Thursday, 25 August 2022

छत्तीसगढ़ आगु रहिस जगत सिरमौर*


*छत्तीसगढ़ आगु रहिस जगत सिरमौर*


*- दुर्गा प्रसाद पारकर* 

                        

छत्तीसगढ़ म कतनो राजवंश, नलवंशी, पांडुवंशी, सोमवंशी, कलचुरी राजवंशी, नागवंशी, छिन्दक नागवंशी, गोड़, मराठा अऊ अंग्रेज मन, मन भर के राज करिन। फेर छत्तीसगढ़ म रतनपुरी राजा मन के शासन काल ल सुख समृद्धि अउ उन्नति के दिन बादर माने जा सकत हे। डॉ. महेंद्र कश्यप राही के मुताबिक तो 



रतन देव के हाथ के दीया ह

 बिना आगी बर जाये, 

उही रतनपुर भीख म भइया

 हीरा मोती बांटय। 



स्व. शुकलाल पांडे के आंखी के देखल आय ग-


नाप-नाप काठा म रुपिया,

 बेहर देत रहिन गौटिया। 

कभू नही स्टाम्प लिखाइन 

रिहिन गवाही अउ ये हमर देश

 छत्तीसगढ़ आगु रहिस जगत सिरमौर। 


अइसन छत्तीसगढ़ म राज करइया राजा मन बिक्कट शोषण करिन । चूहक के फोकला कर दिन।

इन तो पहिलिच्च ले छत्तीसगढ़िया मन सीधवा सबले बढ़िहा हे कहि के हमर खून ल जूड़ा देथे ताहन उन मूड़ी म राज करथे । तहू मन ल कुछ नइ काहन सकन। सियान मन बताथे - पहिली जमाना म संसार भर के सोना भारत म जमा होवत रिहिस। तभे तो भारत ल सोन चिरईया काहत रिहिन। बाद म इंग्लैंड म जमा होय ल धर लिस। अंग्रेजी पूंजीवादी नीति के सेती भारत के गरीब किसान थर्रा गे ग। छत्तीसगढ़या किसान तो ए दाई वो कहि के मुड़ी ल धर के बइठ गे। स्व. कुंज बिहारी चौबे ह इसी बात ल उजागर करथे-


अजी अंग्रेज तैंहर हमला बनाए कंगला। 

सात समुद्दर बिलाएत ले आ के हमला बना दे भिखारी जी।

 हमला बनाए बेंदरा बरोबर बन गए तैं मदारी जी। चीथ-चीथ के तैं हमर चेथी के मास ला, 

अपन बर टेकाए बंगला। 


दुनिया भर के उठा पटक करे के बाद अंग्रेज मन के शोषण नीति ह भारत के एकता के आघु म घोरमुहा हो गे। एकर बाद तो अंग्रेज मन कंझा के देश के नाजुक नस ल बइद बरोबर टमरिन। टमरत-टमरत टमर डरिन जी। ओ नस रिहिस धरम के । बेईमान मन भाई ल भाई के विरोध म खड़ा कर के थपरी बजाए बर धर लिन ताहन तो फेर इन मन फूट डालो अऊ राज करो के महामंत्र ले बिक्कट के फायदा उचइन। धीरे-धीरे फैसन कस बगर गे एकर प्रदूषण ह। जेकर प्रभाव ल आजो देखे जा सकत हे |

धान के फसल ल सधौरी खवाए के उत्सव - पोरा तिहार*




*धान के फसल ल सधौरी खवाए के उत्सव - पोरा तिहार*



*- दुर्गा प्रसाद पारकर*



छत्तीसगढ़ म बारो महीना तिहार बार मनाए के परम्परा हे। सबो तिहार ह इहां के लोक जीवन के कहानी कहिथे। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन के आराध्य श्रम आय। श्रम ले सराबोर कृ़षि कार्य के अलग चिन्हारी हे। छत्तीसगढ़ म कृषि संस्कृति अउ रिषी संस्कृति दुनो हे। कृषि संस्कृति म मुख्य फसल धान आय। तिही पाय के छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा केहे जाथे | जउन किसम ले बेटी के गर्भवती होय ले मइके वाले मन सात महीना म सधौरी खवाए बर आनी बानी के व्यंजन बनाके ओकर ससुराल जाथे उही किसम ले धान के गर्भ धारण करके ले ओला सधौरी खवाए बर किसान खेत म चिला चघाए बर जाथे। 

     पोला पर्व भादो महीना के अमावस्या के मनाए जाथे। पोला ल पोला पाटन , कुशागृहस्थी, कुशा पाटनी घलो केहे जाथे। महाराष्ट्र म पोरा तिहार ल पिठौरी केहे जाथे।

    पोला तिहार के उपर विद्वान मन कतनो  व्याख्या करे हे फेर तुलसी देवी तिवारी के मुताबिक पोरा तिहार मनाए के इतिहास ह भविष्य पुराण म मिलथे। बहुत पहिली के बात आय एक झिन देवधर नाव के ब्राम्हण रिहिस। अपन गोसइन बेटा शंकर अउ बहू बिदेहा के संग राहय। सब बने रिहिसे फेर बिदेहा के लइका ह नइ नांदत राहय। छै झिन लइका मन जनम के बाद जब यमराज घर चल दिन। पंडितिन ह अपन नाती - नतरा के मुंह देखे बर तरसत राहय। बिदेहा ह अपन आप ल दोषी मानत रिहिस। बिदेहा (बहू) के कोख ले एको झिन लइका नांदत नइ हे | वंश परम्परा ह कइसे आगू बढ़ही कहिके ओला घर ले निकाल दिस। छै झिन लइका ल गंवाए के बाद बिदेहा दुख ले उबरे नइ रिहिस उपराहा म ओला घर परिवार वाले मन घर ले निकाल दिन। दुब्बर बर दु अषाढ़ कस होगे। अब तो रोवत - रोवत बिदेहा ह जंगल डाहर निकल गे। जंगल म एक ठिन ठीहा असन दिखिस , ठीहा करा जाए बर आगू बढ़त रिहिसे | साधु मन ओला देख के बिदेहा ल उहां जाए बर स रोकिन, ओती  जोगिन दाई के रहवासा हे ,जान डरही ते तोला खा डरही।

बिदेहा किहिस मय ए संसार ल छोड़ना चाहत हवं, बने होही जोगिन दाई मोला खा डरही ते। बिदेहा उही ठीहा करा जा के लुका गे। रात कन जोगिन दाई मन अइन त मनखे के गंध ल पा के जान डरिन कि हमर अलावा ये मेर कोनो अउ हवय। बिदेहा के दुख ल सुन के जोगिन दाई मन ल दया आगे। ओकर बाद उमन ओकर छैवो लइका ल जिया दिन। घर आए के बाद देवधर पंडित ह बड़ा उत्सव मनाए गिस। बहिनी बेटी, सगा, सोदर मन आन खेल खिलौना लाइस ताहन लइका मन खेलिन। बाबू मन नांदिया बइला मन संग खेलिन त नोनी मन चूकी पोरा संग खेलिन इही दिन ले पोरा तिहार मनाए के परम्परा चले आवत हे।

पोरा तिहार के दिन बेटा मन माटी के बइला संग खेलथे अउ बेटी मन चूकी पोरा संग खेलथे | एकर यहू उद्देश्य हो सकत हे कि बेटा जात मन ल बड़े होय के बाद खेती किसानी करना हे अउ बेटी मन ल रंधनी खोली के बूता करना हे। खेल खेल म घर गृहस्थी के जिम्मेदारी ल ननपन ले जनवा दे जाथे। 

सुधा वर्मा के मुताबिक नंदी ह एक दिन उदास रिहिसे, शिव जी ह कारण पूछथे तब नंदी ह कहिथे कि सबके पूजा होथे फेर मोर पूजा नइ होवय | शिव जी ओकर दुख ल समझ के कहिथे कि चल एक दिन तोला देथंव। भादो  महीना के अमावस के दिन तोर पूजा होही। उही दिन तंय अस्तित्व म घलो आये रेहे। नंदी बहुत खुश हो जथे। शिव जी के संग ओकर स्थापना मंदिर म घलो होथे।

पोला के दिन नंदी मने नांदिया बइला के पूजा होथे। नंदी शिव के वाहन आय। नंदी ल ही छत्तीसगढ़ म नांदिया बइला केहे जाथे। नंदी शिव के वाहन आय। छत्तीसगढ़ के पूरा लोक जीवन ही शिव ले परिपूर्ण हे। आदिकाल ले शिव अर्थात शंकर भगवान ह छत्तीसगढ़ म बड़े देव , बूढ़ा देव, दूल्हा देव आदि के रूप म पूज्य हे। इहां जुन्ना मंदिर म ही नही बल्कि गांव , टोला अउ मुहल्ला म घलो शिव मंदिर के अधिकता हे। छत्तीसगढ़ म शिव सबले जादा लोक पूज्य देव आय। छत्तीसगढ़िया मन बर शिव भगवान देव ही नही बल्कि भोले बाबा आय। ओइसने जइसे भोले बाबा सीधा-सादा निष्कपट अउ निश्छल हे |जेकर आराध्य निश्छल होही ओकर आराधक घलो निश्छल होथे। एकर ले छत्तीसगढ़ के लोक जीवन प्रभावित हे । तभे तो सब झिन छत्तीसढ़िया सबले बढ़िया कहिथेे।

तीजा तिहार म गरीब बाप के पीरा*


*तीजा तिहार म गरीब बाप के पीरा*



*दुर्गा प्रसाद पारकर*


                     

                     पानी के बरसा के संगे–संग तिहार मन के शुरूआत होथे, सउनाही, इतवारी, हरेली, आठे ,पोरा ताहने तीजा, अइसे किसम ले आठ पन्द्रा दिन म एक न एक ठोक तिहार मनाए ल परथे। शहर ले जादा तिहार गांव म मनाए जाथे। जिंकर करा पइसा हे उंकर बर तो रोजे तिहार हरय। फेर जेमन रोज कमाथे अऊ रोज खाथे उंकर मन बर तो तिहार ह सजा कस लागथे। तभो ले दूसर मन ल देख–देख के पीरा ल पियत रहिथे | तिहार मनई ह तो गरीब मन बर सजा आय सजा। दाऊ घर के लइका मन खीर– सोंहारी खाथे, त बनिहार के लइका मन उपास रहिथें। काबर कि कभू–कभू तो हप्ता म तीन चार दिन तिहार हो जेथे। इतवारी तिहार, फांफा बरोए के तिहार, बुधवारी तिहार, अइसने किसम के रंग–रंग के तिहार मनाए के परंपरा हे। बनिहार मन गांव गंवई के अइसन नियम के विरूद्ध म बोल तको नइ सकय | काबर कि अभी भी पूर्वज के बनाय तिहार मन चले आवत हवय। मान ले कोनो तिहार के विरूद्ध बोले के हिम्मत जुटाही वोला डांड़ परही। वोकर नाऊ लोहार छोड़ा दे जाही। यहू कइसन तिहार आय जिहां बनिहार मन के अवाज ल नइ सुने जाय। गांव म अभी घलो ग्रामीण व्यवस्था ल माने बर परथे । आखिर जादा तिहार मनई ह हमर विकास म रूकावट आय कि नोहे । खेत म काम रूक जथे। खेतिहर मजदूर मन तिहार के सेती चउपाल म निठल्ला बइठ के पासा अऊ तास खेलत रहिथें। दू–चार रूपिया हाथ म रहिथे वहू ल पान–बीड़ी म उड़ा डरथे। कुछु नइ सुहावय त चारी निंदा करत रहिथें। जादा बार तिहार म हमर छत्तीसगढ़ के विकास रूकत जावत हे।

धान के कटोरा ह तिहारे तिहार के खरचा म उना होवत जावत हवय, जब काम नइ करबो त पेज पसिया कहां ले मिलही ? जब पइसा नइ मिलही त बेरोजगेारी बाढ़ही। आखिर जादा तिहार मनई ह कतका उचित हवय। यदि हम रोजे काम करबो त रोज पइसा मिलही अऊ रोज हमर घर के चूल्हा म आगी बरही। हमन भूखन लांघन नइ राहन, तब तो हमर बर रोज तिहार रहि। हर रात देवारी अऊ हर रात हरेली रहि।

                      वोइसे यदि मानबो ते रोजे तिहार आय । त का काम करे बर छोंड़ देवन। नइ कमाबो त खाबो काला। अब देख न तीजा आ गे हे। बुधरू के एक झिन दुलौरिन बेटी । तीजा लाए ल जाय बर लागही, इही चिन्ता म बुधरू ह दुबरावत जावत हवय। काबर कि तीजा नइ लाए ल जाबे त बेटी ह कही अब तो हमर मइके वाले मन मरगे हवय। एती बुधारू के गांव वाले मन कही देख सब मन अपन बेटी मन ल तीजा लाए हवय अऊ बुधरू ल देख, एक झिन बेटी ल घलो तीजा नइ ला सके हे। अपन दुख ल अपने जानथे। बुधरू करा तो बहुत अकन समस्या हवय। काला–काला बताए। अरे भई दुनिया हर तो हंसइया हरय, बुधरू के उपर का बीतत हे तेला तो बुधरूच ह जानही। 

                         बुधरू ह अपन बेटी ल तीजा लाने बर जाही त चार दिन के काम ह नांगा होही। आए–जाए बर मोटर गाड़ी के लागही। बेटी–दमांद घर जाबे त कुछु खई–खजाना, चना–फूटेना नइ लेगबे तभो नइ बनय। बेटी आही त ओकर बर अलवा–जलवा लुगरा–पोलखा ले बर लागही | अब बिचारा कइसे करय। आठे के दिन सब घर सूजी, पकवा, सिंघाड़ा बने रिहिस। ओ दिन उंकर घर हंडि़या उपास रिहिस हवय। हे भगवान ! काय पाप करे रिहिसे बुधरू ह तेमा गरीबी भोगत हवय। सब मिले ते मिले फेर बैरी ल घलो गरीबी देखे ल मत मिलय। तीज तिहार तो पइसा वालेे के आय। हरेली के दिन बुधारू ह अपन हंसिया अऊ कुदारी ल बंदन भर के तिलक लगा के छोड़ दे रिहिसे। वो दिन नरिहर घलो फोर नइ सकिस। गांव म अइसे–अइसे उटपुटांग तिहार माने जाथे जिहां के कानून बड़ा सक्त रहिथे। जतका प्रतिबंध कर्फ्यू अऊ बड़े–बड़े शहर म नइ राहय वोतना तो गांव गंवई म रइथे। जऊन दिन फांफा बराथें वो दिन गांव वाले मन म कानून समा जाथे। छेना, लकड़ी धर के तको सहर तनी नइ जा सकय। अब ए बात समझ म नइ आवय कि फांफा बरोए जाथे कि बुधरू जइसे मनखे ल बरोय जाथे, फांफा ह तिहार माने ले भगही कि दवई के छिड़काव करे ले...।

                         अतका लिखत हवंव सबो ह शहर वाले मन बर फालतू लागही, फेर भइया मय तो गांव म रहि के ये सजा ल भोगे हवव। शहर म मान लिस त आठे, देवारी अऊ होली। शहर वाले मन ह तो आठे के दिन सिंघाड़ा, सूजी संउख ले मडि़या के पकवा बनाबे करहीं। देवारी म तो दनादन फटाका फूटबे करही। काबर कि कमई जादा तिहार कम जब तिहार कम मनाही त तिहार ले जुड़े विशेष खरचा कम होही। जिहां खरचा कम होही, बचत जादा होही। बचत जादा होही त हमर पूंजी बाढ़ही ताहन लइका पिचका मन ल पढ़ाए बर कापी किताब बिसा सकत हन। त जादा तिहार मनई ह कहां तक उचित हवय। जउन भी गांव म बनिहार–भूतिहार रहिथे वोकर दुख ह बुधरू जइसे हरय। अंकाल म नोनी ल तीजा लाएच ल लागही। मय तीजा परब के विरोध नइ करत हवंव, फेर बुधारू के बेटी ल अपन ददा के हालात ल समझ के संतोष कर लेना चाही। यदि बुधरू ह अपन बेटी ल तीजा लाए बर नइ गिस त का होइस। ओकर बेटी ल मन मार के अपन ददा के उपर तरस खाना चाही। ए बात ह एक झोक बुधारू के बेटी के बात नोहय, अइसन समस्या के भोगइया कतको बुधरू के बेटी आय।

                           बुधरू घलो चाहथे अपन दुलौरिन बेैटी ल तीजा ला लेतेंव। साल भर म बेटी ल देखे बर मिलथे, फेर का करबे गरीबी ह रोड़ा आ जाथे। बेटी घलव चार महिना आगू ले सपना देखत रहिथे। एसो के तीजा म बिछड़े सहेली मन संग मिल लेतेंव, अऊ पीपर पेड़ म डोर बांध के झून्ना झूलतेंव। फेर का करबे.... ऐसो अंकाल परे हवय, उपराहा म गांव म रोज तिहार मनई म हालत खस्ता हो गे हवय। मय हर तीजा लेय बर नइ आ सकंव बेटी, मोर हिरदे के टुकड़ा तोला नइ देख सकंव, जब कभू पइसा सेकलाही न, त लूगरा धर के आहूं कहिके सोचत बुधरू ह घलो मने मन म बेटी ल समझावत हे..... रिसाबे झन कहिके।

                          बुधरू ऐसो के अंकाल म मरगे। मरबे करिस त बुधवारी तिहार के दिन। लांघन–भूखन मरगे बिचारा ह, अब तिहार के दिन मरे बर गांव म अऊ बुधरू पैदा करत हवय। बिचारी मैना ह अब तीजा घलव नइ जा सकय। अपन संगी–संगवारी मन के संग ठिठोली नइ कर सकय। साल भर के दुख ल नइ बांट सकय।

                          बुधारू के बेटी मैना ह दाऊ के टुरी रइतिस ते आठ पन्द्रा दिन पहिली ले तीजा जातिस। अपन मइके म संगी संगवारी के संग बजार हाट जातिस। चुरी–चाकी पहिरतिस अपन ससुरार म मैना ह लइका ल दूध पियावत–पियावत तीजा के दिन गुनत रहिगे। हे भगवान गरीबी कोनो ल भोगे ल मत मिलय। दुनिया म सब ले बड़े सजा गरीबी आय। न वोहर तिहार मान सकय, न बने लुगरा पहिर सकय, न बने चुरी–चाकी, न बने घर द्वार। वोला तो काली के काम बूता के चिंता रहिथे कि  काम मिलही कि नइ मिलही। मैना मने मन गुनत रहिथे कि गांव म एको ठोक तिहार मत होतिस। नइ ते पेट ह मारे जाही। तिहार नइ होही ते कम से कम काम म तो जाबोन, दू कौड़ी कमा के लइका के मुंहु म चारा डारबोन, जऊन दिन हमर पेट भरही उही दिन तिहार हे। हम्मन तो रोज एक घांव खा के रोज उपास रहिथन तभो ले भगवान प्रसन्न नइ होवय। हो सकत हे भगवान ह हमर मन लेे रिसा गे हावय। काबर कि भगवान म नरिहर तको घलो नइ चढ़ा सकन, जब पेट बर पइसा नइ हे त नरिहर बर कहां ले लाहूं पइसा भगवान फेर तंय तो अवघट दानी हरस , हे भगवान हमु ल पइसा वाला काबर नइ बनायेस। ताहन तिहार हमु मन बने मान सकतेन। बेटी ल तो तीजा लेवा के ला सकतेन अऊ वोकर सऊंख ल पूरा करतेन। तीजा के बहाना बेटी ल साल म एक घांव देख लेतेन भगवान।

                         मोला गरीबी के सेती भले मोर ददा ह तीजा नइ ले जा सकिस ते का होइस, कम से कम हम्मन हमर बेटी ल तो तीजा ला सकन अतेक तो सम्पन्न बना दे। भले जादा बड़े झन बना, फेर जादा गरीब घलो झन बना। कम से कम दू बखत के रोटी ह  नसीब हो सकय। हे शंकर भगवान तंय कइसे प्रसन्न होबे, कइसन उपास करंव अऊ के दिन के उपास राहंव तब मोर उपर प्रसन्न होबे अऊ मोर गरीबी ल दूर करबे। जब हमर गरीबी हट जाही तब तिहार मनाए म आनंद आही। तब कहूं हम्मन गांव के जम्मो तिहार ल चैन से मना सकथन। तिहारे मनई म हमर आर्थिक स्थिति कमजोर होवत जावत हे तेकर ले हमर आर्थिक विकास नइ हो सकय। जऊन जादा जरूरी तिहार हे, उही ल मान के खुशी के इजहार करे म का आपत्ति हे। तेकर ले कम से कम बेटी ल तो तीजा लाए जा सकत हे। कोनो बेटी ह तीजा ले वंचित मत होवय, कउनो मनखे ह बुधरू कस भूख म झन मरय।

                           काम के दिन काम अऊ तिहार के दिन तिहार फेर अलग से गांव स्तर के तिहार। बुधवारी, इतवारी, फांफा बरोई कतको अइसे तिहार हे जेला हम्मन रोक के खेत म काम कर सकथन अऊ खेती के काम ल बढ़ा के अपन आमदनी बढ़ा सकथन। हमर आमदनी बाढ़ही त अपन दुलैरिन बेटी ल तीजा ला सकथन अउ तीजा के बिहान दिन फरहर के दिन मन मड़ाए के लइक लुगरा दे सकथन। जेकर ले बेटी ह तीजा ल साल भर झन भुलावय अऊ अवइया साल के बाट जोहय....।

Thursday, 18 August 2022

कहानी-- *पसहर चाउर*


 

कहानी-- *पसहर चाउर*

                                                                    

                                     चन्द्रहास साहू

                               मो - 8120578897


"दोना ले लो ओ ...!''

"पतरी मुखारी ले ले ओ..!''

"लाई ले ले ओ.... !''

दुनो मोटियारी ओरी-पारी आरो करत हावय। आज झटकुन उठ गे हावय दुनो कोई। मुड़ी मा गुड़री , गुड़री मा पर्रा , पर्रा मा टुकनी , टुकनी मा लाई दोना पतरी दतोन मुखारी । छोटे दाऊ पारा ला चिचिया डारिस। थोकिन बेच घला डारिस। अब तेली पारा जावत हावय। जम्मो बच्छर बेचथे जम्मो नेग - जोग के जिनिस ला अपन गाँव अउ आने दू चार गाँव मे। दोना पतरी वाली नवइन रेवती अउ केंवटिन हा लाई ला बेचत हावय । फेर आज तो रेवती के अन्तस मा जइसे कोनो पथरा लदकाय हावय।

"का होगे दीदी ? आज तबियत बने हावय न !''

"हव बहिनी ! बने हावव।'' 

रेवती हुकारु दिस फेर मन मा अब्बड़ बादर गरजत रिहिस। गौरा चौरा करा अब थिरागे दुनो कोई। पारा के आने माईलोगिन मन सकेलागे रिहिन। पर्रा के दोना पतरी ला निमारे लागिस।

" मेंहा देवत हँव बहिनी तुमन झन छांटो। आ बहिनी रमेसरी नेंग-जोंग के जिनिस ला बिसा ले।'' 

रेवती अउ केंवटिन दुनो कोई किहिस।

रमेसरी दुवार लिपत रिहिस। खबल - खबल  हाथ धो डारिस। भीरे कछोरा मा आइस महुआ झरे कस हाँसत। 

"का होगे या ..?'' 

अब्बड़  खुलखुल हाँसत हस बाई । केवटिन के आरो ला सुनके किहिस।

"अई तुमन मोर घर मा आये हव तब हाँसहु नही, तब रोहू या...। अब्बड़ धुर्रा होगे रिहिस बहिनी तेखर सेती दुवार लिपत हँव।

 फेर ..?''

"फेर..का ?'' समारिन किहिस।

"फेर  अउ का....? पानी गिरत हावय नइ देखत हस ?''

 अब छे सात झन उपासिन मन सकेलागे रिहिन। जम्मो कोई हाँसे लागिस रमेसरी के गोठ ला सुनके। पारा भर गमकत हावय अब।

" सिरतोन काहत हस दीदी ! ये अखफुट्टा इंदर देव हा अइन्ते - तइन्ते बुता करथे । चौमासा मा घाम टड़ेरथे अउ गरमी मा पूरा बोहाथे। तेखर सेती राच्छस मन नंगतेहे कूटथे ओला ओ..।''

बिसाहिन किहिस अउ फेर खुलखुल हाँसीस।

"ओ रोगहा इंदर भगवान के गोठ तो झन कर दीदी पर के गोसाइन बर नियत डोला दिस कुकरा बन के पर घर खुसरगे।  भगवान मन अइसने नियत खोटा करही तब मइनखे मन के का होही ..?'' 

 धरमिन आय। ओखरो गोठ अब मिंझरगे रिहिस। गघरा भर पानी मुड़ी मा बोहो के आवत रिहिस। छलकत पानी अउ पानी मा मिंझरे मांग के लाली कुहकू जतका खाल्हे उतरत हावे ओतकी रंग कमतियावत हावय अउ मन मा उछाह के रंग चढ़े लागिस। माथ ले नाक , नाक ले नरी अउ नरी ले उतरके छाती मा हमागे पानी हा। 

"पसहर चाउर बिसाहू का बहिनी...?''

"वहु तो अब सोना होगे हावय ओ ।'' 

"धरमिन अउ रमेसरी गोठियावत रिहिस।

कामे तौलही रेवती दीदी हा। तोला मे.., किलो मे.., कि पैली मे.. ?''

जम्मो कोई फेर हाँसे लागिस।

" पबित्तर जिनिस हा मँहगा तो रहिबे करही दीदी !'' केवटिन किहिस।

" लइका लोग सब बने- बने हावय न बेटी रेवती  !''

 महतारी कस मंडलीन डोकरी के गोठ सुनके रेवती अब दंदरे लागिस। आँसू के बांध अब रोहो - पोहो होगे। पीरा छलकगे। घो..घो..हि.. हि... हिचकी मार के ..अउ अब गोहार पार के रो डारिस। रेवती के बेटी रितु हा काली मंझनिया ले बिन बताये कही चल देहे। कुछु बताये के उदिम करिस रेवती हा फेर मुँहू ले बक्का नइ फूटे। 

"ओ काला बताही ओ !  रेवती के टूरी हा अनजतिया टूरा संग उड़हरिया भगा गे हे तेला।''

कोतवाल आवय। ओखर बीख गोठ ला सुनके झिमझिमासी लागिस रेवती ला। 

"कलेचुप रहा कका ! सरकारी दस एकड़ खेत ला पोटारे हस तेखर सेती आनी-बानी के उछरत हावस। माईलोगन के मरजाद ला नइ जानस। गरीबीन ला ठोसरा मारे के टकराहा हस ।''

" कुकुर के पुंछी कहा ले सोझियाही ?'' 

रमेसरी अउ धरमिन आवय झंझेटत रिहिन।

                        रेवती भलुक गरीबीन रिहिस फेर अब्बड़ दुलार अउ मया पाये रिहिस माइके मा। कोनो महल अटारी के नही भलुक कुंदरा के राजकुमारी रिहिस रेवती हा। राजकुमार मिलिस तब तो सिरतोन के राजकुमार बनगे रेवती बर। फेर गरीबीन के भाग मा उछाह नइ लिखाये राहय । मंद महुआ पियाईया राजकुमार हा टूरी के छट्ठी के पार्टी  बच्छर भर ले मनावत रिहिस। पार्टी नइ सिराइस फेर राजकुमार सिरागे। 

                   आँसू के एक- एक बूँद ला सकेलतीस ते समुन्दर ले आगर हो जाही..। कतका दुख के पहार ला छाती मा लदके हावय कि हिमालय कमती हो जाही। कतका ठोसरा अउ अपमान सहे हे ...कोनो नइ जाने। बेटी के कल्थी मारत ले बइठत तक। बइठत ले मड़ियावत तक । मड़ियावत ले रेंगत तक। अउ रेंगत ले उड़ाहावत तक...। अउ उड़हाये लागिस तब तो झन पुछ ..! काखर आँखी मा नइ गड़े लइका हा..। पांख ले थोड़े उड़ाथे बेटी मन ..? अपन मिहनत मा सब ला जानबा करा देथे। गोड़ तिरइया मन उही मेर भसरंग ले मुड़भसरा गिर जाथे।

                 बेटी बारवी किलास मा पूरा राज मा पहेला आये हावय। पेपर छपिस जयकारा होइस। "बेटी! तिही मोर जैजात आवस। न गाँव मा दू कुरिया के घर बिसा सकत हँव, न खार मा खेत । ..अउ घर अउ खेत रहे ले मइनखे पोठ हो जाथे का  ? जैजात आवस बेटी तोला देख के मालगुजार कस महु हा छाती फुलोथो। अउ अइसना फुलत रहु सबरदिन।

          फेर आज फुग्गा फुटगे। गुमान टुटगे। हवा निकल गे । 

"भागना रिहिस ते हमर जात सगा के का दुकाल रिहिस ओ ?  पठान टूरा संग...छी छी...।'' कोतवाल फेर बीख बान छोड़त रेंग दिस।

                रेवती के मन गवाही नइ दिस फेर गाँव के पटवारी कका बताइस तब कइसे नइ पतियाही ? उही तो आय पुरखा घर के एक खोली ला अतिक्रमण हाबे कहिके टोरवाये रिहिन। 

 "मेहाँ देखे हँव रेवती बेटी !  बड़का अरोना बेग ला पीठ मा लाद के ओ टूरा संग भुर्र होगे तेला।'' पटवारी फेर किहिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय।

"इंजीनियरिंग कालेज के तीर मा मोटियारी टूरी के लाश मिलिस दू चार दिन पाछू। बदन के जीन्स टी शर्ट जम्मो चिरागे रिहिस। पुलिस केस मा पता चलिस - कबाड़ी वाला के बेटा आवय सलमान । टूरी ला अपन मया मा फँसाये के उदिम करिस अउ नइ फँसिस तब चारो कोई ओरी पारी..।''

पटइल कका आवय। रेवती के जी कलप गे। मुँहु चपियागे टोटा सुखागे फेर पानी के एक बूँद नइ पियिस।

"आजकल नवा चरित्तर उवे हे भइयां ! लव जिहाद कहिथे। आने जात के मन  मया मा फँसा लेथे। टूरी ला मुनगा चुचरे सही चुचर लेथे। खेत जोतके बीजा डार देथे अउ छोड़ देथे ..खुरचे बर। ये जम्मो डंफायेन हा बड़का शहर मा चले । अब हमर गाँव देहात मा घला आ गेहे। धन हे श्री राम जी..! तिही बता भगवा रंग ला कइसे अइसन खतरा ले उबारबोन तेला।

?''

पुजारी आय मंदिर ला माथ नवावत किहिस।

रेवती काला जानही घरखुसरी हा, लव जिहाद - फव जिहाद ला। अपन बुता ले बुता राखथे। उही पुजारी आवय जौन हा डांग-डोरी, देवी-देवता, देव- आंगा देव ला नचा लेथे। 

रेवती बम्फाड़ के रो डारिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय।

                         अभिन बारवी पढ़ के निकले हावय,कइसे मया के मेकरा जाला मा अरहज जाही ? अरहज सकथे न!,नेवरिया घर बारवी पास नइ होवन पाइस अउ बिहाव कर दिस।..अउ ओ खोरवा मंडल के  दसवीं पढ़इया नतनीन.. अब्बड़ आनी-बानी के गोठ सुनथो। ओमन अइसन करत हावय तब मोर बेटी...? अब्बड़ गुनत-गुनत अंगरी मा गिन डारिस। लइका हा छे बच्छर मा बड़े स्कूल मा भरती होइस। बारा बच्छर ले पढ़ीस । बारा छे अट्ठारा..।

"अई''

 रेवती के मुँहु उघर गे। लइका संग्यान होगे। इही उम्मर मा ओखर खुद के बिहाव होये रिहिस।

रेवती के आँसू भलुक सुक्खागे रिहिस फेर आँखी उसवागे रिहिस।

"कोन पठान टूरा आवय रे ..? हमर गाँव के बहु बेटी ला बिगाड़त हे। अभिन थाना मा फोन करथव । भगवा रंग वाला मन ला घला सोरियावत हँव । ओ पठान टूरा के बुकनी झर्रा दिही ओमन।''  

सरपंच आवय रखमखा के आइस, तमकत हे।

" महु देखे हँव ओ रितु नोनी ला । कोन आय तेला नइ चिन्हे हँव फेर सादा कुरता पैजामा अउ मुड़ी मा  हरियर टोपी पहिरके तहसील ऑफिस कोती जावत रिहिस।''

गाँव के डॉक्टर आय।

" मोला तो कोर्ट मैरिज करे बर जावत रिहिन अइसे लागथे।'' सरपंच फेर किहिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय अभिन घला।


             रेवती घर अमरगे रिहिस। अउ घर ले दोना पतरी ला उपासिन मन ला बेचत हाबे। फेर मोटियारी बेटी के संसो मा काला धीरज धरही ?  कभु डॉक्टर करा जातिस कभु वकील करा कभु बइगिन करा तब पहटनीन करा । कतको बेरा फोन घला लगाइस फेर स्विच ऑफ आइस। 

      जेखर संग मया कर तेखर संग बिहाव घला करना चाही । नही ते..? मया ही झन कर। रूखमणी हा भाग नइ सकिस तभे भगवान किसन ला भगाये बर किहिस । अउ रूखमणी ला हरन करके लेगगे किसन जी हा। रितु हा महाभारत देखत- देखत केहे रिहिस अउ रेवती बरजे रिहिस । नानचुन टूरी अउ आनी - बानी के गोठ करथस। जइसे पढाई मा हुशियार हावय वइसने खेलकूद लड़ई झगड़ा सब मा अगवाये हाबे...अउ मया मा भागे बर...?

धिरलगहा पतियावत- पतियावत अब सिरतोन पतियाये  लागिस रेवती हा.. ।

                        बेरा चढ़गे अब। महुआ पत्ता के दोना पतरी ला कतको झन ला बेचिस अउ कतको झन ला फोकट मा घला दिस। कतको झन ला छे किसम के अन्न राहर जौ तिवरा चना बटरा अउ लाई दिस। छे किसम के खेलाउना बनाइस बाटी भौरा गिल्ली डंडा धनुष बाण गेड़ी। पसहर चाउर ( लाल रंग के धान जौन पानी के स्रोत मा अपने आप जाग जाथे सुंघा/कांटा रहिथे। बाली ला सुल्हर लेथे दीदी मन अउ रमन्ज के चाउर निकालथे-लाल रंग के चाउर ) ला रांधिस   बिन जोताये खेत ले छे किसम के भाजी सकेल डारिस अमारी मुनगा कुम्हड़ा लाल पालक बथवा भाजी। गाँव के डेयरी ले दूध मही घीव ले आनिस। अउ अब जम्मो तियारी करके गौरी - गौरा चौक मा रेंग दिस। 

              मंडप साजे हे। सगरी बने हावय सुघ्घर अउ पार मा खोचाये हे चिरइया फूल कनेर कांसी दूबी अब्बड़ सुघ्घर। दाई-माई बहिनी मन घला अपन जम्मो सवांगा पहिरे- ओढ़े । मेहंदी मा रंगे हाथ अउ आलता माहुर मा  गोड़। चुरी वाली अउ बिन चुरी वाली सब बइठे हावय संघरा। लइका के उज्जर भविस बर असीस मांगत हावय जम्मो उपासिन मन कमरछठ महारानी ले। 

"अब तोरे आसरा हावय ओ कमरछठ दाई  !''   रेवती के ऑंसू बोहागे महराज के पैलगी करत। दिन भर के निर्जला उपास । जम्मो कोती अँधियार लागिस। लटपट घर अमरिस अउ सुन्ना घर मा समावत पारबती भोले नाथ के फोटू ला पोटार लिस। बेसुध होगे। जग अँधियार लागत हाबे अब रेवती ला। काबर नइ लागही ? मोटियारी बेटी घर ले निकलगे हाबे। न कोनो सोर न कोनो संदेश। एक-एक मइनखे के दस-दस मुँहू होगे हे। आनी-बानी के गोठ गोठियाथे। पेपर टीवी मा तो फकत ब्रेकिंग न्यूज आय-मासूम संग दुष्कर्म, नाबालिक ला उड़हरिया भगा के लेग गे, ....अउ मर्डर के खबर। .....मोरो बेटी संग .... कुछु अनहोनी.... तो नइ....? रिकम- रिकम के विचार के गरेरा चलत हे रेवती के मन मा। कोन जन कब थिराही ये बवंडर हा। रेवती के जी काँपगे। रुआँ ठाड़ होगे। माटी होवत हाबे रेवती के क्या हा।


              उदुप ले मोहाटी के कपाट बाजिस अउ नोनी रितु हा खुसरिस भीतरी कोती। बटन ला मसक के लट्टू बारिस।

"दाई ! ''

ये आखर रेवती बर संजीवनी बूटी रिहिस। झकनका के उठिस अउ लइका ला पोटार लिस। नोनी रितु के नरी मा झूल गे। 

"गाँव भर नाच नचा डारे। पदनी-पाद पदो डारे । जिहाँ जाना हे, बता के जाना रिहिस तोला कब बरजे हँव बेटी ! झन जा कहि के । '' 

रेवती रोवत रिहिस अउ रितु के गाल घला झन्नागे  दाई के चटकन ले। 

"दाई रायपुर गे रेहेंव। अब तोर बेटी हा मेडिकल कालेज मा पढ़ही ओ !''

मुचकावत रिहिस रितु हा।

"अउ पइसा ? ''

"लोन लेये हँव, शिक्षा लोन। फरहान भइयां जम्मो बेरा पंदोली दिस फारम भरे अउ लोन निकाले बर। मोर संगी रुखसाना के भाई आय ओ ! फरहान हा। रायपुर दुरिहा हे तेखरे सेती अगुवाके काली  गे रेहेन मेहां रुखसाना अउ फरहान भइयां तीनो झन। आजे आखरी दिन रिहिस काउंसिलिंग के । मोबाइल घला मरगिस तब का करहु।   जाथो कहिके पटेलीन डोकरी ला घला बताये रेहेंव । भैरी सुरुजभूलहिन नइ बताइस ?  नानचुन गोठ बर झन संसो करे कर।''

रितु मुचकावत रिहिस अउ रेवती के ऑंसू पोछत किहिस। 

टूरा के जेवनी कोती अउ टूरी के  डेरी कोती पोता मारथे। नानकुन कपड़ा ला पिवरी छुही मा बोर के रितु के डेरी कोती पोता मारे लागिस। छे बार पोता  मारके आसीस दिस  खुलखुल हाँसत रेवती हा अब।

बिन जोताये खेत मा उपजे चाउर कस पाबित्तर लागत रिहिस अब रितु हा। अउ गाल मा उछाह के रंग दिखत रिहिस सिरतोन पसहर चाउर कस कस लाल-लाल । 


चन्द्रहास साहू

द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब के पास

श्रध्दा नगर धमतरी छत्तीसगढ़

493773

मो.  -  8120578897

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समीक्षा


पोखनलाल जायसवाल: 


छत्तीसगढ़ लोकपरब के भुइयाँ ए। जिहाँ कतको लोकपरब आए दिन मनते रहिथे। ए लोकपरब जन-जन ल मया के सुतरी म जोरे रखे म बड़ भूमिका निभाथे। सामाजिकता के विकास करथे। आने-आने जात-बिरादरी के जम्मो मनखे अपन पुस्तैनी काम धंधा ले एक-दूसर के सहयोग करथें। गँवई जनजीवन म एकता, भाईचारा अउ मया-प्रेम के सतरंगी खुशहाली के दर्शन होथे। विकास के निसैनी चढ़त पउनी-पसारी अब नँदावत हे। अभियो दूराँचल म जिहाँ रोजगार गारंटी के घोड़ा कागज म दउड़त तो हे, फेर रोजगार के गारंटी नइ हे, उहाँ पउनी-पसारी लगके कतकोन मन जिनगी ल पार लगाथें। अइसन उही मन करथें, जेन मन अपन गाँव अपन छाँव के भाव ले अपन जन्मभूमि ल सरग मानथें।


       शिक्षा के सुरुज के अँजोर नइ बगरे ले कभू-कभू बिन मुड़ी-कान के गोठ ह जंगल के आगी बरोबर फइलते जाथे। कउँवा कान लेगे कहे म लोगन कउँवा के पीछू दउड़े लगथें। कान ल छू के परछो ले लन कहिके नइ सोच पाँय। एकरे कतकोन झिन मन फायदा उठाथें अउ गरीब अउ लाचार मनखे ल हँसी-मजाक के जिनिस समझथें। उँकर भावना ले खेलथें। जेकर पति नहीं, तेकर गति नहीं। कहावत शिक्षा के अभाव म चरितार्थ हो जथे। 


       भारत गाँव म बसथे। ए गोठ ल सबो मानथें अउ भारतीयता के दर्शन गाँव म देखब ल मिलथे। जिहाँ लोगन के बीच कोनो किसिम के जाति भेद अउ धरम भेद नइ झलकय। सब मिलके रहिथें आगू बढ़थें। 


        ताक म रहइया मनखे मन गाँव के हवा म जहर-महुरा घोरे के बुता करथें। भरम जाल के फाँदा म जनता ल फँसा के अपन उल्लू सीधा करथें। इही अवसरवादी मन ल कहानीकार चंद्रहास साहू जी निशाना म रख के पसहर चाउँर कहानी ल लिखे हें। कहानी अपन उद्देश्य ल पूरा करत हे। 


          आम आदमी लोक लाज जाय के डर ले अधरे अधर काँपत रहिथे। जेकर ले अपन आप के विश्वास ल डगमगा डरथे, अउ अपने लइका ऊपर शक करे धर लेथे। रेवती घलव अपन हुशियार बेटी ऊपर भरोसा करे के स्थिति म नइ राहय। ए गरीबी अउ हँसइया समाज के डर के भूत आय। जउन रेवती के मन म समाज म घटत अनहोनी घटना ले जनम लेथे। ए मनसा पाप कहन ते शक, एला हवा देवइया कतकोन हें, जउन मन इही बगुला भगत सहीं ताकत बइठे रहिथें।


        कहानी के भाषा शैली बढ़िया हे। प्रवाह हे। रोचक हे। कहानीकार सिरीफ सपाट बयानी करना नइ चाहय, प्रतीक म अपन बात रखे म उन ल महारत हासिल हे। देखव बानगी---टुरी ल मुनगा चुचरे सही चुचर लेथे। खेत जोतके बीजा डार देथे अउ छोड़ देथे...खुरचे बर। 

      ए ह अपन आप म गहिर बात ल समेटे हवय। बस विचारे के जरूरत हे।

       संवाद मन पात्र मन ल उभारे म सक्षम हवँय।


     कहानीकार चंद्रहास साहू जी अपन लेखन शैली ले पाठक ल गँवई गाँव के जीवन दर्शन करावत कहानी ल आगू बढ़ाय म सफल हे। कहानी काल्पनिकता ले दुरिहा हे। 


       पाठक रेवती के बेटी रितु के प्रवेश करत ले कहानी का मोड़ लिही? एकर कल्पना नइ कर पाय, अउ पढ़े के मोह घलव छोड़ नइ सकय। कहानीकार के के इही चतुरई पाठक ल अपन शब्द जाल म बाँध लेथे।


      पसहर चाउँर ल खमरछठ म जतका पवित्र माने जाथे, रितु ह महतारी रेवती के जिनगी म ओतके पवित्र हे। ओकर मन के शंका ह निराधार रहिस। अनहोनी के शंका के घटा के फरियाय ले खुशी ले दमकत गाल के लाली ह कहानी के शीर्षक ल सार्थक करथे। अइसन सुखांत कहानी हर पाठक ल पढ़ना चाही। 


      चंद्रकांत साहू जी ल सुग्घर कहानी लिखे बर मँय बधाई देवत हँव।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह (पलारी)

जिला बलौदाबाजार

9977252202

गुड़ी चौक के हटरी •

 • गुड़ी चौक के हटरी •


आज के बेरा म भले हे अब गांव - गांव मन म साग - सालन के बजार लगत हे फेर बीस बछर पाछू सब्बो गांव के गुड़ी चौक म रोज बिहनिया पाँच बजे ले  लेके गरुवा ढिलावत तक हटरी बइठय जहां राऊत हांका पारतिस तंह हटरी उचकय | नदिया के खंड़ म साग भाजी के बोंवइया किसान मन रोज बिहनिया ले कांवर , साइकिल अऊ मुड़ बोझा म घलो माइलोगिन मन बोहके आवंय |सब्बो घर के लइका,सियान चाहे कोनों भी रोज बिहनिया हटरी जातिन अऊ साफ हरा - भरा साग लेवंय गांव के चौक म मिलके सब एक दुसर ल राम राम कहतीन फेर हालचाल , खेती - किसानी के गोठ गोठियावय, खातू, निंदई,पानी,बियासी के संगे - संग कोन आज कती खेत डहर जइसे धरसा, भर्री,खूंठन, गरोसा,बहरा  जात हे ओती के मुंही देखे बर कहय एक नानकुन मेला कस रोज के अइसने माहौल रहय साग बिसइया मन सिरिफ एक दिन के पुरता ही साग लेवंय काबर कि ए हटरी तो रोज बइठना होवय |


गांव के सुमत,मया,परेम, सहयोग के बढ़वार मा हटरी के अपन महती भूमिका रहिस अब बखत के सरुप बदलगे हावय काखरो मेर अतका फुरसत नइ हे के घड़ी भर बइठके गोठिया लेवंय | बुढुवा बबा ए सब गोठ बात बतावत रहिथे अऊ कहत रहिथे गांव गंवई के मिठास नंदागे न तो दया -  मया बाँचिस न ही कोनों चौरा एक दुसर के मया सिरागे अऊ सपना होगे हटरी के जुरई |


       शशिभूषण स्नेही

       बिलाईगढ़ (कैथा)

निबन्ध-*रसा*

 निबन्ध-*रसा*


जीवन मा आनंद हे, यानि रस हे। तनधारी जीव के जनम ले मरन तक रस हे। रसपान तो हर जीव करथे, फेर ये बात अलग हे कि जीव जगत मा मनखे जात भर ला अपन भावना ला व्यक्त करे के शक्ति मिले हे।

संसार मा रस हे। रस हे तभे जिनगी हे अउ जिनगी हे तब तक रस हे।नवजात के किलकारी सुन महतारी अपन प्रसव पीरा भूला के वात्सल्य रस मा भर जाथे। परिवार आनंद के अनुभूति करथे। वइसने कोनों जीव अउ मनखे के मरना हर करुण रस के कारण बनथे। यानि मनुष्य ला अपन जनम -मरन के अंतराल मा रस के अनेक रूप देखे सुने अउ अनुभव करे बर मिलथे।तभे तो काव्य शास्त्र मा ग्यारह प्रकार के रस समाहित करे गए हे। जिनगी के कई रंग हे, हर रंग के अपन एक रस हे। अउ रस के बिना जिनगी अधूरा हे। 

                  रस ला छत्तीसगढ़ी मा *रसा* घलो कहिथे।कुछु खाय पिये के चीज ला देख के मुँह पनछा जथे यानि रस हे, रसा हे।

   साग-भाजी के बात हे तो कतको झन भुँजवा मा रस लेथे अउ कतको ला चपचपहा-रसावाला चाही।  कतको साग - भाजी मन बिना रसा के मिठाबे नइ करै। अउ बिना रसा के बनै घलो नहीं। बफौरी, बटकर डुबकी, इड़हर, कढ़ी मन के कल्पना बिना रसा के नइ किये जा सकै। अइसन अम्मटहा साग मन ला चुहक-चुहक के खाय के अपन मजा हे। मैं जानत हँव पढ़त-पढ़त मुँह मा लार आ गे होही, वहू एक प्रकार के रस ही आय जउन हर मुँह ले टपके बर धरत होही।

                  हमर घर गौटनींन हर पीठ ला खजवा-खजवा के  उकाल डरे रहिस।खर्-रस खर्-रस खजवायले मार नख के चिन्हा पर गए रहिस। तभो ले खजवायच परत रहिस, काबर परिणाम के संसो नइ रहिस,आनंद के वसीभूत रहिस।नतीजा बाद मा देखे जाही, अभी तो खजरी ला खजवाय मा आनंद के सीमा नइ हे, काबर जो रस मिलत हे, ओ ला वोकर सिवा कोनों नइ जान सकै। 

                छत्तीसगढ़ी मा अउ भी कई प्रकार के रस हे जउन हर वो शब्द मा प्रकट होथे। खर्रस-खर्रस यानि खजरी ला खजवाय के रस, झर्रस-झर्रस झरफर-झरफर यानि अपन सुर मा लकर-धकर रेंगे के रस, हर्रस-भर्रस यानि कोनों ले बिना सोचे समझे अन्ने-तन्ते गोठ, झगरा-झंझट, गाली-गलौच, उल्टा-पुल्टा करे के रस अउ चर्रस-चर्रस यानि मारे अउ मार खाय के रस। 

               फर यानि फल हा रसालू होथे रसदार होथे, तभे मजा आथे, फेर निरस आदमी ले सब दुरिहा भागथे।एकर सेती मनखे ला सहज अउ सरस होना जरूरी हे। आदमी ला जब काकरो  उपर तरस आथे तो उपकार घलो करथे, अउ कतको मनखे अपन गलत करम ले  घर परिवार ला तरसे बर मजबूर कर देथे। वक्त-बखत मा अइसन आदमी उपर फेर कोनों ला तरस नइ आवय।

आदमी रसिक अउ रसिया घलो कहाथे।फेर मनखे के प्रकृति के आधार मा एकर सही अउ गलत दूनों अर्थ निकलथे। जिनगी ला रसमय होना जरूरी हे। तभे मजा हे।काम-धाम अउ जीविकोपार्जन के साथ-साथ शौक बर समय निकाल के जीवन मा रस लाये जा सकथे। गाना-बजाना, नाचना, खेलना-कूदना, कलाकारी, बागवानी, पढ़ना-लिखना, सीखना, कुछु-कुछु बनाना अइसन सैकड़ों चीज हे जेन हर जीवन ला रस देथे, खुशी देथे।अउ तभे तो जीवन हे।तभे तो जीवन के आनंद हे। 

           ये हमर शरीर बर खून घलो एक रस आय। धरती बर पानी-बादर रस आय। हमर काया के पाँचों इंद्रिय अनुभूति के रसपान करथे तभे हमर मगज काम करथे। 

ए प्रकार ले जीवन में रस के बहुत महत्व हे। रस के बिना जीवन निरस ही कहाथे। रंग अउ रस के डेरा हे संसार मा। रसदार बने रहे मा ही आदमी हर आदमी ए। नकारात्मकता ला त्याग के सकारात्मकता के तरफ बढ़ते रहना चाही।राग अउ रंग के ये दुनिया मा रस बचा के रखौ, इही मा सब कुछ हे।काबर राग, रंग अउ रस, ये तीन चीज ही प्राण-शक्ति के पहिचान आय। 


-बलराम चंद्राकर भिलाई

व्यंग्य- महाभारत

व्यंग्य- महाभारत  


          द्वापर युग के जीव मन चौरासी लाख योनि म भटके के पाछू अपन नावा पोस्टिंग के अगोरा म ब्रम्हाजी के कार्यालय के परछी म बइठे गोठियावत रहय । ब्रम्हाजी के आफिस के बड़े बाबू चित्रगुप्त ला चपरासी संग आवत देख .. बुता हो जाये के उम्मीद हो गिस । अर्दली हा थोकिन बेर म .. जीव मनला चित्रगुप्त के आफिस म हाजिर होय बर नाव लेके बलाये लगिस । महाभारत काल के सबले सीनियर जीव भीष्म पितामह हाजिर होइन । ओला चित्रगुप्त हा किहिस – तोर पुण्य ला देखत .. मोर मन तोला वापिस धरती म भेजे के नइहे फेर .. हमर नियम कायदा झन टूटय तेकर सेती .. तोला जाये बर परही । भीष्म पितामह पूछिस – ये पइत मोर काये बुता अऊ भूमिका रइहि ? चित्रगुप्त किथे – दुनिया म जतका जीव हे तेकर भूमिका पहिली ले तय रहिथे । एक बेर ओकर बर जे नियम बांध दिये जाथे तेला .. निभाये ला परथे । भीष्म किथे – एकर मतलब मोला फेर भीष्म बने बर लागही अऊ कलेचुप कौरव के गुनाह म भागीदार बने बर लागही तहन .. चौरासी लाख योनि म भुगते बर लागही । चित्रगुप्त हा .. हाँ कहत मुड़ी हलइस । भीष्म किहिस – मोला जाये के मन नइ होवत हे । मोर भूमिका ला बदलहू तभे उहाँ जाहूँ .. गलती कोनो अऊ करथे अऊ सजा मय भुगत थँव । ऊँकर सेती न बर कर सकँव न बिहाव । मानुष तन पाके .. जिनगी के तनिक मजा नइ मिलय । फकत येकर ओकर सेवा बजावत रहव । भले मोला ये पइत उहाँ चपरासी बना दव फेर मोला भीष्म बनाके झन भेजव । मोर ले प्रतिज्ञा करवाथव अऊ मोला बांध देथव । चित्रगुप्त हा किहिस – तैं जब पहिली बेर जीव बनेस तभे तोर इही भूमिका तै होय रिहिस अब बदल नइ सकय .. चाहे तैं कुछ कर । भीष्म किहिस – मोला ब्रम्हा साहेब ले मिलन दव । चित्रगुप्त हा ओला ब्रम्हाजी से मिलवाये बर मना करिस अऊ पोस्टिंग बर नोट शीट बनाके ब्रम्हाजी तिर भेज दिस । भीष्म के इच्छा तको ला नोट शीट म लिखदे रिहिस । ब्रम्हाजी हा नोट शीट पढ़के चित्रगुप्त ला बलवइस । ब्रम्हाजी हा चित्रगुप्त ला किहिस – ओकर भूमिका ला ये पइत बदल दे । बपरा हा बिगन गलती करे चौरासी लाख योनि म सजा पावत भुगतिस हे । चित्रगुप्त हा स्वर्ग के संविधान के धारा देखावत ओकर उल्लंघन होय के हवाला देवत सुझाव देवत किहिस - येला जावन देथन फेर ये पइत .. येला देंहे नइ देवन । येहा कागज बनके जाही अऊ रइहि । ब्रम्हाजी हाँसिस अऊ किहिस – अइसे कइसे सम्भव हे ? चित्रगुप्त बतइस – ये पइत येला भारत म संविधान बना देथन । जेहा चाहे कुछ भी हो जाये कलेचुप सत्तापक्ष के रक्षा करही । न ओला बोले ला परय न सुने ला .. न देखे ला परय ... । ब्रम्हाजी हा भलुक स्वर्ग के सबले बड़े अधिकारी आय फेर वहू ला बड़े बाबू के बात राखे बर परथे ... । नोटशीट म दस्तखत होगे । भीष्म संविधान बनके भारत के सदन म बिराज दिस । अब ओहा बोलय सुनय देखय निही । ओकर तनि ले सरकार बोलथे .. जनता सुनथे अऊ विपक्ष हा देखथे ।

          दूसर जीव मन के पारी अइस । पहिली मौका द्रौपदी ला महिला होय के सेती मिलिस । ओहा जाते साठ केहे लगिस – चाहे कुछ भी हो जाय ... मोला ये पइत स्त्री पात्र झन देहू चित्रगुप्त जी । चित्रगुप्त हा चश्मा ले ओला झाँकत किहिस – बदलना मोर बस के बात नइहे । पोस्टिंग आर्डर म दस्तखत करवाये बर ब्रम्हाजी तिर चल दिस । पिछू पिछू बरपेली खुसरगे द्रौपदी हा । ब्रम्हाजी हा किहिस – हमर स्वर्ग म जे नियम धरम बन चुके हे तेला हम धरती कस .. न तो घेरी बेरी टोर सकन न बदल सकन । तोर भूमिका पहिली बेर तैं जीव बनेस तभे ले तै हे .. तोला जाये ला परही । द्रौपदी किहिस – ब्रम्हा सर .. आपके बात मय नइ मानव .. अइसे नइ कहत हँव .. फेर मोला स्त्री बनाके भेज देथव .. मोर लुगरा पाटा ला मोर देंहे ले उतारे बर धरे रिहिस तब ओ पइत तो भगवान हा मोर रक्षा करे रिहिस ... का ये पइत घला ओहा आही का .. ? ब्रम्हाजी किहिस – अब ओला मय कइसे बताहूँ .. ? ओ कहाँ आही .. कहाँ जाही .. कोन ला बचाही .. कोन ला डुबाही .. तेला उही जाने । द्रौपदी हा रोय लगिस । ब्रम्हाजी के अर्दली हा ओला बाहिर निकले के इशारा करिस । चित्रगुप्त हा सुझाव दिस – सर .. येला उहाँ लुगरा पाटा के संगे संग कुछ भी पहिरे के इजाजत दे देथन । ब्रम्हाजी हाँसिस – अइसे कइसे सम्भव हे .. ? मईलोगिन होके अऊ कायेच पहिर डरही तेमा .. ? चित्रगुप्त किहिस – सम्भव हे सर .. मोर तिर एक उपाय हे .. जेमा हमर कायदा कानून नइ टूटय अऊ बपरी दौपदी के बात माढ़ घला जही । भारत म येकर लिंग परिवर्तन नइ होवन देन .. येला जनता (स्त्रीलिंग) बना देथन .. उहाँ चाहे ओहा जे पहिरे ... । लुगरा पहिरे चाहे फुलपेंठ ... हमला काये करना हे । रिहिस बात ओकर इज्जत उतरे के ... ओ तो होबेच करही ... अऊ ओला बाँचे बर खुदे अपन जुगत जमाये बर परही .. । बपरी द्रौपदी के नावा पोस्टिंग होगे .. बिगन लिंग बदले ... धरती म जनता ( स्त्रीलिंग ) बनके पहुँचगे । 

          कौरव मन ब्रम्हाजी तिर एके संघरा पहुँचगे । ओला गोहारे लगिन – कौरव मन ये पइत कौरव नइ बनन कहय । चित्रगुप्त तिर येकरो उपाय रिहिस । ओहा ओमन ला समझावत किहिस – यहू पइत तुम सत्ता म रइहू अऊ तुँहर रक्षा बर भीष्म हा संविधान बनके रहि । तुँहर उपर जादा आँच नइ आवय । कुछ जीव मन प्रश्न करिन – येकर मतलब ये आय के यहू दारी केवल दुर्योधन हा राज करही .. दुशासन ला कब मौका मिलही .. । चित्रगुप्त बतइस – न अकेल्ला दुर्योधन राज करय ... न दुशासन .. राज करही उही ... जे अंधरा रहि .. । धृतराष्ट्र भड़कगे । मे नइ जाँवव .. मोला अंधरा बना देथस अऊ राज करे बर कहिथस .. । जिनगी के कुछ मजा नइ ले सकँव । चित्रगुप्त किहिस – अंधरा तो तोला बनेच ला परही फेर ये पइत तोर आँखी सही सलामत रहि । तोला उही दिखही जेला देखे के तोर इच्छा रहि । फेर चाह के घला .. न तोला जनता के दुख दिखय ... न अपमान दिखय .. । तोला दुख दिखही दुर्योधन के .. दुशासन के अऊ ओकरे मनके संगवारी के । जेन मन तोर संग छोड़ही ... तेकर तकलीफ तोर आँखी ले धूर हो जहि । फेर तूमन ला एके देंहे म थोरेन रहना हे .. जेला सत्ता मिलही तेकरे देंहे म खुसरना हे । धृतराष्ट्र हा अपन परिवार सुध्धा पहुँचगे अऊ इहाँ हरेक जगा म शासन सम्हलइया मनखे के दिल म खुसरके जगा बना डरिस । तबले जे सत्ता म बइठथे .. तेहा धृतराष्ट्र हो जथे अऊ ओकर बेटा मन ... जनता दौपदी के चीर हरण करत बिगन रोक टोंक भुकरत किंजरत हे । 

          पांडव मन के बारी अइस – ओमा किहिन हम जाबो फेर हमन ला शुरू से सत्ता चाहि । नइते इँहींचे ठीक हन । चित्रगुप्त किहिस – उहाँ द्रौपदी पहुँच चुके हे .. ओला जीत के दूसर मन झन हथिया लेवय । तुँहर जइसे मर्जी .. । पांडो मन के पोटा काँपगे । तुरत फुरत आये बर तैयार होगे । ये पइत अपन भूमिका पूछिन ? चित्रगुप्त हा सबो के खाका तैयार कर डरे रहय । ओहा बताये लगिस – तुम विपक्ष म रहू । धर्मराज किहिस – मय नइ जाँव । चित्रगुप्त किथे – जाये ला तो परही । आदेश म साइन हो चुके हे । फेर तुम घला देंहे बदलत रहू । जे सत्ता नइ पा सकही अऊ जनता के जेला दुख दर्द अपमान हा जब तक दिखही .. तब तक ओकर देंहे म तुँहर जगा रइहि । अर्जुन पूछिस - अइसन म कतको संघर्ष कर .. सत्ता मिलबेच नइ करे अइसे लागत हे ? चित्रगुप्त किहिस – सच बात आय । जेकर देंह ले सत्ता छूटही तिही देंह तुँहर निवास के जगा बनही .. । अर्जुन पूछ पारिस – त येकर मतलब भगवान हा जाबेच नइ करय का .. ? चित्रगुप्त किहिस – भगवान जाही अऊ सत्ता पाये बर तुँहर सहायता घला करही । पांडो मन भगवान के ताकत ला बहुत तिर ले देखे रिहिन । आगू कुछु अऊ प्रश्न करे बिगन .. खुश होवत ... यहू मन आदेश धरके निकल गिन । 

          तभे भगवान पहुँचगे अऊ केहे लगिस – महूँ ला जाये ला परही का जी ? चित्रगुप्त किथे – भगवान तैं जाबे फेर रेहे बर नइ जावस .. पाँच बछर म एके बेर जाबे .. । भगवान हाँसिस – तहूँ अच्छा अस जी । मोरो बर बंधन कर देथस .. । चित्रगुप्त किथे – तैं पाँच बछर म एक बेर जनता के देंहे म खुसरके ओला भगवान बना देबे अऊ पांडो ला सत्ता म बइठारे बर साथ देबे फेर .... । भगवान किथे – अऊ काये फेर जी .. ? चित्रगुप्त किहिस – तैं पांडो मनला सत्ता देवा तो देबे भगवान फेर जइसे सत्ता उँकर हाथ म आही तइसे ... सत्ता पवइया के देंहे के जीव बदल जही .. ओमा कौरव मन खुसर जहि अऊ पांडो मन वापिस संघर्ष करत .. दूसर देंह म नजर आही अऊ तोला रोज रोज झन जूझे बर परय तेकर सेती जनता के देंह ले बिदाई लेहे बर परही अऊ उहाँ फेर जाये बर पाँच बछर के अगोरा करे बर लागही .... । 

          भगवान समेत सरी जीव के भूमिका तै होगे । ब्रम्हाजी के कार्यालय ले आदेश निकलगे । सब धरती म पहुँचके अपन अपन कार्यभार सम्हाल लिन । हरेक पाँच बछर म भारत म महाभारत के खेल फेर शुरू होगे । 


हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .