Wednesday, 15 December 2021

सुरता- देवारी मिलन समारोह, भिलाई











 

देवारी मिलन के सुरता करत मेनका वर्मा जी के भाव।

"छंद के छ" परिवार के  देवारी मिलन के सुरता*


जेन मोबाइल बपरा ऊपर ये आरोप लगे हे कि-

'ये सबके परिवार मा फुट डाल के ऊनला दुरिहावत हे' वुहि मोबाइल के प्रयोग ले अइसन सुघ्घऱ परिवार जोरईया 

*गुरूदेव ला दण्डवत प्रणाम हे*🙏🏻 


अपन चिंता अउ चिंतन मा तो कतको मनखे मन महतारी भाखा बर बड़ बड़े-बड़े गोठ करथे ,फेर भुईयाँ मा उतरके अइसन उदिम होना संहरायेच के बात हरे.... 

अउ ये बात बर घलो

*गुरुदेव ला दण्डवत प्रणाम हे*🙏🏻


अहोभाग्य...

जेन अइसन परिवार मा मोला जगह मिलिस। जेन मोला ये परिवार मा जोड़िन उन हितैषी के मैं आजीवन आभार मानहूँ।🙏🏻

 

मोर असन नानुक सदस्य ला ये 

जनम मा अइसन छन्द सागर के लहरा अउ सुघ्घऱ ज्ञान तीरथ के मौका मिलना....अहोभाग्य🙏🏻

*गुरुदेव ला दण्डवत प्रणाम हे*


जेन दिन ले आयोजन के विषय मा पढ़े रेहेंव । मन कुलकत रिहिस अउ मन बिनती बिनोवत रिहिस रायगढ़ होवय चाहे भिलाई ,भगवान के कृपा होवय अउ शामिल होय के मौक़ा मिलय। पुस्तक मेला के समय भी बहुत मन रिहिस "छंद के छ परिवार" के दर्शन करे के। फेर मन    के गति अउ इच्छा मा सब कारज हो जाय अइसन कोई रिमोट तो अभी तक नई बने हे।

आयोजन के ठौर जौन दिन ले भिलाई होइस तौने दिन ले मन मा रोज आवय आयोजक गुरुजी मन ले एक बेर पूछ लेंव मोर लईक कोनो बुता हे का ...?

फेर वुहि संकोच मार डरय एक मन फेर कहय- 'अभी नवा-नवा जुड़े हच कलेचुप बईठ अउ पहिली देख सुन ज़्यादा झन सियान बन'

उधो(उद्धव)बिचारा सौ मन ला कइसे कर के सम्भालत रिहिस होही सोचथवँ।

इही उधेड़-बुन मा दिन दिन लकठियावत गिस।फेर जब मन नईच मानिस तब एक दिन आदरणीय बलराम चन्द्राकर गुरुजी अउ विजेंद्रभैया (गुरुजी)ला मैसेज करिच दिएंव ।

"मोर लईक कोनो बुता होही तब जरूर बताहू"। 

पिछले कुछ समय से कक्षा के अभ्यास मा समय नई दे पाए के संकोच अपन जघा पेरत रिहीस अउ बार बार मन मोर तीर घोरत किहिस गुरुजी मन के सामना  कैसे करबे...? 

अब तक आयोजन के सब तईयारी हो गे रिहिस। गुरुजी मन ले मोला रचना सहित तैयार हो के आये के सन्देश मिलिस। अउ आयोजन के दिन समय मा आके व्यवस्था ला देखे बर कहे गिस मोर ख़ुशी अउ उछाह के ठिकाना नई रिहिस । छतीसगढिया मनखे कले चुप तो बइठ नई सकय। आयोजन के दिन विजेंद्र भैया जी व्यवस्था में लगे रिहिन जब किहिन अपन भाभी ला साथ ले आबे मोर ख़ुशी अउ बाढ़ गे । संगीता वर्मा भाभी संग 'छंद-कक्षा' मा साथ होना पहिलीच बड़ खुशी के बात रिहिस। कुर्मी भवन में मुलाकात अउ फोन मा बात तो हो जथे, फेर मुलाक़ात कमे हो पाथे पहिली बार उंकर नवनिर्मित व्यवस्थित सुंदर घर ,बढ़िया साज सज्जा अउ सुंदर कोसाही नीला लुगरा मा तइयार मयारू भउजी ला देख के मन खुश हो गे । अब तो तिहार कस लगे लगिस। भाभी देवरिहा रोटी पेश करिन मैं कहेंव रख लौ भाभी उन्हें बांट के खाबो(फेर मौका नई लगिस ,अउ अईरसा मोला ललचा के वापिस घर लहुटगे)।

कुर्मी भवन मा 

चाय-पानी ले लेके रोली चन्दन,तेल फूल बाती सब व्यवस्था अप-टू-डेट रिहिस । वैसे तो अनुभवी आयोजक मन से कोई चूक के गुंजाइश ही नई रिहस तेमा भोजन व्यवस्था के कैटरर ला चिन्हार देख के अउ उछाह लागिस। फेर मन किहिस- दू कौरा उपराहाच खवाही आज देख लेबे।(भोजन के बेर ये देख के सुखद आश्चर्य घलो होइस कि खीर मा मीठ थोकन उपराहा अउ साग मा अममठ थोरकुन ज्यादा करके सबके सुवाद माने "परफेक्ट छतीसगढिया टेस्ट" के व्यवस्था भीलईहा मन के स्वाद ले अलग हटके सबके सुवाद के बहुत ख़्याल रखे जाना भी आयोजक मंडल के सूक्ष्म निरीक्षण अउ कुशल संयोजन क्षमता के गवाही देवत रहीस) 


संगीता भाभी दूर ले चिन्हाइस 'वो प्रिया हरे'।

प्रिया जी (गुरु दीदी) ला पहुँचतीच मा अकेल्ला कोंटा खोज के सेल्फी लेवत देख के मन फेर बहुत खुश हो गे।मन मा भाव आइस उंकर विद्वता संग बचपना कायम राहय ।आदरणीय स्व. माटी जी के कविता कई पत्रिका मा या ग्रुप मा पढ़े ला मिलय। उंखरे माध्यम ले कई छंद के नाम पढ़-पढ़ के उत्सुकता जागय ।उँकर जाय ले ऊंनला जाने देखे बिना भी उंकर बर शोक होवय अउ प्रिया जी बर मन रोवय। रजिस्टर मा साइन करे बेर नान नान उम्मर के बड़े बड़े विद्वान गुरुजी मन संग भेंट होइस ।खुला मंच मा सुने आवाज अउ नाम के संग उनला देखन ता तालमेल कठिन जान परय ये गुरुजी मन तो लइके-लइका दिखथे।मिलन मलरिहा गुरुजी जब अपन नाम बताईन आश्चर्य मा बोल परेन्व- फेसबुक मा 'आपके बुता ल देख के तो सोचत रेहेंव आपके मुड़ मा सन असन सादा बाल होही।'

 ठहाका अउ आत्मीयता दोनों संघरा कुर्मी भवन मा गुंजे लागिस। गुरुजी के आये के खबर आइस मिले बर नीचे ऑफिस मा गेंन रद्दा मा सत्र 14 के सहपाठी राकेश साहू सारागाँव मिलिस। मइके गाँव के होये के कारण सत्र के शुरुवात ले ही भाईजी से आत्मीयता हे अउ हम दुनो "बैक बैंचर" मन के खूब जमथे कि कोन आज ज्यादा गलती करथे।

गुरुजी ला साक्षात देख के देवता दर्शन बरोबर खुशी होइस गुरुजी पहिली ले हाथ जोड़ दिन फेर छतीसगढिया मनखे गुरु के पाँव छुये बिना हम कहाँ मानबो। गुरुजी संग दू बेर फोन मा लम्बा बातचीत होय रिहिस "गुरुदर्शन" के पहिली बार मौका मिलिस ।

ऑफिस मा सरला शर्मा दीदी घला विराजमान रिहीन जिंखर लिखे ला पढ़के अउ उदगार ला सुनके कभु मन नई अघाय। अइसन विदुषी के दर्शन गर्व के विषय आय। 

पहुना मन के चयन बताथे कि गुरुजी हर बात मा कितना सावधान अउ सतर्क हें। अउ साधक मन के कतका बड़ हितवा हरे। ये कलजुग मा अइसन गुरु मिलना हर साधक के परम् सौभाग्य हरे।

कतको ज्ञानपिपासु मन छन्द अउ साहित्य ज्ञान ल चिन्हे, जाने,पाये बर बहुत भटकथे अउ कई-कई बेर बड़े-बड़े नाव के आडम्बर के फेर मा आके कई प्रकार ले मानसिक अउ शारीरिक रूप ले भी शोषित , प्रताड़ित होथे। 

हमर असन कुछे मनखे मन सही गुरुचरण के प्रसाद पाथन अउ "छंद के छ" कस परिवार पाके अपन भाग लिखइया ला शीश नवावत वोखर गुण संग गुरुगुन गाथन।

कार्यकम के चर्चा मा सम्मानपाती पढे के गौरव मोर बांटा आईस। आदरणीय सुरेश देशमुख जी के इंटरव्यू के दौरान ही उंखर संग फोन मा गोठबात ले बहुत आत्मीय रिश्ता बन गे रिहिस हे। फेर भेंट के मौक़ा ये आयोजन मा लगिस। उन सभा मा मंच में बैठ गे रिहिन । ये जघा अपन परिचय देना मोला सही नई लगिस मुनासिब मौका के अगोरा मा मैं एक तीर मा रही गेंव। फेर फलदार रुख अउ गुणी मनखे के अपने स्वभाव होथे। उन खुदे उठ के तीर मा आके किहिन- "मेनका वर्मा न..।"

मोर जड़मति के भाग मा अतका मान...😢

प्रणाम करेंव मुड़ मा हाथ रखिन मोर जी नई भरिस मैं केहेंव एक घँव फेर मुड़ मा हाथ मड़ातेव । उन अपन चिर-परिचित ठहाका संग अपन हाथ मोर मुड़ मा रखिन। सिरतोन कहंव ता आज तक उंकर हाथ के स्पर्श अउ स्नेह अपन मुड़ मा महसूस करत आँखी पनिया जथे।

सरला शर्मा दीदी हमर पहिली साझा संकलन के बेरा मा हमनला असीसे रिहिस । डॉ.सुधीर शर्मा जी के विषय मा बहुत पढ़े सुने रेहेंव सौ सवाल मन में रिहिस। आज के ऐतिहासिक दिन मंच मा संघरा सबके दर्शन अउ सत्संग के सुख अभिभूत करत रिहिस। मंच मा सबके दिव्यता अउ विद्वता के उजास बगरत रिहिस। कुर्मी भवन के ये मंच जिहाँ कई प्रकार के लोककला,संस्कृति अउ साहित्य सम्मेलन होथे आज छत्तीसगढ़ी छंदकार मन के सुर अउ लय गुंजत हे । गुरु शिष्य परम्परा के ये जुग मा साक्षी बनना जन्म सुफल लागत रिहिस।

मंचस्थ अतिथि मन ला सुनना , तीन-तीन विशिष्ट छंदबद्ध किताब के विमोचन ,छंद साधक मन के  अदभुत, भावप्रवण,कलात्मक, सृजनात्मक छंद पाठ सुनना,गुरुजी के उदबोधन,कक्षा सहपाठी मन संग भेंट गोठबात सब कुछ शानदार अनुभव बन गे। अउ बड़भागमानी होये के गरब भीतर हमा गे। 

अतेक सुघ्घऱ छंदरचना सुनेबर मिलिस कि एक दिन मा मन नई भरिस अगला आयोजन दू-दिवसीय होवय इही कामना करथंव।  

ये सफल आयोजन के तईयारी मा लगे गुरुजी मन के चेहरा के शान्ति अउ सुकुन, आदरणीय गुरुजी के हर साधक अउ साधिका के  सोर करई उंकर व्यवस्था के आरो लेवई, ये सब साहित्यिक आयोजन ले बढ़के छन्द परिवार के ऐतिहासिक परिवारीक आयोजन बनगे।

देवारी मिलन के आयोजन के गोठबात ले उछाह के जेन लहर शुरू होये रिहिस अब तक शान्त नई होय हे बल्कि अब तो वोमा  हैंगओवर मिंझर के नवा जोश भरत जात हे कि कब कोनो अगला आयोजन होवय,

अउ कब हम फेर संघरन हमर छंद परिवार संग।

अब जब संघरबों उछाह अउ हुलास अब अउ ज्यादा रइही। काबर कि पटल ल पढ़े, सुने गुरुदीदी अउ गुरुजी के मन के दर्शन होये ले अब नाम के संग लगभग सही तालमेल बइठ गे हे।

अगला आयोजन के अगोरा में

🙏🏻


मेनका वर्मा

सत्र-14

Saturday, 11 December 2021

छंद के छ एक परिचय


 *छंद के छ एक परिचय*

                    9 मई 2016 म, जनकवि कोदूराम दलित जी के सुपुत्र श्री अरुण निगम जी द्वारा स्थापित ऑनलाइन वाट्सअप कक्षा छंद के छ, छत्तीसगढ़ी साहित्य म छंदबद्ध गीत कविता के बाढ़ लादिस। 2016 ले लेके आज 2021 तक कुल 17 सत्र सरलग संचालित हे, जेमा लगभग 80,90 प्रकार के छंद ल छत्तीसगढ़ के लगभग सबे जिला के 250 ले जादा कवि मन सीखत अउ सिखावत हें। आवन छंद के छ ल बने ढंग ले जानन--

*काय ए छंद के छ*- 

वइसे तो "छंद के छ" श्री अरुण निगम जी द्वारा 2015 म प्रकाशित एक पुस्तक ए, जेमा लगभग 50 प्रकार के छंद, विधान अउ एक एक उदाहरण सहित छपे हे। छत्तीसगढ़ी म छंदमय काव्य ल पुष्पित पल्लवित करे बर जनकवि श्री कोदूराम दलित जी के नाम सामने आथे, ओखरे लिखे सियानी गोठ ले प्रभावित होके, दलित जी के सपना ल साकार करे बर सुपुत्र श्री अरुण निगम जी विचार करिन कि मैं छंद सीखे के बाद 2 ले 4 पुस्तक अउ छपा सकत हँव, फेर यदि ये विधान ल छत्तीसगढ़ के कवि मन ल बताहूँ त, सिरिफ 2,4 छंदमय पुस्तक नही बल्कि कोरी कोरी पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के मान बढ़ाही। इही सोच के श्री निगम जी अपन दू चार पहचान के अउ बने लिखइया कवि मन ल मना के, मई 2016 म, सोसल मीडिया के सदुपयोग करत "छंद के छ" नामक पहली सत्र के कक्षा चलाइन। जेमा  छंद के मूलभूत जानकारी अउ मात्रा गणना ले चालू करके छंद कइसे लिखे जाथे तेखर बारे म एक एक करके सिखाये बताये लगिन। सत्र  एक के बाद दूसरा अउ दूसरा सत्र के बाद तीसरा सत्र चले लगिस, साधक मन मन लगाके छन्द लिखे पढ़े लगिन। सत्र बढ़त गिस अउ छंद के छ के नाम घलो बढ़त गिस, दुरिहा दुरिहा जिला के कवि मन छंद सीखे पढ़े म दिलचस्पी देखात गिन। ये प्रकार ले सिरिफ तीने सत्र म "छंद के छ" के नाम के चर्चा, न सिर्फ सोसल मीडिया म बल्कि छत्तीसगढ़ के जमे नवा जुन्ना कवि/ लेखक मन करे लगिन। आज छंद के छ एक आंदोलन के रूप ले चुके हे, जेमा छत्तीसगढ़ के लगभग सबे जिला के साधक मन एक परिवार के रूप म गुरु शिष्य परम्परा के निर्वहन करत छंद सीखत सिखावत हें। अब यदि छत्तीसगढ़ म कोनो ल कहन कि, छंद के छ काय ए? त  एके जवाब आथे- छंद सीखे सिखाये के आन लाइन कक्षा। छत्तीसगढ़ प्रतियोगी परीक्षा म आन लाइन गुरुकुल के नाम से घलो छंद के छ  ल जाने जाथे।  कम शब्द म कहन त---छंद के छ संयम अउ समर्पण ले सुसज्जित, एक आन लाइन कक्षा ए, एक आंदोलन ए, एक परिवार ए।

*हर शनिवार अउ रविवार के होथे आनलाइन गोष्ठी के आयोजन*- 

छंद एक शास्त्रीय विधा आय, जे विशेष मात्रा अउ अपन विशेष लय के कारण विविध नाम ले जाने जाथे। जइसे दोहा छंद, सोरठा छंद, रोला छंद, कुंडलियाँ छंद, अमृतध्वनि छंद, आल्हा छंद, बरवै छंद -------आदि आदि। सबे छंद के मात्रा विधान के संगे संग लय ताल घलो अलग अलग होथे। छंद के छ के मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करना हे, एखर संगे संग छंदकार ल लिखे के साथ पढ़े बर घलो सिखाना हे, तभे तो मार्च 2017 ले सरलग हर शनिवार अउ रविवार के आनलाइन गोष्ठी के आयोजन होथे। जेमा सबे साधक मन बढ़ चढ़के भाग लेथें। साधक मन ल कोन छंद ल कइसे  लिखना हे, वोला उँखर कक्षा म सिखाये जाथे, अउ कोन छंद ल कइसे पढ़ना या गाना हे, तेला गोष्ठी म। गोष्ठी म परिपक्व होके, छंद परिवार के साधक मन कवि सम्मेलन के मंच मन म घलो छंदबद्ध  गीत कविता के प्रस्तुति देवत हें, अउ ताली बटोरत हें। छंद के छ के ही प्रभाव ए, जे आजकल कवि सम्मेलन के मंच मन म घलो छंदबद्ध विविध  गीत,कविता पढ़े सुने जावत हे। गोष्ठी के एक अउ खास बात हे- हर सप्ताह अलग अलग साधक मन ल गोष्ठी के संचालन करे के दायित्व देय जाथे, जेखर ले हर साधक संचालन करे बर सीखत हें।  गोष्ठी के दिन कोनो परब सपड़ जथे त वो दिन वो परब या फेर दिवस आधारित गोष्ठी होथे, जेमा सबो साधक मन एके प्रकार के विषय म गीत कविता प्रस्तुत करथें। जइसे होली हे, त सब साधक होली आधारित काव्य पाठ करथें। गोष्ठी म बीच बीच म छत्तीसगढ़ के विज्ञ साहित्यकार, गीतकार, कलाकार मन पहुना बनके घलो आथें, अउ मन लगाके छंदबद्ध गीत कविता सुनके आशीष देथें,  एखर से वो पहुना मन छंद परिवार के  नवा जुन्ना साधक मन ला जानथें अउ आपसी मया मेल बढ़थे। छत्तीसगढ़ के कतको नामी शक्स मन छ्न्द के छ परिवार के गोष्ठी म पहुना बनके आयें हें, जेमा  लोक गायिका स्वर कोकिल श्री मति कविता वासनिक जी, कवियित्री अउ अभिनेत्री श्री मति संतोष झाँझी जी, वरिष्ठ साहित्यकार सरला शर्मा जी, गजलकार श्री दिनेश  गौतम जी, अभिनेत्री अउ गायिका श्रीमती शैलजा ठाकुर जी, गीतकार, गायक श्री महादेव हिरवानी जी, साहित्यकार बलदाऊ राम  साहू जी, गजलकार जनाब लतीफ खान जी, साहित्यकार, प्रकाशक अउ शिक्षाविद श्री सुधीर शर्मा जी, वरिष्ठ साहित्यकार गजलकार श्री माणिकविश्वकर्मा नवरंग जी, सुमधुर गायिका श्री मति अनुराग ठाकुर ------आदि के अलावा कई बड़े साहित्यकार अउ कलाकार मन अतिथि के रूप म शामिल हो चुके हे। उहू मन छंद परिवार के अइसन उदिम ले भारी खुश होइन,अउ रंग रंग के छंद के संगे संग सुमधुर राग रंग ल सुनके खूब प्रशंसा करिन। 2017 ले अनवरत चलत छंदबद्ध काव्य गोष्ठी आजो राग रंग के आकर्षण के केंद्र होथे।

*छंद के छ के सत्र अउ साधकगण *

  छंद के छ म, सत्र 1 ले लेके आज सत्र 20 तक, लगभग सबे जिला के साधक मन शामिल हें,नाम गिनावन त- जशपुर, रायगढ़, कोरबा, जांजगीर-चाम्पा, मुंगेली, बिलासपुर, बलौदाबाजार, रायपुर, दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, बालोद, महासमुंद, गरियाबन्द, कबीरधाम, कांकेर, बेमेतरा,धमतरी, सरगुजा,बस्तर आदि।

*छन्द के छ - सत्रवार साधक*

सत्र - 1 (09 मई 2016)
1. हेमलाल साहू 
2. रमेशकुमार सिंह चौहान, 
3. सुनील शर्मा 
4. सूर्यकान्त गुप्ता 
5. मिथिलेश शर्मा 
6. लोचन देशमुख 
7. देवेन्द्र हरमुख 
8. श्रीमती शकुन्तला शर्मा
9. मिलन मलरिहा

सत्र - 2  (28 सितंबर 2016)
1. चोवाराम वर्मा 
2. गजानन पात्रे 
3. दिलीप कुमार वर्मा 
4. कन्हैया साहू 
5. असकरण दास जोगी 
6. सुनील शर्मा
7. सुखन जोगी 
8. श्रीमती बसंती वर्मा 
9. श्रीमती रश्मि गुप्ता 
10. श्रीमती आशा देशमुख
11. रेखा पालेश्वर

सत्र - 3 (07 जनवरी 2017) 
1. ज्ञानुदास मानिकपुरी 
2. मनीराम साहू 
3. जितेंद्र वर्मा खैरटिया 
4. मोहनलाल वर्मा
5. हेमंत मानिकपुरी 
6. दुर्गाशंकर इज्जतदार 
7. अजय अमृतांशु 
8. श्रीमती रश्मि गुप्ता
9. सुखदेव सिंह अहिलेश्वर


सत्र - 4 ब(29 अप्रैल 2017)
1. आर्य प्रजापति 
2. मोहन कुमार निषाद 
3. महेतरू मधुकर 
4. संतोष फरिकार 
5. तेरस राम कैवैर्त्य 
6. पुखराज यादव 
7. सुरेश पैगवार
8. ललित साहू जख्मी  
9. श्रवण साहू 
10. श्रीमती दीपिका झा
11. बलराम चंद्रकार

सत्र 4 अ - (29 अप्रैल 2017) 
1. पुष्कर सिंह राज @
2. राजेश कुमार निषाद 
3. अरुण कुमार वर्मा @
4. अनिल जांगड़े गौंतरिहा @
5. जितेंद्र कुमार मिश्र @
6. पोखन जायसवाल 
7. दिनेश रोहित चतुर्वेदी @
8. जगदीश हीरा साहू 
9. कौशल कुमार साहू 
10. तोषण चुरेन्द्र

सत्र - 5 (28 सितंबर 2017) 
1. पुरुषोत्तम ठेठवार 
2. विद्यासागर खूँटे @
3. मेहतरु मधुकर @
4. परमेश्वर अंचल @
5. बोधनराम निषादराज 
6. मथुरा प्रसाद वर्मा
7. श्रीमती ज्योति गभेल 
8. श्रीमती नीलम जायसवाल 
9. श्रीमती प्रियंका गुप्ता @
10. श्रीमती आशा आजाद

सत्र - 6   (10 जनवरी 2018)
1. राजकिशोर धीरही 
2. रामकुमार साहू 
3. ललित साहू जख्मी 
4. दीनदयाल टंडन 
5  जगदीश हीरा साहू 
6. गुमान प्रसाद साहू 
7 मीता अग्रवाल 
8. बलराम चंद्रकार 
9. शुचि भवि 
10. बालक दास निर्मोही 
11. कुलदीप सिन्हा 
12.राम कुमार चंद्रवंशी 
13. महेंद्र कुमार माटी 
14. अनिल पाली 
15. धनसाय यादव 
16. ईश्वर लाल साहू आरुग 
17. गजराज दास महंत 


सत्र - 7 (अ) 04 जून 2018
1. अशोक धीवर जलक्षत्री 
2. राधेश्याम पटेल 
3. सावन गुजराल 
4.उमाकांत टैगोर 
5. राजकुमार बघेल 
6. नवीन कुमार तिवारी @
7. निर्मल राज @
8. योगेश शर्मा @
9. सीमा साहू @
10. सुधा शर्मा 
11. केवरा मीरा यदु


सत्र 7 (ब)  04 जून 2018
1.दीपक कुमार साहू 
2.मिनेश कुमार साहू 
3. द्वारिका प्रसाद लहरे 
4. संदीप परगनिहा @
5. महेंद्र कुमार बघेल 
6. गजराज दास महंत 
7. युवराज वर्मा @
8. हीरालाल गुरुजी 
9. अनुभव तिवारी @
10. ईश्वर साहू बंधी
 
सत्र - 8 (10 जनवरी 2019)
1. गीता विश्वकर्मा @
2. चित्रा श्रीवास 
3. तुलेश्वरी धुरंधर @
4. दीपाली ठाकुर @
5. शोभा मोहन श्रीवास्तव 
6. सुनीता कुर्रे @
7. स्नेह लता सीतापुर सरगुजा @
8. मीना जांगड़े @
9. सरस्वती चौहान 
10. रामकली कारे
11. शशि साहू कुल 11 

सत्र - 9 (26 जनवरी 2019)
सर्वश्री
1. अश्वनी कोसरे 
2. चंद्रेश्वर सिंह दीवान
3. ज्वाला प्रसाद कश्यप
4. धनराज साहू @
5. विरेंद्र कुमार साहू 
6. संतोष कुमार साहू 
7. केशव पाल
8. नमेन्द्र कुमार गजेंद्र
9. लक्ष्मीनारायण देवांगन
10. कमलेश वर्मा
11. जितेंद्र कुमार निषाद
12. श्लेष चंद्रकार

सत्र - 10 (29 सितंबर 2019) 
1. अमित टंडन 
2. जुगेश कुमार बंजारे 
3 तोरण लाल साहू 
4 दीपक कुमार निषाद 
5 देवेंद्र पटेल 
6 बृजलाल भावना 
7 भागवत प्रसाद साहू 
8 लालेश्वर अरुणाभ 
9. लीलेश्वर देवांगन 
10 हरीश अष्टबंधु

सत्र 11 - (12 जनवरी 2020)
1. तेजराम नायक 
2. अनिल सलाम 
3. सुखमोती चौहान @
4. धनेश्वरी सोनी 
5. धनराज साहू बागबाहरा @
6. विजेंद्र वर्मा 
7. मोहनदास बंजारे 
8. जितेंद्र कुमार साहिर 
9. मनोज कुमार वर्मा 
10. मिलन मलरिहा

सत्र - 12  (25 मई 2020) 
1. डर्मेंद्र कुमार रौना 
2.अमृत दास साहू 
3. इंद्राणी साहू 
4. एकलव्य साहू 
5  ओम प्रकाश साहू अंकुर 
6. गोवर्धन परतेती 
7. धनराज साहू मनहोरा खुज्जी 
8. नंदकुमार साहू नादान 
9. मनीष साहू 
10. रमेश कुमार मंडावी 
11. राजकुमार चौधरी 
12. शिव प्रसाद लहरे
13. शेर सिंह परतेती

सत्र - 13 (28 सितम्बर 2020) 
1.अशोक कुमार जायसवाल 
2. कमलेश मांझी 
3. चंद्रहास पटेल 
4. टिकेश्वर साहू 
5. प्रिया देवांगन
6. दीपक तिवारी 
7. नारायण प्रसाद वर्मा 
8. पूरन जायसवाल
9. रीझे यादव 
10.सुनील शर्मा नील 
11. गजराज दास महंत
12. सुरेश निर्मलकर 
13. भागबली उइके

सत्र - 14 (10 जनवरी 2021)
1. अजय शेखर नेताम नैऋत्य
2. अनुज छत्तीसगढ़िया 
3. अन्नपूर्णा देवांगन 
4. केतन साहू खेतिहर
5. तिलक लहरे 
6. मेनका वर्मा 
7. राकेश कुमार साहू 
8. वसुंधरा पटेल 
9. संगीता वर्मा 
10. सुजाता शुक्ला 
11. देवचरण धुरी
12. पद्मा साहू 
13. मनोज यादव

सत्र - 15 (14 मई 2021) 

1. आशुतोष साहू 
2 डी.एल. भास्कर 
3 दूज राम साहू 
4 धर्मेंद्र डहरवार 
5 नंद किशोर साहू 
6 नागेश कश्यप 
7 नारायण प्रसाद साहू 
8 प्रदीप कुमार वर्मा 
9 भागवत प्रसाद 
10 महेंद्र कुमार घृतलहरे 
11 रमेश चोरिया 
12 रवि बाला राजपूत 
13 राजेंद्र कुमार निर्मलकर 1
4 रोशन लाल साहू 
15 सुमित्रा कामड़िया

सत्र - 16 (28 सितम्बर 2021)

1. डीलेश्वर साहू 
2. दिलीपकुमार पटेल 
3. नेहरुलाल यादव 
4. पुर्नोत्तम साहू 
5. भीजराम वर्मा 
6. ममता हीर राजपूत 
7. मुकेश उयके 
8. राज निषाद 
9. वीरू कंसारी 
10. शीतल बैस 
11. केदारनाथ जायसवाल

सत्र - 17 (28 सितम्बर 2021)
1. कृष्णा पारकर 
2. तिलेश कुमार यादव 
3. दयालू भारती 
4. दुष्यन्त कुमार साहू 
5. द्रोण कुमार सार्वा 
6. भैलेन्द्र रात्रे 
7. मनीष कुमार वर्मा 
8. शैल शर्मा 
9. साँवरिया निषाद 
10. चूड़ामणि वर्मा 
11. बाल्मीकि साहू

सत्र 18 (10 जनवरी 2022)

(1) ओमप्रकाश पात्रे बेमेतरा
      
(2) जागृति बघमार
      
(3) पूनम कुमार कंसारी नयापारा राजिम
      
(4) प्यारेलाल साहू मरौद
      
(5) अनिता चंद्रकार,बेमेतरा

(6) भारती राजपूत रायगढ़
      
(7) राधेश्याम सिंह बैस
      
(8) शिवानी कुर्रे
      
(9) गौरीशंकर कश्यप, देवभोग
      
(10) तुषार शर्मा नादान, राजिम
         

सत्र 19 (10 जनवरी 2022)

 (1)  लिखेश्वर साहू सौंगा मरौद मगरलोड
         
(2) भूखनलाल वर्मा धामनसरा सुरगी राजनादगाँव
       
 (3) रूपेश कुमार चौहान- हरदीबाजार कोरबा
      
 (4)परमानंद साहू '"प्रकाश*- धनोरा बालोद
      
(5) वासु यादव, कांकेर   
     
(6) धनेश कुमार वर्मा अर्जुनी
बलौदा बाजार
       
(7) कैलाश कुमार साहू
 लोरमी, जिला- मुंगेली 
       
(8) ,मोहन कबीरपंथी दानी कोकड़ी
      
(9) गीता शिशिर चंद्राकर, भिलाई
       
(10) भारती पटेल भवि,
        


सत्र 20 (03 मई 2022)

1. पंकज मेश्राम, भिलाई

2. हेमलाल सहारे, राजनाँदगाँव

3. ग्वाला यादव, जोशी-लमती

4. जितेंद्र वर्मा वैद्य,धमधा

5. देवेन्द्र परिहार, मुंगेली

6. डोरेलाल कैवर्त कोरबा

7. राधेश्याम ध्रुव, भीरागांव, भानुप्रतापपुर

8. बेदराम पटेल, डोंगरगढ़

9. कमलेश प्रसाद शर्मा , गंडई

10. श्रीमती नीलम वर्मा, बेमेतरा 
      
11. डोमेन्द्र नेताम, मुण्डाटोला, डौंडीलोहारा
     
12. कन्हैयालाल मेश्राम, किरगी, अर्जुनी

13. गुलशन खम्हारी, आमगाँव, तमनार, रायगढ़

14. राज साहू, समोदा (आरंग) रायपुर

15. अजय पटनायक, डोलेसरा तमनार, रायगढ़



सत्र 21(27 सितंबर 2022)

1. श्री नोकेश मधुकर, खैरा लोरमी - 8770351209

2.संजय निषाद,कुटेला कुरूद आरंग - 9575524505

3. दुष्यंत कुमार साहू, डूंड्रा रायपुर- 9926156014

4.जगन्नाथ ध्रुव, घुंचापाली बागबाहरा- 8959582197

5.पप्पू पटेल, लब्दा पोड़ी कोरबा- 9399028204

6.ईश्वर निषाद - ग्राम-सलधा बेमेतरा- 6262220394

7.योगिता साहू, ग्राम - चोरभट्टी,धमतरी- 6260293105

8. संजू ऊके, गंडई, जिला खैरागढ़- 9009864553

9. जलेश्वर दास मानिकपुरी,       -9669708441

10. आशीष बघेल,बहुनवागाँव बेमेतरा- 9301148744

11. दिनेश साहू,बाजार अतरिया खैरागढ़- 9098981250

12.संजय निषाद, मुसकी महासमुंद- 9754168016
      

                    हर बछर तीन बेर लगभग 10 या 12 साधक ल लेके एक नवा सत्र के शुभारंभ होथे-  पहला सत्र नवा साल बर(जनवरी), दूसर सत्र अक्ति बर(मई) अउ तीसर सत्र दलित जी के पुण्यतिथि बर(सितम्बर)। कोनो सत्र म जादा साधक मनके नाम आ जथे त वो सत्र ल अ अउ ब म बाँट दिये जाथे। ये प्रकार ले आज छत्तीसगढ़ के चारो कोती के लगभग 250 साधक मन छ्न्द के छ के आंदोलन म जुड़के छंद सीखत हे।
                   
**छंद के छ के गुरुजी*-

छंद के छ परिवार के मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ी साहित्य के बढ़वार हे, अउ ये तभे सम्भव हे जब लिखइया अउ सीखइया रहय, तेखर सेती छंद परिवार "सीखो अउ सिखावव" के नारा लेके आघू बढ़त हे, अउ एखरे प्रमाण ए कि, आज छंद परिवार ले 200 ले आगर साधक मन सीखत अउ सिखावत हें। सत्र 1,2 अउ 3 ल श्री अरुण कुमार निगम जी खुदे छंद लेखन म पारंगत करिन, तेखर बाद इही सीखे पढ़े साधक मन आन कक्षा म गुरु के दायित्व सम्हालत गिन अउ सत्र बढ़त गिस। आज श्री अरुणकुमार निगम जी के आलावा श्री चोवाराम  वर्मा बादल जी, श्री दिलीप कुमार वर्मा जी, श्री मति आशा देशमुख जी, श्री मनीराम साहू मितान जी, श्री मोहनलाल वर्मा जी, श्री अजय अमृतांशु जी, श्री सूर्यकांत गुप्ता, श्री पोखनलाल जायसवाल, श्री जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया जी, श्री ग्यानु मॉनिकपुरी जी, श्री सुखदेवसिंह अहिलेश्वर जी, श्री गजानन्द पात्रे जी, श्री बलराम चंद्राकर जी, श्री महेंद्र बघेल जी, श्री राम कुमार चन्द्रवंसी जी,  श्री मति शोभामोहन श्रीवास्तव जी,श्री बोधनराम निषादराज जी, श्री मथुरा प्रसाद वर्मा जी, श्री वीरेंद्र साहू जी, डॉ मीता अग्रवाल जी, श्री कमलेश कुमार वर्मा जी,  श्री श्लेष चंद्राकर जी, श्री पुरषोत्तम ठेठवार जी, श्री अशोक धीवर जलक्षत्री जी,श्री डी पी लहरे जी अउ श्री अश्वनी कोशरे जी, नेमेंद्र कुमार गजेंद्र, विजेंद्र वर्मा,मनोज वर्मा,इंद्राणी साहू, नीलम जायसवाल--- आदि मन गुरुजी के भूमिका निभावत हें। गुरु शिष्य परम्परा के बानगी छंद परिवार म सहज दिखथे।

*स्थापना दिवस समारोह*-

आनलाइन कक्षा म जुड़े साधक मन जब आपस म मिलथें तब उँखर खुशी के ठिकाना नइ रहय, इही मया मेल, भेंट भलाई खातिर छंद परिवार मनाथें- स्थापना दिवस समारोह। ये दिवस बिना कोनो नेता मंत्री के छंद परिवार अउ आसपास के विज्ञ साहित्यकार, कलाकार मनके उपस्थिति म सम्पन्न होथे। स्थापना दिवस समारोह म जउन साधक मन छंदबद्ध पुस्तक छपवाये रहिथे ओखर विमोचन घलो होथे। अउ पधारे जम्मो साहित्यकार मन  कविता पाठ करथें। स्थापना दिवस समारोह मई महीना म मताये जाथे।  पहली स्थापना दिवस समारोह 2017 म, वरिष्ठ छंद साधिका श्री मति शकुंतला शर्मा जी के संयोजन म भिलाई म सम्पन्न होइस। दूसर स्थापना दिवस समारोह 2018 म छंदकार मनीराम साहू मितान जी के संयोजन म सिमगा म सम्पन्न होइस। तीसर स्थापना दिवस समारोह 2019 म कबीरधाम के साधक मनके संयोजन म कवर्धा म सम्पन्न होइस। कोविड-19 के कारण 20 अउ 21 म स्थापना दिवस समारोह बाधित रिहिस।

*दिवाली मिलन समारोह-*

 दिवाली मिलन समारोह के मुख्य उद्देश्य घलो आपसी मेल, मिलाप हे। ये समारोह नवम्बर महीना के आसपास आयोजित कर जाथे। पहली दिवाली मिलन समारोह 2017 म श्री चोवाराम वर्मा बादल जी के संयोजन म हथबन्द जिला बलौदाबाजार म सम्पन्न होइस। दूसर दिवाली मिलन समारोह 2018 म श्री बलराम चंद्राकर अउ  श्री सूर्यकान्त गुप्ता जी के संयोजन म रायपुर म सम्पन्न होइस। 2019 के दिवाली मिलन समारोह श्री सुरेश पैगवार जी के संयोजन म जांजगीर नैला म आयोजित रिहिस, फेर जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया जी उही समय हम सब ला छोड़ के परलोक सिधार गिन, ते पाय के नवम्बर 2019 के दिवाली मिलन समारोह मस्तुरिया जी ल समर्पित आयोजन रिहिस।  2020 के दीपावली मिलन समारोह कोरोना  महामारी के कारण नइ हो पाइस। 2021 म चतुर्थ दिवाली मिलन समारोह श्री विजेंद्र वर्मा अउ बलराम चंद्राकर जी के संयोजन म भिलाई म सम्पन्न होइस।
                येखर आलावा श्री अजय अमृतांशु जी के संयोजन म 2017 म सुरता दलित जी, नाम से एक छन्दमय कवि सम्मेलन आयोजन बलौदाबाजार जिला म होय रिहिस, अउ 2019 के अन्तर्राष्ट्रीय  पुस्तक मेला रायपुर म छंद के छंद परिवार ल एक सत्र कवि सम्मेलन बर प्रदान करे गे रिहिस।

*छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ छंद के छ परिवार*- 

 छंद के छ म जुड़े जम्मो साहित्यकार मनके जवाब नइहे, इँखर कलम म गजब धार हे, छंद के छ म जुड़े के पहली, मुक्त छंद म कई पुस्तक ये मन लिख चुके हें, फेर छंद के छ ले जुड़े के बाद छंदमय पुस्तक के घलो बरसात करत हें, महज 4,5 बछर म छंद साधक मनके कतको छंदमय पुस्तक सामने आ चुके हे। कुछ पुस्तक के नाम- जइसे चोवाराम वर्मा बादल कृत- छंद बिरवा, मनीराम साहू मितान  कृत-  हीरा सोना खान के(प्रबन्ध काव्य),महाप्रसाद(प्रबन्ध काव्य), रमेश चौहान कृत- आँखी रहिके अंधरा(कुंडलियाँ संग्रह), दोहा के रंग, छंद चालीसा, छंद के रंग, शकुंतला शर्मा कृत- छंद के छटा, राम कुमार चन्द्रवंशी कृत- छंद झरोखा, छंद बगइचा, जगदीश साहू हीरा कृत- सम्पूर्ण रामायण(मनका- सार छंद में), छंद संदेश, बोधनराम निषाद राज कृत- अमृतध्वनि छंद संग्रह, छंद कटोरा, आदि छंदमय पुस्तक छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करत हे। पाठक मनके मया घलो बरोबर मिलत हे। एखर आलावा छंद परिवार के साधिका आशा देशमुख ह  लंकापति रावण रचित शिव तांडव के छत्तीसगढ़ी म भावानुवाद करे हे, वइसने धनेश्वरी सोनी गुल ह, हनुमान चालीसा ल छत्तीसगढ़ी म पिरोय हे। छंद परिवार के वरिष्ठ साधक अउ गुरु श्री चोवाराम वर्मा बादल जी ह रामायण के छत्तीसगढ़ी भाषा म छंदमय अनुवाद करे के बीड़ा उठाए हे, त श्री पुरषोत्तम ठेठवार जी ह श्री मद भागवत के 18 अध्याय ल छंदबद्ध करत हे। एखर आलावा जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया के छंद सरगम, धनेश्वरी सोनी गुल के 300 सवैया संग्रह, बोधनराम निषादराज जी के 300 हरिगीतिका छंद संग्रह, त्रिभंगी छंद संग्रह, सुखदेव सिंह अहिलेश्वर के छंद अँजोर, आशा देशमुख जी के छंद चंदौनी बहुत जल्दी पाठक मन के हाथ म आने वाला हे। छत्तीसगढ़ी के संगे संग मातृभाषा हिंदी म घलो बरोबर पुस्तक छंद साधक मन लिखत हें। 

*सोसल मीडिया के सदुपयोग-*

सोसल मीडिया के ही प्रताप आय जे छत्तीसगढ़ के चारो कोती के कवि मन वाट्सअप के माध्यम ले छंद जे छ के आनलाइन कक्षा म, छंद सीखत अउ सिखावत हे, कोनो एक जघा क्लास लगाके अइसन कर पाना सम्भव नइ रिहिस।  जब 2019-20 म पूरा विश्व कोविड के महामारी ले त्रस्त अउ भयभीत रिहिस, चारो मुड़ा अशुभ समाचार मिलत रिहिस, वो समय छंद परिवार के साधक मन अपन अधिकतर समय छंद सीखे म,अउ ऑनलाइन गोष्ठी म सीखे छंद ल पढ़े म लगाइन। कतको साधक मन पुस्तक छपाये के तैयारी करिन। इही आनलाइन गोष्ठी ल अइसन आफत के बेरा म पूरा छत्तीसगढ़ काव्य पाठ बर बउरिन, जेला छंद के छ परिवार 2017 ले उपयोग म लावत हें। ये प्रकार ले कोविड काल म छंदपरिवार सोसल मीडिया के जरिये एक होके डर भय दुख सुख बाँटिन अउ विजय हासिल करिन। 
             15 अगस्त 2017 के छंद परिवार छंद खजाना नामक एक ब्लॉग बनाइन, जेमा साधक मनके छंद संग्रहित हे।  तीज, तिहार, बार, तिथि विशेषांक छंदबद्ध कविता के विशेष संग्रह घलो इही ब्लाग म हे। कुल मिलाके यदि गिनती किया जाय त, लगभग 90, 100 प्रकार के 10,000 ले जादा छंदबद्ध कविता संग्रहित होही। जेला न सिर्फ भारत के बल्कि आन देश के  पाठक मन तको बरोबर पढ़थे। 
गूगल म http:chhandkhajana.blogspot.com टाइप करके विविध प्रकार के छंद एक संघरा पढ़े जा सकत हे। एखर आलावा फेसबुक म घलो छंद के छ नाम से एक समूह हे, जेमा छंद परिवार के इतर आन लेखक कवि मन घलो जुड़े हे, जिंहा छंदबद्ध रचना साधक अउ कवि मन पोस्ट करते रहिथे। छंद के छ सोसल मीडिया के ही उपज आय, जेला श्री अरुण निगम जी, छंद सीखाय बर चुनिन, अउ उँखर नेतृत्व, मार्गदर्शन  म छंद के छ आजो सरलग चलत हे। छंद परिवार के साधक मन  आकाशवाणी अउ दूरर्दर्शन म घलो छंदबद्ध काव्य पाठ हें। समाचार पत्र, पत्रिका मन म घलो छन्दबद्ध रचना स्थान पावत हे।

*छंद के छ के उद्देश्य*-

 छंद के छ के एक मात्र उद्देश्य- छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ल पोठ करना हे। छंद के छ के प्रभाव ले छत्तीसगढ़ी शब्द मन म एकरूपता सहज देखे बर मिलत हे, संगे संग हिंदी वर्णमाला के 52 आखर सब झन बउरत हें। भाव पक्ष के संग कविता के कलापक्ष मजबूत होवत हे। विषय म विविधता घलो सहज दिखत हे, घर बन खेत खार के आलावा विधि, विज्ञान, शिक्षा, संस्कार, जन जागृति अउ नवा नवा चीज ऊपर साहित्य सृजन होवत हे। छंद के छ के एक उद्देश्य सीखे के संगे संग सीखाना घलो हे, तभे तो आज अतेक अकन सत्र सुचारू रूप ले संचालित होवत हे। नँदावत गुरु शिष्य परंपरा के झलक छंद के छ परिवार  म देखेल मिलथे। सीखे सिखाये के हमर  इही उद्देश्य ल देखत छत्तीसगढ़ के आन सुजान साहित्यकार मन घलो अपन ज्ञान ल सोसल मीडिया के जरिये बगरावत दिखिस। छंद के छ संयम अउ समर्पण के माला म गुथाय एक परिवार आय, जे सीखे पढ़े के साथ साथ एक विशेष समूह खुला मंच द्वारा अपन सुख दुख ल घलो बाँटथे। छंद के छ छत्तीसगढ़ी भाँखा महतारी के सेवा म सतत लगे हे, अउ खरा उतरत घलो हे, चारो कोती छंद के छ के शोर हे। परिवार के साधक मनके आलावा आन कवि मन घलो छंदमय सृजन करत हे, अउ कतको मन हिंदी, छत्तीसगढ़ी म छंद सीखत अउ सिखावत हें। कवि सम्मेलन, पत्र पत्रिका, सोसल मीडिया  अउ इती उती चारो कोती गूँजत  छंद के शोर, छंद के छ के उपलब्धि आय।

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)

Thursday, 9 December 2021

शहीद वीर नारायण सिंह*


 

*शहीद वीर नारायण सिंह*

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छत्तीसगढ़ के पावन भुइयाँ जेला तइहा के जुग मा दक्षिण कौशल घलो काहयँ, बड़े-बड़े संत, गुरु, ज्ञानी अउ वीर सपूत मन ला अपन गोदी में खेलइया महतारी आय । ए महतारी के अँचरा मा घन जंगल घटते हे  त  हीरा, सोना ,चाँदी  के खदान घलो हाबय । इहाँ के नदिया मन मीठ पानी ले भरे कुलकत- गावत रहीथें ।किसान के कोठी ह अन्न मा भरे  छलकत रहिथे ।भगवान राम के महतारी माता कौशिल्या के मइके ए भुइयाँ मा सदा  धरम-करम के अलख जागे रहिथे। इहाँ के रहवासी मेहनती, सरु किसान मन ला  देख के कतको झन काहत रहिथें-- छत्तीसगढ़िया सब ले बढ़िया।

     जुन्ना जुग ले ए भुइयाँ  मा देशभक्ति के पुरवइया तको फुरुर-फुरुर चलत हे।अन्याय, अत्याचार के विरोध करें मा छत्तीसगढ़िया कभू पिछू नइ राहयँ। भारत के पहली स्वतंत्रता संग्राम ले घलो पहिली इहाँ के सपूत मन अंग्रेज मन के मुकाबला करे  हें।उही कड़ी मा सोनाखान के वीर सपूत नारायण सिंह अउ ओकर  पूर्वज मन ला भुलाये नइ जा सकय।

  वर्तमान मा बलौदाबाजार जिला मुख्यालय ले लगभग 70 किलोमीटर दूरिहा मा डोंगरी पहाड़ के बीच, घन जंगल मा सोनाखान  नाम के गाँव, जेला सिंघगढ़ घलो काहयँ, हाबय। जेन हा 17 वीं शताब्दी मा सारंगढ़ के राजा के वंशज मन के जमीदारी के राजधानी बने रहिसे। इहें के परजा हितैषी वीर जमीदार रामराय के धर्मपत्नी  रानी रामकुँवर देवी के  कोंख ले सन 1795 मा महान प्रतापी बालक नारायण सिंह के जनम होइच।

     कहे गे  हे--होनहार बिरवान के होत चिकने पात। सोला आना सहीं बात आय। बालक  नारायण सिंह ला खून मा दाई के धार्मिक संस्कार और पिता के दयालु पन ,वीरता के गुण मिले रहिसे। जमीदार रामराय परजा के हित करे बर कई बेर अंग्रेज मन ले झगरा लड़ाई करिच ।अपन बिंझवार आदिवासी सेना के संग मा सन 1818- 19 म अंग्रेज अउ भोंसले राजा के विरोध मा तलवार उठाइच। तेकर सेती  कैप्टन मैक्सन हा ओला अपन बड़े दुश्मन मानय।

    परोपकारी जमीदार राम राय के सन 1830 मा इंतकाल होये के बाद 35 साल के  उमर मा  युवराज नारायण सिंह हा सोनाखान के जमीदार बनिच अउ अपन जिनगी ला परजा मन के सेवा मा खपाये ल धरलिच । ओकर निस्वार्थ सेवा अउ राजकाज ला देख के जम्मों परजा अब्बड़ खुश राहयँ ।  

    जमीदार नारायण सिंह ह अपन दुलरुवा घोड़ा म बइठ के, कनिहा मा तलवार खोंचे, घूम-घूम के  अपन परजा के सुख-दुख के सोर -सन्देशा लेवत राहय। एक दिन एक झन आदिवासी हा गोहराइच-- जमीदार महराज, रक्षा करव। एक ठन बघवा हा  अबड़ेच उतपित करत हे। हमर पाले-पोंसे गाय-गरुवा, छेरी-बोकरा मन ला हबक-हबक के खावत हे।अतका  ला सुन के वीर नारायण हा  अपन जान के बाजी लगाके तुरते बघवा ला खोज के मार देइच ।चारों मुड़ा जय जयकार होगे। बताये जाथे उही दिन ले वोला चालबाज अंग्रेज मन वीर के उपाधि देये रहिन।

  सन 1856 के बात आय। भारी दुकाल परगे।लोगन दाना-दाना बर मोहताज होके भूँख मा मरे ल धरलिन। वीर नारायण सिंह  ले उँकर दुख देखे नइ जाय। अपन कोठी के जम्मों धान कोदो ला  बाँट दिच  फेर कतका झन ला पुरतिच भला ? वोहा बड़े-बड़े सेठ साहूकार  मन सो हाथ पसार के अन्न माँगय।जेन मिलय तेला बाँट दय।सहीं बात ये - पाँचों अँगुरी एके बरोबर  नइ होवय। कतको के हिरदे पथरा कस निष्ठुर होथे।ओइसने काइयाँ कसडोल के सेठ माखन रहिसे। वीर नारायण सिंह ह उहू ला गोहरावत कहिच-- सेठ जी! लोगन भूख मा  मरत हें। तोर गोदाम मा  अबड़े  धान-चाउँर भरे हे।  किरपा करके ओला  बाँट दे ।आगू बछर धान- पान होगी तहाँ ले तोला लहुटा देबो।ओतका ला सुन के माखन भन्नागे अउ इंकार करत हाथ हलादिच । तब तो वीर नारायण सिंह हा आव देखिच न ताव ,  गोदाम के तारा ल टोर के धान -चाउँर ला बाँट दिच।वोती  माखन ह रायपुर जाके अंग्रेज कैप्टन इलियट करा शिकायत कर दिच। अंग्रेज मन तो ओखी खोजत राहयँ। चोरी अउ डकैती के आरोप मा 24 अक्टूबर 1856 के संबलपुर मा वीर नारायण ला पकड़ के रायपुर के जेल मा डारदिन। 

  फेर शेर हा पिंजरा मा कतका दिन ले धँधाये रतिच ? 28 अगस्त 1857 ई. मा वीर नारायण सिंह हा अपन तीन झन साथी मन संग जेल ले फरार होके सीधा  सोनाखान पहुँच गिच। वो हा अंग्रेज मन ले निपटे बर तीर-कमान वाले सेना के संग 500 बंदूकधारी सेना के गठन  करिच ।एति एलियट हा कैप्टन स्मिथ ला आदेश देवत कहिच--जा नारायण ला जिंदा या  मुर्दा लाके देखा।आदेश पाके कैप्टन स्मिथ हा भारी सेना लेके  सोनाखान ला चारों मुड़ा ले घेरलिच।वीर नारायण सिंह हा कुर्रूपाट के डोंगरी ऊपर मोर्चा संभाले राहय।भारी लड़ाई होइच। स्मिथ अउ ओकर सेना के पाँव उखड़े ल धरलिच। बहुँते सैनिक मरगें।उही समय देवरी के गद्दार जमीदार हा आके स्मिथ सँग मिलगे। भारी मारकाट मातगे।फेर वीर नारायण हाथ आबे नइ करत रहिच। तब अंगेज मन गाँव मन मा आगी लगाये ल धरलिन। निहत्था परजा मन ला मारे काटे ल धरलिन।जेला देख के अपन परजा ला बँचाये खातिर वीर नारायण हा आत्म समर्पण कर दिच।

      कैप्टन स्मिथ ला ओला पकड़ के रायपुर के जेल मा ओलिहा दिच। अंग्रेज मन ओकर उपर चोरी अउ डकैती के देखवटी  मुकदमा चलाके, मौत के सजा सुनाके 10 दिसम्बर 1857 के दिन आज के रायपुर मा जेन जगा जयस्तम्भ चौंक हे उही जगा तोप मा बाँध के उड़ा दिन। 

       अपन परजा अउ महतारी भुइयाँ खातिर जान गवाँके  वीर नारायण सिंह हा अमर होगे। जब ले ए धरती रइही, जब ले सुरुज- चन्दा रइही ,तब ले वीर नरायन सिंह के नाम अम्मर रइही।

      छत्तीसगढ़ महतारी के वीर सपूत , प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी ला कोटि कोटि प्रणाम हे।


 चोवा राम वर्मा 'बादल '

 हथबन्द (छत्तीसगढ़)


छत्तीसगढ़ के व्यंजन/कलेवा
























 


 छत्तीसगढ़ के व्यंजन/कलेवा



सजन म साढ़ू अउ कलेवा म लाड़़ू 

दुर्गा प्रसाद पारकर 

छत्तीसगढ़ म नवा धान के आते भार मन ह लामे ल धर लेथे आनी बानी के रोटी-पीठा खाए बर। नवा चाउंर के फरा, चीला, मुठिया, दुधफरा मन गंज सुहाथे। तीज-तिहार म तो घरो-घर किसम-किसम के रोटी चुरथे। दुख-सुख म पंगत खवाथन। पंगत म सोंहारी, अइरसा, बरा नही ते पापर संग लाडू के गंज मान हे। जेन ल कलेवा कहिथन। कलेवा बिन लाडू के अधूरा हे। तेखरे सेती तो कहे गे हे ‘सजन म साढू अउ कलेवा म लाडू’। आघु तो पंगत म करी लाडू के चलन रीहिस हे। बड़हर मन घर मोतीचूर के लाडू ह दनादन चलत हे तभे तो करी लाडू ह नंदाए ल धर ले हे। आवव रोटी पीठा अउ लाडू ल घरे म बना के सगा सोदर अउ गोतियार मन ल खवा के सुआगत करन। छत्तीसगढ़ म किसम किसम के लाडू हे। ढीमरीन केंवटीन मन चना संग जऊन लाडू ल बेचथे ओ ह एदइसन हे- (१) मुर्रा लाडू (२) राई जीरा के लाडू (३) तीली लाडू (४) भोक्को (जोंधरा लाडू) (५) लाई लाडू।

मुर्रा लाडूः- लाडू बनाए बर चासनी के जरुरत पड़थे। गुर अउ पानी ल कराही म धर के चुलहा म मड़ाए के बाद आगी ल धमका दे। गुर पानी ह डबक-डबक के लस लस ले हो जथे। ताहन जान डरथन के अब पाग आ गे हे। कोपरा म बगरे मुर्रा उपर चासनी ल उलद दे। मुर्रा ल चिपचिपहा सान के हाथ म धर-धर के दबावत लाडू बना डर। ताहन खाए बर तियार हो जथे मुर्रा लाड़ू। मुर्रा लाड़ू ल बिसेस तौर ले सियनहा मन गजब पसंद करथे काबर के भोभला मन चबल-चबल के सुआद ल ले डरथे। मुर्रा लाड़ू कस राई जीरा, तीली अउ भोक्को ल द्यलो बनाथे। 

करी लाड़ूः- करी लाड़ू बर करी बनाए ल परथे। लाखड़ी नहीं ते चना पिसान ल पानी म सान के कराही के डबकत तेल म झारा के उपर ले चपकथन। भूलका के मुताबित कराही म गीर-गीर के चूरथे। इही ल करी गरई कहिथन। तेल ल झारा ले निकाल लेथन। करी के उपर चासनी ल ढार के चिपचिपाही मेल के मुठा म चपक-चपक के मनचाही आकार दे जा सकत हे। मोतीचूर के लाडू बर चना पिसान के बुन्दी बनाए बर परथे। पिसान ल सान के झारा म थपथप-थपथप थपथपाए ले बूंद बरोबर डबकत तेल म गिरथे। चूर के इही बूंद ह बूंदी बनथे। मुर्रा लाड़ू, राई जीरा के लाड़ू, तीली लाड़ू भोक्को लाड़ू लाई लाड़ू अउ करी लाड़ू बांधे बर गुर के चासनी के जरुरत परथे। मोतीचूर के लाडू बर शक्कर के चासनी बनाए बर परथे। तीन चैथाई शक्कर म एक चैथाई पानी डार के कराही म गरम कर ले। एमा दुध डारे के बाद गजरा बरोबर मइल निकलही तेला झारा म हेर के फेंक दे। एखर पाग जाने बर अंगठा अउ अंगरी म चपक के फरिहाए ले लासा कस लसलस ले लार जइसे लामही ताहन जान लेवव चासनी तइयार हो गे हे। चासनी म सुक्खा बूंदी ल चिपचिपहा मेल के मोती चूर के लाड़ू तियार हो जथे खाए बर।

      कउनो भी अंचल के पहिरावा- ओढ़ावा, खान पान अउ बोली बतरा ह उहां के चिन्हारी कराथे। आवव छत्तीसगढ़ के रोटी ल जानन अउ खावन। अंगाकर रोटी बर कनकी पिसान, सीथा अऊ एकाद कनिक पानी मिंझार के सान ले। साने के बाद हाथ म थपर-थपर के कोंहड़ा पान, खम्हार पान, केरा पान नही ते तरोई पान ल दुनो बाखा चिपका के अंगरा आगी ले रांधबे उही ल अंगाकर रोटी कहिथन। इही ल तावा म मड़ा के रांध्बे त एहा तावा रोटी के नाव ले जाने जाही।

मुठियाः- चांउर पिसान, सीथा, नून अउ जरुरत परगे तब थोर बहुत पानी ल मिंझार के चंदाही नही ते बटकी म सान लेथन। साने के बाद मुठा म चपक-चपक के लम्हरी रोटी बनाथन। बंगोनिया म पानी भर के मुहड़ा म उज्जर कपड़ा ल किटकिटा के बांध ले। कपड़ा के उपर म मुठिया ल ओरी-ओरी ओरीया दे। ओरियाए के बाद तावा ल तोप के बंगोनिया ल चुल्हा म मड़ा के आगी ल धमका दे। भाप ले मुठिया ह उसना के चूर जथे।ताहन का पुछबे लसलसहा ताते-ताते मुठिया रोटी ह खाए बर तियार हो जथे।

फराः- चांउर पिसान ल नून पानी म सान के हाथ म मोठ बाती कस बर ले। बर-बर के सुपा, पर्रा चंदाही नही ते कोपरा म चपक-चपक के फरा ल घलो रांधे जाथे। फरा ल रांध के ओमा दुध चीनी (शक्कर) लायची डार के फेर चुरो ले ताहन का पुछबे रांधते रांधत लार ह टपक जथे। इही ल दूध फरा कहिथन। 

सोंहारीः- सोंहारी ह दू किसम के होथे (१) नुनहा सोंहारी (२) गुहरा सोंहारी

नुनहा सोंहारी ल गहुं पिसान नून अउ पानी ल मिंझार के सान के बनाथन। गुरहा सोंहारी गुर पानी म गहुं पिसान ल सान के नान-नान लोई धर के बेलना म गोल बेल ले। डबकत तेल म फूलत ले चूरो ताहन झारा म रोटी ल निकाल ले। निकाल-निकाल के झेंझरी म रोटी ल सकेलत जा।

ठेठरीः- जीरा पानी म नून ल घोर के चना पिसान ल साने बर परथे। हाथ म बर-बर के सउंख के मुताबित गोल, चेपटी, जलेबी कस गढ़ के डबकत तेल म खड़खड़ ले रांध ले। ताहन फेर का पुछबे ठठरंग-ठठरंग ठेठरी खाए के सुआद ल। खाएच-खाएच के मन ह लागथे। 

खुरमीः- गहुं अउ कनकी ल दर्रा पिसा के पानी, गुर, तीली, खुरहोरी ल मिंझार केे सान दे। ताहन मुठा म दबा-दबा के गोल अउ लम्हरी करके टूकना म चपक-चपक के चेपटी कर ले। खुरमी ल चेपटी, गोलई गढ़े जा सकत हे। ओखर बाद डबकत तेल म डार के चूरोए जाथे। खड़खड़ ले चुरे के बाद झारा म हमऊ हेर के कराही के उपर मड़ा दे। ताकि तेल ह सुखा जय। ताहन रोटी ल झेंझरी म डारत जा। छत्तीसगढ़ म एक ठन कहावत हे- ठिनीन-ठानन बाजे ताहन खवइया के मन जागे।तभे तो लइका लोग मन चूरते भार रोटी खाए बर धर लेथे। खुरमी रोटी ल आठ पंदरा दिन ले खाए बर रखे जा सकथे। खुरमी खाए ले डाढ़हा ह घलो मजबुत होथे।

बराः- सब ले आगु उरीद दार ल रात म भिंजो के रात भर राहन दव। बिहन्चे उरीद दार ल झेंझरी म ओखर छीलका के निकलत ले धो डर। जब दाना के छीलका ह निकल जथे तब सील लोड़हा म पीस ले। पीस के मिरी, गोंदली अउ धनिया ल पऊल के नून ल मिंझार के कस के सान ले। सनाए के बाद नान-नान लोई ल हाथ म चपक-चपक के चेपटी कर के खउलत तेल म डार के ललहूं चुरो दे। ताहन बरा ल देखते भार मुंह ह पन्छा जथे। 

अइरसाः- चांऊर ल रात भर भिंजो के बिहन्चा घाम म भंभो के दू-तीन घंटा ले सुखोए जाथे। सुखाए के बाद ढेकी, खल नही ते बहाना मुसर म कुट के सोंठ बनाए जाथे। रुपिया के बारा आना भाग गुर अउ चार आना भाग पानी ल मिंझार के आगी म डबका के चासनी बनाथन। चासनी म सोंठ ल मिंझार देथन, करछुल म हला-हला के खोए के बाद नान-नान लोई बना के सोंहारी जइसे गोल अउ मोट्ठा बना के तेल म चुरो के अइरसा परोसे के रिवाज रिहीसे। जउन ह अब बहुत कम देखे बर मिलथे।

पोरी रोटीः- तात पानी म नुन ल घोर के हाथ म चपक-चपक के तेल म डारत जा। चुरे के बाद पोरी रोटी तैयार हो जथे। अब्बड सुहाथे गउकीन। 

चीला रोटीः- नुन म चांऊर पिसान ल घोर ले। घाले बने के बाद तावा ल गरम कर। उप्पर म चांटी चबाए कस तेल ल चुपर दे। तावा म घोल ल डारे के बाद कटोरी के पेंदी ले चारे मुड़ा गोल बगरा दे। बगरा के ढकना ल तोप दे। थोकिन बाद ढकना ल उघार के रोटी ल हसिया म लहुटा-पहुटा के रांधे जथे। ताहन पताल (बंगाला) के चटनी संग मन भर के खा ले चीला रोटी ल। खावन-खावन भाथे।

पताल के चटनीः- पताल (टमाटर) के चटनी अउ बासी हो जय तहान का पुछबे, भर पेट भोजन हो जथे। कन्हार भर्री के मिरचा पताल अउ ओलाही फर धनिया म नून ल मिंझार के सील लोड़हा म मन भर के पीस के पताल के चटनी बनाए जाथे। महर-महर महमहाथे धनिया ह। चटनी के सोंध म साग के सुरता नइ आवय। पाका-पाका पताल ल पउल के दू चम्मच तेल म मिरचा के फोरन दे के बघार दे। पताल डबक के चुरे ताहन फेर पताल के झोझो तइयार हो जथे। झोझो के नाव सुनते भार छत्तीसगढ़िया मन के मुंह म पानी आ जथे। मान ले चटनी बासी खाए बर बइठे हस अउ साग पोरसा गे ताहन का पुछबे। सुवाद ले ले के खा ले। तभे तो ‘भाजी म भगवान राजी’ कहावत ह छत्तीसगढ़ म प्रचलित हे। आवव हमु मन बासी संग भाजी खा के सुवाद लेवन। छत्तीसगढ़ म भाजी गंज अकन हे जइसेः-

(१) गुड़रु भाजी (२) मुस्केनी भाजी (३) मछरिया भाजी (४) गुमी भाजी (५) उरीद भाजी (६) उरला भाजी (७) बर्रे भाजी (८) पटवा भाजी (९) चरोटा भाजी (१॰) कजेरा भाजी (११) चुनचुनिया भाजी (१२) अमारी भाजी (१३) पोई भाजी (१४) लाली चेंच (१५) पड़री चेंच (१६) बोहार भाजी (१७) होड़करा भाजी (१८)  दार भाजी (१९) अमुर्री भाजी (२॰) बंगला भाजी (२१) खोटनी भाजी (२२) तीवरा भाजी (लाखड़ी भाजी) (२३) चना भाजी (सुकसा भाजी) (२४) कुसुम भाजी (२५) करमत्ता भाजी कस अउ कतनो भाजी मौसम के अनुकुल मिलथे।


दुर्गा प्रसाद पारकर 

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 हीरा गुरुजी समय: छत्तीसगढ़िया के जेवन मा समाय फर फूल पाना कांदा अउ जर


         संसार मा सबे जीव देह मा एक अंग हावय "पेट" जौन ला रोज भरेबर ओहा नाना रिकिम के उदीम करथे अउ किसम किसम के जिनिस ला एमा डारथे। मनखे हा जौन जिनिस ला डारथे ओला जेवन कहिथे। जेवन हा घलो नाना किसम के जिनिस ला मिंझार के बनाय जाथे। मनखे के जुड़ाव प्रकृति ले होथे।कहे जाथे कलजुग मा मनखे के प्रान अन्न मा माने गय हे।

         छत्तीसगढ़ मा देवी देवता के मानता हे इहाँ के गाँव खार डीही डोंगर मा नानम रुप मा एमन विराजमान हवे। छत्तीसगढ़ ला राम के दाई कौशिल्या के मइके ले जोड़ के देखे जाथे। एखर सेती इहाँ के मनखे राम भगत माने जाथे। राम अउ किसन भगवान एके रुप होय ले इहाँ के मनखे अपन जेवन मा दूध दही मही, फर फूल पाना काँदा जर मन मिंझरगे। छत्तीसगढ़ मा आदिवासी जनजाति के रहवास जादा संख्या मा होय ले इहाँ के खवाई पीयई मा इँखरो जिनिस मिंझरगे हावे। आदिवासी मन शिव रुप बड़ादेव अउ डोंगरी के माई मन के पूजा करथें। उँखर ठउर तीर एमन पूजई करथे। जंगल भीतरी मा रहे के सेती इँखर जेवन मा फर फूल पाना कांदा जर के संग मछरी, कुकरी, बोकरा, सूरा जइसन जीव के मास हा घलो जेवन मा समागे हावय। एमन चिराई चिरगुन, चिटरा, मुसवा ला घलो मारके खा डारथे अउ पेट भरथे।

     छत्तीसगढ़ ला धान के कटोरा कहे जाथे। इहाँ धान के 1500 किसम मिलथे। इहाँ के रहइया मन तीनों चारों बखत चउँर ला कलेवा, भात, बासी के रुप मा खाथे पीथे। छ्त्तीसगढ़िया मन जेवन मा तीन किसम के जिनिस ला मिंझारथे। दूध दही मही अउ फर फूल के रस, माँस अउ फर फूल पाना कांदा जर के साग भाजी। एमा उरीद, रहेर, राखड़ी, मूँग, मसूर, कुल्थी, चना के दार अउ अरसी तिली मूंग फली के तेल घलो होथे। मशाला मन घलो इही फर फूल डारा पाना काँधा जर के रुप होथे।

          छत्तीसगढ़ मा भाजी खाय के परंपरा पुरखौती आय। भाजी हा कोनों केंवरी पउधा अउ नार के पाना होथे। हमर पुरखा मन साठ सत्तर किसम के भाजी बताय हवय। सबो भाजी सबो डहर नइ मिलय। जौन भाजी मिलथे ओमन उही डहर के भाजी ला जेवन मा मिंझारथे। अइसे तो भाजी मा सुवाद नइ रहय फेर तेल हरदी नून मिरचा डार के एला सुवाद वाला बनाय जाथे। कन्हो कन्हो भाजी मन दही मही बरोबर खट्टा होथय। जइसे अमारी भाजी, पटवा भाजी, अमली के कुरमा।

            भाजी हा पुष्टई के संगे संग रोग रई के दवई घलो होथे। राखड़ी भाजी, मुरईभाजी पेट सफई करथे, कुलथी भाजी हा पथरी ला गिराथे। लालभाजी, पाला हा रकत बढ़ाय मा बने होथे। पाला मा बिटामिन कैल्सियम होथे। मुनगाभाजी बीपी ला बने बने राखथे। करमत्ताभाजी हा जर बुखार मा खाय जथे। अइसने गोंदलीभाजी, खेड़हाभाजी, चनाभाजी, चुनचुनियाभाजी, तिवराभाजी, बोहारभाजी, कांदाभाजी, बथुवाभाजी, बिलईपोटाभाजी, मास्टरभाजी, गुमीभाजी, चरोटाभाजी, बर्रेभाजी पोईभाजी, सरसोंभाजी,  तिनपनियाभाजी, चेंच, मुस्केनीभाजी, कोहड़ाभाजी, बनबर्रे, मेथीभाजी, दारभाजी, पीपरभाजी, कुसुमभाजी, जरीभाजी चौलाईभाजी, खोटनीभाजी, बंधेभाजी, उरीदभाजी, गोभीभाजी ला घलो बेरा बखत मा खाय जाथे। धनिया पाना ला साग मा संघेरे जाथे, चटनी मा पीसे जाथे।

     अइसने नाना किसम के फर ला साग बनाय जाथे केरा, तुमा, कोड़हा(मखना), मुनगा, सेमी, बरबट्टी, कटहर, डोड़का, तरोई, भाँटा, कुंदरू, चुरचुटिया, रमकेलिया, करेला, खेक्सी, बंगाला पताल, खीरा, परवर, ढेमसा, बटरा ला साग बनाय जाथे एमा आमा अमली ला कोनों कोनों संग मिझारे जाथे। मिरचा घलो फर आय जौन ला साग मा मिंझारे जाथे।

     अइसने डारा मा जरी जौन ला खेड़हा घलो कहे जाथे, बाँस के करील, जिमीकांदा के पोंगा ला साग राधे जाथे। माई लोगिन मन अपन अपन मा क्षेत्र मा मिलत नाना किसम के डारा ला साग बना लेथे। बांस के करील हा पेट के कीरा ला मारथे।

         साग मा फूल ला घलो राँधे जाथे एमा सबले जादा अउ सबके पसंग के साग आवय फूलगोभी।छत्तीसगढ़ मा जर ला चलो साग राँधके खाय जाथे।मुरई, ढेस, गाजर अइसने जर आय जौन ला साग मा मिंझारे जाथे। जंगल मा रहइयामन ला कांदा कुसा अड़बड़ मिलथे एमा जिमीकांदा, कोचइकांदा, नांगरकांदा, सेमरकांदा, केऊ कांदा, केंवटकांदा, डाँगकांदा, भैसढेठी मन ला साग बनाय जाथे। जिमी कांदा हा बवासीर ला बने करेबर अउ रकत ला सफा करे के दवाई घलो आय। केउकांदा खाय ले बात पीत बने होथे।अइसने प्रकृति ले जुड़े सरईबोड़ा, फुटू घलो ला साग मा मिंझारे जाथे। आलू गोंदली मन घलो कांदा आय जेला  संसार भर मा खाय जाथे। अदरक, हरदी हा घलो कांदा आय जेला साग मा मिंझारे जाथे।

हरदी ला सुखा के पीस के डारे जाथे।



हीरालाल गुरुजी समय

छुरा, जिला- गरियाबंद


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 धिरही जी: छत्तीसगढ़ी खानपान/व्यंजन


भारत देश के सबो राज मा अलग-अलग खानपान देखे बर मिलथे।फेर हमर छत्तीसगढ़ के खानपान के अपन अलगे महत्ता हावै।अँगाकर के रोटी हा बिन तेल के केरा पान परसा,खम्हार असन सरइ पान मा छेना लकरी के आगी अँगरा ल तरी ऊपर मडहा के बनाए जाथे।का गजब के सुवाद आथे,सच मा अँगाकर ल रोटी के राजा कहि सकथन।पताल चटनी,घी मा खाबे तव मजा आ जाथे।नवा चाउर के फरा रोटी भाप मा बनथे,गोल-गोल लमरी-लमरी डबकत पानी के ऊपर मा कपड़ा रख के चुरोथे।इडली हा फरा के आघू मा फेल हो जाही।चाउर पिसान के चीला घरो घर बनथे,दोसा ले अलगे सुवाद मिलथे ।बोबरा रोटी चाउर के बनथे गुण के पाग मा सान के बनाथे खाए मा मजा आ जाथे।सोहारी,अइरसा,खुरमी, ठेठरी अड़बड़ मिठाथे,मालपुआ के नाम सुन मुँह मा पानी आ जाथे एमा गहूँ पिसान चाउर पिसान गुण मिला के बनाथे।उरीद दार के चोकरा के चुनी रोटी बनथे,उरीद के फोकला घलो काम पर जाथे।कोडहा रोटी जीभ म चटक जाथे,फेर आजकल नइ खावै,अकाल घानी बनै।चौसेला घलो बनथे, डेढहउली दही मा सान के गहूँ चाउर पिसान के बनाए जाथे,अमटहा लागथे।भुकू रोटी बनाए बर नून गुण ला सान के बनाथे एहू हर पान मा बनथे कनकी के रोटी घलो ऐला कहे जाथे।कनकी के कइथला रोटी मा गोंदली मेथी के फोरन दे के मही ला डार देथे मही डबकत रहिथे कनकी धो के डार देथे।बरा,पूड़ी सोंहारी डुबकी,झेंझरी,इडहर कोंचइ पान के परसिद्ध हावै। जलियाही रोटी घलो बनाए जाथे।

मुर्रा,तिल,मुमफली सोंठ पीपर,के लाडू परसिद्ध हवै।बड़े-बड़े लाडू जवार लाई के बनथे।

बेसन पिसान के डुबकी,पताल के झोझो सबो झन खाथे।चरोटा साग के भाजी,पीपर पान के भाजी,गुररू भाजी पोई भाजी कोइलार भाजी चेंच चनउरी,मुनगा करेला,चना लाली भाजी के साग राँधे जाथे।खिचड़ी पकाए बर चाउर दूध शक्कर लवांग लायची के जरूरत परथे।आनी बानी के चाउर के भात राँधथे जेमा एचएमटी जीरा फूल सरना दुबराज महामाया कनकी,कोदो रहिथे।


राजकिशोर धिरही

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आज के लोकक्षर म व्यंजन अउ खानपान के ऊपर गद्य लिखे के बात केहे गे हे।ये सुविधा के लाभ उठाके मैं पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन के बढ़त हुए लोकप्रियता अउ बजार के बारे मे चर्चा करे के कोसिस करत हंव।काल हमर घर के एकझन लइका रात कुन किहिस के में बाहिर म खाहंव।लहुटिस तव बहुत अचरज से बताइस के वो जीहां खाइस तिन्हा बहुत स्वादिष्ट चीला, फरा अउ चौंसेला रिहिस अउ खाब म आनन्द आगे।कालेच के बात आय के हमर लोकाक्षर के सुधीर शर्मा जी पोस्ट डारे रिहिन के उंखर नोनी ह दिल्ली म छत्तीसगढ़ी कलेवा के स्टाल लगाए रिहिन।

ये दुनो संदर्भ ल मैं एखर सेती लिखे हंव काबर के आज ले पांच साल पहिली छत्तीसगढ़ी खाई खजेनी मन कोनो दुकान, होटल, ठिया म नइ मिलत रिहिन अउ ये सब घरेच म रांधय खावय लेकिन 26 जनवरी 2016 के गढ़कलेवा के सुरु होए के बाद छत्तीसगढ़ी कलेवा मन अतेक लोकप्रिय होइन के चारो खूंट छत्तीसगढ़ी कलेवा के दुकान - रेस्टोरेंट खुल गे हें।अब तो रायपुर के बड़े स्टार होटल मन म घला एमन बेचाथें।अउ एखर लोकप्रियता से प्रभावित होके छत्तीसगढ़ सरकार ह राज्य के हर ज़िला म गढ़कलेवा खोले के सुरुआत कर दे हावय।मोर अनुमान से आजकल हर महीना छत्तीसगढ़ी कलेवा के 10 लाख रुपिया ले ज्यादा के बेपार होथे।

लेकिन मोला एक चिंता ये बात के हे के गढ़कलेवा मन म केवल अउ केवल छत्तीसगढ़ी व्यंजन ही बनाये अउ बेचे जाए।पैसा कमाए अउ नवा प्रयोग के नाम म पारंपरिक व्यंजन मन संग छेड़छाड़ न करे जाय अउ मौलिकता ल बनाये रखे जाय।मोला ये बात के अपार खुसी हे के जब कोनो छत्तीसगढ़ी व्यंजन मन के सार्वजनिक उप्लब्ब्द्धता के बारे न सोचें नइ रिहिन तब एखर कंसेप्ट बनाये अउ स्थापना म मोर भूमिका रिहिस।जगह के डिजाइन, निर्माण, फर्निशिंग, साज सज्जा, व्यंजन के चयन, उंखर मन के उप्पर सूचना फोल्डर, टेबुल, बेंच, मचान, बर्तन भंडवा सहित ओखर बनाये और सुरु करे के सब काम ल करके मैं एला क्यूरेट करे रेहेंव।ओ टाइम के संस्कृति संचालक राकेश चतुर्वेदी जी के सोंच, दूरदर्शिता, छत्तीसगढ़ी संस्कृति जेमा खानपान भी सम्मिलित हे बर उंखर प्रतिबध्दता अउ मोर क्यूरेटोरियल क्षमता के परख अउ विश्वास के आधार म छोटे से सुरुआत करे गे रिहिस।तब हमन खुदे नइ सोंचे रेहेन के एला इतना अधिक प्रतिसाद मिलही लेकिन अब ये बात के गर्व होथे के एक छोटे लेकिन नवा संकल्पित कदम के सुरुआत करके गढ़कलेवा के माध्यम से पारंपरिक छत्तीसगढ़ी खानपान के उप्पर नवा इतिहास लिखे के काम करे गिस जेन म मोर महत्वपूर्ण भूमिका रिहिस।

अशोक तिवारी

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जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया: कुम्हड़ा पाक/ कोम्हड़ा पाग


                    कुम्हड़ा/मखना/ कोम्हड़ा के नार पहली घरो घर छानी म चारो कोती लामे रहय, अउ कोनो घर दर्जन भर त, कोनो घर कोरी कोरी घलो फरे। जेला सब पारा परोसी अउ सगा सोदर मन संग बाँट बिराज के खायें।  घर के बारी, अउ ओरिछा के खाल्हे आसाढ़ के लगती बोवाय अउ कुँवार कातिक म तैयार हो जाय। कुम्हड़ा पाक नवा खाई, दशहरा, देवारी, झरती कोठार अउ मेला मंड़ई के प्रमुख व्यंजन आय। घी ल कड़काके ओमा करिया तिली झोंक, कुटी कुटी कटाय या फेर किसाय कुम्हड़ा संग गुड़/शक्कर डार बने चूरत ले भूँज दे, अउ सुवाद बढ़ाये बर लौंग, लायची छीत दे, बस बन गे कुम्हड़ा पाक।  कोनो भी घर के हाँड़ी म ये कलेवा बने त पारा परोसी मन महक पाके,सहज जान जाय, तेखरे सेती कटोरी भर भर परोसी मन ल बाँटे घलो जाय। बने के बाद पातर रोटी,फरा अउ चीला संग कटोरी कटोरी नपा नपा के खाय के अलगे मजा रहय, जउन खाय होही तेखर मुँह म, सुरता करत खच्चित पानी आ गे होही। 

                          मेवा मिठाई अउ किसिम किसिम के कलेवा पहली घलो रिहिस, फेर कुम्हड़ा पाक के अपन अलग दबदबा रिहिस,माँग रिहिस। बिना ये कलेवा के कुँवार, कातिक, अगहन अउ पूस के घलो कोनो तीज तिहार या फेर उपास धास नइ होवत रिहिस। नवा जमाना म ये कलेवा धीर लगाके सिरावत जावत हे, अइसे घलो नही कि आज बनबे नइ करे, बनथे फेर गिनती के घर म। कोनो भी घरेलू कलेवा/व्यंजन बर बनेच जोरा करेल लगथे, त वइसने जमकरहा गजब सुवाद घलो तो रथे। फेर आज मनखें शहरी चकाचोंध अउ महिनत देख तुरते ताही मिलइया फास्ट फूड कोती झपावत जावत हे, ते चिंतनीय हे। कुम्हड़ा पाक कस हमर सबे पारम्परिक  कलेवा मुंह के स्वाद के संगे संग शरीर ल ताकत, विटामिन, खनिज अउ  रोग राई ले घलो बचाथे।  कुम्हड़ा कस लौकी, रखिया, तूमा ल घलो पाके या पागे जाथे। रखिया पाक तो पेड़ा के रूप म भारत भर म प्रसिद्ध हे, फेर कुम्हड़ा  पाक के दायरा सिमित होवत जावत हे।  

                            पागे के अलावा कुम्हड़ा के साग,कढ़ी, बड़ी के घलो जमकरहा माँग हे। कुम्हड़ा पाक आजो गाँव के पसंदीदा कलेवा म एक हे, जेला मनखें मन एक बेर जरूर पाकथे, अउ खाथें। शहर कोती या शहर लहुटत गाँव, केक पिज़्ज़ा, बर्गर, चांट समोसा के चक्कर म,धीर लगाके ये कलेवा ल छोड़त जावत हे। घर म बनइया कलेवा ल मन लगाके बनाये अउ मन भर खाय के अलगे आनन्द हे। आज मनखे मन ल मारत हे, अउ ऊपरी देख दिखावा कोती जादा भागत हे, इही कारण आय के परम्परागत चीज दुरिहा फेकात जावत हे, उही म एक हे कोम्हड़ा पाग।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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: 🕉छतीसगढ़ के खान पान 🕉


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नुनहा भजीया

गुरहा भजीया

बेसन भजीया

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प्रकाशन छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के



 

वो 9 दिसम्बर के सुरता//

 प्रकाशन छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के

  अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ी भाखा म मासिक पत्रिका निकाले के बारे म सोचना, जब लोगन रायपुर जइसन शहर म छत्तीसगढ़ी गोठियाए तक म लजावंय. फेर जेन मनखे चेतलग होए के संग छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन म जुड़ जाय, अउ वोकरेच संग छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के रंग म रंग जाय, तब तो अइसन सोचना कोनो किसम के अचरज वाले बात नइ हो सकय. 

   सिरतोन आय, तब वो बखत हमन ल छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के छोड़ अउ कुछू नइ सूझत रहय. बस इही सोच म दिन पहा जावय के कइसनो कर के छत्तीसगढ़ी के सेवा कर लेतेन. वइसे तो मैं छात्र जीवन ले ही अलवा जलवा लिख के खुदे पढ़ के खुश हो जावत रेहेंव, फेर सन् 1982 के आखिर म जब अग्रदूत प्रेस म काम करे बर गेंव, अउ 1983 ले जब अग्रदूत ह दैनिक के रूप म निकले लगिस, त उहाँ के साहित्य संपादक विनोद शंकर शुक्ल जी ल मोर छोटे मोटे लिखे रचना मनला देखावंंव उन वोमा कुछू जोड़ सुधार के छाप देवंय. उही म मोर छपे रचना ल पढ़ के छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद जी अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के सुशील यदु अउ रामप्रसाद कोसरिया जी मोर संग मिले बर अग्रदूत प्रेस आइन. तहाँ ले एकरे मन संग चारों मुड़ा के छत्तीसगढ़ी लेखक मन संग जुड़े बर धर लेंव. संग म पत्रकारिता म घलो जाना होगे. फेर आगू चलके अइसन संयोग बनिस के अपन खुद के प्रिंटिंग प्रेस घलो चालू कर डारेन. मन तो छत्तीसगढ़ी म एक पत्रिका निकाले के रहय, तेकर सेती पंजीयक, दृश्य एवं प्रचार निदेशालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नई दिल्ली के कार्यालय म पत्रिका के रजिस्ट्रेशन खातिर चार-पांच अलग अलग नांव लिख के पठो देंव. महीना भर के बुलकते उहाँ ले मोर जगा चिट्ठी आगे, जेमा 'मयारु माटी' के नांव ले तीन महीना के भीतर पत्रिका चालू करे के निर्देश रिहिस हे. 

   मैं तुरते प्रकाशन के प्रक्रिया म भीड़ गेंव. संग म चारों मुड़ा के छत्तीसगढ़ी लिखइया-पढ़इया मन ल सोर दे लगेंव. महीना भर के भीतर पूरा छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत म एकर सोर बगरगे. कतकों झन छत्तीसगढ़ ले बाहिर रहइया मन के घलो पता-ठिकाना के आरो कराइन. उहू मनला, पाती भेजेंव.

    'मयारु माटी' के पहला अंक खातिर चारों मुड़ा ले रचना अउ शुभकामना आए लागिस. फेर वोमन म पद्य रचना ही जादा रहय. मैं शुरू ले पत्रकारिता ले जुड़े रेहे के सेती गद्य रचना के जादा मयारुक रेहेंव, एकरे सेती गद्य के विविध रूप एकर प्रकाशन खातिर चाहत रेहेंव. कतकों झन ल जोजिया के कहानी, नाटक, व्यंग्य, मुंहाचाही, आनी-बानी के लेख आदि लिखे बर काहंव. पहिली के एक दू अंक म तो महिंच ह कतकों किसम के रचना अलग अलग नांव म लिखंव, कतकों झन के हिन्दी रचना मन के अनुवाद घलो कर देवंव. वोकर बाद फेर भरपूर रचना आए लागिस, तब मोला वोमा छांट- निमार करे बर लग जावय.

    पहला अंक के छपई लगभग पूरा होए ले धर लिए रिहिसे, तब एकर विमोचन खातिर चर्चा होए लागिस. विमोचन कार्यक्रम म मैं कोनो नेता- फेता बलाए के पक्ष म नइ रेहेंव. आदरणीय हरि ठाकुर जी घलो कहिन- सिरतोन आय बाबू, अइसन पवित्र काम के शुरुआत कोनो पवित्र हाथ ले होना चाही. वो बखत मोर सबले बड़े सलाहकार आदरणीय टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी रहिन, वोमन सुझाव देइन के चंदैनी गोंदा के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ल बलाए जाए. मोला उंकर बात जंचगे.

   मैं तो चाहते रेहेंव के जे मन के छत्तीसगढ़ी भाखा संस्कृति के बढ़वार म योगदान हे, उही मनला पहुना के रूप म बलाए जाय. रामचंद्र देशमुख जी के संग सोनहा बिहान के सर्जक दाऊ महासिंग चंद्राकर जी ल घलो बलाए के बात तय होगे.

    छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच के दूनों पुरखा मन ले अनुमति ले खातिर उंकर घर जाए के कारज ल मैं टिकरिहा जी संग पूरा करेंव. इतवार के दिन दूनों झन रायपुर ले रेल म चढ़के दुर्ग पहुंचेन. उहाँ ले पहिली बघेरा जाए के गुनेन, लहुटती म दुर्ग तो फेर आना हे, त महासिंग दाऊ इहाँ हमा लेबो केहेन.

    बघेरा के पहुंचत ले बेरा बने चढ़गे रहय. टिकरिहा जी दूनों हमन देशमुख जी के घर पहुंचेन. वतका बेरा वोमन अकेल्ला कुर्सी म बइठे राहंय. उंकर आगू के टेबल म डाक्टर मन के कान म अरझा के मरीज के देंह ल टमड़े के जिनिस माढ़े राहय. तब तक मैं नइ जानत रेहेंव के वोमन लकवा के मरीज मन के इलाज घलो करथें कहिके. 

  उन टिकरिहा जी ल देखते तुरते कुर्सी ले खड़ा होके अगवानी करीन अउ तीर म माढ़े कुर्सी म बइठे बर कहिन. महू ल बइठे के इशारा करीन. वोकर बाद टिकरिहा जी उंकर जगा मोर परिचय बताइन, संग म छत्तीसगढ़ी म मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' निकाले के बात घलो बताइन. देशमुख जी बड़ा खुश होइन. टिकरिहा जी उनला विमोचन कार्यक्रम खातिर पहुना के रूप म पहुंचे खातिर पूछिन, त उन तुरते तैयार होगें. तहांले उंहचे दिन बादर घलो धरा डारेन के 9 दिसंबर 1987 दिन इतवार के संझा 5 बजे तात्यापारा रायपुर के कुर्मी बोर्डिंग म विमोचन कार्यक्रम ल राखबो कहिके. 

    दाऊ जी फेर पूछिन के अउ कोन कोन अतिथि रइहीं कहिके, त हमन बताएन के महासिंग चंद्राकर जी ल घलो बलाए खातिर सोचे हावन, अभी इहाँ ले लहुटती म उंकर जगा अनुमति ले खातिर जाबो कहिके, त उन कहिन के ठीक हे, अच्छा बात हे, फेर मैं चाहथंव के दैनिक नवभारत के संपादक कुमार साहू जी ल घलो बला लेहू, मोर नांव बताहू त उन तुरते तैयार हो जाहीं. हमन हव कहिके वापस दुर्ग लहुटेन. तहाँ दाऊ महासिंग चंद्राकर जी के इहाँ गेन. उहू मन कार्यक्रम म आए खातिर अनुमति दे देइन.

    रायपुर आए के बाद नेवता पाती छापे अउ वोला चारों मुड़ा बगराये के बुता म भीड़गेन. 9 दिसंबर के बिहनिया ले जतका हमर संगी साथी राहंय सबो झनला अलग अलग बुता खातिर जिम्मेदारी सौंप देन. फलाना फलाना काम फलाना ल करना हे, अउ वोकर बाद संझा 4 बजे तक जम्मो झनला कुर्मी बोर्डिंग पहुंच जाना हे.

     वाजिब म संझा 4 बजे तक हमर जम्मो संगी कुर्मी बोर्डिंग पहुंचगें. तहांले उहाँ के ऊपर वाले सभा कक्ष म विमोचन के तैयारी होए लागिस. रायपुर के जतका छत्तीसगढ़िया साहित्यकार, भाखा प्रेमी अउ मयारुक लोगन रहिन सब उहाँ पहुंचगे राहंय. पहुना मन म सबले पहिली दाऊ महासिंग चंद्राकर जी लाल रामकुमार सिंह संग पहुंचीन, तेकर पाछू कुमार साहू जी पधारिन. दाऊ रामचंद्र देशमुख जी घलो थोरकेच बेर म पहुंच गिन.

   उंकर मन के आवत ले हमर मन के सबो तैयारी होगे राहय. उंकर पहुंचते डा. सुखदेव राम साहू 'सरस' जी कार्यक्रम के संचालन म लगगें. माता सरस्वती के छापा म फूल माला अउ हूम धूप के पाछू सबो पहुना मन के फूल माला ले स्वागत होइस. 'मयारु माटी' के मुंह उघरउनी (विमोचन) होइस, तेकर पाछू पहुना मन के आशीर्वचन होइस. तहांले उहाँ पहुंचे जम्मो झनला मयारु माटी के प्रति बांटे गिस.

   पहला अंक ल देखे के बाद लोगन के भारी दुलार मिले लागिस. अपन अपन ले सब रचनात्मक सहयोग करे लागिन. जे मन गद्य रचना म अच्छा सहयोग करीन उंकर मन के नांव मैं ए जगा जरूर लेना चाहहूं- श्यामलाल चतुर्वेदी, हरि ठाकुर, डॉ. बलदेव साव, लक्ष्मण मस्तुरिया, रामेश्वर वैष्णव, चेतन आर्य, राजेश्वर खरे, हेमनाथ वर्मा 'विकल', तीरथराम गढ़ेवाल, मुकुंद कौशल, डॉ. महेंद्र कश्यप 'राही', डॉ. व्यास नारायण दुबे, डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्रा, डॉ. निरूपमा शर्मा आदि मन के सरलग सहयोग मिलय. इंकर मन के छोड़े डॉ. विमल पाठक, नारायण लाल परमार, लाला जगदलपुरी, जीवन यदु 'राही' के संगे संग अबड़ झन जुन्ना अउ नवा लिखइया मन एमा अलग अलग स्तंभ के अन्तर्गत छपत राहंय.

     मयारु माटी के सरलग प्रकाशन म तब आर्थिक समस्या घलो आये लागिस, जइसे के जम्मो साहित्यिक पत्रिका मन के आगू म आथे. एमा जादा फोरियाए के जरूरत नइए, काबर ते प्रकाशन के कारज ले जुड़े जम्मो मनखे एकर पीरा ल जानथें. 

  पंजीकृत पत्रिका के प्रकाशन म ए नियम हे, के छै महीना लगातार प्रकाशन के बाद सरकारी सहायता विज्ञापन के रूप म मिले लगथे. आज अलग छत्तीसगढ़ राज बने के बाद ए ह बहुत आसान होगे हे वोकरे सेती इहाँ कतकों छोटे बड़े पत्र पत्रिका आज देखे बर मिल जाथे. फेर वो बखत हमन संयुक्त मध्यप्रदेश के अन्तर्गत राहत रेहेन, तेकर सेती जम्मो जिनिस खातिर भोपाली मन के मुंह ताकना परय. वोमन तो छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के नांव सुनते बिदके बर धर लेवंय, अंगरा कस गंजा जावंय. अइसे म भला सरकारी सहयोग कइसे मिले पातीस, सोचे के लाइक बात आय.एक दू छत्तीसगढ़िया नेता मन भोपाल ले सहयोग करवा देबो काहंय, फेर नेता मन के बात ह बाते बन के रहि जाय. अइसे तइसे करत कुल 13 अंक करीब डेढ़ बछर अकन म निकाल पाएन तहांले आगू नइ सक पाएन.

(संस्मरण संग्रह 'सुरता के संसार' ले साभार)

-सुशील वर्मा 'भोले'

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

बोली भाखा के मिठास आय राजगीत

 बोली भाखा के मिठास आय राजगीत



मनखे म एकता,भाईचारा ,धार्मिकता,सहिष्णुता,बनाय म हमर राज के तीज -त्योहार अउ लोक कला मन के अड़बड़ योगदान हावय।अब तो हमर राज खातिर राज गीत के घोषणा होय ले माटी के महक जम्मों राज म बगरे के आधार मिलगे।कबर कि राजकाज म छत्तीसगढ़ी ह बेवहार म नी दिखत रिहिस।राज गीत ले कम से कम लोगन छत्तीसगढ़ के महिमा ल समझे  के कोसिस तो करही।हर राज के अपन कोनो न कोनो चिंहारी आय।आने राज के मन इहा आही अउ हमर राज गीत ल सुनही त सोचे बर मजबूर तो होही कि राज गीत ह काय कहात हे।डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के लिखे येहा पहिली ले लोक प्रिय गीत हवय।

अरपा पैरी के धार ,महानदी हे अपार

इंदिरावती हा,पखारय तोर पइयां 

महूं पांवे परंव ,तोर भुंइया

जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मइयां।

आदिवासी बहुल हमर राज भौगोलिक रुप ले तको आदर्स आय।इहां के प्रमुख व्यवसाय कृषि अउ मुख्य फसल धान आय।80% आबादी ह एखरे ऊपर निर्भर हावय ।

धान के संगे संग हमर अंचल म चना ,गहूं,तिलहन ,गन्ना ,दाल,मन के तको खेती होथे।

कृषि के क्षेत्र म छत्तीसगढ़ ह अड़बड़ समृद्ध हावय।

ऐला समृद्ध करे म प्रकृति प्रदत्त  अड़बड़ अकन नदिया म महानदी ,अरपा ,पैरी,सोंढूर ,शिवनाथ,खारुन ,जइसे कतको

जम्मो नदिया के योगदान हवय।फेर आजकाल देखत अउ सुनत हन मनखें ह तो प्रदूषण के सिकार होवत हे,तेकरे संग नदियां मन घलो प्रदूषण के सिकार होवत हें।

नरुवा के मइलाहा पानी फैक्टरी मन के केमिकल पानी ले नदिया के पानी ह खराब होवत हे।नदिया मन के अमृत पानी जहर होवत हे।ऐकर ले नदिया के रहेंया जीव-जंतु 

मन मरत हे।पानी ह उपयोग के लइक नी होवत हे।

अइसन दसा म हमन ऐ समझ नी पावत हन कि हमन विनास डहान आगू बढ़त हन या विकास डहन।

येहा सोचे अउ गुने के बात होगे।

सन्2000 म नवा राज बनिस फेर राज भाखा म पढ़ई -लिखई नइ होवत हे ये चिंता के विषय आय।

जब तक ले पढ़ई -लिखई महतारी भाखा म नई होही तब तक हमर बोली अउ भाखा के मान बढ़ना मुसकिल हे।

हमर मन के पूरा कोसिस रहय कि जेन से जतका हो सके वोतका अपन महतारी भाखा ल स्कूल म लागू कराय अउ

आठवी अनुसूची म सामिल होवय येकर खातिर योगदान देवन




भोलाराम सिन्हा 

ग्राम डाभा पो० करेली छोटी

वि0रव० मगरलोड 

जिला धमतरी 

मो०9165640803

श्रद्धांजलि -------------- (लघुकथा)

 श्रद्धांजलि

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(लघुकथा)


''प्रगतिशील कदम'' संगठन के बहुतेच लोकप्रिय पूर्व अध्यक्ष स्व० रामलाल जी के दशगात्र कार्यक्रम म वोकर घोर विरोधी मुन्ना भाई जेकर एक बछर पहिली लगाये झूठा आरोप के सेती मजबूर होके वोला इस्तीफा देये ल परे रहिस हे---,ल देख के मैं पूछ परेंव--

कस भइया तहूँ आये हस गा?

मैं नइ आ सकवँ का?--वो कहिस।

नहीं--नहीं-- मोर कहे के मतलब वो नइये भइया जी।अइसना मरनी- हरनी के कार्यक्रम म तो कोनो भी आ सकथे।मैं एकर सेती पूछ परेंव के तोला तो वो ह फूटे आँखी नइ सुहावत रहिस हे। दूनों म बातचीत तको बंद होगे रहिसे।बीच म कोनो समझौता होगे रहिस का?  अइसे भी तू मन तो पहिली एके पतरी म खवइया खाँटी यार रहे हव--बाद म भले चुनाव बखत कट्टर दुश्मन बनगे रहेव।

 नहीं --- कोनो समझौता नइ होये रहिस। मैं तो नेताजी संग वोला श्रद्धांजलि देये बर आये हँव। इही हर तो इंसानियत ये। मैं नइ आतेंव अउ काली जुवर पेपर म श्रद्धांजलि देवइया मन के नाम छपतिस, वोमा मोर नाम नइ रहितिस त लोगन का सोचतिन?

मैं मने मन कहेंव-- वाह--वाह ,वाहवाही लूटे बर तको इंसानियत।


चोवा राम वर्मा' बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़