Thursday, 21 July 2022

हमर भोजली दाई के सोने सोन के अचरा* *दुर्गा प्रसाद पारकर*


 

*हमर भोजली दाई के सोने सोन के अचरा*


*दुर्गा प्रसाद पारकर* 


सावन मास सुहावन माता अति घन बरसन लागे, सीर चुनरिया पहिर जलापा रंग हिडोंलना झूले। किसान मन के आसा ह सावन के झिमिर-झिमिर बरसा म धान कस लहलहावत हे। निंदइया कोड़इया मन के ददरिया ल सुन के धान ह घलो झूमरे ल धर ले हे। सुआ रंग के लुगरा पहिरे खेत खार ह मन ल मोहत हे। एती गांव म पिवराए देंह के मन ह गवना के पहिली भोजली के उमंग कस उमिहावत हे। सावन महीना म अंजोरी पाख के आठे के दिन भोजली खातिर कड़रा घर ले टोपली, पर्री अउ कुम्हार घर ले खातु माटी लाने के नेंग हे। भोजली बोवइया ह नवे के दिन उपास रहि के सराजाम के इंतजाम करे म जूट जथे। टूकनी म खातु माटी भर के गेहूं के बांवत करे के बाद माटी के दीया बार के पिंयर पानी छिंच के कुमकुम लगा के पूजा करथे। सात दिन ले रोज भोजली दाई के सेवा सटका होथे। भाई बहिनी के पावन तिहार भोजली ल खास तौर ले छत्तीसगढ़ म लोधी जात के मन गजब मानथे। भोजली तिहार कोनो कहानी किस्सा नोहे बल्कि ए तो इतिहास ले जुड़े हे।

    मोहबा के राजकुमारी इन्द्रवली ह हर बच्छर किरती सागर म भोजली सरोवय। एक समे अइसे अइस जब राजा परमाल के राज ल चारों कोती ले दिल्ली के पृथ्वी राज चैहान के सेना ह घेर लीन। ठउंका के समे मोहबा म जबर समसिया खड़ा हो जथे के भोजली कइसे सरोए जाए। इन्द्रावली के भोजली सरोए के परन ल निभाए खातिर उदल ले बीड़ा उठवाथे। तभे तो उदल दुसमन के सेना ल खेदार के परमाल के दुलौरिन के परन ल पूरा करथे। इन्द्रावली के भोजली उगोना के बात ह आल्हा म घलो पढ़े बर मिलथे- 

जंह बीड़ा दीन्ह मड़ाय

कउनो वीर मोहबा के रे 

जेहा बीड़ा लेहू उठाय

अउ इन्द्रावली के भोजली ल रे

तरिया म देहू सरवाय


   लोधी जात के मन जउन लड़की के सावन म भोजली उगोना होथे ओखर गवना अवइया बइसाख म देथे। धीरे-धीरे यहू ह नंदावत जात हे। उगोना लड़की ह सात दिन ले बांटी भांवरा बनाथे। सातवां दिन सबो ल सकेल के कुंआ बावली म ठण्डा कर देथे। सात दिन के सेवा जतन करे के बाद पुन्नी (रक्षा बंधन) के दिन भोजली ल राखी चघा के परसाद बर चनादार भिंगो देथे। चना कस कतको सपना ह फूलत रहिथे। उगोना वाले लड़की ह नवा साया, लुगा, पोलखा, चुरी चाकी पहिर के जब सिंगार करथे तब जो अघात सुन्दर दिखथे। धान के पोटरी पान कस चमकत रहिथे लड़की के अंग-अंग ह। कान के दवना ह लड़की के रुप ल अउ निखार देथे। लोगन मन के अइसे मानना हे के कान म दवना पान खोंचे ले भूत-प्रेत, मरी-मसान ह तीर तखार म नइ ओधय अउ टोनही टम्हानी के आंखी ह पटपट ले फूट जथे। उगेना के रसुम ल निभाए खातिर लड़की ह भोजली ल मुड़ म बोहि के पर्री के भोजली ल जेवनी हाथ म धरे सब ले आगु म खड़े रहिथे। गांव वाने मन जान डरथे के एसो फलानी के गवना होही। लड़की के पाछू म पारा मुहल्ला अऊ सगा-सोदर के नोनी मन भोजली ल बोही के खड़े रहिथे। देखे ले अइसे लागथे कि पाछू खड़े नोनी मन अपन उगोना के बाट जोहत हे। घम-घम ले जागे भोजली ल सियान मन के अनुभवी आंखी ह देख के जान डरथे के एसो समे सुकाल होही। 

    भोजली ह गांव के सबो गली म घुमत गउरा चउंरा डाहर के होवत तरिया जाथे। हरियर पिंवरी भोजली के रेम ल देखे ले अइसे लागथे जानो- मानो घनहा ले धान अउ भर्री ले कोदो ह गली किंदरे बर आए हे। गांव भर के लइका सियान भोजली कार्यक्रम म संघरत गीद गावत ठण्ड़ा करे खातिर तरिया पहुंचथे।

देवी गंगा, देवी गंगा, देवी हे दू गंगा

हमर भोजली दाई के सोने सोन के अचरा

हमर देवी दाई के बड़े-बड़े नखरा

एक ठन कोदो के दूई ठन भूंसा

नान-नान हवन भोजली झन करहू गुस्सा

अहो भोजली गंगा, अहो भोजली गंगा


   गंगा पखारे तोर नवमुठा तिरनी, दुघे पखारे लामी केस। गीद गावत तरिया के पानी करा पार म भोजली के पांव पखारे जाथे। भोजली के पूजा पाठ कर के पानी म विर्सजन कर देथे। भोजली ल पानी म सरोए के बाद भोजली ल पानी भीतर उखान के अउ टोपली ल खलखल ले धो के पार म लान लेथे। चनादार, सक्कर, खीरा अउ खुरहोरी के परसाद के संग दू-दू डारा भोजली ल घलो बांटथे। भोजली पा के सब झन धन्य हो जथे। कतको मन जेखर से मन मिल जथे ओखर सन मितान बद डरथे। मितानी के रिश्ता पीढ़ी दर पीढ़ी रहिथे। रद्दा-बाट, हाट- बजार अउ खेत खार म कोनो मितान संग भेंट हो जथे त सीताराम भोजली कहि के एक दूसर ल सम्बोधित करथे। तरिया म भोजली ल ठण्डा करे के बाद सुआ नाचथे। गीद म नारी के पीरा ह जगजग ले झलकथे। नारी के पीरा ल नारिच जानथे। उगेना होय के बाद ससुरार म काखर संग रइहंव मन बांध-


   काखर संग खाहूं, काखर संग खेलहूं रे सुआ ना

   काखर संग रहूं मन बांध, रे सुआ ना

   सास संग खाबे, ननद संग खेलबे

   छोटका देवर संग मन बांध

   ना रे सुआ ना- 


तरिया के पार म तो सुआ नाचबे करथे। घर आए के बाद लड़की मन छै सुआ नाचथे। भेंट म जतना रुपिया पइसा मिलथे ओला आपस म बराबर बांट लेथे। आखिरी के सातवां घर ल उगेना वाले लड़की घर पुरोथे। उगेना लड़की ह महतारी के एक भांवर घुम के अपन पर्री ल उपर ले हाथ ल नीचे करके महतारी करा झोंकबाथे। महतारी ह अपन दुलौरिन के पर्री ल असीस देवत अंचरा म झोंकथे। भोजली उगोना होय के बाद लड़की ल सियानी मान के गवना दे जाथे। 


     भोजली कस दवना जंवारा, गोवर्धन, रैनी, महापरसाद, गंगाजल अउ तुलसी जल घलो बदथे। फूल फूलवारी ह मित-मितानी के चिन्हारी कराथे। सियान मन कथे काखरो न काखरो संग मितान बद ले रे भई सुख-दुख म काम आही। मितान बदई ल न वैवाहिक संबंध कही सकथन न रक्त संबंध। फेर हां मितानी के संबंध ह परिवार म रक्त संबंध कस हरे। मितान बदई ल फूल बदई घलो कहिथन। तभे तो मितान के दाई ल फूलदाई अउ मितान के ददा ल फूल ददा कहिथन। 

      मितान बदे बर कोनो दिन बादर तय नइ राहय। जादा तर तिहार बार के दिन बदथे। अंगना नही ते चैपाल म मितान बदे जाथे। मितान बदे बर नरियर, दूबी, धोती, माटी के दिया, कलस अउ गुलाल के जरुरत परथे। दूनो झन के आमने-सामने खड़ा होय बर दू ठन पीढ़हा हो जय त अउ बढ़िहा। गंगाजल बर गंगा गंगाजल, तुलसी जल बर तुलसी के पाना रहना जरुरी हे। 

     गंगा जल के परसाद पा के मितानी निभाए के परन करथे। गंगा जल महापरसाद ल चार के बीच म बदे जाथे। जंवारा, गोवर्धन, दवना ल रद्दा चलत बदे जा सकत हे। एमा कोनो नियम धियम के जरुरत नइ परय। दुबी ल एक दुसर के कान म खोंचे के बाद रुपिया, नरियर अउ धोती ल एक दूसर संग अदला-बदली करथे। जउन व्यक्ति मितान बदथे उंखर माईलोगन मन घलो आपस म फूल बद डरथे। मितान बदे के बाद परसाद बांटे जाथे। पुर जथे ते चाय पानी के घलव प्रबंध करथे। मीत-मीतान घर तीज-तिहार म सेर चाउंर (चाउंर, दार, रोटी, पीठा, मिरचा, नून) पहुंचा के एक दूसर के मया ल मजबूत करथे।

दुर्गा प्रसाद पारकर

छत्तीसगढ़ म इतवारी तिहार मनाय के परम्परा* *- दुर्गा प्रसाद पारकर*


 

*छत्तीसगढ़ म इतवारी तिहार मनाय के परम्परा* 

*- दुर्गा प्रसाद पारकर* 


                        

छत्तीसगढ़ म महाभारत ल प्रस्तुत करे के सबले बढ़िया तरीका आय पंडवानी। पंडवानी गवइया मन एदे प्रसंग ल मनमोहक ढंग ले सुनाथे-'बोल दव बिन्दा बन बिहारी लाल की जय | पांचो पांडो नाव अउ भेस बदल के बिराट नगर के राजा घर अज्ञात वास काटत रिहिन हे रागी। उहें सहदेव ल सैनिग्वाल के नाव से जानय। जऊन ह बरदी चरावय। एक दिन कौरव दल राजा बिराट के गरुआ ल चोराए बर सुन्ता बांधिन। सैनिग्वाल ह कौरव मन ल गरुआ लेगत देख तो डरिस फेर सक नइ चलिस उंखर ले लड़े के। गरुआ ल रोके खातिर मंत्र पढ़ के धनुष बान बना के ढिल दिस बान ताहन सना नना मोर नना नना कका। बान ह जा के जब गरूआ मन के खुर म लगत गिस रागी। लगते भार जिही मेर के तिही मेर खड़ा होगे। काबर कि बान लगे ले मवेशी मन ल खुरहा बीमारी होगे। गरूआ ल टस के मस नइ होवत देख के, पांडो के बेटा ह दउड़त जावय भइया। राजा ल घटना सुनावन लागे कका। गरुआ के चोरी ल सुन के राजा बिराट तमतमागे। चोर मन के बूता बनाए बर राजा बिराट अपन हिरदे के कुटका उत्तरा कुमार ल पठोथेे। उत्तरा कुमार के रथ हंकइया कोन रिहिस रागी? जानत हस। रागी-नही। ओखर नाव वृहन्ला रिहिस जऊन असली के अर्जुन आय। अर्जुन अपन हिसाब से रथ ल दउंडावन लागे। उत्तरा कुमार ल पता घलो नइ चलिस कि रथ ह कते डाहर जात हे। अर्जुन ह रथ ल जंगल म लेगे जिंहा ओहा गांडिव धनुष ल लुकाए रिहिस हे। अर्जुन ह जब गांडिव धनुष ले धरती म बान मारिस। बान के परते भार पताल गंगा परगट होगे। छरछीर-छरछीर पताल गंगा के पानी ह वृहन्ला ऊपर परत गीस ताहन अर्जुन ह अपन असली रूप म आवत गिस तस-तस गरुआ मन के खुरहा बीमारी ह मिटावत गिस। इसी पाए के छत्तीसगढ़ के किसान सउनाही के दिन अर्जुन के दसो नाव (अर्जुन, पार्थ, विजयी, किरीट, विभत्स, धनंजय, सब्यसांची, श्वेतबाजी, कपिध्वज, शब्द भेद) लिख के गरुआ मन ल खुरा चपका बीमारी मनले बचाए बर बिनती करथे। खुरा बीमारी ह सावन-भादो म जादा होथे। बिमरहा मवेशी के खुर म अंडी, अरसी नही ते मिलवा के तेल ल लगा के इलाज करथे। मान ले अइसन करे ले फुरसुद नइ लागे त बइगा ह कोठा म घी, गुड़, नही ते गंगुल (दसांग) के हुम दे के तिली तेल, अरसी तेल नहीं ते फल्ली तेल के दीया बार के गरुआ के आरती उतार के बने होय बर बिनती करथे। कतको मन अइसनो कथे कि खपरा के गाड़ी, पांच ठन करिया कुकरी अऊ नरियर ल एके संघरा गांव के बाहिर बरोए ले बीमारी के अंत हो जथे। एक बात जरूर हे कि बीमारी ह भभूत अऊ ठुवा-ठामना ले नइ माड़े। फिर भी जन भावना ल एकाएक नइ उधेने जा सकय। मवेशी मन ल सावन-भादो म खुरहा चपका, दांवा धक्का, माता मताही, बघर्रा, एकटंगी, मेंह पाठ के बीमारी झन अभरय कहिके असाढ़ के सिराती शनिच्चर रात के पहाती सउनाही बरो के गांव बनाथे। सउनाही बरोए बर पोंई, कुकरी अंडा, कठवा के गाड़ा, खड़ऊ, लिम्बू, बंदन, एक्कइस ठन धजा (तीन रंग के), एक्कइस ठन नरियर, चार ठन नांगर के नास के जरूरत परथे, करिया रंग के धजा खडऊ अऊ लिम्बू ल काली माई के सनमान म चघाथे। सादा रंग के धजा ल शीतला माता अऊ सत्ती माता के नाव ले देथे। लाली रंग के धजा, बंदन ल महावीर के नाव ले सोपरित करथे। बइगा गांव के देवी-देवता म हूम धूप दे के लिम्बू भारथे अऊ नरियर फोरथे। एखर बाद बइगा अऊ ओखर संगवारी मन तीन सिया जाथे। उहां पूजा-पाठ करके कारी पोंई (कुकरी पीला) के माथ म बंद बुक के ओरियाए सामान के बीचों-बीच बरो देथे। गांव के जतेक अएब हे ओहा कुकरी के संग चले जाय गांव म सउनाही बरोइया मन के गांव म आय के बाद कोतवाल हांका पार के इतील्ला देथे-'पानी कांजी भर सकथव, गोबर कचरा कर सकथव हो....।इतवार के दिन मनखे मन अपन घर के चारो मूड़ा कोठ म गोबर के घेरा बना के बीच-बीच म पुतरा-पुतरी बना के घर के रखवारी करवाथे। ताकि घर म मरी मसान झन झपा सकय। असाढ़ के आखरी इतवार ले सरलग पांच इतवारी ताहन बुधवारी तिहार मनाना जरूरी हे। काम बूता के दिन म इतवारी अऊ बुधवारी तिहार कहां तक उचित हे। मनाना हे त एक इतवार ल जोरदार मना के बाकि इतवारी तिहार ल कुकरी के संग बरोए ल परही ताकि हमर किसानी काम म तिहार ह बाधक झन बन सकय। तभे तो हमन सर्व सम्पन्न छत्तीसगढ़ राज के कल्पना कर सकथन नही ते फूस्का।


दुर्गाप्रसाद पारकर

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छत्तीसगढ़ी कहानी -*घरघुंदिया*


 

छत्तीसगढ़ी कहानी -*घरघुंदिया*

*डॉ. तेजराम दिल्लीवार*



 साठ-सत्तर बच्छर पहिली के गोठ

 आय। तब गंगरेल जलाशय नवा-नवा बने राहय अउ ओखर रक्सहूं मुड़ा म कांड़-कोरई के जंगल बिक्कट लहलहावत राहय। एखर मतलब, अो बखत जंगल के उजाड़ नइ होय रिहिसे।

एक दिन, एक झिन सियनहा ह कोन जनी काखर खोज म   जंगल डाहर जावत रथे । बिहनिया ले रेंगत - रेंगत संझा हो जथे  फेर ओला कोनो नइ मिले। न मनखे न जंगली जानवर ।थके मांदे सियनहा  के बंद मुहूं ह घलो थक हार के ओ हो कहि डरथे -''अब तो दुख के गगरी ल धरके चलिस सुनसान जंगल म भूले-भटके जीव ह !’‘ संझा के समय, पांव म थकान के बेड़ी अउ आँखी म बुढ़ापा के धुमलाहापन। बिचारा थके हारे, लांघन भूखन जंगले - जंगल आगू डाहर रेंगे बर धरथे  |

''ए बटोही! आघू डाहर झन जा ! ओ तनी बहुत बड़े खाई हे।’‘

''ब-टो-ही!’‘  सियान आदमी अपन नवा नाव ल सुन के चौकथे। बाट रेंगइया बटोही नोहे त अउ का ए। एक युग बीत गे मोला बाट रेंगत। बटोही नाव ठीक हे फेर ... फेर ए नाव रखइया कोन ए? कहां ले आइस ए आवाज? सियान आदमी चारो मुड़ा घूम के देखथे त डेरी हाथ ले थोकिन दूरिहा म एक ठन बर पेड़ के खाल्हे म  नानकुन घरघुंदिया नजर आथे। हां! घरघुंदिया तो आय। चारो कोती माड़ी अतना ऊंच माटी के भाड़ी, चार ठन थुनही अउ ऊपर डारा-पतई के छाजन अउ घरघुंदिया के आघू म कोनो जानवर ना कोनो मनखे , जाने कोन ए...? सियान मनखे ह तीर म जाके देखथे, त सादा लुगरा पहिरे एक झिन सियनहीन ह धैर्य अउ तप के मूर्ति बने बइठे दिखिस। सियान मनखे ह ओखर नाव तापसी राखथे। पूछथे-''कस तापसी! तीर तखार म कोनो गांव नइहे का?’‘

तापसी कथे-''तीर तखार के गांव मन तो गंगरेल बांध म ऊबुक चूबुक होगे बटोही। एक-दु ठन गांव बांध के ओ पार मिल जही फेर देख, सांझ होगे हे। चिरई-चिरगुन अपन-अपन खोंधरा म आ गे हे। आज रात मोर घरघुंदिया म अराम कर ,ए मोर बिनती आय। बिहनिया होही ताहन अपन रद्दा बाट म चल देबे।’‘

आह कतेक मधुर आवाज हे। तन बूढ़ागे हे, फेर बोली बचन ह अभी घलो मंदरस कस मीठ हे । सियान मनखे ह ओखर बिनती ला मना नइ कर सकिस।

तापसी ह गोबर म दरपाए अंगना म पानी लानथे । पीढ़ा मढ़ाथे। बटोही के पांव धोके पीढ़ा म बइठारथे अउ जेवन म रूखा-सूखा जइसन बनाय हे, ओला खवाथे।

अब, सुते के बेरा होगे । घरघुंदिया के एक कोती बटोही सुतथे अउ दुसर कोती तापसी। सुते के कोशिश दुनो करथे, फेर नींद दुनो म कोनो ल नइ आय। दुनो झिन गुनत राहय त नींद कहां ले आय। तापसी करवट बदल के पूछथे -

''कइसे, सुत गेस बटोही?’‘

''अहं! का तहूं जागत हस तापसी?’‘

''नींद नइ आत हे, बटोही! एकाद ठन कहानी तो सुना’‘

''कहानी...?’‘

''हव, सुना न एकद ठन बने असन!’‘

''अइसे, त सुन!’‘

ताहन बटोही कहानी सुनाथे-''एक झिन भूले-भटके नवजवान राहय। उमर ओखर करीब अठारह-बीस बच्छर अउ नाव चंदन। ओह गीत बहुत बढ़िया गावय । भगवान ओला बिक्कट सुग्घर गला दे राहय। गंधर्व के कंठ अउ ओखर कंठ म कोनो अंतर नइ राहय। जे मेर खड़े होके, जइसे गीत गा दे, लइका सियान सब आके ओखर गर म बंधा जाय।’‘ कइसे सुनत हस तापसी?

तापसी-''हव, सुनत हवं बटोही! नाव बहुत खूबसूरत हे-चं-द-न! हां, ताहन आगू डाहर का होइस?’‘

बटोही कहानी ल आगू बढ़ाथे-हां, त! भूले भटके चंदन एक दिन शहर म पहुंचगे। शहर के एक छोर म एक ठन बड़े जन धरमशाला राहय | जेमे कोनो दुरिहा शहर के एक रईस घराना के बारात ह लहुटती खानी आ के रूके राहय, गाजा बाजा के संग।

बटोही कहानी आगे बढ़ाथे-हां, त! धरमशाला के बरामदा म मोहरी बजइया ह बराती मन के बीच म बइठ के कोनो स्वर साधत राहय अउ ओखर अगल-बगल  म तबला, मंजीरा, करतार वाले मन बइठे राहय । चंदन ले देख-सुन के रहे नइगे। दौड़ के ओ बराती मन के बीच पहुंचिस अउ मोहरी के आगू म बइठगे। मोहरी बजइया ह पारखी जीव राहय। मोहरी ला एक डाहर हटाके कथे-''बाबू! तोर हृदय म सरस्वती के वास हे। जरूर, गीत के दुनिया म तोर पहुंच हे। अरे त्यागी मन! सुना तो गीत।’‘

सुनके चंदन विभोर होगे। गवइया ला अउ का चाही-''बड़ाई के भंग अउ तबला-मंजीरा के संग।’‘ पहली, चंदन गला साधिस अउ एक बढ़िया लय म गाना शुरू करीस -

''मन-मंदिर म दीया जला के, गा-गा के तोर करँव सुमिरन।’‘

आह! एक पांत के बाद अंतराल अउ अंतराल के बाद फेर एक पद। गीत के बोल अइसे रिहिस-''जब मय गा-गा के तोला बलायेंव तब जइसे खेत म धान के बाली उमिहा उठथे। जिनगी मोर खेत ए अउ तोर एकक ठन गोठ-बात  के सुरता  ह एकक ठन धान के बाली आय। सुन मोर जिनगी के भुइयाँ ला स्वार्थ अउ लोभ के रेगिस्तान झन बना देबे। मया पिरित के वर्षा कर करिया करिया घपटे भादो के बादर कस । मंदिर म दीया जला के गा-गा के तोर करँव सुमिरन ।’‘

चंदन के गीत पवन-झकोरा बन के बराती मन के हृदय के पाना पतई ल हला देथे। कंठ अइसे गुरतुर जानो मानो चांदी के घंटी बजत हे। वाह-वाह! एक गीत अऊ गा भइया गा। सबके इच्छा चंदन ले एक अऊ गीत सुने के इच्छा होइस |  चंदन घलो गाय बर शुरू करत रिहिस कि ठउँका अोतके बेर एक झिन लोकड़हिन ह आके कथे-''ए नवजवान, तोला दुल्हन ह बुलावत हे।’‘

चंदन अवाक होगे। ''मोला काबर बलाही दुल्हन हा।’‘ मने मन बिचार के चिंता फिकर करे बर करे बर धर लिस |कोन जनी दुल्हन ह काबर बलावत होही |

दुल्हा बराती मन के बीच म बइठ के गीत के आनंद लेत राहय। वहू ल चंदन के गीत ह नीक लागत रिहिसे। किहिस-''जा दुल्हन ला घलो एक ठन  बढ़िया गीत सुना दे। सुनके मन ओखर घबरागे , दुल्हा किहिस जा भाई! ईनाम मिलही, जा!’‘

दुल्हन धरमशाला के एक साफ सुथरा कुरिया म राहय। ओखर संग एक झिन लोकड़हिन घलो रिहिस फेर कोन जनि चंदन ला बला के ओ कहां खिसकगे। चंदन दुल्हन के कुरिया के नजदीक पहुंचिस अउ झांक के एक नजर ओला देखिस घलो! चेहरा ह तो घूंघट म तोपाय राहय, कुछु समझ म नइ आवत रिहिस  फेर  ओखर सुंदर सलोना शरीर पींयर रंग के कोसाही लुगरा के बीच देवारी के दीया कस फबे राहय । पांव म माहुर अउ ऐड़ी म पैजन। चूड़ी के झनक अउ नारी तन के महक! आह! चंदन दरवाजा के आड़ म खड़े होके ''राम राम’‘ करिस। दुल्हन घलो जवाब म ''राम राम’‘ किहिस। कुछ देर चुप्पी के बाद दुल्हन कथे-''नवजवान! तोर गीत सुनके लागिस कि, तेंह वियोगी अस, तेंह काखरो सुरता म भटकत हस। सिरसोन बता ओ कोन ए, कइसे तोर जिनगी म ओह अइस?’‘

चंदन अजीब उलझन म परगे। ओह, ए सवाल ले समझगे कि दुल्हन पारखी जीव आय। फेर ओह अपन जिनगी के कथा ल बताए कइसे। कुछु तो नइ हे ओखर जिनगी म, सिरिफ विपत्ति के सिवाय। हो सकथे सही बात ल सुन के थू-थू करे।

अतेक केहे के बाद बटोही तापसी ले पूछथे-''कइसे, सुनत हस तापसी ! कहानी कइसे लागत हे ?’‘

तापसी का बताय। आँखी ओखर 

डबडबा गे राहय। कहानी के एक-एक शब्द अइसे लागत रिहिसे , जइसे कोनो फिल्म देखावत हे। तापसी ह आँसू पोछत कथे-''हां, त आगू का होइस? दुल्हन के पूछे ले चंदन का किहिस?’‘

बटोही कहानी के कड़ी ल आगू बढ़ाथे-''दुल्हन के पूछे ले चंदन किहिस-कि देवी, जेखर खोज म मय भटकत हवं, ओखर नाव कंचन हे। वहू आज तोर जइसे युवती होगे होही। गांव के फुरुर फुरूर पुरवाही म पले बढ़े केशर के फूल जइसे सुंदर कंचन ह कोन दिशा म निवास करत होही। आज ले दस साल पहिली हम दुनो के निवास गंगरेल गाँव म रिहिस। अब तो गंगरेल ह जलाशय बन गे हे। जलाशय, मने चारो कोती जल-ए-जल, जेमे जमीन के एक कण तक नइहे अउ जे पहिली एखर बीच के जमीन म निवास करत रिहिन, ओ मन जाने कहां फेंकागे। उखर दिशा तक के पता नइहे। दस साल पहिली गंगरेल 

 गांव म हमर अउ कंचन के घर ह एके तीर म रिहिस अउ हम्मन दुनो संगे-संग खेलेन कुदेन। हमर दुनो के घरू परिस्थिति म धरती अउ आसमान के अंतर रिहिस। मय एक किसान के बेटा -जमीन जायदाद के नाव म सिरिफ दु एकड़ ला तुलसी के बिरवा कस साज-संवार के राखे रिहिस। एखर अवेजी कंचन रईस बाप के इकलौती बेटी-सुख के सागर म पले बड़े , ओखर बाप पचास एकड़ जमीन के मालिक...गाड़ी घोड़ा, नौकर-चाकर सब ले संपन्न फेर अतेक अंतर के बाद घलो हमर दुनो के आत्मा अइसे एक होगे रिहिसे जइसे आँखी तो दू हे फेर नजर एक।’‘

''गांव के निकलती म नरवा तीर एक ठन बर पेड़ रिहिस। दुनिया के नजर म हमर घर भले अलग-अलग रिहिस होही फेर बर पेड़ के छइहां म हमर दुनो झिन के खेले कुदे बर एक ठन घरघुंदिया होगे रिहिस। बचपन हमर बर पेड़ के छइहां म बीतिस। मय एक गरीब किसान के लइका, घर के हर काम म महतारी के हाथ बटाए बर लगे। दाना-पानी, छेना लकड़ी, डोरी-डंगना सब लागथे किसानी म। ले दे के फुर्सत मिल पाय मोला। कभू देरी हो जाय ते कंचन रिसा जावय - ''जा तोर संग नइ खेलन’‘ अउ मुंहू ल फूलो के एकंगू कर देवय फेर थोरिक देर बाद खुद ओह तीर म आके कहाय-''चंदन ए चंदन! रिसा गे हस का? चल छुवउल खेलबो कि लुकउल खेलबो।’‘ एदे! अइसे रिहिस कंचन। तन ले सुंदर तो रहिबे करे रिहिस, फेर ओखर सरल, भोला भाला मन ओला अऊ सुंदर बनाए रिहिस। देवी ! कंचन के इही सुंदरता मोर गीत के जड़ आय, मोर गला के मिठास ए।’‘

''एक दिन बर पेड़ के छइहां म ओह एक ठन घरघुंदिया बनइस। सुग्घर-सुग्घर कुरिया, माटी के बर्तन भाड़ा , किसानी के साज-सिंगार, सब सजे-सजाए। जब मँय घर के काम-काज ले फुर्सत होके पहुंचेव त ओ मोर हाथ पकड़ के कथे-''चंदन! ए तोर हमर घर ए। ए तोर गाय बइला के कोठा ए। ए कुरिया म तोर खेती-बारी के सामान हे अउ ए मोर रंधनी खोली ए। देख! जब तँय खेत म काम बूता करत रबे तब तोर बर मँय पेज लेगहूं अउ तँय बबूल पेड़ के खाल्हे बइठ के खाबे। है, न।’‘

''कंचन के बात सुनके मोला हंसी आगे-पगली कहां ले तँय किसान नारी के बुध सीखगे। जिनगी ह सबर दिन खेले के नोहे। उझार दे ए माटी के घरघुंदिया ल। तँय रईस बाप के बेटी एक दिन बड़े घर तोर बिहाव हो जही । कोनो लाखो करोड़ो पूंजीपति ह तोर गोसइया होही। तोर करा बंगला अउ मोटर गाड़ी होही। उझार दे घरघुंदिया ल कंचन, तोला ए माटी के खेल नइ फबे।’‘

''मोर ए बात सुनके कंचन चोट खाए कस चिरई जइसे तड़प उठिस। आँखी म ओखर आंसू के झड़ी लगगे। मँय नइ जानत रेहेंव कि बात-बात म ओला अतेक दुख पहुंचही। ओ तड़त के कथे-''चंदन! का तहूं मोला रईस बाप के बेटी समझथस? देख चंदन, मोर शरीर जरूर रईस हे, फेर मोर मन गरीब हे। मोला मोटर-बंगला नइ चाही चंदन, मोला ए घरघुंदिया चाही। मोला लाखो के मालगुजार नइ चाही, मोला चाही सिरिफ तोर बाहुबल, तोर भुजा म हल चलाए के ताकत हे न! देख, तँय मोला स्वार्थ अउ लोभ के घेरा म बंधाय झन समझ। महूं तोर संग भुइयाँ म उगे लहलहावत फसल के संग हंसना मुस्काना चाहत हवं, अउ आजादी के जिनगी जीना चाहथँव।’‘

''देवी! कंचन म अइसन सुग्घर विचार हे। ओ बखत ओखर उमर नौ-दस साल ले जादा नइ रिहिस होही, फेर कइसे आईस होही ओखर मति म अइसन विचार? जरूर पहिली जनम के संस्कार ए। सिरतोन आय , कंचन भले रईस के घर जन्मे हे, फेर ओखर आत्मा गरीब हे।’‘

''आज दस साल होगे हम दुनो ला बिछुड़े। ए दस साल म मोर सब कुछ नाश होगे। दु एकड़ के मुआवजा होथे कतेक-गांव, घर के तलाश म खतम होगे। गरीबी के भार अउ महंगाई के मार। महतारी ला मोर भविष्य के चिंता होइस, फेर चिंता गरीबी के दवा तो नोहे। एक दिन महतारी घलो चिंता म गल-गल के खतम होगे। देवी अब मोर करा कुछू नइ रहि गे हे। सिरिफ कंचन के भाखा -ओखर मीठा बोली मोर जिनगी के आधार ए। मोला कंचन ले कुछ नइ चाही-चाही मोला ओखर ए बोल-जेला गीत के लहजा म गा-गा के घूमत हवं। जब बोल ह सुरता नइ आय बर धरे , तब फेर ओला गा के समेट लेथंव। मोर बर तो कंचन के बोली- बचन हा कंचन के सुरता ए।’‘

''कइसे तापसी! कहानी कइसे लागिस?’‘

बटोही कहानी के अंत करके तापसी ले पूछथे।

तापसी के मन तो कहानी म खोय रथे अउ ओ अब तक ए पाय के चुप रथे कि बटोही अउ आगे कुछ कही। पर जब बटोही कहानी के अंत कर देथे, तब ओ हड़बड़ा के उठथे अउ पूछथे-''चंदन के का होइस बटोही? धरमशाला के बाद कहां गिस?’‘

''काबर तापसी?’‘

''काबर के ओखर कंचन मँय अवं, बटोही!’‘

''का?-बटोही घलो हड़बड़ा के उठ के बइठथे-का ते कंचन अस तापसी।’‘

हां, बटोही! मंय ही ओ अभागिन कंचन अवं। गंगरेल गांव के उजड़े ले मोर मां-बाप एक अइसे नगर म जा बसिन, जे इहां ले सात समुंदर पार जइसे दुरिहा हे। सुन बटोही, चंदन के सुरता महूं ला रिहिस। गंगरेल गांव के फुरुर फुरुर पुरवाही , खेत-खलिहान के हरियाली, चंदन के गोरा गठीला तन अउ ओखर मगन मन, सब कुछ सुरता रिहिस पर मंय दूर देश के निवासी, ओला अपन आत्मा के छोड़ अउ का दे सकत रेहेंव? फेर चंदन मोला अपन मन मंदिर म बिठा चुके हे, ए बात मोला तब मालूम होईस जब ओ धरमशाला म बराती मन ला सुनात बेर अपन गीत म मोर गोठ-बात के राग गाइस। धरमशाला के ओ दुल्हन अउ कोई नही बटोही, ओ दुल्हन मँय आंव। मोर विवाह एक शहर के एक नामी व्यापारी के संग हो चुके हे। धरमशाला म चंदन के जिनगी के कथा ल मँय ए पाए के सुनना चाहेंव के ओ-मोला कहां तक समझ सके हे।

''जे आदमी के संग मोर बिहाव होय रिहिस, ओकर बर सिरिफ मँय शरीर रहेंव, ओह मोर आत्मा ला नइ समझ सकिस। व्यापार तो करे ओ दिन-रात बस हाय पइसा, हाय पइसा। सीधा सादा गरीब मन के खून चूसना अउ हराम के कमाई म गुलछर्रा उड़ाना, एह ओखर काम रहाय। फेर  ज्यादा दिन ओ जी नइ सकिस। दुनिया भर के व्यसन म शरीर कब तक ले टिके। ओला टी.वी. होगे। कम उम्र म मृत्यु के शिकार होगे। जब-जब मँय ओखर कुकृत्य ला देखव-सुनव, मोला चंदन के सुरता ज्यादा आय।’‘

''बटोही, मोर शरीर म सिरिफ मोर मां-बाप के हक रिहिस अउ उंखर आशा मान के मँय बिहाव करेंव फेर मोर आत्मा सिरिफ चंदन के रिहिस बटोही। बिहाव शरीर के होइस, आत्मा के तो नही। देख, गंगरेल के ए सियार म मोला आज चालीस-बियालीस बच्छर होगे हे। ए उही बर पेड़ के छइहां ए, जेखर नीचे चंदन अउ मोर बचपना बीते रिहिस। बर पेड़ के छइहां म घरघुंदिया बना के ओखर बाट देखत मोर आंखी ह पथरागे फेर ओ नइ आईस अउ अब का आही। तोर कहानी घलो आगू डाहर नइ बढ़ीस, कोन जाने ओ कहां हे।’‘

रात के दूसरा पहर रथे। घटाटोप अंधियार चारो कोती बगरे रथे फेर  कंचन ला पूरा जनम के दृश्य दिखाई देथे, गांव-घर, मां-बाप, चंदन सब कुछ। तन ले तो बूढ़ा हो चुके हे, पर मन अंधियारी रात म घलो चिरई-चिरगुन जइसे आकाश म उड़थे। ओ अपन थके शरीर ल उठाके बटोही ले कथे-''अच्छा बटोही! मँय चंदन के खोज म निकलथंव, तँय ह बिहनिया होही ताहन अपन रद्दा बाट म चल देबे ।’‘

बटोही ओखर हाथ पकड़ के कथे-''कंचन अब अऊ तोला कहूं जाए बर नइ लागे। मँय तोर घरघुंदिया म आगे हवं। मही तोर चंदन अंव कंचन मही तोर चंदन अंव।’‘

डॉ. तेजराम दिल्लीवार



Sunday, 17 July 2022

छत्तीसगढ़ी हाना*

 *छत्तीसगढ़ी हाना*


1 . **दूबर बर दू असाढ़*


 अर्थ  - पहिली ले परेशानी हावय तेमा अउ परेशानी आ जाथे


2.*खाई मीठ ता माई मीठ*


अर्थ- जेखर ले जादा फायदा होथे तेन हा जादा मयारुक लागथे


3.**तइहा के बात बइहा लेगे*


अर्थ-अब्बड़ जुन्ना बात


4.*पर भरोसा तीन परोसा*


अर्थ- दूसर के धन ला उड़ाय मा नई अखरय ।


5.*एक कोलिहा हुआँ ता जम्मो कोलिहा हुआँ हुआँ*


अर्थ-बिन गुने बिचारे दूसर के हाँ मा हाँ मिलाय


6.*एक आमा के सौ लबेदा*


अर्थ-कोनो एक ठन जिनिस के जादा माँग होवय


7.*उजड़े मड़वा मा डिड़वा नाच*


अर्थ-कोनो काम के होय ले चुस्ती फुरती देखाय


8.*करमइता के नाँगर ला भूत जोतय*


अर्थ -अबड़ेच भागमानी होवय


9.*चलनी मा गाय दुहय,करम ला देवय दोस*


अर्थ-खुदे गलती करय अउ भाग ला दोष देवय


10.*जबके आमा तबके लबेदा*



अर्थ-जउनेच बुता के बेरा आय तउने बुता ला करय


11*कउआँ कान लेगे ता ओखर पाछू नई भागय*


अर्थ-कोनो कुछु अफवाह फइलाइस तेने ला मान लेवय


12.*नवा बइला के नवा सींग  चल रे बइला टींगे टींग*


अर्थ-नवा नवा जिनिस बर जादा लगाव रहिथे




संकलनकर्ता


चित्रा श्रीवास

बिलासपुर

पलारी के छैमासी शिव मंदिर*


*पलारी के छैमासी शिव मंदिर*


- *दुर्गा प्रसाद पारकर* 

                        

छत्तीसगढ़ देवता धामी के गढ़ आय। गांव होवय चाहे शहर जंगल होवय चाहे पहाड़। खेत होवय चाहे खार, नही ते नदिया करार। अपार मंदिर देवालय हे। अइसे कोनो गांव नइ होही जिंहा भोले भंडारी के मंदिर नइ होही अऊ जिंहा मंदिर नइ होही ते शिवलिंग जरुर होही। काबर कि ओखर मनइया तो घरो घर हे चाहे ओहा सावन होवय चाहे भादो चाहे शिवरात्रि। कतको गांव म तो शिव मंदिर करा कसाकस मेला भराथे। जिंहे नांद बइला म बेल चघा के अउ नरियर के भेला चघा के अपन मनोकामना बर असीस मांगथे अउ ठिन्न ले घन्टी बजाथे | धमतरी गुण्डरदेही रद्दा म पलारी गांव परथे। उहें भारी जुन्नेट शिव मंदिर हे। उहें के मंदिर म हीरादास साहू ह घंटी बजा के बताथे कि सियान मन बताथे ग-जब इहां के मंदिर ह बने रिहिस ओ समे छै महीना के रात रिहिस। बड़े-बड़े पखना म छपे फोटू - ह अपन समे के इतिहास के बक्का फोरत हे।

शिवजी के मंदिर ह तरिया के पार म बने हे। तभे तो दरसन करइया मन तरिया म गोड़ हाथ धो के अवघट दानी भोले भंडारी जी के दरसन परसन बर चघथे। मंदिर के नेव ह बड़े बड़े पखना ले धराये हे। छै फीट लम्हरी अउ दू फीट मोट्ठा पखना ले ए मंदिर ह बने हे। मंदिर के बनावट ले ओकर इतिहास के अंदाज लगाए जा सकत हे। लोगन मन के मानना हे कि ए मंदिर ह बौद्ध काल के होही। एकर गवाही ओकर बनवट हे। कोड़ई के बखत जऊन मुर्ती मिले हे, ओमा बुद्द काल नही ते ओकर तीर तार के होही अइसे संभावना दिखथे।

मंदिर के भीतरी म शिवलिंग हे। जेहा भारी फुरमानुक हे। तभे तो मंदिर भीतर कुंड (जलहरी) म दरसन करइया मन पानी डालथे। कुंड म जतका पानी डालथे ओहा मंदिर के भीतरे भीतर तरिया म जा के समा जथे। पानी ह सुरंगे सुरंग निकलथे।

मंदिर के आगु डाहर मुहाटी म गंगा-जमुना देवी के मूर्ती मन भावन हे। ओकरे लक्ठा म हनुमान जी के छापा छपाए हे। जउन ह देखे के लइक हे। कतको पखना म खुदाई करे गे हे। अइलगे- अइलगे पखना म सात झन भाई मन के छापा ह चकचक ले चिन्हावत हे।

मंदिर के गुम्बद के चारो दिशा म सूर्यदेव के छापा हे बीच म कुछ के चिन्हा नइ हे। मंदिर बहुंते जुन्ना आय। सियान मन बताथे कि हम जब ले देखत हन तब ले अइसने देखत हन। उदपहा देखबे ते अइसे लागथे कि मंदिर अबक तबक गिरतेच हे। जउने देखथे उही कथे कि मंदिर के अइसन गीरे हालत देख-रेख के अभाव म होवत हे फेर देखे कोन। अब गांव वाले मन ल चेत आगे हे तभे तो दस बारा साल होगे गांव वाले मन मंदिर के देख भाल करत हे।

तिही पाए के अब इहां सांप बिच्छी दिखै नही ते पहिली तो बड़ेब बड़े सांप अऊ करिया भूरवा बिच्छी मन उहां माढ़ा बना ले रिहिस। मंदिर के पूजेरी राजेश्वर नाथ झा के देख रेख म मंदिर म धार्मिक कार्यक्रम होवत रथे बखत बखत म। अब तो मंदिर के बगल म पुजेरी ह नानकुन मकान बना ले हे। झा ह इहें परिवार सहित रथे। समे - समे म श्रद्धालु मन तनी ले रमायण किर्तन अउ भजन के कार्यक्रम होवत रथे।

मंदिर के कोनो लिखित इतिहास तो नइहे। फेर पुरातत्व विभाग ह घलो शिव मंदिर के दर्शन कर के असीस पा लेतीन अइसे इहें के सियान मन के आसा हे। काबर के पलारी के अद्भुत शिव मंदिर ह भारतीय संस्कृति अउ धर्म के चिन्हा आय। लोगन मन तो यहू कथे कि छत्तीसगढ़ म अइसन चमत्कारिक मंदिर दुसर करा अऊ देखे बर नइ मिलै। अइसन मंदिर देखे ले अइसे लागथे कि आज ले कोनो जादा भगवान उपर आस्था पहिली जमाना के मन ल रिहिस हे तइसे लागथे। तभे तो अद्भुत-अद्भुत मंदिर देखे बर मिलथे। ओइसन आज कोनो जघा बनत नइ देखे जा सके।

 

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छत्तीसगढ़ म कांदा के महत्व*



*छत्तीसगढ़ म कांदा के महत्व*


- *दुर्गा प्रसाद पारकर* 

                        

      जऊन समे मनखे मन धान कोदो कुटकी ल नइ चिन्हत रिहिन होही ओ समे काला खा के जियत रिहिन होही। कुछू काही ल तो खावत पीयत रिहिन होही। ओ बखत जर बुखार बन कोनो क्रोसिन रिहिस होही न विक्स। तभो ले जिनगी ल काटिन होही कांदा - कुसा खा के। आजो घलो छत्तीसगढ़ म आनी बानी खनिज ले कतको जादा कांदा कुसा ह जघा जघा मिलथे। लगभग इहां सबो किसम के कांदा मिलथे

 जइसे-डांग कांदा के नार ह ढेखरा म बने फून्नाए रथे। डांग कांदा के सागो रांध ले अऊ पलपला म उसन के हकन के खा ले। बने सुहाथे। जंगलिहा मन तो सेवारी ल घलो खवाथे जल्दी सम्हलही कही के। केऊ कांदा ह बस्तर कोती जादा मिलथे। केऊ कांदा खाए ले पेट ह खलखल ले साफ हो जथे। सादा दिखते केऊ कांदा ह। बखत परे म सागो रांध ले जी। ढुलेना कांदा तरिया म करिया रंग के मिलथे। ओकर नान-नान कांदा ह छेरी लेड़ी कस दिखते। डोटो कांदा के नार ह बंगला पान के नार कस होथे। डोटो कांदा ल मरार मन जादा लगाथे। तरिया के पैठू म बुचरूवा कांदा ल देख ले। ए कांदा म बूच रहिथे तिही पाए के एला बुचरूवा कांदा केहे जाथे।

बुचरूवा कांदा ल कुकरी कांदा के नाव से घलो जाने जाथे। बुचरूवा ह भुरवा दिखथे। केसरूवा कांदा ह खान खान भाथे। सियान मन कहिथे बुचरूवा अऊ केसरूवा कांदा दूनो भाई बंद हरे। सेम्हर कांदा ललहूं रहिथे जउन अघात मीठ रहिथे। शकर कांदा ल केंवट कांदा के नाव ले जादा जाने जाते। जऊन ह लाल अऊ सादा रंग के होथे। केवट कांदा ह केवट मन कस सबो डाहर मिलथे। केवट कांदा ह मांदा म भारी भोगाथे। घुपकाला के मौसम म नदिया के रेती म केवट कांदा लगाथे फेर पाला के कांदा कस मोठ नइ राहे तभे तो पचर्रा रथे। बाजार हाट ह तो बिना केवट कांदा के शोभा नइ देवय। कांदा भाजी गजब मिठाथे | लालच म जादा खाबे त झार घलो देथे पेट ल।

नांगर कांदा जीमीकांदा कस होथे। लम्हरी घलो होथे। चना कस नांगर कांदा ह जमीन ल उर्वरक देथे। जतेक जादा करिया माटी ओतके जादा मीठ नांगर कांदा। कोचई कांदा तीन किसम के होथे। लाल रंग के कोचई ह बड़े-बड़े तो होथे फेर जीभ ह खजुवाथे। जीमी कांदा ल मही म रांधबे त तो बने नही ते मुंह के बूता बना देथे। अटके बीर्रे म कोचई खुला तारथे। जात कोचई फरहरी के काम आथे। जात कोचई ह भुंजवा म गंज सुहाथे। अइसने किसम के छूइहा कोचई ल साग बनाथे। कोचई के पाना ल बेसन म लपेट के उसने के बाद काट के कटकट से अम्मट मही म रांधबे ते रांधते-रांधत मुंहू ह पंछा जथे। राम कांदा ह बड़े-बड़े होथे। ए कांदा ल कच्चा खाए जाथे। एला उसने के जरूरत नई परय। भंइस ढेठी कांदा ह भइस के ढेठी कस होथे। अइसने किसम के ढेस कांदा अउ रतालु कांदा होथे जऊन ह तरिया म मिलथे। रतालू कांदा ह घलो होथे । अइसने किसम के अऊ कतनो कांदा छत्तीसगढ़ म मिलथे।

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तुतारी

 तुतारी 

                                          चन्द्रहास साहू

                                मो   8120578897


      हा.. हा.. तो.. तो.. के  आरो के संग खेत जोतत हावय सियनहा हा । बइला मन घला आज अब्बड़ मेछराइस । फेर सियनहा के हाथ के तुतारी हा कच्च ले बाखा म परे तब तरमरा के रेंगें। सियान के जी घला कउवागे आज। अगास ला देखे । सादा करिया गुंगवा कस बादर हा रेंगत रहाय फेर भुइयां म नइ गिरीस । चिरीरिरी फट्..... अब्बड़ आरो संग गरजिस- घुमरिस बादर हा फेर बूंद भर नइ बरसिस । कभू अगास कोती ला, कभू नांगर कोती ला देखे अउ नांगर के पड़की ला धर के कुंड मा कुंड मिलाये परदेसी हा । फेर भुइयां मा बरोबर पानी दरपाये नइ हावय तब कइसे नांगर हा गड़ही ...? बइला हा घला तुतारी के डर मा रेंगे , सामरथ करे । ....बइला लाहकगे अब । 

"गिर जा गंगा मइया ! गिर जा !  पानी गिर जा ।''

अब्बड़ बिनती करिस परदेसी हा। फेर.. येहा परदेसी आवय कोनो भगीरथ थोड़े आय ? आ गंगा मइयां कहि अउ ..आइच जाही, रदरदा के गिर जाही।

 .. पानी नइ गिरिस अउ काया के पसीना हा गिरे लागिस तरतर - तरतर । परदेसी के नांगर फेर चभकगे । हला - डोला के अटेसीस अउ फेर चमकाइस बइला ला।

" हर्रे ..हर्र.. तता ... तता...त त....।''

बाखा म फेर तुतारी मारिस। बइला बमियागे। ताकत नस - नस मा दउड़े लागिस । जइसे  दस हाथी के बल समागे । दुनो बइला संघरा ताकत लगाइस जुड़ा मा... फेर नागर तो टस ले मस नइ होइस अतका सामरथ घलो। ... अबके सामरथ मा जुड़ा हा सुलरागे । नोई टूटगे ।...अउ बइला मन  बारा हाथ आगू कोती दउड़े लागिस । परदेसी मुड़ी ला धर के बइठगे।

" का करव भगवान ! पानी के बेवसथा कहाँ ले करव..? एक - एक पइसा ला जोर के बोर खोदवाये हँव । पानी घला हावय । फेर बिन बिजली अबिरथा हावय। अब्बड़ दउड़े-भागेव घला । कतको झन साहब मन आइस - गिस। जम्मो कोई ला तो पइसा देये हँव । फेर बोर मा बिजली कनेक्शन नइ खिचाइस। 

            परदेसी तरमराये लागिस।

" का करव मेंहा.. ?'' 

हफरगे । कुंदरा ले टूटहा साइकिल ला निकालिस अउ डंडिल मा बांस के कमचील बांध के दुनो चक्का मा हवा भरिस । परदेसी के आरो ला पाके कलवा कुकुर हा घला आगे अउ राख - माटी मा घोण्डइया मारे लागिस । 

“ नानजात ! ”

 बखानत नानकून ढ़ेला मा फेंक के मारिस परदेसी हा कुकुर ला । कु.कु... करत भागगे ओहा । लकड़ी के बोझा ला बोहो के आइस परदेसी के गोसाइन दमयंतीन हा ।

 “कहाँ जावत हस, मार तरमिर. तरमिर.....? "

बोझा ला पटकत किहिस । अउ पछिना ला गुड़री मा पोछे लागिस । फेर पछिना पोछाये के आगू देख डारिस परदेसी हा दमयंती के चेहरा ला ससन भर । दमकत सिकल, चमकत टिकुलिया अउ पछिना मा बोहाये मांग के कुहकू । ललहु गाल, गाल के तेलई अउ तेलई के तीर कान के पीछू सादा - सादा नुन फूटे हे ..। सब ला देख डारिस परदेसी हा ।

 "जात हँव । उही डाहर, तहू जाबे ते चल । ” परदेसी किहिस । गड़गड़ - गड़गड़  एक लोटा पानी ला पियिस दमयंतीन हा अउ नानकून पोटरी मा कुछू ला धरत साइकिल के केरियल मा बइठगे ।

       अब्बड़ सइमो - सइमो करत रिहिस आफिस हा। आफिस के एक कोती बिगड़ाहा टासफारमर, तार , केबल अउ दुसर कोती पावर हाऊस बड़का - बड़का बिजली खम्बा । संगमरमर लगे आफिस के डेरउठी ला जइसे खुंदिस कान मा आरो आइस ।

“फरस ला मइलाहा झन कर डोकरा !”

चपरासी आए तमकत रिहिस । परदेसी हा पनही ला हेरके खनखोरी म चपक लिस अउ दुसर हाथ मा तुतारी ला धरे रिहिस । 

"बड़का साहेब ले भेंट करना हे बाबू ।"

परदेसी के गोठ ला सुनके चपरासी हा भभकत रिहिस। अंगरी देखा के बड़का साहब के कुरिया ला देखा दिस ।  

“ राम राम साहेब !”

 परदेसी जोहार करिस । गोटारन कस आँखी नटेरत चश्मा ले देखिस अउ फेर फाइल मा गड़गे । 

"मइलाहा घोंघटाहा ओन्हा पहिरके आ जाथो। कोन जन के दिन के नहाये नइ हावय ते.. ?मेनरलेस डर्टी पीपल ? पसीना के बस्सई छीः छीः...।"

 साहब फुसफुसाइस अउ मुँहू ला करू - करू करे लागिस । 

"स ..स.. साहेब मोर फारम  ?“

गोटारन कस आँखीवाला हा फेर देखिस दुनो  परानी ला अउ फेर फाइल मा आँखी गडि़या दिस । दुनो परानी भुइयां मा फसकराके बइठगे । आगू के गद्दा वाला खुरसी मे बइठे के सामरथ नइ करिस । 

“भागवत !” 

साहब के आरो ला सुनके चपरासी आगे।

 “बरा भजिया अउ चाहा लानबे  गरमा - गरम जा ।’’

 ” हव  ।"

चपरासी हुकारू दिस अउ ठाड़े रिहिस।

 ” दे दे पइसा ताहन तोर फारम ला देखहू ।"

साहब किहिस । परदेसी अउ गोसाइन एक दूसर ला देखे लागिस । सलूखा के खिसा ले चिपटी कस मुड़े पचास रूपिया ला दिस ।

“अतकी मा का होही डोकरा...?"

 चपरासी मुचकावत किहिस

 “पच्चीस पचास अउ दे दे ! ” आँखी ला रमजत साहब किहिस अउ दमयंतीन हा पोलखा के खिसा ले पंदरा परत ले चिपटाये बीस रूपया ला हेर के दिस । 

“बिन पइसा के आ जाथो ।” 

चपरासी हा फुसफुसावत किहिस अउ रेंग दिस । अब साहब के नजर हा दमयंतीन के उपर ठाढ़े होगे । झुंझी चुंदी मुड़ी ,बजरहा खिनवा, रवाही फुली, चिरहा लुगरा अउ चिरहा पोलखा के ओ पार...। 

         टेबल मे परदेसी के फाइल माड़े रिहिस । बड़का-बड़का कागज नकसा खसरा बी वन । परदेसी झटकुन चिन्ह डारिस अपन अंगठा के चिन्हा अउ संरपच के ठप्पा ला। चश्मा ला उठा - उठाके अपन आँखी ला एक - एक पन्ना मा गडि़याइस । कभू करिया पेन मा कभू लाल  पेन मा कागजात मा चिन्हा लगाये लागिस। अपन गुड़गुड़ी वाला खुरसी ला आगू तिरत साहब हा कहिथे ।

  ’’परदेसी तोर इस्टीमेट बने नइ हे। टांसफारमर  ले तोर खेत हा सात पोल के दुरिहा हावय । अउ ऐमा पांच पोल देखावत हे । ’’

  “कोन जन साहेब नाप जोख तो तुमन ला आथे । हमन तो अड़हा आवन ।” 

परदेसी किहिस । कभू नकसा खसरा बिगड़गे हावय किहिस तब कभू फारम मा सरपंच के दसकत नइ हे किहिस अउ आने साहब मन। "कब बिजली लगही भगवान ..?''

परदेसी संसो करे लागिस । 

"तोर ले आगू वाला साहब ला चार हजार देये रेहेंव। ओखर आगू वाला ला तो पंद्रा सौ देये रेहेंव साहेब ! बछवा ला बेचके।" 

परदेसी अब हाथ जोर डारे रिहिस।

 ’’ये जस के बुता तोरे हाथ मा होही अइसे लागथे साहेब ! मोर बनौती बना दे । हाथ जोरत हँव साहेब । मोर बनौती बना दे ।’’ 

दमयंतीन घला हाथ जोर के किहिस । 

"बन तो जाही परदेसी फेर तोला खरचा करे ला परही , पचीस तीस हजार ।’’ 

साहेब हा जुड़ सांस लेवत किहिस अउ बरा भजिया ला झड़के लागिस । 

"कहाँ ले लानहू साहेब ?''

परदेसी किहिस । साहेब के आँखी दमयंतीन के बांहा के पहुची मा जामगे । 

"तोर घरवाली हा बांहा मा पहिरे हावय ते का गहना आए परदेसी...? "

दमयंतीन बांहा  ला अछरा मा तोपे लागिस

 “पहुंची आय साहेब ! ”  ।

सुघ्घर दिखत रिहिस चांदी के चमकत जोखी भराये सांप कस सलमिल - सलमिल करत हे । सुघ्घर  फुल छप्पा अउ सोनार के कलाकारी घात सुघ्घर हे । 

"साहब मोर दाई हा चिन्हा देये हे। अब्बड़ मया करे साहेब। एक दिन मलेरिया के बुखार होइस अउ एके दिन मा ताला - बेली होगे । पान - परसाद घलो नइ खवा सकेन । दमयंतीन ऐके सांस मा गोठियाइस । ओखर आँखी जोगनी कस बरिस अउ बुता घला गे । आँखी के कोर के आँसू ला पोछिस दमयंतीन हा । 

   " एक ठन उदीम हावय परदेसी तोला पइसा नइ लागे ।''

साहब हा परदेसी डाहर नवगे । परदेसी के घांम मा भूंजाये सिकल मा आँखी गड़ियावत किहिस।

 “का साहेब !’’ 

परदेसी अउ तीर मा जाके पुछिस। 

"सरकार हा एक ठन योजना बनाये हावय जेखर लाभ देवाहू अउ योजना कोती ले पइसा जमा हो जाही । तोला एको पइसा नइ लागे फेर ... । "

साहब  काहत - काहत अतरगे । चाहा ला ढोक्कोम - ढोक्कोम पीये लागिस ।

 "परदेसी ! मेंहा मोर घर मा छत्तीसगढ़ महतारी के मुरती बनवात हँव।  ओहा तोर गोसाइन के पहुंची ला पहिरही तब सुघ्घर लागही । सौहत छत्तीसगढ़ महतारी लागही । अब जमाना घलो बदलगे । कोनो नारी परानी अइसन गहना जेवर नइ पहिरे ....।"

 साहेब महाभारत के सकुनी ममा कस अपन चतुराई मा मुचकाये लागिस । अउ ये दुनो परानी एक दुसर के सिकल ला देखे लागिस । 

  ’’इनाम तो मांगत हव परदेसी ! कतको किसान हा अंकाल मा मरत  हावय । मेहां तोला बचाये के उदीम बतावत हावव । तोर बोर मा बिजली अमरही तभे तो भक्कम पानी निकलही।  ....अउ अंकाल-दुकाल के मुँहू ला नइ देखस । 

“ देख ले परदेसी ! तोर गोसाइन के बांहा के पहुची हा मोर घर मा पहुचही..। तभे तोर खेत मा बिजली पहुचही, परदेसी इमान से ।” 

साहेब हा किरिया  खाइस अउ पान घला । 

’’इमान से मेंहा घुस नइ लेवत हव । ओ ....तो.. छत्तीसगढ़ महतारी के मुरती के सवांगा बर मांगत हव। "

साहब अउ आगू किहिस । 

 परदेसी के आँखी मा उज्जर भविस दिखे लागिस । दमयंतीन घला अंकाल के परछो ले  निकले के रद्दा देखे लागिस। अउ पहुची ला हेर के दे दिस । छाती म पथरा लदक के सुल्हर डारिस पहुंची ला । आँखी ले झर - झर ऑंसू आवत रिहिस। अपन पहेलात नोनी ला गवाइस तब के दुख अउ अब के दुख दुनो बरोबर रिहिस । कतको बड़का दुख आ जावय परदेसी ठाढ़े रहिथे पहार कस । कोनो आँधी धुंका झन आये अइसे । सिरतोन आज के धुंकी तो अधमरहा कर दिस दुनो कोई ला। साहब मुचकाये लागिस जइसे कुबेर के खजाना ला पोगरा डारिस अइसे । कोन जन  ओखर बोर के पानी कब बोहाही ते फेर दमयंतीन के आँखी ले अरपा पैरी के धार  बोहाय लागिस । हाथ गोड़ टूटे कस लागिस । झिमझिमासी लागिस । अउ परदेसी के खांध ला धरके थामिस । 

“ए ...एक महीना पाछू आके आरो कर लिहू ।” साहब किहिस अऊ खिड़की कोती ले पच्च ले पान के पीक ला थूकिस । 

चपरासी हा कोल्ड्रिक के गिलास धरके ठाढ़े रिहिस । साहब झोकिस। पीये लागिस ढ़ोक्कोम - ढ़ोक्कोम । 

"हअये'' साहब ढ़कारिस अउ सांस छोड़ीस ।

" लेवव तहू मन पी लेव कोल्ड्रिक । '' 

 "न ...नही साहेब ! हमन ला नइ पचे आनी - बानी के जिनिस हा ।''

परदेसी के अंतस मा अंगरा बरत रिहिस फेर जुड़ाके किहिस । चपरासी के गोठ सुनके।

                        अब साइकिल के मुठा मा सामरथ फबे लागिस। नस - नस मा लहू दउड़े लागिस। साइकिल उत्ता- धुर्रा दउड़त हे घर कोती लहुटे के रद्दा मा। दमयंतीन केरियल मा बइठे रिहिस अउ  पोटरी के फुटे चना ला खवावत गिस परदेसी ला । फुटे चना के संग डुरू चना ला घला मसक डारिस परदेसी हा । अउ कभु - कभु तो गोटी - माटी ला घला खटरंग ले चाबिस। लीम के जुड़ छांव मा अतरके पानी पियिस । अउ फेर रेंगे लागिस अपन रद्दा। पेट के भभकत आगी ला कतका बुताइस चना हा.....? उही जाने  ...।  फेर कोनो डाहर आथे - जाथे तब अइसना चना ला धर लेथे दमयंतीन हा ।

             बटकी भर बासी अउ चुटकी भर नून के खवइया परदेसी हा कोनो जिनिस के लालच नइ करिस फेर अगास ला देखथे तब संसो हो जाथे । सावन भादो मा आगी सुलगत सुरूज देवता अऊ अइलावत खेत के धान । पानी के मारे पियासे भुंइया अउ मरत मछरी कोतरी...।

"बटकी भर बासी के बेवसथा कइसे होही भगवान.....? तहू ठगत हावस का लबरा बादर ...?  बिजली वाले साहब कस लबरा । दू महीना होगे आज ले बिजली के दउहा नइ हावय। पइसा पहुंची जम्मो गवागे । परदेसी बियाकुल होगे । 

साइकिल ला निकालिस ।  तुतारी ला धर के रेंग दिस आने गॉंव के रद्दा ... अकेला ।


"कइसे साहेब मोर खेत मा बिजली कब लगही ...? ...अउ लगही कि नही वहू ला बता ...?''

 परदेसी बड़का साहब के कुरिया मा खुसरत किहिस।  ओखर आँखी मा लहू उतरे कस लाल रिहिस । चुन्दी छतराये , माथा मा लाल टीका अउ हाथ मा तुतारी । चिरहा सलूखा अउ नानकुन पटका । कोठ मा टंगाये तिरसूल धरे भगवान  भोलेनाथ के रौद्र रूप देखे साहब हा तब तुतारी धरे परदेसी के बरन ला।

“ल ..ल..लग जाही न परदेसी !  संसो झन कर । ” 

साहब डर्रावत किहिस । 

"इही गोठ ला तो सुनत जोजन होगे साहेब ! फेर कब लगही ते ..? महू जानथव सुचना के अधिकार ,लोक सेवा गारंटी अधिनियम ला । जान डारेव तुहरे आफिस मा लगे सी0सी0 टी0वी0 केमरा के आगू मा मोर गोसाइन के पहुंची ला नगाये हस तौन ला । सी0डी0 घला बनवा डारे हव इमानदार बाबू जेखर टरासफर करवाये हस तेखर ले मिलके ।’’

परदेसी किहिस मेछा ला अइठत। 

    साहब थरथराये लागिस अउ टेबल के तरी मा कही ला खोजे के उदीम करिस ।

’’साहेब कतका लबारी मारथस तौन ला अब घला जान डारेव । साहेब खेत जोतथन अउ बइला मेछराये लागथे तब बाखा मा तुतारी परथे तब सोझिया जाथे ।"

 परदेसी फेर किहिस ।

   परदेसी के हाथ के तुतारी ला देखे लागिस  साहब हा । डेढ़ दु हाथ के पातर लउठी अऊ आगू कोती खिला लगे सुचकी ....। कच्च ले गड़े कस लागिस साहब ला अउ लाइनमेन ला बला के कागज मा दसकत करत बिजली खंभा तार अउ आने जिनिस ले भरे ट्रक ला पठोय बर किहिस परदेसी संग । टेबल मा माड़हे अपन गोसाइन के पहुंची ला धर लिस परदेसी हा  अउ गरेरा कस बाहिर कोती आ गे । 

  साहब हा पसीना पोछे लागिस ।

" अड़हा परदेसी हा अब सब ला जानथे ....एवेरी थिंग....।'' फुसफुसाइस  अपने  - अपन साहब हा। तुतारी लागे सही कच्च ले गडि़स साहब के..।        

                     


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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

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