Friday, 8 July 2022

मंगतुगुड़ी अउ चीतवाडोंगरी के नामकरण*





*मंगतुगुड़ी अउ चीतवाडोंगरी के नामकरण* 



  *दुर्गा प्रसाद पारकर*                         


      छत्तीसगढ़ म गांव मन के नाव ह अइसने नइ धरा गे हे। कोनो करा आमा होवत रिहिस त ओकर नाव आमगाँव अउ कोनो करा जाम (बिही) बगीच्चा म मनखे मन बसीन त ओ गांव के नाव ह जामगाँव परगे। अइसने किसम ले कतको जघा ह सुजानिक मन के सेती जाने जाथे जेकर प्रमाण हे कमकापार ले भंडार मुड़ा बसे मंगतुगुड़ी के। ए गुड़ी के आगु दूरिहा दुरिहा ले सोर उड़े अउ काबर नइ उड़तिस काबर कि ओ गांव म ओ समे मंगतू बाबा राहत रिहिस। जेला मंगतू ठाकुर के नाव ले जाने जाय । ठाकुर जी ह सत्य के उपासक रिहिस हे। उहें के तीर तार वाले मन बताथे कि एक घांव के बात आय जब गांव के सियान ह लकड़ी फाटा लाए बर सिवनी गे रिहिस। आवत-आवत रद्दा म ओकर गाड़ा के दुनो कनखीला निकल गे। कनखीला के निकले ले चक्का हिट (निकल) गे। कोनो चिन्ह न पहिचान अब कइसे करँव कहिके सियान ह तरवा धर के बइठ गे । जंगल म मउत ह दिखे बर धर लिस जग जग ले फेर कोनो करा आसरा के ठिकाना नइ दिखिस |आखिर म हलाकान हो के ओ सियान ह मंगतु ठाकुर के सुमिरन करिस- बबा कोनो तोर सत ह आजो हे त अपन सत के ताकत ले ए साधक के रक्षा करो, रक्षा करो मेंहा तोला दू नरियर चढ़ाहूं  कहिके बदना बदिस। सत के प्रताप ले लकड़ी ले भराए ओकर गाड़ा ह गांव आगे। बिना कोनो रोक - छेक के।

अइसने अउ कानो गोठ हे जेकर ओ डाहर कतको प्रमाण मिलथे। काकरो मवेशी कभू गंवागे त पवित्र मन ले बाबा के सुमिरन करे ले मवेशी ह हाथ लग जथे। लांघन भूखन मनखे ओकर कुंदरा म सरन लेवय। बाबा ह बिमरहा मन के सेवा करय तिही पाय के लोगन मन परमार्थी पुरुष काहय 

 तभे तो ओकर नाव म अतना ताकत रिहिस हे।

ओकर इंतकाल (निधन) के बाद आजो घलो ओकर देवता अस पूजा पाठ करके असीस लेथे। पहिली बाबा के आसन ह लकड़ी के रिहिस। उही करा श्रद्धालु मन अपन मनोकामना बर पूजा पाठ करय। मनोकामना पुरा होवत गिस ताहन ओ आसन ल माटी के बनवइन कुछ दिन के गे ले पखना के पक्का

बनवा डरे हे। गंवाए माल मत्ता मिले के बाद इही - गुड़ी म माटी के गाय, बइला, नही ते घोड़ा चघाए के बहाना अपन श्रद्धा फूल ल चघाथे। आजो घलो सड़क के कोर म बने मंगतूगुड़ी म कतको बइला घोड़ा अउ गाय के मुरती देखे जा सकत है। आजो घलो मंगतू ठाकुर के मंगतू गुड़ी ह आस्था अउ बिसवास के केन्द्र आय।

मंगतू गुड़ी ले आधा किलोमीटर आगु डाहर जाबे त सड़क के डेरी बाखा म भारी जंगल हे तेंदू  ,आंवरा, लीम अउ हर्रा बहेरा के। इही जंगल म एक ठन नरवा हे जिंहे बाघ, चीता, तेंदुआ मन सुसी भर पानी पीयय। इसी जंगल झाड़ी के बीच म अंदाजी पैतालीस पचास फुट ऊंच पहाड़ी हे जेला डोंगरी के नांव ले जानथन । इही डोंगरी के आजु बाजु दू ठन गुफा हे। एक ठन नान्हें हे त दूसर ह बड़े जन। छोटे गुफा के मुहाटी ह अढ़ई फीट व्यास के अउ बड़े गुफा के मुहाटी ह करीबन दू फीट व्यास अतका होही। भीतरी देखबे त भारी डर लागथे। काबर कि भीतर म दस गियारा फीट खोह हे जउन ह खाल्हे डाहर सुल्लू  (सकरा )होवत गेहे। आगु डाहर जा के जेवनी डार मुरक जथे। अइसे केहे जाथे ए गुफा मन म चीता राहय तिही पाए के एला चितवा डोंगरी केहे जाथे । चीता ह इही गुफा म दिन भर अराम करे के बाद संझा कना गुफा के उप्पर आ के बइठ जाये। जिंहा ले दु तीन किलोमीटर तक हरखेली (असानी से) देखे जा सकथे। अइसे लागथे कि चीता ह अपन शिकार खातिर ठीहा ल बनाए होही। जउन जघा म चीता बइठे ओ जघा ह गुफा ले दस फूट ऊंचा म पखना ले बने मचान कस लागथे।

इकराज सिंह भामरा के मानना हे कि चीता ह समतल भुईंया कस ढिलवा, अखरा-पखरा अउ जंगल झाड़ी म जल्दी चढ़ - उतर सकथे। तभे तो अइसन अड़चन वाले जघा म राहत रिहिस हे। काबर दुसरा जानवर मन म अइसन विशेषता देखे बर नइ मिले। पहिली कस अब न जंगल हे न जीनवर तभे तो एकर माड़ा म अब चीता घलो नइ दिखै। एक डाहर हमन जंगली जीव जन्तु के जतन करो कथन अउ दूसर डाहर जंगल ल उजाड़त जाथन त उमन तो अइसने बिन मारे के मारे मरत जात हे। अब बतावौ कहां राखे जाये। कभू समे अइसनो आ झन जय के सरकस म घलो सेर अउ भालू देखे बर नइ मिल पाही का?

दुर्गाप्रसाद पारकर

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गुनान गोठ-सरला शर्मा


 

गुनान गोठ-सरला शर्मा

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   असाढ़  पुन्नी अवइया च हे त सुरता आइस बड़े फूफू कहय  साल के बारहों पुन्नी मं असाढ़ पुन्नी के बड़ महात्तम हे काबर के इही पुन्नी के दिन गुरु के पूजा , अर्चना करे जाथे तभे तो एला गुरुपूर्णिमा कहिथें । हाथ जोर के बिनतीं करय " अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया , चक्षुः उन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः । " 

  उषा नोनी चिचिया के कहिस " बड़े फूफू ! अतेक कठिन श्लोक याद नइ होवय तेकर ले सुरता राख लिन न ..के आजे के दिन पांच झन शिष्य मन महर्षि वेद व्यास के सदेह पूजा करे रहिन तेकरे सेतिर आजो लोगन गुरु पूजन करथें । " 

शरद कइसे पिछुवाये रहितिस चट ले फोरन दिहिस "  वेद  व्यास के जनमदिन घलाय तो आय उही हैपी बर्थडे ...। " 

    सुरता के बादर तो आय जेला बरसे बर असाढ़  सावन तो लागय नहीं जब तब बरसे धर लेथे ..फेर कहे गए हे न के जेन मनसे हर अज्ञान के अंधियार ल ज्ञान के अंजोर ले दुरिहाथे , आँखी ल जग जग ले उघार देथे अइसन गुरु ल प्रणाम । ठीके कहे होही भाई फेर एहू विचार तो मन मं आबे करथे के तइहा दिन मं गुरुकुल रहय जिहां राजा , प्रजा , गरीब अमीर सबो के लइकन मन एके संग रहयं , पढ़यं , खेलयं खावयं अतके नहीं एके झन गुरु रहय । धीरे धीरे समय बदलत गिस , जघा जगह स्कूल खुलत गिस , शिक्षा व्यवस्था बदलिस , परीक्षा पद्धति लागू होइस त हर कक्षा मं गुरु बदले लगिन । आजकल के लइकन मन के तो स्कूल , कॉलेज के गुरु अलग त ट्यूशन , कोचिंग के अलग होथें ओहू विषयवार , भाषावार गुरु ..। बपुरा लइका मन कोन ल गुरु मानयं ?सबो गुरु तो अज्ञान ल दुरिहा के ज्ञान देथें । नहीं भाई ! आजकल शिक्षा देना , ज्ञान देना हर नौकरी हो गए हे इनमन ल शिक्षक कहना ही ठीक हे गुरु नहीं ...। ठीक बात हे त गुरु काला कहिबो ? धर्म के ज्ञान देवइया ल ? ओहू तो अलग अलग होथें कोनो गुरु राम के कोनो रहीम के कोनों ईश्वर  के ज्ञान देथें । थोरकुन आउ आघू आए ले देखथन के तकनीकी विकास के चलते सोशल मीडिया के माया बगरे हे उही व्हाट्सएप , फेसबुक , ब्लॉग , यू ट्यूब , इंस्टाग्राम कतका न कतका झन ज्ञान बांटत हें , सबले बड़े गुरु तो गूगल महराज रात दिन ज्ञान देवत हे । बड़ा मरन होगिस जी काला गुरु बनाईं काकर पूजा करिन ? 

      कोन ल साक्षात् परब्रम्ह कहिबो , कोन हर अखण्डमंडलाकारं व्याप्तम्  आय ? मूड़ पिराये बार सुरु कर दिस । 

            भाषा के विकास के संगे संग जन जीवन मं विज्ञान , चिंतन , धर्म , आध्यात्म के स्वरूप हर बदलत गिस ए बदलाव ल मनसे ल स्वीकार करे च बर परही ..गुरु शब्द हर भी इही विकासवाद के प्रक्रिया से गुजरत आवत हे । जीवन मं जेकर से भी ज्ञान मिलिस , सीख मिलिस ओहर गुरु आय तभे तो दत्तात्रेय महराज चौबीस ठन गुरु बना डारिन । 

 गुरुपूर्णिमा जरूर मनावव , 5 सितम्बर के शिक्षक दिवस घलाय मनावव कोनो किसिम के उजर आपत्ति नइये । मूल विचार ऊपर ध्यान अटक गिस के जीवन मं  जेकर से भी , जौन विषय के ज्ञान मिलिस , चाहे ओहर उमर मं कतको छोटे होवय , कोनो भी जात धर्म होवय ओकर सनमान गुरु रूप मं करना चाही इही हर आधुनिक रूप से गुरुपूर्णिमा मनाना होही । अईसे करतेन का ? ऐसों के असाढ़ पुन्नी माने गुरुपूर्णिमा के दिन फोन पूजा अपना लिन ...ओ हो ..नइ समझेव ? अरे भाई ! जेन मनसे से जब कभी ज्ञान मिले हे ओला फोन कर लेवव ..। फूल , नरियर , चन्दन  अगरबत्ती घलाय बांच जाही । असल बात तो मन के श्रद्धा , विश्वास , कृतज्ञता हर आय । नहीं ..नहीं ...अपन रुचि , श्रद्धा अनुसार गुरु मंत्र घलाय जप लेवव कुलगुरु बर खीर बना लेवव , नरियर सुपारी , होम धूप , गुरु वंदना , पूजा अर्चना कर लेवव ...चिटिकन थिरा के आधुनिक फोन पूजा उपर घलाय विचार कर लेतेव जी ...बुधियार , पढ़इया लिखइया मन----


सरला शर्मा

व्यंग्य---योजना

 व्यंग्य---योजना 

                    प्रदेश के मुखिया संग , योजना आयोग के बइठक चलत रहय । योजना आयोग के उपाध्यक्ष हा भड़कत कहत रहय – खैरात म बांटे बर बंद करव । तुँहर अइसन बूता के सेती हमर जम्मो खजाना खाली होवत हे । अब अइसन बूता बर , हमर करा कन्हो फंड निये । तूमन शुरू करे हव , तुहीं मन अइसन योजना ला , अपन पइसा म चलावव । प्रदेश के मुखिया किथे – समे के मांग के हिसाब से योजना सुरू करे रेहेन बाबू .... तैं का जानबे .. ? सरकार बनाये खातिर अइसन करेच ला परथे गा ...... । कन्हो ला , एक रूपिया दू रूपिया किलो म , चऊँर दे के , ओकर पेट भरना गलत हे का ..... ? उपाध्यक्ष किथे – गलत कहीं निये , फेर सस्ता राशन के चक्कर म गरीब के संख्या , उदुप ले बाढ़गे , तबले , हमूमन गरीबी के लइन म आगेन । मुखिया किथे – असल म योजना ला हमन , सिर्फ बोट बर लाने रेहेन फेर , को जनी , कब बोटर मन घला जुड़गे एमा , तेकर सेती , खरचा बाढ़गे । योजना आयोग किथे – चाहे कहीं होय , हमर देश के मुखिया हा .... अब अइसन योजना बर , पइसा दे बर , मना करत हे , तूमन , अपन अपन , बेवस्था कर लेवव । 

                    दूसर दिन प्रदेश म , केबिनेट के बइसका म , समस्या के समाधान बर मंथन चलत रिहीस । जम्मो मंत्री मन अपन अपन सुझाव दीन । सार्वजनिक निर्माण बिभाग के मंत्री बताथे – सर , जम्मो सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला हमर बिभाग ला दे दव । मुखिया किथे – एकर ले काये होही ? मंत्री किथे – सिर्फ लीपापोती ....। कागज म चिक्कन सड़क बना सकत हन , त ये बहुत छोटे बूता आय हमर बर । सिर्फ बजट बनही , खरचा के आवश्यकता निये ... । मुखिया किथे – अरबों रूपिया के बजट ला तुँहर अधिकारी मन सड़क कस लील दिहीं तैं देखते रहि जबे ...... । तोर से नइ हो सके । मंत्री जवाबलेस होगे । 

                    सिचाई मंत्री किथे – सर , जम्मो सिस्टम ला मोला दे दव । चार दिन म खरचा म नियंत्रण हो जही । मुखिया किथे – पानी के नियंत्रण बर जे बांध बनाये हस तेमा , कतका पानी नियंत्रित होइस हे ....... ? दूधो गे दुहना घला गे , बांध अऊ पानी संघरा बोहागे ....... । तहन फसल बोहागे , मनखे बोहागे , जानवर बोहागे , मुवावजा बाँटत हमर कतको बोहागे ...... । कलेचुप बइठगे ।

                    संस्कृति मंत्री किथे – मोर करा वइसे भी कन्हो बूता निये । में सिर्फ , राजिम म कुम्भ कराथँव , कभू कभू साहित्य के सम्मेलन अऊ बछर म एक बेर , राज्य महोत्सव । में सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला बहुतेच नियंत्रण कर सकत हंव । मुखिया किथे – न तोर कुम्भ म ठिकाना , न कन्हो महोत्सव म .... , इनाम बाँटथस तिही म अंगरी उच जथे .... तैं का कर सकबे .....  नानुक बजट तोर से सम्हलत निये , तैं अतेक बजट के बूता ला काला संभाल सकबे .... तोर करा का योजना हे तेला बता .....। मंत्री किथे – काम हाथ म मिलही तब योजना बनाबो .......। 

                     बित्त मंत्री किथे – मोला लागथे अब ये काम ला सीधा , हमर नियंत्रण म दे देना चाही । हमन जइसे चहापत्ती ला ऊँच म टांग के .... गोंदली ला टिलिंग म चइघाके , जनता ला पदोथन तइसने , सस्ता राशन ल अइसे ऊँच म टांगबो के .... कन्हो अमर झिन सकय । जे अमर पारही , ते टेक्स म , मर जही ... । मुखिया किथे – येमा हल्ला होये के चांस हे । चुनई लकठियागे हे , तोर योजना म वोटर ते वोटर , बोट तको दुरिहा जही ...... । 

                    स्वास्थ्य बिभाग के मंत्री कलेचुप बइठे रहय । मुखिया किथे – तहूँ कुछ तो बोल .... । वो किथे – मैं का कहँव सर । जे योजना ला सुरू करथन , बदनामेच होथन । अऊ सरकार के किरकिरी होथे । आँखी के आपरेशन के अभियान चलाथन , त कतको झिन के , आँखी फूट जथे । परिवार नियोजन म , पेट म कैची छूट जथे । साँस के तकलीफ दुरिहाये बर लाने , आक्सीजन के सिलेंडर हा , बड़का बड़का कारखाना म लग जथे । फेर एक बात हे मुखिया जी ... मोला सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला दुहू ते , कुछ महीना म तुँहर समस्या के , समाधान हो सकत हे । मुखिया किथे – कइसे ? स्वास्थ्य मंत्री किथे – फकत एक बेर घोषणा भर कर दव के , सार्वजनिक बितरण प्रणाली के सस्ता राशन , अस्पताल ले मिलही कहिके ...... । मुखिया पूछिस – येकर ले का होही ? स्वास्थ्य मंत्री किथे – जनता जानत हे , सरकारी अस्पताल के हाल ला । इहाँ आये के बाद बहुतेच कम सौभाग्यशाली मन , सकुशल वापिस जाथे , तेकर सेती , कन्हो सरकारी अस्पताल के चौंखट म पाँव दे बर सोंचथे ..... । सस्ता राशन के योजना ल , ‌हमन ला बंद करे बर नइ लागे , हमर अस्पताल म राशन बिसाये बर .... कन्हो आबेच नइ करही , त खुदे , कुछ दिन म योजना अपंने अपन चुमुकले बंद हो जही । पूरा पइसा बाँच जही ....... । चुनाव समे , जनता ला मुहुँ देखाये म घला कन्हो परेशानी नइ होय । हमन , कहि सकत हन के , हमन तो दे बर तियार रेहेन .... फेर कन्हो झोंके बर .... तियार निये । केबिनेट म प्रस्ताव ला मंजूरी मिलगे । चार महीना म , प्रदेश म सस्ता राशन झोंकइया के संख्या शून्य होगे । प्रदेश के गरीबी पूरी तरह ले दूर होगे । गरीब मुक्त राज्य ला यू. एन. ओ. म पुरुस्कार झोंके बर बलाये गेहे ...... ।     

 हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

Friday, 1 July 2022

गुनान -सरला शर्मा राम कथा ( राम चर्चा ) लेखक मुंशी प्रेमचंद ...




 

गुनान -सरला शर्मा

     राम कथा ( राम चर्चा ) लेखक मुंशी प्रेमचंद ...

 प्रकाशक ....साहित्यागार    एस . एम . हाइवे जयपुर 

संस्करण ....1992 

     अभी तक मैं मुंशी प्रेमचंद के साहित्य ल समाज , परिवार , देश , राजनीतिक फेर बदल के बारे मं पढ़त आए हंव चाहे कहानी होवय , उपन्यास होवय या लेख होवय फेर राम कथा सुन के चिंहुंक गएवं ..। एक ठन साहित्यिक ग्रुप मं लिख देहेवं के ये कोनो आने प्रेमचंद होही त बुधियार साहित्यकार दिनेश कुमार गर्ग कहिन " किताब के पीछू डहर मुंशी प्रेमचंद के आने किताब मन के नांव घलाय तो छपे हे दूसर बात के डॉ. हरि महर्षि लिखे हें " राम कथा " मुंशी प्रेमचंद की अनचीन्ही रचना है ..........

रोचक शैली और सरल सुबोध भाषा में प्रस्तुत करने का प्रेमचंद का स्तुत्य प्रयास है । " 

    पेट भर सांस लेके पढ़े बर शुरु करेवं ...फेर मन तो बगटुट भागे लगिस, गुने लागेवं अरे भाई ! तइहा दिन ले तो रामकथा लिखत आवत हें साहित्यकार मन ...त मुंशी प्रेमचंद असन प्रतिष्ठित लेखक ल रामकथा लिखे के जरुरत काबर पर गिस ?

साहित्य ल हमन वाचिक परम्परा अउ शिष्ट साहित्य के रुप मं जानथन फेर वाचिक परम्परा के साहित्य संग ही लौकिक साहित्य दूध मं पानी कस मिले मंझरे मिलथे । रहिस बात राम कथा के त वाल्मीकि रामायण , आध्यात्म रामायण ल जानथन फेर सबले ज्यादा लोकप्रियता मिलिस तुलसीदास के रामचरित मानस ल इन तीनों पोथी के अनुसार तो राम के जन्म त्रेता युग मं अयोध्या के राजा दशरथ अउ महारानी कौशल्या के घर होए रहिस ...माने राम अवतारी पुरुष रहिन ...फेर हाड़ मांस के चलत फिरत मनसे च तो रहिन न ? अपन कर्तव्य निभाईन , सत के रस्ता मं चलिन , राक्षस मन के विनाश करिन तभे तो मर्यादा पुरुषोत्तम कहाइन ...लोक मन मं देवता के जघा पाइन । सुरता आइस के नर तन के तीन रूप होथे ...देव , दानव अउ मानव विद्वान मन कहिथें के मनसे जब धर्म के रस्ता मं चलथे त देव बनथे , कुमारग मं चलथे त दानव बन जाथे मतलब तो इही होइस न के जनम से सबो झन मनसे च होथें कर्म के अनुसार देव , दानव बनथें तभे तो तुलसीदास लिखे हें " कर्म प्रधान विश्व करि राखा ...। " 

मुंशी प्रेमचंद के राम चर्चा मं राम के कर्म प्रधान जीवन के मानवोचित रुप के प्रतिष्ठा करे गए हे । 

     एक बात उनहूँ कहे हें के दशरथ पुत्र राम के अवधारणा समाज मं आदर्श के स्थापना बर करे गए हे चाहे वो शिष्ट साहित्य होय चाहे वाचिक ...। ध्यान देहे लाइक बात एहू हर तो आय के त्रेता युग के राम कथा के बहुत पहिली भी शिष्ट साहित्य मं राम के चर्चा होए हे ...देखव न ऋग्वेदीय साकल संहिता के दशम मंडल के 99वें सूक्त मं विस्तार से राम स्मरण हे ...

" भद्रो भद्रया सचमान आगत् स्वसारम् 

  जारो अभ्येति पश्चात् । 

       इही तरह " मंत्र रामायण " मं 240 राम विषयक मंत्र संकलित प्रकाशित हे जेकर भाष्यकार हें पंडित नीलकंठ शास्त्री ..। 

एकर अलावा भी " नारद रामायण " अउ " कौशिक रामायण " भी तो उपलब्ध हे ..। कहि सकत हन के प्रत्येक कल्प मं देश , राज , समाज मं आदर्श के स्थापना बर भगवान के अवतार होवत गए हे ...प्रश्न तभो मूड़ उठाए खड़े हे के अवतार होइस मनसे के रुप मं जेला भगवान के रुप मं प्रतिष्ठित करिन मनसे च मन ...जिन मन ल हम युगीन साहित्यकार भी कहि सकत हन । 

तभे तो एक झन लिखे हे ...

" आदमी टूटा हुआ ख्वाब है , फरिश्तों का ..। " माने मनसे हर मनसे च आय भगवान नोहय त फेर एहू तो कहि सकत हन के ईश्वरत्व या देवत्व हर गुण ,धर्म ,आचरण आय तभे तो जेन मनसे ए तरह के दैवीय आचरण करिन तेन मन ल मनसे देवता या ईश्वर या भगवान कहे लगिन चाहे वो दाशरथि राम होय चाहे वासुदेव कृष्ण । 

    मुंशी प्रेमचंद संक्षिप्त मं रामचरित मानस के सातों कांड के कथा बोधगम्य भाषा मं लिखे हें । उन किताब के आखिर मं लिखे हें .....अंत...

" उनके ( राम के ) जीवन का अर्थ केवल एक शब्द है और उसका नाम है " कर्तव्य " । उन्होंने सदैव कर्तव्य को प्रधान समझा , जीवन भर कर्तव्य के रास्ते से जौ भर भी नहीं हटे , चौदह वर्ष जंगलों में रहे , अपनी जान से प्यारी पत्नी को कर्तव्य पर बलिदान कर दिया । प्रेम, पक्षपात और शील को कभी कर्तव्य के मार्ग में आने नहीं दिया । यह उनकी कर्तव्यपरायणता का प्रसाद है कि सारा भारत देश उनका नाम रटता है और उनके अस्तित्व को पवित्र समझता है । इसी कर्तव्यपरायणता ने उन्हें आदमियों के समूह से उठाकर देवताओं के समकक्ष बैठा दिया । यहां तक कि आज निन्यानवे प्रतिशत हिन्दू उन्हें आराध्य और ईश्वर का अवतार समझते हैं । " 

  बच्चों ! तुम भी कर्तव्य को प्रधान समझो । कर्तव्य से कभी मुंह न मोड़ो इसे पूरा करने में बड़ी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा किन्तु कर्तव्य पूरा करने के बाद तुम्हें जो प्रसन्नता प्राप्त होगी वही तुम्हारा पुरस्कार होगा । " 

        अब समझ मं आइस के मुंशी  प्रेमचंद संसार प्रसिद्ध गोदान , गबन , कर्मभूमि , मान सरोवर ( आठ भाग ) अउ बहुत अकन किताब लिखे के बाद भी राम कथा काबर लिखिन ? राम कथा के बहाने ओ समय अंग्रेजी राज के विरोध मं स्वराज्य प्राप्ति बर लइकन के मन मं देश के प्रति कर्तव्य बोध जगाना चाहत रहिन । लइकन ही तो देश राज के भावी कर्णधार , नागरिक होथें न ..। 

  पुरौनी 

******  रामकथा मुंशी प्रेमचंद के हिंदी मं लिखे किताब आय तभो ले लोकाक्षर छत्तीसगढ़ी ग्रुप मं एकर चर्चा करें हंव एकर कारण आय के ये किताब हर चर्चित नइये ते पाय के बहुत झन पढ़े भी नइएं ...। किताब के फोटो भी इही पाय के देहे हंव । 

     सरला शर्मा 

      दुर्ग


भूलन कांदा


 

भूलन कांदा  


                खेत के मेड़ म रेंगत रेंगत एक जगा हपट पारेंव । इही तिर म भूलन कांदा अबड़ बगरे हे ... एक पइत हमर बबादई हा बताये रिहिस उही सुरता आगिस .. । बेरा ढरकत रहय । लकर धकर रेंगे लगेंव । अतेक रेंगे के पाछू घला गाँव तिर म पहुँचबेच नइ करेंव । मोला समझ म आगे के .. मेंहा भूलन कांदा उपर गोड़ मढ़ा पारेंव । अब कइसे करँव भगवान .. । कोन्हो दिखत घला नइ रहय । उही तिर बइठ गेंव । थोकिन अलग किसिम के कांदा म नजर परगे । ओकर चेचरा धरके उखाने के प्रयास करेंव । कांदा टस ले मस नइ होइस । पछीना पछीना होगेंव .. फेर कांदा ला एक इंच हला नइ सकेंव । टोंटा सुखागे । पानी पी डरेंव । बांचे खोंचे पानी ला भलभल ले कांदा उपर रिको देंव अऊ ओला हेरे के फेर उदिम करेंव । का मजाल ... गऊकिन .. कांदा टस ले मस नइ होइस । एड़ी के रिस तरुवा म चघगे .. उचेंव अऊ एक लात जमायेंव । मोर गोड़ के आरो पाके कांदा हा अपन जगह ले घुचगे । मोला समझ नइ अइस के काये होवत हे । एक पइत अऊ लात जमायेंव । कांदा एती ले ओती होगिस । मोला बड़ अचरज लागिस । अपन गोड़ ला एक दू बेर अऊ ओकर उपर लहरायेंव फेर कांदा हा अपन जगा ले घुचिच जाय । मोर पोटा काँपगे । भूत परेत मरी मसान के डर हमागे । पल्ला भागे के सोंचेंव । गोड़ उचिस निही । चमचम ले आँखी मुंद फेर बइठ गेंव । 

                      बोले के आवाज सुनइस । तैं कोन अस बाबू अऊ काबर मोला उखानत रेहे ? डर के मारे बक्का नइ फुटत रहय । फेर उहीच सवाल सुनइस । में जवाब नइ दे सकेंव । नावा सवाल सुनइस – तैं मोला लतियाये के उदिम काबर करेस ? का तोला जनाकारी हे के मोला खुंदइया के का हाल होथे ? डर्रा झन .. आँखी उघार अऊ मोर तनि देख । में भूलन कांदा अँव । मोला खुंदे के अधिकार तोला नइहे । अपन नाव ला भूलन कांदा किहिस तहन मोर देंहें म जान लहुँट दिस । में केहेंव – मेहा भूलन कांदा खुंद के आये हँव .. तेकर सेती अपन गाँव के रद्दा भुलागे हँव । तूमन काबर सरी जगा म पसरगे हव । ओ किथे – जेला खुंदे हस तेहा भूलन कांदा नोहय । ओला खुंदे रहितेस त अपन गाँव के सही रद्दा म नइ जातेस । संझाती के बेरा लकठियागे रहय । एक झन भऊजी दिख गिस । ओला पूछ पारेंव – कहाँ जावत हस या भउजी ? भउजी किथे – मई लोगिन मन के दिशा मैदान जाये के ठउर म तैं काये करत हस छोकरा .. ? में कलेचुप ओ तिर ले उचेंव अऊ रेंगे लगेंव । मोर संगे संग भूलन कांदा घला रेंगे लगिस अऊ रेंगत रेंगत किहिस - तैं भूलन कांदा ला खुंदे रहितेस त गाँव के भउजी ला कइसे चिन्हतेस ? मोला गाँव के अऊ कतको महतारी मन उही रद्दा म लोटा धरे दिख गिन .. मोर मुड़ी हा शरम के मारे बोजाये लगिस .. एती भूलन कांदा ला उसमान छुटे रहय ... ओकर मुहुँ अतरत नइ रहय । 

                     में असकटा गेंव अऊ ओला केहेंव - मोर गाँव आ चुके हे तैं वापिस हो जा । भूलन कांदा किथे – वापिस तो मेहा चलिच देहूं .. फेर मोला इही जवाब दे के तैं मोला खुंदे के प्रयास काबर करे ? ओकर ले पीछा छोंड़ाये बर ओकर सो हाथ जोर के माफी मांगेंव अऊ तरियापार म गुड़ाखू घँसरइया संगवारी मन तिर पहुँच गेंव । मोर संगवारी मन मोला देख के बड़ खुश होइन । मय गुड़ाखु नइ घँसरँव तभो ले .. अपन अपन खींसा ले गुड़ाखु निकाल के आफर करिन । महतारी बाप ले मिले के लकर्री रहय .. दूसर दिन संघरे के आश्वासन के साथ बिदा ले डरेंव । कांदा हा मोर आगू म आगे अऊ मोर रद्दा छेंके लगिस । में केहेंव – घुच न यार हमर रद्दा ला काबर छेंकथस । हमर दई हा चहा डबकाके अगोरत होही । ओ किथे – चल अभू तोला छोंड़त हँव .. रथिया आहूँ । 

                सुते दसना म भूलन कांदा अमरगे । में केहेंव – मोर ले बहुत बड़े गलती होगे के मेहा तुमला खुंदे के प्रयास करेंव । मोला माफी देवव । भूलन कांदा किहिस – तोला माफी मंगवाये बर तोर संगे संग नइ किंजरत हँव । अपन दई ददा ला अतेक प्रेम करथस .. अपन ननपन के संगवारी मनला अभू तक नइ भुलाये हस .. अपन गाँव ला नइ भुलाये हस ... मेंहा अतेक छोटे मनखे के खुंदे बर नइ बने हँव । तैं खुदे कतको के गोड़ म खुंदावत रउँदावात हस .. तोला कोन्हो ला खुंदे के अधिकार नइहे । मोला खुंदे बर बड़े मनखे बने बर परथे । मोला खुंद तहन ... दई ददा भाई बहिनी नता रिश्ता संगी जहुँरिया गाँव गोढ़ा ला भुला जा । अऊ मोर नाव लेके बाँच जा । 

               में पूछेंव – तूमन काकरो रद्दा म काबर आथव ? ओ किथे – हम अभू तक कोन्हो मनखे के रद्दा म नइ आये हाबन । दुनिया के कुछ मनखे के गोड़ अतका शापित हे के ओकर तरी म आये ले हमर तन मन म मनखियत हमा जथे तहन हमू ओकरे कस गुनहगरा .. भुलसुधहा .. लबरा हो जथन । हम भुला जथन के .. हम काबर जनम धरे हन .. । में केहेंव – हमर गाँव के मेंड़ म तुमला नइ रहना चाही .. उही रद्दा म हमर दई बहिनी भऊजी मन दिशा मैदान जाथे .. खुंद पारही ... ? भूलन कांदा केहे लगिस – जे दई अऊ बहिनी के बात करत हस तेमन मोला रोज खुंदथे फेर ऊँकर चरण पवित्र हे तेकर सेती .. न मोला नकसान होइस न उनला ... हाँ गाँव के कुछ बहुरिया मन के गोड़ तरी आये बर डर लागथे .. । में पूछेंव – काबर ? भूलन कांदा हा बतइस – ओमन घर के सरी संस्कार संस्कृति ला फुला म टांगके अपन महतारी बरोबर सास के .. बाप बरोबर ससुर के अऊ बहिनी बरोबर ननंद के .. घेरी बेरी अपमान करथे अऊ घरवाला ला .. माफी देहू .. भुलागेंव या .. कहि देथे । मोरे नाव झन लेवय सोंच डर्राथँव .. । 

               में केहेंव – काली पटवारी तिर मोला बुता हे .. । सुतन दे .. मुंधरहा के उचना हे । ओ किहिस – मुंधरहा ले उच जबे तभो काये कर डरबे । पटवारी के आफिस म .. बैक खुले के बाद बुता शुरू होथे । में हाँसेंव अऊ केहेंव – मोर संगवारी आय ओहा । मोला ओकर बर बैक नइ जाये बर परय । ओ किथे – रिहिस होही तोर ननपन के संगवारी .. अब वो केवल पटवारी आय ... अऊ मोला हरेक दिन खुंदे बर आथे ... । सरी बात बेवहार ला भुला चुके हे । जे दिन धराही .. बैरी हा मोरे नाव लिही । में केहेंव – अइसन म महूँ संगवारी वंगवारी नइ गुनव .. उपर डहर शिकायत कर देहूँ .. । ओ किथे – तोर बात ला कोन सुनही । इहाँ ले उहाँ .. तरी ले उपर तक मोला खुंद के अपन भविष्य बनइया मन बइठे हे । सब अपन कर्तव्य भुला चुके हे .. कोन तोर बात ला पतियाही ।   

               मेंहा ओला केहेंव – फलाना ला जानथस निही ... । हमन एके बटकी म बासी झड़के हन । एके संग तरिया म नंगरा डफोरे हन । ओला बताहूँ ... मोर बुता तुरते हो जहि । भूलन कांदा हा खलखलाके हाँसिस – जेकर तैं बात करत हस बाबू ... तेहा मोला खुंदे बर संसद जाथे .. ओ तोर का बुता करही .... बल्कि बुता जरूर बना देही ... । अब हाँसे के पारी मोर रिहिस .. में हाँसत केहेंव – तैं बात अइसे करत हस .. जानो मानो संसद के सिंग दरवाजा म तिंही बइठे हस । भूलन कांदा किहिस – हव .. सहींच कहत हस । उहाँ के चौखट म मोला कबके गड़िया के राखे हाबे ... महू ला खबर नइहे । में केहेंव – तैं संसद म रहिथस तेकर काये सबूत ... ? ओ बतइस – तुँहर घर बिजली नइहे , पानी नइहे , गाँव म सड़क ... तरिया स्कूल कालेज नइहे .. में चुन के आहूँ तहन .. पाँच बछर के भितर सरी हो जहि .. अइसे कहवइया मन … जब उहाँ खुसरथे तहन जम्मो बात भुला जथे । मोला नइ खुंदतिन त कइसे भुलातिन ... तिंही बता भलुक .. । में केहेंव – भुला जतिन त उहाँ ले आके फेर काबर हमर समस्या के सुरता करतिन .. । ओ बतइस – वापिस आये के बेर मोला फेर खुंदथे .. तहन फेर सुरता आ आथे । में केहेंव – त तोला उहाँ नइ रहना चाही ... तोरे सेती हमर समस्या के समाधान नइ हो पावत हे । ओ किथे – मय घला अइसने सोंचथँव .. फेर मोर बर सुरक्षित जगा संसद भवन ले जादा बने अऊ कहूँ तिर नइहे .. ओमन मोर बहुत मान करथे ... तोर कस लतियाये के कोशिस नइ करय । मोला खुंदे के अतके शौंक चर्राये हे त आजा उँहे अऊ आती जाती मोला अपन गोड़ म रऊँदले । में पूछ पारेंव – तैं थोकिन बेर पहिली बताये रेहे के कुछ मनखे के गोड़ शापित हे .. ओकर पाँव तरी म आके भुला जथस .. के काबर जनम धरे हस । तैंहा तो रात दिन उँहे खुंदावत हस .. सरी ला भुलागे होबे ... फेर अतेक गोठ बात कइसे बता डरेस । ओ किहीस – मेहा तोर कस जनता ला देखथँव तब मोला सुरता आ जथे । तोर कस मरहा खुरहा चपकाये रौंदाये खुंदाये ला देख .. अपन संगवारी समझ सुरता आ गिस । तोला बताये बर आये हँव के .. अतका खुंदाये के बावजूद .. तोला अपन असतित्व के अहसास नइ होइस ... अभू तक दऊँचावत हस । पाँच बछर तुँही ला खुंद के .. तोरे ले इज्जत पवइया मनला पहिचान के अलगिया .. तब तहूँ मोर कस काकरो हिरदे म बसके इज्जत पा जबे । 

               में केहेंव – तोरे सेती मोर गाँव के विकास नइ होवत हे .. तोला संसद के सिंग दरवाजा म नइ रहना चाही । तैं उहाँ ले निकल ... निही ते तोला निकलवा देहूँ । ओहा हाँसत किहिस – मोला कहाँ कहाँ ले निकलवाबे ? उहाँ हरेक कुर्सी के आगू म हँव । उहाँ जवइया हरेक हिरदे मोर निवास स्थान आय । में ओकर ले हार गेंव अऊ हाथ जोरत केहेंव – हमर गाँव ले चल देतेव .. तुँहर बड़ कृपा होतिस । इहाँ काकरो घर अऊ हिरदे म झन बसतेव । ओ किहीस – तूमन नान नान जनता अव बाबू .. तुँहर हिरदे म गरीबी अऊ लाचारी के अतेक बिपदा भरे परे हे के .. मोर कस बड़े बर जगा नइहे । तुँहर पेट खुदे पोट पोट करत हे .. मोला का पोस सकहू । अपन आप ला बड़े समझइया .. जेकर तिर बड़का बड़का अबड़ अकन पेट हे तिही मन .. मोला पोस सकत हे । मोला खुंदइया मन बड़े बन जथे .. तेकरे सेती .. तोर गोड़ तरी नइ आयेंव ... । गलती ले तहूँ बड़े आदमी बन जतेस तहन .... तोर नता गोता संस्कार कर्तव्य के का होतिस । कलेचुप सुत .. काली पटवारी तिर नइ ओधँव ... तोर बुता हो जही । में भूलन कांदा ला मने मन धन्यवाद देवत .. छोटे मनखे होय के खुशी के एहसास करत .. आँखी चपकके सुत गेंव । 


 हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

सास के लाम लाम तिंहा बहू के का काम

 सास के लाम लाम तिंहा बहू के का काम 


                बात बहुतेच तइहा तइहा के आय । राजिम म एक झिन रामकिसुन नाव के किसान रहय । ओकर दू झिन बेटा रिहीस । एक के नाव नारद अऊ दूसर के नाव टीकम । लइका मनला बाढ़हे म कतेक टेम लागथे गा । नारद हा देखते देखत जवान होगे । कमाये धमाये ला धरिस तहन नारद के बिहाव कर दिन । नारद घर के बहू हा सुखियारिन रिहीस । ओला खेती खार के किसानी बूता नइ आय । ओहा अपन सास संग कमाये धमाये ला नइ जाय । ओकर सास हा बहू के इही चाल ला देखके अबड़ फटफटाये । ओहा बहू ला रात दिन इही बात म अबड़ खिसियाये । एक दिन सास बहू बिहिनिया ले रखिया बरी बनइन अऊ छानी म सुखो दिन । दू दिन पाछू बिहिनिया ले सास हा बहू ला किसानी बूता सिखोये के बहाना खेत लेगे । टीकम हा घर रखवार रहय । टीकम के बड़े दई हा उही तिर रहय । ओहा थोकिन चोट्टी सुभाव के रिहीस । झिम झाम देख रामकिसुन घर खुसरगे । पर्रा के बरी म ओकर नजर रहय । ओहा टीकम संग बाते बात म छानी के खपरा ला कोचक दिस । पर्रा खसलगे । बरी टपाटप भुंइया म गिरगे । बरी ला उचाये के बहाना आधा ला पर्रा म अऊ आधा ला ओली म डार लिस । 

               सांझकुन सास बहू खेत ले वापिस अइस । पर्रा ला उतारिस तब बरी आधा दिखिस । सास हा टीकम ला पूछिस । टीकम किथे – सफरा बड़े दई हा आये रिहिस । बरी हा ओतके बेर को जनी कइसे भिंया म गिर गिस । बड़े दई हा आधा ला अपन ओली म धरके लकर धकर चल दिस । सास के दिमाग खराब होगे । ओहा ओतेके बेर अपन जेठानी ला बलवाये ला भेज दिस । अपन बहू ला किथे – तहूँ कहन लागबे ? मिहींच अकेल्ला ठेका नइ लेहँव । जेठानी अइस तहन देरानी हा ओला अबड़ झर्रइस । बपरी सफरा हा नइ चोराहों या कहत कतको सफई दिस फेर झर झर झर झर के मारे कुछ नइ चलिस । जेठानी हा मुहुँ उतारके चल दिस । जेठानी जइसे गिस तहन सास हा अपन बहू उपर भड़कगे अऊ केहे लगिस – चुपे चाप देखत खड़े रेहे ....... तहूँ केहे के लइक नइ रेहे तेमा ....... । बहू सुटुर सुटुर अपन कुरिया म खुसरगे । 

               किसानी के दिन नहाकगे । बहू खोसकिस खोसकिस करे लगिस । अब सास अऊ बहू दुनों झिन खेत नइ जाय । कुछ हफता ले एक झिन गरीब मनखे हा ओकर घर मांगे बर आय । ओकर सास हा ओला देवय कुछू निही बलकी रोज सुनावय - दिखत तो हिस्ट पुस्ट हस ..... । तोला सरम नइ लागे । रोज आ जथस मांगे बर । जा दूसर घर देख । ओ भिखारी हा घला अइसे जिद्दी के ओकर घर ले ओला अभू तक कुछ नइ मिलिस ……. फेर मिले के आस म रोज पहुँच जाय । रोज सास ले सुनय तभो ले जाये बर नइ छोंड़े । एक दिन सास हा घर म नइ रिहीस । मंदिर गे रिहीस । उहाँ ले लहुँटत रिहीस तब उही भिखारी ले मंदिर के बाहिर मुलाखात होगे । सास हा भिखारी ला पूछिस – आज हमर घर गे रेहे का बबा ? भिखारी किथे – हव गे रेहेंव महतारी । सास पूछथे – बहू घर म रिहीस ? तोला कहीं दिस ? भिखारी किथे – बहू घरेच म रिहीस फेर कहींच नइ दिस । सास किथे – कहीं किहीस का ? भिखारी किथे – का कहि दई । जइसन तैं कहिथस - दिखत तो हिस्ट पुस्ट हस , तोला सरम नइ लागे रोज आ जथस मांगे बर , जा दूसर घर देख .... । भिखारी के मुहुँ ले बात सुनके सास के पारा चइघगे । ओहा भिखारी ला किथे – चल मोर संग में देखथँव । बहू कइसे अइसने किहीस ? भिखारी सोंचिस – सास बहू के झगरा म आज पहिली बेर फायदा होने वाला हे । वाजिम म भगवान के घर देर हे अंधेर निये । सबर के फर मिठ होथे । 

               घर पहुँचके सास हा अपन बहू उपर भड़कगे अऊ केहे लगिस - तैं कोन होथस मना करइया ? मना करना रिहिस त में करतेंव । तोला कोन अधिकार दिस । बहू ला खिसियाये के पाछू बाहिर निकलके , मोटरी खोलत भिखारी ला किथे – दिखत तो हिस्ट पुस्ट हस । तोला सरम नइ लागे । रोज आ जथस मांगे बर । जा दूसर घर देख । भिखारी हा अपन मोटरी ला लकर धकर बांधिस अऊ समेट के ..... सुटुर सुटुर मंदिर कोती चल दिस । 

               मंदिर के पुजारी हा सब जानत सुनत रिहीस । भिखारी ला वापिस मंदिर आवत देख पुजारी हा ओला पूछिस – कहीं मिलीस जी ...... ? भिखारी किथे – नइ मिलीस महराज । केवल सुने बर मिलिस । महराज किथे – सुन तो पहिली डरे रेहे , दुबारा सुने बर काबर गे रेहे तेमा ........ ? भिखारी किथे – पहिली ओकर बहू हा भले कुछ नइ दे रिहीस , फेर बपरी हा सुनाये नइ रिहीस महराज । हां ..... एक बात जरूर हे ....... जब ओकर घर मांगे बर जाबे तहन ओकर घर के एकेक ईंटा तको ले इहीच बोली निकलथे , उही ला बहू किहिस कहि पारेंव ..... महराज । बपरी बहू हा राम राम नइ केहे रिहिस ओला फोकट .... मोर सेती सुने ला परगे । महराज किथे – ओकर बहू हा सास कस निये जी । ओहा वइसन कहिच नइ सकय । बपरी ला फोकट दोसी बना दे । वइसे भी बहू का करही अऊ कायेच कहि बिचारी हा ...... । जिंहा सास के लाम लाम तिंहा बहू के का काम ......... ? 


हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

रामनाथ साहू: *सात भांवर के बरे - बिहाय/कहानी* ----------------------------------------------

  रामनाथ साहू: 

       *सात भांवर  के बरे - बिहाय/कहानी*

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         नावा- बहु हर, अपन गोसांन ल पीट दिस हे रे..!नावा ...बहु हर अपन गोसांन ल पीट दिस हे रे..!! बबा रे..!


           गांव भर म हल्ला  मात गय रहे।


        येहर सच रहिस।सिरतोन म चंपा हर अपन सात- भांवर के बरे -बिहई,अपन गोसांन.. अपन मालिक बोधराम ल पीट देय रहिस।


"घोर कलिजुग..!ये धरती म पाप हर उपलाईच गय न।"


" देखइ तो धुरिहा, कान म सुने नइ रइबे,तइसन -तइसन जिनिस मन अब सुनई परत हे।"


"कुछु भी हो जाय ,तभो ले दई..!अइसन करे के  काम  नइ होय।"


"अरे,एकर हिम्मत ल तो देख ।"


"जेकरे  अन्न ल खावत हे, जेकर वस्तर ल पहिनत  हे, जेकर छ्या म जुड़ावत हे, तउन ल मार दिस- भई!"


" अइसनहेच मन ल माटी तेल छींच के काड़ी मारत होंही.. अब जा कहके। "


" हाँ..रोज न रोज गजट म अइसन कछु न कछु छपेच रइथे ।"


        अउ येती पागा -वाला मन अलगे बइठे हें-


"अइसन पत्तो  के घेंच ल तरी आड़ा उपर आड़ा करके चीप देय के काम आय।"


"टुरा उप्पर..जनम दिन बर दागी लगा दिस।"


"बने देख ताक के नइ माँगथे जी, मन मोहना ।"


"ये मन मोहना, कहाँ ले का बहु ले आनीस।"


"येकर देखा -सीखा अउ आन मन घलव अइसन करिहीं ।"


"कुछु रोक -रुकावट करो भाई, अइसन हर नइ बनत ये।"


"अरे विरज ,तँय काबर हदर मरत हावस।देखत तो रह।अभी बहुत कुछ होही।"


" ड*की .. हर ...ड*का ल मारही।बाबू अभी बोकरा- भात चुरही।चाहे मनमोहन देय ,चाहे वोकर समधी देय।"


"बुलाव मन मोहना ल..,अभी।"



       झमाझम  गुड़ी जुरे हे।तिल राखे के जगहा नइ ये । सरपंच -पति हर गुड़ी के अध्यक्षता करत हे। वोहर ,ये खबर ल सरपंच गायत्री के काने म नइ जान देय ये। चंपा के दई अउ ददा थर ...थर कांपत  हें ।


"कइसे जी,मनमोहना। ये काय सुनत हन भइ...!"सरपंच -पति पुछिन।


"अब मंय का  बतावंव, सरपंच साहब...!"


"हं...!तोर समधी का कहत हे।"


"अउ मंय , हमन का कइबो , महराज...!"


"तब तुमन ल ,हमर ये करा के फैसला मंजूर ....सरपंच -पति के गोठ हर पूरे नइ पाय रहिस, के वो जगह म सरपंच-गायत्री आ खड़ा होइन।


"तँय इहाँ कइसन..!" सरपंच पति कहिस।


"तुँ इहाँ कइसन.. ?"गायत्री थोरकुन  रिसहा मुस्कुरात  कहिन । सरपंच पति रिस म उठिस अउ वो जगहा ल परा गय।


"नावा बहुरिया चंपा  हर ,अपन गोसांन,बोधराम ल पीट देय हे, आना।अतकेच मंय सुने हंव।" सरपंच गायत्री कहिन।


"कइसे चंपा ,काबर पीट देय नोनी।"सरपंच गायत्री लटपट अपन हाँसी ल रोके सकत रहिन।


"......"


"वोहर तोला पीटीस..?"


"......."


"अइसन चुप रइबे ,तब थोरहे बन ही।डरा झन अउ बता,वोहर तोला पीटीस?"


"  हाँ..!"


"अउ बलदा म तहुँ ,पीट देय वोला।"


"नहीं.. बिल्कुल भी नहीं।"


"तब काबर पीटे,तँय वोला चंपा?"


"  सरपंचीन काकी,येहर मार के मोर पीट ल फटो  देय रहतिस,तभो ले वोहर मोला चिटिक घलव नइ जनातिस ।"


"तब फेर..?"


"येहर काल दारू पी के आय रहिस, तेकर स सेथी येला दु रहपट लगा पारेंव ।"चंपा सरपट कहिस।


           अब तो येती सरपंच गायत्री के आंखी ल अँगरा बरसे के शुरू हो गय रहिस-मार येला, अउ मार..! मोर आगु म मार..!!


        बोधराम तरी मुड़ी कर के बइठे रहिस ।


"अउ आन दिन ल ,अउ अइसन कुछु करही तव फेर लगाबे,डराबे झन मंय हंव।"सरपंच गायत्री फेर दहाड़ीस ।


"कइसे दाउ साहब, तोर का कहना हे। गुड़ी तँय जोरे हस न ..?"वो बोधराम ल पुछिन।


"मंय  कहाँ जोरे हंव। ये गुड़ी तो अपने -आप जुरे रहिस।" बोध राम कहिस, "बोकरा भात लागही कह के कहत रहिन।"


          सरपंच -गायत्री मुड़ ऊँचा कर के देखिन-कहाँ  हें गुड़ी वाले मन कह के।फेर वो करा तो कनहुँ नइ  दिखत रहिन अब।


          पीटिस तब मोला तो पीटिस..!अउ वोकर से मोला कुछु भी तकलीफ नइये,काकी... कहत बोधराम सरपंच -गायत्री के डेरी गोड़ ल धर डारिस।जेवनी गोड़ ल तो चंपा हर पहिलीच के धर डारे रहिस।



*रामनाथ साहू*


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समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल: 



आज कतको किसिम के नशा ह समाज के रग-रग म समा गे हे। का शहर अउ का गाँव? सबो जगा गली-खोर म ठउर-ठउर म नशा के दूकान सजे मिलथे। सरकार नशा मुक्ति के अभियान चलाथे। फेर लाखों रूपया खर्चा करे के बावजूद नशा के दूकान काबर बाढ़ते जावत हे? सोचे के लइक हे। सरकार के आबकारी विभाग कतको अवैध कारोबार पकड़थे, तब ले चोरी-छुपे बेचइया दलाल मन के कारोबार बंद नइ होवत हे। न बाँस रइही, न बँसरी बाजही। फेर सरकार अपन राजस्व म कमी नइ करे सकय। इही कारण आय कि कोनो सरकार नशा बंदी लागू करे के जोखिम नइ लय। जनता ल दिखाय बर छापा मारे के ढकोसला भर करथे। अउ सरकार शराब बंदी के अपन घोषणा ल घिरयाय धरे हे।

        समाज ल नाश के ए जड़ ले बाँचना हे त खुदे उदिम करे ल परही। नइ त समाज ल एकर दियार ह खोखला करते जाही। घर-घर म रोजेच झगरा लड़ई चलते च रइही।

      अइसे तो समाज म शिक्षा के असर जग-जग ले देखे बर मिलत हे। नारी-परानी के पढ़े-लिखे अउ जागरूक होय ले समाज अउ नारी के हाल म कहूँ-कहूँ सुधार दिखथे। नारी अपन अधिकार ल समझे लग गेहे। अउ पुरुष के अँगरी म नचई भुलागे हे। सबला बने के रद्दा म चले लगे हें। मर्यादा म रही के घर-परिवार चलाना चाहथें। जरूरत के बखत म तुतारी घलव चलाय बर तियार दिखथें। गायत्री अउ चंपा   एकर उदाहरण आय।

       नारीसशक्तिकरण के आरो देवत श्री रामनाथ साहू के कहानी 'सात भाँवर के बरे-बिहाय' नशा मुक्ति बर घलव बड़का हथियार नारी हो सकथे, ए बताय म सक्षम हे। काबर कि समाज ल बचाय के नारी के घलो जिम्मेवारी हे। परिवार के सुधरे ले, समाज सुधरथे। जे दिखथे, ते बिकथे। मान के जब दूकान चला सकथे, त का? जेकर ले नकसान हे, वोकर ले बाँचन कहि के अपन परिवार ल नइ बचा सकन? चंपा मर्यादा ल भूले नइ हे। नशा के फेर म अपन ऊप्पर हाथ उचाय बोधराम के होश लाय बर चंपा के हाथ उचई ह भारतीय नारी के चरित्र नइ हो सकय।... फेर यहू सुरता राखन कि चंपा नवा जमाना के नारी आय।। जादा दिन ले ....धँधाय नइ रेहे सकय। ...गायत्री जइसन सजोर ताकत के भरोसा म ही चंपा समाज ल नशा मुक्त करवा सकत हे। 

      कहानी के संवाद पात्र मन के अनुरूप गढ़ाय हे। भाषा सरल अउ सहज हे। 

      कहानीकार नशा मुक्त समाज के अपन कल्पना ल नारी शक्ति के भरोसा पूरा करना चाहथें, जउन सच आय। 

बड़ सुग्घर कहानी बर कहानीकार रामनाथ साहू जी ल बधाई💐🌹🙏


पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार छग

9977252202