Saturday, 12 July 2025

पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी

 छत्तीसगढ़ के विभूति स्व. पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी िवप्र के जन्म 6 जुलाई 1908 के दिन पं. नान्हूराम तिवारी अउ सिरीमती देवकी तिवारी के घर म होए रहिस। ओहर हिन्दी छत्तीसगढ़ी अउ बिरज भासा म लिखत रहिन। ओकर सिक्छा म्युनिसपल हाईस्कूल (अब के लाल बहादुर शास्त्री उच्चतर माध्यमिक शाला) बिलासपुर म होए रहिस। विप्र जी जब चउथी अंगरेजी मं पहुंचिन तब ओकर किलास के सिक्छक सरयू प्रसाद त्रिपाठी रहिन। सन 1935 म सरयू प्रसाद त्रिपाठी अउ विप्र जी बिलासपुर म भारतेन्दु साहित्य समिति के गठन करे रहिन। भारतेन्दु साहित्य समिति के अधिवेसन म डा. रामकुमार वर्मा, डा. बलदेव प्रसाद मिश्रा, डा. हरिवंश राय बच्चन जैसन नामी साहित्यकार मन पधारे रहिन। सिक्छा के बाद ओहर इंपीरियल बैंक आफ इंडिया रायपुर म नौकरी करलिन। उहां ओकर मन नइ लागिस। आगू ओहर बिलासपुर जिला सहकारी केंद्रीय बैंक बिलासपुर म नौकरी करे लगिन। अपन जोग्यता के चलत ओहर प्रबंधक बन गइन। ओकर पुस्तक कुछुकांही, राम अउ केवट संग्रह, सिव स्तुति, गांधी गीत, गोस्वामी तुलसी दास जीवनी पराकासित होए हवे। विप्र जी के एक ठन रचना ल देखा।


धन धन रे मोर किसान,


धन धन रे मोर किसान।


मय तो ताेला जानेंव तय अस


भुइंया के भगवान।


धमनी के हाट ओकर सिरिंगार


रस के कविता हवे।


कविता के कुछ पंकति ला पढ़ा


तोला देखे रहेंव गा


तोला देखे रहेंव गा।


धमनी के हाट म बोइर तरी।


लकर-लकर आये जोगी


आंखी ला मटकाये।


कइसे जादू करके


मोला सुक्खा म रिझाये।


बिलासपुर म साहित्यिक मनखे मन के ओहर परेरना के सरोत रहिन। स्व. लखन लाल गुप्ता स्व. बाबू लाल सीरिया, स्व. गेंदराम सागर जैसन कवि मन के ओहर साहित्यिक गुरु रहिस। बिलासपुर जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक ले रिटायर्ड होवे के बाद म विप्र जी स्नातक महाविद्यालय (अब के डीपी विप्र महाविद्यालय) म काम करत रहिन। आगू विप्र जी उहां प्रसासनिक समिति के अध्यक्छ चुने गइन। संझा के बेरा म ओहर घांेघा बाबा मंदिर के परांगन म बैठत रहिन। उहां कवि मन के मंडली जमत रहिस। महूं ओ मंडली म सामिल होवत रहेंव। कुछ बेरा ल बिमार रहे के बाद म 2 जनवरी 1982 के दिन ओहर संसार ले विदा हो गइन। विप्र जी मोर बर सयान मनखे रहिन। कई बार ओहर मोर हिम्मत ल बढ़ाये रहिन। छत्तीसगढ़ के महाकवि के रुप म ओहर हमेसा सुरता करे जाही।


सुरता - दैनिक भास्कर

होवत हत्या

 होवत हत्या

आजकल छत्तीसगढ़ म बहुत हत्या होवत हावय। कारण खोजे बर जाबे त अनेक कारण मिलथे। आज मनखे अतेक तामसी होगे हावय के बात बात म चाकू निकाल लेथे। ये चाकू आज कहाँ ले आवत हे? हर युवा या आम मनखे बात बात म चाकू निकालत हावय। दोस्त, पत्नी, पति या राहगीर ल गोदत हावय। बहुत पहिली सन सत्तर के दशक म फिल्म मन म चाकूबाजी देखावय। 


खलनायक मन बटन दबा के चाकू लहरावंय। ओ बेरा म जब बहुत चाकूबाजी होइस त पुलिस मन पकड़ना शुरु करिन। बहुत चाकू बरामद करे गीस। ये दौर धीरे धीरे खतम होगे। रिवाल्वर आगे। बात बात म गोली चले ले लगगे। धार दार चाकू, हंसिया, कुल्हाड़ी, हथौड़ा तक खून करे म या फेर हमला करे बर काम म लावत हावंय। 


एक दौर अउ रहिस हे जब घर झोपड़ी जला देंवय। मनखे के ऊपर मिट्टीतेल, पेट्रोल छिड़क के जला देवंय। तंदूर कांड घलो होय रहिस हे। ये सब म बदलाव आवत जात हे। अभी इंदौर ले मेघालय लेजा के पति के हत्या चाकू ले करे गीस। आज छत्तीसगढ़ के राजधानी ये चाकू के कारण खून ले नहावत हे । अचानक आज के युवा चाकू ले के कइसे घूमे ले लगगे। ये चाकू बात बात म निकलत हे। शराब के नशा न, पार्टी म बहस होये ले या फेर रास्ता चलत धक्का लगे म खून होवत हे। पुलिस ल अब चाकू बर भी लायसेंस बनाना जरुरी हावय। ये बात जरुर हंसी ठिठोली कस लागत होही। घर के रसोई ले निकल के चाकू ह युवा मन के जेब म आवत हे। आखिर कोन से असुरक्षा के भावना हे जेखर कारण चाकू ले के चले पर परत हे। आज के फिल्म म तो ये सब नइये। ये कोन से मानसिक असुक्षा के कारण आये जेन हर तरफ बार बार एके समाचार सुने बर मिलथे "चाकू ले गोद डरिस" 


सत्तर के दशक म गुंडागर्दी चलय, युवा मन के गैंग होवय। ये गैंग वार चलय। आज तो कोई गैंग नइये फेर चाकू के जरुरत काबर? आज येला संस्कार के कमी या नैतिकता के कमी कहि सकथन। ये आही कहाँ ले? सीखही कहाँ ले? ये सब परिवार ले आसपास ले अउ शिक्षा ले आथे। आज माँ मोबाइल म लगे हावय। बाप ह अपन काम म या फेर शराब म डुबे हावय। घर म लइका स्कूल ले अइस त ओला भी मोबाइल पकड़ा के बइठा दिस। स्कूली शिक्षा ले नैतिकता गायब हे। गणित बनाओ, हिंदी लिखो,पढ़ो, अँग्रेजी पढ़ो होगे स्कूल के पढ़ाई। एक दिन चुन के शनिवार के कुछ काम सिखाना चाही, सहयोग के भावना विकसित करना चाही।  स्वस्थ मानसिकता के संग आपस म खेलना भी जरुरी हावय। तभे दोस्ती के भावना आपस म एक दूसर ले कइसे व्यवहार करना सिखही। ये चाकू बर कुछ प्रतिबंध होना ही चाही।

सुधा वर्मा, 6/7/2025

बदलाव

 (लघुकथा)



बदलाव

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भूखन लाल के एके झन बेटा धर्मेंद्र कुमार जेकर शादी बिहाव होगे हे अउ दू झन बाल बच्चा तको हे। वोकर बस्तर मा पटवारी के नौकरी हे, दस साल होगे हे। वो हा उन्हें परिवार सहित किराया के घर मा रहिथे।गाँव मा तीन एकड़ खेती हे तेकर देखभाल अधिया रेगहा देके दाई ददा मन करथें।

   धर्मेंद्र हा पहिली महिना- दू महिना मा बाल- बच्चा मन सहित घर आते- जात राहय।धीरे- धीरे सिरिफ तिहार बार मा आये-जाये ला धरलिच।अब तो उहू बंद होगे हे। वो हा पाछू दू बरस ले घर नइ आये हे।

काली हरेली तिहार ये।हो सकथे धर्मेंद्र हा बाल बच्चा मन संग आही सोच के भूखन हा अपन परानी संग रद्दा जोहत हे।

  ठऊँका संझौती के बेरा धर्मेंद्र हा उदुक ले पहुँच गे।वोला देख के दूनों के खुशी के ठिकाना नइ रहिच। थोकुन पाछू सियनहिन दाई हा पूछिच--

"नाती- नतनिन अउ बहू ला नइ लाये अच का बेटा ?"

"कहाँ लाबे दाई।आयेच- जाये मा छै सात दिन लग जथे।लइका मन के पढ़ाई लिखाई के नुकसान होथे।"

धर्मेंद्र के उत्तर ला सुनके भूखन के चेहरा मा उदासी छागे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

छत्तीसगढ़ी अनेकार्थी :एकअध्ययन -मुरारी लाल साव

 छत्तीसगढ़ी अनेकार्थी :एकअध्ययन

-मुरारी लाल साव

    " मतलब "

वाक्यों म प्रयोग 

1 तोर मोर से बात करे के का मतलब हे?( बहस)

2 तोर मतलब ला जान डरेन l

    (स्वार्थ)

3 का मतलब से पूछत हस?

     (कारण )

4  उधारी दे हस ओकर मतलब 

      हाँ म हाँ कहत रहँव l

        ( गुलामी)

5 तोर कहे के मतलब का हे?

      (आशय, अभिप्राय)

6 तोला चिट्ठी लिखेंव का मतलब जानेस?

    ( भाव, भावना )

7 तोर मोर से कोई मतलब नइ हे l(लेन देन, बोल चाल, आना जाना बंद)

8 बिन मतलब के रिश्ता नइ बनय l (प्रेम व्यवहार,)

9 मतलब निकाले बर जुड़े हव l(पद कुर्सी पाने, फायदा)

10 मतलब के मतलब निकाल डरेव l(आन तान, दूसरा का दूसरा अर्थ )

11 बिन मतलब के बात झन कर l (फालतू, व्यर्थ )

12 मतलब के बेरा म कहाँ रहेंव ( काम के समय,जरुरत)

13  मतलब होही तभे मोबाइल करथे l (आवश्यक,)

14  मतलब रही तभे आही तहाँ नइ आवय l (अपने लिए,

 स्वयं की जरूरत पड़ने पर)

15 मतलब के बात कर l

   (मकसद, काम की )

16 मंत्री जी से मिले ले का मतलब होइस? 

( वादा नहीं किया, ध्यान नहीं दिया,टरका दिया...)

17 तोर सेती मतलब पूरा नइ होइस l ( चाहत, इच्छा l)

18 बिन मतलब के डिलीट झन कर l (बिन पढ़े समझे, अकारण )   

19 मतलब के हे रिश्ते नाते

मतलब के हे यार लोंगो

मतलब के संसार..l

  (स्वार्थी, प्रेम नहीं )


             सरलग... I

गुरु पूर्णिमा

 गुरु पूर्णिमा 

        असाढ़ पुन्नी ल गुरु पूर्णिमा कहिथें । महाभारत लिखइया कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास के जनम आजे के दिन होए रहिस उन सत्यवती अउ पराशर मुनि के बेटा रहिन । आज के दिन गुरु दत्तात्रेय ल भी सुरता करथन काबर के उन 24 ठन गुरु बनाए रहिन जेमा मनसे , जीव जंतु , प्रकृति के उपादान सहित खुद के देंह घलाय शामिल रहिस । सबो के वर्णन करबो त लेख लंबा हो जाही त सार बात ऊपर ध्यान दिहिन । हम अपन जीवन मं जेकर से भी जौन कुछु सीखथन ओहर गुरु होइस न ? एतरह देखबो त गुरु के कोनो जात , धर्म , उमर नइ होवय दूसर महत्वपूर्ण बात के हमर देंह से ही हमला बहुत बड़े ज्ञान मिलथे के शरीर नाशवान आय मुख्य होथे ये शरीर द्वारा करे गए कर्म मतलब तो इही होइस के कर्म प्रधान जीवन  होथे । त कइसन कर्म करना चाही ? उत्तर तो बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी मन बहुत प्रकार से देहे हें फेर कर्मकांड के सबले बढ़िया उपदेश मिलथे श्रीमद्भगवतगीता ले ..." कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन "  माने कर्म करव फल के बारे मं झन सोचव इही ल निष्काम कर्मभाव कहे गए हे । सुरता आगे के एहू हर तो वेद व्यास के कहे बानी आय । 

      थोरिक दिन पहिली राम नाथ साहू जी इही पटल मं गीतांजलि के कुछ अंश के छत्तीसगढ़ी अनुवाद प्रस्तुत करे रहिन ...हां आज रवीन्द्र नाथ ठाकुर घलाय ल सुरता कर लिन उन गीतांजलि मं मानवता के गुन गाए हें तभे तो उनला गुरुदेव कहिथें । मनसे के कर्म घर परिवार , समाज , देश , विश्व मं सुख सनात , शांति भाईचारा लानथे त मनसे एक दूसर से सीखत चलथे । 

     अद्भुत गुरु शिष्य रहिन गोरख नाथ अउ मत्स्येन्द्र नाथ काबर के गुरु जब अज्ञान के अंधियार मं रस्ता भुला गिस त शिष्य ओकर आँखी उघारे बर ज्ञान के अंजोर बगराये बर पहुंच गिस ...अद्भुत परम्परा देखे बर मिलिस न ? सार तो इही निकलिस के गुरु होए के अहंकार बिरथा ए समय सुयोग मिलथे त शिष्य घलाय गुरु बन जाथे । 

    शिष्य खोजथे गुरु ल फेर एकझन गुरु रहिन रामकृष्ण परमहंस जेन शिष्य खोजत रहिन त मिलिन  नरेंद्र ..न देवी देवता मानय न गुरु गोविंद , रिसहा बौछहा , रामकृष्ण परमहंस के जब्बर आलोचक फेर गुरु तो गुरु होथे न ? नरेंद्र के विवेक ल जगाईन परमहंस जी अउ हमन ल मिलिन स्वामी विवेकानन्द । इतिहास गुरु शिष्य परम्परा के उदाहरण से भरे हे । ये  कुछेक के सुरता एकर बर करे गए हे के कान फूंका के गुरु बनाना जरूरी नइए , जरूरी नइए जात , धर्म , भाषा , उम्र जौन जरूरी हे तेहर आय ज्ञान के प्राप्ति । 

    आज मैं उन सब गुरु मन ल प्रणाम करत हंव जिनमन से कुछु काहीं सीखत आये हंव ..चीटिक थिरा के गुनें त लिखत हंव अवइया दिन मं माने जियत भर जिनमन से जौन भी सीखिहंव उन सबो झन ल प्रणाम । 

    कबीर दास ल भुलाए कइसे सकत हंव भाई ....

" गुरु गोविंद दोनों खड़े , काके लागूं पांय , 

 बलिहारी गुरु आपनो , जिन गोविंद दियो बताय । " 

     सरला शर्मा

साँप* (लघुकथा) -डाॅ विनोद कुमार वर्मा

 .                     *साँप* (लघुकथा)


                           -डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


            रामलाल के घर के आघू गाँव वाला मन के अच्छा-खासा भीड़ इकट्ठा हो गे रिहिस जेमन अब छँटे लगिन हें। रात के आठ बजने वाला रिहिस। रामलाल के दू कमरा के कच्चा घर रिहिस। जेकर दरवाजा बाहर ले बंद रिहिस। ओकर दस साल के बेटा घनश्याम, अपन दाई लखेसरी के संग घर के बाहिरेच्च मं खड़े रिहिस। दाई के कांधा मं सिर टिकाये दू साल के नोनी सोवत रिहिस। ..... जतकी मुँह ओतकी बात! 

      ' कइसे बेटा साँप ला बने देखे हस न? '

      ' हाँ, महराज! फन काढ़े रिहिस। ओकर माथा मं खड़ाऊ के चिनहा रिहिस। ओही मेर मोर बहिनी सोवत रिहिस। बहिन ला लटपट उठा के मँय उहाँ ले धरा-रपटा बाहिर कोती भागेंव! '

     ' चिन्ता मत कर। वोहा नाग देवता हे। मैं सर्पमित्र अउ तोर ददा ला फोन कर दिए हँव। ओमन आतेच्च होहीं। '- पंडित जी के जवाब ले लड़का संतुष्ट नि होइस। ओहा सवाल करिस- ' सर्पमित्र कब तक आही? दू घंटा तो हो गे हवय! '

      ' आतेच्च  होही बेटा। '

        ठीक ओही बेरा रामलाल आ गे।  रायगढ़ से लउटत बेरा बस ले उतरिस त बारिस शुरू हो गे जेकर कारण वोहा भीगत घर पहुँचिस। ओला मोबाईल मं पूरा जानकारी मिल गे रिहिस। 

        बारिश के कारण बाकी बचे लोगन बगल के घर के टिन सेड के नीचे पंडित जी ला घेर के खड़े रिहिन अउ पंडित जी के धरम-करम के बात मं सब मोहाय कस रिहिन। ओही मेर रामलाल के घरवाली अउ दुनों लइका घलो रिहिन। रामलाल के आतेच्च ले पंडित जी कहिन- ' तँय बहुत भाग्यशाली हस रामलाल! तोर घर मं नाग देवता प्रकट होय हे। नाग देवता के माथा मं दिखत चिनहा भगवान विष्णु के पैर के खड़ाऊ के समान होथे। एकर सनातन धरम मं बड़ महात्तम हे। ये चिनहा गुरुभक्ति और पवित्रता के प्रतीक हे। एहा नाग देवता के दिव्य स्वरूप अउ ओकर ले जुड़े आध्यात्मिक महात्तम ला घलो बताथे! .....'

         ' पंडित जी, आप मोर घर के भीतरी पेल के नाग देवता ला पूजा-पाठ करके बाहर काबर नि  निकालत हॅव! '

       ' पागल हो गे हस का? डस लिही त? ......'

       ' अउ मोर लइका मन ला डस लेतिस त? ' 

       पंडित जी मुक्का हो गे। एकर बाद लकठा मं परे एक ठिन सात फीट लम्बा लकड़ी के डंडा ला लेके रामलाल अपन घर मं घुस गे। थोरकुन देर मं मरहा साँप के पूँछी ला पकड़के ओहा टिन सेड मं आ गे। ओहा लगभग छै फीट लम्बा नाग साँप ही रिहिस। लोगन मन आश्चर्य ले कभू मरे हुए नाग साँप ला देखँय त कभू रामलाल ला! 

        अचानक पंडित जी के मुँहू ले ये शब्द निकलिस- ' रामलाल, तँय नाग साँप ला मार डारेव! ..... ये तो बहुत बड़े पाप हे!! ' 

       रामलाल कहिस- ' हाँ मार डारेंव पंडित जी! .... आपके घर मं तीन घंटा ले एही साँप घुसे रहितिस त आप एही कांड नि करता का ? ..... हिन्दी मं आपमन एक ठिन मुहावरा जरूर सुने होइहा -आस्तीन का साँप! '

       ' हाँ सुने हँव। '

       ' आपके धरम-करम के बात सब ठीक हे। मोला बस एकेच्च  बात के जवाब दे देवा कि ये मुहावरा- आस्तीन का बिच्छू - काबर नि होइस? '

      पंडित जी आवाक् होके रामलाल के मुँह ताके लगिन!

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जाबे कहाँ छोड़ के? "

 लघु कथा - 

"   जाबे कहाँ छोड़ के? "

        -मुरारी लाल साव


      "  बिहाव होये दू साल होये हे l दू साल ले पति पत्नी अलग अलग रहिस lसुरेश धुरिया म नौकरी करत हे l मौका पाके बीच बीच म आवत रहिस ससुरार म रहतीच l अपन घर म अपन माँ बाप ल कभू कभार देखे बर चल दय l सुनीता अपन ससुरार म रहना नइ  चाहत रहिस l ओकर बाई सुनीता ह बहुत घमंडी अउ अकड़हीन बानी के हे तेखर सेती  l " 

काकर गोठ ला कहत हस बिसाहीन?

बिसाहीन कहिस -ओकर वो, लटियारीन के बेटी दमाद 

के वो l 

परेमीन फ़ेर पूछिस -"का होगे तेमा?

 महिला थाना म जात देखेंव हँव कोरा म नानूक लइका ल धरे अकेला रहिस ओकर बहू ओकर दमाद नइ रहिस का

सँग म l  

  " उही तो बात होवत हेl "

महिला थाना म सुनीता पहुंचीस अपन नान्हे लइका के ला धरे अँचरा म लुकाये l

ओकर ले पहिली सुनीता के पति सुरेश अभिच आके बइठे रहिस l

   एक दूसर ला देखे बर देखिस दूनो फ़ेर अपन बेटा नानूक ला सुरेश नइ देख पाइस l

कौसलिंग के एक मेंबर पूछिस

अच्छा सुनीता , ये तुम्हारे कौन हैं? ओला देखत सुनीता -

"मोर आदमी l "

"लेकिन अभी नोटिस पाकर आई हो ना l "

"हाँ " 

"तुम्हारे आदमी नें तलाक लेने अर्जी लगाया हैं l"

सुरेश ले पूछिस-"क्यों सही है ना? सुरेश जी मेडम l

"आपस मे बात करोगे यहीं l "

दूनो नहीं कहिस l 

ऐसे मे क्या निर्णय लेंगे l सुनीता तुम्हारे बारे मे आरोप है उसके बारे मे l

"ओहर लगाए हे ओकर अधिकार हे l चिक चिक नइ करना हे l"

तो तुम भी तैयार हो? "

सुनीता चुप  रहिस l 

चलो आगे की कार्यवाही बढ़ाओ l फाइल ला बंद करदीस l अभी जाओ l

ऑफिस के बाहिर सुनीता अपन बेटा ला दूधपियाये ला धर लीस l सुरेश अपन मन के हार अउ जीत के फैसला म फंस गे रहिस l सही बात सुरेश तलाक लेये बर नहीं सुनीता के घमंड ला खतम करे बर अर्जी लगाके देखना चाहत रहिस l

सुनीता अपन माइके ला छोड़ना नइ चाहत रहीस l पति पत्नि के रिश्ता अउ जिम्मेदारी जरूरत ला समझना चाहत रहिस l आखिर म  सुरेश अपन नान्हे बेटा के मुँह ला देख के हार जथे l 

 "एखर बाप तो में  हरंव 

बिन बाप के कइसे रेही l 

सुनीता ला पानीपेशाब जाना रहीस l कइथे -" थोकिन बाबू धरव तो l " अनबोलना टूटीस l चुप सुरेश आके अपन हाथ म लेथे बच्छर भर बाद l मति घलो बदल गे l

नानूक घलो ताना मारत मुस्कावत " जाबे कहाँ छोड़ के l"

सुरेश के मन बदल गे  उहाँ ले निकलगे l

 हाथ मुँह धोके सुनीता आथे 

सुरेश नइ दिखीस l पूछिस पाछिस त-कोनो बताइस एक झन अपन हाथ म धरे लइका ला इही डहर जावत देखेन l 

सुनीता उही कोती चिल्लावत भागत जावत रहिस -"जाबे कहाँ मोला छोडके l"

जाबे कहाँ छोडके?


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