Thursday, 28 July 2022

गेंड़ी जोहार...


 

गेंड़ी जोहार... 

    हमर छत्तीसगढ़ म हरेली एक अइसे परब आय, जेला लइका मन गजब उत्साह के साथ अगोरा करथें. काबर ते ए दिन वोमन ल बांस के बने गेंड़ी म चघे अउ नंगत किंजरे के अवसर मिलथे. एकरे सेती लइका मन ए हरेली परब ल 'गेंड़ी परब' के रूप म घलो चिन्हारी करथें.

    वइसे तो ए परब म गेंड़ी काबर बनाए जाथे, एकर ए परब ले संबंधित का महत्व हे, ए बात कोनो ठोस कारण नइ मालूम होवय. अउ ते अउ एकर कोनो आध्यात्मिक कारण घलो समझ म नइ आवय. फेर चेतलग सियान मन के कहना हे, एला चम्मास के गहीर बरसा के सेती किचिर-काचर माते चिखला ले लइका मनला बचा के रेंगाए खातिर बनाए गे होही. तेमा वोमन चिखला-पानी ल नाहकत घलो स्कूल, कोनो तरिया या अपन संगी-साथी मन संग मेल-भेंट करे बर आसानी के साथ जा सकय. एकरे सेती ए हरेली परब के बहाना गेंड़ी बनाए के नेंग ल घलो कर दिए जाथे.

    ठउका अइसने एकर विसर्जन खातिर घलो कोनो अलग से परब नइ मनाए जाय, तभो ले एला नरबोद परब के दिन टोर-टुरा के विसर्जित कर दिए जाथे. ए नरबोद परब ल वनांचल क्षेत्र म बहुतायत म मनाए जाथे. ए परब ल 'पोरा तिहार' के बिहान दिन मनाए जाथे. 

    ए नरबोद परब म सबो गाँव वाले मन पोरा के दिन के बांचे रोटी-पीठा अउ घर म जतका सदस्य होथे, वो सबो के नाव ले जुन्ना खटिया के डोरी ल गांठ बांध के, घर के जम्मो परेशानी-समस्या, रोग-राई, खाज-खजरी ल प्रतीक स्वरूप एक ठन पोतका म बांध के सकलाथें. गांव के बइगा ह सांहड़ा देव के पूजा-पाठ करथे. तहाँ ले सबो गाँव वाले मन संग सियार म पहुँचा देथे. ए तिहार म हरेली के दिन बनाए गेंड़ी ल घलो टोर-टुरा के सरोय के परंपरा ल पूरा करे जाथे. गेंड़ी ल गांव के सियार म एक पेंड़ जगा सात भांवर गोल घूम के टोरे जाथे. बइगा ह इही जगा हूम-धूप देके सबो गाँव भर के लाए पोतका मनला बार के रोग-राई ल छोड़ देथे.

    एकर बाद लइका मन गाँव के सबो रोग-राई, बीमारी-परेशानी, दुख-दरद ल ले जा रे नरबोद कहिके चिल्लावत सियार म नहका देथे. बाद म बेलवा डारा, कर्रा डारा ल खेत, घर, बारी-बखरी, कोठार आदि म खोंचे जाथे. एकर मानता हे, के एकर ले जम्मो किसम के परेशानी दुरिहा रहिथे.

    आज गेंड़ी ह प्रतियोगिता के संगे-संग कला के प्रदर्शन के रूप घलो धर लिए हे, एकरे सेती अब एला बारो महीना कोनो न कोनो रूप म देखे जा सकथे. 

    अभी हमर छत्तीसगढ़ सरकार ह हरेली के दिन सबो स्कूल मन म लइका मन खातिर गेंड़ी दौड़ के प्रतियोगिता आयोजित करे बर आदेश निकाले हे, तेनो ह गजब सहराय के लाइक हे. काबर ते एकर माध्यम ले लइका मन अपन परंपरा अउ  भाखा संग जुड़त जाही.

-सुशील भोले-9826992811

आलेख-*लोक परब हरेली*


 

आलेख-*लोक परब हरेली*


सावन महीना के अमौसी के दिन मनाय जाने वाला ये लोक परब हरेली छत्तीसगढ़िया किसान  मजदूर मन के दूसरइया बड़का तिहार आय। छत्तीसगढ़ के किसानी तिहार अक्ती के बाद हरेली ह खेती-बाड़ी मा रमे किसान मन के जिनगी म उमंग-उल्लास भरे के काम करथे। ये तिहार ह चिखला-माटी के काम-कारज मा चिभके कमइया मन बर थोकिन सुस्ताय के उदीम घलव आय। तइहा जमाना ले बैला-भैंसा के उपयोग नाॅंगर जोतई , माल ढुलई अउ आवागमन बर होते आवत हे। मवेशी मन के मल-मूत्र अउ बन-कचरा (कृषि अपशिष्ट) ले जैविक खातू बनाय के परम्परा निच्चट जुन्ना बात आय।

    किसानी काम बर खातू- बीजा मजदूर-बनिहार (मानव श्रम) नाॅंगर-दतारी, रापा- कुदारी (कृषि उपकरण) गाय -बैला (पशुधन) अउ पानी-बरसात जइसन चीज-बस (संसाधन) के होना जरूरी रहिथे। एकरे भरोसा मा किसान हा अपन खेत मा फसल उपजारे के काम ल कर पाथे। किसान ह अन्न के उपजइया आय तेकर सेती ये सबो चीज-बस (श्रम संसाधन) बर भारी चिंता फिकर घलव करथे।

जोताई-बोवाई अउ बिआसी जइसन किसानी बूता के उरके के पाछू जब भाठा-टिकरा, खेत-खार, मेड़-पार, परिया-कछार हरियर-हरियर दिखन लगथे, तरिया-डबरी, नरवा-ढोड़गा, नंदिया-बॅंधिया डबडबाके छलछलाय ला धरथे तब किसान भाई मन इही श्रम संसाधन मन के आभार व्यक्त करे बर हरेली तिहार ल मनाथे।

हम सब जानथन कि खेती किसानी के काम में अवइया श्रम सहायक समान चाहे वोहा सजीव होय या निर्जीव, सबके देखभाल बर किसान ह चोबीस-घंटा सजग रहिथे। किसानी संस्कृति के इही प्रमुख तिहार म अगर कोनो धरम नाम के चीज हे त वोहा आय किसानी धरम जिहाॅं माल-मवेशी अउ कृषि औजार मन ह ही ओकर देवता आय।

     गाॅंंव-गॅंवई म  चलागन (लोक मान्यता) हे कि बीते रातकुन ह बहिरी हवा के सक्रिय होय के बेरा आय। बाहरी-हवा के पोषक मन कहुं डहर सुन्ना जगा म जाके सिरजन के उलट जादू-टोना ( कारू-नारू) सीखे के शुरवात इही दिन ले करथे।

          गांव म ठउका इही दिन जादू-टोना जइसे बाहरी हवा ल जड़मूल ले खतम करे बर तंत्र मंत्र विद्या के गुरूवारी पाठशाला के शुरुआत होथे। गुरूवारी पाठशाला ह सावन अमौसी रतिहा ले भादो महिना के रिषि पंचमी तक सरलग पैंतीस दिन तक चलथे ।

          इही दिन माल-मवेशी मन ल नवा चारा ले होवइया रोग-राई ले बचाय बर औषधीय गुण ले भरे दशमूल कांदा, डोडो-कांदा अउ बन गोंदली जइसन जड़ी बूटी ल खवाय जाथे। तिहार के दिन बड़े बिहनिया राऊत घर ले ये जड़ी-बूटी ल लान के सबो मवेशी मन ल खवाय जाथे। साथे साथ गहूं पिसान के लोंदी मा नमक डाल के घलव खवाय जाथे। येकर ले गाय-गरू ल जरूरी खनिज लवण मिलथे अउ मौसमी बीमारी ले लड़े बर प्रतिरोधक क्षमता घलव बाढ़थे।

     जड़ी-बूटी के एवज म किसान मन राऊत ल धान-पान (शेर-चाऊर ) नइते पैसा देके ओकर कीमत चुकाथे।

     तिहार के दिन येती बेर उईस कि ओती  किसान मन अपन घर के नांगर ,जुड़ा, रापा-कुदारी, भंवारी ,रोखनी बिन्धना-बसूला, पटासी हॅंसिया,पैसूल, सब्बल, छीनी घन अउ टंगिया सबके साफ सफाई में भीड़ जाथे। अपन घर के अंगना मुरूम के आसन बिछा के सब औजार मन ल रखथे।

      ओ दिन घरोघर तेल-तेलई ले नाना प्रकार के पकवान बनाय जाथे। बरा,सोंहारी, चौसेला ,भजिया अउ चीला जइसन मनपसंद रोटी राॅंधे जाथे। हमर छत्तीसगढ़ ह धान के उपजइया प्रदेश आय तेकर सेती इहा के पकवान म चाउर पिसान के जादा उपयोग होथे। मुरूम के आसन म माढ़े कृषि औजार म दीया-बाती,हूम -धूप अउ उदबत्ती जलाके,चाऊर पिसान के घोल ल छिड़के जाथे नइते हाथा लगाय जाथे। अउ गुड़ ले बने गुरहा चीला के भोग लगाय जाथे। किसान के धान-चाऊर ह कतक पवित्र हे तेला ये नेंग मन प्रमाणित करथे। ये साल कस अवइया साल म घलव खेती किसानी म अइसने साथ मिले कहिके घर के जम्मो सदस्य मन किसानी औजार के पूजा-पष्ट करत ओकर योगदान बर आभार व्यक्त करथें। किसान मन डहर ले सजीव (मवेशी) अउ निर्जीव (किसानी औजार) मन बर मान-सम्मान अउ कहूं नइ दिखे।

         पहिली गांव गॅंवई ह पेड़-पौधा, जंगल-झाड़ी, नदी-पहाड़ ले घिरे रहय। एकर कारण खूब बरसा होय अउ अंगना-दुवार गली-खोर, रवन-रस्ता मन चिखला के मारे गदपथ रहय। किसानी औजार मन ल इही चिखला-पानी ले बचाय खातिर मुरूम के आसन बिछाय जाय। आज पक्का घर-दुवार होय के बाद घलव मुरूम बिछाय के परम्परा ह चलत हे,जे बहुत खुशी के बात आय। किसानी समान ल सुरक्षित रखे के येहा किसान के अनुभव ले उपजे वैज्ञानिक सोच आय।


      खेती-किसानी ल बिन छेका-रोका के निपटाय बर गांव गॅंवई म पौनी-पसारी के बड़ सुग्घर वेवस्था होथे। जेमा राऊत,लोहार,नऊ, बरेठ, बैगा, कोटवार अउ रखवार मन ह प्रमुख होथे। हरेली के दिन राऊत अउ लोहार के काम रहिथे। राऊत ह घरोघर जाके कपाट (दरवाजा) म लीम के डारा खोंचथे त  लोहार ह उही कपाट के चौखट मा खीला ठोकथे। कीटनाशी, जीवाणुनाशी अउ शीतलता खातिर नीम के उपयोग अउ येती गरज-चमक ले बाचे बर लोहा के खीला के उपयोग हमर पौनी मन के वैज्ञानिक सोच के कहानी घलव बताथे।

     बड़े (किसान) ल मान अउ छोटे (पौनी) ल दुलार देय के ये तिहार ह मानवता अउ समरसता ले एकता के मजबूत डोरी म बंधे रहे के संदेश देथे।

कमती म गुजारा करे के आदत के सेती पहिली तीज तिहार के छोड़ घर मा कभू तेल-तेलई नइ चूरे। बीज ले तेल निकालना कोई सरल काम नइ रहिस ।किसान के रोज के जिनगी म तेल के कोई जगा नइ रहय,डबका साग ह उनकर भोजन के हिस्सा रहय। येकरे सेती तीज-तिहार म तेलहा रोटी खाॅंय अउ ओला पचाय बर भाठा कोति खेले-कूदे बर घलव जाॅंय।

कतको जगा म रोटी-पीठा खाय के बाद पान बीड़ा कस मुहुं ल लाल करे बर लइका मन कोदो पान,दतरेंगी जड़ अउ सेम्हर कांटा ल खाथें अउ खुशी मनाथे।

      ये परब म पौनी मन अपन ठाकुर ( किसान) मन के घर जोहार-भेंट करे बर जाथें। बलदा म किसान ह खुशी मनावत धान देके बिदा करथे। ओ पइॅंत बोवाई म कोठी के बीजहा धान के छबना च ह फूटे रहय तेकर सेती किसान ह उही बीजहा धान ल पौनी मन ल देंवय ,तेकर सेती ये प्रथा ल बीजकुटनी के नाम ले जाने जाथे।

गांव के चारों मुड़ा म चिखला माटी के कारण एक जगा ले दूसर जगा जाय म बड़ तकलीफ होय। हमर पुरखा-सियान मन ये समस्या ल दूर करे बर गेड़ी के खोज करिन। हरेली के दिन ले पोरा तिहार तक ये गेंड़ी ह आवागमन के काम आय अउ नारबोद के दिन बैगा के अगुवाई म विसर्जित कर दिए जाय। आजकल इही गेंड़ी ह खेल के रूप म जाने जाथे।

बुजुर्ग -सियान मन चौपाल म सकलाके आल्हा-उदल अउ पंडवानी जइसन किस्सा-कंथली सुनथें अउ तिहार के आनंद मनाथें।

       गांव-गांव म स्कूल, बिजली, सड़क,अस्पताल होय ले टोना-टोटका (बाहरी हवा) उपर अंखमुंदा विश्वास करइया मन के संख्या म कमी आय हे।जे मनखे समाज बर बड़ सुग्घर बात आय। फेर येकर साथ ट्रेक्टर, रीपर, थ्रेसर , हार्वेस्टर के आय ले नांगर अउ बैला-भैसा के उपयोग न के बराबर होवत हे। किसान डहर ले लोहार मन ल काम नइ मिलथे।जे  कृषि संस्कृति बर बने बात नोहे।आज आधुनिकीकरण के सेती बिखरत तीज-तिहार के महत्तम ल समोखे के जरवत हवय।


    जिनगी म मनखे के हाय-हफर करत कमई-खवई के बीच म सुख अउ खुशी खोजे के संघरा उदीमे ह तो लोक परब आय।

अउ नेक सोच (सकारात्मक उर्जा)  कोति ले गलत सोच (नकारात्मक ऊर्जा) के हर तिरपट चाल ल हर (खतम) लेना ही हरेली आय।

कुलमिलाके हम इही कहि सकथन खेत-खार, मेड़-पार, भाठा-परिया, जंगल-पहाड़, बारी-बखरी के संग चारो मुड़ा के हरियर-हरियर दिखई अउ ओकर सुघरई ह हरेली आय।


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

आलेख-'हरेली तिहार'


 

आलेख-'हरेली तिहार'

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             हरेली हमर छत्तीसगढ़ के पहिली तिहार आय।गाँव गंवई म ये तिहार ल बड़ हर्षोल्लास के संग मनाथे।सावन महिना म अँधियारी पाँख के अमावस के दिन ये तिहार ल मनाये जाथे।बिहना ले गाँव म चहल पहल दिखथे, मेला मड़ई बरोबर लगथे।

              बड़े बिहना ले किसान मन पिसान ल सान के सुग्घर लोंदी बनाथे।खम्हार पत्ता म नून ल बाँधते। एक थारी म शेर समान(दार चाउँर ) अउ लोंदी ल धर के दइहान म सब सकला जथे। गाँव के सियान मन, बइगा अउ राउत हा दइहान म हूम धूप देथे।तहाँ ले सब अपन अपन गाय गरुवा ल लोंदी खवाथे ।संगे संग राउत  जड़ी बूटी के रस बनाये रहिथे तेला पियाथे। ओ जड़ी के नाम अउ काबर पियाय जाथे मैं आज राउत ल पूछेंव त  बताइस ।जड़ी के नाम पताल कोहड़ा अउ डोकोर कांदा जेन मवेशी ल मउसमी रोगराई ले बचाथे अइसे बताइन ।

                     तहाँ ले सब अपन अपन नाँगर -बख्खर, रापा- कुदरा, बसूला- बिंधना अउ हँसिया- टँगीया जतका भी अवजार रहिथे सुग्घर धो माँज के अँगना म मुरमी ऊपर रख देथे।मिलजुल सब पूजा पाठ करथे, नरियर अउ चीला चढ़ाते।बने सुम्मत बर  अरजी बिनती करथे।फेर घर म बने आनी बानी पकवान के मजा उड़ाथे।

            ऐती बर राउत ह घरोघर नीम डारा अउ दशमूल डारा ल खोचत जाथे अउ लोहार घलो मुहाटी चौखट म खीला ठोकत जाथे।एखर ले ये मान्यता हे अनिष्ट ले बचाथे, घर म घुसरन नइ देवय।बइगा महराज गाँव के जम्मो देवी- देवता ल मनाथे अउ गाँव के सुख -शांति बर अरजी बिनती करथे।आज के दिन कतको मन अपन कुलदेवी या देवता के घलो पूजा पाठ करथे।

             हरेली के पहिली रात ले तंत्र मंत्र विद्या सिखाये के परम्परा घलो शुरु होथे जेन नागपंचमी के दिन तक चलथे अउ गुरु-शिष्य बनाये जाथे।

        लइका मन गेड़ी चढ़े बड़ इतरावत रहिथे। गेड़ी दउँड़ घलो खेलथे। नोनी मन खो खो- कबड्डी, छुवउला- फुगड़ी आनी बानी के खेल दिन भर खेलत रहिथे।कतको गाँव म तो बइला दउँड़ घलो होथे।

           कई महिना बाद चारों मूड़ा हरियर हरियर दिखथे।खेतीखार म धान अउ फसल लहलहावत सुग्घर मनभावन लगथे।अइसे लगथे मानो धरती दाई हरियर रंग म अपन सिंगार करे हे।मोला लगथे एखरे सेती ये तिहार के नाँव हरेली पड़े हे।लगातार काम करत किसान अउ बनिहार मन थक जाथे।इही बहाना थिराये बर मिल जथे।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी(कवर्धा)

छत्तीसगढ़

Saturday, 23 July 2022

19 जुलाई जयंती म सुरता कब पूरा होही डॉ. खूबचंद बघेल के सपना?


 

19 जुलाई जयंती म सुरता

कब पूरा होही डॉ. खूबचंद बघेल के सपना?

   छत्तीसगढ़ के कल्पना तो सोलहवीं शताब्दी के साहित्य मन म मिलथे, फेर एकर नांव म जमीनी बुता 28 जनवरी 1956 के दिन नांदगांव म होए ऐतिहासिक "छत्तीसगढ़ी महासभा" के रूप म होइस. ए महासभा डॉ. खूबचंद बघेल के चिंतन-मनन अउ ठोसलग बुता करे के परिणाम स्वरूप आय. उन जतका जबर राजनीतिक रिहिन हें, वतकेच जबर एक लेखक अउ साहित्यकार घलो रिहिन हें. एक चिंतक स्वभाव के साहित्यकार ही ह अस्मिता आधारित राज्य के कल्पना कर सकथे.

   नांदगांव के छत्तीसगढ़ी महासभा जिहां दाऊ चंद्रभूषण दास जी के देखरेख म होइस, उहें ए अधिवेशन के पहिली सत्र के पगरइति बैरिस्टर मोरध्वजलाल श्रीवास्तव जी करिन, त दूसर सत्र के पगरइति हमर पुरखा साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी करिन. ए जुराव म बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव अउ द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र' जइसन साहित्यिक पुरोधा मन घलो रिहिन. ए ह ए बात के चिन्हारी आय, के अलग छत्तीसगढ़ राज के परिकल्पना अउ एकर खातिर जम्मो जमीनी उदिम म साहित्यकार मन के सबले बड़का अउ पोठ योगदान हे. 

   ए महासभा के बेरा डॉ. रामलाल कश्यप जी प्रश्न करे रिहिन हें - 'छत्तीसगढ़ी कोन आय?' तब डॉ. खूबचंद बघेल जी उनला कहे रिहिन हें- " जेन छत्तीसगढ़ के हित ल अपन समझथे, छत्तीसगढ़ के मान-सम्मान ल अपन मान-सम्मान मानथे तेनेच ह छत्तीसगढ़ी आय."

   डॉ. खूबचंद बघेल जी के चिंतन अस्मिता ऊपर आधारित रिहिसे तेकर सेती उन भाखा, संस्कृति, कला अउ परंपरा के बढ़ोत्तरी करना चाहत रिहिन हें, एकरे सेती उन हिन्दी, संस्कृत, अंगरेजी अउ मराठी भाखा के जानकर होए के बाद घलो इहाँ के महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी म ही अपन रचनात्मक कलम ल चलाइन. इही सब बात ल देख के हमर जइसे नेवरिया लिखइया मन घलो ए अस्मिता ऊपर आधारित राज के कल्पना ल साकार करे के उदिम म भीड़े रेहेन.

   वइसे तो मैं मानसिक रूप ले एकर नान्हेपन ले समर्थक रेहेंव, फेर मैदानी रूप म सन् 1983-84 ले संघरेंव. हमन इहाँ के छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति संग जुड़े राहन अउ हमर पुरखा साहित्यकार हरि ठाकुर जी एमा बनेच रमे राहंय, उंकरे कहे म हमूं मन जुड़ेन. तब मैं अपन नांव ल सुशील वर्मा लिखत रेहेंव. बाद म आध्यात्मिक साधना म आए के बाद गुरु के आदेश ले वर्मा के जगा भोले लिखे के चालू करेंव.

   छत्तीसगढ़ राज बने के पहिली जब डॉ. खूबचंद बघेल सरगधाम के रद्दा रेंग दिन, त हरि ठाकुर जी उंकर बारे म लिखे रिहिन- "एक बीमार छत्तीसगढ़ के कुशल डॉक्टर ह छत्तीसगढ़ ल बीमार छोड़ के चल दिस. छत्तीसगढ़ राज के सपना ल अपनेच मन म लेके चल दिस. आज जब वोकर सपना पूरा होवत हे. (1 नवंबर 2000 के राज निर्माण के बाद) छत्तीसगढ़ राज बनगे हवय त छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति, साहित्य अउ कला ल ऊंचा उठाना हे, तभे उंकर सपना पूरा होही."

  आज जब छत्तीसगढ़ ल अलग राज बने कोरी भर बछर ले आगर होगे हवय, त वो पुरखा मन के अस्मिता ऊपर आधारित राज के सपना ह अधूरा बरोबर जनाथे. 

   आज छत्तीसगढ़ ह बाढ़त तो हे, फेर क्रांकीट के जंगल के रूप म बाढ़त हे. खेत-खार, डोंगरी- पहाड़, जंगल-झाड़ी दिनों दिन कमतियावत हावय. संस्कृति के सबले जादा दुर्दशा दिखथे. खास कर के अध्यात्मिक संस्कृति, परब, उपासना अउ जीवन पद्धति के. जम्मो डहर आने- आने देश राज के संस्कृति मन अलग अलग रूप खापे अतिक्रमण करत हें.

   आज डॉ. खूबचंद बघेल के एक अलग राज के सपना तो पूरा होए हे, फेर ए ह सिरिफ एक अलग नक्शा के रूप म, एक अलग भाषायी अउ सांस्कृतिक इकाई के रूप म नहीं. तेकरे सेती एक साहित्यकार के अंतस ले ए उद्गार निकल परथे-

राज बनगे राज बनगे, देखे सपना धुआँ होगे

चारों मुड़ा कोलिहा मनके, देखौ हुआँ हुआँ होगे..

का-का सपना देखे रिहिन पुरखा अपन राज बर 

नइ चाही उधार के राजा हमला सुख सुराज बर

राजनीति के परिभाषा लगथे महाभारत के जुआ होगे...

तिड़ी-बिड़ी छर्री-दर्री हमर चिन्हारी के परिभाषा

कला-संस्कृति सबो जगा चील कौंवा के होगे बासा

बाहिर ले आए मन सतवंतीन, अउ घर के परानी छुआ होगे..

   आज डॉ. खूबचंद बघेल जी के जयंती के बेरा म अतके आसरा हावय, के उंकर अस्मिता आधारित राज के सपना खंचित पूरा होवय. हमर राज के खेल-कूद, खान-पान, पहिरावा-ओढ़ावा, परब-तिहार, पूजा-उपासना अउ जीवन पद्धति सब के स्वतंत्र चिन्हारी बनय. हमला कोनो आने डहर के पोथी-पतरा संग संघेरे झन जाय.

पुरखा ल उंकर जयंती के बेरा म डंडासरन पैलगी🙏🙏

-सुशील भोले

आदि धर्म जागृति संस्थान रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

संस्मरण- मोर नान्हेंपन के चउमास


 

संस्मरण- मोर नान्हेंपन के चउमास //*=======०००=========

(दिनांक-१८.०७.२०२२)


     मोर नान्हेंपन के चउमास के सुरता करके बचपन के वो अल्हड़पन, चुलबुलेपन, हरदम हंसमुख वो चेहरा  सुरता रूपी आईना म जस के तस झलके लगीस :-

*वाह-वाह ! वो बचपन के ज़िन्दगी कत्तेक सौभाग्यशाली अउ अनमोल रहिस, जेमा कुच्छु बात के न तो संसो-फिकर, न ही कोनो प्रकार दुख-तकलीफ के एहसास रहिसे, तभे तो ये पंक्ति बरबस याद आ गे :-

*ये दौलत भी ले लो*

*ये शोहरत भी ले लो*

*भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी*

    *मगर मुझको लौटा दो*

   *बचपन का सावन*

    *वो कागज की कश्ती*

    *वो बारिश का पानी*

    *सिरतोन वो जिंदगी अनमोल रहिस | जब चउमास के पहिली बारिश होवय,तब गांव बाहिर के खेत-खार, डबरा-तरिया म ओंय-ओंय के आवाज करत  करिया-पींवरा भिंदोलवा ला खेलौना बना के खेलत रहेन | पहिली तो बेसरम के सुटिया ला पटक-पटक के ओमन ला बीदारत रहेंन,जब ओ भींदोलवा मन चंग-चंगौहन पानी भीतरी कूदत रहीन,तव हमू मन ओ डबरा के चारों मुड़ा दौड़-दौड़ के कुदावत रहेन | फेर कोनो ल रस्सी म बांध के चल बईला, चल बईला कहिके आनंद लेवत रहेन*

 *

    *जब कोनो तरिया-पोखर  नदियां म तऊड़े लाईक पानी हो जाय, तब खूब तऊड़-तऊड़ के मजा लेवत रहेन, तऊड़त-तऊड़त आंखी लाल हो जाय !  फेर हम ला कुछू बात के चिंता-फिकर नइ रहत रहिस | जब घर पहुंचत रहेन, तव बुढ़ीदाई ह हमर आंखी ल लाल-लाल देखत रहिस, तब खूब खिसियावै-डबरा म तैं खूब तऊड़े हस का रे ?  तऊड़े हस के नहीं ? अउ तड़तड़ौहन अउहर-चउहर ल थपरा मारे, अउ कहै- अब झन तऊड़बे ,वो तरिया म खूब जोखवा हवय ! समझे के नहीं ?    

      तब हव दाई कहन अउ बिहान दिन फेर कोनो संगी-साथी ल देख के फेर तऊड़त रहेन | 

     *नवा अउ गंदला पानी म तऊड़े से कई बार सर्दी-बुखार हो जाय, फेर हम ला कहां ये सब बात के ग्यान रहिस ?*

     *जब पढ़े बर स्कूल जावत रहेन, तव बरसत पानी म भींजे के मजा लेवत रहेन | पांव म चप्पल-जूता नइ रहत रहिस, गली-खोर म नहर सहीं बोहावत पानी म छपाक-छपाक रेंगे के मजा ही कुछ अलग रहै | सिरिफ हमर पुस्तक-कापी भर झन भींजे सोंच के मोरारजी भाई देसाई ब्रांड राखड़-यूरिया के बोरी ल डबल मोड़ के मुड़ी ले पीठ डहर तोप लेवत रहेन अउ छपाक-छपाक रेंगत पढ़े जावत रहेन |*

     *सावन सोमवार के दिन हाफ डे के बाद छुट्टी हो जावत रहिसे, तब पारा-मुहल्ला म कोनो किसान के रोपा लगाए बर जावत रहेन, तव बीस पैसा, या कोनो चार आना देवत रहिन | वो बखत जेब म एक पैसा,दू पैसा, तीन पैसा, दस पैसा, बीस पैसा, चार आना, आठ आना कभू एक रूपीया धरे रहन, तव खूब पैसा धरे हौं, तईसे लागै*

     *वो बखत आठ काड़ी वाला छाता ह आठ आना अउ बारह काड़ी वाला छाता ह बारा आना म मिलत रहिस, तभो ले खूब महंगी हवय कहिके बीसावत नइ रहेन | हमर गुरूजी या गांव के कोनो मनखे  मन छाता ओढ़े रहत रहिन, तऊन मन ल  खूब पूंजीपति समझत रहेन*

     

    * *कोनो दिन स्कूल ले पढ़ के आते साथ दौड़त गली डहर भाग जावत रहेन, फेर सबो संगी जुरिया के बीच गली के चौरा म नदी-पहाड़ खेलत रहेन | कोनो दिन भौंरा-बांटी, डंडा-पचरंगा, गिल्ली डंडा खेल ला  खूब बिधून हो के खेलत रहेन*

      

     *कभू जम्मो संगवारी जुरिया के अपन दूनो हाथ ल भुईयां म पल्टी राखत रहेन अउ एक गड़ी ह गीत गावत कहै :-

*अटकन बटकन दही चटाका*

*लउहा लाटा बन के काटा*

*तुरू-रूरू पानी आवै*

*सावन म करेला फूटै*

*चार-चार बिटिया गंगा गईन*

*गंगा ले गोदावरी*

*पाका-पाका बेल खाईन*

*बेल के डारा टूट गे !*

*भरे कटोरा फूट गे ,!!*

*मुड़ म बांधे पागा*


*गोपाल सिंह राजा*

   कभू सब गड़ी गोल घेरा बना के खड़े रहत रहेन अउ एक झन संगवारी ह  सब सहेली मन  ल कविता/गीत सुनावत रहिस  :-

     *

*अक्कड़ बक्कड़ बाम्बे बोल,,,*

*अस्सी नब्बे पूरे सौ*

*सौ मिलाकर धागा*

*चोरी करके भागा !!*

       *फुर्र -फुर्र*.........


*कभू सब संगवारी जुरिया के एक-दूसर के हाथ ल पकड़  के गोल खड़ा हो जावत रहेन अउ बीच म एक संगी खड़े रहै तऊन ह जोड़े-जोड़े हाथ ल छू के कहै :-

*अतका-अतका पानी*

*घोर-घोर रानी*-२

*घुठवा अतका पानी*

     *घोर-घोर रानी*

*माड़ी अतका पानी*

       *,घोर-घोर रानी*

*कनिहा अतका पानी*

      *घोर-घोर रानी*

*छाती अतका पानी*

     *घोर-घोर रानी*

*नरी अतका पानी*

     *घोर-घोर रानी*

*मुड़ी अतका पानी*

     *घोर-घोर रानी*

*पोरीस अतका पानी*

      *घोर-घोर रानी*


*एमा ले जाऊंगी*?

     *ताला लगाऊंगी*

*एमा ले जाऊंगी ?*

      *कुंडी लगाऊंगी*

*एमा ले जाऊंगी ?*

   *बहिरी मुठिया मारूंगी*

*एमा ले जाऊंगी ?*

   *डंडा लगाऊंगी*


तब वो बीच खड़े वाला गड़ी ह जोड़े हाथ के तरी ले बुलक के भागै, तब सब संगी ओला कुदाते हुए कहैं-पकड़ो पकड़ो पकड़ो ..........


   *कभू गिल्लीअअ(इब्बा)-डंडा खेलन, कभू डंडा-पचरंगा खेलते रहेन :-

      ( *चाक पक्की*)

    *कभू एक कमरा म कोनो स्लेट, पट्टी, पल्ला या भीथिया (दीवाल) म एक गड़ी द्वारा चाक या बत्ती ले कई कोरी छोटे-छोटे लकीर खींचे रहन अउ दूसरे गड़ी जऊन आने खोली म चाक/बत्ती ले कई कोरी लकीर खींच के छुपाए रहन, तऊन ल खोझे बर बुलावत रहेन | एक-दूसरे के खींचे लकीर ल जतेक देखाऊ पावत रहेन, ओतेक सब ल चाक से काट देवत रहेंन, अउ जितना लकीर बांचे रहै वोला  गिनती करके ओतके मुटका हरू-हरू मारत रहेन | ए ला "चाक-पक्की" खेल कहत रहेन*

   *ये जम्मो खेल मन ल चऊमास म ज्यादा खेलत रहेन*

    *जब सावन महीना म रंग-बिरंगी तितली अउ फुरफुंदी ल उड़ावत देखन, तव ऊंकरो संग खेले के मन होवय | रंग-बिरंगी तितली ल पकड़ के खूब आनंदित होवत रहेन |*

    *एक विशेष बात अउ सुरता आवत हवय-"पकड़े रहन तऊन फुरफुंदी ल मार के छोटे से गड्ढा म गड़िया देवत रहेन अउ मन म जिग्यासा रहै के बिहान दिन वो फुरफुंदी या तितली ल खोद के देखबो,तब वो ह पैसा बन जाही ! लेकिन ए ह सिरिफ भ्रम मात्र आय, कभू एको पैसा हम ला नइ मिलीस !*

   

  *चऊमास म झुंड के झुंड उड़ावत कोकड़ा ल देख के कहत रहेन-"चाउर दे कोकड़ा, चाउंर दे कोकड़ा-चाउंर दे कोकड़ा ......  जब कोकड़ा मन उड़ते-उड़ते दूरिहा चले जावत रहिन, तब अपन हाथ के ऊंगली के नाखून मन ल देख के कहत रहेन-"ए दे कोकड़ा ह मोला चाऊंर देहिन हवंय*! 

    *कभू-कभू खाली-खाली माचिस ल जोड़ के रेलगाड़ी बनावत रहेन, तव कभू दूं ठन खाली माचिस के बीच म लम्बा सुतली बांध के दूसरे छोर से संगी-साथी मन हलो-हलो कहैं, तब अईसे लागत रहिस-सिरतोन म टेलोफोन से बात करत रहेन, जबकि वो बखत हमन टेलीफोन देखे-सुने नइ रहेन | ये खेल ह हमर जिग्यासू प्रवृत्ति या वैज्ञानिक विचार के प्रथम लक्षण कहे जा सकथे* |

      *अषाढ़-सावन महीना म पतंग उड़ाए के आनंद खूब मिलै | पतंग जतके दूरिहा उड़त जावत रहिसे, हमर इच्छा अभिलाषा अउ कल्पना के उड़ान ओतके उंचाई उड़ते जावत रहिस*

      *सावन सुदी पंचमी (नागपंचमी) के दिन विशेष रूप से कबड्डी,कुश्ती खेले के आनंद खूब मिलै*

      *वो दिन नोनी मन गांव के गुंड़ी (चौपाल) म खो-खो प्रतियोगिता खेल के खूब आनंदित होवत रहिन*

      *तईसने सावन लगते ही तलाव खाल्हे अमरैया म आमा के डाली म रस्सी बांध के नोनी मन सावन झूला के खूब आनंद लैवत रहिन अउ वोही आमा तरी रेहचुल गड़े रहै,तेमा झूल के खूब मज़ा मिलत रहिस*

    *चऊमास महीना म जब करिया-करिया बादल उमड़ै, ज़ोर-जोर से पुरवाई हवा चलै, तब चिरई-चिरगुन मन अटखेलिया करते हुए खूब कलाबाजी करते हुए आसमान म उड़ावैं," तब चिरई-चिरगुन मन ल उड़ावत देख के मोरो मन होवय-मैं भी आकाश के ऊंचाई म खूब दूर तक उड़तेंव !" एही सोच के मैं भी अपन दूनो हाथ म छोटे-छोटे सुपेली ल बांध के आसमान म उड़े के कोशिश करेंव, फेर सफल नइ हो सकेंव, मोर मन आज तक एही भावना भरे हवय-"आसमान के खूब ऊंचाई म उड़ते हुए जातेंव, लेकिन ए अभिलाषा ह अभी तक पूरा नइ हो पाए हवय, पता नहीं कब पूरा होही ?*


(दिनांक-१८.०७.२०२२)


    आपके अपनेच संगवारी

*गया प्रसाद साहू*

   "रतनपुरिहा"

मुकाम व पोस्ट करगीरोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)

पिन-४९५११३

मो नं-९९२६९८४६०६

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पत्र अउ पत्रिका म अंतर..

 पत्र अउ पत्रिका म अंतर.. 

    छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास म जब कभू पहला 'पत्रिका' प्रकाशित होए के बात होथे, त 'छत्तीसगढ़ी मासिक' या फेर 'छत्तीसगढ़ी सेवक' के नॉंव लिख दिए जाथे. मोला लागथे, पत्र अउ पत्रिका के प्रारूप म तकनीकी रूप ले का अंतर होथे, एला समझे बिना अइसन लेखन ह सही नइहे.

    असल म 'छत्तीसगढ़ी मासिक' अउ 'छत्तीसगढ़ी सेवक' ए दूनों ह 'पत्र' के श्रेणी म आथे 'पत्रिका' के नहीं.

     पत्र या पत्रिका प्रकाशन के मानक म वोकर आकर-प्रकार, पृष्ठ संख्या अउ बाइंडिंग या केवल फोल्डिंग आदि ल घलो चेत करे जाथे.

    आजकल प्रकाशित होने वाला दैनिक अखबार जेला सामान्य बोलचाल म 'समाचार पत्र' घलो कहिथन. ठउका अइसने एकर आधा साईज वाला छपे अखबार ल घलो 'पत्र' ही कहिथन. हमन प्रेस के भाषा म एला 'टेबलाइज्ड' घलो कहि देथन. असल म 'छत्तीसगढ़ी मासिक' अउ 'छत्तीसगढ़ी सेवक' ए दूनों मन इही श्रेणी म आथें. काबर के वोमन चार या आठ पेज के टेबलाइज्ड साइज म फोल्डिंग वाला छपत रिहिन हें. जबकि 9 दिसंबर 1987 ले चालू होए मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' सही मायने म 'पत्रिका' रिहिसे. मयारु माटी ह शुरू म चालीस पेज के आजकल प्रकाशित होने वाला 'इंडिया टुडे' जइसे आम पत्रिका मन के साइज (प्रेस के भाषा म एला डेमी 1/4 साइज कहे जाथे) म छपत रिहिसे. बाद म एला 36 पेज के 20×30 के 1/8 साइज म छापे गिस. 

    इही ह पत्रिका के मानक आय, जेहा कम से कम तीस या वोकर ले जादा पेज के बाइंडिंग वाला होय. ए मानक म 'मयारु माटी' ही छत्तीसगढ़ी भाषा के पहला मासिक पत्रिका कहलाही, जबकि पहला पत्र कहे म 'छत्तीसगढ़ी मासिक'.

-सुशील भोले

बराती समीक्षा अउ साहित्यिक मूल्यांकन

 बराती समीक्षा अउ साहित्यिक मूल्यांकन 

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       बुधियार लिखइया , पढ़इया मन चिटिक धीर धरके मोर विचार ल पढ़े के कृपा करिहव भाई ! रिसाये , बौछाए के मौका आपमन ल मिलही त अपन विचार ल लिखहव । आजकाल छत्तीसगढ़ी साहित्य मं बहुत अकन किताब के समीक्षा लिखावत हे त समीक्षा गोष्ठी घलाय आयोजित होवत  रहिथे काबर के किताब लिखइया तो दिनोंदिन बाढ़त जावत हें एहर बड़ खुशी के बात आय । गुने लाइक बात एहर आय के जौन किताब के विमोचन होथे या जेन किताब के परिचर्चा होथे या जेन विद्वान साहित्यकार के जन्मशती या कोनों के व्यक्तित्व अउ कृतित्व उपर चर्चा करे जाथे ओकर सम्पूर्ण समीक्षा होए पाथे का ? कमी बेशी उपर चर्चा होथे का ? समकालीन साहित्य संग चर्चित किताब अउ लेखक के तुलनात्मक चर्चा करे जाथे का ? 

नहीं .. जी ...सिरिफ गुणगान होथे चलव इहां तक भी ठीक हे मरन हो जाथे जब समीक्षा के गुण धर्म डहर समीक्षक ध्यान नइ दे पांवय । फरिया के कहिन त कविता हे त लक्ष्मण मस्तूरिया या शकुंतला शर्मा के बाद उही सर्वश्रेष्ठ हे , गद्यकार हे त डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा या नन्दकिशोर तिवारी ले कम नइये अरे भाई !समीक्षा के शिखर या समकक्ष के बीच भी तो लिखइया हंवय न ? कोनो प्रतिमान गढ़े ले जादा जरूरी हे हंस असन नीर क्षीर विवेकी होना जेला  कहि सकत हन समीक्षक द्वारा दूध के दूध पानी के पानी विवेचना । जब तक लेखक या साहित्यकार के कृतित्व के सम्यक समालोचना नइ होही खेत के खर पतवार के निंदाई कइसे होही ? पहिली कृतिकार के गुण दोष के मूल्यांकन होवत रहिस , फुटकर रचना मन के जांच सम्पादक मन करत रहिन त जेन रचना पाठक तक पंहुचाय ओहर दग दग ले धोवाए मंजाए रहय । पाठक मन भी श्रेष्ठ साहित्य अउ साधारण साहित्य के अंतर ल समझे पांवय फेर आजकाल साहित्यकार मन अइसन समीक्षा ल नइ भावयं तभे तो आलोचना ल आरोपण समझे जावत हे एकर खिलाफ़ कोनो समीक्षक गुन दोष लिखही या परिचर्चा मं बोलही त जनम भर बर आपसी मनभेद हो जाथे , हमन मतभेद ल मनभेद बना लेथन । श्रेष्ठ साहित्य रचना के रस्ता के बड़का बाधा इही सोच हर आय । धीरे धीरे आज के दिन मं प्रगतिशील अउ जनवादी विचारधारा मन समीक्षा के उपनिवेश बनाए धर लिहिन त दूसर डहर आज के समीक्षा मं कुलीनतावाद अउ जनवाद के भरत मिलाप घलाय देखे बर मिले लग गए हे । 

      साहित्य घलाय हर बाजारवाद के चपेट मं आ गए हे दूसर मरन के गम्भीर साहित्य के पढ़इया दिनोंदिन कमतियावत जात हें । मैं अकवि जरुर आंव फेर निछक कविता हर साहित्य के भंडार भरे मं सक्षम कभू नइ हो सकय ...गद्य हर सामाजिक , राजनैतिक , साहित्यिक , तात्कालिक परिवेश , परिस्थिति के दर्पण होथे ।समीक्षा विधा हर गद्य के सबले जरुरी विधा आय जेकर से कालजयी साहित्य के निर्धारण होथे । बराती समीक्षा माने तो इही होइस न के तैं मोर कृति के गुणगान कर मैं तोर प्रशंसा के शंखनाद करिहंव । एतरह के बराती समीक्षा के चलते साहित्यिक , सांस्कृतिक मूल्य अउ मूल्यांकन प्रक्रिया दूनों बाधित होही न ? एकरे बर कहत हंव के आज बाजारवादी समीक्षा ले बांहचे के जरुरत हे । समीक्षा बर प्रस्तुत कृति के संगे संग दूसर कृति या कहिन साहित्य के गहन अध्ययन जरुरी हे ,एकरो ले बड़े बात के जे समीक्षक हर जतके जादा आने भाषा के साहित्य ल पढ़े , गुने रहिही ओकर समीक्षा हर प्रस्तुत कृति के ओतके गम्भीर समीक्षा करे सकही । 

    सबले बड़े अउ जरुरी बात के समीक्षा  हर वैचारिक मतभेद आय एला मनभेद कभू झन बने देइ तभे हमर साहित्यिक समीक्षा हर बराती समीक्षा होए ले बांचही । किताब विमोचन अउ किताब परिचर्चा दूनों के अलग अलग आयोजन हर समीक्षा विधा ल फेर प्रतिष्ठित करही काबर के किताब विमोचन हर तो किताब के जन्मदिन समारोह आय जेमा हांसी खुशी मनाथन । 

आजकाल साहित्य परिषद मन के कमी तो है नहीं ...त इन साहित्य परिषद मन के घलाय तो जिम्मेदारी आय के बीच बीच मं निछक समीक्षा गोष्ठी के आयोजन करे जावय ...। 

     सरला शर्मा