Sunday, 5 March 2023

संत कवि अउ भगवताचार्य - पवन दीवान


संत कवि अउ भगवताचार्य - पवन दीवान



जउन मन मा हा छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ला जगाय के गजब उदिम करिस वोमन मन मा श्रद्धेय खूबचंद बघेल , कृष्णा रंजन , हरि ठाकुर ,लक्ष्मण मस्तुरिया , अउ संत कवि, भगवताचार्य पवन दीवान  के नांव अव्वल हवय । दीवान जी हा बाहरी मनखे मन के द्वारा जउन शोषण करे जात रिहिस वोकर अब्बड़ विरोध करिन. लाल किला ले काव्य पाठ कर छत्तीसगढ़ के मान बढाइन.


  


दीवान जी के जनम किरवई गांव मा 1 जनवरी 1945 मा होय रिहिस । वोकर कर्मभूमि राजिम के संगे संग पूरा छत्तीसगढ़ रिहिन ।


वे एक भगवताचार्य के संगे संग बड़का साहित्यकार अउ राजनीतिज्ञ रिहिन। विधायक, सांसद अउ अविभाजित मध्य प्रदेश के मंत्री घलो बनिस । गौ सेवा आयोग छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष बनाय गिस । 


दीवान जी के  भागवत प्रवचन मेहा पहिली बार राजनांदगांव जिला के गांव भर्रेगांव मा सुने रेहेंव ।वो समय मेहा मीडिल स्कूल मा पढ़त रेहेंव ।वो समय वोहा जवान रिहिन हे । वोकर भागवत प्रवचन सुने बर अपार जन समूह उमड़ पड़े । वोकर जोरदार ठहाका ला भर्रेगांव मा सुने रेहेंव । जब वोहा हंसय ता सब ला हंसा के छोड़य । अइसने बुचीभरदा (सुरगी) मा घलो वोकर प्रवचन के लाभ उठाय रेहेंव ।बीच बीच मा अपन कविता सुना के मनोरंजन करे के संगे संग लोगन मन मा जागरुकता लाय । अपन हक बर आगू आके लड़े के प्रेरणा देवय ।


सन् 2001 मा कन्हारपुरी, राजनांदगांव मा छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति द्वारा आयोजित राज्यस्तरीय छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन मा दीवान जी के काव्य पाठ सुने के अवसर मिलिस. येकर बाद छत्तीसगढ़ राज

भाषा आयोग के प्रांतीय सम्मेलन मा उंकर सुग्घर विचार सुने ला मिलिस.


सौभाग्य  से हमू मन ला माई पहुना के रुप मा दीवान जी के दर्शन होइस   वोकर सुग्घर बिचार 


सुने के संगे संग हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी कविता ला सुनके धन्य होगेन ।


 जब साकेत साहित्य परिषद् सुरगी जिला राजनांदगांव द्वारा 10 जून 2007 मा होवइया आठवां वार्षिक सम्मान समारोह बर निमंत्रण छपवायेन ता सुरगी के संगे संग आस पास के गांव के लोगन मन ला एको कनक बिश्वास नइ होय कि पवन दीवान जी हा इंकर कार्यक्रम मा आही! 


ये सब संभव हो पाय रिहिस डॉ. नरेश कुमार वर्मा जी के कारण । मूलत : भाटापारा (बलौदाबाजार) निवासी वर्मा जी वो समय दिग्विजय कालेज राजनांदगांव मा हिन्दी के प्रोफेसर रिहिन ।  ।वर्मा जी अउ हमर साकेत साहित्य परिषद् सुरगी के कुबेर सिंह साहू जी , वरिष्ठ कहानीकार डॉ. परदेशी राम वर्मा जी से बढ़िया संबंध बन गे रिहिस । एकर से पहिली डॉ. वर्मा जी हाै हमर वार्षिक समारोह मा दो तीन बार पहुना के रूप मा पहुंच चुके रिहिन ।ये प्रकार ले साकेत परिषद् ले सुग्घर संबंध बन गे रिहिन ।डॉ. परदेशी राम वर्मा जी कृपा ले पवन दीवान जी के सुरगी आगमन होइस ।संगे संग हमर छत्तीसगढ़ के मुखिया आदरणीय भूपेश बघेल जी हा घलो पहुना बन के आय रिहिन । वो समय बघेल जी हा विपक्ष मा दमदार नेता रिहिन ।


ये कार्यक्रम मा दीवान जी के हाथ ले छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति राजनांदगांव के अध्यक्ष आत्मा राम कोशा अमात्य जी अउ साकेत के तत्कालीन सचिव अउ वर्तमान अध्यक्ष भाई लखन लाल साहू लहर जी ला साकेत सम्मान 2007 प्रदान करिन ।


  इहाँ दीवान जी हा अपन विचार राखिस तेमा छत्तीसगढ़ी भाखा ला राजभाषा बनाय के मांग करे गिस । येमा पारित प्रस्ताव ला राज्य शासन के पास भेजे गिस.येकर बर डॉ. परदेशी राम वर्मा जी के साथ मिलके अभियान घलो चलाइस ।अपन उद्बोधन के माध्यम से छत्तीसगढ़िया मन ला जागरुक करिन।बीच बीच मा अपन जोरदार ठहाका ले लोगन मन ला गजब हंसाइस ।दीवान जी हा किहिस - "हमर छत्तीसगढ़ हा माता कौशल्या के मइके हरय तेकर सेति भगवान राम हा इहां के भांचा कहलाथे ।तेकरे सेति हमर छत्तीसगढ़ मा भांचा भांची ला गजब सम्मान देय जाथे । आगे किहिस  कइसे सुग्घर ढंग ले कहिथन - कइसे भांचा राम । सब बने बने भांचा राम । कोनो हा कैसे भांचा कृष्ण नइ काहय ।अउ कहइया हा अइसने कहि दिस ता वोहा का कहाही ।अइसन कहिके फेर जमगरहा ठहाका लगाइस अउ उपस्थित लोगन मन जोरदार ताली बजा के सभा ला गुंजायमान करिन ।ये कार्यक्रम हा 


सुरगी के शनिचर बाजार चौक के मुख्य मंच मा होइस ।दीवान जी हा किहिस कि मेहा पहिली बार कोनो साहित्यिक कार्यक्रम ला खुला मंच मा होवत देखत हंव।"अइसे कहिके परिषद् के लोगन मन ला प्रोत्साहित करिस ।


 साथ मा हमर गांव " सुरगी "


के सुग्घर व्याख्या घलो कर दिस " सुर " माने देवता अउ "गी " माने गांव ।


 एकर बाद दीवान जी हा" राख "  "चन्दा " अउ "तोर  धरती तोर माटी रे भइया "कविता सुनाके काव्यप्रेमी मन ला आनंदित करिन.


तो ये किसम ले संत कवि पवन दीवान जी के कार्यक्रम हा यादगार बनिस ।हमर साकेत के कार्यक्रम मा पहुंच के परिषद् ला गौरवान्वित करिन । 10 जून 2007  हा हमर परिषद् अउ गांव बर ऐतिहासिक तिथि के रुप मा अंकित रही ।  2 मार्च 2016 मा दीवान जी हा स्वर्ग लोक चले गिस । आज उंकर 7 वीं पुण्यतिथि मा शत् शत् नमन हे 


 


            ओमप्रकाश साहू अंकुर

          सुरगी, राजनांदगांव

     मो. 7974666840

राजनीतिक संतों के बीच म संत के राजनीति

 राजनीतिक संतों के बीच म संत के राजनीति


कभू सोंचे नइ रिहिस के वोहा राजनीति म जाहि । लोगन राजनीति म पाय बर आथे । कोन्हो ला पद ... कोन्हो ला पइसा त कोन्हो ला मान सन्मान के भूख अऊ आस दुनों रहिथे । फेर जेकर तिर बहुत पइसा हे .. जे बड़का पद म बइठे हे अऊ जेकर तिर मान सन्मान के कोन्हो कमी नइहे ... तेमन काकरो आगू म मुड़ नवावत हे तेला काय चीज के लालच ... । 

खो जाय के फितरत जेकर म होथे तिही संत आय । कभू ईश्वर के भक्ति म त कभू जनता जनार्दन के सेवा म । घिसे पिटे चुसाये लुटाये जनता के दरद अऊ घाव ला बहुत तिर ले देखे अऊ महसूस करे रिहिस सुखदेव धर दीवान के पुत्र पवन दीवान हा । एक कोति मन हा भगवान अऊ अध्यात्म डहर भागे त दूसर कोति तन जनता के सेवा बर बेताब रहय । एक दिन रद्दा निकल अइस । इमर्जेंसी हा उँकर बर राजनीति के कपाट ला भंग भंग ले उघार दिस । ओमन राजनीति म राजनीति करे बर नइ खुसरे रिहिस । ओमन तो केवल इही बताये बर आय रिहिन के राजनीति कइसे करना चाहि । फेर दलदल तो दलदल होथे । ओहा काकरो चेहरा नइ चिन्हय  न कोन्हो ला अपन ले अलगियान देवय  । तभो ले चिखला म खिले छतराये कमल कस रिहिस ओमन । चिखला म रिहिन फेर सनाये नइ रिहिन । ये अलग बात आय के वहू मन .. जिनगी भर दलदल ले बाहिर नइ निकल सकिन ।   

एक बेर विधायक . सांसद . केबिनेट मंत्री के दर्जा मिले राजनीतिज्ञ हा ... न केवल अपन बर बल्कि अवइया  अपन सातों पीढ़ी बर धन दोगानी सकेल डरथे । फेर केऊ बेर पद झोंके के पाछू घला सरपंच के बरोबर जमा नइ कर सकिन । कोन्हो उनला आफर नइ करिन होही का ...... । का अपन बुता करवाये के एवज म कोन्हो उनला भेंट पूजा नइ देवत रिहिन का .... । उँकर ले कोन्हो बुता नइ होवत रिहिस  का ... । काकरो बुता करे म उनला रूचि नइ रिहिस का ... । 

अरे भई ... ओमन तो बुता करे बर आय रिहिन ...  बुता करिन घला । फेर उँकर बुता के श्रेय कोन्हो दूसर ले गिन । उनला घला आफर मिलिस ... फेर आफर दूसर के हाथ म रेंग देवय । उँकर जाय के पाछू उँकर तिर नानुक फार्म हाउस अऊ करिया रंग के गाड़ी के अलावा कुछ सम्पत्ति नइ पाये गिस । वाजिम म ओमन केवल संत रिहिन जेला राजनीति के संत मन अइसे पटक के राखे रिहिन के ओमन न तो उठ पावत रिहिन ... न बइठ पावत रिहिन । उँकर नाव ले कतको झन खा डरिन अऊ आखिर तक खात रिहिन । कतको झन फर्जी चेला मन उँकर भेंट पूजा म न केवल हाथ मारिन बल्कि उँकर संग रहिके सरकार म जुड़िन अऊ जुड़े के रद्दा अपन नाव म पेटेंट करा  डरिन । उँकर नाव ला भुनावत कतको झन अपन नाव ला उजागर करवा डरिन । 

ओमन राजनीति के मैदान के कमजोर खिलाड़ी नइ रिहिन फेर ओकरे संग म रहवइया हा ओकरे गोड़ ला ईंचही त ओमन कैच ला कइसे पकड़ सकतिस । ओमन कभू क्रिकेट खेलिस .. कभू हाकी ... कभू खो खो म दिखिन त कभू खुडवा म । कुछ दिन म फेर बैटिग करत क्रिकेट म दिख जाय । हाँ एक बात जरूर रिहिस के ... जे खेलय तिही म जम जावय । क्रिकेट म धुँआधार रन बनाये बर धरिन त अम्पायर ला बोलके ओकरे संगवारी मन उनला एल.बी.डब्ल्यू. आऊट करवा दिन । सबो ला इही लगिस के इही ला मैन आफ दी मैच मिल जही अऊ अवइया मैच म कप्तानी ... तेकर ले एला आउट करवाय म भलाई देखिन संगवारी मन । कबड्डी म उतर गिन ... उहाँ रेडर ला धरे के पहिली इही ला फाउल करार करवा दिन । हाकी म गोल मारत समय सीटी बजवाके खेल समाप्त करवा दिन । कुल मिलाके इही बात के ... जीत के कोन्हो प्रयास म इँकर नाव नइ होना चाहि । इनला बऊरे के सामान बना दिन । मैच पाछू  पुछइया के अभाव घला पैदा कर देवत रिहिन संगवारी मन । 

ससहत्तर म खूब खेलिन । प्रदेश के सबले बड़का आदमी ला क्लीन बोल्ड कर दिन फेर मैं आफ दी मैच कोन्हो अऊ लेगे । अस्सी म अपन हाकी टीम कोति ले गोल करत समय ... संगवारी मन  समय समाप्ति के सीटी बजवा दिन । बियासी म कबड्डी म हाथ आजमाइन  । ओकरे संगवारी मन उनला फाऊल करवा दिन । भोपाल ले आके गुरूजी कहत पाँव परइया मन खेल म रहिके ... नइ खेले के वचन तको ले डरय । मैदान म डटे रेहे बर इँकर मान मनुव्वल घला कर डरय फेर खेलन नइ देवय । 

छत्तीसगढ़ बने के पाछू ये मैदान ले ओ मैदान अंदर बाहिर होइन ... अंतिम एकादश म इँकर नाव लिखवा दिन । फेर बैटिंग अऊ बालिंग दुनो करन नइ दिन । बपरा हा फकत फील्डिंग करत रिहिन फेर कैच झोंके के बेर धकिया दिन । कबड्डी म रेड करे के मौका नइ दिन । इनला टीम म राखना तो हर कोई चाहिन फेर खेलाना कोन्हो नइ चाहिन । मैच चलत ले इनला मैदान के दू चार चक्कर लगवाके ... अपन स्वार्थ पूरा करइया मन ... अपन अपन बनौकी बना डरिन । 

वाजिम म राजनीति हा इनला साहित्य के नाव धरके उपेक्षित करिन ... त साहित्य हा प्रवचन समझ अनदेखा करिन ... अऊ ते अऊ  प्रवचन हा इनला राजनीति समझ बदनाम तको करिन । येमन सबो के रिहिन ... फेर इँकर कोई नइ रिहिस । इही तिर म फेल रिहिन येमन । संत राजनीति नइ कर सकय .... येकर ले बड़का उदाहरण शायदे मिलही । 

इँकर खासियत रिहिस ... अऊ दूसर संत कस खो जाय के । अपन बुता म खो जाय फेर डूबे निही । इँकर अनेक शुभचिंतक रिहिन जेमन राजनीति के दलदल म इनला खिले नइ रहन देना चाहय फेर अतेक गहरा दलदल रिहिस के ओमा ले बाहिर निकल सकना सम्भव नइ हो पइस । इनला निकाले के हरेक प्रयास असफल हो गिस । इकहत्तर बछर के पवन नाव के कमल के ताजगी देखते बनय ... फेर भितरे भितर जनता के पीरा के घुटन हा उनला खोखला कर चुके रिहिस । भगवान ले कोन्हो बात कहाँ छुपे रइहि ... उन हकीकत जानत रिहिस तभे तो मुरझाये के पहिली कमल ला अपने हा टोर के परम धाम लेगे ।

उँकर नाव .... आजो कतको ला रोटी देवाये के ताकत रखथे ... तभे चलत हे । फेर जइसे अन्याय उँकर संग जियत ले होइस तइसे जाय के पाछू घला होवथे । अतेक ऊँच संत के नाव ला जीवित राखे बर .... नानुक स्कूल के नामकरण करके उँकर नाव के राजनीतिक रोटी सेंकत लोगन के बुद्धि के बीच संत के राजनीति बुड़ गिस । राजनीतिक संत के बीच म संत के राजनीति न तब चलिस न आज चलय ... । आज उन नइ खोइन ... हम खो डरेन । हमला उबारत पहिली बेर बुड़िन ... अऊ अइसे बुड़िन के निकलिन निही । अमर संत तुँहर जय होवय ... नमन हे तुमला ... नमन हे । 

हरिशंकर गजानंद देवांगन . छुरा

2 मार्च पुण्यतिथि म सुरता// छत्तीसगढ़ी अस्मिता बर समर्पित रहिन पवन दीवान ...


 

2 मार्च पुण्यतिथि म सुरता//

छत्तीसगढ़ी अस्मिता बर समर्पित रहिन पवन दीवान ...

   छत्तीसगढ़ी कला, साहित्य के संगे- संग छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन म लइकई उमर ले रुचि रखे अउ संघरे के सेती संत कवि पवन दीवान जी के नांव अउ काम ले तो मैं आगूच ले परिचित रेहेंव, फेर उंकर दर्शन पहिली बेर तब होइस, जब उन पृथक छत्तीसगढ़ पार्टी के बैनर म रायपुर लोकसभा ले गाड़ी छाप म चुनाव लड़िन.

  तब मैं पढ़त रेहेंव. मोला सुरता हे, वो बखत हमन रायपुर के अमीनपारा म नव दुर्गा चौक म राहत रेहेन. दीवान जी अपन चुनाव प्रचार खातिर शीतला मंदिर डहर ले रेंगत रेंगत सब झन ल जोहार करत महामाया मंदिर डहर आवत रहिन. हमर घर दूनों मंदिर के बीच म रिहिसे, तेकर सेती दीवान जी ल देखइया अउ भेंट करइया मन के ए जगा भारी भीड़ होगे राहय.

  हमूं मनला जब जानकारी होइस, के दीवान जी इही डहार रेंगत रेंगत आवत हें, त हमूं मन घर ले निकल के बाहिर आगेन. उन माईलोगिन मन ल हाथ जोर के जोहार करंय अउ आदमी जात मन संग हाथ घलो मिला लेवंय. मन तो मोरो होइस के हाथ मिलाए जाय, फेर नइ मिला पाएन.

   जब हमन पढ़त राहन त हर शनिच्चर इतवार के छुट्टी म अपन गाँव नगरगांव जावन. दीवान जी ल रायपुर म चुनाव प्रचार करत देखे के बाद जब गाँव गेंव, त उहों इही चुनावे के गोठ होवत राहय. गाँव म हमर पारा के जम्मो सियान मन सकला के दीवान जी ल ही वोट दे के बात करत रहिन. हमूं मन उंकर चुनाव प्रचार करे के नांव म अपन गाँव के संग म तीर तखार के अउ गाँव मन म जाके उंकर चुनाव चिनहा 'गाड़ी छापछाप' बनावन.

   बाद म जब साहित्य जगत म आएन, तेकर पाछू तो फेर कतकों जगा उंकर संग मेल भेंट होवय. तहाँ ले तो अइसनो बेरा आइस, के उंकर संग एके मंच म बइठ के कविता पाठ घलो करे ले मिल जावय.

    तब के रायपुर जिला (अब गरियाबंद) के गाँव किरवई म 1 जनवरी 1945 के जन्मे पवन दीवान जी के चिन्हारी कवि, साहित्यकार के संगे-संग भागवत के प्रसिद्ध प्रवचनकार के रूप म घलो रिहिसे. उंकर आध्यात्मिक नांव स्वामी अमृतानंद सरस्वती रिहिसे. फेर हमला उंकर भागवत प्रवचन सुने के मौका तो नइ मिलिस. हां, एक पइत जरूर उंकर भागवत कथा के अंतिम बेरा के पांच मिनट देखे बर मिलिस.

   हमन मीर अली मीर, संजय शर्मा 'कबीर' अउ मैं कवि सम्मेलन म संघरे खातिर रायपुर ले थान खम्हरिया जावत रेहेन. रद्दा म जानबा होइस, के आदरणीय दीवान जी के भागवत आगू के एक गाँव म होवत हे. हमन आपस म चर्चा करेन, चलौ दीवान जी ल घलो अपन संग म ले चलथन, कवि सम्मेलन के गरिमा बाढ़ जाही.

   गाँव के भांठा म स्कूल तीर भारी पंडाल लगे राहय. हमन वो मेर पहुंचेन, त कथा समापन के पाछू आरती होवत राहय. आरती के पाछू दीवान जी व्यास गद्दी ले खाल्हे आइन. एती हमन ल देख के अपन परिचित शैली म उन हांसिन, अउ कहिन- अरे तहूं मन भागवत सुने बर आए हव, अतेक दुरिहा? हमन उंनला बताएन के कवि सम्मेलन म जावत हन, बीच रद्दा म आपके भागवत के जानकारी मिलिस, त गुनेन आपो ल संग म ले चलिन. उन हांसिन अउ कहिन, अरे का बतावंव, भागवत चलत हे तेकर ए, नइते सिरतोन म चल देतेंव. मोला तो कवि सम्मेलन म जादा मजा आथे.

    वइसे तो उंकर संग चारों मुड़ा अबड़ संघरन. मैं उनला हमर समाज के कार्यक्रम म घलो बलावंव. छत्तीसगढ़ राज के स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचंद बघेल के जयंती के बेरा म हमर समाज द्वारा रायपुर के तात्यापारा वाले कुर्मी बोर्डिंग म  एक सप्ताह के अलग अलग कार्यक्रम रखे जावय. एकर साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रम के संयोजक मुंही ल बना देवंय. तेकर सेती एमा छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के संगे-संग संगोष्ठी अउ कुछू आने कार्यक्रम घलो राखन, त दीवान जी ल पहुना के रूप म बलावन. एक बछर इही मंच म डॉ. परदेशी राम वर्मा जी मोला डॉ. खूबचंद बघेल अगासदिया सम्मान दीवान जी के हाथ ले देवाए रिहिन हें, अउ संग म मोर कविता संकलन 'सब वोकरे संतान ए संगी' के विमोचन घरो करे रिहिन हें.

   अपन जिनगी के संझौती बेरा म उंकर डॉ. परदेशी राम वर्मा जी संग भारी मयारुक संबंध रिहिस. कहूँ जावयं त दूनों, कुछू करयं त दूनों. वोमन भगवान राम के महतारी माता कौशल्या के नांव ले एक ठन समिति 'माता कौशल्या गौरव अभियान समिति' घलो बनाए रिहिन हें. एकर जगा-जगा कार्यक्रम करंय. तब मैं सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ म रेहेंव. वोमन दूनों समाचार दे खातिर प्रेस मन म घलोक पहुँच जावंय. हमर प्रेस म आवंय, त मोला पहिलिच के फोन कर देवंय, हमन नीचे म खड़े हावन तैं जल्दी आ अउ ए समाचार ल आजेच छपवा देबे.

   माता कौशल्या गौरव अभियान वाले कार्यक्रम म आदरणीय दीवान जी एक बात ल हर मंच म कहंय- 'बंगाल के मन अपन देवता ल धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. गुजरात के मन अपन देवता ल धर के आइन हम उंकरो पांव परेन. उत्तर प्रदेश अउ बिहार के मन अपन देवता धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. पंजाब अउ महाराष्ट्र के मन अपन देवता धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. भइगे चारों मुड़ा के देवता मन के पांव परई चलत हे. फेर मैं पूछथौं, अरे ददा हो, भइगे दूसरेच मन के देवता के पांव परत रहिबो त अपन देवता के कब पांव परबो? वोकर देवता मनके पांव परई म हमर माथा खियागे, अउ वो परदेशिया मन इंकरे आड़ म इहाँ के जम्मो शासन-प्रशासन म छागें.'

   मोला उंकर ये बात बहुत अच्छा लागय. सिरतोन आय, हम दूसर सब के सम्मान करथन ए तो बने बात आय, फेर उंकर चक्कर म अपन देवता, अपन परंपरा, अपन इहाँ के पारंपरिक उपासना अउ जीवन पद्धति मन के उपेक्षा करई ह तो सही नोहय न?  इही बात ल लेके हमूं मन इहाँ के मूल आध्यात्मिक संस्कृति, पूजा उपासना के विधि अउ जीवन पद्धति मनला के प्रचार प्रसार खातिर एक समिति 'आदि धर्म जागृति संस्थान' बनाए हवन, अउ वोकर बेनर म मैदानी काम घलो करत रहिथन.

   अइसने सब बात मन के सेती हमन जब राजिम के प्रसिद्ध पारंपरिक पुन्नी मेला के नांव ल बदल के 'राजिम कुंभ' कर दिए गे रिहिसे, तेकर नंगत विरोध करन. कतकों पत्र-पत्रिका म लेख अउ समाचार घलो छपवाए रेहेन. एकर संबंध म आदरणीय दीवान जी मोर तारीफ करे रिहिन हें. उन काहंय, ए परदेसिया मन हमर परंपरा अउ संस्कृति के सत्यानाश करत हें. इहाँ के मूल संस्कृति खातिर उंकर मन म वाजिब म भारी पीरा रिहिसे.

   राजिम कुंभ के नांव ले जेन आयोजन होवय. वोमा संत समागम घलो होवय. एक पइत हम दूनों उहाँ संघर परेन. मैं दैनिक छत्तीसगढ़ के साप्ताहिक पत्रिका 'इतवारी अखबार' के संपादन ल वो पइत  देखंव. वोमा राजिम ऊपर विशेषांक निकाले रेहेन, तेकर विमोचन उही मंच म होना रिहिसे. तेकर सेती प्रेस ले मोला भेज दे गे रिहिसे, अउ दीवान जी ल राजिम के रहवइया होए के सेती हाथ-पांव जोर के बलाए गे रिहिसे. संत समागम के ए मंच म विशेषांक के संपादन करे के सेती मोर सम्मान घलो करे गे रिहिसे.

   बाद म जब दूनों मिलेन त हांस डरेन. उन कहिन-' का करबे सुशील, तैं प्रेस म नौकरी करथस तेकर मजबूरी म इहाँ आए हस, ठउका अइसने मैं इहाँ रहिथंव, त बरपेली हाथ पांव ल जोर के मोला इहाँ तीर के लान लेथें.'

  आदरणीय दीवान जी 2 मार्च 2016 के ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले के परमधाम के रद्दा धर लेइन. हमन ल मीडिया ले जानबा मिलिस, के गुरुग्राम (हरियाणा) के एक अस्पताल म उन आखिरी सांस लेइन. बिहान दिन मंझनिया करीब 2 बजे उंकर राजिम आश्रम म उनला  समाधि दिए जाही. मैं ए खबर ल सुनते डॉ. परदेशी राम वर्मा जी ल फोन करेंव, त उन बताइन के हव खबर ह  सिरतोन आय. हमन राजिम जाए बर निकलगे हवन. तब महूं ह उनला आवत हंव कहिके तुरते राजिम बर निकल गेंव. 

   जावत-जावत रद्दा म मोर मन म उंकर बर श्रद्धांजलि के ए चार डांड़ गूंजे लागिस-

आंधी का रूप दिखाकर क्यों शांत हो गये पवन

तेरे ठहाकों से गूंज रहा है, अब भी धरा-गगन

काम अभी भी कई शेष हैं, जो तुमने प्रारंभ किए

छत्तीसगढ़ियों के सपनों को कुछ कुछ पूर्ण किए

उन्हें पूर्ण करने का हम तो, अब देते हैं वचन

यही हमारी श्रद्धांजलि है, शत-शत तुम्हे नमन

   उन महान आत्मा के सुरता ल डंडासरन पैलगी 🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

धर्मेंद्र निर्मल: कहानी - मंतर

 धर्मेंद्र निर्मल: कहानी - मंतर


चेहरा कोनो किताब ले कम नइ होवय, पढ़इया होना चाही। 

अहिल्या अउ परमिला परोसीन होथे आखिर। दूनो झिन संग लगाती ससुरार आये हे। दूनो घर के मुँहाटी जुरे हे। संगे संग उठत -बइठत हे । एके थारी म खावत हे, एके थारी म अँचोवत हे, त का ओतको नइ समझही। 


जब कभू अइसन बात होथे त परमिला ल बइठे बर कहे ल नइ लागय। वोहँ खुदे हाथ- गोड़ ल पसार के बइठ जथे। अपने अपन सुर म ओरियाए लगथे अपन राम कहानी ल सरलग - बिन संदर्भ, बिन प्रसंग के । पूछे- पाछे के कोनो नेंगे नइ रखय । 

आजो वोइसने होइस।


अहिल्या भात ल दूए चार कौंरा खाए रिहिस होही। ओतके बेरा परमिला ओरवाती तरी आके बैठ गे। अहिल्या, परमिला के मुँह ल देखते साथ समझ गे। अहिल्या परमिला के नस -नस ल टमर डरे हवय। 


जब कभू परमिला बेरा -कुबेरा अहिल्या घर आथे। ओकर थोथना ओरमे, मुँह फूले रहिथे। चुंदी - मुड़ी बही बरन छरियाए रहिथे। गोटारन कस मार बड़े -बड़े आँखी ल नटेरत, परेतीन कस बुड़ुर- बुडुर करे लगथे त अहिल्या ‘फट्ट ले’ जान डरथे कि परमिला  आज फेर बेटा बहू संग दू चार बात होके आवत हे। 


अहिल्या अँचोते -अँचोवत गोठ के मुहतुर करिस - ‘का साग खाए हस वो बहिनी ?’ सिगनल मिलत भर के देरी रिहिस हे। भइगे ताहेन का पूछत हस परमिला के गोठ ल, रेलगाड़ी कस दऊँड़े लगिस सरपट्टा- ‘अइ ..... का खवइ पीयइ ल पूछतस दीदी ! खाए हवन तभो लाँघन, नइ खाए हवन तभो लाँघन।’


अतका कहिके परमिला अपने -अपन करू -करू करे लगिस । मुड़ म हाथ रखे अनते डाहर मुँह करके अँइठत बइठ गे। जना मना अहिल्ये संग अनबन होगे हावय । मुड़ ल गड़ियाए भीतरे भीतर कनखियाके देख तको डरिस के अहिल्या हँ कुछू बोलत हे के नहीं । अहिल्या के मुँह उले के उले रही गे। 


हाथ ल झर्रावत अपने हँ फेर कहे लगिस - ‘हरहिंसा खाबे तेला खवइ कहिथे अउ उही हँ अंग लगथे । हरहर - कटकट म काय सिध परही ।’

‘अइ का होगे परमिला, आज कइसन गुसियागे हावस वो ?’ गुँझियाए गाँठ के फूचरा ल फरियावत अहिल्या हँ पूछिस। 

हालेके अहिल्या जानत हे के परमिला हँ बिगर पूछे सबो बात ल उछर डरही । ओकर पेट म दाँत हवय। नानमुन बात तको नइ पचय। अइसन हाल म तो वोला उल्टा अचपचन हो जही। छेरी के मुँह अउ परमिला के मुँह ल एके जान। बिन मिमियाए छेरिया नइ राहय तइसे बिन गोठियाए परमिला नइ रेहे सकय। तभो, परमिला ल तको तो अइसे लगना चाही के अहिल्या हँ ओकर दुख-पीरा ल समझत - सरेखत हे। ओकर संग देवत हे। 


अहिल्या के बात हँ अभीन सिराएच नइ रिहिस हे - ‘काला बताबे ....एक ठन राहय तेला बताववँ, इहाँ तो.....’- अइसे काहत परमिला हँ फेर थोथना ल ओरमा दिस। 

बइला ल धूरा पटकत देखके नँगरिहा के जी बमक जथे तइसे परमिला के ओरमत थोथना ल देखके अहिल्या के जी हो गे रिहिस हे, फेर मन ल मसोस के ऊपरसँस्सू लेवत कहिस  -‘का करबे बहिनी !  जिहाँ चार ठन बरतन- भँड़वा होथे तिहाँ ठिनिन -ठानन तो होबेच करथे...........।’


परमिला बीचे म बात ल काटत कहिस -‘तभ्भो ले, तभो ले। हमर घर तो बहुतेच तपत हे। कुच्छूच बात नोहय।’ थोरिक रूकके हाथ ल झर्रारत आगू कहिथे - ‘वो अतलंगहा नाती टूरा हँ अपन ददा संग खाए बर बइठे रिहिस हे। घेरी -बेरी आलू  दे ! आलू दे !! कहिके चिचियावय । ओकर आलू मँगइ ल देखके, मही हँ कहि परेवँ - ‘अइ आलू दे दे न वो। कब के आलू आलू के रटन धरे हे। ओकर थारी म भाँटे -भाँटा दीखत हे अउ मोर थारी म खसखस ले आलूच- आलू ल भर दे हस। पीलखाहा निपोर हँ मीठावत हे न काँही।’

परमिला हाथ ल हला -हलाके आँखी ल मटकावत तो गोठियाते रिहिस हे। अब मुँह ल तको दू बीता फार दिस। 


मुँह फारेच के फारे बात ल लमाइस -‘हाय राम ! वो काली के आए बेंदरिया के जबान ल तो देख। मोरे बर बघवा कस बरनियागे बाई । उल्टा मोही ल कहे लगिस - ‘अई ! मैं छाँट छाँटके परोसत हवँ का ? फोकटे फोकट मोर ऊपर लाँछन लगावत हस।’ परमिला हँ रेंकत अपन बहू के नकल उतारे लगिस। अहिल्या चुपेचाप मुड़ी ल गड़ियाए सुनत गुनत रहय।


अब परमिला अपन औकात म आ गे। दाँत ल पीसत, थूँक छटकारत अहिल्या ले पूछे लगिस - ‘अब बता तैं भला ? अपन दाई ददा ल अइसने जुवाब देवत रिहिस होही ?’ 

अहिल्या एकर का जुवाब देतिस, उही जानय। वोहँ मुँह ल उलाते रिहिसे, परमिला फेर बड़बड़ाए लगिस- उपराहा म ए गड़ौना टूरा के चाल ल तो देख ! ओकरे आघू म अतेक बड़ बात होगे, फेर एक भाखा बहू ल नइ बरजे सकिस।’ 


मोर बेटा मोर बेटा काहत थकस नइ रिहिसे आज उही ल गारी देए लगिस- ‘तैं कलेचुप रहा वो, दाई बने काहत हे’ -अतका तो कहि सकत रिहिस हे न ?’ जेने सवाल ये उही जुवाब तइसे कस किस्सा अपने हँ कारन तको बताए लगगे - ‘फेर काबर बोलय, ओला तो मोहनी - थोपनी देके मोहा डरे हे राँड़ी कलजगरी हँ।’


अहिल्या सोचते रिहिस हे, का जवाब देववँ। परमिला तब तक चुप नइ होवय जब तक ओकर जम्मो भड़ास नइ उतर जाय। बीच म बोले माने अपने हाथ म घाव करे बरोबर हे। टार रोगहा ल आँखी म देखके माछी ल काबर खाववँं।


परमिला पूछे लगथे - ‘आज ओकर ससुर जीयत रहितिस त का होतिस जानथस ?’ अपने सवाल करथे अउ अपने जुवाब तको दे लगथे - ‘बखेड़ा खड़ा हो जतिस बखेड़ा’। अहिल्या कभू मुड़ी ल डोलावय। कभू ‘हँ -हूँ’ काहय, त कभू मुँह ल ’’चक-चक’’ बजा देवय। जानो मानो जम्मो के जम्मो बिपत हँ ओकरे मुड़ म आके खपलागे हवय। अब बिपत खपलाए नइ खपलाए के बात कुंडा तरी जाय फेर अभीन तो आगू म बड़े जन मुड़ पीरा माड़ेच हे।


परमिला इही मेर नइ रूकिस। कहिथे -‘मोर चलतिस त मैं एकर कदाप मुँह नइ देखतेवँ वो। कहाँ कहाँ नीच घरायन म बिहा परेन।’ अब परमिला अपन छरियाए चुँदी ल सकेल के खोपा बाँध डरिस। मुड़ म हाथ ल रखके चिंता म बियाकुल मन कस कहे लगिस- ‘मैं पचासो पइत ओकर ददा ल बरजे होहूँ, आरा -पारा, तीर -तखार ल बने पूछ -गऊछके, देख- परखके माँगबे न कहिके। उहू मुड़पेलवा हँ जब करिस ते अपनेच मन के। मोर एको नइ चलन दिस । येदे, हो तो गे बारा गति। अपन हँ जुड़ा सितरा के बनौका ल बना लिस। मैं हँ फाँदा म परगेवँ।‘ 


उही होइस जेकर अनमान अहिल्या ल पहिलीच ले रिहिस हे। गोठियाते -गोठियावत परमिला बोमफार के रोए लगिस । रोवत -रोवत परमिला अपन सबो पुरखा के जम्मो गुन अवगुन, भल अनभल ल फलफल -फलफल बाँच के ओरिया -ओसा तको डरिस।


अहिल्या जानथे के बात ल बतगंड़ बनाये के आदतेच हे परमिला के। तभो ले ओकर खाँध म हाथ ल मड़ाके सहिलावत ढाँढस बँधाथे - ‘आजकाल के बहू मन ल का कहिबे बहिनी ! कहिबे तेनो अनभल हे, नइ कहिबे तेनो अनभल ।’

खाँध म अहिल्या के हाथ माड़े नइ पाइस परमिला सट्टे चुप होगे। जइसे खजानी पाके रोवत लइका चुप हो जथे।


परमिला ल लगे लगिस के अहिल्या हँ घलो मोर दुख म बियाकुल हे। ओकर ताव थोरिक जुड़ाय लगिस । मन के भड़ास निकल गे। मुड़ी ल नवाए वोहँ सोचे लगिस। ले दे के शांत होवत देखिस तब जाके अहिल्या के जी म जी आइस। अहिल्या समझ गे के परमिला के नस-नारी जुड़ा गे। अब  लोहा म पानी मारे के बेरा आ गे। 


अहिल्या कहिथे  -‘बड़ेमन ल घुरूवा बनेच बर परथे परमिला । नान  -नान बात म किटिर -काटर होवत रहिबोन त परिवार हँ कइसे चलही ?’ 


परमिला के मुँह ल बाँचत-पढ़त अहिल्या आगू कहिस -‘गलती काकर से नइ होवय ? लइका हँ जाँघ म हग दिही त जाँघे ल काटके थोरे फेंक देबे। धोए- पोंछे बर तो हमीच ल परही न !’ 

अहिल्या जानथे के मैं कहूँ थोरको खसलेंव ताहेन परमिला मोरे ऊपर चढ़ बइठही। धीर लगाके बात ल साधत कहिस - ’कोनो ल दोश दे ले बात नइ बनय बहिनी ! खुदे के फदित्ता भर होथे। पर के पान खाए ले अपन मुँह नइ रचय। हमरे घर हमरे दुवार । बनही त हमरे बिगड़ही त हमरे।’ अहिल्या बोलते राहय अउ परमिला के मुँह ल ताकत तको राहय। 


ओकर हाव-भाव ल सरलग टमरत अहिल्या कहिते गइस-‘कोनो अपन मन म काँही राखय, काँही काहय, कुछु करय। हमी हँ अपन फरज ल निभा लेथन सोचके बेटा ल बेटा अउ बहू ल बेटी ले दूसर भाखा नइ काहन। लइका मन संग खेल खाके दुख पीरा ल बिसरा लेथन ।’


अब अहिल्या के भरोसा जाग गे। वोहँ जान डरिस कि परमिला ओकर गोठ ल सुनत, गुनत धरत हावय। आगू कहिथे- ‘फेर हाँ ! गऊकीन, इमान से परमिला ! तैं पतिया चाहे झन पतिया । जेन दिन ले मैं सबिता ल बेटी कहे ल धरे हववँ, वो दिन ले सास -बहू के बीच के जम्मो डबरा -खोचका मन पटा गे हे। बेटी कस मया - दुलार ल पाके सबिता तको हँ बेटी ले जादा मोर हियाव करे लगे हावय । अब काँही  के संसो फिकर नइहे मोला। मैं मन म सोंचे -सपनाए नइ राहवँ, आगू - आगू ले मोर साध पूरा हो जाथे।’


परमिला चुप अहिल्या के मुँह ल बोकबाय देखे लगिस। जानो मानो कोनो गहीर सोच-बिचार के दाहरा म डुबकी लगावत हे।

अहिल्या कहिथे- ‘जइसे देबे तइसे पाबे, जइसे बोबे तइसे लूबे। करम गति सब ल इहेंचे भोगे बर परथे।’ अतके ल सुनिस अउ परमिला अपन अँचरा ल झर्रावत रटपटाके उठगे, जना -मना कोनो खचित काम -बूता के सुरता आगे। के जना मना कोनो अनमोल जिनिस पा घलिस -का पाइस, परमिले जानय। फेर मुसकुराए बानी म कहिस- ‘ले बइठ दीदी जावत हौं ! अबड़ बेरा होगे’ अउ तुरतुर-तुरतुर रेंगते बनिस।

अहिल्या अपन गोठ ल मुँह म धरे के धरे बोकबाय देखते रहिगे।


धर्मेन्द्र निर्मल

कुरूद भिलाईनगर जि. दुर्ग

9406096346

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

 पोखनलाल जायसवाल:


 जिनगी सदा दिन एक जइसे नि राहय| तन म ताकत रहत ले मनखे दम दिखाथे| गरब करथे| तन के सुघरई अउ धन के बल के गरब अउ घमंड म फूल के अनेक कुप्पा हो जथे कि कोनो ल कुछु समझबे नि करय| फेर संसार म जेन ऊपर चढ़ने उही तो खाल्हे उतरथे, ऊपर म बने रहे बर कुछु थेबहा तो चाही फेर सबो जानथन कि  ऊपर अइसन कुछु हैच नइ हे| सहारा ले बर भुइयां म पांव राखे ल परथे| जिनगी के इही सार आय| घर परिवार म घलव बुढ़ापा के सहारा बर एक आसरा चाही, जेला मया परेम अउ दुलार के खातू - पानी ले सजोर करे के जरूरत रहिथे| 

        हमर समाज बेवस्था अइसे हे कि घर परिवार म बेटा बहू बुढ़ापा के सहारा बनथें| जरूरत हे कि उन ल समझन उंकर जइसे बेवस्था बनथे  ओला स्वीकार करन| उही म संतोष करन तभे तो जिनगी के जम्मो सुख मिलही | नारी जात ल गउ/लक्ष्मी कहे जाथे, कहे जाथे कि जेन खूंटा म बांध दे बंधा जथे| अइसन म बहू ल बेटी समझ के मान दे ल परही, आन कोठा ले आय लक्ष्मी ल बेटा समय दिही तभे तो बहू घर ल समझ पाही| बेटा के जिनगी म आय बहू बर नवा घर म पहली सहारा तो बेटा हर आय, समझे के आय|  मनखे के मनोविज्ञान ल सरेखत कहानी मंतर घर परिवार ल जोरे रखे अउ सुख के खजाना बताय म सक्षम हे| संदेशपरक हे|  

        एके पीढ़ी के अहिल्या अउ परमिला के सोच म फरक ल बढ़िया ढंग ले कहानी म कहे गे हे| सिरतोन म "बहू ल बेटी" समझई ह घर के सुख बर कोनो मंतर ले कम नोहय | ए दृष्टि ले कहानी के शीर्षक मंतर सार्थक हे|

         संवाद अउ भाषा शैली गजब के हे|  हाना मुहावरा के प्रयोग ले कहानी के सुघरई बाढ़े हे| सुग्घर संदेशपरक कहानी बर धर्मेन्द्र निर्मल जी ल बधाई🙏🙏

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह) 

जिला बलौदाबाजार छग

कृषि संस्कृति अउ छत्तीसगढ़ी"*

 *"कृषि संस्कृति अउ छत्तीसगढ़ी"*


               हमर छत्तीसगढ़ शुरू ले कृषि अउ ऋषि संस्कृति ले रचे-बसे हवय। इहाँ के 76 प्रतिशत लोगन मन कृषि अउ उँखर ले जुड़े उद्योग-धंधा मा सरलग काम करथे। धान के पैदावार सबले जादा होथे, ऐखर सेती छत्तीसगढ़ ल "धान के कटोरा" के नाव ले दुनिया भर प्रसिद्ध हे। सँगे-सँग इहाँ गहुँ, चना, कोदो, कुटकी, अरसी, मसूर, तीली, रहेर, पटवा, सरसों, सूरजमुखी, मटर अउ जोन्धरा के घलो खेती होथे। इहाँ के लोगन मन बर बारो महीना काम के कमी नइ रहय। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के अब दुनिया भर मा शोर होगे हवय। इहाँ के कृषि संस्कृति बड़ मनभावन हे। खेती-किसानी के बुता मा लगे पसीना के ओगरत ले कमईया किसान अउ उँखर सँग  छैहाँ सही कमेलिन किसानीन के जीवन-दर्शन मा बड़का ग्रंथ लिखा जाही। हमर पुरखा सियान मन कहे घलो हे- "खेत के बोय अउ कोठार के पाय।" खेती के काम मा घर भर के मनखे मन भीड़ें रहिथे, तभे किसानी के बुता ह पूरा होथे। जादा काम होय ले पारा-परोस के मन घलो एक-दूसर के खेत मा कमाये बर लगथे। अईसन सहयोग के भाव ले हमर कृषि संस्कृति मा उत्साह, प्रेम, भाईचारा अउ समरसता ह लबालब भरे हे।

               कृषि संस्कृति के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के जम्मो तीज-तिहार, पूजा-पाठ, संस्कार, मड़ई-मेला, गीत-संगीत, नृत्य मन शामिल हवे। जेमा अकती, सवनाही, हरेली,भोजली, पोला, नारबोद, कमरछठ, इतवारी, देवारी, जेठोनी, मड़ई-मेला अउ छेरछेरा तिहार जईसन उत्सव मा कृषि संस्कृति समाहित हे। ये तीज-तिहार मा प्रकृति ले सीधा जुड़ाव हवय।

               छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति अब दिनों-दिन खुशहाल होवत जात हे। किसानी के कतको जुन्ना तरीका ह नन्दावत हे, त कतको नवा-नवा वैज्ञानिक तरीका ले कृषि के काम सरल अउ जल्दी घलो हो जात हे। कभू-कभू सरकारी सहयोग मिले ले किसान अउ किसानी काम ह घलो समृद्ध होवत हे। जिहाँ कभू पानी के साधन नइ रिहिस, निचट पथर्री अउ मुरमाहा रिहिस, उहाँ घलो आज पानी हाथ मा होय ले अब्बड़ उपज होवत हे। किसान अनाज के सँग भाजी-पाला बोके अपन घर बर अउ बेचे बर घलो पैदा करत हे।

            छत्तीसगढ़ मा ज्यादातर कृषि  काम ह अकती तिहार के दिन ले शुरुआत होथे। अउ सरलग नौ-दस महीना ले चलथे। येमा खरीब अउ रबी फसल दूनो होथे। अइसे तो कृषि काम ह साल भर घलो चलथे। फेर  किसानी के नवा बछर अकती तिहार ले सियान मन शुरुआत करत आवत हे। धान बोवाई ले मिंजई-कुटई तक अउ जिंकर खेत मा उन्हारी होथे उँखर बर चना-गहूँ के लुवात ले किसानी के बुता रथे। किसानी बुता बने रम के करे ले होथे। ठठ्ठा-दिल्लगी मा खेती नइ होय। एक ठन कहावत हे- "बो दे गहूँ चल दे कहूँ।" अईसन मा नइ बने।

             कृषि मा हमर पुरखा मन के दिये अब्बड़ संस्कृति के दर्शन होथे। इहि संस्कृति ह सब झन ल बाँध के रखे हे। किसानी के बुता ह हाड़ा-तोड़ई बुता आय। दिनभर कमात हाथ-गोठ थक के अल्लर पड़ जाथे। तब बीच-बीच मा आराम करे के सेती कई ठन तिहार मनाथे। इंखर ले फेर नवा बल बँधाके काम म जुट जाथे। तिहार-बार मानत, गीत-संगीत मा झूमत, करमा-ददरिया, कविता, कहानी-किस्सा, जनउला-चुटकुला ला सुनत कृषि के काम ह पूरा होथे। ये शोध आलेख मा छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति ल प्रस्तुत करे के प्रयास करत हों।

          अकती तिहार मा गाँव भर के मन मातादेवाला मा सकलाय रथे। नान्हे-नान्हे लइका मन ल प्रतीक स्वरूप बैला बनाके लकड़ी के नांगर धराय रथे। अउ गोल-भाँवर रेंगें बर कथे। एक झन बैला बने लइका मन ला खेदद जथे, अउ दूसर ह धान बोवत जथे, फेर तीसर आदमी ह उँखर मन मे पानी रुकोवत जाथे। ये गाँव के लइका मन मा कृषि संस्कृति के बीजारोपण करके कृषि काम ल उँखर जिंदगी सँग जोड़े के जतन आय। बाद मा बैगा के पूजा-पाठ करे के पीछू परसा पान के दोना में धान ल देथे। घर के सियान जब धान के दोना ल लाथे, तब घर के मुहाटी मा दाई-माई मन लोटा मा पानी ओइचथे अउ पाँव परके घर के भीतरी म लेजथे। अन्न के कतका मान-सम्मान होथे, ये छत्तीसगढ़ के संस्कृति मा देखे ल मिलथे। फेर उही धान ल खेत म लेज के एक कोन्टा मा बोय जाथे। जेला मुड़ सोरना घलो कहिथें।

           मानसून के आय के पहिली खेत के कांद-दूबी मन ला जम्मो रापा मा छोल डारथे। गरमी के मारे सबो कचरा मन अटिया जाथे। घुरवा के खातू-कचरा खेत भर बगर जाथे। आसाढ़ मा पानी गिरीस तहन किसान मन अपन खेत डहन ठऊंका धियान देथे। कतको झन बोथे त कतको मन परहा रख देथें। नहिते "डार ले चूके बेंदरा अउ बांवत ले चूके किसान" वाले किस्सा होथे। खेत मा किसान के अरर-ततत अउ महतारी मन के करमा-ददरिया के तान सुनाथे। लक्ष्मण मस्तुरिया अउ निर्मला ठाकुर के गीत रेडिया मा बाजे लगथे-


   "चल-चल गा किसान बोय चल धान, आसाढ़ आगे गा...

    जेठ बैसाख तपे भारी घाम, अकरस के नांगर पको डारे चाम,

    अब किड़कत बिजली ले ले तोर नाम, आसाढ़ आगे गा.."


             सबो के खेत मा छत्तीसगढ़ महतारी के हरियर लुगरा असन धान हा दिखे ला लगथे। बांवत के काम पूरा होथे, तब नांगर-जुड़ा के सँग सबो किसानी के औजार मन ला तरिया मा धोके घर के बीच दुवार मा पूजा करथे। बेल पान, चीला रोटी अउ नरियर चढ़ा के उँखर कृतज्ञ मानथे। जेला हरेली तिहार कहे जाथे। इहि दिन ले लइका मन बर गेड़ी बनाये के परंपरा हे।

            बियासी के बेरा चपचपहा पानी रहे ले बियासी अच्छा बनथे। बियासी के नांगर जब चलथे तब चारों कोती अरर-ततत के मीठ बोली ह गीता-रामायण बांचे असन लगथे। महतारी मन गीत गावत धान ल चाले के बुता करथे। कुंज बिहारी चौबे जी के गीत किसान के सजीव चित्रण करत बियासी बर सुरता आथे-


"पहिरे बर दू बीता के पागी जी,

पीये ला चोंगी, धरे ला आगी जी।।

खाये ला बासी, पिये ला पेज पसिया।

करे बर दिन-रात खेत मे तपसिया।

साधु जोगी ले बढ़के दरजा हे हमर,

चल मोर भइया बियासी के नांगर।।"


            इतवारी तिहार गाँव मा पाँच नहिते सात ठन माने जाथे। जेमा खेत मा चीला रोटी चढ़ाये के सुग्घर संस्कृति हवय। चीला रोटी, सेना आगी, पानी, हूम-धूप, अगरबत्ती धरके खेत जाथे अउ पूजा-पाठ करके चीला ला खेत मा चढ़ा देथे। अउ अन्न महाराज के अरजी-विनती करथे कि एसो मोर खेत मा बने उपज होके जम्मो कोठी-डोली हा भर जाय। महतारी मन खेत निंदत गीत, कहानी, किस्सा घलो सुनाथे। अईसन होय ले काम के थकासी दूर हो जाथे, अउ घातेच मजा घलो आथे। छत्तीसगढ़ के कवि डॉ. जीवन यदु "राही" जी के पुस्तक 'माई कोठी के धान' के ददरिया ल देखव-


              " बटकी मा बासी, कटोरिया मा नून।

            मैं गावत हौं ददरिया, तैं खड़े-खड़े सुन।।


             धान बाढ़े के बाद पोटराय के समय आथे तब गॉंव वाले अउ बैगा के सलाह ले गरभही तिहार घलो मनाथे। ये दिन कोनो आदमी खेत-खार नइ जावय। कहे जाथे कि इहि दिन अन्न महारानी ह गर्भ धारण करथे। तब खेत मा हलचल नइ होना चाही। एकांत के जरूरत होथे। हमर कृषि संस्कृति हर मनुष्य जीवन के कतिक तीर हवय। किसानी काम प्रकृति ले बिल्कुल जुड़े हवय।

                इहि समय पोरा के तिहार होथे। ये तिहार मा कृषि काम में सहयोग करईया बईला मन के पूजा होथे। बईला मन के कृतज्ञता के तिहार पोरा आय। इहि समे बहिनी मन ला तीजा घलो लानथे।मइके के बाँचे निंदई ला पूरा करे ल लगथे। फेर भाई मन बहिनी अउ भांची-भांचा मन बर बढ़िया कपड़ा-लत्ता देके खुशी मनाथे।पोरा तिहार बर एक ठन हाना हवय- "मानिन पोरा हेरीन मोरा।" मने पोरा तिहार के बाद पानी के गिरना कम हो जाथे, तब मोरा ओढ़े के जरूरत नइ पड़य।

         पोरा के बिहान दिन नारबोद तिहार होथे। जेमे खेत अउ बाड़ी में भेलवा, कर्रा के डारा ला खोचें जाथे। ये डारा मन के रस मन खेत मा मिल के फसल मन बर दवाई के काम करथे। डारा मा चिरई मन बैठते अउ फसल के कीरा-मकोरा मन ला खाके फसल के नुकसानी ले बचाथे। अईसने खेत के रखवाली मा उपयोगी होथे झाँका जेला कागभगोडा घलो कहिथे। जुन्ना कपड़ा, लकड़ी, डोरी, करसा ले येला बनाये जाथे। ये दुरिहा ले देखे मा आदमी सही दिखथे। येला खेत के बीच मा गड़ा देथे। चिरई-चिरगुन अउ जानवर मन येला देखथे अउ आदमी हवय कहिके फसल ला खाय बर नइ आय। एकरो ले फसल के नुकसानी ह बच जाथे। ये कृषि संस्कृति के बढ़िया चित्र आय।

           ये बढ़िया संस्कृति आय कि हमन जब कोई चीज ला ग्रहण करथन तब सबले पहिली देवता-धामी में चढ़ाये के संस्कार सियान मन देहे। धान के नवा फसल आथे तब सबसे पहिली देवता-धामी में फसल ला चढ़ाये के संस्कृति बने हे। बाद में नवाखाई तिहार मनाके प्रसाद के रूप मा ग्रहण करथे। नवा खाये के तिहार मा सबो परिवार एक जगह सकलाय रथे। ये कृषि संस्कृति में आज घलो चलत हवय।

               धान के लुवाई बेरा खेत जावत नवयुवती मन के रेंगई ल जनकवि कोदूराम 'दलित' अपन लेखनी के माध्यम ले किहिस-


"छन्नर-छन्नर पैरी बाजय, खन्नर-खन्नर चूरी।

हाँसत कुलकत मटकत रेंगय, बेलबेलहीन टूरी।।


                फसल के लुवाई हा एक-दू झन के बुता नोहे। येकर बर सबो परिवार अउ जादा काम रेहे ले आसपास के लोग मन एक-दूसर के खेत मा जाके लुये के काम ला करथे। गॉंव मा सहयोग के भाव, आपसी भाईचारा, प्रेम-व्यवहार बने हवय। इहि संस्कृति के जड़ आय। फसल के लुये के दिन जब गाँव मा सहयोग करे बर तियारथे। तब खेत मा परिवार के मन कइसे बुता करथे, जनकवि कोदूराम दलित जी के काव्य मा सजीव चित्रण होय हे-


   "दीदी लुवय धान खबाखब भांटो बांधय भारा।

     अउंहा-झउंहा बोहि-बोहि के लेजय भौजी ब्यारा।।

    लकर-धकर बपुरी लइकोरी समधिन हर घर जावय।

    चुकुर-चुकुर नान्हे बाबू ल दु-दु पिया के आवय।।"


          देवारी के दिन गाय के गला में सुहई बाँधे के रीत बने हे। परसा जड़, चिन्दी अउ मंजूर पांख ले बने सुहई गाय-गरुवा मन के स्वास्थ्य बर बने होथे। गोधन के पूजा के रिवाज पुरखा मन के समे ले चले आवत संस्कृति आय। घर के मन नया फसल के बने खीर-भात तो खाथे। उहें घर के गाय-गरुवा मन बर घलो नया चाँउर के खिचरी भात सँग रोटी अउ कांदा-कुम्हड़ा के साग बने रथे। उँखर खाय के बेरा प्रसाद के रूप मा निकाले खिचरी, भात अउ रोटी- साग मन ला घर भर के मन खाके आनंद पाथे। किसान जीवन मा पशु-प्रेम के अतका बड़े का उदाहरण हो सकथे। राउत भैया मन के दोहा मा कृषि संस्कृति के बढ़वार होय के सुग्घर कामना भरे रहिथे-


   " जैसे के मालिक! दैहौ-लेहौ, तैसे के देबो आसीस।

  अन्न धन्न तोर कोठा भरे भैया, जीयौ लाख बरिस।।"

            

             खेत के फसल ला भारा-भारा बँधाके कोठार तक पहुँचाये बर अब्बड़ जतन करे ल लगथे। फेर  मिंजे के पहिली कोठार में झाला बनाना अउ उहें सुते के कपड़ा-लत्ता, चाहा-पानी के सामान रखना शुरू होथे। सबो धान के मिंजात ले झाला हर किसान बर घर सही काम आथे। अंगेठा के आगी मा रात भर जागे-जागे सुतना अउ बिहनियां ले गाड़ी, बेलन, दौरी फाँदना कृषि संस्कृति के अंग हरे। येहा समय के सँग नंदावत जावत हे। मशीन के जमाना हर कृषि संस्कृति ला लीलत जात हे।

             कोठार के झरती मा झरती कोठार बढ़ोना खवाई ह गाँव मा आज घलो चलत हवे। जतीक झन कमाये ला लगे रथे, ओतिक ला खाना खवाना कृषि संस्कृति के उदारता के प्रतीक आय। बढ़ोना बाजार के दिन जादा करथे, जेकर ले साग-भाजी लेय बर सहूलियत होय। रोटी, बरा, खीर, भात-साग के सँग प्रेम से बइठ के खवाई के अलगे मजा हवे। बढ़ोना कमइया मन ला खुश करत उँखर मेहनत के मान-सम्मान करे के उदिम आय।

             झरती कोठार मा बेटी माई मन ला धान देय के घलो बढ़िया संस्कृति हवय। धान मिंजे के बाद सबो धन तो बेटा मन के हो जाथे। बेटी-माई किसानी काम मा नंगत के भीड़ें रहिथे। बेटा मन ले जादा काम बेटी मन करथे। बेटी ला पराया धन कहिथे, उँखर तो बाप घर के कहीं नई होय। अइसे सोच के झरती कोठार मा अपन शक्ति अनुसार कोठार धान देय के सुग्घर संस्कृति बने हे। झरती कोठार के दिन बेटी मन एक ठन नरियर कोठार के सीग मा रख देथे, फेर उँखर कोठार धान मिलना तय हो जाथे। कोठार धान ला जम्मो बहिनी मन पैसा भंजा के आपस में बांट के अब्बड़ खुश होथे।

           छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति सबले जादा उदार हवे। दुसर ला खवाय-पियाय अउ दान-धर्म करे बर सदा आघू रहिथे। इहि कारण तो इहाँ दान-पुन के परब छेरछेरा तिहार मनाये के सुग्घर रीत हवय। जेमा छेरछेरा मंगईया सबो झन अन्न के दान देथे। ये छत्तीसगढ़ के भुइयाँ के प्रताप आय कि इहाँ सब झन दूसर ला दान देय बर समर्थ हे। धान-पान के घर के कोठी-डोली में भराय के बाद कतको मँगईया घर-घर मांगें बर आथे। जेमे हरबोलवा, गोरखनाथ वाले चिकारा बावा, जय गंगा वाले, पीर बाबा, साँप वाले, दवाई ताबीज़ वाले, देवार मन, नांदिया बईला वाले अउ कतको आथे। इहि कारण कथे घलो- "छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया।"

           कृषि संस्कृति मा गॉंव के जरूरी काम वाले मन बर जेवर देय के व्यवस्था बने रथे। एमा साल भर बाद फसल के उपज अन्न धान, कोदो, कुटकी ला निर्धारित नाप मा देथे। नापे बर काठा, पईली मानक होथे। राऊत, नाई, लोहार, धोबी, मोची, कोटवार, बैगा अउ घर के नौकर-चाकर एमे शामिल हवय। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के यहू बड़का प्रमाण आय।

             मड़ई-मेला गाँव के सामाजिक समरसता के प्रतीक आय। येला गॉंव के वार्षिक उत्सव घलो कहि सकथन। कृषि संस्कृति के साल भर के कमई के बाद मिले उपज के खुशी मा उत्सव मनाय बर मड़ई-मेला के जन्म होय होही। मड़ई मा किसान मन अपन जरूरत के सबो सामान ला खरीद लेते। एमे दिल खोल के खर्च करे जाथे। अपन परिवार अउ सगा-सोधर मन ला नेवता देके बलाथे, अउ सबो मिल के ये उत्सव ला मनाथे। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के सबो तिहार मन आनंद ले भरे हे।

        

निष्कर्ष:-

         छत्तीसगढ़ राज कृषि संस्कृति के गढ़ आय। इहाँ कृषि काम के शुरुआत ले किसिम-किसिम के तिहार मनाये जाथे। जेमा कृषि संस्कृति के सजीव दर्शन होथे। इहाँ के सबो तिहार मा कहीं न कहीं संस्कृति समाये हे। अउ संस्कृति हा सोझे प्रकृति ले जुड़े हवय। किसान अउ कृषि संस्कृति छत्तीसगढ़ के मुख्य आधार आय। संस्कृति मन पुरखा के देय संस्कार हरे, जेमा ज्ञान, अनुभव के सँग आपसी प्रेम-व्यवहार, सहयोग, भाईचारा अउ समरसता कूट-कूट के भरे हे।  कृषि संस्कृति ग्रामीण जन-जीवन के प्राण शक्ति हरे। येकर बिना जीवन सुना अउ नीरस हो जहि। अब के मशीनरी समे में कृषि संस्कृति के कतको नेंग ह नंदावत हवय। संस्कृति सब झन जोड़े के काम आय। अब सब लोगन सामाजिकता ले दुरिहाय सही करत रथे। दिनो-दिन संस्कृति हा पीछू छूटत हे। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति ला बनाये रखे बर येला अपन व्यवहार में लाना जरूरी प्रयास होही। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति छत्तीसगढ़ के रहवईया जम्मो मनखे ल पुरखा ले मिले विरासत आय। इहि कृषि संस्कृति हर छत्तीसगढ़ के सबो संस्कृति के जड़ हरे। छत्तीसगढ़ के जम्मो मनखे ल कृषि संस्कृति ह जोड़ के रखे हे।


हेमलाल सहारे

मोहगाँव(छुरिया) राजनांदगाँव

व्यंग्य - भगत के गत

 व्यंग्य  - 

भगत के गत 

जगतरामजी बात के बत्तु, काम के टरकु। कमाए बर जब्बर अल्लर अउ खाए बर अल्लार चिक्कन। बिन कमाए काला खावय, त भगवान के पीछु परे जाय। जनम देवइया कोन ? -भगवान ! पालही कोन ? -भगवान !! लाद दे लदा दे, दस कोस पहुँचा दे। भक्ति के डोर ल ‘चमचम-ले’ पकड़ लिस जगतराम। अइसे-तइसे जगतराम के टीआरपी ‘घमघम-ले’ बाढ़ गे। टीआरपी बाढ़े ले वोहँ भगत के नाँव ले जगप्रसिद्व होगे। ओकर भरोसा मीडिया ल अपन टीआरपी बढ़ाए के चस्का चढ़गे। भगत के गत, सत, लत, मत अउ रत के हाल-चाल जाने खातिर मीडियावाले ओकर घर जाए के सोचिस।

भगत जी परछी म पलथियाए जेवन भकोसे के तियारी म रहय। आचमन करके पहिली कौंर ल भगवान के भोग बर थारी के खाल्हे भूइयाँ म मड़ाए भर रिहिसे। ओतके बेरा मीडियावाले मन धमक दीन। भगतजी देखिस। उन ल बइठे के इसारा करके अपन हँ गपागप गफेले लगिस। 

भक्तिन उन्कर चहा-पानी के बेवस्था करे लगिस। मार झमाझम नवा लुगरा, स्नो पावडर म पोताए चमाचम चमकत चेहरा। छम्म-छम्म पइरी ल छनकावत जब भक्तिन रेंगय त पत्रकारमन के टीआरपी अंतस ले पाँच हाथ ऊपर छलके-उछले परय। उही समे बारी कोति ले गाय आइस अउ अँगना के सुखावत धान म अभर गे। 

‘उँ....उँ... उँ....उँ... उँ....उँ..ं’ भगत जी मुँह भर भात बोजे-बोजे नरियाइस।

‘हे हे हे हे.....’ भक्तिन पानी देवत चिचियाइस।

भगतजी के माइण्ड छरियागे। कौंरा उठे के उठे रहिगे। कुपित होगे। कोंटा कोति इसारा करत भक्तिन ल गुर्री-गुर्री देखे लगिस -‘उँ....उँ... उँ....उँ...’

भक्तिन पानी ल छोड़ कोंटा म गिस। डण्डा ल धरके आइस अउ गइया ल सोंटियावत खेदारिस।

भक्तिन के आवत ले भगत जम्मो साग ल रॉफेल कस गफेल डरे रहय। भक्तिन धकर-लकर कटोरी म भाजी साग धरके आइस अउ दे लगिस।

‘हूँ...।’ भगतजी एकऊहा गँऊहा डोमी कस फुसकारिस अउ दूसर कटोरी कोति इसारा करिस। 

भक्तिन लहुटिस, तुरते दूसर कटोरी धरके फेर आगे अउ साग ल परोस दिस।

‘कोंदा हे तइसे लगथे यार’- एक अखबारी दूसर तीर संका जताइस। 

सक चलय चाहे झन चलय फेर पुलुस अउ पत्रकार के संका बजुर चलथे। बिना संका करे उन्कर अन्न पचय, न प्रण पूरा होवय।

‘नहीं, बोलथे गोठियाथे।’

‘त ये सब नैन-मटक्का, इसाराबाजी का हरे ?’

‘ले न खाके उठन दे, पूछ लेबोन।’

‘पूछे-जाने बर तो आएच हन का।’- दूनो आपस म नैन-मटक्का करत एक-दूसर ल अपन-अपन बत्तीसी के चमक देखाइन। 

‘बोयंअं... !!!’

अखबारीमन चमक गे-‘अचानक भँइस कहाँ ले आ गे।’ उन अबक-तबक उठके भगइयच् रिहिन हे कि देख परथे -‘अरे ! अलकरहा डाँहकी कस डकारथौ भगतजी।’

भगतजी डकारत अपन भक्तई झाड़िस- ‘बोंयंअं.... जऊन काम करय डंका के चोट म करना चाही, का गुपचुप रखय गुहरामन कस। ये डकार हँ पेट भरे के इसारा हरे । एकर ले उपरहा खाए, माने हदरहा कहाए। अइसे आपमन कहाँ ले पधारे हौ साहेब ?’

‘हमन ‘‘अपना सपना छपना’’ समाचार वाले अन। तुँहर लोकप्रियता सुनके थोक -बहुत जानकारी ले बर आए हन।’

‘सपना छपना’ के नाँव सुनते साथ भगतजी के मन हिरना होगे। वोहँ मनेमन मनी-मनी के जंगल म छपाक-छपाक उछले लगिस। खुसी के मारे मुँह ले हाँसी छलांग मारे परय। होंठ तनाय लेवय अउ दाँत बाहिर कूदे परय। भगतजी खुसी ल खाँसे-खखारे के बहाना खखौरी म चपक के राखिस। तेकर पाछू गंभीरता के कथरी ओढ़के कहिस-‘पूछौ न का जानकारी ?’

पत्रकार महोदय सद्भावना मैच के सुरूवात करत कहिस-‘भगतजी ! खावत-खानी जउन घटिस हे, तेला हमन समझ नइ पाएन, थोरिक बताहू का ?’

भगतजी नेवरिया बहू कस लजागे-‘छोड़व ओला साहेब।’

‘ओला नइ लिखन-देखावन भई। अइसेनेहे झोलाछाप सवाल हरे वोहँ।’

भगत जी एक मन सोचिस -‘तुँहर बर भले झोलाछाप हे। मोर बर तो कई तोला के हे रे भइया।’ फेर कहिस-‘काहे.....पहिली मैं चिचियाएवँ कि गाय आ गे, भगावव।’ दूसरइया पइत खिसियाएवँ कि ‘हे हे’ म नइ मानय, ओदे कोंटा म डण्डा परे हे, मार के भगा स्साले ल।’

‘अउ जेवन परोसे के बेर तको तो कुछू कहत रेहेव का ?’

‘पहिली खेप म भाजी लाए रिहिसे, ओला मना करेवँ। गोभी-आलू के चिखना ल मँगाए हौं।’

‘भक्तिन संग कुछू अनबन-वनबन होगे हे तइसे लगथे ? सबो बात ल इसारे म करत देखे हन ?’

‘नहीं...बने-बने हे गा। मैं खावत-खानी बोलवँ नहीं, मौन धारण करके खाथौ अउ एके परोसा खाथवँ।’

‘काबर ?’

‘मौन, माने बानी म संयम। खावत बेरा बकर-बकर बोलत रेहे ल अन्न के अपमान होथे। मौन रहिके खाए ले अन्न के मान होथे। जइसन करबे अन्न वइसन होथे मन। ये मौन हँ मन के ‘छन्न-छन्न’ ल रोके-थाम्हे के साधन हरे।’

राहेर काड़ी म दाँत ल खोदियावत भगतजी आगू कहिथे -

‘इही तो संयम, भक्ति अउ संतोस के चिन्हा हरे। एके परोसा माने जतका हे ओतके म संतोस। संतोस ले बड़े कोनो धन नइ हे।’

‘त चिखना ल...... ?’

‘चिखना के का दीखना अउ का लिखना साहेब। वोहँ चल जथे।’ भगत जी हल्लू-से दाँत ल निपोरिस अउ मनेमन अपवित्र मंत्र उच्चारे लगिस- ‘ये अनदेखना मन मोर खवई ल तको नइ देख सकिस।’

‘तुँहर प्रमुख देव कोन हरे ?’

‘अइसे तो हमर जात-गोत के देवता ‘दूल्हा देव’ हरे। फेर मैं सबो देवता ल मानथौं  -पूजथौं। समे अउ परिस्थिति के मुताबिक। पढ़ई जीवन म सरस्वती माँ के पूजा करेवँ। बर-बिहाव के पीछू धन के देवी लक्ष्मी के पाछू पर गेवँ। अभीन-अभी सिव पार्वती ल मनाए के चक्कर म हौ।’

‘माने कोनो एक ठिन म तुँंहर पूरा आस्था नइ हे ?’

‘आस्था अतेक सस्ता कइसे हो जही दाऊ, परिया म माड़े जिनिस तो नोहय, जऊन रस्ता चलत मिल जही। ओकरो बर उदीम करे बर लगथे।’

‘कारन का हे ?’

‘ज्ञान के देवी सरस्वती, धन के देवी लक्ष्मी, अब पारिवारिक मया-जुराव बर सिव-पार्वती जी। बस जस जस जइसन समे, परिस्थिति अउ जरूरत, तब-तब तइसे साधना।‘

‘साधना काए ?’

‘अपन साध ल सधोना ही तो साधना हरे।’

‘कहाँ तक पढे-लिखे हौ ?’

‘गाँवे तक भर पढ़े हौं।’

‘मतलब ?’

‘गाँव म पाँचवी तक स्कूल हे, बस ओतके ल जान।’

‘आगू पढ़े बर बाहिर काबर नइ गेव ?’

‘ओकर ले का फायदा ? दुनिया भरके पढ़ई ल मैं गाँवे म कर डारेवँ। उही किताब उही करिया अक्षर ल पढ़े बर फोकट बाहिर का घुमई। फालतू खर्चा करे के का मतलब ? संगम के पानी पी ले, ताहेन घाट-घाट जाए के जरूरते जर-बर जथे।’

अतका कहि भगत हँफर गे रहय। लंबा साँस लिस, फेर कहिस -

‘अउ सबले बड़े बात छोट-छोट लइका मन ल संभालना तको जरूरी राहय।’

‘छोट-छोट लइका माने.......?’

‘अब आप मन तो जानते हौ, स्कूल के हाल-चाल ल। सौ-दू सौ लइका म एक झिन गुरूजी। उप्पर ले दुनियाभर के चोचला। कभू ये बइठका, कभू वो बइठका, कभू वो ड्यूटी त कभू वो ड्यूटी। स्कूल म सबले बड़े महीं रहेवँ, त छोट-छोट लइकन के देखभाल करे खातिर गुरूजी मोला कप्तान बनाके एके कक्षा म दू-दू तीन-तीन साल ले रखै। अउ गुरू के मान रखत मैं पूरा ईमानदारी ले अपन फरज निभाएवँ।’

‘कतको झन कहिथे तुमन अगुवाके कोनो ल राम नइ भजौ ?’

‘काबर भजौं ? मैं राम-रहीम नइ जानौं। एक आसाराम ल जानथौं। मोर ये आसाराम ल कोनो निरासा करिस, त मैं दुर्वासा हो जथवँ। भगत होए के नाते मोर दर्जा सबले उप्पर हे। जब दर्जा ऊँच हे त नाक-माथ ल काबर नवाके रखवँ। ऊँच होके नीच काबर सोचौं। जोन मोला जयराम करही, तेकर जुवाब मैं देहूँ जी। ज्ञान ल सान से तान के रखे बर परथे गा, तब मान होथे। अउ कतको िर्झन मोर ले जलथे तको, तेकर सेति बदनाम करथे मोला।’

अइसे कहि भगत सोचे लगिस- ‘गाँव के मन मोला जोगड़ा समझथे। आज पता चलही कतेक बड़का जोगी हौं।’

‘झाड़-फूँक घलो करथौ सुने हन, का का के करथौ ?’

‘सबके। बिहाव कराए ले लेके लइका होवाए तक।’

‘ये सब ल कहाँ ले सीखे हौ ?’

‘मंतर-संतर नइ सीखे हौं भई ! मैं झूठ लबारी वाले नोहवँ। लोगन ल मोर ऊपर घातेच विस्वास हे, तेकर मजा मारके फायदा उठा लेथवँ। भभूत बड़े-बड़े भूत के बूता बना देथे।’

‘बैदई घलो करथौं ?’

अँगना कोति अंगरी देखावत भगतजी कहिस-‘देखौ, ये सब पेड़-झाड़ उही तो आय।’

‘येदे हँ का पेड़ हरे ?’

‘पेड़ के नाम तो महूँ नइ जानवँ, फेर दवई के काम आथे तेला जानथौ।’

‘का दवई हरे ?’

अब भगतजी के छट्ठी इंद्री जाग गे। ओतेक बेर खुसम-खुस खुस्स-खुस्स जुवाब देवत रिहिसे तउन फुस्स होगे। चुप रहिगे। सोचे लगिस-‘तुम्हला आमा खाए ले मतलब, पेड़ गिने ले का मतलब ?’

कहिस -‘तोला का तकलीफ हे तेला बता, मैं दवई देहूँ। उप्पर वाले के कृपा होही त बजुर बने हो जबे, अतका कहि सकथौं भई ! बाकी तीन-पाँच ल मैं नइ जानौ।’

‘कम से कम हमू एकात ठिन जान लेतेन कहिथौ बइगा महराज।’

भगतजी के जी जर-चुर के चुरमुरा गे। अंतस ले भूकंप के झटका मारे लगिस। आनी-बानी गारी के लावा निकले लगिस। सोच म परगे- ‘अरे मैं तुम्हला दवई बता देहूँ त कालि मोर दुवारी म कोन कुकुर आही। अइसनेहे सब जान डारही ताहेन मैं तो चुकुम ले हो जाहवँ। मोर टीआरपी के का होही ?’

फेर पाछू कहिथे-‘तुमन जान के काएच् करहू, भलकुन कुछू जानत होहू तेला मोला बतावव। मोर हाथ ककरो भलई हो जही, तुँहर ले भला काय सिध परही।’

‘हमन कहाँ ले जानबो महराज।’

‘जानत होहू गा, बताना नइ चाहव। मोर ले कोनो आगू झन बाढ़ै कहिके कतकोन झन मन जानत रहिथे तभो नइ जानन कहि देथे।’

जिहाँ कपट, तिहाँ सपट।

‘जिहाँ मन म कपट होथे, मनखे सपटे-लुकाए लगथे। ताहेन जेन सुनय सपट के तेन मरय अपट के ...हे हे हे ’ - काहत भगत जी अपन जम्मो कपट ल लपेट के मने म सपटा-थपकाके राख लिस-‘का बताववँ रे बइमान हो। मोरे दिमाक चाँटे बर तुमन दीमक अवतार धरे हौ। सब दवई-गोंटी ल तुमन ल फोकट म बता देववँ। मोर बताए दवई म तुमन नाम अउ दाम कमावव। मैं माँछी हाँकत बइठे राहवँ। तुँही भर मन हावव हुसियार।’

‘आपमन के भविस्य के का योजना हे ?’

‘योजना का ? अतके म खुस हौं ? गाँव, घर, परिवार, खेत-खार, रिस्तादार, नता -सैना अउ का चाही ? भभूत ले भूत भागत हे। पंडई के डंडा चलत हे। घर बइठे भर -भर हंडा पावत हौं, अंडा ढरकावत हौं। सब बर अँधियार मुँधियार हे, उहाँ मोर सरग दुवार हे। अउ का चाही, बतावव ?’

अब भगत के मति छरियाए लगिस- ‘येमन मोर माथ ल कब तक खावत रहिही भगवान।’

बइगा के ओतका भभूत ले पत्रकार मन के जम्मो टीआरपी भूत उतर गे। उन उठिन अउ रेंगते बनिन। फेर उहूमन खोजी पत्रकार हरे। गुनते रिहिन - ‘एकर भभूत ल छूत कइसे करे जाय ? ये काला-काला मिलाके गोली बनाथे ? काकर रसा निकालथे ?’

उन सबके छोड़ एक ठो अउ जबर सवाल हे -

‘ये सबके निचोर कइसे निकाले जाय ?’


धर्मेन्द्र निर्मल 

9406096346

अमृत चाॅंटे के भरम महेंद्र बघेल

 अमृत चाॅंटे के भरम


                     महेंद्र बघेल


प्रकृति ह जीव-जगत ल मुफत म धरती-अकाश, सुरुज-चंदा, नदी-नरवा, हवा-पानी, पेड़-पौधा, माटी-पथरा, जुड़-ताप अउ जंगल-पहाड़ संग जिनगी के उपहार देय हे।एकरे परसादे ये दुनिया म मनखे के जिनगानी हे। मनखे के छोड़ दूसर जीव-जंतु मन प्रक‌ति ल अकारण नुकसान पहुंचाय बिन इहें जीथे अउ मरथे।फेर सबो जीव-जंतु ले अलग दूगोड़िया मनखे के चाल अउ चरित्तर हे।

            आज के मनखे मन अजबे-गजब आधुनिक हें, विकास के ड्रोन म झूलत तमाशा देखे के शौकिन। मनखे मन हवाई जिहाज म झूलत ए पार ले ओ पार कतको दूरिहा पहुॅंच जाय भला कालाच देख डारहीं। दुनिया के कोनो भी कोना म चले जाबे सबोच मन विकास के डेना पहिर के फड़फड़ाते मिलहीं।जब अपने ऑंखी ले नटेर के देखबे तब समझ म आही कि विकासवादी मनखे के विकास के नेंव भीतर घोषणा के गारा-गिट्टी म भ्रष्टाचार के मसाला ह चटके हे।जिहां के निकास नाली डहर ले खलबल-खलबल करत सुख-सुविधा ह नावगईन्ता बईहा पूरा कस बोहावत हे।ये खलबली ले निकले अमृत जइसे जिनिस ल पाईप लमाके दस पर्सेंट वाले पेटला मन के पेट म शिफ्ट करे बर लिफ्ट करे जावत हे।बाकी नब्बे पर्सेंट वाले मन के भाग म तो काल हे, जेन अमृत चाॅंटे के भरम म अपन हिस्सा म मिले अम्मट-गोम्मट के भरोसा राष्ट्र धरम निभावत हें।

      पर के घर-दुवारी म कहाॅं जाबे, अपने गांव-गली के हवा-पानी के चिटक आरो ले लव।तब आबो-हवा म बेबस्था के खिल्ली उड़ावत सॅंउहत झाॅंकी के दर्शन इहें हो जही।

           आज के गोठ करे बर काली के सुरता घलव करना पड़ही। सियान मन रद्दा-बाट ल रेंगें-रूंगाय बर बनाय रहिन,ओमा जनता मन रेंगई के संगे-संग लगे हाथ कई ठन व्यक्तिगत काम-कारज के निपटारा घलव कर डरॅंय।चाहे ओ गाड़ा रवन, धरसा, पयडगरी, प्रधानमंत्री सड़क होय चाहे स्टेट हाइवे,सबे रद्दा के पाई मन के एके कथा कहानी ,प्रेशर ल थाम्हे लोटा भर पानी।मनखे प्रक्षेपित अपशिष्ट मलमा ले उपजे वायु प्रदूषण अउ मक्खी के भनभनाहट ले पर्यावरण ल बचाय खातिर खुल्ला म खुलासा करे के लोटाई परम्परा ल धराशाई करे बर घर भीतरी शौचालय के निर्माण करे गीस।

                  ओडीएफ के योजना ले त्रिस्तरीय पंचायती राज के पंच-परमेश्वर अउ बाबू-साहेब मन खूब मालपुआ झोरिन। कई-कई जिला म कलेक्टर मन बस अपने घेखरही चलइन। शौचालय बनाय बर हितग्राही मन के खाता म सीधा पैसा नइ भेजके अपन मुताबिक सीमेंट, छड़,ईटा, रेती दरवाजा अउ सीट ल भेज दिन।जिलाधीश के चलता पुरजा निर्णय ले हितग्राही समाज मन सीट ले होगें।

          पैसा के हल-चल अउ टोर-भाॅंज के सपना संजोय हितग्राही मन के सपना ह सपनाच रहिगे, आखिर म चुरमुरावत अपन ऑंखी के नुनछूर पानी ल गटागट पीगॅंय।

     जेन मन प्रकृति ले जुड़े रहय के लालच ल चिटको दूर नइ कर पाइन तेन मन आज ले सुबे-शाम शुद्ध आबो-हवा के मजा लेवत अपन आप ला कंफर्ट जोन मा घलव पाथें।

       सुबित्ता के आगू म यहू मन चाहथें कि शौचालय ह फोकट धुर्रा खावत काबर परेटहा परे रहय, येकर उपयोग येमा नइते ओमा जरूर होना चाही। तेकर सेती घर म बने शौचालय के उपयोग खरसी-छेना, झिटका-छिलपा अउ लकड़ी धरे के काम आथे । ये घटना ह नवाचारी जनता के बहुआयामी सोच ल घलव प्रदर्शित करथे।

          फेर का कहिबे ओ डी एफ के सिरसिरी बजावत धड़-पकड़ वेवस्था ले चातर पाई अउ प्रकृति के गोद म फारिग होय के नीजी अउ ग्रुपिंग गतिविधि म तारा लगिचगे।

           शौचालय अउ स्वच्छता के प्रचार-प्रसार ले मनखे मन के सोच में गजब बदलाव आइस।ये स्वच्छता के सपना ला अपन होके देखबे करेन, सरकार डहर ले घलव सपना देखाय के एकतरफा इंतजाम रहिस।

        जहाॅं सोच वहाॅं... के नारा ले प्रेरित होके मनखे के सोच ह पाई-परिया, तरिया-नदिया  अउ भाठा-टिकरा ले निकलके घर के दहलीज म स्थापित होगे। ये तो सुविधा हरे, सुविधा सबला चाही। का कहिबे येकर तो बड़े जन प्रेमकथा घलव हे।अब शौचालय म एक लोटा पानी ले काम नइ चले, बाल्टी-बाल्टी पानी के जरवत पड़थे। मने पानी (इज्जत) बचाय बर पानी के जादा जरवत होगे हे।

            विकासवादी मनके पूछी धरे उद्योगपति मन के गोटारन ऑंखी म बड़े-बड़े कारखाना बर सस्ता-सुकाल जगा गांव-गॅंवतरीच ह नजर आथे। तेकरे सेती कारखाना के कार्बोपवित चिमनी ले निकलत चिटियाहा धुॅंगिया ह गांव के वातावरण ल भक्तिमय बनाय बर कोई कसर नइ छोड़त हे। 

     ये भक्ति म टीवी-टाईफाइड , खाॅंसी-दमा अउ जर-बुखार हे।ऑंवाजुड़ी, मुड़पीरा एनीमिया-निमोनिया झाराझार हे। कारखाना के मंत्रोपवित उत्सर्जित पानी ले खेतखार अउ नरवा-ढोड़गा के बेड़ागरक हे, सैफो-सैफो करत मनखे बर येकर ले बढ़के अउ का नरक हे। 

      उही लद्दी पानी म डुबकैया मारत श्यामवर्णी भैसा-भैंसी मन के खस्सू-खजरी म हालत पस्त हे,डिस्टर्भ डायजेशन के नाम म पोकर्री दस्त हे। उद्योगपति ह एक ठिन अउ दूसर गांव ल मुर्गा बनाय म व्यस्त हे।

       गली-मोहल्ला होय चाहे आफिस सबे जगा के घुर्रा-माटी अउ गंदगी ल साफ करे बर सरकारी पैसा म  ब्रस-बहारी, साबुन-सोडा, सुपली-बाल्टी खरीदे के बजट  पास होइस। बजटई योजना के गुरतुर सवाद ह कते भलेमानुष ल नइ भाय होही। इही कड़ी म नौ-नौ झन ल ग्रुप म जोड़े के नौरतन अभियान चलिस। नौ-नौ झन ल ग्रुप म जोड़ो , एक ठन धाॅंसू फोटू खिंचवाव अउ वाट्सेप म ढील देव,फेर चुमुक ले ठंडा पर जाव। 

       दू दिन मंत्री-संत्री मन ल घलव साफ-सफई के भूत धरे रहिस। ये जनाब मन सरकारी बहारी ल धरॅंय अउ कोनो भी आफिस म घुॅंसर जाॅंय अउ बाहरी ल लहरावत धुर्रा के धुर्रा उड़ावत मेनस्ट्रीम मीडिया बर मटक-मटक के फोटू खिंचवावॅंय। फेर धुर्रा महारानी के अकड़ तो अकड़ हरे, मंत्री-मंडली के लहुटते साट आफिस म जस के तस पैठारो ले डरॅंय। सत्ता सरकार मन पता नहीं काबर धुर्रा के धुर्तता ल देखत धुर्रा उन्मूलन आयोग अउ धुर्रा मंत्रालय नइ बना सकिन।

      देश के दिल दिल्ली म सादा कुरता-पजामा वाले मन स्वच्छता के संदेश देय के नाम म घुरवा के कचरा ल खुलेआम बगराके बहारी म बहारत, मटमटावत ,  एंगल बदल-बदल के फोटू खिंचवाय रहिन। तेकरे सेती बहारी ह फूल-पत्ती के संशो ल छोड़के दूसर कति पल्टी मार दिस अउ अपन सुभिमान के रक्षा करे खातिर अपन मुठिया ल दूसर ल धरावत झाड़ू बनके तनगे।

         विकास के सरपट एकंगू दौड़ म गांव-गली के सोंदहा माटी म कांक्रीट के कब्जा होगे।

सुभित्ता के नाम म गांव-गांव अउ शहर-शहर म मीनार कस बड़े-बड़े पानी टंकी ठाढ़े हे जिहां ले पीयाऊ पानी ह घरोघर म पहुॅंच बनावत हे।

      तरिया-नदिया म तऊॅंर के नहवइया मन घलव आजकल घरे भीतरी म हर-हर गंगा हर-हर पाई,नहा-खोर के बासी खाई ,करत हें।

         सब कुआं-बावली ह पुण्यात्मा मन के पूजा-पष्टीय  फूल-पत्तर, राख माटी अउ आधुनिक कचरा ल अंगीकार करत पवित्रता के आखरी साॅंस गिनत हे।                  घरोघर के मुॅंहाटी म पक्की नाली तनगे हे। संगसी कस गली म नाली के अभाव ल झेलत नाहनी अउ रॅंधनी के पानी ह गॅंगरेल कस गली म सलंगत हे।धरती म पानी सोखे के माटी-धरम ह लहुलुहान हे, विकसित के सवाॅंगा म जनता हलाकान हें।

         किसम-किसम के ममहाती साबुन, डिटर्जेंट, टूथपेस्ट, रसायनिक खातू अउ कीटनाशक के बऊॅंरे ले धरती के गरभ के तलातल पानी ह जहर-महुरा होगे हे।तभे तो बोरिंग के पानी म नहाय-धोय ले चुॅंदी-मुड़ी लटिया जथे, कपड़ा धोय म साबुन के झाग ह कतरा-कतरा हो जथे।पीये म पियास नइ बुझाय,पानी के मिठास गायब होगे हे। जाॅंच ले पता लगथे कि पानी के टीडीएस बाढ़ गेहे। इही टीडीएस के नाम म आरओ वाले मन चाॅंदी काटत हे।

जेकर घर ह नाली के आखिरी छोर म बसे हे ओकर बर ये जिनगी ह नरक ले कम नइहे।सुबे-शाम नाली अउ डबरा म जलक्रीड़ा करत कोरी-कोरी सूरा परिवार के दर्शन लाभ जो मिलथे। शौचालय बने ले इकरो पेट म चोट तो लगेच हावय।

       डबरा ल का कहिबे नरवा ह खुदे नाली के पानी म उबुक-चुबुक हे। पोस्टर-बैनर म मेछरावत कका के ये चिन्हारी ह खुदे अपन चिन्हारी खोजत-खोजत लसिया गेहे।

       सुनगुन-सुनगुन चुनाव के आरो पाके नगर के नगर प्रमुख ह नाली के तीरे-तीर म फाग मशीन ले गुॅंगवा उड़ावत हे।फेर जनता के भाग म, न राग हे न फाग हे। जनता ल पाॅंच साल बर बुकिंग करइया विकास मंत्री के फोटू वाले पाकिट म चाऊर-दार अउ बरी साग हे।अहोभाग हे कि जनता बर मंत्री के अतना अनुराग हे।

       नाली के गर्भगृह ले आसवित इत्र ह फेफड़ा ल मित्र बनात हे,त घुनघुट्टी, मच्छर, काकरोच अउ माछी के भनन-भनन ले का दिन अउ का रात सबे एके बरोबर हे। मार्टिन, मैक्सो, आल-आउट, अउ रिलेक्स-प्लस के निर्माता मन एयर फ्रेशनर के सुंगध लेवत फुसुर-फुसुर सूतत हें अउ जनता मन मच्छर मार उदबत्ती जलाके मच्छर भगाय बर जगराता म चिभके हें।

       जनता मन के खुदे कोंदा होय के कीमत म नेता मन सब भैरा होगे हें।उरला-धुरहा के सॅंशो करे बिना चक्का ढुलत हे।पता नहीं कते दिन मनखे ह मनखे के चेत करे बर चेतही .!

           शौचालय,नाहनी, रॅंधनी घर अउ कारखाना के उगलत पानी ले जम्मों नाली बोजाय हे। येकर अद्वितीय जीलेवा महक ह विशेष सुविधा के नाम म जनता ल बोनस के रूप म मिलत हे। देश के नामी गिरामी नाली विशेषज्ञ अउ बजबजहा चिंतक मन के कहना हे कि येकर गैस ले कई घना बरा अउ मुॅंगोड़ी राॅंधके बेरोजगारी ले लड़े जा सकथे।

      ये बायो कम बजबजायो गैस म चूरे बरा-मुॅंगोड़ी ल आर्गेनिक प्रोडक्ट के नाम म वैश्विक बजार म ऊॅंचहा दाम म खपाय जा सकत हे। अउ "नाली ले थाली तक" जइसे नारा के जरिए  मॅंहगाई म लेसावत, थरथरावत जनता ल भरमाये जा सकथे।

         सड़क, शौचालय, नहानी-नाली सबे तो पक्की हे त पानी ल का पथरा ह सोखही, जनता ल कोई बताही कि गंदा पानी के आखरी ओरिजिनल जगा कहां हे..? का येकर निस्तारी बर कोई योजना हे..?अगर हे त योजना ह कते डहर मुड़ी ल गड़ियाय हे। का राजधानी एक्सप्रेस म घूमतहे, किंगफिशर म माला सही झूलत हे, ईरिक्शा म ढुलत हे कि पदयात्री बरोबर रेंगत हे।

             चारो मुड़ा के विकासात्मक कचरा अउ चिटियाहा पानी ले गंगा ह बहुतेच गंदा होगे हे। फेर गंगा ल साफ करे के योजना ह आज ले गंगा म उफलत हे,पता नहीं कते दिन थाह मिलही। सबे मन जानत हन हवनकुंड के आगी म हूम-धूप ल अर्पित करत समय स्वाहा-स्वाहा कहे जाथे। इहाॅं तो सफाई के नाम म अरबों-खरबों रुपया ह गंगा म स्वाहा होवतहे।मने आगी ते आगी पानी म घलव सब स्वाहा हे..?

        अतिक बड़े समस्या के ये हाल हे। त गांव-गली, नहानी-नाली, नरवा-डबरा , तरिया-परिया के आत्मशुद्धि बर दिलपुरिहा अउ रयपुरिहा  ल हमर कोनो  चिंता-फिकर हावय कि नइ गोतियार..?


महेंद्र बघेल डोंगरगांव