Wednesday, 10 August 2022

छत्तीसगढ़ के गांव म तरिया के महत्व- लखनलाल लहर


फोटो- मोखला(राजनांदगांव) के तरिया


छत्तीसगढ़ के गांव  म तरिया के महत्व 

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हमर गंवई गांव म तरिया के गजब महत्व हे ।ये हा निस्तारी के प्रमुख साधन आय।कोनो भी गांव रहय उहां तरिया के सुघरई गजब रहिथे।बर अउ पीपर के छांव ,चारोडहर घाट घठौंदाअउ पचरी । पानी म खोखमा के फूल,बगल म मंदिर।तरिया के पार म पयडगरी रद्दा ।पानी म उछलत मछरी ,बीच तरिया म अगास ल निहारत सरई लकड़ी के खंभा ।पनबुड़ी   चिरई,कोकड़ा,बतख मन के मछरी बिनई।कुरता अंगरखा ल धोए के छप छप आवाज ।डुबकत लइकामन के किलील कालल ।पार म बइठे गरी खेलइया मन ने फुसुर फासर तरिया के सुघरई ल अऊ बढ़ा देथे ।हमर गांव मोखला ले चार कि.मी.दूरिहा  सुरगी गांव म तरिया के ऐतिहासिक महत्व हे इहां के सियान मन बताथे कि सुरगी म छै आगर छै कोरी मने एक सौ छब्बीस ठन तरिया रिहीस  जेला तइहा जमाना म ओड़नीन ओड़ियामन कोड़े रिहीन एखर उल्लेख लोकगीत अउ दसमत कैना लोकगाथा म घलो मिलथे ।सुरगी म अभी भी अब्बड़ अकन तरिया हे फेर कतको पटा घलो गे अउ कतको ह अतिक्रमण के चपेट म सिरागे ।सुरंग के निसान के सेती ए गांव के नाव सुरंगी पड़गे बाद म धीरे धीरे इही सुरगी के रूप म प्रचलित होगे।


तरिया हमर ग्रामीण सामाजिक संस्कृति के परिचायक आय ।एखर ले हमन अपन संस्कृति ,रीति रिवाज,धार्मिक परंपरा ,उत्सव धर्मिता अउ सामाजिक परंपरा ले जुड़थन ।पहिली जमाना म तरिया निस्तारी के मूल साधन रिहीस ।आज के नवा पीढ़ीमन सुविधाभोगी हो गेहे तरिया म नहायेबर ढेरियाथें।बड़बिहनिया ले पहिली नीम,बंबूलअउ करंज के दतोन धरके तरिया नहायबर जावय ।नहाय के बाद सुरूज देवता ल प्रणाम करय अउ लोटाभर पानी तुलसी चौरा म रूकोवय तब कोनो दूसर बुता ल करय ।

तरिया म कोनो भी जग जंवारा ,भोजली,गौरी गौरा के संग संग मूर्ति के विसर्जन घलो करथन ।मरनी हरनी माटी ,तिजनाहवन ,दसकरम के सबो नेंग तरिया म करे जाथे ।छट्ठी बरही तिहार बार के दाई बहिनीमन चुरोना घलो कांचथे ।राउत भाई मन तरिया म बरदी ल पानी घलो पियाथे ।तरिया ह गरमी के दिन म  सरी मंझनिया भइसा अउ पंड़िया पंड़वा मन के माड़ा बने रहिथे।किसान मन अपन गरवा बछरु, बइला भइसा ,रापा कुदारी ,नांगर बक्खर ल घलो धोथे ।


गांव म तरिया के नाव ल विशेषण ,उपयोगिता रहन सहन ,वातावरण,भौगोलिक अउ ऐतिहासिक आधार ले आने आने नाव ले पुकारथे ।जइसे शीतला तरिया,बूढ़वा तरिया, बांधा तरिया,नवा तरिया,आमा तरिया,पैठू तरिया,डबरी तरिया,बड़े तरिया,दर्री तरिया,परेतीन तरिया,भूतहा तरिया,कोगी तरिया,चौहान तरिया ,भूलिन तरिया,केकती तरिया,कटहर तरिया,गौंटिया तरिया,पितरपाख म हमन कुश,तोरईपान,उरीद के दार चांउर ,दतवन धरके  तरिया म जाथन अउ नहाय के बाद रक्सहूं डाहर मुहूं करके अपन पितर देवता ल पांच पसर पानी देथन सिरतोन म हमर गांव के तरिया हमन ल अपन पुरातन संस्कार ले घलो जोड़थे।


तरिया म मछरी पालन के संगे संग ढेंस ,सिंघाड़ा घलो लगाथन जेखर से हमर गांव ल आमदानी घलो होथे।तरिया पार के आमा, अमली,गंगा अमली,बोईर  ह पर्यावरण के सुघरई ल तो बढ़ाबेच करथे फे‌र हमला फरिहर हवा  के संग आमदानी घले देथे।तरिया के पार म चरोटा,चिरचिरा,करमोता,पोंई भाजी ,चिरइया फूल,भेंगरा,दूबी,कुकुरमुत्ता,फुड़हर,धतुरा,ग़ोड़ेली जइसन कतरो भाजी अउ औषधीय गुन वाले छोटे छोटे पौधा मन उपयोग बर बखत बेरा म सहजरूप म मिल जाथे।


 तरिया ह कतरो जीव जंतु के पालनहारअउ संस्कृति के सँउहत सागर आय।तरिया ह हमला एक दूसर के सुख दुख,लोक व्यवहार,खेती किसानी,मीत मितानी,घर परिवार ,सगा सोदर ,सोर खबर समाज ,संस्कृति, तिहार बार ले घलो जोड़थे ।ये हा संचार के बड़का माध्यम घलो आय जे तइहा ले चले आथे ।सिरतोन म तरिया हमर बर गंगा गोदावरी ले घलो ज्यादा उपयोगी हे ।सब  ल  निश्छल अउ फरिहर मया बाँटत , भाई चारा अउ सामाजिक-सांस्कृतिक एकता के संदेश देथे हमर गांव के तरिया ।


            लखनलाल साहू "लहर"

      ग्राम मोखला ,पो.भर्रेगांव

     जिला राजनांदगांव 

     मो.9630312197

Sunday, 7 August 2022

का होथे नंगमत..


 

का होथे नंगमत..


हमर छत्तीसगढ़ के मनखे मन भारी मयारू होथे, रुख-राई,सांप-सेरू, चिरई-चुरगुन, माटी,नदी पहाड़, सब ल पूजथे। 

हमर छत्तीसगढ़ म आनी बानी के लोक कला अउ संस्कृति भरे हे। जेला पुरखा पाहर के सियान मन अउ उँकर नवा पीढ़ी मन सहेज के राखे हे, जेहा अपन उचित दिन तिथि म आयोजित होथे।  अउ सब ओकर ले जागरूक होथे कि ये आयोजन करे के का महत्व हे अउ का लाभ हे...

इही लोकसंस्कृति के एक झलक हमर गाँव म घलो देखे बर मिलथे। 

 हमर गाँव आँकडीह मा नांगपंचमी के दिन भारी नंगमत खेलथे।

साक्षात् मनखे रूप म

नांग,नांगिन,डोमी,असढ़िया, अहिराज,बेल्या करैत,घोड़ा करैत मुड़हेरी, पिटपिटी साँप मन नंगमत नाचथे अउ खेलथे। जेला देखनी उठ जाथे।

गाँव के सियान अउ जवान जवान टूरा मन लगती सावन के दिन ले *नंगमत* नाचे, अउ गाय, अउ तिहार मनाय के तियारी सुरु कर देथे।

सावन महीना के अंतिम  तिथि म हमर लोकसंस्कृति परम्परा म एक प्रसिद्ध लोक परब नांगपंचमी के तिहार होथे ये तिहार म हर घर के सियान, अउ किसान मन होत भिन्सार के अपन खेत खार के पार मुँही के

साँप अउ ओकर डीलवा (साँप की बांबी) म दूध लाई चढ़ाके, छेना अँगरा मा हुम्-धूप देके अपन इस्ट देवता ल सुमर के पूजा- पस्ट करथे, ताकि घर बन के कमईया मन ल साँप बिच्छू झन चाबय अउ आसीस बने रहय।

साँझ के गाँव के सतनामी समाज, बइगा अउ सियान -जवान बाबूपिला (पुरुषवर्ग) द्वारा *नंगमत* करे जाथे। नंगमत के सुरुआत गाँव के ठाकुर देवता,  छईहा, भुइँया, अउ मेड़ो देव, बइगा, अउ अपन ईस्ट देवता के जय बोलाके करथे।

नंगमत, नाग नांगिन के नृत्य आय जेमा बइगा अउ उँकर बाहुक द्वारा नाचने वाला के कान म एक निश्चित समय तक बर विशेष मंत्र फूँक के साँप के गुन ल चढ़ाय जाथे अउ उतारे जाथे,  जेमा आनी- बानी के मांदर झाँझ, दोहा, गीत बजाथे जेकर धुन म जइसे साँप ह नाचथे, अटियाथे, फुमकारथे, अउ सलँगथे वइसने नंगमतिहा मन नाचथे। नंगमत के दोहा गीत मांदर झाँझ ह मन ल मोह लेथे, अउ पूरा सुने बिना ये मन नई करय अउ जब समापन के बेरा होथे त थोकुन अउ होतिस तइसे मन लगथे।

जेला देखे बर गाँव सहित तिर-तखार के गाँव वाले महिला, पुरुष, नोनी,बाबू मन देखे अउ सुने बर आथे। अउ अपन घर बर नांगजरी पाय के आस करथे

नांगजरी ह भारी दवई आय साँप के जहर उतारे के, ये जरी ल पारखी नजर वाला सियान मन ही चिन्हें सकथे, येला जमीन के अंदर ले निकालथे, ये जरी ह निकाले के बेरा सोनहा रंग के होथे अउ सुखाय के बाद बिल्कुल साँप के सरीर कस दिखथे

अउ ये जरी ल अब्बड़ पबरीत माने जाथे।

कई झन के घर म छाँव कुछाँव, दोष, डर के नास करे बर इही नंगमत के नांगजरी ल घर के सिंगद्वार म खोचे जाथे ताकि घर म सुख सांति बने रहय।

येकर महिमा ल नंगमत म बखान कर करके गाथे अउ नाचथे

अंत म पंथी नाच के येकर समापन करे जाथे, जेमा फरहरी, लाई, अउ नांगजरी के परसाद देथे..!


नंगमत मुख्य रूप ले वो बइगा मन के द्वारा करे जाथे जेमन सांप चाबे के जहर उतारे के काम करथँय अउ जहर उतारे बर जड़ी जांगड़ा अउ मंत्तर के प्रयोग करथैं ।

जेमन सांप के जहर उतारे के मंत्तर सीखे रहिथे तेमन ल कहूं दस कोस म भी सांप चाबे के सूचना मिलथे त वोला देखे ल जाय के नियम रहिथे ।


*रचनाकार*

*सुनीता कुर्रे*

मु-आँकडीह(मस्तूरी)

मो न-7974172659


छत्तीसगढ़ के गंवई-गांव के पुरातन मशीन/औजार


 *//छत्तीसगढ़ के गंवई-गांव के पुरातन मशीन/औजार //*

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     *छत्तीसगढ़ के गांव-घर म खेती-किसानी  अउ निस्तारी के औजार/मशीन मन आज कई प्रकार के आधुनिक कृषि यन्त्र के आविष्कार होय ले इंकर उपयोगिता ह कुछ कमती भले हो गए हवय लेकिन अनुपयोगी कभू नइ होवय |  कुछ औजार के उल्लेख जैसे :-*

*नांगर*- *जब कोनो खेत म ट्रेक्टर नइ जाय सकय, या धान बियासी के काम नांगर -बैला से ही संभव होथे*

*बैल गाड़ी*- हर किसान अउ हर परिस्थिति म ट्रेक्टर उपयुक्त नइ रहै,तब बैल गाड़ी ही काम आथे |

*बेलन*- धान मिजाई बर ट्रेक्टर के अभाव म बेलन ही उचित साधन होथे |

हार्वेस्टर थ्रेसर के अभाव म हाथ पंखा सदा दिन उचित साधन आय |

*जंतवा,ढेकी*- आज गांव-गांव म हालर मिल अउ आटा चक्की उपलब्ध हवय,लेकिन सूदूर वनांचल गांव म कोनो -कोनो घर म ढेकी,जंतवा उपलब्ध हवय, एकर उपयोगिता आड़े बखत म सदा दिन बरकरार रहिही |

*मंगठा*- बड़े -बड़े कपड़ा मिल स्थापित होय ले अउ टेरीकाट,टेरीलीन कपड़ा निर्माण होय लगिन जउन सस्ता म उपलब्ध हो जाथे, लेकिन सैकड़ों -हजारों साल तक खादी/सूती कपड़ा हमर पुरखा मन बउरत रहिन | एक जाति विशेष कोष्टा अउ कोरी मन के कई पुरखा तक "मंगठा" द्वारा कपड़ा बुनाई करके जीविका के मुख्य साधन रहिस | 

*चाक*- कुम्हार जाति के कतको मनखे आज भी "चाक" के माध्यम से देवारी तिहार बर दीया अउ बिहाव संस्कार बर कलश करवा, नांदी,दीया अउ गर्मी के दिन म ठंडा पानी पीए बर करसी, सुराही के निर्माण करथें |

*तेल घानी*- हमर पुरखा मन कई पीढ़ी तक "तेल घानी" से तेल पेरत रहिन अउ ऐतराब भर शुद्ध तिल तेल, अरसी, सरसों, मूंगफली तेल के पूर्ती करत रहिन, लेकिन अब बिजली से चलने वाला तेल घानी स्थापित होय ले हमर जीविका के मुख्य साधन "तेल घानी" ह नंदा गईस!

   * *अब कोस्टा घर कोस्टउंहा नहीं*

     *तेली घर पेरल तेल नहीं*

     *पुरखौती बूता लुटा गे*

    *रोजगार एको -अधेल  नहीं*!!


   *सिलौटी*- मिक्सी ग्राईंडर मशीन के आविष्कार होय से "सिलौटी" के उपयोगिता भले कम हो गए हवय, लेकिन मिक्सी म पीसे चटनी,उड़द दाल के बड़ा के तुलना सिलौटी म पीसे चटनी अउ बड़ा के सेवाद कई गुना जादा होथे |

    "जब घर म कुछु दु:ख-सुख के काम रहिथे अउ चटनी,दाल ल मिक्सी म पीसे बर बिजली गुल रहिथे, तब अंततः सिलौटी म चटनी,दाल पीस के काम ल पूरा करथैं |

    *अर्थात आड़े बखत म (अड़चन के समय) "सिलौटी" ह खूब उपयोगी मशीन के काम आथे*

*लोदर*( गोलर) बैला गाड़ी म बांस के बने हुए बड़े भारी टोकरा होथे, जेमा किसान मन गोबर खातू-कचरा ल भर के अपन खेत म पलोथें, साथ ही ए लोदर के द्वारा कतको उपयोगी सामान ल गाड़ी म भर के लाना ले जाना के काम करथें | ये बांस के बने बड़े भारी टोकरा ल हमर बिलासपुर जिला म "लोदर अउ गोलर" कहिथैं |


*टट्टा*- बैल गाड़ी म घाम-पानी से बांचे खातिर अउ गाड़ी म भरे सामान के सुरक्षा खातिर बड़े भारी गोल घेरा वाला बांस के बनाय रहिथे, तेला "टट्टा" कहिथैं | अब बैला गाड़ी के उपयोग कमती होवत जाथे,तेकरे सेती "ये टट्टा" नंदावत जाथे |

*चतवार*-खेती-किसानी के बूता बर रांपा,कुदारी, गैंती, झउहा के साथ-साथ लकड़ी/बांस के लंबा लाठी होथे, जब खेत म पानी भर जाथे, रोपा-बियासी हो जाथे | तब मेड़-पार ल खने-पाटे बर गैंती,रांपा,रपली कुदारी के जरूरत नइ रहय | कोनो जंघा भुलका  ले पानी निकलत रहिथे या मुंही के माटी बोहा के पानी निकलत रहिथे,तऊने ल सुधारे बर किसान मन "चतवार" के द्वारा माटी खनके भुलका या मुंही ल बांध देथैं |

*चरखा*-  आज ले चालीस-पचास बच्छर पहिली  गांव-गांव म कुसियार बोवात रहिस, तब बड़े-बड़े चरखा ले कुसियार पेरत रहेन | अब  अधिकांश किसान मन अलाल हो गईन, सिरिफ धान के फसल लेथें,उन्हारी तिवरा,गेहूं,राहर,तिलहन,दलहन फसल ह बेंदरा के मारे नइ बांचय | 

    तईसने कुसियार के नगदी फसल बर किसान मन चेत नइ करैं | तेकरे सेती गाव-गांव "चरखा" अउ गुड़ चुरोए के "कराव" (बड़े भारी कड़ाही) अब नंदावत जाथै | कोनो -कोनो क्षेत्र म अभी भी कुसियार उगाए जाथे, व्यापक क्षेत्र सिमट गे,  आज के लईकन मन "चरखा "अउ "कराव" ल नइ जानै |


*सार बात आज बड़े -बड़े कारखाना, कई प्रकार के आधुनिक मशीन के आविष्कार अउ शहरीकरण प्रवृत्ति के कारण गंवई -गांव के पुरातन मशीन/औजार अउ जातिगत व्यवसाय मन खूब प्रभावित होवत जाथे, फिर भी परंपरागत मशीन/औजार जऊन बिना बिजली के काम आवत रहिन,तऊन औजार/मशीन मन आड़े बखत म जरूर काम आथैं, इंकर उपयोगिता सदाबहार होथे*


(दिनांक -०२.०८.२०२२)


गया प्रसाद साहू

"रतनपुरिहा"

मुकाम व पोस्ट करगीरोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)

पिन कोड -४९५११३

मो नं -९९२६९८४६०६

          ९१६५७२६६९६

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छत्तीसगढ़ के गाँव मन मा प्रयोग मा आनेवाला मशीन औजार अउ सामान के नाम, विवरण अउ उपयोगिता-


 

*"छत्तीसगढ़ के गाँव मन मा प्रयोग मा आनेवाला मशीन  औजार अउ सामान के नाम, विवरण अउ उपयोगिता-


*कलारी*- लकड़ी के बने औजार जे धान कोड़ियाये,पैरा अलगाय के काम मा उपयोग आथे। चना, गहूँ,अरसी अउ अन्य फसल ला घलो मिन्जे के बेरा कलारी उपयोगी होथे। ये लम्बा बांस मा कठखोलवा चिरई के मूड़ी बरोबर कोकवानी होथे।


*दॅतारी*- एक ले अधिक दाँता वाले लकड़ी के पाटा। कोदो मा दॅतारी मारे जाथे। छोट/हरु दॅतारी मा धान मिंजत बेरा पैरा ला घलो अलगाये जाथे। एक ठन बाँस मा एक लकड़ी फिट रहिथे,जेमा 7,8 ठन दाँता रहिथे।  भारी ला बइला खेत मा बइला तिरथे, छोट हरु ला मनखे खुदे खिचथे।


*कोप्पर*- कोप्पर लकड़ी के बने रहिथे जे धान, कोदो ला कोपराय के काम आथे। किसान मन कोप्पर ला नेवरिया बइला बछवा ला रेंगें बर सिखाये, खेत/ भर्री ला बरोबर करे आदि काम मा लाथे। एखरे कम वजनी रूप बख्खर कहिलाथे।


*ईरता*- ईरता बाँवत अउ बियासी बेरा उपयोगी होथे। खेत जोतत बेरा नांगर मा लेटा चिपकथे तेला ईरता के उपयोग ले निकाले जाथे, ये छोट लोहा के फरसा बरोबर बइला खेदारे के लउठी के नीचे जोती जुड़े रहिथे।


*आरी/तुतारी*- बइला खेदे के लउठी मा गड़े छोट खीला आरी कहिलाथे, एखर उपयोग बइला भइसा ला कोचे बर करे जाथे।


*चामटी*- बइला खेदारे के लउठी मा बंधे चमड़ा के रस्सी जेमा बइला ला नइ रेंगें ता मारे जाथे।


*खूँटा*- कोठा अउ दुवार मा गाय बाँधे बर भुइयाँ मा गड़े लकड़ी।


*पहुरा*- गाय गरवा बाँधे के अइसन छोट लकड़ी जेखर मुड़ी मा गरवा के गला के रस्सी अउ पूछी मा खूँटा मा फँसाय के रस्सी रथे।


*कोटना*- गरवा मन के पानी पीये के आयताकार पथरा के पात्र।


*धोनाही*- मिट्टी के गोल छोट गगरी जेमा धोवन फेके जाथे। 


*गरदेवा/केनउरी*- गाय गरवा के गला मा परमानेंट बंधे डोरी।


*खड़खड़ी*-  गाय गरवा के गला मा बंधे लकड़ी के घण्टी 


*लांहगर/लादका*- हरहा गाय गरु जे गला मा बंधे भारी लकड़ी।


*बिंधना*- लकड़ी ला मनवांछित आकार देय, छेद करे बर, काटे पीटे बर बिंधना उपयोगी होथे। चौड़ा नोक वाले पटासी बिंधना अउ पतला नोक वाले सुल्लू बिंधना कहलाथे। कई प्रकार के धार वाले बिंधना होथे। 


*बसुला*-  ये लकड़ी ला छोले के काम बर उपयोगी होथे।


*लोहाटी तारा/ताला*- करिया लोहा के जुन्ना ताला जेखर चाबी स्क्रुनुमा रहय।


*सँकरी*- दरवाजा/कपाट मा ताला देय बर लामे लोहा जे साँकल


*टँगिया*- लकड़ी काटे के औजार।


*खुरपी*- बन कांदी निकाले के औजार।


*रापा*- माटी जोरे संकेले के औजार।


*कुदारी*- माटी कोड़े के औजार।


*गैंती*- माटी कोड़े के काम अवइया कुदारी के बड़े रूप।


*हँथौडी*- ये खीला ठोंके के काम आथे, कुछु चीज ला फोड़े फाड़े बर घलो उपयोगी होथे।


*घन*- हथौड़ी के बड़े रूप,जे लकड़ी चीरे, लोहा लक्खड़ काटे बर काम आथे।


*धूम्म्स/धम्मस*-माटी कुचरे या दबाये के लोहा के बड़का पाटा असन औजार।


*छिनी*-लकड़ी फाड़े जे बड़का खीला, ये छोट, मोठ कई प्रकार के होथे।


*रोखनी/रेंदा*- लकड़ी ला प्लेन करे के काम मा आथे।


*भाँवरी/भँवारी*- लकड़ी मा छेदा करे के काम आथे। यहू आकार प्रकार के कई किसम के होथे।


*गिरमिट*- लोहा के औजार जेला घुमा घुमाके लकड़ी ला छेदा करे जाथे।


*हँसिया*- धान,कांदी, बन, दूबी लुवे तोड़े के काम आथे। साग भाजी घलो सुधारे जाथे।


*पैसुल*- सब्जी काटे के काम आथें।


*सब्बल/साबर*- भुइयाँ ला गड्ढा करे के लोहा के औजार।


*आरा/आरी*- लकड़ी चीरे के औजार।


*टेंवना*- लोहा धार करे के पथरा


*ठीहा*- लोहार, बढ़ई के घर गड़े लोहा या लकड़ी के टुकड़ा जेमा रखके लोहा ला पीटे जाथे अउ लकड़ी का काटे छाँटे जाथे।


*निहई*- टेंडग़ाय लोहा ला सोझ करे या मनचाहे आकार देय बर उपयोगी औजार।


*सुम्बा*- सुल्लू जघा मा ठोंकाय खीला खूंटी ला बरोबर करे बर उपयोगी।


*गुनिया*- कोन ला बरोबर मिलाय बर, खिड़की चौखट बनाए बर उपयोगी


*पेन्चिस*- खीला तिरे के काम आथे।


*सुजियारी*- खीला के अनुसार छेद ला बड़े करे के काम आथे।


*कनाछी*- लोहा ला धार दे के काम बर उपयोगी


*धमेला*- घर निर्माण बर उपयोगी लोहा के पात्र


*कौंचा*- घर निर्णाण में गारा मिलाये के काम बर उपयोगी


*फंटी/पाटा*- गारा सीमेंट ला बरोबर करे के काम आथें


*गोली*- ईंट जोड़त बेरा सोझ मिलाये बर काम आथें


*नकवार*- नाक के बाल आदि निकाले के चिमटा


*नाहनी*- नख काटे के औजार


*छूरा*- दाढ़ी बनाये के औजार


*चिमटा/ चिमटी/लोचनी*- आगी बूगी, काँटा खूंटी निकाले के बड़े छोटे लोहा के औजार


*सरोता*- सुपारी काटे के, बड़े हा आमा काटे के काम आथे।


*धुकनी*- लोहार घर रहय जेमा लोहा ला गरम करे।


*चाक*- कुम्हार घर के घड़ा/माटी के समान बनाए के मशीन


*घानी*- तेल पेरे जे मशीन


*टेड़ा/रहट*- पानी पलोये के मशीन।


*मंगठा*-कपड़ा बुने के मशीन।


*चरखा*- सुत काते के मशीन।


*मूसर*- धान/ कोदो छरे के लकड़ी के औजार जेखर तरी मा लोहा लगे होथे।


*बहाना*- बाहना मा ही धान कोदो ल रख के मूसर मा छरे जाथे।


*खलबट्टा/ओखली*- कूटे पीसे के काम बर उपयोगी, लोहा के ओखल।


*डंगनी/ अकोसी*- ऊपर के चीज ला अमरे बर बने बॉस।


*खलिहा*- आमा टोरे के झोला बंधे डंगनी।


*ढेंकी*- ढेंकी धान कूटे के काम आथे, येमा दू तीन आदमी एके संघरा काम करथे। कुछ मन ढेंकी के आघू भाग मा गोड़ ले अघाड़ी ला दबावत जाथे ता कुछ मन पाछू के बाहना मा धान ला डारे निकाले के काम करथें। ये देशी धनकुट्टी घलो कहिलाथे।


*घर लिपनी*- गोबर पानी भराय करसी जेमा घर ला लीपे जाथे, घर लीपे बर प्रयोग मा लाये चेन्द्रा पोतनी कहिलाथे।


*बाहरी*- घर दुवार बाहरे के झाड़ू।


*खर्रा*- कोठा/ बियारा बाहरे के राहेर काड़ी के गुच्छा।


*झंउहा*- गोबर कचरा हेरे, माटी फेके के काम बर उपयोगी बाँस के पात्र।


*सील-लोढ़ा*- चटनी हरदी मिर्चा पीसे बर उपयोगी पथरा।


*जाँता*- गहूँ, चना, अउ अन्य आनाज ला पिसान बनाये के हथ मशीन। कोदो जाँता, पिसान जाँता , ये बड़े छोटे प्रकार के होथे।, जेखर नाम घलो बदल जथे। जइसे जँतली, जँतुलिया,कोदो दरनी।


*पाउ*- जाँता मा लगे लकड़ी जेला धरके गोल गोल घुमाय जाथे।


*टिपली*- मिट्टी तेल रखे के डब्बा


*निसेनी*- चढ़े उतरे के लकड़ी के बने सीढ़ी


*चाँड़ी*- तेल ढारे के उपयोग मा लवइया टिन के नली दार  पात्र


*कुप्पी*- साइकिल,मशीन मा तेल डाले बर ये उपयोगी हे।


*गाड़ा*- बइला गाड़ी, खेती किसानी बर उपयोगी। 


*जुवाड़ी*-नांगर में जुड़ा के बीच के भाग जे मेर डाँड़ी आके मिलथे।


*नाहना*- चमड़ा के डोरी जे जुवाड़ी मेर बंधाय रथे, नाहना जुड़ा अउ डाँड़ी ला बाँधे रखथें।


*पंचारी*- जुड़ा के आखिर भाग के लकड़ी जे मेर बइला फंदाय रथे।


*जोंता*-नांगर जुड़ा के पंचारी मा बंधे डोरी जे बइला ला जुड़ा मा बाँधे रखथें। गाड़ा मा सुमेला मा बंधे रहिथे,अउ बइला ल सके जघा स्थिर रखथें।


*खाँसर*- गाड़ा के छोटे रूप,गांव गौतरी,मेला मड़ई जाय बर उपयोग मा लाये जाथे।


*घांघड़ा*- कौड़ी पट्टी युक्त बड़े घण्टी।


*कसेर गाड़ी*- टट्टा/ चापड़ बंधे गाड़ा।


*कोल्लर/लोदर*- बाँस के  टट्टा जे खूँटा तक  उठे रथे।


*चापड़ा*- गाड़ा मा लगे गोलाकार टट्टा


*नांगर*- हल


*जुड़ा*,- नांगर या गाड़ा के वो लकड़ी जेमा बइला फंदाय रथे, जुड़ा गाड़ा मा हमेशा बंधे रथे, जबकि नांगर मा जुवाड़ी कर नाहना मा बांधेल लगथे।


*बेलन*- अरसी, कोदो मिन्जे बर प्रयोग होवइया लकड़ी के भार युक्त गाड़ी।


*पटनी*- गाड़ा के डाँड़ी मा ठोंकाय पाटा।


*धोखर*- गाड़ा के चक्का के पहली वाले लम्बा पटनी जेमा माई खूंटा रहिथे,अउ बइला ला चक्का कोती आवन नइ देवय।


*खूँटा*- डाँड़ी अउ पटनी ला छेद जे गड़ाये गय बॉस या लकड़ी।


*अघाड़ी*- गाड़ा चक्का के आघू के पटनी।


*पिछाड़ी*- गाड़ा चक्का के बाद के पटनी।


*आरा*- चक्का के मूड मा गुथाये लकड़ी।


*पाठा/पुट्ठा*- आरा मा लगे लकड़ी, पुट्ठा  जुड़के गोल बनथे।


*पट्टा*- पाठा के ऊपर लगे गोल लोहा।


*चीपा*- पाठा अउ पट्टी के बीच गेप ला भरे बर ठोंके गय बॉस के टुकड़ा।


*मुड़*- चक्का के बीच के गोल लकड़ी।


*गुर्दा*- मुड़ मा फिट लकड़ी जेमा असकुड़ लगे रहिथे।


*असकुड़*- दोनो चक्का ला जोड़े बर बने लोहा।


*पोटिया*- असकुड़ ऊपर के बड़े खोल वाले लकड़ी।


*बैसकी* पोटिया ऊपर मा लगे लकड़ी जेमा डाँड़ी माड़थे।


*खीला* - असकुड़ के आखिर मा लगे रॉड, जे चक्का ला छेंके रखथें।


*धुरखिली*- पोटिया पटनी के मुख्य खीला।


*बरही*- डाँड़ी अउ जुड़ा के बंधना।


*धूरा*- गाड़ा के आघू के भाग जेमा दोनो डाँड़ी अउ जुड़ा बंधाय रथे।


*सुमेला*- जुड़ा के छेद मा लगाइया लोहा जेमा बइला फन्दाथे।


*सांकड़/ काँसड़ा*- बइला के गला के डोरी जे नाथ अउ केनवरी ले जुड़े होथे, जेला गाड़ा हाँकइया बइला ला काबू मा करे बर धरे रहिथे।


*केनवरी*- बइला के गला मा बंधाय डोरी।


*नाथ*- वो डोर जेमा बइला नँथाय रथे।


*टेकनी*- गाड़ा के धूरा मा टेकाय जाने वाला लकड़ी। ये गाड़ा ला खड़े करे बर उपयोग मा लाये जाथे।


*ओंगना*- गाड़ा के गुर्दा मा अण्डी तेल/ चिट ला चिकनाहट बर डारे जाथे।


*कंडील*- माटी तेल ले जलइया, काँच के गोल  छेंका मा बरत बाती।


*चिमनी/ढिबरी/भभका*- सीसी मा माटी तेल भरके ढक्कन मा बाती लगाके जराय जाथे।


*गियास*- देवारी तिहार बर कुछु प्लेट ला सजाके दीया ला बार के ऊँच आगास मा टांगना।


*तेल कुप्पी*- साइकिल या मशीन मा तेल डारे के छोटे डब्बा।


*गोरसी*- आगी तापे या आगी का रात भर छेना मा सिपचा/दगा के रखे बर उपयोग मा आने वाला माटी के टोकरी।


*पउला/फूला*- अनाज धरे बर बने माटी के छोटे पात्र


*कोठी*- अनाज धरे के बड़े पात्र


*ओंगना*- कोठी मा धान निकाले बर बने छेदा।


*पर्रा*- बॉस के बड़का पर्री।


*पर्री*- भात पसाये या तोपे बर बॉस के बने तोपना।


*तर्री*- जर्मन के तोपना


*बिजना*- बाँस के बड़े टुकना।


*सुताइल/रोखनी*-  छिले के काम बर उपयोगी।


 *चन्नी/चलनी* -  पिसान छाने के, चाउर चाले के काम बर।


*कोदई धोना*- कोदई धोय के काम बर उपयोगी,ये टिन के होथे।


*झेंझरी*- कनकी,कोदई धोय बर बॉस के टुकनी।


*चरिहा*- बॉस के बड़े टुकनी, धान पान नापे भितराये के काम


*सूपा*- छँटाई, निमराई,धान ओसई के काम बर उपयोगी।


*पउवा*- धान चाँउर नापे के पाव भर डब्बा।


*पैली*- एक किलो के डब्बा।


*काठा*- लगभग चार पैली धरउ लकड़ी या टीना के पात्र।


*झिपारी*- बरसात के पहली कोठ/ पर्दा ला पानी ले बचाये बर छिंद राहेर काड़ी अउ खदर मिलाके बनाये जिनिस। झिपार ले बचे बर घलो झिपारी के उपयोग होथे।


*मइरका*-पेंदी मा माटी छभाय करिया रंग के गगरी, जेमा आनाज आदि धरे जाथे।


*गगरी*- करिया रंग के माटी के बर्तन।


*गघरा गुंडी*- पानी भरके रखे बर ये उपयोगी होथे।


*कलौंजी*- साग राँधे के मिट्टी के बर्तन।


*ठेका*- दार चुरोये के माटी के छोटे बर्तन।


*गिरी*- गगरा, गुंडी ला बने मड़ाय बर जड़ या कपड़ा ला गोल गुरमेट के बनाय जाथे,एखर के गगरा गुंडी उंडे नइ।


*गूँड़ड़ी*- पानी लाने,माटी फेके के समय मूड़ ऊपर उपयोग मा अवइया कपड़ा, जे गोल गुरमेटाय रथे।


*बंगुनिया*- पीतल के छोट बर्तन।


*बटलोईया*- स्टील के छोटे मुंह वाले गोल बर्तन।


*गंज*- पीतल या स्टील के बड़े मुँह के बर्तन।


*गंजी*- पानी भरे,खाना बनाये के जर्मन के बर्तन।


*बॉल्टी*- कुँवा ले पानी निकाले के लोहा बर्तन, आजकल स्टील बाल्टी घलो पानी भरे के काम मा आथे।


*माली/कटोरी/कोपरी*- काँच/ स्टील के बर्तन


कुटेला-कपड़ा धोय या कोनो सुखाय फसल ल कुचरे के काम अवइया लकड़ी के  गोल या चाकर पटिया


मुड़ेसा- कपड़ा ले बने मोठ छोट गोल चाकर गद्दा जेन मुड़ के तरी सोवत बेर उपयोग होय।


चुरोना  - जादा या मोठ कपड़ा ल  धोय बर निरमा म डुबोना।


टठिया-- खाय के थाली जेला थारी घलो कथन


मुड़सरिया-तकिया कोती, मुड़ कोती


गोड़सरिया- गोड़ कोती


ओढ़ना..ओढ़े के


दसना...बिछाए के, बिस्तर


कोपरा ..परात


बटुवा.... भात राँधे के बर्तन


हँउला....पानी भरे के गुंडी या गगरी


मलिया,थरकुलिया...प्लेट..


सइकमी/सइकमा- बासी खाय के बटकी


कुंड़ेरा....माटी के दूध चुरोय के बर्तन..


*सुपेती*....रजाई


*कईधोना*= चाउर धोय के


*होमाही*= हूम देके


*तखत*=बइठे के लकड़ी के बाजवट जेंन सोय के घलो काम आवय


*करची*-जर्मन के बर्तन जेन भात बनाए के काम आथे


*जांँता*-अनाज पीसे के चक्की


*ढकेल गाड़ी* -लइका मन के गाड़ी


*तख्ता*-जमीन में बिछाय वाला,जेमा पहिली दर्जी मन कपड़ा काटे


*कागज के टुकनी*-  टुकनी


 *मरपरई*- सिसली गोरसी,कम गहराई के


*कजरौटी* काजर धरे के


*सुराही*-पानी भरे के 


*ढेरा*-रस्सी बनाय के 


*भँदई*-चमड़े का सेंडिल नुमा चप्पल जेला अक्सर राउत मन पहिरे ।


*मोरा*- पाना या झिल्ली से बने हुए  बरसाती जेला मुड़ी मा टाँग के ओढ़े जाथे।


*खुमरी*- पाना, कमचील या झिल्ली से बने हुए बड़का टोपी कस  बरसाती 


*संदूक*- पेटी


*धूसा*- बड़का साल जेला कंबल बरोबर ओढ़े जाथे।


*खोल*- कथरी जे उपर जे कपड़ा/गद्दा रजाई में चढ़ाने वाला कवर।


*पार्खत*- तामा के बने नान्हे मलिया जेमा भगवान के मूर्ति ल नहवाय जाथे।


*नेवार*- पलंग मा गंथे नायलोन/कपड़ा


*मचोली/माची*- छोट खटिया


*भेलवा*- लकड़ी के *झूलना*


*खूँटी*- बाँस के लकड़ी जे कोठ मा गड़े रहे


*मोरा*- बरसात मा ओढ़े के पन्नी


*पौतरा*- प्लेट


*कोपरी*-  गड्ढा वाले प्लेट


*कठौता*- लकड़ी के बर्तन


*फूलबहिरी/काँसी बहिरी/छीनबहिरी/खरेटा बहिरी/खरहेरा बहिरी/ झारिनि*- झाड़ू


*मोड़ा*- बइठे के 


*ठप्पा*- चौंक चाँदन पुरे के छेदरहा डब्बा


*पिल्हर/ मुड़की*- भारन


*चौखट*- दरवाजा के आधार


*कुँदवा खुरा*- खटिया के कुंदाये खुरा


*पठेरा/खोलखा*-कोठ के भीतर बनाय आलमारी


*तुमड़ी* --खेत जाय तब पानी भर के ले जाय, ये तुमा के बने रहय, जब तुमा सूखा जाय तब वोला बनाय।


*खड़ाऊ*- लकड़ी के चप्पल


*अकतरिया* -खेत खार म कांटा खूंटी ले बांचें बर महतारी मन पहिरे सेंडिल नुमा चप्पल


अरगेसनी- घर मा कपड़ा टांगें अउ सुखोय बांस के लकड़ी के


*भंदई* - चमड़ा के बने सेंडिल जइसे चप्पल


*कांवर* - लगभग 4-5 फीट फिट लंबा बांस के दूनों छोर मा जोंति लगा के पानी लाये बर उपयोग करे जाथे


*सिंगार पेटी*- सिंगार के समान रखे के बॉक्स


*मर्रा*-मुड़ कोरे के ककवा/कंघी


*कुरो*=धान नापे के


*पटका*- टॉवेल


*अँगोछा*- पानी मा भींगो के पोछे जाय वाले फरिया/कपड़ा


*गोदरी /कथरी*- सूती लुगरा के मोटा बिछोना


*झाँपी*- बाँस के बड़े टुकना


【रँधनी खोली ले संबधित कतको अकन समान अउ हे जइसे,--*गोरसी (मरपरई),पीढ़ही/ पीढ़ा,माली(काँसा का छोटा प्लेट),फुलकसिया लोटा, फुलकसिया थारी,

बटकी,कोपरा,कोपरी,झारा,डुआ,डुई,पलटनी,सइतमा,थारी,लोटा,गिलास,भँवराही,बटकी,कसेली,दइहा,मइरसा,मथनी,घम्मर,सीका,गिरि,हँउला,मरकी,गगरा,गगरी,घैला,दोहनी,

दुहना,तउला,ठेकवा,लकड़ी,चिल्फा,झिटका,परइ,कनौजी,तोपना,सील,लोढ़ा,पर्रा,पर्री,टुकनी,फुँकनी,अथनहाँ,मरकी,सरकी,दरी,पिढ़वा,फुला,पठेरा,घनौची,एकमूँहा चूल्हा,दुमुँहा चुल्हा,अँगेठा,अँगरा,कोइला, खोइला,तउला, चाक-कनौजी के दूसरा किसम,चँदाही-सबो किसम के थारी,लेन्च-सबो किसम के बाल्टी-बाल्टा, गोड़ही लोटा-गोड़ा वाला लोटा,खूराही गिलास-खूरा वाला गिलास, गोड़ही बटकी-गोड़ा वाला बटकी, भँवराही बटकी-बिगन गूरा वाला,ढिबरी, चिमनी, चटिया-मटिया, कुड़ेरा, डेचकी, चन्नी,कोटना, फरिया, चेंदरा( कपड़ा), फोरन, सुखसी*】

संकलन

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 5 August 2022

छत्तीसगढ़ के गांव मन मा प्रयोग म आनेवाला मशीन अउ औजार के नाम विवरण अऊ उपयोगिता






छत्तीसगढ़ के गांव मन मा प्रयोग म आनेवाला 

मशीन अउ औजार के नाम विवरण अऊ उपयोगिता 

१. बसुला :- बसुला ह लोहा के औजार आए जेन ल हमन लकड़ी छोलेबर, बेंठ धरायबर अउ आने आने कइठन काम म उपयोग करथन । एमे लकड़ी के बेंठ लगे रहिथे । 

२. बिंधना :- बिंधना ह लकड़ी के कोनो समान बनाये बर अउ चौकोर आयताकार लकड़ी म गहराई करे म प्रयोग होथे ।  बिंधना म कम चौड़ाई वाले धार दार लोहा के मोटा पट्टी लगे रहिथे । 

३. पटासी :- पटासी अऊ बिंधना के लोहा के आकार म अंतर रहिथे । पटासी म चौड़ा धारदार लोहा के पट्टी चार पांच इंच के लंबाई म लगे रहिथे एकर प्रयोग बिंधना म लकड़ी ल छेदे बेधे के बाद ओखर आकार ल सफाई दे म अउ झारे म प्रयोग करें जाथे । 

४. आरी :- आरी ह लकड़ी काटे के औजार आए एला एकेझन चलाय जा सकत हे । एहा उल्टा धार अऊ सीधा धार के घलो होथे । एखर मुठ वाले भाग ह चौड़ा रहिथे अउ आखिरी छोर डहर ह सुल्लू आरी के पट्टी म तिनकोनिया धार लंबा बने रहिथे । एला धार करेबर कन्नाछी प्रयोग करे जाथे ।

५. आरा :- आरा ह घलो लकड़ी काटे  के औजार आय फेर ऐ हा आरी ले भारी होथे । एखर दांता घलो बड़े होथे अउ लंबाई ह पाँच से छह हाथ रहिथे । लकड़ी के बड़े-बड़े गोला ल काटेबर आरा के प्रयोग होथे । आरा चलाएबर दुझन मइनखे लागथे । आरा के दुनों डाहर मूठ लगे रहिथे ।

६. निहई :- निहई ह लोहा के औजार आए जेखर प्रयोग लोहा ला अकार प्रकार देबर अउ टेंडग़ाय जिनीस ल सोझियाय बर करे जाथे । ए ह आधार के काम करथे । निहई ह स्थायी रूप म रहिथे जेला जरूरत के हिसाब से उपयोग करथन । 

७. ठीहा :- ठीहा लकड़ी के बनाय जाथे । लोहार अऊ बढ़ई घर के लकड़ी के ढीहा बड़भारी अउ मजबूत रहिथे । जेला बने पोठ जगा म स्थायी रूप से गडिय़ाय जाथे । ए ह लकड़ी ल आकार दे बर अउ छोले काटे बर आधार के काम करथे । 

८. भंवारी :- भंवारी ह लकड़ी म छेदा करे के औजार आए । भंवारी लकड़ी के बनाए जाथे । एमे दोनो डाहर लोहा के राड लगे रहिथे उपर डाहर छोटे खुंटी असन अउ नीचे डहर लंबा पतला राड रहिथे जे म त्रिकोणधार बने रहिथे । भंवारी चलायबर पहिली दू झन जरूरत पडय़ अब तो कुंदवा भंवारी आ गेहे जेन ल कमानी म रस्सी फसा के एके झन लकड़ी म छेदा कर सकत हे । समय के संग बदलाव होगे अब तो बिजली म चलईया ड्रील मशीन ओकर स्थान ले लिस । 

९. गिरमिट :- पहिली बढ़ई मन लकड़ी म दू सूत, तीन सूत, पौन इंची, आधा इंची छेदा करेबर गिरमिट के उपयोग करय । गिरमिट ह लंबा राड के बनथे । गिरमिट के सुरू भाग म लगभग पाँच, छ: इंच तक लोहा ह पट्टी के आकार म अंइठाए रहिथे अउ फुलगी म दु ठन धार बने रहिथे दुनो धार के बीच म नोकदार चुड़ी बने रहिथे जेन लकड़ी के भीतर जाथे । धीरे-धीरे घुमा के अपन हिसाब से लकड़ी के चौखट, पल्ला, पाटी, बेड़ी, कपाट, मेयार म छेदा करे जा सकत हे । एकरो स्थान ल इलेक्ट्रानिक ड्रील मशीन ह ले लिस ।

 १०. सुंबा - सुंबा लोहा के औजार आय । एखर प्रयोग ठेंसाय खीला-खंूठी के उभार ल बराबर करे म अउ छोटे जगह जिहां हथौड़ी के मार नइ पड़ सकय अइसन जगा म होथे ।

११. गुनिया :- गुनिया ह बढ़ई लोहार मिस्त्री मन के औजार आय एकर प्रयोग हमन कोनही ला बराबर मिलायबर करथन । आयताकार वर्गाकार सामान के सही माप बर गुनिया बड़ काम के हे । खिड़की, चौखट ल गुनिया के आधार ले बनाए जाथे । 

१२. झिरी रोखी :- झिरी रोखी के आकार ह छोटे रहिथे अउ एमा लोहा के धारदार पतला पट्टी लगे रहिथे । घर के दरवाजा चौखट बेड़ी मेयार के कोर म लंबा किनारी रहिथे वोहा एखरे कमाल आय ।

१३. कन्नाछी या कानछ - कन्नाछी ह कच्चा लोहा के तिनकानिया राड आय जेमा लकड़ी या प्लास्टिक के बेंठ लगे रहिथे । एखर तीनों डाहर पतला-पतला आड़ा कट अब्बड़ अकन बने रहिथे । आरी-आरा, गिरमिट, भंवारी के धार बनाए बर एकर प्रयोग करथन ।

१४. सुजियारी - सुजियारी के फुलगी ह सुचकू होथे ए ह लोहा के रहिथे अउ लकड़ी के बेंठ लगे रहिथे  एकर उपयोग हमन भंवारी, गिरमिट म जोन छेदा करे रहिथन तेन ल थोड़ा बढ़ाय म करथन । एकर अलावा लकड़ी म खीला ठोके के पहिली सुजियारी म जगा बनाथन जेखर ले हमला चुड़ीदार स्क्रू कसे म अउखीला ठेंसे म सहुलियत होथे ।

१५. रोखी - रोखी ह लकड़ी के पल्ला या कपाट बेड़ी ला रोखे चिकनाय के काम आथे । एला एकेझन चलाय जा सकत हे । रोखी के बीच म लोहा के धारदार चौड़ा पट्टी लगे रहिथे । 

१६. रेंदा - रेंदा ह रोखी ले बड़े साइज के होथे एकरों बीच म धारदार पट्टी लगे रहिथे । मेयार अउ बड़े लकड़ी ला चिकनाए अउ साइज करे म एकर प्रयोग करे जाथे एला दु झन मिल के चलाए जाथे । 

१७. टेवना पखरा - हमर गांव देहात म किसान भाई, बढ़ई, लोहार मन टेवना पखरा के माध्यम ले जम्मो औजार के धार ल बनाए अउ टेंय खातिर एकर प्रयोग करथे । 

१८. टेंड़ा - नंदिया, नरवा तीर खेती करइया किसान भाईमन पहिली जमाना म टेड़ा के माध्यम ले अपन खेत के सिंचाई करय । टेड़ा ल तीन ठन बड़े बड़े लकड़ी के माध्यम ले बनाये जाथे दूठन लकड़ी गड़े रथे अउ एकठन लंबा लकड़ी ला उपर मा दुनों लकड़ी म राड के माध्यम ले फँसाय जाथे । उपर फसें लकड़ी के आखिरी भाग म पथरा के भार लगे रहिथे । अउ दुसरा भाग म फुलगी म रस्सी लगे रहिथे जे म बाल्टी बांध के कुंआ, नंदिया, नरवा, ले पानी ल निकाल के किसान भाई मन पहिली जमाना म अपन खेत म ले जावय । 

१९. ढिबरी :- एला चिमनी घलो कहिथे । पहिली जमाना म बिजली के सुविधा नइ रिहिस तब अपन घर-दुवार ल अंजोर करे बर ढिबरी या चिमनी के प्रयोग करय । ए ह कोई भी छोटे सीसी या डब्बा ले आसानी से बनाय जा सकत हे । ढिबरी या चिमनी म माटी तेल भरे जाथे अउ ओमा बाती घलो लगे रथे । बिजली के बंद होय म हमर गांव गवई म आज भी चिमनी जलाय जाथे ।

 

२०. अकोसी :- आकोसी दो प्रकार के होथे लकड़ी टोरे के अउ मुनगा टोरे के । अकोसी लंबा बांस ले बनाए जाथे फुलगी म छेदा करके ओमा कोकड़ी राड़ लगाय जाथे पेड़ के सुखाय लकड़ी ल नीचे म रहिके आसानी से एमा टोरे जा सकत हे । मुनगा टोरे के अकोसी बनाए बर बांस या बांस के फाँकी कमचील के फुलगी ल चीर के ओमा छोटे असन कमचील के टुकड़ा ल अरझा के बांध देथन । ए अकोसी ले हमन मुनगा के अलावा कई ठन फल अउ गंगा अमली ल घलो टोरथन ।

२१. खलिहा :- खलिहा के स्वरूप ह अकोसी ले थोकिन मिलथे फेर ऐमा अंतर घलो हे । खलिहा बनाए बर घलो बांस के जरूरत पड़थे ।जेकर फुलगी म घुमावदार लोहा के धरहा पट्टी लगे रहिथे। उही आकार के जूट के बोरा या झोरा ओमा बंधाए रहिथे । खलिहा ह मुख्य रूप से आमा टोरे के काम आथे । आमा ह पट्टी के सहायता ले कट के झोरा म भरा जथे एखर से आमा ह भुइया म गिरे अउ नुकसान होय ले बच जाथे ।

२२. खुमरी :- बांस के बनाए जाथे ए ह गोल रहिथे । एला राउत भाई और किसान मन गरमी अउ बरसात ले बचे बर प्रयोग करथे । खुमरी के ऊपर भाग म पाना पतई अउ झिल्ली छवाय रहिथे । 

२३. नाहनी :- नाहनी ह नाखून काटे के औजार आए । नाहनी हमर पारंपरिक नेल कटर हरें । नाऊ ठाकुर के अलावा एला किसान भाई मन घलो रखे रहिथे । 

२४. लोचनी :- लोचनी ह छोटे चिमटी बरोबर काँटा निकाले के औजार आय । खेत खार म किसानी बूता के समय कोनो काँटा गढ़ जाए त ओला लोचनी ले निकालय ।

२५. गरी :- गरी म मछरी फँसाय जाथे । गरी बनाए बर पतला बाँस के जरूरत पड़थे । बाँस के फुलगी म तांत के लंबा तार बंधाए रहिथे अउ तांत के फुलगी म कोकड़ी वाले गरी फंसे रहिथे । गरी खेले के पहिली ओमा गेंगरवा अउ गहँू पिसान के चारा फँसाय जाथे । तांत के बीच म संकेत बर फोहई लगे रहिथे । एखर से मछरी फँसे के संकेत हमला पता चल जाथे । 

२६. नोई :- हमर राउत भाई मन गाय ल दूहत खानी छोटे बछरू अउ गाय ल नोंई म बांधथे । नोंई ह गाय के काटे हुए पुछी के बाल से बनाए जाथे । नोंई के लबाई लगभग तीन चार हाथ रहिथे ।

२७. पहुरा :- पहुरा ह गरवा बांधे के काम आथे लकड़ी के बनाए जाथे । एकर लम्बाई ड़ेढ दू हाथ रहिथे । पहुरा के दुनों डाहर छेदा रहिथे जेमा रस्सी के कनौरी फंसे रहिथे । 

२८. गरदेवा :- गाय गरू बइला, भईसा के गर म स्थायी रूप से जौन रस्सी बँधाय रहिथे ओला गरदेंवा कहिथे । गरवा बछरू ला बांधथ खानी गरदेंवा ह ओला आसानी से पकड़े म सहायक होथे । 

२९. खडख़ड़ी :- खडख़ड़ी लकड़ी के खोल वाले रहिथे ओखर बीच म लकड़ी के खुटी लगे रहिथे । जेन झुलत रहिथे अउ आवाज करथे । जेन गरवा बछरू बरदी ले भागथे ओमा राऊत भाई मन खडख़ड़ी ल बाँध देथे ताकि ओमन ला गरवा ला खोजे म सहुलियत होय । एखर से बरदी अउ गरवा के दिशा के ज्ञान घलो होथे । 


३०. लाहंगर :- हरही गरवा बछरू मन बर लाहंगर के प्रयोग करे जाथे । एहा गोल लंबा लकड़ी के बनथे जेकर एक भाग म छेदा रहिथे उही म कनौरी फँसे रहिथे । लाहंगर बंधाय ले गरवा मन ज्यादा भागन नइ सकय ।

३१. लादका :- अदरा बछवा ला बख्खर म फांदे के पहिली ओखर गला म लकड़ी के लादका पहिराये जाथे । एखर से बछवा के खांध ला भार सहे के आदत बनथे । 

३२. कोटना :- कोटना ह पखरा के बड़े पात्र आय एमा हमर पशुधन मन ला पानी पियाथन अउ कोड़हा भुसा खवाथन । एकर अगल-बगल गाय बछरू ला बांधे बर खंूटा गड़े रहिथे । 

३३. घंघुरू :- हमर ग्रामीण जन जीवन म घुंघरू के प्रयोग अलग-अलग ढंग ले करथन । घुंघरू पीतल के रहिथे । ओमे छोटे-छोटे लोहा के छर्रा भराय रहिथे । घुंघरू के गुच्छा ल हलाय म सुग्घर आवाज निकलथे । किसान भाई मन छोटे बछरू, पडिय़ा, पंड़वा के गला म घुंघरू पहिराथे । घंघरू के संख्या कम हे त ओला गोड़ म घलो बांध देथे । घुंघरू ह संकेतक के काम करथे हमर बछरू ह घर म हवय एकर आभास कराथे । संगे संग बछरू कभू गली खोर डाहर भागही तेन ल खोजे म घलो सहायक हे । घुंघरू के उपयोग ग्रामीण कलाकार मन नाचा गम्मत संग कईठन उत्सव म घलो 

करथे । 

३४. घांघँरा :- घांघँरा ह घंघुरू के बड़े रूप आय यहु पीतल के रहिथे । घांघँरा म बड़े बड़े छर्रा भराय रहिथे । घांघँरा मूल रूप से बइला के गला म पट्टा म गूँथ के पहिराय जाथे । घुंघरू ले एकर आवाज मोटा होथे यहु ह  संकेतक के काम करथे । घांघँरा बंधाए बइला जब गाड़ा अऊ खांसर म फंदा के दउड़थे त नवा संगीत के संचार होथे । 

३५. निसेनी :- हमर गंवई म निसेनी बहु उपयोगी हे । निसेनी बांस के बनथे अपन उपयोगिता के हिसाब से एकर ऊँचाई ल रख सकतहन । दू ठन मजबूत बांस म लकड़ी या निंधा बांस के पक्ति लगा देथन उही निसेनी आय । छानी परवा म चढ़े बर अऊ पटउंहा म चढ़ेबर निसेनी के उपयोग करथन  

३६. राचर :- राचर ह बारी बखरी अउ बियारा के माहटी म लगाय जाथे । आवश्यकता के अनुसार एकर लंबाई अउ ऊँचाई रहिथे । राचर मोटा अउ लंबा लकड़ी के बनाए जाथे । एक तरफ बड़े गोल छेदा रहिथे । जेन ह जमीन म गड़े लकड़ी म फंसे रहिथे । राचर के एक तरफ दूखंधियाँ थून्ही, गड़े रहिथे जेमा संकरी फंसा के तारा घलो लगाथन । एक छोर से दूसर छोर तक राचर म आयताकार या चौकोर छेदा रहिथे जेमा अब्बड़ अकन खंूटा लगे रहिथे । बोरझरी, छिंद के पत्ता, बेसरम लकड़ी ल खंूटा म फंसाय जाथे । 

३७. भांड़ी :- पहिली बियारा बखरी म भांड़ी चढ़ाय जाए । भाड़ी ह एक प्रकार से माटी के आहता आय बरसात के बाद बियारा बखरी के आहता म भांड़ी चढ़ा के ओला ऊँचा करय एकर बर माटी ल मता के ओमा पेरौसी अउ कोदो पेरा ल मिला के भाड़ी ल छाबय । भाड़ी के ऊपर भाग म बोरझरी काँटा ल खोंचय ताकि बियारा बखरी के सुरक्षा हो सकय । 

३८. चतवार :- चतवार ल किसान भाई खेत के अनावश्यक  पानी के निकासी के समय प्रयोग करथे ऐ हा मोटा अऊ चौड़ा पटनी के बनथे । चतवार के माध्यम ले खेत के गढ्ढा जगह म भरे पानी ल खेत के मुही ले निकालथन ।

३९. नकवार :- नकवार ह विशेष प्रकार के चिमटीनुमा औजार आय जेन नाऊ ठाकुर मन करा रहिथे ऐहा नाक के भीतर के अनावश्यक बाल हे ओला उखाड़े म काम आथे । 

टीप :- छूट गे हवय तेन विषय म अउ कभू विस्तार ले चर्चा करबोन.....

लखनलाल साहू च्च्लहरज्ज्

्रग्राम - मोखला, पोस्ट - भर्रेगांव 

जिला व तह.- राजनांदगांव (छ.ग.)

मो. ९६३०३१२१९७

व्यंग्य-कइसे झंडा फहरही ?


 

व्यंग्य-कइसे झंडा फहरही ? 

                                    पंद्रह अगस्त के पहिली दिन .... सरपंच किथे ‌- डोकरी दई .... ये बछर  हमर बड़का झंडा ला तिहीं फहराबे या ..... । डोकरी दई किथे -  मोर न आँखी  दिखय ..... न कान सुनाये ..... न हाथ चले ..... न गोड़ ..... मेहा का झंडा फहराहूँ ? सरपंच मजाक करिस - ये देश म जे मनखे ला दिखथे .... जे मनखे ला सुनाथे ..... जे अपन हाथ ले बहुत कुछ कर सकत हे ....... जे अपन देहें के ताकत ले दुश्मन के नास कर सकत हे तेमन ला ...... आज तक झंडा फहराये के हक नइ मिलिस । जे कुछ करय निही या कर नइ सके तिही मन झंडा फहराथे दई । खिस खिस ले दाँत निपोर के .... हा हा हा ..... हाँस लिस तहन .... एकदम से चुप होके .... सरपंच आगू केहे लगिस -  ये दारी हमूमन सोंच डरे हाबन के ... जे मनखे ....... हमर देश बर कुछ करे हे ….. तिही मन झंडा फहराही । तेकर सेती बइसका म तोर नाव तै करे हाबन । डोकरी दाई किथे – वा ...... देस म अऊ कतको मनखे हे जेमन देश बर बहुत कुछ करे हे । उही मन ला कहव ..... में नइ जाँव झंडा मंडा फहराये बर .......।    

                                    सरपंच किलौली करे लागिस - हमर ले कुछू गलती होये होही तेला माफी देहू डोकरी दई । फेर कइसनो करके ..... मोर खातिर ये बछर के झंडा फहरा दव । डोकरी दई जिद पकड़ लिस - तें चाहे कहींच कहिले सरपंच ....... में झंडा नइ फहराँव । डोकरी दई के जिद देखके सरपंच किथे - तुँहर जगा तुँहर नाती फहराही त बनही ? डोकरी दई किथे - अपन नाती ल घला नइ फहरावन दंव । में अपन घर के कन्हो ला झंडा फहराये बर भेजबेच नइ करँव । सरपंच परेशान होके कारण पूछे लागिस – काबर नराज हस डोकरी दई । काबर अइसने करथस या  .... ?  

                                    सरपंच के किलौली देख डोकरी दई कारण बताए लगिस – हमन जनता अन सरपंच । हमन ला घेरी बेरी बिगन कारन के नराज होय के हक निये । बीच समे म हमर नराजगी ला कोन सहिही सरपंच ? हमन ला नराजगी के हक पांच बछर म सिर्फ एके बेर मिलथे । उहू ला आजमा नइ सकन ... कोई न कोई भरमा देथे तहन ..... भुला जथन । सरपंच किथे – कुछ तो अऊ बात हे डोकरी दई .... । डोकरी दई लंभा साँस लेवत किथे – कुछ निही बलकी बहुतेच बात हे सरपंच ..... । अभू ले अस्सी बछर पहिली के बात आये बेटा .... । तोर बबा ला झंडा फहराये बर उकसा दिन । उकसइया मन जानत रिहिन के जे मनखे झंडा फहराही तेला ...... अंग्रेज मन गोली मार दिही । तोर बबा नइ जानत रिहिस ...... कहत कहत रो डरिस । भरे जवानी म खाली हाथ होगेंव । मोर बेटा हा अपन ददा के बलिदान के प्रमाण खोजत खोजत मरगे ..... एके झिन नाती हाबे तेला .... झंडा फहराये के उदीम म ओला कन्हो कीमत म नइ भेंजंव .... कोन जनी काये करहू ओकर संग ........। 

                          सरपंच किथे - वा .... ओ दारी अंग्रेज मन के राज रिहिस दई ..... । हमन गुलाम रेहेन ..... अभू आजाद हन ...... कोन गोली चलाही हमर ऊपर ? डोकरी दई किथे -  तैं आजाद होबे सरपंच । हमन कति करा आजाद हन । सरपंच किथे - निही वो डोकरी दई ....... देश म जतका झिन जनता हे जम्मो आजाद हे । डोकरी दई मुहुँ फार दिस - अई ...... हम सोंचत रेहेन के ..... देश म फकत बड़े मनखे मन आजाद होही..... । सरपंच किथे ‌- तहूँ ल ओतकेच आजादी हे जतका बड़े मनखे ला हे । डोकरी दई पूछे लागिस - तैं ये बता सरपंच .... हमन सहींच म ओतके आजाद हन जतका बड़का मनखे मन हे ....? सरपंच किथे - हव डोकरी दई ओतकेच ...। डोकरी दई एकदमेच सीरियस होके पूछे लागिस - त मेंहा कनहों रसदा म सुते मनखे ल ..... अपन गाड़ी म चपक के मार सकथँव ? मेहा जंगल जाके ....... कन्हो पशु के शिकार कर सकत हँव ? मेंहा देश के पइसा खाके डकार सकत हँव अऊ छापा परे म अपन कमइया ला बिरोध करे के बुता म लगा सकत हँव ... अऊ अपन नाक उँच करके .... गाँड़ा कस बछवा ...... छेल्ला किंजर सकत हँव । सरपंच किथे - निही दई ..... दूनों बूता नइ कर सकस । डोकरी दई किथे - त मेंहा कती करा आजाद हँव ? सरपंच समझइस - बने काम करे बर आजादी मिले हे डोकरी दई..... । डोकरी दई पूछिस - का बने काम करँव तिहीं बता ..... ? का ग्राम पंचइत म ..... लबारी मरइया मन के टेंटवा मसक सकथँव ? का बईमानी करइया इंजीनियर ला नौकरी ले निकलवा सकत हँव ? फरेब करके गरीब मनखे के जगा भुंइया ला दूसर के नाव करइया तहसीलदार ला सजा देवा सकत हँव ? येमन ल संरक्षण देवइया बिधायक ला ओकर औकात बता सकत हँव ? संसद म बइठके जहर घोरइया मनखे के हाथ ला टोर के बइठार सकत हँव ? सरपंच मुड़ी गड़िया के किथे - तैं कुछ नइ कर सकस डोकरी दई । अतका के करत ले तुहीं ल जेल हो जाही । डोकरी दई किथे - मेंहा जानत हँव बेटा .. न्याय के रद्दा म रेंगइया मनखेच बर ...... इहाँ जेल बने हे । बईमान दुराचारी मन शान बघारत बाहिर मटकत हे । अब तिहीं बता हमन कती करा आजाद हन ? अऊ हमन आजाद नियन त कहूँ फेर झंडा फहराये के बेरा कन्हो हमर जान ले दिहीं तब ....... ?

                                   डोकरी दई ला सरपंच भरमाये लागिस - तहूँ अजाद हो जबे दई .... फेर एक शर्त हे । डोकरी दई पूछिस - का ? सरपंच जवाब दिस - तोला टोपी पहिरे बर लागही दई । झंडा फहराये के बेरा ..... तोर मुड़ी म टोपी मढ़ा देबो ..... तहन तहूँ .... उही बेरा ले अजाद हो जबे । तैं जेन बूता करना चाहबे ...... बिगन कन्हो रोक टोंक के कर सकत हस । डोकरी दई किथे - अई .... अभू तक झंडा फहराये बर टोपी पहिरे लागथे । टोपी के सेती तोर बबा हा ओतका भीड़ म चिन्हागे रिहिस अऊ गोली के शिकार होये रिहिस । तूमन फेर कन्हो गरीब ल टोपी पहिरा के मारना चाहत हव ........ । मय न तो तुँहर टोपी ल पहिरँव ...... न झंडा फंहरावँव । सरपंच किथे – दई तैं नइ जानस या .....  अभी हमर देश म केवल टोपी पहिरइया मन सुरक्षित अऊ आजाद हे ....... । तैं एक बेर पहिरके तो देख ....... ।                

                                    दई केहे लागिस – मेंहा टोपी घला पहिर लेहूं ....... फेर मोर बर सादा सचाई के टोपी लान । झंडा फहराये बर घला चल दूहूँ फेर साफ सुथरा आरूग झंडा के बेवस्था तो कर.... । सरपंच किथे – तोर फहराये बर नावा झंडा बिसाये हाबँव डोकरी दई .... । डोकरी दई किथे - उहीच तो बात हे सरपंच । येमे लगे दागी ..... तूमन ला दिखथे कब ? हमर पुरखा के झंडा ल देखे हव कभू ? सरपंच हाँसत किथे - वो तो कब के चिरागे हे दई । डोकरी दई तमतमागे - वो चिराये निये बेटा .. ओला चिरे गेहे । ओला दागदार बनाके कभू कश्मीर म .. कभू असम म .. कभू गुजरात म . कभू केरल म .. रात दिन चिरत  हव । चिरहा झंडा के कतेक शान ... ओला मे काये फहराहूँ ? तुरते बिसाये नावा झंडा ल सरपंच हेर के जइसे देखइस .... सुकुरदुम होगे उही हा खुदे ..... । ध्यान से देखिस .. जगा जगा ले मइलहा ... जगा जगा दाग .. कतको जगा चिरहा .. ? सरपंच किथे - अरे .. दुकानदार मोला ठग दिस या डोकरी दई ? डोकरी दई किथे - दुकानदार नइ ठगे बेटा .. तूमन जनता ल ठगत हव ।  देख तुँहर हाथ परतेच साठ .. नावा झंडा म दाग लग जावत हे बेटा । कभू भ्रस्टाचार .. कभू बइमानी ... कभू आतंक … कभू झूठ .. कभू फरेब के दाग तूहीं मन लगात हव । मोर बर आरूग झंडा ले आन ... में नइ फंहराहूँ त कहिबे । मइलहा दागी फटहा झंडा झिन टेका हमर आगू म । तोर बबा दगदग ले उज्जर झंडा फहरावत अपन जान दे दे रिहिस । ओकर बलिदान ल अभीरथा नइ होवन दँव । सरपंच भटकत हे ... ये दुकान ले वो दुकान , ये गाँव ले ओ गाँव , ये जिला ले वो जिला , ये प्रदेश ले वो प्रदेश ...... । जगा जगा खोज डरिस । कहूँ नइ पइस साफ सुथरा झंडा । डोकरी दई के हाथ ले झंडा फहरवाये के साध अभू तक अधूरा हे ? कोन जनी कब फहरही साफ सुथरा अइसन झंडा .... ?   

        हरिशंकर गजानंद देवांगन  छुरा

छत्तीसगढ़ के गांव मन मा प्रयोग मा आनेवाला मशीन अउ औजार के नाम, विवरण अउ उपयोगिता






छत्तीसगढ़ के गांव मन मा प्रयोग मा आनेवाला मशीन अउ औजार के नाम, विवरण अउ उपयोगिता 



हमर छत्तीसगढ कृषि प्रधान प्रदेश हरे.इहां धान, गहूं, सोयाबीन,तिली,अरसी, सूरजमुखी,कोदो,रागी,चना,मसूर,लाखड़ी -लाख ,मटर, उड़िद, मूंग, कुसियार के संगे -संग नाना प्रकार के सब्जी बोंय जाथे.खेती किसानी करे बर किसम- किसम के औजार उपयोग म लाय जाथे. 



 दउंरी - बियारा के बीच म ठाहिल लकड़ी ल गड़ियाय जाथे. वोकर चारो मुड़ा जउन फसल ल मिंजना हे वोला बगराय जाथे. फेर बइला - भइंसा ल दउंरी म बांध के गोल घुमाय जाथे.जरुरत अउ सुविधानुसा बइला - भइंसा के जुगाड़ करके फसल ल मिंजथे . बाद म येकर जगह बेलन, गाड़ा अउ ट्रेक्टर ह ले लिस.


बेलन - धान, गहूं अउ उन्हारी मिंजे के काम आय.अब नंदावत हे. बेलन ले जल्दी गाड़ा अउ ट्रेक्टर म फसल ह मिंजाथे तेकर सेति येकर चलन अब कम होगे हे.


पंखा- लोहा के बने होथे. पांच -छै फुट ऊंचा रहिथे. धान अउ आने फसल ल मिंजई के बाद ओकर दाना ल ओसाय के काम आथे जेला हाथ म ओटथे. येकर ले पोठ दाना मन तीर म माड़़ जाथे अउ बोदरा,भूंसा अउ पेरोसी मन दूरिहा फेंका जाथे. नवा जमाना म हाथ ले ओटे पंखा ह नहीं के बराबर हे.काबर कि अब इलेक्ट्रॉनिक पंखा अउ कूलर ले जादा ओसाय के काम होथे.


चलनी - लकड़ी अउ टीना मिला के चलनी बनाय जाथे. येमा गोटी-माटी, कांड़ी -खूंटी ह अलगा जाथे. अब तोओसाय के इलेक्ट्रॉनिक मशीन म चलनी लगे रहिथे.


ढेरा - लकड़ी के बनाय जाथे. येकर ले कांसी, बगई, सन काड़ी,डोरी पटवा ,  बइला-  भैंसा के पूछी  के बाल ल 

ल आंट के रस्सी बनाय जाथे. फेर येकर उपयोग खटिया गांथे बर, गरुवा मन के काछड़ा,राउत मन के  नोई, अउ

फसल ल बांधे बर काम म लाय जाथे.


पैरा कुट्टी मशीन - येकर ले पैरा ल छोटे -छोटे टुकड़ा करे जाथे ताकि मवेशी मन चाव ले खा सके. कोटना म पानी संग बोरके, कोड़हा,  दाना,खल्ली मिलाके खिलाय जाथे.


रिपर - फसल कांटे के काम आथे. बनिहार के समस्या के हल अउ समय के बचत के रुप म येकर उपयोग हे. येहा बैटरी ले चलथे.एक आदमी हाथ म धरके चलाथे.येमा दू चक्का रहिथे .


हार्वेस्टर - धान अउ आने फसल ल कांटे के आधुनिक मशीन हरे येमा कटाई अउ मिंजई दूनों काम होथे. बनिहार के समस्या के हल अउ समय के बचत के रुप म अब्बड़ उपयोग हे. पंजाब अउ हरियाणा म जादा हे. छत्तीसगढ़ के गिने चुने किसान मन कर हार्वेस्टर हे.


  ट्रैक्टर -  ट्रेक्टर आज किसान के सबले बढ़िया मितान बन गे हवय.   

जेन काम बर अलग -अलग साधन 

 नांगर, गाड़ा, बेलन, दंउरी, कोप्पर के जरुरत पड़य वो सबो काम ल अकेलच

ट्रैक्टर ह करत हे.  घुरवा ले खातू ल खेत तक ले जाना, खेत ल बराबर करना, खेत ल जोतना,   मंतई करना, फसल कंटे के बाद वोला डोहारना, फसल के मिंजई करना , फसल ल बेचे बर सोसायटी/ मंडी तक ले जाना, खंती खनना, माटी,ईंटा,पत्थर, सीमेंट, लकड़ी डोहरई जइसन नाना प्रकार के काम ल ट्रेक्टर ह करत हे. येकर ले बनिहार के समस्या हल अउ कम समय

म काम होवत जावत हे. ट्रैक्टर ले कतको मजदूर मन के रोजी- रोटी घलो चलत हे.


स्पेयर - फसल ल कीरा -मकोरा ले बचाव बर दवाई छिड़काव करे जाथे.ये काम म स्पेयर के उपयोग करे जाथे. आज हाथ ले चलाय अउ बैटरी ले चले के स्पेयर उपलब्ध हे.


पोकलेन -  पोकलेन/ बुलडोजर के उपयोग भारी -भरकम चीज ल सरकाय बर, गड्ढा खने बर, जर्जर मकान ल तोड़े बर, नेंव बनाय बर,नाली मन ल साफ करे बर, खंती खने बर  जइसन कतको काम म उपयोग होथे.


आरा मशीन - मकान बनाय अउ चूल्हा म  जलाय बर आरा मशीन ले लकड़ी चिरई करे जाथे.


घास कटर- घास अउ फसल कांटे के छोटे मशीन जेला हाथ म पकड़ के चलाय जाथे.


टुल्लु  मशीन - नदिया,नरवा,तरिया,डबरा, बोर,कुंवा,नल ले पानी खींचे बर येकर उपयोग करे जाथे.  फसल म पानी पलोय, मकान बनाय, पीये के पानी बर,नहाय बर टुल्लू मशीन के उपयोग होथे.


सिगड़ी - चूल्हा के रूप हरे. माटी,अउ लोहा के बनाय जाथे. भात- साग,चाय बनाय के काम आथे. अब इलेक्ट्रॉनिक सिगड़ी घलो उपलब्ध हे.


गैंस चूल्हा - येहा चूल्हा के नवा रुप हरे.गैंस ले चलथे. आज गांव-गांव म गैंस चूल्हा के जोर हे.


इन्डेन - इलेक्ट्रॉनिक चूल्हा.


मिक्सर - इलेक्ट्रॉनिक मशीन जेमा दाल, मिर्ची, धनिया पीसे जाथे.चटनी बनाय जाथे.



             ओमप्रकाश साहू अंकुर

          सुरगी, राजनांदगांव

    मो.7974666840