Wednesday, 10 August 2022

बेरा-बेरा के बात"-- अबेवस्था के विरुद्ध शंखनाद आय


 

*"बेरा-बेरा के बात"-- अबेवस्था के विरुद्ध  शंखनाद आय*


       छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउ लोककला परम्परा के अध्येता डॉ. पीसी लाल यादव जी छत्तीसगढ़ के स्थापित सशक्त साहित्यकार आँय।जिंकर लेखनी हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी दूनो भाषा म गद्य अउ पद्य दूनो विधा म समान अधिकार ले चलथे। डॉ. यादव जी शिशु अउ बाल गीत ले लइका मन के मन ल मोह लेथें। वोमन सबो किसम के रचना करे म सिद्धहस्त हें। उँकर पूरा जिनगी लइका मन तिर रहिके बीते हे। गुरुजी के नौकरी ले छुट्टी पाके (सेवानिवृत्त) आजो सरलग लिखई म भिंड़े हे। साँस्कृतिक संस्था के संचालन करत आप कतको लोककला अउ परम्परा ल नवा जिनगी दे हव। आप लोक संस्कृति के संवाहक के रूप म छत्तीसगढ़ी संस्कृति अउ परम्परा ल लिखित रूप म स्थापित करे म बड़़ भूमिका निभाय हव। आप छत्तीसगढ़ी स्वाभिमान ल जगाय बर बाना धरे सरलग लिखत आवत हव। 

        आप के लेखन म शिल्प अउ भाव दूनो पक्ष म कोनो किसम के कमी नइ मिलै। आपके सधे लेखनी के कमाल आय के आपके गीत मन म ध्वन्यात्मकता अउ संगीतात्मकता के सुग्घर समन्वय देखे ल मिलथे। समीक्षित ए संग्रह "बेरा-बेरा के बात" म जतका रचना हें, ओ मन म गेयता हे। हर कविता ल गीत अउ ग़ज़ल नइ केहे जाय, काबर कि गीत अउ ग़ज़ल दूनो के अपन एक बनकट (बुनावट) होथे। फेर हर गीत अउ ग़ज़ल मन ल एक कविता माने जाथे। इही बात आय के आप ए संग्रह ल कविता संग्रह लिखे हव। एमा गीत के संग म ग़ज़ल घलव शामिल हे। ए अलग बात आय के अब छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ल उर्दू ग़ज़ल के जइसे मीटर/पैमाना या बह्र म परखे जावत हे। आप रामेश्वर वैष्णव अउ मुकुंद कौशल मन के संग छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के बीड़ा ल उठा नवा पीढ़ी ल लिखे बर प्रेरणा बने हव। आप सब के छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ल पढ़के नवा पीढ़ी मन घलव ग़ज़ल म हाथ आजमावत हें। 

       आप के ए संग्रह के रचना मन म हाना अउ मुहावरा मन दगदग ले नजर आथे। कतको जगा म आप नवा हाना गढ़े म सफल होय हव। प्रतीक योजना अउ बिम्ब आपके रचना के बड़ा खासियत आय। काव्य के तत्व रस, अलंकार तो आपके रचना म छत्तीसगढ़ के गँवई-गाँव म बिराजे देवी-देवता मन सहीं देखे मिलथे। रूपक अउ अनुप्रास अलंकार के भरपूर झलक मिलथे। 

          संत बाबा घासीदास जी के परम्परा ल आगू बढ़ावत मनखे मनखे एक समान के संदेश ल डॉ. यादव जी मन अइसन लिखें हें -

         *मनखे तो मनखे आय, चाहे करिया होय के गोरिया।*

         उहें कबीर दास जी जइसे समाज के ठेकेदार मन ल हड़काथे-

         *मनखे-मनखे मभेद करके,*

         *सब करत हें पोठ धंधा।*

         *धरमी खोल धरम दुकान,*

         *बटोरे धरम के नाँव चंदा।*

*रंग बिरंग लगाए झंडा, पंडा ओरपिट्टा बइठे ओरिया।*

    एक ठन उदाहरण देखव जेमा प्रतीक अउ अलंकार दूनो सँघरा नजर आथे- 

     *चरू चुप्पे चाल चलिस, चरू ह होगे हंडा।*

      *देवता ठाड़ लाँघन भूखे, मोटाय पुजेरी-पंडा।।*

       पहली डाँड़ म अनुप्रास अलंकार हे, संगे संग दूनो डाँड़ म प्रतीक योजना लाजवाब हे। छत्तीसगढ़ ले बाहिर के मनखे इहाँ आके चाल चलथे अउ देखते-देखत हंडा वाला हो जथे। धनवान बन जथे। देवता सहीं इहाँ के किसान मजदूर लाँघन मरथे अउ पुजेरी पंडा बने बइठांगुर मन मोटावत हें।

         बिम्ब म डॉ. यादव जी के मारक क्षमता ल देखव- 

*संझा बिहनिया टेकत मंदिर-मंदिर में माथ।*

*दाई-ददा आश्रम परे सास-ससुर हे साथ।*

       मानवीय मूल्य के गिरावट ल लेके डॉ. यादव जी के पीरा ल देखव-

   *मान गउन होगे हरू, मनखे-मनखे बर गरू।*

     *मनखेपन नंदागे कहाँ, बोली-बोले बिकलम करू।*

     *कहाँ ले झपागे जिंग म घिरना के किरवा?*

     कतकोन जगह समासिक शब्द मन के प्रयोग ह रचना मन के सुघराई ल बढ़ा देहे।

      छल-कपट, नारी-परानी, धरम-करम, हित-मीत, अँवरी-भँवरी, लहू-पछीना, डारा-पाना....अउ कतको शब्द मिलही।

         ए संग्रह के तुकांत अउ शब्द संयोजन ल देख के कहि सकत हँव कि छत्तीसगढ़ी शब्द भंडार ऊप्पर अँगरी उठइया मन ए संग्रह ल कहूँ पढ़ लिही त उँकर चेत हजा जही। उँकर जम्मो भ्रम ह टूट जही। छत्तीसगढ़ी के शब्द भंडार अतेक विपुल हे। छत्तीसगढ़ी ल कमती आँके बर भुला जही। तुकांत शब्द के कुछ बानगी देखव---अलकरहा, हरहा, बरहा, धरहा, गरहा, थरहा, परहा, जरहा, मरहा, सरहा, तरहा, दरहा, लरहा। 

      बिया के, पिया के, जिया के, खिया के, दिया के, सिया के ,....जइसन  कतको सजोर तुकांत संग्रह म नजर आथे।

        अवसरवादी मन ल चेचकारत लिखथें-

   *अघुवा बने के दम नहीं त,कखरो बने चम्मच झारा।*

   *कोनो सरपंच के भाँचा, कोनो बनगे पंच के सारा।*

*काँख-काँख के पेलत हें, लद्दी म सटके चक्का।*

         एक रचनाकार रचनाकार होय के पहिली मनखे आय अउ समाज ले ओकर जुड़ाव रहिथे। इही जुड़ाव ओला समाज हित बर सोचे मजबूर करथे। सामाजिक सरोकार ल पूरा कर सचेतक के रूप में समाज ल दरपन दिखाय म रचनाकार कभू पीछू नइ राहँय। डॉ. यादव जी मन घलव अपन ए दायित्व के निर्वाह करे हें।

         संग्रह के शीर्षक रचना म श्रमशील करमइता के महिमा मंडन करत लिखें हें-

*कोनो काँही करे हिन्ता करमइता नइ करे चिंता।*

*उदीम-उजोग करइया ह, लाखों म एक नाव गइन्ता।*

          ग़ज़ल मन म बड़ मरम के बात पढ़े बर मिलथे। जउन ग़ज़ल के सब ले बड़े खासियत माने जाथे।

       *अपन अपन ढपली अउ अपन हे राग,*

        *गली गली गाल बजावत हे मनखे।*


        *अपन दुख ले कहाँ, दुखी हवै कोनो,*

        *पर के सुख देख गुंगवावत हे मनखे।*

       सरल अउ सहज शब्द म छत्तीसगढ़ी अस्मिता, तीज परब, किसान के पीरा, सर्वहारा वर्ग के संसो, शोषित मन के दुखड़ा के संग जागरण के गीत ए संग्रह म सिलहोय गे हे। शोषक अउ शोषित दूनो ल पटंतर दे म कोनो कमी नइ करे हे। शोषित ल शोषण के विरुद्घ खड़े होय बर पटंतर हे, व्यंग्य हे।

      ए संग्रह सामाजिक अउ राजनीतिक घालमेल अउ अबेवस्था के विरुद्ध शंखनाद आय। स्वाभिमान अउ जागरण के प्रतिनिधि संग्रह आय। मानवीय मूल्य ल सहेजे के कोशिश म लिखे गे अइसन सुग्घर संग्रह बर डॉ. पीसी लाल यादव जी हार्दिक शुभकामना अउ बधाई।


संग्रह : बेरा-बेरा के बात

रचनाकार: डॉ. पीसी लाल यादव

प्रकाशक : वैभव प्रकाशन रायपुर छग.

पृष्ठ सं. - 88

मूल्य : 100/-


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी

जिला बलौदाबाजार भाटापारा छग.

9977252202

छत्तीसगढ़ के गांव मा तरिया के महत्व"


 

"छत्तीसगढ़ के गांव मा तरिया के महत्व"

छत्तीसगढ़ मे गांव के  तरिया मन के गंगा जइसन  मान हे। जब हम नान_ नान रेहेन ता पानी बर तरिया  के च भरोसा रहाय । गांव के लोगन  मन  खेत_ खार डोंगरी_ झारी जावय त जात _ जात तरिया  ले पानी भरे अऊ संग मा लेगे ।आतिखानी लकड़ी के बोझा ला तरिया  मेढ़ में टेका के असनान करें। गांव के मनखे अऊ गाय_ गरू सबों मनके नहाना _ धोना तरियाच में होवय। एमा  बइला _भईसा  मन ला धोबेच करें, लइका मन घला बहुतेच डुबके। काबर कि ओ घाट ह  चातर राहय,बाकी डाहा गजब गाज राहय, ओमा  चिंगरी मछरी गजब राहय । लइका_ सियान मन पटका_ लुगरा के पेलना बनाके मछरी पेले । कोनो_ कोनो तरिया के एकात कोंटा ला बांध के मछरी धरय त कोनो भरे मंझनिया में मछरी तमडे बर जाय। अब तो सब नदागे काबर कि सब तरिया मन ला ठेका दे देथें अऊ ठेकादार मन मछरी पालन कर थे ।                                                                             ठौउका अभी  आठे तिहार आवथे हमर गांव में  आठे तिहार में उपसहा लइका मन डोंगरी जाय अऊ कच्चा तेंदू ला टोर के, फोड़  के , ओकर सीथा निकार के लाने अऊ तरिया मां रगर _रगर के धोए अऊ घर में लानके वोला गुड़  मां पागे, ओहि ह आठै उपास के फलाहारी रहाय ।                                       भोजली, जवांरा , गऊरा _गऊरी , गनेस  भगवान ला ठंडा, तरिया में करे। सन अऊ डोरी पटवा ला सरोना है ता तरिया च मां ।             खेत में अपासी के काम आए तरिया हर एकरे सेती सियान मन गांव में तरिया बनाए बर बहुत जोर देवे । दुरुग जिला मा शरदा गांव मा गए  रेहेव ता ऊहा के मन बताईन के इहा छे आगर छे कोरी तरिया हावय । ऐसना कई ठन गांव हे । तरिया सुखा जाय ता तरिया तिर में झेरिया खन के पानी पिएं।गांव के गोटिया मन अपन _अपन चक  मे तरिया बनावे।           

    गांव में कोनो काम होवय _ जैसे कि बर_ बिहाव, मरनी _हरनी सब बर तरिया के पानी ला बऊरय काबर कि कुआं ह एकात घर में रहाय या तो एकात ठन रहाय । तरिया के पानी गांव भर बर अमरीत आय। आजो घलो तरिया के महातम बने हावय । फेर जनसंख्या के बढ़ोतरी के मारे तरिया पार तक नई बाचत  हे ,ऊहू में सब पोगरा _ पोगरा के घर बनात हे। ये  बने बात नई ये सब मन ला पानी के जातका सोत हे ओला बचाना चाहिए।            

   डॉ बी नंदा जागृत

छत्तीसगढ़ के गाँव म तरिया के महत्व- चोवाराम वर्मा बादल


 

छत्तीसगढ़ के गाँव म तरिया के महत्व- चोवाराम वर्मा बादल

--------------------------------------

बिना तरिया के कोनो गाँव के कल्पना नइ करे जा सकय।तरिया ह तो हमर ग्रामीण जन जीवन के बहुतेच जरूरी अंग आय।एकर बिना हमर जिनगी ह नइ चल सकय।

   जल ला जीवन कहे गे हे। चाँटी-चिरगुन, जानवर,पेड़-पौधा ले लेके मनखे तक कोनो भी जीव पानी बिना जिंदा नइ रहि सकय।बहुत कस मान्यता के संग ,विज्ञान के तको कहना हे के मनखे के काया हा प्रकृति के पाँच तत्व पृथ्वी,जल, अग्नि,आकाश अउ वायु ले मिलके बने हे जेमा जल के अधिकता हे।

        जीव के उत्पत्ति जल ले  सागर तीर म अउ विकास सभ्यता के महतारी नदिया मन के तीर म माने जाथे। संसार के जतका पुराना ले पुराना कोनो भी सभ्यता हे --चाहे वो सिंधु घाटी सभ्यता हो ,चाहे सुमेरु सभ्यता हो या दजला-फरात(मोसोपोटामिया) सभ्यता हो ,पीये बर या आन काम म बउरे बर पानी के सहजता ले मिले के सेती नदिया

के तीर मन म पनपे हें।

   अइसे लागथे के मनखे मन ह जब खेती किसानी करके अन्न उपजाये ल धरिन होहीं, संगे-संग  जनसंख्या बाढ़िस होही त नदिया तीर के अलावा एती-वोती फइलिन होंही। जंगल ल चतवार के खेत बनाइन होहीं ,घर-कुरिया बनाइन होंही,गाँव बसाइन होंही---बरसा के पानी ल सकेल के रखे बर बड़े-बड़े गड्ढा कोड़िन होहीं।इही मन तरिया ,कुआँ-बावड़ी आयँ।

        हमर छत्तीसगढ़ म कोनो गाँव या शहर अइसे नइये जिंहा तरिया नइ होही। कई जगा तो छै आगर छै कोरी तरिया के उल्लेख मिलथे जइसे रतनपुर,मल्हार ,खरौद, नवागढ़,अड़भार ,धमधा आदि म । ओइसने सरगुजा अंचल म सात आगर सात कोरी तरिया के जिकर होथे। छत्तीसगढ़ म बड़े-बड़े बहुत कस गाँव हे जिंहा दसों तरिया आजो मिल जथे। हमर छत्तीसगढ़ म कतकोन नामी ,बहुत पुराना तरिया तकों हें जइसे रतनपुर के घी कुड़िया तलाब जेकर बारे म मान्यता हे के वोला अपन अश्वमेध यज्ञ के समे राजा मोरध्वज ह कोड़वाके घीव ले भरे रहिस।ओइसने गोपिया तलाब अकलतरा, बालसमुंद तरिया पलारी, सफुरा माता तलाब गिरौदपुरी, बुढ़ा तलाब रायपुर, कंकाली तलाब रायपुर, तेलीबांधा तलाब रायपुर(श्री शोभाराम साव जी के कोड़वाये), किरारी (जाँजगीर )के हीराबाँध तलाब आदि बहुत प्रसिद्ध हें।अइसनेच कतको ठन पहिली के जमीदार -गौंटिया मन के प्राइवेट तरिया घलो हें।

   छत्तीसगढ़ के गाँव म तरिया के अबड़ेच महत्व हे।तरिया के पार अउ घाट घठौंदा म हमर समाजिक ताना-बाना गुँथाये रहिथे। तरिया कोड़वाना अब्बड़ पुन के काम माने जाथे।

 तरिया के समाजिक अउ साँस्कृतिक महत्व--

-------------

 कई ठन तरिया पनपिया (पेयजल बर) या पनखत्ती के काम आथे। अइसन तरिया के पानी कुँआ कस निर्मल होथे।गाँव भरके मनखे मन एला मिलजुल के साफ-सुथरा अउ पवित्र रखथें। ये हा एक प्रकार के झिरिया या बावली के रुप आय।सुदूर जंगली या पहाड़ी क्षेत्र म अइसन तरिया आजो हाबयँ।अइसन तरिया के पानी ले भोजन तको पकाये जाथे। फेर आज के समे ह बोरिंग-नलकूप के जमाना आय तेकर सेती अउ प्राकृतिक जल स्रोत मन के सुखाये के कारण अइसन तरिया मन नँदावत जावत हें। अइसन तरिया ह शौच बर उपयोग नइ करे जाय।  

  गाँव म अधिकतर तरिया अइसे होथें जे मन सार्वजनिक रूप ले नहाये धोये अउ निस्तारी के काम आथे। बिना जाति धरम के भेदभाव के गाँव के जम्मों निवासी बाल-वृद्ध, महिला पुरुष एकर जल मा स्नान करथें। समाजिक समरसता के ये उज्जर उदाहरण आय।ककरो घर मरनी-हरनी होथे तब तरिया के नाहवन घाट ह काठी ले दशगात्र तक मृतक स्नान के काम आथे। तरिया पार म लगे पीपर पेंड ह छँइहा तो देबे करते , मृतक ल पानी देये बर हाँड़ी (माटी के बरतन ) ल टाँगे के काम आथे। पिंडदान अउ कपिला तर्पण तको एकरे तरी करे जाथे। तरिया पार म लोगन अपन पुरखा के सुरता म बर-पीपर,आमा , बेल जइसे पेड़ तको लगवाथें। कतको झन घाट-घटौंदा बनवाके जनसेवा के कारज करके पुण्य कमाथे।

 प्रायः जम्मों तरिया के पार म देवता धामी के मंदिर जरूर होथे खास करके शिव मंदिर तो होबे करथे जेमा लोगन स्नान करके जल चढ़ाथें। कतको जगा हनुमान जी, महमाया अउ शीतला माता,अंगार मोती दाई के मंदिर तको होथे जिंहा नवरात परब म जँवारा बोके जोत जलाये जाथे। हमर छत्तीसगढ़ म  कई ठन तरिया अइसे हें जिंकर पार म परब विशेष म मेला तको भराथे। होरी के दिन मोंहदा गाँव (धरसींवा) के तरिया पार के मेला जग प्रसिद्ध हे। 

    गणेश विसर्जन, जँवारा विसर्जन, गउरा-गउरी विसर्जन,ताजिया विसर्जन तको तरिया के पवित्र जल म करे जाथे। हरेली तिहार के दिन  इही तरिया के पानी म बाहन- बक्खर ल नँहवा- धोके पूजा पाठ करे जाथे। खमरछट पूजा म दाई -दीदी मन के कोड़े सगरी ह एक प्रकार ले तरिया के प्रतीक आय। बारों महिना गाँव के पशुधन के(बरदी के) पानी पियाये बर ,बुड़ोये बर इही तरिया काम आथे।

   कातिक महिना म बड़े फजर स्नान अउ ग्रहण स्नान इही तरिया म होथे। 

कतकोन पूजा पाठ के आयोजन तको तरिया पार म होथे। बस्तर अंचल म बिहाव के बहुत कस रीति रिवाज तरिया म निभाये जाथे। कांकेर क्षेत्र म अइसन आदिवासी समुदाय हें जिंहा बिहाव के दिन दुलहिन-दुल्हा ह तरिया के सात भाँवर घुमथें अउ सगा-सोदर मन हर फेरा के बाद हरदी चढ़ाथें। फेरा होय के पाछू वर ह कन्या ल पिठइया चढ़ाके तरिया म लेगथे अउ बोहे-बोहे डूबकी लगाके ,बोहे-बोहे वापिस आथे।

     हमर छत्तीसगढ़ म तरिया मन के तइहा जुग ले बिहाव करे के परंपरा तको हे। नवा तरिया कोड़े के पाछू वोकर पूजा -पाठ करके ,बीचो बीच अनेक जगा लकड़ी (सरई के) के खंबा गड़िया के वोकर बिहाव के रस्म ल पूरा करे जाथे । किरारी(जांजगीर) के हीराबाँध तलाब म गड़े मिले लकड़ी के खंबा ल लगभग दू हजार साल पुराना बताये जाथे। कहूँ-कहूँ लोहा के खंबा तको हे जइसे सक्ती के महमाया तरिया म लोहा के हे।ओइसने धमधा म ताम्रपत्र म मढ़े खंबा तको हे।आजकल सिमेंट के खंबा चलन म आगे हे। एला आजकल के भाषा म एक प्रकार ले लोकार्पण कहि सकथन। तरिया के बिहाव होये के पाछू वोकर सार्वजनिक उपयोग करे जाथे। कतको तरिया कुँवारा तको होथें जेकर जल के पूजा-पाठ म अबड़े मान्यता होथे।

   हमर लोकगीत अउ लोकगाथा मन म तरिया के सुग्घर बखान मिलथे। जेंवारा गीत म आजो सुने ल मिलथे--

कोन कोड़ावय ताल सगुरिया, कोन बँधावै पारे,

कोन लगावै लख अमरइया, कोन हवै रखवारे।

राम कोड़ावय लख अमरइया, लखन बँधावै पारे।

सिया लगावै लख अमरइया, हनुमत हे रखवारे।

   ओइसने भोजली गीत म कन्या मन तरिया म ठंडा कर बर भोजली ल लेगे बखत गाथें--

देवी गंगा देवी गंगा, लहर तुरंगा।

हमरो भोजली दाई के भिंजे आठो अंगा।

जय हो देवी गंगा।

 अहिमन रानी अउ रेवारानी के लोककथा म उँकर तरिया स्नान के वर्णन होथे। 

 ओंड़िया गीत म तरिया खनइया ओंड़िया-ओंड़निन मन बर गाये जाथे-

नौ लाख ओंड़निन, नौ लाख ओंड़िया 

माटी फेंके बर जाय

अहा माटी फेंके बर जाय।

 ओइसने राजा बालंद के कथा हे जेमा बताये जाथे के वोहा अपन फौज-फटाका संग जिंहा रुकय तिहाँ जोड़ा तरिया खनवावय। लोकोक्ति हे-

सात सौ फौज जोड़ा तलवा, अइसन रहे बालंद रजवा।

    गाड़ी बइला म नून तेल अउ गृहस्थी के समान भरके गाँव-गाँव म घूम के व्यापार करइया नायक बंजारा मन खने छैमासी तरिया के किस्सा तको सुनाये जाथे।

     कुल मिलाके तरिया  ह एक प्रकार ले गाँववासी मन के आध्यात्मिक अउ सांस्कृतिक हलचल के केंद्र बिंदु होथे। 


आर्थिक महत्व--

---------------

      समाजिक अउ सांस्कृतिक महत्व के संग तरिया के जब्बर आर्थिक महत्व उल्लेखनीय हे। अवर्षा के स्थिति म, ए दू पानी बर जब फसल तरसे ल धर लेथे तब तरिया ह अपासी के काम आथे अउ किसान ह दुकाल ले उबर जथे। 

     तरिया चाहे सार्वजनिक होवय चाहे निजी होवय --मछली पालन के उदिम करे के काम आथे।  मछुवारा समिति या महिला स्वसहायता समूह के मन ये तरिया मन ल लिज म लेके मछली पालन करके भरपूर आय कमाथें अउ गरीबी ले उबर के अपन जिनगी ल सँवारथें।कतको झन ल एकर ले रोजगार तको मिलथे।

  तरिया के तीरे-तीर उपजे पसहर चाँउर ल सकेल-बेंच के कतकोन झन हजारों रुपिया कमाथें।कतेक झन सुनसुनिया भाजी,तिनपनिया भाजी , उरई जर,ढेंस ,करमता भाजी, पोखरा ,सिंघाड़ा के उत्पादन तकों करथें।

जब कोनो तरिया ह अवर्षा म सुखा जथे या फेर तरिया के पानी खजुवाये ल धर लेथे तेकर सेती वोला साफ करे बर गाँव वाले मन तरिया के नाखा(गाँसा) ल फोर के या फेर सबमर्सिबल पंप म पानी ल फेंक के अँटवा देथें तब गाँव के मन  जुरमिल के मतावर करके मछरी पकड़थे तहाँ ले जब लद्दी सुखा जथे तब खतुहा लद्दी ल किसान मन अपन खेत म पाल के वोकर उर्वरा शक्ति ल बढ़ाये के संगे संग सामुदायिक जिम्मेदारी के सुग्घर पालन करथें। ये समे मिले ढुलेना काँदा,बुचरवा काँदा अउ कुकरी काँदा के सुवाद ल का कहिबे?

     हमर तरिया मन के महत्व के जतका बखान करे जाय सब कम पर जही। गाँव के तरिया मन भूजल स्तर ल बनाये रखे के अउ बढ़ाये म अपन अमूल्य योगदान देथें। कतको जगा तरिया खाल्हे म धान लूके, ओल्हा गहूँ अउ ओन्हारी तको होथे।

       फेर आजकल के मनखे मन के चाल-ढाल ल देख के बड़ दुख के साथ कहना परथे के हमरे गलती ले तरिया मन के दुर्गति होवत जावत हे। तरिया पार बेजा कब्जा करके घर बनत हें। पैठू जेमा तरिया के उपराहा उलट पानी ह भरय तेन हा बेजा बियारा-बियारी म घेरा गे, गाँव गली के बोहाये कचरा म तरिया के गहिर गाँसा पटा के उथली होगे तेकर सेती तरिया म चार-छै महिना के पुरती पानी नइ भरै। पचरी म काँछे-काँछ बिछाये मिलथे। साफ-सफाई म ककरो धियान नइये। मेड़-पार खियागे। पेड़ लगाना ते दूरिहा के बात ये ,काट के लेगे बर कतकों तइयार मिलथें। मनखे के सोंच अइसे होगे हे के हम ला का करना हे?पंचायत जाना अउ सरकार जानय। अतका नइ सोंचयँ के सरकारी मनरेगा म तलाब गहरीकरण के बूता म भरपूर रोजी लेके उपरे -उपर ल राँपा म खोड़र देथें?का अइसने म तरिया ह गहिरा होही?

     आशा म दुनिया टिके हे। हमू ल लागथे के अब चेत जरूर चढ़ही अउ सब कोई मिलजुल के सरकार के बिना मुँह ताके अपन जीवन रेखा ,पुरखौती तरिया मन के जतन जरूर करबो तभ्भे हमर तरिया मन के दिन बहुरही।


  चोवा राम 'बादल'

 हथबंद, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के गाँव मा तरिया के महत्व-हेमलाल सहारे


 

छत्तीसगढ़ के गाँव मा तरिया के महत्व-हेमलाल सहारे


छत्तीसगढ़ मा जतका गाँव के महत्व हे, ओतके इहाँ तरिया के घलो हवे। छत्तीसगढ़ के हर गाँव, टोला,शहर-नगर म तरिया के अब्बड़ महत्व हे। तरिया के बिना गाँव के जीवन के कल्पना करना मुस्कुल हे। हर गाँव मा कम से कम पाँच ले सात ठन तरिया मिल जाथे, अउ तरिया के संख्या ह गाँव के आबादी के अनुसार घलो कम-जादा होथे। पहली के राजा-महाराजा अउ मालगुजार मन अब्बड़ तरिया खनवाय।जे तीर उँखर खेत रहय,ते तीर उँखर पोगरही तरिया रहय। कई गाँव,सहर म तो कोरी-कोरी तरिया देखे ल मिलथे। जेहर तरिया के महत्व के प्रमाण आय। तरिया म साल भर ले पानी भरे रथे,जेकर ले निस्तारी के सुविधा बने रथे। कोनो-कोनो तरिया मन गरमी मा सुखा जाथे, त जादा गहरी तरिया मन के पानी बचे रथे। उही पानी म गाँव वाले मन के काम ह सरकथे।


तरिया ह हमर जीवन के छोटे ले बड़े कारज मन म काम आथे। सबले पहली तो तरिया म नहाय के मजा आथे,फेर कपड़ा धोवई, गरू-गाय मन ल धोवई, चुरोना कांचई,छट्ठी-बरही के कपड़ा धोवई, मरनी-हरनी के नहवाई, बर-बिहाव म सगा-सोधर के नहवाई अउ घर-दुवार बनाये बर पानी के उपयोग जरूरी होथे। कभू-कभू तरिया तीर के किसानी काम म तरिया के पानी पलोय के घलो काम आथे। हरेली तिहार म नांगर,जुड़ा,कुदारी,रापा,टंगिया, हँसिया अउ देवारी तिहार म घर के कपाट मन ल धोय के काम तरिया म होथे।


तरिया म नहाय के आनन्द अलगे होथे। बिहने-बिहने ले तरिया के भाप उड़त गरम पानी म नहवई अब्बड़ सुहाथे। घर के नहवई म तरिया जइसे मजा नई आवय। तरिया के नंगत भरे के बाद नहवई अउ जादा मजा देथे। इही सेती लईका मन कूद-कूद के नहावत रथे। बांवत के समय मंझनिया जब नांगर ढीले के पीछू बईला धोवन अउ तरिया म नहाके निकलन तब जम्मो थकासी मिटा जाये। तरिया के पानी अतिक सुहाथे कि खेत ले लहुटे त पहली सियान मन तरिया म नहाके अपन हिरदे ल जुड़ावय। तभे घर जाये। गरमी दिन म दाई मन तेंदू पान टोरे बर जाये त आवत ले मंझन हो जाये। लहुटती म तरिया मेड़ म बोझा ल उतारे अउ तरिया म नहाय,फेर कच्चा कपड़ा म घर आ जावय। अईसन छत्तीसगढ़ मा तरिया के महत्व हे।


गाँव के तरिया म घठोंदा के अब्बड़ नियम घलो हवे। तरिया म दू ठन घठोंदा प्रमुख रथे। माईलोगिन घठोंदा अउ टुरा घठोंदा। माईलोगिन मन के घठोंदा मा टुरा जात मन नई नहाय अउ टुरा जात मन के घठोंदा मा माईलोगिन मन नई नहाय। 


गाँव के तरिया के एक ठन अउ बिशेषता हवे कि इंहा के एक-दू ठन तरिया म देव-धामी के मंदिर जरूर रथे। हमरे गाँव के मंदिर तरिया म संतोषी माता,शिवजी,गणेश जी,कार्तिक जी अउ दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर हे। मोला सुरता हवे पहली सियान मन नहाय तहन मंदिर मा फूल चढ़ाय तभे घर जाये। गाँव म तरिया ह पबरीत जगह हवय। बर-बिहाव के बाद दूल्हा-दुलही ल रातकुन तरिया म नहवई अउ दुलही के तरिया ले करसा भरके पानी लवई के नेंगहा अउ सुरहुती तिहार म गौरी-गौरा विसर्जन के पहली बिहने ले करसा म दाई-माई मन के तरिया ले पानी लवई आजो चलत हे। ये हमर तरिया के सांस्कृतिक महत्व के चिन्हारी आये।


नान्हे पन म तरिया म नंगत के डूबकई,गरमी दिन म घेरी-बेरी नहवाई अब्बड़ सुरता आथे। गणेश,सरस्वती, दुर्गा विसर्जन,जंवारा विसर्जन,गौरी-गौरा विसर्जन म नंगत भरे पानी म नरियर अउ खीरा ल लालच में कूदई। संगवारी मन संग तरिया ल आर-पार करई। बचपना के सुरता के संग म तरिया के महत्व जुड़े हवय। तरिया के तीर म कमरछठ के उपासिन मन सगरी बनाके कथा-कहानी बतात पूजा-पाठ पूरा करथे।


पहली घर बनाये त सुक्खा बांस के कमचिल ल तरिया म बोर दे रहय। जे दिन गड़ाड़ करना रहय उही दिन तरिया ले निकाल के लाये अउ ठेसे। सन अउ पटवा ल घलो सरोय के काम तरिया म आवय। सरे के पीछू डोरी निकाल के ढेरा म सियान बबा ह आंटय।


तरिया म कई ठन जीवधारी मन के बासा रहिथे। कई ठन जिनिस के पैदावार घलो होथे। तरिया ल एक ठन अलगेच दुनिया घलो कहि सकथन। कमल-खोखमा के फूल,पुरईन पान, सिंघाड़ा, ढेंस, करमोता भाजी,पसहेर चाऊर जइसे जरूरी चीज मन तरिया मन मिलथे। इंकर बुता करईया मन बाजार म बेच के लाभ कमावत रथे।


तरिया म मसरी बोये के काम घलो होथे। गाँव के कोनो आदमी नहिते समूह वाले मन मसरी बोय रथे। बाजार नहिते कोनो तिहार म तरिया मा अब्बड़ भीड़ रथे। काबर कि इहि दिन मसरी ल पेल के निकालथे अउ बेचे बर लेगथे। कई झन कमचोरहा सही मनखे मन दिनभर गरी ल धरके तरिया मेड़ म बईठ के साग सिल्होत घलो रथे।


अब रोज बाढ़त गरमी के सेती तरिया मन घाम दिन आये के पहली सुक्खा हो जाथे। जल स्तर नीचे होवत जात हे। अब तो तरिया के पानी के निस्तारी बर गरमी मा पंचायत डहन ले बोर चालू कर के भरत रथे। जेकर ले गाय-गरू,छेरी-पठरू के पिये के संग तरिया के भरे पानी अउ कतको काम आथे। आज घलो कोनो डहर ले डेरा वाले मँगईया-खवईया मन आथे त ओमन तरिया तीर मा अपन झाला-झोपड़ी ल बनाथे। ताकि तरिया के लाभ ले सकय।


आजकल नवा तरिया खनाही तेहा कब पटा के खेत बन जहि,पता नई चले। खनईया मन बने खने नहीं। अउ कही खनागे त, तरिया मेड़ ह बांचे नहीं। टेक्टर-मोटरवाला मन तरिया मेड़ के जम्मो मुरुमी अउ माटी ले लेज के बरोबर कर देथे। त अईसने मा कहाँ तरिया बच पाही।


गाँव के तरिया ह हमर संस्कृति के  सबो कारज संग जुड़े हवय। फेर तरिया जइसे पबरीत जगह मा गंदगी फैलई ह बने बात नो हरे। गाँव के मन दातुन-मुखारी के बाद कुची ल उही पानी कर फेंक दिही,दूसर जगह नई रखे। ब्रश, मंजन करईया मन तीर-तीर मा बिन ठिकाना के थूके रहही। अउ मंजन डब्बा ल घलो फेंके रथे। नहाय अउ कपड़ा धोय के साबुन के कागज फेकाय रथे, पूजा-पाठ के बाद फूल-दूबी,राख-माटी, नरियर के बुच अउ खोलटी। फूल-पतरा के डारा-पाना अउ सुखाए तुलसी के पेड़ ल घलो ठंडा कर देथे। येकर ले ये चीज मन पानी म सड़ के गंदगी फैलात रथे। जेहा अच्छा बात नोहे। येला कचरा गड्डा डारे म नहिते आगी जला दे मा जादा अच्छा रहही। भला होवे महिला समूह वाले दीदी मन के जेमन खरहेरा,रहेर के बाहरी म बाहर के साफ करत रथे। तरिया सबो झन के हरे त साफ-सफाई के जवाबदारी घलो सब के रहना जरूरी हे। तभे हमन अवईया पीढ़ी मन बर तरिया ल साफ-सुथरा अउ बने सुग्घर ढंग ल बचा के रख सकबो।


हेमलाल सहारे

कहां जाबे रे कनवा* *- दुर्गा प्रसाद पारकर*

 

*कहां जाबे रे कनवा*

*- दुर्गा प्रसाद पारकर* 

                        

छत्तीसगढ़ म तो लोक कथा के भरमार हे। आज बबा अऊ डोकरी दाई मन करा ले जादा ले जादा कहानी किस्सा ल बटोरे के जरूरत हे। नइ सकेलबो ते फेर सियान मन के माटी म मिलते भार लोक कथा ह मटिया मेट हो जही। गुलाल राम ह गुड़ी म बइठ के एदे लोक कथा ल सुनइस-एक झिन किसान के चार झिन बेटा राहे ग। चारो म सबले छोटे टूरा के नाव गिजोरवा राहे। काम न धाम के गीज-गीज करत राहे। बहू आए के बाद घलो काम बूता नइ करय । भइया भऊजी मन गिजोरवा के कोड़ियाई ले हदास होगे ताहन लड़ई झगरा मात गे। गिजोरवा के ददा ह अपन बेटा बहू मन ल समझइस-अरे भई गिजोरवा ह काम बूता भले नइ करय फेर कविता तो लिखथे। अतका म बड़े भाई कथे-कविता ले पेट थोरे भरही ग। बर बिहाव नइ होय रिहिस त गिजोरवा ल पोसत रेहेन फेर अब तो बहू आगे। अपन परिवार के जिम्मेदारी ल खुदे उठाए अऊ काली ले अलग खाय। रात कन गिजोरवा ल भारी उदास देख के ओकर गोसइन कथे-राजा के राज दरबार म जा के अरजी करबे, उहें तोर कविता के कदर हो जय। अपन घरवाली के बात ल मान के चांऊर दार धर के मोटरी म रोटी बांध के शहर जाए बर निकल गे।

रेंगत-रेंगत गिजोरवा थक गे। पीपर पेड़ के खाल्हे म अपन मोटरी ल मड़ा के अंगाकर रोटी खाए बर धर लिस। कनवा मुसवा के नीयत ह गिजोरवा के मोटरी उपर परगे। मोटरी ल मुसवा ह देखे बर धर लिस | देख के गिजोरवा कथे-टुकुर-टुकुर देखत हवे। थोकिन देर बर मुसुवा ह मोटरी डाहर रेंगे ल धर लेथे। ओला देख के गिजोरवा कथे-धुसुर-धुसुर रेंगत हवे।

मुसवा ह मोटरी ल कोड़ियाए बर धर लेथे। गिजोरवा फेर कथे-कइसे खुसुर-खुसुर कोड़त हवे। गिजोरवा के भाखा ल मुसवा ओरख के रेंगे ल धर लेथे। देख के गिजोरवा कथे-कहां जाबे रे कनवा। कविराज गिजोरवा ह बहुत खुश होगे चलो आज एक ठन कविता बन गे-


टुकुर-टुकुर देखत हवे, धुसुर-धुसुर रेंगत हवे, 

खुसुर-खुसुर कोड़त हवे, कहां जाबे रे कनवा।


गिजोरवा ह गीज-गीज करत मार रटपट-रटपट शहर चल देथे। राजा के महल म पहुंच के अपन अरजी देथे। गिजोरवा के परीक्षा बिहान दिन लेहूं कहि के राजा ह मंत्री करा ओकर रेहे बसे के बेवस्था करवा देथे। गिजोरवा मने मन गुनथे नौकरी के सवाल हे बने कविता ल याद कर लेथंव कहि के अधरतिया अपन कविता ल याद करत रिहिसे - कइसे टुकुर-टुकुर देखत हवे। ठऊंका उही समे तीन झिन चोर महल म चोरी करे बर टुकुर-टुकुर देखत राहे। चोर मन फूसुर-फूसुर गोठियाए ल धर लिन-कलेचुप राहव कोनो जागत हे तइसे लागत हे कहि के तिजौरी डाहर रेंगे ल धर लिन। ओतके बेर गिजोरवा काहत रिहिस-धुसुर-धुसुर रेंगत हवे। ए बात सुन्न के तीनो चोर सन्न रहिगे। बड़ हिम्मत करके तिजौरी ल कोड़े बर धर लिन। गिजोरवा ह फेर याद करत राहय -खुसुर-खुसुर कोड़त हे। चोर मन सोचथे कि अब हम्मन ल कोनो देख डरिस कही के थोर बहुत गाहना गुरिया ल धर के भागत राहय। ओतके बेर गिजोरवा पढ़त राहे-कहां जाबे रे कनवा। संयोग से चोर के सरदार कनवा रिहिसे घबरा के चोर मन मंत्री करा आत्म समर्पण कर दिस।

कउनो हम्मन आत्म समर्पण नइ करबो ते राजा भारी सजा देही कही के। जबकि गिजोरवा उन ल नइ देखे रिहिस। बिहान दिन सबो घटना ल जब मंत्री ह राजा ल बतइस त राजा ह राज्य के धन रक्षा करे के अवेजी म कविराज गिजोरवा ल सम्मानित करीस।


-00-

राखी तिहार- दुर्गा प्रसाद पारकर*


राखी तिहार- दुर्गा प्रसाद पारकर* 

*राखी बांधे बर बहिनी मइकेे आही*

*रक्षाबंधन के धरम ल भइया निभाही* 


*- दुर्गा प्रसाद पारकर* 

रक्षाबंधन के तिहार ल श्रावण मास के पूर्णिमा के दिन बड़ा धूमधाम ले मनाथे। रक्षा सूत्र ल ही रक्षाबंधन केहे जाथे। रक्षाबंधन ह वेद के संस्कृत शब्द 'रक्षिका’  के अपभ्रंश आय। रक्षिका के अर्थ-'रक्षा करे खातिर वचन देवई’ आय। राखी तिहार के परम्परा कब ले चले आवत हे एमा विद्वान मन के अलग-अलग मत हवय। कोनो विद्वान कहिथे-ए परम्परा ह राजा बली के समे ले चले आवत हे। जब राजा बली निन्नाबे जग पूरा करके सौवां जग पूरा करे बर बइठिस तब गुरू शुक्राचार्य ओला ये न बध्यो बली राजा... मंत्र ल पढ़ के रक्षाबंधन बांधिस। जउन मंत्र ल आज भी पंडित मन रक्षाबंधन बांधे के बेरा म पढ़थे।

रक्षाबंधन तिहार (पर्व) के संग कतनो ऐतिहासिक अउ पौराणिक कथा जुड़े हे। जइसे एक घाव देवता अउ राक्षस मन के युद्ध होइस। युद्ध म देवता मन हारे बर धर लिस। तब गुरू बृहस्पति के सलाह के मुताबिक राक्षस मन ल हराये खातिर इन्द्राणी ह मंत्र तंत्र अभिशक्ति युक्त धागा दिस। जेकर से देवता मन ल युद्ध म विजयश्री मिलिस।

पौराणिक कथा के मुताबिक अइसे केहे जाथे एक घाव बामन अवतार म भगवान विष्णु जी ल राजा बली करा दास (द्वारपाल) बनके सुतल म रेहे बर परिस। बहुत दिन बीते के बाद भगवती लक्ष्मी जी ल चिंता होइस। भगवान विष्णु जी ल खोजे बर लक्ष्मी मइया ह सुतल लोक पहुंचिस। उहां जा के देखथे त भगवान विष्णु जी ल अपन वचन के पालन करे खातिर राजा बली के सेवक बनके रेहे बर परत हे।

एला देख के माता लक्ष्मी जी ह राजा बली ल रक्षा सूत्र रूपी राखी बांधिस तब राजा बली ह माता लक्ष्मी ल किहिस-बहिनी उपहार के रूप म आज तोला जउन मांगना हे मांग ले, मंय जरूर दुहूं। तब माता लक्ष्मी किहिस-भैया मोला कुछु नइ चाही बस आपके ए सेवक (द्वारपाल) ल दे दे। एकर बाद राजा बली ह भगवान विष्णु जी ल दासता से मुक्त कर दिस। तिही दिन ले बहिनी मन अपन रक्षा खातिर भैया मन ल राखी बांधे के परंपरा शुरूआत होइस हवय।

पहिली तो पंडित मन घर-घर जा के रक्षा सूत्र ल बांधय। ओकर अवेजी म पंडित जी ल सब उपहार देवय। अपन रक्षा खातिर घर म, गाड़ी म, मोटरसाइकिल म राखी बांधथे। धार्मिक ग्रंथ मन म घलो राखी ल लगाय के परम्परा चले आवत हे। पहिली तो राखी तिहार ल सादा नरबदा मना लेवय फेर समय के संग आज राखी तिहार ह भव्य रूप ले ले। राखी तिहार के अगोरा सबो भाई बहिनी मन ल रथे। राखी तिहार ल तो बहिनी मन अगोरत रहिथे काबर कि  बहिनी मन अपन भाई ल राखी बांधे बर मइके जाथे। जेला साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर ह गीत म बहुत बढ़िया वर्णन करे हवय -


फूलगे य फूलगे य, फूलगे य चिरइया

मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया

राखी बांधेे बर, बहिनी मोर आही

भाई-बहिनी के धरम ल निभाही

अंगना म चिहुकत हवय य चिरइया

मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया।


धरती मइया कस थारी सजाहूं

सुरूज नारायण कस दीया जलाहूं

माथे म सगुन के तिलक लगाहूं

हाथे म असीस बर नरियर धराहूं

अमरइया म कुहु कुहु कुहकय कोयलिया

मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया।


हाथ म चंदा कस राखी चमकही

नदिया नरूवा कस मया कुलकही

जंगल झाड़ी मन नाचही करमा

खुशी के सागर ह आही घर-घर म

बाजा बजाही दुम दुम कारी बदरिया

मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया।


असीस दिही बड़े भइया मोला

मंय असीस दुहूं छोटकू भाई तोला

भाई के राहत ले नइ राहय फिकर

गजब दुख होथे, भाई नइ राहे जिंकर

अजर-अमर रहे भाई-बहिनी के मया ह

मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया।


-00-

छत्तीसगढ़ के गाॅंव मा तरिया के महत्व*- रीझे यादव


 फोटो-दर्री तरिया सुरगी,राजनांदगांव


*छत्तीसगढ़ के गाॅंव मा तरिया के महत्व*


तरिया हा छत्तीसगढ़ में निस्तारी के साधन मात्र नइ होवय।ये हर हमर गंवई परंपरा अउ रीति रिवाज के चिन्हारी घलो हरे। बड़े बड़े गौंटिया अउ मंडल मन अपन पुरखा के नाॅंव ला जगाय खातिर अउ गाॅंव के गरीब मनखे मन ला रोजगार दे खातिर तइहा बेरा मा कुंआ,बाउली अउ तरिया खनवावय। छत्तीसगढ़ मा बंजारा जाति के बेपारी मन बिकट अकन तरिया खनवाय हवै।कहूं ना कहूं मेर नायक तरिया या नायक बांधा मिली जथे।गांव मन घलो उही तरिया मन के नांव ले धरे गे हवै।

तइहा के बेरा मा कुंआ के पानी ला रंधनी,बरतन के धोवई मंजई अउ बारी बखरी पलोय बर बउरे जाय।मनखे के नहाय, कपड़ा धोय बर अउ मवेशी धोय बर तरिया मा ही लोगन जावय।

मरनी हरनी के सबो नेंग नियम तरिया पार मा ही होवय।गांव के जंवारा,भोजली,गौरी गौरा अउ गणपति विसर्जन घलो तरिया मा ही करे जाय अउ आज भी करे जाथे।पितर पाख मा पुरखा ला पानी देवई अउ कतको धार्मिक कार्यक्रम मा तरिया के पानी ले ही संपन्न होवय।

पहिली पटवा डोरी निकाले बर वहू ला पानी में बोर के रखे राहय।तरिया पार मा ही कतको गांव मा शीतला दाई के मंदिर हवै।बर, पीपर के रुख अउ शिवजी के मंदिर छत्तीसगढ़ के तरिया के चिन्हारी आय।कहूं कहूं गांव में तरिया के मेड़ मा अमरईया घलो देखे बर मिलथे।

ननपन मा तरिया मा ही डेरा रहे हमर।मछरी टमरई अउ बर रूख के लाहा में झुलना झूले में बड़ मजा आवय।फेर समय बदलत गिस।मनखे सुविधा भोगी होवत गिन।

आज घरो घर नल हवै।एक बांगा पानी में मनखे नहा डारत हे।काकरो कना समे नइहे मुखारी घसरत तरिया पार मा बइठे के। जब कोनो जिनिस के वास्तविक  उपयोग सिरा जथे ता मनखे ओला आने चीज बर बउरे ला धर लेथे।वइसने अब गांव के तरिया मन नहाय खोरे बर उपयोग नइ होवत हे बल्कि गंजहा दरुहा मन के अड्डा बनत हे।कचरा फेंके के घुरवा बनत हे।कभू काल मरनी हरनी के बुता मा मनखे जथे त नाक ला बंद करके दू बूंद पानी के छींटा मार के मरनेवाला ला पानी देवत हे।अतेक दुर्गति होगे हे तरिया के।

हमर पुरखा काहय कि जेन तरिया अउ कुंआ ला पाटथे ओमन निरबंशी हो जथे।आज मनखे के लालच अउ अलाली सबो ला लीलत हे।


*रीझे यादव,टेंगनाबासा(छुरा)*