Thursday, 9 January 2025

गाय अब गरू होगे*

 *गाय अब गरू होगे*



तइहा के बेरा  मा पशु धन के बड़ मान सम्मान होवय अउ वइसने इंकर महत्व भी रिहिस भइ ...गाय ला लक्ष्मी के रूप मानंय अउ सब पूजा भी करंय,घरो घर गाय गरू पालय पोंसंय,एकाध घर नइ राहय तहु हा देवारी के दिन पूजा करबो ,कोठा सुन्ना झन परे कहिके... अउ नहिते...नानकुन बछिया ला तहु बिसा के लावय... तहां ले धीरे-धीरे लंजार बाढ़ जाही  कहिके...।

अउ कोनो बछवा पिला आ जाय ता बड़े होय तहां ले किसानी बुता जैसे नांगर‌ ,बक्खर ,दंवरी,गाड़ा,खांसर ,बेलन मा ओकर सहयोग लेवंय...उपयोग करयं।

अउ जबले मशीनी जुग के आगमन होहे..तब ले धीरे-धीरे मनखे मन के झुकाव मशीन डहर होय ला धर लिस अउ  इही मेर ले पशु धन मन के पुछन्ता लगभग कम होय ला धर लिस।

नइते.. बड़े किसान के परसार/कोठा मा दू चार जोंड़ी बइला बंधायच रहितिस अउ एक जोंड़ी बइला तो गइंज अकन घर रहिबेच करय..।

एक ठन समस्या यहु हे के.. आजकाल सबे घर पढ़े लिखे बहु आवत जात हे..ता वहु मन अब गोबर कचरा करे बर हिचकथें ..अउ यहु पाय के कतकोन मन गाय गरू ला बेंचत अउ बरोवत हें...फेर इही मेर आज घलो कइ झन पढ़े लिखे बेटी बहु मन पशु धन के सेवा जतन भी करत हें भइ...यहु ला माने ला परही।

एक ठन बात यहु के आर्थिक रूप ले कमजोर कइ ठन परिवार पलायन घलो कर जथें...वहु मन काकर भरोसा मा इनला छोंड़बो कहिके पालत पोंसत नइ हावयं।

...एक अउ बात.... आजकाल गोबरहिन घलो नइ मिलय...यहु एक ठन समस्या हे....।

.....

अब तो अइसे होगे हे के....पशु धन ला मनखे मन गरू घलो समझे ला धर लेहें लगथे तभे तो पाले पोंसे के बजाय धीरे-धीरे बरोय ला धर लेहें अउ इही कारण हे के आज के स्थिति मा पशु धन के बहुत दुर्गति होवत हे अउ इंकर स्थिति धीरे-धीरे बड़ चिंताजनक होवत जावत हे... जेती जाबे तेती गाय गरू मन लवारिस असन सड़क तीर ता अउ आने जघा मा खड़े अउ बइठे दिखिच जथे।

आजकाल...इही चक्कर मा कइ ठन दुर्घटना घलो घट जावत हें..।

पशु धन मन उप्पर सबले बड़का खतरा एक ठन अउ मंडरावत हे...वो हरय....इंकर तस्करी ,हां आजकाल इंकर तस्करी घलो शुरू हो गे हावय भइ... तभे तो आए दिन समाचार पत्र  मा पढ़े ला मिलथे कि अमुक गांव या शहर म गाय गरू ले भरे वाहन पकड़ाइस......आने...आने...।।

पहिली के मनखे मन पशु धन के सहयोग ऊंकर बुढ़ात ले लेवयं अउ काम बुता के लइक नइ रहय तभो नइ बेंचय भल्कुन ओकर जियत ले सेवा जतन करंय ।

जइसने गाय गरू पालय वइसने ओ जमाना मा......दूध,दही,मही अउ घींव घलो गहगट होवय भइ... ओ समे के मनखे मन के एक खासियत अउ राहय कतको दूध दही होतिस आस पड़ोस मा मिल बांट के खावय...फेर बेंचय कभू नहीं..!

   अब तो भले पाकिट वाला दुध ले लिही... नहिते चंडी बंधा लिहीं फेर गाय गरू नइ पालय पोंसय ...उपराहा मा भले कुकुर पोंस लिहीं, फेर गाय गरू नइ पोसंय ...पहिली अंगना- दुवारी,कोठार-बियारा ला गोबर ले लिपंय अब तो भइगे वहु मन सीमेंटेड हो गे हावय...कुछु नेंग जोग बर गोबर के जरूरत रही ता मांगे जोगे ला पर जथे...अइसन हाल तो हो गे हाबे।

बीच मा गाय गरू मन ला सुरक्षा परदान करे खातिर शासन हा कुछ दिन एक ठन योजना घलो चलाय रिहिस जेकर अंतर्गत गोसंइया के आधार नम्बर ला सिदहा पशु के आई डी ले जोंड़ दे रिहिस अउ बिल्ला बनाके उंकर कान मा पहिरा दे रिहिस,जेकर माध्यम ले लवारिस घुमत हे,ते काकर गाय गरू हरे पता चल जावय अउ इही माध्यम ले लापरवाह गोसइयां मन उपर कार्यवाही घलो हो जात रहिस....अउ इही बहाना  गोसंइया मन सावचेत घलो रहयं,...।फेर यहु नियम कानून चरदिनिया अउ फिसड्डी साबित होगे...।

पहिली के गोसंइया मन तो बरदी आय के बेरा गाय गरू ओइलाए ला लगही कहिके...कहुंचो गांव गंवतरी जाय रहितिस ता.....गाय गरू ओइलाना हे कहिके..एक झन सदस्य जरूर गोधुलि बेला मा वापिस घर आ जावय अउ गाय गरू मन ओइले हे ते नहीं देखय अउ नइ ओइले राहय ता पहटिया ल पुछ परख करयं के बरदी ला कते खार मा चराय बर लेगे रेहेस अउ कोई जघा गिर, हपट या बइठ तो नइ गे रिहिस ना? कहिके खोज खभर लेवयं अउ आज तो भइगे...।, ... आजकाल तो कइ झन गोसंइया मन, उंकर गाय गरू ला कोनो कांदीभूंस मा ओइला दे रहि ते ओला छोंड़ाय तक ला नइ  जावय..।

पहिली गोसंइया मन गाय गरू ला घर ले गौठान छोंड़े बर जावय ता गाय गरू के नरी मा बंधाय घंटी,घुंघरू अउ खड़पड़ी के आवाज हा पुरा गांव भर गुंज जावय अउ इही घंटी अउ घुंघरू मन के आवाज सुन के बरदी ओइले के बेरा के आभास घलो गोसंइया मन ला हो जावय 

.....गांव गांव मा अभी एक ठन समस्या घलो चलत हे...तेकर सेती घलो कतकोन गोसंइया मन अपन गाय गरू ला बेंचत अउ बरोवत हें.....

वो समस्या हरय... कतकोन गांव  मा अब इंकर चरइया चरवहा घलो नइ मिलत हे...?काबर ए ते कोनजनी? हो सकत हे गोसंइया मन जेन जेवर देथें तेमा उंकर परिवार के भरन पोसन नइ हो पावत होही या उंकर गांव मा इनला चराय बर चरी नइ होही अउ कुछु आने कारन भी हो सकत हे..?

 अब तो....कतकोन गांव मा गांव भर के गाय गरू के गोंसंइया मन के आरी पारी चराय वाले सिस्टम घलो चलत हे।

 इंकर विषय मा एक ठन चिंतनीय अउ विडम्बना के विषय यहु घलो हे के एक छोर ले हमन सरकार ले गाय ला राष्ट्रीय पशु घोषित करे के मांग करत हन अउ दूसर छोर ले हमन गाय गरू ले दुरिहावत घलो जावत हन......लगथे!

अमृत दास साहू 

ग्राम -कलकसा, डोंगरगढ़ 

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

मो.नं.- 9399725588

लघुकथा - " अपील "

 लघुकथा -

      "  अपील "

 

 "हमर आप मन से निवेदन हे कल जरूर अपन सहयोग राशि लेके निश्चित रूप आहूl काली आंदोलन के रुपरेखा  बनाबो lआज के बैठक ला इही मेऱ समाप्त करत हन l " उद्घोषक अतका कहिके सभा ला खतम कर दीस l सभा उसलगे lसब अपन -अपन घर जाये ला धर लीस l गनपत कहिथे -" महिला मन ल आघू  लावव के बात म मनटोरा के बात ला काट दीस सभापति ह l " सुधु पूछिस -

"का बात ला?"

मनटोरा कहत रहिस आघू आथे महिला मन तेन ला पूरा जानबे नइ करय सुनबे नइ करय ओकर गोठ ला l अब जान डरेन कहिके ताली बजवा देथे l" 

"उहू मन तो पूरा बात ला रखे नहीं l पूछ के बताबो कहि देथे l

पूछे के का बात हे? काला पूछही l "

" दारू पीना बंद करो कहे ले काम नइ चलय l पीने वाला ला घर ले बाहिर करो l बाहिर करही त तो l"

" कोन महिला अइसन कर सकत हे, अउ कतका झन ओला साथ दिही, तंही बता l अउ अइसन होही त  ओकर का गत होही l "

" त महिला मन आघू कभू आ नइ सकय l"

'अघुवाही तेन ला का कहि जानथस?

" बताना? "

" फर्जण्ड l कोनो महिला एला सून नइ सकय l"

सुधु अपन बात ला रखिस -" त फ़ेर आंदोलन कइसे चलही l जतके महिला मन के भीड़ रही 

तभे दारू भट्टी बंद होही l दारू पीने वाला मन के घर ले  महिला मन आहे हे, कहत बनही l "

गनपत कहिस -" पीने वाला ल रोका जाय  घर अउ बाहर l "

सुधु -" भइगे  अइसने एती ओती के गोठ हे भैया l राजनीति करने वाला के धंधा हे अउ झंडा हे l  पीने वाला मन मरय झन कहिके  सरकार भट्टी चलावत हे l महिला मन ला सड़क म लाके बेइज्जती झन करवाव l अपन -अपन घर म समझाये के तरीका अपनाव l उही बने हे l  समाज मन रद्दा निकालय l "

"महिला मन के सम्मान  करव जेकर घर म नइ चलय दारू पानी l" 

"वाह! काली अइसने बात रखे बर भउजी ला भेज बे l"

" तैं भेजबे ग तुंहर इंहा जादा पढ़े लिखे हे l"

" जूता मरवाबे का? मोर इंहा सुनय नहीं चप्पल जूता ला देखाथे l  अइसन भीड़ म नइ आवय l "

सुधु हँसत तब आंदोलन सफल होगे... I "


मुरारी लाल साव 

कुम्हारी

अन्न हे त टन्न हे, नइते सना सन्न हे !!

 अन्न हे त टन्न हे, नइते सना सन्न हे !!


भीड़ के कोनो चेहरा नइ होवय, अभाव के चेहरा भलुक आरूग चुकचुक ले होथे। अभाव के दर्षन करे बर होवय त किसान के थोथना ल देख लेवय। चिरहा चेंदरा के आड़ ले पोचकत पेट ल झाँक लेवय। भारत गँवइहा अउ किसनहा देष हरे। इहाँ गाँव के मनमाड़े भीड़ हवय अउ गाँव-गँवई म किसान मन के भीड़ हे। भीड़ माने अभाव के मेला हे। ते हिसाब ले देखबे त भारत के कोनो चेहरा नइहे, मुड़कट्टा हे, फेर भारत ल तो सोनचिरइया ये कहिथे। माने देष दूमुँहा हे, देष के वासीमन दूमुँहा हे। संगे-संग हाथी बरोबर दूदँत्ता तको हे, एक दाँत कुकुर कस सपटके मुसर-मुसुर खाए के, त एक गिजिर-गिजिर करत खबखब ले देखाए के। जब ये हाथी एके ठन हे, देष एके ठन हे त ये चेहरा अउ दाँत दू किसम के कइसे ? सोन के चिरइया दाना-तिनका के मोहताज काबर ? जगमग चमचमावत महल-अटारी बनइया के कुरिया कुलुप अंधियार काबर ? जम्मो बिपत जाँगर टोर जग के पेट भरइया भूँइया के भगवान बर काबर ? 


जगत के जम्मो प्राणी, चाहे वोह रिंगीचिंगी होवय कि साँगर मोंगर, पेट म अन्न परे ले टन्न रहिके अँटियाथे। कतको बड़े पहलवान हो जाय, चार दिन लांघन-भूखन रख दे, जम्मो नस-बल राई छाँई हो जथे। अगास उड़इया के तको एक दिन भूँईया म पाँव माढ़थे अउ छोटे-बड़े सबो ह भूँईया के भगवान के ओगारे पसीना के नून ल चाँटके जीथे। महल के रहइया गुनहगरा, अप्पत अउ घेक्खर मन भले उन्कर अभार ल झन मानय। फेर नून सबो ल लगथे। ये बात अलग हे के कोनो ल जादा लगथे कोनो ल कमती। कोनो नममहलाल हो जथे त  कोनो नमकहराम। ये कमती अउ जादा के निर्वार भगवान नई करय। वो तो जम्मो ल एके आँखी ले देखथे, एकेच लाठी म हाँकथे। भावना के आँखी, मेहनत के लाठी। 


ये भूइँया के भगवान हर खेती अपन सेति कहिथे भर अउ भाव सर्वे भवन्तु सुखिनः के रखथे। इन अपन मेहनत ले कभू जी नई चोरावय। इन कभू जाँगर चोराए बर जानबेच नइ करय, तभे तो कुला खाय माटी तब मुँह खाय भाती के ददरिया गावत-अलापत दिनरात खेत म जीव ल देय जीपरहा बरोबर कमावत रहिथे। ये बात अलग हे कि खैटाहा, गरकट्टा अउ बइमान मन इन्कर संग नियाव नइ कर सकय। 


आज के मनखे करमछँड़हा, नीयतखोर अउ लतखोर होगे हावय। नाक ल ऊँच करके चमकत चमचमावत माँहगी गाड़़ी म चढ़के बाजार जाथे। दस रूपिया के झोला धरे म उन ल नाक कटाए अस लगथे। बेषरमी, बेकदरी अउ अउ बेअदबी के हद तो तब हो जथे जब दस रूपिया के बंगाला ल सात रूपिया म मलोवन माँगथे अउ उपराहा म बंगाला धरे बर झिल्ली तक ल तँही दे कहिथे। किसाने के भीख के दिए धनिया म अपन राषन, आसन अउ भाषण ल महकाथे। इन जीछुट्टा मन के चलय त इन बंगाला के चटनी पसरे म पिसवा के घर लानय। उल्टा कहि देवय - हम तोला पोंसत हन, तैं हमर बर का करे। पद पाए, ताहेन पाद मारे। तभो इन ल लाज नइ लागय। अतेक दुख ल सहिके तको बपुरा बिचारा किसान टूटहा करम के टूटहा दोना, दूध गँवागे चारो कोना कहिके अपन आप ल समझा समोख लेथे। 


डार के चूके बेंदरा, असाड़ के चूके किसान। डार अउ खार दूनो के बेंदरा अपन लक्ष्य ल बिलकुल जानथे-समझथे। तभे तो इन जी परान देके कमाए बर नइ छोड़य। खेती म बने उपज होना इन्कर सौभाग्य होथे अउ फसल के नास होना मऊत बरोबर दुखदायी। जिनगी कतकोन अभाव, बिसम अउ बिपत म बीतय इन जुगजुगावत आसरा के फूचरा अँचरा ल छिन भर नइ छोड़य। आसरा भले चेंदरा-चिथिया जावय, अपन मेहनत के चकमक पथरा ल घिसके उहू म चिनगारी जगो लेथे। ये चिटिक चिनगारी अनन्त-अनन्त उर्जा अउ ऊष्मा के दाहकत रगरगावत भट्ठा होथे। इही चिनगारी संसार ल गति, मति अउ शक्ति देथे। जीत के मुकुट मुड़ म भले नइ परिरै फेर हार काला कहिथे उहू ल नई जानय। बिन मुकुट, बिन खडग, बिन ढार के ये स्वयंभू राजा, अपन हौसला अउ हिम्मत ले हार के रार मता देथे। 


राहेर कोदो के कोनो संग नइ बनै तभो इन एक दूसर के पूरक होथे। तभे तो हिजगा के खेती ल भलुवा खाय काहत माटी म माटी मिल कमाथे अउ कहिथे-अधिया के खेती, सहजी के रोजगार, बजारू औरत के संग अउ उधारी कभू नइ करना। सही म देखे बर मिलथे - उत्तम खेती अपन सेती, मध्यम खेती भाई सेती, निक्कट खेती नौकर सेती, बिगड़ गई तो बलाय सेती। 


आसरा, आष्वासन अउ विष्वास ले दुनिया चलत हे। लेगही राम त रखही कोन, रखही राम त लेगही कोन। इही आसरा के नाँगर म जाँगर पेर किसान जिनगी कुसियार के रसा ल निचो-चुहक लेथे अउ उछाह-उमंग के कतरा बनाके खा लेथे। तभे तो कहिथे- खेती तो थोरी करै, मेहनत करै सवाय, राम चहै वा मानुस को, टोटौ कभूअन आय। इन जानथे कि खेती जुआ हरे। पा गे त पौ बारा, नइतो सरबस वारा-न्यारा। आइस कातिक फुलिस गाल, सावन भादो उही हाल। गाँठ बँधाए जोड़ी संग निभना -निभाना कइसे होथे तेला किसान जानथे। सुख होवय के दुख होवय जिनगी के गाड़ी दूनो पाटा के सुमत बिगर अधबीच्चे म धपोर दिही, तेकर सेती संघेर के चलना अपन परम करम धरम मानथे। जिनगी के संगवारी रिसाए ल धरथे त संगी ल अउ किस्मत रिसाए बर धरथे त किस्मत संग ठट्ठा अउ हाँसी-मजाक करत ओकर सुघरई ल सहिरावत मना लेथे। मन मसोस के भले रहि जाय, फेर मया पझराके जिनगी के मजा उड़ा लेथे। ठाढ़े खेती गाभिन गाय, तब जानौ जब मुँह में जाय। सम-बिसम, सुकाल-दुकाल अउ सम्मत-बिपत म सामंजस्य ल बइठारे बर किसाने जानय। उन जानथे कि पंचमी कातिक शुक्ल की जो होवै शनिवार, तो दुकाल भारी परै मचिहै हाहाकार। जब बरखा चित्रा म होय, सगरी खेती जावय खोय।


ये सुकाल के बेरा ल तको जानथे -रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय, कहै घाघ सुनि घाघिनी स्वान भात नही खाय।

आद्रा बरसे पुनर्वसु जाय, दिए अन्न कोई न खाय।

आद्रा के बरसे, महतारी के परसे, जऊन नइ अघाइस तऊन जिनगी भर तरसे। 

गाँव म घर नहीं, खार म खेत नहीं, तभो ले इन जिनगी ले हार नइ मानय। अपन मेहनत के भरोसा खुद संग दुनिया के पेट ल पाल-पोस डरथे। शायद इंकर इही जीवटता ल देख के दुनिया जलथे। ठौं-ठौं म इन ल कमजोर करे के ताना -बाना बुनथे। तरीवाले तो तरीवाले ऊपरवाले तको कभू इंकर नरी ल दबा-चपक के राखे बर दूब्बर बर दू असाड़ लान देथे। 


गँहू संग कीरा रमजाए कहिथे, तेन सोला आना सही हे। करनी कोनो करय, भरय कोनो। बिकास के मुकुट पहिरे मटमटावत वर्तमान पवन, पानी अउ माटी ऊपर कतका अति करत हावय। पखरा के अल्लार जंगल उगावत हे। ठौं-ठौं म बिख बोवत हावय अउ मँगरा के आँसू रोवत हावय। सबो जानत हे तभो बिलई कस आँखी ल मूँदके मुँह मिटकियाए बइठे हावय। आँखी ल मूँदके बिलई भले सोच लेवय कि कोनो ल नई दीखत हे, ये ह ओकर भरम हरे। ये भरम के भूत जब तक नई उतरही दुनिया नई उबर सकय। माटी के मान, पानी के जान अउ हवा के शान ल मितान कस मया समोख के बनाए रखना सबो के कर्तव्य हरे। बिलई के गर म घाँटी कोन बाँधय। भूत के छूत ह किसाने भर ल काबर लगय ? मेहनत करय कुकरा, अण्डा खाय फकीर। ये लकीर जब तक नइ मेटाही बिपत के सुरसा अइसनेहे मुँह बाए दुनिया ल खाए बर दँऊड़ते रहिही। अक्कल के न बुध के, बनिया मारे कूदके। एसी रूम म बइठ के किसान अउ किसानी के गोठ करे भर ले किसान के किस्मत नइ सँवरय। 

पानी म गोबर करही तेन उफलबे करही। ऊँचहा अटारी के रहइया, हवा म उड़इया दुनिया भोरहा म झन राहय कि हमरे भर चिक्कन चाँदर रहे ले जग म सुघरई आ जही। करनी दीखय मरनी के बेर। बिपत बताके नई आवय, न ककरो नेवता झोंकय। जब आ परही त कतको आपत्ति कर वो अतेक अप्पत होथे कि अपन जम्मो सँऊख पूरा कर लेही। छिन भर नइ लगय मनखे के जम्मो सँऊख पूरा हो जही।



धर्मेन्द्र निर्मल 

9406096346

पूस महीना के महत्तम*

 *पूस महीना के महत्तम*

                                  

                          *डोरेलाल कैवर्त  "हरसिंगार "*

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                    हिन्दी पंचाग के कालगणना मुताबिक एक बछर के बारा महीना होथे अऊ सबो महीना बारा किसीम के अलगेच-अलग होथे। सबो महीना अपन आप म विशेष महत्तम ल तुमा नार असन लपेटे हावे।सबो महीना के अंधियारी अऊ अँजोरी पाख के आरुग पहिचान बने हावे।बारहो महीना के अलगेच चिन्हारी अऊ महत्तम फकफक ले ओग्गर दिख जाथे।

             बारहों महीना ल तीन ऋतु म अलगेच-अलग बांटे गे हावे।चार महीना बरसा ऋतु के होथे जेमा नरवा, नदिया ,तरिया, पोखरी,खेत-खार अऊ कुआँ-बउली जघा-जघा पानीच-पानी दिखथे।धरती दाई हरियर लुगरा पहिरे सोला सिंगार करे कस जनाथे।ओकर बाद चार महीना जाड़ा के ऋतु आथे जेमा जाड़ के मारे हाड़ा तको कांप जाथे,जाड़ दंदोरे लागथे।फेर चार महीना गरमी के ऋतु होथे।गरमी के मउसम म सूरुज ले अँगरा बरसा देथे।भुइयाँ के कुधरा चट ले जरे लागथे।देहें ले नरवा कस पसीना बोहाय ल धर लेथे।जुड़-छांव खोझासथे।चिरइ-चिरगुन,जीव-जन्त मन ल पानी पियाय के पून काम कतको झन मन करथें।

                    वइसे देखे जाय त पूस के महीना सबो ल अगोरा रहिथे, फेर पूस पून्नी के अलगेच महत्तम होथे।सबो किसान मन कोठार म धान के खरही छोटे-बड़े गोल चुकचुक ले गांजे रहिथें।दउंरी अऊ बेलन,टेक्टर ले अपन धान ल मिस-कुट के अन्नकुवांरी दाई ल परघाके घरेच म लानथें।कोठी-ढाबा धान म भराय रहिथे त घर म उछाव रहिथे।ते पाय के अन्नकुवांरी दाई के पाछू म सबो किसान मन गरब करथें अऊ अपन भाग सहरावत रहिथे।

                 पूस के महीना गजब आय बड़ जल्दी बुलक जाथे गम नि मिले।रथिया जबर लम्बा अऊ दिन छोटकून होथे।पूस महीना जाड़ के भराय महीना होथे।जाड़ ह देहें भर ल दंदोरे लगथे,झाँपी म धरे-सइंते सुपेती ,कम्बल ल बउरे बर सबोझन बहिराथें। *" पूस के जाड़ा कंपवा देथे हाड़ा "*। भूर्री बारे,रउनिया लेहे,गोरसी अऊ अंगेठा तापे के गजब मजा आथे।गरमे-गरम चहा अऊ पताल चटनी संग अंगाकर रोटी के सवाद लेहे के अलगेच मजा रहिथे।तरिया,नदिया के पानी सबो ल रहि-रहि के डरवाथे।बबा के गोरसी तपइ,चोंगी पियइ अऊ खोर-खोर खंसइ के आरो मिलत रहिथे।

                  पूस के महीना म सूरुजनारायन अपन सतरंगी रंग ल धरके रुख के छइहाँ म लुकावत ,धुंगिया के चद्दर ओढ़े मुचमुचावत बहिराथे।अइसे लागथे जाना-माना नवा बहुरिया कस लजावत हे।हवा तो बैरी बरोबर जनाथे जून्ना बैरवासी निकालत हावे अइसे लागथे।दांत किटकिटावत घड़ी के कांटा असन सुनावतत रहिथे।छोटे-छोटे बिरवा के ऊपर गोल-गोल शीत के बून्द मोती जइसन चमकत हावे।जेहर देखे म बड़ सुग्घर लागथे।

                  खेत-खार म तिवरा भाजी,चना भाजी,सेरसों भाजी,बटर,बउटरा अऊ मेड़ के राहेर सबो ल लोभावत रहिथे।तिवरा बटकर साग के सवाद लेहे के मजा आथे।बारी-बखरी के साग-भाजी,भांटा, पताल मन भावत हावे।बाम्बी सेमी,चनबुटरी सेमी अऊ पर्री सेमी के नार ढेंखरा म लपटाय अइसे लागथे जइसे मया ल रपोटे अपन छाती म चटकाय हावे।छत्तीसगढ़ के सेव कहाथे बोइर घलो मन भावन हो जाथे । डोहरहा अऊ गेदराय हरियर पिंवर बीही देखत मुहूँ म पानी ओगर जाथे।छत्तीसगढ़ म जघा-जघा रउताही मेला  घुमे अउ रेंहचुल, झूलवा झूले के अलगेच मंजा मिलथे।

               गुनिक सियान मन कहिथे हमर गँवई गाँव म अपन नोनी-बाबू के बर-बिहाव करे बर पूस पून्नी के तिहार मनाय के पाछू वर अऊ कइना खोजे सरेखे निकलंय एकर पाछू कुछू न कुछू कारन जरुर होही ।मोला लगथे जून्ना समे म आय-जाय के साधन सुविधा ओतका जादा नि रहिस ते पाय के रेंगत जावंय,जाड़ अऊ छोटे दिन ,काकरो घर रुके म परेशानी झन होही कहिके पूस महीना नाहक लेवय तेकर पाछू लोग-लइका के सरेखा करे जावंय।कइथे पूस म बरी घलो नि बनावंय।एकरो कारन हावे पूस महीना म बादर घोप देथे जेकर कारन बरी जल्दी नि सुखाय ते पाय के ओकर सवाद अमसुरहा हो जाथे अऊ नि चुरय घलो ।

               हमर देश म बछर भर म कतको अकन परब ल मनाथन।जेमा हमर छत्तीसगढ़ के पहिली तिहार हरेली ले शुरू होके फागुन महीना म मया-दुलार के परब मया के रंग होरी के संगे-संग तिहार ह छेवर होथे।छत्तीसगढ़ म सबो परब ल बड़का उछाव ले मनाय जाथे इहाँ के सबो तिहार म मया-दुलार भराय हावे जेकर सेती सबोझन परब ल मनाय म कोनों प्रकार के कोताही नि करंय।

              पूस पून्नी के दिन हमर छत्तीसगढ़ के लोक संसकृति,लोक परब,दान-पून के तिहार *छेरछेरा* बड़का उछाव ले मनाय जाथे।ये दिन के सबो ल अगोरा रहिथे।लइका रहे चाहे सियान सबो कोनों ल छेरछेरा मांगे जाये के साध लागे रहिथे।छेरछेरा परब बरोबरी के तिहार आय एमा छोटे-बड़े,जात-पांत,ऊंच-नीच के कोनों किसम के भेद नि रहे।येकर सेती ये तिहार ल समरस के तिहार घलो कहे गे हावे।अऊ सबो जुरमिल के मनाथे।

                छेरछेरा परब के दिन गली-खोर म बिहनिया बेरा लइका मन के सेरी-डोरी,आवा-जाही,रेलम-पेला लागे रहिथे।लइका मन के छेरछेरा के गुरतुर बोली कान म मंधरस घोरे रहिथे।झांझ-मंजीरा अऊ मांदर के थाप म कनिहा मटकावत डंडा नाचा गजब सुहाथे।डंडा नाचा के कुहूकी के अलगेच महत्तम रहिथे जेकर भाखा हिरदे ल हिलोर देथे।नोनी मन के सुआ नाचा बिधुन होके नाचथे।सुआ नाचा के सुग्घर गुरतुर गीत अऊ हंथोरी के थाप के सोर ह दुरिहा ले सुनावत रहिथे।

              एती घर के मुहांटी म डोकरी दाई टुकनी म धान धर के ठोम्हा,अँउजरा भर-भर बइठे-बइठे सबो लइका-सियान अऊ छेरछेरा मंगइया मन ल देवत मंजा लेवत हे,जइसे शाकम्भरी दाई सबो ल बइठे -बइठे मया-दुलार बांटत हावे।चूल्हा म माढ़े कराही चन-चन बरा के चुरइ के ममहाई गली-खोर ल तको गमका देवत हे। सबोझन नाचत-गावत,झुमरत खुशियाली मनावत मया-दुलार बांटत छेरछेरा परब मनावत रहिथें।पूस महीना छेरछेरा तिहार के संगे-संग माघ महीना ल सउंपत छेवर हो जाथे।

           आप सबोझन ल जोहार हे।

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जस करनी तस भरनी*

 *जस करनी तस भरनी*


केहे जाथे- जस करनी तस भरनी'। ये संसार मा जउन जइसन करनी करथे वइसने फल घलो भोगथे। निक के निक फल अउ गिनहा के गिनहा।

        पड़ोसी सुभाष अउ कातिक संगे पढ़िन। सुभाष पढ़ई-लिखे मा गजब धियान देवे। खरचा घलो सोच-समझ के करे। कातिक गजब खर्चीलहा रिहिस। सुभाष आज के संगे-संग अवइया भविस के बारे मा घलो सोचे। कातिक ल न घर के फिकर न अवइया भविस के। 

       संसार मा सुख अउ दुख एक सिक्का के दू भाग होथे। परानी के जिनगी मा आरी-पारी ले आथे। पहिली सुख मिलथे त पाछु दुख। अउ पहिली दुख मिलथे त पाछु सुख। 

          सुभाष अपन पढ़ई जिनगी मा गजब दुख झेलिस। स्कूल जाय बर घर मा साइकिल घलो नइ रिहिस। कभू संगी मन के साइकिल मा जावय कभू रेंगत। सुभाष रात अउ दिन एक करके कॉलेज के  पढ़ई करिस अउ अव्वल नम्बर मा पास घलो होगे। उहीं  कातिक पढ़े-लिखे बर टालमटोल करय। दसवीं कक्षा ल पास नइ कर सकिस। सुभाष पढ़ लिख के कलेक्टर ऑफिस मा बाबू बनगे अउ कातिक खेतिहार होगे। सुभाष कर आज मोटरसाइकिल अउ कार दुनो हे। कातिक कर साइकिल के टायर लगवाये बर रुपिया नइ हे।

     ए बछर कातिक के नोनी उषा के बिहाव होवइया हे। कुछु जोरा होय नइ हे। मने मन मा कातिक गुनत हे कि नोनी बर गहना लेवाय नइ हे। नइ पहिनाये मा खुदेच के फदित्ता हे। सगा-सोदर, घर-परिवार बर कपड़ा-लत्ता के लेन-देन तो आम बात हे। सबो ल नइ देबे त चल जाही फेर जिंकर घर के कपड़ा-लत्ता ल पहिरे हावन वो मन ल तो देना ही पड़ही। दहेज देना अउ लेना भले कानूनन  अपराध हे। फेर अपन बेटी ल कोनों मॉं-बाप जुच्छा विदा घलो कइसे करे। खुद के इज्जत मा बट्टा लगही। हाँड़ी के मुँह मा परई ल तोपबे, मनखे के मुँह मा का ला। रहि-रहिके ये बात ह कातिक के दिमाग ल अइसे खावत हे जइसे लकड़ी ल घुना।

         कातिक आज अपन बीते दिन ल सुरता करके पछतावत हे। जब कातिक के बाप जीयत रिहिस, तब दू पइसा आवक खातिर कातिक बर किराना दुकान खोलिस। कातिक किराना दुकान ल घलो सफल नइ कर पाइस। काबर कि कातिक के नवा-नवा जघा मा घूमे-फिरे के गजब सउँख रिहिस। कातिक अपन सउँख ल पूरा करे खातिर किराना दुकान मा होय नफा के संगे-संग मूल ल घलो घूमे-फिरे मा उरकाये। कातिक के ददा किसुन कातिक ल गजब समझाये कि- बेटा, कुछ रुपिया बचाय बर सीख। आज बचाबे त तोरेच भविस मा काम आही। समय-बेसमय ल कोनों नइ जाने। जब रुपिया के जरूरत पड़ही, तब काकर कर हाथ फैलाबे? बचा के रखबे त तोरेच परिवार के काम आही। हमर का कब साँस ठग दिही का भरोसा। मनखे ल अपन आवक ले जादा कभू खर्चा नइ करना चाही।  फेर कातिक मा कुछु असर नइ परे। उल्टा खुदे ज्ञान बाँटे लगे कि घूमे-फिरे के दिन मा नइ घुमहूँ तब का बूढ़ा जहूँ तब घुमहूँ? बाप ल सरग सिधारे दू बछर होइस हे अउ कातिक के गृहस्थी बिगड़े लागिस। घर के जरूरत के पूर्ति मुश्किल होय लागिस। कातिक काम-बुता मा धियान तो देवय नहीं, बस खरचा बर ही आगू रहय। आज कातिक ल अहसास होवत हे कि सउँख तो  माँ-बाप के कमई ले ही पूरा होथे, अपन कमई ले तो सिरिफ जरूरत पूरा होथे।

          कातिक के ददा किसुन बहुत मेहनती रिहिस। अपन लहू-पसीना एक करके दू एकड़ जमीन घलो बिसाइस। आज ओकर बेटा कातिक उही जमीन में से एक एकड़ ल बेचे बर तियार हे। वोला अपन बेटी उषा के बिहाव जउन करना हे। रुपिया के आज सख्त जरूरत हे। कातिक ल भरोसा हे कि ओकर जमीन के जादा कीमत राममोहन ही दे सकत हे। काबर कि वो जमीन राममोहन के जमीन ले लगे हे। राममोहन ल घलो ये बात पता हे कि कातिक ल रुपिया के सख्त जरूरत हे। तेकर सेती जादा तान के कीमत दे बर तियार नइ हे। मउका के फायदा सबो मन उठाना चाहथे। तब राममोहन घलो काबर चूकही। अटके बनिया  का करे, गिराहिक के मर्जी ल स्वीकार करे।मजबूरी मा कातिक अपन एक एकड़ जमीन ल चार लाख मा राममोहन कर बेच के पछतावत हे। अपन करम ल सोच-सोच के आँसू ढारत हे। 'जस करनी तस भरनी' के कहावत आज कातिक के जिनगी मा सिरतोन होगे।

           

             राम कुमार चन्द्रवंशी

              बेलरगोंदी (छुरिया)

             जिला-राजनांदगाँव

छत्तीसगढ़ के चमकत हीरा मेहत्तर राम साहू-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 *पुण्य तिथि के बेरा मा छत्तीसगढ़ माटी महतारी के दुलरुवा बेटा गायक,कवि रामायणाचार्य मेहत्तर राम साहू जी ल कोटिशः नमन*


छत्तीसगढ़ के चमकत हीरा मेहत्तर राम साहू-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                  धन धन हे हमर छत्तीसगढ़ के माटी, जिहाँ 01 जुलाई सन 1933 के एक अनमोल हीरा गरियाबंद ले लगे ग्राम पांडुका मा अलालराम साहू अउ सुकवारो बाई के घर जनम धरिन। वो अनमोल, चमकत हीरा आय मेहत्तर राम साहू जी। नान्हेंपन म ददा तेखर पाछू दाई के मया ले दुरिहाय के बाद, मेहतर राम साहू जी ऊपर दुख के पहाड़ लदागे। डोकरी संग, छोटे भाई अउ बहिनी संग पूरा परिवार के जिम्मेदारी ओखरे ऊपर आगे। पेट पाले बर जांगर टोर महिनत अउ बीड़ी बनाए के बूता घलो उन ला करेल लगिस। संझा बिहना जिम्मेदारी के बोझ म लदे लदे कटत रिहिस। लइकुसहा उम्मर मा ही उन मन घर परिवार के नेव ल बोहे रिहिन। साहू जी बचपन ले ही प्रतिभावान रिहिस। भगवान घलो बिरवान के भाग ला गढ़थे। अउ उही होइस घलो। देवदूत बरोबर उजियार लेके नारायण लाल परमार जी गांव पांडुका मा गुरुजी बनके आइन अउ सबले बढ़िया बात ये के गांव भर मा उंखरे घर मा रहे लगिन। ताहन का कहना? परमार गुरुजी के नजर मेहत्तर राम साहू जी के प्रतिभा ला परख डरिस, अउ काम बूता के संगे संग ओखर हाथ मा कलम थमा दिन। उंखर डोकरी दाई ल समझा बुझा के स्कूली शिक्षा बर हामी भरवाइस। परमार गुरुजी के प्रताप ले साहू जी मन काम बूता के संगे संग पढ़ाई लिखाई अउ कला के रदद्दा मा दौड़ेल लगिन। टेलरिंग मा घलो साहू जी के जवाब नइ रिहिस।नाचाकूदा, खेलकूद, गीत संगीत, रंगमंच नाटक, गायन,रामलीला, राम कथा वाचन, गीत कहानी लेखन कस कतकोन सुघर उदिम मा साहू जी मन बचपन के ही अघवा बनके चले लगिन। विद्यार्थी काल मा ही अपन गुरुजी फकीर राम देवांगन जी के मार्गदर्शन मा साहू जी, वो समय आयोजित होवइया परिक्षा ला पास करके रामायणाचार्य के उपाधि पाए रिहिन।

                       पढ़ाई के बेरा मा जीवन लाल साहू जेन बाद मा विधायक बनिन, साहू जी के खाँटी मितान रिहिन। जीवन जी के संगे संग साहू जी के अनन्दराम, चैतराम, उधोराम झकमार, रामप्यारे, नरसिंह, भगीरथ तिवारी जइसे व्यक्तित्व मन संग मेलजोल रिहिन। छत्तीसगढ़ महतारी के खाँटी सेवक मेहत्तर राम साहू जी के नाचा कूदा, कला संगीत, गीत कविता के कोनो शानी नइ रिहिस। तभे तो भूदान आंदोलन ले प्रेरित गीत- "दे देव भुइयाँ के दान ग" आकाशवाणी भोपाल ले प्रसारित होइस। तेखर बाद चैतराम साहू जी के आवाज मा गाए "भुइयाँ ला सरग बनाबों" जइसे मनभावन गीत बजे लगिस। आज के दौर मा कलाकार,कवि लेखक मन प्रसिद्धि बर सामदण्डभेद अउ कतकोन जुगत जुगाड़ बनाथे, फेर वो दौर मा बिन जैक जुगाड़ के घलो असल हीरा के परख करत करत प्रस्तुत कर्ता अउ प्रयोजक मन पा गिन मेहत्तर लाल साहू जी ला। वो बेरा के बड़े छोटे सबे प्रकार के पत्रिका पेपर मन मा साहू जी मन खूब छपे अउ कवि सम्मेलन मा घलो भाग लेवँय। आकाशवाणी रायपुर बने के बाद कोरी ले घलो आगर गीत 1975-76 मा आकाशवाणी रायपुर ले रिकार्डिंग होइस। मेहत्तर राम साहू जी के अइसन अइसन मनभावन गीत, जे छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया मन के अन्तस् मा रच बस गिस। कुछ गीत के सुरता महूँ ला आवत हे, यदि आपो मन रेडियो ले जुड़े रेहे होहू ता आपो ला सुरता आ जही--

 सुवा लहकत हे डार मा,

 तहू जाबे महूँ जाहूँ राजिम मेला,

 सारस बोले रे तरैया मा,

 लाल लुगरा रे पिंयर धोती गँवन के,

 झुनकी तरोई रे भाई,

 लक्ष्मण रेखा पारेल लगही,

 मोंगरा फूल फुलगे,

 दे तो दीदी दे तो दीदी,दही वो बासी 

 झूम झूम नाचौ

             ये सब गीत आजो सुने बर मिल जथे, अउ जे बेर सुनबे ते बेर अन्तस् मा समा जथे। साहू जी कलमकार तो रबे करे रिहिन संगे संग उम्दा गायकी घलो करे। लगभग अपन गीत ला खुदे सुर साज में ढाल के गाए। सतत कलम चलावत मेहत्तर राम साहू जी मन अपन जीवन काल मा 13 ठन छत्तीसगढ़ी पुस्तक निकालिन।  न सिर्फ गीत कविता बल्कि कहानी,एकांकी,कथा,लघुकथा अउ गजल जइसे लगभग सबे विधा मा छत्तीसगढ़ी मा सृजन करिन। कुछ पुस्तक के नाम प्रस्तुत हे-

कौवा लेगे कान ला(काव्य संग्रह), 

होही अँजोर (गीत संग्रह),

 मया के बंधना (एकांकी संग्रह),

हमरेच भीतरी सब कुछ हे(कहानी संग्रह),

बूड़े म मोती मिलथे जी(कथा संग्रह),

सब परे हे चक्कर म (गम्मत),

कैकेयी (लघु प्रबंध काव्य),

रतना बपरी ( खंड काव्य),

राजिम लोचन ( कहानी),

                       स्कूली शिक्षा अउ मैट्रिक के बाद साहू जी मन गुरुजी के नौकरी करिन। कुछ बछर बाद उंखर पदस्थापना गरियाबंद ले बागबाहरा खोपली होगिस। उहें बछर 1980 में कला के पुजारी मेहत्तर राम साहू जी मन "तुलसीदल लोककला मंच खोपली बागबाहरा नाम के एक संस्था बनाइन। अउ अपन कमाई ला परिवार ले जादा कला, संस्कृति, साहित्य अउ समाज के बढ़वार मा लगा दिन। साहू जी के सुपुत्र धनराज साहू जी मन अपन ददा के जगाए पौधा ल लगातार बढ़ावत हें, चाहे कला होय, या साहित्य सबे के बढ़वार बर लगातार उदिम करत हें। वइसे तो कला साहित्य के समागम बागबाहरा मा रोजे होथें, फेर बछर मा एक अउ दू तीन बेर घलो छत्तीसगढ़ भर के कला अउ साहित्य प्रेमी मन जुरियाथें। कला अउ साहित्य के क्षेत्र मा कई आवासीय कार्यशाला के संगे संग सुरता श्री मेहत्तर राम साहू जी के बेरा मा, कई सम्मान जइसे--  नारायण लाल परमार, मेहत्तर राम साहू, प्रभंजन शास्त्री, हरिकृष्ण श्रीवास्तव, पी एल कोरी, साहित्य सन्देश, बी सी दास आदि आदि सम्मान  छत्तीसगढ़ भर के साहित्कार मन ला, मेहत्तर राम साहू सृजन संस्थान द्वारा दिये जाथे। मेहत्तर राम साहू जी जब फिंगेश्वर मा प्रामरी स्कूल मा गुरुजी रिहिन ता सन्त कवि पवन दीवान वो समय हाई स्कूल मा पढ़त रिहिन। बागबाहरा के गौटिया अनवर शेख खाँ, प्रभंजन शास्त्री, तरुण सोलंकी,  हरीश पांडे, जग्गू,गौरी, छाया आदि व्यक्तिव मन संग मिलना जुलना अउ बढ़िया सम्बंध साहू जी के रिहिस। कला अउ साहित्य के पुजारी श्री मेहत्तर साहू जी जिनगी भर माटी महतारी के सेवा करिन अउ सेवा करते करत 25 दिसम्बर 2010 के ये दुनिया ले बिदा ले लिन। 

                   मेहत्तर राम साहू जी के कलम ले कुछु नइ छूटे हे, खेती बारी, भर्री भाँठा, संस्कृति समाज, पार परम्परा, तीज तिहार, ऊंच नीच, छोड़े बड़े, दुख सुख, सृंगार, धरती, आगास,पाताल, नदी,ताल,जनजागरूकता आदि आदि---- का विषय मा कलम नइ चलाए हे? आवन कुछ काव्य के बानगी देखथन----


"*धन दौलत, रुपिया पइसा ला तो मनखें मन बिन बोले बाँट डरथें, फेर जब दुख आथे ता मनखें अकेल्ला हो जथे, उहू ला बाँटे के किलौली करत साहू जी मन लिखथें"*--

आवव 

मिलके

बँटवारा कर लेवन

भूख पियास ल,

बासी के हँड़िया

बरोबर

पोटारे-पोटारे,

जुन्ना-जुन्ना

आस ल।।


*"मनखें के अधिकार के बात होय या करम के या फेर जगजागरुकता के साहू जी सबे स्वर ला मुखर रूप मा उठाए हे"*-

जाग जावन

साँप के बिख ल

टोरे बर,

दूध के कटोरा म

मुंह ल बोरे-बर।

संकलप के रुख तरी

सुंता के कुंदरा बनाबो

शब्द कोश म 

नावा अध्याय के

बीज ल उपजाबो।।


*"नायिका ला संबोधित करत प्रकृति के शानदार मानवीकरण करत नायक के माध्यम ले सृंगारिक घटा बगरावत साहू जी मन गजल रूप मा कहिथें"*-

ये रात तोर असन मांग ला,सँवारे हे।

बहार तोर असन, मुस्की घलो ढारे हे।।


*"नई कविता के बानगी घलो साहू जी के रचना मन मे दिखथें। बने चीज के खुल्लम खुल्ला पलोंदी अउ गिनहा के मुँह फटकार के विरोध,साहू जी के रचना मन मा सहज दिखथें"*-

काम के 

साधत ले

धरम के 

नकली धोती ल

पहराथे,

उही ह

फाँसी के 

फांदा होके

हमरे गला मेर

लहराथे

अब तो जानो

मोर कहना मानो।।


*"साहू जी मन के बचपना के समय आजादी के छटपटाहट रिहिस अउ जवानी मा देश आजाद होय के बाद सृजन के चुनौती, दुनों रंग मा रंगे के बाद रचना मन मा देशभक्ति के बिगुल तो बजबे करहीं। ओज, प्रेरणा के कतकोन स्वर साहू जी मन अपन कविता के माध्यम के जनमानस ला दिये हें"*-

हाथ-हाथ ल चलो जोर के

एकता म आघु बढ़ जाबो।

हमर देश हे, हमर भुयां हे

दुश्मन के छाती चढ़ जाबो।।


*"छत्तीसगढ़ के सुख समृद्धि अउ बढ़वार के बात करइया साहू जी मन छत्तीसगढ़ रॉज निर्माण के सपना घलो देखिन अउ उंखर जीते जीयत नवा राज घलो बनिस। फेर रॉज निर्माण के बाद राज करइया आने आगे, जबकि लड़इया कोई दूसर रिहिस। तभे तो  साहू जी मन कथें"*-

छत्तीसगढ़ के राज पाए बर

बहाँ जोर के करिंन लड़ाई।

जे मन खुसरे रिहिन बिला में

नाँचत हावय मेला मड़ाई।।


*"बात बात मा बड़े अउ गाहिर बात ला सरल सहज ढंग ले कहि देना साहू जी जे कलम के गजब के विशेषता रिहिस। बिंब प्रतीक अउ अलंकार के बानगी के तको जवाब नइ रिहिस"*-

साँच बिचारा जीवत हावय,भटक-भटक के।

लबरी मोटियारी नाचत हे, मटक-मटक के।।


संझिया राँड़ी पहिरे हे, चिकमिकहा चूरी।

पुनमासी के रात, चिरागे कूरी -कूरी।।


*"दुख दरद धरे महिनत के थेभा मा सुख के रद्दा खोजइया मेहत्तर राम साहू जी शोषण, ऊंच नीच, गरीबी सब ला खुदे जीये अउ झेले हे"- एखरे बर सब ला सावधान करत कथें कि"*-

सोहबती-मोहबती म मेटागेंन

दार घोटरे कस घेटागेंन।

हमरे तन अउ लहू ह

दिया अउ तेल होथे।

उँकर बर देवारी म

शुभ-लाभ के मेल होथे।।


*"छत्तीसगढिया सबले बढ़िया" ये कोनो हाना नही बल्कि छत्तीसगढिया मन के सिधवापन के पहिचान ए। मनखें मनखें ला एक मनइया,नता रिस्ता के बीड़ा बोह के सबर दिन चलइया, छत्तीसगढिया मन ला जगावत, जेला देखे हे तेला हूबहू शब्द देवत साहू जी कथें"*-

कतका दिन ले ममा-भांचा

अउ मितान मानहौ।

कतका बेरा ले

मनखे तन ल सानहौ।।

कब ले मुँह ताकहौ

पर-पर के।

कब तक जिहौ

मर-मर के।।

पंदोली देथो

तेकरे सेती मरथो।

अपन हाथ म


*"जेन भी राज पाठ संभालिन आखिर मा छोट मंझोलन ल ही रौंदिन। फेर उंखर चालबाजी ला छत्तीसगढिया मन नइ समझ पाए अउ करम ल दोष देय बर धर लेथें, इही बात ला साहू जी कथें"*-

निच्चट होगेंन सिधवा

ओमन होगे, चील-गिधवा

ठोंनक के झींक लेथे मास ल

हमन दोष लगाथन अपन सांस ल।।


*"साहू जी मन अपन जिनगी ला कला, साहित्य,शिक्षा अउ समाज के बढ़वार बर खपा दिन। छत्तीसगढ़ महतारी के रतन बेटा मेहत्तर राम साहू जी,अपन माटी महतारी ला माथ नवावत कहिथें"*-

मेंहा पिलवा हँव,छत्तीसगढ़ महतारी के।

में हँव बजरंगी,छत्तीसगढ़िया संगवारी के।।

मुस्काथँव बादर झर जाथे

कमल फूल मोर हाँसी।

बिजली के रंग घलो लजाथे

अइसे चिगबिग आँखी।।

हँव अलबेला नार बरोबर,

मैंहा तोर फुलवारी के....


*"कथा, कहानी, तीज तिहार, संस्कृति संस्कार के संगे संग प्राकृतिक सुंदरता ला घलो साहू जी मन खूब उकेरें हे। जेमा अलंकारिक छटा ला अलग से खोजे के जरूरत नइहे, साहू जी के रचना मन मा काव्य गत सबो विषेशता दिखे बर मिल जथे"*-

खेतखार म

चिगबिग-चिगबिग,रूप रुपौती

लकलिक-लकलिक

जीव लुभवती।।

जानो-मानो,भूरी भइंस के

जम्मो गोरस,

छलल-छलल बोहाथे

रंग बिरंगी मेड़पार म

इंदर धनुष लजाथे।।

गाँव के बरगद रुख

बबा कस

भाँग पिए अस,डोलत हे

आमा-पीपर एक पार में

जय जय जय जय बोलत हे।।


               अइसने अलग अलग विषय, विधान अउ विशेषता लिए कतकोन रचना हे, सबो ला ओरियाना मोर बस के बात नइहे। ये सब के संगे संग कहानी, एकांकी, जनउला, प्रबन्ध काव्य,गजल, खंडकाव्य,कथा कस अउ कतकोन विषय विधा मा साहू जी मन कलम चलाए हें। फेर यहू बात सच हे कि आज साहू जी के रचना जादा झन तीर बगरे घलो नइहे। वो दौर मा ज्यादातर कवि मन हिंदी मा रचना करें, मेहत्तर राम साहू जी मन घलो हिंदी मा लिखिन,फेर माटी महतारी के करजा उतारे बर छत्तीसगढ़ी के जादा सेवा करिन। साहू जी के रचना मा भावपक्ष बड़ बेजोड़ हे अउ कलापक्ष के सुघराई के का कहना? अलंकार, बिम्ब,प्रतिबिम्ब, प्रतीक, हाना, मुहावरा, बिस्कुटक, लोकोक्ति के संग सरल सहज ठेठ छत्तीसगढ़ी रचना,जे नाना प्रकार के रस ले भरे रसमलाई बरोबर साहू जी के कलम के निकले हें। साहू जी के रचना ला पढ़े बर छत्तीसगढ़ी जानना जरूरी हे, चलती छत्तीसगढ़ी के जघा ठेठ छत्तीसगढ़ी हे, जेमा रायपुर, बिलासपुर के छत्तीसगढ़ी के मिश्रण दिखथें। कतको मन  छत्तीसगढ़ी मा ष,श नइ होय कहिके विवाद घलो पैदा करथें, फेर मेहत्तर राम साहू जी मन ष,श, ढ़, ढ, ङ, ड़, व ,चन्द्रबिन्दु आदि सबे ला बेधड़क बउरें हें। धनराज साहू जी द्वारा मोला भेजे, साहू जी के हस्तलिखित कविता एखर सबूत हे। कोई कोई जघा हिंदी के अपभ्रंश हे, फेर ज्यादातर जब हिंदी के शब्द ल लेना पड़े हे त जस के तस ले हे, जइसे प्रकृति, स्कूल, ऑफिस, पर्यावरण---- आदि आदि। देश के आजादी के पहली ले घलो छत्तीसगढ़ी महतारी के सेवा करइया माटी के दुलरुवा बेटा मेहत्तर राम साहू जी के कला, गीत, संगीत अउ महतारी भाँखा में साहित्यिक योगदान कखरो ले छुपे नइहे, तभो उंखर नाम आज कला साहित्य जगत मा धूमिल हे। उंखर गीत संगीत ला सुन के हम सब खुश हो जाथन फेर नाम ला नइ जानन, ये हमर समाज,राज अउ शासन प्रशासन के दुर्भाग्य ये।


जीतेन्द्र वर्मा" खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


नमन

देख जी आँखी सुन जी कान, मनखे-मनखे एक समान*

 *देख जी आँखी सुन जी कान, मनखे-मनखे एक समान*


18 दिसम्बर सन 1756 के गुरु घासीदास बाबा के अवतरण होइस, ओ समय हमर देश म अंग्रेज मनके फूट डारव अउ शासन करव के नीति ह मनमाड़े डारा-थांघा फेंकत फुलत-फलत रहिस। गाँव-शहर जहाँ देखते भेदभाव ह अपन चरम म दिखतिस। अंग्रेज मन हम भारतीय मन संग रंगभेद करँय अउ हम भारतीय मन अपने भाई-बन्धु मन संग बरन अउ जाति भेद करन। स्थिति अइसे होगे राहय के भेद-भाव के घिन मानसिकता ह हजारों हजार व्यक्ति अउ वोकर घर-परिवार ल रोजे अपमानित करय। कभू-कभू तो मनखे अपन मान-सम्मान, इज्जत-मरजाद के संग जान-माल ल घलो गवाँवय। निसैनी कस खड़े जाति व्यवस्था म ऊपर अउ तरी ल छोड़के बाकी के जाति बर ऊपर के जाति हर बड़े अउ नीचे के जाति हर छोटे होवय। भेदभाव के भरम अउ दंभ म जीयत जाति, एक डहर अपन ले ऊपर वाले जाति कर अपमानित होवय त दूसर डहर अपन ले नीचे पायदान वाले जाति ल अपमानित करय। जाति-भेद के नाँव म गाँव-गाँव खँड़ाय लग गे। झगरा-लड़ाई के बँवर्रा ह गाँव-बस्ती ल उजारे लग गे। माटी के चूल्हा घर-घर हे जिनगी भर सुख-दुख छँइहा-घाम लगेच रहना हे एक जघा जुरमिल के रहिबो त भार ह नइ लगय कहिके गाँव बसा के बसे मनखे मन एक-दूसर ले दूरिहाय लग गें। फूट अउ बिखराव के पोषक भेदभाव के आचरण ह जिनगी अउ जरूरत के हर क्षेत्र म केवल घाटा के ही सौदा साबित होइस, कखरो फुरमान नइ दिखिस। आपसी संघर्ष अउ असहमति के बाढ़े ले सबल समृद्ध देश ह निबल अउ गरीब असन होगे। उन्नति विकास के गति ह दँउड़े के जघा रेंगे लग गे, रेंगे का घिसले लग गे। व्यक्ति विकास तो होइस पर हर देश ल समष्ठि विकास चाही रहिथे, जेन ह नइ हो पाइस। चिंता के चित्र अइसे होगे के बरकस मन खावँय अउ हिनहर मन टुकुर-टुकुर देखँय।


अमानवीय आचरण के काँटा-तार ह अदमी के घर-दुवार, अंगना-बारी, खेत-खार, मेंड़-पार, इचार-बिचार ल कटकटा के घेर लिही त सुमता सलाह समन्वय अउ सहकारिता के उन्नत सोंच धरे अवसर सन वोकर भेंट-मिलाप कइसे हो पाही? माथा म अज्ञानता के अँधियार अउ आँखी म छूत-अछूत के अंधरौटी रइही त मनखे ह मनखेपन के मंजिल ल नइ पा सकय। भेद-भाव के कारण एकता सुमता समता समरसता सद्भावना सहयोग अउ भाईचारा जइसन समाजसेतु भाव-शब्द मन लड़भड़ाय लग गें। पीड़ित मन बर उज्जर भविष्य के सपना ह जइसे सपने रहिगे। घर परिवार, जाति-समाज के मानस म कोर-कपट, किंचा अउ कुमता जइसन करुहा भाव के घर होय लग गे, गोरसी के आगी कस तरीत्तरी सुलगत गुंगवावत अनदेखी-जलन के आगी ह रुमरुम-रुमरुम बरे लग गे। परिणाम ये होइस के एके ठन गाँव के रहवासी मनके अलग-अलग कुआँ, अलग-अलग तरिया अउ अलग-अलग मरघटिया बनगे। नानचन गाँव ह पारा-पारा म बँटागे। फूट के फायदा उठावत मुठा भर अंग्रेज मन हमर अतेक बड़ देश ल अपन मुठ्ठी म कर डारिन अउ हम आँखी म आँसू धरे बोकबाय देखत रहि गेन।


अंतस के अँधियार ल सुरुज ह नइ छाँटे सकय, वोला छाँटे बर संत अउ सतगुरु के अँवतरण होथे। गुरु के बारे ज्ञान के दीया के अँजोर ह बगरथे तब जाके अंतस के अँधियारी ह छँटथे। भेदभाव के कारण उपजे पीरा देवइया स्थिति-परिस्थिति ल देख सुन अउ गुन के गुरु घासीदास बाबा ल घोर पीड़ा अउ दुख होइस, प्रबुद्ध कहाने वाला मनखे से वोला ये उम्मीद नइ रिहिस, वोकर ज्ञान अउ ध्यान अब ये विकृत स्थित-परिस्थिति के सुधार म लगे लग गे। भेदभाव ह मुँह ल कइसे टारय, कई-कईठन कुप्रथा ल मानत मनखे के मइलाय मन कइसे उजरावय तेखर गुनान अउ जुगत म लगे लग गे। गुरु घासीदास बाबा के प्रयास ह रंग लाइस, वोकर ज्ञान के आवा म पक के निकले दीया मन जगमग-जगमग अँजोर करे लग गें। भेदभाव के अँधियार ह छँटे लग गे समता अउ समरसता के उजियार बगरे लग गे। गुरु घासीदास बाबा के योग तप ध्यान ज्ञान-विज्ञान शोध-साधना के केन्द्र छातापहाड़ अउ शहीद वीर नारायण सिंह के धरा धाम सोनाखान के बीच बहत जोंकनदी के कंचफरी पानी ह वो परछइहाँ बनगे जेमा सुख-सुराज के सुखदेवा चित्र ल बेरा ह देखे लगगे। दिसम्बर के पावन महिना मा वो महान सतनाम आंदोलन छिड़गे, जिहाँ हजारों हजार लोग मन सतगुरु घासीदास बाबा के सुर म सुर मिलावत एक सुर म कहे लग गें- देख जी आँखी सुन जी कान, मनखे-मनखे एक समान।


▪️महंत सुखदेव सिंह ‘अहिलेश्वर’

   गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़