Friday, 1 July 2022

कहानी--*मोहरी/कहानी*


 

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                   कहानी--*मोहरी/कहानी*

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                  (एकठन प्रेम कथा)


         

                    बाजा - रुंजी मन म मोहरी के बड़ महत्तम हे। येहर छत्तीसगढ़ीया -शहनाई आय। अइसनहेच मिलता- जुलता बड़े आकार के बाजा ल हमर  दक्षिण भारतीय भई मन - नाद स्वरम  घलव कहिथें ...रत्नाकर गुनत हे। वोहर अपन थोरकुन धुरिहा के रिश्तेदारी म बरात आये हे।अउ अभी वोकर  करा कुछु खचित काम घलव नइ ये। पूरा फुरसत ले , वोहर ये बिहोतरा- बाजा के आनन्द उठात हे । 


          अपन मुड़ म परे कारज म तो मनखे ल मुड़ खुजियाय के मउका नइ मिलय। अउ निकट -सम्बन्धी  मन के  कारज ल तो कूद के उठाय बर लागथे ।तब अइसन बाजा -रुंजी सुने के अवसर कहाँ मिल पाथे।


       मोहरी के सुर कान म मिश्री ल घोलत हे ।


 "हाय... रत्नाकर...! कइसन हावस बाबू अउ इहाँ तंय कइसन...! "आवाज हर जाने -चीन्हे कस लागिस, रत्नाकर ल।वोहर  वो    कोती ल  देखिस।  अब तो वोकर क्लासमेट श्रुति तीर म आ के खड़ा हो गिस ।


"कोन श्रुति...!तंय इहाँ कइसन..?"


"येहर मोर गांव..मोर  छईंहा- भुइंया।" श्रुति झरझरात कहिस,"अउ तंय बारात आय हस ।"


"वाह..!तँय कइसे जान डारे कि मंय बारात आँय हंव।" रत्नाकर घलव श्रुति ल अइसन अचानक आगु म पा के आनन्द -विभोर हो गय रहे।


"तँय अतेक फुरसत लेके ये दे मोहरी ल सुनत हावस अउ बरतिया मन के संग म हावस।अउ येकर ल बड़खा बात...तँय इहाँ मोर गांव शायद पहिली बार आय हावस।"श्रुति पूरा विस्तार ल बता दिस। अउ मुचमुचात खड़े रहिस । अब  रत्नाकर विपत्तियां गय,अब श्रुति करा गोठियाव कि मोहरी ल सुनों। वोहर दुनों च छोड़ना नइ चाहत  रहिस ।



           श्रुति  अउ रत्नाकर कक्षा -संगवारी ये। वोमन के स्नातकोत्तर कक्षा म मनखे के कमी नइ ये।श्रुति करा  रत्नाकर के विशेष परच...उठना- बैठना नइ रहिस।हाँ... फेर एके जात -बिरादरी के होय के सेथी, वोकर उपर नजर हर परिच  जाय ।वोकरे कस अउ चार -पांच लड़की  ये कक्षा म हावे वोकरेच जाति- बिरादरी के।वो सब  मन उपर जाने -अनजाने नजर परिच जाय ।


                मोहरी बाजत हे...!


"चल मोर घर..!"


"अभी नहीं..।"


"अभी नहीं त, तँय अउ कब आबे।"


"पता नइये।वो दे ध्यान लगा के सुन मोहरी हर बाजत हे अउ का  कहत हे।"


"वो तो बहुत कुछ कहत हे। सुने सकबे तव सुन..!"श्रुति हर अब रत्नाकर कोती ल देखे नइ सकत रहिस।


"चल मोर घर..!" अब वो थोरकुन हड़बड़ी म कहिस।


"अभी पहिली.. वहाँ,  जिहाँ जाना हे ।"


"वोकर बाद..?"


"मोर तो दुबारा इहाँ आये के मन करत हे।वो दे सुन मोहरी काय कहत हे।"


"तईंच सुन..!"श्रुति कहिस,फेर भागे नइ सकिस ।


"चल मोर घर..!"वो  आन कोती ल देखत फेर कहिस।जइसन ले जा के ही मानही अपन घर।


"पक्का बलावत हस कि कचिया।" रत्नाकर तो जइसन मोहरी के बोल म बोलत हे।


"अगर मंय कचिया कह हां तब..?"


"मंय तुरन्त चल दिहां।" रत्नाकार ल खुद अचम्भा होवत रहिस कि वोकर मुहँ ल  का... का ... ये ...आन... तान...निकलत हे।अउ ये मोहरी तो बाजतेच हे।


"अउ मंय पक्का कह हां तब...?"श्रुति खुदे कहत हे।


"तब  तो   पाछु आहाँ  तोर घर...फेर अइसन मोहरी जरूर बाजही ...!रत्नाकर के मुँह ले तुरते निकल गय ,"अब बोल का कहत हस...तँय...!"


       श्रुति अब ले घलो भागे नइ सकिस।मोहरी हर बाजतेच रहिस।अब  तो दुनों झन वोला सुनत रहिन।


"का कहत हस...अब बोल।"रत्नाकर बड़ बेर बाद म पूछिस।


" अब मोला नही ये मोहरी ले ...पूछ।"श्रुति अब भी रत्नाकर के तीर ल भागे बर समरथ नइ होय पाये रहिस। 


                हाँ...मोहरी हर अब ले भी बाजतेच रहिस।अउ  बरात के पइरघनी होवत रहिस।




 *रामनाथ साहू*




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हमर संस्कृति हमर पहिचान**


 

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   **हमर संस्कृति हमर पहिचान**


       " हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति हर देश म ही नहीं बल्कि,  विदेश घलाव म अपन अलग पहिचान रखथे। 'हमर छत्तीसगढ़ के पानी अउ हमर छत्तीसगढ़ के बानी ' के मिठास हर इहां अवइया सबे मइनखे के मन म रच बस जाथे। 

     हमर छत्तीसगढ़िया मन के सरल स्वभाव, ओकर सहज रहन-बसन अउ वेशभूषा, ओकर बोली-भाखा हर जम्मो झन के मन ल  मोह लेथे तेकरे सेथी हमर छत्तीसगढ़  ले दूर प्रांत के मइनखे  मन घलाव आके इहां रच-बस जाथें; हमर बोली अउ हमर संस्कृति ल घलाव ओमन हर अपना लेहे हें। हमर छत्तीसगढ़ के लोकपर्व, हमर लोक गीत, हमर लोकगाथा, हमर पकवान के कहर  हर देश-विदेश तक बगरे हावै। हमर छत्तीसगढ़ के कई नामी-गिरामी कलाकार मन देश-विदेश भर म अपन कला के परचम लहराय हें अउ छत्तीसगढ़  के अलख जगाय हें। छत्तीसगढ़ के सुआ अउ कर्मा नृत्य हर जम्मो झन के मन मोह लेथे, पंथी नाच म छत्तीसगढ़ के कलाकार मन विदेश के रहइया मन ल घलाव अचरज म डाल देथें, हमर सरगुजिहा गीत अउ नृत्‍य हर विदेशी घलाव मन ल थिरके बर मजबूर कर देथे। छत्तीसगढ़ के भोजली के परंपरा हर देश-विदेश म चर्चा के विषय हे, येकर ऊपर कतको विदेश के ज्ञाता मन हर शोध करत हावंय।

     हमर छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा के नाम से जाने जाथे, इहां  के माटी म जम्मो फसल उपजाय के क्षमता हे, संगे-संग खनिज के अकूत भंडार भरे हे। कहे जाय त छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा म धन-धान्य के भंडार भरे हे त ओकर कोख म नाना प्रकार के नव रतन के भंडार घलाव भरे हे। हमर छत्तीसगढ़ के संपदा अउ संपन्नता के संग छत्तीसगढ़ के संस्कृति हर जम्मो झन ल अपन कोती आकर्षित करे हे। आज देश-विदेश के आदमी हमर छत्तीसगढ़ म देखे जा सकत हे। 

     हमर छत्तीसगढ़ हर एक तरफ तो दुनिया म अपन पहिचान बनाय हे त दूसर कोती कुछ नुकसान भी उठाय हे, वो कथें न कि, 'फलदार पेंड़ ल जम्मो झन पथरा धर के झोरियाय हें ' वोही हाल छत्तीसगढ़ के हावै। ये कहना  गलत नइ होय कि, जइसे हमर भारत-भूमी म दूसर देश के मन आके आक्रमण करे रहिन वइसने आज हमर छत्तीसगढ़ प्रांत म अतिक्रमण हो गय हे। अब्बड़ संभावना होय के बावजूद छत्तीसगढ़ के आदमी आज घलव पलायन करे बर मजबूर हे। हमर संसाधन के अलावा हमर भाषा अउ हमर संस्कृति म भी एकर प्रभाव देखे बर मिल जाथे। आज छत्तीसगढ़ म हर प्रांत के आदमी देखे बर मिल जाथे। जम्मो तिहार अउ परब के मनाने वाला इहां मौजूद हें। जम्मों भाषा के बोलइया, किसिम-किसिम के वेशभूषा छत्तीसगढ़ म चलन म आ गय हे। येहर हमर छत्तीसगढ़िया मन के सरल स्वभाव कहे जाय कि ओमन कोनो भाषा अउ संस्कृति के विरोध नइ करंय बल्कि हरेक पर्व म बराबर के शामिल होथें।

     ये कहना घलव गलत नइ होय कि आज हमर छत्तीसगढ़ के तीज-तिहार,भाषा अउ संस्कृति म अतिक्रमण हो चुके हे, एक तो दिगर प्रांत के, ऊपर ले बाजार वाद अउ भौतिकता, आधुनिकता जम्मो तरह ले हमर छत्तीसगढ़ म बोजा गय हे। बावजूद येकर, संतुष्टि अउ खुशी के बात ये हे कि, आज भी कतको छत्तीसगढ़िया मन छत्तीसगढ़ के भाषा अउ संस्कृति ल बचा के राखे हें। रहिस बात पहिनावा के धीरे-धीरे नंदावत हे; अब येहर दूरांचल म घलव देखे बर मिलथे। पुराना मइनखे मन के संगे संग छत्तीसगढ़ के पहिनावा इहां के वेशभूषा हर छत्तीसगढ़ ले नंदा जाही।

     आज हमर छत्तीसगढ़ के कतको जागरुक मइनखे मन छत्तीसगढ़ के भाषा अउ संस्कृति ल बचाय बर प्रयासरत हें। छत्तीसगढ़ी भाषा अउ छत्तीसगढ़िया संस्कृति के सरलग प्रचार-प्रसार करे जावत हे। कतको लेखक, कवि अउ विद्वान मन आज छत्तीसगढ़ी भाषा म साहित्य रचना करत हें, वहीं इहां के कलाकार मन इहां के संस्कृति ल बगरावत हें। अब जरुरत हे त छत्तीसगढ़ म छत्तीसगढ़ी भाषा म शिक्षा के अउ सरकारी कामकाज म येकर चलन के। जब ये हो जाही त हमर नवा पीढ़ी के बीच घलव हमर भाषा हर जिंदा रही अउ छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी भाषा के दुनिया म पहिचान बनही जेकर लाभ छत्तीसगढ़िया मन ल मिलही। छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया दूनों के तरक्की निश्चित होही जेकर ओहर हकदार हावै।

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  **अंजली शर्मा **

बिलासपुर (छत्तीसगढ़ ).

7470989029.

8889529161.

बादर गरजीस ते फूटू (मशरूम) फूटीस*



*बादर गरजीस ते फूटू (मशरूम) फूटीस*



*दुर्गा प्रसाद पारकर*

 

                        

छत्तीसगढ़ धान ले धनवान हे। तभे छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा कहिथन। ए बात जरूर हे कि अषाढ़  म बावत करके अग्घन पुस म मींज टोर के कोठी म धरे धान ल मुसवा कस कुटुर-कुटुर फोलत राह। सुकाल होगे त तो कोनो बात नही फेर दुकाल परगे त तो भारी जियानथे दुख तकलीफ ह। काबर के बाकी के छै महीना म तो कभू काम-बूता करेच नइ हे। जब छै महीना कमा के धान के कटोरा कहा सकथे त तो पूरा बारा महीना किसान कमातीन ते लछमी ह बारो महीना अपन हाथ ले रुपिया बरसाही। कुबेर कहातिन छत्तीसगढ़िया मन। फेर बारो महीना कमाए बर पानी जादा जरूरी हे अऊ इहें के अधिकांश रकबा गैर अपासी हे। महानदी अऊ शिवनाथ कस बड़े-बड़े नदिया होय के बाद घलो कभू कभू छत्तीसगढ़ महतारी के अंग अंग ह भादो म घलो पानी बर तरस जथे। एखर प्रमुख कारन हे सिंचाई के पर्याप्त साधन नइ बन पाए के। जघा जघा जब बांध नइ बने हे त फेर डोली से डोली तक नहर कहां ले पाये। पानी के अभाव म खेती संग किसान लरघाए ल धर लेथे। अभी तक ले खेती के लइक पर्याप्त पानी नइ गीरे हे। अइसन म तो मरे बिहान हे। न कोनो करा फुरफुंदी उड़त दिखय न कोनो करा गहिरीन कीरा रेंगत दिखय न फांफा उड़त दिखय। अरे भई जब फांफा नइ उड़ही त बादर कहां ले गरजही जब बादर गरजही नहीं त फूटू कहां ले फूटही। ओइसे भी एसो अथान खाए बर लुलवा गे हन फेर भगवान ले बिनती हे कि फूटू साग खाए बर लार टपकाए बर झन परय। ओइसे तो फूटू ( मशरूम) कतको किसम के होथे। कतको ह खाए के त कतको देखाए के। मशरूम के खेती म कतको के जीवन चलत हे। जऊन ह बारामासी हरे। कतको कर डर ग प्राकृतिक जीनिस के पार कृत्रिम ह नई पा सकय। काबर के कृत्रिम म वैज्ञानिक ढंग ले खेती करे बर ताप मेंटेन करे बर परथे फेर सावन भादो के फूटू बर अपने-अपन ताप मेंटेन रथे। बादर गरजीस ते फूटू फूटिस। मशरूम के बीज ह कृषि विश्वविद्यालय रायपुर म बाटल म मिलथे। गहूं के दलिया म बारीक मशरूम के बीजा ल मिंझार के पैरा कुट्टी म डार के पालीथीन म भर के मिंयार म लटका दे। चार-छै दिन म पैरा कुट्टी ह ढिड़हा कस बन जथे ताहन पालिथीन ल हेर के डोरी म बांध के पैरा कुट्टी ल लटका दे। बीस पच्चीस दिन बाद मशरूम ह कुट्टी के चारो कोती ले फूटथे। मशरूम म भारी प्रोटीन होथे कथे तभे तो भाव म घलो आगी लगे रथे। मशरूम घलो दू किसन के होथे। (1) बटन मशरूम ह बटन कस रथे। (2) अम्ब्रेला मशरूम ह छतरी कस छतराए रथे। वोइसे तो छत्तीसगढ़ म कतको किसम के फूटू पाए जाथे फेर चांउर फूटू अऊ कोदई फूटू ल ही खाए जाथे। कतको मन दूसर फूटू ल घलो खा लेथे। चांऊर फूटू ह चांऊर कस चकचक ले सादा रथे। जादा करके कन्हार म चांऊर फूटू ह फूटथे। गोल छितराहा बानी के रथे। कोदई फूटू ल कनकी फूटू के नाव ले घलो जाने जाते। कोदई फूट ह कोदई कस धूमलाहा रथे। एके जघा घमघम ले नानेच नान फूटे रथे। कतको कन राहय रांधबे ताहन पुच ले ताय। तेखरे सेती साग ल बढ़ाए बर चनादार नही ते कनकी ल मिंझार के रांधे ले चटनी कस थोर थोर पुर जथे। अऊ गजब के मिठाथे घलो। बोतका फूटू ह चीनी बांटी कस नही ते अंडा कस दिखते। छोटे-बड़े सबो किसम के होथे। जादा करके मुरमाहा नही ते परिया भुईंया म ए फूटू ह फूटथे। बोतका फूटू ह ठोस सुग्घर देखे के लइक रथे। भिंभोरा म जऊन फूटू फूटथे ओला पिहरी कहिथन। इही ल डोहरू फोटू घलो कहिथन। जतके कोड़बे ओतके पाबे | बम्हरी म फूटथे तेला बंबरी फूटू अऊ गोबर म फूटथे ओला गोबर फूटू कहिथन। घाम परते भार सबो फूटू ह गल जथे या फेर कीरा पर जथे। लकड़ी फूटू ह लकड़ी कस चेम्मर रथे। पींवरहू बानी के रथे। लकड़ी म एक अइसे फूटू फूटथे जेखर छतरी भर रहिथे। ए फूटू म तै पांव राख के खड़ा हो जबे तभो थोरको उद् नइ जले। पैरा फूटू ह कुसवाहा रंग के रखे। कटाए पेड़ म फूटू नइ फूटे। परपोसी होथे। मन भर के शोषण करथे। फूटू ह सबो जघा नइ फूटे। दियार मन जउन जघा दीमक बनाए रथे उही करा फूटू फूटथे। फूट साग खाए बर हे त झडी झक्खर म गांव जाए बर परही रे भई। 

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सगा आ हे पानी दे दे ओ दीदी*



*सगा आ हे पानी दे दे ओ दीदी*



*दुर्गा प्रसाद पारकर*


                        

छत्तीसगढ़ म पहुना ल देवता कस मानथन। काकरो भी घर चल देहू एकर सम्भा देखे बर मिल जही। कतको घर तो सुआ (मिट्ठू) ह लाल मिरची झड़कत पिंजरा म मस्त रथे। घर म कोनो सगा आवत देखिस ताहन गुरतुर बोली म कथे-'सगा आ हे पानी दे दे ओ दीदी ' अतका ल सुन के काम बूता म भूलाए दीदी ह धरा पसरा निकलथे लोटा म पानी घर के। फूलकसिया नही ते पेंदियही लोटा म पानी दे के 'ए लव पानी, गोड़ हाथ धो लव ' कहि के टूप-रूप पांव परथे। सगा ह थके मांदे गोड़ हाथ ल धो के जीव ल जुड़ाथे। कोनो मइके के सगा होगे ताहन का पूछबे, दीदी तो सबो काम बुता ल छोड़ के सेवा सटका म लग जथे। एक डाहर गोठियाते रही अऊ ओती चहा बर आगी ल सिपचाते रही। मान ले ददा आगे सगा त दीदी सबले पहिली पुछही  'त दाई बने बने हे ददा ? ददा कथा -हव बेटी , तोर दाई तो बने बने हे फेर थोकिन माड़ी ह फूटगे रिहिस हे। ओ दिन ओहा कोठी ले बदाक ले गीर गे रिहिस हे। बेटी ह पूछथे -  त जादा तो नइ लागे हे न ग ?, ददा बताथे-नही बेटी अभीन तो टन्नक होगे हे गांवे म इलाज पानी चलत हे। एकर पहिली मइके के जोराए मोटरी ल दे डरे रही-ए दे बेटी लइका मन बर तोर दाई ह रोटी पीठा जोरे हे ताहन फेर मिट्टू के दीदी ह अपन ददा ल चना होरा, मुर्रा नही ते लाई नास्ता म देथे। आज काल तो नास्ता म मिक्चर, बिस्कुट के जादा चलन होगे हे। चहा पियत पियत सियान ह पूछथे त दमांद ह कहां गे हे ओ? बेटी ह कथे - अभीच्च ओह खेत डाहर गिस हे, धान बोवई चलत हे न, चलत हे। चाय-ऊ पी के सियान ह खेत डाहर चल देथे। उहां दमांद ह देखते भार ललक के अपन ससूर के पलागी करथे। हाल-चाल पूछे के बाद भूर्री ठऊर म 'बइठे हे कहिके बइठार देथे।  अपन बेटी दमांद मन ल खुशी-खुशी देख के खुश राहय । खाए के बेरा होइस ताहन दमांद ह कथे 'चलव हो घर डाहर ' कहिके अपन ससुर ल घर लेगथे। घर म जाते भार दू लोटा पानी निकाल के देथे -'ए दे खाए बर पानी ' कही के। उंकर हाथ गोड़ के धोवत ले सरकी अउ पीढ़हा माढ़ जय रही। थारी म दार भात। दार म घींव। एक थरकुलिया म साग अउ कटोरी म चटनी परोसिस। झोर वाले साग म दार के जरूरत नइ परय। आजकाल तो ओन्हारी कमती होय ले दार ल सगा आथे उही दिन रंगोते ताहन आन दिन तो दरघोटनी ह टंगाए के टंगाए रही जथे। बटलोही ल देखत। पीढ़हा उपर पोरसाए साग भात ल लोटा के पानी ले हाथ के सहारा आचमन करके सबले पहिली धारी के कोर म भगवान ल जेंवा के अपन खाए के शुरूआत करथे। पीढ़हा खातिर पटनी के जरूरत परथे। वोइसे नेम के पीढ़हच्च बर लकड़ी नइ चिरवाए जाए। घर कुरिया उठाए के बखत कपाट, चौखट, पटान बर आरा मिल म लकड़ी के गोला ले पल्ला चिरवाए बर परथे। कपाट चौखट ले बाचे खोचे पटनी के पीढ़हा बनाथे बढ़ई मन। पटनी ल पीढ़हा खातिर आरी म आयताकार काट के रोखी म रोखे बर परथे ताहन डिजाइन वाले खुरा बनाधे, कतको मन बिना डिजाइन वाले खुरा ले पीढ़हा संवाग लेथे। खुरा बनाए के बाद लोहा के खीला ले पटनी अउ पाया ल जोड़े के बाद पीढ़हा तैयार हो जथे। बइठइया-उठइया मन ल पीढ़हा देच बर परथे। कोनो बइठे बर पीढ़हा नइ देबे त ओमन केहे बर नइ बिसरय-'फलानी घर बइठे बर गेन त बइठे बर पीढ़हा घलो नई दिस दई।' घर म माइलोगन मन पीढ़हा म बइठ के निकियाथे, फूनथे त बूता ह जल्दी सरकथे अउ कनिहा पिराए घलो नही। इही समे कोनो बइठइया आगे ताहन देख इंकर चांटी-चांटी गोठियई ल। लोक जीवन में पीढ़हा के बिक्कट उपयोग होथे। लइका ल बइठार के नहवाए बर होवय चाहे बिहाव अउ पूजा पाठ बर पीढ़हा के गंज उपयोग होथे। बड़े ल पीढ़हा अऊ छोटे ल पीढूली केहे जाथे।

पारकर


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सुरता// ठाकुर भला बिराजे हो...


 

सुरता//

ठाकुर भला बिराजे हो... 

   पहिली जब आवागमन के साधन बहुत कम रिहिसे, तभो श्रद्धालु मन तीरथ-बरत करत रिहिन हें. तब लोगन जादा करके रेंगत ही जावंय अउ अपन ईष्ट मन के पूजन- दर्शन कर के वापस रेंगत ही लहुट आवंय. तब ए तीरथ-बरत कर के लहुटे श्रद्धालु मन ल 'नवा जनम' धर के लहुटे हें, कहिके घर-परिवार के संगे-संग जम्मो गाँव भर के लोगन बाजा-रूंजी संग नाचत-गावत परघावंय.


    अइसने जब हमर गाँव ले जे मन भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन करे खातिर रेंगत  उड़ीसा राज के तीरथ जगन्नाथपुरी जावंय अउ जब उन लहुट के वापस गाँव आवंय, त उन  गाँव के तरिया तीर के कोनो मंदिर म या फेर बस्ती के अमाती म कोनो पीपर पेड़ के छाॅंव तरी रुक जावंय, अउ घर-परिवार वाले मनला अपन तीरथ-बरत के लहुट आए के आरो जनावंय. 


    तब घर परिवार वाले मन जम्मो गाँव वाले मन संग मिल के उनला माॅंदर, ढोलक, झाॅंझ- मंजीरा संग गावत-बजावत 'परघाए' बर जावंय.  अतेक दुरिहा ले रेंगत जाके तीरथ कर के लहुट आए लोगन ल 'नवा जनम' धरके आए हे, अइसे समझे जावय. एकरे सेती उंकर स्वागत म पूरा गाँव सकला जावय. ए बेरा म जेन भजन गाये जाय, वोला जगन्नतिहा गीत कहे जाय... 


ठाकुर भला बिराजे हो... 

उड़ीसा जगन्नाथ पुरी में भला बिराजे-2


ओड़िया मांगैं खिचरी

बंगाली मांगैं भात

साधु मांगै दर्शन महापरसाद

    ठाकुर भला बिराजे हो ....


काहे छोड़े मथुरा नगरी?

काहे छोड़े कांशी ?

झारखंड म आए बिराजे

वृंदावन के वासी

    ठाकुर भला बिराजे हो ....


नील चक्र में धजा बिराजे

मस्तक सोहे हीरा

ठाकुर आगे दासी नाचे

गावैं दास कबीरा

      ठाकुर भला बिराजे हो... 


***"

एक अउ गीत गाए जावय... 


भजन बोलो भगवान के

तोर नइया ल लगाही वो ह पार हो... 

ए भजन बोले... हो मुरली वाला के... 


    तीरथ-बरत कर के आए लोगन ल तब फूल, नरियर, कपड़ा लत्ता आदि भेंट कर के स्वागत करे जावय. उहू मन अपन संग म लाने महापरसाद देवंय. कतकों झन पातर बेंत के बने कोकानी लाठी अउ माला- मुंदरी घलो लाए राहंय, उहू ल देवंय.


-सुशील भोले-9826992811

गांव म रोका-छेका तईहा के चलत हे--*


 

*गांव म रोका-छेका तईहा के चलत हे--*


हमर ग्रामीण अंचल में लोक संस्कृति के भंडार भरे हवे। गंवई-गांव में किसिम-किसिम के तिहार माने जाथे, जेकर अलग-अलग संदेश भरे होथे। ग्रामीण संस्कृति के जुड़ाव सोझे प्रकृति ले जुड़े होथे। प्रकृति अउ गाय-गरु के असली संगवारी ओकर रखवार गांव के मनखे मन ही बने हवय। गाय-गरुवा बिना गांव के कोनो काम नई होय सकय। गांव के कृषि संस्कृति म गाय-गरुवा मन के अब्बड़ महत्व हवय। गाय-गरु अउ प्रकृति ले जुड़े के सेती गांव के मनखे मन जादा ठहिल होथे। गंवईया मनखे के जादातर सबो आवश्यकता के पूरती घलो गंवई-गांव ले ही हो जथे।


गांव म रोका-छेका तईहा जुग ले चलत हवय। जेला गांव मे रऊत के लऊठी लेना के नाव ले जाने जाथे। धान बोय के पन्द्रह-बीस दिन बाद जब धान हरियर-हरियर दिखे ल लगथे,अउ उही बेरा म गरुवा मन हरियर चारा देख के चरे बर खेत के भीतरी में खुसर जथे। तब ये रोका-छेका के उदिम करे जाथे। गांव म जादातर बुधवार-रविवार के दिन तिहार सही मानके शुरू करे जाथे। ओकर बिहान दिन ले रोज बरदी चरईया रऊत मन गरु-गाय मन ल खैरखाडाँड़ म छेके के चालू करथे। यही सेती येला रोका-छेका के नाव के जाने जाथे। अभी छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल पोठ करैया वर्तमान सरकार घलो रोका-छेका अभियान के नाव ले हर साल 1 जुलाई के कार्यक्रम ल तिहार सही मनाथे। जेहर ओकर ठेठ छत्तीसगढिहा होय के बडका कारण हरे।


लउठी लेय के दिन बिहिनिया ले तिहार के सेती महतारी मन घर-अंगना के लिपई-पुतई ल घलो जल्दी कर डारथे। फेर रउत मन हूम-धूप नरियर-फाटा धरके गांव के खैरखाडाँड़ म बिराजे सांहड़ा देव के तीर म पहुँच जथे। गांव के बैगा अउ सियान मन के गोधन के मंगल कामना अउ बढ़वार बर सुमरन करत पूजा-पाठ के संग रउत मन के नवा बनाके लाये तेंदू के लउठी के घलो पूजा करे जाथे। पूजा के पीछू लउठी ल सांहड़ा देव के सुमरन करत अपन कर रख लेथे अउ इहि ल रऊत मन के लउठी लेवई के नाव के जानथे। फेर गाय-गरुवा मन ल एक जगह छेके के शुरू हो जाथे।


इहि दिन ले गांव भर के मनखे मन अपन सबो गाय-गरुवा मन ल बिहिनिया ले खैरखाडाँड़ म लाके रउत के हाथ म चराय बर सौप देथे,अउ रोका-छेका अभियान के सुघ्घर शुरुआत हो जथे। गांव के जम्मो गाय-गरुवा के मालिक मनखे मन आज ले चराय के शुरुआत होत हे कहिके अपन बरदिहा मन बर सेर चाँउर जेमे चाँउर, दार, साग,नून, मिरचा सुपा म धरके बिहिनिया ले गरुवा मन संग ले आथे,तेला सांहड़ा देवता कर खड़े रउत मन ल भेंट करत देय जाथे। रऊत मन परेम से अपन मालिक के देय सेर चाँउर ल रख लेथे। येला साल भर बर गरुवा चराय के परेम-बंधन म बंधे के सेती भेंट कही सकथन। रऊत मन के साल भर के कमई ल धान-कोदो ल मिंजे के बाद देय जाथे। तेला जेवर देवई कहे जाथे।


बरदी छेकाय के बाद किसान मन के जीव हाय लगथे। काबर के अब गाय-गरुवा मन उँकर फसल के नुकसानी नई कर सकय। फेर बिना फिकर के खेती-किसानी के बुता शुरू हो जाथे। कई ठन गरुवा मन हरहा-हरही घलो रथे,ओमन बरदी में अउ गरवा मन संग चरना पसंद नई आये ओला तो अकेला निकल के सोतंत्र चरना बने लगथे। रउत भैया मन कर एकरो उपाय रथे। जादा अतलंग करईया गरुवा मन के नरी में खड़पड़ी,घण्टी,टेपरा,झूला,लहंगर,लादका घलो बांध देथे। फेर उँकर अलगाये के बेरा म चरईया रउत मन ल पता हो जथे अउ ओमन ल छेक म फेर बरदी म संघेर लेथे।


गांव म जादा हरही-हरहा गरु-गाय जेहर बरदिहा मन ले छुट के नंगत भाग जाथे। अईसन भगईया गरुवा मन के कतिक पीछू परे रही। उँकरो बर गांव के मन घलो छेके के बेवस्था करे बर एक ठन अउ उदीम रखे रथे। जेला मुड़का केहे जथे। मुड़का में गांव भर के लोगन मन के पारी चार-पांच घर के मनखे मन संग रोज के ओरी-पारी लगथे। येमन अपन-अपन पारी म गांव के जम्मो खार कोती दिन भर घुमत हरही-हरहा गरुवा मन ल देखत रथे। कहूं ककरो गरुवा ल खेत म चरत देख डारिन त ओला सबो झन छेक बांध के गरुवा वाले घर अमरा देथे। अउ तुंहर मुड़का लगगे कहिके बता देते। फेर ओ किसान ल गांव म तय मुड़का के दाम धान-पैसा ल देय ल पड़थे। जेहा मुड़का पारी वाले मन के होथे। येकर ले भगईया गरुवा वाले किसान मन गरुवा ल मत भागे अईसन उपाय रउत भैया मन संग मिलके करथे। फेर उही खड़पड़ी, झूला,लहंगर,घण्टी बांधे के जोरा करथे। सबो फसल लुवाय के पीछू मुड़का पारी अवइया साल के आत ले बन्द रथे। अउ रऊत मन के बरदी चरई ह फागुन तिहार के बाद छेलला हो जथे।


गंवई-गांव के किसान मन अइसने ढंग ले रोका-छेका के उदिम ल करत अपन खेती-किसानी के जब्बर बुता एक-दूसर के बने परेम ले सहयोग ल करत अउ सबो जीवधारी मन बर जेवन के बेवस्था करत धरती दाई के सेवा करत रथे। 


          हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगांव


छत्तीसगढ़ी अस्मिता अउ स्वाभिमान के प्रतीक : ढेंकी*


 

समीक्षा

*छत्तीसगढ़ी अस्मिता अउ स्वाभिमान के प्रतीक  :  ढेंकी*


       हमर छत्तीसगढ़ संस्कृति, बोली-भाखा, रीत-रिवाज अउ लोकसाहित्य ले अपन अलगे चिन्हारी रखथे। कोनो भी परम्परा ह एक समय के पाछू संस्कृति के रूप म बदल जथे। छत्तीसगढ़ राज बर जउन भी आन्दोलन होय हे, वो सबो शांतिपूर्ण रहे हे। राज बन भी गे, फेर अपन राज बने के अपन सुख आजो नइ मिल पावत हे। छत्तीसगढ़ी ल ओ सम्मान नइ मिल पाय हे। जे कोनो राजभाषा ल मिलथे। भाषा संस्कृति के पोषक होथे। भाषा ले ही संस्कृति के बढ़वार हे, भाषा संस्कृति के संवर्धन बर खातू-पानी जस उपयोगी होथे। संस्कृति ल मिले गौरव ले अंतस् म अभिमान जागथे। अपन अस्मिता अउ अस्तित्व बर स्वाभिमान के होना जरुरी आय। अपन अस्मिता अउ अस्तित्व बर लड़ाई लड़े ल परथे। साहित्य ले साहित्यकार मन जागरण के अलख जगाथें। जन जन म चेतना भरथें। जनजागरण लाय म कहानी मन के बड़ भूमिका होथे। कहानी कोनो घटना ल लेके जिनगी ल नवा रस्ता दिखाय के बूता करथे। निराशा के अँधियारी ल मेट आशा के अँजोर बगराथे। कहानीकार मन अपन गढ़े पात्र मन के माध्यम ले कहानी म अपन विचार ल लिखथें। मानवीय मूल्य मन ल सहेज के समाज ल नवा दिशा देथें। समाज म फइले अंधविश्वास, कुरीति अउ आडंबर ल दूर खदेड़थें त दूसर कोती शोषण, भ्रष्टाचार, भेदभाव के विरुद्ध फौज खड़ा करथें। स्वाभिमान, अस्मिता अउ अस्तित्व बर संघर्ष करे के ताकत अंतस् म जगाथें।

        छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी अस्मिता बर जिनगी भर संघर्षरत रहे सुशील भोले जी मन छत्तीसगढ़िया समाज म जनजागरण लाय के उदिम म कतको आन्दोलन म भाग लिन। इँकर अलावा उन मन साहित्य के माध्यम ले जागरण के स्वर ल जन-जन तिर पहुँचाय बर कहानी लिखिन। उही कड़ी म 13 कहानी मन के संग्रह ढेंकी निकालिन। ढेंकी छत्तीसगढ़ी स्वाभिमान अउ अस्मिता के प्रतीक आय। राज बने के पहिली गँवइहाँ जिनगी म ढेंकी घरोघर पाय जावत रहिस हे। पौनी पसारी के बूता कमइया मन रोज बनी भूती ले के बनी म मिले धान ल कूटँय, तब जाके घर के चूल्हा म आगी बरै। आज के सहीं तब गाँव-गँवई के दूकान मन म चाँउर नइ बेचावत रहिस हे। काम के बलदा म धान मिलत राहय। जेन ल कूट के खावँय। सबो गाँव म मिल नइ राहत रहिस। ढेंकी गरीब मजदूर वर्ग के प्रतिनिधित्व करथे। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन ले जुड़े एक चिन्हारी आय ढेंकी।

         ए संग्रह के कहानी मन के संवाद मन अइसे लागथे, जना मना हमरे तिर तखार के गोठ बात हरे।जम्मो जिनिस मन आँखीं के आगू म फिलिम बरोबर दिखे लगथे। पात्र मन के मुताबिक संवाद लिखाय ले कहानी मन कोनो सच्ची घटना बरोबर लागथे। जेन मन ला कहानीकार ह अपन भाषई चतुरई ले कल्पना के पाग धरे लाड़़ू बरोबर बाँध डरे हे। भाषा के मिठास म  बूड़े पाठक कब कहानी ल पढ़ डारथे पार नइ पावँय। कल्पना के पाँख लगाय बिना कहानी म विस्तार नइ लाय जा सकय अउ अपन उद्देश्य ल पूरा नइ करे जा सकय। कुल मिला के ए कहे जा सकत हे कि कहानी मन अपन शिल्प म कहूँ मेर कोनो किसम के समझौता नइ करे हे। भाषा सरल सहज हे। पठनीय हे। मुहावरा अउ हाना मन ल बउरे ले कहानी के सुघरई बाढ़ गे हे।

       संवाद मन मन म गहिर छाप छोड़थे---"का करबे सेठईन..तुहीं मालिक मन घर ले काठा पइली पाथन, तेने ल अतके बेर कूट काट के राखथन, तभे चूल्हा बरथे....बइठे तक के फुरसुद नइ मिलय।"

       एक ठन अउ संवाद देखव, जेन म समाज के कर्ता-धर्ता मन के सुभाव म आय बदलाव ल सरेखत व्यंग्य हे अउ एक संदेश घलव हे---

" का करबे बेटी हमूँ मन तोरे जात समाज के होतेन त एती तेती कइसनो करके तोर हाड़ म हरदी चढ़ाए के बेवस्था ल करबे करतेन।फेर तोर समाज आन अउ हमर आन। कइसे ककरो घर उदुप ले चल देबे? तुँहर समाज के जतका झन हें...देखे भर के हें। ....समाज के नाँव म सिरिफ राजनीति करे...समाज के मन मरय ते बाँचय....।"

     हमर संस्कृति अउ संस्कार ल बट्टा लगइया मन ऊप्पर बरसत अपन अंतस् के पीरा ल कहिथे..." कहाँ ले दिखही बेटा कमाए-खाए ले आए रिहिन हें, फेर अब तो इही मन इहाँ के मालिक बनगे हें, हमर संस्कृति इतिहास अउ चिन्हारी के प्रवक्ता बनगे हें। ए मन लोगन ल हमर बारे म जइसन बताथें, चिन्हाथें, तइसने लोगन हम ल जानथें, चिन्हथें।"

      अब कुछ कहानी मन के स्वर के गोठ बात कर लन। 

       संग्रह के नाँव ऊप्पर के कहानी ढेंकी म नियाव के बखत कोनो छोटे-बड़े नइ होवय। सब बरोबर होथे। नियाव सब ल मिलही। नियाव म भेद नइ करे जाय। इही सब बात के परछो मिलथे। अब वो जमाना गय जब गाँव पंचइत म नियाव मनखे चिन्ह के होवत रहिस। कहानी के छेवर ह मुंशी प्रेमचंद जी के पंच परमेश्वर के सुरता करा गिस।

         गुरु बनावौ जानके म विकास के लालीपाप धरा के हमर संस्कृति अउ परंपरा ल मेटत हम ल लुटइया मन ले बाँचे बर चेतवना हे।

         धरम युद्ध म राम राज के मरम अउ महत्तम ल बताय गे हे। अपन राज म अपने मनखे ल राजा के रूप म देखे के सपना पूरा होवत दिखाय गे हे। साँस्कृतिक हमला के कथानक ऊप्पर लिखे कहानी म बाहरी अउ स्थानीय म फरक करे के मूल स्वर हे।

         "धरमिन दाई" पात्र ल ही दान दे के संदेश देथे। पात्र मनखे नइ मिले ले समाज ल दान करके सामाजिक हित म धन दौलत लगाना चाही। जेकर ले समाज के उत्थान हो सकय। एकर संग कहानी म नारी शिक्षा बर बड़ संदेश हे।

      संसार के चक्र ल बनाय रखे म कन्या दान जरुरी हे। बेसहारा अउ अनाथ बेटी के बिहाव रच के पुन कमाय के नवा रद्दा दिखाय के कहानी आय "नवा रद्दा"। जेन म 

       "एंहवाती" छत्तीसगढ़िया का?पूरा भारतीय समाज म विधवा के जिनगी ल सँवारे के उदिम म करे गे बेवस्था ल सही ठहरावत सुग्घर पारिवारिक अउ सामाजिक कहानी  आय। जे समाज म नारी ल हँसी खुशी के संग जिनगी जिएँ के मौका दे के रस्ता खोलथे। 

          "अमरबेल" क्षेत्रीयता के स्वर ल मुखर ढंग ले पिरोए हे। अमरबेल प्रतीक के रूप म उपयोग करे गे हे। जउन ल परदेशिया मन बर बउरे गे हावय। परदेशिया मन हमरे आसरा लेके हमीं ल कइसे चूस डरथे? मन के बात गड़रिया जानै। इहीच भाव परदेशिया मन के अंतस् म रहिथे। जेन उजागर नइ होय। इही बात ल अमरबेल म कहानीकार मन रखे के उदिम करे हें।

       बड़े आदमी ( गाँव के धनी मनखे अउ नेता/सरपंच मन)के चतुरई अउ गाँव के विकास म भेंगराजी मारे के पोल खोलथे। संगेसंग सरकारी योजना मन के बंदरबाट कइसे होथे? एकर बढ़िया चित्रण "बड़े आदमी" म होय हे।

      डंगचगहा कहानी आस्था, विश्वास के भरोसा मया(प्रेम) के मँझधार म झूलत चंदा के एकतरफा प्रेम कहानी आय।

        "बलवा जुलूम" छत्तीसगढ़ के विकास म बाधा अउ बड़का समस्या नक्सलवाद के कथानक ले सिरजाय गे हे। नक्सली, पुलिस, सेना अउ नेतामन ले त्रस्त आम आदमी के पीरा ल परतवार खोल के रखे म कहानी सक्षम हे। कहानी म नक्सली अउ रक्षा म तैनात रक्षक मन के चरित्र (करिया मन) ल उघार के रख दे हे। कहानी म उँकर करतूत ल पढ़ के मन म आगी लग जथे। उँकर घिन बूता अउ विभत्स रूप ले सलवा जुडूम के दिशाहीन होय के सबूत मिलथे। तभे कहानीकार ह कहानी के नाँव बलवा जुलुम रखे हे।

          संग्रह के आखरी कहानी के शीर्षक मन ल सुख पहुँचाथे। किताब के समापन सुख ले होय म मन म शाँति हमाथे। शिक्षा ले जिनगी के जम्मो सुख पाए जा सकथे, जिनगी म शिक्षा बड़ जरूरी हे। इही संदेश देवत कहानी "मन के सुख" अंजलि के संघर्षमय जिनगी के राम कहानी आय। हाँ! अंजलि के डॉक्टर बने के बात थोकन अचरज लागिस। चौथी तक पढ़े अंजलि सग्यान होय ले गिरहस्थी जिनगी म पहुंचिस अउ फेर गिरहस्थी टूटे के पाछू पढ़ई करत डॉक्टर बनई ह मोर समझ नइ आइस। हाँ! लेखक ल हक हे, के पात्र ल कइसे गढ़ना हे? अउ कहानी ल कइसे मोड़ देना हे अउ कोन मेर खत्म करना हे? 

           ए संग्रह के मूल स्वर तो छत्तीसगढ़िया अस्मिता अउ संस्कार ल समेटे क्षेत्रीयता ल सजोर करे के हावय। क्षेत्रीयतावाद ह राष्ट्र हित म सही नइ होवय। राष्ट्रीयता के मार्ग म क्षेत्रीयता ह बाधा आय। फेर भारत जइसन देश बर क्षेत्रीयता ह माला के एक ठन मोती सहीं होथे। जउन ल राष्ट्रीयता के सुतरी म पिरो-पिरो के माला ल पूरा गुँथे जा सकत हे। बस क्षेत्रीयता ह कट्टरता के हद ल पार झन करँय। संस्कृति अउ परंपरा लोगन ल जोर के रखे के बड़का बँधना आय। इही म बँध के ही मनखे सही मायने म अउ आने जीव मन ले श्रेष्ठ होथे। एक-दूसर के क्षेत्रीय संस्कृति, परंपरा, संस्कार अउ रिवाज ल कमजोर झन करन। नइ तो अवसरवादी मन अपन मकसद म कामयाब हो जही।

         ए संग्रह के आधा ले जादा कहानी मन बहुत पहिली लिखे गे कहानी आय, फेर इँकर प्रासंगिकता आजो हे। पाठक के मन ल जरूर हरषाही। सुग्घर-सुग्घर कहानी मन के बढ़िया संग्रह बर कहानीकार सुशील भोले जी ल बधाई अउ शुभकामना पठोवत हँव।


*संग्रह - ढेंकी (द्वितीय संस्करण)*

*कहानीकार - सुशील भोले*

*प्रकाशक - स्मृति प्रिंट हाऊस रायपुर*   

*वर्ष  - 2020*

*मूल्य - 260/-*

*पृष्ठ - 112*


✍️ *पोखन लाल जायसवाल*


पलारी (पठारीडीह)

जिला -बलौदाबाजार छग.

9977252202