Thursday, 10 June 2021

क्रातिकारी गीतकार : लक्ष्मण मस्तुरिया*

 


*क्रातिकारी गीतकार : लक्ष्मण मस्तुरिया*


"जागव रे जागव बागी बलिदानी मन..

धधकव रे धधकव सुलगत आगी मन..."


अइसन गीत के एक-एक पंक्ति अउ एक-एक शब्द अन्तस् ल झकझोर देथे,अउ सीना चीर के सीधा अन्तस् मा उतरथे। छत्तीसगढ़ी गीत मा क्रांति के अइसन आह्वान करने वाला क्रांतिकारी गीतकार केवल लक्ष्मण मतुरिया ही हो सकथे कइहूँ ता गलत नइ होही। छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान जगइया मस्तुरिया जी के कलम ले क्रांति के चिंगारी निकलय। अन्याय,अत्याचार, जमाखोरी, बेरोजगारी, पलायन अउ नपुंसक राजनीति उपर उँमन निडर हो के कलम चलाइन । एक डहर मस्तुरिया जी श्रृंगार के गीत लिखिन उँहे दूसर डहर क्रांति के गीत लिख के छत्तीसगढ़िया जन मानस ल जगाए खातिर क्रांति के गीत लिखिन। 

मस्तुरिया जी अपन गीत म कतेक गंभीर बात कहिथे :-

 "जागो रे जागो बागी बलिदानी मन..

परिवर्तन उही ला सकथे जेन जुझारू होथे,बागी होथे, लड़े अउ मर मिटे बर हमेशा तियार रहिथे अउ बलिदान भी उही मन दे सकथे जेन अपन मूँड़ी मा कफ़न बाँध के निकलथे । तब अइसन गीत बागी अउ बलिदानी मन बर टॉनिक के काम करथे। मस्तुरिया जी जब कहिथें-

   "धधकव रे धधकव रे सुलगत आगी मन"

तब देह के रूवाँ रूवाँ खड़ा हो जाथे। अन्याय अत्याचार के खिलाफ़ खड़ा होने वाला युवा जेन परिवर्तन लाय के जज्बा रखथे अइसन एक आह्वान ल सुन के मर मिटे बर उतारू हो जाथे। जब दानव मन ले देवता मन घलो हार जाथे तब आदि शक्ति माँ दुर्गा पापी मन के संहार करे बर अवतरित होथे। तब मस्तुरिया जी वीरांगना दुर्गावती अउ अवंतिबाई  सरिक मातृशक्ति मन ल आह्वान करथे :-

"महाकाल भैरव लखनी

 महामाया दुर्गा काली मन..। जागो रे...

       ओज ले भरे अइसन गीत ल सुनके काकर तन म आगी नइ लगही ? दमदार लेखनी के संग वजनदार  प्रस्तुति म मस्तुरिया के कोनो मुकाबला नइ रहिस। जेन मनखे एक घव मस्तुरिया जी ल सुन लय आजीवन वोला नइ भुलाय। छत्तीसगढ़ी के अमर गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया शोषित वर्ग के प्रतिनिधि कवि/गीतकार रहिन। शोषक मन के खिलाफ जब उमन मुखर होके लिखथे तब खून मा उबाल आना स्वाभाविक हे :-

"लंद फंद वाले मालामाल हे

सिधवा बर रोजे अकाल हे

अउ गोहार परत हे नाचे

छानही चढ़ चढ़ पापी मन..."


नपुंसक राजनीति के खिलाफ खुल के लिखे बर करेजा चाही। मस्तुरिया जी निडर होके लिखिन- 

"भीख माँगे म जिनगी के 

अधिकार कोनो ल मिलय नही..

कुंडली मारे साँप सिंहासन

आगी आँच बिन हिलय नहीं...।"


अइसन बात ल लिखना अउ मंच म पढ़ना तलवार के धार म चलना आय,फेर कबीर के रददा म रेंगइया मन ककरो परवाह कहाँ करथे । 


जमाखोरी तब भी रहिस अउ आज भी ये विकराल समस्या हे जेला जड़ ले उखाड़ना जरूरी हवय। जमाखोर मन के ख़िलाफ़ उँकर आक्रोश देखव-

"लहू ले माँहगी तेल गुड़ 

निर्दयी होगे बैपारी मन ..जागो रे.."


अपन फर्ज ले विमुख, देश अउ समाज के प्रति उदासीन केवल अपन म मस्त मनखे मन ला लताड़त मस्तुरिया जी कहिथें -

"मुर्दा जागव मरद बनव रे

छाती बाँख म गरब भव रे

देश धरम पुरखा पीढ़ी बर...

मरव खपव जीवदानी मन" जागो रे..


मस्तुरिया जी छत्तीसगढ़ी गीत के दशा अउ दिशा बदलइया अप्रतिम गीतकार रहिन। उँकर गीत के प्रासंगिकता तब ले जादा आज महसूस होथे।सम्मान के साथ जीना ही उँकर फितरत रहिस। उँकर कृति "सोनाखान के आगी" के पंक्ति देखव :-  

"बिना सुराजी के जिनगानी

मुरदा हे तन मरे परान

बिना मान सभिमान के मनखे

गाय गरु अउ कुकुर समान"


सिधवा छत्तीसगढिया मन ला अपन स्वाभिमान के 

रक्षा करे खातिर मस्तुरिया जी आजीवन चेताइन :-


अरे नाग तैं काट नहीं त

जी भर के फुफकार तो रे

अरे बाघ तै मार नहीं त

गरज-गरज धुतकार तो रे


छत्तीसगढ़ के पबरित माटी सब ला शरण दिस। अलग अलग राज के मनखे आके इँहे के होके रहिगे। फेर कुछ लोगन छत्तीसगढ़िया मन के अस्मिता अउ स्वाभिमान सँग आज घलो खेलत हवय। उँनला मस्तुरिया जी खुला चुनौती देथे :-

"एक न एक दिन ए माटी के

पीरा रार मचाही रे ..

नरी कटाही बइरी मन के

नवा सुरुज फेर आही रे।"


येहू कटु सत्य आय कि मस्तुरिया जी आजीवन अपन स्वाभिमान के साथ कभू समझौता नइ करिन। छत्तीसगढ़,छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के पीरा ला जीवन पर्यन्त लिखिन। मनखे के सीना धधक जय, अपन माटी के खातिर मनखे मर मिटय, मुरदा घलो खड़े हो जय अइसन प्रेरणा देने वाला अमर गीतकार सदियों मा कोनो एक होथे। येमा कोई दू मत नइ हो सकय की मस्तुरिया जी छत्तीसगढ़ी गीत के दशा अउ दिशा ल बदले के काम करिन। अब बेरा हे कि नवा पीढ़ी उँकर गीत ले प्रेरणा ले के काम करँय, इही मस्तुरिया जी ल सही मा श्रद्धांजलि होही।  


अजय अमृतांशु

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

Wednesday, 9 June 2021

सुरता -खुमान जी






 

सुरता -खुमान जी

लोक संगीत म जीवन ल समर्पित करइया महान कलाकार -खुमान साव 

कोनो भी अंचल के संस्कृति वो क्षेत्र के पहिचान होथे. येमा वोकर आत्मा ह वास करथे. जब अपन संस्कृति ल जन मानस समाज ह कोनो मंच म प्रस्तुति के रूप म देखथे त ऊंकर हिरदे म गजब उछाह भर जाथे. ढाई करोड़ के आबादी वाला  हमर छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति के अलगे पहिचान हे. येला जन जन तक बिखेरे म जउन महान कलाकार मन के हाथ हे वोमन म स्व. दुलार सिंह साव मंदराजी, स्व. दाऊ रामचंद्र देशमुख, स्व. महासिंग चन्द्राकर, स्व. हबीब तनवीर, स्व. देव दास बंजारे, स्व. झाड़ू राम देवांगन, श्रीमती तीजन बाई, स्व. केदार यादव, स्व. लक्ष्मण मस्तुरिया,स्व.शेख हुसैन, झुमुक दास बघेल, निहाई दास मानिकपुरी, ममता चन्द्राकार, कविता वासनिक, पूना राम निषाद, लालू राम साहू, स्व. मदन निषाद, स्व. गोविन्द निर्मलकर,माला मरकाम, फिदा बाई मरकाम, सूरुज बाई खांडे, चिन्ता दास बंजारे, रामाधार साहू, दीपक चन्द्राकार, शांति बाई चेलक, स्व. भैया लाल हेड़ाऊ,स्व.गंगा राम शिवारे, बद्री विशाल यदु परमानंद,शिव कुमार तिवारी, मिथलेश साहू, घुरवा राम मरकाम, डॉ. पीसी लाल यादव, शिव कुमार दीपक, नवल दास मानिकपुरी अउ संगीतकार श्रद्धेय स्व. खुमान साव के नांव ल आदर के साथ लेय जाथे. स्व. साव जी ह अपन साधना के बल म छत्तीसगढ़ी लोक संगीत ल खूब मांजिस. हमर लोक गीत ल पश्चिमी अउ फिल्मी संस्कृति ले बचा के माटी के खुशबू ल बिखेरिस. खुमान साव ह छत्तीसगढ़ के नामी कवि अउ गीतकार मन के गीत ल संगीतबद्ध कर के चंदैनी गोंदा के मंच म प्रस्तुति दिस. 

   छत्तीसगढ़ी गीत संगीत बर समर्पित खुमान साव के जनम 5 सितंबर 1930 म राजनांदगॉव के खुर्सीटिकुल (डोंगरगॉव) म होय रिहिस. बाद म ठेकवा (सोमनी )म बसगे. वोकर बाबू जी के नांव टीकमनाथ साव रिहिस. खुमान ल लोक गीत- संगीत के घर म सुग्घर वातावरण मिलिस काबर कि वोकर बाबू जी ह हारमोनियम बजाय. लइका खुमान ह घर म हारमोनियम बजाय म धियान लगाय. फेर वोहा रामायण मंडली म हारमोनियम बजाय ल शुरु करीस. खुमान ह नाचा के भीष्म पितामह स्व. मंदराजी दाऊ के मौसी के बेटा रिहिस .मंदरा जी दाऊ ह खुमान ल हारमोनियम बजाय बर प्रोत्साहित करे. खड़े साज म वोहा  पहिली बार 13 साल के उमर म बसन्तपुर (राजनांदगॉव) के नाचा कलाकार मन सँग हारमोनियम बजइस. मंदरा जी दाऊ द्वारा संचालित रवेली नाचा पार्टी म वोहा 14 साल के उमर म शामिल होगे. वो हर नाचा म हारमोनियम म लोक धुन के सृजन कर छत्तीसगढ़ के माटी के महक ल बिखेरे के जब्बर काम करिस. साव जी ह बी. ए. तक शिक्षा प्राप्त करे रिहिस. वोहर म्युनिसीपल स्कूल राजनांदगॉव म शिक्षक रिहिस. 

    साव जी ह सन 1950-51 म राजनांदगॉव म आर्केस्टा पार्टी घलो चलाइस. छत्तीसगढ़ के कतको शहर के सँगे सँग महाराष्ट्र अउ मध्यप्रदेश म आर्केस्टा के प्रस्तुति दिस. धीरे से वोकर मन ह आर्केस्टा डहर ले उचट गे. 1952 म सरस्वती कला मंडल के गठन करीस. खुमान साव जी के प्रतिभा ल देखके दाऊ रामचंद्र देशमुख ह अब्बड़ प्रभावित होगे रिहिस. 1952 म दाऊ रामचंद्र देशमुख के गांव पिनकापार (बालोद )म मंडई के समय म नाचा होइस. ये कार्यक्रम म देशमुख जी हा साव जी ल हारमोनियम बजाय बर बुलाइस.1953 म घलो अइसने होइस.ये कार्यक्रम के अइसे प्रभाव पड़िस कि रवेली अउ रिंगनी नाचा पार्टी के विलय होगे. काबर कि येमा रवेली अउ रिंगनी पार्टी के संचालक मन ल छोड़ के बाकी नामी कलाकार मन ह आमंत्रित होय रिहिस हे. लोक संगीत अउ कला डहर कुछ अलग काम करे के इच्छा के सेति वोहा 1960 म शिक्षक सांस्कृतिक मंडल के गठन करिस. येमा भैया लाल हेडाऊ, गिरिजा सिन्हा, रामनाथ सोनी जइसे बड़का कलाकार मन शामिल होइस. 

  साव जी ह सबले पहिली स्व. रामरतन सारथी के 3 गीत मोला मइके देखे के साध, सुनके मोर पठौनी परोसिन रोवन लागे, सोन के चिरइया बोले ल लयबद्ध करिस. 1971 म आकाशवाणी रायपुर म वोकर संगीत निर्देशन म गाना रिकार्ड होइस .भैया लाल हेड़ाऊ अउ दूसर कलाकार मन ह गीत गाइस. 

दाऊ रामचंद्र देशमुख ह रेडियो म खुमान साव अउ ऊंकर कलाकार मन के गीत ल सुनिस त साव जी ल अपन गांव बघेरा बुलाइस. वो समय दाऊ जी ह छत्तीसगढ़ के लोक कलाकार मन ल सकेल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उदिम करत रिहिस. साव जी ह दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा स्थापित चंदैनी गोंदा म हारमोनियम वादक के रूप म जुड़गे. चंदैनी गोंदा म साव जी ल अपन प्रतिभा देखाय के सुग्घर मौका  मिलिस. चन्दैनी गोंदा के प्रसिद्धी म संगीत पक्ष के गजब रोल रेहे हे. येकर श्रेय खुमान साव ल जाथे जउन ह अपन साधना के बल म नामी कवि /गीतकार लाला फूलचंद, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, रविशंकर शुक्ल, पवन दीवान, प्यारे लाल गुप्त, कोदू राम दलित, राम रतन सारथी, लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत ल संगीतबद्ध करके चंदैनी गोंदा म प्रस्तुति दिस. साव जी ह मोर संग चलव रे..., धन धन मोर किसान, घानी मुनी घोर दे, छन्नर छन्नर पैरी बाजे, चिटिक अंजोरी निर्मल छइंहा, मोर धरती मइया जय होवय तोर, पता ले जा रे गाड़ी वाला, बखरी के तुमा नार बरोबर, मोर खेती खार रुमझुम जइसे कतको छत्तीसगढ़ी गीत ल संगीत दिस. ये गीत मन हा अब्बड़ लोकप्रिय होइस अउ आजो जनता के जुबान म बसे हे. छत्तीसगढ़ी लोकगीत गौरा गीत, सुवा गीत, बिहाव गीत, करमा ये मन ला लयबद्ध करे म ऊंकर गजब योगदान हवय.


 लोक संगीत के ये महान

 कलाकार से मोर पहिली भेंट 17 मार्च 2002 म दिग्विजय स्टेडियम के सभागार म 

आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम म होय रिहिस. 

दूसरइया भेंट मानस भवन दुर्ग मा आयोजित छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के प्रांतीय अधिवेशन म होइस .इहां के एक संस्मरण बतावत हवँ. कार्यक्रम ह चालू नइ होय रिहिस. साहित्यकार /कलाकार मन के पहुंचना जारी रिहिस. नामी साहित्यकर दानेश्वर शर्मा जी, खुमान साव जी सहित पांच -छै साहित्यकार स्वागत द्वार के पास खड़े होके एक दूसर ला पयलगी /जय जोहार करत रेहेन. इही बीच एक नव जवान कवि ह अइस अउ साव जी ल नइ पहिचान पाइस. हमर मन ले वो नव जवान कवि ह पूछे लागिस कि ये सामने म खड़े हे वोहा कोन हरे. मेहा  साव जी के परिचय बताय बर अपन जबान खोलत रेहेंव त साव जी ह मोला रोक दिस अउ ओकर से पूछिस कि पहिली तँय ह बता तैंहा कोन गांव के हरस. नव जवान सँगवारी ह बोलिस - मेहा बघेरा (दुर्ग) के रहवइया अंव. 

साव जी ह बोलिस कि- तैंहा बघेरा के हरस तब तो मोला तोला जानेच ल पड़ही. अउ मोर नांव नइ बता पाबे त तोला मारहू किहिस ". ये बात ल सुनके वो नव जवान ह सकपकागे!

 वइसे मेहा साव जी के अख्खड़ स्वभाव ले परीचित रेहेन त देरी नइ करत वोला बतायेंव कि - यह महामानव चंदैनी गोंदा के संचालक आदरणीय खुमान साव जी हरे. अइसन सुनके वोहा तुरते साव जी ल पयलगी करिस. जे साव जी ह वोला मारहू केहे रिहिस वोहा वोकर मुड़ी म हाथ रखके आशीर्वाद प्रदान करिस. ये प्रसंग म हमन मुस्कात रहिगेन. 

  फेर साव जी ह नम्र स्वभाव ले वोकर से किहिस कि - तैंहा बघेरा रहिथो केहेस तेकर सेति केहेंव कि मोला जाने ल पड़ही .फेर वो नव जवान ल पूछिस कि दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ल जानथस? श्री विश्वंभर यादव मरहा जी ल जानथस? त वोहा किहिस कि हव दूनों ल जानथव. 

साव जी ह बोलिस कि महू ह दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के घर रिहर्सल मा आंव जी .तेकर सेति तोला केहेंव रे बाबू कि मोला तोला जाने ल पड़ही. 

ये घटना ले पता चलथे कि साव जी ह नारियल जइसे ऊपर ले

कठोर जरूर दिखय पर अंदर ले गजब नरम स्वभाव के रिहिस. 


साव जी ह  हमर साकेत साहित्य परिषद् सुरगी जिला राजनांदगॉव के वार्षिक समारोह म चार बेर पहुंचिस. 2012 म करेला (खैरागढ़) भवानी मंदिर मा आयोजित कार्यक्रम म, 2013 म सुरगी के पंचायत भवन म, 2015 म सुरगी के कर्मा भवन म अउ 2016 म  सुरगी शनिवार बाजार चौक के मुख्य मंच मा आयोजित कार्यक्रम म पहुंच के हमन ल कृतार्थ करिस. 2015 म खुमान साव जी ह साकेत सम्मान स्वीकार कर हमन ल गौरवान्वित कर दिस. वर्ष 2016 म 87 साल के साव जी के चयन संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार -2015  बर चयनित होय के खुशी म  साकेत साहित्य परिषद् सुरगी द्वारा नागरिक अभिनंदन करे गिस. 

    2015 अउ 2016 म सम्मानित होय के बेरा म साव जी ह किहिस कि -" मोला जनता से जउन सम्मान मिलथे उही मोर बर सबले बड़का सम्मान हरे. आज तक मेहा राज्य सम्मान अउ पद्म श्री बर आवेदन नइ करे हवँ न अवइया बेरा म करव! हां शासन ह खुद मोला सम्मान देना चाहत हे त दे सकथे. छत्तीसगढ़ के लाखो जनता के प्रेम ह मोर बर सबसे बड़े पुरस्कार हरे. "

   हमर छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के अइसन महान कलाकार ह 9 जून 2019 के दिन 89 साल के उमर म ये दुनियां ल छोड़ के स्वर्गवासी होगे. श्रद्धेय साव जी 

द्वितीय पुण्य तिथि म शत् शत् नमन हे. विनम्र श्रद्धांजलि. 🙏🙏💐💐

            

          ओमप्रकाश साहू "अँकुर "                सुरगी, राजनांदगॉव (छत्तीसगढ़)

Monday, 7 June 2021

आज मस्तुरिया जयंती पर विशेष... ओमप्रकाश अंक







 

आज मस्तुरिया जयंती पर विशेष... ओमप्रकाश अंकुर


छत्तीसगढ़ के स्वभिमान बर जिनगी भर फूंफकारिस लक्ष्मण ह


 छत्तीसगढ़ी गीत के अमर गायक मस्तुरिया 



मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी... मंय छत्तीसगढ़िया अंव... पता दे जा रे गाड़ी वाला... पड़की मैना... मंगनी म मांगे मया नइ मिलय... मन डोले रे माघ फगुनवा... घनही बंसुरिया... सोना खान के आगी... जइसे गीत के लिखइया जन कवि स्व. लक्ष्मण मस्तुरिया के  आज  72 वां  जनम दिन हरे.  मस्तुरिया जी हा अपन अपन गीत, कविता अउ गायन के माध्यम ले छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ला जगाइस अउ सुग्घर ढंग ले अपन हक खातिर लड़े के रद्दा बताइस. वोकर गीत मा एक डहर जिहां छत्तीसगढ़ महतारी के गजब बखान हे अउ दूसर कोति छत्तीसगढ़वासी मन के भोला पन के वर्णन के संगे संग किसान, मजदूर ला जगाय के उपाय हे. 

जिनगी भर छत्तीसगढ़िया मन के मान मर्यादा बर लड़इया अइसन क्रान्तिकारी कवि अउ गीतकार 

 के जनम बिलासपुर जिला के मस्तुरी गाँव म 7 जून 1949 के होय रिहिस हे. शुरुआत के जिनगी गजब संघर्ष ले बीतिस.वोहर  राजकुमार कालेज रायपुर 

म शिक्षक के रूप म अपन सेवा दीस. बाद म हिंदी विभागाध्यक्ष घलो रिहिस. 

   जउन मन ह दाउ रामचन्द्र कृत चंदैनी गोंदा ला अपन खूब मिहनत ले ऊँचाई तक पहुँचाइस वोमा लक्ष्मण मस्तुरिया  ह प्रमुख रिहिस. लक्ष्मण मस्तुरिया ह गीत अउ गायन पक्ष ल गजब सजोर बनाइस. 

   मस्तुरिया जी के लिखे अउ गाये

गीत ह जनता के बीच गजब लोक प्रिय होइस . छत्तीसगढ़ के आकाशवाणी केन्द्र मन म उंकर गीत ह खूब चलिस. रायपुर दूरदर्शन म गीत प्रसारित होइस. उंकर गीत ल सुन के मन हा खुशी से झूमे लागय त कतको गीत ह छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ल जगाइस. वोकर गीत के खूब आडियो अउ वीडियो रूप बनिस. पान ठेला, होटल के संगे संग बर बिहाव, षट्ठी, कोनो भी सार्वजनिक कार्यक्रम म मस्तुरिया जी के गीत रंग झाझर मंता देय. वोकर गीत ल सभा -संगोष्ठी म बजा के / गा के जनता म जोश भरे जाथे. स्कूल /कॉलेज के वार्षिक समारोह म मस्तुरिया के गीत ह कार्यक्रम म जान डाल देथे. 

  लक्ष्मण मस्तुरिया के बारे म डॉ. बल्देव जी ह लिखथे -"लक्ष्मण मस्तुरिया हमर अग्रज कवि हरि ठाकुर जइसन वीर अउ ऋंगार, क्रांति अउ पीरित के अद्वितीय गायक आय .कहूँ -कहूँ उन बहुत करीब हे, लेकिन शैली के थोर बहुत अन्तर तो रहिबेच करही."

 छत्तीसगढ़वासी मन के स्वाभिमान ल वो कइसे जगाइस वोकर उदाहरण देखव -

सोन उगाथौं माटी खाथौ ।

 मान ल देके हांसी पाथौ ।।

खेती खार संग मोर मितानी ।

घाम मयारु हितवा पानी ।।


मोर इही जिनगानी मंय नगरिया अंव ग 

किसन के बड़े भइया हलधरिया अंव रे ...

 झन कह मोला लेढ़वा डोमी करिया अंव ग

सिधा म सिधा नइ तो डोमी करिया अंव रे... 

  मैं छत्तीसगढ़िया अंव रे... 


मोर संग चलव गीत म वोहर छत्तीसगढ़िया मन ल जगाय के काम करथे. बिपत संग जूझे बर कहिथे. 

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी 

वो गिरे  थके हपटे मन अउ परे

 डरे मनखे मन 

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव ग 

बिपत संग जूझे बर भाई मंय बाना बांधे हंव ।

सरग ल पिरथी म ला देहू प्रन अइसे ठाने हंव ।।

मोर सुमता के सरग निसेनी जुरमिल सबो चढ़व रे.... 

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी... 

मस्तुरिया जी के ऋंगार गीत ल सुन के मन ह मयूर जइसे नाचे ल लगथे. अंतस ह मगन हो जाथे. 


पता दे जा ले जा  गाड़ी वाला रे 

तोर नाम के तोर गाँव के तोर काम के... 

पता दे जा... 

जियत जागत रहिबे बयरी 

भेजबे कभू ले चिठिया 

बिना बोले भेद खोले रोये 

जाने अजाने पीरीतिया 

बिन बरसे उमड़े घुमड़े 

जीव मया के बयरी बदरिया 

पता दे जा रे गाड़ी वाला... 

अइसने "पड़की मैना "गीत ल सुनके  हिरदे ल गजब उछाह लागथे. 


वारे मोर पड़की मैना, तोर कजरेली नैना 

मिरगिन कस रेंगना तोरे नैना 

 मारे वो चोंखी बान, हाय रे तोर नैना... 


वियोग ऋंगार रस मा मस्तुरिया के गीत ल सुन के मया करइया मन के आंसू ह टपक जाथे. 


काल के अवइया कइसे आज ले नइ आये 

तोला का होगे, रस्ता नइ दिखे बइरी तोर... 

का कहूं रस्ता म काहीं अनहोनी होगे 

का कहूं छोड़ मया ल संगवारी जोगी होगे

घेरी बेरी डेरी आंखी कइसे फरकाये 

तोला का होगे, टीपकी टीपकी आंसू गिरे मोर... 


अइसने अउ उदाहरण प्रस्तुत हे.. 


सरी रतिहा पहागे तैं नइ आये रे 

तोला घेरी बेरी बइरी मंय सपनायेंव रे... 

अइसन का होगे काम 

भूलिगै देह ल परान 

का तो महि हौं अभागिन 

अपने होगे आन 

आ आ नींद बइरी आंखी ले उड़ि जाय रे... 


शोषण करइया मन ल मस्तुरिया जी खूब ललकारय .

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हम तो लूट गयेन सरकार तुंहर भरे बीच दरबार 

खुल्लम -खुल्ला राज म तुंहर अहा अत्याचार 

रइहो रइहो खबरदार... 

हाय विधाता दिन -दिन बाढै देस म अत्याचारी 

परमिट वाले डाकू भइगे जन सेवक सरकारी 

सुतरी सुतरी छांद फांद के लूटै पारी -पारी 

हांस रे लछमन करम ठठा नइ रोवे म उबार 

हम तो लूट गयेन सरकार तुंहरे भरे बीच दरबार...


मस्तुरिया जी ह "सोनाखान के आगी" म शहीद वीर नारायण सिंह के वीरता ल गजब सुग्घर ढंग ले प्रस्तुत करे हवय .


फेर सुरता आगे उही प्रन के ।

फरकिस भुजा बरन ललियाय ।।


आंखी जले लगिस लक लक ।

कटरै दांत, बदन अंटियाय ।।


नहीं नहीं संगी ये मरना तो ।

कायर अउ मन हारे के ।।

मोर जिनगी मोर परजा खातिर। 

जे मोला मुखिया माने हे ।।


जमींदार मंय सोना खान के ।

सोना उपजै मोर माटी म ।।

जिहां के भुंईधर भूख मरत हे ।

आग बरै मोर छाता म ।।


रचनायें... 

मस्तुरिया के रचना म हमू बेटा भुइंया के (काव्य संग्रह), 

चंदैनी गोंदा में लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत ,छत्तीसगढ़ के माटी (छत्तीसगढ़ दर्शन ),सोना खान के आगी, माटी कहे कुम्हार से (निबंध संग्रह) अउ घुनही बंसुरिया (गीत संकलन) प्रमुख हे. 

 मस्तुरिया जी ह सन् 2000 मा बने मोर छइंहा भुइंया, मंजरी सहित कतको छत्तीसगढ़ी फिलिम बर गीत लिखे के सँगे सँग गायन करिस. 

कछ बेरा तक लोकासुर मासिक पत्रिका के संपादन घलो करीस. 

सम्मान - 

     छत्तीसगढ़िया जन जागरण के अग्रदूत मस्तुरिया जी ल राज्य सरकार द्वारा जउन सम्मान मिलना रिहिस वो नइ मिल पइस. आंचलिक साहित्य म गजब लिखइया साहित्यकार मन ला शासन द्वारा पं. सुंदर लाल शर्मा सम्मान देय जाथे. वहू नइ देय गिस. जबकि मस्तुरिया जी के कई ठन गीत ह छत्तीसगढ़ के स्वभिमान गीत हरे. पृथक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन के समय मस्तुरिया के गीत ह शंखनाद के काम करिस. 


पर मस्तुरिया जी ह जनता के प्यार ल सबसे बड़े सम्मान माने. एक चैनल म इंटरव्यू देत खानि 

वोहा पूरा दम खम के साथ येला बोले रिहिस. ये इंटर व्यू देत समय 

सुप्रसिद्घ गीतकार जनाब मीर अली मीर जी घलो  उंकर संग रिहिस. 


हमर छत्तीसगढ़ के कतको साहित्यिक अउ सांस्कृतिक संस्था मन हा मस्तुरिया जी ल सम्मानित करिस. येमा छत्तीसगढ़ी काव्य भूषण, लोक स्वर, विशेष प्रतिभा सम्मान, स्व. ठाकुर प्यारे लाल सिंह सम्मान, छत्तीसगढ़ी विभूषण, सृजन सम्मान, रामचंद्र देशमुख बहुमत सम्मान ।


मस्तुरिया जी के कवि सम्मेलन म अब्बड़ मांग रहय. छत्तीसगढ़ के सबो प्रमुख शहर अउ कतको गाँव म वोहा काव्य पाठ करे हे.वोकर लोक प्रियता ल देख के भीड़ भाड़ ल रोके बर वोला आखिरी डहर काव्य पाठ कराय जाय. 


20 जनवरी 1974 म नई दिल्ली के लालकिले म गणतंत्र दिवस के अवसर म आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन म काव्य पाठ करीस. वोहा देश के नामी कवि/गीतकार गोपाल दास नीरज, बाल कवि बैरागी, इन्द्रजीत सिंह तुलसी, रामावतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी मन संग अपन प्रस्तुति दीस. वो समय मस्तुरिया जी के उम्र मात्र 25 साल रिहिस. येहर वोकर लोक प्रियता के सबले बड़े उदाहरण हे  .

 छत्तीसगढ़ के ये रतन बेटा ह 3 नवंबर 2018 म परम लोक चले गे.

मस्तुरिया जी ल उंकर 72 वां जयन्ती मा शत् शत् नमन हे. विनम्र श्रद्धांजलि. 🙏🙏💐💐

              ओमप्रकाश साहू" अंकुर "

        सुरगी, राजनांदगॉव (छत्तीसगढ़)

Friday, 4 June 2021

जगवारीन-शोभामोहन श्रीवास्तव

      जगवारीन-शोभामोहन श्रीवास्तव


ब्रह्मा छट्ठी के रात जेन लिख देथे तेन अटल होथे, ये जिनगी के भँउरी मा सुख के सेवाद हर ओतका नहीं जनाय जतका दुख के हर जियानथे। मोरे कस कतको झन अपन अपन पीरा मा कल्हरत होहीं, मही अकेल्ला नहीं भोगत हौं कहि के सुंदरिया हर अपन मन ला धिरोवत भुँइया मा उतान परे मियार मुड़का मन ला टकटकी लगाय निहारत तात तात आँसू ला ढ़रकावत हे। सास ननंद अउ देवर के तपनी भुँजनी मा हरिनबहेरा होय जीव हर फेर कोनजनी कोन मेर लटके रहै । पानी पानी कहिके रेरियावत झाँवा खागे फेर न तो बपरी के कोनो किरवार करइया ना सरेखइया । अब्बड़ बेर पाछू  झम्म झम्म करत आँखी ला उघारथे अउ पूरा सक सकेल के घिसलत कपाट मेर आके भितिया ला थेभत ठाढ़ होथे अउ पूरा जोर लगा के बचाव बचाव कहिके हाँक पारथे, ओकर कपिला गोहार ला कोनो तो कान टेंड़के सुनथे अउ कोनो तो  मिटका देथे, पारा परोस ला तो रोजे ओकर कलकुत ला सुने के टकर परगे रहय, ककरो रुआ टेड़गा नहीं होवय अउ सोग पियास जागै तउनो कभू ओकर घर के चौंखट ला नइ नाहक सकै । फेर आज असकुस होइस ते परोसिन के पथरा असन छाती हर टघलिस अउ दनदनावत सुंदरिया घर के सिंगदरवाजा के संँकरी ला उघार के सुंदरिया जेन खोली मा धँधाय रहिस तेन खोली के आरो लेवत चारोमूड़ा गिंजरत बड़बड़ावत रहे आगी लगै अइसन धन जेन घर के छाहित लछमी के काम नइ आ सकै, महल ताने ले का होही लखटकनीन बने शान बघारत हे घर के बहुरिया पानी बर तरसत हे हत्त रे असत्तीन तोला नरक मा घलो ठउर नहीं मिलै। कोनहा के एकठन खोली मा सइघोबड़ तारा ठेंसाय रहै उहें ले सुंदरिया के गिंगियाय के आरो आवत रहै खोजत खोजत गिस अउ पथरा खोज के जब्बर तारा ला अब्बड़ कुचर कुचर के टोरत रहै तब ओती खोली भीतरी सुंदरिया के जीव पोटपोट करत रहै अब का होही भगवान कहिके ससकत बइठिस फेर गिरगे। रंभा पसीनियागे रहै तब लटपट तारा टूटिस कपाट ला उघारथे तौं अधमरा परे सुंदरिया पानी पानी कहिके आँखी ला लड़ेर दे रहै। रंभा दँउड़त अपन घर ले पानी लानिस अउ पियाये के डउल करिस तौं मार ढ़कर ढ़कर पानी पीयइ ला देखके बोटबिटावत कहिस-एक दिन मर जाबे रे बैरी जा अपन मइके मा चल दे जग मा आय हवस तौ कोनो मेर जीबे खाबे कइसे भाई भतीज मन अर्राय गर्राय दू जुआर तोर पेट ला नहीं चलाहीं । जइसे आज रंभा के डर हर मरगे रहै अउ मनुखई हर जागगे रहै तइसने सुंदरिया के घलो डर हर मरगे रहै अउ जिये के साध हर सास संग भिड़े बर कछोरा भिर डरे रहै, कोनजनी कब मोला अउ अतका संगदेवइया मिलही क नहीं कहत सुंदरिया हर ठान ठान लिस आज कहूँ सासदाई हर अपन रंग देखाही तौ महूँ जीवबचाय सेती अपन रूप देखाहूँ  आज चूकेंव तब भारी चूक हो जाही अइसे कहत डरपोकनी सुंदरिया अपन मन ला कसत रहै, ठउका ओतके बेर सुंदरिया के सास हर अपन चरबत्ता मंडली ले मूड़ ढ़ाके लहुटथे मुँहाटी ला देखत साठ ओकर एड़ी के रीस तरुआ मा चढ़ जथे, भीतरी आके देखथे तौ तारा बेंड़ी टूटे रंभा संग अपन बहुरिया ला बइठे देखथे तौ रखमखावत आके रंभा के डेना ला धरे बर करथे तौ लाम लाहकर जब्बर रंभा अइसे झटकारथे डोकरी दू भाँवर गिंजर के खोली के कोन्टा में जाके गिर परथे ।

                 अब सुंदरिया हर बल करके एक साँस मा अपन सास ला कहिथे-देख सासदाई आज तक तैं जेन करेस काबर करेस? कइसे करेस ? मैं नहीं जानौ, तोर लंबरदार बेटा संग सतभँउरी गिंजर के चार समाज के आगू तोड़ डेहरी ला पाँव परके तोर घर के बहुरिया बने रहेंव, रंग बिरंग के कुँवारी सपना ला ओलियाय अपन मइके ले निकले मैं अड़ानी का जानौं कि कोन जनम के बैरी घर बिधाता मोर भाग लिखे रहिस हे । मैं आज तक नहीं बूझ सकेंव कि तुमन मोर संग अतका अनीत काबर करथौ, मोर ले कुछु अनीत होवत होही तौ बतातेव तौ सुधारतेंव। मोर तो पहिली पठौनी के सब्बो सपना मा पहिलीच दिन आगी लगगे अउ मैं कलेचुप देखत रहिगेंव, मोर 

गोसइया तुँहर उठाय उठत हें तुँहर बइठाय

 बइठत हें, मोला मोर पति के मुँहरन तो अब्बड़ दूरिहा हे ओकर गोड़ के धुर्रा बर तरसा देव मैं चुप रहेंव, मोर बहुरिया बकठी हे कहिके गाँव भर गोहार पारेव मैं चुप रहेंव, मोला भात पानी बर तरसायेव मैं चुप रहेंव। दिनभर तुँहर बाड़ा मा बनिहारिन बूता करवा के लाँघन राखथौ तभो मोर परान नहीं छुटत हे सासदाई मोर कतका करमदंड बाचे हे ते भगवान जानै,

मैं तो तुँहर घर के लाज ला तोपे बर कलेचुप रहिगेंव सासदाई फेर अइसे झन समझहू कि कोनो कुछु नहीं जानै । मोर पेट के फोरा में तुँहर बड़ौकी के होरा भुँजागे हे । पारा परोस तुँहर मनुखबाहिर चाल के गवाही हे । जब जब मोर पेट मा भूँख के दावा ढिलाथे तब मैं बहिर टंकी के पानी ला पी पी के भाँड़ी मेर सपटे ससके ररहीन असन परोसी मन घर सित्था पेज माँगथौं जेकर दा उलथे तेन दे देथे नहीं तो अपन गड़िया करम ला कोसथौं। पहिली तीजा  मा दाई मेर लुगरा के बदला नगदी देबे  कहिके खँधो के पाँच हजार लाने रहेंव तेन पाँच सौ के नोट ला मैं हर दस बीस रुपिया के समोसा मँगाय बर अनचिन्हार मनखे मेर फेक के ददा भैया कहिके कलकूत करथौं मोर बर कुछु खाय के जिनिस लान दौ कहिके, कोनो मोर बिपत ला देख के मोर बर सोग मरै कोनो मोर भरोसाघात करथें। मोर तो दूसर उपर भरोसा करे के छोड़ आने रद्दा नहीं है। सासदाई तोर बखरी के जाम अउ बोइर के रुख मन धन्य हे ओ जेन मन मनखे ले बढ़के मोर संग देथें । जब भूँख मा आँखी तँवारा मारथे तौ जेन बोइर के रुख तरी जाके अपन फूटहा करम उपर आँसू चुचवाथौं तब उही मन अपन कच्चा पक्का फर ला झरो के मोर दुख मा धीर बँधाथें अउ जियाथे ।  मनखे के जनम धरके अतका मनुखबाहिर चाल चलथौ फेर मैं सवाँस के तुँहर डेहरी ले ओप्पार गोड़ नहीं मढ़ायेंव। तुँहर तपनी ला सवाँस के मैं जब्बर भोरहा कर परेंव सासदाई अब मैं अपन भोरहा ला सुधारहूँ कहत सुंदरिया अपन पठौनी के संदूक ला बोह के निकलिस रंभा पाछू पाछू जा के मोटर 

 बइठारिस अउ गुनत गुनत घर डहर आवत हे बीच बाट मा सुंदरिया के देवर छेंक लिस अउ कहिस -तैं कबले दूसर घर के नियाव पंचइत टोरे लगेस भउजी, हमर घर अपन टँगरी फँसाय हवस तेकर परिणाम तोला भुगतना परही। रंभा कहिस-ले चल रे बाबू रस्ता नाप मैं सुंदरिया नोहौं मोला डरुवा झन अतका दिन ले जेन पाप करत रहेव ओकर फल पाय के बेरा लकठा आगे हे, भोरहा ला छोड़ देहू दाई बेटा बेटी सब्बो झन जेल मा सिगबिगाहू । तुमन कोन से जुग मा जीथौ रे पढ़े लिखे मुरुख हो, सरकारी नियम के हिसाब से तिरियातपनी महापाप हे परोसी के लिखाय रिपोर्ट मा तको अइसे पेराहू कि तुँहर गत ला देख के दूसरो मन के पोंटा काँप जाही कहत अपन घर आके अपन गोसइया ला सबो बात ला रंभा बताथे तौ गोसइन के ये रूप घलो होही कहिके अंताजे नहीं रहै फेर बकखाय सुने पाछू कहिस तैं अउ हम माने समाज के सबो मनखे कहूँ अनीत कुरीत के आगू अइसने जब्बर बनके ठाढ़ होबो तौ सब कुकरमी जेल मा जाहीं अउ बहू बेटी मन के दुख टरही, अपन तीर तखार के घटत घटना बर हमर आँखी मूँदे के टकर के  सेती अइसन रक्सा रक्सीन ढ़िलाय हें। रंभा आज तोर रूप मा छाहित कालीदुर्गा दाई के दर्शन पागेंव ।

ओती मोटर मा बइठे सुंदरिया हर रंभा के बिसाय केरा अंगूर ला खावत घर के जेल कोठरी के बाहिर खुल्ला हवा मा पेट भर साँस साँस लेवत अउ बिसाय बोतलवंद पानी ला पीयत जीये के डहर खोजत जावत हे ।


शोभामोहन श्रीवास्तव

रायपुर

टीप-:(सत्य घटना उपर आधारित कहानी)

चुनाव आयोग म भगवान -व्यंग्य

 चुनाव आयोग म भगवान -व्यंग्य

                    भगवान के दर्शन करके , बूता सुरू करे के इच्छा म , चार झिन मनखे मन , अपन अपन भगवान तिर जाये के सोंचिन । चारों मनखे अलग अलग जात धरम के रिहिन । भलुक चारों झिन म बिलकुलेच नइ पटय फेर , जम्मो झिन म इही समानता रहय के , चाहे कन्हो अच्छा बूता होय या खराब बूता , ओला सुरू करे के पहिली , अपन देवता ला जरूर सुमिरय । बिहिनिया ले तैयार होके निकलिन । मंदिर ले भगवान गायब रहय , मस्जिद ले अल्लाह कति मसक दे रहय , चर्च ले ईसा गायब त , गुरूद्वारा ले गुरूजी गायब .......। बड़ सोंच म परगे एमन ........ । मोबाइल म , अपन अपन देवता ले गोठियाये बर , फोन लगाना सुरू करिन । काकरो मोबाइल बंद दिखावय , काकरो कव्हरेज क्षेत्र ले बाहिर ...... । भगत मन बड़ परेशान होगे । थक हार के रेंगत रेंगत , चुनाव आयोग के दफतर के आगू म , पूजा के तैयारी देखिन त , इंहींचे पूजा कर लेथन सोंचके , ठाढ़ होगिन । उहां चार झिन , मनखे कस जीव मन , अपन अपन धरम के हिसाब से , चुनाव आयोग के दुवारी म खड़े , कपाट हिटे के अगोरा म , पूजा पाठ के सकल समान ला धरे खड़े रहय । पहिनाव ओढ़ाव देखके , येमन चुनाव आयोग के दफतर म खुसरे लइक , नइ दिखत रहय । भगवान के खोज ला भगत मन भुलागे अऊ इंकर तिर म जाके , इहां आये के कारन , पूछे लगिस । 

                   ओमन बतइन के , हमन चुनाव आयोग के , पूजा करे बर आये हन । भगत मन अचरज म परगे । भगत मन केहे लगिन – अभू चुनाव सिरागे हे अऊ कहूं तिर चुनाव होये के संकेत नइ दिखत हे , काबर फोकटे फोकट , तूमन इंकर पूजा म , अपन समे नस्ट करत हव । ओमन किथे – चुनाव घेरी बेरी होतिस कहिके , चुनाव आयोग ले बिनती करे बर , आये हाबन । भगत मन किथे – नेता कस तो नइ दिखव तूमन जी ...... , चुनाव म सबले जादा कमइया , बैपारी आव का जी ? ओमन किथे – बैपारी नोहन जी , हमन भगवान अन । भगत मन बड़ हसिन । भगत मन किथे – भुंइया म गोड़ मढ़हावव जी , अगास म झिन उड़ियावव , चुनाव निपट चुके हे जनता जी ...... , जनता केवल चुनाव के होवत ले , भगवान होथे , चुनाव निपटे के पाछू जनता के का किम्मत ......? अरे चुनाव के पाछू तो , सऊंहत भगवान ला कन्हो नइ पूछय , तुंहर कस जनता ला कोन भाव दिही ....? ओमन किथे – हमन सहींच के भगवान आवन जी ...... तूमन का जानहू ? भगत मन किथे – चुनाव म वोट गिरते साठ तुंहर भगवानगिरी , कते तिर फेंका जथे तेकर पता निये , तूमन काबर , चुनई निपट जाये के पाछू घला , अपन आप ला भगवान कहिके , मजाक बनाथव जी ....?

                   ओमन किथे – मनखे कसम गो , हमन सहींच के भगवान आवन , तूमन ला बिसवास नइ होवत होही , त जाके , अपन अपन मंदिर देवाला ला देखलव , सुन्ना परे होही .....। भगत मनला सुरता आगे सुन्ना परे पूजा घर के ..... । भगवान मन बिसवास देवाये बर किथे - हमन काये करन तेमा , तूमन ला बिसवास होही ? भगत मन किथे – अपन रंग रूप बदल के दिखावव । ओमन किथे – हमन ला नेता समझे हव रे , जेमा खड़े खड़े रंगरूप बदल देबो । देखते देखत जम्मो झिन भगवान मन , चुनाव जितइया नेता कस , पांच बछर ले लुकाये कस , झम ले गायब होगिन । कुछ बेरा म फेर लहुट दिन , तब भगत मन ला , बिसवास होगिस के , येमन भगवान आय । फेर ओमन ला एक बात समझ नइ आवत रिहीस के , येकरे मन बर हमन , एक दूसर ले लड़थन अऊ येमन अइसे एकजुट हाबें , जइसे संसद म अपन तनखा बढ़होत्तरी बर , पक्ष अऊ बिपक्ष एकजुट रहिथे । इहां येकर मनके , तनखा थोरेन बाढ़ही तेमा ? एक झिन भगत पूछथे – तूमन ला का बात के कमी हे भगवान , तेमा तूमन , चुनाव आयोग म बिहिनिया ले ओड़ा दे दे हव , उहां तूमन ला , खोज खोज के जनता परेशान हे । एक झिन भगवान किथे – जइसे तूमन , हमर दर्शन करके , हमर आशीर्वाद मांगे बर आये हव , तइसने हमू मन चुनाव आयोग के दर्शन करके , ओकर आशीर्वाद ले बर , जुरियाये हन । भगत किथे – तूमन चुनाव आयोग के आशीर्वाद ला काये करहू ? एक झिन भगवान किथे - सधारन मनखेमन , हमर ले , केवल मांगथे , कुछु देवय निही | सिर्फ इही मन अइसन मनखे आय जेकर कृपा ले , हमन मालामाल हो जथन ..... ? भगत मन किथे – सरी दुनिया के देवइया तूमन आव , चुनाव अयोग कतेक दे दिही तूमन ला , ओ खुदे दूसर के कृपा म स्वांस लेवत हे । भगवान मन किथे – येमन सिध्धा देवय कुछु निही फेर अतका देवा देथे के ...... छक जथन ।

                    देवता मन भगत मनला बतावत कहत रहय – चुनाव आयोग ले हमन बिनती करे बर आये हन के , हरेक बछर म कम से कम दू ले तीन बेर चुनाव होना चाही ....? भगत मन पूछिन – चुनाव ले तूमन ला काये मिल जही तेमा ? देवता मन किथे – चुनाव आथे न , तभे हमर पूछ परख होथे जी , हमर घर कुरिया म देस के बड़का ले बड़का मनखे मन , अपन चरन रज छोंड़थे । दूसर धरम के मनखे मन घला , दूसर धरम के , भगवान संगवारी के पूजा म , लग जथे । शक्ति ले जादा , चढ़हावा चइघाथे । बछर भर के रासन , एके मनखे लान के मढ़हा देथे । खा खा के हमूमन चिकना जथन । भगत मन किथे – घेरी बेरी के चुनाव म , जनता त्रस्त हो जही भगवान ....। देवता मन जवाब देवत किहिन – तुहीमन कहिथव के , चुनाव के समे , जनता ला हमरे कस जनार्दन कहिथे , त असन म , जनता ला तो , घेरी बेरी के चुनाव म , का नकसान ....... । 

                    गोठ बात के होवत ले , चुनाव आयोग के कपाट खुलगे । चुनाव आयोग हा , देवता मन ले मिले से अऊ ऊंकर पूजा ला स्वीकार करे ले , सफ्फा इंकार कर दिस अऊ कारन बतावत किहिस के , हमन सिर्फ पंजीकृत पार्टी ले मिलथन अऊ उंकरे पूजा स्वीकारथन .........। देवता मन के , मोटाये के सपना टूटगे । छकत ले खाये बर , अवइया चुनाव के अगोरा करत , अपन अपन मंदिर देवाला म , फोकट म आशीर्वाद बांटे बर , वापिस खुसरगे बपरा मन .....।  

 हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

कुछ दिन बर*-चोवा राम वर्मा 'बादल'

 *कुछ दिन बर*-चोवा राम वर्मा 'बादल'

 हथबंद, छत्तीसगढ़


हलो---हलो---हलो--

हलो --हाँ, राजू बेटा बोल। का बात ये गा ? बड़े बिहनिया ले फोन करे हस। सब ठीक-ठाक तो हे न? भिलाई म रहइया रामसिंग ह अपन गाँव के मितान माखन के बेटा ल पूछिस।

     कहाँ ठीक हे बाबू। ददा के तबियत ह बनेच बिगड़गे हे। आप मन तो दू महिना होगे ,न तो घर आयेव ,न तो फोन करेव। उहाँ सब ठीक हे न बाबू?

     हाँ बेटा, इहाँ हमन सब बने-बने हावन।तैं तो जानत हस दू महिना होगे सख्त लाकडाउन लगे हे। तेकर सेती कोनो कोती आना जाना ते दूर ,दुवारी ले बाहिर नइ निकलत अँव----। अच्छा ,ये बता का होगे हे मितान ल ?

    का बताववँ बाबू---हमन भारी हलकान हवन। ददा के दिमाग चले बरोबर होगे हे। झाड़-फूँक करइया कोनो बइगा ल धरके आजे आ जते।

    तहूँ ह बेटा--पढ़े-लिखे होके कहाँ अंधविश्वास म परे हस।  अरे तबियत खराब हे त डाक्टर सो इलाज करवाना चाही।

   ठीक काहत हस बाबू फेर मैं का बताववँ--एक महिना म पचासों डाक्टर ल देखा डरेन फेर ददा के मारे चलही तब न ? कभू हार्ट के डाक्टर सो लेगे ल कहिथे, कभू किडनी के ,त कभू पेट रोग वाले सो, त कभू न्यूरो सर्जन करा ,त कभू आयुर्वेद वाले सो, त कभू होम्योपैथी वाले सो। हमन ल बेंदरा नाच नचवा डरत हे। ककरो दवई ल दू दिन ले उपराहा नइ खावत ये। हजारों रुपिया के दवा ल फेंकवा के फेर आन दवा लेवाथे---उहू ल एक-दू दिन खाके ,ये रियेक्शन करत हे कहिके फेंकवा देथे । तहाँ ले फेर आने दवा-- लाखों रुपिया फूँकागे बाबू।

 देख न काली जुवर रात भर नइ सुते रहिस त वोकर आँखी थोकुन ललियागे रहिस त वो ह मोला ब्लेक फंगस होगे कहिके हलकान कर डरिस। गाड़ी-घोड़ा करके तुरते एम्स लेगेंव त उहाँ जाँच करके डाक्टर कहिस --'ब्लेक फंगस नहीं हुआ है। अनिद्रा के कारण आँख लाल हो गया है।' अतका ल सुनके ददा ह---तैं कुछु ल नइ जानस।फोकट के डाक्टर बनगे हस कहिके भड़कगे रहिसे। उहाँ ले निकल के बड़े-बड़े, दू-तीन  अस्पताल के अउ चक्कर लगवाइस। सबो जगा ब्लेक फंगस नइ होये ये कहिन त लटपट म मानिस अउ घर लहुटिस।

   ओह--- सिरतोन म समस्या तो बड़ गंभीर हे राजू बेटा। कोनो मनोचिकित्सक सो इलाज करवाये ल परही---।अच्छा ,ये बता वोकर दिनचर्या अभी कइसे रहिथे। रामसिंग ह पूछिस।

      का गोठियाववँ बाबू। दाई बपुरी ह वोकर मारे परशान हे। ददा ह रात भर खुद नइ सुतय, न आन ल सुतन दय। कभू ये पिरावत हे, कभू वो पिरावत हे---कभू ये तेल त कभू वो तेल म बस मालिश करवावत अउ माथा ल ठोंकवावत रहिथे। बिहनिया पाँच बजे ले कभू ये काढ़ा ,त कभू वो काढ़ा पियत रहिथे।तहाँ ले नाना प्रकार के दवाई खवई चालू होथे। खाना-खुराक तो निच्चट टूटगे हे। पेपर ल दसो पइत पढ़थे।दिनभर टी वी म समाचार सुनत रहिथे। हमन ल कोनो सिरियल ल  तको नइ देखन देवय। रिमोट ल पोटारे रहिथे। कभू योगा करथे त कभू बाबा रामदेव के कार्यक्रम ल देखके उटपुटांग व्यायाम करे ल धर लेथे।देख न ,काली जुवर काय व्यायाम करत रहिसे त वोकर कनिहा धरले हे। हमन हलकान हावन बाबू---  तहीं बता ,पछत्तर साल के बुढ़वा ह आँय-बाँय व्यायाम करही गा---

  हाँ बेटा-- ये तो बड़ मुसीबत के बात ये फेर तैं थोरको चिंता मतकर ।सब ठीक हो जही। मैं आजे आवत हँव। ये बता अभी वो का करत हे-- रामसिंग कहिस।

      बताये म लाज लागत हे बाबू। वो ह गंभीर कोरोना होगे हे कहिके, गोबर ल सरी अंग म चुपरके वो दे अँगना म चरचरावत घाम म बइठे हे।एक घंटा म तीन पइत गोमूत्र के पान कर डरे हे। कुछु अलहन हो जही तइसे लागथे बाबू। राजू ह रोवासी बानी कहिस।

   नहीं--नहीं, अइसे कुछु नइ होवय बेटा। तैं धीर धर ,मैं आवत हँव न--। बीमारी पकड़ म आगे---मैं तुरते इलाज कर देहूँ। कुछ दिन बर पेपर अवई ल बंद करे बर लागही। टी वी के दू-चार ठन वायर ल इँच-आँच के वोला बिगाड़े ल परही। इही मन ल पढ़के अउ दिन-रात देख के वो ह डिप्रेशन के शिकार होगे हे।

  कुछु कर लेबे बाबू फेर तैं जल्दी आजे आव।

  हव कहिके रामसिंग ह मोबाइल ल बंद करिस अउ अपन मितान गाँव आये बर तइयार होइस।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

 हथबंद, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ म गद्य साहित्य*

 *छत्तीसगढ़ म गद्य साहित्य* 

 *भाग-1* 


छत्तीसगढ़ी बोली भाषा - क्षेत्र के दक्षिण पुर्वी विस्तार ल सम्हाले हे| अखड़ रूप म ए क्षेत्र विशेष के भाखा द्रविण -भाषा परिवार के आदीभाषा रूप गोंडी उरांव, तेलंगी,दोरलीऔर आग्नेय भाषा परिवार के आदी भाषा रूप कोरकू खड़िया खेरवारीमन उपमक्षेत्र म समाहित हे|छत्तीसगढ़ी अपन चारो कोति ले अन्य भाषा ले घेराय हे| एकर कारण हे छत्तीसगढ़ भौगोलिक परिक्षेत्र के बनावट|पुर्व म उडड़िया के प्रभाव हे ,पश्चिम म मराठी के,उत्तर पश्चिम म बुंदेली  बघेली हिन्दी के,और दक्षिण भाग म तेलुगू के|

 समे - समे म छत्तीसगढ़ के राज पाठ, संस्कृति, सम्पदा म  होय आक्रमण के सति भाषा साहित्य के उपर घलो अतिक्रमण होइस| लगातार उत्तर -पश्चम आवज्रन, और स्थापन्य ले परिवर्तन और परसंकृतिकरण होय हे|

   देश विदेश के बुधियार और गुणमानी शोधकर्ता भाषा- वैज्ञानिक,साहित्यिक विचारक और भाषाविद ,दार्शनिक मनिषी मन छत्तीसगढ़ी ल स्थानीय रूप म उत्पन्न जन भाखा माने हें| लोकक्रिया के भाखा माने हें|जउन हर हिन्दी के अर्ध मागधी (मगही- हिन्दी) ले मेलखाथे| पर हर क्षेत्र म एकर स्वतंत्र अस्तित्व हे| काबर कि ए बोली-भाखा हर छत्तीसगढ के घरोघर, गली- गली ,गाँव -गाँव खेत - खार के संगेसंग लोक संस्कार, लोक जीवन और लोकशैली के रूप म तनमन रचेबसे हे, अंतरमन म समाये हे ,हिरदे - आत्मा म पोहे हे|| छत्तीसगढ़ी भाषा के व्यापार छत्तीसगढ़िया मनके लोकदर्शन हरे |छत्तीसगढ़ी बोली ल अलग कर दे जावय तव छत्तीसगढ़िया निष्प्राण हो जही बिन जल मछली कस| ए प्रयास भी करे गइस पर लोगन के आत्मा ले छत्तीसगढ़ी ल  निकार नइ पाइन|

       *छत्तीसगढ़ी भाषा विकास के अध्ययन करवइया मन के विचार जानना भी जरुरी हे फेर छत्तीसगढ़ी  साहित्य के होम हवन भी सुंघना हे|* 

 *भाषा के पहिली पहल शोध ग्रियर्शनहर करीन|ए ग्रामर आफ छत्तीसगढ़ी डायल्क्ट1890 .ए हर छत्तीसगढ़िया लेखक हीरालाल काव्योपाध्य के  छत्तीसगढ़ी बोली व्याकरण के अनुवाद लेखन मात्र आए|** 

 उंकर शोध ग्रंथ के कुछ अंश सरलग *लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया नाम ले के 1904 प्रकाशित होइस|** 

एमा छत्तीसगढ़ी ल  हिन्दी के ही भाग माने गए हे | कारण एक समान लिपि ल माने गइस|ए कहाँ तक नियाव संगत हे अभो महाशोध और सूक्ष्म खोज के विषय हे| परवर्ती शोधार्थी मन इही ल आधार मानत चले गँय |

जेमन हे, ए ग्रामर आॕफ छत्तीस गढ़ी डायलक्ट आॕफ हिन्दी- लोचन प्रसाद पाण्डेय जी भालचंदर राव तैलंग जी - *छत्तीसगढ़ी हलबी भतरी बोलीयों के वैज्ञानिक अध्ययन , *  डाॕ शंकर शेष  छत्तीसगढ़ी भाषाशास्त्री अध्ययन , कांति कुमार जी के छत्तीस गढ़ी व्याकरण और कोश| इही क्रम म कतकोन नाम हें-भाषाविद  साधना जैन जी, डाॕ . चितरंजनकर सर,रमेशचंद्र महरोत्रा जी हवें | *फेर शोध के दिशा बदलिन कवि समीक्षक ,कथाकार,गीतकार उपन्यासकार, सिद्धपुरुषहर डाॕ नरेन्द्र देव वर्मा जी हर|1979  म छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास -डाॕ. नरेन्द्रदेव वर्मा के खोज खरोय और छत्तीसगढ़िया विचार ले तपे विश्लेषणा अऊ दृष्टांत ले समृद्ध ग्रंथ हर पूर्व के शोध म नवा अंजोर बगराइन|* साथ ही इकर महत्वपूर्ण उपन्यास सुबह की तलाश नेह के ईंट बरोबर हे|मोला गुरु बनाइलेते-नाटक और 

ढोलामारू रूपक हर काफी लोकप्रिय होइस| *अपुर्वा - छत्तीसगढ़ी गीत* संग्रह हे जेखर गीत *अरपा पैरी के धार अब छत्तीसगढ़िया मनके राजगीत हवे* | आप मन के शोध के प्रभाव होइस कि 1981 के जनगणना म आपके शोधे भाषा ल शामील करे गइस|

  *एक और महत्व पुर्ण नाम शामील करे के आवश्यकता होवत हे| जउन हें कवि, समीक्षक ,पत्रकार ,संपादक-डाॕ विनय कुमार पाठक जी जिन्कर कृति छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ साहित्यकार, सिद्ध शोध ग्रंथ गद्य क्षेत्र बर मील के पथरा हे|* 

मूल बात ए हरे कि पटाक्षेप नइ कर के मौलिक अऊ यथार्थ चिंतन होवय| एकर सबो पक्षधर हवँय फेर थोकन इतिहास ल झाँके म आत्म ज्ञान सँचर थे  | अइसन सोंच हर विकास अनुगामी बताय गय हे| 

पुरखा मन के दिखाय रस्ता ल थाम्हे चलना, उनकर  सम्मान आए| छत्तीसगढ़ी गद्य इतिहास के पुरोधा साहित्यकार और जूनेटहा कलमकार के सुरता जरुरी हे|ए सबो खम्हीया  मन बर एक आदरांजली होही कि जऊन  *धरसा* उन बनाय हें वो मंजिल तक पहुचाही| एक बखत मुखिया के रेंगे,भले फुदकी परे चिन्हा हे,चले म सहुलियत होथे| नरवा झोरकी के पानी हर सरकत थोकन बड़े नँदिया अउ बड़े नँदिया के हर महानंद म समा जथे, फेर ए महानंद हर सागर म मिल जथे| तव नरवा झोरकी हर भी तो संसाधन देथे| उही किसम कलम के धार कखरो अउ  कउनो के सरसरा सकथे| पोठ हो सकत हे|  जंगल के पँयडगरी म गोल्लर पाछू नान्हे नान्हे बछरु मन तको रेंगत एक दिन बुधियार गोल्लर बनथें|अउ गौठान म  उकर भी आरती उतरे लगथे|

      हँस हर अपन पिलवा ल जब उड़े ल खीखोथे तव कइसे सीखोथे| काफी ऊँचाई  तक अपन पीठ म लाद के ढोथे| फेर कई जोजन उपर ले जा के पीठ ल उदका के छोड़ देथे| और नीचे आके फेर पीठ म बैठाके ऊपर ले जथे| ए उदिम हँस हर तब तक करथे जब तक पिलवा हँस अपन पाखीं खोल के उड़े ल नइ सीख जावय| 

 

इही हर एक परंपरा आए| फेर कोनो  साहित्य समाज के आधार तो मुड़का ही आए| धारन के नइ रहे ले पटिया का मा टिकही ? फेर छानही के बनगत कइसे होही|

पोठ धारन खड़े ले साहित्य समाज तको वोतके मजबूत होही|

              जब पाँच हजार साल पीछू के इतिहास हमन ल अतेक आनंदित करथे| तव हजार साल पहिली के हर वोतेक ऊबाय भी नइ|

जून्ना पेड़ ले ही नवा नवा फूल फर आथे| नवा फर ल फेर धरती म गड़े ल परथे तव अंकुरन होथे| और एक दिन सिरज के झलार करथे| वइसनहे  कोनो भी भाखा के साहित्य होय साधक अउ माध्यम दूनो के आधार मुड़का साहित्यिक व्यक्तित्व मन आँए|

           जिन्करे पुन परतापे कुछ नवा करन,उँखर कागज -पोथी - पतरी ले संस्कार अउ संस्मरण लेवत अपन मती ल सजोर कर सकत हवन| कुछ हजार साल पहिली छत्तीसगढ़ी भाखा हर मनखे के विचार अभिव्यक्ति के माध्यम बनीस|

      तव  आधुनिक शोध  आलेख करवइया मन छत्तीसगढ़ी बोली के जनम १००० ई सन के आस पास मानथें| भाषा साहित्य के बात करन तव मौखिक वाचिक परंपरा के कहिनी कहावत ,हाना , लोकोक्ती ,जनऊला , मन लोकसाहित्य के बिछौना आए|

धिरे ले साहित्य ल राज घराना संरक्षण मिलिस और हैहयवंशी- कलचुरी काल म राजधानी रतन पुर म छत्तीसगढ़ी बोली ल आश्रय मिलेलगीस|

क्रमशः..........

अश्वनी कोसरे कवर्धा कबीरधाम



*छत्तीसगढ़ी भाषा के गद्य साहित्य* 

 *भाग- 2*


हमर छत्तीस गढ़ महतारी हर नैसर्गिक सौंदर्य ,अद्भूत रोमांचकारी और रमणीय प्राकृतिक भू-भाग ले सुसज्जित हे| महतारी के कोरा म अन्न -धन के भण्डार हवय|अकूत और विपुल संपदा के समृद्ध,धनी भुइँया म कोनो रतन के कमती नइ होय हे|

जैसे किसम किसम के रतन पदारथ ल समेटे हे वइसन हे किसम किसम के फसल सियारी के जननी हे | ए भुइँया तो सरग बरोबर हे| समृद्ध महतारी  भुइँया हर आदीम परंपरा,संस्कृति अऊ संस्कार ले तको परिपुर्ण हे| खनिज संपदा , वन संपदा और जल संपदा के संग भोला - भाला ,सरल -सहज ,सदगुणी मनखे संपदा ल घलो सम्हारे हे|

तव उँखर ए तपसी , करमइता और सेवक बेटवा मन अपन महतारी के गुणगान , गाथागान  सेवाबजावत जसगान घलो करे हवँय  | अऊ सदा होवत रइही ए परम्परा बने रइही|जब ए सब संपूरण सबो जिनीस मिले हवे तव भागमानी बेटा- बेटी मन महतारी के अस्तित्व ल बनाय राखे और बढ़ाय खातिर अपन बोली भाखा म साहित्य जतन घलो करे हवँय|

ए बात अलग हे के छत्तीसगढ़ म पद्य साहित्य तो भर पुर मिलथे| और एकर भण्डार भरे हवय सरलग पोठ होवत हे.छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन के तुलना में छत्तीसगढ़ी पद्य लेखन पारंम्परिक रूप ले अधिक शसक्त प्राचीन और विकसित हे|

 *पर गद्य साहित्य के कोठी थोरकन उन्ना हे!* 

  *समय और आवश्यकतानुसार सिरजन जरुरी हे| ताजा समय हर छत्तीसगढ़ी गद्य परंपरा और प्रवृत्ति ल बहुआयामी स्वरूप प्रदान करे के दिशा म प्रयासरत* हे| 

            *दंतेवाड़ा शिलालेख 1703ई.,कलचुरी शिला लेख1724ई. अऊ ,अंतिम कल्चुरी शासक के राजा अमर सिंह के आरंग शिलालेख ल छत्तीसगढ़ी गद्य के उन्मेष माने जाथे| कई शिला लेख और प्रसस्ति लेख मन के अध्ययन होना बाँचे हे जेमन  छत्तीसगढ़ी गद्य के और प्राचीनता ल सिद्ध* कर सकत हें|

 पाली ,तुम्माण, भोरमदेव , खल्लारी  के प्रसस्ति आलेख जोगीमरा गुफा कबरा पहाड़ , सिंघन गढ़ के चित्र आलेख अभी अपन प्रकाश म नइ आए हें|

राजकीय संरक्षण म रतनपुर के प्रसस्ती लेखन बाबू रेवाराम पंडित द्वारा छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन  (द्वार प्रस्सस्ती  मुखभाग  ) होय के जान कारी खूबतमाशा नामक ग्रंथ म उल्लिखित हे| ज उन हर ततकालीन समर के भाखा के जानकारी देथे| खैरागढ़ गद्यात्मक शैली के प्रसस्ती लेखन के जानकारी भी उपलब्ध हे ए हर दलम सिंह राव द्वारा करवाय गय रहीस|

     अइसे ही लोक परंपरा , संसकृति ले मेल करथ  गद्यात्मक साहित्य हर स्थापित होवत हे|

 *कहानी,निबंध , लोकगाथा , जीवनी, लघुकहिनीया लघुकथा  नाटक ,उपन्यास ,एकांकी, रिपोतार्ज, यात्रा विवरण, पर्यटन आलेख, समीक्षा साहित्य , शोधपत्रसंपादन प्रकाशन , आलोचनात्मक साहित्य और टिप्पणी आलेख , डायरी लेखन  हाईकू और क्षणिका मन के सुरुआत होइस |* छत्तीसगढ़िया पाठक मन भी पोठ साहित्य ल हाथों हाथ लेथे| और अच्छा रचनाकार ल अपन नयन नक्श म बइठा के रखथें| कुछ नामी साहित्यकार मन के अमर कृतित्व के चर्चा करन तव नाम आथे कहानीकार पं बंशीधर पाण्डेय जी के जिन्कर एक ही कृति  *हीरू के कहनी* हर शीर्ष ख्याति दिलादिस ,साहित्य शिखर म स्थापित होगें||

आपमन के कुल तीन ही रचना उपलब्ध हे. एक हिन्दी और एक उड़िया म हे|

अइसे अनुकरणीय उदाहरण हें| आज खातू कचरा असन साहित्य के बाढ़ आगे हे | हमन ल ठोस व पोठ साहित्य चाही जऊन अवइया पीढ़ी ल निसेनी दे सकय|

गंभीर मूल्यांकन , चुस्त संपादन और वृहत समीक्षा होय विधा के सबो पक्ष उजागर होय| 

अइसन उदाहरण हें *पंडित लोचन प्रसाद पांडेय कृत नाटक "कलिकाल",शिवशंकर शुक्ल के  उपन्यास" दियना के अंजोर* , मोंगरा, रधिया श्री *नंदकिशोर तिवारी कृत एकांकी "परेमा"* |

डाॕ खूबचंद बघेल रचित नाटक " करम छड़हा"|केयुर भूषण कृत फुटहा करम |लखन लाल गुप्त के *सरग ले डोला आइस* कुछ  परमुख निबंधकार मन के निबंध 

लखन लाल गुप्त के *सोनपान* 

धान के आत्म कथा और छत्तीसगढ़ के आत्म कथा के सुघ्घर उदाहरण हे कपिलनाथ कश्यप कृत *निसेनी* पं श्याम लाल चतुर्वेदी कृत " *भोलवा भोला राम बनीस* 

श्री परदेशी राम वर्मा जी द्वारा रचित *मय बइला नोहव "* नाटक हे|

डाॕ राजेंद्र सोनी जी के " *खोरबहरा तोला गाँधी बनाबो"*कहिनी, डाॕ पालेश्वर शर्मा जी के *सुसक झन कुर्री सुरताले*  स्व. लक्षमण मस्तुरिहा जी,विनय कुमार पाठक  रचित कहानी छत्तीसगढ़ी लोक कथा|  बहुत से विदूषी  साहित्यकार मन के भी स्थान हवय छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य म निरूपमा शर्मा- बुंदों का सार , पतरेंगी, सकुनतला तरार - बन कइना, सरला शर्मा आखर के अरघ| दीदी सुधावर्मा जी समालोचक ,समीक्षक ,संपादक मड़ई देश बंधु| आदरणीया दीदी वासंती वर्मा जी|

       जून्ना कतकोन कलम कार भी हवँय जिन्खर साहित्य जगत म योगदान कभू भुलाय नइ जा सकय | एमन हे , छत्तीसगढ़िया पुरोधा कवि लेखक सव्तंत्रता सेनानी ,संपादक पं सुंदर लाल शर्मा जी, ठाकुर हरि सिंह , पदुम लाल पुन्नालाल बक्क्षी जी , गजानन माधव मुक्तिबोध ,नारारण लाल परमार जी,  टिकेन्द्र टिकरिहा, डाॕ राजेंदर सोनी जी, श्री राम कुमार वर्मा जी, सुकलाल पांडे जी, कपिल नाथ जी - *खुसरा चिरई के बिहाव* ,ऊर्मिला शुक्ल जी ,जय प्रकाश मानस - कला दास के कलाकारी,जीवन यदु,सीताराम साहू, राम लाल निषाद , रामेश्वर शर्मा, पाठक परदेशी राम  डा जे आर सोनी जी,डाॕ विनोद लर्मा जी,  एमनदास मानिक पुरी जी, दादूलाल जोशी जी, डुमन लाल ध्रुव डाॕ अनिल भतपहरी जी, डाॕ सुरेश तिवारी जी,डाॕ पी सी लाल यादव जी ,रामप्रसाद कोसरिया जी ,डाॕ पी डी सोनकर जी,प्रदीप कुमार दास, परमेश्वर वैष्णव, रमेश विश्वहार ,आदरणीय श्री सुधीर शर्मा जी , श्री सुशील भोले जी श्री रामनाथ साहू जी,  श्री चोवा राम बादल जी, श्री बलदाऊ राम साहू जी ,श्री रमेश शर्मा जी, डाॕ साकिर अली जी, श्री निरज मंजीत जी, श्री अजय चंद्रवंशी जी और झेंझरी लिखव इया डाक्टर गोरेलाल चंदेल जी

अइसन बहुत से गुनीमानी प्रगतिशील लेखक मन गद्य साहित्य साधना म रत हें और र इहीं|और गद्य साहित्य भी अब छत्तीसगढ़ मा भरमार  उपलब्ध हे|

*छत्तीस गढ़ी उपन्यास भूलनकाँदा उपर आधारित* फिल्म हर फिल्म जगत में राष्ट्रीय खिताब जीते हे|  

आज छत्तीसगढ़ी साहित्य के पोठ धरातल (पृष्ठभूमि )और कथावस्तु,कथानक , हर राष्ट्रीय रंगमंच के माध्यम ले अऊ छत्तीसगढ़ी सिनेमा के राष्ट्रीय पटल म प्रदर्शन हर छत्तीसगढ़ी साहित्य के मजबूत उपस्थिति, उपादेयता ल अनुप्रमाणीत करत हे| जनमानस ल जागृत करत हे 

ए सिरिफ मनोरंजन के साधन मात्र नइ होके जिनगी जिए के प्रेरणा घलो देवत हे|

      व्यक्तिगत साहित्यकार हर अपन कृति ल सुरक्षित रखे के भरपुर प्रयास करथे ल|

वो अर्जित ज्ञानतत्व ल बाँटथे भी लेकिन जिम्मेदार व ईमानदार उत्राधिकारी नइ मिल पावय |

आज छत्तीसगढ़ी गद्य के सबो विधा के साहित्य प्रचुर मात्रा म उपलब्ध हे| वोला सहेजे और सरेखे के महती आवश्यकता हे|

एकर संधान करे के जरुरत हे|

अब तक के ए सबो विधा म होय परमुख अमर कृति मन ल व उंकर पाडूलिपि ल संरक्षित करे ल परही|और कृतिकार मन ल यथोचित सनमान देना होही|संकलन ,संग्रह और नवा तकनिकी जतन ले वेभ फार्म म ,वेभ पाकेट के रुप म,  ई - लाइब्रेरी और ई -सुरक्षा कवच म पिरोय के दायित्व सक्षम हाथ ल करना होही| 

           एकर जवाबदेही तय होय जउन उचित संस्था के निगरानी व निरीक्षण म होय|

व्वसायिक और रोजगारपरक होय ले भाषा साहित्य हर जल्दी विकसित होथे| तेपाय के छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकार मन ल प्राथमिकता देवँय | शालेय और उच्च शिक्षा के विद्यर्थी मन के बीच म छत्तीसगढ़ी भाषा म सम-सामयिकविषय म निबंध नाटक लेखन , प्रतियोगिता होय |उकर पाठय क्रम म एक विशेष विषय के प्राथमिकता क्रम म शामील  राहय| विविध विधा ल अइसे.ही जनसमूह समाज के बीच बगरावँय| समाचार पत्र- पत्रिकामन म छत्तीसगढ़ी आलेख कहिनी नाटक मन ल व , साहित्यकार मन के विचार ल प्रमुखता ले छापँय |  विशेष कालम के संगेसंग  आने पन्ना म हरदिन स्थान मिलय|सबो सरकारी अर्धसरकारी, सहकारी और निजि संस्थान म घलो छत्तीसगढ़ी ल प्रोत्साहन देवँय| बिजहा और माई कोठी नंदा गय सोरपतॎ न इ चलत हे| आयोग अऊ  भाषा विभाग मन तको बने सुसतियावत हें|

अइसे म कयइसे साहित्य हर समाज के दरपन बन सकही|

घर के न घाट के होगें|

 सरकारी प्रयास होथे फेर खानापूर्ती ले छत्तीसगढ़ी गद्य  साहित्य के छत्तीस हाल होगे हे  आज भी अपन बढ़वार  के रसता जोहत हे| 

          *एमा हर स्तर के इकाई के जिम्मेदारी हे मजबूत मानसिकता के संग प्रकाशक और संपादक ल तको गंभीर और कर्तव्य निष्ठ होय के जरुरत हेवे के इन सही साहित्य के संपादन और प्रकाशन करँय |* 

                 *अगर साहित्य सामग्री समाजोपयोगी , ज्ञानवर्धी या साहित्यिक विधा म नइ हे तव श्रम और संसाधन के संग समय और ऊर्जा के अखारत व्यय आए| एमा जागरुक बुधियार साहित्यकार और पाठक  मन के तको जिम्मेदारी हे के वो मन आमा ल आमा और अमली ल  अमली लिखँय और पढ़ँय , कहि सकँय| |* 


अश्वनी कोसरे कवर्धा कबीरधाम