Sunday, 15 May 2022

संस्मरण-मोर प्राथमिक शाला के सुरता

 संस्मरण-मोर प्राथमिक शाला के सुरता 



  स्कूली जीवन ह जिनगी के अनमोल समय होथे. ये समय म बने चेत लगाके के पढ़ई -लिखई कर लेबे त भविष्य ह उज्जर होथे. प्राथमिक स्कूल के पढ़ई ह नेंव हरे. जइसे घर बनाय बर मजबूत नेंव धरे ल पड़थे वइसने अपन जिनगी रुपी घर ल सुग्घर बनाय बर बने धियान देके के पढ़े लिखे ल लगथे. अउ पढ़इया लइका मन के पोठ नेंव बनाय के काम प्राइमरी स्कूल के गुरुजी अउ बहिन जी मन ह करथे. लइका मन माटी के समान होथे अउ गुरुजी मन ह कुम्हार कस मिहनत करके उंकर जिनगी ल बने गढ़थे. जइसे कुम्हार ह कोनो बर्तन, मूर्ति ल सुग्घर अकार देय बर माटी ल नँगत मताथे ,वोमे ले गोटी ल निकालथे ।फेर गजब नरम बनाके, ठोंक -पीट के अउ सँगे सँग अपन हाथ म सहला के बढ़िया रुप गढ़थे. वइसने पहिली के गुरुजी मन के काम राहय. लइका ल बने बनाय बर मारय- पीटय अउ प्रेम घलो करय. 

    मोर जनम भूमि सुरगी हरे. राजनांदगॉव ले अर्जन्दा रोड म 13 किलोमीटर म बसे हवय. सुरगी ह बड़का गाँव हरे. हमर गाँव म अंग्रेज जमाना ले प्राथमिक स्कूल हे. मोर बबा श्रद्धेय घुनारी राम साहू जी ह  1 मई 1922 म पहली कक्षा  म भर्ती होय रिहीस हे . मोर बबा के जनम 1914 म होय रिहिस हे. मोर बबा ह रामायन के टीका करे बर प्रसिद्ध रिहीस हे. हमर गाँव के प्राथमिक शाला ह बस स्टेन्ड अउ शनिचर बाजार चौक के बीच म हे. जब मेहा सत्र 1980-81 म 1 ली म भर्ती होयेंव त स्कूल ह खपरैल वाला रिहिस. मोर बाबू जी श्रद्धेय मेघू राम साहू जी ह मोला भर्ती करे बर ले गीस. बहिन जी श्रीमती फूल बाई देवदास ह जनम तिथि पूछिस त बाबू जी ह नइ बता सकीस अउ बहिन जी ह मोर जनम तिथि लिखीस - 03-01-1973 . मोर बबा ह भले चौथी पास रिहीस हे फेर मोर बाबू जी ल कोनो कारन ले नइ पढ़ा पा रीहीस. 

  ये प्रकार ले मेहा पहिली कक्षा म भर्ती होगेंव. पढ़ई लिखई म मोर नेंव बहिन जी फूल बाई देवदास ह बनाइस. हमर घर ह हाईस्कूल डहर हवय. हमरे पारा म देवदास बहिन जी ह घलो किराया के घर म रहय. हमर बहिन जी ह पढ़ई लिखई म गजब मिहनत करय. देवदास बहिन जी ह हमर गाँव के तीन पीढ़ी ल पढ़ाय हवय. ये हमर सौभाग्य हे कि बहिन जी ह नौकरी पूरा होय के बाद सुरगी म बसगे अउ भगवान के कृपा ले अभी जीवित हे. मँय मोर बहिन जी ल घेरी बेरी प्रणाम करत हवँ. वर्ष 2019 म हमर गाँव म पोला महोत्सव म बहिन जी के सम्मान करे गीस. त वो मंच म बहिन जी के सँग महू ल बइठे के सौभाग्य मिलीस. 

  हमर समय के पढ़ई गजब कड़ई रहय. गुरुजी /बहिन जी मन कमजोरहा लइका मन ल अब्बड़ मारय. कई घांव होशियार बच्चा मन जब कोनो प्रश्न के उत्तर नइ दे पायेंव त वहू मन मार ल झेलय. वो समय सजा के रुप म हाथ से मारना, छड़ी म मारना, कनबुच्ची धरई, उठ-बैठक ,घुंटना टेकई शामिल रहय. 

जहां तक मोर पढ़ई के बात हे त मोर गिनती हुशियार बच्चा म होय. हमर समय स्कूल के प्रधान पाठक श्री देवांगन गुरुजी (अर्जुन्दा वाले) रिहीस. मोला चौथी पढ़ईस ते बहिन जी के नाँव श्रीमती ओछला यादव (राजनांदगॉव )रिहीस. यादव बहिन जी ह घलो हमर पड़ोसी हेमनाथ साहू जी के घर किराया म रहय. बहिन जी मन जब मारय त उंकर चुड़ी ह फूट जाय तहां ले फेर गुस्सा म दू चार घांव उपराहा जमा देय. मोला 5 वीं  म देवांगन गुरुजी (माहुद) ह पढ़ईस. शरीर से गठीला, रौबदार अवाज देवांगन गुरुजी ह लइका मन ल पढ़ाय लिखाय म अब्बड़ मिहनत करय. गजब अनुशासन प्रिय रिहीस हे. देवांगन गुरुजी ह पांचवीं के पाछू चार -पांच साल के 

बोर्ड परीक्षा के प्रश्न ल रखे रहय अउ जमगरहा समझाय अउ हमन ल गृह कार्य देय. गणित समझाय बर अब्बड़ नाँव चलय. गणित समझाय के बाद लइका मन ल पूछे कि समझेंव कि नइ. नइ समझ अइस कहितीस त अउ समझाय. समझ म आगे कहय अउ पूछे त कोनो लइका ह नइ बता पाय त नँगत ढढाय. 

   पांचवीं बोर्ड परीक्षा होय त महू ह नँगत मिहनत करे रेहेंव. फेर 31 अक्टूबर 1984 के दिन प्रधानमंत्री मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी के हत्या कर दे गीस. तहाँ ले वो समय परीक्षा नइ होइस 

अउ मेहा जनरल प्रमोशन के रुप म आगू कक्षा छठवीं म पहुंच गेंव. 

परीक्षा नइ होइस त मोला अउ हुशियार बच्चा मन ल अब्बड़ अखरे रिहीस. 

    ननपन म छुटपुट हरकत घलो कर डरवं. बचपना होथेच वइसने. 

एक बार स्कूल के खिड़की ल धर के झूलत रेहेंव त वो खिड़की ह जेहा पहिली ले कमजोरह रिहीस वोहा भड़ाक ले टूटगे. सब लइका मन चिल्लाय लगिस कि ओमप्रकाश ह खिड़की ल तोड़ दीस.  फेर मेहा सकपका गेंव. लइका मन मोला धरके गुरुजी /बहिन जी मन जेकर बइठे रिहीस वोकर ले गीस. फेर मोला दू -चार रहपट गिनीस अउ समझइस कि अइसन अब मत करबे. 

    पढ़ई लिखई के सँगे सँग खेलकूद के समय दौड़, खो -खो म भाग लेवन. प्राथमिक शाला म पढ़ई के समय के सँगी- सँगवारी मन के याद करथवं त दू झन सहींनाँव  ओमप्रकाश निषाद, ओमप्रकाश साहू, चुम्मन साहू(भिलाई),ललित जैन, माखन साहू, घना राम साहू, स्व. ओंकार दास साहू, अनुरागिनी शर्मा, एकता जैन, स्व. लक्ष्मी जैन, माधुरी साहू के नाँव सुरता   आथे.

हमर घर म बड़े दीदी अउ बड़े भइया  कुंज राम साहू जी ह मोला घर म बने पढाय -लिखाय. 

त अइसन ढंग ले मोर प्राथमिक शाला के पढ़ई होइस हे. आगू के अउ पढ़ई के चर्चा कभू अउ करहू. मोर प्राथमिक शाला के जम्मो बहिन जी /गुरु जी मन के सँगे सँग मोर दाई -बाबू अउ भइया  दीदी मन ल घेरी -बेरी प्रणाम करत हवँ .


            ओमप्रकाश साहू" अंकुर "

            सुरगी, राजनांदगॉव (छ. ग. )

बासी दिवस बनाम मजदूर दिवस ----------------------------------------

 बासी दिवस बनाम मजदूर दिवस

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एक मई मजदूर दिवस आये। येला मजदूर दिवस के रुप म दुनिया म मनाये जाथे। येला छत्तीसगढ़ के बासी ले जोड़ के मुख्यमंत्री ह सबके दिल म जगह बना लिस। अइसे का मन म अइस के एक मई ल बासी दिवस के नाव दे दिस? आज छत्तीसगढ़ के खान पान ऊपर बहुत ध्यान देवत हावंय। कलेवा तो अब आम मनखे मन मक पहुंच गे हावय। बनावत हावंय अउ बेचत घलो.हें। चार सौ ले लेके छै सौ रुपिया किलो तक मिलथे। इंहा तक जचकी लड्डू घलो मिलथे। 


आज  बासी डाहर सबके धियान जावत हे। दूसर प्रदेश.के मन भी बासी के बारे म जानथे। मजाक घलो उड़ाथें।फेर येखर महिमा ल जाने के बाद सब सब येला खाना शुरु कर दिहीं। विदेश में भी येखर ऊपर शोध होये हावय। अमेरिका भी येखर लोहा मानथे। डाक्टर रूणा पल्टा आहार विशेषज्ञ ह घलो येखर बारे म बताये हावय। रात के बने भात ल पानी म बोर के रख दव। बिहनिया ओला बासी कहे जाथे। हल्का खट्टापन रहिथे अउ बहुत मिठास रहिथे।


अरुणा पल्टा के अनुसार बासी म बहुत पोषक तत्व रहिथे। रातभर पानी म डुबे रहिथे त फर्मनटेशन होथे याने खमीर उठथे। येमा केल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम अउआयरन होथे। शरीर बर बहुत आवश्यक तत्व होथे विटामिन बी 12, यहू ह येमा पाये जाथे। येखर ले शरीर ल उर्जा मिलथे। ये सब मानसिक स्वास्थ्य बर भी बहुत उपयोगी होथे। ताजा बने भात ले येमा 60% कैलोरी ज्यादा होथे।


दिन के भात ल तुरंत एक पानी धोके पानी डाल के खाथें तेन बोरे कहलाथे। रातभर बोर के रखे जाथे तेन बासी आये।

 येला भाजी के साथ खाना चाही। संग म गोंदली याने प्याज होना जरुरी हे। नमक डाले जाथे स्वादानुसार। नया लहसुन अउ लाल मिर्चा के सील म पीसे चटनी होगे त येखर स्वाद ल कोई दूसर म नइ पाये।बासी दाल म लालमिर्च डाल के भी खाथें। खट्टा सब्जी होगे तब तो स्वाद ल पूछ मत। सबके रूझान बोरे बासी ले हटत हावय। पिस्ता ,बरगर, पास्ता डाहर लइकामन के ध्याश जात हावय। तब ये बासी दिवस के.शुरुआत ह येला बढ़ावा दिही। 


आज कुकर म माइक्रोवेव ,इंडक्शन म खाना बनत हावय। ये खाना मन पकय नहीं फटथें। ये ह पेट म गैस पैदा करथे। आज रासायनिक खाद के उपयोग होथे येखर ले अनाज साग भाती म पौष्टिकता नइ राहय।आजकल ये बात ल जाने के बाद जैविक खाद के उपयोग होवत हावय। येखर चावल ,गेहूँ, सब्जी भाजी बहुत मंहगा होथे। फेर.पौष्टिक रहिथे। बहुत खरीददार ये मांहगी जिनिस ल लेवत हावंय।


आज इही कारण ले हमर पौष्टिक बासी डाहर सबके धियान गीस। आजकल बरतन के धातु ऊपर भी गोठ बात चलत हावय। मिट्टी के बरतन बहुत उपयोगी हावय। बासी बर तो करिया मटका बहुत ही बढ़िया होथे।  मटका के बारीक छेद ले हवा जाते त बासी म उचित खमीर उठथे अउ बहुत स्वादिष्ट हो जथे। हल्का खट्टापन ही एखर पौष्टिकता के चिन्हारी आये। गर्मी म सबला बासी जरुर खाना चाही ये ह ठंडा होथे। बोरे भी खाना चाही ये सब खराब पेट ल भी सुधार देथे। जय होवय बासी के।

सुधा वर्मा, 8/5/2022 ,मड़ई ,संपादकीय देशबंधु

सरपंच के शपथ ग्रहण

 व्यंग्य-

सरपंच के शपथ ग्रहण 

                          भारी कस्मकस म चुनई जीते रहय बपरा हा । बिपक्ष के हरेक मनखे मन एकमई होके ओला बदनाम करे के बड़ साजिस रचिस । बदनाम करिस घला फेर जनता हा ओला अपन सिर आँखी म बइठार के , ओकर बिरोधी मन के हवा निकाल दिस । चुनई म ओला अबड़ फेंकू आय .... लबरसट्टा आय कहि कहि के .... खूबेच गारी बखाना करे रिहीन । 

                         शपथ ग्रहण के दिन तैयार होके मंच म पहुँचगे । गाँव के जम्मो मनखे मन खइरखा ड़ाड़ तिर पहिली ले सकलागे रहय । मंच म बिराजमान तहसीलदार हा .... सरपंच ला शपथ ग्रहण करवाये बर कागज पातर धरके तैयार बइठे रहय । मंच म जइसे शपथ ग्रहण के शुरुवात के घोषणा होइस तइसने , तहसीलदार साहेब हा सरपंच ला कागज देवत किथे – इही ला दुहराना हे सरपंच साहेब । सरपंच हा कागज ला एक पइत झाँकिस अऊ उही तिर मंच खालहे म फटिक दिस । तहसीलदार किथे – इही ला देख देख के पढ़ना हे सरपंच साहेब .... येला काबर फटिक देहव ? सरपंच किथे – सत्तर बछर ले इही ला देख देख के पढ़त शपथ लेवत हन .... फेर आज तक  , कभू येकर पालन नइ करेन । आज मेंहा अपन तरीका ले बोलके शपथ ग्रहण करहूँ अऊ ओकर खमाखम पालन करके दुनिया ला देखा घला दुहूँ । 

                         सरपंच माइक तिर पहुँचगे अऊ शपथ लेवत केहे लागिस - में फलाना राम , भगवान के कसम खावत सत्यनिष्ठा ले प्रतिज्ञा करत हँव के बिधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान ला एको कनिक नइ मानव । में गाँव के सरपंच के रूप म अपन कर्तव्य के पालन अपन हिसाब से करहूँ अऊ भय पक्षपात .. प्रेम अऊ बिरोध अपनाके ... गाँव के कन्हो मनखे संग संविधान अऊ बिधि अनुसार कभू न्याय नइ करँव । 

                         गाँव के सरपंच के रूप म मोर बिचार बर जे बिषय लाने जाही या मोला जानकारी होही तेला ... में जेला जरूरी समझहूं तिहीच ला बताहूँ .... जेला जरूरी नइ समझहूँ तेला नइ बतावँव । 

                         पांच बछर तक सरपंच हा अपन शपथ ले एक बूंद नइ डिगीस । जे किहीस ते करिस । गाँव के दुर्दशा कर दिस । करथे तो सबो इहीच ... फेर कहि के करइया .... पहिली मनखे बनगे सरपंच हा । पहिली बेर कन्हो निर्वाचित मनखे हा मंच ले अइसन बूता करे के शपथ लिस अऊ पांच बछर ले निभइस घला । निही ते जेन आथे ते संविधान अनुसार काम करहूँ , पक्षपात नइ करँव , अपन गाँव के प्रति कर्तव्य के पालन करहूँ कहिके .... शपथ लेवत बेवकूफ बना देथे । 

                         फेर अइसन सच हा सरपंच ला कहीं के नइ छोंड़िस । ओला अतका मालूम नइ रिहीस के ,  जे बात के शपथ लेना हे .... उहीच करे के .... का परिणाम हो सकत हे । ओहा अभू तक सिर्फ इही ला जानत रिहीस के शपथ कुछ अऊ लेना हे करना कुछ अऊ हे ........ । फेर ये पइत ओकर मुड़ म सच के भूत सवार रिहीस .. जे करना हे तिहीच ला कहना हे ..। बुता करत अऊ बुता बनावत ... सबूत तियार हो चुके रिहिस जेमा ओकरे खखारवृन्द ले निकले बात हा घेरी बेरी गवाही बनके ठड़ा हो जावत रिहिस हे । बात जगा जगा उजागर होगे । थोकिन समे  पाछू ... बपरा ला इही सच हा .... जेल म सरे बर मजबूर कर दिस । जेल के परोसाये भात म भिनभिनावत माछी खेदत .. हाथ ला ... जोर जोर से हलाये लगिस । दसना म सुते ओकर बई ला रट ले परिस । सरपंचिन उठगे । सरपंच के नींद घला टूटगे । जेल अऊ उहाँ के भात के सुरता म सच बोले के सपना ओतके बेर काफूर होगे । बिधि द्वारा स्थापित संविधान के बात मान , लोगन ला पांच बछर बर .... बेवकूफ बनाये बर , तैयार होके एक पइत फेर मंच म शपथ ग्रहण करे बर , बेरा म पहुँचगे हमर गाँव के सरपंच ...... । 

     हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

बिहाव संस्कार मा भड़ौनी - दुर्गा प्रसाद पारकर


बिहाव संस्कार मा भड़ौनी


- दुर्गा प्रसाद पारकर 


छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति मा सोला संस्कार माने गेहे। एमा बिहाव महत्वपूर्ण संस्कार आय। छत्तीसगढ़ के बिहाव म बहुत अकन प्रथा हे। जइसे लमसेना बिहाव, मंझली बिहाव, बड़े बिहाव अऊ ठीका बिहाव कस कतनो प्रथा हे। आजकाल तो मंझली बिहाव अऊ बड़े बिहाव के जादा चलन हे। बिहाव वंश बढ़ोत्तरी के संगे संग आदिम प्रेम परस्पर सहयोग अऊ सहज आकर्षण के सूत्र आय। तिही पाय के बिहाव सिरिफ दुए शरीर के ही नही बल्कि दु आत्मा के संगे-संग दु परिवार अऊ संस्कृति के पवित्र मिलन आय।

बिहाव संस्कार के ज्ञाता हैबलक एलिस हा कहिथे कि भारतीय गाँव मन मा लोक परम्परा हा अनूठी अऊ चिरस्थायी हे। विमन ऑफ इंडिया के लेखक रथफील्क हा बिहाव अऊ बिहाव के सबो नेंग जोरा ला सुखी जीवन के आधार मानथे अऊ कथे कि बिहाव के नेंग जोग म नि:स्वार्थ भावना भरे रथे।

छत्तीसगढ़ म सबो समाज अऊ जात म थोर बहुत फरक के साथ बिहाव संस्कार सबो नेंग जोग करत पूरा होथे। बिहाव लोक रीति अऊ वैदिक रीति ले संपन्न होथे। बिहाव संस्कार म नेंग जोग के समय बिहाव गीत गाए के परम्परा हे। जइसे मंगनी गीत, चुलमाटी गीत, तेल चघनी गीत, नहडोरी गीत, मउर सौंपनी गीत, बरात बिदा गीत, नकटा नाच गीत, धमसा नाच गीत, बरात स्वागत गीत, परघनी गीत, भड़ौनी गीत, भांवर गीत, लगिन गीत, टिकावन गीत, सोहाग गीत, दाईज गीत, बिदा गीत, डोला परछन गीत अऊ मड़वा विसर्जन गीत के संग बिहाव संस्कार पूरा होथे। बिहाव गीत के अंतर्गत भड़ौनी गीत के विशेष महत्व हे।

भड़ौनी के उत्पत्ति के बारे मा अइसे माने जाथे कि भड़ौनी छत्तीसगढ़ी के भड़ धातु मा औनी प्रत्यय लगाय ले भड़ौनी शब्द बने हे तिही पाय के जादा बोलइया पुरूष मन ला भड़भड़हा अऊ जादा बोलइया माईलोगन मन ल निच्चट भड़भड़हीन केहे जाथे।

सियान मन के अइसे मानना हे कि रामायण काल म घलो भड़ौनी गायन के परम्परा हा जीवित रीहिसे। रामचरित मानस म उल्लेख हे कि भगवान राम हा सिरिफ पांच कौर नैवेध निकाल के भोजन शुरू करेच रिहिसे कि भगवान राम हा गारी गायन सुनके हर्ष विभोर होगे -


पांच कंवर करि जेवन लागे

गारी गायन सुनि अति अनुराग


उही समे ले भोजन के समय भड़वनी गीत गाय के परम्परा के शुरूआत होइस होही।

पुराण म घलो उल्लेख हे कि शिव पार्वती बिहाव म गारी गायन प्रचलित रिहिसे। शिव जी हा बरात ले के दुवार मा अइस द्वारचार के नेंग होय लगिस। तभे नारद जी हा माता मैना ल किहिस कि शिव जइसे दूल्हा तीनो लोक म नइहे। एती मैना हा देखीस कि शिव ह शरीर भर भस्म चुपरे हे ओकर शरीर मा साँप के माला हे अऊ खोपड़ी के गहना ले लदाय हे दई। ओहा उघरा, जटाधारी हे अउ ओकर डरावना रूप ल देख के चिंता म परगे ताहन दुखी होके माता मैना हा शिवजी ला केहे बर धर लीस -


तछार ख्याल कपाल

भूषण नगिन जटिल भयंकारा

संग भूत पिशाच सब

जोगिनी विकट मुख रजनी चरा


शिव जी हा अपन सासु माँ ल चिंता फिकर म देख के अउ ओकर मन:स्थिति ल भांप के दिव्य रूप म प्रकट हो के ओकर दुख ल दूर करिस। अइसे केहे जाथे तब ले मानव समाज म बाराती मन ल गारी दे के स्वागत करे के परम्परा विकसित होइस होही। अइसने किसम ले भड़ौनी गीत प्रेमपूर्वक गारी गायन के रूप आय। गारी गायन ल ही छत्तीसगढ़ म भड़ौनी गीत केहे जाथे। इंकर लक्ष्य समधी-समधीन, वर-वधु अऊ लोकड़हीन डाहर रहिथे।

इही बात ल आघु बढ़ावत सीता राम साहू कथे-भड़ौनी हा हास परिहास, हल्का ताना अउ मीठा व्यंग्य आय। ओखी पाके ठगे के लइक नता रिश्ता मन ल भड़ौनी गीत के माध्यम से भड़ के माहोल ल आनंदमय बनाथे। जइसे कि चुलमाटी के बेरा ढेड़हा ल गीत के माध्यम से कुड़काथे -


तोला माटी कोड़े ला, तोला माटी कोड़े ला

नइ आवय मीर, धीरे-धीरे

धीरे-धीरे अपन धोती ला तीर, धीरे धीरे...


बरात स्वागत ले भड़ौनी गीत के शुरूआत होथे। बरात परघाए के बेरा बरतिया मन ला भड़थे -


नदिया तीर के पटवा भाजी

उल्हवा उल्हवा दिखथे रे

आए हे बरतिया तेमन

बुढ़वा बुढ़वा दिखथे रे


भड़ौनी एक-दुसर ल कुड़का के मजा ले के गीत आय। ठट्ठा दिल्लगी के गीत आय। भड़ौनी गीत म भड़इया मन बरतिया मन के गाँव ल आधार बना के घलो भड़थे...


नदिया तीर के पटुवा भाजी

पटपट पटपट करथे रे

मालूद बेलौदी टूरा मन हा

मटमट मटमट करथे रे


दयाशंकर शुक्ला हा भड़ौनी ल राग द्वेष ले मुक्त प्रेम के प्रतीक माने हे। तभे तो दुल्हन पक्ष वाले मन दूल्हा ल घलो भड़े बर नी छोड़य -


सुन्दर हवस कहिके दुलरूवा

हमला दिए दगा रे

बिलवा हवय मुंह हा तुंहर

नोहव हमर सगा रे


भड़ौनी गीत अधिकार अऊ कर्तव्य के बोध कराथे। समधीन मन बर माई सरी अउ दुल्हन बर जउन लुगरा लाए रथे ओहा कहूं निच्चट हल्का रथे ता ओ झलझलहा लुगरा ल देख के भड़ौनी गीत के स्वर निकलथे - 


बने बने तोला जानेंव समधी

मड़वा मा डारे बांस रहे

झाला पाला लुगरा लाने

जरय तुंहर नाक रे...


ठीका बिहाव के बारे म सियान मन बताथे कि ठीका बिहाव म बिना तेल हरदी चघे बरतिया मन दुल्हिन के गाँव जाथे। दुल्हिन घर गऊर बइठथे ताहन फेर संग म दुल्हिन ल लानथे। दुल्हिन के संग म लोकड़हीन घलो जाथे। दूल्हा घर नेंग जोग निपटे के बाद चौथीया आथे।

डुमन लाल ध्रुव कथे कि चौथीया परघौनी के बखत दूल्हा अउ दुल्हिन पक्ष वाले मन एक-दुसर ल नीचा देखाए बर अपन-अपन समधीन ल हाथ देखा-देखा के भड़थे। भड़ौनी गीत के माध्यम ले दुनो पक्ष के नोक झोक हा माहोल ल आनंदमय बना देथे। दूल्हा पक्ष वाले मन चौथीया परघाए के बेर अपन समधीन ल भड़थे -


हमर समधीन

रउतइन बने हे, रउतइन बने हे

कि मही ले ले, दही ले ले कहिथे समधीन ह

मही ले ले, दही ले ले कहिथे

ओ तो मोला देखन नइ तो भाए समधीन

ओ तो मोला देखन नइ तो भाए।


एकर जवाब मा चौथीया पक्ष वाले मन अपन समधीन ल जोशे-जोश म भड़थे-


हमर समधीन

मरारिन बने हे, मरारिन बने हे

कि भाजी ले ले, भांटा ले ले कहिथे समधीन हा

भाजी ले ले भांटा ले ले कहिथे

ओ तो मोला देखन नइ भाए समधीन हा

ओ तो मोला देखन नइ तो भाए।


दूल्हा पक्ष वाले मन तो दुल्हिन के दाई ल घलो भड़े बर नइ छोड़य -


दुल्हिन के दाई ल लुगरा के साध हे

ओ लुगरा के साध हे

कि गए होही कोसरा के दुकाने

समधीन गए होही कोसरा के दुकाने

ओ तो बने-बने लुगरा निमारे समधीन हा

बने-बने लुगरा निमाये

ओला लाज सरम नइ आये

समधीन हर चढ़े हे कोसरा दुकाने


भड़ौनी गीत बिहाव समारोह के आनंद ल दुगुना कर देथे। एक-दुसर ल भड़े के बाद घलो कोनो रिस नइ करय बल्कि दुनो पक्ष एक-दुसर के पूरा मान-सम्मान के ख्याल रखथे।

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बिहाव के नेंग- डोर छेकई --

 बिहाव के नेंग- डोर छेकई --


      हमर छत्तीसगढ़ में किसिम-किसिम के नेंग-जोग हवे। चाहे कोनो बर-बिहाव रहय,चाहे तिहार-बार। ये नेंग-जोग ह हमर छत्तीसगढ़ी संस्कृति के जरूरी हिस्सा आये। अईसन संस्कृति ह हमर मन ल बोधईया अउ सुख देवईया आये। जेकर ले हँसी-दिल्लगी वाले नता-गोत्ता के मनुहार ह नंगत के गाढ़ा होथे।


अईसने एक ठन हमर छत्तीसगढ़ म बिहाव के पहित नेंगहा हवे। जेला डोर छेकई केहे जाथे। वइसे तो छत्तीसगढ़ी संस्कृति के बिहाव म हँसी-मजाक के संग अब्बड़ नेंग होथे। मंडवा छवाई ल लेके बिहाव के झरत ले ढेड़हा-सुवासा, संग उँकर सारा-भांटो-सारी मन अब्बड़ ठठ्ठा-दिल्लगी करत काम पूरा करथे।


दूलहा बरतिया ले वापस अपन घर दुलही सन आथे,त सटका घर रूके रथे। बिहान दिन घर के मन बरतिया ल परघाये बर जाथे,तब बाजा-मोहरी के संग नाचत-गावत  सटका घर जाथे। महतारी ह दूलहा-दुलही ल तेल-हरदी चढ़ाये के बाद गुड़ अउ पानी ले मुँह मीठा करथे। तहन अपन दुलहा बने बेटा संग दुलही बहु ल हाथ धरके घर रेंगत नहिते गाड़ी म बइठार के लाथे। 

अब दफड़ा-गुदुम अउ मोहरी के धिड़कत धुन म बरतिया अउ सगा-सोधर मन मनमाड़े नाचत-कूदत गाँव ल घुमत-घुमत आथे। इही कर गाँव के महतारी दाई मन बरतिया ल छेके के उदिम करथे। पाँच,छह,सात झन के दल म गाँव के दाई मन घर के डोर ल गली के बीचो-बीच लमा के धरे रथे। फेर परघावत बरतिया उही कर रूक जाथे। येकर ले अपन घर कर ले बरतिया मन के नाचा देखे बर मिल जाथे, अउ नवा नेवरनीन दुलही ल घलो बने ढंग ले देख डारथे। जब तक ले दुलहा ह डोर छेकईया मन ल पैसा नई देय,ओमन बरतिया ल जावन नई देय। इही कर मान-मनुहार के सुघ्घर बेरा देखे ल मिलथे। डोर छेकईया मन अपन दल के संख्या के अनुसार पैसा माँगथे, त दुलहा ह ओमन ल कम करे बर अपन ढेड़हा ल सोरियात रथे। इही बखत ग्रामीण संस्कृति के बड़ सुघ्घर छबि देखे ल मिलथे। बाद में अब्बड़ मनाये के पीछू डोर छेकईया दाई-महतारी मन दुलहा ले पैसा लेके मान जाथे। फेर बरतिया अपन घर डहन आघू बढ़ जाथे।


बरतिया ह जइसे घर के मुहाटी म पहुँचथे,घर के दुवार म पानी ओच के स्वागत होथे। दुलहा-दुलही के आरती करें के बाद घर के भीतरी लेजथे। भीतरी म लेगे के पहली एक बार फेर दुलहा-दुलही के रस्ता ल दुलहा के बहिनी अउ फूफू दीदी मन छेक लेथे। ये जगह दुलहा के फेर बड़े जनि परीक्षा हो जथे। दुलहा अउ ढेड़हा के अब्बड़ मान-मनोखी घलो कुछु काम नई आये। जतिक ओमन मांग करही ओतके पैसा देय ल पड़ते। काबर के बहिनी अउ फुदु मन ल नाराज करई नई बने। फेर सबो बहिनी अउ फूफू दीदी मन रस्ता ल छोड़ देथे। भीतरी खोली में लेजे के पीछू दुलहा-दुलही मन ल सुग्घर खाना खवाथे। रस्ता छेकई के पैसा ल बाद म सबो बहिनी अउ फूफू मन बरोबर-बरोबर बांट लेथे।


बरतिया मन ल खवाय-पियाय के बाद बाकी बुता ल करे के तैयारी होथे। इही बेरा म तीर-तखार के सब नेवताये सगा-सोधर मन आये के शुरू हो जथे। घर म सगा मन के जमघट अउ लोग लईका मन के खेलई-कूदई ले घर भरे-भरे लगथे। शाम के भांवर परे के पीछू टिकान बईठारथे। चौथिया मन ल खवाय-पियाय के पीछू सगा मन ल फेर गाँव वाले मन ल खाना खवाय जथे। सबले पीछू नवा-नवा बने समधी मन नंगत गोठियात-बतरात खाना खाथे अउ बाद में चौथिया मन के बिदा करे जथे। गाँव म आज घलो जम्मो गाँव भर के मन बिहाव वाले घर के काम-बुता ल पूरा करे ल लगथे। बिहाव घर वाले ह अपन एककनी लकधीरहा मन ल बिहाव के झरत ले कमाए अउ खाय के नेवता दे दे रथे।


डोर छेकई के पैसा ल एक झन दल के ह धरे रथे। ये डोर छेकई के नेंग जब गाँव भर के बिहाव ह झर जाथे, तब इही पैसा के कुछु-कहीं खजानी-वजानी लेके सबो झन मिल-बाँटके खाथे। मने हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति में हर नेंग-जोग म सामाजिक समरसता के भाव भरे रथे। जेमे आपसी प्रेम-व्यवहार, टीम भाव संग मिल-जुलके रेहे अउ खाय के भाव कूट-कूट के भरे हवे।




         हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगांव

नवा रचनाकार मन बर लेख* *आखर-आखर गोठियाथे*

 *नवा रचनाकार मन बर लेख*


*आखर-आखर गोठियाथे*

 

लेखक के जिनगी के सार ओकर लेखन के प्राण-तत्व होथे। जइसे-जइसे उमर बाढ़त जाथे, जिनगी के अनुभव घलो बाढ़त जाथे। हल्का उमर मा लिखे रचना ला पढ़के लेखक खुदे हाँसथे अउ सोचथे कि पहिली काय अगड़म-बगड़म लिखत रहेंव। अइसन हँसाई हर-उमर मा होथे। हल्का उमर के बहुते कम रचना मन अपनआप ला संतुष्ट कर पाथें। असली लेखन उही हर आय जे अपनआप ला संतुष्ट करय। लेखन जब तक लेखक ला संतुष्ट नइ करही तब तक पाठक ला संतुष्ट नइ कर सकय। उत्कृष्ट लेखन के आखर-आखर गोठियाथे।

लेखक ला प्रचार करे के जरूरत नइ पड़े। 

 

कहूँ पढ़े बर नइ मिलिस कि कविवर रवींद्र नाथ टैगोर हर लिखिस - "मँय गीतांजलि लिखे हँव, किताब छप गेहे। सुग्घर किताब आय। आपमन खचित पढ़व।" कथाकार प्रेमचंद के घलो कथन नइ दिखिस - "मोर गोदान फलाना प्रकाशन के प्रकाशित हो चुके हे। मँगवावव अउ पढ़व।" मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला" अइसन कतको साहित्यकार मन होइन, जिनकर लेखन कालजयी होगे हे फेर इनकर कलम ले इनकर किताब मन के प्रचार-वाक्य पढ़े मा नइ आइस। इनकर लेखन के आखर-आखर गोठियाथें। रसिक पाठक मन सुन तको लेथें। 

 

आज के जमाना, सोशल मीडिया के जमाना आय। जउन ला देखव तउने हर मरो जियो लिखत हे। किताब मन मुक्का होके बइठे हें अउ लेखक मन गोठियावत हें - मोर अमका किताब छपगे, मोर ढमका किताब छपगे। खीसा ले खर्चा करव अउ सप्रेम भेंट मा बाँटत रहव। दू चार झन पढ़ लिन त पढ़ लिन नइते प्राप्तकर्ता के आलमारी मा धुर्रा खावत पड़े हे। महाकाव्य के लक्षण नइ जानँय अउ महाकाव्य लिखत हें। प्रबंध काव्य ला खण्ड-काव्य बतावत हें। अरकान अउ बहर ला नइ जानँय अउ गजल संग्रह छपगे। तुकबन्दी ला छन्द बतावत हें। एक ठन पोस्ट ला पचीसों समूह मन मा कॉपी-पेस्ट करत हें। निजी इनबॉक्स ला तको नइ छोड़त हें। अपने खर्चा मा अपन अभिनन्दन करावत हें।इहाँ सम्मान, उहाँ सम्मान….ददा रे! कोन डहर साहित्य के डोंगा जावत हे?

 

कोनो लेखक हो, ओकर समग्र साहित्य के चर्चा (जयंती-विशेष या पुण्यतिथि ला छोड़ के) साहित्यिक मंच मन मा नइ होय। केवल उत्कृष्ट पंक्ति या पैरा ला रेखांकित करे जाथे। इही गिनेचुने पंक्ति मन लेखक ला मरे के बाद घलो जिन्दा रखथे। कहे के मतलब प्रचार, प्रसार, हँगामाबाजी कुछु काम नइ आवय, उत्कृष्ट लेखन हर लेखक ला जिन्दा रखथे। तेपाय के नवा रचनाकार मन बर मोर सलाह हे कि ज्यादा पढ़व, भले कम लिखव फेर उत्कृष्ट लिखव। इसी मा सार हे। बाकी हो-हल्ला अउ प्रचार-प्रसार बेकार हे। सफलता तभे हे जब लेखक चुप रहय अउ आखर-आखर गोठियावैं।

 

*अरुण कुमार निगम*

Saturday, 7 May 2022

छत्तीसगढ़ी शब्द निचट अउ बिकट

 छत्तीसगढ़ी शब्द निचट अउ बिकट


*निचट अउ बिकट के अर्थ बिल्कुल अलग-अलग होथे* |

    

*निचट*:- *कोनो भी वाक्य म एकदम अच्छाई-बुराई ला व्यक्त करे बर विशेषण के पहिली उपसर्ग के रूप म "निचट,निच्चट,निचटेच शब्द के प्रयोगों करे जाथे*|

   *"निचट "शब्द ह हिन्दी के "पट्ट" या "निपट" शब्द के ही रूप होथे* 

*जैसे :-*

*१. मोहन  पट्ट /निपट मूर्ख है*|

*(छत्तीसगढ़ी अनुवाद)*

  *मोहन निचट/निचट्ट/निचटेच मूर्ख हवय*

*२. सोहन निपट अनाड़ी है*

  *( सोहन निच्चट अनाड़ी हवय)*

*३. सुरेश निपट गदहा है*

    *(सुरेश निच्चट गदहा हवय)*


*बिकट :- के अभिप्राय "बहुंत ज्यादा" होथे | बिकट शब्द  कोनो विशेषण के पहिली प्रयोग करे जाथे*| जैसे:-

*१. सीता बहुत सुंदर लड़की है*

   *(सीता बिकट सुंदर लड़की हवय)*

*२. राम बहुंत शूरवीर  है*

  *( राम बिकट शूरवीर हवय)*

  *३. बलराम बहुंत शक्ति शाली गदाधारी था*

   *बलराम बिकट शक्ति शाली गदाधारी रहिस*

*४.शकुनी बहुंत चालबाज एवं धोखाधड़ी कार्य करता था* |

*शकुनी बिकट चालबाज अउ धोखाधड़ी काम करत रहिस*|

*५. आज बहुत ज्यादा गर्मी है*

*(आज बिकट गर्मी हवय)*


   *ए प्रकार से "निचट अउ बिकट"शब्द के अर्थ बिल्कुल अलग-अलग होथे*


*गया प्रसाद साहू*

   "रतनपुरिहा"

🙏