Sunday, 4 December 2022

छंद गीत बहार - समीक्षा



 छंद गीत बहार  - समीक्षा


गीत- कविता ,साहित्य मन हमर परिवेश के, रीति रिवाज, परब- तिहार, रहन सहन, खेती किसानी अउ एमन मासंयोजित संसाधन, श्रम के उपयोगिता, अभाव , अउ  उपलब्धता मा रचे -बसे, या कहन जुड़े होथे| 

                      गीत कविता मन 

हमर संस्कृति- परंपरा के संवाहक तो होबे करथे संगे मा हमर मानवीय संवेदना के संवाहक घलव होथे, जउन हर विचार, परिस्थिति ले उपजे, उदगरे शब्द ध्वनि मन, इंद्री ल रोमांचित अउ आनंदित करथे|वइसने आदरणीय श्री द्वारिका प्रसाद लहरे 'मौज' जी के कृति मा समाए गीत मन पाठक के अंदर एक सुखद अहसास कराहीं|


छंद गीत बहार मा जिंनगी के विविध रंग मन के शुद्ध भावनात्मक चित्रण करें हवँय |अउ  हमर अंचल के साहित्य बर एक नवा रसदा तय करही, स्वस्थ परंपरा मा गीत के सृजन के एक नवा परिवेश पोषित होही | ए गीत मन के गायन करे जावत हे|

 गीत के रचना करत समय छंद आ जाना एक संयोग आए, पर छंद बद्ध गीत के रचना करना कठिन काम हें, ए विशेष बात होथे | गीत के ढाँचा मा स्थायी अउ दुहराव पद होथे गीत दू तीन पद ले बने होथे,जब कि छंद मा मात्रा होथे और कोनो छंद हर रिपिट नइ होय छंद के पद घलो बनेच रहिथे | छंद गीत हर,छंद के गहन ज्ञान अउ काव्य कौशल के बिना सृजन संभव नइ हे| 

      मोर जानकारी मां छंद गीत बहार छत्तीसगढ़ी भाषा मा छंदगीत के पहली किताब के स्थान पावत हे|

ए संग्रह मा गुरु महिमा,माटी वंदन,महतारी महिमा,भक्ति भाव, प्रकृति चित्रण,घर परिवार ले जुड़े गीत,बेटी बीदा गीत,राष्ट्रीय भावना के गीत,माता के गीत, परब मन के गीत,सामाजिक समता खातिर विषय म सुग्घर अउ भावप्रद गीत हवँय|


 काव्य के शास्त्रीय 

मात्रिक छंद मन के अनुरुप पद मन गठित होय हे|

गेयता/ गायन -  विधान सम्मत होय के कारण विविध छंद राग,लय बद्ध हे, छत्तीसगढ़ी तर्ज (फोंक) म घलो गाय जा सकथे|


 *भाषा शैली*- सरल सहज बोधगम्य हे| छत्तीसगढ़िया पन के छाप लिए मौलिकता ले परिपूर्ण हे|


व्याकरण संबंधी- छंदगीत मन अलंकार, विविध रस मन के  अनुभूति देवत हे|

ए कृति मां अलंकारिक शब्द मन ला बहुत बढ़िया संजोय हें  -


अनुप्रास- 


पाँव परत हँव दाई मँय हा, निसदिन गुण ला गावँव|

सात जनम बर बेटा बनके, तोर कोंख ले आवँव||


महर -महर ममहाय




 *उपमा* -

उलहा पाना जइसन जोही, मन ला तँय डोलाये|

रूप गजब हे गोरी तोरे ,चंदा घलो लजाये||


सार छंद गीत


पान खाय कस होंठ रचे हे,छलके मँदरस सागर|

करिया चूँदी कनिहा लोरय, छाये जइसे बादर ||


 रूपक-

रूप लागे फूल गोंदा फूल गोंदॎ फूल|

कान मा लोरै दिवानी झूमका के झूल||


रात रानी कस गियाँ ओ, अंग हा ममहाय|

तोर ममहाई पिरोही, मोर मन ला भाय|| 


 के बहुत बढ़िया प्रयोग होय हे|


ध्वन्यात्मकता  बहुत सुग्घर अउ प्रभावी प्रयोग करे हें-


पातर-पातर कनिहा गोरी, अब्बड़ लिच लिच डोले ओ|

खनर खनर चुरी अउ कँगना, भेद मया के खोले ओ||



मटकत कुलकत हाँसत गावत, बरसा रानी आये हे|



आंचलिक भाषा के पुट मन निखालस हें,फबीत के,उबकत अउ जनावत हें,लचकदार, पटंतर शैली, सवाल जवॎब के लहजा समाहित हें,अउ आरूग प्रयोग हे|

 वइसे तो द्वारिका जी हर श्रृंगार के कवि हें, इकर रचना संसार मा श्रृंगार के प्रधानता अउ बहुलता ए संग्रह मा देखे बर मिलत हे|

संयोग वियोग दुनो मा बढ़िया लिखे हे| 

 *संयोग श्रृंगार-*  आँखी हावय कजरारी ओ, मारे चोखी बान|

लाली लाली होंठ दिखत हे ,खायो बीरो पान||



संयोग सिंगार तो सबे लिख लेथे पर वियोग म कलम चलना सब के बस मा नइ राहय| पर ए म कवि के विशेष भाव देखे बर मिलथे|


 *वियोग श्रृंगार-* 


मोर संग तँय माया बढ़ा के, काबर नाता टोरे ओ|

कलपत हावय जिवँरा भारी, कइसे महूरा घोरे वो||


 *ए कृति मा जोराय जोरन कस छंद मन मा* 

दोहा छंद गीत ,सार छंद गीत सरसी छद गीत, आल्हा छंद गीत उल्लाला छंद गीत, ताटंक छंदगीत, बरवै छंद गीत, कुकुभ छंद गीत, लावणी छंद गीत, विष्णुपद छंद गीत, मानव छंद गीत, प्रदीप छद गीत, रास छंद गीत, रूपमाला छंद गीत ,गीतिका छंद गीत ले सृजित हें / रचित हें|


सरसी छद गीत बसंत ऋतु / *मौसम /प्रकृति के मनोहारी चित्रण हे* --


रितु बसंत दे बर आये हे, जन-जन ला उपहार|

हँसी-खुशी दिन कटही अब, सुख पाही संसार||

 देख कोइली कुहक कुहक के, गावय सुघ्घर गीत|

 मन हर्षावय गुत्तुर बोली, मन ला लेवल जीत ||

पिंवरा पिंवरा आमा मउरे, लहकय  झूमय डार||


 *माटी के महक, देश भक्ति सुगंध* देखे बर मिलथे|


इहाँ चीज हे चोक्खा- चोक्खा, सब हे बड़ उपयोगी जी|

अपन देश के गुण ला गावत,

बन जावव उपभोगी जी||


 भारत राहय सबले आगू ,दुनिया ला दिखलाना हे|

छोड़व जम्मो चीज विदेशी, देसी ला अपनाना हे||

     

 *किताब के उपयोगिता* - 


द्वारिका प्रसाद लहरें जी के गीत मन, छत्तीसगढ़ी साहित्य के युवा कवि -गीतकार मन ला, छत्तीसगढ़ के गायक -गायिका , नव कलमकार गीतकार मन ला मार्ग दिखाही |छत्तीसगढ़ी फिल्म संगीत बर बहुत उपयोगी होही|


छंद गीत बहार हा आदरणीय डी पी लहरें जी के पोगरी स्वामीत्व आबे करय ये मा कोनो दू मत के बाते नइ हे फेर ए कृति  हर छत्तीसगढ़ी भाषा ल हमर बोली ल ,छत्तीसगढ़ी साहित्य ल समृद्धि करही | छत्तीसगढ़ी साहित्य के कोठी ल भरत हे|

सुकवि ,गीतकार आदरणीय द्वारिका प्रसाद लहरे जी ला बहुत- बहुत शुभकामना अउ बधाई देवत हवँव उंकर कलम सतत चलय अउ बढ़िया -बढ़िया रचना पढ़े बर मिलय|


कृति -छंद गीत बहार

 द्वारिका प्रसाद लहरे 'मौज'


प्रकाशन - तनवी पब्लिकेशन जयपुर राजस्थान|


विशेष - समग्र शिक्षा वर्ष 2021-22 खातिर  छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा माध्यमिक स्तर के विद्यालय मन के पुस्तकालय बर 500 नग क्रय कर के वितरित हो चुके हे|


समीक्षक-

अश्वनी कोसरे रहँगिया, कवर्धा कबीरधाम छत्तीसगढ़-491995


संसो// शहर के पारा म लहुटत हमर गाँव

 


संसो//

शहर के पारा म लहुटत हमर गाँव


आजा रे आजा गाँव म 

सरग अस सुग्घर ठॉंव म

चंदा के हाॅंसी देखबे चंदैनी के ठिठोली

सुरूज ह इहें बोलथे सुख के रे बोली

बादर ह जस पाथे इहेंच के नॉव म

आजा रे आजा गाँव म... 


    शहरी जिनगी के चींव-चॉंव, धुर्रा-धुंगिया अउ नाली मन के बस्सई ले असकटा के मैं अपन गाँव के सुरता करत ए गीत ल लिखे के उदिम करे रेहेंव. तब ए सपना म घलो नइ गुने रेहेंव के उही मोर सरग अस गाँव ह घलो कभू अइसने शहर के हिस्सा बन जाही! 


    कक्षा आठवीं पढ़े खातिर मैं बछर 1973-74 म रायपुर आए रेहेंव. तब ए शहर ह अपन डेना ल जादा लमा नइ पाए रिहिसे. तब हमन अभी के पुरानी बस्ती थाना के आगू म राहत रेहेन. उहाँ ले थोरके आगू लाखे नगर चौक तक बढ़े तहाँ ले खारून नदिया महादेव घाट के जावत ले चारों मुड़ा खेत-खार दिखत राहय. वइसने एती महराजबंद तरिया ले उतरे त चारों मुड़ा खेती-किसानी म भीड़े लोगन पाते. दशहरा बखत रावनभाॅंठा जावन त इहाँ उहाँ ले लामे खेत के मेड़ो म रेंगत जावन. 


    वइसने टिकरापारा के पूछी खूंदते नजर भर खेतेच खेत दिखय. तब बोरिया, कांदूल, डूंडा आदि गाँव मन गजब दुरिहा जनावय. वोती अकेल्ला दुकेल्ला जाय म डरभुतहा बानी के जनावय. फेर अब ए सब गाँव मन रायपुर के अलग-अलग वार्ड अउ पारा के रूप म लहुटत हावंय. अइसने रायपुर के चारों मुड़ा के गाँव मन घलो ए शहर के समुंदर म समागे हावंय. एकरे संग गाँव-गॅंवई के सहजता, सरलता, संस्कार अउ परंपरा मन घलो शहरी आडंबर अउ तामझाम के रंग म रंगत दिखे लागे हे.


     जेन किसान मन खेत म नॉंगर जोतत, बियारा म धान मिंजत अउ बारी-बखरी म साग-भाजी बोवत या टोरत दिख जावय, वोमन अब शहर के कोनो दूकान या फेक्ट्री म मजूरी-हमाली करत दिखथे. कोनो मन रिक्शा ठेला पेलत या कचरा के ढेर म प्लास्टिक के पन्नी झिल्ली बीनत. 


    बहुत अभियावन नजारा देखब म आथे. लोगन अपन सोना उगलत धनहा मनला बेच-बेच के बड़का-बड़का सीमेंट के घर बनवा डारिन. फेर कुछ बछर के  छकल-बकल खवई-पियई म सबो ल गंवा डारिन. आज उन छोटे छोटे मजूरी-हमाली के भरोसा दू जुवर के पेट ल पोंसे पावत हें.


    गाँव मन के अइसन विनाश लीला करे के पाछू घलो शहर के रकत पीये के टकर ह छूटत नइए, भलुक दिन के दिन अउ बढ़ोत्तरी देखे म आवत हे. अभी इहाँ के स्मार्ट सिटी के जेन नक्शा आए हे, ए ह मोर अपन खुद के गाँव नगरगाँव, मोहदी, बरबंदा आदि, सबला अपन सपेटा म कब्जियावत हे. मैं कभू लोगन ल बड़ा गरब के साथ बतावौं, के  मोर गाँव के घर ह हमर रायपुर के घर ले ठउका 29 किमी के दुरिहा म हे. फेर अब ए नवा स्मार्ट सिटी के योजना पूरे के बाद हमर गाँव ह रायपुर के ए पारा ले वो पारा हो जाही.


    रायपुर के सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र के चारों मुड़ा होवत फैलाव ह हमन ल ए बात के पहिली च ले आरो कराए असन करत रिहिसे. काबर ते औद्योगिक क्षेत्र के प्रदूषण धुंगिया ह हमरो गाँव के वातावरण ल करिया डारत रिहिसे. अब स्मार्ट सिटी के नवा नक्शा ल देखे के बाद लागत हे- गाँव के सामाजिक सांस्कृतिक चिन्हारी सबो ह शहर के गंदगी भरे पारा अउ कोलकी-संगसी के रूप म लहुट जाही.


-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


Friday, 2 December 2022

छत्तीसगढ़ी भाषा म आने भाषा के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत हवय ?

 छत्तीसगढ़ी भाषा म आने भाषा के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत हवय ?

    *ये संबंध म आदरणीय निगम सर जी द्वारा प्रस्तुत आलेख खूब महत्वपूर्ण,संहराए लाईक अउ छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य,व्याकरण, के संबंध म जब भी चर्चा होही,उदाहरण देहे बर सहेज के राखे लाईक हवय*

     *छत्तीसगढ़ी भाषा म लिखे बर कतेक वर्णमाला होना चाही ?*

     *ये विषय के विमर्श म पिछले बार खूब विचार-मंथन होए रहिस, तेमा सर्वसम्मति से 52 वर्णमाला मान्य करे गए रहिस*

    *जब हमन छत्तीसगढ़ी भाखा बोलथन, तब हिन्दी भाषा के 52 वर्णमाला के उच्चारण खच्चित रूप से होबेच करथे | तव 52 वर्णमाला के उच्चारण ल लिखत बेरा कुछ वर्णमाला ल नइ लिखबो,तव बोलबो-गोठियाबो कईसे ? तब तो शब्द मन अधूरा हो जाही | 52 वर्णमाला से कुछ वर्णमाला ल काट देबो,तव छत्तीसगढ़ी भाषा के कई ठन महत्वपूर्ण शब्द मन कट जाही ! छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य ह विकलांग हो जाही! कनवा-खोरवा हो जाही ! तेकरे सेती मैं हाथ जोड़ के विनती करत हौं -"हिन्दी वर्णमाला म  बऊरे जाथे,तऊन सब 52 वर्णमाला के उपयोग लिखे-बोले बर खच्चित जरूरी हवय*

    *हां, एक बात बज्र गठिया के धरे लाईक हवय  - "हिन्दी के 52 वर्णमाला मन ल बऊरे के मतलब ये हरगिज नइ होय के छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी भाषा म अंतर होबेच नइ करय, हर हिन्दी शब्द ल जस के तस लिख दे ! तब तो खूब अलहन हो जाही ! "छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य काला कहिबो?*


     *सार बात तो विशेष रूप से खूब चेत करे बर परही के -हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दुनो सहोदर बहिनी होय के बावजूद दुनो के रूप-रंग, चाल-ढाल,  व्याकरण के दृष्टि से लिंग,वचन,कारक रचना के दृष्टि से,स्वरूप,संस्कृति,रहन-सहन,खान-पान, अउ मूल तासीर के दृष्टि से खूब अंतर हवय*

    *हिन्दी भाषा बड़े बहिनी आय, छत्तीसगढ़ी भाषा सग्गे छोटे बहिनी आय*

     *हिन्दी भाषा म साहित्य लेखन-वाचन अउ छत्तीसगढ़ी भाषा म साहित्य लेखन-वाचन के समय-काल के दृष्टि से भी हिन्दी भाषा बड़े बहिनी आय, जबकि छत्तीसगढ़ी भाषा छोटे बहिनी आय*

     *पैदाईशी काल गणना म  हिन्दी बड़े बहिनी आय, छत्तीसगढ़ी छोटे बहिनी आय*

   * *प्रयोग कर्ता के क्षेत्रफल अउ जनसंख्या के अनुपात म घलो हिन्दी बड़े बहिनी आय | छत्तीसगढ़ी छोटे बहिनी आय*

    *सबसे खास बात ये हवय-छत्तीसगढ़ी संस्कृति भाषा ह हिन्दी के संगे-संग चलथे,तभो ले छत्तीसगढ़ी भाषा के मूल तासीर म अंतर होथे | जब हम ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा म लिखथन, तव एक्के नजर पड़ते ही ये बात स्पष्ट हो जाथे -एहा छत्तीसगढ़ी भाषा म लिखाय हवय*

    *ये साहित्य ह हिन्दी भाषा म लिखाय हवय*

     *जैसे कोनो दू झन जुड़वा बहिनी होथे | ऊंकर रूप-रंग, आकार, डील-डौल, कद-काठी, आंखी के बनावट, चुंदी के साईज, एक्के जैसे रेशमी-चमकीली या घुंघरालू चुंदी होय के बावजूद एक बहिनी ल अम्मठ (खट्टा) पसंद रहिथे,तव दूसर बहिनी ला मीठा पसंद रहिथे | एक बहिनी ल नमकीन पसंद रहिथे,तव दूसर बहिनी ल चुरपुर (चटपटा) पसंद रहिथे | एक बहिनी ल नीला,पीलाअउ हल्का रंग पसंद रहिथे,दूसर बहिनी ला काला,लाल,भड़कीला,गहरा रंग पसंद रहिथे | एक बहिनी वाचाल रहिथे, तव दूसर बहिनी मितभाषी होथे | एक बहिनी ला बाग-बगीचा,हाट-बाजार जाना पसंद रहिथे, तव दूसर बहिनी ला अपन घर -अंगना ही पसंद रहिथे*

     *ठीक अईसनेच हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दुनो सहोदर बहिनी होय के बावजूद इंकर रूप-रंग,चाल-ढाल,स्वरूप व्याकरण के दृष्टि से, आकार-प्रकार म  बहुंतेच अंतर होथे*

     *हिन्दी उ छत्तीसगढ़ी के वर्णमाला अउ लिपि एक्के हवय, सोच के छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य म हिन्दी भाषा के जम्मो शब्द ल जस के तस लिख देहे ले वोहा छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य म हरगिज मान्य नइ होही, बल्कि वर्णशंकर स्वरूप माने जाही! तब लिखैया साहित्यकार ल दुख लागही, ओकर सब  मेहनत ह "आधा तीतर-आधा बटेर सहीं अउ गुड़-गोबर हो जाही!*

     *छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य म साहित्य सिरजन करे बर छत्तीसगढ़ी ठेठ बोल-चाल के शब्द मन ल खूब पूछताज करके, दादी-नानी, बड़े ददा-बड़े दाई, कका-काकी के बोलचाल के शब्द मन ल खोजबीन करके वो शब्द मन के शोधपरक उपयोग करना जरूरी हवय, तभे हमर छत्तीसगढ़ भाषा-साहित्य ह अपन नवा वजूद बनाके देश-दुनिया म मान-सम्मान पाही*

     *एक महत्वपूर्ण प्रश्न हवय-"छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य म आने भाषा के शब्द मन ल अपभ्रंश के रूप म कतेक बऊरे जाना चाही ?*

     *ये महत्वपूर्ण सवाल के उत्तर मोर मति अनुसार -छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य म आने भाषा के शब्द ल तभे उपयोग करे जाय,जब वो शब्द ह हमर छत्तीसगढ़ के रीति-रिवाज,खान-पान, रूप-रंग, रहन-सहन म तालमेल बना सकै | अईसे हरगिज नइ होना चाही-हिन्दी के 52 वर्णमाला मन ल छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य बर स्वीकार करे जा चुके हवय, तव हर हिन्दी शब्द ला छत्तीसगढ़ी साहित्यिक म जबरन ठूंस-ठूंस के भर देही, तब वो साहित्य ल पढ़े म छत्तीसगढ़ी भाषा-बोली के नामोनिषान नइ रहिही ! तब ओ लेख-कविता ला छत्तीसगढ़ी के दर्जा कईसे देबो ? काबर देबो ? जउन रचना म छत्तीसगढ़ी भाखा-बोली के तासीर नइ मिलही, तेला छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य हरगिज मान्य नइ होही*

     *छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य म हिन्दी के अलावा अंग्रेजी,उर्दू, संस्कृत,अरबी,फारसी,असमिया,अवधी,बुंदेलखंडी,भोजपुरी जम्मो भाषा के शब्द ल जस के तस लिखे जाय, जऊन बोलचाल म अईसे लगथे के एतो छत्तीसगढ़ी भाषा आय, लेकिन आने भाषा के अपभ्रंश शब्द मन ल छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य म समाहित करे के एक मतलब नइ होना चाही के छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य बर ओ शब्द मन नुकसान पहुंचाही !*

      * *हम छत्तीसगढ़िया भाई-बहिनी मन बंगाली,बिहारी,मद्रासी,ओड़ीया, तेलगू, मराठी मनखे आथें, "तव एक लोटा पानी अउ चार पहर रात बीताए बर खली-खोर के आंट म रहे बर दे देथन | एकर मतलब ए हरगिज नही होना चाही के जऊन बाहरी मनखे ल अलकर-सांकर म चार पहर रात बीताए बर गली-खोर के आंट ल दे देथन, तऊने मनखे धीरे-धीरे चापलूसी करके हुसियारी पूर्वक हमर घर म कब्जा करके हमी ल हमर घर से बाहिर निकाल देही !!*

     *ठीक अईसनेच हमर छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य म घलो आने भाषा के अपभ्रंश शब्द मन ल खूब सोच-विचार के शोध करके ओही शब्द मन ल शामिल करे जाय,जऊन हमर छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ल विटामिन प्रोटीन सहीं फायदा पहुंचाही, आगे चल के छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ला नुकसान झन पहुंचाही,वईसने शब्द ल शामिल करे जाय-जऊन छत्तीसगढ़ी दूध सहीं भाषा म मिस्री बन के घुलमिल जाय*

    *हमर छत्तीसगढ़ी लोक कला,लोक गीत, लोक गाथा, लोक नृत्य मन देस-विदेश म खूब मान-सम्मान पावत हवय, काबर के लोककला संस्कृति के प्रस्तुति ह देस-दुनिया म वाचिक परंपरा के द्वारा दुनिया के लोगन ल प्रभावित करथे*

    *लेकिन हमर छत्तीसगढ़ साहित्य ह, छत्तीसगढ़ी लोक कला जईसे सम्मान अभी तक प्राप्त नइ कर पाए हवय! एकर सब ले बड़े कारन हवय -" छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ह लिखित रूप म अपन मौलिक स्वरूप म नइ दिखत हवय ! छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ह अपन मौलिक अस्तित्व के रूप म खास पहचान नइ बनाए हवय !*

     *तेकरे सेती छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ल देस-दुनिया म अलग मान-सम्मान पाए बर ठेठ छत्तीसगढ़ी शब्द द्वारा ही साहित्य सिरजन करना खच्चित जरूरी हवय |*

     *छत्तीसगढ़ राज्य स्थापित होए के बाद ये 22 बच्छर म छत्तीसगढ़ी साहित्य के जम्मो विधा म खूब साहित्य सिरजन होवत हवय, तव मोला पक्का विश्वास हवय- अब छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ह घलो छत्तीसगढ़ी लोककला संस्कृति सहीं जल्दी मान-सम्मान पाही | तभे छत्तीसगढ़ी भाषा ल भारतीय संविधान के आठवींअनुसूची म जघा अपने-आप पा जाही*


   *जै छत्तीसगढ़*

    *जै छत्तीसगढ़ी*


दिनांक-02.12.2022


आपके अपनेच संगवारी

*गया प्रसाद साहू*

    "रतनपुरिहा"

मुकाम व पोस्ट करगी रोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)

पिन कोड -495113

Thursday, 1 December 2022

छत्तीसगढ राजभाषा आयोग ले मोर अपेक्षा //*

 *//छत्तीसगढ राजभाषा आयोग ले मोर अपेक्षा //*

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     विगत चार दिन ले छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर साहित्यिक वाट्सएप पटल म बहुत महत्वपूर्ण विषय -" छत्तीसगढ राजभाषा आयोग ले मोर अपेक्षा" के संबंध म विमर्श जारी हवय,ये विमर्श म कई साहित्यकार मन खूब सुग्घर अउ उपयोगी विचार लिख के पटल म भेजीन हवंय,हिरदय ले साधुवाद |

      *सब ले पहिली -"छत्तीसगढ़ या छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग" के संबंध म एक निष्कर्ष तय करना जरूरी हवय | "छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग कहना सही हवय ? " के  "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग कहना सहीं हवय ?" कोई भी शब्द के हरेक मात्रा के खूब महत्व होथे,एक मात्रा गड़बड़ होथे,तौ अर्थ के अनर्थ हो जाथे,कभी-कभी तो शब्द के अर्थ म जमीन-आसमान के अंतर हो जाथे, जैसे :- कोटा शब्द के "ओ"  मात्रा के बजाय "आ" लिखा जाथे, तव "काटा" हो जाथे ! जैसे:-- हिन्दी शब्द के "दी" के बजाय "द" लिख देहे ले "हिन्द" हो जाथे, अर्थात भाषा ला व्यक्त नहीं करके "स्थान/देश" ला परिभाषित करथे | तईसनेच "छत्तीसगढ़ी" शब्द के "ढ़ी" के बजाय "ढ़" लिख देहे ले "छत्तीसगढ़" हो जाथे, अर्थात "भाषा" ला व्यक्त नहीं करके "स्थान/राज्य" ला परिभाषित करथे*

     *तेकरे सेती मोर मति अनुसार -छत्तीसगढ़ राजभाषा नहीं, बल्कि "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग ही होना चाही | कोनो भी मनखे या स्थान के नाम म एक मात्रा के अंतर या एक डाट ...के अंतर होए ले गूगल के सर्वर ह स्वीकार हरगिज  नइ करै या फिर "छत्तीसगढ़ के राजभाषा आयोग (करण कारक "के" प्रयोग ) होना चाही* |

      *सब से महत्वपूर्ण बात हवय- गूगल के सर्वर म "छत्तीसगढ़ भाषा" ला सर्च करबो,तव का दिखाई देही ? हरगिज नहीं, जबकि "छत्तीसगढ़ी राजभाषा" सर्च करबो,तब खच्चित दिखाई देही,हालाकि गूगल सर्वर म कोई भी बात ला साफ्टवेयर इंजीनियर,प्रोग्रामर या फिर जानकार मनखे ही अपलोड करथैं,तव सहीं अपलोड होना चाही*

       *छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग कहे म सरगुजिहा,बस्तरिहा भाई मन सहमत होहीं के नहीं ? अईसन समस्या नहीं हवय | काबर के रायगढ़ से ले के राजनांदगांव,अउ सरगुजा से ले के बस्तर तक हम छत्तीसगढ़िया भाई मन एक हवन*

     *जैसे- राष्ट्र भाषा हिन्दी के सहयोगी उपभाषा-बघेली, बुंदेलखंडी,अवधी,ब्रज भाषा हवंय,तईसनेच "राजभाषा छत्तीसगढ़ी" के सहयोगी -कुडुक,सादरी ,गोंडी,हल्बी ला पूरा सम्मान सदैव मिलही*

      *२८ नवंबर/२००७ के दिन "छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग संबंधी विधेयक सर्वसम्मति से पारित होईस,तब से ले के छत्तीसगढ़ी साहित्य के हर विधा म लेखन अउ प्रकाशन म तेजी आए हवय,साथ ही उच्च स्तरीय साहित्य सृजन होवत हवय*

    *छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के उद्देश्य :- १. राजभाषा ल संविधान के ८वीं अनुसूची म शामिल करवाना | २. छत्तीसगढ़ी भाषा ल राज-काज के भाषा के रूप में उपयोग मे लाना, ३. त्रिभाषायी भाषा के रूप म शामिल करवाना, इंकर अलावा "माई कोठी" अउ"बीजहा" योजना घलो संहराए लाईक हवंय*

     * *छत्तीसगढ़ राजभाषा  आयोग के उद्देश्य/लक्ष्य ह तभे सफल होही,जब सरकार ह अन्य महत्वपूर्ण विभाग के क्रियान्वयन बर जैसे करोड़ों, अरबों-खरबों रूपीया के बजट  आबंटित करथें, तईसनेच भरपूर बजट स्वीकृत करही,लेकिन साहित्य,कला, संस्कृति के उन्नयन अउ विकास बर सरकारी बजट "ऊंट के मुंह में जीरा के समान रहिथै,अर्थात "तैं खड़े रह,मैं आवत हौं" कथन चरितार्थ होथे,तऊन बहुत दुखद बात आय*! 

     *भाषा, साहित्य, संस्कृति के संरक्षण अउ संवर्धन बर सरकार ला अन्य अति आवश्यक सेवा विभाग के भावना से काम करना चाही | भाषा, साहित्य,कला, संस्कृति के विकास होही,तब राज्य ह स्वयं विकसित अउ गौरवान्वित होही | प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर जी ह छत्तीसगढ के साहित्य,कला, संस्कृति ला दुनिया के कई देश म प्रस्तुति दे के लोकप्रिय अउ गौरवान्वित बनाईस, पद्मश्री स्व. देवदास बंजारे के पंथी नृत्य, पद्मविभूषण डाक्टर तीजन बाई के पंडवानी गायन हा दुनिया भर में खूब लोकप्रिय होईस,ढोला-मारू,लोरिक-चंदा,भरथरी,कर्मा,ददरिया,सुवा नृत्य ह देश-विदेश म खूब लोकप्रिय हवय*

      *तईसनेच छत्तीसगढ़ी साहित्य के देश-विदेश म एक विशिष्ट पहचान होना चाही, लोकप्रिय होना चाही,तब "छत्तीसगढ़ी राजभाषा ह संविधान के 8वीं अनुसूची म स्वमेव जघा बना लेही | छत्तीसगढ़ी साहित्य बर लिपि के समस्या बिल्कुल नहीं है,साथ ही  उल्लेखनीय विशिष्ट साहित्य सृजन होवत जाही,तब मानकीकरण भी स्वमेव होवत जाही*

      *एक महत्वपूर्ण प्रयास करना जरूरी हवय-छत्तीसगढ म जत्तेक कम्प्यूटर,लेपटाप, मोबाईल उपयोग म लाए जाथे,ऊंकर बिक्री के पहिली से ही साफ्टवेयर म छत्तीसगढ़ी डिक्शनरी,व्याकरण,हाना इत्यादि अपलोड कर देना चाही,एकर से छत्तीसगढ़ी साहित्य के सृजन अउ बोल-चाल म आश्चर्यजनक ढंग से सुधार होही,साथ ही कम्प्यूटर,लेपटाप, मोबाईल म छत्तीसगढ़ी भाषा म टाईप करे से डिफाल्ट हिन्दी शब्द स्वमेव आने-ताने टाईप हो जाथे,तऊन समस्या से निजात मिल जाही*

     *एक अउ महत्वपूर्ण सुझाव देना चाहत हौं - छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष, सदस्य के नियुक्ति दलगत राजनीति से पृथक होना चाही |  सिर्फ ०२ सदस्य "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग म नियुक्त करें जाथे,तऊन संख्या ला बढ़ा के हर जिला म एक सदस्य के नियुक्ति होना चाही,तब  २८ जिला बर नियुक्त सदस्य मन अपन-अपन जिला के साहित्यकार लोककलाकार के सर्वांगीण विकास बर समर्पित भावना से काम करहीं,तब "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग" के कामकाज हा सफल होही*

    *अन्य आयोग,मंडल, बोर्ड में सत्ता पार्टी के ब्यक्ति ला नियुक्त कर देथैं,जबकि साहित्य,कला, संस्कृति के उत्थान बर दलगत राजनीति से हट के योग्य व्यक्ति ला नियुक्त करना चाही*

    *साहित्यकार, लोककलाकार के आर्थिक सुधार करे बर पर्याप्त बजट स्वीकृत करना चाही, प्राथमिक, माध्यमिक कक्षा में मातृभाषा (दूध के बोली) छत्तीसगढ़ी माध्यम से ही पढ़ाई होना चाही, शिक्षक छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य में पारंगत होना चाही | अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में भी एक विषय छत्तीसगढ़ी अनिवार्य होना चाही |साहित्यकार लोककलाकार के उत्थान बर कल्याणकारी योजना जैसे:- बीमारी, दुर्घटना, मृत्यु के स्थिति में तत्काल आर्थिक सहायता मुहैया कराना चाही, साहित्यकार लोककलाकार ला यथायोग्य रोजगार के साथ ही पेंशन सुविधा उपलब्ध कराना चाही*

       *छत्तीसगढ़ी भाषा में बोलचाल शासकीय,अर्धशासकीय,निजी संस्थान के कार्यालय में अनिवार्य करना चाही | जैसे :- कोई उड़िया,बंगाली,गुजराती,मराठी, राजस्थानी,मलयालम,तेलगू,कन्नड़,तमिल भाषी लोगन अपन राज्य के लोगन से मातृभाषा में  ही बात करथैं,तईसने हम सब छत्तीसगढ़िया ला हाट-बाजार,बस स्टेंड, रेलवे स्टेशन,शापिंग माल,कस्बा,शहर में अपन भाषायी मनखे संग सिर्फ छत्तीसगढ़ी में ही बात करना चाही,तभे छत्तीसगढ़ी भाषा ह जन-जन के भाषा साबित होही*

      *छत्तीसगढ राजभाषा आयोग के गठन होए लगभग साढ़े तेरह बच्छर हो गए हवय,लेकिन अपेक्षित उपलब्धि बहुत कम नजर आवत हवय | अभी हाल में ही छत्तीसगढ के कई मंडल, बोर्ड,आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य मन के नियुक्ति करे गईस हवय, लेकिन छत्तीसगढ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष, सदस्य के नियुक्ति करे बर का दिक्कत होवत हे ? समझ से परे हवय ? यथाशीघ्र योग्य व्यक्ति ला नियुक्त करना चाही*

      *आखिर म भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के लिखे दोहा के उल्लेख करना चाहत हौं :-*


*निज भाषा उन्नति अहै*

*सब उन्नति को मूल*

*बिन निज भाषा ज्ञान के*

*मिटत न हिय की सूल*


(सर्वाधिकार सुरक्षित)

दिनांक-२९.०७.२१


*गया प्रसाद साहू*

  "रतनपुरिहा"

(कवि, लेखक, गीतकार एवं गायक)

मुकाम व पोस्ट-करगी रोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)


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छत्तीसगढ़ी म 52 आखर

छत्तीसगढ़ी म 52 आखर


 छत्तीसगढ़ी भाषा म बावन अक्षर ल बउरत हन , जब बउरते हन तो ओला ओकर मूल रूप म ही स्वीकारन , ओला जबरदस्ती छत्तीसगढ़ी के नाँव म तोड़ मरोड़ के लिखबो वहू सही नइये ,भलुक एकर ले हमर हिनता होही। 

  कोनो भी भाखा के महत्ता तभे हे जब ओकर बउरने वाला ल ओ भाखा आसानी ले समझ आये। शुरुच ले हमर पुरखा मन घलोक अपन रचना मन म आन-आन भाखा के प्रचलित शब्द मन ल बउरे हें। 

  ये बात बिल्कुल सही हे कि क्षेत्रीय , जातिगत , अउ अशिक्षा के सेतीन भी उच्चारण म गलती होवय ,अब ओ गलती ल यदि हम छत्तीसगढ़ी मान लेबो तो कइसे बनही। 

  हमन ल भाखा के बढ़वार खातिर उदार होएच परही। जेन ल तेन सही बोले अउ लिखे परही ,ओमा संकोच करे के जरूरते नइये।

  जहाँ तक हो सके जुन्ना शब्द मन ल भी अधिक से अधिक उपयोग म लावन , संग म नवा-नवा शब्द मन खातिर भी मेहनत करन , एमा मोला कोई बुराई नइ दिखय।

धनराज साहू

विमर्श के विषय: छत्तीसगढ़ी भाषा मा "आने भाषा" के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत*

 तारीख: 01/12/2022

दिन: गुरुवार

*विमर्श के विषय: छत्तीसगढ़ी भाषा मा "आने भाषा" के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत*



                    ए बंदा (सूर्य कांत गुप्ता)भाषाविद् ए न कोई बहुत बड़े विद्वान। हमर छंदगुरु श्रद्धेय अरुण निगम जी मन पटल मा आज सुंदर विषय रखिन हें; "आने भाषा के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत"। बहुत बढ़िया विषय।


                     भाषा का ए। अपन विचार, अपन भाव ल व्यक्त करे के माध्यम। अउ एकर सबले बड़े विशेषता आय एकर पोठ व्याकरण होना। एकर बारे म पहिली ही बड़े बड़े विद्वान मन अपन विचार व्यक्त कर चुके हें।

अभी अभी हमर छंद परिवार के दीवाली मिलन समारोह होइस त ए बात ऊपर शिक्षाविद् अउ तीन चार भाषा के जानकार सम्माननीय डॉ. चितरंजन कर जी द्वारा  जोर दे गइस, अउ सही भी आय उंकर जोर देना, के कोनो भाषा के प्रवाह ल बनाए रखना हे त आन भाषा ल ओमा शामिल करे ल परही। आदरणीय डॉ. कर साहब मन इहू बात म जोर दइन के वो भाषा के व्याकरण सम्मत होना जरूरी हे।  हमर राजभाषा छत्तीसगढ़ी के व्याकरण तो पहिली ले बने हुए हे अउ वर्तमान म आदरणीय डॉ. विनोद वर्माजी के भी किताब निकल चुके हे।

अब बात  आथे आन भाषा के शब्द ल ओकर मूल रूप म राखन के अपभ्रंश ल उपयोग म लावन। मोर मत के अनुसार तो ओ शब्द ल मूल रूप म लाना ही उचित रइही ओकर अपभ्रंश बना के ओकर  मान गिराना ठीक नइ  रइही। कोई भी शब्द के अपभ्रंश

बोली म सुने बर मिलथे। बोली अउ भाषा म अंतर होथे। बोली मतलब ओ क्षेत्र के रहइया जउन शिक्षित नइए उंकर द्वारा उच्चारित शब्द।  भाव समझ मा आवत हे। वर्तमान म बहुतायत म देखे जा सकत हे के गाँव गाँव म शिक्षण संस्थान खुल गे हे। जउन भाषा प्रचलन म हवै ओकर उच्चारण म भी तकलीफ नइ होवत हे।  ए विषय ऊपर हमर विदुषी दीदी आदरणीया सरला शर्मा जी के भी विचार पढ़े ल मिलिस...अउ भी बड़े बड़े साहित्यविद् मन के विचार पढ़े ल मिलिस। जम्मो झन ल मोर सादर प्रणाम।


 

सूर्यकान्त गुप्ता

सिंधिया नगर दुर्ग(छ.ग.)

छत्तीसगढ़ी भाषा मा आने भाषा के शब्द ला अपभ्रंश रूप मा प्रयोग करना कतका न्यायसंगत*

 : *छत्तीसगढ़ी भाषा मा आने भाषा के शब्द ला अपभ्रंश रूप मा प्रयोग करना कतका न्यायसंगत*

 

छत्तीसगढ़ी भाषा के "मूल शब्द" के न तो उच्चारण मा दोष देखे बर मिलथे अउ न लेखन मा कोनो दोष दिखथे। फेर आने भाषा के शब्द जब बउरे जाथे तब उन शब्द मन के छत्तीसगढ़ीकरण लोगन अपन-अपन तर्क, बुद्धि अउ ज्ञान के अनुसार करथें। आने भाषा के शब्द मन भाव ला ज्यादा स्पष्ट करे बर "अमानत" के रूप मा प्रयोग मा लाए जाथे। अमानत मा ख़यानात तो बने बात नोहय! 

 

तइहा के जमाना मा स्कूल के कमी रहिस। बड़े-बड़े केंद्र मा बस स्कूल रहिन। शिक्षा के कमी के कारण बहुत बड़े जनसंख्या देवनागरी लिपि ला नइ जानत रहिन तेपायके जइसे सियान मन बोलँय, वइसे लइका मन बोलत रहँय। बोले मा कइसनो उच्चारण करके बोले जाय फेर लेखन मा देवनागरी लिपि के जम्मो 52 वर्ण के प्रयोग होना चाही। मौखिक मा "बोली" अउ लेखन मा "भाषा" अनुसार बोलना अउ लिखना चाही। शिक्षा के अभाव मा कई झन नुकसान ला "नुसकान" बोलथें। अब बोलत हे कहिके वोला सही शब्द नइ कहे जा सके। बबा सक्कर बोलत रहिस वोकर नाती शक्कर बोल लेथे। ये अंतर शिक्षा के कारण होथे। बबा अशिक्षित रहिस तो नाती हर शिक्षित होगे हवय। 

 

एक महत्वपूर्ण बात यहू हे कि वर्ण ले अक्षर बनथे अउ अक्षर ले शब्द बनथे। "शब्द" कभू निरर्थक नइ होवय। हर शब्द के अपन विशिष्ट अर्थ होथे। शुक्ला के अर्थ हे, सुकुल के कोनो अर्थ नइये। रामेश्वर के अर्थ हे, रमेसर के कोनो अर्थ नइये। लेखन मा हमेशा सार्थक शब्द होना चाही। कमल शब्द तीन अक्षर ले बने हे। क, म अउ ल। कमल के अर्थ हे। इही तीन अक्षर के शब्द आय - कलम, एखरो अर्थ हवय फेर मकल, लकम घलो इही तीन अक्षर ले बने हवँय  फेर इनकर अर्थ नइये। माने निरर्थक शब्द आँय। 

 

मोर मान्यता घलो हवय अउ निवेदन घलो हवय कि भाषा के साहित्य लेखन मा "निरर्थक शब्द" के प्रयोग नइ करना चाही। प्रकाश ला परकास, प्रयोग ला परयोग, परदेश ला परदेस, प्रकृति ला परकीरती जइसन तोड़ मरोड़ के नइ लिखना चाहिए। 

 

हमर सियान साहित्यकार मन स, श, ष, श्र जइसन अक्षर के प्रयोग बहुत पहिली ले करत हवँय। अनुकरण हमेशा अच्छा बात के होना चाही। अलग-अलग जमाना के साहित्यकार मन के कुछ अइसन अक्षर के प्रयोग के उदाहरण देखव जेन ला कुछ झन कहिथें कि छत्तीसगढ़ी मा केवल "स" अक्षर हे। श अउ ष नइये। 

 

*“क्ष”  के  प्रयोग -* 

 

*गाथा काल - (सन् 1000-1500 ई.)* 

 

बड़ सैइता धारी *लक्ष्मण* जती जोगी, बारा बरस जोग करेरे भाई


 ( *फुलबासन*) 

 

*आधुनिक काल (सन् 1900 ले 2018)* 

 

*यक्ष* एक हर अपन काम में, गलती कुछु कर डारिस ।

तब कुबेर हर शाप छोड़ अलका ले ओला निकारिस ।। 


( *मुकुटधर पांडे - मेघदूत छतीसगढ़ी अनुवाद*)

 

पिंगल शास्त्र न पढ़ेव कछु, *निरक्षर* अघधाम । 

अंध मंदमति मूढ़ हौं, जानत जानकि राम ।। 


( *नरसिंह दास – अपन परिचय*)

 

झाड़ें भाषण, *गो रक्षा* के नेता बन के ।

कभू बात पतियावव झन, इन अड़हा मन के।। 


( *कोदूराम “दलित”-  सियानी गोठ*)

 

जम्मो टूरा टूरी ल *अक्षर* पढ़न दे, जिनगी के कहानी नवा गढ़न दे।। 


( *चेतन भारती -   उन्नत के बीज*)

 

 “दलित” सहीं  *शिक्षक* मिल जातिन, जौन पढ़ातिन दिन अउ रात ।

  सब लइका मन मिल के गातिन, हो जातिस सुख के बरसात ।।


 ( *शकुंतला शर्मा - आल्हा छन्द*)

 

*शिक्षा* ले संस्कार जगय 

सुग्घर आचार व्यवहार पगय ।

रहन-सहन के बदले सलीका 

अउ दरिद्रता दूर भगय ।।


 ( *सपना निगम – विश्व  साक्षरता दिवस*)

 

ईश्वर के तो रूप अनेक। करैं काज उन जग बर नेक।।

पशु *पक्षी* नर वानर रूप। किसम किसम के तोर सरूप।।


 ( *सूर्यकांत गुप्ता - चौपई छन्द*)

 

*भिक्षा* दे दे द्वार खड़े हँव, कपटी ह गोहराय |

देखय साधू ला कुटिया मा ,सीता *भिक्षा* लाय ।। 


( *आशा देशमुख – सरसी छन्द*)

 

*“त्र” के प्रयोग -*

 

*भक्ति युग, मध्यकाल (सन् 1500 - 1900)* 

 

*जंत्र मंत्र* टोटका नहीं जानेव, नितदिन फिरत उदासी ।।


 ( *संत धरमदास*)

 

कहे नरसिंह *त्रिपुरारी* देखें स्वारी, धांवे भूले सब नहीं कोऊ बारे आगी चूलहा।


( *नरसिंह दास - कवित्त*) 


गंग के पानी म भंग घोटावत, बीष मिलाय पिये *त्रिपुरारी*।


 ( *नरसिंह दास – सवैया*) 

 

*आधुनिक युग (सन् 1900 से आज)*

 

विश्व-शांति अब लाव , सबो के भला विचारो ।

*अस्त्र शस्त्र*,बम वम  सब ला सागर मा डारो ।।

 

पाई पाई जोर के, बनँय धनी कंजूस ।

चिरहा फटहा *वस्त्र* नित, पहिरँय मक्खीचूस ।।

 

रहव एक खातिर सबो, अउ सब खातिर एक।

*मूलमंत्र* सहकार के, आय यही हर नेक।।


 ( *कोदूराम “दलित”- सियानी गोठ*)

 

बी ए पास करे खातिर हम, मर मर हाड़ा टोरेन।

बने नौकरी पाबो ना कहिके, *सत्रह* बछर अगोरेन ।।


 ( *विमल कुमार पाठक - रे भैया हम खेती करबो*)

 

अँधियारी रात मा जी,दीया धर हाथ मा जी,

भूत  प्रेत  साथ  मा  जी ,निकले  बरात  हे।

बइला  सवारी  करे,डमरू  *त्रिशूल* धरे,

जटा जूट चंदा गंगा,सबला  लुभात हे ।। 


( *जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" -घनाक्षरी छन्द*)

 

साफ सफाई स्वस्थ रहे के *यंत्र*।

स्वच्छ रहे के आदत,होथे *मंत्र*।।


 ( *सुखदेव सिंह अहिलेश्वर – बरवै छन्द*)

 

*“ज्ञ” के  प्रयोग -*

 

*गाथा काल - (सन् 1000-1500 ई.)* 

 

सासे के बोलेव सास डोकरिया,कि सुनव सासे बिनती हमार

मोला *आज्ञा* देते सास, कि जातेव सगरी नहाय

घर हिन कुंवना कि, घर हीन बावलि

कि घर हीन करो असनांद, अहिमन झन जा सगरी नहाय ला ।। 

( *अहिमन गाथा*)

 

*भक्ति युग, मध्यकाल (सन् 1500 - 1900)* 

 (1)

सन्तगुरु हमरे *ज्ञान* जौहरी,, रतन पदारथ जोर देव हो।

धरमदास के अरज गोंसाई,, जीवन के बांधे डोर छोर देव हो।।

(2)

*ज्ञान* दुलीचा झारि दसाबो, नाम के तकिया अधर लगावो ।।

धरमदास विनवै कर जोरी, गगन मंदिर मा पिया दुलरावौ ।।


 ( *संत धरमदास*)

 

*आधुनिक युग (सन् 1900 से आज)*

 

गुरु हरथे *अज्ञान* ला, गुरु करथे कल्यान ।

गुरु के आदर नित करो,गुरु हर आय महान ।।

ऋषि मन के *विज्ञान* , सबो ला सुखी बनाइस ।

सीखो सब  विज्ञान,   येकरे जुग अब आइस ।। 

 

( *कोदूराम “दलित”- सियानी गोठ*)

 

बनके  लछमी भरही घर जी बन शारद देहँय गा सब *ज्ञान*।

इँदिरा प्रतिभा सुषमा जइसे करही उँन कारज पाहँय मान ।।


 ( *मनीराम।साहू "मितान" - अरविंद सवैया*)

 

**श्र” के प्रयोग -*

 

*आधुनिक युग (सन् 1900 से आज)*

 

मेकल *श्रेणी*  बनिस सिंघासन

भगिस सोन तब मस्ती मा।। 


( *प्यारेलाल गुप्त - छत्तीसगढ़ बर जीबो मरबो*)

 

जहाँ योगेश्वर कृष्ण चंद्र अउ जहाँ पार्थ गांडिवधारी।

उहाँ *विजय श्री* अउ विभूति सब अचल नीति हे सुभकारी।।


 ( *कपिल नाथ कश्यप -श्रीमद भगवत गीता*)

 

*श्रृंगी* भृंगी बाजत हावय, नाचे मरी समान।

ब्रह्मा जी हा बिनय सुनाइस, मौका ला शुभ जान।। 


( *चोवाराम “बादल” - शिव जी के लीला*)

 

गौरी सुत गणराज प्रभु, हे गजबदन गणेश ।

*श्रद्धा* अउ विश्वास के, लाये भेंट रमेश ।। 


( *रमेश कुमार सिंह चौहान - सुमरनी*)

 

आवव पेंड़ लगाइन,समय निकाल।

धरती ला सुघराइन, *श्रम* ला डाल।। 


( *दिलीप कुमार वर्मा – बरवै छन्द*)

 

*“श और ष” का प्रयोग -*

 

*(भक्ति युग, मध्यकाल) (सन् 1500 - 1900)* 


मैं तो तेरे भजन भरोसो *अविनाशी* 


( *संत धरमदास*)

 

*आधुनिक युग (सन् 1900 से आज)*

 

(1)

 

*जगदीश्वर* के पाँव मा, आपन मूड़ नवाय

सिरी *कृष्ण* भगवान के, कहि हौं चरित सुनाय।।

पँड़री पँड़री देह के, रूपस सबे अघात

*श्याम* मिले के *खुशी* में, फसफसात हे जात।।

 

(2)

 

रौताइन सब सुनत रिसाइन।

कब ले *श्याम* साव बन आइन।।

साँप घलाय सबो *पोषे* हौ।

सबो जगत आज मोर देहौ।।


 ( *पं. सुंदरलाल शर्मा - दान लीला*)

 

(1)

अणु ला नान्हें मत समझ, अणु ला तुच्छ न जान।

अणु मा *शक्ति*  अघात हे , अणु मन आयँ महान।।

(2)

बंधन –मां जतका हवयँ, सबला मुक्त कराव।

*पंचशील* ला मान के , *विश्व-शांति* अब लाव।।

(3)

बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव।

ठठिया भर पसिया पियौ, तन ला *पुष्ट* बनाव।।

(4)

*नष्ट* करो झन राख-ला, राख काम के आय।

परय खेत-मा राख हर , गजब अन्न उपजाय।। 


( *कोदूराम “दलित” - सियानी गोठ*)

 

*दशरथ* बोलिस छोटी रानी, का दुख मा तंय करे गोहार ।

जौन माँगबे सब कुछ देहूँ, राजपाट मैं करंव निसार ।।


 ( *वसंती वर्मा – आल्हा छन्द*)

 

*शंभु* के बरात देखि जियरा डरावत।

डाकिनी *पिशाच* गीत लुलु लुलु गावत।। 


( *नरसिंह दास - कवित्त*)

 

साँप के सूत मा बिच्छु गुँथाइ, लगाइके झूल जटा अहिरे।

हाथ म पाँव म साँप के *भूषण, भूषण* साँप *शरीरहि*  रे।।


( *नरसिंह दास – सवैया*)

 

मंदिर कोती गै पुजेरी चला घंटी *शंख* ला हेरी।।

राजा *हरिश्चन्द्र* बड़ दानी। भरिन डोम के घर पानी।।

धरे रहिगै *धनुष* बान समय होथे बड़ बलवान।। 


( *द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र - बुड़ती बेरा*)

 

हमरे कमई में बसे हे *शहर*

हमरे भरोसा चलत हे पुतलीघर ।। 


( *कुंजबिहारी चौबे - बियासी के नागर*) 

 

सदा काल ले *दुष्ट* समय बर, जिनगी सहज सवारी बनगे।

ये दुनिया मा *महापुरुष* मन, कतको आथें कतको जाथें।। 


( *नारायण लाल परमार - हमर जिनगी*)

 

आँसों होरी मा सबो,धरव शांति के *भेष*।

मेल जोल जब बाढही,मिट जाही सब *द्वेष*।। 


( *अजय अमृतांशु - दोहा छन्द*) 

 

*शंकर* तांडव झुमरत नाचे,धरती दाई देख !

पटक-पटक के गोड़ दबाथे,छाती अपन सरेख !! 


( *असकरन दास जोगी - सरसी छन्द*)

 

माघी पुन्नी मा चलव, दामाखेड़ा धाम।

*दरशन* ले साहेब के, बनथे बिगड़े काम।। 


( *कन्हैया साहू "अमित" - दोहा छन्द*)

 

महँगा हवय *कीटनाशक* हा, गोबर खातू डारौ |

छोड़व रासायनिक खाद ला, करजा अपन उतारव ||


 ( *ज्ञानुदास मानिकपुरी*)


मोर विचार मा छत्तीसगढ़ी मा आने भाषा के शब्द के अपभ्रंश रूप के प्रयोग नइ करना चाही।


*अरुणकुमार निगम*

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 एक लाइन के समर्थन बात -ठेठ अउ बनावटी छत्तीसगढ़ी ल बउरे ले , भाषा (भाखा, भासा )के प्रवाह (परवाह ) रवानगी हर छेंकाही। येहर हिंदी मोह नोंहे।समय के मांग आय।  हिंदी अउ अंग्रेजी पद मन  ल समोखे आत्मसात करे ले पठनीयता बढ़ही। अउ भाषा हर आधुनिक लागही। हर जुग हर अपन अलग व्याकरण क़ाबर नई लिखही ? पतंजलि के 'महाभाष' के जोहार हे।पाणिनि के 'अष्टाध्यायी' के जोहार हे। कात्यायन के 'वार्तिक' के जोहार हे। हीरालाल काव्योपाध्याय जी के जोहार हे। ग्रियर्सन के जोहार हे । कामता प्रसाद गुरु के जोहार हे। अउ आज के विनोद वर्मा अउ विनय पाठक के घलव जोहार हे।🌸🙏

रामनाथ साहू

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*विचारोत्तेजक ज्ञानवर्धक आलेख* ........आदरणीय अरुण निगम जी द्वारा पुराना अउ नवा कवि मन के रचना के उद्धरण शोधपरक संकलन हे। छत्तीसगढ राजभाषा आयोग द्वारा 22 जुलाई 2022 के बिलासपुर म आयोजित प्रांतीय संगोष्ठी म ए आलेख के अधिकांश भाग के पठन आदरणीय निगम जी अपन व्याख्यान म करे रिहिन। जेन हर छत्तीसगढ राजभाषा आयोग द्वारा प्रकाशित अउ सद्यः विमोचित  ( 28 नवंबर 2022) पुस्तक *छत्तीसगढी का मानकीकरण : मार्गदर्शिका* ( संपादक- डाॅ विनोद कुमार वर्मा ) म संकलित हे। एही संगोष्ठी म *देवनागरी लिपि के हिन्दी बर अंगीकृत 52 वर्ण के छत्तीसगढी लेखन म स्वीकार्यता के प्रस्ताव सर्वसम्मति ले पारित होय रहिस।* अधिकृत रूप ले ये तिथि  ( 22 जुलाई 2022 ) ल छत्तीसगढ़ी भाषा के बदलाव के बिन्दु माने जा सकत हे। हालाकि एखर पहिली से ही अनेक प्रबुद्ध छत्तीसगढी साहित्यकार मन देवनागरी लिपि के 52 वर्ण के प्रयोग अपन लेखन म करत रिहिन। *छन्द के छ* म शामिल सबो कवि/लेखक मन 2016-17 से ही 52 वर्ण के प्रयोग अपन लेखन  म करत रिहिन मगर पुराना विचारधारा ( 39 वर्ण के समर्थक ) के लोगन मन एखर पुरजोर विरोध घलो करत रिहिन। *वास्तव म छत्तीसगढी लेखन म 52 वर्ण के प्रयोग के  कारण ही छत्तीसगढी अपभ्रंश लेखन ले मुक्ति के मार्ग प्रशस्त होइस*। छत्तीसगढी भाषा के मानकीकरण अउ संरक्षण-संवर्धन  बर एखरे सबले जादा जरूरत रहिस। सादर......🙏🌹


            - विनोद कुमार वर्मा