Friday, 3 December 2021

लालच के फल* (छत्तीसगढ़ी लोक कथा)

 *लालच के फल*  (छत्तीसगढ़ी लोक कथा)

एक गाँव मा एक झन मरार डोकरा अउ मरारिन डोकरी रिहिस ।दुनो झन बखरी मा साग-भाजी बोंय अउ बेंचे।मरार डोकरा ह रोज बखरी ल राखे बर जाय । इन्द्र भगवान के घोड़ा ह डोकरा के बखरी मा रात के बारा बजे रोज आय अउ साग-भाजी ल चर देय।

मरार डोकरा अपन डोकरी ल बताथे - काकर गरवा ह आथे वो अउ बखरी ल चर के चल देथे।

मेहर पार नइ पावौ।

डोकरी कथे-डोकरा तैंहर आज दिन भर अउ रात भर बखरी मा रबे ।डोकरा हव काहत बखरी मा चल देथे।रात के बारा बजे इन्द्र के घोड़ा आइस अउ चरे लागिस,डोकरा उनिस न गुनिस अउ वोकर पुछी ल रब ले धरिस।घोड़ा उड़ावत डोकरा ल इन्द्र लोक ले जथे।

इन्द्र लोक मा बइठे डोकरा ल सैनिक मन पूछथे -ए डोकरा इहां ते काबर आय हस?तब डोकरा कथे-जा तोर मालिक ल बता देबे अन्नी लेय बिना मेहर इहां ले नइ जावव ,काबर कि तोर मालिक के घोड़ा हर मोर बखरी ल चर देय हे।

सैनिक,इन्द्र भगवान ल जाके सब बात ल बताथे अउ कथे मृत्यु लोक ले एक झन डोकरा आय हे तेहर अन्नी लेय बिना नइ जावव काहत हे।इन्द्र भगवान कथे -अरे सैनिक, डोकरा ल एक काठा हीरा मोती देके घोड़ा ल पहुंचाय बर भेज दे।

घोड़ा डोकरा ल मृत्यु लोक पहुंचा के चल देथे।डोकरी ह डोकरा के रद्दा देखत रथे,ओतकी बेरा डोकरा घर पहुंचथे,अउ अपन खोली के कोनहा मा काठा के हीरा मोती ल रख देथे।

हीरा मोती चमके लागिस ।मरार डोकरा ,डोकरी नइ जानै कि येहर हीरा -मोती आय।डोकरी कथे -ए तो चमकत हाबे डोकरा ।

डोकरी कथे-जा दू ठन ल धर ले अउ साहूकार के दूकान मा दे देबे कहूं खाये पीये के  समान दे दिही ते।साहूकार के दुकान मा डोकरा जाथे अउ देखाथे।साहूकार देख के जिन डारथे कि ये तो हीरा -मोती आय।साहूकार झट ले डोकरा ल पूछथे -काय-काय लागही ग।डोकरा खुश हो के खाय पीये के समान ल मांग डारथे।सामान ल धरके डोकरा ह घर मा आथे अउ डोकरी ल बताथे।डोकरी सुनके खुश हो जथे।अइसने -अइसने दिन बीतत गीस।

एक दिन साहूकार डोकरा ल पुछथे- कस ग तेहा  येला कहां पाय हस?

डोकरा ह सब बात ल बता दिस ,त साहूकार कथे महूं जातेंव जी तोर संग ।डोकरा कथे चल न भइ मोला का हे।

साहूकार ह अपन घरवाली ल बताथे कि मे हा डोकरा संग जावत हंव,एक काठा हीरा -मोती हमरो घर आ जही।साहूकारिन कथे-साहूकार महूं तूंहर संग जातेंव ते दू काठा आ जतिस।ये सब बात ल सुनके साहूकार के बेटा कथे- महूं जातेंव ग तीन काठा आ जही।ओकर बहू कथे-महूं जाहूं तुंहर मन संग ,चार काठा आ जही ।हमन मंडल हो जबो,पूरा गाँव ल बिसा डारबो।चारो झन डोकरा संग गइन।डोकरा कथे ठीक अधरतिया के बेरा घोड़ा ह आथे,मेहा आही तंह ले रब ले घोड़ा के पुछी ल धरहूं अउ साहूकार मोर गोड़ ल धरबे,तोर गोड़ ल तोर घरवाली धरही ,तोर घरवाली के गोड़ ल तोर बेटा धरही ,वोकर गोड़ ल तोर बहू धरही।अइसे तइसे करत रात के बारा बजिस अउ घोड़ा आइस तंह ले रब ले डोकरा ह पुछी ल धरिस।येती साहूकार,वोकर घरवाली ,वोकर बेटा ,वोकर बहू सब एक दूसर के गोड़ ल धरिन।अब घोड़ा ह उड़ाय लगिस साहूकार पुछथे,- तोला देय रिहिस ते काठा कतका बड़ रिहिस डोकरा ?

डोकरा साहूकार के बात ल सुन के कथे-अतका बड़ रिहिस साहूकार कहिके घोड़ा के पुछी ल छोंड़ परिस।सबों के सबों भड़भड़ ले भुइंया मा गिरिस।डोकरा ह साहूकार के उपर लदागे अउ सब झन खाल्हे मा चपकागे।साहूकार के संग वोकर घरवाली ,बेटा,बहू सबों झन मर जथे,डोकरा भर बांच जथे।

येकरे सेती केहे गेय हे,फोकट के चीज बस के लालच नइ करना चाही।जादा लालच करई ह जिव के काल होथे।

दार भात चुरगे मोर कहिनी पुरगे


*भोलाराम सिन्हा डाभा*

जइसन ला तइसन

 : जइसन ला तइसन

एक ठन राज मा भीम नाम के राजा रहय। राजा बड़ धनवान रहय। बडे़-बडे़ महल अटारी मा खजाना के भंडार भरे रहय। तभो ले राजा के नीयत हर बेरा कुबेरा डोल जाय। राजा के परोस मा गरीब किसान रहय। छितका कुरिया मा कइनो गुजर बसर होय बपुरा के। फेर घर बनाहूँ

सोच के १० कुन्टल छड़ घलो मँगा लिस। फेर रखे कहाँ घर मा ठउर नइ रहे। वोला राजा के सुरता आइस, अतेक बड़ महल हे, छड़ मड़ाय के जघा मिल जाही, सोच के किसान राजा के महल पहुँचिस। कथे "महराज मँय घर बनावत हँव,मोर नानकन घर मा छड़ मडा़य के जघा नइये। किरपा करके अपन महल मा जघा दे देतेव मालिक।' राजा कथे 'जा कोठार मे मढ़ा दे'। किसान राजा के कोठार मे छड़ ला जतन देथे। येती किसान घर बनाये के शुरू करथे त छड़ के जरूरत परथे,किसान राजा के महल मे जाके कथे' महराज मोला अपन घर बर अब छड़ के जरूरत परत हे त मँय छड़ ला अपन घर ले जाना चाहत हँव। राजा कथे 'तोर छड़ ला तो घुना खा दिस जी' सुन के किसान दंग रहि जथे। कहूँ छड़ ला घुना खाही।अकबकाये किसान हा राजा के चाल ला समझ जथे।अउ मने मन सबक सिखाये के योजना बनावत कलेचुप लहुट जथे।किसान अपन बाई दुनो कुछु सोच बिचार करथे अउ दूसर दिन गाँव भर के लइका मन ला अपन घर खाना खाय के नेवता भेजथे। राजा के बेटा ला घलो भोजन के नेवता देथे। गाँव भर के लइका मन आथे किसान सबला पेट भर भोजन कराथे। राजा के बेटा घलो आथे। सब लइका खाना खा के अपन अपन घर चल देथे। 

येती किसान हर राजा के बेटा ला घर नइ जान दे अउ  पठौहाँ मे धाँध देथे। बेटा नइ लहुटे ले राजा ला चिन्ता हो जथे। वो अपन नौकर ला भेजथे किसान के घर। त किसान कथे राजा के बेटा ला तो चील लेगे। चील ले गे- - चील ले गे - - चारो कोती हल्ला हो जथे। राजा सुनथे ता बाय बियाकुल हो जथे।

 राजा तुरते पंचायत सकेलथे। चारो कोती सइमो- सइमो, आखिर राजा के पंचायत ये। किसान ल बलाय जाथे। राजा कड़क के पूछते 'बता मोर लइका कहाँ हे।वोतेक बड़ लइका ला चील कइसे उठाइस होही' ।किसान हाथ जोड़ के कथे ' कइसे नइ उठा पाही महराज जब छड़ ला घुना खा सकथे ता लइका ल घलो चील उठा सकते'। राजा सकपका जथे अउ मुड़ी ला नवा दे थे। राजा भरे सभा मा अपन गलती ला कबूलथे अउ छड़ ला लहुटा देथे।अउ किसान ह राजा के बेटा ला। 

सीख - दूसर के जिनिस मा  लोभ नइ करना चाही। ना कोनो ला कमजोर समझना चाही। 


शशि साहू बाल्को नगर कोरबा।

छत्तीसगढ़ी लोककथा-- *राजा के नियाव--*

 छत्तीसगढ़ी लोककथा--


*राजा के नियाव--*


एक सहर म एक राजा रहय। ओहा बने ढंग से राज-काज करत रथे। राजा के सारा ह राज दरबार के चपरासी रहय। एक दिन राजा अपन राज म नवा मंत्री बनाये बर अपन सारा चपरासी ह बलाथे अउ कथे। जा इहाँ के एक झन परमुख आदमी ल बलाके लानबे। जेला हमन अपन राज-दरबार म मंत्री बना सकन। राजा के बात ल मानके उंकर चपरासी गांव म जाथे अउ एक झन परमुख आदमी ल बुला के लानथे। राजा ओकर गुण-दोष ल अनताज के अपन नवा मंत्री बना देथे।


नवा मंत्री अब्बड़ गरीब रिहिस,फेर ओकर भरा-पुरा परिवार रहय,पांच झन बेटा,पांच झन बहु अउ पांच झन नाती घलो रहय। लंबा परिवार म सबो के पेट पलाई-पोसईम बड़ मुस्कल होवय। फेर का करबे राजा कर अपन इज्जत के सेती मंत्री अपन मेंछा म एक ठन भात ल हरदी ले रंगा के लगा ले अउ राज-दरबार म जावय। राजा ल भोरहा होवय कि मंत्री अच्छा भोजन करथे तभे तो ओकर मेंछा म रोज पिंयर-पिंयर भात ह लटके रथे। पर समस्या रहय येकर के दूसर।


एक दिन मंत्री के पांचों बहु मन घूमे बर जाए रथे त परोसी गांव म बने ढंग ले पेटी-तबला मन बाजत रहय जेहर अब्बड़ नीक लगत रहय। पेटी-तबला के सुघराई ल सुन ल बड़े बहु ल अपन देरानी मन कथे। अई! सुनतहो बहिनी हो, ये मरे गरवा के मांस हर कतका मिठावत हे। सबो देरानी-जेठानी मन घलो कथे हव  बहिनी अब्बड़ गुरतुर लागत हवे न! चलो न हमू मन एकात दिन अपन ससुर ल कहिबो अउ मरे गरवा के मांस ल मंगा के सुवाद लेथन। सबो देरानी-जेठानी मन एक सुर ल बड़े बहु के सुर म सुर मिलाइन।


ये सबो बात ल राजा के चपरासी सुनत रथे,राजा ल खुश करके इनाम पाए के लालच म ओहा राजा ल जाके सबो बात ल फोर-फोर के बता देथे। राजा बहिया जाथे के मोर राज म कइसे कोई मनखे मरे गरवा के मांस ल खा सकत हे। चपरासी कथे- नहीं महाराज अईसन होवईया हे,अउ कहि नई करहू ते हो कि रही। राजा चपरासी के अईसन बात ल सुनके कहिथे-जावव कोन अईसन गलती करत हे वोला मोर कर पेस करव भला। चपरासी कथे महाराज-अउ गलती ह सिद्ध होही त का इनाम रही! राजा -अगर ये बात सही हवे तो सिद्ध करईया ल पांच गांव इनाम म देय जाहि। अब तो पांच ठन गांव चपरासी के आँखी म झूलत रहय।


चपरासी मंत्री के घर जाके बहु मन ल बताथे की तुमन ल राजा साहब अभी बलात हे। का होगे हे चपरासी तेमे हमन ल राजा साहब बलाही! बड़े बहु चपरासी ल हड़काइस। तुमन वो दिन कइसे मरे गरवा के मांस खाबो कहत रेहेव-चपरासी वोमन धांदे के प्रयास करिस। कलबिल-कलबिल गोठबात ल सुनके घर के जम्मो झन जुरियागे। बड़े बहु कथे-का परमान हवे तेमे, कुछु बताबे। परमान हवे! में खुदे बड़े जनिक परमान हो,जे अपन कान से सुने हो। चलो तुमन सब राजा के पास। अब पता चलही तुमन। चपरासी अपन जीत के आस म अब्बड़ मने-मन खुश होवत रहय।


मंत्री के जम्मो बहु मन ल चपरासी राजा के तीर म पेस करिस। राजा कड़क के पूछिस- कइसे बहु हो! तुमन अपन ससुर ल मरे गरवा के मांस घर मे मंगा के खाबो कहत रेहेव, ये बात कतका सही हवे। येती चपरासी मुसमुसावत हवे कि अब तो मजा आही। बहु मन समझ जाथे कि येहा ललचाहा चपरासी के चाल आये। राजा ल कथे- महाराज तुमन एककन हमर संग दरबार ले दरबार ले बाहर निकलहु त सबो बात साफ-साफ हो जाहि। राजा अपन मंत्री मन सन तैयार होके निकल जाथे। मंत्री के बहु मन राजा ल परोसी गांव के तीर म सुनावत नाचा-गम्मत के आवाज तीर ले जाथे। उन्हा पेटी,तबला,ढोलक, मंजीरा के सुर-ताल बड़-नीक लगत रहय। जब-जब गीत के ताल म उतार-चढ़ाव आथे तबला अउ ढोलक वाले मन के हाथ बम-बम करत गुचकेलत आवाज निकालय। देखइया मनखे मन के मन गदक जाये,अउ झुमरे ल लगय। राजा संग सबो मनखे मन घलो अब्बड़ खुश होगे।


अब मंत्री के बड़े बहु ह राजा ल कथे-कस महाराज ये तबला अउ ढोलक के बम-बम के आवाज ह तुमन ल कईसे लगत हवे। राजा कथे-वाह वाह वाह! बहुत सुग्घर लगत हवे,बहुत सुघ्घर। बड़े बहु कथे- ये तबला अउ ढोलक म का छवाय हवे महाराज। राजा- ये तो मरे गरवा के मांस मन ताय बेटी। तहन फेर बहु ह कथे इही तबला अउ ढोलक के सुघ्घर धुन ल हमन सुनेन त सबो देरानी-जेठानी गोठियावत रेहेन कि देख तो बहिनी! ये मरे गरवा के मांस कतका मिठावत हवे,हमू मन एकात दिन हमर ससुर ल कहिके घर म इहि पेटी,तबला अउ ढोलक मंगा के इंकर सुवाद ल लेतेन। तेला ये चपरासी ह  हमन ल मरे गरवा के मांस ल खाबो किहिसे कहिके बताये हवय। अब तुहि मन नियाय करव महाराज! हमन का गलती कर परे हन।


राजा ल अपन आप म शर्मिंदा होय ल लागिस अउ चपरासी ल नंगत के दमकावत कथे-कइसे रे! तोर कान म बोजाय कनघौवा ल निकाल अउ आँखी ल घलो बने धो। कोन का किहिस अउ का ते सुने-समझे। राजा खिसियाके चपरासी ल ओकर पद ल छोड़ा देथे। बहु मन के बात म खुश होके इनाम के पांच गांव ल राजा साहब सौप देथे।


ककरो बात ल पूरा सुने अउ समझे बिना कोई दूसर मतलब लगाए ले अपने हानि होथे। हमन ल ककरो बात ल पूरा सुन अउ समझ के आगे काम करना चाही।




लोककथा--रामसिंग सेन

संकलन-- हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगांव

सुरता// शीला बिनई अउ भक्का लाड़ू के खवई...

 सुरता//

शीला बिनई अउ भक्का लाड़ू के खवई...

    जाड़ के आगमन के संग छत्तीसगढ़ के खेत-खार म धान लुवइया मन के आरो मिले लगथे. जेती देखव तेती हंसिया डोरी धरे किसान परिवार के सदस्य अपन-अपन उदिम म भीड़े दिख जाथें. कोनो ओरी धर के धान लु-लु के करपा रखत दिख जथे, त कोनो करपा मनला सकेल-सकेल के बोझा बांधत, त कोनो ओ बंधे बोझा मनला एक जगा सकेल के छोटे खरही असन रचत. इही बीच म घर-परिवार के छोटे-छोटे लइका मन किंजर-किंजर के शीला बीनत.

    ए बड़ा मोहक दृश्य होथे. हर गाँव म अउ हर खार म अइसन मनभावन नजारा देखब म आथे. हमूं मन जब गाँव म राहन, त प्रायमरी ले लेके मिडिल स्कूल के पढ़त ले ए उदिम म मगन राहन. बिहनिया स्कूल जाए के पहिली तीर-तखार के खेत म धमक देवन, अउ संझा स्कूल ले लहुटे के पाछू थोक दुरिहा के खेत मन म घलो अभर जावत रेहेन.

   धान लुवई ले लेके शीला बिनई अउ बढ़ोना बढ़ोई ले लेके धान मिंज के ओसाई अउ ओला कोठी म सहेजई तक अइसन बेरा होथे, जब इहाँ के किसान मन म औघड़दानी के रूप सहज देखे जा सकथे. हमन जब शीला बीने बर जावन त ए जरूरी नइ राहय के अपनेच खेत म जावन. जेने खेत म बोझा बांधे के बुता चलत राहय, उहिच म अभर जावन. खेत वाले मन घलो हमन ल देखय, तहाँ ले पढ़इया लइका मन आए हे कहिके जान-बूझ के बोझा ले धान ल गिरा देवंय, तेमा हमन ल आसानी के साथ जादा ले जादा शीला मिल सकय. कतकों खेत वाले मन तो हमन ल आज अपन खेत ले बोझा डोहारबो कहिके अपनेच मन संग गाड़ा बइला म बइठार के लेग जावंय, अउ शीला बीने के बाद लहुटती म गाड़ा म बइठार के बस्ती डहार लान देवंय घलो. जेन दिन बढ़ोना बढ़ोवंय, तेन दिन तो बढ़ोना के पूजा-नेंग के बाद खीर सोंहारी चघावंय, तेला खाए बर घलो देवंय.

    स्कूल के छुट्टी राहय, तेन दिन हमर मनके गदर राहय. बस बिहनिये नहाए-धोए के बाद खेत के रद्दा. हमर मन के चार-पांच लइका के टोली राहय. इतवार या छुट्टी के दिन शीला बीने के संगे-संग खारेच म पिकनिक घलो मनावन. सबो लइका अपन अपन घर ले रांधे-गढ़े के जिनिस धर के लेगन. ए सीजन म तींवरा भाजी घलो बने फोंके-फोंक ल सिलहो के रांधे के लाइक हो जाए रहिथे, तेकर चिखना तो बनाबे करन. बोइर मन घलो गेदराए ले धर ले रहिथे, वोकरो मन के पोठ मजा लेवन. हमर गाँव म खार के बीचोबीच कोल्हान नरवा बोहाथे. एकर दूनों मुड़ा के कछार म जाम के कटाकट बारी हावय. अउ इही जाड़ के दिन ह एकर सीजन आय. जम्मो बारी मन म गौंदन मता देवत रेहेन. उहाँ साग-भाजी अउ कतकों जिनिस के खेती होवय. सबके मजा ओसरी-पारी लेते राहन.

     शीला बीने ले जेन धान मिलय, तेला बने गोड़ म रमंज-रमंज के मिंजन अउ सकेलन. कमती राहय तेन दिन पसरा वाली घर जाके कभू मुर्रा, त कभू मुर्रा लाड़ू अउ कभू लाई के बने भक्का लाड़ू के सेवाद लेवन, अउ कोनो दिन शीला ह थोक जादा सकला जावय, तेन दिन वोला दुकान म बेंच के इतवार के पिकनिक खातिर जोखा करन.

     फेर अपन लइकई के ए सब बात ल गुनथन, अउ आज के दृश्य ल देखथन त एमन अब सिरिफ सपना बरोबर लागथे, काबर ते आज वैज्ञानिक आविष्कार के चलत खेतिहर मजदूर मन के जगा बड़े बड़े ट्रैक्टर अउ हार्वेस्टर ह जगा ल पोगरा लिए हे. न तो खेत म बने गढ़न के धान लुवइया दिखय, न बोझा बंधइया अउ न शीला बिनइया. हाँ कभू-कभू उहू जुन्ना दृश्य मन घलो एती-तेती दिख जाथे, फेर बहुत कम संख्या म.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

फोकट के सलाह* - *लक्ष्मण मस्तूरिया*

 *फोकट के सलाह* -

 *लक्ष्मण मस्तूरिया* 


चाहे महामुरुख मनखे होय चाहे महापंडित, बिन मांगे सलाह के कभू कदर नहीं करैं। तभो ले फोकट म सलाह देवइया अपन सुमत-सलाह माने, ज्ञान बाँटे के काम म लगे रथें। अइसने काम लेखक कवि और कलाकार मन करथें। तइहा समे ले मनखे ल जिंदगी के नीत-नियाय सिखाए बर कतको बड़े-बड़े पोथी ग्रंथ लिखाए पड़े हें फेर मनखे के जात गुनबोरा, फोकट के सीख-सलाह ल माने बर तियार नइ हे। अमीर होय के गरीब, ज्ञानी होय के अज्ञानी, अपनेच मन के करथे। अपने मन मुताबिक गोठ-बात वाले ल पसंद करथे। तभो ले कहूँ गलती होंगे5, नुकसान होगे, ठोकर लागिस तहाँ दूसर के नाम लेके, अपन पय ल लुकाथें। कतेक जुग बीत गे, बड़े-बड़े संत-साधु, महात्मा, ज्ञानी-ध्यानी, तपसी-त्यागी मन ए मनखे जात ल सुधारे बर, सुमत-सलाह सीख भरे बेद-पुरान ले लेके, आज के हाँसी-ठट्ठा मा समाए ज्ञान-गोठ के रचना करे हें। फेर वाह रे मनखे चोला, सरहा डुमर खोला, तोर मन के भेद भगवान घलो नइ जान पाथे।

मनखे के मन ल बाँधे-छाँदे के काम जुन्ना रिसी-मुनि मन करत रहिन। तपस्या म लगे रहें। भूख-प्यास म मन अल्लर पर जाथे, फेर जेती रेंगाबे वोती रेंगथे। ए भेद ल तपस्वी मन जानथें।  मनखे ल सुधारना हे तब वोला पेट ले उबरन मत दौ। खाली पेट मुरुख अउ पंडित के अंतर ल पाट देथे। भूख म दुनों सिरिफ भोजन के गुन गाथें। भूख के घलो भारी महात्तम हे। ज्ञानी ल मुरुख अउ मुरुख ल ज्ञानी बनाये के काम भूख करथे। ज्ञान-विज्ञान सब पेट भरे के चोंचला होथे। मनखे ल सिखाना पढ़ाना हे तब पेट भरे के सुग्घर रद्दा गढ़ना परही। बिन मेहनत के भूख बाढ़त जाथे, नवा-नवा भूख जनमथे। बिन मेहनत के कमाई खाये म पेट फूलथे, अपच होथे अउ बिन मेहनत के खाथें वोमन ल नवा-नवा बेमारी घलो होथे। इही मन बर तुलसीदास जी लिखे हें - पर उपदेस कुसल बहुतेरे। मनखे ल जतके सुधारथें, वोतके बिगड़थे। एकरे बर सियान मन खुद के सुधार करे के काम ल महान काम बताथें। फोकट म सलाह लेना देना दूनो बेकार होथे। अपन मन के भड़ास ल निकाले बर कोनो कुछू सलाह देत हे, वोला भला कोन मानही? तोला अइसे करना चाही, तोला वइसे करना चाही कहइया मन ल खुद पता नइ रहे के वोला का करना चाही। सलाह के सार तभे हे जब कोनो वोकर मोल समझे, वोकर जरूरत जाने। सलाह लेना अउ देना बने होथे, फेर बिन मांगे फोकट के सलाह ले बचना चाही।


*लेखक - लक्ष्मण मस्तुरिया*

(छत्तीसगढ़ी गुनान गोठ ले साभार)

भूख के जात

 भूख के जात 

                     मरे के जम्मो कारन के कोटा तय रहय ….. फेर जब देखते तब , जइसे सरकारी दुकान ले दूसर के कोटा के रासन ला .... गाँव के सरपंच जबरन लेगय , तइसे भूख हा दूसर कोटा के मौत नंगाके मनखे ला मार देवय । भगवान के नियम म खलल परय । भगवान हा यमदूत ला अइसन नियमखोरी करइया ला खोज के लाने बर भेजिस । यमदूत मन धरती म अइसन भूख ला खोजत अइन । इहाँ अइन त देखथे के इहाँ तो भूख के कइठिन जात रहय ....... । ओमन सोंच म परगे .... भगवान कते भूख ला लाने बर केहे हे । सबे भूख ला धरके लेगे अऊ भगवान के दरबार म हाजिर कर दिस ।                    

                    एक ठिन भूख हा जइसे भगवान के आगू म खड़ा होइस तइसे ... भगवान बरस गिस ओकर बर । भगवान केहे लगिस - कस रे तोला कहीं लागथे ? जब पाये तब अऊ जेला पाये तेला .. ढनगा देथस । धरती के मनखे कस ... दूसर के बाँटा ला नंगा लेथस । तोर सेती कतका समस्या पैदा होगे हे । तैं जनता ला अइसने मारबे त .... हमर नियम धरम के काये आवसकता ? देख कतका अकन तोरे कोटा म .... मरके आये हें । भगवान के बड़े स्क्रीन वाले कम्प्यूटर म तरी उपर लास देख के भूख किथे – तोर कसम गो .... ये मन मोर मारे नोहे .... । हमला दूसर के बाँटा नंगइया नेता समझथस का भगवान .... ? गऊकिन .... अपन बर निर्धारित कोटा ले उपराहा एक ठिन मनखे नइ मारे हँव ...... । पहिली कस समे नइ रहिगे भगवान .... तैं का जानबे .... मनखे ला मारे बर कतेक उदिम लगाये बर परथे तेला ........ कतका पछीना ओगारथँव तेला मिही जानहूँ । भगवान किथे - लबारी मारथस रे ? भूख किथे - दईकुन गो ..... लबारी नी मारँव भगवान । उहाँ एक रूपिया किलो म चऊँर .. पिये बर सरकारी दारू अऊ रेहे बर घर मिलत हे । कोन मरही मोर ले भगवान ? अऊ बीते कुछ समे ले जनता के पेट भरे बर नावा किसिम के मोबाइल आगे हे ... जेकर बटन चपकतेच साठ ... अनाज के दाना झरझर झरझर गिरत हे .... मनखे के पेट कहाँ उना रइहि तेमा .... । चित्रगुप्त कोती देखिस भगवान  ……..  वहू अपन कम्प्यूटर म देखत ....... हाँ म हाँ मिलइस । पेट के भूख ला सनमान सहित वापिस लहुँटे के आज्ञा मिलगे । भगवान सोंचे लगिस .... कोन येकर नाव ले पाप करत हे ? भगवान हा प्रस्नवाचक मुहूँ बनाके चित्रगुप्त कोती देखिस त ओहा ... दूसर भूख ला खड़े कर दिस आगू म । 

                    चित्रगुप्त बताये लगिस - धरती म भूख के कतको धरम जात अऊ समाज बन चुके हे । काकर बूती ... बिन पारी के मनखे मरत हे तेला ... मोर कम्प्यूटर बता नइ सकत हे । जइसे येला जाने के कोसिस करथँव नेट बंद हो जथे ..... तेकर सेती सबो जात के मुखिया भूख मनला लाने गेहे । भगवान पूछथे – जात .......? येमन मनखे कस बिगड़ गेहे का रे .....? येमन ला जात बनाये के कोन आज्ञा दिस ? चित्रगुप्त किथे - भगवान , जात बनाये बर कनहो ला केहे नइ लागे , चार झिन जुरियइन तहन नावा समाज अऊ नावा धरम खड़ा हो जथे । जेकर सुआरथ पूरती नइ होये तिही मन राजनीतिक दल कस अपन जात खड़ा कर लेथें । ये जात हा मनखे के उपज आय , हमर रचना नोहे भगवान । भगवान किथे - येहा कोन जात के भूख आये ? भूख खुदे केहे लागिस – मोर सेती मनखे मरथे कहाँ भगवान तेमे मोला हथकड़ी पहिरा के ले आने हव ? मेहा तो अइसे जगा म रहिथँव जेला तोपे बर धरती के हरेक मनखे ला उदिम करे लागथे । भगवान पूछिस – का ...... पेट म नइ रहस तेंहा ? भूख किथे - मेंहा पेट म नइ रहँव भगवान .... पेट के खालहे म रहिथँव । भगवान मुहूँ फार दिस । चित्रगुप्त किथे – भूख के रेहे बर पेट म जगा बनाये हाबन ? तोला कोन पेट के तरी म रेहे के परमीशन दिस । भूख किथे – हमर जात के भूख ला रेहे बर काकरो परमीशन के आवसकता निये । पेट के खालहे म जगा दिखिस तहन ....... मन पटवारी .. के जेब गरम करके अपन नाव म खालहे पारा के रजिस्ट्री करवा डरे हाबन । भगवान हा चित्रगुप्त कोती कननेखी देखिस । चित्रगुप्त किथे – येहा मनखे के वासना के भूख आय भगवान ...... येकर ले मरथे तो बहुत कम फेर …….. फेर येकर बर कतको झिन मरथे .......। येला मेटाये बर कतको धरमगुरू साधु संत पादरी मौलवी मन बड़े बड़े असपताल खोल के बइठे हाबय । फेर अपने असपताल म उही मन इही भूख के सिकार हो जथे .........। यहू ला छोंड़ दिस ।

                     सुसकत खड़े दूसर भूख ला पूछत रहय भगवान - तैं कोन अस जी अऊ कते मेर रहिथस ? काबर रोवथस ? निच्चट दुब्बर पातर भूख हा सरम के मारे मुड़ी गड़ियाये रिहिस । हूँकिस ना भूँकिस । चित्रगुप्त किथे – ये भूख हा मनखे के कभू आँखी अऊ कभू दिल म रहिथे । ये प्रेम के भूख आय । येला दुनिया म जम्मो झिन अपन सुआरथ के सेती चाहथें । येकर मरम ला ना कनहो जानय । ना येकर करम ला कनहो निभावय । ये अपन अस्तित्व बर खुदे तरसत मरत हे ..... कनहो ला काये मारही । ये भूख अपन प्रजाति ला बचाये के गोहार करत रो डरिस । यहू छूटगे ।

                    अगला भूख हा सुघ्घर पहिरे ओढ़हे रहय । खुसरतेच साठ दरबार महर महर महमहाये लगिस । कतको झिन हाली मोहाली संग म अइस । इही दोसी भूख होही कहिके आते आत जमदूत के सोंटा लहराये लगिस ........ सेवा करइया मन भाग गिन । चित्रगुप्त किथे – येहा पइसा के भूख आय भगवान । येला मेटाये बर जतको खाबे ... येहा ततके बाढ़थे । येहा अपन बलबूता म बहुतेच काम कर सकत हे । दूसर के पछीना ला अपन देहें म चुपरके महकत मजा मारत किंजरत हें येमन । इही भूख के सेती मनखे मनखे म दूरी बाढ़त हे । इही भूख हा मनखे ला अपन नता रिसता के त्याग करे बर मजबूर कर देथे । येकर बर जे जादा मरथे तिही ला निपटाथे येहा ........। भगवान तिर येकरो अपराध सिद्ध नइ होइस । यहू बरी होगे । 

                    ये दारी के भूख हा ... जइसे दरबार म खुसरिस तहन ..... कितको झिन हाथ जोर के खड़ा होगे । ये भूख हा नाव के भूख आय । येला कोन नइ जानय । अपन नाव चलाये बर का का नइ करय .... । एके ठिन बात ला घोर घोर के केऊ ठिन मीडिया म बगरा के अपन नाव ला जनाये के उदिम लगावत रहिथे । ये भूख बहुत झिन उप्पर सवार होथे फेर बहुत कमती मन ला पार लगाथे । कितको झिन मरत ले नइ छोंड़य येला । येहा मनखे ला मारय निही फेर अपन नाव के उप्पर म या बरोबरी म कनहो ला झिन आय कहिके कतको उदिम म लगे रहिथे । इही भूख हा दूसर के नाव मेटाके अपन नाव ला जगजाहिर करे के डिगरी अऊ पी एच. डी. देवाथे । कतको कस पदम पुरूसकार इही भूख के सहारा अऊ भरोसा म मिलथे । चित्रगुप्त अइसन बतातेच हे तब तक भगवान हा यहू ला वापिस लेग जाये के इसारा कर दिस । 

                     खूनाखून दिखत भूख ला आवत देखिस त भगवान समझगे ... इही आय मौत के असली जुम्मेवार । हाथ म गोला बारूद बनदूक तलवार धरे रहय । भगवान खुद डर्रागे । भगवान काँपत पूछथे – तिंही हरस का जी ..........? डर के मारे आरोप घला नइ लगा सकत रहय भगवान । चित्रगुप्त ला तिर म बला के किहिस - तिहीं हकन के पूछना येला ...... । मेहा कहूँ त मुही ला झिन मार देवय । तैं पूछबे अऊ तोला मारीच दिही त मेंहा तोला फेर जिया दुहूँ अऊ मोला मार दिही त तैं भगवान कहाँ ले लानबे । भगवान के मन म डर हमागे । चित्रगुप्त किथे - रावन ... कंस अऊ हिरण्यकस्यप कस राक्षस मन ला चुटकी म मरइया भगवान के चेहरा म अइसन डर शोभा नइ दय । तूमन काबर डर्राथव भगवान ? भगवान किथे - राक्षस मन मोर संरचना रिहीस अऊ येहा मनखे के आय .... तेकर सेती डर लागत हे । चित्रगुप्त किथे – डर्रा झिन । येला जब तक बड़का भूख आदेस नइ देवय तब तक ..... ये कनहो ला नइ मारय । अपन जरूरत बर अभू तक काकरो शिकार नइ करे हाबय येहा । ये हिंसा के भूख आय । जब तक कनहो उकसाये निही तब तक ... येकर हाथ ले हथियार नइ छूटय । त ये लहू म सनाये कइसे दिखत हे ? भगवान फेर पचारिस । चित्रगुप्त किथे - येकर निवास स्थान लहू आय भगवान तेकर सेती .....। यहू छूटगे ।

                     भगवान किथे – चित्रगुप्त .... जतका अकन भूख अभू अइस तेमा .... कनहो भूख म अतेक अकन मनखे मारे के क्षमता निये । तूमन गलत रिपोट देके बपरा भूख ला काबर बदनाम करत हव । चित्रगुप्त किथे - एक ठिन भूख अऊ बाँचे हाबय । तभे भूख भइया की जय के नारा सुनई दिस । नारा लगइया मनला बाहिर म रोके नइ सकिस यमदूत मन । भूख हा ... संसद कस …… समर्थक संग ..... परिवारसुद्धा .... दोरदीर ले खुसरगे । भगवान किथे - तिहीं हरस रे .... अतेक कन मौत के जुम्मेवार । वो किथे - कोन कथे ....... ? कोन कथे ....... के मिही अतेक मनखे के मौत के जुम्मेवार आँव कहिके .... पूछ येमन ला ....... । देखा सबूत ...... । जुबान लड़ाये बर धर लिस अऊ बहुमत ले जीते कस भगवानेच के खुरसी कोती अमरे लागिस । चित्रगुप्त भगवान के कान म फुसुर फुसुर केहे लागिस – मोला समझ नइ आवत हे भगवान । मोर रिकाड म इही भूख के कोई लेखा जोखा निये । बिगन सुनवई सबूत के अभाव म यहू भूख हा नेता कस छूटगे । 

                 भगवान ला आखिरी वाले भूख उपर शक होगे । ओहा चित्रगुप्त संग कम्प्यूटर बिसेसज्ञ ला धरके इही भूख के पाछू पाछू धरती म पहुँचगे । तलास अऊ तफतीस म भगवान पइस के ..... ये भूख हा चित्रगुप्त के कम्प्यूटर म .... राजनीति नाव के अइसे वाइरस डार दे हाबय ..... जेहा  कभू काकरो पकड़ म नइ आ सकय ...... । ये भूख हा मनखे के दिमाग म रहिथे । मनखे के अकाल मौत के जुम्मेवार इही आय फेर येकर ताकत के डर म ..... येकर खिलाफ कन्हो गवाही देबर खड़ा नइ होय । भगवान जान डरिस के .... येहा सत्ता के भूख आय जेहा .... कतको लास बिछा के घला शांत नइ होय । इही भूख ला शांत करे बर ..... मनखे हा ..... कतको के दुरदसा कर देथे अऊ कतको ला मार के ढनगा देथे । ये अइसे भूख आय जेकर उप्पर बिजय पाये के बाद .... मनखे हा पहिली ले अऊ जादा भुखाके ..... तपनी तपे लगथे । इही भूख के साथ देवइया मन भुकुर भुकुर के खाथे अऊ बिरोध करइया मन इही भूख बर भुखा जथें ....... । भूख के इही जात ला खतम करे बर .... उही दिन ले सरग म भगवान हा ..... लांघन भूखन रहिके तपस्या म जुटगे ........ ।  

    हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

छत्तीसगढ़ी में पढ़े - व्यंग्य काखर संग बिहाव करबे?

 छत्तीसगढ़ी में पढ़े - व्यंग्य 

काखर संग बिहाव करबे?

दुर्गा प्रसाद पारकर

चिन्ता ले चतुराई घटे दुख ले घटे शरीर, पाप पुण्य ले लक्ष्मी घटे कह गये दास कबीर ह राम परसाद उपर उतर गे हे, तभे तो धन्धा के चिन्ता म रहेर रेगड़ा हो गे हे। वधु चाहिए, टूरा के रंग साफ, ऊंचाई-चार फूट पांच इंच, काम शिक्षा विभाग, वेतन चार अंको में, इच्छुक मनखे ये पता म संपर्क करें - राम परसाद मिलनसार, वर वधू भवन, अंगूठा बाजार, दामपुर। के विज्ञापन ह हजारों रुपिया के चुना लगा दे हे। विज्ञापन ल पढ़ के डाँक्टर ह अपन टूरी के बिहाव बर राम परसाद ले भेंट करीस। अंधरा का मांगे दू आंखी कस राम परसाद ल डाँक्टर ह मिलगे। कोनो न कोनो किसम ले ये संबंध ल जोड़ के दू जुवार के रोटी जुगाड़ करना रीहिसे। वर तनी ले परसाद त वधु तनी ले पंचामरीत। दाहिज के समझौता के बाद दोनों तनी ले राम परसाद ह अपन कमिशन ल निथार लीस। घोड़ी म चढ़ के दुल्हा डउका ह जनकपुर बराती संग गीस। बेटा बिहाव हरे मन भर के खरचा करीस दुल्हा राजा के ददा ह। बरात ल देख के लड़की पक्ष वाले मन दंग रहिगे। माईलोगन मन म खुसर-फुसुर होय ल धर लीस- डाँक्टर ह बने दमांद पाय हे दई, बड़हर हे, पढ़े लिखे हे अउ नौकरी म हे। येती डाँक्टर ह अपन नेवतहार अउ बराती मन बर बफर सिस्टम ले पार्टी के आयोजन करे रिहीसे। पार्टी के बखत डाँक्टर के दमांद-बेटी, राजा रानी खुरसी म बइठे टुकुर-टुकुर देखत राहय। जिनगी के सुख-दुख कस झालर संग बराती मन बुगबुगावत राहय। जतका खरचा म नेवतहार मन समान ल लाल कागज म लपेट के लाने राहय ओखर अवेजी म दू पइसा आगर पेट म भर-भर के जावत राहय।

      पार्टी के एक कोंटा म दुलहा के संगवारी मन खावत-खावत ही-ही भकभक करत रिहीस। अबे दुकलहा चपरासी ह कतेक बड़हर ससुरार पाय हे। दूसर ह कथे-दुकलहा के ससुर ह झेलही। जूठा प्लेट ल मढ़ा के तीसर ह कथे- छोड़ न यार ये तो दुकलहा चपरासी के बेवकूफी हरे। अरे भाई जतका जड़ चद्दर ओतके गोड़ ल लमाना चाही नही ते अइसन फुटानी ह खजवा के घाव करई हरे। दुकलहा के बाप ल घलो अपन जोड़ के समाधी बनाना चाही। अभी तो बने लागथे बाबू, जब नर्स भउजी ह दुकलहा के घंटी नइ बजा देही ते मँय मोर मुंछ ल मुडवा  देंहू। चौथा ह कथे- सुनो यार जनम, बिहाव अउ मरन ह ब्रम्हा के रेख हरे। नौकरी वाले बाई किस्मत वाले ल मिलथे। कुटहा बन के खीर खाय म का एतराज हे अउ येला तुमन तो जानतेच हव के दुहानु गाय के लात मिट्ठा। महूं ह दुकलहा के सटका ल अइसने ससुराल खोजे बर कहूं। रामचरण कथे- दुकलहा के बिहाव ल तो राम परसाद ल लगाय हे रे। ये सब बात ल डाँक्टर के संगवारी ह सुन परीस। डाँक्टर ल जा के कथे- तोर दमांद तो घंटी बजइया चपरासी हरे। ये गोठ ह जहर कस चारों कोती बगर गे। डाँक्टर के पारा गरम हो गे। बेटी बिदा नइ करंव कहि के डाँक्टर ह ताव देखाय बर धर लीस। ओतका म सावित्री कथे- नही पापा मय जेखर संग सात भांवर घुमे हंव ओला पति मान चुके हंव। एकाद भांवर कम रहीतिस ते भले देखे जातिस। अब तो पति ह पति होथे वोह चपरासी होय चाहे व्याख्याता।

    बेटी बिदा करे के बाद डाँक्टर ह रातो रात कार म बइठ के सोज्झे राम परसाद के घर जा के बगिया गे। अरे दोगला बईमान, तँय मोला दगा दे देच रे। मोर बेटी ल चपरासी के संग लगा दे, आघु ले काबर नइ बताय ये बात ल। राम परसाद खैनी ल पुरक के कथे- तँय ये सब पुछेस कहां डाँक्टर साहेब, तेमा बतातेंव। धकर-लकर तो तुंही ल होय रिहीसे। मँय तो व्याख्याता होही काहत रेहेंव। राम परसाद ल अब तो जीनगी  भर मुरगा के जघा म मुनगा ल चुचरे ल पर जही। ये कांड के बाद शहर म मुंह देखाय के लइक नइ रही गे। राम परसाद ह।

        राम परसाद ह रोजी-रोटी के खोज म एक शहर ले दूसर शहर पलायन करीस। इही समे पंचायत राज के सोर चलत राहय। राम परसाद नवा ढंग ले अपन धन्धा के शुरुआत करीस। गांव-गांव जा के कुंवारी लड़की मन ल पंच, सरपंच, जनपद सदस्य अउ जिला पंचायत के सदस्य बर उचका-उचका के चुनाव लड़वाए बर भीड़गे। उंखर चुनाव म अपन तनी ले धन लगइस। राम परसाद अपन रणनीति म प्रदेश म बारा आना सफल होगे। अब जम्मो नेता मन राम परसाद ल राम चाचा जिन्दाबाद कहिके नारा लगाय ल धर लीस। येमा राम परसाद के राजनैतिक पकड़ मजबूत होगे। राम परसाद ह जउन शहर ले मार खा के आय राहय ऊही मन ओखर अखंड भक्त हो गे। अब तो पांचो अंगरी घी म। काला खाय ते काला बचाय।

    महिना भर बाद गजट म विज्ञापन पढ़े बर मिलीस वर चाहिए, वधु योग्यता अनुसार संपर्क राम परसाद मिलनसार, दलाल कालोनी चुहकनपुर। ल पढ़ के बिहाव के लइक बाढे टूरा मन के भीड़ बाढ़गे। राम परसाद ह पोस्टर टांग के आफिस जमा के बइठ गे। अउ सबके एक के बाद एक साक्षात्कार लेवन लागे। सब टूरा मन अपन योग्यता प्रमाण पत्र धर के पहुंचे राहय। एक झन मास्टर ह अपन बिहाव के प्रस्ताव ले के राम परसाद के आफिस म ओइलिस। मास्टर के बात ल सुन के राम परसाद कथे- देख भई तोला कइसन वधु चाही? एक ठन फोटू देखा के कथे- ए नोनी ह नींदे कोड़े बर जानथे, भात साग रांधे बर जानथे, मछरी-अंडा नइ खाय फेर अपन परिवार के सुख के खातिर रांध-पोरस सकथे। गोरी हे, चाल चलन बने हे। दूसर फोटू ल देखा के कथे- ए नोनी ह आठवीं पढ़े हे नवा-नवा पंच बने हे। गोठियाए-बताय बर नइ आय तभो ले अपन देवर ल कहवा के पंच बने हे। तीसर फोटो ल देखा के कथे- ये नोनी ह सरपंच बने हे चौथी फेल हे ते का होइस बीस पंच के उपर सरपंच रीहि, योजना उपर खेलही, जइसे जवाहर रोजगार योजना, आवास योजना, निराश्रित पेंशन योजना। येखर पहिली नोनी के बाप ह सरपंच रीहिसे। फेर असो महिला आरक्षित के नाव ले के नोनी के करम ह जागिसे। येसो के पंचायती म गंज अकन अधिकार मिलही जउन भी येखर संग बिहाव करही ओहा गंज सुख पाही पंच मन ल ठेंगवा देखाही। तीसर फोटू ल देखा के कथे- ये नोनी ह जनपद सदस्य हे थोकिन चंट बानी के हे, एखर कमई कम हे फेर इज्जत जादा हे। येखर संग बिहाव करबे ते ओखर फाइल ल धर के सइकिल म बइठार के ब्लाक आफिस जाय ल परही। पांचवा फोटू ल देखा के कथे- येहा जिला पंचायत के अध्यक्ष हे निरक्षर हे ते का भईस, कलेक्टर के गोपनीय रिपोर्ट लिखही। राज्य मंत्री के दरजा मिले हे, लाल बत्ती के कार, बंगला, फोन, सबो के सुख। फेर येखर सन बिहाव करही ओखर बर एक ठन शर्त हे ओला मुड़ गड़ा के रेहे ल परही। राजनैतिक लड़की मन सन बिहाव करबे ते उंखर दाई ददा ल दहिज दे के उंखर सुरक्षा बर बांड भरे ल लागही। अब अपन अवकात ल देख के बता मास्टर काखर संग बिहाव करबे? अभी नइ बता सकत हवस ते काली तोर दाई-ददा ल पुछ के बताबे। मास्टर बिचारा बर-बिहाव म राजनीतिकरण ल देख के दुखी होगे अउ अपन फैसला ल सुनइस- मोला अइसन घरवाली चाही राम चाचा जऊन ह घर-दुवार, खेती खार के काम बूता ल जानय मोला पहिली फोटू पसंद हे, मँय ओखर संग बिहाव करिहंव। नेता मन सन बिहाव करके मोला न तो मुड़गड़ा बनना हे, न तो रजिस्टर धरना हे, न मोला फर्जी काम करवा के देश के पइसा ल खाना हे। हम दुनों परानी आम आदमी रही के देश सेवा करबों।


दुर्गा प्रसाद पारकर