Saturday, 7 May 2022

कजरौटी**

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       **कजरौटी**

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      " बाबा जी के थैली म का-का चीज, लौंग, सुपारी, धतुरा के बीज।" येकर का मतलब ये तेकर कछु पता नइ रहय फेर तभो ले लईका मन ल येला खेले म बिकट मजा आथे। जइसे बाबाजी के थैली म दुनिया-जहान के चीज भरे रथे वइसने किसम ले अम्मा के बक्सा म न जाने का-का चीज भरे रहय। अम्मा,बाबूजी के दाई जऊन ल बाबूजी हर अम्मा कहय त सब कोई अम्मा कहन, अपन दाई ल माँ कहन,तेकर बाद बड़े दाई, बड़का दाई, कका दाई, बबा दाई, डोकरी दाई, नावा दाई, जून्ना दाई, गिंया दाई,फूफू दाई, पता नहीं कतको रिश्ता रहंय गांव म। अम्मा ल घलाव कइनो झन मन अइसने कछू-कछू कहंय। अम्मा के बक्सा खुले के हमेशा इंतजार रहय। अम्मा के बक्सा म रखे सामान मन ल देखे के उत्सुकता रहय। बक्सा के अंदर ले नावा-नावा जीनिस देखे बर मिलय। हमन पूछन; अम्मा तैं ये सब ल कहाँ ले लाय हावस, बाहर काबर नइ रखस? अम्मा कहय; ये सब तइहा जमाना के आय, अब चलन म नइ हे। फेर हमन ल तो सब हर नावा-नावा लागे। सब सामान मन के नाव सुनके बड़ा मजा आय अउ बड़ा अचंभा घलव होय। बिहान होय तहं ले अम्मा हर माँ मन के पाछू पर जाय ये लईका मन ल नउहा-धोवा देवा न ओ, पहिली नउहा-धोवा देवा तहं ले लईका मन अपन खेलहीं-कूदही तहं ले तुमन छूछिंधा अपन काम बूता ल करिहा। जइसे ही हमन जइसे ही नहा-धो के सकन तहं ले अम्मा हर कहय,लइका मन  ल काजर, पवडर लगा देवा, जा कजरौटी अउ पवडर डब्बा ल ले आन, लईका मन ल टीका लगा देवा, दिठौना ल बने लगा देबे, नजर व नइ लगही। अम्मा करा लोहा के बने लम्बा कजरौटी रहे। कजरौटी कहे त! काजर धरे के। अम्मा हर साल म एक घंव काजर बनाय जब निबौली  आय अउ ओकर तेल निकालंय। अम्मा करा एक ठन बड़े दिया रहय ओही म कपड़ा के लम्बा बाती लगा के लीम तेल ( नीम तेल ) ल भर दे अउ दिया ल बार के एक ठन माटी के खोपरा म ढांक दे। माटी के खोपरा म नानकन छेदा रहे जेमा ले हवा जाय अउ दिया हर जलत हे कि नहीं तेकरो पता चलत रहय। 

       अम्मा हर दिया ल आठ दस दिन ले बारे रहे। बीच-बीच म खोपरा म जमें केरवछ, कभू कइरछा कहे, तेला एक ठन बरतन म निकाल-निकाल के धरत रहे। दूसर तरफ घर के गाय के दूध ल जमों के मथ के ताजा घी बनावत रहे। जब ओकर जरुरत के हिसाब से कइरछा जमा हो जाय तंह ओला घर के ताजा शुद्ध घी म अच्छे से मिला के कजरौटी म भर दे अउ ओकर साल भर बर काजर तियार हो जाय। डॉक्टर ल जतका अपन अस्पताल म भरोसा नइ रहय; तेकर ले जादा अम्मा ल अपन कजरौटी म भरोसा रहे।कजरौटी निकलय त सबके आँखी म भर-भर के काजर, माथा के बीचोबीच बड़का गोल सूरुज अस टीका, माथा के कोना म चंदा बने रहय त गाल म घलव एकठन चँदैनी मार दैवे। कहय; देख अब अतका म कोनो नजर नइ लगांय। आँखी हर सुग्घर बड़े-बड़े दिखथे, आँखी के रोशनी बाढ़थे, आँखी नइ आय, घर के बनाय काजर के अंजन लगाबे त आँखी के घलाव अवरदा बाढ़थे। अब अम्मा नइ हे परंतु, ओकर कजरौटी आज भी खूंटी म टंगाय हे। कोनो उपयोग नइ करें लेकिन, ओकर हाथ के बने काजर आज घलव कजरौटी म भरे हे। 

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**अंजली शर्मा **

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ).

Friday, 6 May 2022

छत्तीसगढ़ी व्याकरण : वचन*


 

.      *छत्तीसगढ़ी व्याकरण : वचन*


 *परिभाषा* - शब्द के जेन रूप ले ओकर संख्या ( एक या जादा ) के बोध होथे, ओला वचन कहिथें।

  हिन्दी जइसन छत्तीसगढ़ी म घलो वचन के दू रूप होथे-


1) *एकवचन*- शब्द के जेन रूप ले एक व्यक्ति/वस्तु/पदार्थ के बोध होथे, ओला एकवचन कहिथें।जइसे- टूरा,टूरी, किताब,कुर्सी आदि।


2) *बहुवचन*- शब्द के जेन रूप ले एक ले अधिक व्यक्ति/वस्तु/पदार्थ के बोध होथे, ओला बहुवचन कहिथें। जइसे- टूरा मन, घोड़ा मन आदि।


         *वचन के रूपान्तरण-*


1) छत्तीसगढ़ी बहुवचन के रचना म ' *मन*' शब्द के *प्रत्यय* के समान प्रयोग बहुप्रचलित हे।जइसे-

   *एकवचन*             *बहुवचन*

      लइका               लइका मन

      मनखे                मनखे मन

      घोड़ा                 घोड़ा मन


2) छत्तीसगढ़ी बहुवचन के रचना म *सबो/सब्बो, जमो/जम्मो* के *उपसर्ग* के समान प्रयोग बहुप्रचलित हे। जइसे-

   *एकवचन*             *बहुवचन*

       खेत                 सब्बो खेत

       आदमी           जम्मो/जमो आदमी

        टूरा                सब्बो/सबो टूरा


3) कई बार बहुवचन बनाय बर *गंज,खूब, बढ़ियन*' आदि शब्द के प्रयोग *उपसर्ग* के समान( शब्द के पहिली ) छत्तीसगढ़ी म करथें। जइसे-

   *एकवचन*             *बहुवचन*

       घोड़ा                 गंज घोड़ा

      हिरनी                 खूब हिरन

      आदमी         बढ़ियन आदमी


4) कई बार *संख्यावाची विशेषण* अउ *संज्ञा* के बीच *झन/झिन, कन, ठन/ठिन* के प्रयोग बहुवचन बनाय बर छत्तीसगढ़ी म  करथें। जइसे-

आठ *झन* मनखे

कई *ठन/ठिन* पेड़

बहुत *कन* रोटी

सात *झिन* टूरी


5) कई बार द्विरूक्ति शब्द के बीच ' *च*' लगाके  बहुवचन बनाये जाथे। जइसे-

छेरी-च-छेरी (बकरियाँ ही बकरियाँ)

लइके-च-लइका (बच्चे ही बच्चे)


6) कई बार शब्द म ' *न*' जोड़ के बहुवचन बनाये जाथे। जइसे-

लइका(एकवचन), लइकन(बहुवचन)


7) कई बार बहुवचन के भाव प्रदर्शित करे बर ' *पंचन* ( लोग )' के प्रयोग किये जाथे। जइसे-

हम पंचन ( हम लोग )

तुम पंचन ( तुम लोग )

ऊन पंचन ( वे लोग )


8) कुछ शब्द मन के एकवचन अउ बहुवचन एक समान होथें। जइसे-

कुरिया ( घर ), आदमी, तलाव,डंडा, भालू आदि।


 *निष्कर्ष* - छत्तीसगढ़ी म सामान्यतया बहुवचन बनाय म संज्ञा शब्द म विकार उत्पन्न नि होय अर्थात संज्ञा शब्द अपन मूल रूप म बने रहिथे अउ ओमा उपसर्ग या प्रत्यय के समान आघू या पाछू शब्द जोड़ के बहुवचन बनाय जाथे। छत्तीसगढ़ी म बहुवचन बनाय के प्रक्रिया अत्यन्त सरल हे जबकि हिन्दी म बहुवचन बनाय म संज्ञा शब्द म विकार उत्पन्न होथे।



    - डाॅ. विनोद कुमार वर्मा

कहानीकार, समीक्षक, संपादक


मो.  98263-40331

ईमेल.  vinodverma8070@gmail.com

Tuesday, 3 May 2022

खेती किसानी के नवा बच्छर अकती तिहार म पुतरी-पुतरा बिहाव के परम्परा


खेती किसानी के नवा बच्छर अकती तिहार म पुतरी-पुतरा बिहाव के परम्परा


- दुर्गा प्रसाद पारकर


छत्तीसगढ़ी लोक कथा के मुताबिक बहुत दिन पहिली के बात आय जब रतनपुर के राजा के दरबार म कतको सौंजिया, बइला चरवाहा अउ दरोगा कस कतको कमइया मन सेवा बजाये। कमइया मन के मारे राज दरबार ह भरे-भरे लागे। इहें बइठमल नाव के एक झिन नौकर घलो राहय। निच्चट कोड़िहा राहे बइठमल ह। एकर अलाली ह राजा के आंखी म पहिलीच्च ले खटकत रीहिस हे। उपराहा म एक दिन बइठमल ह दरबार ल बहारे-बटोरे बर बिसर डरिस। दरबार म कचरा ह जतर कतर बगरे राहे। राज दरबार के हालत ल देख के राजा ह बइठमल उपर बिफड़गे। गुस्सा गुस्सा म ओकर हिसाब-किताब घलो कर दिस। का करे बिचारा बइठमल के आंखी ले चिंता के आंसू ह तरतर-तरतर गिरे बर धर लीस। रोवत-रोवत गरीब ह दरबार ले घर जाए बर निकल गे। एकर सिवा तो कोनो अउ चारा नइ रीहिस हे। बइठमल के व्याकुल दशा ल ओरख के रानी ह धरा पसरा राजा करा जा के कथे-बइठमल ल काबर खिसिया देव जोड़ी? दरबार ल नइ सफ्फा करीस तेकर कारण मंय हंव। गलती तो मंय करे हंव राजा जी, जउन भी डाड़ लेना हे मोर ले लेव मोर गलती के सजा बइठमल ल काबर देवत हव। रानी ल अपन सांखी तीरत देख के बइठमल ह घलो लहूट के राजा के चरण ल किटकिटा के धर के विनती करे ल धर लीस। महराज मंय ह रानी दाई के बुता म लगे रेहेंव तिही पाए के दरबार के सफाई करे म बि‍लम होगे। गलती तो मोर ए सजा मोला देव रानी ल झन डाड़व कहि के घर चल दिस बइठमल ह। अकती के दिन सब नौकर चाकर ल बला के राजा किहिस-आज तुंहर दिन पुरगे। अब तुंहर छुट्टी होगे। जिंहा तुंहर कमाए के मन होही उहां कमाहू रे भई मोर डाहर ले कोनो बंधन नइ हे। मोर दरबार म कमाए बर होही ते तुंहला जम जही त चोंगी माखुर झोंक लेहू। राजा के फैसला सुनत नौकर मंत्री मन सुकुड़दुम होगे। सब झिन मुंह ओथरा के अपन-अपन घर चल दिन। बिन कमइया के दरबार ह खाए बर दउंड़े। भांय-भांय लागे। अब न राजा रानी मनके मन माड़े न नौकर चाकर मन के काबर कि राजा ह परजा ल संतान कस मानय। काबर कि‍ ओ समे उंकर एको झिन लोग लइका न राहे। कमइया अउ कमेलिन मन के मुंह ल देख के जीयत रीहिन हे। अपन दुख ल कोन ल बताए राजा-रानी मन। परजा के नजर म तो राजा-रानी सुख भोगत हे। ओती रानी ह संतान के दुख म बोमफार के रोवत राहे। रानी के आंसू निकलय एती राजा दुख ल पीयय। राजा ह रानी ल समझावत कथे-कइसे करबो रानी जउन भाग म नइ हे ओकर बर का रोना। अब तिंही बता हमर हिरदे ल कइसे संतोष होही। रानी ह अचरा म आंसू ल पोसत कथे-जोड़ी एसो मंय पुतरी-पुतरा के बिहाव मड़ाहूं तभे मोर मन ह माड़ही। राजा हामी भर देइस। सबो नौकर चाकर मन ल बिहाव निपटाए बर बलाथे। बिहाव झरे के बाद फेर बच्छर बर कमइया मन चोंगी माखुर झोंकथे। ए लोक कथा के मतलब ए होइस के अकती के दिन पुतरा-पुतरी बिहाव के चलन इही समे ले होइस होही।

नान-नान लइका मन छोटे-छोटे अपन बेटा-बेटी पुतरा-पुतरी के बिहाव बड़ा धूमधाम ले करथे। घर म बिहाव के बखत नेंग जोग के मुताबिक पुतरा-पुतरी के बिहाव करथे। बिहाव खातिर लइका मन सेकला के चंदा बरार के पुतरा-पुतरी बिसाथे। खरचा करे के बाद आधा मन बेटी वाले अऊ आधा मन बेटा वाले के धरम निभाथे। अकती के दिन एके दिन म तेलमाटी, चुरमाटी, मायन, पाणीग्रहण सबो ह निपट जथे जेन ल देख के आज के समे म खर्चीला बिहाव ले बांचे जा सकत हे। बाजा बर थरकुलिया, सुपा, टुकनी अउ कटोरा के जब उपयोग करथे त ए दृश्य ह देखते बनथे। लइका मन सही के बिहाव कस पुतरा-पुतरी के बिहाव ल निपटाए के प्रयास करथे भले गीद के अर्थ जाने या न जाने। लइका मन के मुंह ले जब भड़ौनी गीद ल सुनबे त हांसे बिना नइ रहीबे। जइसे-


खाए बर मखना पिराए बर पेट रे,

का लइका बियाए समधीन हंसिया के बेठ रे।

बड़े-बड़े रमकलिया चानी बीच म गुदा भराए रे,

हमर समधीन चटक चंदैनी घर-घर गोसइया बनाये रे।

नदिया तीर के पटवा भाजी उलव्हा उलव्हा दिखथे रे,

महासमुंद के टूरा मन ह बुढ़वा बुढ़वा दिखथे रे।

नदिया तीर के पटवा भाजी पटपट-पटपट करथे रे,

धमतरी के टूरा मन ह मटमट-मटमट करथे रे।


मड़वा बर बांस के जघा कमचील नही ते बेसरम लकड़ी, करसा के जघा चुकिया, दूलहा बर धोती ल चीर के कुरता, धोती बनाथे अउ पुतरी ल जुन्ना लुगरा के आंछी ल चीर के परिहाथे। सिकारी मन पुतरा-पुतरी बर नान-नान तेलचघनी अउ माई मउंर बनाये रथे। लइका जात भगवान के रूप। पुतरा-पुतरी के बिहाव म सबो जात के लइका मन संघर सकथे। छत्तीसगढ़ म कौमी एकता के सबले बढ़िहा उदाहरण पुतरा-पुतरी के बिहाव आय।

पंगत घलो होथे। लइका मन के उछाह ल देख के सियान मन उंकर काम म हाथ घलो बंटा देथे। जब टिकावन परथे त सियान मन अपन लइका मन बर नता देख देख के गीद गाथे-


इही धरम ले धरम ए वो

आ वो मोर दाई फेर धरम नइ तो पाबे वो

लागत रेहे छूटी डोर वो

आ वो मोर दाई तीनो तिलीक जीत डारे वो

आ वो मोर दाई चना खाए बर पइसा देवे वो...


बइसाख के अंजोरी पाख के तीज के दिन अक्षय तृतीया ल छत्तीसगढ़ म बड़ा धूमधाम ले मनाए जाथे। गोवर्धन श्रीवास बताये रिहिस हे कि बहुत साल पहिली लोहरसी गांव के कड़रा पारा म काकरो घर बिहाव नइ लगीस त पारा वाले मन बड़ा धूमधाम ले पुतरा-पुतरी के बिहाव अकती के दिन करे रीहिस हे। अकती के दिन कोनो डाहर दिशा नइ राहे तिही पाय के ए दिन के भांवर ल बड़ शुभ माने गेहे।

अकती के दिन कोठी के खाल्हे गोड़ा के आगु चार ठन माटी के ढेला उपर करसा म पानी भर के परई तोप के मड़ा देथे। जेकर ले बरसा के जानबा होथे। जउन किसम ले सावन म पूरब दिशा ले अउ भादो म पश्चिम दिशा ले हवा चले ले दुकाल परे के संभावना रहिथे उही किसम ले जउन तनी के ढेला सुक्खा रथे ओ दिशा म बरसा कम होय ले अंकाल परे के संभावना जादा रथे। तिही पाए के अकती के दिन पानी गिरई ल सुकाल के सूचक माने गे हे। जेन गांव म पानी नइ गिरिस उहां सियान मन के पाके चूंदी जान डरथे कि एसो के दिन बादर ठीक नइहे।

किसान मन के नवा साल अकती ले शुरू होथे। तिही पाए के किसानी बूता के जोरा इही दिन ले करथे जइसे पेरा धरई, छेना धरई, धान बोवई के मुहतुर घलो अकती के दिन ले होथे। मउंहा पान के दोना म अपन-अपन कोठी ले धान भर के गांव भर के किसान ठाकुर देव म चघाथे। पूजा पाठ करके बइगा ह पांच झन कुंवारा टूरा मन के हाथ ले कुदारी म कोड़ के सबले पहिली धान बोए के नेंग करवाथे। एकर बाद सबो किसान दोना के धान ल खेत म बो के बांवत के शुरुआत करथे। किसान मन जब बांवत करके घर पहुंचथे त कोतवाल ह गोबर कचरा, पानी कांजी करे बर हांका पारथे। घरो घर तेलई बइठथे। घर के देवता के पूजा पाठ करके सुकाल के कामना करथे। मालिक मन नौकर-चाकर मन संग संघरा बइठ के खाना खाथे। जतका बन जथे मालिक नौकर मन ल उपहार भेंट कर के उंकर छुट्टी करथे। बिदा ले के पहिली नौकर चाकर मन घलो अपन भूल चूक बर माफी मांगे बर नइ चुके। जउन नौकर के मन इही मालिक घर कमाए के रहिथे उमन धरमउत एक दिन अउ कमाथे जेकर ले मालिक ह नौकर के इरादा ल जान डरथे। छत्तीसगढ़ म ए बात विशेष तौर ले देखे बर मिलथे जे नौकर जउन मालिक घर जतके जुन्ना होथे ओकर मान ह जुन्ना धान कस बाढ़ जथे। ओकर ईमानदारी अउ जांगर के सोर दशो कोस तक लाम जथे। इहां तक ले कतको दाऊ मन घर तो यहू देखे बर मिलथे के जम्मो किसानी के देखरेख ल जुन्ना नौकर के मार्फत रहीथे। इहां तक ले ए नौकर के सलाह ल दाऊ मानथे अउ बात ल बनिहार मन मानथे। कतको जघा यहू देखे बर मिलथे कि जउन नौकर ह फागुन म काम छोड़थे वोहा अकती म काम करथे अउ अकती म काम छोड़थे वोहा पंदरा महीना दिन म चोंगी माखुर झोंक के काम धरथे। अकती पानी पाए रथे तेन ह बड़ भागमानी होथे काबर कि पीतर पाख ले अकती तक सरग सिधारे मनखे ल पानी दे जाथे। जउन चोला अकती ले पीतर पाख के बीच इंतकाल होही ओला अकती पानी नइ देवय। सबले महत्वपूर्ण बात ए हे कि जब तक ले अकती पानी नई पाही तब तक ले ओला पीतर नइ मिलाए जाये।


दुर्गाप्रसाद पारकर


किसानी के नवा बछर-अकती तिहार


 

किसानी के नवा बछर-अकती तिहार


हमर छत्तीसगढ़ राज म बारो महीना अब्बड़ तिहार होथे। तिहार मनखे के जिनगी म नवा उसाहमंगल,नवा बिचार,नवा कारज करे के पबित्र संदेश देवत रथे। तिहार मनखे के थके-हारे मन म जोस,उमंग भर देते अउ वोला अपन जम्मो थकान ल भुला के तिहार के रंग म अंतस ले बुड जाथे। मने तिहार मन ह टानिक के काम करथे। पहिली के बुजरुग मन तिहार के संरचना ल बड़ा सोच-बिचार के बनाये हे।


अइसन हमर किसानी जीवन म एक ठन परमुख तिहार मनाथन अकती तिहार, जेला भगवान परशुराम के जयंती के नाव के घलो जानथे। ये तिहार बैशाख महीना के अंजोरी पाख म तिसरैया दिन बड़ा धूमधाम ले जम्मो खेती-किसानी ले जुड़े किसान भाई मन मनाथन। अक्ति तिहार ल अब्बड़ शुभ दिन माने जाथे। एकर सेती ग्रामीण जनजीवन म खेती-किसानी के शुरुआत घलो इहि दिन हो जाथे।


सबले पहिली बिहिनिया ले घर के साफ-सफाई,पिवरी-करिया म लिपई-पोतई दाई-माई मन कर डारथे। घर के सियान ल परसा पाना के तीन पनिया दोना म धान भरके हाँका परही तहन ले गांव के मातादेवाला म ठाकुर देव कर लेज के चढ़ा देथे। जेला गाड़ा ले जाना घलो कहिथे। गांव भर के धान ल बैगा मिला देथे,पीछू इहि धान ल फेर सबो झन ल दोना म घर लेजे बर देथे। बैगा हुम-धूम,पूजा-पाठ,नरियर-फाटा चढ़ा के सुमरत अरजी-बिनती करथे कि देख ठाकुर देव महाराज ऐसो हमर खेत-कोठार ल अन्न-धन ले भरपूर करबे। 


अकती तिहार ले किसानी के शुरुआत होथे एकर परतीक रूप म मातादेवाला म सकलाय लइका मन ल नंघरिया मानत लोहा के फाल, लकड़ी ले जुताई करवाके धान ल बोथे। हंसी मजाक करत सियान मन बरसा अउ सिचाई रूप म टीपा के पानी ल नंघरिया लइका मन ल डारत जाथे। लइका मन घलो पानी ले बांचे बर जोर-जोर ले रेंगे लगथे। अइसन बेरा ल देखके लइका सियान अब्बड़ सुख अउ मजा पाथे। सबो कारज होय के बाद परसाद ल बांट के खाथे अउ दोना म धान धरके घर आथे। जेला गाढ़ा लाना कथे।


घर के मुहाटी म पहुचे के बाद सियान ल चिल्लाथे, गाढा आगे पानी लावव ओ। घर के माई-लोगन मन लोटा म पानी धरके आथे अउ मुहाटी म रितो देथे,मने आये धान के सुआगत करथे। आरती उतारे के बाद ओला घर के भीतरी देवता खोली म पूजा पाठ करके रख देथे। फेर पीछू कुदारी, छेना आगी,हुम,उगबत्ती धरके दोना के धान ल खेत म बोये बर जाथे। खेत के कोई कोंटा म हुम-धूप देवत धरती माता ल सुमरत ये धान ल कुदारी म खन के बोये जाथे,अउ अन्न-धन बने होय कहिके अरजी-बिनती करथे। जेला मुड़ छोरना कहे जाथे।


खेती किसानी के शुरुवात इहि दिन ल हो जाथे। घर के जम्मो झन फेर खेत के कांटा-खुटी, लकड़ी,डारा-पाना के जलाथे अउ कांद-बूटा, दूबी मन ल निकाले के शुरू कर डारथे। खेत के सफाई के काम शरू होथे। घुरवा के कचरा ल गाडीबैला निहिते टेक्टर म निकाल के खेत म बिगराये के चालू हो जाथे।


तिहार के दिन नवा करसा म पानी लान के चार ठन माटी के ढेला म मढ़ा देथे। येकर ले हमर सियान म परसो पाथे कि ऐसो पानी-बादर कइसे हे, अउ कोन दिशा ले ऐसो पानी आही। जेती के ढेला पानी म भीज के घुरथे ओ दिशा ल ऐसो  पानी आहि कहिके अंदाजा लगाथे ये पहिली के सियान मन के परखे बर जोतिस बिद्या सही हे।


अकती तिहार म अपन सरग सिदारे पुरबज मन ल सुरता करे के दिन आये। ये दिन तरिया म नहाये के बाद  परसा पान अउ उरीद दार ल चढ़ा के उंकर सुरता करत पांच-सात बार ले पानी देवत किरतगय होथे। जेला सियान ल पानी देवई कथे।


अकती तिहार म गांव म पुतरा-पुतरी के बिहाव घलो रचाये जाथे। ये कारियाकरम म लइका-सियान सबो झन भीड़े रहिथे। संझा कुन माटी के नहिते कपड़ा के दूल्हा-दुलही बनाके तेल-हरदी,नचौडी, बरतिया,भांवर, टिकावन सबो रसम ल पूरा करथे। ये परतीकात्मक रूप म होथे पर सबो बिहाव के नेंग ल पूरा करत आनन्द के माहोल बनाके सुख पाथे।


हमर गरामिन अंचल म अकती तिहार के दिन अब्बड़ बर-बिहाव घलो मंगल दिन मानत मढ़ाये रथे। ये तिहार के दिन बिहाव करथे तेन ल दिन तिथि, मुहूरत देखे के जरूरत नई पड़े,ऐसे मानता चले आवत हे।


गांव के मनखे मन बिना अकती तिहार माने बिना परसा पाना ल नई तोड़े। काबर के परसा पाना म ही तो हमर किसानी के धान ठाकुर देव ले आथे कहिके। ये हमर प्रकृति परेमी अउ जंगल म मान करे के बात आय। बाद म मोरा छाये बर अउ घर म पनपुरवा रोटी,खेत जवैया में साग-पान लेजे बर तोड़ते।


किसान मन बर अकती के तिहार उंकर खेती किसानी बर नवा बछर जइसन होथे। किसान मन ये दिन कोई गांव-गवतरी नई जावे। कतरो जरूरी बुता ल नई करे। अउ करही त अपन तिहार ल पूरा मनाये के बाद। येकर ले साफ हे कि किसान मन बर कतिक महत्व के तिहार हरे। इहि दिन ले किसान ह अपन खेत बर बिजहा,नांगर,जुड़ा,कोप्पर, दातारी ल सुधारे के चालू कर देथे।

 

अकती तिहार गरामिन संस्कृति म अन्तस् ले रचे बसे हे। कृषक समाज म येकर महत्व अउ बड़ जाथे। तिहार मनाये के पीछू किसान अपन खेती-किसानी म नंगत के भीड़ जाथे।



                 हेमलाल सहारे

      मोहगांव(छुरिया)राजनांदगांव

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Monday, 2 May 2022

अक्ती तिहार म विशेष लेख...



 

अक्ती तिहार म विशेष लेख... 


कृषि संस्कृति ले जुड़े परब हरे अक्ती 


हमर देश हा कृषि प्रधान देश हरे. किसान हा देश के रीढ़ के हड्डी हरे. किसान ह जाँगर टोर के कमाथे अउ भुइयाँ के संग मितानी बध के खूब सेवा जतन करथे. वइसने हमर छत्तीसगढ़ हा घलो कृषि प्रधान  राज्य होय के कारण" धान के कटोरा " कहलाथे. हमर देश अउ प्रदेश के कतको तिहार हा खेती किसानी ले जुड़े रहिथे. अक्ती तिहार के संबंध घलो खेती किसानी से जुड़े हवय. 


    ठाकुर देव मा नेंग जोग करे जाथे 

   अक्ती तिहार बैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) के दिन मनाय जाथे. अक्षय माने जेकर क्षय (नाश) नइ होय. ये दृष्टि ले अक्षय तृतीया जेला हमर छत्तीसगढ़ म अक्ती कहे जाथे गजब पवित्र दिन आय. येहा किसान मन के द्वारा मनाय जाने वाला पहिली तिहार हरे. अक्ती दिन किसान मन परसा पान मा धान भरके ठाकुर देव मा ले जाथे. फेर ऊहाँ गाँव भर के प्रमुख सियान मन के उपस्थिति मा बइगा हा विधि विधान ले पूजा करथे.  ग्रामीण संस्कृति म बइगा के गजब महत्व हे. येकर पाछू कारण हे कि साल भर किसान मन ऊपर कोनो ढंग परेसानी झन आवय. ठाकुर देव मा चढ़ाय परसा पान के धान ला किसान मन खेत मा जाके सींच देथे अऊ कुदारी मा खन के ढंक देथे. ये प्रकार ले अक्ती परब हा खेती किसानी शुरु होय के संकेत देथे. 


किसान मन हा खेत के कांटा खूटी ला रापा, टंगिया के माध्यम ले साफ करे के शुरु कर देथे. येकर ले जऊन दिन नंगरिहा हा नांगर जोतही त बने बने जोत सकय अऊ बइला मन के खूर ला घलो झन गड़य. खेत के कांद बूटा ला रापा, कुदाली मा खन के चतराथे. 

  किसान हा बइला गाड़ी मा अऊ अब बदलत जमाना मा ट्रेक्टर ले घुरुवा के खातू (खाद) ला खेत मा लेगके कुढ़ी गांज देथे. जउन ला धान बोय के पहिली बगराय जाथे. 

     किसान मन खेती किसानी ले जुड़े औजार नांगर बख्खर के बने तइयारी कर लेथे. बढ़ई अउ लोहार कर ले जाके बनवाथे. येकर ले जब बरसा चालू होथे ता धथवाय ला नइ पड़य. किसान मन अपन कच्चा मकान के खपरा ला जानकार मन ला बुला के खपरा लहुँटाय के काम करवा लेथे जेकर 

ले बरसात मा परेशानी झन होवय. 


 पुतरा -पुतरी के बिहाव होथे 


   अक्ती के दिन सुग्घर ढंग ले लईका मन पुतरा -पुतरी के बिहाव 

करथे. येकर तइयारी लइका मन हा एक सप्ताह पहिली ले करत रहिथे. येमा बड़का मन घलो लइका मन के सहयोग करथे और ऊंकर खुशी मा  शामिल  होथे . लइका मन के उछाह ह देखते बनथे. शादी- बिहाव मा अक्ती भांवर हा गजब शुभ माने गेहे. हमर छत्तीसगढ़ म अक्ती के दिन नंगत के बिहाव होथे. 


 अक्ती के दिन के अड़बड़ महत्तम हावय  . इही दिन माँ गंगा हा धरती मा अवतरित होइस. महर्षि परशुराम, माँ  अन्नपूर्णा के जनम होय रिहिस. कुबेर ला खजाना मिले रिहिस अऊ सूर्य भगवान हा पांडव मन ला अक्षय पात्र देय रिहिस. संगे संग महाभारत के लड़ाई के अन्त होय रिहिस. महर्शि वेद व्यास हा महाभारत के रचना के शुरुआक अक्ती के दिन भगवान गणेश जी के साथ करे रिहिस. अऊ कतको प्रसंग अक्ती तिहार ले जुड़े हावय. ये ढंग ले अक्ती तिहार के अड़बड़ महत्तम हे. 


       जय जवान, जय किसान .

       जय छत्तीसगढ़ महतारी .

       आप जम्मो झन ला अक्ती तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई अउ  शुभ कामना हे .


                ओमप्रकाश साहू" अंकुर"  

 सुरगी, राजनांदगाँव

  मो.  7974666840


Sunday, 1 May 2022

छत्तीसगढ़ी व्याकरण : काल*

     


.      *छत्तीसगढ़ी व्याकरण : काल*


                             ( 1 )

                     

कोनो भी भाषा के व्याकरण म काल के बहुत महत्व होथे काबर कि एकर ले समय के बोध होथे।


 *परिभाषा*- *क्रिया* के जेन रूप ले ओकर होय के समय के बोध होथे; ओला काल कहे जाथे।


       *काल के तीन भेद हे*-


1) वर्तमान काल

2) भूतकाल

3) भविष्यत् काल


1) *वर्तमान काल-* जेन क्रिया के रूप ले कार्य के वर्तमान समय म होय के बोध होथे, ओला वर्तमान काल कहिथें। जइसे-


 # मैं पढ़थौं। ( मैं पढ़ता हूँ। )


2) *भूतकाल*- जेन क्रिया के रूप ले कार्य के समाप्ति के बोध होथे, ओला भूतकाल कहे जाथे। जइसे-


# मैं लिखेंव।( मैंने लिखा।)


3) *भविष्यत् काल* - जेन क्रिया के रूप ले भविष्य म होने वाला कार्य के बोध होथे, ओला भविष्यत् काल कहे जाथे। जइसे-


# मैं पढ़हूँ। ( मैं पढ़ूँगा।)


 *हिन्दी*,*छत्तीसगढ़ी* अउ *अंग्रेजी* म  वर्तमान काल, भूतकाल अउ भविष्यत् काल के विभिन्न रूप मन ला आघू लिखत हौं।


                          ( 2 )


# *जाना* क्रिया के संग *वर्तमान* *काल* के विभिन्न रूप ला देखव अउ गुनव।


अ) *सामान्य वर्तमान काल ( Present Indefinite Tense*)-


# मैं जाता हूँ।

    *मैं जाथौं।* 

    I go.


#हम जाते हैं।

  *हमन जाथन।* 

  We go.


# तुम जाते हो।

   *तुमन जाथौ* ।

   You go.


# मुस्कान जाती है।

   *मुस्कान जाथे।* 

   Muskan goes.


# वे जाते हैं।

   *ओमन जाथें*।

    They go.


ब) *अपूर्ण वर्तमान काल (Present Continuous Tense)*-


# मैं जा रहा हूँ।

   *मैं जावथौं। / मैं जावत हौं।*

    I am going.


# हम जा रहे हैं।

   *हमन जावथँन।/ हमन जावत हन।*     

   We are going.


# तुम जा रहे हो।

   *तैं जावथस।/ तैं जावत हस।*

    You are going.


# मुस्कान जा रही है।

   *मुस्कान जावथे।/ मुस्कान जावत हे।*

    Muskan is going.


# वे जा रहे हैं।

   *ओमन जावथें।/ ओमन जावत हें।*

    They are going.


स) *पूर्ण वर्तमान काल ( Present Perfect Tense* )


# मैं जा चुका हूँ।

    *मैं जा चुकेंव।*

    I have gone.


# हम जा चुके हैं।

    *हमन जा चुकेंन।*

    We have gone.


# तुम जा चुके हो।

   *तैं जा चुके हस।*/

   *तुमन जा चुके हव।*

    You have gone.


# मुस्कान जा चुकी है।

   *मुस्कान जा चुकिस हे।*

    Muskan has gone.


# वे जा चुके हैं।

   *ओमन जा चुकिन हें।*

   They have gone.


 द) *पूर्ण-अपूर्ण वर्तमान काल ( Present Perfect Continuous Tense*)


# तीन घण्टे से पानी बरस रहा है।

    *तीन घण्टा ले पानी बरसत हे।*

    It has been raining for three hours.


# वह दो घण्टे से गीत गा रहा है।

   *वोह/वो हर दू घण्टा ले गीत गावत हे।*

    He has been singing for two hours.


# मैं पाँच घण्टे से पढ़ रहा हूँ।

   *मैं/मैं हर पाँच घण्टा ले पढ़त हौं।*

   I have been reading for five hours.


# तुम दो घण्टे से खड़े हो।

   *तैं/तैं हर दू घण्टा ले खड़े हस।*

    You have been standing for two hours.


# वे लोग दो घण्टे से रामायण पढ़ रहे हैं।

    *वो मन दू घंटा ले रामायन बाँचत/पढ़त हें।*

   They have been reading Ramayan for two hours.


                          ( 3 )


 *लिखना* क्रिया के संग भूतकाल के रूप-


अ) *सामान्य भूतकाल(Past Indefinite Tense)*   


# मैंने लिखा।

    *मैं लिखेंव।*

    I wrote.


# हमने लिखा।

   *हमन लिखेन।* 

    We wrote.


# तुमने लिखा।

   *तैं लिखे हस।/ तैं लिखे।* 

    You wrote.


# राम ने लिखा।

    *राम लिखिस।* 

    Ram wrote.


# उन्होंने लिखा।

    *ओमन लिखिन।* 

    They wrote.


ब) *अपूर्ण भूतकाल ( Past Continuous Tense )* 


# मैं लिख रहा था।

   *मैं लिखत रहेंव/रेहेंव।* 

   I was writing.


# हम लिख रहे थे।

   *हमन लिखत रेहेन/रहेन।* 

    We were writing.


# तुम लिख रहे थे।

    *तैं लिखत रेहे/रहे।* 

   You were writing.


# राम लिख रहा था।

    *राम लिखत रहिस।* 

   Ram was writing.


# वे लिख रहे थे।

   *ओमन लिखत रिहिन/रहिन।* 

They were writing.


  स) *पूर्ण भूतकाल ( Past Perfect Tense )*


# मैं लिख चुका था।

   *मैं लिख डरे रेहेंव।/रहेंव।*

   I had written.


# हम लिख चुके थे।

   *हमन लिख डरे रेहेन/रहेन।*

   We had written.


# तुम लिख चुके थे।

   *तैं लिख डरे रेहे/रहेव।*

   You had written.


# राम लिख चुका था।

   *राम लिख डरे रिहिस/रहिस।*

    Ram had written.


# वे लिख चुके थे।

   *ओमन लिख डरे रिहिन/रहिन।*

    They had written.



द)  *पूर्ण-अपूर्ण भूतकाल (Past Perfect Continuous Tense)*


# तीन घंटे से पानी बरस रहा था।

    *तीन घंटा ले पानी बरसत रहिस।* 

    It had been raining for three hours.


# वह दो घंटे से गीत गा रहा था।

   *वोहा/वो हर दू घंटा ले गीत   गावत रहिस।* 

    He had been singing for two hours.

   

# मैं पाँच घण्टे से पढ़ रहा था।

   *मैं* */मैं हर पाँच घंटा ले पढ़त रेहेंव/रहेंव।*

   I had been reading for five hours.


# तुम दो घंटे से गा रहे थे।

   *तैं/तैं हर दू घंटा ले गावत रेहे/रहे।*

    You had been singing for two hours.


# वे लोग दो घण्टे से रामायण पढ़ रहे थे।

   *वो मन दू घंटा ले रामायन बाँचत (पढ़त) रिहिन/रहिन।*

   They had been reading Ramayana for two hours.


                          ( 4 )


.       *पढ़ना* क्रिया के संग *भविष्य काल*  के रूप


अ) *सामान्य भविष्य काल ( Future Indefinite Tense* )


# मैं पढ़ूँगा।

   *मैं पढ़हूँ।*

    I shall read.


# हम पढ़ेंगे।

   *हमन पढ़बो।*

   We shall read.


# तुम पढ़ोगे।

   *तैं पढ़बे।/तुमन पढ़हू।*

   You shall read.


# राम पढ़ेगा।

   *राम पढ़ही।*

   Ram will read.


# वे पढ़ेंगे।

   *ओमन पढ़हीं।*

   They will read.


ब) *अपूर्ण भविष्य काल ( Future Continuous Tense )*


# मैं पढ़ता रहूँगा।

   *मैं पढ़त रुहूँ/रहूँ/रइहूँ।*

   I shall be reading.


# हम पढ़ते रहेंगे।

   *हमन पढ़त रहिबो।* 

   We shall be reading.


# तुम पढ़ते रहोगे।

   *तैं पढ़त रहिबे।*

   You shall be reading.


# राम पढ़ता रहेगा।

   *राम पढ़त रिही/रइही।*

   Ram will be reading.


# वे पढ़ते रहेंगे।

   *ओमन पढ़त रिहीं/रइहीं।*

   They will be reading.


स) *पूर्ण भविष्य काल ( Future Perfect Tense )*


# मैं पढ़ चुका रहूँगा।

   *मैं* *पढ़ डारे/डरे  रहूँ/रुहूँ।*

   I shall have read.


# हम पढ़ चुके रहेंगे।

   *हमन पढ़ डरे/डारे रहिबो।* 

   We shall have read.


# तुम पढ़ चुके होगे।

   *तैं पढ़ डरे/डारे रहिबे।* या

    *तुमन पढ़ डरे/डारे रूहू।* 

   You shall have read.


# राम पढ़ चुका रहेगा।

   *राम पढ़ डरे/डारे रिही।* 

   Ram will have read.


# वे पढ़ चुके रहेंगे।

   *ओमन पढ़ डरे/डारे रिहीं।* 

    They will have read.


द) *पूर्ण-अपूर्ण भविष्य काल ( Future Perfect Continuous Tense* )


# कम से कम दो घण्टे से पानी बरसता रहेगा।

   *कम से कम दू घंटा ले पानी बरसत रइही।*

   It will have been raining for at least two hours.


# वह दो घण्टे से गीत गाता रहेगा।

   *वोहा/वो हर दू घंटा ले गीत गावत रइही।*

   He will have been singing the song for two hours.


# मैं चार घण्टे से पढ़ता रहूँगा।

   *मैं/मैं हर चार घण्टा ले पढ़त रइहूँ।*

   I will have been reading for four hours.


# तुम कम से कम दो घंटे से खड़े रहोगे।

   *तैं/तैं हर कम से कम दू घंटा ले खड़े रहिबे।* 

   You will have been standing for at least two hours.


# वे दो घण्टे से रामायण पढ़ते रहेंगे।

   *ओमन दू घंटा ले रामायन बाँचत ( पढ़त ) रइहीं।*

   They will have been reading Ramayana for two hours.



    - विनोद कुमार वर्मा

कहानीकार, समीक्षक, संपादक


मो.  98263-40331

ईमेल vinodverma8070@gmail.com




                              


छत्तीसगढी कहानी साध

          छत्तीसगढी कहानी           



                         साध 


फरवरी के महीना कतका सुग्घर होथे न गरमी अउ न जाड़, सबो चीज बरोबर। चारो मुड़ा खुशी के माहौल दिखथे। आमा मउर जाय रहिथे। ओकर सुग्घर महक ले अंतस भर खुशबू फैलत रहिथे। कोयली रानी अमराई मा आके सुग्घर गीत सुनाथे। फूल-फुलवारी तको अइसे लागते जइसे हाँसत-गोठियावत हे। लइका मन हर ये मौसम तको कतका खुश रहिथें। बाग-बगीचा मा जाके मगन हो के खेलत रहिथें। लइका होय या जवान या हो बुढ़ुवा सबके मन हर गदगदा जाथे। स्कूल ले पिकनिक जाय के अड़बड़ सुग्घर मौसम होथे ये हर। कईठन स्कूल के लइका मन दल के दल, बस, कार, जीप मा बइठ के कतिक सुग्घर हाँसत-मुस्कात पिकनिक जावत रहिथे। शहर-डहर के लइका मन जंगल डहर पिकनिक जाथे तब जंगल डहरके लइका मन ल शहर देखे के साध रहिथे तब शहर डहर पिकनिक जाथे। 

ये साल कोरोना के आय के सेती कोनो स्कूल के लइका मन पिकनिक नइ जा पावत हे। इही पाय के सब लइका मन चुटमुरा के रहिगे हें। पिंकी अउ शकुन कक्षा आठवी मा पढ़थे। पिंकी हर अपन कक्षा के कप्तान हरे तब शकुन हर सांस्कृतिक सचिव। शकुन हर पिंकी ला कहिस- ‘‘पिंकी ये साल कोरोना के सेती कोनो कार्यक्रम नइ हो पाइस। दू साल होगे काँहचो पिकनिक नइ जा सकेन। ये साल आठवीं पास होय के बाद कोनो हर कोनो स्कूल मा चल दिही, तब कोनो हर कोना स्कूल मा। हमन सब सहेली अलग-बिलग हो जाबोन।’’ 

"तब मैं का कर सकता हौं। ये साल के समे हर अइसने हे। अइसे भी भीड़भाड़ जगह मा नइ जाना हे अउ बड़े गुरूजी ला कहिबो, तब वहू हर अनुमति नई दीही।’’

‘‘मैं कहत रहेंव सीमा मैंडम ला कहिथन स्कूल मा कुछ न कुछ कार्यक्रम छोटकुन करे बर।’’ 

‘‘कइसे छोटे स्तर मा कर सकथें। जब हमन कार्यक्रम करबोन तब छटवीं, सातवी के लइकामन तो घलो सँघरहीच्च। अइसे अभी आधा लइका एक दिन तब आधा लइका ला एक दिन बलाये जाथे। तैं कार्यक्रम के का बात करथस पढ़ई-लिखई हर बने ढंग ले नइ होवत हे।’’ 

"तैं ठीक कहत हस, फेर मैडम ले बोलके देखथन का कहिथे।’’ 

‘‘ठीक हे। चल दूनो झन जाथन।’’ 

पिंकी अउ शकुन जब मैडम सीमा के कर गिस तब सीमा मैडम रजिस्टर के काम करत रहिस। 

‘‘पिंकी अउ शकुन ल अपन तीर आय देख के कहिस- "का बात हे पिंकी, बताओ।’’ 

‘‘मैडम हमन ये साल आठवी पास हो के सब ऐती-ओती चल देबोन। कउनो सहेली ले कब भेंट होही, ओकर पता नइ हे।’’  

‘‘हाँ ये तो ठीक हे, फेर।’’ मैडम सीमा हर कहिस।

‘‘हमन चाहत हन कि परीक्षा के पहिली कउनो कार्यक्रम होय।’’

‘‘फेर कोरोना के चल कार्यक्रम कइसे कर सकत हन, शासन के कड़ाई  हर रोज बढ़त हे। उलटा हमरे मन उप्पर कार्यवाही हो जाही।"

‘‘मैडम हमन अलग कउनो कार्यक्रम नइ करके कक्षा मा  कर लेबोन। एक संग बइठ के हाँस-गोठिया, लेबो गा-बजा लेबो।"

"ठीक हे मैं हर बड़े गुरुजी ले बात करके बतावत हौं।" 

मैडम सीमा हर लइका मन के बात ल बड़े गुरुजी कर रखीस। बड़े गुरुजी पहली तो मना कर दिस। जब सीमा मैडम हर लइका मन के भावना ल बताईस तब बड़े गुरुजी हर कोविड-19 के दिशा निर्देश के सख्त पालन करत कार्यक्रम करे अनुमति दे दिस। 

जब सीमा मैडम हर लइका मनला बड़े गुरुजी के बात ल बताईस तब लइका मन के मन मा गजब उत्साह छागे। अउ ओमन अपन तैयारी करे के शुरूवात कर दिस। कार्यक्रम बर रविवार के दिन तय करे गिस। ताकि दूसर कक्षा के लइका मन मत राहय। 

लइका मन अपन कार्यक्रम के तैयारी के बाद बड़े गुरुजी नेवता देब गिस तब बड़े गुरुजी हर सीमा मैडम ला समझा के कहिस, "कौनो चुक नइ होना चाहिए। मैं हर लइका मन के भावना ल देख के अनुमति दे हौं। ओ दिन जम्मो लइका मन मास्क लगा के आही, दू गज के दूरी बना के बइठहीं, अउ दरवाजा मा ही सब झन अपन हाथ ला सेनेटाइज कर लिही। बाजार ले खाय के कउनो खुला सामग्री नइ लाना है।"

सीमा मैडम के संग लइका मन बड़े गुरुजी के बात सुन के कहिस, सर हमन पूरा कोविड-19 के नियम के पालन करबोन। आप जरूर आहू अउ देखहू हमर तैयारी ल। सर धन्यवाद, आप मन हम लइका मन के भावना के कदर करेंव। 

आठवीं कक्षा मा पढ़इया जम्मो लइका मन रविवार के दिन बाँधे समय पहुँच गे। शकुन हर जउन-जउन ला जउन जिम्मेदारी देगे रहिस पूरा कर ले रहिस। सीमा मैडम अउ बड़े गुरुजी लइका मन के तैयारी ला देख के खुश होगे। लइका मन सुग्घर कार्यक्रम करिस। अपन अनुभव बताइन। एक दूसर ले आगू बढ़े के शुभकामना दिस। आखिर मा सीमा मैडम अउ बड़े गुरुजी अपन विचार रखीन। वहू मन सब लइका मन अपन आशिर्वाद दिन।




बलदाऊ राम साहू

न्यू आदर्श नगर, होटल साईं राम के पास 

दुर्ग,  छत्तीसगढ