Thursday, 29 September 2022

*माँ शीतला (हिंगलाज) दरबार के पताका - बैरग*



*माँ शीतला (हिंगलाज) दरबार के  पताका - बैरग* 



*दुर्गा प्रसाद पारकर*


 


मसो कुंआर नीत नम्मी दसराहा घर-घर खरख धोवाय। कुंआर महीना म पितर देवता मन के सुआगत करथे। पितर खेदा के बिहान दिन जोत जंवारा ह माढ़थे। ताहन फेर - 


 कुंवार मास अहोमाया बन-बन सेऊक आए, 

चोवा चन्दन अगर मलागर माय के सिर चढ़ाए। 


छत्तीसगढ़ म जंवारा ल हिंगलाज अउ घर म बोए जाथे। गांव हित म गांव भर मिल के बदना के मुताबिक बइगा के सुलाह ले हिंगलाज म जंवारा बइठथे। घर के मुखिया ह परिवार के सुख शान्ति खातिर बदना के मुताबिक घर म जंवारा बोथे। 


   जंवारा पाख म तो पूरा छत्तीसगढ़ देवी मय हो जथे। जघा-जघा देवी महिमा के बखान होथे। संझा बिहनिया तो जंवारा के पूजा आरती होथे |  संझा के संझा ढोल मंजीरा बजा के सेऊक मन मइया जी के जस गीद गा के गुनगान करथे। जस गीद म शीतला के बरनन मिलथे जइसे-


 ब्रम्हा धर ले कमण्डल मइया धर ले कमण्डल, 

शीतला सेवा म चले जाबो हो माय। 

बिजली अस चमकै शीतला, 

तै बिजली अस चमकै ना।

तोर हिंगलाज म मइया 

तोर हिंगलाज म फूलवा के उड़त हे बहार 

तुम्हरी हिंगलाज म माय |


 थंइया-थंइया नाचय अंगना लंगूरुवा हो , 

माय के अजब बने हे दरबार । छत्तीस रुप तुम धरे माता कोट कोट अवतारा, 

ठाड़े जिभिया लाल करत हे रुप दिखय विषधारा।

 कर खप्पर हाथे पर लिए सिंह भये हो हां......। 


   जंवारहा मन शीतला नही ते घर म जंवारा बो के अपन कूल देवी के मनौती ल मानथे। फेर डिगर मन अपन मनोकामना ल पुरा करे के खातिर चंडी, महामाया, बम्लेश्वरी अउ दंतेश्वरी माई म जोत जलाथे। अब मनोकामना जोत शीतला (माता देवाला) म घलो जलाए के शुरू हो गे हवय |छत्तीसगढ़ म जंवारा पाख म बैरग घलो बनाथे।बैरग मातारानी के  पताका आय | जंवरहा मन जंवारा पाख म शीतला के बैरग ल मानथे अउ मड़इया मन सुरतोही रात म बैरग बना के देवी देवता ल मनाथे।


*अ) जंवरहा मन के बैरगः-*



       जंवारा पाख म अष्टमी के दिन हुमन होथे। देवी मय माहोल म पिसान ल तेल नही ते घींव म सान के अठोई बनाए जाथे जेला रोठ कहिथन। अठोई ह परसाद के काम आथे। तीर-ताखर के गांव वाले मन ल घलो देवी सेवा बर नेवता दे जाथे। अठोई के दिन जंवारा म एक्कइस ठन लिमऊ चघाए जाथे अउ देवता मन म छोटे छोटे धजा खोचे जाथे। शीतला म बइगा ह बैरग ल सम्हराथे। माता देवाला म बैरग ल करिया (मेघीन) लाली अउ पड़री (सादा) रंग के अइलगे-अइलगे एक्कइस-एक्कइस फाल ल   सुक्खा बांस ल फहरा दे जाथे। अतका होये के बाद फुलिंग म कलश के स्थापना कर देथे। तीनो रंग के बैरग ह अइलगे-अइलगे देवी देवता मन के चिन्हारी कराथे। सत्ती (कड़गी सात) बर लाली रंग के बैरग, ठाकुर देवता बर पड़री रंग के बैरग अउ ऋृक्षिण (कंकालीन) खातिर करिया रंग के बैरग सिरजाए जाथे।

जब सेऊक मन बाजा के थाप ले देवी के गुनगान करथे तब उत्साहित हो के कतको मन देवता चघ जथे। भाव विभोर हो के देवता मन अपन तन ल लोहा के सांकड़ म पीट-पीट के लहु लुहान कर डरथे। बाना ले जीभ अउ बांह ल घलो के आल-पाल बेध डरथे। देवता म हूम दे के नरियर पा के मन भर नाचथे। देवता चघे के बखत एदे गीद ह जोर पकड़थे-


तुम खेलव दुलारुवा रन बन रन बन हो 

का तोर लेवय रइंया बरम देव

का तोर ले गोर रइंया

का लेवय तोर बन के रकसा

रन बन रन बन हो.........

नरियर लेवय रइंया बरम देव

बोकरा ले गोर रइंया

कुकरा लेवय बन के रकसा

रन बन रन बन हो..............



      जंवारा पाख म पंडा अउ बइगा के अघात योगदान रहिथे। तभे बइगा के बताए मुताबिक बैरग बर सराजाम के बेवस्था करथे। मेघिन बर दू नरियर, एक ठन धोती नही ते पन्छा म नरियर गठिया के बैरग म बांध देथे। सत्ती बर एक नरियर, एक पंछा अउ चूरी पाठ। ठाकुर देव बर सत्ती कस जोरा करे बर परथे। 

 


 *ब) मड़इया मन के बैरगः-* 


         मड़ई बनाथे तेन ल मड़इया कहिथन। मड़इया घर म बैरग ल बदना के मुताबिक सुरहोती के रात करिया (मेघीन) ,लाली अउ पड़री (सादा) कपड़ा ल तोरन कस बड़े अकार म काट के सात घांव एक के बाद एक राख के सील के सुक्खा बांस म फहरा देथे। फूलींग म कलश के स्थापना करथे । देवारी (गोवर्धन पूजा) के दिन जब राऊत मन बाजा-गाजा के संग बैरग ल परघाए बर जाथे। ओतके बखत तीन ठन लिम्बू, तीन ठन नरियर, उदबत्ती, गुलाल, हूम, बंदन, आगी अउ लोटा म पानी रख के पूजा पाठ करथे। लोक आस्था के मुताबिक हूम धूप म खयरा कुकरा (करिया लाली), खैरी पोंई नही ते पड़री कुकरा के बली चघाए जाथे। तब देवी देवता के मुताबिक राऊत मन दोहा पार केे बाजा बजा के नाच गा के देवी देवता मन ल नेवता देथे-


      पूजा परे पूजेरी भइया

      धोआ धोआ चांउर चढांव

      पूजा होवत हे मोर सत्ती के 

      सब देखन चले आव


राऊत मन बैरग संग ठाकुर देवता अउ ग्राम देवता मन ल सांहड़ा देव म गोवर्धन खुंदाए के कार्यक्रम म संघरे बर नेवतथे। गोवर्धन खुंदाए के बाद बैरग ल शीतला लेगथे। पूजा पाठ करे के बाद बइगा ह बैरग ल घर लानथे।

छत्तीसगढ़ी म पढ़व - जोत जंवारा तोर देवाला म दाई जगमग जोत जले - दुर्गा प्रसाद पारकर


 

छत्तीसगढ़ी म पढ़व - जोत जंवारा

तोर देवाला म दाई जगमग जोत जले


- दुर्गा प्रसाद पारकर 


छत्तीसगढ़ म चैत्र नवरात्रि ल बड़ा धूमधाम ले मनाथन। मईया जी के देवाला ह जोत जंवाला ले जगमगा जाथे। जंवारा आस्था के परब आय। छत्तीसगढ़ म भोजन ल जेवन कहिथन। जीये बर जेवन जरूरी हे। जेवन बिना जीव के का अस्तित्व? इंखर अस्तित्व ल बचाए खातिर जेवन देवइया देवी आय जंवारा। जऊन ल बोलचाल म जंवारा कहिथन। जेवन करे ले जीव मन ल शक्ति मिलथे। तभे तो जंवारा ल शक्ति के देवी के रूप में पूजा करथन।

सबो युग म महतारी के महिमा के बखान होये हे। जब-जब धरती म अत्याचार बाढ़त गीस तब-तब अत्याचारी मन के नाव ल बुताए खातिर जंवारा (महामाया) ह कतनो रूप म अवतार लीस।


जंवारा कोन आय?

जंवरहा मन के घर म जंवारा बोए के परम्परा ह आदिम काल ले चले आवत हे। घर परिवार में कोनो किसम के बिघन ह देवी मां के नराजगी ल व्यक्त करथे। अइसे केहे जाथे कि देवी मां ह अपन रीस ल घर के सियान ल सपना के माध्यम ले अवगत कराथे। देवी ल मनाए खातिर परिवार के सुख शान्ति बर सियान ह घर के सुन्ता सुलाह ले पांच सेऊक मन ल गवाही राख के अवइया दिन बादर म जंवारा बोए बर माई खोली (जंवारा बोए के स्थान) म हूम दे के बदना (मनौती) बदथे। मारन वाले घर तो बोकरा के पुजई घलो देथे। कतको घर नायडू (सुरा) के बली चढ़ाए जाथे।

छत्तीसगढ़ वनवासी अंचल आय तभे तो इंहा आदिवासी संस्कृति के चलन हे। येखर सऊंहत गवाही हे-बइगा। बइगा मने ग्राम देवी-देवता मन के विधि-विधान ले पूजा-पाठ अउ देख रेख करइया। गांव के सुख शान्ति बर शीतला (माता देवाला) म जंवारा बोए जाथे। जेखर देख रेख बइगा ह करथे। खरचा ल गांव भर के मन मिलजुल के उठाथे।

अमावस्या के रात बीरही फिंजोए जाथे। बीरही का आय? (1) बीजा ल ही बीरही कहिथन (2) तीन, पांच, सात या नव किसम के अनाज (गेहूं, चना, बटर, लाखड़ी, तीली, धान, जौ, उरीद, मूंग) ल मिंझार के बीरही फिंजोए जाथे। बीरही बर ओलाही गेहूं के बेवस्था करे बर परथे। अइसे केहे जाथे कि महामाई मन इक्कीस बहिनी होथे तेखरे सेती इक्कीस किसम के बीजा ल मिंझार के घलो बीरही फिंजोए जाथे।

देवता कुरिया म कन्हार माटी ले कोठ तीर म आयताकार मेड़ बनाए जाथे, जेन ल फूलवारी कहिथन। खेत बनाए बर छै आना कन्हार माटी ल दस आना बारीक खातू (कम्पोट खातू ल चन्नी म चाल के) ल मिंझार के भूंसा ल ओमे मेले बर परथे। इही मिश्रण ल कलस, चरिहा अउ दोना म घलो चाल दे जाथे। फूलवारी के सोभा ल माई कलस अउ मंझला कलस ह बढ़ाथे। माई कलस ल घांघरा घरो कहिथन। नांदी म नीम तेल भर के कलस के उपर मढ़ा दे। आज काल तो फल्ली, सरसों तेल ल घलो जोत जलाए बर उपयोग म लानत हे। भरूहा काड़ी म हाथ डेढ़ हाथ बाती (पोनी ल बर के) लपेट के नांदी के उप्पर मढ़ा के जोत जलाए जाथे। मंझला कलस ल काली माई के प्रतीक माने गे हे। फूलवारी के मुड़सरिया म रोखी रहिथे। रोखी ल देवी के निराकार रूप माने गे हे। बीरही ल फूलवारी, कलस (माई कलस, मंझला कलस), माई झेंझरी, टुकनी अउ दोना मन म बांवत करे जाथे। बीरही ह जामथे तेन ल जंवारा कहिथन। माई झेंझरी ल रिक्षीन देवी (गुस्सा होवइया देवी) के प्रतीक माने गे हे। तीन कठिया झेंझरी म चार आंगुर छोड़ के खातू ल भर दे, भरे के बाद ओमा बीरही के बांवत कर दे। जऊन बछर जंवारा ह बने जामही ओ साल सुकाल अउ जऊन साल खड़मण्डल जामही वोहा दूकाल के संकेत देथे। परसा पाना, महुआ पाना नही ते खम्हार पाना के दोना बनाए जाथे। दोना ल गांव के नाऊ ठाकुर मन सण्डेवा नही ते राहेर के काड़ी म गोभ-गोभ के बनाथे। दोना ल जंवरहा घर एकम के दिन पहुंचा देथे। ओखर अवेजी म नाऊ ठाकुर ल सेर चाऊंर भेंट करके बिदा करथे। दोना के जंवारा ल ठण्डा के दिन ग्राम देवी-देवता म चढ़ाके गांव, घर-परिवार के सुख शान्ति बर बिनती करथे। कलस के जोत जलाए के पहिली तीन ठन बिना आंछी के सादा लुगरा ल मढ़ाए रहीथे तेन ल ठण्डा के दिन माई कलस, मंझला कलस अउ माई चरिहा के बोहइया मन पहिरथे। एकम के दिन विधि विधान ले देवी पूजा के शुरूआत होथे। सुभ मुहूर्त म पांच पंच के उपस्थिति म जोत जलाए जाथे। घर के सियान ल पण्डा के भार सौंपे जाथे। शीतला (हिंगलाज) म पंडा के जवाबदारी ल बइगा ह निभाथे। पण्डा ह नवरात्रि उपास रहीथे। संझा के संझा रोज फल, दूध, दूबी के रस के फरहरी करथे। एकम के दिन देवी के रक्षक के रूप म लंगूरे (बजरंगबली) के स्थापना फूलवारी के तीर म होथे। काली के रूप म खप्पर ल जंवारा खोली के मुहाटी के बगल म स्थापित करे जाथे। जेन ल खप्पर वाले देवी के नाव ले जानथन।

सेवा बजइया सेऊक मन ढोलक, मंजीरा, झांझ बजावत सेवा गीत गावत जंवारा के सेवा बजाए बर जंवरहा घर पहुंचथे तब पण्डा ह घर के मुहाटी म पानी ओरछ के उंखर स्वागत करथे ताहन सेऊक मन के आरती उतारत पचघुच्चा घूंचत सेवा गाए बजाए बर सादर आमंत्रित करथे। सेऊक मन ठाकुर देव के सुमरनी ले सेवा गीत के सुरूआत करथे। तेखर बाद मातेश्वरी के सेवागीत, लंगूरे गीत गाथे ताहन सोसन भर देवी गीत गा के सेवा करथे। पूरा वातावरण देवी मय हो जय रहिथे। वोइसे तो देवी के श्रृंगार के कतनो गीत हे फेर विशेष तौर से देवी मां ल पांच रंग ह जादा प्रिय हे। जेखर वर्णन ह येदे गीत म मिलथे -


पचरंग सोलहो सिंगार महामाया


सफेद-सेत सेत तोर ककनी बनुरिया, अहो महामाई सेते पटा तुम्हार

        सेत हवय तोर गर के हरवा अउ फूलन के हारे

लाल-लाली लाल लहर के लहंगा, लाली चोली तुम्हारे

       पान खात मुंह लाल भवानी, सिर के सेंदूर लाले

पीला-पिंयर पिताम्बर पहिरे महामाई पिंयर कान के ढारे

       पिंयर हावे तोर नाक के नथनी रहे होठ म छाये

हरा-हरियर हरियर हाथ के चूरी, हरियर गला के पोते

      हरियर हावे तोर माथ के टिकली, बरे सुरूज के जोते

काला-कारी कोर लगे अचरन म, कारी काजर के रेख

      कारी हवय तोर भंवर पालकी, कारी सिर के केस

     

देवताहा मन देवता चढ़ जथे। हूम देवा के ओला शांत करे जाथे। कतको मन तो कांटादार साकड़ ले अपन पीठ ल लहूलुहान कर डरथे। देवी आस्था ल जीभ नही ते हाथ ल आलपाल बेध के देखा देथे। पंचमी के दिन बाना परघाए जाथे। पंचमी अउ साते के दिन फूलकसिया लोटा के कलस चढ़ाए बर परथे। मान ले जंवारा ह अऊ जादा बढ़ागे तब अष्टमी के घलो कलस चढ़ाए जा सकत हे। जंवारा पाख के अष्टमी के दिन हुमन होथे। इही दिन पिसान ल तेल, घी म सान के अंठोई बनाए जाथे। इही ल रोंठ घलो कहिथन। रोंठ (अठोई) ल गोतियार मन देवी के प्रसाद के रूप म स्वीकार करथे। अठोई के दिन एक्कइस ठन लिमऊ घलो चढ़ाए जाथे। इही दिन नेवोतहार मन नरियर भेंटकर के अपन मनोकामना पूरा करे बर बिनती करथे।

जऊन रद्दा ले जंवारा ठण्डा करे बर नदिया, नरवा, तरिया जाना हे वो रद्दा ल मुंदराहा ले बहारे बर परथे। जोत ह झन बुताए कहिके चाऊंर म मंतर मार के बइगा ह जंवारा म छीत देथे ताहन लिमऊ ल दू कुटका कर के भुइयाँ म छोड़े बर परथे। अइसे केहे जाथे-जेखर संतान नइ राहय ओ माई लोगन मन माई कलस बोहइया के गोड़ म हंवला भर पानी ढार के पेट के भार सुत जथे। जंवारा बोहे रहिथे तेन मन ओरी-पारी ओला नहाक के आगु बढ़ थे। अइसे करे ले देवी मां अपन भक्त के पुकार ल सुनथे। जंवारा ठण्डा करे के बाद जंवारा ल बांटे जाथे। जेखर ले कतनो मन मित मितान बद के अटूट रिश्ता जोड़ डरथे। फूल फूलवारी ह कोनो जघा भेंट हो जही तब एक-दूसर ल सीताराम जंवारा कहिके संबोधित करथे।



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Wednesday, 28 September 2022

दलित जी के 'छन्नर-छन्नर पैरी बाजय' में ग्राम्य जनजीवन के चित्रण*


 

*दलित जी के 'छन्नर-छन्नर पैरी बाजय' में ग्राम्य जनजीवन के चित्रण* 


       छत्तीसगढ़ी साहित्य के गिरधर कविराय के रूप में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ के साहित्यकार, लेखक, जनकवि कोदूराम दलित के साहित्य जगत म बिसेस महत्व हवय। उँखर छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी के पद्य-गद्य में बरोबर पकड़ रिहिस। दलित जी हिन्दी के छन्द में छत्तीसगढ़ी कविता लिखय। उँखर कविता मन हा गाँधीवादी विचारधारा ले प्रेरित रहय। हास्य-व्यंग्य घलो बनेच रहय। कवि सम्मेलन मन म अपन इहि विशिष्ट शैली ले लोगन मन ल  जागरूक करत अब्बड़ मनोरंजक करय। दलित जी के कविता में देशप्रेम भाव, जनजागरण,प्रकति चित्रण, नीतिपरख, समाज सुधार, समाजोपयोगी, मानवतावादी, अउ प्रगतिशील नजरिया के घलो दर्शन होय। येखर सेती दलित जी ल जनकवि के नाव घलो मिले रिहिस।

  

       दलित जी अपन कलम ले लगभग 800 कविता रच के साहित्य संसार के कोठी ल भरे के उदिम करीस। आज 55 वीं पुण्यतिथि म उँखर कविता संग्रह के किताब "छन्नर-छन्नर पैरी बाजय" के सुरता करत मोर आदरांजलि देवत हों। ये किताब ल संपादक नंदकिशोर तिवारी जी अउ गुरुदेव अरुण कुमार निगम जी के स्वत्वाधिकार म सन 2007 म प्रकाशित होय हे। ये किताब म समाज सुधार,देशप्रेम भावना के संगे-संग किसान-मजदूर के पीरा ल कहत अपन अधिकार बर जगात, मद्यपान निषेध, राष्ट्रीय तिहार, भारतमाता ल आजादी करे बर गोहार अउ खादी ग्रामोद्योग के कविता मन प्रमुख हवय। ये किताब के कविता मन हमर ग्राम्य जनजीवन के चित्रण ले भरे हे।  दलित जी के विचार ल ये किताब के 32 ठन कविता ल पढ़के जाने जा सकत हे।  कवि के लगभग सबो भाव ये कविता संग्रह में आगे हवय। येला पढ़के साहित्य प्रेमी मन बिना सहराये नई रह सकय। 


     दलित जी शिक्षण काम के जुड़े के सेती सबो झन बर शिक्षा के चिंता करना स्वभाविक बात आय। अनिवार्य शिक्षा के महत्व ल बतात उँखर पहली कविता 'अनिवार्य सिक्छा' में जम्मो लइका मन के शाला भेजे बर किहिस-


"पढ़े लिखे बर जाव-गुन सीखे बर जाव,

पढ़ लिख के भईया! बने नाम ल कमाव।"


लइका मन के चिंता के पीछू सियान मन के प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम बर बने चेतावत घलो कहत हे-


"रतिहा आठ बजे आ जाहू, साढ़े नौ के छुट्टी पाहू।

आए बर झन करौ कोताही, बिगर बलाए आना चाही।"


     हमर समाज बर अभी सबके बड़े बुराई हवे त ओ हरे मंद-मउँहा के पियई। दलित जी ह येला रोके अउ जनमानस ल येकर के बचे के प्रयास बर लिखिस। येहा घर, परिवार, समाज अउ देश ल नुकसान करथे। पियईया मन ल फटकारत किहिस-


"पियइ में तोर लगे आगी, जर जाय तोर ये जिनगानी।

पीथस निपोर तैं ढकर-ढकर, ये सरहा मौहा के पानी।"


   सहकारिता अपनाय बर कवि के लेखनी कम नई चले हे। सबो झन ल सहकारिता लाय बर सहयोग करे के जरूरत हवय। सबो मिलके हमर देश के बेकारी, भुखमरी अउ गरीबी ल दूर करे के  संकेत देवत हे-


"हम्मन भिड़बो तो भारत में,लाबो स्वर्ग उतार।

सहकारिता हमर देस के, कर देही उद्धार।"


       दलित जी के देशप्रेम 'भारत ला बैकुण्ठ बनाबो' कविता में साफ-साफ दिखत हे। गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होय के भाव देखव-


"अवतारी गाँधी जी आइन,

जप-तप करिन सुराज देवाइन।

हमर देस ल हमर बनाइन,

सुग्घर रसदा घलो देखाइन।"


      दलित जी के लिखे के शुरुआत 1926 ले 1967 तक सरलग होईस हे। शुरुवाती के समय स्वतंत्रता संग्राम मचे रहय। त ओकर प्रभाव कविता में आनाच हे। उन स्वतंत्रता सेनानी मन ल अपन कविता म जगह देवत उँखर प्रशंसा करीस। 'भगवान तिलक' कविता में बाल गंगाधर तिलक जी के सुघ्घर बखान करे हे-


"है पावन जेकर तिलक नाव,

हम कस न परीं ओकरेच पाँव।"


       ग्रामीण जनजीवन के सउँहत चित्रण उँखर कविता 'हम सुग्घर गाँव बनाबो' में दिखथे। संग मा ग्रामीण परिवेश के साफ-सफाई,वृक्षारोपण, समानता के भाव, पंचायती-राज, खेती-खार के गोठबात सहज, सरल शैली में केहे हे-


"घर कुरिया अउ गली खोर मन ला,

साफ रखत हम जाबो।

हवा-अँजोर निंगे खातिर,

घर-घर खिरकी लगवाबो।"


"बस्ती के बहिरी-भितरी रुख,

राई खूब लगाबो।

नवा ढंग मा खेती करबो,

गजब अन्न उपजाबो।"


   स्वतंत्रता आंदोलन के समय  उपजे वर्गभेद, ऊंच-नीच, छुआछूत जईसन घातक कुरीति मन ला दलित जी अपन कलम ले निशाना साधत हरिजन मन बर मंगलकारी-जन हितकारी सुराज ला सामाजिक समता के अचूक उपाय बताईस-


"गांधी बबा सब्बो झन खातिर,

लाये हवय सुराज।

ओकर प्रिय हरिजन मन ला,

अपनाना परही आज।"


     अपन कविता '15 अगस्त के सुराजी परब' में अमीर-गरीब के बीच वर्ग-संघर्ष ल मार्मिक ढंग के चित्रित करीस कि कईसे स्वतंत्रता के सुराज सिर्फ बड़े मन बर आईस हे, छोटे वर्ग तो आज घलो आर्थिक कमजोरी, बेकारी, गरीबी ले जुझते हवय-


"कइसे सुराजी परब ला मनाई,

नइ हे गा घर मा एकोठन पाई।

पंदरा अगस्ते के होही देवारी,

चमकीही दाऊ के महाल-अटारी।

हमर घर में रहि घुप-अँधियारी,

जरजा गरीबी, तँय मर जा बुजारी।

पोनी अउर तेल,का में बिसाई,

नइ हे गा घर में एकोठन पाई।"


      छत्तीसगढ़ी गीत के राजा ददरिया के राग में 'बापू जी' कविता में गाँधीजी जी के सत्य, अहिंसा, हरिजन उद्धार अउ आजादी बर करे कठिन संघर्ष के बानगी देखे के लईक हवे-


"हमला पढ़ाये अहिनसा के पाठ,

छेरी-बघवा-ला पानी पिलाये एके घाट।"


        कविता 'भारत माता से' सवैया छंद में अंग्रेज मन के गुलामी में जकड़े हमर भारतमाता ला ये कहके भरोसा देवात हवे, कि हमन सब झन मिलके तोला ये फिरंगी मन के मुक्त करा लेबो दाई, अउ वो मन का कइसनो करके इन्हां ले खेदार के ही सांस लेबो-


"अब रो मत भारत माता कभू,

हम बंधन-मुक्त कराबोन तोला।

अंगरेज के संग,करे बर जंग,

करे हन राजी इहाँ के सबो ला।"


         देश के आजादी के लड़ई लड़े बर दलित जी ह गांव के मजदूर और किसानों मन ला जगाके अंग्रेज मन ले दू-दू हाथ करे बर तैयार करे हे-


"आजादी खातिर लड़ना हे,

जागो मजूर जागो किसान।

गोरा-ला खूब कुचरना हे,

जागो मजूर जागो किसान।"


        इंकर संग जवान मन ल घलो आजादी के लड़ई बर चेत करे ल किहिस। आलसीपन ल छोड़व अउ देश बर आघू आवव-


"हे नव भारत के तरुण वीर,

ये भीम,भगीरथ, महावीर।

झन भुला अपन पुरूसारथ बल,

खँडहर मा रच अब रंग महल।"


       आजादी बर किसान, मजदूर, जवान मन ला जगाये के बाद सत्याग्रह करे के तैयारी उँखर 'सत्याग्रह' कविता में दिखत हवे।  गाँधी जी के बात मानके उँखर रद्दा धरबो-


"अब हम सत्याग्रह करबो,

कसो कसौटी-मा अउ देखो।

हम्मन खरा उतरबो,

अब हम सत्याग्रह करबो...."


        लकर-धकर देश के आजादी होय के बाद घलो बैरी- दुश्मन मन पीछू नई छोड़िन। देश के दुश्मन जेमन कश्मीर में घुसपैठ के कोशिश करिन ओमन ला मार भगाये के बात कवि ह 'बंडवा हुंडरा' में केहे हे। अउ घनाक्षरी छंद के माध्यम के चीनी आक्रमण करईया मन ल घलो धमकाईन हे-


"दौड़ो-पकड़ो, मारो खेदारो सँगी हो,

बंडवा हुंडरा-मन हमर देस मां आइन हे।"


"अरे बेसरम चीन! समझे रेहेन तोला,

परोसी के नता-मां अपन बंद-भाई रे।"


         पाकिस्तानी आक्रमण बर वीर सिपाही मन ला जोश दिलाये के काम उँखर 'आव्हान' कविता में हवय। अपन मातृभूमि के रक्षा बर बैरी मन ले लड़े बर बंदूक, बम, तोप, तलवार जइसन हथियार उठाये के अब समय आ गेहे। स्वतंत्रता संग्राम के समय सिपाही के आम जनता ला मारना एकोकनी अच्छा नई लगे, येकर सेती ओहा 'झन मार सिपाही' में बड़ा करूणा भरे शब्द में कथे-


"झन मार सिपाही, हमला झन मार सिपाही।

एक्के महतारी के हम-तैं, पूत आन रे भाई।"


     दलित जी मूलतः गांधीवादी विचार ले प्रेरित कवि रिहिस। उँखर कविताओं में सत्य, अहिंसा के साथ खादी ग्रामोद्योग के बात तको हे, 'फगुवा अउ फगनी के गोठ' में देवारी तिहार म सबो झन बर स्वदेशी खादी भंडार ले खादी के कपड़ा-लत्ता लेय बर केहे हे। 'तकली' कविता में जम्मो झन ला तकली चलावत आलस्य छोड़के कर्मठ बने के सुझाव दिस। 'सूत कातिहौं वो दाई' में लइका अपन महतारी ले चरखा और तकली लेय बर कहत हवय।

 'खादी के टोपी' कविता में आजादी के बाद सबो झन ला खादी के टोपी पहने ल कहत खादी के महिमा अउ खादी ग्रामोद्योग ला बढ़ावा देय के सफल उदिन करे हे-


"पहिनो खादी टोपी भइया!

अब तो तुम्हरे राज हे।

खादी के उज्जर टोपी ये,

गाँधी जी के ताज हे।"


       किसान-मजदूर के भुखमरी बर तो दलित जी हा भगवान ला घलो नई छोड़िस। 'न्यायी भगवान' कविता में गरीब मनके लाचारी, बड़े वर्ग द्वारा शोषण के सेती दलित जी हा भगवान के स्वरूप बर प्रश्नचिह्न घलो लगा दिन। इहि दलित जी के प्रगतिवादी कवि होय के प्रमाण आय-


"धन-धन रे न्यायी भगवान,

कहाँ हवय तोर आँखी-कान।

नइये ककरो सुरता-चेत,

देव आस के भूत-परेत।"


      गुरु के महिमा, भक्ति, त्याग अउ समर्पण के भाव मनखे के जीवन संवर जथे। अपन लोक-परलोक ल सुधारे बर रत्नावली के फटकार हा तुलसीदास जी ला सत के रद्दा धरा दिस। कविता 'तुलसी भगवान तभे पाइस' में गुरु के महिमा ल बतात केहे हवय-



."पहिली सद्गुरु जी चरण धरिस।

ओकर सेवा दिन-रात करिस।

विदया सीखिस, दस-पांच बरिस।

गुरु ग्यान भरिस, अग्यान हरिस।

मन मंदिर में अँजोर लाइस।

तुलसी,भगवान तभे पाइस।"


      दलित जी छत्तीसगढ़ी के संगे-संग हिन्दी के घलो बेजोड़ कवि रिहिन। दूनो भाषा में कवि के समान अधिकार रहय। हिन्दी के देवनागरी लिपि बर उँखर लिखे कविता हिन्दी प्रेम ला स्पष्ट करत हे-


" येकर मान करय सब जनता,

हिन्दी अउर अहिन्दी,

ये जान्हवी बनिस अउ बनगें,

सब भासा कालिन्दी,

बोलंय ये भासा-ला मदरासी,

बंगाली सिंधी,

बनिस रास्ट्रभासा हमार,

हम सबके प्यारी हिन्दी।"


         छत्तीसगढ़ के कण-कण ले परिचित होय के सेती उँखर कविता में छत्तीसगढ़ के हर रंग, रूप, संस्कृति, खान-पान, लोक व्यवहार के दर्शन जरूर होथे। छत्तीसगढ़ के कई ठन भाजी में खेड़ा भाजी प्रसिद्ध हवे। येला जरी भाजी घलो कहिथे। ये हमर शरीर बर कतका उपयोगी हवे, दलित जी बतात हे-


"जो चुचुर-चुचुर के खावे।

तन-बदन मस्त हो जावे।

वो हार कभू न माने।

कखरो से भिड़े अभेड़ा।

ये छत्तीसगढ़ के खेंडा।"


         छत्तीसगढ़ के किसानी जनजीवन ला सबसे ज्यादा छूये के जतन दलित जी हा अपन रचना में करे हे, किसान पुत्र दलित जी स्वयं बालपन ले ही सबो किसानी काम-काज ला नजदीकी से देखत आय हे, तेकर सेती ओकर रचना मन में किसानी जनजीवन के बारीकी ले चित्रण होय हे। 'हम किसान' कविता के पंक्ति में किसानी काम के कतिक सुंदर चित्रण करे हे-


"चल नांगर सरर-सरर,

खेत चीर चरर-चरर,

छिड़के हन बीज-भात,

छरर-छरर, झरर-झरर।"


        किसानी के चार महीना के कठिन परिश्रम के पीछू फसल कटई के समय सबसे ज्यादा आनंददायक होथे। किसान के मेहनत अब बगबग के दिखे ल लगथे। गांव के सभी सँगी-साथी के संग मिलके, ये पुण्य काम के शुरुआत ले आखिरी करथे। धान लुवाई कराये बर अपन-अपन खेत में जादा मनखे जाये के मोह बने रइथे। जेकर ले धान कटई के बुता जल्दी पूरा हो जाये। इहि में लोगन मन के बीच आपसी मनुहार देखते बनथे-


"चल संगवारी,चल संगवारिन,

धान लुए ला जाई।

मातिस धान लुवाई अड़बड़,

मातिस धान लुवाई।"


       फसल कटई के समय मोटियारी अउ नवा बहुरिया के  तैयारी अउ उँखर संगी-सहेली के साथ हँसी-मजाक के दृश्य सजीव हो उठथे। दलित जी के लेखनी के जादू के ये गीत अमर होगे हे-


"पाटी पारे मांग सँवारे,

हँसिया खोंच कमर मा।

जाँय खेत मोटियारी जम्मों,

तारा दे के घर मा।"


"छन्नर-छन्नर पैरी बाजय,

खन्नर-खन्नर चूरी।

हाँसत, कुलकत,मटकत रेंगय,

बेलबेलहीन टूरी।"


       "छन्नर-छन्नर पैरी बाजय" कविता संग्रह में आखिरी कविता के रुप में 'चउमास' का वर्णन मिलथे। चउमास अर्थात बरसात के चार महीना के चित्रण करे गेहे। चारों दिशा में फईले हरियाली हरे-भरे फसल,पेड़-पौधा ला देखके मन प्रफुल्लित हो जथे। ग्रामीण संस्कृति में जइसे-जइसे घटना-घटित होत जाथे, वइसे-वइसे उँखर रूप के चित्रण बड़ सुघ्घर ढंग ले करे हवय-


"घाम दिन गइस, अइस बरखा के दिन।

सनन-सनन चले पवन लहरिया।

छाये रथे अगास-मां चारों खूँट धुँआ साहीं।

बरखा के बादर निच्चट भिम्म करिया।

चमकय बिजली गरजे घन घेरी-बेरी।

बरसे मुसरधार पानी छर-छरिया।

भरगें खाई खोंधरा, कुवाँ, डोली-डांगर 'औ'

टिप-टिप ले भरगें-नदी नरवा तरिया।"



        अईसन ढंग के जनकवि कोदूराम 'दलित' जी के कविता संग्रह "छन्नर-छन्नर पैरी बाजय" में शामिल जम्मो कविता मन में तत्कालीन स्थिति, स्वतंत्रता संग्राम, गांधीवादी विचारधारा, सहकारिता, प्रकृति चित्रण, ग्रामीण जनजीवन, समाज-सुधार, खादी ग्रामोद्योग, सत्य-अहिंसा, किसान-मजदूर के मेहनत उँखर पीरा अउ संघर्ष पुरजोर तरीका के केहे गे हवे। ये संग्रह में वर्तमान समय के स्थिति के घलो चित्रण होय हे। ये कविता संग्रह में कवि के समय के सामाजिक ,राजनीतिक स्थिति, स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणीय वीरों, आंदोलन कारी महिला मन के चित्रण का होना जरूरी लगत रिहिस। तिहंक ले ये कविता संग्रह सराहनीय हवे। आज घलो दलित जी के कविता संग्रह "छन्नर-छन्नर पैरी बाजय" सहृदय सबो वर्ग के पाठक मन बर पठनीय हे। येमें शामिल कविता मन वर्तमान स्थिति में घलो प्रासंगिक हवे।



             हेमलाल सहारे

मोहगाँव(छुरिया)राजनांदगांव

जजनकवि कोदूराम “दलित” की साहित्य साधना :


 

जजनकवि कोदूराम “दलित” की साहित्य साधना :

( 5 मार्च को 107 वीं जयन्ती पर विशेष) : शकुन्तला शर्मा 


मनुष्य भगवान की अद्भुत रचना है, जो कर्म की तलवार और कोशिश की ढाल से, असंभव को संभव कर सकता है । मन और मति के साथ जब उद्यम जुड जाता है तब बड़े बड़े  तानाशाह को झुका देता है और लंगोटी वाले बापू गाँधी की हिम्मत को देख कर, फिरंगियों को हिन्दुस्तान छोड़ कर भागना पड़ता है । मनुष्य की सबसे बड़ी पूञ्जी है उसकी आज़ादी, जिसे वह प्राण देकर भी पाना चाहता है, तभी तो तुलसी ने कहा है - ' पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ।' तिलक ने कहा - ' स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे ।' सुभाषचन्द्र बोस ने कहा - ' तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा ।' सम्पूर्ण देश में आन्दोलन हो रहा था, तो भला छत्तीसगढ़ स्थिर कैसे रहता ? छत्तीसगढ़ के भगतसिंह वीर नारायण सिंह को फिरंगियों ने सरेआम फाँसी पर लटका दिया और छत्तीसगढ़ ' इंकलाब ज़िंदाबाद ' के निनाद से भर गया, ऐसे समय में ' वंदे मातरम् ' की अलख जगाने के लिए, कोदूराम 'दलित' जी आए और उनकी छंद - बद्ध रचना को सुनकर जनता मंत्र – मुग्ध हो गई  -


" अपन - देश आज़ाद  करे -  बर, चलो  जेल - सँगवारी

 कतको झिन मन चल देइन, आइस अब - हम रो- बारी।

जिहाँ लिहिस अवतार कृष्ण हर,भगत मनन ला तारिस

दुष्ट- जनन ला मारिस अउ,   भुइयाँ के भार - उतारिस।

उही  किसम जुर - मिल के हम, गोरा - मन ला खेदारी

अपन - देश आज़ाद  करे  बर,  चलो - जेल - सँगवारी।"


15 अगस्त सन् 1947 को हमें आज़ादी मिल गई, तो गाँधी जी की अगुवाई में दलित जी ने जन - जागरण को संदेश दिया –


" झन सुत सँगवारी जाग - जाग, अब तोर देश के खुलिस भाग

सत अउर अहिंसा सफल रहिस, हिंसा के मुँह मा लगिस आग ।

जुट - मातृ - भूमि के सेवा मा, खा - चटनी बासी - बरी - साग

झन सुत सँगवारी जाग - जाग, अब तोर देश के खुलिस भाग ।

उज्जर हे तोर- भविष्य - मीत,फटकार - ददरिया सुवा - राग

झन सुत सँगवारी जाग - जाग अब तोर देश के खुलिस भाग ।"


हमारे देश की पूँजी को लूट कर, लुटेरे फिरंगी ले गए, अब देश को सबल बनाना ज़रूरी था, तब दलित ने जन -जन से, देश की रक्षा के लिए, धन इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया –


कवित्त – 


" देने का समय आया, देओ दिल खोल कर, बंधुओं बनो उदार बदला ज़माना है

देने में ही भला है हमारा औ’ तुम्हारा अब, नहीं देना याने नई आफत बुलाना है।

देश की सुरक्षा हेतु स्वर्ण दे के आज हमें, नए- नए कई अस्त्र- शस्त्र मँगवाना है

समय को परखो औ’ बनो भामाशाह अब, दाम नहीं अरे सिर्फ़ नाम रह जाना है।"


छत्तीसगढ़ के ठेठ देहाती कवि कोदूराम दलित ने विविध छंदों में छत्तीसगढ़ की महिमा गाई है। भाव - भाषा और छंद का सामञ्जस्य देखिए –


चौपाई छंद


"बन्दौं छत्तीसगढ़ शुचिधामा, परम - मनोहर सुखद ललामा

जहाँ सिहावादिक गिरिमाला, महानदी जहँ बहति विशाला।

जहँ तीरथ राजिम अति पावन, शबरीनारायण मन भावन

अति - उर्वरा - भूमि जहँ केरी, लौहादिक जहँ खान घनेरी ।"


कुण्डलिया छन्द -


" छत्तीसगढ़ पैदा - करय अड़बड़ चाँउर - दार

हवयँ इहाँ के लोग मन, सिधवा अऊ उदार ।

सिधवा अऊ उदार हवयँ दिन रात कमावयँ

दे - दूसर ला मान, अपन मन बासी खावयँ ।

ठगथें ए बपुरा- मन ला बंचक मन अड़बड़

पिछड़े हावय अतेक इही कारण छत्तीसगढ़ ।"


सार  छंद -

" छन्नर छन्नर चूरी बाजय खन्नर खन्नर पइरी

हाँसत कुलकत मटकत रेंगय बेलबेलहिन टूरी ।

काट काट के धान - मढ़ावय ओरी - ओरी करपा

देखब मा बड़ निक लागय सुंदर चरपा के चरपा ।

लकर धकर बपरी लइकोरी समधिन के घर जावै

चुकुर - चुकुर नान्हें बाबू ला दुदू पिया के आवय।

दीदी - लूवय धान खबा-खब भाँटो बाँधय - भारा

अउहाँ झउहाँ बोहि - बोहि के भौजी लेगय ब्यारा।"


खेती का काम बहुत श्रम - साध्य होता है, किंतु दलित जी की कलम का क़माल है कि वे इस दृश्य का वर्णन, त्यौहार की तरह कर रहे हैं। इन आठ पंक्तियों से सुसज्जित सार छंद में बारह दृश्य हैं, मुझे ऐसा लगता है कि दलित जी की क़लम में एक तरफ निब है और दूसरी ओर तूलिका है, तभी तो उनकी क़लम से लगातार शब्द - चित्र बनते रहते है और पाठक भाव - विभोर हो जाता है, मुग्ध हो जाता है ।


निराला की तरह दलित भी प्रगतिवादी कवि हैं । वे समाज की विषमता को देखकर हैरान हैं, परेशान हैं और सोच रहें हैं कि हम सब, एक दूसरे के सुख - दुःख को बाँट लें तो विषमता मिट जाए –


मानव की


" जल पवन अगिन जल के समान यह धरती है सब मानव की

हैं  किन्तु कई - धरनी - विहींन यह करनी है सब - मानव की ।

कर - सफल - यज्ञ  भू - दान विषमता हरनी है सब मानव की

अविलम्ब - आपदायें - निश्चित ही हरनी - है सब- मानव की ।"


श्रम का सूरज (कवित्त)


" जाग रे भगीरथ - किसान धरती के लाल, आज तुझे ऋण मातृभूमि का चुकाना है

आराम - हराम वाले मंत्र को न भूल तुझे, आज़ादी की - गंगा घर - घर पहुँचाना है ।

सहकारिता से काम करने का वक्त आया, क़दम - मिला के अब चलना - चलाना है

मिल - जुल कर उत्पादन बढ़ाना है औ’, एक - एक दाना बाँट - बाँट - कर खाना है ।"


सवैया - 


" भूखों - मरै उत्पन्न करै जो अनाज पसीना - बहा करके

बे - घर हैं  महलों को बनावैं जो धूप में लोहू - सुखा करके ।

पा रहे कष्ट स्वराज - लिया जिनने तकलीफ उठा - करके

हैं कुछ चराट चलाक उड़ा रहे मौज स्वराज्य को पा करके ।"


गरीबी की आँच को क़रीब से अनुभव करने वाला एक सहृदय कवि ही इस तरह, गरीबी को अपने साथ रखने की बात कर रहा है । आशय यह है कि - " गरीबी ! तुम यहाँ से नहीं जाओगी, जो हमारा शोषण कर रहे हैं, वे तुम्हें यहाँ से जाने नहीं देंगे और जो भूखे हैं वे भूखे ही रहेंगे ।" जब कवि समझ जाता है कि हालात् सुधर नहीं सकते तो कवि चुप हो जाता है और उसकी क़लम उसके मन की बात को चिल्ला - चिल्ला कर कहती है -


 गरीबी – 


" सारे गरीब नंगे - रह कर दुख पाते हों तो पाने दे

दाने दाने के लिए तरस मर जाते हों मर जाने दे ।

यदि मरे - जिए कोई तो इसमें तेरी गलती - क्या

गरीबी तू न यहाँ से जा ।"


कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि गाय जो हमारे जीवन की सेतु है, जो ' अवध्या' है, उसी की हत्या होगी और सम्पूर्ण गो - वंश का अस्तित्व ही खतरे में पड जाएगा । दलित जी ने गो - माता की महिमा गाई है । बैलों की वज़ह से हमें अन्न - धान मिल जाता है और गो -रस की मिठास तो अमृत -तुल्य होती है। दलित जी ने समाज को यह बात बताई है कि-"गो-वर को केवल खाद ही बनाओ,उसे छेना बना कर अप-व्यय मत करो" -


 गो - वध बंद करो


" गो - वध बंद करो जल्दी अब, गो - वध बंद करो

भाई इस - स्वतंत्र - भारत में, गो - वध बंद करो ।

महा - पुरुष उस बाल कृष्ण का याद करो तुम गोचारण

नाम पड़ा गोपाल कृष्ण का याद करो तुम किस कारण ?

माखन- चोर उसे कहते हो याद करो तुम किस कारण

जग सिरमौर उसे कहते हो, याद करो तुम किस कारण ?

मान रहे हो देव - तुल्य उससे तो तनिक-- डरो ॥


समझाया ऋषि - दयानंद ने, गो - वध भारी पातक है

समझाया बापू ने गो - वध राम राज्य का घातक है ।

सब  - जीवों को स्वतंत्रता से जीने - का पूरा - हक़ है

नर पिशाच अब उनकी निर्मम हत्या करते नाहक हैं।

सत्य अहिंसा का अब तो जन - जन में भाव - भरो ॥


जिस - माता के बैलों- द्वारा अन्न - वस्त्र तुम पाते हो

जिसके दही- दूध मक्खन से बलशाली बन जाते हो ।

जिसके बल पर रंगरलियाँ करते हो मौज - उड़ाते हो

अरे उसी - माता के गर्दन- पर तुम छुरी - चलाते हो।

गो - हत्यारों चुल्लू - भर - पानी में  डूब - मरो

गो -रक्षा गो - सेवा कर भारत का कष्ट - हरो ॥"


शिक्षक की नज़र पैनी होती है । वह समाज के हर वर्ग के लिए सञ्जीवनी दे - कर जाता है । दलित जी ने बाल - साहित्य की रचना की है, बच्चे ही तो भारत के भविष्य हैं -


वीर बालक


"उठ जाग हिन्द के बाल - वीर तेरा भविष्य उज्ज्वल है रे ।

मत हो अधीर बन कर्मवीर उठ जाग हिन्द के बाल - वीर।"


अच्छा बालक पढ़ - लिख कर बन जाता है विद्वान

अच्छा बालक सदा - बड़ों का करता  है सम्मान ।

अच्छा बालक रोज़ - अखाड़ा जा - कर बनता शेर

अच्छा बालक मचने - देता कभी नहीं - अन्धेर ।

अच्छा बालक ही बनता है राम लखन या श्याम

अच्छा बालक रख जाता है अमर विश्व में नाम ।"


अब मैं अपनी रचना की इति की ओर जा रही हूँ, पर दलित जी की रचनायें मुझे नेति - नेति कहकर रोक रही हैं । दलित जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । समरस साहित्यकार, प्रखर पत्रकार, सजग प्रहरी, विवेकी वक्ता, गंभीर गुरु, वरेण्य विज्ञानी, चतुर चित्रकार और कुशल किसान ये सभी उनके व्यक्तित्व में विद्यमान हैं, जिसे काल का प्रवाह कभी धूमिल नहीं कर सकता । 

हरि ठाकुर जी के शब्दों में -

" दलित जी ने सन् -1926 से लिखना आरम्भ किया उन्होंने लगभग 800 कवितायें लिखीं,जिनमें कुछ कवितायें तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और कुछ कविताओं का  प्रसारण आकाशवाणी से हुआ । आज छत्तीसगढ़ी में लिखने वाले निष्ठावान साहित्यकारों की पूरी पीढ़ी सामने आ चुकी है किंतु इस वट - वृक्ष को अपने लहू - पसीने से सींचने वाले, खाद बन कर, उनकी जड़ों में मिल जाने वाले साहित्यकारों को हम न भूलें।"


साहित्य का सृजन, उस परम की प्राप्ति के पूर्व का सोपान है । जब वह अपने गंतव्य तक पहुँच जाता है तो अपना परिचय कुछ इस तरह देता है, और यहीं पर उसकी साधना सम्पन्न होती है -


आत्म परिचय


" मुझमें - तुझमें सब ही में रमा वह राम हूँ- मैं जगदात्मा हूँ

सबको उपजाता हूँ पालता- हूँ करता सबका फिर खात्मा हूँ।

कोई मुझको दलित भले ही कहे पर वास्तव में परमात्मा हूँ

तुम ढूँढो मुझे मन मंदिर में मैं मिलूँगा तुम्हारी ही आत्मा हूँ।"


शकुन्तला शर्मा, भिलाई                                                    

मो. 93028 30030

Monday, 26 September 2022

साहित्यिक तर्पण छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय- कोदूराम दलित


 

साहित्यिक तर्पण


छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय-  कोदूराम दलित   

                                                            जब हमर देश हा अंग्रेज मन के गुलाम रिहिस ।वो समय हमर साहित्यकार मन हा लोगन मन मा जन जागृति फैलाय के गजब उदिम करिन । हमर छत्तीसगढ़ मा हिन्दी साहित्यकार के संगे संग छत्तीसगढ़ी भाखा के साहित्यकार मन घलो अंग्रेज सरकार के अत्याचार ला अपन कलम मा पिरो के समाज ला रद्दा देखाय के काम करिन ।छत्तीसगढ़ी के अइसने साहित्यकार मन मा स्व. लोचन प्रसाद पांडेय, पं. सुन्दर लाल शर्मा, पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, स्व. कुंजबिबारी चौबे ,प्यारे लाल गुप्त, अउ स्व. कोदूराम दलित के नाम अब्बड़ सम्मान के साथ लेय जाथे ।येमा विप्र जी अउ दलित जी हा मंचीय कवि के रुप मा घलो गजब नाव कमाइन । छत्तीसगढ़ी मा सैकड़ो कुंडलिया लिखे के कारण दलित जी ल  छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय कहे जाथे 


जन कवि कोदू राम दलित के जनम बालोद जिले अर्जुन्दा ले लगे गांव टिकरी मा 5 मार्च 1910 मा एक साधारण किसान परिवार मा होय रिहिन ।पढ़ाई पूरा करे के बाद दलित जी हा प्राथमिक शाला दुर्ग मा गुरुजी बनिस। बचपन ले वोकर रुचि साहित्य डहर रिहिस हवय ।वोहा अपन परिचय ला सुघर ढंग ले अइसन देहे –


लइका पढ़ई के सुघर, करत हवंव मैं काम ।

कोदूराम दलित हवय मोर गंवइहा नाम ।।

मोर गंवइहा नाम, भुलाहू झन गा भइया ।

जनहित खातिर गढ़े हवंव मैं ये कुंडलियां ।।

शउक महूँ ला घलो हवय, कविता गढ़ई के ।

करथव काम दुरुग मा मैं लइका पढ़ई के ।।



दलित जी सिरतोन मा हास्य व्यंग्य के जमगरहा कवि रिहिन हे । शोषण करइया मन के बखिया उधेड़ के रख देय ।दिखावा अउ अत्याचार करइया मन ला वोहा नीचे लिखाय कविता के माध्यम ले कइस अब्बड़ ललकारथे वोला देखव –


ढोंगी मन माला जपयँ, लमभा तिलक लगायँ।

हरिजन ला छूवय नहीं, चिंगरी मछरी खाय ।।

खटला खोजो मोर बर, ददा बबा सब जाव ।

खेखरी साहीं नहीं, बघनिन साहीं लाव ।।

बघनिन साहीं लाव, बिहाव मैं तब्भे करिहों ।

नई ते जोगी बनके तन मा राख चुपरिहौं ।।

जे गुण्डा के मुँह मा चप्पल मारै फट ला ।

खोजो ददा बबा तुम जा के अइसन खटला ।।


ये कविता के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ के नारी मन के स्वभिमान ला सुग्घर ढंग ले बताइन । संगे संग छत्तीसगढ़िया मन ला साव चेत करिस कि एकदम सिधवा बने ले घलो काम नइ चलय ।अत्याचार करइया मन बर डोमी सांप कस फुफकारे ला घलो पड़थे ।


दलित जी के कविता मा गांव डहर के रहन सहन अउ खान पान के गजब सुग्घर बखान देखे ला मिलथे –


भाजी टोरे बर खेतखार औ बियारा जाये ,

नान नान टूरा टूरी मन धर धर के ।

केनी, मुसकेनी, गंडरु, चरोटा, पथरिया,

मंछरिया भाजी लाय ओली ओली भर के । ।

मछरी मारे ला जायं ढीमर केंवटीन मन,

तरिया औ नदिया मा फांदा धर धर के ।

खोखसी, पढ़ीना, टेंगना, कोतरी, बाम्बी, धरे ,

ढूंटी मा भरत जायं साफ कर कर के । 


दलित जी हा 28 सितंबर 1967 मा अपन नश्वर शरीर ला छोड़ के स्वर्गवासी होगे । 


दलित जी के सुपुत्र आदरणीय गुरुदेव अरुण कुमार निगम जी हा अपन पिता जी के मार्ग ला सुग्घर ढंग ले अपना के साहित्य सेवा करत हवय । संगे संग” छंद के छंद “जइसे साहित्यिक आंदोलन के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ के नवा पीढ़ी के साहित्यकार मन ला छंद सिखा के सुग्घर ढंग ले छंदबद्ध रचना लिखे बर प्रेरित करत हवय। येहा एक साहित्यकार पुत्र द्वारा अपन पिता जी ला सही श्रद्धांजलि हरय।



[ ●ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’,सुरगी,राजनांदगांव, 


मो.79746 66840. ]


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व्यंग्य- गनपति उवाच


व्यंग्य- गनपति उवाच

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सपना म का देखथँव के गनेश विसर्जन होये के पाछू गनपति महराज ह अपन घोसघोस ले मोटाये वाहन मुसवा म बइठे

अपन घर कैलाश कोती जावत हे। कैलाश ह एकाध कोस बाँचे रहिसे तइसने अचानक मूसक ह वापस तुरतुर पल्ला भागे ल धरलिस। गनपति महराज ह अकचकागे के एला काय होगे --- पलटूराम बनत हे---सोजबाय कैलाश कोती नइ जाके जिंहा ले आवत हन तेने कोती जावत हे। गनपति जी ह अरे रुक--अरे रुक कहिते रहिगे फेर मुसवा ह कहाँ रुकने वाला हे? त जइसे बइला गाड़ी वाला ह काँसड़ा ल कसके इँचके गाड़ी ल खड़ा करथे तइसने वोहा मुसुवा के दूनों कान ल जबेड़  के धरिस अउ कस के गुमेटिच त जइसे हमर गाँव शहर म बने सरकारी गौठान ल छोड़के---छोड़के का ,उहाँ कोनो रखइया रइही तब न ?---- बीच सड़क म अघोषित ब्रेकर कस  बइठे गाय-गरुवा मन ल देख के, फटफटी वाला ह कसके ब्रेक मारथे त फटफटी ह चीं चा चूँ करत ठाढ़ हो जथे तइसे मुसवा ह चीं चीं चीं नरियावत खड़ा होगे। गनपति महराज ह लकर-धकर उतरिस अउ डाँटत कहिस-- कइसे --तैं पगला होगे हच का? वोती बर उल्टा फेर कहाँ लेगत हच? मुसवा ह अपन कान ल सहलावत कहिस--हे देवा गुसियावव मत । वो काय हे--- गाँव -शहर ,गली-गली म जिंहाँ-जिहाँ तोला लोगन मन बइठारे रहिन हें उहाँ आनी बानी के खाये ल मिलत रहिसे।पंडाल म एती वोती लोगन मन परसाद ल झोंक के आधा खायँ, आधा बिछयँ  तेला महीं ह पोगरी झोरत रहेंव। संगे संग भक्त मन तोला जेन भोग चढ़ावयँ तेनो ह मोरे अंगत लगत रहिसे काबर के तैं ह तो एको कौंरा चिखत तहाँ ले छोड़ देवत रहे। फल फूल ल तको हाथ नइ लगावत रहे।मोदक ह तको थार-थीर माढ़े रइ जावत रहिसे। बस सब ल मही ह सपेटवँ।देख तेकरे सेती मोर हेल्थ बाढ़गे हे अउ तैं दुबरागे हच।तोर पेट घलो ओसकगे हे। काबर नइ खावत रहे देवा? 

       मूसक के बात ल सुनके गनपति जी हा लम्बा साँस लेके कहिच--मैं अपन मन के दरद ल का बताववँ तोला। वो जतका मोदक चढ़त रहिसे न वो सब मिलावट वाले बेसन के बने राहयँ।घीव तको मिलावट वाले अशुद्ध।एके घंटा म महके ल धर लय। लोगन मन तेल के भाव अब्बड़ बाढ़गे हे कहिके डड़हेल तेल म बना के पूड़ी चढ़ावत रहिन हें। ये मनखे मन ल भला कोन समझावव ,दारू के भाव कतको बाढ़ जवव --ब्लेक म तकों ले के पी लेहीं ।वोकर बर मँहगाई नइ जनावय।बस चिल्लाय भर बर--ओड़हर करे भर बर  मँहगाई हे। मंत्री ल लेके संतरी तक मन के तनखा उपर तनखा---डी ए उपर डीए बाढ़त हे तेला त नइ गोठियावयँ।मुँह सिला जथे। मोर जानबा म मँहगाई डायन ह सिरतो म गरीब मजदूर अउ किसान बस मन ल चूहकथे -बाँकी मन ल बड़े ददा मानथे। हूँह---खीर तको मिलावटी दूध म चूरे सिट्ठा के सिट्ठा। फल-फूल तको रसायन म पके वाला। तोला पता नइये का बइठकी के दिन भुँखाय रहेंव त भोग ग्रहण कर परेंव तेन दिन ले पेट अँइठत हे।मोला कब्ज होगे हे अउ तोला हरियर सूझे हे---चल लहुट अउ जल्दी चल कैलाश कोती।गनपति जी ह थोकुन गुसियावत कहिस।

      जइसे कोनो चमचा ह अपन स्वारथ सिधोय बर नेता के अउ चेला ह गुरु के पालिश मारथे ओइसने मुसवा ह दूनों हाथ ल जोड़के कहिस--- हे स्वामी बुरा झन मानबे। अभी तो  कतेक भक्त मन तोर मूर्ति के विसर्जन नइ करें यें।अभी तीन-चार दिन अउ लागही।वो बेचारा मन के भावना के तको ध्यान रखना रहिसे। तैं तो लकर-धकर लहुट गेच। चल भइ लहुट के उँहचे जाबो अउ जब तक पूरा पूरा विसर्जन नइ हो लेही वापस नइ आवन। रंग रंग के कार्यक्रम तको देखे ल मिलही, हास्य व्यंग्य के नाम म एको ठन फूहड़ कवि सम्मेलन तको सुने ल मिल जही।

मुसवा के बात ल सुनके गनपति जी भन्नागे अउ कहिस---वाह रे मूसक बने गुरुमंतर देवत हस। वोमन महिना भर ले विसर्जन करत रइहीं त मैं सबके ठेका ले हँव का ? वो तो माता श्री ह जबरदस्ती भेज दिच त आगे रहेंव। अउ लोगन के भावना के कद्र करे बर जगा जगा प्राण प्रतिष्ठित होगे रहेंव।रहिस बात कार्यक्रम के त दिन रात उसनिंदा के मारे मोर आँखी झप झप करत हे--माथा फटे बरोबर लागत हे। बइरी मन ल भक्त काहत तोला लाज तको नइ लागय---वो मन मोर भावना के कभू ख्याल रखिन का? रात दिन पोंगा में आनी बानी के गीत लगाके ---कतको झन दारू पीके कइसे नाचत राहयँ।न तो कोनो लाज शरम न तो ककरो लिहाज। अउ वो मेचकी नान नान टूरी मन बिच्छी मार दिच वो वाला गाना म कइसे फूहड़ डाँस करत रहिन हें।अइसने होथे सांस्कृतिक कार्यक्रम ह---का बताववँ -मोर हालत ह तो मूँद ले आँखी तोप ले कान वाले होगे रहिस हे।बइठारिन हे तेन दिन अउ विसर्जन करिन हे तेन दिन देखे हच---कतका ऊँचा अवाज म डीजे ल बजावत रहिन हें। उँकर भडंग-भडंग म मोर हिरदे धक धक धक धक धड़के ल धर लेवत रहिसे।मोर जम्मों नाक कान ह बोजागे हे।भैरा होगेंव तइसे लागत हे। का बताववँ ---सोंड़ म लपेट के जम्मों झन ल कचार देतेंव तइसे लागय।फेर का करबे मोर असली भक्त वो छोटे छोटे लइका मन के मया के मारे कुछु नइ करेंव।

   गनपति महराज के बानी बरन ल देख के मुसवा सकपकागे अउ कहिस--ले चल बइठ भइ। गनपति महराज बइठिस तहाँ ले मूसक ह सीधा कैलाश गुफा के मुँहाटी म आके रुकिस। गनपति महराज ह अपन महतारी ल अवाज लगाइस---माता श्री--माता श्री--माता श्री। वोकर टोंटा ले बने अवाज निकलतिस तब तो सुनतिस माता पार्वती ह। टोंटा ह गुलाल के रिएक्शन म भँसिड़ियागे राहय। माता श्री ह नइ सुनत ये कहिके  वोहा गुफा के भीतर चलदिस। माता पार्वती ह  बइठे मोदक बनावत राहय। गनपति ल देख के खुश होगे अउ दूनों बाँह म पोटार के वोकर माथा ल चूमे ल धरलिस तहाँ ले अपन गोदी म बइठार के पूछिस--अउ सब बने बने न लाला? ओतका ल सुनके गनपति के आँसू टपकगे---कहाँ बने बने माता श्री। देखत नइ अच मोर हाल  बेहाल हे। हाथ गोड़ मनमाड़े खजवावत हे।गला बइठगे हे।

  हाय!हाय!! ये कइसे होगे बेटा? माता पार्वती ह दुलारत पूछिस।

कइसे होगे---कइसे नइ होही ---आज विसर्जन के बेरा कुंटल-कुंटल गुलाल ल उड़वायें हें दुष्ट मन। जम्मों मोर नाक कान अउ सोंड़ म भरगे हे। साँस लेये म तको दिक्कत होवत हे। उपर ले तरिया, नरवा नदिया के गंदा, बजबजावत पानी म मोला मनमाँडे चिभोरे हें। ये देख मोर पूरा शरीर म बड़े-बड़े डोमटा होगे हें जेन मनमाड़े खजवावत हे। कोनों दवई होही त लगा दे--अउ हाँ पेट गडबड़ हे वोकरो दवई दे --गनपति ह कहिस।

  हहो दवई लगा देहूँ---दवई खवा पिया देहूँ फेर तैं हा भक्त मन ल उल्टा पुल्टा काहत काबर हच।उँकर आस्था ल ठेंस पहुँच जही।

 अउ मोर आस्था के का होही महतारी।हम ला कतका ठेंस पहुँचे हे तेला हमी जानबो। मोर पूजा करनेच हे त अपन घरो घरो बइठार के शांति पूर्वक पूजा कर लेतिन।मोर अतेक बड़े बड़े मंदिर बने हे तिंहा जाके पूजा कर लेतिन।उहू नइ हो सकतिच त मानसिक पूजा कर लेतिन।मैं हँसी खुशी पावा मान लेतेंव।  एक दू जगा बइठा लेतीन त का होतिच।गली-गली, पारा-पारा पचासो जगा आडंबर करे के का जरूरत हे।सब चंदा के चक्कर आय तइसे लागथे मोला।दर्शन कम हे अउ प्रदर्शन जादा हे।जेने मेर पाइन तेने मेर--मंडप गाड़ देथें --नाली के तीर म--अद्दर कच्चर तरिया पार म------काला बताववँ मैं-- 

   ओहो बड़ दुख के बात हे लाला फेर का करबे हमन ल भक्त अउ भगवान के रिश्ता ल निभाये ल परथे। भक्त मन बर थोड़ बहुत कष्ट सहे ल परथे--माता ह समझावत अउ शांत करावत कहिस।

  ले ये मैं दवई देवत हँव तेला सरी अंग म चुपर लेबे ---सुखाही तहाँ ले मानसवोर म रगड़-रगड़ के नहाँ के आबे--जम्मों फोड़ा-फुंसी अउ खुजली ह तुरते मिटा जही --अउ एक ठन शीशी म दवई देहूँ तेला एक कप पी लेबे -पेट के जम्मों बीमारी दूर हो जही। अइसे कहिके महामाया ह आँखी ल मूँद के ध्यान धरिस तहाँ ले एक झँउहा गोबर  अउ एक बोतल लाली द्रव हाजिर होगे।

 गनपति ह पूछिस--ए काये माता श्री?

इही मन तो दवई आय ग ---देहा गोबर ये अउ देहा गोमूत्र ये।छत्तीसगढ़ ले मंत्रशक्ति म मँगाय हँव।ले आव गोबर ल चूपर देथँव ।ये ह एकदम खाँटी हे।मुँड़मिंजनी माटी ल मिलाके बेंचे वाला नोहय।अउ एला एक कप तुरते पीले--एकदम ताजा अउ शुद्ध हे ,कुँआ बोरिंग के पानी म माखुर पानी मिलाके बेंचे वाला नोहय।अउ तहाँ ले झटकुन नहाँ के आजा।तोर बर छप्पन भोग बनावत हँव।

      गनपति ह नहाँ के अइस तहाँ ले पेट भर खाके डकारत कहिस---देख माता श्री तैं हा मोर तथाकथित भक्त मन ल बने समझा देबे नहीं ते मैं अगले बरस इहाँ ले गनेश उत्सव टेम म बिल्कुल नइ जाववँ ।भले वोमन ठकठक ले बेजान मूर्ति ल पूजत रइहीं। अउ हाँ तहूँ ह नवरात्रि म चल देथच त मोर बर अबड़े कस मोतीचूर के लाड़ू बनाके राख दे राह। 

माता पार्वती हा हव कहिस।

  तहाँ ले गनपति ह पूछिस--कइसे माता तोर नवरात परब म तको कार्यक्रम होथे का। 

 हाँ होथे ग। गरबा के धूम रहिथे। फेर उहू म अब---

फेर का माता---साफ साफ बता न? गनपति ह पूछिस।

अब गरबा म तको गड़बड़ी होये ल धर लेहे--माता पार्वती ह थोकुन उदास होवत कहिस।

अचानक नींद खुलिस तहाँ ले झकनाके उठ गेंव।घड़ी ल देखेंव त बिहनिया के चार बजत राहय। ये ब्रह्मबेला के सपना के बारे म अउ गनपति के जतका उवाच रहिस हे तेकर बारे म सोचत बइठे हँव।


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़


23 सितम्बर पुण्यतिथि म सुरता// छत्तीसगढ़ी झंडा ल अगास म लहराए खातिर भुइॅंया बनाइस सुशील यदु



 

23 सितम्बर पुण्यतिथि म सुरता//

छत्तीसगढ़ी झंडा ल अगास म लहराए खातिर भुइॅंया बनाइस सुशील यदु

    छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास म जब कभू एकर खातिर संगठन के माध्यम ले जमीनी बुता करइया मन के नाॅंव लिखे जाही त सुशील यदु के नाॅंव ल वोमा सबले आगू लिखे जाही. सन् 1981 म 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' के गठन करे के बाद वोहा जिनगी के आखिरी साँस तक एकर खातिर जबर बुता करीस. आज हमन छत्तीसगढ़ी भाखा-साहित्य के अतका विस्तारित रूप देखथन, लोगन के जुराव देखथन त वोमा ए समिति अउ सुशील यदु के अपन संगी मन संग मिलके करे गे जबर मैदानी बुता के पोठ हाथ हे.

    ए समिति के गठन के पहिली घलो पुरखा साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी खातिर कारज करत रेहे हें, फेर वोहा लेखन, प्रकाशन अउ मंच के माध्यम ले जनमानस म छत्तीसगढ़ी खातिर मया उपजाए के बुता रिहिसे. समिति के माध्यम ले आरुग भाखा-साहित्य खातिर रचनात्मक संगठित बुता 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' ले ही चालू होय हे. एकर पाछू इहाँ छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद जी के संयोजन म 'छत्तीसगढ़ी भासा-साहित्य प्रचार समिति' घलो बनिस. ए ह संयोग आय, मोला ए दूनों समिति संग जुड़े के साथ ही सचिव बनाए गे रिहिसे. ए दूनों समिति के गोष्ठी-बइठका अलग-अलग होवत राहय. छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के गोष्ठी आदि जिहां पुरानी बस्ती के देवबती सोनकर धरमशाला म जादा करके होवय, त छत्तीसगढ़ी भासा-साहित्य प्रचार समिति के गोष्ठी आदि 'छत्तीसगढ़ी सेवक' के कार्यालय म ही जादा होवय. छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के कार्यक्रम आरुग भाखा-साहित्य ऊपर आधारित रचनात्मक किसम के राहय त प्रचार समिति के बेनर म कतकों पइत छत्तीसगढ़ी ल आठवीं अनुसूची म संघारे के संगे-संग अउ अइसने विषय मनला लेके धरना प्रदर्शन के घलो आयोजन हो जावत रिहिसे. 

    महतारी पूना बाई अउ सियान खोरबाहरा राम यदु जी के घर 10 जनवरी 1956 के जनमे सुशील यदु के आमतौर म चिन्हारी 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' के संस्थापक अध्यक्ष के रूप म ही जादा होथे. फेर वो कवि मंच के हास्य कवि के रूप म घलो अपन एक अलगेच चिन्हारी बना लिए रिहिसे. घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचय रे, अल्ला अल्ला हरे हरे, होतेंव महूं कहूं कुकुर, नाम बड़े दरसन छोटे आदि मन तो उंकर मनपसंद कविता रिहिसे. संग म गंभीर रचना कौरव पांडव के परीक्षा अउ सुराजी बीर मन ऊपर लिखे कालजयी रचना मन घलो मंच म जबरदस्त ताली बटोरय. 

    उंकर लिखे कुछ गीत मन तो गजबे च लोकप्रिय घलो होए रिहिसे. 'चंदैनी गोंदा' के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के सुझाए विषय ऊपर लिखे एक गीत तो मोला आज तक गजब निक लागथे-

 

जिनगी पहार होगे रे

सोचे रेहेन फूल होही, 

खांड़ा के धार होगे रे... 

रेती महल बनगे आज बिसवास ह

बेली बंधागे हे कतकों के आस ह

पीरा ह सार होगे रे

जिनगी पहार होगे रे...


    अइसने एक अउ गीत हे, जेकर नॉंव ले उंकर गीत अउ कविता के समिलहा संग्रह छपे हे-


फूल हांसन लागे रे दारि, बगिया झूमरगे

बगिया मा जब चले आये सजनी मोर, मन के मिलौनी मोरे

हरियर आमा रे घन मउरे... 

तोरे पिरित के रंग मा अइसन रंगे हंव

सपना के सुरता दिन में आथे सजन मोरे

हाय रे बलम मोरे, हरियर आमा घन मउरे... 


     सुशील यदु के आकाशवाणी अउ दूरदर्शन ले घलो बेरा-बेरा म कविता परिचर्चा आदि के प्रसारण होवत राहय. उहें वोमन प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र 'नवभारत' म 'लोकरंग' शीर्षक ले सरलग 1993 ले 2002 तक कालम घलो लिखिन. एमा कलाकार अउ साहित्यकार मनके परिचय घलो देके काम करिन. ए बात तो सच आय, हमर इहाँ कतकों अइसन प्रतिभा हें जिनला मिडिया के मंच नइ मिल पाए के सेती लोगन के नजर ले अनजान असन रहे बर पर जाथे. आज के सोशलमीडिया के जमाना म घलो अइसन देखे बर मिल जाथे, त गुनव वो बखत जब मिडिया के अंजोर भारी दुर्लभ रिहिसे, वो बेरा अइसन मंच देना कतेक बड़े बुता रिहिसे.

    सुशील यदु के गीत मन आडियो, विडियो के संगे-संग फिलिम म घलो गाये अउ संघारे गिस. सुशील यदु ह अपन लेखन के रद्दा म आए खातिर अपन महतारी पूना देवी ल प्रारंभिक प्रेरणा बतावय, जबकि गुरु उन बद्रीविशाल यदु 'परमानंद' ल मानय. हमन संग म ही परमानंद जी संग जुड़े रेहेन. पुरखा साहित्यकार हरि ठाकुर जी के उन अपन आप ल सेनापति समझय, तेकरे सेती उंकर अगुवाई म वो बखत चलत छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन के रद्दा म घलो रेंगय. 

    छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के माध्यम ले कतकों अइसन साहित्यकार मनला प्रकाशन के मंच घलो दिए गिस, जेमन किताब छपवाए के स्थिति म नइ रिहिन. मोला हमर गाँव नगरगांव के सूरदास कवि रंगू प्रसाद नामदेव जी के जबर सुरता हे. रंगू प्रसाद जी कुंडलियाँ के सिद्धहस्त कवि रिहिन हें, फेर उन खुद होके किताब छपवाए के स्थिति म नइ रिहिन, अइसन म छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति ह उंकर किताब 'हपट परे तो हर गंगे' छपवाए रिहिसे. अइसने हेमनाथ यदु के व्यक्तित्व अउ कृतित्व, बनफुलवा, पिंवरी लिखे तोर भाग, बगरे मोती, सतनाम के बिरवा आदि आदि अलग अलग रचनाकार मनके रचना ल छपवाए गे रिहिसे. 

    सुशील यदु के अपन खुद के लिखे पांच कृति घलो छपे हे- 1.छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर, 2. लोकरंग भाग-1, 3. लोकरंग भाग-2, 4. घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचय, 5. हरियर आमा घन मउरे.

    छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के माध्यम ले पुरखा साहित्यकार, कलाकार आदि मनके सुरता घलो करे जावय.  समिति के सालाना जलसा म तो उंकर मनके नाम ले सम्मान घलो दिए जावत रिहिसे, फेर उंकर मनके जनम या पुण्यतिथि के बेरा म या वोकर संबंधित महीना म अलग से गोष्ठी आदि के आयोजन करे जावत रिहिसे. 

    पुरखा मनके सुरता करत-करत सुशील यदु घलो 23 सितम्बर 2017 के रतिहा करीब 9.30 बजे सुरता के संसार म समागे. आज उंकर बिदागरी तिथि म उंकरेच ए गीत संग उंकर सुरता-जोहार-


मोर दियना के बाती बरत रहिबे ना

चारों खूंट ला अंजोरी करत रहिबे ना... 

पीरा हीरा के बाती बनायेंव

मया के आंसू के तेल भरायेंव

तन के पछीना के लेयेंव अचमन

मन अउ काया के फूल चघायेंव

दुखिया के पीरा हरत रहिबे ना

मोर दियना के बाती बरत रहिबे ना... 

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811