Monday, 28 September 2020

छत्तीसगढ़ी अउ आत्मकथा

 छत्तीसगढ़ी अउ आत्मकथा 

      राजा रानी , गरीब बाम्हन , चिरई चुरगुन अउ बहुत अकन कथा कहत , सुनत , पढ़त , लिखत रहिथन फेर अपन कहानी अपन जुबानी कहना लिखना जब होथे त ओला आत्म कथा  कहिथें । गद्य साहित्य के नवा विधा आय , त मोर नज़र मं अभी तक  छत्तीसगढ़ी मं कोकरो आत्मकथा नई आए हे , गुनी मानी मन  सही बात बताये सकहीं । 

    डॉ . हरिवंश राय बच्चन के अनुसार " आत्मकथा लेखन की वह विधा है जिसमें लेखक ईमानदारी के साथ आत्म निरीक्षण करता हुआ अपने देश काल परिवेश से सामंजस्य अथवा संघर्ष के द्वारा अपने को विकसित और स्थापित करता है । " 

    इंकर लिखे आत्मकथा क्या भूलूं क्या याद करूं , नीड़ का निर्माण फिर , बसेरे से दूर अउ दशद्वार से सोपान तक ल पढ़ के जाने बर मिलथे के आत्मकथा सिर्फ अपन जीवन के कहानी नोहय बल्कि जेन समाज मं जेन परिस्थिति मं रहिथे ओ सब के लेखा जोखा घलाय आय । 

   ओशो कहिथें आत्मकथा " मैं " के विस्तार आय । 

आत्मकथा दू तरह के पाये जाथे पहिली जेमा लेखक स्वकेन्द्रित होथे ,अपने बारे मं लिखथे त अइसन लेखन हर अपने च बड़ाई करत दीखते एकर से साहित्य या समाज या पाठक ल कोनो प्रेरणा नई मिलय ...। बकलम खुद लेखक मोहन राकेश अउ रसीदी टिकट लेखिका अमृता प्रीतम के आत्मकथा पढ़ के पाठक जानथे के अपन कमी , कमजोरी ल बिना लाग लपेट के लिखना घलाय हर आत्मकथा के एक रूप आय जेहर बहुत कठिन होथे । 

  दूसर तरह के आत्मकथा होथे जेमा लेखक अपन कथा जनम , लइकाई  , पढ़ाई असन घटना जेन हर आदमी के जीवन मं घटथे ओकर उपर जादा ध्यान न दे के ओ समय के सामाजिक , राजनैतिक , धार्मिक स्थिति के वर्णन उपर जादा ध्यान देते , अइसन आत्मकथा हर साहित्य के भंडार भरथे , पाठक बर रोचक उपयोगी जानकारी देवइया होथे । महात्मा गांधी के आत्मकथा " सत्य के प्रयोग " अउ पंडित जवाहर लाल नेहरू के " मेरी कहानी " उत्तम आत्मकथा माने जाथे । 

आत्मकथा के तत्व होथें वर्णन के विषय वस्तु , देशकाल , चरित्र चित्रण , उद्देश्य , भाषा शैली । 

सहज रूप मं कहिन त स्वकेन्द्रित होते हुए भी अपन मुंह अपन बड़ाई से बंचते हुये , नितांत व्यक्तिगत मानवीय भावना के भी  तटस्थ वर्णन  , खुद के प्रति ईमानदार रहते हुए ओ समय के सामाजिक  , राजनैतिक , धार्मिक , शैक्षिक  साहित्यिक संगति - विसंगति के निष्पक्ष चर्चा । 

नांव भले आत्मकथा हे फेर जीवन मं शामिल मनसे- तनसे , घटना - दुर्घटना , लाभ - हानि , जस - अपजस के सोला आना सही सही वर्णन , विश्लेषण हर आत्मकथा के मोल बढ़ा देथे । 

  आत्मकथा लिखना बहुत कठिन होथे काबर के मनसे अपन मन के अंधियारी कोठरी मं खुदे जाए बर तियार नई होवय त पाठक ल कइसे जाए दिही ? 

  सरला शर्मा

आत्मकथा--विमर्श*


*आत्मकथा--विमर्श*


 जेन ह सबके हित करय ओला साहित्य कहे गे हे। साहित्य म खुद के (लेखक के) अउ आन के (पाठक के) हित समाये  रहिथे।

   लेखक के हित के मतलब ओला मिलने वाला आत्मिक सुख अउ कभू-कभू कुछ धन के संग मिलने वाला मान सम्मान ले हे।साहित्य ले लेखक ल स्वयं आत्म दर्शन करे के अवसर मिलथे। ये ह साहित्य के महिमा आय कि एक फकीर ल समाज में वो मान- सम्मान मिल जाथे जेन कोनो राजा, महाराजा अउ धनकुबेर  ल नइ मिल सकय। असली मान सम्मान ल भला कोन पइसा म खरीद सकथे?

    साहित्य ह पाठक के तको हित करथे। जब  कोनो सहृदय पाठक साहित्य के रसपान करथे त वोला  अलौकिक आनंद के अनुभव होथे। नवाँ-नवाँ, सुंदर-सुंदर, शुभ-शुभ विचार वोकर मन भीतर जनम लेथे। वोकर जिनगी म कहूँ कमी-बेसी हे त सुधार करे के प्रेरणा मिलथे। कतको साहित्य पाठक के हिरदे म घपटे धुंध ला हटाके निर्मल कर देथे।   ये साहित्य के कई रूप हे जेमा *आत्मकथा* ह  तको एक ठन आय।


*आत्मकथा काला कहे जाथे* ----

ये सृष्टि म दूये कथा हो सकथे--- एक तो *आत्मकथा*( खुद के कथा) अउ दूसर  *पर के(आन के) कथा* ।

  जब कोनो मनखे ह  अपन जीवन कहानी ल जेमा घर-परिवार, जिनगी म पाये सुख-दुख, मान -अपमान, सफलता -असफलता ,  संघर्ष ल समाजिक भलाई के भावना ले बताथे या लिखथे त उही ह *आत्मकथा* कहलाथे। 

  कुल मिलाके जब मनखे ह समाजिक भलाई के इच्छा ले अपन जीवन के खट्टा-मीठा अनुभव ल बताथे या लिखथे त वोला आत्मकथा कहे जाथे।


*आत्मकथा के रूप*  -- मोटी-मोटा आत्मकथा के *दू रूप*  होथे।

 *1कमजोर आत्मकथा* कमजोर आत्मकथा वोला कहि सकथन जेमा - आत्म कथाकार ह अपन गुण या उपलब्धि मन के बढ़-चढ़कर के वर्णन करे हे।अपन अवगुण ल घलो कुतर्क के मुखौटा पहिनाके सुंदर देखाये हे। पीतल म सोन के पालिश चढ़ाके चोबीस कैरेट के सोन ठहराये हे।

  अइसन *आत्मश्लाघा* वाले आत्मकथा पाठक के आनंद म बाधा बन जथे। अइसन आत्मकथा *व्यक्ति निष्ठ* हो जथे।मतलब लेखक के सत्य ह (व्यक्त विचार ह) ,संसार के सत्य ले मेल नइ करय।

   कुछ आत्म कथाकार मन अपन कमजोरी ल नइ बताके जान-बूझके, तोप के, गुणे के वर्णन कर देथें।उहू का काम के ? संसार म कोनो बिन अवगुण के नइ हो सकय। चंदा म तको दाग हे। 

      कोनो आत्म कथाकार ह अगर  सहानुभूति बटोरे बर अपन असफलता, संघर्ष अउ बुराई ल आत्मकथा म भर डरे हे त उहू *कमजोर आत्मकथा* हो जथे।


*2 सजोर आत्मकथा*--- 

 जेन आत्मकथा म *संतुलित रूप म सफलता-असफलता, संघर्ष संग आन ले पाये सहयोग आदि के निर्भिक अउ निरपेक्ष भाव ले(नीर-क्षीर विवेक ले)  वर्णन होथे तेला सजोर आत्मकथा कहे जाथे।* 

 मोर हिसाब ले ककरो *आत्मा के कथा* ह सजोर आत्मकथा बनथे काबर के आत्मा ह कभू झूठ-लबारी नइ मारय। वोकरे अनुभव ह असली अनुभव होथे ।

      अइसन आत्मकथा ह *वस्तुनिष्ठ होथे*। मतलब संसार के अन्य मनखे मन के अनुभव ले ,अटल सत्य ले मेल खाथे। 

*आत्मकथा के प्रकार*--


विद्वान मन आत्मकथा के  तीन मुख्य प्रकार बताथें--

1राजनैतिक आत्मकथा

2धार्मिक आत्मकथा

3 साहित्यिक आत्मकथा


*आत्मकथा के इतिहास*--

 जइसेअन्य साहित्यिक विधा मन पहिली वाचिक रूप म रहिन हें ओइसने आत्मकथा ह तको वाचिक रूप म आइस होगी ।

  जेन दिन कोनो पुरखा ह पहिली बार ये काहत कि मोर चूँदी ह फोकट घाम न नइ पाके ये जी या महूँ ह घाट- घाट के पानी पिये हँव कहिके या नाती नतुरा मन ल अपने जिनगी के किस्सा बनाके, अपन अनुभव ल सुनाइस होही उही ह पहिली आत्मकथा आय।

लिखित रूप में आत्मकथा ह जादा पुराना नोहय।  येला हमर देश के अनुसार हम दू ढंग ले समझ सकथन।

*संस्कृत साहित्य म आत्मकथा*---

आत्मकथा के आधुनिक परिभाषा के अनुसार संस्कृत साहित्य म आत्मकथा नइये फेर शुरुआती चिनहा जरूर हे।

 *6वीं सदी के महाकवि भट्टि के भट्टिकाव्य(रावण बध) म*।

*7वीं सदी के महाकवि बाणभटृ ह अपन महाकाव्य हर्ष चरितम अउ कादम्बरी म अपन बचपन,देशाटन अउ शिक्षा के बारे म थोर-बहुत लिखे हे।*

*7वीं सदी के संस्कृत कवि माघ ह अपन कृति शिशुपाल बध म अपन कुल के परिचय लिखे हे।*


*8वीं सदी के महाकवि भवभूति ह अपन रचना महावीर चरित के प्रस्तावना म अपन परिचय लिखे हे--दादा के नाम- भट्ट गोपाल,पिता-नीलकंठ, माता-जातुकर्णी।*

*12सदी के कवि श्रीहर्ष ह अपन कृति नैषध चरित के सबो सर्ग के अंत म अपन नाम श्रीहर्ष ,पिता के नाम-श्री हरि, माता के नाम-भामल्ल देवी लिखे हे।*

कुल मिला के संस्कृत साहित्य म आत्मकथा ह अइसने छुटपुट बीज रूप म हाबय।

*हिंदी साहित्य म आत्मकथा*-----

हिंदी साहित्य म आत्मकथा बहुतायत ले पाये जाथे।


*हिंदी के प्रथम आत्मकथा श्री बनारसी दास जैन के सन् 1641 म लिखे 'अर्द्धकथा' जेन ल 'संकाय कथानक ' तको कहे जाथे हर आय। ये ह पद्य रूप म हे*।

 वोकर बाद के आत्मकथा मन ल चार युग-

*1पूर्व भारतेंदु युग अउ भारतेंदु युग।*

*2 द्विवेदी युग।*

*3 छायावादी युग।*

*4 छायावादोत्तर युग।(आधुनिक युग)*

      म बाँट के अध्ययन करे जा सकथे।


*छत्तीसगढ़ी भाषा म आत्मकथा*---

हम अभी तक पढ़े नइ अन।हो सकथे मोला मालूम नइ होही।

फेर हाँ, छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्व श्री अजीत जोगी जी ह कोरोना काल म अपन आत्मकथा *सपनों का सौदागर* लिखत रहिन।वोकर प्रकाशन के अगोरा हे।

🙏🙏🙏🙏


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी अउ आत्मकथा*

 *छत्तीसगढ़ी अउ आत्मकथा*

        साहित्य चाहे कोनो भी भाषा के होय, गद्य साहित्य के सूची थोरिक लम्बा हो जथे। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी मन शुरुआती गद्य रहिन। निबंध लिखे गिस। निबंध के विषय अउ लेखन शैली ले अउ कतको विधा मन ल स्वतंत्र विधा के रूप म पहचान मिलिन।अउ स्थापित घलो होइस।जेमा संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, डायरी, ललित निबंध, जीवनी, आत्मकथा, पत्र लेखन प्रमुख हें। साहित्य म जीवनी लेखन अउ आत्मकथा लेखन दूनो म प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व के चरित्र वर्णन रहिथे। अइसे बताय के  । डायरी म दैनिक जीवन के खास बात रोज लिखे जाथे। आत्मकथा म अपन पूरा जीवन के महत्वपूर्ण घटना मन ल ईमानदारी के संग लिखे जाथे। 

         मनखे दुख पीरा म रहे ले अपन हितवा मितवा मन ले अपन रामकहानी कहिथे। कहे जाथे दुख बाँटे ले मन हल्का होथे। सुख बाढ़थे त दुख घटथे। शारीरिक अउ मानसिक दुख  खाय पीए के चीज बरोबर बँटै तो नइ फेर मन हरू जरूर हो जथे। फेर कतको झन के मानना हे, अपन दुख ल बता जना के दूसर ल का दुखी करना। कतको मन सुने बर तियार नइ होय, कहे लगथे तोर राम कहानी ल राहन दे। बड़े बुजुर्ग अउ सुजानिक मन के कहना हे, अपन राम कहानी अउ कोनो ल जतका गारी गुफ्तार करना हे तउन ल कागज म लिख डारव, मन के पूरा भड़ास निकाल लव। जब मन शांत हो जही त कागज ल चीर दौ नइ त लेस दौ। एकर ले काकरो ले संबंध नइ बिगड़ै। जीवन के सँझौती के  बात सुने बिहनिया अउ मँझनिया तिर समय नइ राहय। जीवन नदिया कस ए। बहत हे त अस्तित्व हे। सुक्खा नदिया देखे कोनो नइ जाय। पूरा आय नदिया ल देखे कतको आथे। उतरती नदिया देखे नइ जाय। सुर ताल के रहिते जीवन हे। थमे लगिस त पुछारी नइ होय। थमिस त जै राम जी की। इही तरह जीवन के सँझौती म कतको अपन मन के बात ल सुरता करथे। छोटे बड़े सबो घटना बेरा बेरा म आँखीं म झूले लगथे। कतको मन लिखे के उदीम करथे अउ लिखथे घलो। कतको मन स्वांतःसुखाय लिखथे। कतको समय अउ सोच दूनो के कमी ले  नइ लिखैं। कतको मन जीवन के उतार चढ़ाव ल पूरा ईमानदारी के संग लिखे के उदीम करथे। इही तरह ले आत्मकथा चलन म आय होही। मोर मन म विचार आथे। आत्मकथा शब्द ऊपर विचार करे म यहू लगथे कि आत्म अउ कथा दूनो मिले ले आत्मकथा बने हे। आत्म याने खुद अउ कथा याने कहना या कथन। अपन स्वयं के बारे म कहना ही आत्मकथा ए। इहाँ कहना या कथन विस्तार ले हुए हे। व्यापकता समोए। खुद के जीवन के जम्मो उतार चढ़ाव ले भरे समय के बारे म लिखना ही आत्मकथा ए। आत्मकथा के लेखक एक तरह ले हीरो होथे। खुदे अपने बारे म लिखना आत्मकथा ए, त विश्वसनीयता अउ वास्तविकता के प्रश्न खड़ा जरूर होथे। पूरा ईमानदारी के साथ लिखना रहिथे। ए ला लिखे म कल्पना बर कोनो जगह नइ राहै। अपन अच्छाई के सं बुराई ल भी लिखना पड़थे। एक तरह ले आत्मकथा खुद के विश्लेषण करना घलो आय। 

      आत्मकथा के बारे म

*डॉ. श्याम सुंदर घोष जी* मन कहे हे *"आत्मकथा समय प्रवाह के बीच तैरने वाले व्यक्ति की कहानी है। इसमें जहाँ व्यक्ति के जीवन का जौहर प्रकट होता है, वहाँ समय की प्रवृत्तियाँ और विकृतियाँ भी स्पष्ट होती है।इन दोनों घात प्रतिघात से ही आत्मकथा में सौंदर्य और रोचकता का समावेश होता है। "*

       आज साहित्य जगत ह पाठक के कमी ले जूझत हे। एकर कारण पाठक के संगेसंग साहित्यकार भी हो सकत हे। अभी ए ऊपर चर्चा करे बेरा नइ हे। पाठक आज उही आत्मकथा पढ़ना चाही जेकर लेखक के बारे म ओ पहिली ले जानथें। जीवनी अउ आत्मकथा दो अइसे विधा ए, जेला पाठक संबंधित ले पहिली परिचित होय म ही पढ़े के सोचथे। ए दूनो विधा म सफल सामाजिक कार्यकर्ता, राजनेता, अभिनेता, साहित्यकार, खिलाड़ी, उद्योगपति जइसे चर्चित व्यक्तित्व के जीवन वृत्त प्रकाशित होथे। कतको चर्चित व्यक्तित्व मन खुदे लिखे म सक्षम नइ रहे ले लिखवा लेथे, तब जीवनी कहाथे। जीवनी लेखक एक कलम के धनी होथें। उहें आत्मकथा के लेखक कलम के धनी होना जरूरी नइ राहै। वो अपन कर्मक्षेत्र म सफल रहिथे। भाषा शैली आत्मकथ्यात्मक ही रहिथे। भाषा सहज सरल अउ बोधगम्य होना चाही। 

       एक आत्मकथा  देश दुनिया अउ समाज बर उपयोगी होथे। देश दुनिया अउ समाज ल प्रेरणा देथे। नवा दिशा देथे। नवा विचार देथे। एक ऊँचाई प्रदान करथे। भीड़ म एक अलग पहचान देथे।

       आजकल देखे सुने मिलथे कि कई झन मन अपन आत्मकथा ले विवाद म आ जथे। चर्चित होय अउ बिक्री के चक्कर म भी अइसन  लिख जाथे, जेकर खंडन ओकर समकालीन व्यक्ति अउ सहयोगी ले करे जाथे। ए तब होथे जब लिखे गे बात सच्चाई ले कोस भर दूरिहा रहिथे। वास्तविकता ले कोनो संबंध नइ रहै। अपन चरित्र ल उज्जर बताय अउ कोनो आन ल अपन ले कम बताय के फेर म घला अइसन होथे। आत्मकथा लेखन बर ईमानदारी अउ वास्तविकता दो मूल जरूरी तत्व हे। एकर बिना आत्मकथा बेमानी हो जथे। आत्मकथा म लिखे विषय अइसे होना चाही कि विवाद ल जन्म झन दै। विवादित विषय लिखे जाना जरूरी हे तब पूरा साक्ष्य के साथ होना चाही। नइ तो आप के समकालीन ओकर खंडन कर सकथे।अउ आपके लेखन के मोह ले आपके बने छवि म दाग लग सकत हे।

      छत्तीसगढ़ी साहित्य म आत्मकथा के दिशा अउ दशा का हे, जानकारी के अभाव म कुछु कहना मुश्किल हे। ए विषय म ए लेखन केवल गद्य लेखन म आत्मकथा लिखे बर एक रस्ता अउ प्लाट तियार करना भर आय।


पोखन लाल जायसवाल

पलारी

जनकवि दलित जी ला पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि




 जनकवि दलित जी ला पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि 


अत्याचार करइया मन ला खूब ललकारय दलित जी हा 


जब हमर देश हा अंग्रेज मन के गुलाम रिहिस ।वो समय हमर साहित्यकार मन हा लोगन मन मा जन जागृति फैलाय के गजब उदिम करय ।  हमर छत्तीसगढ़ मा हिन्दी साहित्यकार के संगे संग छत्तीसगढ़ी भाखा के साहित्यकार मन घलो अंग्रेज सरकार के अत्याचार ला अपन कलम मा पिरो के समाज ला रद्दा देखाय के काम करिस ।छत्तीसगढ़ी के अइसने साहित्यकार मन मा स्व. लोचन प्रसाद पांडेय, पं. सुन्दर लाल शर्मा, पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, स्व. कुंजबिबारी चौबे ,प्यारे लाल गुप्त, अउ स्व. कोदूराम दलित के नाम अब्बड़ सम्मान के साथ लेय जाथे ।येमा विप्र जी अउ दलित जी  हा मंचीय कवि के रुप मा घलो गजब नाव कमाइस। छत्तीसगढ़ी मा सैकड़ो कुंडलिया लिखे के कारण वोला छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय कहे जाथे ।


जन कवि कोदू राम दलित के जनम बालोद जिले अर्जुन्दा ले लगे गांव टिकरी मा एक साधारण किसान परिवार मा होय रिहिस ।पढ़ाई पूरा करे के बाद दलित जी हा प्राथमिक शाला दुर्ग मा गुरुजी बनिस । बचपन ले वोकर रुचि साहित्य डहर रिहिस हवय ।वोहा अपन परिचय ला सुघर ढंग ले अइसन देहे -


लइका पढ़ई के सुघर, करत हवंव मैं काम ।

कोदूराम दलित हवय मोर गंवइहा नाम ।।

मोर गंवइहा नाम, भुलाहू झन गा भइया ।

जनहित खातिर गढ़े हवंव मैं ये कुंडलियां ।।

शउक महूँ ला घलो हवय, कविता गढ़ई के ।

करथव काम दुरुग मा मैं लइका पढ़ई के ।।

        दलित जी सिरतोन मा हास्य 

व्यंग्य के जमगरहा कवि रिहिस हे । शोषण करइया मन के बखिया उधेड़ के रख देय ।दिखावा अउ अत्याचार करइया मन ला वोहा नीचे लिखाय कविता के माध्यम ले कइस अब्बड़ ललकारथे वोला देखव - 


   ढोंगी मन माला जपयँ, लमभा तिलक लगायँ 

हरिजन ला छूवय नहीं, चिंगरी मछरी खाय ।।

खटला खोजो मोर बर, ददा बबा सब जाव ।

खेखरी साहीं नहीं, बघनिन साहीं लाव ।।

बघनिन साहीं लाव, बिहाव मैं तब्भे करिहों ।

नई ते जोगी बनके तन मा राख चुपरिहौं ।।

जे गुण्डा के मुँह मा चप्पल मारै फट ला ।

खोजो ददा बबा तुम जा के अइसन खटला ।।


   ये कविता के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ के नारी मन के स्वभिमान ला सुग्घर ढंग ले बताय गेहे । संगे संग छत्तीसगढ़िया मन ला साव चेत करिस कि एकदम सिधवा बने ले घलो काम नइ चलय ।अत्याचार करइया मन बर डोमी सांप कस फुफकारे ला घलो पड़थे ।

 दलित जी के कविता मा गांव डहर के रहन सहन अउ खान पान के गजब सुग्घर बखान देखे ला मिलथे -


भाजी टोरे बर खेतखार औ बियारा जाये ,

नान नान टूरा टूरी मन धर धर के ।

केनी, मुसकेनी, गंडरु, चरोटा, पथरिया, 

मंछरिया भाजी लाय ओली ओली भर के । ।

मछरी मारे ला जायं ढीमर केंवटीन मन, 

तरिया औ नदिया मा फांदा धर धर के ।

खोखसी, पढ़ीना, टेंगना, कोतरी, बाम्बी, धरे ,

ढूंटी मा भरत जायं साफ कर कर के । ।


   दलित जी हा 28 सितंबर 1967 मा अपन नश्वर शरीर ला छोड़ के स्वर्गवासी होगे ।अइसन जन कवि ला आज  53 वीं पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन हे. विनम्र श्रद्धांजलि. 


दलित जी के सुपुत्र आदरणीय गुरुदेव अरुण कुमार निगम जी हा अपन पिता जी के मार्ग ला सुग्घर ढंग ले अपना के साहित्य सेवा करत हवय । संगे संग" छंद के छंद "जइसे साहित्यिक आंदोलन के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ के नवा पीढ़ी के साहित्यकार मन ला 

छंद सिखा के सुग्घर ढंग ले छंदबद्ध रचना लिखे बर प्रेरित करत हवय । येहा एक साहित्यकार पुत्र द्वारा अपन पिता जी ला सही श्रद्धांजलि हरय ।


               ओमप्रकाश साहू" अंकुर "

   सुरगी  ,राजनांदगांव

Friday, 25 September 2020

28 सितम्बर, पुण्यतिथि विशेष*-अजय अमृतांशु

 *28 सितम्बर, पुण्यतिथि विशेष*-अजय अमृतांशु


संघर्ष ले उपजे जनकवि : कोदूराम "दलित"

                               

छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय के नाम ले मशहूर जनकवि कोदूराम "दलित" जी के जन्म 5 मार्च 1910 के ग्राम-टिकरी (अर्जुन्दा) जिला दुर्ग के  साधारण किसान परिवार म होय रहिस। किसान परिवार म पालन पोषण होय के कारण पूरा बचपन किसान अउ बनिहार के बीच म बीतिस।  ।आजादी के पहिली अउ बाद उन कालजयी सृजन करिन। समतावादीविचार, मानवतावादी दृष्टिकोण अउ यथार्थवादी सोंच के कारण आज पर्यन्त उन प्रासंगिक बने हवय।


दलित जी के कृतित्व मा खेती किसानी के अदभुत चित्रण मिलथे। खेती किसानी ल करीब से देखे अउ जिये हवय येकर सेती उँकर गीत म जीवंत चित्रण मिलथे :- 


पाकिस धान-अजान,भेजरी,गुरमटिया,बैकोनी,

कारी-बरई ,बुढ़िया-बांको,लुचाई,श्याम-सलोनी।

धान के डोली पींयर-पींयर,दीखय जइसे सोना,

वो जग-पालनहार बिछाइस,ये सुनहरा बिछौना।

दुलहिन धान लजाय मनेमन, गूनय मुड़ी नवा के,

आही हंसिया-राजा मोला लेगही आज बिहा के।


स्वतंत्रता आंदोलन के बेरा लिखे उँकर प्रेरणादायी छन्द -

अपन देश आजाद करे बर,चलो जेल सँगवारी,

कतको झिन मन चल देइन,आइस अब हमरो बारी। 


गाँधीजी के विचारधारा ले प्रभावित अंग्रेजी हुकूमत  खिलाफ साहित्य ल अपन हथियार बनाईन शिक्षक रहिन तभो ले लइका मनके मन मे स्वतंत्रता के अलख जगाय खातिर राउत दोहा लिख-लिख के प्रेरित करिन :- 

हमर तिरंगा झंडा भैया, फहरावै असमान।

येकर शान रखे खातिर हम,देबो अपन परान।


अपन मन के उद्गार ल बेबाक लिखइया दलित जी के रचना मन कबीर के काफी नजदीक मिलथे। जइसन फक्कड़ अउ निडर कबीर रहिन वइसने कोदूराम दलित जी। समाज म व्याप्त पाखण्ड के उन जमके विरोध करिन। एक कुण्डलिया देखव :- 


ढोंगी मन माला जपैं, लम्हा तिलक लगायँ ।

हरिजन ला छीययँ नहीं,चिंगरी मछरी खायँ।।

चिंगरी मछरी खायँ, दलित मन ला दुत्कारैं।

कुकुर – बिलाई ला  चूमयँ – चाटयँ पुचकारैं।

छोड़ - छाँड़ के गाँधी के, सुग्घर रसदा ला।

भेद-भाव पनपायँ , जपयँ ढोंगी मन माला। 


कोदूराम "दलित" ला जनकवि कहे के पाछू खास वजह ये भी हवय कि उँकर रचना म आम जनता के पीरा हे,आँसू हे,समस्या हे। उँकर कविता सुने के बाद आम अउ खास दूनो मनखे प्रभावित होय बिना नइ रह सकिस। उँकर कविता लोगन मन ला मुँह जुबानी याद रहय। उँकर रचना  समाज म व्याप्त बुराई उपर सीधा चोट करय। जेन भी बात उन लिखिन बिना कोई लाग लपेट के सीधा-सीधा कहिन। छत्तीसगढ़िया के पीरा ल दलित जी अपन जीवनकाल म उकेरिन जेन आज भी प्रासंगिक हवय। उँकर लिखे एक एक शब्द छत्तीसगढ़िया मनखे के हक के बात करथे :-


छत्तीसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चाँउर दार।

हवय लोग मन इहाँ के, सिधवा अउ उदार।।

सिधवा अउ उदार, हवयँ दिन रात कमावयँ।

दे दूसर ला भात , अपन मन बासी खावयँ।

ठगथयँ बपुरा मन ला , बंचक मन अड़बड़।

पिछड़े हवय अतेक, इही करन छत्तीसगढ़।


कवि हृदय मनखे प्रकृति के प्रति उदात्त भाव रखथे काबर कि उँकर मन बहुत कोमल होथे । दलित जी के प्रकृति प्रेम घलो ककरो ले छुपे नइ रहिस। उँकर घनाक्षरी मा प्रकृति के अदभुत चित्रण अउ संदेश मिलथे:-


बन के बिरिच्छ मन, जड़ी-बूटी, कांदा-कुसा

फल-फूल, लकड़ी अउ देयं डारा-पाना जी ।

हाड़ा-गोड़ा, माँस-चाम, चरबी, सुरा के बाल

मौहां औ मंजूर पाँखी देय मनमाना जी ।

लासा, कोसा, मंदरस, तेल बर बीजा देयं

जभे काम पड़े, तभे जंगल में जाना जी ।

बाँस, ठारा, बांख, कोयला, मयाल कांदी औ

खादर, ला-ला के तुम काम निपटाना जी ।


विद्यालय कइसन होना चाही दलित जी जे सपना रहिस उँकर कविता मा साफ झलकथे  :- 

अपन गाँव मा शाला-भवन, जुरमिल के बनाव

ओकर हाता के भितरी मा, कुँआ घलो खनाव

फुलवारी अउ रुख लगाके, अच्छा बने सजाव

सुन्दर-सुन्दर पोथी-पुस्तक, बाँचे बर मंगवाव ।


खादी के कुर्ता, पायजामा,गाँधी टोपी अउ हाथ मा छाता देख के कोनो भी मनखे दुरिहा ले दलित जी ल पहिचान लय। हँसमुख अउ मिलनसार दलित जी के रचना संसार व्यापक रहिस। गांधीवादी विचार ले प्रेरित होय के कारण सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के संदेश अक्सर अपन रचना म दँय। हास्य व्यंग्य के स्थापति कवि होय के कारण समाज के विसंगति ल अपन व्यंग्य के हिस्सा बनावय। राजनीति उपर उँकर धारदार व्यंग्य देखव :- 


तब के नेता जन हितकारी ।

अब के नेता पदवीधारी ।।

तब के नेता काटे जेल ।

अब के नेता चौथी फेल ।।

तब के नेता लिये सुराज ।

अब के पूरा भोगैं राज ।।


दलित जी अपन काव्य-कौशल ला केवल लिख के हे नहीं वरन् मंच मा प्रस्तुत करके घला खूब नाव बटोरिन। अपन बेरा मा मंच के सरताज कवि रहिन। सटीक शब्द चयन, परिष्कृत भाखा अउ रचना मन व्याकरण सम्मत रहय जेकर कारण उँकर हर प्रस्तुति प्रभावशाली अउ अमिट छाप छोड़य ।कविता काला कहिथे येकर सबसे बढ़िया अउ सटीक परिभाषा दलित जी के ये मात्र दू लाइन ल पढ़ के आप समझ सकथव : - 


जइसे मुसुवा निकलथे बिल से,

वइसने कविता निकलथे दिल से।


छत्तीसगढ़ी कविता ल मंचीय रूप दे के श्रेय पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी "विप्र" अउ कोदूराम "दलित" ला जाथे। 50 के दशक म दलित जी के छत्तीसगढ़ी कविता के सरलग प्रसारण आकाशवाणी भोपाल, इंदौर,ग्वालियर अउ नागपुर ले होइस जेकर ले छत्तीसगढ़ी कविता ल नवा ऊँचाई मिलिस। समाज सुधारक के रूप में दलित जी के संदेश अतुलनीय /अनुकरणीय हवय :-


भाई एक खदान के, सब्बो पथरा आँय।

कोन्हों खूँदे जाँय नित, कोन्हों पूजे जाँय।।

कोन्हों पूजे जाँय, देउँता बन मंदर के।

खूँदे जाथें वोमन फरश बनयँ जे घर के।

चुनो ठउर सुग्घर मंदर के पथरा साँही।

तब तुम घलो सबर दिन पूजे जाहू भाई ।।


दलित जी के कुल 13 कृति के उल्लेख मिलथे जेमा- (१) सियानी गोठ (२) हमर देश (३) कनवा समधी (४) दू-मितान (५) प्रकृति वर्णन (६)बाल-कविता - ये सभी पद्य में हैं. गद्य में उन्होंने जो पुस्तकें लिखी हैं वे हैं (७) अलहन (८) कथा-कहानी (९) प्रहसन (१०) छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ (११) बाल-निबंध (१२) छत्तीसगढ़ी शब्द-भंडार (13) कृष्ण-जन्म (हिंदी पद्य) फेर दुर्भाग्य से उँकर जीवनकाल में केवल एक कृति- "सियानी-गोठ" ही प्रकाशित हो सकिस जेमा  ७६ हास्य-व्यंग्य के कुण्डलियाँ संकलित हवय। बाद में बहुजन हिताय बहुजन सुखाय‘ अउ ‘छन्नर छन्नर पैरी बाजे‘ के प्रकाशन होइस। विलक्षण प्रतिभा के धनी लगभग 800 ले आगर रचना करे के उपरांत भी दलित जी आज भी उपेक्षित हवय ये छत्तीसगढ़ी साहित्य बर दुर्भाग्य के बात आय।  प्रचुर मात्रा म साहित्य उपलब्ध होय के उपरांत भी  दलित जी उपर जतका काम होना रहिस वो आज पर्यन्त नइ हो पाय हवय। कभू कभू तो अइसन भी महसूस होथे कि पिछड़ा दलित समुदाय हा सदियों से जेन उपेक्षा के शिकार रहे हे उही उपेक्षा के शिकार दलित जी भी होगे । 


दलित जी साहित्यकार के संग एक आदर्श शिक्षक, समाज सुधारक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अउ संस्कृत के विद्वान भी रहिन । उमन छत्तीसगढ़ी के संगे संग हिंदी के घलो शसक्त हस्ताक्षर रहिन दलित जी साक्षरता अउ प्रौढ़ शिक्षा के प्रबल पक्षधर रहिन। दबे कुचले मनखे मन के पीरा  लिखत दलितजी 28 सितम्बर 1967 के नश्वर देह ल त्याग के परमात्मा म विलीन होगे,फेर अपन रचना के माध्यम ले आज भी अपन मौजूदगी के अहसास कराथें । दलित जी के जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण अउ अभाव म बीतीस ,शायद येकरे कारण उमन अपन रचना के प्रकाशन नइ करवा पाइन। आज जरूरत ये बात के हवय कि नवा पीढ़ी उँकर साहित्य के प्रकाशन करवा के गहन अध्ययन भी करयँ। 


अजय अमृतांशु 

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

काकर सहीं हे*-चोवा राम वर्मा बादल

 *काकर सहीं हे*-चोवा राम वर्मा बादल

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(कहानी)


अपन दाई-ददा के एके झन संतान ,नरेश ह जब ले गलत संगती म परिस तब ले निचट दरूहा होगे रहिस।अपन घर ल नरक बरोबर बना डरे हे।रात दिन झगरा-लड़ई म, कलर कइया म कोनो ल खाये अंग नइ लागय।

     वोकर बाई बेचारी रमेसरी, जेन ह बने घर ले आये हे के जिनगी ह दुख म बूड़गे हे। एक-दू दिन आड़ नइ परय,मार-पीट म अउ संसो-फिकर म सुखाके काँटा होगे हे।

   नरेश ह आजो रतिहा कसके पी के लड़भड़- लइया करत घर आये हे।आइस तहाँ ले परछी म हाथ-गोड़ लमाके बइठत अपन बेटी मोतिम ल कहिस--ये टूरी एक गिलास पानी लान।

हव बाबू कहिके मोतिम ह जेन पढ़े-लिखे बर बइठे रहिसे, अपन कापी-किताब ल सकेले ल धरलिस।

अरे मर जहूँ त पानी लाके देबे तैं टूरी।बड़ा पढ़हंतीन बने हस--काहत नरेश ह उठिस अउ तड़ाक ले एक चटकन मोतिम ल दे दिस।

बेचारी ह कल्लाके रोये ल धरलिस।

बेटी ल रोवत सुनके रमेसरी ह अइस अउ चुप करावत अपन गोंसइया ल कहिस--आजो पी-खाके आये हस अउ फोकट के मार-पीट चालू कर देच।पानी देये म दू मिनट देरी होगे त का होगे?जादा  पियासे रहे त खुदे हेर के पी लेते।

अतका ल सुनके नरेश ह मनमाड़े जँजीयावत कहिस--हाँ-हाँ पी के आये हँव। तोर भिखमंगा ददा के पइसा म पी के नइ आये हँव।

     अपन ददा ल भिखमंगा काहत सुनके रमेसरी ह भन्नावत कहिस--मोर ददा भिखमंगा नइये। भिखमंगा तो तैं हस।वोकर पहिराये जम्मों गहना-गुरिया ल बेंच बेंच के पी खा डरे तेन ह शरम नइ लागय? एक ठन चिरहा ओनहा बर तरसत रहिथौं।बेटी ह एक ठन कापी-पेन

बर लुलवावत रहिथे। लाँघन-भूँखन जीयत हन तेकर चेत नइये। गोठियाथच त लाज घलो नइ लागय?

मोला शरम नइ लागय काहत हस रे निशरमी।तोर जीभ ल अभी सुरर देहूँ --काहत नरेश उठिस अउ बपरी ल दू-चार थपरा दे दिस।

बहू ल मारत देख के अस्सी साल के सियनहा रामलाल ह छोंड़ावत कहिस--अरे बेटा काबर अइसन अतियाचार करथस गा।निरपराधिन ल काबर फोकट के मारत हस।छोंड़ एला। बने तो कहिस हे।का गलती कइ परिस?

देख ददा तैं हट जा।आज एकर जीव ल मैं लेके रइहूँ काहत नरेश ह हटकारिस त बेचारा सियनहा ह थरथराके गिरगे।

नशा चढ़े राक्षस नरेश के मन नइ माढ़िस त रमेसरी के चूँदी ल धरके गिरा दिस अउ लात मुटका म मारे ल धरलिस।

नोनी मोतिम अउ रमेसरी बोमफार के रोये ल धरलिन।

 जर-बुखार म खटिया धरे नरेश के दाई सियनहिन सुकवारो ह कइसनो करके उठिच अउ छोंड़ावत कहिस--तोर हाथ-पाँव जोरत हँव बेटा झन मार पीट कर गा।

चुप रा डोकरी।तैं मरत तक नइ अच।तोरे चढ़ाये म ये ह अतका चढ़गे हे। नशा म पगलाये नरेश ह कहिस।वोला का तमीज हे।महतारी -बाप जेन मन ल भगवान सरूप कहे गेहे तिंकर ले कइसन बरताव करना चाही।

हाँ डोकरी कहिले अउ कुछु गारी दे ले।तोला बियाये के सेती पथरा बिया ले रहितेंव तेन बने रहिसे। रोवत रोवत सुकवारो कहिस।

       हल्ला-गुल्ला अउ रोवई -धोवई ल सुनके हम पारा -परोसी मन सकलागेंन।कुछ झन नरेश ल डाँटिन फटकारिन ,कुछ झन वोला समझाइन-बुझाइन तहाँ ले वो कुरिया म जाके सुतगे।

परोसिन काकी ह रमेसरी ल धीर धराके चुप करइस ।वोकर पीठ अउ बाखा म जेन-जेन जगा ल दुष्ट नरेश ह मारे राहय तेमा माटी तेल लगाके अपन घर ले दरद माढ़े के गोली ला के खवाइस। तेकर पाछू लेवन खावव -पीवव अउ चुपचाप सुत जवव कहिके हमन लहुटगेंन।

     अइसन म भला काकर मुँह म कौंरा जाही। सबो झन सात धार आँसू बोहावत परछी म बइठे रहिन। एकाध घंटा पाछू  सियनहिन ह अपन बहू ल कहिस--जा बेटी वोला खाना खाये बर उठा दे।नशा फाटगे होही त एको कौंरा खा लेही।

हव दाई काहत अउ आँसू ल अँचरा म पोंछत रमेसरी ह कुरिया म गेइस त ओकर चेत हरागे।

  नरेश ह कतका बेर मेयार म फाँसी ले ले राहय। वो हतभागिन ह बोमफार के कल्लई असन रोये ल धरलिस।

 का होगे सोंच के सियान, सियनहिन अउ नोनी ह कुरिया म गिन त देख के अकबका गे। सुकवारो ह गश खाके गिरगे फेर सबो कोई जोर-जोर से रोये ल धरलिन।

  फेर का होगे सोंचके हम पारा-परोस के मन तुरते जुरियागेंन। घटना ल देख के सब सन्न होगेन। सरपंच ,कोतवाल अउ गाँव के सियान मन ल बलाये गिस।

  नरेश के फाँसी लगाये के खबर दसे मिनट म पूरा गाँव म फइलगे। खमाखम लोगन सकलागें। सौ मुँह ,सौ प्रकार के बात होये ल धरलिस।बाहिर निकलेंव त चौरा म बइठे चार झन गोठियावत राहँय।

नरेश ह बहुत बड़े गलती कर दिस। अपन मरिस ते मरिस ,संग म अपन दाई-दाई, बाई अउ बेटी ल जीते जी मार डरिस।एक झन कहिस।

मरिस त बने होगे।मुक्ति तो मिलिस।सबके जिनगी ल नरक बना दे रहिस।बाँचे हे ते मन पेज-पसिया पी के कइसनो करके जी जहीं। दूसरा ह कहिस।

 मैं तो सुने हँव नरेश ह अपन बाई के दुख म फाँसी ले लिस। तिसरइया ह काहत राहय।

नहीं जी।हम जानत हन ।अइसन बात नोहय।नरेश ह दारू के नशा म अपन मसमोटी म मरगे।चौथा मनखे ह कहिस।

उँकर गोठ ल सुनके मैं गुने ल धरलेंव --काकर गलत हे ।काकर सहीं हे ?


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद,छत्तीसगढ़

कहिनी: *लक्ष्मण रेखा* पोखन लाल जायसवाल

 कहिनी: *लक्ष्मण रेखा*

          पोखन लाल जायसवाल

        मया तो मया होथे, मया ले जिनगी म सुघरई आथे। मया जिनगी बर बसंत होथे। बसंत आय ले जइसे रुख राई मन नवा डारा पाना संग फूलथे, फरथे, अउ सजथे। फबथे घलो।वइसने मया दुलार के गहना पहिने जिनगी फुदरथे, सजथे अउ सँवरथे। बिन मया के जिनगी बेरंग जनाथे।

        मया मनखे के बनाय जिनिस नोहै, जउन बउरे ले खिरा जै।हाँ अतका जरूर आय मया ले मनखे मनखे कहलाथे। मया जतेक बाँटबे ओतेक मिलथे, अउ बाढ़थे।

        सुनहर गरमी के दिन आय के सँघराती पोरा अउ कटोरी म पानी भर के चिरई पीये के उदीम करथे। रद्दा बाट म पानी भरे करसी के बेवस्था घलो करथे। बटोही मन बर घाम पियास के चिंता राहय। इही म हमर भलाई हे कहि सबो ल सिखौना देत ए उदीम करे के गोठ गोठियात रहिथे। सुनहर मास्टर जउन बनगे हे।

     ननपन के उतलइन सुनहर के मारे कोनो खार कोनो पीपर, बमरी अउ कसही कौहा म बने खोंधरा के अण्डा अउ चिरई पिला नइ बाँचत रहिस। कतको ऊँच म खोंधरा राहे,चाहे कतको पतला डारा म राहै, चढ़ना हे मतलब चढ़ना हे। सरसरउवन चढ़तिस अउ अण्डा निकाल बे करतिस। बर पीपर ले कौवा के अण्डा निकाले म ओला बड़ मजा आवै। कौवा के काँव काँव सुने बर जइसे तरसत रहिथे। खेत खार के कुआँ उतरई ओकर बर ठठ्ठा दिल्लगी के खेल राहै। फेर महतारी के मया के जादू चलगे। महतारी के सिखौना बात ले सुनहर ए सब ल छोड़ दिस। बड़ सुजानिक होगे। जम्मो जीव जंतु ले मया करैया होगे। पढ़ लिख के मास्टर के नौकरी घला पागे। अपन ननपन ल भुलावत नान्हें लइका मन ल बरजत कहिथे--" मया तो प्रकृति के वरदान आय जउन प्रकृति के जम्मो जीव जंतु बर हरे।जीव जनावर मन घला हमरे मन सही एक दूसर ले मया करथे। इही ए बात ल साफ बताथे मया प्रकृति के वरदान आय। चिरई चिरगुन ल हरहिन्छा जीयँन दौ।

 " 

       महतारी के मया अउ कोरा ल बड़ नजीक ले जानथे। भाई बहिनी म सबले छोटे होय ले सबो मया जइसे ओकर बर ढकलागे राहै। सबो ओला बड़ मया करैं। अइसे भी महतारी के मया कभू बँटाय नहीं, भलुक बाढ़थे। महतारी अउ बड़े भाई बहिनी मन के मया पावत मया के मरम ल सुनहर जानगे रहिस। तभे सबो ल मया करे अउ मया ले रहे के संदेश देवत रहिथे।

       एक दिन के बात ए, सुनहर दाई ल कहिथे--" दाई जा जल्दी नहा डर। अउ झट ले तियार हो जा, बड़े भैया घर जाबो।  " दाई ह सियानापन म  अपन बूता म लगे भुलागे।अइसे भी सियानापन म भुलाय के बीमारी ले कोन बाँच पाय हे। सुनहर नहा के आगे फेर दाई हर अपन बूता म भुलाय हे। ए ल देख फेर कहिथे- " दाई जा न झटकुन तियार हो,घाम हो जही तहान चाम धर लिही। " अतका कहिके अपन तियारी म लग्गे। दाई ह एती उत्ताधुर्रा नहाइस अउ जुन्नटहा लुगरा पहिने काँचा कपड़ा मन ल सुखोवत रहिस। एल देख सुनहर कहिस " मास्टर अउ डॉक्टर के महतारी हरच, गाँव जाय बर बने नवा सही लुगरा पहिन ले न दाई।" अउ संदूक म रखाय अपन पसंद के नवा लुगरा ल दे दीस। 

   जादा उमर के होय ले आँखी अउ कान थोकिन पातर हो जथे। जाँगर घलो जुवाब दे हे धर लेथे। फेर दाई चार कोरी उमर म जाँगर ले थके नइ रहिस। तियार होवत होवत बेटा ले आँखी चुरा के गाय गरु के जोखा करे कोठा चल दीस। पैरा रख अउ कोटना म पानी डार के आ घलो  गे।

         बइसाख के महिना राहै। घाम लाहो तपत राहय। तात तात हवा अउ घाम ल देख के घर ले निकले के मन नइ होय। फेर घाम अउ काम डर्राय ले नी बनै। कहे हे, जस-जस चाम तिपे, तस-तस काम बाढ़े। काम तो करे पड़ही, काम के बिना जिनगी ह एके ठउर म ठहर जही। जिनगी अपन अरथ ल खो दिही। जिनगी साँसा के चलत ले हे,साँसा थमिस कि जिनगी थम गे। इही गोठ ल सुरता करत सुनहर के बड़े   भाई डॉक्टर मार मँझनी मँझनिया खच्चित बूता निपटाय बर सोच शहर जात रहिस। भागती बइसाख के घाम जान करसी के पानी पी मुँह कान तोपे हेलमेट लगाय निकले रहिस। सड़क म बड़ सावचेत ले गाड़ी चलावत रहिस। दाई के सीख जउन रहिस, हड़बड़ हड़बड़ कभू आना जाना मत करहू। अपन रस्ता आहू जाहू। फेर कहे हे न होनी अनहोनी बता के नइ आवै। सड़क तिर बसे बस्ती पार करत बखत नान्हें लइका सड़क पार करत दौड़ के गाड़ी के आगहू आगे। ओला बचाय के चक्कर म गाड़ी बिजली खम्भा म टकरागे। बड़े अल्हन तो नइ होइस। हेलमेट पहिने  ले चोट नइ आइस। सावचेती अउ धीरलगहा गाड़ी चलाय ले खरोच भर आय रहिस। मरहम पट्टी कराके घर लहुट गे।

        एती भैया संग आय अल्हन ल बिन बताय सुनहर ह दाई ल गाँव ले चार कोस दूरिहा भैया घर लेके पहुँचगे। महतारी के मया  बेटा-बहू अउ नाती नतनीन बर उमड़गे। मया छलछलाय लगिस अउ आँखी ले बोहाय धर लिस। दाई नाती नतनीन  ले पूछे लगिस- " तोर पापा कति हे नइ दिखत हे, का बूता ले नइ लहुटे हे। " कोनो कुछु नइ बता पावत रहिस तब डॉक्टर बेटा कुरिया ले निकलिस। बेटा के हाथ गोड़ म लगे पट्टी ल देख दाई ह बोम फार के रोय लगिस। 

"दाई!झन रो मोला कुछु नइ होय हे , बड़े अल्हन ले बाँचगे हँव। तोर मया अउ आशीर्वाद ले मोला कुछु नइ होइस। तोरे सिखौना ले मोला दूसर जनम मिले हे।"

  " दाई तोर कहना हे न, जिनगी म कोन काय करत हेमत देख, तोला काय करना हे, ए देख। रस्ता चलत काँटा बिनत चलबे, रस्ता चतवारत चलबे। दे के सोच बे,दे म सुख हे,खुशी हे। काखरो बिगाड़ झन अउ  सोचबे मत। एखर लेतोर कभू बिगाड़ नइ होय।"

   सच दाई जिनगी के कोनो ठिकाना नइ हे।काकरो अहित नइ करे ले मोर अहित नइ होइस।

      मोर महतारी के मया अउ सिखौना यमराज बर लक्ष्मण रेखा बनगिस। तभे तो मोला नवा जनम मिले हे।

     पोखन लाल जायसवाल

पलारी