Friday, 26 August 2022

छत्तीसगढ़ के लोकगीत


 छत्तीसगढ़ के लोकगीत

लोकगीत माने कि लोक के गीत ,जन के गीत।लोक हर अपन सबे  तरह के भाव अऊ उछाह ला कभू गा के अऊ कभू नाच के परकट करथे । लोकगीत मन ला कोन हा सिरजिस होही कोनो नई जाने फेर लोक में एक पीढ़ी ले दुसर पीढ़ी मा  जावत रहीथे।

       लोकगीत ह कत्का होही येकर गनती नई करे जा सके फेर कोई_ कोई गीत के नाव लिए जा सकत हे।

        कोनो_ कोनो ला नाच _नाच के गाए 

जाथे त कोनो गीत ला खेलत _खेलत गाथें ।

कोई _कोई लोकगीत मां बाजा नई राहय , जयसे कि सुआगीत, ये गीत ला माईलोगन मन अपन हाथ के थपड़ी पीट_ पीट के

गाथे ।डंडा गीत मां बाबू जात मन डंडा बजा बजा के मुंहु ले कुहकी पार के गाथे ।

        खेलगीत मन मा घलो कोई बाजा नई बाजय फेर लईका मन बिधुन हो जथे _

   _ घोर घोर रानी इत्ता इत्ता पानी......

_अटकन मटकन दही चटाका, लहुआ लाटा बन में काटा.....

_अररा गोटा पर्रा गोटा एक धनी दे अईसन चलाकी  भौजी फुगड़ी खेलन दे... फुगड़ी फू फू जी फुगड़ी फू......

      जस गीत , सेवागीत,भोजली गीत जयसे 

गीत मां नाच नई होवय,  बैठे_ बैठे गाए जाथे । एमा नाच नई होवे ,जेकर मां देवता चढ़ते ओकर झुमई ला नाच नई कहे जाय। ईही तरह के गऊरा गीत होथे जेमा कभू _कभू बाजा बाजथे ता कभू_ कभू नई, फेर गीत के लय  ऐसेना हे कि कई झन  सुनईया मन ला डढरिया चढ जाथे _

_जोहर जोहर मोर ठाकुर देवता सेवर लागव तोर 

_एक पतरी रैनी भैनी राय रतन वो दुर्गा देवी

 गऊरा गीत में दफड़ा बाजा बाजथे ताहा देवता  घलो चढ़ जाथे जेनला डढरिया कहे 

जाथे । डढरिया मन ला गांव के राऊत ईहां लेग के दही खवाये जाथे ।

       करमां , शैला,पंथी गीत जईसे गीत मन

 मांदर के थाप मां गाए जाथे ,फाग गीत नंगारा के धुन मां।

   बिहाव गीत,सोहर गीत जईसे संस्कार गीत होथे । बिहाव गीत , देवतला, चूलमाटी ले सुरु 

होके बिहाव के जम्मों नेग के संग_ संग बेटी के बिदा तक चलत रहिथे ।

    बरात परघौनी में दूल्हा _दुल्हीन दोनो डाहा के मन भढऊनी  गा _गा के बिधुन हो 

जथे। हमर गांव मे दू_ चार नोनी मन तो ऐसन  गविया रिहिन हे कि बरतिया मन ला रोआ 

डारे ।एक ले बढ़ के एक भड़ऊनी _

_नरवा तीर के पटवा भाजी ऊलूहा _ऊलूहा दिखथे रे ।

आए हे बरतिया टूरा बुडवा बुडवा        दिखथे  रे ।

  सुरहोती में गऊरा गीत हे त देवारी अऊ 

देवउठनी मां राऊत नाच हे । राऊत मन गाय_गरुवा ल सुहई बांधे बर आथे त दोहा पारथे ईकर अलगे धुन रहिथे _

 अ रे रे रे  से सुरु होथे । मड़ई मेला मे अपन

साज सिंगार के संग राउत मन दोहा पारथे ।

      बांस गीत ,देवार गीत के अपन अलगे 

महत्तम हे।

    गीत    , नाचा( नृत्य) अऊ  बाजा (वाद्य) के संगत ला संगीत कहे जाथे । शास्त्रीय कलाकार मन सात सुर में संगीत के धुन गाथे 

फेर लोकगीत ल कभू कभू लोककलाकार मन  चारे स्वर मा घलो गा लेथे ।

     लोकगीत के गजब महत्तम हे इनकर ले तैहा जमाना के लोक के भाव ,समाज अऊ ससकिरिती के रुप ला समझे मां सहारा मिलथे । आजकाल लोक गीत ह नंदाथे अइ सन गीत मन ला जतन करके राखे ल परही 

       डॉ. बी.नंदा जागृत

छत्तीसगढ़ के लोक गीत- चोवाराम वर्मा बादल


 


छत्तीसगढ़ के लोक गीत- चोवाराम वर्मा बादल

------------------------------

जन समान्य म आदि काल ले पारंपरिक रूप ले सुने -सुनाये जावत वो जम्मों गीत मन जेकर रचइता आज के समे म अज्ञात हें -लोकगीत कहाथें। ये गीत मन एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी ल मौखिक रूप ले मिलत रहिथें। अइसे भी आदिकाल म हमर निरक्षर पुरखा मन सो  आजकल जइसे कोनो कापी-किताब अउ प्रिंटिंग प्रेस के सुविधा तो रहिस नइये ।

   प्रकृति के गोद म बइठे हमर कोनो पुरखा ह जेन दिन अपन हिरदे के नाना भाव जइसे के सुख-दुख, प्रेम ,विरह,खुशी , उत्साह, निराशा आदि ल या फेर अपन रीति-रिवाज , जंगल ,डोंगरी-पहाड़ , खेत-खार ,फसल के महिमा ल गुनगुना के लय म व्यक्त करिस होही उही दिन ले लोकगीत उदगरिस होही।

  ये लोकगीत मन के उपजन -बाढ़न ठेठ गाँव-गँवई म होये हें तेकर सेती बहुतेच सहज अउ सरल हें।ये मन म पांडित्य(चतुराई) अउ शास्त्रीयता (काव्य शास्त्र के नियम-धियम) खोजना व्यर्थ हे। हाँ कोनो चाहय त लोकगीत के मधुरता के रसपान कर सकथे। लोकगीत म समाये किसान अउ बनिहार के ममहावत माटी म सनाये पछीना के खुशबू  ल सुँघ सकथे।

  ये धरती के कोनो कोना म चल दे, जिहाँ जिहाँ मनखे रहिथें ,उहाँ-उहाँ कोनो न कोनो लोकगीत मिलके रहिथे। लोकगीत बिना तो दुनिया एकदम निरस हो जही तभे कहे जाथे कि लोकगीत मन जन जीवन के खेत म लहलहावत फसल के समान आयँ। दूबी के जर ह जइसे इहाँ-उहाँ खोभियावत फइलत रहिथे ओइसने लोकगीत ह तको ये कंठ ले वो कंठ म पीढ़ी दर पीढ़ी जरी जमावत रहिथे।

     लोकगीत मन के अध्ययन करे ले पता चलथे के कुछ लोकगीत मन ल सिरिफ पुरुष मन गाथें त कुछ ल केवल स्त्रीच मन। कुछ-कुछ लोकगीत अइसे भी हें जइसे छत्तीसगढ़ म ददरिया जेला समिलहा रूप म गाये जाथे। फेर  अतका बात तो तय हे के सोला आना म लगभग चउदा आना लोकगीत मन ल नारीच मन गाथें।ये हा शोध के विषय हो सकथे।अइसे लागथे के नारी जेन सकल सृष्टि के जनम देवइया शक्ति ये ,वोकर हिरदे के ममता ह लोकगीत के तको सिरजन करके वोला दुलारे हे, अपन अमरित दूध पियाये हे।

  लोकगीत मन के संबंध म एक चीज जान के बड़ अचरज होथे के कोनो कथा ले उपजे लोकगीत ह,भले भाषा बोली बदल जथे फेर अबड़ेच जगा उन्नीस-बीस के अंतर ले  सुने-सुनाये जाथे। एकर उलट कुछ लोकगीत अइसे होथें के एक विशेष समुदाय तक सिमटे रहिथें। एकर कारण विशेष रीति रिवाज हो सकथे।

    हमर हरियर छत्तीसगढ़  म तो लोकगीत मन के खदान हें। हमर छत्तीसगढ़िया लोकगीत मन म इहाँ के परंपरा,अचार-विचार, रहन-सहन , खान-पान अउ तीज-तिहार के सुग्घर दर्शन होथे। लोकगीत मन निमगा लोक साहित्य होथें। ये मन ल समाज के दर्पण तको कहि सकथन जेमा हमर परंपरा अउ इतिहास ह झलकथे।

      भाव के दृष्टि ले लोकगीत मन ल मोटी-मोटा ये प्रकार ले बाँटे जा सकथे--

संस्कार गीत,लोकगाथा गीत(कथा गीत), पर्व(तीज-तिहार)गीत, पेशा गीत,जातीय गीत(कोनो समुदाय/जाति विशेष के गीत। छत्तीसगढ़ म जेन लोकगीत मन के चलन हे ओमा के कुछ प्रमुख लोकगीत मन ये हावयँ---

सुआ गीत--नारी परानी मन गोल घेरा म घूम-घूम के ,थपड़ी के ताल देकें गाथें । बीच म टोपली म माटी के बने सुआ ल रखे रइथे। सुआ गीत म एही सुआ ल संबोधित करे जाथे। सुआ गीत के विषय विविध होथे। मुख्य रूप ले नारी जन्म के कष्ट, संषर्ष अउ स्नेह के वर्णन होथे जइसे के-- 

तरी हरी नाना के ना हरि नाना रे सुवना,

तिरिया जनम झनि देबे।

रे सुअना तिरिया जनम झनि देबे।

     छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग म देवारी तिहार बखत पंदरा दिन ले सुआ गीत अउ नृत्य के धूम रहिथे।नान-नान नोनी मन ले लेके मोटियारी अउ सियनहिन दाई मन के टोली ह गाँव के घरो-घर अउ हाट-बजार के दुकान मन म सुआ गीत गाके मान पाथें।

ये गीत अउ नृत्य सिरिफ माई लोगिन मन प्रस्तुत करथें।


सेवा गीत/जेंवारा गीत-----

  हमर छत्तीसगढ़ ह आदिकाल ले शक्ति पूजा के केंद्र रहे हे।हमर आदिवासी मन के अराध्य बुढ़ादेव अर्थात भगवान शिव अउ बुढ़ी माई (माता दुर्गा-भवानी) जेला महमाई , शीतला दाई के नाम ले तको पुकारे जाथे  के महिमा के बखान सेवा गीत म करे जाथे।प्रायः हर गाँव म महमाई  जरूर होथे। माता भवानी के गुणगान सेवा गीत म करे जाथे। क्वांर अउ चइत महिना म जब जग जेंवारा बोंवाथे त  सेउक मन के दल के दल माँदर बजावत जिंहा-जिंहा जेंवारा बोंवाये रहिथे उहाँ-उहाँ सेवा गीत  गाथें।ये सेवा गीत मन अतका मनमोहक अउ उत्साह ले भरे होथे के कई झन भाव विभोर होके नाँचे अउ झूमे(झूपे) ल धर लेथें। कहे जाथे के ये मन ल देंवता चढ़गे।

      सेवा या जेंवारा गीत ह दू कड़ियाँ अउ पँचराही के रूप म होथे। दू कड़िया सरल अउ मधुर होथे त पँचकड़िया ह कठिन अउ जोश बढ़इया होथे।

   जेंवारा सेवा लोकगीत के शुरुआत देवी-देवता अउ गुरु वंदना ले होथे---

  इतना के बेरिया कउन देव ल सुमिरवँ, 

 लेववँ ओ भवानी तोरे नाम हो माय।

माता पिता अउ गुरु अपनो ल सुमिरवँ,

लेववँ ओ भवानी तोरे नाम हो माय।

  जेंवारा अउ सेवा  लोकगीत म बिरही फिंजोना ,बाँउत ले लेके पंचमी, आठे(हूमन) अउ नवमी (जेंवारा विसर्जन) तको के विशेष गीत हें।जइसे के  पंचमी के सिंगार गीत--

मइया पांचो रंगा ,मइया जी करे हे सिंगारे हो माय।

सेत सेत तोर ककुनी बनुरिया, सेते पटा तुम्हारे

सेत हवय तोर गल के हरवा ,अउ गज मुक्तन हारे।

मइया पाँचो रंगा मइया जी करे हे सिंगारे हो माय।

      अठवही के दिन जेला हुमन(यज्ञ) के दिन कहे जाथे।ये दिन गाँव के महमाई म सबो निवासी सकलाके महमाई म नरियर चढ़ाथें वोती सेउक मन लोकगीत गाथें--

राजा जगत घर हूमन होवत हे, के मन लकड़ी जलावय हो माय।

राजा जगत घर हूमन होवत हे ,नौ मन लकड़ी जलावय हो माय।

नवमी के दिन विसर्जन (जेंवारा ठंडा) के लोकगीत----

 सुंदर माया जी चलत हे स्नान हो माय।

अलियन नाँहकय मइया गलियन नाँहकय,

नाँहकत हे  बइगा दुवार हो माय।

सुंदर माया जी चलत हे स्नान हो माय।


पंडवानी--- ये हा महभारत के कथा उपर आधारित लोकगीत आय जेमा मुख्य रूप ले भीम के वीरता के वर्णन करे जाथे। ये छत्तीसगढ़ म दू शैली म गाये जाथे।

वेदमती शैली अउ कपालिक शैली। पंडवानी लोकगीत गायन ह मुख्य रूप ले परधान(आदिवासी) अउ देवार जाति के लोकगीत आय। जगत प्रसिद्ध देवरिन  पंडवानी गायिका पद्मश्री श्रीमती तीजनबाई के नाम ल  भला कोन नइ जानत होही। 


भोजली गीत----

 नारी (नोनी मन के) मन के गाये जाने वाला अन्न दाई (गहूँ के उगाये रूप) के गुणगान म भोजली गीत गाये जाथे। अन्न ल देवी के रूप मानना छत्तीसगढ़ी संस्कृति के खास पहिचान हे। कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ म  जब चारों मुड़ा हरियाली छाये रहिथे ते समे  राखी तिहार ,आठे कन्हैया (कृष्ण जन्माष्टमी)अउ तीजा - पोरा के समे गाँव-गाँव म भोजली बोयें के परंपरा हे। भोजली लोकगीत म भोजली जेन हा गँहूँ ल छाँव म जगाये पिंवरा-पिंवरा पौधा होथे के बाउँत ले लेके विसर्जन तक के लोकगीत सुने ल मिलथे।

बाँउत के दिन जम्मों झन ल निमंत्रण देवत नोनी मन आह्वान करथें--

उठव उठव मोर ठाकुर देंवता हो उठव शहर के लोग।

  गहूँ ल टोपली म बोंके वोला जमाये बर (अंकुरण बर)  पानी देवत उन गाथें---

देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरंगा।

हमरो भोजली दाई के भिंजे आठो अंगा।

जय हो देवी गंगा, जय हो देवी गंगा।

     भोजली गीत ल सुनके कोनो नोनी भावावेश म आके डंरइया चढ़ जथे त  वोती लोकगीत शुरु होथे--

झूपव झूपव मोर झूपव डँड़रइया हो, झूपव शहर के लोग।

रोनही डँड़इया हो बड़ रँगरेली,

लिमुवा के डारा टूट फूट जँइहयँ।

 ये डँड़इया चढ़े नोनी मन ल हूम-धूप देवा के शांत करे(मनाये) जाथे।

ये लोकगीत म भोजली दाई के सिंगार के मनभावन वर्णन होथे---

आये ल पूरा बोहाये ल पटनी

हमरो भोजली दाई के सोने सोन के ककनी

जय हो देबी गंगा,जय हो देबी गंगा

    सात दिन सेवा करके जब आठवाँ दिन भोजली दाई ल गाँव के तरिया या नरवा-नदिया मा विसर्जन करे के बेरा आथे त बहुतेच विछोह(दुख) के अनभो होथे।भोजहारिन मन के आँखी ले आँसू निकल जथे अउ कंठ ले पीड़ा के स्वर।उन पुकार उठथें--

देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरंगा

हमरो भोजली दाई ल कइसे करबो ठंडा

जय हो देवी गंगा,जय हो देवी गंगा।

 लोकगीत भोजली म छत्तीसगढ़ी संस्कार के सुग्घर दर्शन होथे।


बाँस गीत-- नाम के अनुसार  ये लोकगीत म वाद्ययंत्र के रूप म सजे-धजे पोंडा बाँस के प्रयोग करे जाथे। गायक,रागी अउ वादक --तीन झन के टीम होथे। बाँसगीत ह मुख्य रूप ले चरवाहा राउत जाति (भँइसवार या पाहटिया) मन के लोकगीत आय जेला सिरिफ पुरुष मन गाथें। छट्ठी- बरही, बर-बिहाव या फेर मरनी-हरनी के समे जब सगा-सोदर सकलायें रहिथे तब बाँस गीत के आयोजन करे जाथे। 

     बाँस गीत मुख्य रूप ले करुणा के कथा गीत आय जेमा सितबसंत,राजा मोरध्वज , कर्ण आदि के गाथा लोक शैली म गाये जाथे--

देखे बर देखेन दीदी देही डाहर गिसे वो

हाथें म धरे दुहना काँधे म धरे नोई वो।


देवार गीत----देवार जाति ल जन्मजात कलाकार जाति माने जाथे। देवार पुरष मन गाँव म जब छोटकुन  सारंगी ल बजावत भिक्षा माँगे ल जाथें  त लोककथा मन ल गाकें दान माँगथें। ओंड़िया-ओंड़निन मन के तरिया कोड़े के सुग्घर वर्णन देवार गीत म होथे--

नौ लाख ओंड़निन नौ लाख ओंड़िया माटी फेंके बर जाय

अहा माटी कोड़े बर जाय।

ये हरि।


ददरिया---ददरिया ल छत्तीसगढ़ी लोकगीत के राजा कहे जाथे। येहा एक प्रकार के प्रेम गीत आय। येला पुरुष अउ नारी अलग-अलग या फेर युगल रूप म गाथें। दू दी लाइन के ददरिया जेन म दोहा जइसे भाव म कसावट होथे---सवाल-जवाब के रूप म गाये जाथे। खेती-किसानी के काम-बूता करत ,डहर चलत ददरिया झोरे जाथे।ददरिया म प्रेम के निश्छल उद्गार होथे।

नवाँ सड़क म रेंगे ल चाँटी वो।

तोर बर लेहौं मैं गउकिन चाँदी के साँटी वो।

जंगल झाड़ी दिखे ल हरियर।

मोटर वाला नइ दिखै बदे हँव नरियर।

      सचमुच म ददरिया ल सुनके हिरदे के दरद (टीस) मिटा जथे अउ अइसे लागथे के सुनते राहँव।


गउरा गउरी गीत--

मुख्य रूप ले गोंड़ आदिवासी मन के लोकगीत आय।देवारी तिहार बखत सुरहुत्ती के  अउ जेठौनी(देवउठनी)  के रात म माटी के गउरा -गउरी बइठा के पूजा करे जाथे। ये हा देवी ल समर्पित होथे। ये दिन पूरा रात भर गउरा(भगवान शिव) अउ गउरी(माता भवानी) के बिहाव के पूरा रस्म निभाये जाथे अउ गउरा गउरी गीत गाये जाथे।ये लोकगीत के शुरुआत स्थान पूजा ले अइसन होथे-

जोहर जोहर मोर गउरा गुड़ी वो

सेउर लागवँ मैं तोर।

  तहाँ ले रस्म के अनुसार लोकगीत के निर्मल धारा फूट जथे--

एक पतरी रैनी बैनी, रायरतन मोर दुर्गा देवी

तोरे शीतल छाँव, चँउकी चंदन पिढ़ुली वो

 गउरी के होथे मान।


करमा गीत---

  करमा गीत ह आदिवासी मन के मुख्य लोकगीत आय। संझा बेरा कउड़ी अउ नाना प्रकार के गाहना-गूँटी ले सजे धजे जनजाति मन करमा गीत म थिरकथें त देखनी हो जथे। ये विश्व प्रसिद्ध  लोकगीत ह सामुहिक रूप ले गाये जाथे।


राउत गीत--

राउत जाति(चरवाहा) मन देवारी तिहार बखत ,मँड़ई जगाये के बेरा दोहा पारथें तेला राउत गीत कहे जाथे। येमा हास्य रस, शांत रस के संग मुख्य रूप ले वीर रस के पुट होथे। राउत ह कछिनिया के(जोश म भरके ) दोहा पारथे।

  अरा ररा

ये पार नद्दी वो पार नद्दि बीच म खोरी गाय रे।

गहिरा टूरा छेंके ल भुलागे, बेंदरा दूहै गाय रे।


मोर लाठी रिंगी चिंगी ,तोर लउठी कुसवा।

खोज खाज के डउकी लानेंव, उहू ल लेगे मुसवा।


राम राम सब जपे, दशरथ जपे न कोय।

एक बार दशरथ जपे, घर घर लइका होय।


अइसन तइसन लाठी नोंहय रे भइया, जेन कुटी कुटी हो जाय।

ये हरे मोर तेलपिया लाठी, परे प्रान ले जाय।


बसदेवा गीत--- छत्तीसगढ़ म जइसे धान पान सकलाथे तहाँ ले जै हो मालिक काहत अउ अपन हाथ म धरे गोल घुनघुना ल बजावत जै गंग के टेही पारत बसदेवा मन आसिस देये बर आथें।कोनो कोनो मन नँदिया बइला तको धरे रहिथें। बसदेवा गीत म कृष्ण कथा विशेष रूप ले कृष्ण-सुदामा के मितानी के कथा रहिथे।

 जै गंगा।

जै हो गौंटिया जय हो तोर।

जय हो गौंटनिन धर्मिन तोर।

जय गंगा।


पंथी गीत--- संत गुरु घासीदास बाबा के जीवन चरित अउ सत के अँजोर अँजोर सरी दुनिया म बगरावत आध्यात्मिक संदेश ले भरे पंथी गीत अउ नृत्य ले भला कोन परिचित नइ होही ? सामूहिक रूप ले झाँझ माँदर के थाप म गाये जाने वाला ये गीत विलक्षण होथे।एकर प्रारंभ गुरु घासीदास जी के गगन भेदी जयकारा के संग नाम सुमरनी ले होथे।

  होत है सकल पाप के क्षय, होत है सकल पाप के क्षय।

एक बार सब प्रेम से बोलो, सत्य नाम के जय।

  तहाँ ले एक ले बढ़के एक कर्णप्रिय गीत संग नयनाभिराम प्रस्तुति होथे।

माटी के काया माटी के चोला, के दिन रहिबे बता न मोला।

ये तन हाबय तोर माटी के खेलौना हो।

माटी के ओढ़ना ,माटी के बिछौना हो।

माटी के काया छोंड़ जाही तोला।

के दिन रहिबे बता न मोला।


भरथरी गीत--  राजा भरथरी अउ रानी पिंगला के कथा ल भरथरी गीत म गाये जाथे। वंदना के पाछू नारी के मधुर कंठ ले भरथरी गीत मंत्रमुग्ध कर देथे।

भाई ये दे जी।

घोड़ा रोवय घोड़सारे म घोड़सारे ,हाथी रोवै हाथीसार।

रानी रोवै मोर महलों म ,राजा रोवै दरबार।

भाई ये दे जी।


बिहाव गीत अउ भड़ौनी गीत--- बिहाव के समे नेंग जोग के समे महिला मन चुलमाटी, तेलमाटी ,हरदी चढ़ाय के गीत अउ भड़ौनी गीत गाथें। ये गीत मन म हास्य व्यंग के संग मया के पुट रहिथे।

सुवासा ल छोलत चुलमाटी गीत म कतका हास्य व्यंग भरे रहिथे-

तोला माटी कोड़े ल नइ आवय ग धीरे धीरे।

धीरे धीरे तोर बहिनी ल तीर धीरे धीरे।

तेल हरदी चढ़त हे अउ वोती दाई-महतारी मन गावत हें--

एक तेल चढ़गे दीदी एक तेल चढ़िगे वो हरियर हरियर।

मड़वा म दुलरू तोर बदन कुम्हलाय।

     बरतिया आय हें।भोजन करे बर बइठे हें अउ वोती भड़ौनी गीत चलत हे जेला सुनके कतकोन बराती तिलमिला के भड़क तको जथें--

 हम का जानी हम का जानी दुरूग भिलई के बानी रे।

आये हे बरतिया मन हा मारत हे फुटानी रे।

मेछा हाबय कर्रा कर्रा गाल हाबय खोंधरा रे।

जादा अँटियावव समधी होगे हाबय डोकरा रे।


फाग गीत-- फागुन महिना भर जब ले होरी रचाये के शुरु होथे तब ले उमंग अउ मस्ती ले भरे नाना प्रकार के फाग गीत के धूम रहिथे। पुरुष मन के द्वारा गाये जाने वाला फाग गीत म  राम अउ कृष्ण कथा के संग ,जीवन दर्शन अउ हँसी ठिठोली के भरमार होथे।

सरा सरा ---

बर काट बउदा भये संगी के, पीपर काट चंडाल।

मँउरे आमा ल काटके, मानुस जनम नहीं पाय।


 चलो हाँ धनुष को रख दे मालिन चौंरा में।

टोरवइया हे राजा राम, अरे टोरवइया हे राजा राम

धनुस को रख दे माल


सरा ररा हो-सुन लो हमारे छंद।

केरा बारी म बिलई टूरी खोभा गड़ि जाय केरा बारी म।

आरी रुँधेंव बारी रुँधेंव तीर तीर म खोभा।

कारी टूरी माँग संवारे तीन दिन के शोभा।

केरा बारी म-----

सरा ररा

मुख मुरली बजाय मुख मुरली बजाय छोटे से श्याम कन्हइया।

चंदैनी गीत-- ये हा एक प्रकार ले कथा गीत आय जेमा लोरिक चंदा के प्रेम गाथा ल प्रस्तुत करे जाथे।

आल्हा गीत-- ए हू हा वीर रस ले ओत-प्रोत कथा गीत आय जेमा आल्हा अउ उदल दू भाई के वीरता के बखान करे जाथे।,

     छत्तीसगढ़ म अइसने अनेक लोकगीत हे। मूल रूप ले बस्तर अउ आदिवासी बहुल क्षेत्र म अनेक लोकगीत जइसे--रीना गीत(गोंड़, बइगा जनजाति), लेंजा गीत(बस्तर के जनजाति), रैला गीत(मुरिया जनजाति के प्रमुख गीत),बैना गीत(तंत्र मंत्र ले संबंधित),बर गीत(कंवर जनजाति),घोटुल पाटा(मुरिया जनजाति मन के मृत्यु के समे गाये जाने वाला लोकगीत जेमा प्रकृति के अनेक रहस्य ल परगट करे जाथे), डंडा गीत(गोंड़ जनजाति के पुरुष मन के क्वार नवरात्रि अउ देवारी के समे ),धनकुल गीत(बस्तर क्षेत्र म), गम्मत गीत(गणेश उत्सव के समे),ढोलकी गीत,नागमत गीत,नचोनी गीत,सोहर गीत आदि।

     ये लोकगीत मन के अध्ययन ले पता चलथे के कुछ मन विशुद्ध रूप ले हमर छत्तीसगढ़ के आयँ त कुछ मन अंते के आयँ फेर छत्तीसगढ़ म अपन छत्तीसगढ़िया ढाँचा म ढल गे हें।

    लोकगीत मन के हमर लोक संस्कृति म अबड़ेच महत्व हे काबर के इही मन  मा हमर संस्कार, परंपरा अउ अचार-विचार के दर्शन होथे। ये लोकगीत मन जनमानस ल खुशी देथे। अपन संस्कृति उपर गर्व करे के अवसर देथें। ये मन ला आधुनिकता अउ पश्चिमी संस्कृति के मार ले बँचा के रखे के जरूरत हे। गाँव-गँवई म अनजान फेर प्रतिभावान लोक कलाकार मन ल प्रोत्साहन देके आगू बढ़ाये के जरूरत हे।


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

बिहाव गीत-सरला शर्मा

 

बिहाव गीत-सरला शर्मा


 हमर संस्कृति मं मनसे के जीवन हर सोलह संस्कार से संस्कारित होथे जेमा बिहाव संस्कार के सबले जादा महत्व होथे । बिहाव हर दू झन नोनी बाबू के संगे संग दू ठन परिवार के बीच नता रिश्ता जोरथे । सुख सनात के बेरा हर बाजा- गाजा , गीत -गोबिंद बिन सुन्ना लागथे तेइ पाय के नोनी लइका मन गीत गाथें । 

बिहाव के गीत अलग अलग रीत रिवाज के अलग अलग होथे । चुलमाटी , मंगरोहन , दौंतेला , हरदियाही के बेरा सुग्घर गीत गाये जाथे फेर बिहाव के दिन के गीत मन के सुरता करे ले अभियो आंखी बरसे लगथे, मोर इशारा नोनी लइका के बिहाव के दिन …। एक ठन जरूरी बात सुरता राखे बर परही के बिहाव गीत अउ भड़ौनी मं फरक होथे …भड़ौनी मं हांसी ठठ्ठा मिंझरे रहिथे त कभू कभू लोक मर्यादा के सुरता बिसर जाथे । 

    समधी सजन घर दुआर मं ठाढ़े हें त उनमन के गोड़ धो के तो घर मं पधराये जाही न ? त गावत हें फूफू , दीदी , काकी , मामी मन …

" समधी सजन सबो आइन दुआरे , पानी परात मं गोड़ ल बोरिन ।

  पटुका मं गोड़ ल पोंछिन सियनहा , माथ मं चंदन दे  पधराईन हो ….। " 

       बेटी के बबा , कका , ममा , भाई मन माथ नवा के समधी सजन के आदर , सनमान करथें । जेवनार बर तो आनी बानी के रोटी पीठा बने च रहिथे फेर समधी मन ल तो पनवार परोसे जाथे ओहू एके बेर माने कोनो जिनिस दूसरइया बेर परोसे नइ जावय ..। इही बेरा सुनथें समधी मन गारी …जेकर बिना पनवार उघारत तो बनय नहीं …सुनव गारी गीत …। 

" का गारी देबो हमन समधी सजन ल , हमर नता परे हे बड़े भारी हो .।

रैया रौरी के रार बड़े ….

उनकर चरण कमल बलिहारी हो , हमन का गारी देबो समधी सजन ल …

का गारी देबो उनकर बहिनी हे परम पियारी , जेहर पांच पुरुष एक नारी । 

हो रैया रौरी के रार बड़े ….। " 

     चरण कमल के वंदना ओहू एकर बर के समधी तो रौरी ( राजा ) आयं हमन तो रैया (  प्रजा ) अन तभो सुरता करत हन द्रौपदी के काबर ओहू तो समधी मन के बहिनी च आय । सुंदर मसखरी ..जेवन के स्वाद चिटिक गुरतुर चिटिक नुनछुर हो जाथे । 

     दाइज के बेरा होथे ..जथा शक्ति बेटी के बाप महतारी टिकावन टिकथें …कान भर सुनथें मनसे मन ….

" दाई तोर देवय धियरी अचहर पचहर , ददा  देवय सहनभंडार हो …

 भाई तोर देवय धियरी लिलि हंसा घोड़वा , भउजी देवय सिंगरौल हो …। " 

      धन्य छत्तीसगढ़ जिहां बाप अपन बेटी ल सहन भंडार दे के बिदा करथे …तभे तो बेटी दूनों कुल के मरजाद निभाये सकथे । 

दाइज मं पलंग घलाय तो देहे जाथे , भाई खार ले लकड़ी काट के लानथे , बाप बढ़ई बलाथे त महतारी बढ़ई ल कहिथे …… 

" आंछे आंछे छोलना तुम छोलव रे बढ़इया 

के बीचे बीच पुतरी उकेसउ हो लाल .. 

 रिगबिग पुतरी सिख़ौना देही धियरी ल 

अचल एंहवात सम्हारै हो लाल …। " 

     महतारी के मन तो आय डेरावत हे ससुरार मं सबके सुन सहि के रहे के पाठ कोन सीखोहि , कोन अचल एंहवात के महत्ता बताही तेकर बर सिंहासन बत्तीसी के पुतरी के कल्पना आय ….। 

    सेंदुर दान होगिस , भांवर पर गिस अब बिदा के बेरा …बेटी के बिदाई ..सहज नइ होवय जी !मनसे च नहीं कवि कहे हे न …

" बेटी जावत हे ससुरार , फफक फफक के रोवत हे  घर दुआर " । 

त आंसू पोंछत , रोवत रोवत गावत हें सबो झन ……

" ददा तोर रोवय धियरी पटुका भिंजोई के 

  दाई रोवत हे अहोधार ….

 भाई तोर रोवय अलथ कलथ के त

  भउजी के नयन कठोर …। " 

         बिदाई के दुख अपन जघा , दुलौरिन बेटी ल धीरज धरावत , लेवा लाने के बात कहना भी तो जरुरी हे …। 

" दाई कहय आबे आठे पन्द्रही 

 ददा कहय छै मास हो …

भाई कहय बरिस पूरे आही 

भउजी कहय तीजे तिहार हो ….। " 

     हमर छत्तीसगढ़ के बेटी के बिहाव अउ बिदाई के गीत सुन के  पथरा के आंखी हर भी अहोधार बरसे लगही …तेमा तइहा दिन के कन्या दान जब बाप भाई मन समधी के घर पानी तो दुरिहा के बात चोंगी , पान के बीरा घलाय नइ झोंकत रहिन ।

तभे तो शील जी लिखे हें ……

" भइया आइस कुलकत राधेवं खीर , 

  हाय बिधाता कइसे धरिहौं धीर । 

चोंगी छुइस न झोंकिस बीरा पान , 

हाय रे पोथी धन रे कन्यादान । " 

      

*सरला शर्मा*

जन्म-28 अगस्त .. निधन-22 अगस्त सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा

 


जन्म-28 अगस्त .. निधन-22 अगस्त

सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा


सत् मारग म कदम बढ़ाके, देश-धरम बर करीन हें काम।

वीर सुराजी वो हमर गरब आय, नांव जेकर हे अनंतराम।।


देश ल सुराज देवाय खातिर जे मन अपन जम्मो जिनिस ल अरपन कर देइन, वोमन म अनंतराम जी बर्छिहा के नांव आगू के डांड़ म गिनाथे। वो मन सुराज के लड़ाई म जतका योगदान देइन, वतकेच ऊँच-नीच, छुआ-छूत, दान-दहेज आदि के निवारण खातिर घलोक देइन, एकरे सेती एक बेरा अइसे घलोक आइस के अनंतराम जी ल अपन जाति-समाज ले अलग घलोक रहे बर लागिस। अछूतोद्धार के कारज खातिर गाँधी जी ह छत्तीसगढिय़ा गाँधी के नांव ले विख्यात पं. सुंदरलाल जी शर्मा के संगे-संग जम्मो छत्तीसगढ़ ल अपन गुरु मानिन, त एमा अनंतराम बर्छिहा जइसन मन के घलोक योगदान हवय।


अनंतराम जी बर्छिहा के जनम छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर ले करीब 24 कि.मी. दूरिहा म बसे गाँव चंदखुरी म 28 अगस्त सन् 1890 म होए रिहिसे। ए मेर ये जानना जरूरी हवय के रायपुर के उत्ती दिशा म बसे ये चंदखुरी ह उही ऐतिहासिक गाँव आय, जेला हमन दुनिया के एकमात्र कौशिल्या मंदिर खातिर जानथन। अनंतराम जी के माता के नांव यशोदा बाई अउ पिता के नांव हिंछाराम जी बर्छिहा रिहिसे।


अनंतराम जी के लइकई उमर के नांव नंदा रिहिसे। उंकर सियान हिंछाराम जी कुल 15 एकड़ खेती के जोतनदार रिहिन हें, एकरे सेती घर के आर्थिक स्थिति थोरुक कमजोर रिहिसे। बाबू नंदा ल चौथी कक्षा के बाद अपन पढ़ाई ल छोड़े बर परगे, अउ एकरे संग वो ह नांगर-बक्खर अउ खेती-किसानी म भीडग़े। इही बीच उंकर सियान सरग के रस्ता चल देइन। अब अतेक बड़ परिवार के जोखा-सरेखा नंदा के खांध म आगे, तेमा अकाल-दुकाल के मार। वो अइसे सुने रिहिसे के व्यापार करे म लछमी के आवक जल्दी होथे, एकरे सेती वो खेती के संगे-संग छोटकुन दुकान घलोक चालू करीस। तीर-तखार के गाँव मन म काँवर म समान धरके घलोक जावय। वोकर मेहनत अउ ईमानदारी ह रंग लाइस, अउ देखते-देखत वो बड़का बैपारी के रूप म अपन चिन्हारी बना डारिस। सिरिफ तीरे-तखार के गाँवेच भर म नहीं भलुक दुरिहा के गाँव मन म घलोक वोकर नांव के डंका बाजे लागिस।


सन् 1920 के बात आय। जब गाँधी जी रायपुर आइन त उंकर दरस करे के साध कर के बर्छिहा जी रायपुर आइन, अउ गाँधी जी के वाणी ल सुन के वो गाँधी जी के अनुयायी बनगें। वो बेरा ह तो स्वतंत्रता संग्राम के बेरा रिहिसे। पूरा देश म एकर लहर चलत रिहिसे, तेकरे सेती जम्मो मनखे के मन म कोनो न कोनो किसम ले सुराज के भावना मन रहिबे करय, त भला अनंतराम वो लहरा ले कइसे बांचे सकत रिहिसे। छत्तीसगढ़ अंचल लोकमान्य तिलक के आंदोलन ले प्रभावित हो चुके रिहिसे। पं. माधवराव सप्रे ह सन् 1900 म 'छत्तीसगढ़ मित्र' के प्रकाशन चालू कर डारे रिहिसे। 1903 म भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्थापना रायपुर म होगे रिहिसे। सन् 1907 म स्वदेशी जिनिस मनके दुकान खुलगे रिहिसे। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती 'सामाजिक असमानता' के खिलाफ संघर्ष करत बिलासपुर तक आगे रिहिन हें।


एकर प्रभाव पूरा छत्तीसगढ़ म परत रिहिसे। अइसन म युवा अनंतराम के मन म ए सबके प्रभाव कइसे नइ परतीस? बर्छिहा जी के अपन कुर्मी जाति समाज तो पहिलीच ले ए मारग म आगू बढ़ चुके रिहिसे। गाँधी जी के आगमन तो ये सुलगत आगी म घीव के कारज करीसे। अइसन म बर्छिहा जी भला कहाँ पाछू रहितीन, उहू मन अपन दुकानदारी के जम्मो काम-काज ल अपन छोटे भाई सुखराम बर्छिहा के खांध म सौंप के राष्ट्रीय आंदोलन म कूद गें।


सन् 1923 म नागपुर म झंडा सत्याग्रह चालू होइस। छत्तीसगढ़ के जम्मो खुंट ले सत्याग्रही मन नागपुर पहुंचे लागिन। वो सत्याग्रह म भाग लेके छै-छै महीना के सजा घलोक काट आइन। बर्छिहा जी के ये पहली जेल यात्रा रिहिसे, जेला उन नागपुर केंद्रीय जेल म काटिन। वोकर बाद तो उन घर-बार ल छोड़ के गाँव-गाँव अलख जगाये लागिन। एकर सेती उनला सन् 1930 म एक पइत फेर एक बछर के सजा होइस। सन् 1930 के आंदोलन के केंद्र चंदखुरी च गाँव ह बनगे रिहिसे, जेकर प्रसिद्धि पूरा देश भर म होए रिहिसे। वो गाँव के मन अनंतराम बर्छिहा के अगुवई म असहयोग आंदोलन म बड़का भूमिका निभाए रिहिन हें। गाँव-गाँव जाके विदेशी जिनिस मनके बहिष्कार के बात करयं, वो जिनिस मनके होरी बारयं, छुआछूत मिटाए के बात करयं, खादी ग्रामोद्योग के प्रचार करयं, सहभोज के आयोजन करयं, बीमार मनखे मन के सेवा करयं, उनला दवई बांटयं, गाँव के साफ-सफाई करयं, नान्हें लइका मनला पढ़े खातिर  प्रोत्साहित करयं।


चंदखुरी गाँव वो बखत राष्ट्रीय आंदोलन के गढ़ बनगे रिहिसे। अइसे म फिरंगी शासन कब तक कलेचुप बइठे रहितीस? गाँव म पुलिस के घेरा डार दिए गेइस। एक बटालियन पुलिस उहां तैनात कर दे गइस। फेर वो पुलिस वाला मनके गुजारा होतिस कइसे? सरकारी व्यवस्था के खिलाफ म तो आंदोलन होवत रिहिसे। पुलिस वाले मनला मांगे म कोनो आगी-पानी तक नइ देवत रिहिन हें। बर्छिहा जी के दुकान म बिसाए म घलोक कोनो समान नइ मिलत रिहिसे। अइसन म पुलिसवाला अउ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन के आपस म ठनना स्वभाविक रिहिसे। ए बगावत के असर आसपास के अउ आने गाँव मन म घलोक बगरत जावत रिहिसे।

एकर जानकारी जिला के अधिकारी मन जगा घलोक पहुंचीस। जिला कप्तान चंदखुरी पहुंचीस अउ उहां के लोगन ल समझाए-बुझाए के उदिम करिस। बर्छिहा जी के दुकान ले समान लेना चाहिस। उंकर जगा संदेश भेजवाइस। जेकर जवाब मिलिस- 'आप हमर इहाँ मेहमान बनके आहू त आपके सुवागत हे, फेर कहूं सरकारी अधिकारी बनके आहू, त आपला हमर असहयोग हे।' ए जुवाब ले अधिकारी चिढग़े, अउ पूरा गाँव म कहर मचा देइस। घुड़सवार पुलिस वाला मन पहुंचीन अउ पूरा गाँव ल रौंद डारिन। बर्छिहा जी के दुकान ल लूट डारिन। अतको म उंकर मन नइ माढि़स त घोसना कर डारिन के बर्छिहा जी के दुकान ले जेन कोनो उधारी लिए होहीं वोला वापस झन करे जाय। संग म अनंतराम बर्छिहा के संगे-संग गाँव के अउ सात झनला गिरफ्तार करके जेल भेज देइन। गिरफ्तार लोगन म रिहिन हें- बर्छिहा जी के छोटे भाई सुखराम बर्छिहा, बर्छिहा जी के बड़े बेटा वीर सिंह बर्छिहा, नन्हे लाल वर्मा, गनपतराव मरेठा, हजारीलाल वर्मा, नाथूराम साहू अउ हीरालाल साहू।

बर्छिहा जी के लाखों रुपिया के संपति नष्ट होगे, जेकर निसानी ल आजो देखे जा सकथे। उन सेठ ले फेर फकीर होगे रिहिन हें। तभो ले उनला एक साल के फेर सजा होगे, अउ संग म जुर्माना घलोक लाद देइन। जुर्माना नइ पटाए के सेती उंकर नांगर-बख्खर, गाय-बइला आदि के नीलामी कर दे गइस। बर्छिहा जी के संग ये सिलसिला सन् 1942 तक सरलग चलीस।


सन् 1930-32 के जेल यातना ह आज कस सहज नइ रिहिसे। उंकर मन जगा चक्की चलवायं, घानी म बइला के जगा उनला फांद के तेल पेरवायं, पानी के रहट चलवायं। उनला लोहा के बरतन म खाना देवयं, तेल-साबुन के तो नामे नइ रिहिसे। पहिने खातिर एक जांघिया अउ एक बंडी, कनिहा म बांधे खातिर एक ठन पंछा अउ एक ठन टोपी। बिछाए अउ ओढ़े खातिर दू ठन कमरा अउ एक ठन टाटपट्टी। फेर सत्याग्रही मन म कतकों अइसे राहयं, जेन खादी के छोड़ अउ कोनो जिनिस के उपयोगेच नइ करत रिहिन हें। अनंतराम जी घलोक वइसने खादी धारी रिहिन हें, उन दूसर कपड़ा मनला उपयोग नइ करत रिहिन हें, तेकरे सेती जेल म उन नग्न अवस्था म राहयं। सिरिफ लोक मर्यादा खातिर उन एक ठन कमरा ल लपेट ले राहयं। अइसन खादी व्रतधारी रिहिन हें बर्छिहा जी।


अब चिटिक उंकर सामाजिक क्रांतिकारी रूप के चरचा। सन् 1933 ह अस्पृश्यता निवारण के इतिहास म बहुते महत्वपूर्ण बछर आय। बाबा साहेब अंबेडकर अउ गाँधी जी के बीच होए पुना पेक्ट के अनुसार अस्पृश्यता के कलंक ल मिटाए खातिर पूरा देश म अभियान चालू करिन। छुआछूत के संगे-संग, कुरीती, गरीबी, अज्ञानता, अशिक्षा ल मिटा के स्वावलंबन के रद्दा देखाइन। ये जम्मो बात बर्छिहा जी के अंतस म उतर आइन। अउ ये जम्मो कारज के शुरुवात उन अपनेच घर ले चालू करीन।


वो बखत जम्मो गाँव-घर म छुआछूत के चलन भारी मात्रा म होवत रिहिसे। उन अपनेच गाँव के अइसन जाति कहाने वाला लोगन ल सामाजिक अधिकार देवाए खातिर आंदोलन चलाइन। अइसन जाति-समाज के लोगन मन सार्वजनिक कुंआ ले पानी नइ ले सकत रिहिन हें, वोकर मन खातिर उन अपन घर के कुंआ ल खोलवाइन। मरदनिया मन उंकर हजामत नइ बनावत राहंय, त उन खुद उंकर मनके हजामत बनावयं। धोबी के कारज ल घलोक उन खुदे करयं। उन अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन चलाइन तेकर सुफल ये होइस के उंकर गाँव के मंदिर ह सबो मनखे खातिर खुलगे। गाँव के वातावरण तो उंकर अनुकुल होगे, फेर वोकर खुद के जाति-समाज के मुखिया मनला ये सब बात नइ सुहाइस, अउ उन बर्छिहा जी के परिवार ल अपन जाति ले बाहिर के रद्दा देखा देइन।


उंकर ले रोटी-बेटी के संबंध, पौनी-पसारी के संबंध, घाट-घटौंदा के संबंध जम्मो ल बंद कर दिए गेइस। वो बखत के स्थिति के चित्रण करत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अउ सामाजिक नेता डॉ. खूबचंद बघेल ह लिखे हवयं- 'गाँव के परिस्थिति विस्फोटक होगे रिहिसे। पांचों पवनी माने- नाऊ, धोबी, राउत, मेहर अउ लोहार मन उंकर जम्मो काम-धाम ल छोड़ दिए रिहिन हें। उंकर समाज उंकर संग जम्मो किसम के व्यवहार ल बंद कर दिए रिहिसे, तभो ले बर्छिहा गाँधी जी के आदर्श म चलत मगन राहयं।'


वो समय तक मनवा कुर्मी समाज म प्रगतिशीलता आए ले धर लिए रिहिसे। बर्छिहा जी के ही विचार ल मानने वाला एक परिवार उंकर बेटी ल अपन बहू के रूप म ले के समाज ले बहिष्कृत होए बर तइयार होगे। फेर बात अतकेच म नइ बनिस। काबर ते बर्छिहा जी के एक ठन अउ संकल्प रिहिसे के 'न तो वो दहेज लेवय, अउ न दहेज देवय।' वो ककरो समझाए म घलोक नइ समझत रिहिन हें। तब वो परिवार वाले मन अइसनो खातिर मानगें।


बर्छिहा जी के जम्मो शर्त ल मानने वाला परिवार दुरुग जिला के सिलघट नामक गाँव के टिकरिहा परिवार रिहिसे। ये बिहाव के जुराव ल मनवा कुर्मी समाज ल दो भाग म बांट देइस। जुन्ना पीढ़ी ए मन ल सबक सिखाए खातिर त नवा पीढ़ी ए नवा सामाजिक सुधार ल लागू करे खातिर। नवा पीढ़ी के वो बखत मुखियाई करत रिहिन हें- डॉ. खूबचंद बघेल, जगन्नाथ बघेल, दुर्गासिंह सिरमौर, प्रेमतीर्थ बघेल, जयसिंह वर्मा, वीरसिंह बर्छिहा के संगे-संग आने समाज के वो समय के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन, जे मन वो बिहाव के पतरी उठाए ले लेके जम्मो किसम के नेंग-जोंग सबो ल करीन।


बर्छिहा जी के बेटी राधबाई ह खादी के साड़ी पहिन के मंडप म बइठिस। भांवर के बाद दहेज के रूप म सिरिफ एक ठन सूत काते के चरखा अउ पानी दे गेइस। अइसन आदर्श बिहाव ये छत्तीसगढ़ अंचल म एकर पहिली कभू नइ होए रिहिसे। आज घलोक अइसन आदर्श के चरचा न तो कहूँ सुने ल मिलय अउ न देखे ल। बर्छिहा जी अइसन महापुरुष रिहिन हें, जेन सामाजिक क्रांति के शुरुआत अपनेच घर ले करे रिहिन हें।


बर्छिहा जी म संघर्षशीलता के संगे-संग प्रशासनिक क्षमता घलोक रिहिस हे। उन कई बछर तक तहसील कांग्रेस के अध्यक्ष रिहिन। सन् 1937 म अपन अंचल ले विधायक घलोक बनीन। उन जब तक जीइन दीया बनके जीइन, लोगन बर अंजोर करीन। छत्तीसगढ़ महतारी के ये सपूत ह अपन पूरा जीवन ल देश खातिर समरपित कर देइस। 22 अगस्त सन् 1952 के उन ये नश्वर दुनिया ले बिदा ले लेइन।


-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर 

मो/व्हा. 98269 92811

छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक वैभव-सुआ गीत-शोभामोहन श्रीवास्तव

 


छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक वैभव-सुआ गीत-शोभामोहन श्रीवास्तव

------------------------- 


छत्तीसगढ़ में लोकगीत के विराट अउ वैभवशाली परंपरा है जेमा सुआ गीत एक प्रसिद्ध लोकगीत विधा हे । ये हर छत्तीसगढ़ के आदिवासी गोंड़ जात के नारी मन के द्वारा विकसित प्रमुख नृत्य -गीत आय, जेन ला समूह मा नाचे अउ गाये जाथे। परम पबरित कार्तिक महिना भगवान राम के बनवास काट के अवध बहुरे अउ गौरी गौरा के बिहाव के मंगलबेरा मा देवारी तिहार के दस दिन पहिली ले गौरी गौरा जगावत तक ये गीत ला गाये के जुन्ना परंपरा हे। ‘गौरी गौरा’ परब हर छत्तीसगढ़ के आदिवासी गोंड़ मन के एक प्रमुख तिहार आय जेन ला  छत्तीसगढ़ के सबो क्षेत्र में धूमधाम ले मनाये जाथे, सुआ गीत अउ गौरी गौरा गीत  ला छत्तीसगढ़ के सबो नारी परानी मन आत्मसात करके सालपुट गाथें। सुआ गीत अउ गौरी गौरा के पूजा एक दूसर ले संबंधित हे। जेन हर असल मा गौरी (माता पार्वती) अउ गौरा ( शिवजी) के बिहाव के उत्सव आय। सुआ गीत गाके जेन अन धन सकलाथे तेकरे ले गौरी गौरा जगाय के तैयारी करे जाथे तेन हर सुआ गीत अउ गौरी गौरा के घनिष्टता के पोठ सत परमान आय। नारी प्रधान गीत होय के सेती येमा कालांतर मा नारी मन अपन मन के दुख सुख ला घलो सुआ गीत संग संघेरत गिन। तेकरे आधार लेवत  छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति सुआ गीत ला मात्र नारी के व्यथा कथा के गीत के रूप मा परिभाषित करे के डउल के गिस, हमर मूल आराध्य ला भुला के येला मात्र नारी के दुख सुख के गीत के रूप मा निरूपित करना उचित नहीं हे,  लोकसंस्कृति अउ लोकपरंपरा ला मूलरूप में ईश्वर के गुणगान हे स्तुति हे।सुवागीत परमात्मा अउ जीव के अंतरंगता के गीत आय ये गीत मा एक गवैया अउ बाकी  राग झोंकैया होथे नारी परानी मन नरगर ले सँभर पकर के दल के दल बिहिनिया कार्तिक नहाथें अउ तरिया नदिया के पार मा बने भोलेनाथ के पूजा पाठ करके जलदेवती मा दीया ढ़िलथें अउ घर बूता रँधना पसना करके जइसे ही बेरा हर कलथथे तहाँ अपन अपन संगी गिंया संग माटी के चुकचुक ले रंगे सुआ ला टुकनी मा मड़ा के दीया बार के झोफ्फा के झोफ्फा निकलथें अपन संग ओमन नान नान दू दू ठन रेंदाय लकड़ी के गुटका ला धरे रहिथे जेला चटका/चुटका कहे जाथे। गोल घेरा बना के एक पग आगू बढ़ा के एक पग पाँव घुँच के एक पग डेरी हाथ अउ एक पग जेवनी हाथ डहर घुँच के थपोड़ी पीट पीट के अउ चुटका/चटका बजा बजा  के गोला बना के एकभाँवर नाचथें। जेकर डेहरी मा चढ़थें तेन घर हर गझिन होके गजगजाय लगथे, हाँसत गावत घर मा अमाथें अउ अन धन जन अउ सुख शांति के असीद देवत जाथें । 


लाली गुलाली छींचत आयेंन ओ छींचत आयेन। 

तोर घर के मुहाटी ला पूछत आयेन।। 


तरी नारी नाना मोर नाना रे नाना रे सुवना

तरी नारी नाना रे ना ।

जेकर अर्थ हे  तरी नारी ना ना मोर ना न रे ना ना रे। मतलब नारी हर समाज मा खाल्हे दर्जा के नोहय पार्वती हर बज्र बैरागी ला अपन तपबल ले बिहाव करे बर खंधो डरिस। उही पार्वती हमर इष्ट देबी आय हमू मन अपन तप अउ साधन ले परमदेव अउ परमगति ला पाबो, भोले बाबा ला मनाबो अइसन महत् भाव समाहित हे। 



*मूल गौरी गौरा के भक्ति सुआगीत* 


ठाढ़ धोवा चाँउर चढ़ा के बेलपतिया 

चढ़ा के बेलपतिया रे सुआ हो।

चलौ गड़ी गौरा ला मनाय, ना रे सुआ हो 

तरी नारी नाना मोर नाना नाना रे सुआ हो..................

तरी नारी ना ना रे ना..................... 

तरी नारी ना ना मोर नाना रे नाना रे सुआ हो । 


देबी परबतिया के दुल्हा औघड़ भोला, 

हमरो पुरोही सब आस, ना रे सुआ हो।

तरी नारी नाना मोर नाना नाना रे सुआ हो..................

तरी नारी ना ना रे ना..................... 


 *नारी विरह रूप* मा प्रचलित सुआगीत

१/

पईयाँ मैं लागँव चन्दा सुरुज के,

रे सुअना तिरिया जनम झनि देय। 

तिरिया जनम मोर गऊ के बराबर,

रे सुअना ! जहँ पठौए तहँ जाए। 


२/

सास मोर मारय-ननद गारी देवय,

रे सुअना! के राजा मोर गये हें बिदेस!

लहुरा देवर मोरे जनम के बैरी,

रे सुअना! ले जाबे तिरिया संदेस। 


३/

ऊँच मनसरुवा के करिया रे अखियाँ रे सुअना!

चुहत हय मेछन के रेख।

कोदई साँवर रंग सुग्घर सुहावन रे सुवना।

वीर बरोबर हे भेख।

४/

बन रोजगारी मोर पिया परदेसिया रे सुवना, 

गये हावै पइसा कमाय। 

हालचाल लेई के तुरत चले अइबे, रे सुअना! 

झिन कोनो राखै बिलमाय।

मोती के झालर डैना गुँथवइहौं,रे सुअना! 

लादे तैं पिया के सन्देस।

सोने के थारी मा जेवन जेवइहौं, रे सुअना! 

पइयाँ टेके सेहूँ हमेस। 


*असीद* 


लोहा के ड़ंडा ला घुना खाथे रे नारे सुवना

कि हम बहिनी देवन असीद। 

गउवा ना गउवा तोर कोठा भरे रे ना रे सुवना

कि हम बहिनी देवन असीद। 

बेटवा व बिटिया ले घर भरै रे ना रे सुवना

कि हम बहिनी देवन असीद। 


शोभामोहन श्रीवास्तव                      

मया के डोरी , महतारी के लोरी


 

मया के डोरी , महतारी के लोरी 

     ******** 

       '  लोरी '  हर वाचिक परम्परा के गीत आय जेला लोकगीत के रुप मं प्रतिष्ठा मिले हे काबर के छत्तीसगढ़ भर नहीं संसार के पहिली महतारी हर जब अपन लइका ल भुलवारे बर , सुताये बर  जौन किसिम ले गुनगुनाए रहिस होही उही हर पहिली लोरी रहिस होही फेर हमन तीर लिखित इतिहास तो है नहीं । हमर दाई , बूढ़ी दाई मन सो सुने लोरी अउ आजकाल के लिखे लोरी मन के चिटिक सुरता कर लेईन ...। 

  छोटकुन लइका ल तेल चुपरत गावत हे कोनो महतारी ....

" चाकी चाकी लोहरा , तेल ठोंके पोहरा , 

 तेल कस चिकनाई , घानी कस मोटाई । 

 तेल जावै कोरे कोर , लइका बाढ़य पोरे पोर ।

 नोनी / बाबू बाढ़य पोरे पोर .....। 

    लइकन ल नहवाये के पहिली तेल मालिस करथें तभे तो लइका पोट्ठ होही फेर लइका तो रोबे करही त ओला भुलवारे बर जौन गीत गाए जाथे उही हर तो लोरी कहाथे । लइकन ल नहवा -खोरा  के  दूध पिया के सुताये के बेरा हो जाथे फेर लइका तो आंखी मूंदे बर तियारे नइ होवयं , रोथें , रिरियाथें त उनला थपकत थपकत महतारी गुनगुनाए लगथे .....

     " धीरे बाने आबे निंदिया , 

       हांथ बाजै  झन गोड़ ।

      सोवत बाढ़यै मोर दुलरुआ 

      देहें कान होवै पोठ । " 

            लइकन चिटिक अउ बाढ़थें त ओकर बर झुलिया डारे बर परथे , झुलिया झूलत लइकन सुत जाथें ...महतारी काय गावत हे चिटिक सुनिन तो ....

     " चंदन के पलना , रेशम के डोरी , 

    झुलना झुलावत हे नंद के रानी 

    सोए हे बाल गोपाल ।

       पंइया परय मैया , देवी देवता के , 

       आ जा निनी दाई , आ जा न ओ ..। 

     जुग जुग जियय नंदलाल 

        कोनो कोनो डहर इही लोरी ल एरकम भी गाए जाथे ...... 

" चंदन के पलना झुलावै नंदरानी 

 सोये हे बाल गोपाल । 

पंइयां परत हे महादेव के 

जुग जुग जियय नंदलाल ....

    आ जा निनी दाई आ जा ना ओ ...। " 

          मुंहखरा लोरी तो आय ते पाय के शब्द मन थोरिक एती तेती हो जाथें फेर भाव तो एके च आय के लइका निभुर सुत जावय । दुलरुआ के आंखी मं परी दाई सपना आंज देवय । इही मया ल तो हिंदी साहित्य मं सूरदास के सेतिर वात्सल्य नांव मिलिस अउ दसवां रस के आसन मिलिस । 

  गोंगइया छोड़ के लइका डगमग डगमग पांव धरत रेंगे लगिस , नान नान गोड़ दौड़े सीख गिस त अंगना छोड़ के खोर-   गली मं खेले कूदे धर लिहिस , थक जाथे फेर आंखी मूंद के थिराये नइ चाहय ओला नाना उदिम करके सुताये बर महतारी गाये लगथे ...

" धरती अकास मं बगरे चंदनिया , 

 सोवा पर गे हे रात 

दाई ददा के रतन बेटा ।

सुन सुन मोर बात 

सुत जा राजा बाबू ( बेटा ) सुत जा ना ..। 

   बिरबिट कारी रात अंधियारी 

  सुन्ना पर गे हे कोला बारी ।

  चिटिक थिरा के मूंद ले आंखी 

 रात के होथे नींद के पारी 

  सुत जा राजा बाबू  सुत जा ना ...। " 

           महतारी के हलकनी देखव लइका तो कुछु खाए बर तियार नइये , नइ खाए के नौ ठन ओढ़र ..। नहीं निदान महतारी फेर गुनगुना के भुलवारे लगिस ...गुप्प ले कौंरा मुंह मं भर दिस ...। 

 " चंदा ममा तरी आ , मोर घर उतरी जा 

 दार भात सुट ले , मोर बेटा गुट ले ...। " 

        शिष्ट साहित्य के विकास के संगे संग कवि मन लोरी लिखे बर शुरु करिन हें जेहर सहराये लाइक बात आय । मुकुंद कौशल लिखे हें ...." तरिया ले पानी भर लानौ बाबू , फेर तोला झूला झुलाहौ ना ... " 

    झुलना झुलाए के ओढ़र मं महतारी अपन दुलौरिन बेटी ल चिरई- चुरगुन , रूख- राई , फल- फूल के चिन्हारी करावत गाये लगथे ..... 

  " झूल झुलना ओ बेटी , झूल झुलना ।

   आनी बानी के फूल फूले हे , 

  अंगना अउ दुवरिया । 

 झूल झुलना ओ ननिया , झूल झुलना .। 

    कोइली बइठे अमुवा के डारी 

   मैना रानी बइठे लिमुवा ।

  सुवा बइठे बीही के रूख मं 

  पंड़की बइठे हे पिपरवा ।

  झूल झुलना ओ बेटी झूल झुलना ...। 

       लिखइया .... वसंती वर्मा 

              पीरा ले जनमे हीरा के महतारी पुरवाही के बिनती करत हे ...हर- हर ,हर - हर झन बोहाबे पुरवाही मोर लइका लटपट आंखी मूंदिस हे , जाग जाही मोर बिनती ल सुन ...

   " सोवत हे मोर ललना , पुरवाही धीरे बह ना 

     तोर आये ले डोलय डारा पाना , ललना उठ जाही मान मोर कहना । 

    झरर झरर झन बह ना पुरवाही ....। " 

        लिखइया ...रामेश्वर शर्मा 

              संसार के काव्य साहित्य मं गीत विधा के श्री गणेश लोरी से ही होए रहिस काबर के सबले पहिली मया के डोरी महतारी अउ लइका च के बीच मं तो बंधाथे । आज के मशीनी युग मं जिहां लइकन बाजारवादी , उपभोक्तावादी संस्कृति के बीच बाढ़त पौढ़त हें उनमन ल लोरी के सुरता कराना जरुरी हो गए हे । सबले जुन्ना , सबले मजबूत डोरी होथे महतारी के लोरी । 

    सरला शर्मा

आलेख - पोरा तिहार*‌






*आलेख - पोरा तिहार*‌


हमारे भारत देश कृषि प्रधान देश हरय। पहली जमाना में खेती-किसानी के काम पशु मन के द्वारा करे जावत रिहीस। आज भी गाँव में खेती-किसानी के काम बइला-भँइसा के द्वारा करे जाथे। फेर आधुनिक युग मा कृषि काम ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेसर, आदि मशीन से होवत हे, तेखर सेती अब खेती-किसानी में पशु मन के उपयोग कम होगे हे।  


वइसे तो हमर छत्तीसगढ़ में तीज-तिहार के विशेष महत्व हे। जेमा पोरा तिहार बहुत ही खास तिहार आय।

*पोरा तिहार* जेला हिंदी में *पोला पर्व* के रूप में हमर छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश अउ महाराष्ट्र में बड़े धूमधाम से मनाये जाथे। मान्यता हे कि द्वापर युग में कृष्ण भगवान जब लइका रूप में रिहीस तब कंस ह कृष्ण भगवान ला मारे बर कई झन राक्षस मन ला भेजिस जेमा पोलासुर नाम के राक्षस भी रिहीस हे। भगवान कृष्ण हर  पोलासुर ला मारके  बाल रूप में अपन लीला देखाइस। जे दिन पोलासुर के वध होईस वो दिन भादो के महीना अमावस्या के दिन रिहीस हे,  उही दिन ले पोला पर्व मनाय जाथे।


हमर में छत्तीसगढ़ में *पोरा तिहार* के विशेष महत्व हे। ये दिन विशेष रूप से बइला के पूजा करे के रिवाज हे। ये दिन बइला मन ला सजाय जाथे अउ पूजा करे जाथे। गाँव मा खेती-किसानी में जोताई-बोवाँई के काम होय के बाद पोरा तिहार के दिन किसान मन अपन बइला मन के पूजा करथे। येखर अलावा माटी के बइला के भी पूजा करे जाथे, संगे संग माटी के जाता-पोरा के पूजा भी होथे। मान्यता हे कि पहली जमाना में गहूं, चना, राहेर, तिवरा, कोदो अनाज ला जांता मा दरके खाना बनावै। आज के जमाना में सब चीज रेडिमेंट मिल जाथे। 


*पोरा तिहार* मा रोटी पीठा के विशेष महत्व हे। ये दिन सबों घर मा ठेठरी-खुरमी, बरा, सोंहारी, अइरसा, चौसेला, भजिया, गुजिया, चीला आदि  प्रकार के रोटी बनाय जाथे, जेला पूजा के बाद बइला अउ जाता पोरा मा चढ़ाथे। पूजा के बाद बहिनी मन पोरा पटके बर गाँव के चऊँक मा जाथे। पोरा तिहार के दिन नान्हे-नान्हे लइका मन बर माटी के बइला मा चक्का लगाके ओमा बाँस के कमचील लगाके बने सुग्घर तइयार करें जाथे। फेर लइका मन मगन होके गली मा अब्बड़ चलाथें। अउ नोनी मन घर मा जाता पोरा मा सगा पहुना खेलथें।


हमर छत्तीसगढ़ मा कई जगह मे बइला दौड़ प्रतियोगिता के आयोजन भी होथे। जेमा आस-पास के क्षेत्र के किसान मन अपन बइला मन ला सुग्घर सजाके प्रतियोगिता मा भाग ले बर आथे। अउ ये प्रतियोगिता ला देखेबर भी आस-पास के मनखे मन सकलाथें। 


पोरा तिहार के एक अलग मान्यता हे कि *पोरा* माने "पोटरियाना" मतलब धान मा दूध आना। जब खेत के धान के फसल हर गर्भ धारण करथे, या दूध भराथे तेला पोकरी भरना, या पोटरियाना भी कहिथे। तेखर सेती हमर छत्तीसगढ़ मा *पोरा तिहार* मनाय जाथे।


आप सब ला पोला तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई अउ शुभकामना।


रचनाकार 

राजकुमार निषाद *राज*

बिरोदा, धमधा, जिला-दुर्ग

7898837338