Saturday, 24 January 2026

आजादी के लड़ाई म राजनांदगांव जिले के योगदान

 आजादी के लड़ाई म राजनांदगांव जिले के योगदान


जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस म गरम दल के नेता मन के धाक जमे लगिस तब भारतीय जनता म अंग्रेजी सासन के विरुद्ध भीतरे भीतर आगी सुलगत


गिस। वो समय लाल-बाल-पाल के रूप म लाला लाजपतराय, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक अउ विपिनचंद्र पाल के अब्बड़ सोर रिहिस। 1905 म बंगाल विभाजन ले ये चिंगारी ह आगी बनगे अउ जनता मन अंग्रेज़ी सासन बर बागी बनगे। हमर देश के नेता मन जनता ल समझाय लगिस कि अंग्रेजी सासन फूट डालय अउ राज करव के नीति ल अपना के शुरू ले सासन करत आवत है ।बंगाल के विभाजन येकर एक बड़का उदाहरण हे। देशभर में अंग्रेजी सासन के विरुद्ध वातावरण बनिस। अइसन बेरा में 1905 म राजनांदगांव म ठाकुर साहब के अगवाई में छात्र मन के पहली हड़ताल होइस। ठाकुर साहब अपन सहयोगी छविराम चौबे अउ गज्जू लाल शर्मा के संग मिलके राजनांदगांव म राष्ट्रीय आंदोलन ल ठाहिल बनाइस। 


अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ के कांग्रेस सदस्य मन घलो गरम दल के नेता मन ले प्रभावित होके उंकर संग सामिल होगे। बछर 1907 म सूरत म आयोजित कांग्रेस अधिवेशन म कांग्रेस दू भाग म बंट गे। अब उदारवादी नेता मन के जगह उग्रवादी दल के नेतामन के दौर चालू होगे अउ अंग्रेजी सासन के सोसन के विरुद्ध जनता संगठित होय लगिस। अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले म घलो आजादी खातिर जन जागृति फैलाय बर सुघ्घर कारज होइस। 

छत्तीसगढ़ म स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के अर्जुन ठाकुर प्यारेलाल लाल सिंह बछर 1909 में राजनांदगांव म सरस्वती पुस्तकालय के स्थापना करिन। आगू चलके सरस्वती पुस्तकालय ह राजनीतिक गतिविधि के ठउर बनगे। अंग्रेजी सासन ल पता चलिस त सरस्वती पुस्तकालय ल जब्त कर लिस।


बछर 1915 म महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका ले भारत लहुटिस अउ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस म सामिल होगे। गांधी जी ह देश के दसा ल जाने खातिर दौरा करिन। अंग्रेज मन के सोसन ल जानके बोहा अहिंसक ढंग ले लड़ाई के योजना बना के जन जागृति के सुघ्घर र कारज करिन। धीरे से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गांधी जी के धाक जमगे जेहा आजादी तक जारी रिहिस। गांधी जी के मानना रिहिस कि अंग्रेजी सासन ले अहिंसा अउ सत्याग्रह ल अपनाके लड़ना ठीक रहि। येकर प्रयोग गांधी जी ह दक्षिण अफ्रीका में मजदूर मन के हक खातिर लड़ाई म कर चुके रिहिन। 

भारत म खेड़ा सत्याग्रह के माध्यम से गांधी जी अहिंसक आंदोलन के सुरुआत करिन। सितंबर 1920 में कलकत्ता म लाला लाजपत राय के अध्यक्षता म

 कांग्रेस के विशेष अधिवेशन आयोजित होइस। येमा गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाय के स्वीकृति दे गिस फेर कांग्रेस के अधिवेशन नागपुर में 26 दिसंबर 1920 म होइस जेकर अध्यक्षता विजय राघवाचार्य करिन। ये अधिवेशन म हमर छत्तीसगढ़ ले आने नेता मन संग ठाकुर प्यारेलाल सिंह ह सामिल होइन। रौलेट एक्ट जइसे करिया कानून अउ जलियांवाला बाग हत्याकांड के कारन देश भर म अंग्रेज सरकार के विरुद्ध चिंगारी सुलगत रिहिस हे। अइसन समय म गांधी जी ह आह्वान कर चुके रिहिन कि अंग्रेज


सरकार के गुलामी ले छुटकारा पाय खातिर स्थानीय समस्या ल आधार बना के असहयोग आंदोलन चालू करय।


ठाकुर प्यारेलाल सिंह ह असहयोग आंदोलन के समय वकालत छोड़‌के राजनांदगांव म राष्ट्रीय विद्यालय के स्थापना करिन । हजार भर के संख्या म छरखा बनवा के जनता ल बांटिस। चरखा के महत्तम समझाइस अउ खादी के प्रचार करिन। ठाकुर साहब खादी पहने लागिस। राजनांदगांव ले हाथ म लिखे पत्रिका घलो निकालिन। जउन ह जन चेतना बर अब्बड़ सहायक होइस।


    गांधी जी के आगमन के प्रभाव 


गांधी जी जब पहिली बार 20 दिसंबर 1920 म छत्तीसगढ़ आइस त इहां के नेतामन के संगे संग जनता मन में अब्बड़ उछाह छागे। गांधी जी कंडेल नहर सत्याग्रह के सिलसिले म आय रिहिन। गांधी जी के छत्तीसगढ़ आय ले अंग्रेजी सासन में हड़कंप मचगे। गांधी जी के कंडेल जाय से पहिलीच अंग्रेजी सासन ह आंदोलनरत किसान अउ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन के बात ल मान लिस।


बछर 1923 में जब झंडा सत्याग्रह चालू होइस त ठाकुर साहब ल प्रांतीय समिति द्वारा दुर्ग जिला ले सत्याग्रही भेजे के काम सौंपे गिस। नागपुर म सत्याग्रह आंदोलन चालू होइस। झटकुन नागपुर सत्याग्रह के प्रमुख ठउर बनगे। 1924 में जब बीएनसी मिल के दुबारा हड़ताल चालू होइस तब ठाकुर प्यारेलाल सिंह ल जिला बदल कर दे गिस। राजनांदगांव ले निष्कासित करें के बाद सन 1925 म ठाकुर साहब रायपुर चले गे अउ अपन जिनगी के आखिरी तक ऊंहचे रहि के अपन राजनीतिक काम मन ल संचालन करत रिहिन। ठाकुर साहब के उदिम ले राजनंदगांव, छुईखदान, खैरागढ़ रियासत मन मा कांग्रेस संगठन के निर्माण होइस।


बछर 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन म पंडित जवाहरलाल नेहरू के अध्यक्षता म पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव पारित होइस। येकर बाद 26 जनवरी 1930 म स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाय गिस। गांधी जी देशवासी मन ले आह्वान कर चुके रिहिन कि स्थानीय समस्या ल लेके आंदोलन चालू करय। अइसन बेरा म राजनांदगांव छुई- खदान, मौहला, मानपुर, कौड़ीकसा, डोगरगढ़ डोगरगांव, सहित छुरिया क्षेत्र के बादराटोला, चिरचारीकला, घोघरे, बापूटोला (चिचोला) क्षेत्र ह आंदोलन के प्रमुख केंद्र बन में। राजनांदगांव म विद्रोही कवि कुंज बिहारी चौबे छात्र जीवन म अंग्रेज शासन के झंडा ल उतार के भारतीय झंडा फहरा दिस। येकर कारन वोला बेत ले अब्बड़ मारे गिस पर वोहा महात्मा गांधी के जय अउ भारत माता के जय कहत गिस।


1930 में गांधीजी ह नमक कानून तोड़ो आंदोलन चालू करिन अउ येकर असर राजनांदगांव जिला म देखे ल मिलिस। सन 1930 में राजनांदगांव में स्टेट कांग्रेस के स्थापना आर. एस. रूईकर के मार्गदर्शन म होइस। कांग्रेस के प्रथम बैठक्क मानिक भाई गोंदिया वाले के मकान में रखे गिस जेमा जिले के 162 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भन भाग लिस। फरवरी 1932 में देश-प्रदेश के संगे- संग राजनंदगांव, छुईखदान, छुरिया के बादराटोला बापूटोला (चिचोला), मानपुर, कौड़ीकसा, मोहला, डोंगरगांव, डोंगरगढ़ क्षेत्र म ब्रिटिश शासन अउ स्थानीय राजशाही के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन आवाज बुलंद करिन। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विश्राम दास बैरागी ला आजादी के लडाई म भाग ले खातिर सिद्ध दोष कैदी के रूप में 1932 में पहिली रायपुर केंद्रीय जेल म रखे गिस फेर वोला अमरावती जेल म स्थानांतरित कर दे गिस।


22 नंबर 1933 म महात्मा गांधी छत्तीसगढ़ म द्वितीय प्रवास के रूप म आइस। येकर सुरूआत दुर्ग ले होइस। हरिजन मन के उत्थान, तिलक फंड अउ स्वराज्य फंड खातिर आयोजित कार्यक्रम म दुर्ग के मोती तालाब मैदान में गांधी जी के सभा में लगभग 50,000 से अधिक लोगन मन सामिल होइस। गांधी जी के दौरा 22 नवंबर ले 28 नवंबर तक रिहिन है। 24 नवंबर 1933 म गांधी जी ह पं. सुंदर लाल शर्मा द्वारा संचालित सतनामी आश्रम के निरीक्षण करिन येकर बार सभा ल संबोधन करे के बेरा म शर्मा जी द्वारा करे गे हरिजन उद्धार के कारज बर गांधी जी ह उंकर अब्बड़ तारीफ करिन अउ ये काम खातिर शर्मा जी ल अपन गुरु कहिस। शर्मा जी ह गांधी जी ले आठ बछर पहिली हरिजनोंद्धार के कारज ल चालू कर दे रिहिन।

गांधी जी के ये दूसरा दौरा ह राजनांदगांव जिला के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन ल अब्बड़ प्रभावित करिन अउ गांधी जी के दर्शन लाभ पाय बर इहां के कतको स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन दुर्ग पहुंचिस। घोघरे, छुरिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विश्वेश्वर प्रसाद यादव जउन ह लालूटोला स्कूल में शिक्षक रिहिन वोहा अपन स्कूल ल बंद करके गांधी जी के दर्शन करें खातिर अपन चचेरा भाई विद्या प्रसाद यादव जी के संग गिस।


सन 1938 म हरिपुर कांग्रेस अधिवेशन म राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ह रियासती जनता मन ले आजादी के आंदोलन म भाग लेय के आह्वान करिन। ए बछर छुईखदान म जंगल सत्याग्रह चालू होगे।  समारू बरई,गोवर्धन लाल वर्मा, गुलाब दास वैष्णव, अमृतलाल महोबिया , दामोदर त्रिपाठी मन सत्याग्रह के अगुवाई करिन। ठाकुर प्यारेलाल सिंह ह अपन प्रमुख सहयोगी राम नारायण हर्षुल मिश्र ल कांग्रेस संगठन के मार्गदर्शन बर कवर्धा भेजिस। राजनांदगांव जंगल सत्याग्रह के अगवाई ठाकुर लोटन सिंह के हाथ में रिहिन।


छत्तीसगढ़ ह वन संपदा ले भरपूर हावय। येहा इहां के रहवासी मन के जिनगी गुजारे के प्रमुख साधन हरे। अंग्रेजी सासन के गलत वन नीति के कारन जंगल क्षेत्र के रहवासी मन ल नंगत तकलीफ उठाय ल पड़त रिहिस। अंग्रेज जंगल ल अपन संपत्ति समझय। रक्षित वन क्षेत्र म मवेशी मन ल घास चराय खातिर कांजी हाउस म डाल दय येकर ले पशुपालक मन ल अब्बड़ परेसान होवय। अइसने जब लोगन मन जंगल से लकड़ी अउ कांदी (घास) काट के लाय त अंग्रेज मन नाना प्रकार के अतियाचार करय अउ गिरफ्तार कर लेय।  येकर ले अंग्रेजी सासन के विरुद्ध जनता मन म अब्बड़ गुस्सा छमागे। येकर परिणाम जंगल सत्याग्रह के रूप में सामने आइस। हमर छत्तीसगढ़ म सिहावा नगरी डहर के जंगल सत्याग्रह ह देशभर म एक मिसाल बनगे।


जंगल सत्याग्रह अउ बादराटोला गोलीकांड


राजनांदगांव रियासत म बछर 1939 में जंगल सत्याग्रह चालू होइस। येकर सूचना भेज दे गिस। 21 जनवरी 1939 के दिन राजनांदगांव जिले के छुरिया विकासखण्ड के बादराटोला म आस-पास गांव के जनता मन जंगल सत्याग्रह खातिर इकट्ठा होय लगिस। हजारों के भीड़ बादराटोला म सकला गे। इहां जंगल सत्याग्रह के अगुवाई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बुध लाल साहू करत रिहिन। तहसीलदार सुखदेव देवांगन ह 50 सशस्त्र पुलिस बल के संग बादराटोला पहुंच के सबले पहिली जंगल सत्याग्रह के मुखिया बुध लाल साहू ल गिरफ्तार कर लिन। येकर ले बादराटोला म सकलाय लोगन मन ल अब्बड़ गुस्सा आगे अउ तहसीलदार ल भीड़ ह घेर लिस। बुधलाल साहू के चरवाहा रामाधीन गोंड ह तहसीलदार के सामने आके खड़े होगे अउ महात्मा गांधी के जय, भारत माता के जप, वंदे मातरम के नारा लगा के गिरफ्तारी के विरोध करिन। भीड़ के गुस्सा ल देखके तहसीलदार घबरागे अउ जनता ल तितर बितर करे खातिर पुलिस मन ल गोली चलाय के आदेश दे दिस। ये गोली काण्ड म रेवती दास ल गोली लगिस अउ घायल स्थिति म अस्पताल ले जाय गिस। रामाधीन गोंड के छाती म गोली लगिस अउ शहीद होगे। सिरिफ 27 बहर के उमर म रामाधीन अपन मातृभूमि के रक्षा खातिर सहीद होगे अउ इतिहास म अमर होगे। 1939 म


जंगल सत्याग्रह म सामिल होय खातिर विश्वेश्वर प्रसाद यादव, विद्या प्रसाद यादव, तुलसी प्रसाद मिश्रा अउ आने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन ल जेल म डाल दे गिस।


राजनांदगांव, खैरागढ़ - छुईखदान गंडई अउ मानपुर -मोहला -अंबागढ़ चौकी जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन म ठाकुर प्यारेलाल सिंह, लोटन सिंह ठाकुर, गोवर्धन लाल वर्मा, गुलाब दास वैषगव, अमृत लाल महोबिया, दामोदर प्रसाद त्रिपाठी, छवि राम चौबे, गज्जू, लाल शर्मा


रामाधीन गोंड, विश्राम दास बैरागी, बुध लाल साहू, रेवती दास, बहुर सिंह, विश्वेश्वर प्रसाद यादव, विद्या प्रसाद यादव, तुलसी प्रसाद मिश्रा, दामोदर दास टावरी, पी. वी. दास, देव प्रसाद आर्य, कुंज बिहारी चौबे, कन्हैया लाल अग्रवाल, दशरथ साहू, ईशना पवार, सतानंद साहू के संगे संग आने नांव सामिल हे। वनांचल मानपुर मोहला क्षेत्र म कतको स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रिहिन। अइसन भूले बिसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन उपर काम करे के जरूरत हे।


ओमप्रकाश साहू" अंकुर "सुरगी, राजनांदगांव।

आजादी के लड़ाई मा छत्तीसगढ़ के योगदान

 आजादी के लड़ाई मा छत्तीसगढ़ के योगदान


भारत हा पहिली सोन के चिरइया कहलाय। हमर देश मा बेपार करे खातिर पुर्तगाली, फ्रांसीसी,डच अउ अंग्रेज मन आइस। पहिली इंकर मन के बीच बेपार खातिर आपसी लड़ाई चलिस जेमा आगू चलके अंग्रेज मन हमर देश मा राज करे मा सफल होइस । अंग्रेज मन फूट डालव अउ राज करव के संगे संग रियासत मन बर हड़प नीति अपनाके  करीब दू सौ बछर ले जादा समय तक सरलग राज करिस । अंग्रेज मन के अत्याचार अउ कइ ठक उंकर गलत नीति के कारन इहां के राजा -महाराजा, जमींदार अउ आम मनखे मन मा भीतरे भीतर आगी सुलगत गिस।येकर पहिली परिणाम सन 1857 मा अंग्रेज मन ले राजा महाराजा मन के लड़ाई के रुप मा आगू आइस ।


अंग्रेज मन ले हमर भारत देस ल अजाद कराय के पुन्य काम म हमर छत्तीसगढ के सुघ्घर योगदान हे. हमर छत्तीसगढ़ के मनखे मन अब्बड़ सिधवा अउ शांतप्रिय रेहे हे। तइहा जमाना ले इहां के कृषि अउ ऋषि संस्कृति सुघ्घर सोर बगरे हावय।पर जब कोनो ह जबरन इहां के रहवासी मन के सोसन अउ अतियाचार करे ला लगथे ता अपन हक खातिर जुर मिल के लड़े मा कभू पाछु नइ रिहिन हे। अइसने छत्तीसगढ़ के  रहवासी मन अजादी के लड़ाई म बढ़ -चढ़ के भाग लिन. अंग्रेजी सासन ले लड़ाई करके सबले पहिली सहीद होइन बस्तर क्षेत्र के परलकोट के जमींदार गेंद सिंह हा. 1825 म अंग्रेज मन वोला उंकरे महल के आगू फांसी म लटका दिस. सन 1857 मा भारत के राजा- महाराजा मन अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित होके लड़ाई लड़िन जेला प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्रामकहे जाथे। जब पूरा भारत वर्ष मा अंग्रेज मन बर चिंगारी सुलगत रिहिस ता छत्तीसगढ़ हा कइसे पाछु रहितिस। जब हमर देश मा मंगल पांडे,तात्या टोपे,नाना शाहब पेशवा, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बहादुर शाह जफर,राजा कुंवर सिंह अउ आने राजा मन अंग्रेजी शासन ले जोम देके लड़िन तब येकर असर छत्तीसगढ़ के सोनाखान जमींदारी मा देखे ला मिलिस। सन् 1857 के पहिली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम म सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह के अंग्रेज मन ले छापामार लड़ाई ले कोनो अनजान नइ हे.जब सोनाखान क्षेत्र मा अकाल पड़िस ता सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह हा करौद गांव,कसडोल के बेपारी माखन लाल बनिया के गोदाम ले अनाज लूट के जनता मा बंटवा दिस । माखन बनिया हा येकर शिकायत रायपुर के डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स सी. इलियट ले करिन।24 अक्टूबर 1856 मा अंग्रेज अधिकारी कैप्टन स्मिथ हा  वीर नारायण सिंह ला संबलपुर ले गिरफ्तार कर रायपुर जेल मा बंद कर दिस । 10 दिसंबर 1857 म  वीर नारायण सिंह ल  रायपुर के जयस्तंभ चौक म फांसी म चढ़ा दिस. वीर नारायण सिंह के सहादत के बाद 10 जनवरी 1858 तक क्षेत्र मा नंगत के अशांति फैलगे । येकर ले हमर छत्तीसगढ़ मा अंग्रेज मन के विरुद्ध चिंगारी फूटे ला लगिस। वीर नारायण सिंह के सहादत हा  बैंसवाड़ा के राजपूत अउ छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे वीर हनुमान सिंह ला अंग्रेजी सासन ले लड़े बर प्रेरित करिन. हनुमान सिंह तीसरी बटालियन मा मैग्जीन लश्कर के पद मा तैनात रिहिन । 18 जनवरी सन 1858 मा संझा साढ़े सात बजे वीर हनुमान सिंह हा तीसरी बटालियन के सार्जेंट मेजर सिडवल के घर मा घूंसके उंकर हत्या कर दिस  । हनुमान सिंह के सत्रह संगवारी मन ला लेफ्टिनेंट स्मिथ के अगुवाई मा गिरफ्तार कर ले गिस । 

अइसने संबलपुर सरगुजा क्षेत्र के उदयपुर रियासत अउ सोहागपुर मा अंग्रेज मन के विरूद्ध विद्रोह होइस।ये प्रकार ले देखथन कि छत्तीसगढ़ क्षेत्र मा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मा कतको राजा, जमींदार,सैनिक अउ नागरिक मन भाग लिस पर  अंग्रेज मन हा आने राजा अउ जमींदार मन के सहयोग ले विद्रोह ला दबाय मा सफल होगे।

जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मा  गरम दल के नेता मन  के धाक जमे लगिस तब भारतीय जनता म अंग्रेजी सासन के विरुद्ध भीतरे- भीतर आगी सुलगत गिस । वो समय लाल-बाल-पाल के रूप म लाला लाजपतराय, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक अउ विपिनचंद्र पाल के अब्बड़ सोर रिहिस । 1905 म बंगाल विभाजन ले ये चिंगारी ह आगी बन गे अउ जनता मन अंग्रेज़ी सासन बर बागी बनगे । सन 1907 मा कांग्रेस हा गरम दल अउ नरम दल के रूप मा विभाजन होगे।येकर असर छत्तीसगढ़ मा अब्बड़ पड़िस। हमर देश के नेता मन जनता ल समझाय लगिस कि अंग्रेजी सासन फूट डालव अउ राज करव के नीति ल अपना के शुरू ले सासन करत आवत हे अउ बंगाल के विभाजन येकर एक बड़का उदाहरण हे । देशभर म अंग्रेजी सासन के विरुद्ध वातावरण बनिस। अइसन बेरा म हमर छत्तीसगढ़ मा घलो असंतोष के चिंगारी सुलगत गिस। अइसन बेरा मा छत्तीसगढ़ मा गरम दल के नेता के रूप मा माधव राव सप्रे, पं. रविशंकर शुक्ल,दादा साहब खापर्डे, वामन राव लाखे, ई. राघवेन्द्र राव, हनुमान सिंह,लक्ष्मण राव उदगीरकर मन उभर के आगू आइस । येमन 1907 मा तात्यापारा हनुमान मंदिर के तीर जनसभा ला संबोधित करके विदेशी सामान मन के बहिष्कार अउ स्वदेशी सामान मन ला अपनाय बर समझाइस।

सन 1907 मा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक हा बिलासपुर के यात्रा करिन।तिलक जी हा नागन्ना बाबू के घर रूकिस। 1907 म राजनांदगांव में ठाकुर  प्यारेलाल सिंह के  अगुवाई म देश के पहिली छात्र  हड़ताल होइस ।  ये हड़ताल लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के गिरफ्तारी के विरोध मा स्टेट हाईस्कूल नांदगांव मा होय रिहिस । ठाकुर साहब अपन सहयोगी नंदलाल झा,छविराम चौबे अउ गज्जू लाल शर्मा के संग मिलके राजनांदगांव म राष्ट्रीय आंदोलन ल ठाहिल बनाइस । ये देश के छात्र मन के पहली हड़ताल माने जाथे। अइसन दौर म छत्तीसगढ़ के कांग्रेस सदस्य मन घलो गरम दल के नेता मन ले प्रभावित होके उंकर संग सामिल होगे ।  लोकमान्य बालगंगाधर तिलक हा जनवरी 1918 मा लखनऊ ले कलकत्ता जाय के समय रास्ता मा दुर्ग, रायपुर अउ बिलासपुर मा आमसभा ला संबोधित करिन । 1918 मा पं. सुंदर लाल शर्मा हा अछूतोद्धार  कार्यक्रम चलाइस। राजनांदगांव मा ये कारज पं. छविराम चौबे हा करिस।  अंग्रेजी शासन के काला कानून रोलेट एक्ट के विरोध मा रायपुर, बिलासपुर, रतनपुर, राजनांदगांव, राजिम मा  30 मार्च 1919 मा काला दिवस के रूप मा मनाय गिस । 30 मार्च 1919 मा रायपुर मा माधव राव सप्रे अउ राष्ट्र कवि माखन लाल चतुर्वेदी हा मध्य प्रांत हिंदी साहित्य सम्मेलन के आयोजन करिन जेकर उद्देश्य लोगन मा जनजागरण फैलाना रिहिस । सन 1920 मा रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर मा जिला राजनीतिक सम्मेलन होइस । येमा रोलेट एक्ट अउ जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध करे गिस ।


 हमर छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के आदिवासी मन के जिनगी जल, जंगल अउ जमीन पर टिके हावे । आदिवासी मन अब्बड़ सिधवा रहिथे अउ अपन संस्कृति, संस्कार ला पालन करत सुघ्घर जिनगी बितात रहिथे पर जब कोनो उंकर स्वाभिमान ला ठेस पहुंचाथे ता वोमन डोमी करिया कस फूंफकारे ला लगथे ।  अपन सुरक्षा खातिर तीर कमान ले निसाना लगाय बर नइ चुके । अइसने निरंकुश राजशाही अउ अंग्रेज मन के गलत वन नीति के कारण बस्तर क्षेत्र मा सन 1910 मा विद्रोह होइस तेला भूमकाल विद्रोह के नांव ले जाने जाथे । रानी सुवर्ण कुंवर,लाल कलेन्द्र सिंह हा ये आंदोलन के अगुवाई करे के जिम्मेदारी नेतानार गांव के रहवइया नवजवान आदिवासी वीर गुंडाधूर ला सौंपिस। वीर गुंडाधूर बस्तर के स्वाभिमान के प्रतीक माने जाथे । नायक वीर गुंडाधूर ला अंग्रेजी शासन आखिरी तक नइ पकड़ पाइस । 

गांधी जी जब पहिली बार 20 दिसंबर 1920 मा छत्तीसगढ़ आइस त इहां के नेतामन के संगे-संग जनता मन म अब्बड़ उछाह छागे ।  गांधी जी संग मौलाना शौकत अली घलो आय रिहिन । गाधी जी रायपुर के गांधी चौक मा सभा ला संबोधन करके असहयोग आन्दोलन के महत्ता ला बताइस । छत्तीसगढ़ के नारी मन गांधी जी ला तिलक स्वराज फंड खातिर लगभग दो हजार रूपया के आभूषण भेंट करिन ।  गांधी जी धमतरी क्षेत्र के कंडेल नहर सत्याग्रह के सिलसिले म आय रिहिन । गांधी जी के छत्तीसगढ़ आय ले अंग्रेजी सासन म हड़कंप मचगे।कंडेल नहर सत्याग्रह के अगुवाई पं. सुंदर लाल शर्मा करिन अउ सहयोगी मन मा छोटे लाल श्रीवास्तव, नारायण राव मेघावाले, नत्थूजी जगताप सामिल रिहिन । येकर संबंध असहयोग आंदोलन ले रिहिस ।  गांधी जी के कंडेल जाय से पहिलीच अंग्रेजी सासन ह आंदोलनरत किसान अउ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन के बात ल मान लिस।


छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहर मन मा सन 1921 मा स्कूल कालेज के बहिष्कार करके राष्ट्रीय विद्यालय,  सत्याग्रह अउ असहयोग आश्रम खोले गिस । 12 मई 1921मा राष्ट्र कवि अउ कर्मवीर पत्रिका के संपादक माखन लाल चतुर्वेदी ला बिलासपुर मा अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जमगरहा भाषण देय खातिर गिरफ्तार कर जेल भेज दे गिस । 5 जुलाई 1921 मा असहयोग आन्दोलन के समर्थन मा प्रचार प्रसार बर राष्ट्रीय नेता मन बिलासपुर पहुंचिस जेमा डा. राजेन्द्र प्रसाद,सी. राजगोपालाचारी अउ कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान मन पहुंच के आम सभा ला संबोधित करिस। अइसने रायपुर मा गांधी चौक मा जमनालाल बजाज अउ मौलाना कुतुबुद्दीन हा जनता मन ला संबोधित करके उछाह बढ़ाइस। 


21 जनवरी 1922 मा धमतरी के सिहावा नगरी मा छत्तीसगढ़ के पहिली जंगल सत्याग्रह चालू होइस। अंग्रेजी शासन के गलत वन नीति, आदिवासी मजदूर मन के शोषण के विरोध मा येकर अगुवाई पं. सुंदर लाल शर्मा, छोटे लाल श्रीवास्तव, नारायण राव मेघावाले के संगे संग स्थानीय नेता शोभा राम साहू, श्याम लाल,बिसंभर पटेल मन करिन।  1924 में जब बीएनसी मिल के दुबारा हड़ताल चालू होइस तब ठाकुर प्यारेलाल सिंह ल जिला बदल कर दे गिस। राजनांदगांव ले निष्कासित करे के बाद सन 1925 म ठाकुर साहब रायपुर चले गे अउ अपन जिनगी के आखिरी तक ऊंहचे रहि के अपन राजनीतिक काम मन ल संचालन करत रिहिन।

26 जनवरी 1930 मा पुरा भारत वर्ष मा स्वाधीनता दिवस के रूप म मनाय गिस । गांधी जी देशवासी मन ले आह्वान कर चुके रिहिन कि स्थानीय समस्या ल लेके आंदोलन चालू करय । येकर असर पूरा छत्तीसगढ़ मा देखे ला मिलिस । 26 जनवरी 1930 मा पूरा देश जइसे छत्तीसगढ़ मा घलो प्रतिज्ञा दिवस मनाके पूर्ण स्वाधीनता के मांग दुहराय गिस । रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, जांजगीर चांपा अउ आने जगह मा राष्ट्रीय झंडा फहराय गिस । गांधी जी द्वारा चलाय गे नमक कानून तोड़व आंदोलन छत्तीसगढ़ मा अब्बड़ जोर पकड़िस ।  

9 दिसंबर 1930 मा महासमुंद के तमोरा गांव मा जंगल सत्याग्रह के समय बालिका दयावती हा महिला मन संग जंगल गिस । महिला मन ला जब अनुविभागीय अधिकारी एम.पी. दुबे हा रोके के उदिम करिस ता बालिका दयावती हा वोला तमाचा मार दिस । 


 हमर छत्तीसगढ़ मा महात्मा गांधी के दूसरइया बार अवई  छुआछूत ला दूर करे के उद्देश्य ले 22 नवम्बर 1933 के होइस अउ हफ्ता भर रिहिन । ये समय गांधी जी संग मीराबेन, ठक्कर बापा, महादेव भाई देसाई मन आय रिहिन। गांधी जी के छत्तीसगढ़ दौरा ले इहां के राजनेता अउ आम मनखे मन मा स्वतंत्रता के प्रति जागृति भाव मा बढ़वार होइस। गांधी जी हा सबले पहिली दुर्ग पहुंच के मोती तरिया के पास एक बड़का सभा ला संबोधित करिन जेमा करीब 25 हजार लोगन मन गांधी जी के दरसन करे बर पहुंचिस । 18 जनवरी 1940 मा सरदार वल्लभ भाई पटेल हा रायपुर पहुंच के कार्यकर्ता मन मा जोश भरिस। 1938 मा छुईखदान मा समारू बरई अउ राजनांदगांव जिला के छुरिया, घोघरे, बापूटोला मा 3 जनवरी 1939 मा विद्या प्रसाद यादव अउ विश्वेश्वर प्रसाद यादव के अगुवाई मा जंगल सत्याग्रह होइस ।  राजनांदगांव म विद्रोही कवि कुंज बिहारी चौबे छात्र जीवन म अंग्रेज शासन के झंडा ल उतार के भारतीय झंडा फहरा दिस । येकर सेति वोला बेत ले अब्बड़ मारे गिस पर वोहा महात्मा गांधी के जय अउ भारत माता के जय कहत गिस ।  21 जनवरी 1939 मा राजनांदगांव जिला के छुरिया क्षेत्र मा जंगल सत्याग्रह चलिस जेमा बादराटोला गांव के आदिवासी युवक रामाधीन गोंड उपर गोली चला दे गिस जेमा वोहा शहीद होगे । इहां बुद्धू लाल साहू के अगुवाई मा अंग्रेजी शासन के गलत वन नीति के कारन जंगल सत्याग्रह चालू होय रिहिस । महात्मा गांधी के आह्वान मा 17 अक्टूबर 1940 मा देशभर मा व्यक्तिगत सत्याग्रह चालू होइस। ये समय छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, धमतरी मा स्थानीय कार्यकर्ता मन व्यक्तिगत सत्याग्रह ला सफल बनाइस।


1942 मा रायपुर षड्यंत्र केस इतिहास मा अमर होगे। छत्तीसगढ़ के भगत सिंह परस राम सोनी के अगुवाई मा विस्फोट सामग्री अउ बम बनाय के काम चलिस। परसराम सोनी के संगवारी मन मा गिरी लाल लोहार, सुधीर मुखर्जी, दशरथ लाल दुबे, प्रेमचंद वासनिक,क्रांति कुमार भारतीय, बिहारी चौबे  ,कुंज बिहारी चौबे,गोवर्धन राम, समर सिंह ,बहादुर , भूपेंद्रनाथ मुखर्जी, सुरेंद्रनाथ दास ,सीताराम शास्त्री, निखिल भूषण सूर अउ देविकांत झा सामिल रिहिन। परसराम सोनी ला सात बछर के सजा सुनाय गिस । 


 8 अगस्त 1942 मा बंबई मा आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बैठक मा छत्तीसगढ़ के राजनेता मन भाग लिस। गांधी जी हा 9 अगस्त 1942 ले भारत छोड़ो आंदोलन के चालू होय के घोषणा करिन। आंदोलन चालू होय ले पहिली गांधी जी सहित देश के सबो बड़का नेता मन ला अंग्रेजी शासन हा गिरफ्तार कर लिस। बंबई बैठक मा सामिल छत्तीसगढ़ के ग्यारह राजनेता मन ला घलो मलकापुर रेलवे स्टेशन ले गिरफ्तार करके नागपुर जेल मा बंद कर दे गिस। छत्तीसगढ़ मा भारत छोड़ो आंदोलन जोर पकड़ लिस । सबो जिला के स्थानीय नेता मन ला अंग्रेजी शासन गिरफ्तार कर लिस तब इहां के कार्यकर्ता अउ रहवासी मन आजादी के लड़ाई मा खुदे आगू आके आंदोलन ला सफल बनाइस । इहां के आजादी के सेनानी मन अंग्रेजी शासन ले जोम देके लड़िस । हमर छत्तीसगढ़ ले आजादी के लड़ाई म अपन योगदान देवइया मन म  शहीद गेंद सिंह,वीर नारायण सिंह, हनुमान सिंह, सुरेन्द्र साय, कल्याण सिंह,वीर गुंडाधूर, पं. सुंदर लाल शर्मा, पं. रविशंकर शुक्ल, माधव राव सप्रे, दादा साहब खापर्डे, डा. मुंजे, कुंज बिहारी अग्निहोत्री, शहीद रामाधीन गोंड, ठाकुर प्यारेलाल लाल सिंह, केदार नाथ ठाकुर, डा. ई. राघवेन्द्र राव, बैरिस्टर छेदी लाल, घनश्याम सिंह गुप्त, मुंशी अब्दुल रउफ मेहवी, वामन राव लाखे, नारायण राव मेधावाले, पं माखन लाल चतुर्वेदी, हरख राम सोम, विशंभर पटेल, पंचम सिंह सोम, शोभा राम साहू, शिवदास डागा, महंत लक्ष्मी नारायण दास, महंत नयन दास, कुंज बिहारी चौबे, यति यतन लाल, क्रांति कुमार भारतीय, डा. खूबचंद बघेल, डा. राधा बाई, बालिका दयावती, बाबू छोटे लाल श्रीवास्तव, राम प्रसाद देशमुख, शोभा राम साहू, बुद्ध लाल साहू, हीरा लाल सोनबोइर,नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, वाय, व्ही. तामस्कर, रत्नाकर झा, रघुनंदन सिंगरौल, नत्थू जी जगताप, सेठ गोविंददास, पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र, गयाचरण त्रिवेदी, राम गोपाल तिवारी, गजाधर साव, कालीचरण शुक्ल, गंगाधर प्रसाद चौबे, नंद कुमार दानी, आनंद राम गोंड, श्याम लाल गोंड, फिरतू राम गोंडा, मंगलू गोंड, शंकर राव गनौद वाले, बालक बलीराम आजाद, अवध राम सोनी, पं. मुरलीधर मिश्र, कैलाश चंद्र श्रीवास्तव, कन्हैया लाल सोनी, परस राम सोनी, सुधीर मुखर्जी, रामचंद्र, बल्देव प्रसाद मिश्र, गोवर्धन लाल श्रीवास्तव, सखा राम रूईकर, शिव लाल मास्टर, केलकर, हरि सिंह गौर, शंकर खरे, तुलसी प्रसाद मिश्रा, विश्राम दास बैरागी, विश्वेश्वर प्रसाद यादव, विद्या प्रसाद यादव, कन्हैया लाल अग्रवाल, दामोदर दास टावरी, पं. राम नारायण मिश्र हर्षल, समारू बरई, वली मोहम्मद, इंदु केंवट, अरिमर्दन गिरि, रामाधार दुबे, वासुदेव देवरस, शेख मुंतजीमुद्दीन, सी.एम. ठक्कर, बद्री प्रसाद साव, राम राव चिंचोलकर, राजू लाल शर्मा, छवि लाल चौबे, पं. विष्णु दत्त शुक्ल, असगर अली, सोमेश्वर शुक्ल,जमुना प्रसाद वर्मा, विद्याचरण वर्मा, कैलाश सक्सेना, अब्दुल कादिर सिद्दीकी, बल्देव सतनामी, याकूब अली, ठाकुर राम कृष्ण सिंह सहित आने नांव सामिल है.

 भारतीय मन के अंग्रेजी शासन ले अब्बड़ लड़ाई के बाद भारत 15 अगस्त 1947 मा आजाद होइस । बिरबिट करिया रतिहा के बाद नवां बिहान आइस । अंग्रेज मन के सैकड़ों बछर के गुलामी के बाद भारतमाता हा मुक्त होइस अउ ये प्रकार ले अब इहां के जनता मन खुद मालिक बनगे । भारत मा अब राजा महाराजा मन के शासन समाप्त होके जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि मन के शासन चालू होइस। भारत के तरक्की के रद्दा खुलगे । अठहत्तर बछर मा हमर भारत अउ छत्तीसगढ़ के  सुघ्घर विकास होइस ।हम सब के कर्तव्य बनथे कि महापुरूष अउ सहीद मन के बताय रद्दा मा चल के देश के विकास मा योगदान देवन। 


भारत माता की जय । जय छत्तीसगढ़ । 


ओमप्रकाश साहू अंकुर

ग्राम व पोष्ट - सुरगी

जिला व तह. - राजनांदगॉंव छ.ग.

Thursday, 15 January 2026

छत्तीसगढ़ी के गद्य साहित्य ;नाटक

 

छत्तीसगढ़ी के गद्य साहित्य ;नाटक


     डॉ पीसी लाल यादव


कोनों भी भाषा के साहित्य होय गद्य ओखर पोठ विधा आय | जतके मह्त्तम पद्‌य के होथे, ओतके महत्तम गद्य के होथे। इही बात हमर माई भाषा छत्तीसगढ़ी बर घलो लागू होथे। छत्तीसगढ़ी गदय म जतके महत्तम कहानी अउ उपन्यास के हवय ओइसने महत्तम नाटक के घलो हवय । मोला तो अइसे लगथे के कहानी अउ उपन्यास ले जादा प्रभाव नाटक के परथे। काबर के कहानी अउ उपन्यास ल पढ़े जाथे , जबकि नाटक ला सुने के  संग-संग सऊँहत देखे घलो जाथे । येखरे सेती नाटक ल दृश्यश्रव्य केहे जाथे। येहा पाठक, श्रोता अउ दर्शक ला जादा प्रभावित करथे । संवाद, अभिनय के सेती नाटक के मंचन म सजीवता होथे । नाटक म गीत-संगीत अउ अभिनय के त्रिवेणी होथे। छत्तीसगढ़ी नाटक के इतिहास ल सौ-दू सौ साल म बांधना या ओला समेटना, मोला उचित नई लागय । येला जाने-समझे बर हमला लोक के सहारा लेना परही। ओ लोक, जेन हा श्रम परिहार बर, समुदाय के मनोरंजन बर, रात-रात भर नाचथे-गाथे, अपन दुख-पीरा ला अभिनय के माध्यम ले उद्‌गारथे । ओ आय छत्तीसगढ़ी नाचा, जेला नाचा-गम्मत घलो कहिथन । के हे जाय त नाचा लोक जीवन के दरपन आय। जेमा ओखर दुख-सुख, हास-परिहास, उछाह-उमंग, हांसी-रोआसी, दया-मया ,करुना, मीत-मितानी, भाईचारा जम्मो के दर्शन होथे | लोक जीवन के विसंगति नीत-अनीत येमा सब कुछ समाय रहिथे । एक बानगी देखव् – 


भांग मांगय चना रे संगी, गांजा मांगय घी । दारू मांगय जूता-चपाल, मन लगे तो पी ।। 


छत्तीसगढ़ नाटक के गढ़ आय। कोनों नई पतियाय त ओला रामगढ़ के प्राचीन नाट्‌य शाला ल जा के देखना चाही। जेन ह ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के आय, जिहाँ कालीदास के मेघदूत के रचना होय हे। अउ येहा दुनिया भर के सबले जुन्ना नाट्य शाला आय | अइसन विद्‌वान मन  कहिथे। जब हमर छत्तीसगढ़ में अतका  जुन्नबी नाट्य शाला हे ,त का इहाँ के मनखे नाचत -कुदत नई रिहिन होहीं ? नाच-कूद के अपन मनोरंजन नई करत रिहिन होहीं । ये हा गुने के बात आय। ये बात जरूर हे के तब नाटक या नाचा के कोनों लिखित रूप नई रिहिस, भलुक ओहा वाचिक परम्परा पीढ़ी-दर-पीढ़ी समय के अनुसार लोक कंठ म समाय रिहिस। ओखर प्रत्यक्ष प्रमाण हे आज के हमर लोक नाट्य ‘नाचा' जेन हा आज भी वाचिक परम्परा ले जनमानस के मनोरंजन के साधन बने हे । जन-चेतना के माध्यम बने हे | जेमा स्त्री पात्र के भूमिका पुरुष मन निभाथे । इही लोक रूप में जऊन आदिकाल से चले आवत हे । जेमा शोषित, दलित,पीड़ित के स्वर मुखर होथे |


अइसने छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य के दूसर रूप हे ‘रहस’ | रहस धार्मिक अनुष्ठानिक आयोजन ये, जेखर कथा कृष्ण लीला ऊपर आधारित होथे। येखर संवाद लिखित रूप  में होथे अउ येखर आधार आय बाबूवा का राम लिखित गुटका । रहस ला रास लीला घलो केहे जाथे | कृष्ण लीला के बाद  ईही मंच में जेन ला बेड़ा केहे जाथे , जिहाँ श्री कृष्ण लीला से संबंधित मूर्ति मन के स्थापना होय, रहिथे तेमा ‘छैला नाच’ के घलो प्रदर्शन होथे। येहा नाचाच आय जेमा  गम्मत देखाय जाथे। छैला नाचा के कोनों स्क्रीप्ट नई होय । नाचा के खड़े साज, देवारिन साज, अउ अब बइठक साज छत्तीसगढ़ी नाटक के आदि रूप, प्रारंभिक स्वरूप आय । पंडवानी, चंदैनी, भरथरी गायन मा घलो अब नाट्य तत्व माने अभिनय के दर्शन होथे ,जेन हा छत्तीसगढ़ी नाटक के महत्तम ला उजागर करथे। बस्तर उड़ीसा ले लगे सीमांचल म भतरा नाच के चलन हे । जेमा मुखौटा के उप‌योग करे जाथे | येहूँ ह नाटक के आदि रूप के गवाही हे | तब जुन्ना समय म  शिक्षा के प्रचार –प्रसार नई रिहिस, लोगन पढ़े-लिखे नई रिहिन, तभो नाटक ह वाचिक रूप में लोगन के मनोरंजन के संगे संग लोक चेतना के माध्यम बने रिहिस। ये मन छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य के वाचिक रूप आय, जऊन हा आजो चलत हे । नाचा ह अंग्रेजन के खिलाफ स्वतंत्रता के शंखनाद करिस |  ऊँखर जोर-जुलुम बर अवाज उठइस । अजादी बर लोगन ल जगइस  - 


भागेल ल हरथे ग मोंरो, भागे ल हरथे ना आये हे बिदेसी सगा, भागे ल हरथे ना ।      अंग्रेजन मन बिदेसी सगा ये , जेन मन हमर भाग माने हमर आजादी ला हर ले हे। अइसन भाव हे येमा । आजादी के बाद जइसे-जइसे शिक्षा के प्रचार-प्रसार होइस, लोगन जागरुक बनिन, तब छत्तीसगढ़ी नाटक के लोक रूप, वाचिक परम्परा ह घलो लिखित रूप मा अइस । राष्ट्रीय चेतना के संचार होइस । तब जागरूक सियान साहित्यकार मन समाज ल जगाय बर, अशिक्षा, अंधविश्वास के अंधियार ल मेटाय बर नाटक के रचना करिन । काबर के नाटक लोगन ल जादा प्रभावित करथे । कान के सुनई अउ आँखी के देखई दूनों संगे - संगे होय ले हिरदे में येखर जादा प्रभाव परथे। अउ मनखे चेतलग होथे। परंपरा ले हट के आधुनिक भाव बोध वाले नाटक के लेखन अउ मंचन होय लगिस | सन् 1‌904 में पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय लिखित नाटक 'कलिकाल' ल छत्तीसगढ़ी के पहिली नाटक माने जाथे। इही समय में पंडित शुकलाल पाण्डेय रचित नाटक ‘केकरा घरैया’ अउ ‘खीरा चोट्टा’ घलो प्रसिद्ध होइस | जेमा छत्तीसगढ़ी लोक जीवन अउ लोक संस्कृति के चित्रण हे । दूनों नाटक(एकांकी) शिक्षाप्रद अउ हँसी-मजाक से भरपूर मनोरंजक रिहिस। ये बेरा के नाटक में मनोरंजन के संग-संग लोकचेतना, समाज सुधार अउ स्वतंत्रता के भाव मुखर होइस ।


सन् 1948 में पंडित मुरलीधर पांडेय ह ‘विस्वास' नाटक के रचना करिन, जउन ह  30 अगस्त 1948 के ‘छत्तीसगढ़ केशरी' म छपिस । एमा बलि प्रथा के विरोध अउ सामाजिक चेतना के गोठ रिहिस। ये बेरा में धार्मिक भाव ले ओत-प्रोत 'छत्तीसगढ़ी राम चरित नाटक' श्री उदय राम जी ह 1963 म लिखिन | डॉ० रामलाल कश्यप जी ह ‘श्री कृष्णार्जुन युद्ध’ 1965 म लिखिन । श्री  रामकृष्ण लाल अग्रवाल के नाटक ‘गॅवई के अंजोर’ घलो उल्लेखनीय हे । छत्तीसग‌ढ़ी जन जागरण के अग्रदूत, छत्तीसगढ़ी माटी के सपूत समाज सुधारक डॉ खूबचंद बघेल के साहित्यिक अवदान ल कभू नई भुलाय जा सके। ऊँखर लिखे नाटक, ‘ऊँच अउ नीच’, ‘करम छड़हा’, ‘जनरैल सिंह’, ‘बेटवा बिहाव’ अउ 'किसान के करलई’ मन मील के पखरा साबित होईन। ‘ऊँच अउ नीच’ नाटक हरिजन उध्दार के दृष्टि से गांधी जी के सन 1933 के आगमन अउ अनंत राम बरछिहा द्वारा अपन गाँव के हरिजन भाई मन के हजामत बनाय के घटना ले संबंधित हे | उहें जन्‌रैल सिंह ह देशप्रेम अउ छतीसगढ़ प्रेम ले सराबोर हे । ये नाटक के मंचन ले छत्तीसगढ़ के आत्म सम्मान अउ देश के गौरव गरिमा, सीमा के रक्षा कइसे कर सकत हन | ये संदेश मिलिस | ‘बासी महात्म्य' इही म समाहित हे |        गजब विटामिन भरे हवय जी, छत्तीसगढ़ के बासी में        धान-उन्हारी उपजायेन जी , हम कम्हार मटासी में । 


हे किसान में गुन सेवा जस, संत अमर सन्यासी में | 


नंदिया जल विरमल जइसे, चंदा हर पूरन मासी में | 


छत्तीसगढ़ बर गजब मया हे, हर छत्तीसगढ़ वासी में। 


वीर नारायण सिंह देश बर ,चढ़गे हाँसत फांसी में || सन् 1963 में टिकेन्द्र टिकरिहा के नाटक ‘साहूकार से छुटकारा’ अउ सर्वनाश, फंदी घलो महत्वपूर्ण नाटक ये | ‘साहूकार से छुटकारा'  साहूकार मन के शोषण ल उजागर करथे । दुर्ग निवासी श्री ग‌जाधर प्रसाद रजक के ‘बांटा’, बाबू लाल सिरिया के 'महासती बिंदारमती’ | धमधा निवासी बंगाली प्रसाद ताम्रकार के 'मसाल के जोन’, डॉ महेंद्र कश्यय राही के 'गांधी अउ गंगा के देश में घलो छत्तीसगढ़ी के महत्वपूर्ण नाटक आय | श्री नंदकिशोर तिवारी  द्वारा रचित नाटक ‘परेमा’ के अपन अलग चिन्हारी हे, जेखर प्रसारण आकाशवाणी रायपुर ले बेरा-बेरा म होवत रहिथे । येमा पांच नाटक ‘बंटवारा’, नई जानन का चीज, लुकाय जेमा सब्बो बीज’  रंग सा एक’, ‘महारसिया’, ‘परेमा’ के संकलन हे। श्री नंदकिशोर तिवारी जी के एक अउ नाटक “रानी दाई डभरा के” बहुत प्रसिद्ध होईस। डॉ योगेन्द्र चौबे के निर्देशन ये नाटक के कतको प्रभावी मंचन होय हे। ‘अहिमन कैना’,’नारद मोह’,'उरुभंगम’, ‘मोर कुंआ गँवागे’ घलो इंखर चर्चित नाटक आय । सन् 1977 में प्रकाशित श्री नारायण लाल परमार रचित ‘मतवार’ अउ दूसर एकांकी’ घलो बड़ प्रसिध्द होइस । श्री लखन‌लाल गुप्त के नाटक 'बेटी के मनसूबा' , 'वर के खोज’,अउ ‘नवा बिहान’ 'हार-जीत' एकांकी मन घलो नाटक के रूप आय।‘महाकवि कपिलनाथ कश्यप छत्तीसगढ़ी साहित्य के पुरोधा आँय । ऊँखर एकांकी नाटक ‘अधियारी रात’ (1992), ‘नवा बिहान' (1994), ‘गोहार’ (1994), ‘पूजा के फूल’ (1997), 'पापी पेट' (1997), ‘गुराँवट बिहाव’ (1998) प्रसिद्ध हे । सन् 1998 में डॉ. परदेशी राम वर्मा रचित नाटक ‘मैं बइला नौहव' तो साक्षरता कला जत्था मंच के माध्यम ले शिक्षा के अलख जगइस । ये संग्रह में क्रमशः मैं बइला नो हंव’, ‘टोटका के फोटका’, ‘लोकवा’, ‘भांवर',‘जनौला', 'जॉगर’ अउ ‘बिदाई' एकांकी मन के जोर न हे | श्री विश्वेन्द्र ठाकुर के नाटक ‘जवाहर बंडी’ (1996), 'घुरुवा के दिन बहुरगे’, ‘राजिम’, श्री श्यामलाल चतुर्वेदी के  'मया के मोटरी’ एमन छत्तीसगढ़ी नाट्य लेखन ल नवा दिशा दिन । बेरा बदलथे अउ सब ला अपन रंग म  रंग लेथे। साहित्य बर घलो ये बात लागू होथे | त भला नाटक ह कइसे छूटही ? पारंपरिक नाटक के स्थान म नवा लेखन, नवा प्रयोग शुरू होईस अउ नाटक के तेवर घलो बद‌लिस । डॉ. सुरेन्द्र दुबे के नाटक ‘पीरा' एखर बढ़िया उदाहरण ये । डॉ. जीवन यदु के गीत नाट्य "अइसने च रात पहाही, संतोष कुमार चौबे के ‘ठोमहा भर चाउर’ शंकुतला तरार के ‘चूरी' ,रघुबर सिंह चंद्राकर के "पटवारी” के परपंच’, ‘मुड़ पेलवा’ , ‘गुड़ी के गोठ’, डॉ योगेन्द्र चौबे के ‘बाबा पाखंडी’,'रानी दाई’, अजय आठले के ‘बकासुर’ | लोकनाथ साहू ललकार के ‘रंग विहार’, घनश्याम साहू के 'अघनिया’, नकुल जायसवाल के ‘सबास बेटी’, ‘गुरांवट’, 'मोरो मन करथे'। रामनाथ साहू के नाटक ‘जागे-जागे सुतिहा गो’, ‘हरदी पीयंर झांगा-पागा’ अउ ‘बिलासा, अरपा के बेटी’ छत्तीसगढ़िया लोकजीवन के दरपन आय । अभी डॉ पीसी लाल यादव के छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य" नाचा के मूल पाठ छपे हे तेनो संहराय के लइक हे | श्री दुर्गा प्रसाद पारकर के नाटक ‘चिन्हारी', शिवनाथ, ‘सुकवा’, ‘चंदा’, ‘सुग्घर गाँव’ अउ ‘ सुराजी गाँव’ नवा लिखइया मन ला प्रेरणा देवत नाटक आंय |


सन् 1971 में दुर्ग जिला के गाँव बघेरा ले कला-संस्कृति के क्षेत्र म नवा अंजोर बगरिस । जब दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ह चंदैनी-गोंदा के सिरजन करिन | छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के संगे-संग नाटक ल घलो नवा दिशा मिलिस । दाऊ रामचंद देशमुख जी ह नाचा कलाकार मन ला संगठित करके छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल के माध्यम ले नाटक के क्षेत्र म नवा उदिम करिन । ये बात सन् 1953 के आय । पाछु चंदैनी गोंदा म गीत नाट्य के माध्यम ले 'पूजा के फूल’, ‘एक रात का स्त्रीराज' ‘देवार डेरा' अउ कारी नाटक के मंचन करिन, जेन बड़ लोकप्रिय होइस । उही बेरा म हबीब तनवीर जी मन नाचा कलाकार मन ल लेके नवा थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी नाटक में नवा प्रयोग करिन । ‘चरनदास चोर’ नाटक के दुनिया भर म खूब शोर होइस। अइ सनेहे ‘मोर नाँव दमाद, गाँव के नांव ससुरार’, ‘बहादुर कलारिन’ अउ ‘आगरा बजार’ जइसे लोकप्रिय नाटक के मंचन करिन, तब  दुनिया भर म नाचा के डंका बाजे लगिस । ये हा छत्तीसगढ़ी नाटक के स्वर्णिम काल आय । चंदैनी गोंदा के प्रेरणा ले दाऊ महासिंह चंद्राकर ह,डॉ नरेन्द्र देव वर्मा के उपन्यास के नाट्य रूपांतरण ‘सोनहा बिहान’ के सिरजन करिन । येहू खूब लोकप्रिय होइस । फेर पाछु येमन चिंता दास बंजारे चंदैनी लोक गायक के गाथा ऊपर “लोरिक-चंदा" नाटक के निर्माण करिन, तेखर बाद ‘गौरी’ नाटक के घलो मंचन करिन। प्रेम साइमन के लिखे नाटक घर कहाँ हे ? के बाते निराला रिहिस। छत्तीसगढ़ी नाटक के निर्देशन में रामह्रदय तिवारी जी के नाव ल नई भुलाय जा सके। लक्ष्मण चंद्राकर के 'हरेली’, दीपक चंद्राकर के ‘गम्मतिहा’, राकेश तिवारी के ‘दसमत कैना’, ‘राजा फोकलवा’, मिर्जा मसूद के ‘सैंया भए कोतवाल’, चंद्रशेखर चकोर के चंदैनी शैली के नाटक ‘टेकहा राजा’, ‘खोखन खल्लू’, रामशरण वैष्णव के “बुढ़वा बिहाव”, डॉ.पीसी लाल यादव के “अक्कल बड़े के भईस”, “हवलदार हरिराम”, “भोला भगवान” छत्तीसगढ़ी नाटक मन आज घला ओतके लोक प्रिय हे । भूपेंद्र साहू के नाटक भरथरी म परम्परा के संग आधुनिक मंची प्रभाव दर्शक मन ल भावविभोर कर देथे | छत्तीसगढ़ी म नाटक के लेखन बहुत होय हे | फेर ओखर मंचन ओतका नई हो पाय हे | जबकि मंचन बहुत जरुरी हे । एक बात संहराय के लईक हे के आकाशवाणी रायपुर ह बहुत अकन छत्तीसगढ़ी नाटक मन के प्रसारण करे हे, जेन ह बहुत ही प्रभावी बने हे । सुग्घर संगीत अउ सारथक संवाद ले ये नाटक मन मन म उतर जथे । बजेन्द्र बैद्ध , किशन गंगेले, लखन लाल परगनिहा, लाल रामकुमार सिंह, मिर्जा मसूद, मोहन सी रामानी, राजेश फाये , समीर शुक्ल, विष्णु प्रसाद साहू अउ याद राम पटेल के निर्देशन में प्रसारित ये नाटक मन छत्तीसगढ़ी नाट्य साहित्य के बड़ उपलब्धि आय । प्रसारित नाटक मन ये प्रकार हे-  आँखी के टोपा लेखक बजेन्द्र बैद्ध, चना बूट- राजेश गनौद वाले , मोला गुरु बनई लेते – डॉ.नरेन्द्र देव वर्मा, अपन गाँव अपन छाँव - विष्णु प्रसाद साहू, अप्पड़-जीवनदास मानिकपुरी, बरत-रक्सा - आदित्य नारायण सिंह, गियान अउ धियान - तपस्विनी साहू, गुरु बाँटा -राकेश साहू, कुंआ के मेचका - राजेश रंगारे, मतवार-आशीष सेन्द्रे, नई जानन - नंदकिशोर तिवारी, पंच परमेश्वर - जीवन यदु, पाँचवाँ हड़िया-पुष्पलता वर्मा ,परेमा - नंद‌किशोर तिवारी, अंजोर- खेमप्रसाद शर्मा, अंजोर - सुरेश कुमार दुबे, गिदरी- उर्मिला देवी ताम्रकार, गुंरावट - नकुल जायसवाल, हंसा नियाँव-जीवन यदु, जंगल मा आगी- पुनऊ sराम साहू, लछनी - राकेश तिवारी, लकड़‌हारा के किस्सा- खोमप्रसाद शर्मा, मन-चलहा-पुनऊ राम साहू, नवा बिहान के अंजोर- पुष्पलता वर्मा , नवा जिनगी नवा रद्दा – खोमप्रसाद शर्मा, पुरखौती- पुष्पलता वर्मा, पूत-सपूत - प्रेम साइमन, सोनाखान - सुशील यदु , रतिहा पहागे- सुरेखा कश्यप, सठियाय उमर - आशीष सेन्द्रे, सोन के खिनवा- माँघी लाल यादव, ठग ले बड़े जग - माँघी लाल यादव, भरथरी - प्रेम साइमन, हंडा-पुष्पलता वर्मा, अहा रे चहा (झलकी) – रामेश्वर वैष्णव , भरम - निवेदिता सिंह, दूध दाई, भीष्म देव चतुर्वेदी, लक्ष्मण रेखा - निवेदिता सिंह, मनबोध - पुष्पेन्द्र सिंह, पीरा - भीष्मदेव चतुर्वेदी, सुंता सलाह -दीनदयाल साहू, भरम- सुरेश वर्मा, अंजार - भीष्मदेव चतुर्वेदी, कुलवंतीन- रविशंकर दुबे |


इंखर अलावा अउ कतकोन छतीसगढ़ी नाटक हे, जउन छत्तीसगढ़ी वेब साइट मन म हे। श्री संजीव तिवारी दुर्ग के मुताबिक ऊँखर वेबसाइट "गुरतुर गोठ" डाट काम में सीताराम पटेल के लगभग 20-25 छत्तीसगढ़ी नाटक संग्रहित हे । जऊन ऊँखर स्वयं के लिखे अउ कतको हिन्दी के बड़े कथाकार मन के कहानी के नाट्य रूपांतर आय । जइसे विष्णु सखाराम खांडेकर के एकांकी शांति के नाट्य रूपांतरण | जयशंकर प्रसाद के कहानी पुरस्कार के नाट्‌य रूपांतरण बिरहा के आगी । फणीश्वर नाथ रेनु के कहानी नित्य लीला ल किसना के लीला नांव से | आजाद परिन्दे के रुपांतरण चिरई-चिरगुन नांव से । लाल पान की बेगम के रूपांतरण पान के मेम के नांव से | सिरी पंचमी के सगुन ठेस कहानी के नाट्य रूपांतरण ठेंसा नांव ल करे गे हे | इंखर छोड़ अउ कतकोन अउ नाटककार मन छूटगे होही ऊँखर से मैं क्षमा चाहत हंव । मोर जतका जानकारी होइस, मैं ओतके भर ला सरेख पाये हंव | 


ये तरहा से देखे जाय तो छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य में नाटक के बड़ सुग्घर स्थान हे । परंपरा ले लेके आधुनिक रंगमंच तक देखे जाय त नाटक के क्षेत्र में लेखन सरलग चलत हे। फेर अतके म संतोष करना जड़ता होही । हमला समय ला देख के समय के संग चले ला लगही । नाटक के क्षेत्र में होवत प्रयोग अउ नवाचार ल अपनाय ल लगही। समाज के विसंगति ऊपर लेखनी ल चलाय ल परही। जिनगी के सुख-दुख, जय-पराजय, दया-मया, समता –सद्भाव ,भाईचारा के बढ़‌वार बर, मनखेपन के रखवार बने ला परही। नवा पीढ़ी ले तो अउ जादा उमेंद हे के ओमन नाटक लेखन ले हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य के ढोली –ढाबा ल छलकत ले भरंय |  


     डॉ. पीसी लाल यादव


      ‘‘साहित्य कुटीर‘‘


  गंडई-पंड़रिया, जिला खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (छ.ग.) 


      मो. नं. 9424113122


Email – pisilalyadav55@gmail.com






छत्तीसगढ़ी व्यंग्य बाबा बिल्होरन दास

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य

बाबा बिल्होरन दास

वीरेन्द्र सरल

पहिली हमर देश ह कृषि प्रधान रिहिस अब बाबा प्रधान होंगे हावे। कहे कि मतलब है कि बाबा मन अब काबा होगे हे। अधर्मानन्द ले लेके निशर्मानन्द तक किसम - किसम के बाबा नेता के मतदाता के चक्कर लगाय बरोबर हमर चारो कोती चक्कर लगावत है। खांस- खखार के थूंके के पहिली घला बने चेत लगा कि आजु-बाजू ल देखना पड़थे, डर लागथे कहूँ थूकत बेर भोरहा म कोन्हों बाबा उप्पर झन पड़ जाय नहीं ते कोन्हों तपस्या करत बाबा  कहूँ गुसियाके श्राप  दे  दिही तब गड़बड़ हो जही। खने- कोड़े के बेर घला ध्यान रखना पड़थे कि कोन्हों बाबा ह भुइयां भीतरी समाधि लगा के झन बइठे रहय। मुख्य रूप ले बाबा मन के दु ठन बुता होथे। पहिली प्रवचन झाड़ना अउ दूसर दक्षिणा के हिसाब ले आशीर्वाद देना।

 एक दिन एक झन संगवारी ह बतावत रिहिस कि बाबा बिल्होरन दास ह दक्षिणा तो जमा के लिस फेर मोला सस्ता वाला आशीर्वाद थमा दिस तइसे लागथे। वोहा आशीर्वाद देवत कहे रिहिस की जा तोर घर अन्न-जल गौ लक्ष्मी के भंडार भरही फेर आज ले मोर घर अन्न धन तो नई आइस बल्कि धरे रहेंव तहू धन ह ओला दक्षिणा देवय म सिरागे। बाबा बिल्होरन दास के नावेच ह बड़ा गजब के हे। उंखरे संग भेंट कर के आशीर्वाद बिसाय के मोरो मन होय लगिस।

मैं अपन संगवारी ल कहेंव-" संगी अभी तक किसम- किसम के बाबा मन के नाव सुनत रहेव फेर बाबा बिल्होरन दास के नाव पहली बार सुनत हंव, नवा- नवा उद्गरे हे का?"

संगवारी बताइस -"नहीं वो तो सीनियर बाबा आय। बाबागिरी के मैदान के जुन्ना खिलाड़ी । अपन गोठ-बात म अपन भक्त मन ल अइसे बिल्होर देथे की भक्त ह कंगला हो जथे अउ ओला पता घला नई चलय। जब तक भक्त ल पता चलते तब तक बाबा अंतर्ध्यान हो जथे। अउ ओखर जूनियर बाबा मरखण्डा नन्द के तो बातेच मत पूछ। भक्त के भूत अउ वर्तमान के बात ल सऊंहत बता देथे। भविष्य के बात ल अपन मन रखथे जउन उंखर भक्त मन ल उंखर अंतर्धान होय के बाद पता चलथे। बाबा मरखण्डा नन्द ह जउन बात ल बताथे ओला कले चुप सुने के आय। जादा आंय-तांय पूछबे तब खींच के लताड़ा चमकाथे।"

 संगवारी के गोठ ल सुनके मैं मन में गुनेव, यह बइ हागे हे तइसे लागथे ? तभे अन्ते-तन्ते गोठियात हे? ये बाबा मन के गोठ गोठियावत धुन चिटफंड कंपनी वाले मन के?

 एक तो ये बाबा मन के नावेच ल उटपटांग बताथे अउ दूसर लताड़ा- छताड़ा के बात घला करथे। अब तो बाबा मरखण्डा नन्द के दर्शन करके उंखर आशीर्वाद पाय के शौक महुँ ल चर्रागे।

 एक दिन के बात आय। अपन फटफटी म मैं गांव जावत रहेंव। एक ठन बड़का गांव के चौक म पहुँचेव तब देखथव कि मनमाने भीड़ सकलाय रहय। भीड़ ह गोल खड़े रहय अउ भीतरी ले नदिया बइला बुगबुग - बुगबुग कहिके आवाज आवत रहय। महुँ फटफटी ले उतर के भीड़ के तीर म पहुँचेंव। अउ एड़ी ऊँचाके देखे लगेंव। नदिया बइला के गोसान ह चिन्हे- जाने असन लगिस। रब ले सुरता आगे, ये तो अपन पड़ोसी गांव के बैल कोचिया बुधारू आय।

 कोचियाई म पहिली पैसा तो बहुत कमाय रिहिस फेर सब ला मन्द-मउहाँ, जुआ - ताश म फूँक घला डारे रिहिस। येखर मेर एक ठन फुटहा ढोल, जुन्ना चिमटा अउ एक ठन बूड़गा बइला भर बाचे रिहिस, ये कब ले बाबागिरी विभाग म  पोस्टिंग पा गे हावे भाई ? बाबागिरी में तो मनमाने पैसा झोरत हे बुधारू कका ह।

 मैहा जोर से चिचिया परेंव- बुधारू कका। वोहा मोर कोती नल देखिस, तीर म आइस अउ मोल समझावत किहिस-" तोला भोरहा होवत हे बच्चा। मैहा बुधारू कका नो हंव। मैहा बाबा बिल्होरन दास  अउ ये मोर चेला बाबा मरखण्डा नन्द आय, स उँहत नन्दी के अवतार आय। तैहा नई पतियावस तब देख मैहा जउन पुछहुँ तेखर जवाब ये मोर चेला ह दिही। बाबा ह पूछिस बोल चेला -" ये सब भक्त मन के गरीबी ह दूर होही या नहीं, मंहगाई कम होही या नहीं, बेरोजगार भगत मन ल रोजगार मिलहि की नहीं?

 बाबा के सवाल सुनके चेला ह हंव कहिके अपन मुड़ीं ल डोलावय। ताहन भीड़ ह मनमाने थपड़ी पिटय अउ पैसा चढ़ावय। जउन ज्यादा पैसा चढ़ावय ओला बाबा मरखन्दा नन्द ह जादा आशीर्वाद देवय। आशीर्वाद के लालच म दस रुपए के नोट निकाल के मैहा बाबा मरखण्डा नन्द के आघू म खड़े हो पारेंव। दस के नोट ल देख के वोहा मोर बर बगियागे अउ हुमेले बर दौड़ गे। मैहा डर के मारे ओखर पाछू कोती जा के पूछ पारेंव-" देश के गरीबी अउ महंगाई कब दूर होही बाबा?'

 बाबा मरखण्डा नन्द मोला  लताड़ा जमा दिस। मोर थोथना ह फुटगे। मैहा अपन मुड़ी ल धरके सोचत रही गेंव , बाबा ल सही बात पुछबे तब लताड़ा जमा थे तइसे लागथे ददा।  अब येला मरखण्डा नन्द कहंव कि लटारा नन्द । जय हो बाबा मरखण्डा नन्द। क्षमा करबे ददा।

 वीरेन्द्र सरल

ग्राम-बोड़रा ( मगरलोड ) 

पोष्ट - भोथीडीह

व्हाया-मगरलोड

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

चंदा

 चंदा


चंदा के नाम सुनके मन म हिलोर मारथे। अऊ मनके भार्री भांठा ह लहलहा उठथे । ऐकर उलटा कोनो ल चंदवा कही देबे त भांठा के पेरावठ म आगी जरे कस लागथे। काबर की चंदवा मन के मुड़ी अधियारी पाख के तीज, चऊत के चांद कस दिखथे।


चंदा के नाम सुनबे तेमे अइसे लागये मानो पूरा सर्व गुण सम्पन्न होही। फेर ओकर  असलियत तो पाख के एम्कम, दूज तीज के पता चलथे ।चंदा ल कहिबे त सिरिफ अऊ सिरिक अंधियारी पाख के पून्नी के चंदा ह  दगदग ले लागथे। कतनो मनखे मन पून्नीपूनवास बर मेला मड़ई म नहाखोर के पूजा-पाठ दानपून घलो करथे। 


ये बात धलो सिरतोन आय चंदा हर सबो मनखे ल नई मिले। सकल सुरत सुभाव ल देख के मिलथे ।एक ठन चंदा दानपुन वाले घलो होथे।कोनो समाजिक, सामुहिक काम, कारज बर चंदा लागबे करथे ।चंदा मंगई धूलो अड़बड़ हिम्मत के काम आय। ये कोनो जंग (लड्ई) लड़े ले कम नोहे। चंदा मांगे बर बहुत बड़े करेजा चाही। जइसे माइनस डिगरी म देश के रक्षा करना ।चंदा देवईया मन घलो दुश्मन ले कम नी राहय । भले चंदा दस, बीस रुपया ल दीही फेर सुनाही अतिक ठाढ़े-ठाड़ सुखा जबे । अइसे लागथे दुबारा ओकर डेरोठी म गोड़ ती राखतेव ।अऊ मुख नी देखतेंव।अऊ अइसने मन डिमांड ल घलो बड़े बड़े नाचाकूदा के करथे।अऊ कहीं भणडारा होगे त अइसन मनके घर के चूल्हा ह उपवास घलो रहिथे।

चंदा के असली मजा ल राजनीतिक पारटी वाले मन उठाथे।मानो आरबीआई हर नोट छापे के ठेका इही मन दे देहे। चुनावी चंदा मतलब हरहा गोल्लर।जिनगी के संग जिनगी के बाद।सब चीज म छुट।ते हर कोनो ईनाम जीत जबे तेमे टैक्स,फेर ऐमन टैक्स फीरी रहिथे।इंखरो सोंचना ठीक हे। जनता ल सब फीरी दे सकथे त एकात ठन फीरी यहू मन ल मिलना चाही।हमन दस बीस चंदा बर तरसथन ऐमन ल करोड़ों मिल जथे।इही सकल सुरत के कमाल आय।विमल दाना दाना म केसर के सुवाद?


         कतनो मनखे मन के काम चंदा म चलथे। कतनो मनखे मन चंदा के पईसा ल पूड़ी ल चपका म चमकथे तईसे चपक ( दबा) दबा देथे। भले देवी देवता के राहय चाहे धारमिक काम कारज के।ददा लगे न भईया सबले बड़े रुपईया।

        कहां राजा भोज अऊ कहां गंगू तेली।एक झन बुधियार साहित्यकार हर सोसल मिडिया म लिखे राहय साहित्यिक कार्यक्रम बर चंदा ज़ोन ज़ोन मन देना चाहत हे नगद नही ते फोन पे कर सकत हे।ये हर उंखर बर गरिबी म आंटा गीला कस आय।चाहे गोष्ठी म जाय बर होय चाहे कराय बर। ये बुद्धिजीवी मन ल न थूंकत बने न लिलत। भले घर के सुवारी लईका मन झंझेट राहय।बिचारा मन बड़ दिलवाला रहिथे।मंच म स्वांत:सुखाय बोलेबर नी छोड़े।

     कहिथे जब -जब देश के राजनीति लड़खड़ाथे तब तब साहित्यकार ह उठाथे।फेर साहित्यकार -------------।

हाय मोर चंदा?

         

 *फकीर प्रसाद साहू* 

       *फक्कड़*

          सुरगी 🙏

छत्तीसगढ़ी म गद्य साहित्य (व्यंग्य) वीरेन्द्र सरल

 छत्तीसगढ़ी म गद्य साहित्य (व्यंग्य)

वीरेन्द्र सरल

 छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य ये विषय म चर्चा करे के पहली हमला व्यंग्य काय हरे? व्यंग्य काखर ऊपर अउ कइसे करे जाथे ?  व्यंग्य के उद्देश्य काय हरे ? येला बहुत गम्भीरता ले समझे के जरूरत हे । तब आवव सबले पहली व्यंग्य के स्वरूप ल समझे के कोशिश करथन।

 व्यंग्य के बड़े - बड़े विद्वान मन येला अपन - अपन ढंग ले परिभाषित करे हावे। व्यंग्य ल प्रतिरोध के स्वर माने जाथे। व्यंग्य हमेशा विपक्ष के भूमिका निभाथे। एक झन विद्वान ह व्यंग्य ल सार्थक हस्तक्षेप के लोकतांत्रिक अधिकार कहे हे। व्यंग्य सदैव आम आदमी के पीड़ा ल स्वर देथे। सत्ता चाहे राजनीतिक हो, धार्मिक हो, सामाजिक हो चाहे अउ आने प्रकार के हो यदि ओखर काम मानव या मानवता विरोधी होथे तब उही मेर ओला चेताय बर व्यंग्य के काम शुरू होथे। साहित्य ल समाज के दर्पण कहे जाथे। जब साहित्य के आने सबो विधा ह समाज के आघू म दर्पण असन खड़े हो के ओखर चित्र देखाथे तब व्यंग्य ह एक्सरे अउ सोनोग्राफी के मशीन असन समाज ल ओखर चरित्र देखाथे। कहे कि मतलब आय के व्यंग्य ह केवल बाहर - बाहर नहीं भितरौन्धी बात ल समाज के सामने लाय के काम करथे। व्यंग्य  समाज के वस्तुगत परिस्थिति म समाय अंतर्विरोध के अभिव्यक्ति आय। व्यंग्यकार अपन समय अउ समाज के सच्चाई के प्रति जागरूक रहिथे अउ वोहा कोंदा-भैरा असन ओला कलेचुप देखत नई रहय भलुक सच ल सच कहें के खतरा उठाथे। इही पाय के व्यंग्यकार ल गूंगी जनता के वकील कहे जाथे। व्यंग्य ह  साहित्य के सीमा म बंधाय नई हे बल्कि जिंहा तक मानव जीवन के प्रसार हे उँहा तक व्यंग्य के विस्तार हे।

 व्यंग्य ह समकालीन समाज अउ राजनीति के दर्पण होथे जउन ह समाज के विकृति अउ कमजोरी ल बताथे। व्यंग्य के काम केवल मनोरंजन नोहे वो हा चेतना ल झकझोर के मनखे ल सोचे - विचारे बर बाध्य करथे। व्यंग्यकार के काम कबीर के ये दोहा कि कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर, न काहूँ से दोस्ती न काहूँ से बैर।। असन होथे । वोहा तटस्थ भाव ले लोक मंगल के भावना रखत अपन बात कहिथे।

कभू - कभू हमन हास्य ल घलो व्यंग्य कहे के या माने के गलती कर देथन। जबकि दुनो एकदम अलगेच आय। कोन्हों घटना, क्रिया, परिस्थिति, लेख या विचार के दो मुंहापन, असमानता, आसमजस्य ल देख, सुन या महसूस करके मनखे के मन म जो आनन्द भाव उतपन्न होथे वोहा हास्य आय। हास्य के काम केवल मनोरंजन होथे जबकि व्यंग्य के काम पाखण्ड के पर्दाफाश करके सामाजिक जागरुकता अउ राजनीतिक चेतना लाना होथे। येला अउ अच्छा ये उदाहरण ले समझ सकथन कि  हास्य ह कोन्हों फिल्म के कॉमेडियन आय अउ व्यंग्य ह फ़िल्म के हीरो।

कोन्हों - कोन्हों मन आरोप लगाथे कि व्यंग्यकार मन हमेशा गलतीच ल देखथे बने - बने बात ल काबर नई देखे अउ लिखे? तब भैया डॉक्टर के काम ह बीमारी देखे के आय कि स्वास्थ्य देखे के? डॉक्टर चाहथे कि मनखे आज जतका स्वस्थ्य हे आने वाले समय म ओखर ले जादा चुस्त, दुरुस्त अउ तंदुरस्त रहय। डॉक्टर ह मरीज के शरीर के फोड़ा फुंसी के ऑपरेशन करे बर चाकू चलाथे तब ओखर मन में गुस्सा नहीं भलुक करुणा अउ दया के भाव होथे। ओखर उद्देश्य ह मरीज के पीरा ल बढ़ाना नहीं भलुक पीरा से मुक्ति दिलाना होथे बस वइसनेच काम व्यंग्य अउ व्यंग्यकार के होथे। वोहा अपन समकालीन समाज ल अउ बढ़िया स्वस्थ्य बनाना चाहथे। तिही पाय के सबो किसिम के कमजोरी ल देख के लिखत रहिथे। ये काम कबीर ल लेके आज तक चलत हे अउ जब तक समाज म विसंगति, विद्रूपता , शोषण अउ असमानता रही तब तक आघू घला चलते रही।

 ये तो बात होइस व्यंग्य काबर? अब बात व्यंग्य कइसे करे जाय। तो व्यंग्य अइसे हो कि गलती करने वाला अपन गलती ल समझ घला जाय अउ ओला दुख घला होय फेर वोहा व्यंग्यकार ल तै मोर ऊपर व्यंग्य करे कहिके कहि घला झन सकय। मतलब व्यंग्य व्यक्ति विशेष ऊपर नहीं बल्कि प्रवृति विशेष ऊपर होथे। मने कोन्हों आन मेर नजर अउ कोन्हों आन मेर निशाना । व्यंग्य ह करू होथे तब ओखर स्वाद ल बढ़ाय बर हास्य के तड़का लगाय बर लागथे। जइसे डॉक्टर मन करू दवाई ल मन्दरस म मिला के खाय बर कथे या सब्जी के सुवाद ल बढ़ाय बर सुवारी ह नून, तेल, मिर्चा के उपयोग करथे। कोन्हों साग कम अउ नून, तेल, मिर्चा मन जादा हो जहि तब तो साग के सुवादेच बिगड़ जहि। अइसने व्यंग्य ल सुस्वादु बनाए बर हास्य के उपयोग करे जाथे। कहूँ हास्य के मात्रा जादा होईस कि व्यंग्य के सुवाद ह बिगड़ीस।

ऊपर म लिखाय गोठ -बात के आधार म छतीसगढ़ी व्यंग्य के विकास  यात्रा ल समझे के कोशिश करे म हम पाबो कि छत्तीसगढ़ी व्यंग्य अभी अपन किशोरावस्था म हे । मने न पूरा परिपक्व होय हे  अउ न बिल्कुल नासमझ हे। 

 वइसे भी हिन्दी व्यंग्य के इतिहास ल घला विद्वान मन बीसवीं शताब्दी के सुरुआत ले ही मानथे। विद्वान मन के कहना हे कि पहली तो व्यंग्य ल विधा घला नई माने जावत रिहिस। हिंदी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी ह खुदे व्यंग्य ल विधा के बजाय स्प्रिट कहे हे जउन कविता, कहानी, नाटक, निबन्ध सबो म हो सकत हे। 

  जब हिंदी व्यंग्य के इतिहास ह लगभग सौ -डेढ़ सौ बरस के माने जावत हे तब छत्तीसगढ़ी व्यंग्य के इतिहास ल हम बहुत आसानी से  समझ सकत हन।

   हाँ लिखित सहित्य के बजाय हम वाचिक परम्परा के सहारा ले के कोन्हों इतिहास मानबो तब जरूर येहा जुन्ना हो सकत हे। वाचिक परम्परा के लोक कथा, लोकगीत, हाना-ठेही म जगह-जगह व्यंग्य के पुट देखे बर मिलथे। जइसे बिहाव के ये भड़ौनी गीत म देखव-

बड़े -बड़े तोला जानेन्व सगा, कुंआ म डारेंव बांस रे।

झाला-पाला लुगरा लाने जरय तुंहर नाक रे।

दार करे चाऊंर करे लगिन ल धराय रे।

बेटा के बिहाव करे बाजा ल डर्राय रे।

मेंछा हावय लाम लाम मुँहू हावय करिया रे।

समधी बपरा काय करय पहिरे हावय फरिया रे

 अइसने बानगी पंथी गीत म घलव देखव---

घट-घट म बसे हे सतनाम, खोजे ल हंसा कहाँ जाबे रे।

ये मूरख पापी चोला सुन ले गुरु के वाणी ल।

अन्तस् म सतनाम बसा ले झन हो तै अज्ञानी ग।

 या

अपन घट के देव ल मनईबो, मन्दिरवा म का करेल जईबो।

 अइसने व्यंग्य के बानगी  छत्तीसगढ़ी हाना अउ ठेही म गजब दिखथे--जइसे---

घर म नाग देव भिम्भोरा पूजे ल जाय। कोरा म लइका अउ गांव भर गोहार। जोग म साख नहीं भभूत म आँखी फोड़य। कुकुर ह गंगा जाही तब पतरी ल को चांटही। सहराय बहुरिया डोम घर जाय। नवा बइला के नवा सींग, चल रे बइला टिंगे टिंग। पइधे गाय कछारे जाय। खाय बर लरकु, कमाय बर टरकु। हाथ म घड़ी कान म सोन तेखर बुता ल करही कोन। नांगर के न बख्खर के दौरी बर बजरंगा। देखब म श्याम सुंदर पादे बर ढमक्का। ये तो छत्तीसगढ़ी के वाचिक परम्परा म समाय व्यंग्य के बात होइस फेर चर्चा के मूल बात तो छत्तीसगढ़ी के व्यंग्य आय। एखर लिखित रूप के गोठबात बिन तो ये लेख अधूरा हो जही। तब आवव मिले जानकारी के आधार म ये विषय ऊपर चर्चा करन। 

  सन 1950 म रचित अउ 1955 म प्रकाशित कपिल नाथ मिश्र जी के खुसरा चिरई के बिहाव नाव के कृति ल अभी- अभी छत्तीसगढ़ी के प्रथम व्यंग्य होय के रूप प्रचारित - प्रसारित करे जावत हे फेर  अकलतरा डॉट कॉम म येला पढ़े के बाद येहा मोला हास्य रचना के रूप म लागिस जउन ह कविता संग्रह आय। दूसर बात येला पढ़े म विशुद्ध छत्तीसगढ़ी असन नई लागे बल्कि हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के मिंझरा रूप असन लागिस हे। अइसनेच किसिम के रामेश्वर वैष्णव जी के काव्य संग्रह नोनी बेन्द्री अउ  उधोराम झकमार जी के कविता संग्रह ररूहा सपनाय दार -भात घला रिहिस। झकमार जी के किताब ला प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति ह प्रकाशित कराय रिहिस। यदि छत्तीसगढ़ी कविता म व्यंग्य के बात करन तब एला वैश्विक प्रसिद्धि देवाय म सबले बड़े योगदान छत्तीसगढ़ राज भाषा आयोग के पूर्व सचिव अउ अंतराष्टीय कवि पद्मश्री डॉ सुरेन्द्र दुबे जी के योगदान सबले बड़का अउ अविस्मरणीय हे।

   ये सत्र ह छत्तीसगढ़ी म गद्य व्यंग्य ऊपर केंद्रित हे तब गद्य रूप के चर्चा करना ही ज्यादा महत्वपूर्ण हे।

 मिले जानकारी के मुताबिक सन 1970 म दैनिक युगधर्म रायपुर में स्व हेमनाथ यदु द्वारा छत्तीसगढ़ी कालम लिखे के शुरुआत होइस। फेर छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करे म सबले ज्यादा काम रामेश्वर वैष्णव जी के दिखथे। बागबाहरा ले दिलीप सोनी जी के द्वारा संपादित पत्रिका बांगो टाइम्स म ओमन 1976 ले 77 तक  आँखी मूंद के देख ले कालम लिखिन। छत्तीसगढ़ी झलक म 1978 ले 80 तक दार-भात चटनी नाम के कालम लिखिन। छत्तीसगढ़ी सेवक म 1980 ले 86 तक गुरतुर - चुरपुर कालम लिखिन। 1986 ले 1993 तक अउ 2010 ले 2013 तक लगभग दस साल ले दैनिक नवभारत म उत्ता-धुर्रा कालम लिखिन अउ 1998 ले 2000 तक दैनिक भास्कर म उबुक-चुबुक नाव ले कालम लिखिन जउन ह अभी 2024 म पुस्तक रूप म प्रकाशित होय हे। दैनिक देशबन्धु म परमानन्द वर्मा के बेरा - बेरा के बात अइसने किसम के नव भास्कर म लक्ष्मण मस्तूरिहा जी ह घला माटी कहे कुम्हार से, दैनिक स्वदेश म जी एस राम पल्लीवार ह रईचुली ,   सुशील भोले के आखर अंजोर अउ किस्सा कलयुगी हनुमान के , रामेश्वर शर्मा के जाती - बिराती,  आनन्दी सहाय शुक्ल के कांव -कांव , दैनिक नवभारत बिलासपुर म  डॉ पालेश्वर शर्मा के गुड़ी के गोठ, दैनिक नवभारत म 2003 म  सुशील यदु  ह लोकरंग नाम के कालम लिखिन। व्यंग्य के रंग किताब के माध्यम ले जानकारी मिलिस कि सुधा वर्मा जी ह एक लेख के माध्यम ले बताय हावे कि 1962 म घला कालम लेखन होवत रिहिस  जेखर नाम बेरा - बेरा के बात रिहिस अउ ओला पहिली  टिकेंद्र टिकरहा जी लिखत रिहिन बाद म उही ल भूपेन्द्र टिकरहा जी मन लिखिन। बाद म परमानंद वर्मा जी द्वारा लिखित कालम  डहरचला घला रोज छपत रिहिस। हरनारायण शर्मा जी ह बहेरा के भूत अउ दुर्गा प्रसाद पारकर जी ह रौद्र मुखी स्वर म 1992 ले 94 तक आनी-बानी के गोठ अउ दैनिक भास्कर म चिन्हारी नाव ले कालम लिखिन। पहट म भैया गुलाल वर्मा जी के कालम का कहिबे लगातार छपत रिहिस आजकाल शायद येहा दिखत नई हे। एखर छोड़ भी बहुत अकन कालम लिखे गे होही जेखर जानबा मोला नई हो पाय हे । ये कालम मन म यद्यपि हास्य अउ व्यंग्य के बहुत पुट जरूर होही फेर येला व्यंग्य माने म विद्वान लेखक मन के अलग अलग मत हे अउ ये कालम मन के लेख वाजिब म व्यंग्य के  शर्त ल पूरा करथे या निमगा निबन्ध आय ये तो समकालीन विद्वान लेखक मन जादा अच्छा बता सकथे।

 अभी तक छत्तीसगढ़ी व्यंग्य के प्रकाशित किताब के रूप म जयप्रकाश मानस जी के कलादास के कलाकारी, स्व राजेन्द्र सोनी जी के खोरबाहरा तोला गांधी बनाबो, कृष्ण कुमार चौबे जी के लंदफंदिया अउ गम्मतिहा,  सुशील यदु जी के घोलघोला बिना मंगलू नई नाचय, विट्ठल राम साहू के नीम चघे करेला, द्वारिका प्रसाद वैष्णव जी के ठोंक रेट म चिल्हर ज्ञान अउ बनगे तोर बिगड़गे,  धर्मेन्द्र निर्मल जी के तुंहर जंउहर होवय,  दुर्गा प्रसाद पारकर जी के राजा के विकासयात्रा,  कांशीपुरी कुंदन जी के बेईमान के मुड़ी म पागा अउ गदहा माल उड़ावत हे, महेंद्र बघेल मधु जी के झन्नाटा तुंहर द्वार , राजकुमार चौधरी रौना जी के का के बधाई, विजय मिश्रा अमित के कल्लू कुकुर के पावर, गुलाल वर्मा के का कहिबे नाव ले किताब प्रकाशित होय के अउ बन्धु राजेश्वर खरे जी के गाय के परमोशन नाव के प्रकाशनाधीन होय के जानकारी मिले हे।

 छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद सबो कोती विकास के गंगा बोहावत हे तब साहित्य अउ विशेषकर छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखन कइसे पाछु रही? यहु म गति आय हे। इंहा लिखैय्या मन अब व्यंग्य के मरम अउ धरम ल समझ के व्यंग्य लेखन करत हे। तभो ले हास्य व्यंग्य के कवि मन के तुलना म गद्य व्यंग्य लेखन करने वाला लेखक कमेच हावे। हरिशंकर देवांगन, संजीव तिवारी, कुबेर साहू,  रीझे यादव , ललित नागेश, हीरालाल गुरुजी , ललित जख्मी,  महेंद्र बघेल मधु, राजकुमार चौधरी, धर्मेंद्र निर्मल, चोवा राम वर्मा बादल, विवेक तिवारी  जइसे सरलग व्यंग्य लिखैय्या के संगे-संग छिट-पुट व्यंग्य लेखन करैया लेखक मन में दीनदयाल साहू , अरुण निगम, दिनेश चौहान,  दादुलाल जोशी असन अउ व्यंग्य के कतको लेखक मन ह  लेखन करके ये विधा ल समृद्ध करत हे। आप मन चाहो तो ये क्रम म मोरो नाव ( वीरेन्द्र सरल ) ल रख सकत हव। छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करे म दैनिक हरिभूमि के चौपाल, देशबन्धु के मड़ई, पत्रिका के पहट  प्रखर समाचार के सप्तरंग, अमृत सन्देश के अपन डेरा संगे संग लोकाक्षर व्हाट्सएप समूह अउ गुरतुरगोठ डॉट कॉम के बहुत महत्वपूर्ण योगदान हे। हिन्दी व्यंग्य म घला बने पोट्ठ आलोचना के किताब  ह घला अंगरी म गिने के लइक हे अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ी व्यंग्य आलोचना के किताब संजीव तिवारी जी द्वारा लिखित व्यंग्य के रंग बहुतेच महत्वपूर्ण हे। बहुत झन लेखक मन छत्तीसगढ़ी सरलग तो नहीं फेर कभु - कभू व्यंग्य लिख के छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करत हे। आजकल सोशल मीडिया म सुशील भोले जी के कोंदा - भैरा के गोठ के गजब चर्चा हे।  मैं अपन मति अउ उपलब्ध जानकारी के आधार म ये लेख ल लिखे के कोशिश करे हंव। सम्भव हे बहुत झन लेखक अउ उंखर व्यंग्य किताब के नाव ये लेख म छुटगे होही। येला मोर अज्ञानता समझ के मोला माफी देहु।

 वीरेन्द्र सरल

ग्राम -बोड़रा 

पोष्ट -भोथीडीह

व्हाया-मगरलोड

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

पिन 493662

मो -7828243377

कलजुग केवल -------।"

 "कलजुग केवल -------।"

      लेड़गा पूछथे कलजुग केवल नाम अधारा।ऐकर काय मतलब होथे भईया।मे केहेंव रमायनिक मन बताथे रे लेड़गा पहिली परमात्मा ल पाय बर बड़ तपझप करे ल पड़े।तब कहूं ले देके प्रभु के दरसन होय। गंगा ल लाय बर भगीरथ के तीन पुरखा निकल गे तब ले देके गंगा हर धरती म आईस।फेर कलजुग ऐसन जुग आय जेमा सिरिफ भगवान के नाम ले ले से परमात्मा के दरसन हो सकत हे।या ये मानुष जनम ले मोक्ष मिल सकत हे।वहू म कहिथे एक घड़ी या दो घड़ी। कोनो जरूरी नइ हे माला धरके घंटों जपत रहा जब समे मिले जतना समे मिले परमात्मा के नाम लेना चाहि।लेड़गा कथे हव भईया तेखरे सेती सब अस्पताल, स्कूल,लेब मनके नाम देवी देवता के नाम म रखे रथे।

नही रे लेड़गा कलजुग के दूसर पक्ष (   )घलो हे।धरम अउ अधरम।अधरम के गोड़ हांथ नी राहय।वो हर धरम के गोड़ हांथ के भरोसा म रहिथे।जईसे रावण ल देख ले कतिक ज्ञानी, बलवान रिहिस तभो ले माता सीता के हरन करे बर साधू के भेष बनाय ल पड़गे ।जेन रावण हर कैलाश पर्वत ल हिलाय के दम रखे तेन हर का माता सीता ल अइसने नी ले जा सकतीस?

           वइसने कलजुग म जतना अधरम के काम हे धरम के नाम म होथे।जइसे अस्पताल, स्कूल के नाम ल देख ले, श्री राम,सांई, तुलसी, रामकृष्ण, गंगा, गायत्री, कृष्णा। भले कोनो मरे मनखे के लाश ल बिना पईसा के छुवन नी दिही।चाहे खेत खार बिक जाय।  दरियादिल।ददा लगे न भईया सबले बड़े रुपईया। वइसने स्कूल मन धंधा बनगेहे।जिहां ज्ञान बांटे नही बिकथे। ऐला लक्ष्मी के मंदिर घलो कही सकथन।लेड़गा कथे तोर कहे के मतलब हे भईया विद्या ददाति धनम।

         लेड़गा पूछथे ऐसने पूजनीय,दरसनीय जगा म घलो होवत होही न भईया?मे केहेव हव जी लेड़गा बड़े बड़े मंदिर मन में दरसन करे बर वीआईपी गेट, आनलाईन, आफलाईन,इही तो खेल आय। मंदिर म परसाद बेचना भभूती बेचना।अइसने राजनीति के भव सागर पार करे बर घलो धरम के डोंगा के जरुरत  होथे।

 हां कलजुग के एक ठन गुन खास हे चाहे धरमी राहय चाहे अधरमी अगरबत्ती जलाय बर नी छोंड़े।जईसे अंताक्षरी शुरू करे बर कहिथन शुरू करो अंताक्षरी लेके प्रभु का नाम।

           फकीर प्रसाद साहू 

               फक्कड़ 

                सुरगी