Friday, 17 December 2021

विषैला

 विषैला

                                  देश ला आजादी मिले के कुछ बछर पाछू के बात आय । एक गाँव म , एक किसान , उदुपले  , बिन कोन्हो बीमारी के  , दुनिया ले चल दिस । काबर मरिस ? कोन्हो ल खोज खबर करे के जरूरत अऊ फुरसत दूनों , नइ रिहिस । दू चार झिन कारन खोजे के प्रयास करिन , तेमन ल सिर्फ झिड़की मिलिस । ओकर चिट्ठी चिरा गिस - तेकर सेती मर गिस होही , कहिके चुप करा दिन । समे बीतत अइसन घटना के बाढ़ आगिस । सरकार करा , कुछ मन ये खबर ला फेर अमरईन । देशी   सरकार लबारी थोरे मारही ..... ? वोमन , लोगन ल बतईन – किसान मजदूर मनखे के उदुप ले मरई हा , साँप चाबे के सेती होवत हे । लोगन ल चेतइन - खेत खलिहान , बारी बखरी जंगल झाड़ी म चेत लगा के जावव , जरूरी हे तभे जावव । कतको बछर नहाकगे , फेर गरीब किसान मनखे ल कहाँ ओतेक चेत । अऊ फेर चेत के चक्कर म , जेकर बूती जिनगी चलत हे , तेला थोरे छोर दिही । मनखे ल हरखे बरजे के , जम्मो उपाय फेल होगे , त सरकार कानून बनाए बर मजबूर होगिस – अउ खेत खार जंगली भुंईया ला , फेक्ट्री मालिक मन ल बाँटे लागिस , किसान मजदूर बिरोध करीन , तब ओमन ल बताय गिस कि तुँहर प्रान बचाये बर , साँप के भुंईया ल देवत हाबन , येमे तुँहर कोन्हो नकसान नईये । एकर बावजूद , प्रान हराये के संखिया नइ कमतिअईस ।

             सरकार के सलाहकार मन , साँप ल मरवाये के सलाह दिन । देखते – देखत साँप के संख्या घटे लागिस । साँप समाज ल चिंता होइस । जंगली जनावर मन के बईठका सकेल के अपन पीरा ल गोहनईस । जम्मो जानवर प्रजाति मिल के तै करीन ..... अब कोन्हो मनखे ल काटना - चाबना या कोकमना घला निये , निही ते साँप कस हमरो दुर्दशा होही । साँप मन किथे ‌- हमन कोन्हो मनखे ला नइ चाबन - काटन , हमर ऊप्पर फोकटे फोकट इल्जाम लगावत हे । सरकार करा बात रखे के , बात तै होईस । सरकार हा पहिली तो जाँच कराये बर आनाकानी करिस । फेर पाछू ...... जानवर मन के दबाव म सबर दिन ले झुकईया सरकार हा मांग स्वीकार कर लिस ।  

              छै महिना बर , जाँच आयोग के काम शुरू होगे । खुल्ला सुनवाई होये लगिस । साँप मनला अपन बात रखे के पहिली मौका मिलिस । साँप मन अपन दरद पीरा ल बतावत किहीन – हमन वाजिम म बिषैला आवन जज साहेब , फेर कुछ बछर ले मनखे ल काटंना कोकमना त दूर , देखना तको बंद कर दे हाबन । किसान गरीब मनखे मन के उदुप ले मरे के पाछू , हमर निही , मनखेच मन के हाथ हे । अपन बात के समर्थन म आगू किहीन – देश के आजाद होए के पहिली , जब हमन कोन्होच ल काटन , तब हमर जहर के प्रभाव ले , काकरो बाँच पाना सम्भव नइ रहय । फेर वो समे , हमन कोन्हो ला जानबूझ के नइ काटन । हमर रद्दा म उदुप ले सपड़ईया मनखेच हमर शिकार होय । कुछ दिन पाछू , हमन देखेन के , मनखेच ह , मनखेच के लहू ल पियत हे । उही समे एक दिन हमूमन सोंचेन के .... मनखे के लहू म जरूर मिठास आगे होही , इही सोंच के साधारण दिखत एक्का दुक्का मनखे ल , हमूमन जानबूझ के , चाबे बर धरेन । पछीना म बस्सावत , मइलहा अंगोछा धरे , आधा पेट खाके सेफला कस हाड़ा हाड़ा दिखइया , नानुक पटका पहिरे घूमत हे , तेकर लहू म अतेक मिठास हे , तब   सुघ्घर धोती कुरता पइजामा पहिरे , चिक्कन चिक्कन गाल , अउ महर महर महमहईया मनखे के लहू म अऊ कतेक मिठास होही । इही सोंच के उही दारी दू चार झिन अईसने मन ल घला चाब पारेन ..... हमन का जानन , यहू मन हमरे कस होही कहिके , येमन नइ मरिन जज साहेब । ओला तुहूँ मन जानत हव , उही दारी ले , मनखे ल , कभू कभू साँप कहिके बुलाये लागिन । एक बेर उदुपले , कुछ लालबत्ती वाला मन सपड़ागे ......  दू चार झिन एके संघरा चाब पारेन । एक ठिन साँप .... तुरते मरगे । दूसर .... कुछ बछर ले बड़ तड़फिस ..... आखिरी म दरद पीरा ल सेहे नइ सकिस ..... फाँसी लगाके मरगे । कुछ अभू तक तड़प तड़प के हाबे .... न ठाड़ हो सकत हे ..... न बईठ सकत हे .... इँकर गिनती न जियईया में हे .... न मरईया में । इही दारी ले हमन अब कोन्हो सधारन मनखे तक ल चाबे बर डर्राथन । हमन जान डरेन के , मनखे बड़ प्रगति कर डारे हे … साफ सुथरा दिखईया के लहू म अतेक बिख हे , त मइलहा म को जनि अऊ कतेक बिख हमागे होही । अब बतावव .... बिषैला हमन आवन कि मनखे ?

             साँप के बात सुनके मनखे भड़कगे । नारेबाजी ... निंदा प्रस्ताव सुरू होगे । अऊ ये चक्कर म साँप के शिकार मनखे मन के रिश्तेदार मन के बयान नइ हो सकिस । कतको छै महीना नहाकगे .... आयोग के कार्यकाल लामते गिस । आखिर म .... जज ह साँप के बयान के अधार म फैसला सुनाये बर रिपोट बनाये धर लिस । रिपोट फाइनल होए के पहिली .... जज हा कोन जनी काकर शिकार होके दुनिया ले चल दिस । नाव फेर साँप के धर दीन । फाइल बंद होगे । सरकार हा साँप उप्पर , अऊ जादा नराज होगे  । धड़ाधड़ मरवाये लागिस ..... साँप मन ल । 

             साँपमन बहुतेच जादा डर्रागे । एक दिन लटपट .... आस्तीन म खुसर के अदालत तिर पहुँच गिस । उहाँ जज ल बतईस – जब ले हमर देश आजाद होये हे तब ले सरकार हमन ल परेशान करत हे , हमर जान के पाछू परे हे । वो समझथे के , उदुपले मनखे मरे म हमरे हाथ हे । अदालत ले प्रार्थना करिन .... जाँच कराये के । अदालत सज्ञान लिस । तब सरकारी वकील बतईस – उदुप ले मरईया , मनखे के मौत के जुम्मेवार , इही साँप मन हरे जज साहेब । मरईया के लहू के रिपोट ल , घला मढ़हा दिस । जज किहिस – तूमन लबारी मारथव रे साँप हो ..... सरी रिपोट तुँहर खिलाफ हे । साँप मन किथे - हमन साँप आवन साहेब  , मनखे नोहन । जनम लबारी नइ मारन । रिहीस बात चाबे के , त हमन अभू कोन्हो ल चाब घला देबो , तभ्भो ले वोहा नइ मरे । हमर बिख ले जादा ताकतवार बिख ला मुहुँ म लुकाये मनखे हा .... ओकरे उपयोग करके हमन ला बदनाम करत हाबे । हमर बिख ला हमन अइसे लुकाके राखे हन के ओला कन्हो नंगाये नइ सकय । जम्मो जाँच ल तुँहर देखरेख म फेर करावव । 

             अदालत के आदेश ले जाँच सुरू होगे .... मरघट्टी ले जुन्ना जुन्ना हाड़ा गोड़ा के खोजा खोज माचगे । कुछ नावा नावा लास घला मिलगे । रिपोर्ट अइस । जम्मो के मरे के तरीका एके रिहिस - तड‌प तड़प के । जम्मो मनखे बिख के असर ले मरे रिहिन । फेर साँप चाबे के निशान कोन्हो करा नइ रिहीस । कुछ के , हाड़ा गोड़ा लहू म अजीब किसीम के गंध रिहीस , कोन्हो म चारा के गंध , कोन्हो म गोला बारूद तोप के गंध , कोन्हो म पेट्रोल के गंध , त कोन्हो म कोइला के गंध , एकर अलावा अऊ कतको प्रकार के बिचित्र बिचित्र गंध आवत रिहीस । जाँच आगू बढ़िस , कुकुर संसद भवन तक पहुँच गिस भूँकत भूँकत । उहाँ एको बिल नइ मिलीस साँप के । फेर कुकुर हा कभू सत्ता पक्ष के खुरसी , त कभू बिपक्ष के खुरसी ला सूँघ सूँघ के भोंके लागिस ।  

            एक दिन जज जान डरिस के – बिख साँप कस बिषैला हे , फेर ऐला बगराने वाला साँप नोहे , बल्कि सभ्य मनखे आए , जे कभू सत्ता पक्ष के खुरसी म , त कभू विपक्ष के खुरसी म , समे समे म बइठथे । अउ मरईया जीव , देश के गरीब , मजदूर , साधारन जनता अउ किसान आए । अपन आप ला बिख ले बँचाये बर फैसला सुना दिस - गलती साँप के आए .... जेन रूख रई के लकड़ी ले संसद के खुरसी बनथे , उहीच म एमन मनखे ल बदनाम करे बर अपन बिख ल लुका देथें , अऊ , एकर सेती जे भी मनखे संसद म बइठथे , तेहा बिषैला हो जथे । सभ्य मनखे माँचगे ..... । फैसला के बिरोध म साँप अपील करिस – हमर बिख करिया धन नोहे जज साहेब , जेला हमन लुका के बिदेसी बैंक कस राखबो , एला हमन अपनेच तिर लुकाके राखथन । दूसर बात , हमन चाबथन तभ्भेच हमर बिख ले मनखे मरथे , जाँच रिपोट म चाबे के कोंन्हो निसान निये । तीसर बात , मरईया मन तड़प तड़प के मरे हे , हमर काटे ले , मरे बर , जादा तड़पे नइ लागे साहेब । अदालत जानत रहय , फेर खुद ला घला बाँचना हे ...... इही बिख ले .... । वहू मन मजबूर हे । मामला जनता के अदालत म घेरी बेरी पहुँच जथे ..... जनता तय नइ कर पावत हे ....... बिषैला कोन ?    

   हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

कहानी- ==माॅई कॅवरा==

 [ कहानी


         ==माॅई कॅवरा==

          बड़े बिहनिया एक दुसर ले खुसुर फुसुर गोठियावत बात गाॅव भर बगरगे कि जानकी चल बसिस।जानकी खतम होगे ।अउ थोरिक बेरा मा ओकर दुवारी मा मनखे मन सकलाय लगगे। सगा संबंधी हित पहिचान सब्बो जगा फोन खबर पहुचे लगगे ।

गाॅव के परम्परा के मुताबिक घरो घर ले पाॅच पाॅच ठन छेना घलो सकेलागे । घर के सियान माने जानकी के गोसॅइया दुखी मन ले दुवारी के एक टोकान मा गाॅव के चार छै झन सियान मन सॅग बइठे रहय । थोरिक बेरा मा जानकी के   देंह ला अंतिम बिदाई देय के तियारी सुरु होगे। जानकी हर हेंवाती दसा मा परान तजे रहय। येकर सेती जानकी के शव यात्रा के पहिली वोला सोला सिंगार मा सजाये लागिन।अइसे भी नारी परानी मन सुहागिन मरना ला अपन अहोभाग मानथे ।नारी परानी मन ला दू बखत सुहागिन के सोला सिंगार मा सजाथें।एक तो बिहाव होथे तब अउ दूसर पति के जियते जीयत मर जाथे तब । भले वो हर नेंगहा काबर नइ रहय। 

              गाॅव आने गाॅव के सबो सगा पथिया मन मिलके खटोली तियार करके मुक्ति धाम कोती मरे तन के गत बनाय बर चले गे। जानकी के बेटा बसंत अपन महतारी के बड़ मयारू बेटा रहय।  महतारी तो महतारी होथे ।चाहे वो एक लइका के रहय चाहे चार लइका के । दुवा भाव कोनो बर नइ राखय। ना नोनी बाबू मा भेद करय ।काबर कि एके दुख पीरा ला सहिके सबो ला जनम देथे । बिचारा बसंत मुक्ति धाम तक मा रोवत बिलखत रहय । उही गाॅव के एक झन अधेड़ मनखे जेन हर बसंत के जौजर अउ नानपन के सॅगवारी भूरू । भूरू घलो काठी करम मा पहुंच जाय रथे । चिता मा जानकी के देंह ला जरत लेसात देख के आॅसू नइ रोक पाइस। अंतस मन ले रोवत रोवत वोला अपन नान्हे पन के वो सबो बात घरी घरी सुरता मा समाये लागिस । 

             जब बसंत अउ भूरू नान्हे नान्हे रहय। पहिली साल आॅगन बाड़ी मा इसकुल मा भरती होय रथे । दूनो के जोड़ी सॅग कभू नइ छूटय। कतको बखत खेले के धुन मा इसकुल घलो नइ जावय ।एक दिन के बात आय। कातिक अग्घन के महिना मा रांय रांय धान लुवई चलत रथे । मॅझनिया जानकी लकर धकर खेत ले बियारी करे बर आइस ।हाथ पाव ला धो के जेवन निकालथे । ओकर मयारू बेटा अपन सॅगवारी भूरू सॅग खेले मा मगन रथे । बिचारा भूरू के महतारी भूरू के जनम के साल भर बाद अलपकाल गुजर जाय रथे । ओकर ददा मेरन बने खेती बारी रिहिस खाय पिये के कमती नइ रिहिस। कमती रिहिस ते सिरिफ भूरू के महतारी के। धुर्रा माटी मा सनाय भूरू अउ बसंत मगन रथे। अउ ये डहर घर ले जानकी आरो देथे----------बसंत-------- ए बसंत आ बेटा भात भाले ,,,,,,,,,। जनकी कई बखत आरो देथे। महतारी के मन नइ माड़िस तब , तब जानकी हर तीर मा जाके ओकर हाथ ला धरके तिरत लाके कथे-----------चल बेटा एक कनी खाले । ताहन खेलत रबे भूरू सॅग। ढिठईपना करत बसंत हर कथे-------------मोला भूख नइये    पाछू ले खाहू मोला खेलन दे ना वो । भूरू भगा जाही दाई। मयॅ एके झन काकर सॅग खेरहूं कहिस अउ भगागे। खेत मा भारा बॅधइया गोंसइया बर घलो जेवन लेके जाय बर हे देरी होय ले खिसियाही कहिके जल्दी जल्दी खाय बर जेवन निकाल लिस अउ खाय बर बइठगे। महतारी के मया अतका तो घलो कमजोर नइ रहय कि लइका ला छोड़ के पेट भर जेवन खा लिही। जानकी खाय बर तो लगगे फेर सुधअपन पेट ले जादा बसंत डहर लगे रहय। अगल चगल खावय अउ बीच बीच मा चिचियावे---------आ बसंत खाले,,,,,,जल्दी खेत जाहू । तोर भात ला बिलई खा दिही रे भूखे रेहे रबे बेटा आ खाले । सथरा उरकती आ गे तभो बसंत नइ आइस। महतारी के मन नइ मानिस तब जानकी सथरा छोंड़ के जाथे अउ तिरत लान के थारी केआगू मा बइठार के कथे--------------ले एक कॅवरा तो खाले रे  बेटा ताहने भूख नइ लागे।अउ ओकर मुंह मा लकर धकर दू तीन कॅवरा डार देथे। तब जानकी के मन हा माड़थे। अउ लइका हर घलो दू ओआर कॅवरा मा डकार लेय ला धर लिस। अइसन कोनो अभागा नइ होही जेन महतारी के सथरा सॅग नइ हितात होही । महतारी हर अमरित तो तन ले ओगार के पियाथे। अउ अपन सथरा मा बइठार के खवाके जनमो जनम के दरिदरी ला भगाथे । महतारी अपन पेट ला उन्ना करके लइका बर माई कॅवरा बनाथे।अउ आखिर मा दू कॅवरा खवाथे तभे हिरदे जुड़ाथे। सियान मन कथे-----

माता के पोरसे अउ मॅगहा के बरसे । बहुते सुखदाई होथे ।जेन ये दूनो मा नइ हिताय तै कभू सुख नइ पाय। भले मगहा मत बरसे फेर माता के मया सदा बरसथे। 

   बसंत ला खवात खवात जानकी के नजर भूरू उपर पर जथे। भूरू कपाट के चौंखट ला धरके दुरिहा ले सपटे असन देखत रथे। ओकर मन मा का बिचार चलत रिहिस होही वो लइका जाने । जानकी हर देखके भूरू ला कथे---------------तहूं खाय रते का भूरू ।भूरू हां कहय ना निहीं। बिन महतारी के लइका कहिके जानकी के ममता भूरू बर घलो पिकियागे। तिर मा बलाके बइठारिस। अउ उही जुट्ठा सथरा के भात सान के दू कॅवरा भूरू के मुंह मा डारके खवा दिस।

अउ मूड़ी मा हाथ रखके कथे--------------झगरा झन होहू दुनो सॅग मा खेलहू बेटा हो। साॅझ किन आहूं तब तुंहर मन बर मुगेसा लाहू ना। जानकी हर गाॅव के नता ले भूरू के बड़े दाई लागय । फेर परोसी के लइका ला जुट्ठा भात खवाए हे कहिके कोनो जान पारही त अलहन मत होय कहिके भूरू ला कथे-----------भूरू जुट्ठा भात ला खवाइस कहिके कोनो ला झन बताबे बेटा आॅय,,,,,,।अउ बने दुनो भाई रहू मोर आवत ले। 

बसंत के माई कॅवरा के हिस्सा भूरू घलो पागे। फेर जौन मया दुलार ला सान के मुंह मा कॅवरा परे रहय वो भूरू के तिसना बनगे। ओकर सकल ला देख के अइसे लागत रहय। महतारी के मया ननपन ले दुरिहाय रहय। बाप हर सबो सुख देय। फेर जानकी के हाथ के खाय के तिसना हर भूरू ला तिर के लानय।मॅझनिया आॅगन बाड़ी ले आवय अउ बसंत सॅग भूरू घलो जानकी के सॅग बइठ जावे। डर के  मारे जानकी अलग अलग थरकुलिया मा परोसय। फेर जब तक चार सीथा जानकी के हाथ के माई कॅवरा नइ खाय मन नइ हिताय। महतारी दुलार के खवाय चाहे डाॅट डपटके मया तो सनाय ही रथे। लइका बर अमरित एक तो महतारी के दूध अउ दूसर सथरा के आखिर मा बाॅचे माई कॅवरा । भूरू जुट्ठा भात ला खवाइस कहिके आज ले कोनो ला नइ बताइस । फेर जौन आनंद सुख परेम भाव ला कॅवरा सॅग मा खाय रहय  जानकी के जरत चिता ला देख देख के सुरता कर।कर के तरी तरी सुबकत रहय।  आॅखी ले आॅसू टुप टुप चुहे लागथे । बसंत अउ भूरू के नजर एक दूसर उपर परथे । दुनो एक दूसर के तिर मा आके बसंत ला पोटार के भूरू कथे--------------तॅय तो अपन दूध के करजा अउ माॅई कॅवरा के लागा ला आगी देके छुट डारे बसंत । मोर तो उधार के उधार रहिगे भाई,,,,,,,,,।अउ दूनो झन मुक्तिधाम मा गोहार पार के रो डारथे । भूरू अउ बसंत के आज घर गिरहस्ती बसगे हे । मुड़ मा घर परिवार के जुवाबदारी घलो हे। तभो ले भूरू जानकी के हाथ के खाय माई कॅवरा ला भूले नइ पाये हे ।


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनादगाॅव🙏

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समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल: 

सागर वो होथे, जिहाँ ले कतको पानी निकाल कमती होय के नाँव नइ लय। उही किसम ले नारी-परानी मया के सागर होथे, जिंकर मया कभू कमतियाय नइ भलुक बाढ़थे। नारी कहूँ महतारी बनगे त ओकर मया ल तो अउ नापेच नइ जा सकय। जतका लइका सबो बर ओतके मया। कोन्हों बर कम अउ जादा नइ होय, सब बर बरोबर मया रहिथे। हमर भरम आय जउन महतारी के मया ल कमती आँकथन। महतारी के मया लइका नइ चीन्हे। ए मया सिरीफ लइका देखथे अउ लइका बर पलपला जथे। कहूँ बिन महतारी के लइका होगे त मया अउ छलके लगथे।

         गँवई गाँव होय त शहर होय लइका के संगी साथी बर महतारी मन के मन म मया जाग जथे। अपन लइका के मुँह म डारत कउँरा बँट जथे। कभू कभू मया अतेक उमड़ जथे कि महतारी चेत ले बिचेत हो जथे अउ बिरान के लइका ल घलव अपने बियाय लइका बरोबर खवाय पियाय के जतन करथे। मया के भूखाय लइका घलव चेत नइ धरय कि महतारी मोर नोहय। ओला तो सिरीफ मया चाही। अइसन मया दुलार सिरीफ मया ल चीह्नथे। 

       इही मया ले भरे कउँरा के उधारी ल सुरता करत सुग्घर मार्मिक कहानी आय माई कउँरा। माई कउँरा माने महतारी के हाथ ले ओकर जुठा भात के कउँरा। 

       गँवई गाँव म कभू कभू यहू देखब अउ सुनब म आथे कि नान्हें लइका के करलई ल देख के परोसिन अपन गोरस ले दूध पियाय हे।

       कहानी म दुख के बखत म क्रिया करम बर छेना लकड़ी के बेवस्था करे के चित्रण गँवई गाँव के सुग्घर परंपरा ल उजागर करे के बढ़िया उदिम आय। इही बहाना लोगन ल दुख कमती जनाथे। दुख सहे के ताकत मिलथे। सबर दिन बर कखरो बिछड़े के दुख ल बाँटे तो नइ जा सकय। दुख के घरी म सहारा जरूर बने जा सकथे। 

      जानकी दाई के हाथ ले खाय भात के कउँरा ल सुरता करके भुरू के तरी तरी सुबकई अउ आँसू  के टपकई ओकर दुखी होय के प्रमाण आय।

      कहानी के भाषा सहज सरल हे अउ नदिया के धार सहीं बोहावत हे। जेमा पाठक बहत जाथे। 

    मुँहाचाही गजब हे, कहानी अउ पात्र मन के मुताबिक़ गढ़ाय हे।

      खेत खार अउ बूता म जात खानी दाई ददा मन के सिखौना ले भरे गोठ जीवंत लागथे---"झगरा झन होहू, दूनो संग म खेलहू बेटा हो...."


पारा परोस के लइका संग होय कुछु बात के मन म डर आय के फोटू(चित्रण) घलव बढ़िया बने हे---"भुरू! जुठा भात ल खवाइस कहिके कोनोल झन बताबे बेटा आँय।"

      जानकी दाई के बिछोह म भुरू के मन के पीरा ल बड़ मार्मिक ढंग ले लिखे ले कहानी अपन उद्देश्य ल पूरा कर लेथे--"तँय तो अपन दूध के करजा ल आगी दे के छुट डारे बसंत! मोर तो उधार के उधार रहिगे भाई।" सिरतोन भुरू बर जानकी के खवाय माई कउँरा भुरू बर उधारेच रहिस, फेर भुरू भागमानी आय जउन ल मया मिलिस।

      कहानी के शीर्षक कहानी ल सार्थक करत हवै, इही कउँरा के उधार आय जउन बिन महतारी के लइका भुरू के आँखी ले टप टप चूहत हवै। फेर कहे जाथे दाई के करजा कभू छूटे नइ जा सकय।

      बहुत सुग्घर कहानी लिखे खातिर राजकुमार चौधरी जी ल बधाई अउ शुभकामना🌹💐🙏🙏


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह (पलारी)

कहानी-डर्टी गर्ल

 : डर्टी गर्ल

                                चन्द्रहास साहू

                          मो  8120578897


एक झन टुरा आय ओहा ।

एक झन टुरी आय यहु हा ।

टुरा वइसने रिहिस जइसे आने टुरा मन रहिथे नान्हे चुन्दी वाला कुरता जिंस के पेंट अऊ गोड़ मा जूता।

टुरी घला वइसने रिहिस जइसे आने टुरी मन रहिथे कुरता फ्राक लम्बा चुन्दी लाल फीता दु बेनी गथाएं अऊ चप्पल पनही।

सिकल टुरा के दमकत रिहिस।

टुरी के सिकल घला दमकत रिहिस अपन पुरती।

टुरा चूक ले पावडर लगाये रिहिस।

टुरी घला पावडर लगाये रिहिस- चोरोबोरो।

टुरा काजर अंजाये रिहिस- चूक ले।

टुरी घला काजर अंजाये रिहिस-चोरोबोरो,लिपिस्टिक घला चोरोबोरो।

टुरा ला ओखर दाई तियार करे रिहिस।

टुरी ला घला ओखर दाई तियार करे रिहिस।

टुरा बारा बच्छर के।

टुरी घला बारा बच्छर के।

टुरा मोर  परोसी आय नवा कॉलोनी के बंगला वाला घर के ।

टुरी घला  परोसी आय जुन्ना घर के खाल्हे बस्ती के ।

                    आज इतवार आय। दुनो कोई गंगरेल जावत हावय अपन - अपन गाड़ी मा। मंदिर मा दूध पियईया दाई असन  बइठे अंगारमोती दाई । तभे तो दुनिया- दुनिया के माइलोगिन मन आथे कोरा हरियाये बर।  धजा- पताका ले साजे मंदिर । मंदिर मा झूलत घंटी - घन्टा अऊ उहा ले आरो आवत ठिन ठिन...ठनन -ठनन ...अब्बड़ सुघ्घर। दाई के पांव पखारत, जलरंग - जलरंग करत अथाह बांध । सुरुज अंजोर पानी मा परथे तब अब्बड़ सुघ्घर दिखथे। लहर - लहर लहरावत पानी । अऊ ओमा खलबिल - खलबिल करत, उबुक- चुबुक होवत मछरी । नजर भर देख ले पानीच पानी। ओमा तौरत डोंगा अऊ पानी जिहाज जइसन डोंगा दूर- दुरिहा मा धुन्धरहा दिखत पहार- परबत जंगल- झाड़ी । अगास टंगाये  हावय ओमा।

सुघ्घर गार्डन। गार्डन मा मनभावन रिकम- रिकम के फूलपत्ती पेड़ - पौधा । पथरा ला रच के बनाये  नदी पहार  के सुघराई ..अब्बड़ सुघ्घर। फिसल पट्टी,भांवरी, झूला, चढ़े- उतरे खेले के लोहा के जिनिस।  गदबदावत लइका मन अऊ गमकत गंगरेल।

"ऐ..ऐ... डर्टी गर्ल ...!''

टुरा आवय देखते साट आरो करिस।

टुरी घला अब चिन्ह डारिस। 

पाछु दरी देवदुत बनके आये रिहिस इही टुरा हा।

 डोकरी दाई के पहिराए ताबीज़ मा हाथ मड़ाइस अऊ मंतर पढ़ीस - "अन्नपूर्णा दाई अपन नानचुन परी बेटी ला जेवन करा, खाना दे । बेटी लांघन हावय ।'' जोर - जोर ले चिचियाबे ताहन देवदुत  ला पठोही अन्न्पूर्णा दाई हा । अइसना तो केहे रिहिस टुरी के डोकरी दाई हा। जब लांघन रहिथे तब इही मंतर ला चिचियाथे। आज सिरतोन मंतर काट करिस ।  टुरी मंतर पढ़ीस।  टुरा हा अब मटर पनीर अऊ सोहारी के प्लेट ला धर के आइस अऊ टुरी ला  दे दिस । 

...अऊ टुरी हा । बदला मा झूलना झुलावत हावय टुरा ला। ससन भर झूलना झुलिस टुरा हा। ...अऊ टुरी के पारी आइस तब कान मा आरो आइस ।

"व्हाट आर यू डूइंग माई लिटिल किंग ? ये हमारे सोसायटी के बराबर के नही है। किप डिस्टेंस फ्रॉम डर्टी गर्ल ..।''

 टुरा के मॉम रिहिस । टुरा ला बरजिस अऊ चेचकारत लेग गे। टुरी भलुक आखर ला नइ जानिस फेर भाव ला समझ गे।

"ऐ..  ऐ...डर्टी गर्ल !''

टुरी आरो ला सुनिस । छिन भर के सुरता ले निकलिस अऊ टुरा के तीर मा अमरगे।

टुरा फेर झूलना मा बइठ गे अऊ टुरी ला झुलाये बर आरो करत हावय।

"ओ दिन के मटर पनीर सोहारी सुघ्घर लागे रिहिस । आज घलो लाने हस का मोर बर देवदूत बनके ?'' 

टुरी पुछिस जीभ ले होठ ला चाटत ।

नो ..आई हैव....। टुरा अंग्रेजी छोड़के छत्तीसगढ़ी मा गोठियाइस। छत्तीसगढ़ी भाखा सीखोये रिहिस न काम वाली बाई हा।

" नही ..नइ लाने हव।''

 "झूलना झूला न !''

 टुरी झूलना झुलाये लागिस।

टुरी झुलावत हावय अऊ टुरा झूलत हे चुई.. चुई..सुई...सुई...सरर...सरर..झूलना ले आरो आवत हावय। दुनो के गोठ बात हा.. हा.. ही..ही..।

"तोर बाबू का करथे ।'' टुरी किहिस।

"मोर डैडी झिल्ली के बुता करथे । बड़का बड़का फैक्ट्री हावय सड़क तीर मा, पालीथिन प्लास्टिक खुरसी मेज दरवाजा ड्रम  बनाये के। '' टुरा बताइस अऊ पुछिस घला।

"तोर बाबू का करथे ?''

"मोरो ददा हा झिल्ली के बुता करथे। बड़का बड़का हुंडी हावय जुन्ना झिल्ली टुटहा प्लास्टिक खुरसी मेज दरवाजा अऊ ड्रम के।''

टुरी बताइस अऊ पुछिस घला।

"तोर दाई का करथे।'' 

"मोर मॉम हा बुता करथे। फोरव्हीलर गाड़ी मा जाथे पर्स टिफिन धर के।''

 टुरा बताइस अऊ फेर पुछिस चटाक ले।

"...अऊ तोर दाई हा ?

" मोर दाई हा घलो  फोरव्हीलर.... टुटहा ठेला मा जाथे कमाये बर। दाई हा ठेला ढूलावत- ढूलावत थक जाथे तब कभू- कभू ददा हा मोला अऊ दाई ला  बइठार के ठेला ला ढकेलथे।

"स्कूल जाथस ?

"हा। अब्बड़ बड़का हावय  हमर स्कूल । बड़का बिल्डिंग, बड़का  क्लासरूम, बड़का टॉयलेट अऊ बड़का खेल मैदान।''

"..अऊ तेहा ?''

"हव, अब्बड़ बड़का हावय मोरो स्कूल हा।बड़का बिल्डिंग खपरा वाला । परेवा गुटूर - गुटूर करत रहिथे । बड़का  हाल, छेटवी ले आठवी तक एक संघरा बइठथन । टॉयलेट छोटे अऊ मैदान बड़का जिहा अमली के पेड़ अऊ......।''

टुरी बताइस अऊ पुछिस।

"बड़का होके का बनबे ?''

डैड कहिथे प्लास्टिक के चार फैक्टरी ला चालीस ठन बढ़ाबे अऊ चालीस हजार नौकर चाकर राखबे। अइसने सपना हावे  डैडी के।''

"तेहा का बनबे ?''

टुरी बताइस

"मोर ददा कहिथे चार आखर पढ़ ले । रांध गढ़ के चार झन ला खवा लेबे । माइके ससुरार के चार झन के आगू अपन नाव के अंजोर बगराबे अइसना सपना देखथे ददा हा।''

 टुरी बताइस अऊ पुछिस।

"तोर घर कोन कोन हावय ?''

"मे, डैडी अऊ मॉम।''

"बस.. तीने झन'' ... हो हो ....टुरी हासे लागिस। पुछिस।

"तोर घर ?''

"मे, दु झन मोर बहिनी, मोर भाई ,कका -काकी, ओखर बेटी -बेटा, डोकरी दाई अऊ डोकरा बबा...। टोटल छब्बीस झन। ''

अंगरी मा गिन के बताइस टुरी हा।

"तोर डोकरी दाई हा नरी मा नइ बांधे हे ताबीज तोर भूख भगाये बर... ? अन्न्पूर्णा दाई के मंतर... अऊ कभू- कभू देवदुत ला भेज के जेवन पठो देथे.....। पाछु दरी आये रेहेस न तेहा मटर पनीर धर के । 

"अरे मोला खाये ला नइ भाइस तब कुकुर कर फेके ला जावत रेहेंव। तोला देख पारेव अऊ तोर आगू मा डार देव।''

टुरा किहिस चटाक ले।

त...देवदुत...? टुरा के सिकल ला देखत रिहिस टुरी हा।

"देवदुत नइ होवय, सब अंधविश्वास आय ।'' टुरा किहिस।

"तोर डोकरी दाई अऊ डोकरा बबा नइ हे का ..? ओखरे सेती अइसना काहत हस। कहा गेहे ?'' टुरी पुछिस।

"मोर डोकरी दाई अऊ बबा हा महारानी अऊ महाराजा बनगे हे। बड़का - बड़का हाथी- घोड़ा, नौकर -चाकर, तलवार - तोप, बंदूक -भाला सब हावय। खाइ - खजाना, पिज्जा - बर्गर, इडली - डोसा, काजू -बादाम, खोवा- जलेबी सब मिलथे उहा । टीवी के रामायेन सीरियल मा देखे हस बड़का-बड़का महल बिल्डिंग ला, वइसने हावय मोर डोकरी दाई बबा के घर हा।'' टुरा गरब मा फुलत रिहिस।

"तेहा देखे हस जम्मो ला ?'' टुरी पुछिस।

"नही ... मॉम बताथे ।''

"का नाव हावय ओ राज के ?''

"वृद्धाश्रम राज नाव हावय । जब बड़का होहु न तब मॉम डैड ला उही राज मा पठोहू। वृद्धाश्रम राज के मॉम हा महारानी रही अऊ डैड हा महाराजा रही।''

 टुरा जइसे भीषम किरिया खावत किहिस।

झूलना अपन गति मा फेर बाढ़गे। हवा मा तौरे लागिस टुरा संग। 

टुरी गुनत रिहिस चाहे कही हो जावय मोर डोकरी दाई बबा ला कोनो राज नइ पठोवव। हाथी- घोड़ा, राज- पाठ मिलही तभो ले......अपन ले दुरिहा नइ करो। 

झूलना फेर अपन गति मा चलत हावय।

"व्हाट आर यू डूइंग माय लिटिल किंग '' टुरा के दाई आइस बंबियावत। टुरा ला बरजिस, खिसियाइस।

" दिस पिपल आर नॉट इक्वल टू अवर सोसायटी। मत खेला करो इन लोगो के साथ। न संस्कार ,न तमीज ...हु....रियली डर्टी गर्ल  ...।'' मुहु बिचकावत किहिस मॉम हा।

टुरी डर्रागे टुरा के मॉम के बरन ला देख के। दउड़त अपन डोकरी दाई करा गिस अऊ पोटार लिस। वहु हा झिल्ली बिनत रिहिस आने डर्टी गर्ल मन संग ।



चन्द्रहास साहू

द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब के पास

श्रध्दा नगर धमतरी छत्तीसगढ़

493773

मो.  -  8120578897



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समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल:

 सच म बाल मन, मन के सफ्फा रहिथे। लइका मन मन म कोनो किसम के भेद राखय न भेदभाव ल जानय। सब ल बरोबर जानथे। सबो ल अपने सहीं मान थे अउ समझथे। मन ले मन मिलथे अउ संघरा खेलथे कुदथे अउ गोठियाय लगथे। दुनियादारी ले दुरिहा रहिथे। अइसन हे बालपन के गोठ ल समोय अउ समाज के तथाकथित पढ़े लिखे सुसभ्य कहावत लोगन ल चेतवना देवत कहानी आय डर्टी गर्ल।

       ए कहानी आर्थिक रूप ले समाज के वर्ग भेद ऊप्पर व्यंग्यात्मक शैली म लिखे गे कहानी आय। जेमा बिल्कुल सरल सहज भाषा म समाज अउ बेवस्था ऊपर टंट मारे म कहानीकार सफल हे। दूनो लइका पात्र मन के गोठ बात एकदमेच सहज हे सरल हे। बालमन के सुग्घर छाप घलव देखब ल मिलथे। 

      कहानी के शुरुआतेच म टुरा अउ टुरी के रूप वर्णन ह आर्थिक विषमता ल दरसाय बताय बर काफी हे। जे ए कहानी के मूल कथानक आय।

       गंगरेल बाँध जउन छत्तीसगढ़ बर कोनो बरदान ले कमती नइ हे, इहाँ के फोटू(चित्रण) बिल्कुल हुबहू हे। उहाँ ले आय मनखे के आँखीं आँखी म झूल जही। अउ जेन पाठक उहाँ नइ गे हे तेकर मन एक पइत गंगरेल जाय के करही। ए कहानीकार के भाषा अउ चित्रण के कमाल आय। अंगारमोती के महत्तम ल सरेखत कहानी म उकेरई ह साँस्कृतिक अउ सामाजिक मान्यता ल सहेजे के दिशा म कहानीकार के जुड़ाव ल बताथे। इही ह कहानी के अपन बेरा अउ परिस्थिति के आरो देथे। कल्पना के गहिर सागर ले निकाले कोनो मनगढ़ंत बात नोहय के सबूत आय।

       संवाद मन पात्र के संग नियाव करत उँकरेच बर लिखे गे हवय। अँग्रेजी शब्द मन ल बउरना (प्रयोग म लाना) कहानी म लालित्य लाय हे।

      सहज अउ सरल भाषा म कहे गे ए संवाद ल देखव-- "....अब्बड़ बड़का हावय मोरो स्कूल ह....बड़का हाल हे जेमा छेटवीं ले आठवीं तक सँघरा बइठनथन।..." 

     ए संवाद सरकारी स्कूल के बेवस्था ऊपर टंट मारे गे हे। आज भले अइसन स्थिति कमतीयागे होही। फेर....।

    समाज के गरीब तबका के सपना अउ सोच ल देखव जे ह सोला आना सिरतोन आय।

" मोर ददा कहिथे चार आखर पढ़ ले। राँध गढ़ के चार झन ल खवा लेबे। ....अपन नाव के अंजोर बगराबे अइसना सपना देखथे मोर ददा ह।"

    अभाव म जिनगी जियत मन बहलाव के गोठ करत डोकरी दाई के देवदूत आय वाला भरम ल टोरत टुरा के गोठ अंधविश्वास के जड़ी ल उखाड़ देथे।

"अरे मोला खाय ल नइ भाइस तब कुकुर कर फेके....तोर आगू म डार देंव।"

"कोनो देवदूत नइ होवय।"

     अवइया बेरा के फोटू खींचत ए संवाद सब के चेत ल हजा दिही फेर एकर नजरअंदाज करई घलव सही नइ होही। समाज ल सावचेत करे के उदिम म लिखे संवाद देखव

"वृद्धाश्रम राज नाव हावय।जब बड़का होहूँ न तब मोर मॉम डैड ल उही राजम पठोहूँ....।"

     गार्डन के झूलना म बइठना अउ झूलत झुलावत गोठ बात करना सरल अउ सहज चित्रण आय। 

      कहूँ सास ससुर ल वृद्धाश्रम म छोड़ के मजा उड़ावत जिनगी जिएँ के उदिम करइया बहू अभाव म जियत मइलाहा कपड़ा लत्ता अउ सँवागा देख के कोनो टुरी ल डर्टी गर्ल कइही। त अइसन सोच पाठक ल गुने बर मजबूर करथे कि असली म कोन डर्टी गर्ल आय। सच म कहानी अपन ए नाव/शीर्षक के संग अपन उद्देश्य ल पूरा करथे।

        अतेक सुग्घर कहानी ल पढ़त बखत कोनो कोनो मेर के टंकण त्रुटि पाठक ल खटक सकत हे।

     पानी म रहवइया मछरी के गंगरेल के पानी म 'उबुक चुबुक होवत मछरी' लिखई मोला समझ नइ आवत हे।

    डर्टी गर्ल जइसन सुग्घर कहानी लिखे बर चंद्रकांत साहू जी ल नंगत अकन बधाई अउ सुग्घर सुग्घर कहानी लिखत रहय इही शुभकामना देवत हँव।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह(पलारी)

9977252202

छत्तीसगढ़ी में पढ़े - पठौनी

 छत्तीसगढ़ी में पढ़े - पठौनी

बरदिहा छोड़ दिही ते छोड़ दिही, गोसइया थोरे छोड़ही

दुर्गा प्रसाद पारकर 


छत्तीसगढ़ के सियान मन अपन जमाना के बात ल बताथे। हमर जमाना म गांव भर के बेटी माई मन सेकलावत रीहिन हे बेटी के बिदा करे बर। बेटी के बिदाई ल ही पठौनी (गवना) कहे जथे। दिन बादर बंधाए के मुताबिक जोंगे दिन के दू चार दिन पहिली ले दमांद ह पठौनी ले बर आवय। पठौनी खातिर महतारी बाप अपन दुलौरिन के सवांगा महीना भर पहिली ले करय। सन्दुक, साबुन, लुगा, पोलखा, छाया, टिकली, फूंदरी अउ तेल फूल आदि। कवि मरहा कहिथे- ‘‘ महूं ह अपन संगवारी के पठौनी लाए बर लोकड़ाहा बन के गे रेहेंव। नता रिशता मन जेखर ले जतका बनिस रुपिया पइसा साबुन सोडा धरइन। अपन दमांद ल माई खोली म बला के लाली धागा बांध के काकी महतारी मन समझाइन बेटी ल चला लेहु हो। कोनो किसम के गलती हो जी तेला संवास लेहु। लड़की के मुड़ म नवा लुगा ओढ़ा के भेंट लागत लगावत बस्ती के आखरी म आइन। ठउंका गुर पानी पियाए के बेरा होत रिहीस हे ओइसने म दु ठन गोल्लर लड़त लड़त इही मेर आगे। सबो ल जी के डर। जुरियाए मनखे मन सब भागगे। इहां तक ले ओखर भाई ह अकाद घुट गुर पानी पियाय पाए रिहीस हे वहू ह लोटा ल कचार के भाग गे। लड़की के भाई अउ संइया एके जघा खड़े रीहिन हे। मुड़ी तो लुगा म तोपाए रिहीस हे कुछु नइ दिखे। भाई तो भगा गे सइंया ल पोटार के भेंट लागे ल धर लीस। मोला सगा आवत हे कहिबे भइया ए हें हें.....। लड़की के रोवई ल देख सुन के मरहा ह कथे- ए हा तोर भइया नो हे वो तोर संइया ए संइया ए। अरे भई बरदिहा छोड़ दिही ते छोड़ दिही गोसइया थोडे़ छोड़ही अपन लक्ष्मी ल’’। अतका सुन के बिचारी ह ठगाए कस रहिगे। संसार के नियम ल तो निभाए ल परही। फेर अपन हीरा ल बिदा करे के पीरा ल तो महतारी कइसे सहत होही तेला उही जानत होही। ए बात के एहसास बिहाव गीद ले करे जा सकत हे- दसे वो महीना दाई ओदरा (पेट) म राखे। दाई ओदरा म राखे। सोपि लेबे दाई तै माथे के मउंर......। 

   अब अइसन पठौनी कहां ले। सब नंदागे। कहां गे पिंयर धोवई ह। अब तो पठौनी (गड़जरावन) के नेंग ल बिहाव पारी टोर देथे। कउनो ले बर अइ जही ते परोसी ल कोनो कान खभर नइ चलै कि फलानी घर के सुवना ल कतेेक बेर उड़ा के ले गे। खैर जऊन आए हे ओला तो जाएच बर परही। फेर बेटी ल दु घांव जाए बर परथे। पहिली मइके ले दमांद लेगथे ताहन आखिरी म ससुरार ले जमराज। पठौनी के बाद नवा-नवा जुग जुग जोड़ी के घर बसथे। दू चार दिन तो बने चलथे जइसे नवा बइला के नवा सींग चल रे बइला ंिटंगे-टिग। ताहन चालू हो जथे बरतन भाड़ा बाजे के। दूनो अलग-अलग परिवार के रथे वैचारिक टकराव स्वाभाविक हे। अइसे बहुत कम बहुरिया होथे जउन मइके अउ ससुरार ल एके लउठी म हांकथे। माईलोगन मन बर तो मइके के करिया कुकुर नोहर। अइसन स्थिति पीढ़ी दर पीढ़ी चलत आवत हे। महतारी जइसन सिखाही ओइसन सिखही नोनी ह। बेटी ल तो बढ़िया सीखा पढ़ा के ससुरार पठोना चाही। सुन बेटी तै अपन गोसइया ल राम सरीख अउ देवर ल लछिमन बरोबर मानबे। इही किसम ले सास ल कौसिला अउ ससुर ल दसरथ बने बर परही। लड़की उमर म छोटे अउ लड़का ह बड़े रहिथे यहू पाय के लड़की मन ह लड़का के अपेक्षा कम परिपक्क रथे। यहू बात जरुरी नइ हे कि दूनो के बिचार म समानता हो। हाँ एक बात जरुर हे यदि गृहस्थी के गाड़ी ल बने खींचना हे त समझौता ही एखर हल हरे। 

   एक साल बहु ला, बने बने होगे ताहन फेर साल छट्ठी चाय पी। अम्मल म रहिते भार ये तो तय हो जथे कि जेचकी कते महीना म निपटही। जस-जस दिन बाढ़त जाथे तस-तस तन ह चिकनावत जथे सियान मन के आकब हे के जब पेट म टूरा हे त आधा सीसी माईलोगन के चेहरा ह फिक्का पर जथे अउ मान ले पेट म नोनी खेलत हे ते ओखर सुन्दरता ह बाढ़ जाथे। मान ले लइका ह डेरी बाखा म खेलत होही त नोनी अऊ जेउनी बाखा म खेलत होही त बाबू लइका होही। हो सकथे ये सब आज के वैज्ञानिक युग म गलत हो सकथे तभो ले अजमाए जा सकत हे कि सियान मन के बात म कतना सच हे। कोनो माईलोगन ल ओ-ओ उल्टी आवत हे। अम्मट-गोम्मट बने सुहावत हे। ताहन जान डर पठउव्हा ले लइका गिरया हे। आधा सीसी के हालत म बने खाना अउ कमाना चाही। जेखर ले जेचकी ह बड़ सहोलियत म निपटथे। आज कल तो जच्चा अउ बच्चा के देख रेख खातिर जांच करवाना चाही, समे म टीका लगवाना चाही। ताकि भारत के भविष्य स्वस्थ रहि सके। नवा सगा के रद्दा ल सबो जोहत रहिथे। आनी बानी के खई खजाना अपन बहु ल खवाथे। कोनो जलेबी लाथे त कोनो आमा। आमा के अथान बिना तो कंवरा नइ उठे आधा सीसी माइलोगन के। सात महीना होते भार आधा सीसी के सधौरी खाए के साध ल मइके वाले मन पूरा करथे। मइके वाले मन सात जात के रोटी पीठा (फरा, खुरमी, ठेठरी, बरा, खीर, भजिया, सोंहारी) रांध के पहलावत दरी लेगथे। कतको मन सबो दरी बर सधौरी खवाथे।

         आधा सीसी माईलोगन के दिन पुरते भार दुख खाए बर धरथे। ताहन गांव म जेचकी निपटाए बर सुईन बलाथे। डोकरी ढाकरी मन घलो नरियर खाए के ओखी म जेचकी निपटाए बर साथ देथे। सहर के अपेक्षा गांव में जेचकी सोहिलत ले निपट जथे। काबर के इन मन हमेशा काम बूता करत रथे। बहुत कम जेचकी असफल होथे। अइसन स्थिति म नर्स बाई ल बलाथे या स्वास्थ्या केन्द्र लेगथे। ओइसे देखे जाय जिंहा सुविधा हे उहां अलहन ले बांचे खातिर अस्पताल म जेचकी निपटाना जादा अच्छा हे। लइका ह पठउव्हां ले नार फूल सहित गिरथे। जेखर जतन सुईन ह करथे। पहिली समे म नार फूल  खपरा म कुचर के काटे जाय। फेर अब नार फूल काटे खातिर पत्ती के उपयोग करे ल धर ले हे। जंग लगे पत्ती ले सावधानी बरते के जरुरत हे। जेचकी के समे लइका के मुड़ी ह पहिली बाहिर आथे। 

गोड़ के पहिली आए ले मुड़ी के अटके के डर रथे। जउन लइका ह गोड़ डाहर ले पैदा होथे ओला पंवरिया केहे जाथे। अइसे माने जाथे कि काखरों हाथ गोड़ म पीरा उमड़ गे हे त पंवरिया लइका के खूंदे ले ठीक हो जथे। जेन ल भगवान देथे ओला खपरा छानी फोर के देथे। जइसे एके घांव म जुड़वा लइका हो जथे जेन ल जांवर जीयर कहिथन। 

जेचकी के दिन ले छुट्ठी तक सुईन ह सेवारी के पेट ल लगरथे ताकि रुके रुकाए कुछु कहीं ह झर जय। सेवारी ल शुरु दिन चाय भर दे जाथे। ताकि मुंह सुखाए झन। अबके मन हल्का फुल्का खाए बर घलो देथे। दुसरइया दिन ले चालु होथे नरियर भेला डुढ़ही अउ कांके पानी के कांके लकड़ी अउ लाल सुपारी ल पानी म खउला के ओखर पानी ल तीली के फोरन दे के बघार दे जाथे। इही ल कंाके पानी कहिथन।

  ढूड़ही बर बादाम, खारीक, किसमिस, काजू, चिरौंजी, फरपीपर, अंजवाइन, करायत, दाख, मुनक्का, लाई, मखना, फर पीपर, गोंद, लाइचा, कमरकस, खस-खस, करिया तीली, सोंठ, गुड़, खोपरा अउ मंदरस के जरुरत परथे। लइका मन बर महतारी के दुध ह जादा फायदा करथे। लइका ल दुध पियाए ले माईलोगन ल कुछु फरक नइ परय बल्कि मातृत्व के अपन आनंद हे। आजकल पाउडर दूध ले बांचे बर परही। छत्तीसगढ़ म पांच-छै दिन म छट्ठी उचाए जाथे। मंगल अउ शनिच्चर के छट्ठी नइ उचाए जाए। अइसन स्थिति म छट्ठी चार दिन अउ छै दिन म घलो उचाए बर पर जथे। छट्ठी के दिन नता रिसता ल नेवतथे। गांव वाले मन ल छट्ठी संावर बनाए बर नेवतथे। लड़की अउ लड़का के भेद ह तो पहिलीच ले चले आत हे। तीही पाए के लड़की आए ले छट्ठी चाय सिट्ठा-सिट्ठा लागथे। लड़की अउ लड़का म भेद करई ह बने बात नोहे। लड़की होय चाहे लड़का दूनों के बढ़िहा लालन-पालन कर के शिक्षा दे के जरुरत हे। जब नारी पढ़ही लिखही तभे तो अपन लइका ल पढ़ा लिखा के उंखर भविष्य ल संवारही। टूरा के छट्ठी बर चकल चउदस। का दारु ल कहिबे त का मछरी ल। महर-महर करत रहिथे घर बाहिर ह। मुनगा बरी बिना तो जेचकी निपटे नही चाहे छट्ठी कोनो महीना म होवय। छट्ठी के दिन नाऊ ह सबके छट्ठी सांवर बनाथे। लइका के मुड़ मुड़थे। लइका के चिकनी मुण्डी होय के बाद सुईन ह नहवाथे-खोराथ,े मालिश करथे। 

          येखर अवेजी म लड़का के बाप ह सुईन अउ नाऊ ल जतका बन जथे उपहार देथे। कतको गांव म ये तय कर देथे के जेचकी अउ छट्ठी निपटउनी सुईन अउ नाऊ ल कतका अउ रुपिया देना हे। छट्ठी के दिन गरीब से गरीब मनखे रेडियो बजवाथे। चाय पियाथे। कतको जघा मिश्चर घलो खाय बर मिल जथे। 

कतको परिवार समधीन भेंट के नेंग ल बिहाव दरी टोऱ देथे। नइ टोरे उमन छट्ठी के बाट ल जोहत रहिथे। इही दिन समधीन भेंट के नेंग ल घलो निपटाए जाथे। छट्ठी के दिन लड़की के मइके वाले मन अपन बेटी कर लुगा पोलखा छाया, दमाद बर धोती अउ लइका बर नवा कपड़ा लानथे। छट्ठी के दिन खुशी म रमायन करवाथे। रमायन के सिरावत खानी लइका के नाव घलो धर देथे। नवा धरे के पहिली सोहरगीद येदइसन गाथे- हो ललना बाजथे आनंद बधाई। मोर आनंद बधाई हो। ए हो ललना बाजत हे आनंद बधाई। तीनो के घर सोहर हो। कोन घड़ी भये सिरी रामे, कऊन घड़ी लछिमन। ए हो ललना कऊन घड़ी भरत भुआल। तीनो के घर सोहर। सुभ घड़ी भये सिरी राम, सुभेच घड़ी लछिमन। ए हो ललना सुभ घड़ी भरत भुआल। तीनो के घर सोहर हो। काखर भए सिरी राम, काखर भये लछिमन हो। ए हो ललना काखर भरत भुआल। तीनो के घर सोहर हो। कौसिला के भये सिरी राम। सुमितरा के भये लछिमन हो। ए हो ललना कैकई के भारत भुआल। तीनो के घर सोहर हो। जो यह सोहर गावै अउ गाई के सुनावे हो। ए हो ललना तुलसी दास बली पावे, सुनइया फल पावे, परमानंद पावे हो ललना। 

              छट्ठी के बिहान दिन बरही। बरही के दिन सेवारी ह नहा खोर के नवा लुगा छाया पोलखा पहिर के टुप-टुप पांव परथे बड़े मन के। अऊ असीस लेथे। जनम बिहाव अऊ मरन तो लगे हे। संसार म फेर दू लइका के बीच कम से कम तीन बछर के अंतर जरुरी हे। नही ते धकर लकर के घानी, आधा तेल आधा पानी, कस रोहन बोहन लइका मन हो जही।

चोर ले मोटरा उतियइल

 चोर ले मोटरा उतियइल 

                    फकीर राम बड़ ईमानदार मेहनतकश मनखे रिहिस । गरीब लचार असहाय अऊ बीमार मनखे मन के कठिन समे म मदद करे बर , टांग पुरत ले अपन धन सम्पति ले मदद रहय । जब अपन धन दोगानी के औकात समाप्त हो जाये तब , जरूरतमंदी के आवसकता अनुसार चोरी घला कर डरय । दू लांघन एक फरहर करके अपन दिन ला पोहावत रहय । फेर अपन खातिर काकरो चीज ला हाथ नइ लगइस कभू । जे मनखेमन दुनिया ला लूटत खसोटत रहय तेकरे घर के धन दोगानी म अइसे हाथ मारय के कभू धरावय घलाव निही । ओकर एक झिन चेला रिहिस । देहें ले नानुक बौना फेर आदत बेवहार म ओकरेच कस । जस गुरूजी करय तस वहू करय । एके संघरा रहाय एके संघरा उठय बइठय एके जगा जाय । चोरी के माल म कभू दावा नइ करिस । फेर चेला म एक ठिन बुरई रिहिस ओहा अम्मट देखय तँहले लार टपकना सुरू हो जाय । 

                       एक बेर गाँव के अमीर मनखे मन राजा साहेब ला शिकायत करिन के फकीर राम हा चोर आय । ओला पकड़ के जेल म डारे बर गोहनइन । राजा सबूत मांगिस त एक झिन बड़का मनखे किथे - मोर घर में आजे चऊँर दार के चोरी होये हे । फकीर के घर म जाके खोजे जाय , जतका अकन समान लेगे हे तेला एके दिन म नइ उरका सकय । तुरते सिपाही भेज के खाना तलासी लेईन । चऊँर दार के एक ठिन दाना नइ अमरइन । तभो ले फकीर राम ला सिपाही मन पकड़ के राजा तिर लेगिन । राजा पूछिस - तैं सही म चोरी करथस रे ? फकीर राम जवाब देवत किहिस - हव राजा साहेब में चोरी करथँव । राजा किथे - तैं जानत हस के का कहाथस ? फकीर किथे - में लबारी नइ मारँव राजा साहेब । मे सहीच म चोराथँव अऊ काली घला चोराये हँव । राजा पूछिस - चोरी के माल ला तैं कहाँ करे ? फकीर किथे - इही ला झिन पूछव राजा साहेब । में नइ बतावँव । राजा किथे - तोला दंड परही । फकीर किथे - काके दंड राजा साहेब । तुँहर कानून म सच बोले म घला दंड के प्रावधान होही त में ओकरो बर तियार हंव । न्यावधीस कती देखिस राजा साहेब हा । न्यावधीस किथे - हमर दंड संहिता म सबूत मिले ले दंड के प्रावधान हे । येहा कहि दिस के चोरी करथँव ततकेच म येहा चोर नइ हो जाये । जब तक कनहो येला चोरी करत नइ अमराही अऊ आके आपके अदालत म गवाही नइ दिहीं तब तक येहा चोर नोहे । अमीर मनके दाँव फेल होगे । फकीर बाइज्जत बरी होगे । 

                     फकीर काबर चोरी करथे तेला , अमीर मन घला जानय । तभो ले ओमन हा फकीर ला पकड़े के दाँव खोजत रहंय । फकीर के गाँव म एक झिन बड़ गरीब मनखे रहय । ओकर बेटी सग्यान होगे रिहिस । रिसता तै होगे रहय फेर , गरीब मनखे अकाल दुकाल के मारे अतका पस्त हो चुके रहय के सग्यान बेटी के तै होय बिहाव , नइ मढ़हाये सकत रहय । दूसर कोती लड़का के घर वाले मन , बिहाव जलदी करे बर पदोवत रहय । अब तो ओमन धमकी घला देना शुरू कर दिन के , एसो बिहाव नइ माढ़हिस ते रिसता टूट जही । जेकर घर खाये बर दाना निही तेहा कइसेच बिहाव रचा डरही ? गरीब के घर चिंता खुसरगे । फकीर ल पता लगिस । ओला बिहाव रचाये के सलाह अऊ मदद करे के बचन दिस । बिहाव के दिन तिथि निच्चित होगे । गरीब घर बेटी के बिहाव के तैयारी होये लागिस । खाये पिये , दे ले बर , जइसे तइसे फकीर हा अपन धन दोगानी ले जुगाड़ जमा डरिस , फेर बेटी के गला बर , सोन के मंगलसूत्र कहाँ ले पाये । बेटी ला सोन के नाव म कम से कम इही देना जरूरी रहय । येकरे जुगाड़ के फिकर म फकीर ला धुकधुकी धर लिस । एती अमीर मन फकीर के एकेक गतिबिधि ला परखत रहय .. ओमन जान डरिन के फकीर हा सोन चांदी वाले घर सोन के चोरी करे बर जवइया हे । राजा साहेब ल इतला कर दिस के फकीर हा कोरी करइया हे .. रंगे हाथ पकड़े के बढ़िया मौका हे । राजा हा दिन रात चार चार झन सिपाही मनला चौकीदारी म लगा दिस । एती जेकर घर म चोरी के योजना बने रहय ते सेठ हा सोंचिस के , सोन चांदी ला अलमारी म लुकाके राखिहँव त राजा के सिपाही मन , फकीर ल रंगे हाथ पकड़ही तहन हमर अलमारी ला खोजत खोजत .. हमर सरी धन दौलत ला जान डरहीं अऊ जाके राजा साहेब ल बता दिही के हमर तिर अतेक माल खजाना हाबे .. तब ....... मोरो पोल खुल जही । तेकर ले एक ठिन सोन के पुतरी ल पिछू कोति के दुआरी तिर जगजग ले दिखय तइसने जगा म रखवा देथँव । चोर जइसे दुआरी करा आही तहन पुतरी ला उचाबे करही ... तब चारों डहर लुकाये सिपाही मन ओला बाहिरे म रंगे हाथ धर लिहीं । सरी रात बीतगे फकीर नइ अइस । दूसर दिन ... दिन भर चोर ला अगोरिन .. चोर आबेच नइ करिस । दूसर रात पोहाये के पाछू सेठानी ला शंका होइस । ओहा बिहिनिया बिहिनिया उचके जइसे पिछू डहर के कपाट ला हेरिस .... साँप साँप चिचिअइस । अमीर सेठ हा भागत भागत तिर म गिस तब ओहा देखथे के , सोन के पुतरी के जगा म सहींच म नानुक मरे साँप माढ़हे रहय । घर के भीतरी म पहुँचके अलमारी के सरी गहना गूठा ला हाबे के निही कहिके खंगाले लगिस । गहना गूठा के एक ठिन पोटली म सोन के उही पुतरी ला देख सेठ मुहूँ ला फार दिस ... ये उही हार आय जेला फकीर चोराही कहिके दुआरी म फेंक दे रिहिस । ये पुतरी हा पोटली म कइसे अइस तेला बिचारत बइठे रहय तइसने म ओकर बेटा बतइस - काली दुकान बढ़होये के समे एक झिन मनखे हा इही जुन्ना पुतरी के बदला म , नावा मंगलसूत्र लेगिस हे ........ । 

                      वास्तव म होइस ये के , फकीर बिचारा हा गुनताड़ा म लगे रिहिस के , अतेक कड़ा पहरा म चोरी करे बर कइसे खुसरँव । ओहा सेठ घर के आगू जुन्ना पीपर के तरी म दिन भर भजन करत चेला संग बइठे रिहिस । तभे एक ठिन बाज हा उड़ियावत उड़ियावत अंगना के दुआरी म माढ़हे सोन के पुतरी ल खाये के समान समझ , मुहूँ के मरे साँप ल छोंड़ दिस अऊ उड़ियावत उड़ियावत पुतरी ला फकीर के आगू म गिरा दिस । सिपाहीमन पहिली रात अऊ दिन भर तो सहींच म सोन के पुतरी के रखवारी करिन फेर दूसर दिन संझा अऊ दूसर रात , मरे साँप ला सोन के पुतरी समझ रखवारी मा लगे रिहिन अऊ दूसर दिन , दिन बुड़े के पहिली , दुकान बंद होये के आगू , पुतरी ला उही सेठ के दुकान म बदलके , फकीर अपन बूता कर दिस । फकीर फेर बांचगे । राजा हा सेठ मनला बलाके जबरदस्ती फकीर के चोर नाव धरे के सेती बहुतेच फटकारिस ।

                    एक दिन फकीर के परोसीन ला जुड़ीताप धर लिस । बाढ़त बाढ़त बीमारी हा मोतीझीरा के रूप धरके ओकर देंहें ला चुँहके बर धर लिस । अइगा बइगा देवता धामी सरी के चक्कर लगगे । चार महिना म बपरी के देंहें म सिर्फ हाड़ा बाँचे रहिगे । खाये पिये के चीज सुहाबे नइ करय । बईदराज के दवई ले बिचारी हा बने तो होगे फेर देंहें म मास नइ भरावत रहय । बईद तिर अन्न जल सुहाये के दवई सिरा चुके रहय । ओकर घरवाला हा बहुतेच परेशान रहय । खेत खार के दिन म कमई धमई ला छोंड ... बई के सेवा म लगे रहय । एक दिन बईद किथे - लिमऊ म भूंजे जीरा के भुरका गोद के पियाये म , हो सकत हे खाये के इच्छा जागही । जब खाये के इच्छा जागही तभे येकर देंहे भराही अऊ येहा ठीक होही । मोर तिर होतिस तब दे देतेंव । चौमासा बीतत ले कतेक अगोरबे । कहाँचों ले जीरा खोज .. मिल जही त उपाय बन सकत हे । 

                    अब जीरा कहाँ ले मिले । ओ समे हमर देश म जीरा के फसल नइ होवत रिहिस । जीरा ला बाहिर ले मसाला बेंचइया मन लानय । महंगा रहय तेकर सेती फकत बड़े आदमी मन खावय । एक झिन अमीर घर , जीरा मांगे बर गिस । ओकर घर के मन ये कहत मना कर दिस के – तैंहा चोट्टा के संगवारी परोसी हरस .. तोला मांगे के का जरूरत .. संगवारी ला बोल के , चोरवा नइ लेतेस काकरो घर ले ...। फकीर ला जइसे पता चलिस तब , ओहा उही बनिया के रंधनी म सेंध मारे के सोंचिस । उही रात .. चेला संग कलेचुप रंधनीखोली म खुसरगे । मसाला के डब्बा खोजत खुल्ला अलमारी म चइघे चेला के नजर आमा के अथान उपर परगे । मुहूं पंछियागे । लार टपके लागिस । जीरा ला खींसा म धरत ले , चुचुवाये लार के सेती , ओ तिर गिल्ला होगे । उतरत बेर उही म हाँथ परगे .. फिसलके गिरगे .. गिरत समे पथरा के बारा म माथ परिस .. चेला बेहोश होगे । फकीर दुबिधा म फँसगे । न चेला ला छोंड़ के जाये सकय न धरके । कोशिस करिस चेला ला उठाके रेंगाये के , फेर प्रयास असफल रिहिस । तब तक बेरा घला पंगपंगागे । फकीर हा अपन मुड़ के पागा ला हेरिस अऊ चेला ला मोटरा कस बांध डरिस । मोटरा ला मुड़ी मा बोही के धरके जइसे बाहिर निकलिस ........... पकड़ागे । बिहिनिया ले गाँव भर हल्ला होगे । राजा के दरबार म , एक कोती फकीर ला सजा देवाये बर त दूसर कोती बचांये बर भारी भीड़ लगे रहय । राजा किहिस – तैं सेठ घर ले काये काये चोराये हस .. अतेक बड़ मोटरा म बांध के काये लेगत रेहे हस ... तैं अपन मुहुँ ले बताबे के जम्मो जनता के आगू म मोटरा ला हेरवांवव .. । तैं कहस ना के , सबूत बतावव अऊ सजा देवव ... आज सबूत सुध्धा रंगे हाथ पकड़ाये हस । तिहीं बता तोला का सजा देवन ? फकीर चुप रहय कहींच नइ बोलय । एक कोती फकीर ला फाँसी दे के मांग उठे लागिस । दूसर कोती ओला बचइया मन .. राजा साहेब फकीर अच्छा मनखे आय .. ओला छोंड़ देवव .. कहिके गोहनावत रहय । 

                    चारों डहर ले होवत , मनमाने जोर जोर के कलल कलल म , मोटरा म बंधाये चेला के मुरछा टूटगे । ओ सुन के जान डरिस के ओमन पकड़ा चुके हे अऊ ओकर गुरू ला सजा होवइया हे । हकीकत बताये बर खुसमुसाये लागिस । बहुत बेर होगे , फकीर हा अपन बचाव म न हुँके न भुँके । राजा घुस्सा होके फकीर ला भरे बजार म तुरते फाँसी चइघाये के हुकुम सुना दिस । पूरा दरबार कलेचुप होगिस । शांत दरबार म मोटरा ले अवाज निकलिस - हमन कहींच नइ चोराये हन राजा साहेब । फैसला ला ठीक से बिचार लव अऊ घटना के पूरा तफतीस कर लेवव । अऊ फाँसी के सजा देना ही हे त मोला फाँसी पहिली दव । मोर सेती मोर गुरू पकड़इस हे आज । आवाज कती ले आवत हे पता नइ चलत रहय । फकीर राम मुड़ी गड़ियाये राजा के निर्णय के आगू कलेचुप खड़े हे । तभे मोटरा उंडत उंडत राजा तिर पहुंचगे । मोटरा कइसे उलंडथे , पूरा दरबारी मन डर्रागे । हिम्मत करके मोटरा खोले गिस । मोटरा ले बाहिर निकलतेच साठ बौना किथे - फाँसी देना हे त मोला देवव । राजा ला पूरा घटना के बिबरन अऊ चोरी के कारन बतइस अऊ अपन धराये के कारन घला बतइस । तलासी म सहींच म फकत जीरा के अलावा कुछ भी नइ मिलिस । ऊँकर ईमानदारी अऊ समाज सेवा उपर राजा प्रसन्न होगे । दूनो झिन ला राज कोष के कर्मचारी बना दिस । सेठ मनला समे म काकरो मदद नइ करे के सेती जमके फटकार लगावत किहिस - तुँहर सेती कन्हो भले मनखे ल गलती करे बर मजबूर होये ला परिस । सेठ मन माफी मांगिन । उही दिन ले अन्याय या दोष या सजा  ले बाँचे बर , सियान ले पहिली , असल बात ला देश अऊ समाज के आगू लनइया मन बर , चोर ले मोटरा उतियइल .. हाना बनगे । 

                                                            हरिशंकर गजानंद देवांगन  छुरा .

साहित्यकार मन के गिरौदपुरी धाम यात्रा..

 सुरता//

साहित्यकार मन के गिरौदपुरी धाम यात्रा..

    हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी म धर्म उपदेश देवत "मनखे-मनखे एक बरोबर" के जयघोष करइया गुरु घासीदास बाबा जी के जन्म भूमि, कर्म भूमि अउ तपो भूमि के दर्शन करे के अबड़ दिन के साध रिहिसे. फेर ए साध ह तब पूरा होइस, जब 2 अगस्त 2015 दिन इतवार के अखिल भारतीय गुरु घासीदास साहित्य अकादमी अउ मिनी माता फाउंडेशन द्वारा रायपुर के वरिष्ठ साहित्यकार मनला गिरौदपुरी के जन्म अउ कर्म भूमि,  तप भूमि छाता पहाड़ अउ पंचकुंड यात्रा के संगे-संग माता शबरी के धाम शिवरीनारायण के घलो एक संग दर्शन करवाए गिस. 

   साहित्यकार मन के ए आध्यात्मिक यात्रा म छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त साहित्यकार डाॅ. सुशील त्रिवेदी, सद्भावना दर्पण के संपादक साहित्यकार गिरीश पंकज, सृजन गाथा डाट काम के संपादक जयप्रकाश मानस, डॉ. सुधीर शर्मा, अजय किरण अवस्थी, सुशील भोले, प्रवीण गोधेजा, मुकेश वर्मा के संगे-संग यात्रा के आयोजन संस्था डहर ले डॉ. जे.आर. सोनी अउ रामस्वरूप टंडन जी शामिल रहिन. 

    ए बात ल तो आज सबो जानत हें, वर्णव्यवस्था अउ मूर्ति पूजा के नांव म ए देश म जब भेदभाव अउ अत्याचार अपन चरम म पहुंचत गिस, तब कतकों महात्मा अउ गुरु मन पीड़ित वर्ग के उत्थान खातिर जबर अभियान चलाए रिहिन हें. ए रद्दा म गौमत बुद्ध, गुरु नानक देव ले लेके कबीर दास जी जइसे महान विचारक अउ समाज सुधारक मन सामाजिक अउ धार्मिक जागरण कर के पीड़ित वर्ग के लोगन ल आध्यात्मिक अउ सामाजिक ताकत देइन. अइसने हमर छत्तीसगढ़ राज म गुरु घासीदास जी ह सतपुरुष के उपासना करत शोषित पीड़ित अउ उपेक्षित लोगन ल एकफेंट कर के सामाजिक उत्थान के जबर बुता करे रिहिन हें.

  गुरु घासीदास जी के जनम के संबंध म जेन जानकारी मिलथे, वोमा सबले जादा प्रमाणित शासकीय तौर म लिखे गजेटियर ल माने जाथे. सन् 1993 म लिखे गे रायपुर जिला के गजेटियर के अनुसार गुरु घासीदास जी के जनम अगहन पूर्णिमा दिन सोमवार 18 दिसंबर 1756 ई. के एक कृषक परिवार म ग्राम गिरौदपुरी जिला -रायपुर (अब बलौदाबाजार) म होए रिहिसे. घासीदास जी के पूर्वज पवित्र दास जी संपन्न किसान रिहिन. पवित्र दास ले मेदिनी दास, दुकालु दास, सगुन दास, मंहगु दास अउ फेर घासीदास जी होइन. घासीदास जी के पीढ़ी ल 1756 ले 1850 तक माने गे हे. घासीदास जी के बिहाव सिरपुर निवासी किसान अंजोरी दास जी के बेटी सफुरा संग नान्हेपन म होगे रिहिसे. उंकर चार बेटा अउ एक बेटी होइन. बेटा म अमरदास, बालकदास, आगरदास अउ अड़गढ़िया दास होइन. बेटी के नांव सुभद्रा बाई रिहिस, जेकर बिहाव बिलासपुर जिला के गाँव कुटेला म होए रिहिसे.

   हमन 2 अगस्त'15 के बिहनिया 9 बजे रायपुर ले निकलेन. डॉ. जे.आर. सोनी जी हमन ल रस्ता म जावत खानी बतावत रिहिन हें, रायपुर ले सीधा गिरौदपुरी जाबो. पहिली जन्मभूमि के दर्शन करबो, फेर कर्मभूमि जाबो. उहाँ कुतुबमीनार ले भी ऊंचा जेन जैतखाम बने हे, वो सबला देखत फेर दुसरइया जुवर बाबा जी के तपोभूमि छाता पहाड़ जाबो तहाँ ले उहिच डहर ले बार नवापारा अभ्यारण होवत  वापिस रायपुर आ जाबो.

    हमर मन के गिरौदपुरी के पहुंचत ले मंझनिया के 12 बजगे राहय. उहाँ गेन त पता चलिस के जन्मभूमि तक बड़का गाड़ी मन नइ जा सकय, तेकर सेती रेंगत जाए बर लागही. अगस्त के महीना माने पानी-बादर के दिन. रेंगत गेन त गली म पानी रेंगे के चिनहा दिखत राहय. जन्मभूमि जगा पहुंचेन, त वोकर आगू म एक चौंरा असन बने रिहिसे, जेमा एक जैतखाम अउ एक बोर्ड गड़े रिहिसे. बोर्ड म गुरु घासीदास जन्म स्थान लिखाय रिहिसे. हमन ल लागिस के इही जन्मस्थान आय. तब सोनी जी बताइन, ए ह जन्मस्थान वाले घर के बाहरी भाग आय. एदे जेन घर दिखत हे न वोकर अंदर हे जन्मस्थान ह. काहत हमन ल घर के भीतर लेगिन. उहाँ घर के भीतर एक झन नोनी भर राहय, जे ह जेवन बनावत राहय. हमन ल उहाँ आए देखिस त वो नोनी ह बाबाजी जिहां जन्म लिए हें, वो कुरिया म लेगिस. वो छोटे असन कुरिया म एक अखंड जोत जलत रिहिस. उही जगा एक कुर्सी म सादा कपड़ा ऊपर खड़ाऊ माढ़े रिहिसे. हमन वोकर दर्शन पैलगी करेन. तहाँ ले कर्मभूमि जाए खातिर निकल गेन.

    कर्मभूमि स्थल पहुंचेन, त लागिस, कोनो बड़का तीरथ-बरत म आगे हावन. जन्मभूमि अउ कर्मभूमि स्थल के विकास म अतेक अंतर कइसे हे? त सोनी जी बताइन, जन्मभूमि के देखरेख अउ सबो व्यवस्था ल उही घर वाला मन ही बिना ककरो सहयोग के खुदे करथें. जबकि इहाँ कर्मभूमि म एक ट्रस्ट हे जेन ह एकर देखभाल अउ विकास के काम करथे. तेकर सेती दूनों जगा के विकास म अतका अंतर दिखत हे. उन कहिन, फेर हमन कोशिश करत हवन के जन्मभूमि के देखभाल घलो एकाद समिति या ट्रस्ट के माध्यम ले हो जाय, तेमा उहू स्थान के गरिमामय विकास हो सकय. (ए लेख संग संलग्न जम्मो फोटो उही दिन के खींचे आय).

    सोनी जी के मार्गदर्शन म हमन कर्मभूमि ल अच्छा से देखेन-घूमेन, बाबा जी के आशीष लेन. तब फेर नवा-नवा बने विशाल जैतखंभ देखे बर गेन. तब वोकर विधिवत उद्घाटन नइ हो पाए रिहिसे, तेकर सेती उहाँ कोनो ल जाए के अनुमति नइ रिहिसे. तब सोनी जी उहाँ के व्यवस्था देखइया मन ल बताइन के, ए मन सब रायपुर के वरिष्ठ साहित्यकार आंय, हमन इनला विशेष रूप ले इहाँ के दर्शन कराए खातिर ही लाने हावन. त फेर सिरिफ हमन ल ही विशाल जैतखंभ म जावन दिन. जैतखंभ म ऊपर चढ़े खातिर लिफ्ट तो लगे रिहिसे, फेर उद्घाटन नइ होए के सेती वो ह चलत नइ रिहिसे. त फेर हमन दर्शन करे बर आए हावन त वोकर महत्व तो रेंगत जवई म ही हे, काहत रेंगत ही पूरा ऊपर तक चढ़ेन.

   जैतखंभ के नीचे उतरत ले बनेच बेरा होगे राहय, त सोनी जी कहिथें- चलौ पहिली कोनो जगा जेवन कर लिए जाय, तेकर पाछू फेर आगू के रद्दा धरबोन. वोमन बताइन के इहाँ ले बस थोरके दुरिहा म महानदी के पुलिया हे, जेन ह बलौदाबाजार अउ जांजगीर जिला ल जोड़थे, उही जगा बढ़िया असन ढाबा हे, तिहां चलथन. 

   ढाबा म जेवन करत बेरा पता चलिस के ए पुलिया के वो पार तो शिवरीनारायण हे. त डॉ. सुशील त्रिवेदी जी कहिन, अरे अतेक लकठा आगे हावन त चलौ शबरी माता के ठउर के घलो दर्शन कर लेथन. 

     सबो झन हां म हां मिलाएन तहां ले शिवरीनारायण चल दिएन. उंहो बने देखेन किंदरेन. मैं पहिली घलो उहाँ गे रेहेंव, फेर मंदिर के भीतर गर्भगृह म नइ जा पाए रेहेंव. इहू बखत जब हमन उहाँ गेन त उहाँ के पुजारी मन गर्भगृह के भीतर जाए के कोनो ल अनुमति नइहे किहिस. फेर जब उनला बताए गिस के एमन सब रायपुर के साहित्यकार आंय, संग म छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे डॉ. सुशील त्रिवेदी जी घलो संग म हें, त फेर मुख्य पुजारी ह खुदे हमन ल भीतर लेगिस. उहाँ पहिली बार देखे बर मिलिस के भगवान शिवरीनारायण के पांव के नीचे म जलधारा प्रवाहित हे. पुजारी बताइस, के ए ह महानदी आय भगवान के चरण पखारे खातिर ए जगा स्वयं प्रकट होए हे.

   बेरा बनेच होए ले धर ले रिहिसे. सोनी जी कहिन के जल्दी चले बर लागही, काबर ते बाबा जी के तपोभूमि छाता पहाड़ ह बनेच दुरिहा हे. फेर उहाँ आप सबो साहित्यकार मन के आज के यात्रा अउ बाबा घासीदास जी के संबंध म वक्तव्य घलो लेना हे. असल म हमर मनके ए पूरा यात्रा के मिनीमाता फाउंडेशन द्वारा विडियो रिकार्डिंग करे जावत रिहिसे.

   हमन ल छाता पहाड़ के पहुंचत ले बनेच बेरा होगे रिहिसे, तभो बेरा बूड़े बर अभी बहुत जुवर बांचे रिहिसे. सोनाखान क्षेत्र के अंतर्गत अवइया ए ठउर म हमन ल आत्मिक शांति के अद्भुत अहसास होइस. छाता पहाड़ के दर्शन परिक्रमा करे के पाछू हमन वो पांच कुंड मनला देखे बर गेन, जेकर जल ल देके बाबाजी ह शारीरिक मानसिक असाध्य रोग ले ग्रसित लोगन ल उंकर ले मुक्ति देवावत रिहन हें. 

  मुंधियार होए असन होए ले धरिस, तब उही जगा के चातर जगा म हमन ल बइठार  के वो दिन के यात्रा अउ अनुभव के वक्तव्य रामशरण टंडन जी एंकर के रूप म लिन. सबो झन अपन- अपन अनुभव के बात बताइन. महूं अपन बात राखेंव, संग म मिनीमाता अउ छत्तीसगढ़ महतारी के बीच सामंजस्य स्थापित करत अपन एक गीत घलो सुनाएंव-

मोतियन चंउक पुराएंव जोहार दाई

डेहरी म दीया ल जलाएंव जोहार दाई

छत्तीसगढ़ महतारी परघाए बर

अंगना म आसन बिछाएंव...

   ए गाना ल सुने के बाद डॉ. त्रिवेदी जी मोला कहिन- सुशील आज के तो तैं ह मंच ल लूट लिए रे.

   दिन बुड़े ले धर ले रिहिसे तइसने हमन रायपुर वापसी खातिर निकलेन. आवत- आवत मन म ए चार लाईन गूंजे लागिस-

गुरु बाबा के कहना हे- मनखे-मनखे एक समान

सतमारग अउ सत बानी ले ही आही नवा बिहान

सब सिरजे हें एक जोति ले इहीच हमर पहचान

ऊंच नीच के भेद करत करथौ कइसे फेर अभिमान

(संस्मरण संग्रह "सुरता के संसार" ले साभार)

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

अगहन बिरस्पत म होथे लक्ष्मी दाई के बासा...

 अगहन बिरस्पत म होथे लक्ष्मी दाई के बासा...

    कार्तिक पुन्नी के बिहान दिन ले अगहन महीना लगथे। अउ अगहन महीना मा जउन दिन बिरस्पत परथे उही दिन हमर छत्तीसगढ़ म घरो घर अगहन बिरस्पत के परब ल बड़ उछाह ले मनाए जाथे। गजब मान गौन के संग लक्ष्मी दाई के पूजा करथें। 

   एकर तैयारी बुधवार के संझा बेरा ले घर के साफ सफाई, अँगना परछी कुरिया के लिपाई। घर के मुहाटी मा सुघर चउँक पुरके माईलोगिन  मन बने चउंक पुरथें, रंगोली बनाथें। लक्ष्मी दाई ल जेन जगा स्थापित करथें उहू जगा ला सफ्फा करके चाउँर पिसान ला घोर के चउँक पुरथें घर के चारों मुड़ा के साफ सफाई करके लक्ष्मी दाई के स्थापना करथें। सुघर आमा पान, फूल पान, नरियर, आँवला फल, आँवला पत्ती, केरा पत्ता,

अउ कंद मूल जिमी काँदा, धान के बाली मा सजा के कलश के स्थापना करथें। अउ बुधवारेच के रतिहा म सबो जूठा बरतन भाड़ा ला माँज धो के रखथें. घर मुहाटी ले लक्ष्मी दाई के वास (स्स्थापना स्थल) तक चाउँर पिसान के सुघर पांव के छापा बनाथें। राते मा माता करा दीया बार के रखथें।

    बिरस्पत के मुँधरहा ले घर के माईलोगिन मन उठ जाथें, नहा धोके घर के दुवारी, रंगोली अउ तुलसी चौंरा मा दीया बारथें। दीया बार के घर के दरवाजा ला खुल्ला राखथें। जेन हा दिन भर खुलेच रहिथे। पूजा पाठ करके माईलोगिन मन उपास घलो रहिथें अउ लक्ष्मी दाई के ध्यान मा मगन रहिथें। 

    ये पूजा के एक ठन अउ खास बात हवय, बुधवारे के दिन महिला मन अपन अपन घर मा सबो मनखे ला चेता के रखे रहिथे आज चुंदी, नाखून नइ कटाना हे, साबुन से नहाना नइ हे, बाल नइ धोना हे, पइसा खरचा भी नइ करना हे, कपड़ा लत्ता धोय के मनाही हे कहिके चेताँय रहिथें। माने भारी नियम धियम माने बर परथे। माईलोगिन मन सुघर नवा नवा लुगरा पहिन के टिकली, माँहुर, काजर आँज अपन आप ला सुंदर अउ स्वच्छ बनाय रखथें। ये दिन पीला फल, पीला कपड़ा,  पीला भोग के बड़ महत्व रहिथे। दान मा केला फल, भोग मा चना के दाल ला बड़ शुभदायी मानथे।

     पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक पुन्नी के साथे मा अगहन के शुरुआत हो जथे, माईलोगिन मन अपन घर के सुख समृद्धि अउ यश, धन खातिर माता लक्ष्मी के आराधना करथें। येकर पीछू मान्यता इही हे के माता लक्ष्मी अगहन महीना मा क्षीरसागर ले निकल के पृथ्वी लोक मा विचरण करत रहिथें। जेन मन धरम करम से माता के पूजा पाठ करथें तेकर घर आके वोहा वास करथे। अउ ओकर घर मा सुख, शाँति, समृद्धि अउ ऐश्वर्य के वास हो जथे। इही मान्यता खातिर ये तिहार ला हमर छत्तीसगढ़ म घलो नियम धियम अउ पारंपरिक रूप ले मनाये जाथे। ये दिन लक्ष्मी पूजा के संगे-संग सुरुज देवता के पूजा, शंख के पूजा ल भारी फलदायी मानथें। अइसे मान्यता हावय सुरुज देव के किरण हा कीटाणु ला नष्ट कर देथे अउ शरीर ला निरोग बनाथे। तेकर सेती सब बिहनिया बिहनिया जल चढ़ाके आशीष माँगथें।

एक उछाह अउ बिश्वास के साथ अगहन बिरस्पत के परब ल महिला मन बड़ ऊर्जा अउ धरम करम अउ संयमित रहिके मनाथें। 

बोलो अगहन बिरस्पत की जय

लक्ष्मी दाई के जय🙏

सुशील भोले-9826992811