Thursday, 18 August 2022

व्यंग्य साहित्यकार के गठबंधन- साहित्य के गोल्लर

 व्यंग्य  साहित्यकार के गठबंधन- साहित्य के गोल्लर


साहित्यकार माने अल्लार अल्लर, कामचोट्टा नम्बर एक। जनम के कोढ़िहा। जेकर कमाए -धमाए बर गतर नइ चलय। फालतू बइठ -घोलन्डके, फोकटइहा घूम- फिरके, बिन मतलब रो- गाके कलम टोरे बर जानथे तेने हँ कलमकार होथे। ये हँ तइहा जुग के बात हरे। तइहा के ल बइहा लेगे। अब नँदा गे। अब तो गठबंधन के जुग आ गे। 


पहिली कलमकारमन रात -रात भर घुघुवा, राक्षस अउ माँसाहारी जंगली जिनावर कस जागय। दिन -दिन भर पगला-बइहा अउ बैसुरहा मन बरोबर लाँघन -भूखे घूमत रहय। बइहा बरन मुड़ी-कान ल खजुवावत सोंच -सोंचके लिखय। तब जाके उन्कर रचना म जान आवय। 


अइसने -अइसने दू चार ठिन रचना सकेला जय अउ लिखइया रात जगई, लाँघन रहई अउ मरे -जिये सोंचई -गुनई म रोगहा होके मर जावय, तब लोगन ओला अउ ओकर रचना ल जानय- सुनय। मनई -गुनई तो गजब दुरिया के बात हरे। 


जिहाँ सरसती राहय उहाँ लक्ष्मी नहीं, जिहाँ लक्ष्मी जावय तिहाँ सरसती नहीं। अब वोइसन बात नइ रहि गे। अब तो सरसती अउ लक्ष्मी म गठबंधन हो गे हावय। जिहाँ सरसती जाथे पीछू -पीछू लक्ष्मी घलो आ जथे। आ जथे का ? सरसती खुदे जुगाड़ भिड़ा़ डारथे। कभू -कभू तो लक्ष्मी खुदे नेवता कारड अउ लिफाफा धरके पहुँच जथे सरसती घर। 


माने कवि, कलाकार घलो कमाए बर सीख गे हे। अब के साहित्यकार म कुछु दम राहय चाहे झन राहय, जोगाड़- प्रचार पहिली देखथे। प्रकासक खोज लेथे जेन ओकर किताब ल छापय-बेचय अउ संगे-संग बिज्ञापन तको करय। 


किताब ल पढ़बे त का रइथे। खोदबे पहाड़, निकलथे छुछु। मुसुवा घलो नहीं। 

हमर बबा अइसे करिस। ककामन अइसे रहिन। ददा अइसे हावय। भाई मन अइसे। अब सवाल ये पइदा होथे के, तैं हँ का करे हस अउ कइसन हस ? 


साहित्यकार मन बड़ चंट, चतुरा अउ चोखू होथे। उन गोठ-बात म अपन महान समे के गर ल मुरसेटना नइ चाहय। उन सबके जुवाब अपन कलम अउ करम ले देथे। कलम के भाखा ल ही उन दमदार मानथे। 

‘हम नहीं हमर करम बोलथे’ के स्टाइल म उन्कर करम ये बयान देथे- ‘भइगे, नेता मन के गोड़ धर गुन -गाके पुरूस्कार के जोगाड़ कर लेथवँ। फोकट म किताब छप जथे। मूर के बियाज अउ बियाजो के बियाज।’ 


‘छींक आथे त मंतरी -संतरी फोन करके पूछथे - ‘बीमार हवस का ?’

अस्पताल म भरती होथौं त मंतरी अपन एसो -अराम ल कोन्टा म बोज-सकेल- तिरियाके अस्पताल दऊँड़ जथे। इही बहाना अस्पताल के निरीक्षण हो जथे। ये हँ का नानमून बात ये ?’


अब येकर कारन सुन ! कारन - मोर गीत उन्कर बर बोट बटोरथे त उन्कर गोठ मोर बर नोट छापथे। गठबंधन के गनित अइसने बइठारे जाथे। गुन गाए म गुनी कहाए लगथौं, पाँव परे म परिवार का पूरा पुरखा तरत हे। पनही पालिस करे म जिनगी चमके जात हे। येकर ले पोठ, बड़का अउ ठाहिल का हो सकथे ?’ 


अब कहुँ कहिबे -‘कवि, कलमकार मन तो स्वाभिमानी होथौ का गा ?’

‘अरे ! टार तोर स्वाभिमान के मुख ल। स्वाभिमान के गोठ हँ सिरिफ मंच अउ किताब भर म सोभा देथे। जिहाँ पेट के बात आथे स्वाभिमान फूटे आँखी नइ सुहावय। स्वाभिमान अउ सम्माने भर म पेट भर जाही का ? तुमन टोंम- टोंम ले पेट भरहा खावव, पगुरावव अउ मसमोटी मारव। हमन बोट -बोट देखत रहन ?’ 


अइसने एक झन कलमकार रद्दा म उदुपहा अभर गे। एक ठिन जुन्ना पेपर म वोकर चुटकुला छपे राहय। उही जुन्ना पेपर ल धरके पान ठेला म पहुँच गे। वोह ठेला पहुँच मीठा पत्ती के मीठ पान बनवाके मुँह भर हुरेस -बोज डरिस। 


चोंच हँ चुकचुक ले लाल हो गे। तब रेंगे के बेरा कहिथे - ‘येदे ! ये पेपर म मोर लिखे कहिनी छपे हे। पढे़ के लइक तो नइ हे। फेर पान -तमाखू बाँधे बर तो पेपर लागथे। पढे़ के पीछू इही ल चीर के बाँध लेबे। बाहिर ले पेपर काबर लेबे ? तोर पान मोर पेपर, गणित बरोबर बइठ गे न ?’ 

ठेलावाले गुरेर के कलमकार ल देखिस। वोकर लाल -लाल आँखी ल देखके कलमकार के लाल -लाल लार हँ मुँह के कोन्टा ले दाढी के आवत ले बोहा गे। ठेलावाले कहिस-‘मैं हँ तो रोज पेपर मँगवाथवँ। समाचारो पढ़ लेथौं। उही म पान -तमाखू घलो बाँध लेथवँ। एक तीर दू निसाना हो जथे। ये तोर कहिनी- वहिनी ल अपन झोला म रख। मोला पइसा चाही।’

कलमकार के मुँह कोचरके कुंदरू कस तुत्त-ले हो गे। पान के चमनबहार मिले जम्मो कतरी अउ मसाला मन करेला कस चानी करूवा गे। 


कलमकार जम्मो पान ल उलग डरिस-‘चूना ल कइसन भर दे हस। मुँह भर ल चर डारिस। अउ उरमाल म मुँहु ल पोंछत अपन ऐब ल तोपत - छुपावत कहिथे : हाँसी -ठटठा करत रहेवँ बईहा। तहूँ थोरिक बात म गुसिया गेस।’


अतका कहि पान के पइसा दे साहित्यकार सुटक लिस। तैं नही दूसर पार्टी सही। ये हँ तो गठबंधन के जुग ये।


अइसने एक बेर साहित्य सम्मान देना राहय। चयन समिति के टेबल म एक ले बढ़के एक कविता- कहिनी बिलबिलावत -बेलबेलावत राहय। समिति के सदस्यमन अपन -अपन आदमी के चिट धरे उन्कर कविता -कहिनी ल निकाल -निकालके एक दूसर ल देखावत रहय। सब के सब दूसर के नाम काटके अपन आदमी ल बढ़ाए के चक्कर चोंगी उड़ावत गुमताड़ा लगावत रहय। बात अतेक बाढ़ गे के सदस्ये मन अपने -अपन चूँदी- मुड़ी ल चीथ -चीथके लडे़-झगड़े अउ हुदेले-हुमेले लगिन। हार खाके समिति ल भंगलाए बर पर गे।

 

ओतके बेरा एती मंत्री बंगला म एक झन गँवखरहा हाना जोरईया पहुँच गे। मंत्री ल कहिथे -

‘साहेब ! ये बछर के साहित्य पुरूस्कार मोला मिलना चाही।’

मंत्री जब साहित्यकार ले वोकर रचना के बारे म पूछिस। साहित्कार नाक ल उँच करके फुटहा पोंगा कस भनभनावत सुनाए लगिस-

अटकन बटकन दही चटाकन, 

लउवा लाटा बन म काटा, 

बोटिंग म हम बोट देवाएन, 

पेटी -पेटी दारू बाँटेन, 

बिरोधी के छक्का छूट गे, 

हमर नेता जीत गे। 

नेता खुस्स। दाँत ल खबखब -ले निकालके हाँसिस। ओकर पीठ ल ठांकिस-‘का कमाल के लिखे हस। पुरूस्कार तो तुँही ल मिलना चाही। कवि इनाम के सपना ल भीतरे- भीतर चिचोरत घर आ गे।’

 

ओकर निकले के पीछू दूसर कवि पहुँच गे। मंतरी ल सलाम ठोंक के कहिथे-

‘मैं हँ अपन एके ठन चुटकुला ल हरेक मंच म कविता बरोबर बोलथौं अउ हँसा -हँसाके तारी सकेलथौं। एक ले दूसर कभू नइ पढ़वँ।’

मंतरी पूछे - ‘अइसे काबर ?’

‘जिनगी म एक ले दू लिखेच नइ सके हौं। काला पढ़हूँ ? तभो ले मैं पुरूस्कार के दावेदार हौं।’ 

मंतरी कहिस - ‘अरे ! यार, ओकर चयन तो हो गे।’ 


साहित्यकार ‘फट्ट-ले’ मंतरी के गोड़ ल धर लिस-‘चयन होके रिजेक्ट होना हमर देश के संस्कृति अउ तुँहर डेरी हाथ के काम ये महराज।’ 

मंतरी सोच म पर गे- ‘पहिली तैं मोर गोड़ ल तो छोड़। चुनाव करे बर समिति बइठे हे। उहाँ मोर का चलना हे ? चलतिस त कुछु करतेवँ-धरतेवँ।’ 


कवि देखिस अरे ! दार हँ चुरत- गलत नइ हे। उँहूँ.....फार्मूला बदले जाए। मंतरी के गोड़ ल छोडके ‘सट्ट-ले’ खड़ा हो गे। अपन खाँध म रखे गमछा ल घेंच म फाँद लिस अउ कहिस- 

‘देख नेता जी ! तैं मोर सिधई ल देखे हस। नंगई ल नइ देखे हस। अतेक बेर ले बिनती करत रहेव, त तैं मोला निच्चट लल्लू राम समझ गेस। सहीं म सिधई के जमाना नई हे।’

नेता बोकबाय देखे लगिस - अरे ! ये बइहा का करथे।

ओतके म कवि आगू कहिस- ‘सुन ! पुरूस्कार कहुँ नइ मिलिस न, त मैं तोर डेरौठी म फाँसी लगा के मर जहूँ।’ 


कवि के गोठ सुनके मंतरी के आँखी छितरिया गे। हाथ -गोड़ ल तनिया दिस। ‘स्साले ! जउँहर हो गे यार ! अब तो करेच ल परही।’ 

करही कइसे नहीं - नंगरा देख लँगुरवा भागे। 

मंतरी सोचे असन कहिथे - ‘पुरूस्कार तो देवा देहूँ ! फे....र .....सदस्यमन ल पटाए बर लगही। अइसे करथन, दस उन्कर पन्दरा मोर। का बोलथस ?’


कवि फेर गोड़ ल धर लिस - ‘बीसे के जुगाड़ हे। अतके म गनित बइठारे बर परही। कहत खिसा ले निकालके ओकर गोड़ म रख दिस।’ 

कहिस -‘बने फरिहाके गिन ले।’ 

भागत भूत के लंगोटी सही। 


मंतरी कहिथे - ‘दान के बछिया के दाँत नइ गिने जाय। जा, तोर काम हो गे।........ अउ सुन, चुनाव म देखे रहिबे।’ 

कवि चरणदास अपन चारण कविता ल पोटारे ‘हौ-हौ’ काहत मेंछरावत खिसक लिस।

गठबंधन तो होगे हे।

परिणाम जऊन आही तऊन आही। वोकर बर समिति बइठे हे।

मंतरी चार ठो बदाम अउ कुछ काजू कुतर लिस अउ तनियाके सुतगे। 


धर्मेन्द्र निर्मल 

मो. 9406096346

लोक आस्था के पर्व -आठे कन्हैया- दुर्गा प्रसाद पारकर*



लोक आस्था के पर्व -आठे कन्हैया- दुर्गा प्रसाद पारकर*

छत्तीसगढ़ म कृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष्य म जन्माष्टमी ल आठे कन्हैया के रूप म बड़ा धूमधाम से मनाथन। आठे कन्हैया ल भादो महीना के अष्टमी के दिन मनाए के परम्परा हे। भगवान श्री कृष्ण देवकी के गर्भ ले जनम लेवइया आठवां संतान रिहिसे अउ लोक अवतरण घलो अंधियारी पाख के अष्टमी के दिन होय रिहिसे। तिही पाय के छत्तीसगढ़ म आठे कन्हैया ल बड़ा धूमधाम ले मनाथे। छत्तीसगढ़ म आठे कन्हैया के दिन दीवाल म आठ ठन बाल चित्र चूड़ी रंग, स्याही, सेमी अउ भेंगरा ले बनाथे। आठे कन्हैया के दिन सब उपास रहिथे। आठे कन्हैया के दिन मड़िया तिखुर के पकवा के भोग लगाथे। छत्तीसगढ़ म कृष्ण जन्म होथे सोहर गाये जाथे जेमा कंस के कारागार म देवकी अउ वासुदेव के जीवन के त्रासद स्थिति के मार्मिक चित्रण हे -


दुख झन मानव कहे

बसदेव धीरज बंधावे 

कारागृह म पड़े हवन दुनो

कतेक दुख ल साहन ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


हाथ म हथकड़ी लगे

पांव म लगे बेड़ी ओ

कइसे के हम दुनो मिली

दुख बड़ भारी ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


बोलत हवे राजा बसदेव

रानी देवकी रोवथे ओ

प्राणनाथ मोर जीवन के अधार

अब कइसे होही ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


रिमझिम रिमझिम पनिया

जब बरसन लागे ओ

दीदी बिजली ह कइसे चमचम

धमकन लागे ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


आठे के दिन मोर ये दे

पैदा भए कान्हा ओ

कृष्ण अंधियारी राते

पैदा भए कान्हा ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


कृष्ण के जनम लेते भार पहरादार मन सुत गे रिहिन हे, कारागाह के दरवाजा अपने आप खुल गे रिहिसे। तब ईश्वरी प्रेरणा से नवजात कृष्ण ल सूपा म रख के यमुना तट पार करके गोकुल पहुंचाए रिहिसे। छत्तीसगढ़ म आज घलो इही भावना के अनुरूप लइका के जनम होय के बाद ओला धान से भरे सूपा म सुताए जाथे। बाद म सूपा के धान ल जेचकी निपटइया सुईन दाई ल दे दे जाथे।

आठे के दिन जनम लेवइया लोक के कृष्ण कन्हैया ह नम्मी के दिन ग्वाल बाल मन के संग म गोपी मन के दूध दही लूटे बर उतावला हो जथे। छत्तीसगढ़ म आठे कन्हैया के बिहान दिन दही लूट संपन्न होथे। कतनो जघा दही लूटे के बाद नृत्य घलो करथे एला दहिकांदो नाच घलो केहे जाथे। येह आज के मटकी फोड़ के समान ही छत्तीसगढ़ के लोक परम्परा आय।

अइसे केहे जाथे छत्तीसगढ़ म वल्लभाचार्य के जनम बर चम्पारण के आठ मूर्ति के मान्यता हे। उही मूर्ति मन के समूह ल अष्ट कृष्ण केहे जाथे। ए आठो मूर्ति मन के नाम - श्रीनाथ, नवनीत प्रिय, मथुरा नाथ, विलनाथ द्वारिका नाथ, गोकुल नाथ, गोकुल चन्द्रमा अउ मदन मोहन हे। वल्लभ कुल के कृष्ण के छत्तीसगढ़ी अनुवाद आठे कन्हैया आय ।

छत्तीसगढ़ मन वल्लभ कुल के अष्ट कृष्ण ल आठे कन्हैया के रूप म भले अपना ले हे फेर ओकर फलाहार तिखुर, बैचांदी, सिंघाड़ा अउ मड़िया आदि बने पकवान जनजातीय संबंध ल प्रमाणित करइया वनोपज के भोग ले तृप्त होथे। छप्पन प्रकार के भोग ले नही। जबकि वल्लभ समुदाय म श्रीकृष्ण बर 56 प्रकार के भोग के व्यवस्था करे जाथे। घर के बाल गोपाल मन ल घलो आठे कन्हैया के जन्मोत्सव के दिन आनी बानी के पकवा (पकवान) खाए बन मिलथे।

 

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लोक आस्था के 'आठे'- सुशील भोले


 

लोक आस्था के 'आठे'

   पूरा देश अउ दुनिया म मनाए जाने वाला कोनो परब-तिहार जब लोक के डेहरी म पहुंचथे, त वो अपन एक अलगेच अउ मौलिक रूप धर लेथे. हमर छत्तीसगढ़ म एक अइसने परब देखे बर मिलथे, जेला हम सब 'आठे' या 'आठे कन्हैया' के नांव ले जानथन.

   योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के परब ल पूरा दुनिया म भादो महीना के अंधियारी पाख म आठे (अष्टमी) तिथि म मनाए जाथे. ए अष्टमी तिथि के सेती ही एला आठे कहिथे. एकर संबंध म एक मान्यता इहू हवय- भगवान कृष्ण ह अपन महतारी देवकी के गरभ ले जनम लेवइया आठवाँ संतान रिहिसे, तेकर सेती एला आठे कहे जाथे.  

   हमन जब लइका राहन गाँव म राहत रेहेन, त ए आठे के दिन बिहनिया ले बारी अउ बियारा मन म जाके सेमी पान टोर के लावन अउ वोला कुचर के हरियर रसा ल निकालन. गाँव के भांठा ले भेंगरा पान घलो लानन, वोमा जादा रस निकलय. महतारी बहिनी मन के पांव म रचाए के माहुर ले लाली रंग बनावन अउ बमरी के दतवन ल कुचर के लिखे/पेंटिंग करे खातिर कुची बनावन. कभू-कभू स्कूल-कापी म लिखे खातिर पहिली जेन कांच के दवात म स्याही राहय वोकरो उपयोग पेंटिंग खातिर कर लेवन.

   इहाँ ए बात जानना जरूरी हे, पहिली भगवान कृष्ण के मूर्ति या फोटो आदि आज अतका सहज उपलब्ध नइ रिहिसे. खास करके गाँव-गंवई म तो बिल्कुल नहीं. तेकर सेती उंकर पूजा खातिर अपन घर के पूजा ठउर म भिथिया म भित्ति चित्र बनाए जावय. हमर मन के बिहनिया ले रंग कुचरई के बुता ह उही भित्ति चित्र के रेखांकन खातिर राहय. 

   पूजा घर के कोठ म दू-तीन फीट के ऊंच म डमरू असन आकार वाले आठ ठन लइका के पुतरा बनाए जाय. लोगन एला अपन- अपन कल्पना के अनुसार बना लेवंय. कोनो सिरिफ आठ झन लइका भर के छापा, त कोनो बड़का असन डोंगा म आठ लइका मनला खड़े कर देवंय. कतकों झन ऊपर म आठ लइका के छापा अउ तरी म नंदिया घलो बना लेवंय, जेमा डोंगा, सांप, मछरी सब के छापा उकेर देवय. तहाँ ले इही सब ल भगवान के अवतरण के प्रतीक मान के एकरे पूजा कर लेवंय.

    हमर इहाँ के परंपरा म कृष्ण जन्म ले जुड़े एक अउ परंपरा देखे ले मिलथे. जब ककरो घर लइका के जनम होथे, त वोला धान ले भरे सूपा म बइठारे के नेंग करे जाथे. बाद म वो सूपा भर धान ल जचकी कराने वाली दाई ल दे दिए जाथे. ए परंपरा ल भगवान कृष्ण संग जोड़े जाथे. सियान मन के कहना हे- भगवान जब जनमिस त जेल म रिहिसे. वोकर सियान वासुदेव जी तब वोला कंस के हाथ लगे ले बचाए खातिर वो जगा रखाए सूपा (साहित्य के अध्ययन ले टोकरी के जानकारी मिलथे) म बइठार के नंद बाबा के इहाँ अमराए रिहिसे. एकरे सेती हमर इहाँ नवा अवतरे लइका ल धान ले भरे सूपा म बइठारे के नेंग करे जाथे.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

Tuesday, 16 August 2022

लोग लइका बर उपास -- कमरछठ के तिहार


 

कमरछठ विशेष  )


लोग लइका बर उपास -- कमरछठ के तिहार

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छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा कहे जाथे । काबर इहाँ धान के फसल जादा होथे ।इहाँ के जादातर मनखे मन ह खेती के काम करथे । किसान मन ह अपन खेत में हरियर हरियर धान पान ल देख के हरेली तिहार मनाथे । हरेली तिहार के बाद से छत्तीसगढ़ में बहुत अकन तिहार मनाये जाथे । ओमे से एक ठन तिहार कमरछठ भी हरे ।


कमरछठ ल महिला मन अपन लोग लइका के सुख शांति  अऊ समरिद्ध के खातिर मनाथे ।


भादो महिना के अंधियारी पाँख के छठ के दिन कमरछठ मनाय जाथे ।एला हलसस्ठी भी कहे जाथे । इही दिन भगवान किशन कन्हैया के बड़े भाई बलदाऊ जी के जनम होइस हे । बलदाऊ जी के शस्त्र हल अऊ मूसल हरे । इही कारन ओला हलधर भी कहे जाथे । एकरे नाम से ए तिहार के नाम हलसष्ठी परे हे ।


ए तिहार ल विवाहित महिला मन अपन लइका के सुख शांति अऊ समरिदधि के खातिर मनाथे ।


ए दिन महिला मन ह उपवास रहिथे अऊ बिना नांगर चले अन्न जेला पसहर चांउर कहिथे तेला खाथे । आज के दिन महिला मन ह बिहनिया ले जल्दी उठथे अऊ मऊहा या करंज पेड़ के लकड़ी के दतवन करथे ।

गांव में नाऊ मन ह बिहनिया ले घरो घर दोना पतरी अऊ मऊहा के लकड़ी ल पहुंँचा देथे ।

एकर बाद गांव में मंदिर के सामने एक ठन छोटे से गडढा खोदे जाथे जेला सगरी कहिथे ।सगरी में पानी भरे जाथे । सगरी के चारो डाहर कांसी के फूल , परसा के डारा , बोईर के डारा आदि से सजा दिये जाथे ।

मंझनिया के बेरा पूरा गांव के महिला मन सगरी के पास सकलाथे अऊ पूजा पाठ करथे ।

पूजा के समान -- पूजा के समान में चना, जंवा, गेंहूं, धान, अरहर, मक्का अऊ मूंग ल चढाय जाथे ।कुछ गहना गुथा , नरियर अऊ हरदी से रंगे कपड़ा भी रखे जाथे ।

आज के दिन भंइस के दूध, दही अऊ मक्खन के उपयोग करे जाथे । गाय के दूध दही ह मना हे ।

एकर बाद महराज ह विधि विधान से पूजा करथे अऊ काहनी सुनाथे ।काहनी सुने के बाद सब कोई परसाद झोंक के अपन अपन घर आ जाथे ।

घर आय के बाद महिला मन ह अपन अपन लइका के पीठ में प्रेम  से कपड़ा के पोतनी ल ओकर पीठ में मारथे अऊ आशीरवाद देथे ।

एकर बाद जो पसहर चांऊर के खाना बनाय रहिथे वोला सबसे पहिली छै ठन दोना में अलग से निकाल के गाय-बइला , कुकुर, बिलई,चिरई चिरगुन बर अलग से मढहा देथे ।ओकर बाद घर के सब झन ल परसाद के रुप में बांट के खाय जाथे ।

पसहर चांऊर में दूध दही मिलाय जाथे अऊ छे परकार के भाजी बनाय रहिथे ओकर संग खाय जाथे ।

ए परकार से कमरछठ के तिहार ल मिलजुल के बढ़िया हांसी खुशी से मनाय जाथे । एकर से एकता अऊ मिल बांटके खाय के भावना बढथे ।

कमरछठ के बारे में एक ठन काहनी बताय जाथे के दुवापर युग में माता देवकी ह ये वरत ल करे रिहिसे । काबर राजा कंस ह अपन आप ल बचाय खातिर देवकी के सब लइका ल मारत जात रिहिसे । तब देव रिसी

नारद ह माता देवकी ल ए वरत करे के सलाह दिस । वोकर बात मानके माता देवकी ह ये वरत ल रखिस अऊ ओकर प्रभाव से भगवान किशन ह बांचगे । फेर बाद में भगवान किशन अऊ बलदाऊ दूनो कोई कंस ल मारके विजय हासिल करिस ।

ओकर बाद सब माता मन अपन संतान के खुशहाली अऊ सुखशांति खातिर ये वरत ल करे बर धरलिस ।

हमर ये परंपरा ह आज भी उत्साह से मनाये जाथे ।

लेखक

महेन्द्र देवांगन "माटी"

आलेख - कमरछठ तिहार*


 

*आलेख - कमरछठ तिहार*


छत्तीसगढ़ अपन रीति-रिवाज अउ कला संस्कृति के नाम से पूरा देश मा जाने जाथे। हमर छत्तीसगढ़ में तीज तिहार ला अब्बड़ सुग्घर एक होके मनाथें। रीति रिवाज के बात करन त *कमरछठ तिहार* हमर छत्तीसगढ़ के बहुत ही पारंपरिक तिहार आए ये दिन हमर छत्तीसगढ़ के दीदी बहनी महतारी मन अपन लइका मन के जिनगी के खुशहाली बर उपवास रहिथें। कमरछठ तिहार ला कई झन *हलषष्ठी* घलो कहिथें। येकर मान्यता हे कि भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम के जनमदिन के सेती येला हलषष्ठी तिहार के रूप में मनाए जाथे। अउ कई झन के कहना हे कि द्वापर युग में जब कंस माता देवकी के सात लइका मन ला मार दिस तब देवकी ह छठ  माता के उपवास रिहिस अउ अपन लइका के जिनगी बर कामना करिस ओकर बाद भगवान कृष्ण के जनम होइस। तब ले कमरछठ तिहार मनाए जाथे।


हमर छत्तीसगढ़ मा *कमरछठ तिहार* के विशेष महत्व हे। ये दिन दाई दीदी बहनी मन महुआ के दतवन करथें अउ नहाखोर के तइयार होके गाँव के बीच बस्ती मा जिहाँ सगरी बने रिथे उहां जा के सबोझन पूजा-पाठ करथें। पूजा- पाठ बर महुआ के पतरी, दोना, लकड़ी अउ महुआ फूल के विशेष महत्व हे। यह दिन भईंस के दूध अउ दही चढ़ाए जाथे। ये दिन चना, गहूं, मसूर अउ लाई फोड़ के प्रसाद भी बनाए जाथे। ये दिन गांव के महाराज हा सबोझन ला *कमरछठ तिहार* के कहानी सुनाथे। ये दिन हरेली तिहार के गेड़ी के भी पूजा करे जाथे।  पूजा के बाद सगरी के पानी ला घर में लइका मन ला पोता करे के रिवाज हे अउ सगरी के पानी ला पूरा घर में छिंचे जाथे। ताकि घर मा सुख-शांति के व

राहय।


*पसहर चाउँर के महत्व-* करमछठ तिहार मा पसहर चाउँर के विशेष महत्व हे। पसहर चाउँर ला  चुरो के  दही संग प्रसाद के रूप में भोग लगाथे अउ पूजा के बाद पसहर चाउँर के भात ला खा के फरहार करे जाथे। पसहर चाउँर गाँव के परिया, डबरी, मेंड़ या नरवा तीर जामे रिथे। पसहर चाउँर ला खेत में नाँगर चला के नइ बोय जाए।


*भाजी के महत्व-* हमर छत्तीसगढ़ मा भाजी के विशेष महत्व हे। कमरछठ तिहार मा 6 प्रकार के भाजी के महत्व बताए गेहे, ये भाजी मन लमेरा के रूप मा जामे रिथे मतलब येला भी बोय नइ जाय। जइसे दार भाजी, मुसकेनी, मछरिया, कउँवाकेनी, बर्रा भाजी, ये बस भाजी ला मिंझार के साग राधे जाथे।


*काशी फूल के महत्व-* ये दिन काशी फूल के भी पूजा करे जाथे। मान्यता हे कि जब माता सीता वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में रिहिस अउ लव कुश ल जनम दिस। सीता माता अपन दोनों बेटा के पालन-पोषण वन मा रहिके करिस अउ इहाँ कंद मूल भाजी तरकारी खाके अउ काशी के बिछौना मा सो के जीवन यापन करिस। तेकर सेती महतारी मन कांशी के पूजा करथें।


*आप सब ला कमरछठ तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई।*💐💐🙏🏻


*रचनाकार*-

*राजकुमार निषाद "राज"*

*बिरोदा, धमधा जिला-दुर्ग*

*7898837338*

Monday, 15 August 2022

नोनी बाबू ल देवय सगरी मइया वरदान* *दीदी वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान*





*नोनी बाबू ल देवय सगरी मइया वरदान*

*दीदी वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान*



*- दुर्गा प्रसाद पारकर*

 

                        

छत्तीसगढ़ म महतारी मन अपन संतान के सुख, शांति, समृद्धि अउ दीर्घायु खातिर हलषष्ठी के व्रत रहिथे। लोक भाषा म हलषष्ठी ल कमरछठ के रूप म जाने जाथे। तिही पाय के कमरछठ व्रत ल पुत्रेष्ठी व्रत घलो केहे जाथे। महतारी मन कमरछठ व्रत ल भादो महीना के कृष्ण पक्ष (अंधियारी पाख) छठ के रखथे। कमरछठ व्रत बर कतनो पौराणिक कथा जुड़े हे। अइसे केहे जाथे कि इही दिन भगवान बलभद्र के जनम होय रिहिसे ओकर शस्त्र के रूप म हल (नांगर) ल मान्यता मिले रिहिसे तिही पाय के कमरछठ ल हलषष्ठी व्रत घलो केहे जाथे। अलग-अलग विद्वान मन के कमरछठ व्रत उपर अलग-अलग मत हे। जनश्रुति के मुताबिक कमरछठ उपास रहिके माता गौरी ह कार्तिकेय ल बेटा के रूप म पाये रिहिसे, ओकर गोसइन के नाम षष्ठी रहिसे तिही पाये के कमरछठ व्रत ल हलषष्ठी व्रत केहे जाथे। अइसनो घलो केहे जाथे कि सतयुग म समू नाम के राजा रिहिस जेकर गोसइन के नाव सुवर्णा रिहिस | उंकर एक झिन हस्ति नाम के बेटा रिहिस जेकर अल्पायु म ही मौत होगे। जेकर सेती राजा रानी मन भारी दुखी होके विलाप करे बर धर लिन। उंकर दुखी पुकार ल सुनके षष्ठी देवी ह प्रगट होके भादो महीना के अंधियारी पाख के छठ के दिन उपास (व्रत) रेहे ले ओकर बेटा ल जीवित करे बर आश्वासन दिस। रानी ह मन लगा के विधि-विधान ले पालन करके कमरछठ उपास रिहिस ताहन ओकर बेटा जीवित होगे।

कतनो विद्वान मन के मुताबिक लक्ष्मी जी के उत्पत्ति सागर ले होय रिहिस हे तिही पाये के सगरी पूजा के विधान हे। काबर कि माता गौरी ह कमरछठ उपास ल सागर के किनारा म पूरा करे रिहिसे। इही पाये के पूजा के बखत प्रतीक के रूप म चारो डाहर कांशी ले सगरी ह सजे रथे |मउंहा के फल अउ लाई के संगे संग माटी ले बने लइका मन के खिलौना, भौंरा, बाटी सगरी म चघाथे। ए जघा म शिव अउ पार्वती जी के पूजा करे जाथे तिही पाये के दूध घलो चघाए के परम्परा हे। कमरछठ व्रत बर सिर्फ भइंस के दूध के उपयोग करे जाथे एकर पीछे अइसे मान्यता हे कि इही दिन देवता मन तांत्रिक विधि ले भइंस के उत्पत्ति करे रिहिन हे। इही पाये के भइंस के दूध , दही के उपयोग कमरछठ उपास बर करे जाथे।

कमरछठ उपास रहवइया महतारी मन ल नांगर (हल) चले भुइयां म चलना अउ ओकर ले पैदा होय कोनो भी किसम के अनाज खाना मना रथे। ए दिन सिर्फ बिना हल चले भुइयां के चांउर जेला हम्मन पचहर चांउर कहिथन अउ छ: किसम के भाजी ल मिलाके ही फरहारी करथे | कमरछठ के दिन महतारी मन सगरी करा सकला के विधि-विधान ले पूजा करथे।

पूजा करके लहुटे के बाद महतारी मन पिंयर पोथी जउन ह कपड़ा के बने रथे, जेला षष्ठी देवी के ध्वज केहे जाथे। इही पोथी ल अपन लइका मन के पीठ म मारथे एकर पीछे ए मान्यता हे कि पीठ म अधर्म के वास रहिथे जउन ह पिंयर ध्वज ले नाश हो जथे। एकर बाद महतारी मन पचहर चाँउर के भात अउ छै किसम लमेरा भाजी ले फरहारी करके हलषष्ठी देवी ले अपन संतान मन बर सुख, समृद्धि के कामना करथे  जेला साहित्यकार दुर्गा प्रसाद परकार ह अपन गीत म बहुत बढ़िया वर्णन करे हे -


दीदी वो, दाई वो, बेटी अउ माई वो

सुनव सगरी मइया के महिमा हे महान

दीदी वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान

दाई वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान।


पूजा खातिर मंय सगरी कोड़ाये हवंव

डबडब ले सगरी म पानी भराये हवंव

सगरी मइया के असीस ह मिलत रहय

लइका मन के उमर दिनो दिन बढ़त रहय

नोनी बाबू ल देवय सगरी मइया बरदान

दीदी वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान

दाई वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान


सगरी तीर बइठ गौरी व्रत करे हवय

सगरी के चारो मुड़ा कांसी म सजे हवय

माटी के खिलौना सगरी म चघावय

गहूं, लाई, उरीद, मूंग, चना ल भावय

महतारी के ममता के करंव परनाम

दीदी वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान

दाई वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान


पचहर चांउर अउ लमेरा भाजी

भइंस के दूध, दही सगरी होवय राजी

मऊंहा के पतरी दतुन, मऊंहा के दोना

जीव जन्तु ला, भोग लगाबोन चारो कोना

पोथी मार के करबोन संकट के निदान

दीदी वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान

दाई वो, पूजा करबोन कमरछठ के विधि-विधान 


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लोक आस्था के पर्व -आठे कन्हैया*


*लोक आस्था के पर्व -आठे कन्हैया*


*- दुर्गा प्रसाद पारकर*

 

                        

छत्तीसगढ़ म कृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष्य म जन्माष्टमी ल आठे कन्हैया के रूप म बड़ा धूमधाम से मनाथन। आठे कन्हैया ल भादो महीना के अष्टमी के दिन मनाए के परम्परा हे। भगवान श्री कृष्ण देवकी के गर्भ ले जनम लेवइया आठवां संतान रिहिसे अउ लोक अवतरण घलो अंधियारी पाख के अष्टमी के दिन होय रिहिसे। तिही पाय के छत्तीसगढ़ म आठे कन्हैया ल बड़ा धूमधाम ले मनाथे। छत्तीसगढ़ म आठे कन्हैया के दिन दीवाल म आठ ठन बाल चित्र चूड़ी रंग, स्याही, सेमी अउ भेंगरा ले बनाथे। आठे कन्हैया के दिन सब उपास रहिथे। आठे कन्हैया के दिन मड़िया तिखुर के पकवा के भोग लगाथे। छत्तीसगढ़ म कृष्ण जन्म होथे सोहर गाये जाथे जेमा कंस के कारागार म देवकी अउ वासुदेव के जीवन के त्रासद स्थिति के मार्मिक चित्रण हे -


दुख झन मानव कहे

बसदेव धीरज बंधावे 

कारागृह म पड़े हवन दुनो

कतेक दुख ल साहन ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


हाथ म हथकड़ी लगे

पांव म लगे बेड़ी ओ

कइसे के हम दुनो मिली

दुख बड़ भारी ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


बोलत हवे राजा बसदेव

रानी देवकी रोवथे ओ

प्राणनाथ मोर जीवन के अधार

अब कइसे होही ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


रिमझिम रिमझिम पनिया

जब बरसन लागे ओ

दीदी बिजली ह कइसे चमचम

धमकन लागे ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


आठे के दिन मोर ये दे

पैदा भए कान्हा ओ

कृष्ण अंधियारी राते

पैदा भए कान्हा ओ

ललना किसन के जनम होय हवय...


कृष्ण के जनम लेते भार पहरादार मन सुत गे रिहिन हे, कारागाह के दरवाजा अपने आप खुल गे रिहिसे। तब ईश्वरी प्रेरणा से नवजात कृष्ण ल सूपा म रख के यमुना तट पार करके गोकुल पहुंचाए रिहिसे। छत्तीसगढ़ म आज घलो इही भावना के अनुरूप लइका के जनम होय के बाद ओला धान से भरे सूपा म सुताए जाथे। बाद म सूपा के धान ल जेचकी निपटइया सुईन दाई ल दे दे जाथे।

आठे के दिन जनम लेवइया लोक के कृष्ण कन्हैया ह नम्मी के दिन ग्वाल बाल मन के संग म गोपी मन के दूध दही लूटे बर उतावला हो जथे। छत्तीसगढ़ म आठे कन्हैया के बिहान दिन दही लूट संपन्न होथे। कतनो जघा दही लूटे के बाद नृत्य घलो करथे एला दहिकांदो नाच घलो केहे जाथे। येह आज के मटकी फोड़ के समान ही छत्तीसगढ़ के लोक परम्परा आय।

अइसे केहे जाथे छत्तीसगढ़ म वल्लभाचार्य के जनम बर चम्पारण के आठ मूर्ति के मान्यता हे। उही मूर्ति मन के समूह ल अष्ट कृष्ण केहे जाथे। ए आठो मूर्ति मन के नाम - श्रीनाथ, नवनीत प्रिय, मथुरा नाथ, विलनाथ द्वारिका नाथ, गोकुल नाथ, गोकुल चन्द्रमा अउ मदन मोहन हे। वल्लभ कुल के कृष्ण के छत्तीसगढ़ी अनुवाद आठे कन्हैया आय ।

छत्तीसगढ़ मन वल्लभ कुल के अष्ट कृष्ण ल आठे कन्हैया के रूप म भले अपना ले हे फेर ओकर फलाहार तिखुर, बैचांदी, सिंघाड़ा अउ मड़िया आदि बने पकवान जनजातीय संबंध ल प्रमाणित करइया वनोपज के भोग ले तृप्त होथे। छप्पन प्रकार के भोग ले नही। जबकि वल्लभ समुदाय म श्रीकृष्ण बर 56 प्रकार के भोग के व्यवस्था करे जाथे। घर के बाल गोपाल मन ल घलो आठे कन्हैया के जन्मोत्सव के दिन आनी बानी के पकवा (पकवान) खाए बन मिलथे।

 दुर्गा प्रसाद पारकर

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