Wednesday, 8 January 2025

पुस्तक : ठग अउ जग, दुर्लभ छत्तीसगढ़ी हास्य लोककथा संग्रह”

 “पुस्तक : ठग अउ जग, दुर्लभ छत्तीसगढ़ी हास्य लोककथा संग्रह”


लेखक - वीरेंद्र सरल


प्रकाशक - कल्पना प्रकाशन, बी - 208 / ए, गली नं - 2, मजलिस पार्क, आदर्श नगर, दिल्ली 110033


मूल्य - ₹450/-


ISBN 978-81-19366-09-2


प्रथम संस्करण - 2023


                      “समीक्षा”


समीक्षक : अरुण कुमार निगम, आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़


“लोककथा” - 


साहित्य की दो प्रमुख विधाएँ हैं, गद्य विधा और पद्य विधा। मुझे ऐसा लगता है कि गद्य विधा का जन्म लोक कथाओं से और पद्य विधा का जन्म माँ की लोरियों से हुआ होगा। दोनों ही विधाएँ वाचिक परम्परा की हैं। लोक कथा की बात करें तो पुरातन काल में कृषि ही मुख्य व्यवसाय हुआ करता था और कृषि कार्य के उचित निष्पादन के लिए संयुक्त परिवार हुआ करते थे। युवा और अधेड़ तो दिन के समय में खेतों में चले जाते थे और घरों में रह जाते थे वृद्ध जन और बच्चे। इनके पास समय ही समय होता था। तब खाली समय में परिवार के दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के मनोरंजन के लिए उन्हें काल्पनिक कथाएँ सुनाया करते थे। इन कथाओं में नीतिपरक संदेश भी शामिल हुआ करते थे ताकि बच्चे संस्कारवान बन सकें। लोक कथाओं के पात्र प्रायः ग्रामीण परिवेश के ही होते थे। कुछ कथाओं में राजा-रानी होते थे तो कुछ कथाओं में भूत-प्रेत, दैत्य-परी जैसे काल्पनिक पात्र भी होते थे। इनके अलावा पशु-पक्षी, जीव-जंतु, वनस्पति और निर्जीव वस्तुओं का मानवीकरण भी हुआ करता था। लोक कथाओं के महत्व को किसी भी काल में नकारा नहीं जा सकता। नयी पीढ़ी को सुसंस्कृत करने के लिए लोक कथाएँ एक सशक्त साधन हैं। छत्तीसगढ़ में एक लोक मान्यता यह भी है कि अधूरी लोक कथा कहने या सुनने से उनका मामा रास्ता भूल जाता है। 


“जीवन शैली में बदलाव” - 


मानव समाज ज्यों-ज्यों विकसित होता गया, जीवन-शैली बदलती गयी। मनोरंजन के अनेक साधन बनते गये। संयुक्त परिवार, एकल परिवारों में टूटते गए। दादा-दादी, नाना-नानी और नाती-पोते एक दूसरे से दूर होते गये। दादा-दादी और नाना-नानी को छोड़ कर सभी के पास समय का अभाव होता गया। लोक कथाएँ स्मृति-पटल से धुँधलाती हुई लुप्त होने के कगार पर पहुँच गईं। आधुनिक जीवन की भागमभाग में लोक कथाओं की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। हाँ, कुछ विचारशील और प्रबुद्ध लोगों ने लुप्त होती हुई लोक कथाओं को संकलित कर संरक्षित करने का बीड़ा अवश्य उठाया है। ऐसे ही विचारशील और प्रबुद्ध लोगों में मगरलोड के साहित्यकार वीरेंद्र सरल का नाम अग्रणी पंक्ति में आता है। 


“लोक कथाओं पर वीरेंद्र सरल की किताबें” -


वीरेंद्र सरल ने “कथा आय न कंथली” शीर्षक से एक किताब प्रकाशित करवाई जिसमें छत्तीसगढ़ी लोक कथाओं का संकलन है। इस किताब के प्रकाशन के बाद भी उनका मन नहीं माना तो उन्होंने अब “ठग अउ जग” शीर्षक से एक किताब और प्रकाशित करवा ली है। इस किताब में बत्तीस लोक कथाओं का संकलन है।

वाचिक परम्परा की लोक कथाओं का संकलन अत्यंत ही कठिन कार्य है क्योंकि लोक कथाएँ सुनाने वाली पीढ़ी के अधिकांश लोग इस दुनिया से रुखसत हो चुके हैं, कुछ लोगों की स्मरण शक्ति समाप्त हो चुकी है। बस गिनती के कुछ लोग ही बचे हैं जिन्हें वे लोक कथाएँ याद हैं। दूसरा सबसे कठिन काम है, मौखिक लोक कथाओं को लिपिबद्ध करना। सुनने के साथ-साथ लिखते जाना व्यावहारिक रूप से संभव भी नहीं हो पाता। सुनाने का एक प्रवाह होता है, बस सुनकर याद रखते जाओ और बाद में उसे लिखित स्वरूप प्रदान करो। वीरेंद्र सरल जी ने अपने उपनाम को सार्थक करते हुए, अत्यंत ही कठिन कार्य को सरल करके बताया है, इस हेतु वे साधुवाद के पात्र हैं। प्रत्येक वृद्ध के पास अलग-अलग लोक कथाएँ होती है। वे न जाने कितने वृद्धजन से मिले होंगे, उनसे लोक कथाएँ सुनी होंगी, याद रखा होगा फिर लिखा होगा। निस्संदेह वीरेंद्र सरल जी का यह कार्य सराहनीय है। 


“श्रवण और लेखन” - 


कानों सुनी कथाओं को लिपिबद्ध करना भी कोई आसान काम नहीं होता है। कथानक में भाषा का ध्यान रखना होता है। आंचलिक शब्दों के प्रयोग के प्रति सचेत रहना पड़ता है। लोकोक्तियों और मुहावरों का सटीक प्रयोग करना पड़ता है। पात्र अनुसार वाक्य-विन्यास और भावों में संतुलन रखना पड़ता है। इन सबको साधते हुए कथा के प्रवाह को बनाये रखना पड़ता है। 


“इस संकलन में प्रयुक्त कुछ लुप्त होते हुए शब्द देखिए” - 


जीव बिट्टागे, अम्मल, पान रोटी, बेंझहारत, डेरौठी, निझमहा, कुल-बोरूक, मनटूटहा


“इसी तरह से मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग भी देखिए” - 


हरियर खेती, गाभिन गाय, जभे बियाय तभे पतियाय। दूसर के आँखी मे सपना नइ दिखे।

जिनगी के चिट्ठी चिराना।

टेटका के पहिचान बखरी तक।

उही जबान आ कहिथे अउ उहीच ह जा।

करम के नाँगर ला भूत जोते।

अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान।

दुब्बर बर दू आषाढ़।

खाय बर लरकू, कमाय बर टरकू।

देखा सीखी लागे बाय, चुम-चाँट के सबो जाय।

रोगहा ला छोड़ के बनाये रोगही, तोर करम के भोग ला कोन भोगही।


“लोक कथाओं में छत्तीसगढ़ के खान-पान”-


पान रोटी, चुनी-भूँसी के रोटी, भाजी-कोदई के साग, गुड़हा चीला, मुठिया रोटी, दूध-भात, मछरी-भात, बरा-रोटी, रोटी-पीठा, बरा-भजिया, खीर-सोंहारी, डुबकी-कड़ही, डुबकी-बफौरी, मालपुआ, गुलगुल भजिया, महरी-पेज


“लोक कथाओं में छत्तीसगढ़ का पहनावा”-


बारह हाथ की धोती, खुमरी-कमरा, 


“ठग अउ जग लोककथा संग्रह” : 


इस लोक कथा संग्रह में बत्तीस लोक कथाएँ संकलित हैं। प्रत्येक लोक कथा में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था दिखाई देती है। इनमें ग्रामीण पत्रों के अलावा राक्षस, देवी-देवता जैसे काल्पनिक पात्र हैं। कुछ कथाओं में पात्र को लेड़गा बताया गया है किंतु यही लेड़गा बड़ी चतुराई से बुद्धिमत्ता पूर्ण कार्य करने में सफल होता दिखाई देता है। कुछ लोक कथाओं में प्रकृति, पशु-पक्षी, जीव जन्तु, पेड़ पौधे, कीट पतंगे आदि का भी मानवीकरण किया गया है। कुछ कथाओं में चमत्कार, तिलस्म और जादू जैसी पारलौकिक शक्तियों का भी वर्णन किया गया है। कुछ कथाएँ कमरछठ पर केंद्रित हैं। कुछ कथाएँ श्राप पर आधारित हैं तो कुछ कथाओं में अंधविश्वास भी दिखाई देता है। जिज्ञासा बढ़ाती हुई इन लोक कथाओं का प्रवाह प्रशंसनीय है। ये लोक कथाएँ मनोरंजक, ज्ञानवर्द्धक और शिक्षाप्रद हैं। ये लोक कथाएँ बच्चों में कल्पनाशीलता बढ़ाएंगी जिससे उनमें रचनात्मकता का विकास होगा। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि इस किताब की लोक कथाएँ बच्चों के चरित्र निर्माण में सहायक साबित होंगी।


“कमियाँ” : 


यह एक समीक्षा है अतः किताब की कुछ कमियों की ओर भी ध्यान आकर्षित करना मेरा कर्तव्य बनता है। पहली कमी - मुख पृष्ठ पर “दुर्लभ छत्तीसगढ़ी हास्य” शब्द-समूह निरर्थक लग रहा है क्योंकि संकलित सभी लोककथाएँ हास्य-प्रधान नहीं हैं। दूसरी कमी - व्याकरण की दृष्टि से छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुनासिक (चन्द्र बिंदु) का प्रयोग अपरिहार्य होता है। कुछ स्थानों पर अनुनासिक का प्रयोग ही नहीं किया गया है और कुछ स्थानों पर अनुनासिक के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किया गया है। हालाँकि यह टंकण त्रुटि भी हो सकती है। इन दो त्रुटियों के अलावा मुझे और कोई कमी नजर नहीं आई।


शुभकामनाएँ - 


राष्ट्रीय स्तर पर व्यंग्यकार के रूप में स्थापित वीरेंद्र सरल जी ने छत्तीसगढ़ की लोक कथाओं के संकलन में रुचि दिखाते हुए अथक परिश्रम से छत्तीसगढ़ी लोक कथाओं को पुस्तक का आकार देकर न केवल नयी पीढ़ी बल्कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के खजाने में अपना अमूल्य योगदान दिया है इस उत्कृष्ट कार्य हेतु उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। 


शुभेच्छु एवं समीक्षक - 


अरुण कुमार निगम

संस्थापक : “छन्द के छ-ऑनलाइन गुरुकुल”

छत्तीसगढ़

संपर्क - 9907174334

जीमेल - arun.nigam56@gmail.com

कहानी - रिश्तेदारी

 कहानी - रिश्तेदारी 


‘पंखा तको अबड़ दिन होगे, पोंछावत नइहे।’ सोनिया चाऊँरधोवा गंजी म नल ले पानी झोंकत कहिस। सुनिस धुन नहीं ते योगेश अपन सुर म गाड़ी धोते रिहिस। 

‘डेना मन म भारी गरदा माड़ गेहे, पोंछ देते। बने ढंग के हवा आबेच नइ करय ...ऊपराहा म ये गर्मी लाहो लेवत हे।’

‘अरे ! पहिली एक ठिन बूता ल सिरजावन दे, ताहेन उहू ल कर देहूँ। तोर तो बस... एक सिध नइ परे राहय दूसर तियार रहिथे। मशीन नोहवँ भई मनखे औं। दू ले चार हाथ थोरे कर डारवँ।’

‘बतावत भर हौं जी, तोला अभीच करदे नइ काहत हौं।’ योगेश के भोगावत मइन्ता म झाड़ू पोंछा करत सोनिया सफई मारिस।

‘एकात ठिन अउ बूता होही, तेनो ल सुरता करके राखे रही। आज इतवार ये न, छुट्टी के दिन ल कइसे काटहूँ।’ - कंझावत कहिस अउ गुने लगिस योगेश - ’उल्टा के उल्टा छुट्टी के दिन अउ जादा बूता रहिथे बूजा हँ।‘

‘तोला तो कुछु कहना भी बेकार हे’ -सोनिया तरमरागे, चनचनाए लगिस अब - ‘दू मिनट नइ लगय, अतेक बेर ले घोरत हस घोरनहा मन बरोबर। एक घंटा ले जादा होगे, कोन जनि अउ कतेक नवा कर डरबे ते।’


’अरे ! तैं नइ समझस पगली ! मनखे बने बने पहिरे ओढ़े भर ले बने नइ होवय। लोगन सब ल देखथे। चेहरा बने हे त कपड़ा-लत्ता बने पहिरे हे कि नहीं। बने बने कपड़ा-लत्ता पहिरे त, गाड़ी बने साफ सुग्घर हे कि नहीं। गाड़ी साफ सुग्घर हे, त मुड़ कान म बने तेल-फूल लगे हे कि नहीं। तेल-फूल लगे हे, त कंघी-उँघी कोराए हे कि नहीं..... वोकर लमई ल सुनके सोनिया मुँह ल फारके गुने लगिस- ‘का होगे ये बैसुरहा ल आज।’

योगेश रेल के डब्बा कस लमाते रिहिस - ‘सुघराई सबो डाहर ले देखे जाथे। चिक्कन चिक्कन खाए अउ गोठियाए भर ले सुघरई नइ होवय। चिक्कन चिक्कन रेहे, खाए अउ गोठियाए भर ल दिखत के श्याम सुन्दर उड़ाए म ढमक्का कहिथे’ - अइसे काहत जोर से खलखलाके हाँस तको भरिस।

‘बात म तो ...... तोर ले कोनो नइ जीते सकय। गोठियाबे ते गदहा ल जर आ जही।’ सोनिया के मुँह थोरिक फूलगे।

मनाए के मुड म योगेश कहिस - ’कोन जनि हमरेच घर म अतेक कहाँ ले गरदा आथे, चीन्हे जाने अस।’ सोनिया ओकर गोठ ल सुनके कलेचुप रंधनीखोली कोति रेंग दिस।

योगेश जब गाड़ी धोथे त एक-डेढ़ घंटा लगि जथे। तरी-ऊपर, इतरी-भीतरी फरिया-अंगरी डार-डारके धोथे। सबले पहिली सादा पानी मारके धुर्रा-माटी ल भिंजोथे। फेर वोला शैम्पू पानी लगे फरिया म रगड़थे। तेकर पीछु साफ पानी म फेर कपड़ा मारके धोथे। तभे तो देखइया मन कहिथे -‘भारी जतन के रखे हस गा अपन गाड़ी ल ?’ 

कोनो कहिथे - ’अतेक दिन ले बऊरे तभो अभीन ले नवा के नवच हे जी।‘ 

अइसन सब सुनके योगेश ल गरब नइ होवय भलकुन कहइया मन ल वो खुदे कहिथे- ’गाड़ी हमर हाथ गोड़ होथे, एकर देखभाल बने करबोन त ये हली-भली हमर संग देही। इहीच ल बने नइ रखबोन त कतेक संग देही।’ बने तको ल कहिथे।

‘फरी पानी मारके बस तीरियावत रिहिसे। ओतके बेरा दुवार कोति ले सिटकिनी के आरो आइस। योगेश देखथे - बनवारी अउ सुनीता दुवार म खड़े हे। 

बनवारी भीतर आवत हाँसत पूछिस -’अंदर आ सकथन नहीं वकील साहब।‘ 

’अरे ! आवव आवव‘ - योगेश आत्मीयता के पानी ओरछत कहिस - ‘अपने घर म तको पूछे बर लगथे ?’

बनवारी अउ सुनीता पहिली पइत योगेश घर आवत हे। योगेश जब गाँव म राहत रिहिसे त उहाँ इन्कर आना जाना होते रिहिसे। बनवारी के आए ले योगेश के मन म आसरा के बिरवा फूटगे -‘कहूँ इन केस के पइसा चुकाए बर तो नइ आवत हे।’ 

बनवारी के दसों ठिन केस चार सौ बीसी के। जेन बेरोजगार ओकर नजर म आइस उही ल चिमोटके पकड़िस। 

‘मंत्रालय म मोर अबड़ जोरदरहा पकड़ हावय।’ 

‘तोला नौकरी लगा देहूँ।’ 

‘तैं तो घर के आदमी अस, तोर ले का पइसा लेहूँ। हाँ, साहब सुधा मन ल खवाए-पियाए बर परथे। जादा नहीं एक लाख दे देबे।’

आखरी म सब चुकुम, बिन डकारे सब्बो हजम। कतको झिन जिद्दी मनखे मन धरके कूट तको दीन। सबो केस ल योगेश ह निपटाइस। सबो म बाइज्जत बरी। तबले बनवारी योगेश तीरन आए जाए लगे हे। एक दू पइत फोन म तगादा करिस योगेश ह त कहि दे रिहिसे-‘तैं पइसा के टेंशन झन ले, मिंजई होवइया हे, बस पइसा हाथ आइस अउ मैं लेके आतेच हौं।’

एक पइत कहि दे रिहिस -‘चना मिंजा कूटागे हे भइया, दू चार दिन म बेंचके तोर जम्मो फीस ल चुकता कर देथौं।’

योगेश अब वकीली के पइसा म शहरे म घर बना डारे हावय। तीज-तिहार म गाँव आना जाना होथे। सुनीता -बनवारी वोकर दीदी भाँटो हरे। तीर के न, दुरिहा के। अतेक तीर तको नहीं जिन्कर बर कुकरी-बोकरा के पार्टी मनावय अउ अतेक दुरिहा तको नहीं जिन ल भाजी-भात तको नइ खवाए जा सकय।


फेर मया, जुराव अउ लगाव हँ रिश्ता नता के बीच के दूरी ल नइ नापय। अपन अउ बिरान ल नइ चिन्हय।

‘अइ ... घर कोति ले आवत हौ कि कोनो डाहर ले घूमत-फिरत आवत हौ’ - सोनिया पानी देके पैलगी करत पूछिस। 

’घरे ले आवत हावन भाभी‘-सुनीता जवाब दिस। ननद भौजाई घर म निंग गे। योगेश अउ बनवारी अपन गोठियाए लगिन। उन्कर नहावत, जेवन करत ले मंझनिया अइसेनेहे निकल गे। संझा सारा-भाटो बाजार जाए बर निकल गे। 

घरे तीरन नानकुल हटरी लगथे। योगेश उही मेरन घर के जम्मो जरूरत के समान बिसा लेथे। साग-भाजी, किराना, कपड़ा-लत्ता तको। घूमे फिरे के मन करथे, तभे बाहिर जाथे। नइते इही मेरन दूनों प्राणी संघरा घूम लेथे। तीर तखार म उन्कर बने मान सम्मान तको हवय। सब कोनो वकील-वकीलीन कहिथे।

किराना के दूकान म डायरी चलथे। साग भाजी ल हाल बिसा लेथे। सबो झिन चिन्हथे जानथे तेकर सेति चिल्हर नइ रेहे या कुछू कमी बेसी म साग भाजी तको उधार दे देथे। योगेश घलो काकरो हरे खंगे म संग निभा देथे। अपन अउ बिरान के लगाव-दुराव व्यवहार ले बनथे, रिश्ता -नता के जुराव भर ले नइ होवय।

’पाला भाजी का भाव लगाए हस पटैलीन ?’ -योगेश पूछिस।

’चालीस रूपिया ताय ले ले ... के किलो देववँ ?’ पटैलीन एक हाथ म तराजू बाट ल सोझिवत अउ दूसर हाथ म भाजी के जुरी ल उठावत कहिस। 

’आधा किलो दे दे।’ 

’भाजी मन बने ताजा हावय।’ - बनवारी मुचमुचावत कहिस।

’हौ ..... मैं सरीदिन ताजा लानथौं .... पूछ ले वकील साहब ल ..... न वकील साहब’ - पटैलीन भाजी तऊलत योगेश ल हुँकारू बर संग जोरिस। 

’इन्कर बहुत बड़े बारी हावय। आठो काल बारा महीना इमन इही बूते करथे।‘ योगेश, बनवारी ल बताए लगिस।

बाजू म बइठे बिसौहा कहिस - ’खीरा नइ लेवस वकील साहब !’

’पहिली फर आय तइसे लगथे, बने केंवची-केंवची दीखत हे‘ - बनवारी कहिस।

योगेश के मन तो नइ रिहिसे। बनवारी ल खीरा के बड़ई करत देख माँगी लिस -’ले आधा किलो दे दे।‘

’एक दे देथौं न .....‘ बनवारी के बड़ई ले बिसौहा के आसरा बाढ़गे रिहिस। योगेश इन्कार नइ करे सकिस -’कइसे किलो  लगाए हस ?‘

’तोर बर तीस रूपिया हे, दूसर बर चालिस रूपिया लगाथौं‘.........बिसौहा खुश होवत कहिस - तैं तो जानते हस ... तोर बर कमतीच लगाथौं।’ अउ हें हें हें करत हाँसे लगिस।

एकात दू ठिन अउ साग भाजी लेके दूनों घर लहुट गे। सुनीता नान्हे लइका ल सेंक-चुपरके वोकर हाथ गोड़ ल मालिस करत रहय। वकील घर ठऊँका नान्हे लइका आए हवय। वोकरे अगोरा अउ सुवागत के तियारी के चलते गजब दिन होगे रिहिस सोनिया मइके नइ गे पाए रिहिसे। एक तो एकसरूवा मनखे उपराहा म नान्हे लइका के देखभाल, उहू फीफियागे रिहिसे। मन होवत रिहिसे दू चार दिन बर मइके जाए के। उन्कर आए ले वोकर बनौती बनगे। 

‘दीदी मन आए हे त इन्कर राहत ले मइके होके आ जातेवँ कहिथौं।’ - रतिहा बियारी करे के पीछु सोनिया पूछिस। 

’सगा-सोदर के सेवा सत्कार ल छोड़के, इन्करे मुड़ म घर के बोझा ल डारके मइके जवई नइ फभय भई।‘ -योगेश कहिस।

‘जावन दे न भैया, मैं तो हाववँ। कतेक मार बूता हे इहाँ, घर के देखरेख ल मैं कर डारहूँ।’

’हौ...बने तो काहत हे, सुनीता सबो ल कर डारही, नइ लगय।‘ बनवारी सुनीता ल पंदौली दीस।

बिहान भर सोनिया मइके गै। रहिगे तीन परानी - वकील, बनवारी अउ सुनीता। योगेश आन दफे कछेरी ले आवय त हटरी जाए के, कभू राशन के, त कभू अहू काँही लगेच राहय। सोनिया के जाए ले उल्टा दिन हली भली कटे लगिस। होवत बिहनिया नाश्ता पानी तियार करके सुनीता घर के जम्मो बूता ल सिरजा डारय। योगेश के कपड़ा लत्ता ल तको धो डारय। वोकर कछेरी के आवत ले बनवारी नवा-नवा, ताजा-ताजा साग भाजी लान डारय। जेवन बेरा म तियार मिल जाय गरमागरम। सुनीता रहय त कभू बाँचे भात के अंगाकर बना देवय, त कोनो दिन ओकरे फरा बना देवय।

योगेश कहय -‘तैं काबर तकलीफ करथस, मैं आतेवँ त साग भाजी ल ले लानतेवँ।’ 

’का होही जी, आखिर हमीच मन ल तो खाना हे।’ बनवारी टोंक देवय।

’एकेच तो आवय भैया ! तैं लानस कि इही लानय।’ सुनीता के गोठ सुनके योगेश के मुँह बँधा जाय। 

हफ्ता भर कइसे कटिस पतेच नइ चलिस। शनिच्चर के दिन रतिहा सोनिया के फोन आगे -‘कालि लेहे बर आबे का ?’

‘नइ अवावय, सगा सोदर ल छोड़के मैं कइसे आहूँ तँही बता ? तोर भाई एक कनक छोड़ देही .... त नइ  बनही।’

सुनीता कहिस -’चल देबे न भइया, हमूमन कालि घर जाबोन, अइसे तइसे पन्द्रही निकलगे, हमरो घर म काम बूता परे हावय।‘

‘तैं ओति चल देबे हमन गाँव कोति निकल जबो।’ बनवारी एक सीढ़ी अउ चढ़ गिस।

बिहान भर संझा योगेश सोनिया ल लेके लहुट आइस। चहा पानी पीके झोला धरके हटरी निकल गै। 

‘अबड़ दिन बाद आवत हस वकील साहब, का देवौं बता ?’ पसरा लमाए बिसौहा कहिस।

‘ससुरार चल दे रेहेंव, उहाँ अबड़ अकन साग-भाजी जोर दे हावय, पताल, मिर्चा अउ धनिया भर दे।’

ओतके ल झोला म झोंका के पूछिस -’के पइसा ?‘ 

’अढ़ई सौ।‘

’अढ़ई सौ ?‘ योगेश मजाक समझ हाँसत चेंधिस।

बिसौहा फोरियाके बताइस -‘बीच म दमांद बाबू आवत रिहिसे न, ओकरे हाथ के तीन किलो खीरा, दू किलो करेला अउ भाँटा के पइसा बाँचे रिहिस।’ 

योगेश कुछु नइ बोलिस, बिसौहा के पइसा ल जमा करके रेंगे लगिस। बाजू म बइठे पटैलीन ओतेक बेर ल चुप रिहिसे। वोला रेंगत देखिस त चिचियाइस -‘मोरो ल देवत हस का वकील साहेब !’

‘तोर कतेक असन आवत हे ?’

‘जादा नइहे ... अस्सी रूपिया ताय।’

योगेश ओकरो चुकारा ल करिस। घर आके पूछिस -‘राशन दूकान थोरे जाए बर लगही। लगही त दे, ले लानथौ।’ सोनिया अपन काम म लगे रिहिस। कुछु आरो नइ मिलिस। वोह अपन गाहना गुरिया, चुरी चाकी  ल हेरे-धरे, सहेजे-सिरजाए म लगे रहय। माईलोगन मन कतको दुरिहा ले आए रहय, कतकोन थके हन कहत रहय, फेर अपन घर दुवार के साफ सफई, गहना गुरिया के हेरई तिरियई करे बर थोरको थकास नइ मरय, न कभू बिट्टावय। योगेश वोकर परवाह करे बिगर झाँकत-ताकत रंधनी कुरिया म गइस अउ सब समान ल तलाशे-तवाले लगिस। ओला बड़ ताज्जुब होइस। रसोई के सबो समान उपराहा उपराहा रिहिस। काँहीच के कमी नइ रिहिसे। सूजी रवा, साबुनदाना अउ शक्कर तको पर्याप्त रिहिस। जबकि सुनीता बीच बीच म सूजी के हलवा, साबूनदाना के बड़ा अउ एक दिन खीर तको बनाए रिहिस। योगेश राशन दूकान के डायरी ल निकालिस।

डायरी ल देखिस त ओमा हफ्ता भर म तीन पइत ले समान आए रिहिसे। वो तीन पइत म कम से कम हजार भर के समान आए रिहिसे।

‘अतेक अकन समान कइसे अउ काबर आए रिहिस’ - योगेश इही गुणा भाग लगाते रिहिसे, ओतके म सोनिया के आरो आइस - ’कस जी ..... सुनत हस ?‘

‘हाँ, बता।’-योगेश मनढेरहा जवाब दिस।

‘मोर कान के झुमका, दूनो नवा पैरी अउ सोन के अँगूठी मन नइ दीखत हे, कहूँ तिरिया के रखे हस का ?’

’का ? मैंहँ तो गोदरेज ल तोर गए के बाद खोल के देखेच नइ हौं।‘ योगेश के मन म कुछ-कुछ शंका उभरे लगिस। वोकर समझ म हफ्ता भर के सबो घटना रहि-रहिके आए जाए लगिस। छाती के धुकधुकी बाढ़े लगिस।

’त सबो गहना मन गै कहाँ ?‘ अब सोनिया के बिफड़े के बेरा रिहिसे।

’पहिन के तो गे रेहेस न ..... अउ चाबी तको तोरे तीरन रहिथे।‘

योगेश के बात सुनके सोनिया के जी धक्क ले होगे -’सबो गाहना ल थोरे पहिनके गे रेहेंव..... अउ चाबी ल तको इहेंचे छोड़ दे रेहेंव, ........गोदरेज के ऊपर म .......।‘ वो रोवाँसू होवत चिचियाइस।

अब मुड़ धरे के बारी योगेश के रिहिसे- 

‘निभगे रिश्तेदारी हँ।’

धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

चौपाल-(तब अउ अब)*

 *चौपाल-(तब अउ अब)*





तइहा के बेरा मा गांव के चौपाल के बड़ महत्तम राहय कहिथें ...समस्या नान्हे होवय चाहे बड़का...गांव के सब समस्या के हल माने...गांव के चौपाल... समस्या कइसनो राहय ? .... सब चौपालेच मा निपट जावय...कहिथें।

पहिली चौपाल के विषय मा कोनों वर्ग,समाज वाले बातेच घलो नइ राहय तइसे घलो लागथे...भई...तभे तो गांव के कोनों वर्ग,समाज वाले के समस्या राहय...सब के समस्या के हल..निपटारा माने ...चौपाल... अउ वइसने एकर आदेश निर्देश के पालन घलो एकतरफा होवय कहिथें भई...फेर हो सकत हे ,वहु समे मा काहीं कुछु के अभाव मा सियान मन ले थोर मोर गलत नियांव नइते कोनों संग अनियांव  भोरहा मा हो जावत रिहिस होही...तेकर भुगतना कोनो गरीब नइते अउ आने परिवार ला पर जावत रिहिस होही....यहु ला माने ला परही..यहु असंभव बात नोहे।

फेर....पहिली के मनखे मन हा कोट,कछेरी अउ थाना वाना के चक्कर मा जादा पड़बेच नइ करयं अउ पड़ना घलो नइ चाहयं तइसे घलो लागथे...काबर.. ओमन समझय के थाना कछेरी जाना मतलब... बड़का समस्या ....अउ बड़का समस्या माने... जेन समस्या के हल चौपाल मा संभव नइहे...?अब तो नान्हे नान्हे बात मा लोगन मन थाना अउ कोट कछेरी ला उमड़े घुमड़े ला धर लेथें ...थोरको धीर नइ धरयं....ताहने.. रेंगत हें कस के टूटत ले..पेशी...अउ पुरखा मन के सकेले जमीन ,जायदाद ला सिरवावत हे... अउ काहे...।

पहिली के सियान मन केहें घलो हे ...थाना अउ कोट, कछेरी के चक्कर...माने सरी धन,दौलत के सिरई... बर्बादी..।

...अब तो अपन-अपन वर्ग समाज के समस्या ला अपन-अपन स्तर मा घलो निपटा डरत हें भई...अउ कुछु सरकारी योजना ले संबंधित समस्या हे ता... पंचायत मा निपट जावत हे... अउ सुग्घर बात ‌घलो हे...होना भी चाही..फेर...डांड़ बोड़ी ले दे के...अउ उही डांड़ बोड़ी के पइसा ले गांव,समाज के विकास करत हन कहना...कहां तक उचित अउ सहीं हे? 

...समझ ले परे हे...अउ कोनों गरीब परिवार हा?...हमर इही डांड़ बोड़ी के चक्कर मा... समाज ले दुरिहावत जावत हे...हमर ले दुरिहावत जावत हे...गांव समाज के मुख्य धारा ले दुरिहावत जावत हें--कहिके आज के सियान मन काबर नइ सोचयं ?काबर एक घांव पाछू मुड़क के नइ देखय...काबर विचार मंथन नइ करयं?... के हमन जेन फैसला सुनाए हन, नियांव करे हन,तेन उचित हे के नहीं कहिके...।

काबर के ...तहां ले इही शोषित अउ पीड़ित वर्ग मन ही धीरे-धीरे हमर गांव ,समाज ले दुरिहावत जाथें अउ दूसर मन ,इंकर इही कमजोरी के फायदा उठा के...इन ला अपन शिकार बनाके... कुछ लालच देके...अपन उल्लू सिदहा कर लेत हें अउ अपन जनसंख्या ला बढ़ावत जावत हें...ता कहां ले गांव समाज के विकास...?ये तो सीधा-सीधा गांव समाज के विनाश होवत हे।

पहिली के नियांव करइया मन सोंचय,एक घांव पाछु मुड़ के देखयं,के सामने वाला ला हमर फैसला ले जादा पीरा तो नइ होवत हे...अउ काहीं उन ला लागय ता फैसला मा फेरबदल घलो करयं... तभे तो तइहा के बेरा मा चौपाल के निर्णय विश्वसनीय अउ सर्वमान्य रहय।

....अइसे बात नइहे के पहिली डांड़ बोड़ी नइ होवत रिहिस...!पहिली घलो जिंकर कोनों गलती राहय,नइते जेन मन गांव ,नइते कोनो वर्ग समाज के नीति ,नियांव के उल्लंघन करयं, तेन मन ला चौपाल के माध्यम ले गांव, वर्ग ,समाज के सभ्यता बने रहय अउ इन फेर गांव समाज के मुख्य धारा ले जुड़ जावयं कहिके‌‌ इन ला सुधार स्वरूप कुछ दंडित जरूर करयं... फेर उन ला गांव ,समाज ले दुरिहावयं नाहीं.... फेर अब काबर उही मन दुरिहा जाथे..? मतलब सीधा हे के वर्तमान व्यवस्था हा कुछ तो दोषपूर्ण हावय...। 

अब तो चौपाल सिरिफ नाम मात्र कुछु सरजनिक समस्या अउ कुछु  आयोजन करे के निमित्त बर ही सकलाथें तइसे घलो लगथे ...वहू मा कोनो मान मर्यादा घलो नइ रहय...भई...।

 कोनो नशापान करके आ जाय  रही, ता कोनो अउ कहीं...ता कोनो कुछु बोलत हे ता कोनो अउ काहीं.... कहूं-कहूं जघा अइसनो..देखे सुने मा आथे...।

... हो सकत हे, जेन मन विरोध करथें तेन मन ला,अपन सियाने मन मा ही कुछु खामी नजर आवत होही? नइते इन ला वर्तमान सिस्टमे हा दोषपूर्ण लगत होही...तभे तो इन अंगरी उठाथें अउ विरोध करथें.. एमा काकरो व्यक्तिगत समस्या भी हो सकत हे।

...अउ एक बात..का पाय के ते?अभी के सियानी अउ नियांव मा मनखे मन पहिली जइसे बने बिस्वांस घलो नइ करयं भई.....।

फेर...हां !पहिली के चौपाल के विषय मा एक ठन यहु बात हे के पहिली के सियान मन जइसन निष्पक्ष अउ निःस्वार्थ सियानी अपन समे मा करयं,फैसला सुनावयं...नियांव करयं...। वइसन तो अब संभवेच घलो नइ हे...तइसे घलो लगथे...काबर? तभे तो ओ पहिंत इन ला *पंच परमेश्वर* काहय भई ...अउ तइहा के रहन-सहन,सोंच-विचार ,मान- मर्यादा अउ परिवेश असन...अब कुछु कहां घलो हे?

पहिली चौपाल के निर्णय मतलब सर्व मान्य रहय अउ वइसने निष्पक्ष अउ निःस्वार्थ सियानी घलो होवय भई... सामने वाला के आर्थिक,मानसिक, पारिवारिक अउ शारीरिक क्षमता ले वाकिफ होय के बाद ही सियान मन अपन निर्णय देवयं,नियांव करयं ताकि सामने वाला हा गांव समाज ले झन दुरिहावय कहिके.....? 

... अब तो अइसन सिस्टम घलो चलत हे..एक्के घांव मा गांव समाज ले दुरिहा घलो देत हें.....अउ अगड़म सगड़म, डांड़ बोड़ी ले दे के ..एक्के घांव म अपना घलो लेत हें... अइसन तो हाल ...घलो हो गे हावय..लगथे।

... आजकाल एक ठन अउ बात देखे अउ सुने ला मिलथे...के ...अपन समस्या के निमित्त, कोनो चौपाल सकेलवाय रहि ...अउ फैसला ओकर पक्ष मा झन तो होवय... तहां ले देख ले...ओ अपन गलती ला मानबेच नइ करय...अउ एकेकन मा थाना कछेरी ला उमड़े ला धर लेथे...। 

मतलब...आज के मनखे मन अपन गलती ला आसानी ले स्वीकारेच घलो नइ करयं अउ स्वारथ मा ही डूबे रहिथें...तइसे घलो लागथे।

....... अउ आजकाल के कुछ अइसने विशेष प्रजाति के सब रंगा ढंगा,चालाबानी अउ लंदर फंदर के सेती... घलो,कुछ हद तक आज हमर चौपाल अस्तित्व विहीन होय के कगार मा खड़े होगे हे तइसे घलो लगथे...... अउ हमर पुरखा मन तो केहे घलो हावय ना !..कुछ गंदा मछरी के सेती जम्मो तरिया बस्साथे अउ मतला जाथे कहिके... अउ लगथे घलो आजकाल के सब चरित्तर ला देख के...अब तो धीरे-धीरे लोगन मन के विश्वास चौपाल ले उठत घलो जावत हे लगथे....भई..तभे तो आज...चौपाल ला सोरियावय ला छोंड़ के गइंज लोगन मन एकर जघा थाना अउ कोट कछेरी के बाट जोहे ला धर लेहें... जेन हा चौपाल के विषय मा हम सब बर... आज बड़ चिंतन अउ मंथन के विषय‌ घलो होगे हे ...काबर के चौपाल मतलब सीधा-सीधा हमर ग्राम्य अंचल के वास्तविक स्वरूप के दर्शन....हमर धरोहर...हमर थाथी....जेला बचाए रखना, हमर ग्राम्य अंचल के अस्मिता ला बचाए राखे के बरोबर हे.....अउ एला बचाए अउ संजोय राखे खातिर ...हम सब के जिम्मेदारी भी बनथे भई...... चाहे एकर बर हम सब ला कतनो जतन करे ला काबर नइ पर जावय...?....।

अमृत दास साहू 

ग्राम -कलकसा, डोंगरगढ़ 

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

मो.नं.-9399725588

कहिनी // *माछी के पीत* //

 कहिनी               //  *माछी के पीत*  //     

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                      ए दुनिया म अलगेच-अलग सुभाव के मनखे देखे म मिल जाथे।सबो के बेवहार घलो अलगेच होथे कोनों अपनेच सुवारथ म मस्त रहिथें त कोनों काकरो सुख-दुख के संग-संगवारी बनके "*नार असन लपटा*" जाथें अऊ कोनों जतका मिलय सबो ल रपोटे अऊ पोगरिया के धरौ अइसन सुभाव के मनखे घलो रहिथें।कतको झन तो धन जोगानी के पाछू भागत रहिथें।दुनिया म संतोष रुपी धनले बढ़के कोनों धन नइ हें।समे म धन-जोगानी काम नि आवय,मनखे के बेवहार जिनगी भर पूरथे। "*मनखे के सुग्घर बेवहार ओकर असल पूँजी आय*" मनखे के गुन ल आकब करे म घलो पता चल जाथे कोन किसम के आय,जइसे हांड़ी म भात ह चुरे हे के नि चुरे एक-दू दाना ल छूए म पता चल जाथे। "*बेवहार मनखे के असलियत बता देथे*"।

                गुमान गंवटिया जबर कंजूस सुभाव के मनखे रहिस।खार म चक के चक खेती रहय।तीन-चार जोड़ी नांगर रहय।घर म कोठी-ढाबा छलकत रहे।मुसवा कोठी तरी बिल बनाके कतको अकन ल नकसान कर देवैं,फेर कोनों गरीबहा ल एक मूठा कभू देहे नि जानिस।गंवटिया घर के बारी म बीही,छीता,अरमपपई,दरमी अऊ आमा बनेच लगे रहे।बारी के चारो कोती थुहा अऊ बोईर कांटा के छेका करे रहे।एतका छेका रहे के टेटका घलो बारी म नि खुसर सके।गुमान ह अपन बारी के बीही,छीता अरमपपई,दरमी अऊ आमा के रखवारी करतेच रहे,लइका तो लइका इहां तक के "*चिलहरा तको ल चाटन*" नि देवै।

             गुमान गंवटिया के दस कोस गाँव तक गंवटानी के सोर बगरे रहय,तेन ल सबो मनखे मन जानय।ओखर घर म धन जोगानी भरे रहय,फेर कोनों गरीब दुखिया ल एक मुठा छिटकारे तको नइ।अइसन चीज बस रहे के का काम जेन कोनों ल बांट-बिराज नि खाय जाने। "*सूम के धन ल खाय घून*",गुमान लेहे भर जानय देहे तो अपन जिनगी म कभू जानबेच नि करिस।

             दू कोस दूरिहा गाँव के रिझू अपन घर के हालत ल देख के गंवटिया के घर उधार-बाढ़ी मांगे जाथे। "*मुसकुल घरी म मनखे ल आसरा के जरूरत होथे*"। पैलगी जोहार हे गंवटिया साहेब... पांव तरी ढोंकरत रिझू कहिथे।खुशी रह...कइसे आय हावस...आशीष देवत गंवटिया कहिस।पसिया बर लइका मन  ललावत हावें दुख ल गोहरावत... रिझू कहिथे। हमन ल कइसनहों करके धान-चउंर उधारी-बाढ़ी दे देतव....रिझू कहिस।तैं अइसे कर कालि बिहनिया आ जाबे आज कोठी ले धान नि हेरे हन अउ आती बेरा म एक कांवर कांटा बोह लानबे...गंवटिया कहिस।जेन दिन कोनों कुछू जिनीस मांगे आतीस त वो दिन गंवटिया तो कभू नि देवय।कुछू न कुछू चीज मंगावत दूसर दिन बलाबेच करे।बपरा पेट के दुख म काय नि करे गंवटिया के कहे मुताबिक लानबेच करे।रिझू घलो दूसर दिन एक कांवर कांटा बोह के लानिस।

             गुमान गंवटिया दू किसिम के तामी रखे रहिस।उधारी-बाढ़ी देहे के बेरा अपन छोटकी बहुरिया ल तामी लेके आय बर आरो करे।एकर मतलब रहिस के छोटे तामी ल लाने बर कहय।बाढ़ी लेहे के बेरा अपन के बड़की बहुरिया ल तामी लाने बर आरो करे।एकर मतलब रहिस के बड़े तामी ल मंगावय।देहे के समे छोटे तामी म अऊ लेहे के बेर बड़े तामी बउरे। "*जेन ह दूसर ल धोखा देथे एकदिन अपनेच धोखा खाथे*" ।अइसनहे करके चीज के बढ़ोवन करे रहिस।

                गुमान गंवटिया घर फेर दूसर कोनों बाढ़ी मांगे आवय त ओमन ल कहे,अभी बहुरिया मन असनांदे नि हे,ओतका ले कांवर म कांटा हावे वोला थोरिक बारी ल रुंध के आ जाबे तंह ले बहुरिया मन घलो असनान कर के तियार हो जाही।बपरा मन काय करे पेट के खातिर करे बर परे।गुमान गंवटिया के फोकट म सबो बुता हो जावत रहिस।अइसनहे सबो करा बेगारी करावत चीज बस ल जोरे रहिस।कतको झन करा अइसनेच बूता करवातिस।कोनों ल खेत के मुंही भेजे त कोनों ल बिंआरा के रांचर ल बनवातिस अऊ कोनों ल कुछू बूता जोंगबेच करे।

               एक दिन गुमान गंवटिया बीमार पर गिस।गोड़-हाथ,मूड़ी पीरा अऊ जर-बुखार म हंकरत रहे।मोर मूड़ी म तेल लगाके थोरिक ठोंक दे... खटिया म सूते-सूते अपन नाती ल कहिस।ओकर नाती काबर करे... नीं करंव कहत गली खोर कोती खेले बर भाग गीस।फेर अपन बड़की बहुरिया ल हंकरत ...गुमान आरो करथे।काय होगे बाबू.....कहत बड़की बहुरिया आइस। गोड़ हाथ के पीरा अऊ जर-बुखार म हंकरत हौं थोरिक डाक्टर ल बलवा देते।हव कहत बड़की बहुरिया चल देथे अऊ डाक्टर बलाय बर अपन लइका ल ओकर संगवारी संग भेज देथे।

                थोरिक बेरा म गंवटिया घर डाक्टर आथे।राम-राम गंवटिया जी ...का होगे हावे... डाक्टर पूछथे।राम-राम डाक्टर साहेब आवौ बइठव ... मोला हाथ गोड़ पीरा अऊ बुखार चढ़ाय हावें ...कलहरत गंवटिया कहिथे।डाक्टर अपन थरमामीटर निकाल के झटकारत ओकर खखोरी म चीप दिस।थोरिक बेरा म निकाल के देखिस त एक सौ दू डिगरी बुखार चढ़ाय रहे।गंवटिया तुंहला एक सौ दू डिगरी बुखार चढ़ाय हे थरमामीटर ल देखावत कहिस...। डाक्टर ईलाज करे पातिस तेकर ले पहिली कतेक खरचा आ जाही पूछत....गंवटिया कहिस...।दू सूजी लगही,बोतल चघाय अऊ खून जांच करे परही... डाक्टर बताइस।कतेक खरचा आ जाही.. गंवटिया फेरेच पूछिस।दवाई मांदी,सूजी अऊ बोतल सबो मिलाके बारा तेरा सौ लग जाही।बनेच जादा बतावत हौ,एमा कुछू कम नि होही डाक्टर साहेब....गंवटिया पूछथे।

             गुमान तो देहे-लेहे ल कभू जाने नहीं ते पाय के ओला कीमत ह जादा लागिस।डाक्टर साहेब मोला एकोठन गोली अभी दे देवौ पाछू सूजी अऊ बोतल लगवा लेबो... गुमान कहिस।डाक्टर गुमान ल गोली दे दिस अऊ अपन घर चल दिस।एती गंवटिया के गोली म बुखार उतरबे नि करिस।एक गोली म थोरे उतर जाही।अपन के छोटे बेटा सरवन ल बलाइस अऊ कहिस ...जा तैं परउ बईद ल बलाबे थोरिक फूंकतिस अउ जरी-बूटी के दवाई घलो दे देतिस।अऊ ओहर दू बछर होगे धान के बाढ़ी ल घलो नि दे हावे।

           परउ बईदराज कहत ले लागय ओकरो नांव ह दस कोस ले जगजाहिर रहिस।अपन झाड़-फूंक अऊ जरी-बूटी ले बनेच बीमरहा मन ल ठीक कर देवै।ओहर ईमानदार घलो रहय।ते पाय के परउ करा एक-दू मनखे रोजेच ईलाज कराय आतेच रहंय। राम-राम बईदराज...गुमान के बेटा सरवन कहिस।राम-राम आ बइठ छोटे गंवटिया..खटिया कोती इशारा करत परउ कहिस।एदे मउंहार भांठा के मन आय रहिन ईलाज कराय बर अभिच घर गइन हे उही मन ल बिदा करके जरी-बूटी खने जंगल कोती जाहूँ सोचत हंव....परउ कहिस।हमर घर थोरिक चलते का हमर सियनहा ल दू दिन होगे हे देहें पीरा अऊ बुखार उतरतेच नि हे... गंवटिया के लइका सरवन कहिस।ले चल आवत हंव...परउ कहिस।अपन झोला झंकर धरिस अऊ गंवटिया घर जाय बर निकल गिस।

               परउ लकर-धकर गंवटिया के घर पहुंचिस।राम-राम गंवटिया...जोहारत परउ कहिस।आ बइठ परउ देख तो हाथ नारी ल थोरिक तउल दू दिन होगे पीरा अऊ बुखार उतरतेच नि हे.. डाक्टर घलो चेक करिस अऊ दवाई दे रहिस तेमा छोड़बेच नि करिस तहीं कुछू जरी-बूटी अऊ झाड़-फूंक करके थोरिक देख तो...पीरा म हंकरत गुमान कहिस।तुंहर हाथ ल देखावौ गंवटिया...परउ कहिस।गुमान अपन हाथ ल परउ कोती लमा दिस।परउ ओकर हाथ ल अपन अंदाज लगावत तउलिस।सात दिन के दवाई खाय बर परही तंह ले पूरा ठीक हो जाबे घबराय अऊ चिंता करे के बात नि हे गंवटिया... हिम्मत बढ़ावत परउ कहिस।सात दिन के दवाई के कीमत कतेक लाग जाही ....गुमान पूछिस। "*मनखे ह धन-जोगानी के पीछू भागथे जब तक ओहर मर नि जावे*" जरी-बूटी थोरिक मंहगा मिलथे तभो ले सात दिन के ओई एक हजार के भीतर म हो जाही ...परउ कहिस।

           दू बछर के बाढ़ी लेगे हे तेला देहे निहे ठउका मउका मिले हे इही म कटौती करवा देहूं ...मने-मन गुमान सोचत रहिस।सात दिन के खुराक देवत हौं दू प्रकार के दवाई।एकठन ल काढ़ा बनाके पीये ल परही अऊ दूसर ल करंज तेल ल कड़का के ओमा दवाई ल मिलाके बने फेंट के देहे भर चुपरे म सबो पीरा-बीथा छोड़ दीही अऊ बुखार घलो उतर जाही ...परउ समझावत कहिस।सबो झन ल गंवटिया बेगारी करवाथे,अभी मैं ठउका मउका पाय हौं कहिके ....परउ मन म सोचिस।अइसनहे गंवटिया के बदला लेहे बर कतको झन मउका खोजत रहिन। "*बरी के तेल ल बरा*" म निकालहूं...परउ मने-मन खुश होवत रहय।  "*राजा खोजे दांव अऊ माछी खोजे घाव*" ।अइसे कर परउ तैं मोला एक खुराक पहिली दे,ठीक लागही त फेर ले लेहूं गांवेच म तो रहिथस...गुमान कहिस।एक खुराक के दवाई दे दिस अऊ परउ घलो अपन घर चल दिस।

          परउ के जाय के पाछू बईदराज के कहे मुताबिक गुमान करे लागिस त ओकर बुखार अऊ देहें भर के पीरा छोड़ दिस।एक खुराक म तो छोड़ दिस एकेच खुराक के पइसा ल बाढ़ी लेहे तेमा कटौती करवा देहूं।अब दवाई के जरुरत नि परे....गुमान मन म सोचे धर लीस।बुखार अऊ पीरा छोड़ दिस कहिके गुमान अब दवाई नि लिस। पूरा दवाई नि लेहे के खातिर ओकर बीमारी जरमूल ले नि कटे पाइस फेर उबकगे।ए पइत परउ बईदराज करा ईलाज करवाय पातिस तेकर ले पहिली गुमान के नांव सगरो दिन बर संसार ले गुम होगे। "*समे ह अच्छे-अच्छा मन ल नवा देथे*"।एकरे सेथी कहे गे हावे शरीर के रख-रखाव बर ध्यान देवौ समे म पइसा-कौड़ी धन-जोगानी काम नि आवै।जादा "*माछी के पीत*" हेरे म काम कभू नि बने।

✍️ *डोरेलाल कैवर्त " हरसिंगार "*

         *तिलकेजा, कोरबा( छ.ग.)*

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अई .. इहाँ के रहइया नोहय...

 अई .. इहाँ के रहइया नोहय... 

    मशाल के भभका अँजोर म चिकारा, तमुरा अउ करताल संग म होवत खड़े साज ले कनिहा म तबला पेटी बाँध के नाचत नाचा ले लेके आज के जगर-बगर अँजोर म झाँय-झिपिंग होवत सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप म भले सरलग बढ़ोत्तरी देखे जावत हे, फेर जिहाँ तक मंचीय गरिमा के बात हे, त एकर संदर्भ अउ प्रस्तुति म वो ह थोरिक कमी आए असन जनाथे.

   मैं ह नाचा के वो खड़े साज वाले रूप ल घलो देखे हौं, जेमा मशाल के अँजोर म गाँव के कोनो चौंक-चाकर जगा म चार ठन बाँस ल गड़िया के रात भर विशुद्ध जनरंजन के कार्यक्रम देखाए जावय. बिना माईक के होवइया ए कार्यक्रम म पारंपरिक गीत मन के संगे-संग समसामयिक विषय मन ऊपर तुकबंदी के शैली म जोड़े गे गीत मन के बीच म सामाजिक अउ राजनैतिक विसंगति ले जुड़े विषय म बड़ सुघ्घर गढ़न के पिरोए जाय. वो बेरा ह स्वाधीनता आन्दोलन के रिहिसे तेकर सेती नाचा प्रसंग मन म गाँधी बबा के संग देश ल आजादी देवया के जबर उदिम के आरो मिल जावत रिहिसे.

    खड़े साज के बाद हारमोनियम तबला संग बइठ के गावत-बजावत नाचा के घलो अबड़ मजा ले हावन. तब तक माईक अउ कमती पॉवर वाले बिजली-बत्ती आगे रिहिसे. 

    हमन स्कूल-कॉलेज के पढ़त ले एकर भारी आनंद ले हावन. वइसे तो हमर खुद के गाँव नगरगाँव म घलो अलवा-जलवा नाचा पार्टी रिहिसे, तभो कोस दू-चार कोस के दुरिहा म कोनो गाँव म नाचा होय के आरो मिलय त दू-चार संगी सँघर के उहाँ सइकिल म धमकीच देवत रेहेन. हमर गाँव के खँड़ म बसे बोहरही धाम म हर बछर महाशिवरात्रि के बेरा तीन दिन के जबर मेला भराथे. एमा रतिहा बेरा नाचा के कार्यक्रम तो होबेच करथे. कभू-कभू तो अइसनो हो जावय के एकेच रतिहा म दू अलग अलग जगा एके संग नाचा के कार्यक्रम चल जावय. तब हमन दर्शक दीर्घा के नाचा प्रेमी होय के संग वालंटियर के बुता घलो कर डारत रेहेन. तब परी मनला मोजरा देखाय के अलगेच सेवाद राहय. तीन-सेलिया टार्च के बटन ल चपक के परी के मुँह म अंँजोर मारन त वो ह स्टेज म नचई-गवई ल छोड़ के हमर मन तीर म आ धमकय. 

   हमन सब संगी बरार के पाँच-दस जतका सका जाय ततका रुपिया देके बिदा करन तहाँ ले वोहा मंच म जाके सर्रावय-

    अई .. इहाँ के रहइया नोहय.. रहिथे नगरगाँव गा.. अउ का सुशील कहिथे तइसे वोकर नॉव गा.. पास म बलाके मयारु दिसे दू के नोट गा..  मैं तहे दिल से उनका शुक्रिया अदा करती हूँ.. अउ सुनथस गा बजकाहर का किहिसे तेला..? 

   -ले सुनाना बाई.. सुनाना ओ.. 

   -ओ किहिसे- चलना-चलना जाबो बोहरही के मेला बजार .. तोर बर लुहूँ चूरी-पटा अउ पहिनाहूँ सोनहा ढार.. 

    बछर 1970 के दशक म फेर नाचा ल अउ परिष्कृत कर के सांस्कृतिक मंच के स्वरूप दे गइस. दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ल एकर श्रेय जाथे. जइसे खड़े साज ल हारमोनियम तबला संग बइठ के नाचा के सुग्घर रूप दे के श्रेय दाऊ मंदरा जी ल जाथे ठउका वइसनेच.

    मैं व्यक्तिगत रूप ले साहित्य अउ पत्रकारिता के संग जुड़े रेहे के संग ही आडियो रिकार्डिंग स्टूडियो के संचालन घलो करत रेहेंव, तेकर सेती मोर उठक-बइठक ह कला, साहित्य, संगीत सबोच क्षेत्र के पोठहा लोगन संग होवत रिहिसे. इँकर मन संग मुँहाचाही घलो होवय, जेला पत्र-पत्रिका म छापत घलो रेहेन. 

    खड़े साज ले जेन नाचा अउ फेर नाचा ले सांस्कृतिक मंच तक के विकासयात्रा होवत हमर ए मंचीय प्रस्तुति ह आगू बढ़े हे, तेकर संबंध म मैं दाऊ रामचंद्र देशमुख, दाऊ महासिंह चंद्राकर, खुमान साव, कोदूराम वर्मा, लक्ष्मण मस्तुरिया आदि जइसन जम्मोच कला-संस्कृति के रखवार मन संग गोठबात करत रेहेंव. सबोच झन एकर विषय अउ प्रस्तुति म सरलग आवत गिरावट ऊपर चिंतित रिहिन. अभी जइसे कवि सम्मेलन के मंच मन म हास्य के नॉव म फूहड़ता अउ अश्लीलता घलो ह अपन ठउर बना डारथे ठउका वइसनेच सांस्कृतिक मंच म घलो एकर मन के आरो मिल जाथे.

    पहिली गीत-संगीत ल विस्तार दे बर तावा आइस, जेला ग्रामोफोन काहन. एकर पाछू आडियो कैसेट आइस. इही आडियो कैसेट के चलन बाढ़े के संग इहाँ के मयारुक गीत मन म हल्का-फुल्का गीत मन धीरे धीरे संघरत गीन. तब फेर ए कैसेट के गीत के हल्का पन ह मंच के प्रस्तुति म घलो जनाए लगिस. एक बेरा अइसनो आइस जब एकरे मन के बोलबाला दिखे लागिस. ए मनला प्रोत्साहित करे म आडियो कैसेट कंपनी वाले मन के विशेष हाथ हे, जे मन आडियो के संगे-संग विडीयो घलो बनाए लगे रिहिन हें. वइसे बड़का साँस्कृतिक मंच वाले मन तो कइसनो कर के मंच के गरिमा ल बचाए के जतन करत रहिथें आजो करत हें, फेर जे मन चार-छै झनला जोर-सकेल के गावत-नाचत रहिथें अइसने मन आडियो विडीयो कंपनी वाले मन के झाँसा म झट फँस जाथें. उन जइसे गढ़न के नाचे-गाये बर कहिथें, बिन सोचे-गुने वइसनेच कूद-फाँद देथें.

    हमर लोक संगीत के अइसन दुर्दशा ल देख के कतकों बेर विचार आथे- जइसे सिनेमा मन के प्रदर्शन के पहिली उनला फिल्म प्रमाणन बोर्ड ले अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना जरूरी होथे, ठउका वइसनेच लोक कला अउ संगीत क्षेत्र खातिर घलो एक अइसे संस्थान बनना चाही, जे ह अइसन जम्मो किसम के गीत, संगीत अउ सांस्कृतिक प्रस्तुति मन के सोर-खबर लेवत राहय.

   सांस्कृतिक मंच मन के भारी बढ़ोत्तरी के बाद घलो अभी नाचा पार्टी वाले मन के कभू-कभार दर्शन हो जाथे. ए पार्टी वाले मन के प्रदर्शन ल देख के अभी घलो मन ल थोक संतोष जनाथे, के इन फूहड़ता अउ अश्लीलता ले अभी घलो इनला बँचा के राखे हावँय.

   अभी बीते बछर म नाचा कलाकार डोमार सिंह कुँवर ल पद्मश्री के उपाधि ले सम्मानित करे गे रिहिसे जे हा हमर पुरखौती परंपरा के संरक्षण संवर्धन खातिर प्रोत्साहित करे के बड़का उदिम आय. भरोसा हे, अउ दूसर कलाकार मन घलो पुरखौती परंपरा ल संजो के रखे के रद्दा म आगू आहीं. मंच के गरिमा ल बनाए रखहीं.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

Thursday, 2 January 2025

नवा बछर _ कुछ नवा कर* !!

 *नवा बछर _ कुछ नवा कर* !!


सरी दुनिया 1 जनवरी के नवा बछर मनाथे। विविधता अउ विचार ले भरे भारत म 1 जनवरी के संगे -संग आने -आने बेरा म नवा बछर मनाए जाथे।

तइहा समे बेरा ल नापे -जोखे -गिने के कोनो अधार नई रिहिसे। पूर्वज मन चँदा-सुरूज ल ठिहा मानके दिन ल नापय -गिनय। जेकर अनुसार चैत ले बछर शुरू होके फागुन म जाके सिरावय-थिरावय। अब ग्रेगोरियन कलेण्डर आगे हवय जेला सरी दुनिया मानथे अउ ओकरे दिन -तिथि अनुसार चलथे। एकर शुरूआत 1 जनवरी ले होथे। इही दिन दुनिया नवा बछर मनाथे।

भारत किसनहा देश हरे। इहाँ के हरेक परब अउ तिहार किसानी ले जुड़े हवय। छत्तीसगढ़ म बैसाख महीना के अंजोरी पाख (शुक्ल पक्ष) के तीसरइया दिन (अक्ती ) ल किसानी तिहार के रूप म मनाथे। येला अक्षय तृतीया कहिथे।


ये दिन किसानी ले जुरे जम्मो बूता माने फसल के बोनी ले लेके काम -बूता करइया मन के नियुक्ति तक के बोहनी करे जाथे। खरीफ फसल माने धान बोवई के बोहनी ल ‘मूठ धरना’ अउ नियुक्ति होवइया कमइया-बनिहार ल ‘पौनी-पसारी’ कहे जाथे।

जिनगी के शुरूआत के प्रतीक पुतरा-पुतरी के बिहाव रचाए जाथे। प्रकृति माने जम्मो रूख-राई ल पानी देहे जाथे अउ भींजे चना दार अउ चाऊँर संग फूल -पान अर्पित करके सकभर दान-दक्षिणा करे जाथे। 


जम्मो भारत म बैसाख महीना म ही नवा बछर मनाए जाथे चाहे वोह जुड़शीतल, पोहेला बोइशाख, बोहाग बिहू, विशु या पुत्थंडु काबर नई होवय।

पहिली सियान मन कइसन -कइसन किसम ले कोन कोन बेरा म अपन नवा बछर मनावय, देखथन


 *नवसंवत्सर* -

चैत महीना के अंजोरी एकम (शुक्ल प्रतिपदा) ल नवसंवत्सर कहे जाथे। असल म नवा बछर के आरूग आगमन इही दिन होथे। भारत म पंचाग के शुरूआत राजा विक्रमादित्य के समे म होइस। येकर गिनती के अधार चंदा-सुरूज हवय अउ इही पंचाग के बेरा ले सप्ताह के सातो दिन अउ 12 महीना के बछर माने जाथे, जेला हम विक्रम संवत के नाम ले जानथन।

पुराण के अनुसार इही दिन ब्रम्हा ह सृष्टि के रचना करे रिहिसे। आयुर्वेद के अनुसार ये दिन लीम (नीम) के पान-फूल अउ गुर (गुड़) के सेवन करे ले मनखे सब रोग -राई ले दूरिहा रहिथे। ये करू-मीठ ह जिनगी के सुख-दुख, दिन -रात, जीत-हार, लाभ-हानि, प्रेम-द्वेष के तको चिन्हा हरे।


 *बैसाखी परब-* 

बैसाखी सिक्ख मन के नवा बछर हरे। खालसा संवत के अनुसार खालसा पंचाग बैसाख एकम 1756 विक्रम संवत माने 30 मार्च 1699 के शुरू होय रिहिसे। बैसाखी ल सौर्य मास के पहला दिन माने जाथे। कहे जाथे कि इही दिन धरती म गंगा अवतरे रिहिसे तेकर सेति ये दिन गंगा स्नान के बड़ महात्तम हे। बैसाखी के दिन सुरूज मेष राशि म संक्रमण करथे तेकर सेति येला मेष संक्रांति या विशुवत संक्रांति तको कहे जाथे। बैसाखी पंजाब प्रांत के मुखिया तिहार हरे। रबी फसल कटई के बेरा म किसान उछाह ले भरके ये तिहार ल मनाथे। ये दिन किसान उपजे -पाके फसल बर ईश्वर ल धन्यवाद देथे। येला धन्यवाद तिहार तको कहि सकथन। 

आवत पौनी बैसाखी परब के एक ठो परम्परा होथे जेमा गँहू लुए (काटे) बर लोगन एक जगा सकेलाथे-जुरियाथे।

संझा बेरा आगी तीरन सकेलाके आदमी जात मन भाँगड़ा अउ माइलोगन मन गिद्धा नाचथे। 

ये तिहार ल अमेरिका, कनाडा अउ इंग्लैंड म तको मनाए जाथे।.


 *उगादि/युगादि- तेलगू नवा बछर* 

उगादी/उगादि/युगादि ल दक्षिण भारत माने आंध्रप्रदेश, कर्नाटक अउ तेलंगाना म नवा बछर के रूप म मनाए जाथे। येहा हिन्दी के चैत महीना (चैत नवरात्रि) के पहिली दिन अउ अंग्रेजी के मार्च-अप्रैल के बीच म परथे।.


 *गुड़ी पड़वा-* 

चैत महीना के पहिली दिन माने चैत नवरात्रि के पहिली दिन ये तिहार ल मराठी अउ कोंकनी मन नवा बछर के रूप मनाथे। ये दिन गुड़ी ल घर के दुवारी म सजाये जाथे। गुड़ी के मायने ‘विजय पताका’ होथे। 


 *पुत्थांडु- तमिल नवा बछर* -

येला पुथुवरूशम या तमिल नवा बछर घलो कहिथे। इही ल दक्षिण तमिलनाडू के रहइया मन चिंतारीय विशु कहिथे। ये तमिल तारीख ल तमिल महीना चिधिराई के पहिला दिन के रूप म लन्नीसरोल हिंदू पंचाग के सौर चक्र के संग स्थापित करे गे रिहिसे। ये बेरा म तमिल मन एक दूसर ल ‘पुट्टू वतुत्काका’ कहिके एक दूसर ल बधई देथे। जेकर मायने ‘नवा बछर के बधई’ होथे। येला तमिलनाडू अउ पांडिचेरी के बाहिर श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, मॉरीशस के रहइया प्रवासी तमिल मन तको मनाथे। ये दिन कच्चा आम, गुड़ अउ नीम के फूल ले तिहार के खास डिश तियार करे जाथे। 


 *बोहाग बिहू- असमी नवा बछर* 

बोहाग बिहू असम के सबले मुखिया तिहार हरे। येला रोंगाली बिहू तको कहिथे। ये ह सात दिन के होथे। बिहू म बिहू नाच अउ बिहू लोकगीत के मेल हवय। येला अप्रैल महीना के बीचो-बीच माने बैसाख महीना म विशुव संक्रांति (मेष संक्राति) स्थानीय भाखा म बोहग (भास्कर पंचाग) के रूप म मनाए जाथे। येकर छोड़ इहाँ अक्टूबर म कोगाली बिहू अउ जनवरी म माघ बिहू या भोगाली बिहू तको मनाए के परम्परा हावय, जऊन ह फसल के कटई अउ ओकर ले उपजे उछाह के चिनहा हरे। तेकर सेति येला फसल तिहार घलो कहिथे।

ये पारंपरिक नवा बछर ह तीनो बिहू ल मिलाके एक महीना के हो जथे।


 *बंगाली नवा बछर-* 

बंगाली नवाबछर अप्रैल महीना के बीच पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, अउ असम (बराक घाटी) म मनाए जाथे। बैसाख महीना के पहिली दिन ‘पोइला बोईशाख’ नाम ले जाने जाथे। बोइशाख बंगाली पंचाग के पहिला महीना होथे। बंगाली पंचाग हिन्दू वैदिक सौर मास ऊपर आधारित हे। नवा बछर म बंगाली मन ‘शुभो नोवोकोर्शो’ कहिके एक दूसर ल जोहार-भेट करथे जेकर मायने ‘नवा बछर मुबारक’ होथे।

ये बेरा बंगाल म उछाह मंगल शोभायात्रा के आयोजन करे जाथे। 2016 म यूनेस्को ह ललित कला संकाय, ढाका विश्वविद्यालय कोति ले आयोजित ये उत्सव ल मानवता के सांस्कृतिक विरासत घोषित करे हावय।


 *गुजराती नवा बछर-* 

गुजराती नवाबछर ‘बेस्तु वर्ष’ देवारी के दूसरइया दिन मनाए जाथे। माने जाथे कि भगवान श्री कृष्ण ह ब्रज म होवत घनघोर बरसा ल थाम्हे बर गोवर्धन पूजा करे रिहिसे। गोर्वधन पूजा के दिन ले गुजराती नवा बछर के शुरुआत माने जाथे।


 *विषु/विशुक्कणी- केरल/* *मलयालम नवाबछर* 

विषु केरल नवाबछर के दिन हरे। विशुक्कणी वो झाँकी दर्शन ल कहे जाथे जेकर दर्शन विशु के दिन बड़े बिहिनिया ले सबले पहिली करे जाथे। येला मलयालम महीना मेदम के पहिलावत तिथि के मनाए जाथे। केरल म विषु उत्सव के दिन धान के बोआई शुरू होथे। काँसा के बर्तन म चाऊँर, नवा कपड़ा, कच्चा आमा, पान के पत्ता, सुपारी, कटहर, आइना, धनबहेरा (अमलतास) के फूल आदि सजाके ओकर तीरन लंबा दीया बारके रखे जाथे जेला विशुक्कणी कहिथे।


 *नवरेह- कश्मीरी नवाबछर* 

नवरेह नव चंद्रवर्ष के रूप म हिन्दू पंचाग के चैत अंजोरी पाख माने नवरात्र के पहिली दिन मनाए जाथे। नवरेह संस्कृत के नववर्ष ले बने हे जेकर मायने नवा बछर होथे। ये दिन कश्मीरी पंडित मन अपन देवी शारिका ल सुपरित करथे। माने जाथे कि देवी शारिका, शारिका परबता (हरि परबता) म निवास करथे जिहाँ सुरूज के पहिली किरण चक्रेश्वरी म परथे तेकर सेति ये दिन ल शुभ माने जाथे। अइसे कहे जाथे कि कश्मीरी हिन्दू मन के सप्तर्षि युग 5079 बछर पहिली नवरेह के दिन शुरू होय रिहिसे। नवरेह के बिहिनिया लोगन सबले पहिली चाऊँर ले भरे बर्तन के दर्शन करथे येला पोठ अउ बाढ़त भविष्य के प्रतीक माने जाथे।

प्रथा के अनुसार तिहार के पहिली दिन बड़े असन थारी म चाऊँर, पंचाग, फूल, जड़ी-बूटी, कलम-स्याही, आइना, सोन -चाँदी के सिक्का, नून, गँहू जइसन प्रसाद ले भरे जाथे जेकर बिहिनिया ले जम्मो एके संघरा दर्शन करथे।

चाऊँर अउ सिक्का जिनगी के दैनिक जिनिस रोटी अउ धन के, कलम, कागज अउ सियाही सीखे के कला अउ ओकर खोज के सुरता देवाथे। दरपन ह पूर्व व्यापीकरण के प्रतिनिधित्व करथे त उहेंचे करू जड़ी-बूटी ह जिनगी के करू-कासा अउ खट-मीठ अनभो के सुरता देवाथे।


 *बिखोरी उत्सव-* 

नवा बछर के रूप उत्तराखण्ड म बिखोरी महोत्सव मनाए जाथे। जेकर अंतर्गत लोगन पवित्र नदिया म डुबकी लगाथे। उहेंचे प्रतीकात्मक राक्षस मन ल पखरा म मारे के तको परम्परा हावय।


 *बिहार के जुड़शीतल-* 

बिहार, झारखण्ड अउ नेपाल के मिथिला क्षेत्र म मैथिली नवा बछर के रूप  म मनाए जाथे। इही ल जुड़शीतल अउ सतुआनी तको कहिथे। येह तिरहुत या मैथिली पंचाग के पहिला दिन होथे। ये तिहार ल मिथिला अउ नेपाल के मैथिली समुदाय के लोगन मन रबी फसल कटई के खुशी म मनाथे। ये दिन परिवार म सत्तू आटा जऊन ह आनी -बानी के अनाज के मिंझरा पिसान के बनथे ओकर जेवन कराए जाथे। गुड़ अउ सत्तु के संगे-संग मौसमी फल अउ जल ले भराए घड़ा के दान तको करे जाथे।


 *महा विशुव संक्रांति-* 

महाविशुव संक्रांति उड़िया नवा बछर हरे जऊन उड़ीसा म मनाए जाथे। येमा उड़िया लोक नृत्य अउ शास्त्रीय नृत्य होथे जेमा शिव ले जुरे छाऊ नृत्य तको संघरे हावय। 


 *हिजरी-इस्लामिक नवाबछर-* 

इस्लामिक बछर मुहर्रम के पहिली दिन ले शुरू होथे। हिजरी एक चंद्र अधारित पंचाग हरे। इस्लामिक धार्मिक तिहार मनाए बर हिजरी पंचाग के उपयोग करे जाथे। 


 *जमरोदी नवरोज- पारसी* *नवाबछर* 

पारसी नवा बछर जमरोदी नवरोज अंग्रेजी पंचाग के अगस्त महीना म मनाए जाथे। फारस के राजा जमशेद ह पारसी पंचाग के शुरूआत करे रिहिसे। पारसी समुदाय बर नवा बछर नवरोज आस्था अउ उछाह के ंसंगम हरे। ये उछाह सहींच म ब्रम्हाण्ड म जम्मो जिनिस के नवीनीकरण ल फरिहाके बताथे।


 *बौद्ध बैसाख -* 

अइसेनेहे एतिहासिक तिहार भारतीय उपमहाद्वीप, पूर्वी एशिया अउ दक्षिण पूर्व एशिया म बुद्ध के जनमदिवस के रूप म मनाए जाथे जऊन ‘वेसाक’ कहाथे। इहीच ल वैसाखी पूर्णिमा, वैसाखा या वेसाखा के नाम ले तको जाने जाथे।

नवा बिहान 

नवा बछर बीते बछर के सुख-दुख, घाम-छईंहा, करू-मीठ, अपन -बिरान, हितुवा -बइरी, गुन-अवगुन, चिन्हार-अनचिन्हार मन ले मिले-उछरे नवा भल-अनभल, अनभो -अनुमान ले भेंट कराथे। माने नवा बछर जुन्ना के जम्मो खाए पीए ल उछरथे, जेकर ले अवइया बेरा के काँटा -खूँटी, झाड़-झँखाड़, खोचका-डबरा, करू-कासा ल छाँट-निमार, चिन-पहिचान के अपन नवा रद्दा बना सकन। अपन धरम-करम, नीत-नियाव, सेवा-संस्कार के प्रति चेत कर सकन।

इही चेत-हियाव, कर्तब-बोध अउ नवा आस-विश्वास के अँचरा धरके चले म ही जिनगानी सँवर सकथे। भविष्य सुग्घर जगमगा सकथे। नवा बछर के परब मनाए भर ले कुछु भल हाथ आ जतिस त कोनो बाते नइ रहितिस। सुरूज तो रोजे उथे -बूड़थे। रात-दिन बोहावत धार कस सरलग आते-जावत रहिथे। बछर बीतते रहिथे। खा-पीके डकार मारत बेरा पहाते रहिथे।

नवाबछर मनाए के सार्थकता अउ सुघरई तभे हे जब नवा सोच, नवा मनोबल अउ नवा परन के संग नवा रद्दा चुन उही म आगू बढ़न नइते सबे नवा बछर खा पीके उछर बरोबर हो जही। 

नवाबछर तुँहर जिनगी म उमंग, उछाह अउ उज्जर भविष्य लेके आवय अउ तुँहला साज-सँवार, सहिराए के लइक बनावय अइसन आसरा के संग गाड़ा -गाड़ा बधई


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

Monday, 30 December 2024

 

नवा साल मा का नवा

                   मनखे मन कस समय के उमर घलो बाढ़थे, येदे देखते देखत एक साल अउ बाढ़गे। 2024 ले 2025 होगे। बीते समय सिरिफ सुरता बनगे ता नवा समय आस। सुरुज, चन्दा, धरती, आगास, पानी, पवन सब उही हे, नवा हे ता घर के खूंटी मा टँगाय कलेंडर, जेमा नवा बछर भर के दिन तिथि बार लिखाय हे। डिजिटल डिस्प्ले के जमाना मा कतको महल अटारी मा कलेंडर घलो नइ दिखे, ता कतको गरीब ठिहा जमाना ले नइ जाने। आजकल जुन्ना बछर ला बिदा देय के अउ नवा बछर के परघवनी करे के चलन हे, फेर उहू सही रद्दा मा कम दिखथे। आधा ले जादा तो मौज मस्ती के बहाना कस लगथे। दारू कुकरी मुर्गी खा पी के, डीजे मा नाचत गावत कतको मनखे मन घुमत फिरत होटल,ढाबा, नही ते घर,छत मा माते रहिथे। अब गांव लगत हे ना शहर सबे कोती अइसनेच कहर सुनाथे, भकर भिकिर डीजे के शोर अउ हाथ गोड़ कनिहा कूबड़ ला झटकारत नवा जमाना के अजीब डांस संगे संग केक के कटई, छितई अउ एक दूसर ऊपर चुपरई, जइसन अउ कतकोन चोचला हे, जेला का कहना ।
              भजन पूजन तो अन्ग्रेजी नवा साल संग मेल घलो नइ खाय, ना कोनो कोती देखे बर मिले। लइका सियान सब अंग्रेजी नवा साल के चोचला मा मगन अधरतिहा झूमरत रहिथे, अउ पहात बिहनिया खटिया मा अचेत, वाह रे नवा साल। फेर आसाढ़, सावन, भादो ल कोनो जादा जाने घलो तो नही, जनवरी फरवरी के ही बोलबाला हे। ता भले चैत मा नवा साल मनाय के कतको उदिम करन, नवा महीना के रूप मा जनवरी ही जीतथे, ओखरे संग ही आज के दिन तिथि चलथे। खैर समय चाहे उर्दू मा चले, हिंदी मा चले या फेर अंग्रेजी मा, समय तो समय ये, जे गतिमान हे। सूरुज, चन्दा, पानी पवन सब अपन विधान मा चलत हे, मनखे मन कतका समय मा चलथे, ते उंखरें मन ऊपर हें। समय मा सुते उठे के समय घलो अब सही नइ होवत हे। लाइट, लट्टू,लाइटर रात ल आँखी देखावत हे, ता बड़े बड़े बंगला सुरुज नारायण के घलो नइ सुनत हे। मनखे अपन सोहलियत बर हाना घलो गढ़ डरे हे, जब जागे तब सबेरा---- अउ जब सोय तब रात। ता ओखर बर का चौबीस अउ का पच्चीस, हाँ फेर नाचे गाये खाय पीये के बहाना, नवा बछर जरूर बन जथे।आज मनखे ना समय मा हे, ना विधान मा, ना कोनो दायरा मा। मनखे बलवान हे , फेर समय ले जादा नही।
           वइसे तो नवा बछर मा कुछु नवा होना चाही, फेर कतका होथे, सबे देखत हन। जब मनुष नवा उमर के पड़ाव मा जाथे ता का करथे? ता नवा साल मा का करही? केक काटना, नाचना गाना, पार्टी सार्टी तो करते हे, बपुरा मन। वइसे तो कोनो नवा चीज घर आथे ता वो नवा कहलाथे, फेर कोनो जुन्ना चीज ला धो माँज के घलो नवा करे जा सकथे। कपड़ा,ओन्हा, घर, द्वार, चीज बस सब नवा बिसाय जा सकथे, फेर तन, ये तो उहीच रहिथे, अउ तन हे तभे तो चीज बस धन रतन। ता तन मन ला नवा रखे के उदिम मनखे ला सब दिन करना चाही। फेर नवा साल हे ता कुछ नवा, अपन जिनगी मा घलो करना चाही। जुन्ना लत, बैर, बुराई ला धो माँज के, सत, ज्ञान, गुण, नव आस विश्वास ला अपनाना चाही। तन अउ मन ला नवा करे के कसम नवा साल मा खाना चाही, तभे तो कुछु नवा होही।  जुन्ना समय के कोर कसर ला नवा बेरा के उगत सुरुज संग खाप खवात नवा करे के किरिया खाना चाही। जुन्ना समय अवइया समय ला कइसे जीना हे, तेखर बारे मा बताथे। माने जुन्ना समय सीख देथे अउ नवा समय नव आस। इही आशा अउ नव विश्वास के नाम आय नवा बछर। हम नवा जमाना के नवा चकाचौंध  तो अपनाथन, फेर जिनगी जीये के नेव ला भुला जाथन। हँसी खुसी, बोल बचन, आदत व्यवहार, दया मया, चैन सुकून, सेवा सत्कार आदि मा का नवा करथन। देश, राज, घर बार बर का नवा सोचथन, स्वार्थ ले इतर समाज बर, गिरे थके, हपटे मन बर का नवा करथन। नवा नवा जिनिस खाय पीये,नवा नवा जघा घूमे फिरे  अउ नाचे गाये भर ले नवा बछर नवा नइ होय।
               नवा बछर ला नवा करे बर नव निर्माण, नव संकल्प, नव आस जरूरी हे। खुद संग पार परिवार,साज- समाज अउ देश राज के संसो करना हमरे मनके ही जिम्मेदारी हे। जइसे  कोनो हार जीते बर सिखाथे वइसने जुन्ना साल के भूल चूक ला जाँचत परखत नवा साल मा वो उदिम ला पूरा करना चाही। कोन आफत हमला कतका तंग करिस, कोन चूक ले कइसे निपटना रिहिस ये सब जुन्ना बेरा बताथे, उही जुन्ना बेरा ला जीये जे बाद ही आथे नव आस के नवा बछर। ता आवन ये नवा बछर ला नवा बनावन अउ दया मया घोर के नवा आसा डोर बाँधके, भेदभाव, तोर मोर, इरखा, द्वेष ला जला, सबके हित मा काम करन, पेड़,प्रकृति, पवन,पानी, छीटे बड़े जीव जन्तु सब के भला सोचन, काबर कि ये दुनिया सब के आय, पोगरी हमरे मनके नही, बिन पेड़,पवन, पानी अउ जीव जंतु बिना अकेल्ला हमरो जिनगी नइहे। बहर हाल सरी दुनिया मा जनम मरण, दिन तिथि इही अनुसार चलत हे ता, नवा बछर के बधाई बनबेच करथे, सादर सादर बधाई -----जोहार

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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