Saturday, 9 July 2022

छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी छत्तीसगढ़ी नाटक

 




छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी

छत्तीसगढ़ी नाटक

सुराजी गाँव

- दुर्गा प्रसाद पारकर-













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 आप मन देखत हव नरवा-गरवा-घुरवा-बारी ल बचाए बर हमर महाअभियान सुरू हो गे हे। हम्मन हर गाँव म गउ अउ खेती- संकृति ल संरक्षण दे बर गौठान मन ल बहुआयामी केन्द्र के रूप म विकसित करत हवन। सुराजी गाँव योजना ह महात्मा गाँधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शाó, डाॅ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जइसन महान नेता मन के सपना ल साकार करे के योजना आय। किसान समृद्ध होही त गाँव समृद्ध होही, पंचायत राज सषक्त होही तहान पूरा देष समृद्ध अउ खुषहाल होही।

- भूपेश बघेल

मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

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भूमिका कृषक हृदय के भावों की अभिव्यक्ति है नाटकसुराजी गाँवछत्तीसगढ़ के जनजीवन के सघन अनुभवों से जो सहज लय उत्पन्न होती है, वही अंततः नाटक सुराजी गाँव बन जाती है। छत्तीसगढ़ के किसानों के दुःख दर्द, प्रेम और मानवीय प्रसंग का संगम है सुराजी गाँव नाटककार प्रेम साइमन ने एक बार दुर्गा प्रसाद पारकर (दुरगा प्रसाद पारकर) से कहा था कि मेरा यह मानना है कि किसी किताब की भूमिका लिखने का अधिकार वही होता है जिसकी दक्षता कुछ तो उसके समकक्ष हो जिसके उपर वह लिख रहा है। चूंकि एक नाटककार अपने परिवेष की उत्पत्ति होता है। वह जीवन भर जनमानस के धरातल पर ही रहता है। समय और समाज को लक्षित करता है। छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी योजना है छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरूवा, बाड़ी अउ गाँव ल बचाना हे संगवारीछत्तीसगढ़ी नाटक सुराजी गाँवके लेखक दुर्गा प्रसाद पारकर ने नाटक के माध्यम से समाज को जागृत करने का संकल्प लिया। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण किसानों को जगाने में सुराजी गाँवनाटक सबसे प्रबल सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रसाद पारकर की विषेषता यह भी है कि उन्होनें उसमें छत्तीसगढ़ी वातावरण एवं पात्रों का समावेष किया है।सुराजी गाँवनाटक कृषक हृदय के भावों की अभिव्यक्ति है। रासायनिक विकृतियों से उपर उठकर जैविक खेती की आगे बढ़ाने एवं आर्थिक उपार्जन के लिए अनुप्राणित होने का आव्हान किया है। छत्तीसगढ़ में जनजीवन

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की विसंगति अवष्य स्पष्ट होती है लेकिन लेखक सुराजी गाँव नाटक के प्रति बड़े सजग दिखाई पड़ते हैं। ग्रामीण जीवन को उन्नत बनाने के अनेक संकेतिक उपाय किये हैं और गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की परिकल्पना को अनेक आकांक्षाओं के स्वर को प्रतिध्वनित किया है। छत्तीसगढ़ शासन के यषस्वी मुख्यमंत्री भूपेष बघेल ने नरवा, गरवा, घुरूवा, बाड़ी योजना के तहत संस्कृति के उदात्त और मानवीय रूप पर अपनी भावी संस्कृति के निर्माण की चेतना प्रदान करने का साहस किया। पर यह समझना भी भूल होगी कि उन्होंने केवल छत्तीसगढ़ के गौरव गान के लिए नरवा, गरवा, घुरूवा, बाड़ी योजना का क्रियान्वयन किया है नरवा कार्यक्रम के अंतर्गत राज्य में उपलब्ध जल óोतों का संरक्षण करने से ग्रामीण अंचलों में किसानों को पानी उपलब्धता सुनिष्चित होगी और पशु-पक्षियों का जीवन सुरक्षित होगा। आज के रासायनिक खाद के युग में घुरूवासे जैविक खाद का उत्पादन को बढ़ावा देना अत्यंत आवष्यक है ताकि किसानों को कम लागत से जैविक खाद उपलब्ध हो और भूमि की उपजाऊ क्षमता को बढ़ाया जा सके। ग्रामीण अंचलों में पशुओं के रखरखाव तथा देखभाल हेतु सामूहिक व्यवस्था नही होने से फसल को नुकसान होता है। फसलों को नुकसान से बचाने तथा पशुओं की देखरेख सुधार हेतु गरवा” (पशुधन विकास) कार्यक्रम उद्देषित है। प्रत्येक गाँव में ग्रामीणों के घरों के पीछे भूमि पर साग-सब्जी, फलों का उत्पादन किया जाता है, परन्तु संसाधनों की कमी के कारण ग्रामीणों की बाड़ी विकास कार्यक्रम को प्राथमिकता दी है। जिसके अंतर्गत बाड़ी कार्यक्रमों की क्रियान्वयन हेतु विभिन्न विभागों द्वारा संचालित योजनाओं के अभिसरण से साग

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सब्जी, फलों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जायेगा। यह योजना समसामयिक जीवन के प्रति उदासीन नहीं है, वह प्रत्यक्ष को लेकर मुखर है और लोक संग्रह का प्रयत्न है। छत्तीसगढ़ के उद्बोधन की आकांक्षा है। सुराजी गाँवके लिए दुर्गा प्रसाद पारकर संस्कृति के जागरूक समर्थक हंै। जीवन दृष्टि के अनुरूप अपने नाटक स्वच्छंतावादी नाट्य प्रणाली को आधार बनाकर कल्पना, भावुकता, अतीत के प्रति अनुराग तथा शैली षिल्प के स्वच्छंदता को ग्रहण किया है। लेखक दुर्गा प्रसाद पारकर सुराजी गाँवके माध्यम से पूरे छत्तीसगढ़ वासियों के जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव कर नई दृष्टि देंगे। लेखक एवं सुराजी गाँव के लिए शुभकामनाएं। - डुमन लाल ध्रुव प्रचार-प्रसार अधिकारी जिला पंचायत-धमतरी (छत्तीसगढ़)

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दृष्य एक राजगीत - डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार इंदिरावती ह पखारय तोर पइँया महूँ पाँवे परँव तोरे भूइँया जय हो, जय हो, छत्तीसगढ़ मइया... सोहय बिंदिया सहीं, घाटे डोंगरी पहार चंदा सुरूज बनय तोर नैना सोनहा धाने के अंग, लुगरा हरियर के रंग तोर बोली हवय सुघ्घर मैना अँचरा तोर डोलावय पुरवहिया महूँ पाँवे परँव तोर भुइँया जय हो, जय हो, छत्तीसगढ़ मइया... रयगढ़ हवय सुघ्घर, तोरे मँउरे मुकुट सरगुजा अउ बिलासपुर हे बइँहा रइपुर कनिहा सहीं, घात सुघ्घर फभय दुरूग बस्तर सोहय पैजनिया नांदगांवे नवा करधनिया महँू पाँवे परँव तोरे भुइँया जय हो, जय हो, छत्तीसगढ़ मइया...

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(राधा अउ किसन के मंच म प्रवेष। दूनों झिन पंचायत के मुखिया सरपंच करा पहंुचथे। सरपंच करा पहुंच के दूनांे झिन अभिवादन करथे।) राधा किसन - जै जोहार सरपंच जी ! सरपंच - जै जोहार! तुमन कोन अव ? किसन - मँय किसन अँव। राधा - मय राधा अँव। सरपंच - तुमन कहां ले आय हौ ? किसन - हम्मन इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय रायपुर ले छत्तीसगढ़ भ्रमण बर निकले हवन। सरपंच - काबर ? राधा - नवा छत्तीसगढ़ गढ़े बर। सरपंच - नवा छत्तीसगढ़ कइसे गढ़ाही ? किसन - नरवा, गरवा, घुरूवा, अऊ बारी उपर केन्द्रित सुराजी गाँवयोजना ल सफल करके नवा छत्तीसगढ़ गढ़बोन। गीत गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज होरि, होरि, होरि, हो रेऽऽऽऽ छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी एला बचाना हे संगवारी आज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज ( नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी के तख्ती मन ल धर-धर के मंच म चारो डाहर कलाकार मन किंजरथे।)

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दृष्य - दू नरवा (थूकेल के बेटा के अरथी मंच म निकलथे। राम नाम सत हे सबके इही गत हे, काहत परदा के अन्दर लहूट जथे।) (बैक ग्राउंड ले लक्ष्मण मस्तुरिया के लिखे गीत बजत रहिथे) जीनगी ए दियना देवारी के बर-बर के बुताय-जोति जलै अँधियार हरै जी मनखे जोति समान, जब तक जियै उजियार करै जी लोभी के मन रमे अन्न धन प्रेमी मया दुलार, बीर रमे रन रंग भूमा रे भगती साधु सुजान, कायर के मन धुंधरा ए मनखे के जिनगी खड़ग चढ़े पल म पार वो पार, खतरा म खेलै बहादुरा रे सपटे कपटी सियार, सुविधा खोजै चोर बाटुरा रे कपटी के जिनगी कलह भरे हे सुछिंदा सुजान, लोभिया के जिनगी सजे सजा हरहा हाय-हाय, संत के जिनगी मजे मजा मानुस के मन स्वारथी लोभी कपटी बइमान, माने न बिना लगाम के जी धक्का बिन दुई चार, ये मन बइरी बेकाम के जी किसिम-किसिम रंग मनखे के भला बुरा दुई रूप-दुख दुई संगी साथिया रे अन्न धन पांव के धूल-करम-धरम दूनो बांटिया ए लागे लगन जीव नइ छूटे करो कसनो जतन, लोहा पाथर टूटे छिन छिना जी मया टोरे न जाय, बाढ़े दना दन-दिन दिना जी।।

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(मंच म थूकेल ह मुड़ी धर के बइठे रथे। इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय के राधा अउ किसन मंच म प्रवेष करथे। किसन थूकेल करा जाके -) किसन - काबर मुड़ी ल धर के बइठे हर कका? थूकेल - काला बताबे बेटा। किसन - बता कका, बता। थूकेल - मोल एकलौटा बेटा ह गर म फांसी अरो लिस बेटा। राधा - काबर कका ? थूकेल - एसो पानी के बिना धनहा डोली ह सुखागे हे बेटी। बैंक ले करजा ले रेहेन वहू नइ पटिस। साहूकार मन घलो तगादा करत रिहिन। तगादा ले तंग आ के बेटा ह फांसी अरो लिस राधा। (थूकेल ह फफक-फफक के रोए बर धरथे) राधा अउ किसन ह थूकेल ल सम्हालथे) किसन - चुप राह कका, चुप राह। थूकेल - कइसे चुप रहौं रे ? किसन - काबर ? थूकेल - मोला भारी फिकर होगे हे। राधा - का के फिकर होगे हे कका ? थूकेल - बहू ह कइसे करही कहिके। राधा - काबर ? थूकेल - नतनीन ह सज्ञान होगे हे, नाती ह अभिन पढ़त हे। आधा उमर म बहू खाली हाथ होगे हे। बहू के हाथ ह का खाली होइस, हमर जिनगी ह खाली होगे राधा। जिनगी ह अँधियार होगे, अँधियार। लइका मन के जिनगी ल गढ़े बर पइसा नइ हे। हमर मन बर तो दुख के पहाड़ टूटगे बेटी, दुख के पहाड़ टूटगे। (गमछा ले आँखी ल पोंछथे) (9) किसन - मत रो कका, मत रो। थूकेल - त का करौं बेटा ? किसन - त खेत म बोर नइ करा लेतेव कका ? थूकेल - बोर करा के का करबे किसन, पानी निकलही त तो। राधा - त का पानी नइ निकले ? थूकेल - हमर आँसू ह निकल जथे फेर पानी नइ निकले बेटी। किसन - अब आँसू नही पानी निकलही कका, पानी। थूकेल - वो कइसे बेटा ? किसन - हमर सरकार ह गाँव-गाँव नरवा मन ल बांधे के योजना बनाय हे। थूकेल - एकर ले का होही ? किसन - एकर ले बरसात के पानी ह नरवा म भराही तहान भुइँया के जल स्तर बाढ़ही। ओकर बाद जिही करा कोड़बे उसी करा पानी निकल जही। अब आँसू नइ निकले बल्कि सब किसान के चेहरा म हाँसी दिखही हाँसी। चल हाँस कका, खलखल-खलखल हाँस। राधा - बोनस तो घलो बाँटिस हे सरकार ह, तोर खता म आहे कि नहीं? थूकेल - कहां ले आही राधा? धान होएच नइहे त बेचबो काला। किसन - अब नरवा के बंधाय ले पानी के समसिया ह खतम हो जही। सोला आना धान होही, ओकर बाद अपन धान ल जादा कीमत म बेचबे, उपराहा म बोनस घलो पाबे। थूकेल - कतेक बढ़िया हे हमर सरकार ह। राधा - हव कका। किसन - चलव अब एसो के देवारी ल बड़ धूम-धाम ले मनाबोन।

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गीत भाग जागे रे आगे देवारी - दुर्गा प्रसाद पारकर भाग जागे रे आगे देवारी गउरा चँवरा म कुचरागे अँधियारी जगमगावत हे दिया घर दुवारी भाग जागे रे आगे देवारी.... लक्ष्मी ह देवत हे आज वरदान पिंवरागे आज हमर डोली के धान देवी-देवता मन आगे दइहान बली चघाबो दुरमत के नर-नारी भाग जागे रे आगे देवारी.... रिगबिग-रिगबिग दिया बरत हे दुखियारिन मन के दुख हरत हे दोहा म मया पीरा झरत हे मड़ई हलाबो जुरमिल के नर-नारी भाग जागे रे आगे देवारी.... किसन - बस इच्छा है भगवान कसम तेरे ही कोख में मिले जनम जो स्वेद खेत में छलकाए माथे का चंदन बन जाए राधा - तेरा इतिहास चमकता हो पावन गुलाब का रूप खिला तुफानों में भी खड़ा रहे तेरे सपनों का लाल किला

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किसन - तेरे शहर स्वर्ग बन जाए, नंदन वन हो ग्राम मेरे छत्तीसगढ़ की माटी, सौ-सौ बार प्रणाम हमर मयारूक मुख्यमंत्री भूपेष बघेल जी के कहना हे - हमर सरकार प्रत्येक नागरिक के स्वावलंबन, स्वाभिमान अउ गरिमा खातिर हर संभव उपाय करे बर कटिबद्ध हे। हमला ग्राम स्वराज बर महात्मा गांधी के परिकल्पना घलो सुरता हे अउ ओकर ए वचन घलो सुरता हे-कोनो भी निर्णय ले के पहिली सबले गरीब मनखे के सुरता करौ अउ खुद ले ए पुछो कि आप जउन कदम उठाववत हव ओह गरीब मनखे बर उपयोगी होही।हमर सरकार सबो फैसला ल महात्मा गांधी के वचन के भावना के मुताबिक ले हे। राधा - तभे तो ग्राम स्वराज के सपना ल साकार करे बर हमर मुख्यमंत्री ह नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी उपर केन्द्रित सुराजी गाँव योजना के सुरूआत करे हे। किसन - नरवा योजना के अन्तर्गत जल श्रोत ल नरवा मन के उद्गम स्थल ले सुरूआत करत जरूरत के मुताबिक जल संचयन, कच्चा अउ पक्का संरचना के निर्माण होही। राधा - वैज्ञानिक ढंग ले सेटेलाईट इमेज अउ जी.आई.एस मैप के उपयोग होही। छोटे स्ट्रक्चर, बोल्डर, चेक मन ल बढ़ावा मिलही। तरिया ल सोलर पंप अउ पाईप लाईन ले भरे जाही। किसन - तरिया मन के संधारण, जीर्णोद्धार अउ गाद ल हटाए जाही। नदिया नरवा के पुनरोद्धार होए ले जल स्तर मे बढ़ोतरी होही। राधा - जल स्तर के बढ़ोतरी होय ले दू-तीन फसल के पैदावारी भरपूर होही। जल श्रोत बाढ़े ले साल भर पर्याप्त मात्रा म पानी मिलही। पर्याप्त मात्रा म पानी मिल ले हरियर छत्तीसगढ़ के सपना पूरा होही। तहान धान के कटोरा छत्तीसगढ़ ह विकास म सबो प्रदेष ले अगुवाही।

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गीत गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज होरि, होरि, होरि, हो रेऽऽऽऽ छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी एला बचाना हे संगवारी आज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज (नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी के तख्ती मन ल धर-धर के मंच म चारो डाहर कलाकार मन किंजरथे।) दृष्य - तीन गरवा (गौंतरिहा ह एती ओती झांखत अपन गरवा ल खोजत आथे। गौंतरिहा संग फगुवा के भेंट।) फगुवा - तें कहां जाथस जी गौंतरिहा ? गौंतरिहा - गाय गंवागे हे जी, ओला खोजत हौं। बछरू ह दूध के बिना सुररत हे। देखे हस का ? फगुवा - वाह, ओला तो काली पंचराम ह कांजी भूस म ओइलाय बर गे रिहिसे जी। गौंतरिहा - अच्छा त का ओला मोरे गाय ह दिखीस जी ? फगुवा - एला तो पंचराम ह बताही रे भई। (गौंतरिहा ह तरमीर-तरमीर पंचराम करा गिस। पंचराम ह कांवर म कांदी बोह के घर आतव रिहिसे।) गौंतरिहा - अरे, वाह पंचराम। पंचराम - का होगे गौंतरिहा ? गौंतरिहा - का होगे कहिथस, मोर गाय ल कांजी भूस म काबर ओइलाए हस

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पंचराम - त का तोर घर म ओइलातेंव। गौंतरिहा - मोर घर म नइ ओइला के कांजी भूस म ओइला देस। पंचराम - त काबर नइ ओइलातेंव। गौंतरिहा - काबर ओइलाए हस ? पंचराम - मोर सब्बो धान ल चर डरे हे त का करतेंव ? गौंतरिहा - का करतेंव नही, तोला करे बर परही। पंचराम - का करे बर परही ? गौंतरिहा - तँय ह मोर गाय ल कांजी भूस म ओइलाए हस ? अब तिंही ह निकाल के लान। पंचराम - मँय नइ निकलावौं, तोला जऊन करना हे कर लें। गौंतरिहा - (धमकावत) तोला देख लुहूं। पंचराम - तँय मोला का देखबे, अभी देख। गौंतरिहा - अइसे। (दूनो झिन मार-पीट सुरू कर देथे। चैतू ह दूनो झिन ल छोड़ाथे।) चैतू - पहिली तो तुमन छोड़ो यार, झगरा मता दे हौ। गौंतरिहा - झगरा मँय नइ मताये हौं, झगरा पंचराम मताए हे। पंचराम - झगरा काकर सेती माते हे तेला तो बइठक तय करही। गौंतरिहा - एक गाँव के का, पचगैंहा सकेल डर, पचगैंहा। बइठक के दृष्य सरपंच - हँ बता पंचराम, बइठक काबर सकेले हस ? पंचराम - गौंतरिहा ह मोर संग मारपीट करे हे। सरपंच - कइसे गौंतरिहा पंचराम ल काबर मारे हस ? गौंतरिहा - नइ मारहूं त का आरती उतारहूं। सरपंच - का होगे, कुछु बताबे।




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गौंतरिहा - मोर दुहानू गाय ल कांजी भूस म काली के ओइला देहे, एती बछरू भूख मरत हे, ओती पहाटिया ह बरवाही बर तरसत हे। सरपंच - कइसे पंचराम एकर गाय ल कांजी भूस म काबर ओइलाए हस ? पंचराम - एकर गाय ह मोर धान के बिंदरा बिनास कर देहे तेह। सरपंच - कइसे गौंतरिहा गाय ल बरदी म नइ मिलाय रेहे का ? गौंतरिहा - मिलाव रेहेंव सरपंच - त फेर बरदी ले कइसे छटक दिस ? गौंतरिहा - एला पहाटिया ल पुछौ। सरपंच - कइसे पहाटिया ? पहाटिया - हुकुम करौ सरपंच जी। सरपंच - कइसे एकर गाय ल बरदी म छेंक के काबर नइ राखे ? पहाटिया - काकर-काकर गाय-गरवा ल छेंक के राखबे सरपंच जी। सरपंच - काबर ? पहाटिया - गाँव म अब तो चरागन नइ हे। त गाय गरवा मन तो हराही करबे करही। सरपंच - अब काकरो गरवा ह न कांजी भूस जावै न हराही करै। पहाटिया - वो कइसे ? सरपंच - अब हमर सरकार ह गाँव-गाँव म तीन एकड़ भुइँया के चयन करके गौठान निर्माण करही। गौठान अइसे जघा बनाय जाही जउन जघा बड़े-बड़े रूख राई होवय। पहाटिया - त गरवा तो भाग जही। सरपंच - नइ भागे पहाटिया - वो कइसे ? सरपंच - भुइँया के आरक्षण के संगे-संग ओतका जघा म फेंसिंग अउ सी.पी.टी. कार्य होही। गौठान के चारों मुड़ा वृक्षारोपरण घलो होही।

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पहाटिया - त खइरखा डाढ़ म तो चिखना मात जही। सरपंच - नइ मातै। पहाटिया - वो कइसे ? सरपंच - गरवा मन के बइठे बर पक्का प्लेट फार्म बनाय के योजना हे। पहाटिया - त गरवा मन पानी पीए बर कइसे करही ? सरपंच - गौठान म पानी टंकी, नलकूप खनन अउ सोलर पंप के स्थापना घलो करे जाही। पंचराम - एकर ले का फायदा होही ? सरपंच - गौठान के बने ले सबो गाय-गरवा एके जघा सकलाय रिही जेकर ले बधियाकरण अउ नस्ल सुधार ल बढ़ावा मिलही। गौंतरिहा - अऊ का फायदा होही ? सरपंच - आज कस कइठक सकेले के जरूरत नइ परै। गौंतरिहा - काबर ? सरपंच - जब तोर गाय-गरवा गौठान ले बाहिर जाबे नइ करही तब हराही कहां ले करही ? जब हराही इन करही त कांजी भूस कहां ले जाही, जब फसल के नुकसान नइ होही त उत्पादन म बढ़ोतरी होही। गौंतरिहा - ठउँका केहे सरपंच जी। सरपंच - ठउँका तो कहिथौं फेर मानथौं कहां ले ? सामूहिक गौठान ले पशु मन के सुरक्षा घलो होही। पंचराम - बने काहत हस सरपंच जी। हमर सरकार के ए योजना ले उन्नत नस्ल के गाय-गरवा पाबोन तहान दूध के उत्पादन म बढ़ोतरी होही। गौंतरिहा - अइसन म तो बढ़िया नवा छत्तीसगढ़ गढ़ा जही। सरपंच - नवा छत्तीसगढ़ गढ़ा तो जही फेर तँय, पंचराम सन जुन्ना दुस्मनी ल मेटा के दूनो झिन गला मिलव। (पंचराम अऊ गौंतरिहा दूनो झिन गला मिलथे।)

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गीत गांधी बबा के सपना सुराज - दुर्गा प्रसाद पारकर गांधी बबा के सपना सुराज जी चँवरा म आगे, अँगना म आगे मउँरे आमा महके मउँहा सेमर सब ल भागे दावना दाम देवत-देवत बीरो छुए बर आगे आगे पंच परमेष्वर के राज जी चँवरा म आगे गांधी बबा के सपना सुराज जी, चँवरा म आगे... जागे जाँगर संग पाँघर बइला अउ नाँगर हरियाही भर्री भांठा डोली अउ टाँगर हमर भुइँया म आगे राम राज जी चँवरा म आगे गांधी बबा के सपना सुराज जी, चँवरा म आगे... नीत नियाव चैपाल के पुरतीन करही बलराम सियानी अन्न धन भण्डार भरही सुन लव करन दानी आगे सजे सुम्मत के साज जी चँवरा म आगे गांधी बबा के सपना सुराज जी, चँवरा म आगे...

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राधा - महात्मा गांधी के ग्राम स्वराजके सपना ल सिरतोन करे बर पं. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी अउ राजीव गांधी अपन जीवन खपा दिन। किसन - अब छत्तीसगढ़ के दुलरूवा मुख्यमंत्री भूपेष बघेल ह महात्मा गांधी के सपना ग्राम स्वराजल सिरतोन करे बर किरिया खाय हे। राधा - भारत माता के करेजा छत्तीसगढ़ महतारी सब ल अपन मया दुलार देथे। किसन - तभे तो छत्तीसगढ़ के स्वप्न दृष्टा डाॅ. खूबचंद बघेल ह कथे-छत्तीसगढ़ के मान सम्मान ल अपन मान-सम्मान, छत्तीसगढ़ के अपमान ल अपन अपमान समझथे अउ छत्तीसगढ़ के मान सम्मान अउ स्वाभिमान ल बचाय खातिर अपन जिनगी खपा देथे उही सिरतोन के छत्तीसगढ़िया आय। चाहे वोह कोनो भी धर्म के हो, कोनो भी भाषा के बोलइया हो चाहे कोनो करा ले आ के बसे हो। राधा - कौषल्या के मइके छत्तीसगढ़ म अन्न भण्डार ल कौषिल्या अउ अन्नपूर्णा भण्डार के नाव ले जाने जाथे। आज कौषिल्या भण्डार ल सम्हाल के रखे खातिर अपन जिम्मेदारी निभावत हमर मुख्यमंत्री भूपेष बघेल जी हा नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी के संरक्षण अउ संवर्धन बर सुघ्घर कार्य योजना बनाय हे। हमर मुख्यमंत्री ह नवा छत्तीसगढ़ बर किरिया खाय हे। किसन - जिन्हंे दुनिया बनाती है, मकाम उनका नही बनता। जमाना उनका है, जो खुद बनाते हैं मकान अपना। 



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गीत गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज होरि, होरि, होरि हो रेऽऽऽऽ छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी एला बचाना हे संगवारी आज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज (नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी के तख्ती मन ल धर-धर के मंच म चारो डाहर कलाकार मन किंजरथे।) दृष्य - चार घुरूवा (पाँचो ह खाँसत-खाँसत स्टेज म आथे अउ गीर जथे। ओला सुकवारो उठाथे। पाँचो ह हफरत रथे। तुरते अस्पताल लेगथे। सुकवारो - का होगे डाॅक्टर साहेब दीदी ल ? डाॅक्टर - एला साँस के बीमारी होगे हे। सुकवारो - सांस के बीमारी काबर होथे ? डाॅक्टर - कचरा के बदबू ले सांस के बीमारी होथे, संगे-संगे इन्सफेंक्षन घलो होथे। सुकवारो - अउ का-का बीमारी होथे डाॅक्टर साहेब ? डाॅक्टर - काला-काला कबे, सर्दी, खाँसी, एलर्जी के संगे-संग पेट के बीमारी घलो होथे। सुकवारो - तभे तो काहँव कइसे मोरो पेट ह कुटकुट-कुटकुट रही-रही के पिरावत कहि के।

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डाॅक्टर - कहूँ तीर तखार म कचरा तो नइहे ? सुकवारो - वो तो हमर घरे करा कचरा के भरमार हे। डाॅक्टर - काबर ? सुकवारो - हम्मन तो घर के आघु म कचरा ल फेंकथन, भारी बस्साथे घलो। डाॅक्टर - त कचरा ल घुरूवा म नइ फेंकतेव। सुकवारो - गाँव म घुरूवा कहां हे डाॅक्टर साहेब। डाॅक्टर - त गाँव के घुरूवा मन कहां गे ? सुकवारो - सबो घुरूवा म तो घर बन गे हे त कचरा ल कहां फेकबे ? डाॅक्टर - अब कचरा ल अपन घर के तीर म फेंक के जरूरत नइ परही। सुकवारो - वो कइसे ? डाॅक्टर - अब कचरा बर हमर सरकार ह गौठान के तीरे-तीरे घुरूवा बनाय बर सोचे हे। सुकवारो - त एकर ले का होही ? डाॅक्टर - गाँव घर के कचरा के संगे-संग गौठान के गोबर ल घलो घुरूवा म फेकिंगे। ताहन उहें बायो गैस प्लांट के निर्माण होही। जेकर ले हम्मन गैस म खाना पकइँगे। एकर ले धूल धुआँ ले बांचबो धूल धुआँ ले बांचे ले कतनो बीमारी ले बाँचिंगे। पाँचो - (थुथुर थाम्हर करत) त अउ का-का फायदा होही डाॅक्टर साहब ? डाॅक्टर - रासायनिक खातू ले बड़े-बड़े बीमारी होथे। अब जब हम्मन घुरूवा म जैविक खातू बनाबोन तहान धान ह घलो अच्छा होही अउ फसल के उत्पादन म बढ़ोतरी घलो होही। संगे-संग पौष्टिकता घलो बाढ़ही। फल अउ साग भाजी के उत्पादन म बढ़ोतरी होही तहान बीमारी मन ले मुक्ति पाबोन।



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सुकवारो - बने काहत हस डाॅक्टर साहब। अब हम्मन कचरा ल घर के आघु म नइ फेंक के गौठान करा बने घुरूवा म फेंक के अपन सेहत के रक्षा करबोन। गीत घुरूव के दिन ह दइहान म बहुरगे... दुर्गा प्रसाद पारकर घुरूवा के दिन दइहान म बहुरगे सुख के छइँहा ह आज बगरगे हरियर-हरियर दिखत हे भुइँया अब रूख-राई मन फर म लहसगे मइया बरोबर रूख-राई के मया महतारी के सपना सँवरगे घुरूवा के दिन दइहान म बहुरगे... रूख राई संग लइका सियान झुमरत हे खेत म ददरिया के सोर उड़त हे खांेधरा म चिरई चिरगुन चिहुकत हे घरो-घरो सुख के अमरित बरसगे घुरूवा के दिन दइहान म बहुरगे...

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गीत गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज होरि, होरि, होरि हो रेऽऽऽऽ छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी, नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी एला बचाना हे संगवारी आज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज.. गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज (नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी के तख्ती मन ल धर-धर के मंच म चारो डाहर कलाकार मन किंजरथे।) राधा - चन्दूलाल चंद्राकर असुविधा अउ साधन हिनता ले कभू विचलित नइ होइस। गुरूबाबा घासीदास, वीरनारायण सिंह, मीनीमाता, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, पं. सुन्दरलाल शर्मा अउ डाॅ. खूबचंद बघेल के पृथक छत्तीसगढ़ राज के सपना ल पूरा करे बर गांधीवादी पत्रकार चन्दूलाल चंद्राकर ह शांतिपूर्वक छत्तीसगढ़ म जन जागरण चलइस। किसन - चन्दूलाल चंद्राकर अउ दाऊ वासुदेव चंद्राकर के संस्कार हमर माटी पुत्र मुख्यमंत्री भूपेष बघेल ल मिले हे। कतनो मन ल राजनीति विरासत म मिल जथे फेर भूपेष बघेल ले मुख्यमंत्री भूपेष बघेल बनाय म ओकर पिता श्री नदं कुमार बघेल जी के मार्गदर्षन रेहे हे। तब कहूँ जा के छत्तीसगढ़ ल साहसी अउ संघर्षषील मुख्यमंत्री मिलिसे। जउन आज हर छत्तीसगढ़िया के आसा अउ विष्वास आय।

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दृष्य - पाँच बारी (चैतू ह ढेरा आँटत मंच म बइठे हे, ओतके बेरा ओकर समधी रमेसर ह पहुंचथे।) चैतू - जोहार ले समधी। रमेसर - जोहार ले समधी महराज, जोहार ले। चैतू - कइसे निच्चट भांटा खुला कस खड़खड़ ले सुखाय कस दिखत हस समधी महराज ? रमेसर - काला बताबे समधी, मिही नही हमर गाँव भर के मन सुखावत हे। चैतू - कइसे जी ? रमेसर - खेत ह पानी बिना सुखावत हे, गरवा मन चरागन के बिना सुखावत हे। घुरूवा के बिना कचरा के बदबू के मारे गाँव भर के मन बीमारी म गरती आमा कस टपकत जावत हे। चैतू - त का तुँहर जिला म नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी के योजना ह लागू नइ होय हे का ? रमेसर - ए नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी ह का होथे समधी महराज ? चैतू - नरवा म स्टाप डेम बने ले जल स्तर उप्पर आ जथे तहान बोर म जल्दी पानी निकलथे। इही स्टाप डेम ले निस्तारी बर गाँव के तरिया ल भरथन तभे तो सूसी के बूतावत ले दफोर-दफोर के नाहथन। रमेसर - गरवा के योजना काए जी ? चैतू - गरवा बर हमर गाँव म तीन एकड़ म गौठान बने हे। अब गाय गरवा बर सबो के बेवस्था कोठा कस गौठान म रथे। अब तो गोबर गैस संयंत्र घलो बनगे हे। इही गोबर गैस संयंत्र ले घरो घर गैस पहुंचथे अउ इही गैस ले चुल्हा म भाग साग रांधथन।

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रमेसर - त ए घुरूवा योजना का ए ? चैतू - गौठान के तीरे-तीर घुरूवा बने हे। जेमा गौठान के गोबर ला फेंकथन। घुरूवा म गाँव भर के कुड़ा करकट ल डारथन। तहान इही घुरूवा ले जैविक खातु बनथे। रमेसर - त ए जैविक खातु ल का करथौ जी ? चैतू - इही जैविक खातू ल तो बारी म डारथन जी। तभे तो हमर गाँव भर के मन स्वस्थ अउ हिस्ट पुस्ट हन। रासायनिक खातू अउ अंग्रेजी दवई छिंचे ले फसल ह घलो रासायनिक हो जथे। जेकर उपयोग ले बड़े-बड़े जी लेवा बीमारी होथे। एकर ले हम्मन बाँच गे हन। अब तो पूरा छत्तीसगढ़ ल बचाना हे। रमेसर - बारी बखरी बर सरकार के अउ का योजना हे समधी महराज ? चैतू - सरकार ह उद्यानिकी अउ कृषि विभाग के योजना के मुताबिक साग-भाजी अउ फलदार पेड़ मन के वृक्षारोपण, साग सब्जी के उत्पादन बर जैविक खातू अउ बीजा के वितरण। संगे-संग हमर गाँव म तो नदिया-नरवा के तीरे-तीर फलदार वृक्ष मन के वृक्षारोपण होय हे। रमेसर - एकर ले का फायदा होही ? चैतू - तहूँ ह समधी महराज, चल हमर बारी ल देखावत हवँ। हमर साग भाजी के उत्पादन म बढ़ोतरी होगे हे, हमर मन के आमदनी म बढ़ोतरी होगे हे, अउ सब झिन ल पौष्टिक आहार मिलत हे। तभे तो हम्मन स्वस्थ, मस्त अउ तंदरूस्त हन। रमेसर - भइगे समधी महराज काली महँू गाँव म जाहूँ तहान सरपंच ल जल्दी से जल्दी गाँव म नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी के योजना ल लागू करे बर कहूँ।

(24)

चैतू - काली नही अभी जा अउ तुरते नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी के योजना ल लागू करे खातिर तैयारी करे बर काह। रमेसर - हव समधी महराज, जाथौं। जै जोहार! चैतू - जै जोहार! गीत गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज होरि, होरि, होरि हो रेऽऽऽऽ छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी, नरवा, गरवा, घुरूवा, बारी एला बचाना हे संगवारी आज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज गढ़बोन नवा छत्तीसगढ़ राज (नरवा, गरवा, घुरूवा अउ बारी के तख्ती मन ल धर-धर के मंच म चारो डाहर कलाकार मन किंजरथे।) 

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दुर्गा प्रसाद पारकर जन्म 11 मई 1961 षिक्षा एम.काॅम., एम.ए. (हिन्दी) प्रवर्तक एम. ए. (छत्तीसगढ़ी) पं. रविषंकर शुक्ल वि. वि. रायपुर (छ.ग.) प्रकाषित कृति चिन्हारी (लोक संस्कृति) 2001 जस जँवारा षोध” 2002 मया पीरा के संगवारी सुवागद्य 2011 मया पीरा के संगवारी सुवापद्य 2013 छत्तीसगढ़ी नाटक षिवनाथ” 2015 छत्तीसगढ़ी नाटक सुकवा” 2018 छत्तीसगढ़ी नाटक चंदा” 2018 छत्तीसगढ़ी नाटक संग्रह सोनचिरई” 2018 छत्तीसगढ़ी उपन्यास केंवट कुंदरा” 2020 छत्तीसगढ़ी स्तंभ : चिन्हारी (दैनिक भास्कर, रायपुर) 1995 - 2000 आनी बानी के गोठ (दैनिक रौद्रमुखी स्वर) 1992 - 1993 संपादन : लोक मंजरी (छत्तीसगढ़ी) 1995 छत्तीसलोक (छत्तीसगढ़ी) 1995 अपन कद काठी ले बड़का साहित्यकार डुमन लाल ध्रुव (व्यक्तित्व - कृतित्व) सम्मान : राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ शासन प्रेम साइमन सम्मान बिसम्भर यादव मरहासम्मान पता : केंवट कंुदरा, प्लाट - 03, सड़क - 11, आषीष नगर (पष्चिम) रिसाली, भिलाई, छत्तीसगढ़ -490006 मोबाइल नं. : 9827470653, 7999516642 (26) 



Friday, 8 July 2022

चौमासा के चार रंग**


 

**चौमासा के चार रंग**

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     "चार महिना के चौमासा। चौमासा कहे ले- चार महिना। चार महिना तो ठंडी अऊ गर्मी के घलाव होथे; फेर, चौमासा, ये बरसात के समय ल ही कहे जाथे।   अषाढ़ ले लेके सावन-भादों- क्वाँर! ये चार महिना हर सबो मइनखे बर बिकट होथे। 

    बरसा हर जिनगी के अधार ये, पानी बिना खेत-खार सुन्ना, काम-धंधा ठप हे! नदिया-नरवा, ताल-तलइया, तरिया-पोखरी, सब सुखा जाथे। चार महिना पानी नइ गिरही त खेती-खार नइ होवय, अकाल पर जाथे। चारा बिना जानवर मन मर जाथें। जीव-जंतु बेहाल हो जाथें। देश - दुनिया के साधन संपन्नता हर ये चार महिना के अधार म रइथे। फेर, चार महिना के चार रंग। अषाढ़ के बरसा हर आन होथे, त सावन-भादों के बरसा हर आन रुप म होथे, क्वांर के महीना के बरसा के आन महत्व होथे। दिगर जगह म दिगर होथे, त दिगर जगह म दिगर। 

     साधु-संत -महात्‍मा मन बर चौमासा के अलग महत्व हे त घर गृहस्थी वाला मन बर अलग महत्व हे। किसान आदमी खेती-किसानी म मगन हो जाथें त काम-धंधा करइया मन के कामधंधा हर निहल हो जाथे। रोजी-मजदूरी वाला मन के तो जान दे काम धंधा बिना घर म फांका पर जाथे। जेकर घर म भरे-बोजाय ते तो झक्कर के मजा  उड़ावत तर माल खाथे, जेकर नइ हे, गरीब-गुरा हे तेकर चूल्हा म हांड़ी नइ चढ़य। कइसनो करके चउर-दार कर दारही त लकड़ी-छेना मार दारथे। आगी के सुलगत ले लईका मन भूख म  अलथी-कलथी देवत सूत भूलाथें।  आगी सुलगइया सुवासिन के मूड़कान पीरा जाथे। नानकन घर-दूरा; बइठे के ठउर नहीं, तभो ले घर भीतरी म लकरी-छेना ल घुसार दारे रथें। साँप-बिच्छी आ जाही तेहु ल नइ डरांय, काबर कि पेट भरना जरुरी ये। सावन के बरसा हर धरती के प्यास ल बुझा दिही फेर पेट के आग ल बुझाय के सामर्थ्य  नइ रखे। पेट बर तो दाना चाहिये। 

     गरीब आदमी ल अपन नोनी-बाबू के पेट के चिंता होथे, अपन घर-दूरा टूटे के चिंता होथे, अपन खपरा छानही चुहे के चिंता होथे। अपन टिन-टपरा ल बचाय के उपाय सोंचथे। बड़े आदमी मन  अपन बड़े-बड़े घर के बालकनी म बइठे बारिस के मजा लेवत किसिम-किसिम के पेंड़-पौधा लगाय के बारे म सोंचथें। गरीब अादमी अपन डेहरी म बइठ के काटथें त बड़े आदमी गाड़ी म बइठ के लॉग ड्राइव करे बर निकलथें। सिनेमा जाथें, चौपाटी जाथें, रंग-रंग के मजा उड़ाथें। नौकरी वाला मन के अलग ढंग। काहीं कछु के चिंता नइ रहय, येमन के एके ढंग रइथे येमन के मन हर ढेरियावत रइथे। कभू येमन सरोत्तर मन ले अपन काम म नइ जावंय, फेर का करबे नौकरी ये बाबू त करेच ल परही, येही सोंच के मनटुटहा चल देथें। बस ये ही हाल हे। गाँव म चिखल-काँदो मार देथे त शहर म घलाव जगह-जगह पानी भर जाथे, नाली-नाला के कचर-पचर, कती के पानी कती। गाँव म खेती-किसानी, निंदाई-कोड़ाई, बियासी, रोपाई के काम हर माते रथे त शहर म घलाव जइसे-तइसे काम-धंधा चलत रथे अउ घर-गृहस्थी के गाड़ी हर चलत रथे। सबले मुश्किल निम्न मध्यम वर्ग वाला मन के होथे जउन मन छोट-मोट काम-बूता कर नइ सकंय नहीं कोनो ढंग के काम-बूता रहय। 

    अब मुश्किल तो मुश्किल ये फेर तभो चार गर्मी ले बिट्टाय मइनखे हर अषाढ़ के पानी ल देख के जुड़ा जाथे। सावन-भादो कतको तकलीफ के होथे तभो ले आदमी गरज-बरस के बरसे बरखा के आनंद लेवत रइथे। भले कीचड़-कांदो कतको रहय फेर जम्मो कोती हरियर-हरियर देख के सब के मन हर आनंद होवत रथे। चउमास म जूड़-सर्दी ले लेके  किसम-किसम के बीमारी हर आथे जेमा आदमी हर परेशान हो जाथे। दूसर तरफ सब तीज-तिहार हर। छत्तीसगढ़ के बाते जान दे; हरेली ले शुरु त फेर हरेली, तीजा-पोरा,

खमरछठ,जन्माष्टमी, भोजली, गणेश, कतको अक तिहार मनाथें। चार महिना चहल-पहल बने रथे। सावन भर येती के मइनखे ओती जावत हे, ओती के मइनखे येती आवत हें। इहाँ के पानी उहाँ, उहाँ के पानी उहाँ ले के शंकर भगवान म चढ़ावत रथें फेर शंकर भगवान के पिंडी के पानी घर ले के जावत रथें। कोनो पहाड़-जंगल के सैर करे बर जावत हें त कोनो झरना-नदिया के पानी म नैन सुख पावत हें। साधु-संत मन कोनो एक पाँव म ठाढ़े तपस्या करत हें त कोनो बइठे कथा-भागवत करत हें। कोनो सुक्खा बितावत हें, त कोनो फल-फूल खा के। कोनो मन हलवा पूड़ी घलव खावत हें। जेकर-जेकर जइसन-जइसन मन हे; ओहर वइसन-वइसन चौमासा के चार महिना के समय ल बितावत हे।

     फेर दुःख तकलीफ चाहे कतको परे फेर; हर मइनखे चाहथे कि, पानी हर झमाझम के गिरे। बदरा जतके बरसथे, धान-पान हर ओतके पोट्ठ होथे। बादर के बरसे ले मन हर झूमर जाथे, आदमी गद् गद्  मन ले धान-पान तिंवरा- ओन्हारी के आस जगा लेथे अउ नाना प्रकार के सपना संजोय लगथे। येकर असर हर इहाँ के पूस पून्नी म मनाय जाने वाला "छेरछेरा" म दिखथे, जब किसान मन मगन होके नाचथें-गाथें अउ दूनों हाथ ले उलच-उलच के धन-धान लुटाथें।

    चौमासा हर मौज-मस्ती के तो महिना आय फेर जीवन ल दूभर घलव बना देथे, फेर तभो ले मइनखे येकर रस्ता देखथे तभे तो चौमासा के पहिली येकर तियारी कर लेथे। घर-दूरा ल साज-सँवार दारे रहिथें त खान-पान के घलव बेवस्था ल कर दारे रहिथें। आखिर चौमासा ले ही तो साल भर के आसा टिके रहिथे। 

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   **अंजली शर्मा **

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )


74709-89029

88895-29161.

anjalisharma160272@gmail.com

चऊमास


 

चऊमास

हमर देश म बारह महीना के एक बछर होथे ये बारह महीना ल परमुख चार चार महीना के अलग अलग ऋतु म बांट दे गे हावय चऊमास के गिनती आषाढ़ सावन भादो कुंवार ये चारों महीना ल मिलाके चऊमास कहे जाथे जेठ वैसाख के गरमी से लोगन व्याकुल हो  जा थे तिपत भुइंया म  उसनाय कस दिख थे चौमास हमर किसान मन के लिए जादा महत्व रख थे चऊमास म दुख 

अउ सुख दोनो मिल्थे किसान अपन खेती किसानी के तैयारी  स्कूल जव इया लईका मन स्कूल जाए के तैयारी चिरई चिरगुन अपन घोषला के तियारी किसान मजदूर बनिहार अपन घर कुंदरा के मरम्मत के तैयारी करथे  किसान मन खेत म धान  राहर कोदो तिली बोथे  असाढ़ म पानी गिर थे त सबके मुंह हरिया जाथे

तिहार के शुरुआत भी चऊमास से हो थे चारों कोती खेत खार हरियर हरियर दिख थे नदिया तरिया कुआ झिरिया सबो आषाढ सावन भादो के महीना म गांव चिखला म माते रहिथे लईका सियान चीखला म बिछल के गिर भी जाथे सावन के वर्षा भादो के गरजना म 

लईका सियान डरा जा थे  चऊ मास म हरेली कमरछठ तिजा पोरा भोजली गणेशजी के आगमन हो थे सावन भादो के सूपा कस धार म नदी नाला म पुरा से नुकसान भी होते चऊमास म कई तरह के बिमारी भी हो थे जेकर से हमला बचना हे  नवा पानी के कारण सर्दी बुखार खासी फोड़ा फुंसी भी हो जा थे डाक्टर से सलाह लेके बिमारी से बचना हे

बरसात म गांव म गंदगी जा दा हो जा थे त सफाई म भी ध्यान देना हे तभे हमर देश  आउ खुद के विकास होही 


मोहन डहरिया कोटमी भाटापारा

8319589325

चउमास के जोरा-दुर्गा प्रसाद पारकर*



*चउमास के जोरा-दुर्गा प्रसाद पारकर*

 


आमा पाके पहिली मउराथे, जाम पाके पहिली गेदराथे, पानी गीरे के पहिली बादर करियाथे उही किसम ले चउमास आए के पहिली हवा गरेर के संगे संग सीटीर साटर पानी ह धरती के आचमन करथे पूजा पाठ बर ताहन फेर किसान किसानी के तइयारी करथे। डोली धनहा के कांटा खूटी ल बीन बांवत बक्खर बर चतवार के एक जघा सकेल के कांटा खूटी के मुंह म आगी लगा के उंकर नाव  बूता देथे कांटा खूंटी बिनइया किसनहीन मने मन ए बात के बिनती जरुर करथे कि जब मोर नंगरिया झेंझरी म धान, छेना म आगी लोटा म पानी अऊ हुम बर गुड़ नही ते दसांग धर के नांगर बइला संग आही त ओकर पांव म कांटा झन गड़य सांप बिच्ची ले बिनती करथे हे नाग देव तुंहर मान मनउवा ल पूरा करबोन कोनो किसम के अलहन झन आवय। तभे तो हमर किसानी ह सोला आना होही ताहन फेर देवी देवता ल तिहार म तो मानबे करबोन संगे संग करजा बउड़ी ल घलो छूटबोन।

           चउमास के पहिली नदिया नरवा गांव वाले मन के संगे संग सबो मन बरसाती जोरा कर लेथे | बोरा भर नून गड़ा वाले मवेशी खवाए बर, टीपा भर तेल, पठौव्वा म छेना लकड़ी ल रच-रच के भर डरथे। 

अभी तो बरसात ह तिरीया गे हे कहिके बरसात म मवेशी मन बर गांव-गांव पैरावट के पैरा ल बइला गाड़ी म जोर-जोर के घर के पठौव्वा म भरत जात हे। तीर के कोठार वाले मन बोझा - बोझा घलो डोहार डरथे। धनकुट्टी बाले मन ल तो धान कुटे ले फुरसद नइ हे।

चउमास म किरा मकोरा के भारी डर रथे। भुइयाँ म सुतई ह बने नइ राहे तिही पाए के पहिलीच ले मनखे मन खटिया गांथ डरथे, अभी संझा कांसी के डोरी  बर के गुढ़वा बना के मुड़ी म बोही के ढेरा आंटत करको जघा किंजर के घलो आ जथे। 

अटाये के बाद सुविधा के मुताबिक माचा नही ते बरदखिया खटिया गांथ डरथे। सबो बेवसाय वाले मन अपन अपन धंधा म मगन रथे जइसे भंगई बनइया मन भंदई बनाए म काबर कि किसान ल चिखलही भंदई के जरुरत परथे, केवट मन मछरी फंदोए बर झोल्ली दावन के जुगाड़ म रथे, बढ़ई खटिया के खातिर खुरा पाटी बनाए बर लकड़ी के बेवस्था करथे। 

    ए सब तो चलत हे फेर अभी गांव के कोनो भी गली म रेंग जव मुंह ह आमा के अम्मट अऊ कुर म मुंह ह पंछा जही। जब मोर मुंह ल लिखते लिखत पंछावत हे त आघु म रही ते ओला खाए बिना थेरे छोड़हू रे भई।

दाऊ लाला मन घर तो तीन चार साल के जुन्ना चाँउर खाथे उही किसम ले ऊंकर मन घर आमा के अथान ल घलो पाबे । आमा के अथान घलो धीरे धीरे नंदा जही तइसे लागत हे। 

आमा ल टोर के पानी म बुड़ो दे। पानी ले हेर हेर के सबसे पहिली ओकर लस्सी ल सरोता म काट ताहन सोजिया के आमा के चार फांकी कर दे। एक झन कांटत हे त लइका मन गोही निकालत हे अउ लइका के दाई ह कुर मेलत हे बढ़िया जीनगी ल चलाए बर। जेकर चटनी जतेक सुहाथे उंकर जिनगी घलो ओतके बढ़िया चलथे। बने सवाद बर आमा ल हरदी म मेल के रौउनीया म सुखो दे। झूराए के बाद ओमा कुर ल कोंच कोंच के भर दे। अइसन चटनी म जाला अऊ कीरा परे के डर नइ राहे। अब तो आमा के कूटी कूटी आठ टुकरा कर के छीदीर बीदीर कर देथे तभे तो मोला अइसे लागथे कि कुर ह चारो फांकी ल एक जघा जोर के संयुक्त परिवार चला डरथे  अउ इही आमा के कुटी कुटी होए ले  संयुक्त परिवार के अभाव दिखथे तभे तो सियान म कथे के खान पान, वातावरण ह रहन सहन ल प्रभावित करथे। 

गांव के भाई मन अभी खइरपा बनाए म मगन हे दीवाल ल बचाए । नांगर, लोहा के संगे संग नाहना जोतार, डोर, खुमरी, मोरा के बेवस्था तो करबे करत हवय फेर थके हरे जीव चैन के नींद सूते बर घर ल टपरे बर परही नहीं ते पानी ह फूटे खपरा डाहर ले चूह के जीना हराम कर देही  ।

दुर्गा प्रसाद पारकर*

 


पानी ले किसानी अउ किसानी ले जिनगानी


 

पानी ले किसानी अउ किसानी ले जिनगानी 

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    *चउमास के महीना न सिरिफ छत्तीसगढ़ बल्कि भारत देश के खेती-किसानी,व्यवसाय, तीज-त्योहार, खान-पान,कला अउ संस्कृति ल जीवंत बनाए बर साल भर के ०८ महीना ले खूब महत्वपूर्ण होथे |*

    *पानी ले किसानी*

     *किसानी ले जिनगानी*

    *किसानी ले सब उच्छामंगल आनी-बानी*

   

    *आज ले लगभग ५० साल पहिली पोथी-पंचाग के जानकार पंडित मन अषाढ़ बदी परूवां के दिन गांव-गांव के गुड़ी म बइठ के किसान मन ल संवत के जानकारी बतावत रहिन- "एसों कै बिसवां पानी हे ? कै बिसवां धान हे ? कै बिसवां घास-बन हवयं ? जैसे ०८ बिसवां धान हे, १६ बिसवां पानी हे, ०६ बिसवां बन-कचरा हे | तेकर मतलब होवय-एसों खूब फसल होही,अच्छा सुकाल हवय | ए रहस्य ल अइसे समझे जा सकथे -"जब हम चाऊंर ल भात बनाए बर चुरोथन, तब चाऊंर ले दूगुना पानी डाल के रांधे ले चोवा भात बढ़िया पक जाथे | जैसे  कूकर म भात पकाथन, या बिना कूकर के गंजी-तबेलिया म  चोवा भात पकाथन तब ०१ गिलास चाऊर म दू गिलास पानी डालथन |  चाऊर ले दूगुना पानी नइ डाले से भात नइ पकय,डांकर- चऊंरहा हो जाथे अउ  जल जाथे ! खाए के लाईक नइ रहै |*

     *तईसने पंडित मन बतावैं -"एसों धान ले डबल पानी हवय | एकर मतलब खूब अच्छा फसल होही-सुकाल होही* |

     *जउन साल घांस-फूस जादा रहय जैसे ०८ बिसवां घांस-फूस,०६ बिसवां धान | एकर मतलब एसों पानी कमती बरसही, तेकरे सेती घास-बन घपट जाही, धान ल चगल डारही अउ खूब दुकाल परही !*

    *कोनो साल ०६ बिसवां धान अउ १५-१६ बिसवां पानी बतावैं, तेकर मतलब एसों पानीच-पानी म धान ह जलजला जाही अउ पनिहा दुकाल होही !*

     *अइसे ढंग से संवत बताए के बदला म गांव भर के किसान मन वो पंडित ल चाऊर-दार, साग-भाजी, दू-चार आना पैसा दक्षिणा के रूप म देवत रहिन, तेला बैला गाड़ी म भर के ओ पंडित ह अपन घर लेगत रहिन | 

    *आजकल तो लोगन खूब जागरूक हो गईन, टी. बी., समाचार पत्र, आकाशवाणी ले प्रसारित कृषि समाचार सुन के, या  अपन स्मार्टफोन मोबाईल ले पानी-बादर के जानकारी ले लेथैं |

    *पहिली के किसान मन "अकती तिहार" (परसुराम जयंती) के दिन अपन खेत म गोबर -खातू डाल के पांच मुठा धान सींच के "मुठ" ले लेवत रहिन | अउ आद्रा नक्षत्र म दंदोर के पानी बरसत रहिस, तब बोए धान मन भकभक ले जाम जावत रहिन | वो बखत "चउमास" ह अषाढ़ ले कुवांर (आश्विन नक्षत्र) तक माने जावत रहिस |*

      *अब नवा-नवा हाईब्रेग धान के प्रजाति आ गे, जऊन ८० या ९० दिन म भरपूर उत्पादन होथे, साथ ही नवा-नवा कृषि यन्त्र, ट्रेक्टर आ गे | तेकरे सेती "खुर्रा पद्धति" के धान बोवाई लगभग समाप्त हो गे | अब खेत म पानी भर जाथे, तब ट्रेक्टर म मता के "रोपा पद्धति" से धान के फसल उगाए जाथे |*

     *अब चउमास महीना ह सावन ले सुरू हो के कार्तिक तक माने जाथे |*

      *सावन बदी अमावस्या के दिन हरेली तिहार होथे | हमर छत्तीसगढ़ राज्य म हरेली तिहार ल चउमास के पहिली तिहार माने जाथे | ए दिन किसान मन अपन कृषि औजार ल धो के अंगना म लाल मुरूम ऊपर राखथें अउ चाऊर पिसान-गुलाल लगा के, गुड़-घी के हूम-धूप देथैं, चाऊर पीसान के गुरहा चीला चढ़ाथैं, खेत म जा के घलो चीला चढ़ाथैं | 

    *खेती-किसानी के बूता ले थके बईला-भैंसा ल अंडी के पत्ता म नून ल भर के खवाथैं, जेकर से थके बईला-भैंसा के पाचन क्रिया भरपूर होथे | कोठा के अउ जम्मो मवेशी ल घलो अंडा के पत्ता म नून लपेट के खवाथैं, ढोर डाक्टर से बीमारी रोधक टीका लगवाथें,जेकर से मवेशी ल सावनाही बीमारी-खुरहा, चपका,गलघोंटू से बचाव होथे | किसान मन के अन्न धन अउ गौ धन दूनो खूब महत्वपूर्ण होथे |*

       *हरेली तिहार के पहिली रात  गांव के बईगा मन गांव के देवी-देवता ल मनाए बर  सिवाना म अंडा, कुकरा देथें अउ गांव के सिवाना ल बांध के गांव सुधार करथैं,ताकि चउमास म गांव के जम्मो मनखे अउ मवेशी मन ल कुछु बरसाती बीमारी झन होय | गांव के लोहार ह घर-घर जा के घर दुवारी चौखट म खीला-पाती ठोंकथैं,ताकि जम्मो मनखे स्वस्थ रहैं | गरूवा चरवाहा राऊत मन अपन किसान के कोठा म जंगली दवाई खोंच देथैं,ताकि जम्मो मवेशी मन स्वस्थ रहैं, बदला म किसान मन जम्मो पौनी-पसारी ल दार-चाऊंर देथैं*|


     *सावन सुदी पंचमी के दिन "नागपंचमी तिहार" होथे | ए दिन किसान मन धरती माता म नांगर नइ चलावैं, न ही रांपा-कुदारी म खनै, बल्कि श्रद्धा-भक्ति पूर्वक नाग देवता के पूजा करथैं, खेत-खलिहान अउ भिंभोरा म  जा के नाग देवता बर दूध चढ़ाथैं*

      

      *सावन सुदी सप्तमी के दिन गांव के बहिनी-बेटी मन अपन पारा के मुखिया घर सामूहिक रूप से "भोजली" बोथैं | तेकर रोज संझा खेत ले आ के धूप अगरबत्ती जला के पूजा करथैं अउ श्रद्धा भक्तिपूर्वक "भोजली गीत गाथैं:-*

      *देवी गंगा-देवी गंगा लहर तिरंगा ओ लहर तिरंगा*

       *हमरो भोजली दाई के भींजे आठो अंगा*

       *आ हो $$$ देवी गंगा*

      *माड़ी भर जोंधरी पोरीस कुसियारे-पोरीस कुसियारे*

     *जल्दी-जल्दी बाढ़ा भोजली जाहा ससुरारे*

      *आ हो $$$ देवी गंगा ........*

    *आई गई पूरा,बोहाई गई कचरा-बोहाई गई कचरा $$$*

      *हमरो भोजली दाई के सोने-सोन के अंचरा*

      *आ हो $$$$ देवी-गंगा ........*

     *लीपी डारेन, पोती डारेन, छोड़ी पारेन संगसा, ओ छोड़ी पारेन संगसा $$$*

     *हमरो भोजली दाई ल चाबथे मंगसा !*

      *आ हो $$$¢ देवी गंगा .........*


    *सियान मन के हाना भी एक मंत्र समान होथे : - सावन म सांवा फूले, भादो म कांसी*

    *कुवांर म ठग दीस बरखा*

      *किसान ल हो गे फांसी*

     *ए किसम से सावन शुक्ल सप्तमी के दिन बोए "भोजली दाई" के नौ दिन- नौ रात तक खूब श्रद्धा भक्तिपूर्वक पूजा करके राखी के बिहान दिन संझा बेरा गांव के तरिया या नदिया-नरवा म ठंडा (बिसर्जन) करथें | चैत अउ कुवांर म बोए जोत-जवांरा जैसे "भोजली दाई" के नौ दिन-नौ रात सेवा करके गांव के बेटी,बहिनी, बहूरिया,काकी,बुढ़ी दाई मन के "भोजली दाई" के प्रति अपार श्रद्धा भक्ति जागृत हो जाथे | भोजली दाई ल बिसर्जन करत बेरा कई झन बेटी-बहिनी मन खूब रो डारथैं ! पर्यावरण अउ प्रकृति के प्रति अपनापन अउ अपार श्रद्धा भक्ति होथे | हमर छत्तीसगढ़ के बेटी-बहिनी,बहुरिया मन के प्रकृति प्रेम,अपनापन भाव के हिरदय ले स्वागत करथन, कोटि-कोटि वंदन, अभिनंदन करथन*

    *सावन शुक्ल पूर्णिमा के दिन "राखी तिहार" खूब मया-दुलार अउ अपनापन भरे होथे | ए दिन जम्मो बहिनी मन अपन भाई के हाथ म रेशमी धागा के डोरी बांध के अपन रक्षा के वादा करवाथें | ए पवित्र तिहार के प्रभाव अतेक जादा होथे- जऊन भाई के बहिनी नइ रहै, तऊनो ह दूसर के बहिनी ल अपनेच बहिनी के भाव से मानथें अउ दूसर के बहिनी ह ऊंकर हाथ म "राखी" बांध के जीयत भर अपन सग्गे भाई सहीं व्यवहार करथैं* |

     *भादो कृष्ण पक्ष छठ के दिन "खमरछठ" तिहार होथे | ए दिन जम्मो महतारी मन अपन संतान के सुरक्षा अउ दीर्घायु के कामना कर के उपवास रहिथैं अउ हलषष्ठी देवी" (माता पार्वती) के पूजा करथैं* |

      * *भादो कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण जी के जन्माष्टमी महोत्सव खूब धूमधाम से मनाथें | ए दिन घर भर के जम्मो लईका-सियान उपवास रहि के भक्तिपूर्वक पूजा-आराधना करथैं अउ रात के १२ बजे भगवान के जन्म मान के फरहार करथैं*

    

     *भादो कृष्ण पक्ष अमावस्या के दिन "पोला तिहार" मनाथैं | ए दिन नान्हे-नान्हें बेटी-बहिनी बर माडल स्वरूप जांता अउ पोरहाई बिसा के जांता-पोरहाई के प्रति रूचि जगाए जाथे,ताकि बड़े हो के ससुरार जा के ढेंकी-जांता म अन्न कूट-पीस के अपन परिवार बर भोजन बनाए के रूचि होवय |  तईसने छोटे-छोटे बेटा मन बर माडल स्वरूप बईला बिसा के किसान मन के खेती के आधार बईला के प्रति प्रेम-भाव अउ अपनापन जागृत होवय | आजकल कृषि वैज्ञानिक मन के किसम-किसम के कृषि यन्त्र, ट्रेक्टर के आविष्कार होय से बईला नांगर द्वारा खेती अब कमती होवत जाथे, लेकिन पुरातन पद्धति बईला नांगर द्वारा खेती अपेक्षाकृत सस्ता अउ जादा लाभदायक होथे | अब लोगन जादा सुविधाभोगी, आराम धर्मी हो गईन, तेकर सेती बईला नांगर संग मेहनत करें बर ढेरियाथें* | 

     *"पोला तिहार" के दिन जम्मो किसान अपन घर के कुल देवी-देवता म छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध व्यंजन ठेठरी-खुरमी बना के चढ़ाथे अउ खुद ए लजीज व्यंजन के आनंद लेथें | ठेठरी-खुरमी रोटी के खास विशेषता होथे- ए ह पंद्रह-महीना दिन तक बसियाय नहीं, एकर सेवाद ह जस के तस रहिथे अउ खेती-किसानी के बूता करके  घर आ के जब रिमझिम-रिमझिम बारीस होवत रहिथे,तब जम्मो परिवार मिल-जुल के ए रोटी के सेवाद लेथैं अउ अपन भूख मिटाथें* |

     *पोरा तिहार मान के जम्मो भाई या जेकर भाई नइ रहै, तिंकर कका, ददा मन अपन बेटी,बहिनी ल लेहे बर ऊंकर ससुरार जाथें | पोरा तिहार के ओही रोटी ठेठरी-खुरमी ल धर के बेटी-बहिनी घर लेगथें | छत्तीसगढ़ के जम्मो बेटी बहिनी मन "तीजा तिहार"  बर अपन मईके जाए बर दिन-रात ददा-भईया के रद्दा जोहत रहिथें | घर के छांधी या लेंटर ऊपर बईठ के कोनो कौआ कांव-कांव करथे,तब बेटी-बहिनी खूब गदगद हो जाथें-"ए कौंआ ह मोर ददा-भईया के आए के सोर लाने हे" तोला बहुत-बहुत धन्यवाद हे कौंआ | पोरा के बिहान दिन कोनो बेटी-बहिनी के ददा-भईया ह लेहे बर नइ पहुंचै, तब घेरी-बेरी गली-खोर म निकल के कुकूर-बिलाई ल निटोरत रहिथें ! कहिथें-"मइके के कुकूर-बिलाई दुर्लभ अउ अनमोल होथे !*

     *तीजा तिहार हमर छत्तीसगढ़ के बेटी बहिनी मन के सब ले बड़े तिहार होथे | ए दिन सकल बूता ल अंतार के मईके जाथें, दीदी-बहिनी, संगी-सहेली गले मिल के अपार आनंद के अनुभव करथें, फेर चौबीस घंटे निरजला उपवास रहि के तीजा के बिहान दिन चीला,कतरा,बीनसा पानी, घारी,भजिया, इड़हर अउ बासी के फरहार करथें | अपन सुहाग बर जैसे माता पार्वती ह कठिन तपस्या करके "अपर्णा" कहलाईस अउ महादेव ल प्रसन्न करके अपन पति बनाईस |*

      *वोही किसम से हमर छत्तीसगढ़ के बेटी-बहिनी मन "तीजा तिहार" म निर्जला उपवास रहिके माता पार्वती अउ महादेव से अपन सुहाग के सलामत अउ दीर्घायु के कामना करथैं ! छत्तीसगढ़ के जम्मो बेटी बहिनी ला अतेक सराहनीय पतिव्रत धर्म के पालन करे बर कोटि-कोटि वंदन अभिनंदन अउ साधुवाद देवत हौं* |

     

      *तीजा के बिहान दिन बिघ्न विनाशक लंबोदर स्वामी भगवान गणेश जी के स्थापना करथैं अउ  ११ दिन तक खूब पूजा-आराधना कर के कुवांर कृष्ण पक्ष परूंवा अर्थात पीतर पाख के पहिलीच दिन बिसर्जन करथें* |

     *कुवांर कृष्ण पक्ष प्रथमा से ले के अमावस्या तक पीतर दाई-ददा,पुरखा मन ल पीतर तर्पण दे के तृप्त करथें | पीतर देवता मन अपन कुल-परिवार ल सुख-समृद्धि के आसीरवाद देके पीतर बिसर्जन के दिन फेर पीतर लोक चले जाथें |*।    

   *पीतर पाख समाप्त होते ही कुवांर शुक्ल पक्ष प्रथमा से ले के नवमी तक "नवरात्रि पर्व" होथै, तेमा महालक्ष्मी, महासरस्वती अउ महाकाली के खूब श्रद्धा भक्ति पूर्वक पूजा-आराधना करथें | कुवांर नवरात्रि अउ चैत नवरात्रि पर्व ल महापर्व कहे जाथे, ए पर्व म जम्मो लईका-सियान के तन-मन म माता के प्रभाव देखे जा सकथे | ए पर्व है सुख,शांति अउ समृद्धि प्राप्त करे के महान पावन पर्व होथे* |

      *नवरात्रि पर्व के समाप्त होते ही कुवांर शुक्ल पक्ष दसमी के दिन"दसहरा तिहार" होथे | ए दिन भगवान श्री राम चंद्र जी ह दस सिर वाले पापी, दुराचारी रावण के अंत करे रहिस | एही खुशी म देश भर दसहरा तिहार खूब श्रद्धा भक्ति की उत्साह पूर्वक मनाए जाथे*|

     *दसहरा तिहार के बीसवां दिन "दीपावली महापर्व" होथे |  कार्तिक कृष्ण पक्ष तेरस के दिन "धनतेरस" , चौदस के दिन "नरक चौदस" अउ अमावस्या के रात ", दीपावली तिहार मनाथें | कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रथमा के दिन "मातर तिहार" अउ बिहान दिन "गोवर्धन पूजा" खूब धूमधाम से मनाय जाथें |*


        *चउमास महीना के वर्णन आध्यात्मिक भाव से भी ओतप्रोत हवय | ए संबंध म एक लोकगीत प्रस्तुत हवय :-*

   *,निकल चले दुनो भाई जी, वन को निकल चले*

    *आगे-आगे रामे चलतु हैं-२*

    *पीछे म लछिमन भाई जी*

      *वन को निकल चले*

     *मांझ-मंझोलन सिया-जानकी*

      *चित्रकूट बर जाई जी*

      *वन को निकल चले*

     *सावन महीना रिमझिम बरसे-२*

      *भादो म गहिल जनाई जी*

    *वन को निकल चले*

     *निकल चले दूनो भाई जी*

      *वन को निकल चले*



*चउमास के वर्णन गोस्वामी संत तुलसीदास जी ह किष्किंधा काण्ड के दोहा क्रमांक-१३ से ले के दोहा क्यों १५ तक लिखे हवंय, तऊन अद्वतीय अउ मंत्र समान हवय*

*दो. लछिमन देखु मोर गन*

    *नाचत बारिद पेखि*

*गृहि बिरति रत हरष जस*

   *,बिष्णु भगत कहुं देखि*


*दो. हरित भूमि तृन संकुल*

     *समुझि परहिं नहि पंथ*

   *जिमि पाखंड वाद तें*

    *गुप्त होहिं सद्ग्रंथ*


*दो. कबहुं प्रबल बह मारूत,*

    *जंह-तंह मेघ बिलाहिं*

*जिमि कपूत के उपजे,*

   *कुल सद्धर्म नसाहि*

      *ए किसम से छत्तीसगढ़ के चउमास सावन से ले के कार्तिक तक खेती-किसानी के बूता के साथ-साथ अधिकांश तिहार भी ह़ोथें | हमर पूर्वज मन खूब ज्ञान-विज्ञान अउ भक्ति भाव से ओतप्रोत रहिन | ऊंकर बनाए तीज-त्योहार , लोक गीत, संगीत, खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन, आचार-विचार, परंपरा के हम सब ला श्रद्धा भक्ति पूर्वक पालन करना चाही, एकर से हमर जिनगी म सुख शांति अउ समृद्धि मिलथे अउ हमर जिनगी सरल-सुगम पूर्वक व्यतीत होथे |*

      *आप सब ला छत्तीसगढ़ के चउमास महीना के जम्मो तीज-त्योहार बर गाड़ा-गाड़ा बधाई अउ शुभकामना देवत हौं*


     

दिनांक-०५.०७.२०२२


आपके अपनेच संगवारी


*गया प्रसाद साहू*

   "रतनपुरिहा"

मुकाम व पोस्ट करगीरोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)

मो नं-9926984606

🙏☝️✍️❓✍️👏



6 जुलाई पुण्यतिथि म सुरता//



 6 जुलाई पुण्यतिथि म सुरता//

छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान बर जिनगी भर संघर्ष करीन रामाधार कश्यप जी...


राज बनगे राज बनगे, देखे सपना धुआँ होगे

चारों मुड़ा कोलिहा मन के, देखौ हुआँ हुआँ होगे... 


का-का सपना देखे रिहिन, पुरखा अपन राज बर

नइ चाही उधार के राजा, हमला सुख-सुराज बर

राजनीति के पासा लगथे, महाभारत के जुआ होगे... 


    छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन के संगे-संग छत्तीसगढ़िया मन के शोषण, स्वाभिमान अउ अधिकार खातिर जतका झन संघर्ष करे रिहिन हें, सब के मन म ए बात ह जरूर उठत रिहिसे, के का जेन उद्देश्य ल लेके छत्तीसगढ़ राज के आन्दोलन म संघरेन, वो ह आज राज बने के कोरी भर बछर बुलके के बाद घलो पूरा हो पाय हे? अउ कहूँ नइ हो पाय हे, त काबर नइ हो पाय हे? का एकर खातिर हमला फेर सरलग संघर्ष के रद्दा ल जारी नइ रखना चाही? 


     छत्तीसगढ़ राज के स्वप्नदृष्टा डाॅ. खूबचंद बघेल के संग खांध म खांध जोर के संघर्ष करइया रामाधार कश्यप जी के मन म घलो ए पीरा जिनगी भर जनावय. जब कभू उंकर संग बात होवय त उन ए बात ल जरूर फोरियावयं अउ एकर बर लगातार संघर्ष करत रहे के बात करयं.


    जांजगीर-चांपा जिला के गाँव चोरभट्ठी म महतारी जानकी देवी अउ सियान भुवन प्रसाद जी कश्यप के  घर 26 नवंबर 1936 के जनमे रामाधार कश्यप जी संग मोर पहिली बार भेंट तब होए रिहिसे, जब वोमन राज्यसभा के सांसद रिहिन हें. रायपुर के सर्किट हाउस म रूके रिहिन हें. तब उंकर एक राजनीतिक क्षेत्र के संगवारी छत्रपाल सिरमौर जी ह मोला उंकर संग भेंट करवाए बर लेगे रिहिन हें. असल म रामाधार जी तब छत्तीसगढ़िया मन के शोषण अउ स्वाभिमान ल स्वर दे खातिर छत्तीसगढ़ी भाषा म एक दैनिक अखबार निकालना चाहत रिहिन हें. मोला वोकर जिम्मेदारी सौंपे खातिर बलवाए रिहिन हें. 


    वो दिन करीब घंटा भर उंकर संग बइठना होए रिहिसे. छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन के शुरुआत ले लेके वर्तमान के दशा-दिशा अउ स्थिति सबके ऊपर जबर चर्चा होए रिहिसे. छत्तीसगढ़ी भाषा म अखबार निकाले के संबंध म उंकर विचार रिहिसे- छत्तीसगढ़िया मन के अधिकार, शोषण अउ संघर्ष के बात ल इहाँ अभी जतका भी मिडिया के मंच हे, कोनो ह सम्मान जनक स्थान अउ महत्व नइ देवय, तेकर सेती आम छत्तीसगढ़िया आज राज निर्माण होए के अतेक दिन बाद घलो शोषित अउ उपेक्षित हे. एकर असली कारण ए आय के, इहाँ के जम्मो मिडिया मन गैर छत्तीसगढ़िया मन के हाथ म हे. एकरे सेती वोमन अपन लोगन मनला तो सजावत-बढ़ावत रहिथें, फेर हमर आदमी मन के न्यायसंगत बात ल घलो लुकाए-तोपे के षडयंत्र करथें. बने गतर के छापय घलो नहीं.


     वोमन छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन के बेरा के सुरता करत बताए रिहिन हें- '28 जून 1969 के वोमन अपन संगी मन संग मिलके भोपाल के विधानसभा भवन म पर्ची फेंक के ए अंचल के विधायक मन जगा जवाब मांगे रिहिन हें. ए घटना के सेती तब भारी बवाल माते रिहिसे. एक दिन के सजा घलो सुनाए गे रिहिसे. तब रामाधार जी डाॅ. खूबचंद बघेल जी द्वारा स्थापित 'छत्तीसगढ़ भातृसंघ' म जुड़े रिहिन हें. वो पर्ची वाले घटना के तब अतका असर होए रिहिसे, के तत्कालीन राज्यपाल के द्वारा एक परिपत्र जारी कर के 'छत्तीसगढ़ भातृसंघ' के कोनो भी किसम के कार्यक्रम म सरकारी कर्मचारी मन के भाग ले या वोमा सदस्यता ले म प्रतिबंध लगाए गे रिहिसे. ए परिपत्र के कश्यप जी जबर विरोध करे रिहिन हें. तब सरकार ह अपन वो परिपत्र ल निरस्त करे रिहिसे. ए घटना ल छत्तीसगढ़ भातृसंघ के बड़का जीत के रूप म देखे जावत रिहिसे.


    रामाधार जी डाॅ. खूबचंद बघेल के सैद्धांतिक रूप म जबर अनुयायी रिहिन हें. एकरे सेती डाॅ. बघेल जब कभू बिलासपुर क्षेत्र के दौरा म राहयं त रतिहा ल कश्यप जी के इहाँ ही बितावयं. 


    रामाधार कश्यप जी के चार बेटी अउ दू बेटा के भरे-पूरे परिवार म उंकर सबले बड़े बेटी डाॅ. शारदा कश्यप जी संग घलो मोर अच्छा संबंध रिहिसे. हमन छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति अउ जम्मो अस्मिता के संरक्षण संवर्धन खातिर एक समिति 'आदि धर्म जागृति संस्थान' के गठन करे रेहेन, एमा शारदा जी के सक्रिय सहयोग मिलत रहय. उंकर माध्यम ले घलो रामाधार जी के गतिविधि मन के जानकारी मिलत रहय. हमर इही समिति के वार्षिकोत्सव जेन 3 मार्च 2021 के रायपुर के वृंदावन सभागार म संपन्न होए रिहिसे, एमा कश्यप जी घलो अतिथि के रूप म शामिल होए रिहिन हें. अउ ए ह कतेक संयोग के बात आय, के हमर समिति के इही कार्यक्रम ह कश्यप जी के जिनगी के अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम साबित होइस. तब महूं लकवा के अटैक के सेती शारीरिक रूप ले अकेला कहूँ आए-जाए के लाइक नइ रेहेंव. कश्यप जी तब मोर पीठ ल थपथपा के आशीष देवत कहे रिहिन हें- 'जल्दी ठीक हो, छत्तीसगढ़ महतारी ल तोर बहुत जरूरत हे.' 


    हमर वो वार्षिकोत्सव कार्यक्रम के कुछ दिन बाद ही बिलासपुर ले खबर आइस के  6 जुलाई 2021 के उन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी लेके परमधाम के आसन ग्रहण कर लिन. उंकर सुरता ल पैलगी-जोहार🙏


-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


निबन्ध–चौमास(जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया)


 

निबंध--*चौमास*

                 फुतकी उड़त अउ मारे गर्मी मा टघलत,भभकत भुइँया चौमासा के आरो पाके नरम पड़े बर लगथे। पानी के पहली बौछार के सुवागत भुइयाँ अपन सौंधी महक ल चारों खूंट बगरा के करथे। गर्मी मा पियासे भुइयाँ ससन भर पानी पीये बर धर लेथे,तभे तो मुँह उलाय दर्रा पानी पी पी अघाके मुंदावत जाथे। चौमासा के अगोरा कोन ला नइ रहय, चाहे जीव जंतु होय या पेड़ पात सबो एकटक बादर ला निहारत चौमास के बाट जोहथें। चौमास वो चार महीना ए जेमा बादर झिमिर झिमिर पानी बरसाथे। आसाढ़,सावन,भादो अउ कुँवार चौमासा के चार महीना आय। कतको फुतकी उड़त भुइयाँ रहय, आसाढ़ के पानी पी पीके हरियाये बर धर लेथे। धरती मा पड़े सूक्खा बीज-भात इही महीना आँखी उघार, आसमान ला अमरे के सपना देखथे। संगे संग सपना देखथे भुइयाँ के भगवान किसान, ताल तलइया, कुँवा, नदिया,नरवा अउ छोटे बड़े सबे परानी। चौमास चालू होथे आसाढ़ ले,अउ आषाढ़ ले सब ला आस रहिथे। चौमास पानी बादर के महीना होथे, एखर आये के पहली अउ बाद कई किसम के जोरा- जांगी, तीज-तिहार, उपास-धास, गीत-भजन अउ सुख-दुख  के बेरा देखे बर मिलथे। भारत का?  हमर छत्तीसगढ़ घलो गाँवे गांव ले मिलके बने हे। गांव घर के दिनचर्या, काम काज, तीज तिहार ,खान-पान अउ रहन सहन खेती- बाड़ी के संग चलथे। आवन चौमास के कुछ झलकी देखन----


*चौमास आये के पहली जोरा-जांगी*-

आषाढ़ के आरो पाके किसान-मितान अउ जीव-जानवर सब अपन अपन जोरा मा लग जथे। किसान मन बारी-बखरी, घर कोठार संग खेत खार ला घलो पानी बादर के बेरा हिसाब ले सिरजाथें। पानी गिरे के पहली पर्दा,भाँड़ी अउ घर के बाहरी कोठ मा पलांदी देथे अउ झिपारी बांधथे। बंधाय खइरपा, झिपारी अउ पलांदी पानी ले पर्दा भाँड़ी अउ दीवाल ला बचाथे। चौमासा के जोरा करत चूल्हा जलाए बर, किसान मन लकड़ी छेना ला पाठ पठँउहा मा भीतराथे। गाय गरवा के खाय बर घलो पैरा भूंसा ला जतनथे। कोठार मा माड़े छेना लकड़ी पैरा भूंसा धरा जाये ले,कोठार रीता हो जाथे, जेमा साग भाजी बोये के तियारी चलथे। मनखे मन छानी के फूटे खपरा ला टपर के बरसा ले लड़े बर अपन घर ला तइयार करथे। परछी, कोठा मा झिल्ली,दरी अउ खदर छाथें। किसान मन आषाढ़ के आरो पाके जेठ महीना भर,खातू कचरा पाल के खेत खार के काँटा, काँद, दूबी  झोल झाल के, मेड़ पार गाँसा पखार सब ला बढ़िया तियार करके रखथें। बीच-भात ला अलगाके, कोन डोली मा का धान बोना हे, तेला सोंचत परखत पानी के बाट जोहथे। चौमास मा साग भाजी के घलो किल्लत झन होय कहिके महतारी मन बरी बिजौरी बनाथे अउ नाना किसम के साग भाजी के खोइला करथें, आमा अउ लिमउ के अथान/चटनी घलो डारथे। कँड़ड़ा मन बॉस के मूड़ बर खुमरी और जमे तन ला पानी ले बचाये बर, तन तोपना बनाये बर लग जथें, ता दुकान बाजार हाट मा छत्ता, मोरा, बरसाती, कमरा दिखेल धर लेथे। चौमास लगे के पहली किसान भाई मन, पाठा पक्ति पानी मा झन भींगे कहिके गाड़ा, खाँसर ला उतार(अलग अलग करके) छानी परवा तरी ओधा मा जमा देंथें,अउ झिल्ली झिपारी मा तोप देथें। नांगर लोहा ला पजा के, नाहना, जोता, जुड़ा, कानी, घण्टी सबे के जोरा किसान भाई मन अदरा लगे के पहली करथें। दुकान ठपरी वाले मन घलो झिल्ली पन्नी छा के आसाढ़ के अगोरा करथें। घर कोठार के गड्ढा  अउ रेगान मा पानी झन भरे कहिके मुर्मी/कुधरिल पाट के बरोबर करथें। नेव मा जादा पानी झन जाये, अउ घर के कोठ मा सीहल झन पहुँचे कहिके घर के बाहरी कोठ तरी मुर्री ला ओधाथें।  ये सब जोरा घर के घर लइका सियान सब मिलके मारे खुशी मा हाँसत गावत करथें। चिरई चिरगुन मन घलो पेड़ पात तरी या फेर घर कोठा मा झाला खोंधरा के रचना करथें, कतको चिरई मन बड़का पेड़ अउ ओखर सांधा ला चौमास बर चुनथें। बन मा रहवइया जीव जानवर मन अइसन जघा खोजथें, जिहाँ हवा पानी ले बचें जा सके। चौमास के आरो पाके पहटिया मन गाय गरुवा ला बरदी मा सँकेले बर लग जथे। 


*चौमास मा पेड़-प्रकृति अउ गांव घर बन के छटा*-

बरसात के पानी मा नहाके, धरती दाई हरियर रंग मा रँगत दिखथे।  घाम घरी झरे जम्मों काँद दूबी, बीज भात सब आँखी उघारेल धर लेथें। खेत खार, जंगल, झरना, झिरिया सब खुशी के मारे नाचत गावत दिखथें। सरसर सरसर चलत पवन, गड़ गड़ गरजत बादर, चमचम चमकत बिजुरी, लहसत पेड़-पात, झरझर करत झरना, मेचका के टरटर, झिंगुरा के सरलग गान,पपीहा अउ मोर के पीहू पीहू, चिरई मन के चिंव चिंव चौमास भर चारो कोती मन ला मोहत रहिथे। चिरई चिरगुन, चांटी-माछी अउ चारा चरत गाय गरुवा मन के झुंड मन मा उछाह भरथें। चाहे रात होय या दिन उमड़ घुमड़ के बादर आथे अउ धरती ला नहवाके दम लेथे। कम होवत पानी के संसो मा अधियावत मेढ़क मछरी चौमास मा बढ़त पानी ला देख के तरिया, नदिया मा मेछरावत दिखथे। हरियर हरियर चारा बर गर्मी भर तरसे गाय गरुवा, चौमास मा हरियर चारा पाके इतरावत दिखथे। नदिया, नरवा के पानी जे समुंद ले मिले के सपना देखे रहिथे, उहू पूरा होवत दिखथे। चौमास मा पानी पा के खुद उगे चेंच, चरोटा, जरी, खोटनी, चौवलई, मुस्केनी,मछरिया, बोड़ा, फुटू, फोटका, काँदा अउ करील मनखे मन ला खाये बर  उपहार बरोबर धरती दाई, बिन महिनत के देथे। धान संग खेत खार मा कोदो कुटकी, राहेर, जुवाँरी, जोंधरी, कपसा, तिली, सन हाथ हला हला के पुरवइया हवा मा नाचत दिखथे। ता बारी बखरी मा नाना किसम के भाजी अउ नार बियार घउदे रहिथे। इही बेरा आसमान मा इंद्रधनुष के मनमोहक सतरंगी रंग के दर्शन घलो होथे। ये सब सुघराई देख, चौमास भर सूरज देव लजावत लुकाये लुकाये फिरथे। आसमान मा एके घरी अँजोरी ता एक्कन मा अँधियारी छा जथे, कभू कभू चारों खूंट गुंगवा छाये रहिथे। अतेक खुशी अउ नयनाभिराम छटा चौमास भर चारो कोती बगर जाय रहिथे कि मनखे,  रतिहा बेरा चंदा सितारा ला देखे बर घलो नइ ललाय, ते पाय के उहू बिचारा मन बादर मा जादा समय तोपायेच फिरथे। खेत खार, नदिया नरवा, कुवाँ बवली, पेड़ पहाड़, तरिया परिया सब सजे सँवरे मतंग दिखथे। नजर जिंहाँ तक भी जाथे, धरती दाई हरियर लुगरा पहिरे नाचत गावत दिखथें। संगे संग ऊँच ऊँच पेड़ चौमास मा अउ उपरहा सज सँवर के आगास ला अमरत दिखथें।चेंच,चरोटा, मछरिया, लटकना, खदर, गुखरू, गुड़रू,  धनधनी, चिरचिड़ा, बगली, बेमची, हफली, भोंड़, फूट, फोटका, भेंगरा, फुलही, चिचोल, सिवबम्भूर,गुठलू, आमा गोही अउ पैरी कस अनगिनत लमेरा रद्दा बाट, मेड़ पार, परिया अउ तरिया पार मा खुलखुल खुलखुल हाँसत नाचत दिखथें। चौमास भर खेत खार,गाँव गुड़ी, मन्दिर-देवाला मा गूँजत कर्मा, ददरिया, कजरी, आल्हा, भजन, कीर्तन,जस सेवा मन मा आशा विश्वास अउ उछाह उमंग के जोती जलाथें। बरदी अउ खेत खार मा, गाय गरुवा के गर मा खनकत घण्टी-घांघड़ा, चरवाहा मन के बाँसुरी के धुन, नोई धर घर घर घूमत, दूध दुहत पहटिया मन के मुंह ले निकलत सिसरी, छानी मा छनकत पानी के सुर अउ घर घर बजत खँजड़ी- ढोलक चौमास के सुघराई मा चार चाँद लगाथे।


* चौमास मा खेती-बाड़ी के काम*—

चौमास मा सब ले ज्यादा खुश यदि कोई रहिथे ता किसान मन, भले छत छानी चुंहे, फेर खेत खार बर पानी माँगत, अरजी करत दिखथें। गर्मी घरी काम बूता बर शहर नगर कोती गय कमैया मन चौमास के पहली महीना आषाढ़ के आरो पाके अपन गाँव लहुट जाथे,अउ अपन खेत खार ला सिधोय बर लग जाथें, कहे घलो गे हे-"डार के चुके बेंदरा अउ आसाढ़ के चुके किसान।" रिमझिम फुहार धरे आय आसाढ़ के हबरते साँठ, किसनहा मन धान बीजहा धरके, नांगर बइला जोर के, जम्मो घर भर खेत मा चल देथें। खेत मेला कस सइमो सइमो करथे। कमइयाँ मनके मुख ले निकलत ददरिया अउ ओहो तोतो मा खार गूँजेल लग जथे। बाँवत, बियासी अउ निंदई के कारज चौमासा मा होथे। किसान मनके अइसन लगभग एको दिन नइ रहय, जेन दिन ओखर पाँव खेत मा नइ पड़त होही। लहरावत खेत ला देख जम्मो किसनहा परम सुख पाके, खेतेच मा नाच अउ गा देथे। मुही पार बँधई, खातू छीचई, बन, काँद,कांदी,करगा ला हेरई  समय समय मा चौमास भर चलते रथे। गांव के गांव मिलके एक दूसर के काम मा हाथ बँटाथे, चाहे बाँवत होय, बियासी होय या फेर निंदई कोड़ई। बइला भइसा,कुदारी रापा, बीज- भात अउ नांगर जुड़ा ला घलो समय पड़े मा माँगत-देवत किसनहा मन खेती बाड़ी के काम मा तन मन अउ धन लगा के करथें।  खेत खार मा धान, कोदो, कुटकी, तिली, राहेर, कपसा, सन, सनई के संगे संग घर के बारी बखरी कोठार मा रमकलिया, बरबट्टी, तोरई, कोंहड़ा, तुमा, खेकसी,करेला,कुंदरू अउ किसम किसम के भाजी पाला, साग सब्जी बोथें। बढ़े नार बियार ला सहारा देय बर ढेंखरा गड़ाथें। छानी मा मखना, रखिया के नार चढ़त दिखथे, ता खेकसी, करेला,कुंदरू ढेंखरा ऊपर मनमाड़े घउदे। लइका सियान सब मिलके खेत खार के काम करथें। बाँवत, टोकान कोड़ई, रोपा लगई, निंदई, खातू छीचई, मुही पार बँधई अउ समय देख के जादा पानी मा मेड पार ला फोड़ई आदि कतको काम बूता चौमास भर किसान भाई मन घर के लइका सियान गांव भर संग मिलके करथें।


*चौमास मा तिहार बार*-

रहन सहन,खान पान कस हमर जम्मो तिहार मन घलो खेती बाड़ी के हिसाब ले चलथे, अउ जादा तिहार चौमासा मा होथे,अरजदूज, हरेली, तीजा, पोरा, सवनाही, इतवारी, जुड़वास, सम्मारी, कमरछठ,भोजली, राखी, गुरुवारी, आठे कन्हैया, नांगपंचमी, गुरु पुन्नी, पितर पाख, रामसत्ता, पितर पाख, गणेश पूजा, दुर्गा पूजा, दसहरा अउ शरद पुन्नी कस कतको छोटे बड़े तिहार गांव भर मिलजुल के मनाये जाथें। आसाढ़ दूज रथ यात्रा ले लेके कोजागरी पुन्नी(शरद पुन्नी) तक चौमास भर कतको कन तिहार बार मीत मयामनखे मनके  मन मा मेलथे। जुड़वास तिहार आसाढ़ मास अठमी के दिन भभकत भुइयाँ जब पानी पीके हिता जथे तब मनाये जाथे, ये दिन दाई शीतला मा तेल हरदी चढ़ाके गांव के गांव ला जर बीमारी ले बचाये के विनती करे जाथे।  बियासी के बाद सावन मा नांगर ला धो धा के हरेली तिहार मनाये जाथे, ये दिन पेड़ प्रकृति, बइला नांगर अउ खेती बाड़ी के काम मा अवइया औजार मन ला पूजे जाथे। सावन भर सावन सम्मारी चलथे। जइसे जइसे धान बढ़त जाथे तिहार घलो वइसने चलत जाथे। सावन भादो भर फाँफ़ा कीड़ा काँटा बर इतवारी, कटवा तिहार, गुरुवारी, कड़ा बन्द जइसे कतको तिहार मनाये के परम्परा हमर छत्तीसगढ़ मा हे। धान मा दूध भरावत बेरा भादो मा पोरा तिहार मनाये जाथे। भादो मा तीजा, गणेश पूजा,आठे कन्हैया ता कुंवार मा पितर पाख, दुर्गा पूजा होथे  जम्मो तिहार ला मनाये के अपन अलग अलग खास महत्ता अउ परम्परा हें।  किसनहा मन के कर्मा ददरिया के संगे संग चौमास मा आल्हा, कजरी अउ साल्हो घलो सुने बर मिलथे। आजादी के परब 15 अगस्त घलो गांव गांव मा बड़ धूम धाम ले मनाये जाथे। ये सब तिहार के अपन अलग अलग महत्ता हे, मान्यता हे, आस्था हे, विश्वास हे, प्रकृति ले जुड़ाव हे, दया मया अउ भाई चारा के भाव हे। सब तिहार के मनाये के अलग अलग ढंग अउ रोटी पीठा राँधे के परम्परा हें।  चौमास मा सब ले जादा काम बूता होथे, जाँगर घलो जवाब दे बर धर लेथे, बरसत पानी अउ चुंहत छानी देख कभू कभू बिट्टासी घलो लग जाथे, इही सब ला दुरिहाये बर सब ले जादा तिहार बार घलो चौमास मा ही होथे। काम कमाई के दरद ला तिहार बार भुला देथे, ये बेरा मा जम्मों मनखे मिलके एक दूसर घर रोटी पीठा खावत, नाचत गावत, दया मया बाँटत काम करथें अउ सुखमय जिनगी जीथें।


*चौमास मा दिनचर्या*–

सनन सनन चलत पवन, झिमिर झिमिर बरसत पानी,गरजत घुमड़त बादर,चमचम चमकत बिजुरी अउ चिखला माते मखमल कस भुइयाँ मनखे का जीव जानवर के घलो रोजमर्रा के जिनगी ला प्रभावित करथे। जइसे बरत आगी मा पानी पड़थे, ता वो गुंगवाये बर धर लेथे, वइसने जरत भुइयाँ बरसा के पहली पानी मा दंदके,भभके बर लग जथे, अउ भभकी मा निकलथे काल बरोबर सांप बिच्छू। ते पाय के सब ले जादा साव चेत मनखे मन ला इही समय होय जे जरूरत पड़थे। चारों कोती माते चिखला मा चप्पल जूता दाँत निपोर देथे, मोरा छत्ता, खुमरी घर के मुहाटी मा टँगाये दिखथे। सुरुज नारायण के आँच बिन कतको कुर्था कपड़ा अँवसइन अँवसइन महकत रहिथे। कपड़ा लत्ता घलो चिखला पानी मा जल्दी जल्दी मइलाथे। माछी मच्छर बड़ भींन भींन करत रहिथे, कतको कीरा ला देखत मन ऊब जाथे। सीहल(सीड़) आये अउ चुंहे के कारण घर चोरो-बोरो लगथे। कुँवा बोरिंग ले घलो मतलहा पानी निकले बर धर लेथे। एखरे सेती साफ सफाई राखत, गरम भोजन अउ पानी ला घलो डबका के पीना पड़थे। चारों मुड़ा माते चिखला पानी अउ खेत खार मा धान पान बोवा जाय के कारण मनखे मन ला चौमास भर बाहिर बट्टा जाय बर भारी परेशानी होथे,खैर अब तो घरों घर पखाना सावर होगे हे। पानी मा छेना लकड़ी सिताये रहिथे ते पाय के बरसात भर चूल्हा गुंगवाते रहिथे, ये घरी आगी सुपचाना अबड़ दुखदाई होथे। कतको साफ सफाई कर बरसात के चिखला पानी मा घर दुवार गैरी मात जाय रहिथे। ये समय जर बोखार, खांसी सर्दी मा सबके हालत खस्ता रहिथे।  छट्ठी बरही, मरनी हरनी अउ कोनो जरूरी काम बूता मा कहूँ कोती आय जाय के बेरा  पानी गिरई करलई लगथे। चिखला पानी अउ किचिर काचर के सेती, बर बिहाव कस अउ कतको मांगलिक काम ये मास मा नइ करे जाय। चौमास भर जतके जादा काम होथे,वोतके थकान मिटाये बर तिहार बार घलो होथे। गाय गरुवा, चिरई चिरगुन मन घलो पानी मा भींगत दिखथे। खेत खार मा लगातार पानी मा काम करे के कारण हाथ गोड़ सेठरा जाथे,अउ गोड़ ला केंदवा घलो खा देथे। बिला-भरका, खँचका-डिपरा पानी मा एकमई होय के कारण बड़ धोखा घलो होथे, कतको मनखे रेंगत बेरा फँस जाथें, कतको मन गाड़ी मोटर सुद्धा झपा जाथें। ये मौसम मा ज्यादातर मनखे मन गरी खेलत, मछरी धरत दिखथे। बोड़ा, फुटू, बरी, बिजौरी,चटनी,अथान,खोइला अउ चौमास मा उपजे साग भाजी ला खाके गुजारा करे बर लगथे। बरसा के मौसम मा साग भाजी के किल्लत अउ महँगाई घलो आम बात आय।

                    वइसे तो चौमास  खुशी के महीना होथे, तभो सुख के संग दुख घलो सहज दिखथे। जादा पानी बाढ़ के रूप धर लेथे, जेखर कारण खेत खार अउ गांव घर के हाल बेहाल हो जाथे। आवागमन बाधित हो जथे, पुलिया,सड़क बोहा जाथे, कखरो घर दुवार,खेत खार बुड़ जाथे, ता कतको मनखे मन घलो नइ बाँचे। मारे पूरा मा जीव जानवर, मनखे तनखे सब के जिनगी अधर मा लटक जाथे अउ चारो मुड़ा हाहाकार मच जाथे। वइसने कोनो कोनो साल चौमास मा पानी घलो नइ गिरे, ते पाय के सूखा के मुँह घलो देखेल लग जाथे। चौमास मा अक्सर बिजुरी गिरे ले खेत खार पेड़ पात संग मनखे अउ जीव जानवर मन जान गँवा देथे। ये समय साँप बिच्छू,कीरा काँटा के खतरा अबड़ रहिथे, कतको मन इंखरे शिकार हो जाथे। खेत खार संग गाँव घर मा घलो साँप डेड़हू के डर बने रहिथे। बिच्छल रद्दा मा फिसल के कतको झन के हाथ गोड़ घलो टूट जाथे। घर के सीहल अउ चुंहई ले खपरा वाले घर के बारा बज जाय रहिथे, कभू कभू तो पर्दा कोठ तको गिर जाथे, जेखर ले जान माल के घलो नुकसान हो जाथे। कई साल चौमास मा महामारी तको सपड़ जाथे, मलेरिया,टाइफाइड, हैजा, पेचिस, डायरिया कस कतको महामारी बरसा घरी जादा पदोथे। हवा पानी मा चिरई चिरगुन अउ कतको जीव  मनके झाला खोंधरा उझर जाथे, जादा पानी मा कतको चिरई चिरगुन अउ छोटे मोटे जीव जानवर पीटा के मर जाथे। सांप बिच्छू के बिला मा पानी भरे के कारण जबरन घर छोड़ निकले बर पड़थे, अउ कभू कभू मनखे मनके लउठी के पूर्तिन घलो हो जाथें। बिन मुँह के कई जानवर अउ गाय गरुवा बपुरा मन झड़ी बादर मा भींगत कुड़कुड़ावत रहिथें। जघा जघा फाँफ़ा फुरफुंदी,कीरा मकोड़ा मरे दिखथें। चाल के बरोबर पानी बादर आथे तभे चौमास खुशी मा गुजरथे, कमती अउ जादा पानी दुख के कारण बन जाथे।


*चौमास मा लइका*–

वइसे तो आसाढ़ लगत लइका मन के स्कूल खुल जाथे, जिहाँ गुरुजी मन जेवनी हाथ ले डेरी कान ला मुड़ के बीचों बीच हाथ ला मोड़त अमरे ले लइका मन ला स्कूल मा दाखिला घलो दे देथें, भर्ती के बाद अउ नवा कक्षा मा जवइया लइका मन स्कूल टेम मा, स्कूल तो जाबे करथें, तभो स्कूल होय या फेर घर गली, खेल कूद करना नइ छोड़ें।  लइका मन सब ले जादा मतंग होके चौमासे मा खेल के मजा लेथें। चौमास लगे ले लइका मन के खेल कूद घलो बदल जथे। चिखला मा गिल्ली, भौरा, बाँटी, पिठ्ठूल खेलत नइ बने ता लइका मन लोहा गड़ावत, नदी पहाड़ खेलत, डोंगा चलावत,  रद्दा या मेड़ पार ला बिच्छल करके बिछलत, धार ला बांध के रोकत, घानी मुंदी खेलत, फाँफ़ा फुरफन्दी पकड़त, तरिया ढोंड़गा मा  तँउरत, पथरा माटी फेकत अउ घर संग स्कूल के काम बूता करत चौमासा के आनंद लेथें। आँखी उघारत चिचोल ला अंगरा मा भूंज, चिरई जाम, कैत, होरा, जोंधरा अउ फुटू खावत मगन घूमत रहिथें। वइसे तो सबे तिहार बार मा लइका मन भारी खुश रहिथे तभो, गणेश पूजा भर लइका मन के उछाह के ठिकाना नइ रहे। हरेली, पोरा अउ राखी तिहार मा गेड़ी चढ़ना, डंडा पिचरंगा खेलना, राखी के गुजगुजा ला सड़क मा उड़ाना, मछरी धरना, नदिया बइला, पोरा जांता चलाना लइका मन ला बड़ भाथे। लइका मन खेवन खेवन खिड्डी अउ मी होवत, माने एके घड़ी लड़त अउ एके घड़ी मिलत, खेत खार संग स्कूल जावत अउ रोटी पीठा खावत मगन मन लइका मन चौमास ला सब मिल हाँसत खेलत काँटथें। जब झड़ी करथे तब लइका मन अंगाकर रोटी अउ चना होरा चाबत घरे मा संगी साथी संग तिरिपासा अउ गोंटा खेलत समय बिताथे। नान्हे लइका मन ला दाई ददा मन कतको बरजथें तभो बरसत पानी मा भींगत,उंडत,गिरत,उठत, धार ला छीतत, डोंगा ढीलत बड़ मस्ती करथे, खेवन खेवन कपड़ा लत्ता ला मइलावत रहिथें अउ खुदे पानी खेलत धोवत घलो रहिथें।

             चौमास के चार महीना पानी बादर के महीना आय, जेमा आसाढ़,सावन मा बिकट पानी गिरथे, अउ भादो ले कुंवार पहुँचत कमती होय बर लग जथे। चौमास के ये चार महीना मा खेत मा बोवाये फसल,सजोर होके, पके बर धर लेथे। किसान मन चौमास भर जाँगर खपावत, अउ मन बहलाये बर तिहार बार मनावत हॉसत गावत,सुख के संग दुख तको ला झेलत चार महीना ला बिताथें।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)