Thursday, 9 December 2021

अंडा ( संस्मरण)*

 *अंडा ( संस्मरण)*


              मँय आरुग भाजी पाला, दार,आलू, बरी, चटनी खवइया मनखे आँव। मास, मछरी, कुकरी, बोकरा इँहा तक कि अंडा ला खवई तो दुरिहा छुवँव तको नइ। फेर भगवान कभू कभू परीछा लेथे। तीन बच्छर पहिली के सुरता आय। एक दिन मय बहनिया दस बजे अपन फटफटी मा इस्कूल जावत रहेंव। मोर आगू आगू एक ठन फटफटी जावत रहिस। वोहा कोनों गांव के दुकान वाला रहिस। अबड़ अकन झोरा गाड़ी मा दूनों पार अरोय रहय अउ पाछू मा दू सैकड़ा अंडा ला लादे रहय। सड़क मा एकक दू ठन फटफटी, कार, ट्रक घलाव आवत जावत रहय। उदुपहा आगू डहर ले एकठन सर्बिस आगे। आगू फटफटी वाला हा लकर धकर अपन फटफटी ला पाइ मा उतारिस।पछलिग्गा महूँ पाइ मा उतारेंव। सर्बिस हा बुलकिस, तेकर पाछू अब आगू फटफटी वाला अपन फटफटी ला सड़क मा चढ़ाय लगिस। कोन जनी काय होइस पाछू चक्का सड़क मा चढ़े के पहिलिच गाड़ी सुद्धा गाड़ीवाला सड़क के पाइ मा गिर के फेंकावत दू उलानबाटी खागे। मय पाछू मा रहेंव लकर धकर ब्रेक मारेंव अउ गाड़ी ला सड़केच मा तीर मा खड़ा करेंव अउ ओ मनखे ला उठाय बर गेंव। ओकर मुड़ी मा माथा करले लहू निकलत रहय। ओकर गर के पंछा ला ओकर हाथ मा धरा के माथा कर ला चपके बर कहेंव। ओकर गाड़ी डहर देखेंव ता मोर मति छरियागे। गाड़ी मा लदाय अंडा के बंधाय डोरी छूट गे रहय अउ दरजन भर ले आगर अंडा हा उही मेर कुचरा के बोहावत रहय। मय धरम संकट मा परगेंव। गाड़ी अउ अंडा ला कइसे उठावंव।गाड़ीवाला उठेबर नइ सकत रहय। सोंचेव मय अकेल्ला ओकर गाड़ी ला उठा नइ सकंव। एक डहर अंडा ला देख के मन भिरगागे। मन काहय अंडा वाला गाड़ी ला कइसे छूबे, दूसर डहर हिरदे नइ मानय काबर कि पेट्रेाल के गिरे असन सुगंध आवत रहय, गाड़ी उठाना जरुरी होगे रहय। ओतकेच बेरा एक झन साइकिल वाला भगवान बरोबर आवत दिखिस। ओला हांका मारके रोकेंव। दूनो मिलके फटफटी ला उठायेन अउ खड़ा करेंन। झोरामन ला सकेलेन। गाड़ी ला उठात बखत एक ठन अंडा मोर पनही (जूता)मा गिर के फूटगे। मोर गाड़ी मा रखाय पानी ला दुकान वाला ला पियायेन। बाँचे पानी ला मोर पनही मा रुतोएंव।दुकानवाला थोकिन सम्हलिस अउ गोठबात करे लगिस तब तक एक दू झन अउ सकलागे। सायकिल वाला हा ओकर अंडा ला कैरेट संग सकेलिस अउ फटफटी मा बांधे लगिस। ओला अस्पताल जायबर कहिके मय अपन  बस्सावत पनही संग इस्कूल गयेंव। दिन भर अंडा के बिच्छर ला सुंघे ला परगे।


हीरालाल गुरुजी "समय"

छुरा, जिला गरियाबंद

कहानी- सोहाई चन्द्रहास साहू

 कहानी- सोहाई

                         चन्द्रहास साहू

                    मो 8120578897


बिहनिया ले उठगे आज ओहा। काबर नइ उठही  ? आज दुसरइया दिन आवय। जम्मो जीव जिनावर भक्तिभाव मा बुड़े रहिथे। पहिली दिन जोरा - जारी, हियाव -नियाव, स्वागत - सत्कार मा निकल जाथे। बच्छर मा एक बेरा आथे कुवार नवराति हा।.. अऊ संग मा आथे सौहत देबी हा...। जोत -जेवारा, डांग - डोरी धजा -पताका     ..  ।   

रिकम - रिकम के बरन । बईगा - गुनिया, चेला - चंगुरी, डीही - डोंगर, देवी - देवता के। दरसन - परसन,सेवा - सटका करे बर। ओला तो आने गांव जाना हावय आज। अपन कला देखाय बर , आदिवासी लोक नृत्य देखाये बर। ओखर दल बेरा परब मा नाचके, झुमके जम्मो दुख पीरा अऊ जिनगी के थकासी ला  बिसरा लेथे अपन गांव मा।  फेर आने गांव के नेवता मा कला देखाये बर घला चल देथे।

            जम्मो लोकनृत्य मा भगवान आराध्य, इष्टदेव के महिमा, ओखर जस अऊ ओला उछाह करे के गोठ रहिथे । चाहे  करमा सरहुल  गौरानृत्य मांदरी डंडा रहस पंथी गेड़ी राउत नृत्य होवय। लोकनृत्य घला भक्ति के माध्यम आय । शहर के ओन्हा ओढ़ईया कस्बा अऊ बड़का शहर मा ये गांव महुआटोला के नांव के सोर अब्बड़ हावय ।

                मन मंजूर अऊ गोड़ मिरगा के होगे हे आज ओखर । भिनसरहा भईसा मुंधियार रिहिस तभो ले कतका बुता कर डारिस। गाय बछरू के जतन पानी । गोबर - कचरा,बरतन - बासा .. जम्मो बुता । बम्बर बारके परछी ला करिया मा, अऊ लाल घेरू माटी मा कोठ ला खुटिया डारिस । उपका डारिस काली के बाचे खोचे ला ..। माटी के घर खपरा वाला अऊ छानी के टिप मा बइठे सोनचिरई ..। सिरतोन कुम्हार हा अभिन लान के मड़हा देय हावय अइसे लागत हावय। बढ़ई अभिन घर ला बनाये होही।  सरई अऊ बीजा लकड़ी के काड़ - कगड़ी, खिड़की - कपाट, खइरपा तक हा सुघ्घर उज्जर नवां - नवां दिखत हावय । सुरुज नरायेन सोनहा अंजोर बगरावत हे ..। सीत बरसे ले सुघ्घर लागत हे। ससन भर देखिस अपन घर ला मुचकावत । सुरहीन गाय के गोबर ले लिपाये अंगना ला, खीरा कुंदरू के झूलत बारी ला।  धोवाये बरतन के मइलाहा पानी ला आरमपपई म रिकोइस। कोवर कोवर आमा पाना के ममहासी ला सूंघीस । कुम्हड़ा नार ला कोठा के छानी मा  चड़ाइस। 

        नहा के छाती बांधे - बांधे दरपन के आगू मा ठाड़े होइस तब सिरतोन उही लजागे अपन बरन ला देख के। सावर गोरी झक्क दमकत सिकल । खीरा बीजा कस दांत । उल्हा - उल्हा कोवर सरई पत्ता कस होठ- गुलाबी । डोमी कस सुघ्घर बाल अऊ कजरारी आँखी हा ...। 

जादा तारीफ झन कर फुलगजरा अपने आप के । ओहा फुसफुसाइस । चेथी मा चपत मारिस अऊ महुआ झरे कस खनखनावत हासे लागिस। 

            अब जान डारे होहु रूपषोडसी मोटियारी ला । महानदी के निरमल पानी ला कछोरा भिरके तौरे हे। परसा फूल के आगी मा तन ला सेके हे । झरत महुआ ला ओली मा झोंके हे । सरई - सइगोना, बर - पीपर के कोरा मा डंडा पचरेंगा खेलइया ये नोनी आय - फुलगजरा । रुप षोडसी मोटियारी फुलगजरा ।

                चातर राज , बस्तर राज अऊ उड़िया राज जिला धमतरी, जिला कांकेर कोंडागांव अऊ जिला नवरंगपुर के लोक परब अऊ संस्कृति के मिंझरा सियार आय ये गांव - महुआटोला हा। जगन्नाथ भगवान ला पांव परके गजामूंग खा लेथे । पचहत्तर दिन के दसेरा मनावत सल्फी लांदा ला चुहक लेथे।  तब गौलछमी ला गोबरधन खुन्दा के,  सोहाई पहिराके, खिचरी खवाथे । नगरी सिहावा के कर्णेश्वर मड़ई मा डांग - डोरी ला गिदबिद - गिदबिद नचा घला लेथे। अऊ भाखा ग्यान ...उड़िया छत्तीसगढ़ी हिन्दी हल्बी भतरी सब गोठिया लेथे अपन पीरा ला बताये बर।जइसन भेष तइसन भाखा । 


" तुई तो तियार होऊन गेली से रे फुलगजरा ?  पूजा पाठ करतोर काजे शीतला दाई बले जावतोर आसे । (तेहा तियार होगेस का फुलगजरा ? शीतलामाता मा पूजा करे बर घला जाये के हे ।'')

"  हव री होऊन गेली । (हव , बस हो गेव।)''

            हिरौदी,मानकुंवर,सुकारो ,सुकधनिया ,दुलारी आयतिन , रमौतीन , नीलम , रेखा अऊ मधु जम्मो कोई आगे दोरदिर ले। जहुरिया मन के गोठ ला सुनके किहिस। माड़ी ले लाल लुगरा, फुग्गा पोलखा,  रूपियामाला, सुता ,नागमोरी करधन ,अइठी, बाहा भर चुरी , माथ मा कौड़ी के मथौड़ी ,मोरपंखी खोपा ...गजब सुघ्घर बरन। संगी मन देखते रहिगे।

दुलारी इतरावत किहिस

"आजी तो तुई हुंचो जीव च नेऊन जहुआस कसन आले! ''  (तेहा तो मार डारबे आज अइसे लागथे !)

 "को चो ? '' (कोन ला ?)

" हुनि '' (उही)। 

"को हुनि ''(कोन उही)।

"अऊर को मोके चलासित, गहिरा लेका के ।'' (अऊ कोन , मोला चलाथस । गहिरा टुरा ला कहत हव।)

फुलगजरा अब लजागे । बातिक बाता नइ कर सकिस।

हा... हा ...खी.. खी.. के आरो आइस। शीतला दाई के अंगना घला गमकत हावय अब।

             

फुलगजरा अपन टोली के मुखिया डांसर आवय। गहिरा टुरा बलराम हा मांदर बजाथे तब सब मात जाथे । आज टेक्टर मा जोरा के मांदरी नृत्य देखाये ला जावत हे गरियाबंद।

" सेठ पिला के फोन आये रिहिस। रायपुर बलात हावय। एलबम मा बुता दुहु कहिथे । जतका पइसा कबे ओतका दुहु कहत रिहिस। मेहा तो जाहू मोला हीरोइन बनना हे। तहु चल फुलगजरा ।''

मानकुंवर किहिस मुचकावत।

"ओ चतुरा मन के बुध मा झन आ बहिनी । न घर के रहिबे, न घाट के । सेठ - साहूकार आदिवासी, छत्तीसगढ़िया के भला करे हे.... ? हुसियार फुलगजरा समझाइस।  ओखर आँखी अगियावत रिहिस।

               आज बलराम हा दुकान ले बिसाके लाये मोरपांख ला ओरियावत रिहिस। बबा ढेरा मा परसा डोरी ला आटत हावय। अऊ बाबू हा, सोहाई के छोटकुन बंडल बनात हावय।  "बलराम तेहा का करत हस ? प्रैक्टिकल कापी देना  तोर  ?''

बलराम देखते रहिगे फुलगजरा ला ।

"बइहा देखते रहिबे कि कुछ बताबे।''


" सोहाई बनाथन फुलगजरा ! (सोहाई पशुधन के नरी मा बांधे जाथे जौन हा मोर पांख, परसा के डोरी ,छोटकुन रिकम- रिकम के कपड़ा ला सुघ्घर सजाके  बनाथे । येहा मनमोहनी हार आय।)  ये परसा के जड़ ला लान के कुचरथन। छालटी निकाल के एक -  एक रेशा ला हेर के ढेरा मा आटथन। ये सादा डोरी ला हर्रा अऊ चिखला माटी मा चिभोर के करिया करथन। सादा करिया डोरी मोरपांख अऊ नान नान कुटका चिकमिकी ओन्हा बांधके बना लेथन सोहाई।''

बलराम बताइस फुलगजरा मुचकावत रिहिस ।

"हा सुघ्घर बनाये हव रिकम- रिकम के।'' 

"हव ! येहा दुहर सोहाई आय । झक्क सादा । येला देबी - देवता, गोर्रैया, ठाकुर देव अऊ नन्दी महराज मा, डीही - डोंगर अऊ दुधारू गाय में बांधथे। पचेड़ी सोहाई आय पचरंगा । गाय भईस मा बाँधथन। ये करेलिया सोहाई पांच लर के। ये गोल्लर अऊ बड़का गर वाला गौलछमी मा बँधाथे। मंजुरहा सोहाई मा जोरदरहा मोरपंखी डारके बनाथन दुधारू गाय बर। सुघ्घर मंजुरपंखी के चांदा ला देखत रिहिस फुलगजरा हा। गोल सादा सोहाई येला गईठा कहिथे येला बईला भईसा बछरू ला बाँधथे ।"

बलराम के ददा देखाये लागिस ओरी पारी ।

"अभी ले बनाबो बेटी ! तब देवारी बर पुर सकबो ओ ! गांव भर के गौलछमी बर।''

"येला सोहाई काबर कहिथे बबा ? ''

फुलगजरा किहिस

"सोहाई माने शोभा बढ़ानेवाला । पशुधन के शोभा मुकुट पहिरे राजा कस बाढ़ जाथे। पसीना ओगरा के हमर किसानी कारज मा पंदोली देवइया गौलछमी अऊ प्रकृति ला मान देथन। सोहाई  के मंजूर पांख भगवान किशन अऊ सादा डोरी ला राधारानी घला कहिथे।''

बलराम बतावत रिहिस । 

              फुलगजरा  देखत रिहिस ओखर सांवर बरन ,फडकत भुजा, चाकर छाती, नरी मा करिया रेशम ला ...। 

"मोरो घर के शोभा बढ़ाबे का मोर जिनगी मा आके ? सोहाई कस सतरंगी कर देबे का ? मोर रानी ..! मोर सोहाई...।''

 बलराम के आँखी गोठियाये लागिस । फुलगजरा घला हुंकारु दिस पलक झपक के। सब बिसरागे रिहिस जात धरम ,रीति रिवाज, चाल चलागन , गांव समाज ला । चन्दा - सुरुज, नरवा -डोड़गा , ताल - तरिया, सरई  ,महुआ रुख तक भेद नइ करिस। तब मया मा का के भेद....? 

मोर राजा.. मोर बलराम !

मोर रानी .. मोर सोहाई..!

 आँखी गोठियावत रिहिस । मुक्का  भाखा, मूक सम्प्रेषण फेर सब गोठिया डारिस दुनो कोई प्रेक्टिकल कापी के बहाना। दुनो बारवी किलास मा हावय।

                      चिरई-चिरगुन नानकुन रहिथे घर के शोभा बढ़ाथे । अऊ उड़ियाये लागथे तब डर समा जाथे । कोनो शिकारी झपट्टा झन मारे अइसे  । फुलगजरा के दाई ददा ला संसो होये लागिस। मया तो गोरसी के आगी आय उप्पर ले बुताये कस अऊ तरी - तरी धधकत रहिथे। मया तो स्प्रिंग घला आय जतका दबाबे ओतकी उछलथे। ....अऊ कोनो उछलथे तब दुरिहा के शिकारी कइसे फांसथे, फंसइया ला आरो नइ होवय।

            येहां जंगलिहा गांव गवई आय जतका सुघ्घर हावय ओतकी भयानक घला। मीठ चार तेंदू के रुखवा मा कोन कोलिहा बईठे हावय..? महुआ मा कोन परेत हावय...? आमा अमली के बौर मा कोन राच्छत लुकाये हे ..? मूसली सतावर सर्पगंधा मा कोन सांप लपेटाये हे..? कोंन गली ले रायफल पिस्तौल लेके निकलही ..? कोन पैडग़री मा टिफिन बम होही .? कोन सड़क उखड़ जाही..?  कोन  रेलवाही छिही बिही हो जाही....?

कोनो नइ जाने।

फुलगजरा अऊ बलराम पढ़ई मा हुशियार रिहिस । अऊ गोठ बात मा सब मोहा जाही..। फेर आज तो उही मन मोहागे हावय । जल जंगल जमीन आदिवासी के हित गोठियइया मीठ लबरा मन मा। अधरतिया के वर्दी पहिन के मइलाहा सोच के दल मा वहु मिंझर गेहे। लाल सलाम के झंडा बुलंद करत हावय।

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मुरलीवाला किसन कन्हैया की ....जय !

राऊत भाई मन   जयकारा बोलाइस।

अरा ररा रे.......

घर घर दीया जलाओ संगी,आगे देवारी तिहार रे।

मोर संहाड़ा देव बर राखे हव, नरियर फुलगजरा हार रे।।

डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ......।

दफड़ा बाजा तान मारिस

राउत भाई मन दोहा पारिस अऊ बजनिया मन लहस-लहस के बाजा बजाइस। टिमकी मोहरी सिंगबाजा दफड़ा गुदुम झांझ मंजीरा झुमका ।

सुघ्घर सवांगा राउत मन के । माड़ी ले पीयर धोती , लाल छिटही सलूखा , मोरपंखी के कमर बाजूबंद , मुड़ी मा खुमरी,  खुमरी मा खोसाये चंदैनी गोंदा । बंगला पान के लाली ले मुहू  रंगे। अब्बड़ सुघ्घर बरन हावय गहिरा टोली के। ठोमहा भर तेल पियाईया तेन्दुसार के चिकचिकावत लउठी अऊ आनी बानी के रेशम सुत चिकमिकी मा सजाये लउठी ला उप्पर उठा उठा के नाचत हावय। गांव के गौटिया पारा जावत हावय सोहाई बांधे बर। पहिली गौटिया बेड़ा - बड़का मंझला , नान्हे गौटिया घर के गौलछमी ला सोहाई बाँधही । 

अरे हा... , 

नेवरिया घर घला बाँधही सोहाई ला।  नेवरिया  - नवा नवा आये हे ये गांव मा। चार पांच बच्छर होवत हे फेर अतका धाक हावय गांव मा ...कि अब ये गांव मा नेरवा गड़े सियान दाऊ के घला कुछु नइ चले । कोन जन का मोहनी मंतर जानथे ते .... लइका सियान जम्मो मोहा जाथे ।  जवनहा मन तो अपन दाई ददा के पांव भलुक नइ परे अऊ ओखर आगू मा डंडा सरन हो जाथे। अइसे हावय नेवरिया हा।  अड़गड़ा पल्ली बड़गड़ा ...  टार अइन्ते तइन्ते   हो जाही ।बिचित्तर नाव हे। महु ल लेये ला नइ आवय  ओखर नाव ला। ओखरे सेती नेवरिया कहिथो सोझहा। 

          राउत नाचा अऊ गौरी गौरा के बाजा बजनिया के पइसा नेवरिया कोती ले रहिथे। गांव समाज वाला मन ऐखरे सेती तो मिलाय हावय अपन गांव समाज मा। अऊ सोहाई ...।  पइसा वाला के पांव कोन नइ परे..?

 देवारी के दिन दाऊ बेड़ा मा । जेठाऊनी के दिन बीच पारा के किसान मन घर अऊ पुन्नी के दिन आबादी पारा के नान्हे किसान मजदूर के गौलछमी मा सोहाई बाँधथे। अभी सोहाई बांधे के पाछू काछन निकलही जल्दी करो गहिरा भाई मन । गांव के सियान मन किहिस।


डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ......डंग। दफड़ा बाजा ताल दिस।

अरा ररा रे.......

जय महामाई रतनपुर के, अखरा के गुरु बैताल।

चौसठ जोगनी पुरखा के,बइहा मा होबे सहाय।।

 

बड़े दाऊ घर गिस सोहाई बांधे बर सुमिरन करत राउत टोली हा। गांववाला मन उछाह मा रिहिस अऊ गौलछमी.. वहू मन अब्बड़ गमकत हावय।


अरा ररा रे.......

     मन मैला तन उजला , बगुले जैसा भेष हो।

इन सब ले कागा भला, भीतर बाहर एक हो।।


गहिरा मन दोहा पारिस नाचत कूदत  । अऊ गांव के निकलती  मसान घाट जाए के रस्दा,जंगल ले लगे झुंझकुरहा खेत मा बसे नेवरिया घर कोती रेगे लागिस।


                    चार आँखी सब ला देखत रिहिस । जंगल मा हुआ - हुआ करइया आज गांव आये हे। करिया बरन ला हेर के उज्जर बरन धर के। राउत मन तो जइसे कौआ अऊ बगुला बर नही ..ऐखरे बर दोहा पारिस। आज दुनो एक दुसर  के हाथ ला धरके मसकत रिहिस।आदिवासी के हित के गोठ करइया मन, जल जंगल जमीन बर न्याय के गोठ करइया मीठलबरा मन के कथनी अऊ करनी ला जान डारे रिहिस।  सड़क पुल पुलिया बिजली स्कूल कालेज बर बाधा बनइया ला जान डारिस।....असल गोठ ला जान डारिस।

हमर संगठन हा पातर होवत हावय । अपन संगी - संगवारी मन ला दल में जोर। पुलिस प्रशासन हमर कुनबा ला नाश करत हावय। घर लहुटे अभियान लोन वर्राटू हा कनिहा ला मुरकेट डारे हावय। लोगन मन घला अब नइ डर्रावय। नाच गान दल ले प्रमोशन होगे तुहर । परीक्षा के घड़ी आवय । अब गांववाला मन के बीच एसो के देवारी मा अइसे  फटाका फोड़ कि रायपुर भोपाल दिल्ली अऊ देश के कोना कोना तक आरो जाना चाही। इही तुहर परीक्षा आवय । इही तुहर टास्क आवय।

अइसना तो केहे रिहिस ओखर आंका हा। ओखरे सेती अइसे बम धरे हावय लुका के, कि काछन देखइया , गोबर्धन खुन्दवइया गांव भर दहल जाही। हाहाकार मच जाही। ये चार आँखी बलराम अऊ फुलगजरा के आय। 

         सिरिफ बलराम अऊ फुलगजरा भर नइ आये हे आज । ओखर संग आये हे सोमारू आयतु ,मड़का,  श्रीनिवास ,वेंकटेश, कुमारलू  देवारी मनाये बर। लाखो करोड़ो इनाम हे  ऐखर मन उप्पर प्रशासन डाहर ले।  नेवरिया आय न नेवता देये हे, देवारी के कांदा कोचई खाये बर।देवारीच देखे बर नइ आये हे ऐमन।  बम  के धमाका सुने बर घला आये हावय।

               राउत मन नाचत हे फेर उछाह सब के सिकल मा हावय। बुढ़वा- जवान, लइका - पिचका , जीव - जिनावर सब मगन हावय। सब गमकत हावय। फटाका बर बिटोवत लइका। मंद महुआ पीके भकवाय कका, खोड़खोड़ी खेलइया टुरा मन , ठेठरी खुरमी बनावत दीदी मन । हाथा देवइया राउताईन मन ,पान खा के इतरावत नाती बबा.....। 

सब मर जाही ...  ? सिरतोन सब मर जाही...?सब जुच्छा हो जाही ...? सब सुन हो जाही... ? सब मरे ले आदिवासी ला अधिकार अऊ न्याय मिल जाही..? ये गांव के सिधवा मन के का कसूर ...? फूल कस लइका काही नइ जाने...ओखर का होही....? 

   फुलगजरा अऊ बलराम ला ओखर नान्हेंपन सुरता आगे । जम्मो कोई नत्ता - गोत्ता, लरा - जरा लागत हावय  कका - काकी ,दाई- महतारी दीदी - बहिनी ...। ...गुने लागिस । ....जी कांप गे। रुआ ठाड़े होगे।

बाजा बाजत रिहिस। राउत मन नेवरिया घर तीर अमरगे। 


"फोड़ो रे फटाका मोर बैरी बड़का दाऊ के कान फूटना चाहिये। बीच बस्ती ला घला जानबा होना चाही नेवरिया घर के सोहाई बँधागे अइसे।'' 

नेवरिया आय। अपन अंगना मा राउत मन ला नचवाये लागिस। सौ सौ के गड्डी ल फेकिस अऊ कोठार के कुंदरा कोती चल दिस । सोमारू आयतु मड़का  श्री..... जम्मो के उहिन्चे डेरा रिहिस।   बलराम अऊ फुलगजरा घला गिस  टिफिन ला धरके । दुनो के हाथ मा रिहिस टिफिन , अऊ टिफिन मा रिहिस देवारी के कलेवा कांदा कोचई बरा सोहारी सलगा बरा ठेठरी खुरमी ......। 

राउत मन बिधुन होके नाचत हे अऊ दोहा घला पारत हावय ।


अरा ररा रे.......

सोहाई बनायेव अचरी पचरी, गांठ दियो हर्रेइया।

जउन सोहाई ला छाटही,ओला लपेट लागे गोर्रैइया ।।

बलराम आय दोहा परइया। वहू तो आय गहिरा टुरा । सुकधनिया (सूपा मा धान दीया अऊ सोहाई मड़ाये रहिथे ।)मा माड़े धान मा गोबर के लोई ला लोटाइस अऊ कोठी मा सुघ्घर छपाये हाथा के बीच मा  थोपिस। सोहाई ला निकाल के करिया गाय ला सोहाई बाँधत पारिस दोहा।

                फट फट फट फट .....धड़ाम...। नेवरिया के दुवारी मा फटाका फूटत रिहिस फेर.... सब कोई देखे लागिस कुंदरा कोती ला।   जतका फटाका फूटत रिहिस ओखर ले लाख गुना जादा आरो ले कोठार के  कुंदरा मा फुटिस ...फटाका... बमफटाका। चीख चित्कार करलई के आरो आइस सोमारू आयतु श्री .......सब्बो कोई के ।

 ये बड़का फटाका सही जगह मा फूटे हावय आज । फुलगजरा मुचकावत रिहिस। ओखर सिकल मा गरब रिहिस कर्तव्य के परीक्षा मा पास होये के। चाक्कर छाती मा गुमान रिहिस बलराम ला गांव लहुटे के। 


                   

 दुनो के नजर अटकगे  करिया गाय मा।  कतका सुघ्घर लागत हावय ...चपर-चपर दूध पियत बछरू ...। पीठ ला चटर- चटर चाटत गाय ...अऊ गाय के गर मा बंधाये  सुघ्घर दिखत सोहाई....। सोहाई मा साजे चाक्कर मोर पंखी...अऊ मोर पंखी मा  सतरंगी ....चांदा ।  अऊ चांदा मा दुनो के .....गमकत सोहाई कस सपना। अऊ सपना मा....।

        


चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़


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समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल: 


छत्तीसगढ़ अपन तीज तिहार अउ संस्कृति के नाँव ले के सरी जग म अपन चिन्हउ हे। इहाँ के आदिवासी लोक नृत्य अउ बस्तर के दसेरा के तो फेर का कहिना। आदिवासी मन के संघरा छत्तीसगढ़िया मनके अपन संस्कृति अउ परम्परा बर समर्पण देखते बनथे। एकर सबूत आय पोरोगराम देहे बर सबके मिल के सँघरा जाना, राउत भाई मन के घर म सोहई बनाना। ....अउ कतको रिवाज अउ परम्परा हे जे हमर छाती ल चौड़ा करथे, फेर इहाँ के संस्कृति अउ परम्परा के दगदग ले अंजोर चंदा म नक्सलवाद के बड़का दाग घलव लगे हे। जउन इहाँ के विकास के रथ ल आगू नइ बढ़न दय। मया  के फुलवारी घलव घात गहदथे। फेर मया के फुलवारी म बसेरा करइया चिरई मन ऊपर बाज मन के आँखी गड़ जथे। इही सब के पीरा ल अपन कहानी म जगा देवत अउ इहाँ के जन मन के जिनगानी म उजास भरे बर नवा किरण बगराय के उदिम ले लिखे कहानी आय - *सोहाई*। 

        ए कहानी म मया के संदेश दू तरह ले देखे मिलथे, जउन म फुलगजरा अउ बलराम के मया हे, त दूसर कोती दूनो के अपन धरती बर उमड़त मया। जउन ह अपन गाँव अपन मनखे अउ अपन डीह।

      जम्मो संवाद मन ल मोह लेथे। मन म मया के रस घोरथे, त कभू लाल सलाम के झंडादार मन बर आगी भभका देथे।

       पढ़े लिखे मन के लाल सलाम अउ देश समाज के विद्रोही मन के चंगुल म फँसना थोरिक संसो फिकर के बिसय आय। समाज ल घलव थोरिक सावचेत रहे के जरूरत हे। 

       कहानी पढ़े के बेरा मन एकोचकन नइ भटकय। शब्द मन के तार अइसे हे कि मिलकी मारे के मउका नइ दय। भाषा के इही प्रवाह हर पाठक ल कहानी म गहिर तक डुबोवत बहाके ले जथे अउ कहानी ल पढ़ा लेथे। ए ह चंद्रहास जी के कहानी मन के सबले बड़े विशेषता आय। मँय उँकर चार कहानी पढ़े हँव अउ सबो म इही च खास बात मिलिस। नवा पीढ़ी के रचनाकार म जरूर एकर नाँव बड़ सम्मान के संग लिए जाही। अउ चंद्रहास जी अपन कहानी के दम म पहचान घलव बनाही।

        चार आँखी सब ल देखत रिहिस। जंगल म हुआ हुआ करइया आज गाँव आय हे।... कमाल के फोटू।


    सब मर जाही....? सिरतोन सब...?  .सब सुन हो जाही...?....ये गाँव के सिधवा मन के का कसूर...?  

       इही विचार संग फुलगजरा अउ बलराम के अपन लोगन मन ल देख हिरदे बदलना अउ अपन गाँव लहुटे के ठान लेना, सच म कहानी के उद्देश्य ल पूरा करथे। समाज के संग रहिके समाज ल आगू बढ़ाना ह देश अउ राज के विकास बर नवा गोठ आय अउ इही सोच हर समाज ल शोभा देथे। अउ इही शोभा ह तो सोहाई आय। 

     कहानी के सबो तत्व म खरा उतरत कहानी ल पढ़ के मन उछाह ले भरगे। छत्तीसगढ़ी कहानी ल सजोर करइया नवा तारा टिमटिमावत हे, अइसे लागत हे।

      

      सुग्घर कहानी बर बधाई देवत उँकर उज्ज्वल भविष्य के कामना करत हँव।

पोखनलाल जायसवाल

मोर गोदना छत्तीसगढ़ के चिन्हा हरे दुर्गा प्रसाद पारकर

 छत्तीसगढ़ी मे पढ़े-गोदना

मोर गोदना छत्तीसगढ़ के चिन्हा हरे

दुर्गा प्रसाद पारकर

गोदना ह आदिवासी संस्कृति के बिसवास ले जुड़े हे। गोदना के अर्थ गोभाई (गोभना,चुभोना) ले हे। गोदना आदिवासी मोटियारी मन के सिंगार भर नोहे बल्कि उंखर परिधान घलो आय। जऊन ह तन भर चकचक ले उपके रहिथे। आजकाल तो बिदेशी मनखे मन फैशन बना डरे हे। वोइसे तो गोदना के उद्गम स्थान पोलोनेशिया ल माने गे हे। फेर येखर ठोस सबुत नइ मिले हे। न्यूजिलैंड, बर्मा, लाओस अऊ आफ्रीका के मूल वासी मन म गोदना ह भारत के जनजाति मन कस लोकप्रिय हे। अब तो अमेरिका म गोदना गोदवाए के प्रतियोगिता होय ल धर ले हे। ”वाल्टर” ह अपन तन म ५४५७ गोदना गोदवा के ” गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड ” म अपन नाव लिखवा डरे हे।

           छत्तीसगढ़ म अगघन-पुस ले गोदना गोदवाए के शुरुवात हो जथे। वोइसे तो गोदना उपर कतनो कथा हे फेर कोंड़ागांव (बस्तर) म येदइसन दंत कथा सुने बर मिलथे - बुढ़ा वा देव के छै भाई अऊ सात बहिनी रीहिस। बुढ़ा देव ह अपन टूरा मन के नाव ल मुरहा अऊ ओझा राखिस। बुढ़ा देव ह मुरहा ल लकड़ी धरा के भुईया ल बजाए बर सीखोइस। सीखीस ताहन मुरहा ह किसान बनगे। ओझा ल खांध म डमरु लटकवा के डमरु बजाए बर सीखोइस। ओझा ह डमरु बजावत-बजावत, किंदर-किंदर के कोठ (दीवाल) मन म छापा छापे तेन ल देख के ओखर माईलोगन ह गोदना गोदे बर सीख गे। तभे तो साल म एक घांव ओझा परिवार (गोदना गोदइया ओझनीनन, बदनीन, देवरनीन) बुढ़ा देव ल कुकरा, बोकरा, बधिया जेखर ले जतना बन सकय ओकर बली चढ़ा के सुमिरन करथे। हे देव! गेदना ह हमर रोजी रोटी के साधन हरे हमर गोदे गोदना म घाव झन उपके। मवाद झन भरय, सुजन झन होवय अऊ कोनो टोनही-टम्हानीन के नजर डीट झन लगे। तेखरे सेती अइसे मानता हे कि गोदना गोदे के बेर ठाकुर देव ह गुदनारी मन के संग म रहिथे। गुदनारी गोदना गोदे के बाद रीठा देथे जेन ल पानी म घोर के गोदना के उपर चुपरे ले पीरा ह सपसप ले तिरा जथे। लइका मन के दांत जामे बर सोहिलत होही कहि के रीठा ल रेसम म गुंथ के गर (गला, टोंटा) म घलो पहिरा देथे। चाऊंर, हरदी, अऊ तेल ल लकड़ी के चारों मुड़ा घुमा के अनुष्ठान करके एक भाग ल सतबहिनिया म चघा दे ले गोदना के पीरा ह जियाने नही। गुदनारी मन कोइला पोंठार के छिलका ल पीस के अंडी, खजूर, हर्रा नही ते मंउहा के ते म घोर के सियाही बना लेथे। येला फूटहा गघरी म गरम कर लेथे। अइसन करे ले काजर तियार हो जथे। काजर ल खड़होर के नरियर के खोटली म सकेल लेथे। इही काजर ल गोदना बर प्रयोग म लानथे। ओझनीन मन बांस के सूजी बना के सतबहिनिया के अराधना करके गोदना गोदे के शुरुआत करथे-

तोला का गोदना ल गोदंव वो 

मोर दुलौरिन बेटी 

मोर गोदना चुक ले उपके 

दाढ़ी म चुटकुलिया

रामलखन हिरदे म गोदा ले 

दाढ़ी म चुटकुलिया

       गोदना गोदवाले रीठा ले ले ए वो दाई आए हंव गुदनारी तोर गांव म कही के गोहार पारत गंाव के गली-गली म देवरनीन ह टूकना म गोदना के सराजाम धर के किंदरथे। गोदना गोदे के नियम-धियम ल सुग्धर ढंग ले छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य नाचा के देवार गम्मत म देखे जा सकत हे। गोदना गोदवाए के बखत गंज पीरा होथे, पीरा मा कहर के ए दाई वो..........

  पिरावथे वो, कही के रो डरथे। अनाकनी करथे उन ला भुलवारथे। नइ माने वोला धर बांध के गोदना गोदत कथे- गोदना गोदवा ले ओ परलोखलीन नही ते तोला भगवान हा साबर मा ततेरही। जइसे-जइसे नाचा मा देवार गम्मत हा नंदावत जात हे ओइसने ओइसने गोदना के परम्परा ह घलो खीरत जात हे। गोदना गोदवाए के बाद नेंग मा अनाज के संगे संगे पइसा कउड़ी अनाज भेंट करथे। गुदनारी ला सम्मान पूर्वक बिदा करथे। मड़ई-मेला, हाट-बजार म घलो गुदनारी मन ल किंदरत, गोदना गोदत देखे जा सकत हे। जेन जात म गोदना गोदवाए के परंपरा हे उखर मानना हे कि गोदना ह माईलोगन मन बर स्वर्ग जाये के निसैनी हरे। गोदना ह तन के संग माटी म मिल जथे।

ददा देथे चूरा पइरी टूट फूट जाय

दाई देथे कारी गोदना, माटी म मिल जाय

 जनजाति परंपरा के मुताबिक जब नोनी जाने सुने के लइक होथे तब उन ल गोदना गोदवाय के मउका मिलथे। मइके म गोदना गोदवई ल शुभ माने गे हे। मान ले कोनो बहुरिया ह बिना गोदना गोदवाए ससुराल चल दिही ते ओखर सास ससुर मन बहुरिया के दाई ददा ले गोदना के खरचा मांग सकथे। घर ते घर डीगर मन घलो नवा बहू ल ताना मारे बर नइ छोड़े-

देख तो दई बहुरिया ह 

चुरी पइरी नइ गोदवाए हे

बांहा - पहुंचा, तन ल घलो

नई फोरवाए हे.................

  एक समे गोदना ह देवार जात के जीवन यापन के साधन रीहिस फेर मशीनीकरण ह उंखर पेट म लात मार दे हे। गोदना गोदवाए ले कतनो बिमारी के निराकरण घलो हो जथे। गोदना ल देख के गठिया वात के तकलीफ ह भगा जथे। लोगन तो यहू मानथे के एक्यूपंचर चिकित्सा पद्धति ह गोदना के देन हरे। शेख गुलाब ह अपन किताब भिम्मा म लिखथे कि जऊन ह बिच्छी गोदवाथे ओला बिच्छी नई मारय। मार दिही ते ओखर झार नई चड़य। जऊन ह छाती म देवी-देवता गोदवाथे ओला नजर - डीट नई लगय। आधुनिकता के चकाचैंध म गोदना परंपरा ल बिसरे ल धर ले हे। तभे तो बिना गोदना के माईलोगन मन ऊदूप ले दिखथे-

मोर गोदना छत्तीसगढ़ के चिन्हा हरे पुछ ले 

बिना गोदना के बेटी-माई मन दिखथे उदूप ले

      आदिवासी मन म जऊन गोदना प्रचलित हे ओहा एदइसन हे- जांघ म - कजीरी, घुटना (माड़ी) के तीर गोड़ म - फुलिया, पीठ म - मांछी अऊ जादुई चैन, गोड़ म मछरी के छोरटा अऊ चकमक। गिराहिक के मन पसंद के मुताबित गुदनारी मन गोदना गोदथे। जऊन जघा देवी-देवता के गोदना गोदवाथे ओहा एदइसन हे- पद्म सेन देव पांव के देवता, गजकरन (हाथी) देवता गोड़ के देवता, कोड़ा (घोड़ा) देव गोड़ के उपर भाग (आघु तनी), हनुमान (शक्ति के देवता) बांह के देवता, भीम सेन (रसोई के देवता) पीठ म, झूलन देवी अऊ कटेश्वर माता छाती म। छत्तीसगढ़ म एदे गोदना के जादा चलन हे-

        नाक (डेरी आंखी के तीर) म - तीन बुंदकी जऊन ल मुटकी कहिथन। डाढ़ी म - एक बूंद के जऊन ल चुटकुलिया कहिथन। हिरदे म - राम लखन (मनखे जइसे) तीन बूदियां, बांह म - बांह पहुंचा, पांव म चूरा पैरी, हथेरी म मोलहा, नाड़ी म लवांग फूल। आदिकाल म परिधान के रुप म शुरुवात होइस होही जऊन बाद म आभूषण के रुप धारण करीस जऊन ह अब फैसन म बदल गे हे। चाहे जइसे भी हो आदिवासी मन के जीनगी म गोदना के महत्व ल नकारे नइ जा सकय।


दुर्गा प्रसाद पारकर

Friday, 3 December 2021

छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के सम्मान*








 

*छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के सम्मान*

 

28 नवम्बर 2021 के राजभाषा दिवस मा अरुण निगम के सम्मान होइस। जम्मो साधक मन के हिरदे ले शुभकामना अउ बधाई मिलिस। अरुण निगम जम्मो साधक मन के हिरदे ले आभार प्रकट करथे।

28 नवम्बर के दिन ले मँय आत्म मंथन करत हँव कि ये अरुण निगम कोन आय जेला सम्मान मिलिस अउ यहू गुनत हँव कि ये सम्मान काबर मिलिस ? के हजार रचना कर डारिस? कतका दर्जन किताब छपवा डारिस? छत्तीसगढ़ी भाषा के अइसन का सेवा कर डारिस कि वोला छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग अउ छत्तीसगढ़ शासन सम्मानित करे बर चुनिस? अरुण निगम के अस्तित्व का हे?

आत्म मंथन करे के बाद पाथंव अरे ! छत्तीसगढ़ी भाषा मा अरुण निगम के एके ठन त किताब छपे हे - "छन्द के छ"। छत्तीसगढ़ के बड़े-बड़े स्थापित साहित्यकार मन कभू कोनो मंच ले जेकर कभू गुनगान नइ करिन, जेन हर कभू अखबार मन मा सरलग छपत नइ दिखिस। न कभू मंत्रालय, न संस्कृति विभाग, न राजभाषा आयोग के ऑफिस के चक्कर लगावत दिखिस, अउ त अउ न कोनो मंत्री, न विधायक संग ओकर रिश्तेदारी हे, वो अरुण निगम ला कइसे सम्मान मिलगे?

अचरित के बात आय, ताज्जुब के बात आय कि अइसन अरुण निगम ला सम्मान मिलगे।

 

ऊपर गिनाये अनिवार्य अर्हता मा फिट नइ बइठे के बावजूद सम्मानित होना सही मा आश्चर्य के बात आय। लेकिन यहू सत्य आय कि अरुण निगम सम्मानित होइस। फेर आत्म मंथन करथंव कि का कारण होही? तब मोर अन्तस ले ये जवाब मिलथे कि अरुण निगम के अस्तित्व, "छन्द के छ" के कारण हे। "छन्द के छ" के बिना अरुण निगम के न कहूँ चिन्हारी हवय अउ न कहूँ पुछारी हवय।

 

 "छन्द के छ" का आय ? संस्था !!!!! संस्था त नइ हो सके। काबर कि संस्था मा अध्यक्ष, प्रांतीय अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, महासचिव, कोषाध्यक्ष जइसे बड़े-बड़े पदाधिकारी मन होथें। "छन्द के छ" मा अइसन एको पदवी-धारी नइये। "छन्द के छ" मा गुरुदेव अउ शिष्य बस दुये नामधारी मन मिलथें। गुरुदेव माने निःस्वार्थ भाव ले ज्ञान बाँटने वाला अउ शिष्य माने सीखे के लगन रख के ज्ञान प्राप्त करने वाला। यहू शिष्य मन ज्ञान प्राप्त करे के बाद ज्ञान बाँटत हें अउ गुरुदेव के भूमिका निभावत हें। "छन्द के छ" मा गुरुदेव कोन मन हें? शिष्य (साधक) कोन मन हें? आपेमन त गुरुदेव आव अउ आपेमन त शिष्य आव। 

अब आप मन गुनव - जब अरुण निगम के अस्तित्व "छन्द के छ" के कारण हे अउ "छन्द के छ" के कारण अरुण निगम सम्मानित होइस हे तब "छन्द के छ" निस्संदेह शक्ति के स्त्रोत आय जउन हर कोनो के अस्तित्व ला सम्मान कराए के ताकत रखथे। 

"छन्द के छ" साहित्य-जगत मा आकार मा छोटे रहे के बावजूद अपन भीतर अणु अउ परमाणु असन असीमित ऊर्जा रखथे। "छन्द के छ" के हर सदस्य ऊर्जा के स्त्रोत आय। हर सदस्य ताकतवर आय। हर सदस्य अरुण निगम ला मिले सम्मान के बराबरी के हकदार आय। इही पाय के "राजभाषा दिवस" के सम्मान बर मँय, हर साधक ला अन्तस ले बधाई देवत हँव। ये सम्मान के वास्तविक हकदार "छन्द के छ" के हर साधक आय। बस आप मन के प्रतिनिधि के रूप मा अरुण निगम ये सम्मान ला प्राप्त करिस हे। 

 

"छन्द के छ" के कारण अगर अरुण निगम के हस्ती हे, अस्तित्व हे तब आप मन अपन स्वतन्त्र या पृथक अस्तित्व के कल्पना कइसे कर सकथव? मोर निवेदन हे कि "छन्द के छ" के शक्ति ला पहचनाव, अपन शक्ति ला पहचनाव। "छन्द के छ" के कारण पहिली पइत आयोग अउ शासन के संज्ञान मा ये बात आइस हे कि छत्तीसगढ़ी भाषा के समृद्धि बर "छन्द के छ" सार्थक काम करत हे। हमर काम के अनुगूँज अब आयोग अउ शासन तक पहुँच चुके हे, जेकर कारण मँय विश्वास करत हँव कि भविष्य मा एमन "छन्द के छ" ला अपन आयोजन मा जरूर सुरता करहीं जेकर लाभ "छन्द के छ" के साधक मन ला भविष्य मा जरूर मिलही। हर साधक के सुखद भविष्य के कामना सहित…..

 

*अरुण कुमार निगम*


पान अउ ढेला*

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                 *पान अउ ढेला*

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         *(छत्तीसगढ़ी लोककथा)*


-रामनाथ साहू



                 ये जगह म ,आज  खेत  नइये। बहुत पहिली...बहुत- बहुत पहिली,येकरा एक ठन खेत रहिस।येकर संग म अउ बहुत अकन ,खेत रहिन । 


                    खेत रहिन, तब रुख- राई मन रहिन ,एकदम गझिन...सघन वन ..अइसन । अउ जब रुख राई मन रहिन ,तब  पान-पतइ मन गिरबे करें । खेत म माटी के एकठन ढेला रहिस ।वोकरे तीर म एक ठन  चौड़ा थारी असन  पान हर आ गिरीस। दुनों के दुनों ,एक दूसर ल पसन्द करे लॉगिन । अउ आपस म सुख-दुख गोठियाय लॉगिन । धीरे- धीरे वोमन के  मित्रता हर परवान चढ़े लागिस,अउ वोमन आपस  मितान घलव बद डारिन ।मितान बनिन।संग म जिये मरे के कसम खाईन । 



               एक दिन बड़ जोर से बड़ौरा आइस,अउ  पान हर उड़ियाय कस करिस। तब ...मोर रहत ले तुंहला कुछु नइ होय मितान...कहत ढेला,पान उप्पर चढ़ के बोला लदक दिस । पान उड़ियाय ले बांच गय । पान वोला हृदय कमल ले आभार दिस ।



                           अइसनहेच एक दिन रटा -तोड़,मूसलाधार वर्षा होइस । ढेला के मूड म एक बूंदी गिरीस के,पान हर तुरतेच वोकर उप्पर म चढ़ गिस ।ढेला हर घूरे ले बांच गइस  ।   


                  अइसन  सुख -दुख म एक दूसर के काम आवत,वोमन बड़ दिन ल हाँसी -खुशी रहिन । फेर एक दिन,विधाता के लीला...!गर्रा-धुंका, आंधी-तूफान...बरसात...सकल पदारथ  एके संग म आइन। ढेला हर कूद के पान उप्पर चढ़ गय।फेर पानी के मोठ... मोठ बूंदी ले वोकर अङ्ग -भङ्ग होय लागिस।वोहर गले के शुरू हो गय रहिस । मितान...!मोर रहत ल तुंहला कुछु नइ होय, कहत पान, वोकर उप्पर चढ़ गय।तभे जोर से गर्रा वोला,उड़ियाय लागिस।मितान... मोर रहत ल तुंहला कुछु नइ होय ।ढेला ललकारिस अउ पान उप्पर फेर चढ़ गय। कभु पानी...कभु ....गर्रा -धुंका।कभु  पान तरी,ढेला उपर त कभु ,त कभु पान उप्पर म ढेला ल बचावत । पान चिथात गिस, अउ ढेला घुरत...!फेर जीवन अउ मृत्यु के ये  जंग ल दुनो मिल के बहादुरी के साथ लड़त, छेवर म पान चिथा-पुदका के उड़ गय, अउ अपन मित्र ल बचाते -बचात ढेला घूर गय ।                        

             अउ ये कत्था हर पुर गय ।

      



*छत्तीसगढ़ के लोकप्रसिद्ध लोककथा*

*प्रस्तुति - रामनाथ साहू*



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कउवा अउ पड़की **************

 कउवा अउ पड़की

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नदिया के तीर एक ठन पेड़ म कउवा अउ पड़की रहय।कउवा बड़ घमंडी अउ पड़की रहय ते सिधवा ।उकर दुनों के मितानी होगे।एक दिन के बात आय कउवा कथे मितान पड़की भूख के मारे मोर पोटा ऐंठत हे मेहा तोर पीला ल खाहु तभेच मोर भूख मिटाहि।

  पड़की सोच म परगे फेर कहिस :-मितान तै खाए बर तो खाबे फेर मोरो एक ठन बात हवय।तै हा पहिली अपन चोंच ल धो के आ जातेस।

   कउवा उड़ावत-उड़ावत नदियाँ कर गिस।नदियाँ के पानी म जइसने मुँहू धोय लागथे नदिया कथे तैहा चोंच ल मोर पानी म बोरबे त मोर पानी ह जूठा हो जाही तेकर ले तइहा कुम्हार तीर के करसा लाले अउ पानी डुम के अपन चोंच ल धो डार।

    कउवा उड़ावत-उड़ावत कुम्हार कर गिस अउ कहिन- भइया मोला करसा बना के देव।

 कुम्हार पूछिस करसा ल कइसे करहु कउवा भाई।

 कउवा कहिस-

    लेगबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच...

   कुम्हार कहिस ठीक हे भाई मैं करसा तो बना देहु फेर तँय माटी लान दे।

    कउवा माटी कर गिस अउ किहिस-

   "खनबो माटी बनाबो करसा,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच"

    माटी कइथे मोर कर माटी तो हवय फेर तय कोड़बे कइसे।

    कउवा उड़ावत-उड़ावत हरिणा कर गिस अउ कइथे-

 "लेगबो सींग, कोड़बो माटी,लेगबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच"...

      हरिणा कइथे भइया कउवा ये सबो तो बने हे फेर सींग ल उखानबे कइसे।

  कउवा हरिन के बात सुन कुकुर कर गिस अउ कइथे:-

     "लेगबो कुकुर,लुभाबो हरिना,तोड़बोन सींग, कोड़बो माटी,बनाबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच."

    कुकुर ह कहिस बात तो तय बने कहत हस फेर मोला ताकत बढ़ाये बर दूध पिये ल लागहि।

    कुकुर के बात सुन के कउवा नीलगाय तीर गिस।कउवा कहिस-

  "लेगबो दूध,पियाबो कुकुर,लुभाबो हरिना,तोड़बोन सींग, कोड़बो माटी,बनाबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच."

       नीलगाय कथे ये सब तो बने हे फेर दूध दे बर मोला कांदी लाग ही।

  कउवा कांदी के तीर पहुँचगे अउ कथे-

"लेगबो कांदी, खवाबो गाय, निकालबो दूध,पियाबो कुकुर,लुभाबो हरिना,तोड़बोन सींग, कोड़बो माटी,बनाबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच."

   कांदी किहिस बात तो बने आय फेर तय मोला लुबे कामे ।कउवा उड़ावत-उड़ावत लोहार कर गिस।अउ कहिथे भैया लोहार:-

" बनादे हँसिया ,लुबो कांदी, खवाबो गाय, निकालबो दूध,पियाबो कुकुर,लुभाबो हरिना,तोड़बोन सींग, कोड़बो माटी,बनाबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच."

    लोहार हँसिया बना देथे।कउवा जइसे हँसिया ल धर के उड़ाथे कउवा के चोंच ल जर जाथे।अउ कउवा के नाश हो जाथे।विश्वासघाती कउवा के नाश होय ले पड़की अउ उकर परिवार के जिनगी बाँच जाथे अउ हँसी खुशी ले उकर जिनगी चलथे।

              🙏

        छत्तीसगढ़ी लोककथा से साभार...

    द्रोणकुमार सार्वा

डोकरी अउ अगास* --------------------------

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           *डोकरी अउ अगास*

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        *( छत्तीसगढ़ी लोक कथा )*





                             अभी तो अगास हर कतेक न कतेक धूर म हावे । पहिली अइसन नि रहिस । पहिली अगास हर मनखे के अमरउ म रहिस । मनखे मन के, जइसन मन लागे तइसन अगास के तारा -जोगनी मन ल छू लेंय । वोमन ल एती - वोती हलचल कर लेंय । वोमन ल अपन मन मुताबिक सजा लेंय । सुरुज हर घलव तिरेच ल नाहके। वो बखत  वोहर थोर -थोर सुलगे के शुरू होय रहिस , तेकर सेती वोमे कम अंजोर अउ अउ कम गर्मी रहिस ।


                  आन मनखे मन के पीठ हर बने रहिस फेर डोकरी के पीठ हर कुबरी हो गय रहिस । एक दिन वोहर अपन ठूठी बहिरी ल धरके अंगना ल बाहरत रहिस खुरूर... खुरूर...!


                        तभे वोकर पीठ के कूबड़ ल अगास हर छू दिस ।डोकरी ल पिराईस तब वो रिस म भर गय अउ अगास ल अपन ठूठी बहिरी के मूंठ म मार दिस अउ कहिस -जा रे... जा ! बहुत धूर छिंगल जा !


                       तब ले अगास हर बड़ धूर छिंगल गय वोहर भाग पराइस ।



*संकलन* - 


*रामनाथ साहू*



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