Saturday, 10 September 2022

जनकवि बिसम्भर यादव 'मरहा' (6 अप्रैल 1931 - 11 सितम्बर 2011) - दुर्गा प्रसाद पारकर


 

जनकवि बिसम्भर यादव 'मरहा'

(6 अप्रैल 1931 - 11 सितम्बर 2011)


- दुर्गा प्रसाद पारकर 


देखव हमर छत्तीसगढ़ कतेक महान हे,

सुनव हमर छत्तीसगढ़ अतेक महान हे।

छत्तीसगढ़ महतारी के मया म सबो बरोबर हे,

सब झिन एक समान हे, सुनव हमर छत्तीसगढ़ अतेक महान हे।

बिसम्बर यादव 'मरहा', सुनव हमर छत्तीसगढ़ अतेक महान हे।


हमर छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा म डॉ. खूबचंद बघेल, द्वारिका प्रसाद 'विप्र', कोदूराम दलित, हरि ठाकुर, उधोराम झखमार, नारायण लाल परमार, भगवती सेन, मेहत्तर राम साहू, नरेन्द्र देव वर्मा, बद्री विशाल परमानंद यदु, चतुर्भुज देवांगन, हेमनाथ वर्मा 'विकल', निरंजन लाल गुप्ता अउ जनकवि बिसम्भर यादव 'मरहा' कस कतनो विभुति मन जनम धरीन।

दुर्ग ले तीन किलोमीटर दुरिहा गांव बघेरा म भजनहा कुशाल यादव अउ चैती बाई के कोरा म गुड्डू बिसम्भर हा 6 अपै्रल 1931 के दिन अँवतरिस। कुशाल यादव हा राजमिस्त्री अउ मूर्ति कला म पारंगत रीहिसे। अपन ददा कस 'करनी' अउ माटी-गोटी संग खेलत-कूदत बिसम्भर ह देखते देखत स्कूल जाय के लइक होगे। लइका ह बने पढ़ लिख के अपन जीवन ला गढ़ही कहिके कुशाल यादव ह अपन दुलरूवा ला स्कूल म दाखिल करा दिस। 7 जुलाई ले दिसम्बर तक स्कूल के मुंहु ल देख पाइस ताहन बिसम्भर के मन ह पढ़ई म लगबेच नइ करीस। घर ले स्कूल जाय बर निकले अउ नवापारा दुर्ग म भांगर देव मंदिर म बइठे राहय। भगवान ह तो बिसम्भर ला पढ़े बर नही बल्कि कविता गढ़े पर भेजे रीहिसे। कुशाल ह रोजी रोटी के जुगाड़ म लगे राहय एती बिसम्भर हा अपन संगवारी मन संग खेलकूद म मगन राहय। एक दिन रामचन्द्र देखमुख के ददा के नजर हा भांवरा, बांटी खेलत बिसम्भर यादव ऊपर परगे ताहन दाऊ जी ह बिसम्भर ल अपन घर राख लीस फेर बिसम्भर ल जादा दिन राख नइ पइस दाऊ बाड़ा म। जाने सुने के लइक होइस ताहन अपन रोजी-रोटी के जुगाड़ मा भीड़गे अउ दाऊ बाड़ा ला छोड़ के लकड़ी फाटा छोले चांचे बर सीखे बर धर लीस।

रामचन्द्र दाऊ ह मालगुजार बाप के बेटा रीहिसे। नवा-नवा वकीली पढ़ के गांव म आय रीहिसे। वो बखत वोकर जबर रूतबा रीहिसे। वो समे बिसम्भर ह लगभग 14-15 बच्छर के रीहिसे। गांव वाले अउ दाऊ के झगरा के जहर ला पी के बघेरा गांव के शांति अउ सद्भाव ह मरे बर धर ले रीहिसे। बिसम्भर यादव मोला बताए रीहिसे-एक दिन के बात आय-बाड़ा म दस झिन के बिचार ल अपन-अपन लिफाफा म भर देन। दसो लिफाफा म जब दाऊ जी ह खोधिया के निकालिस ल वोमा मोरे लिफाफा ह हाथ लगगे। लिफाफा ल खोल के कागज ला जब फरिहा के दाऊ जी पढ़िस त वोमे लिखाय रीहिस -


प्रजा पालन राजा करे,

पुत्र पालन करे मां-बाप।

का दुसर के कहिनी म,

लड़त हवव सब आप।


कविता के पढ़ते भार दाऊ जी के आंखी ले आंसू ह तरतर-तरतर निथरगे। कोतवाल करा हांका परवा के चौपाल म गांव वाले मन के बइठक सकेलिस। गुटबाजी अउ मनमुटाव के कचरा ल सरो के खेत बर खातु बना डरिस ताहन इसी खातू के भरोसा चंदैनी गोंदा के सोर ह भारत भर बगरीस। बिसम्भर यादव सोचिस कि जब चार लकीर के कविता म गांव के अतेक बड़ समस्या के निदान होगे ता फेर अऊ कविता लिखहंू ते देश के बड़ेब बड़े समस्या के हल हो सकथे। लोगन मन बर मोर कविता खुशहाली के साधन बन सकथे। इही आशा म बिसम्भर यादव कविता गढ़े के शुरू करीस। एक डाहर दाऊ रामचन्द्र देखमुख ह चंदैनी गोंदा के तैयारी म लगगे। दुसर डाहर बिसम्भर यादव ह कविता अउ परिवार गढ़ई म लगगे।

बिसम्भर यादव ल भाग्य ले भगवन्तीन कस गोसइन मिलिस जउन कविता के प्रेरणा बनीस। दुनो झन के डाला शाखा बाढ़िस। तीन झिन दुलरूवा बेटा- जीवन, रमेश, अरूण अउ दु झिन दुलौरिन बेटी कांती अउ दुलारी ह पीपर पेड़ के छइहां म खेलत-कूदत बाढ़िन। जीवन यापन बर बढ़ई गीरी के संगे संग चंदैनी गोंदा मा जीपरहा कवि के अभिनय घलो करय। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक नाट्य कारी म 'पटइल' के अभिनय करके जनमानस ल अपन अभिनय के लोहा मनवा लिस। बिसम्भर कवि के संगे-संग बढ़िहा कलाकार घलो रीहिसे। तभे तो कविता ला पूरा अभिनय के संग प्रस्तुत करय।

वोकर बाद तो गांव के मंच ले बड़े-बड़े कवि सम्मेलन म बिसम्भर यादव के कविता यात्रा शुरू होगे। टेमरी (सिमगा) म पं. द्वारिका प्रसाद 'विप्र' के बरसी कार्यक्रम म छत्तीसगढ़ के जाने-माने कवि मन नेवताये रीहिन हे। कवि सम्मेलन मा बिसम्बर यादव ह 'मरहा के आंसू' कविता ल सुनइस -


भेदभाव ल छोड़ के

सब भारतवासी कूद परीन

आजादी के सागर म

आजादी तो मिलिस लेकिन

सागर समा गे कुछ गागर म

तो गागर ल फोरना जरूरी हे

अपासी के पानी बंजर म बोहावत हे

वोला फसल डाहर मोड़ना जरूरी हे

एक डाहर पानी फोकट बोहावत हे

दुसर डाहर पानी बिना फसल सूखावत हे

बिसम्भर यादव मरहा दुसर डाहर पानी बिना फसल सूखावत हे।


कविता ले प्रभावित हो के माई पहुना संत कवि पवन दीवान अउ वरिष्ठ साहित्यकार श्यामलाल चतुर्वेदी के अध्यक्षता म चंदैनी गोंदा के सर्जक दाऊ रामचन्द्र देखमुख ह ये प्रस्ताव रखीस कि बिसम्भर यादव ह अपन उपनाम 'मरहा' राखय। सुनते भार सबो झिन समर्थन कर दिन ताहन उही दिन ले बिसम्भर यादव ह बिसम्भर यादव 'मरहा' होगे। धन दौलत ले यादव जी भले मरहा रीहिसे फेर कविता म सजोर रीहिसे। छत्तीसगढ़ भर रामायण सम्मेलन ह बिसम्भर यादव बिना अधूरा लागय। रामायण सम्मेलन के माध्यम ले बिसम्भर यादव जन-जन के हिरदे तक पहुंचगे ताहन तो बिसम्भर यादव छत्तीसगढ़ के जनकवि बिसम्भर यादव 'मरहा' होगे।

पांच हजार ले जादा मंच मा टोपी लगाये धोती कूरता पहिरे सइकिल म जा-जा के कविता पढ़इया मरहा जी ल इंडिया टू डे हा मैराथन कवि के रूप म छापे रीहिसे। छत्तीसगढ़ म तो मरहा नाइट चलै। मरहा ल डॉ. पाटणकर के संगति म डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, दीनदयाल उपाध्याय, गुलजारी लाल नंदा, अटल बिहारी वाजपेयी अउ यशवंत राव चौव्हाण जइसे व्यक्तित्व मन ले भेंट करे के मौका मिले रीहिसे। महात्मा गांधी ले प्रभावित छत्तीसगढ़ के कबीर सादा जीवन अउ उच्च बिचार ला पोसे रीहिसे। यादव जी मंच के पारखी रीहिसे। कते कविता ल कहां सुनाना हे तेखर चयन म हुशियार राहे। सबो वर्ग बर आनी-बानी के कविता वोकर कोठी म भराय राहै, वहू मुखाग्र। लगभग 300 कविता मुखाग्र रीहिसे मरहा ल। यादव जी काहय अलवा-जलवा अक्षर अज्ञान ले मोला खुशी के काबर कि जादा पढ़तेंव-लिखतेंव ते अपन पढ़ई-लिखई के घमण्ड हो जतीस ताहन अतेक अकन कविता ला सुरता नइ कर पातेंव।

बिसम्भर यादव 'मरहा' के ददा कुशाल यादव ह तमूरा अउ चटका धर के भजन गावय तिही पाय के कुशाल ल भजनहा घलो काहय। आजो घलो यादव घर ल भजनहा घर के नाव ले जानथे। मरहा ल घलो भगवान राम के प्रति अपार प्रेम रीहिसे तभे तो छोटे डायरी के एक पन्ना म रोज राम-राम लिखय। रामायण सम्मेलन म साल भर कविता पढ़े के सेती बिसम्भर यादव ल भक्त राज के नाव ले घलो प्रसिद्ध होगे। भक्त राज जनकवि बिसम्भर यादव मरहा ह जिनगी के सार बताये हे -


सुख, दुख तो भगवान के विधान हे

हमर जीवन हा दिन अउ रात के समान हे

बिसम्भर यादव मरहा-हमर जीवन ह दिन अउ रात के समान हे।


अब तक ले बिसम्भर यादव 'मरहा' के दु ठन काव्य संग्रह 'हमर अमर तिरंगा' अउ 'माटी के लाल' डॉ. गिरधर शर्मा अध्यक्ष-छत्तीसगढ़ साहित्यकार परिषद बिलासपुर के संपादन म प्रकाशित होय हे। छत्तीसगढ़ के लाल म प्रमुख रूप ले रविशंकर शुक्ल जी ला परनाम, बाबा गुरू घासीदास ल परनाम, वीर नारायण जी ल परनाम हे, श्रद्धा सुमन डॉ. खूबचंद बघेल ल, छत्तीसगढ़ के वीर सेनानी, छत्तीसढ़हीन महिला मन के बलिदान अउ हमर अमर तिरंगा म भारत भुइयाँ के पूजा, अइसे मिलिस आजादी, भारत के स्वर्ग काश्मीर, पारसमणी महात्मा गांधी, सुरता नेहरू जी के, आजादी के आधार आदि कविता मन शामिल हे।

बड़े बेटा जीवन यादव ह अपन भजनहा बबा अउ भक्तराज ददा के परम्परा ल आघू बढ़ावत रीहिसे ओह जगत जननी महामाया के जसगीत लिखय। दुरिहा-दुरिहा ले वोकर सोर बगरे रीहिसे। सन् 2000 म अकस्मात बड़े बेटा के इंतकाल होवइ ह घर भर ल दंदोर दिस। मरहा के छोटे बेटा अरूण ह बतइस कि बड़े भइया के गुजरे ले महतारी ल भारी सदमा लगिस। महतारी ल पहाड़ असन दुख ल नइ सहि सकिस अउ चार-छै महीना के भीतर महतारी घलो सब झन ल छोड़ के स्वर्ग सिधारगे। वोकर बाद तो बिसम्भर यादव दुख के सागर म बुड़गे रिहिसे। तभो ले हिमालय कस हिम्मत वाले बिसम्भर यादव 'मरहा' कविता पढ़े बर नइ छोड़िस। 'आसु' कवि मरहा काहय -


वोइसे तो जिनगी एक सफर हे

मरना सबला हे इहां कोन अमर हे

अपन बर जीना कोई जीना हे

अपन बर जीने वाला तो जानवर हे

बिसम्भर यादव मरहा-अपन बर जीने वाला तो जानवर हे।


जानवर केहे म सुरता अइस कि मरहा के गोसइन ला खतम होय लगभग छै-सात बच्छर होय रीहिसे बांवत बियासी के बखत बघेरा म एक ठन बइला ह बिसम्भर ल उठा के दनाक ले पटक दिस। मरहा के जेऊनी हाथ फ्रेक्चर होगे। माई पिल्ला बिक्कट सेवा करीन। बहू-बेटा मन दिन-रात सेवा म लगे राहय। ले दे के बने होइस ताहन साइकिल मा दुरूग जावत रीहिसे। जावत-जावत चण्डी मंदिर करा गिरगे। अब तो दुब्बर बर दु अषाढ़ होगे ताहन फेर इलाज पानी चलिस फेर थोर बहुत बने होइस ताहन घर म बदाक ले गीरिस ताहन उठबे नइ करीस। तीन साल ले खटियच्च म रीहिस। घर म जाके 7 अप्रैल 2011 के दिन चिन्हारी साहित्य समिति (संयोजक-दुर्गा प्रसाद पारकर) भिलाई डहार ले छत्तीसगढ़ के गरिमामय चिन्हारी सम्मान-2011 ले सम्मानित करे गिस।

11 सितम्बर 2011 के दिन बिहनिया 6 बजे मरहा के छोटे बेटा अरूण के फोन अइस-भइया मोर ददा के बीते रात 10 बजे इंतकाल होगे। आज काठी हे आबे कहिके। कविता ला जोरत-जोरत यादव जी के जिनगी कइसे बुलकगे वोकर आरो नइ लगिस। धन दौलत के जोरइया मन बर मरहा लिखे हे -


जोरत-जोरत जिनगी बीतगे, तब ले मन नइ भरे रीहिस

जुच्छा हाथ जोरइया चल दिस, धन-दौलत सब परे रीहिस।


अंतिम संस्कार के दिन छत्तीसगढ़ भर के साहित्यकार अउ कलाकार मन पहुंचे रीहिन हे। भगवान घलो अपन भक्त के अंतिम बिदाई म रिमझिम-रिमझिम पानी बरसावत रीहिसे। बघेरा गांव वाले मन अपन रतन बेटा ल श्रद्धांजलि के रूप म नवा मुक्तिधाम के उद्घाटन मरहा के चिता ल आगी दे के करीन। संगे संग मसान घाट म भक्तराज के सुरता म बर पेड़ (वृक्ष वृक्ष) लइगन। मरहा के खटली के बांस ल बर पेड़ बर रूंधना अउ पिताम्बरी ल रूंधना के बंधना बनइन। महु (दुर्गा प्रसाद पारकर) माँ कल्याणी शीतला समिति मड़ौदा भिलाई के तत्काली अध्यक्ष संतोष रावत के संग यादव जी के काठी म गे रेहेंव। यादव जी के सुरता म गाँव वाले मन ल बर पेड़ लगावत देख के संतोष रावत जी किहिस-पारकर जी हम्मन जनकवि बिसम्भर यादव 'मरहा'  के सुरता म का कर सकथन? मँय केहेंव-यादव जी के सुरता म 'बिसम्भर यादव मरहा सम्मान' के शुरूवात करके ओकर परम्परा ला आघू बढ़ा सकथन। रावत जी ल जम गे ओकर बाद चैत्र नवरात्रि षष्ठी के दिन 2012 ले माँ कल्याणी शीतला समिति ह बिसम्भर यादव मरहा सम्मान के शुरूआत करिन।

13 अक्टूबर 2011 के दिन माननीय भूपेश बघेल जी के संयोजन मा पाटन ब्लाक के अचानकपुर गांव म बिसम्भर यादव मरहा ल श्रद्धांजलि देवत मरहा के परम्परा ल आघु बढ़ाय बर संत कवि पवन दीवान ह मरहा के नाती यशवंत यादव ल 'बाल कवि' के उपाधि दे के जिम्मेदारी सौंपीस।

जनकवि बिसम्भर यादव 'मरहा' जी ल शत् शत् नमन हे, शत् शत् नमन हे।

छत्तीसगढ़ी लोक कथा मंत्री मन के घमंड वीरेन्द्र सरल

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा

मंत्री मन के घमंड

वीरेन्द्र सरल

एक राज में एक राजा राज करय। वो राज म अन्न-धन, गौ-लक्ष्मी, कुटुंब-परिवार के भरपूर भंडार रहय, सब परजा मन सुखी रहय। सबो कोती बने सुख संपत्ति रहय। कोन्हों ला कोन्हों किसम के दुख-पीड़ा नई सतावय।

      एक समे के बात आय। राजा के मंत्री मन ला बहुत घंमड होगे कि वो राज मे उंखर ले जादा बुद्धिमान जीव कोन्हों नइ हे। ओमन सब परजा ला मूरख समझे अउ सोचय कि राज के सुख शांति सब हमरे भरोसा म हावे। मंत्री मन के हाव-भाव ला देख के राजा जान डारिस कि येमन ला अपन बुद्धि ऊपर घमंड होगे हावे। समे रहत इखर घमंड ला तोड़ना बहुत जरूरी हावे नही ते ये बीमारी बढ़ते जाही अउ राज के सुख-शांति ला नष्ट कर दीही।    राजा ह उपाय सोचे लगिस। 

    वोला एक उपाय सूझिस, तब ओहा सब मंत्री मन ला राज दरबार मे बला के किहिस-‘‘बहुत दिन होगे हावे अपन राज ला घूमे नई हन, चलो आज हमन अपन राज भर ला घूम के देख के पता करथन कि हमर राज म परजा मन कतका सुखी हे धुन दुखी हावे।‘‘

    राजा के आज्ञा पाके सब मंत्री मन अपन-अपन वाहन ला सजाय लगिन। अपन-अपन वाहन म सवार हो के सब मंत्री मन राजा के आघु-पाछू चले लगिन। कुंवार के महीना रहय। मार लक - लक ले घाम करत रहय।

   एक ठउर म एक किसान ला काम करत देख राजा ह मंत्री मन ला उही मेरन ठहरे बर किहिस। साठ बछर के सियान किसान ह नांगर फांद के खेत ला जोतत रहय।    राजा ह वो किसान के तीर म जाके पूछिस-‘‘कइसे बबा! अदरा नई बरसिस का?‘‘ 

किसान किहिस-‘‘बरसिस राजा साहब ! फेर खोचका डबरा के पुरतीन होगे।‘‘ 

राजा फेर पूछिस-‘‘अउ मघा के काय हाल- चाल रिहिस?‘‘ अब मघा के काय बतावव राजा साहब, बरसिस फेर जिहाँ के चीज तिहाँ चलदिस।

किसान के बात सुनके राज ला बड़ दुख होइस। राजा किहिस-‘‘अच्छा बबा! ये बता उत्तरा-चितरा म बरसिस के नई बरसिस?‘‘ 

बरसिस राजा साहेब तभे तो मैहा ये कुंवार के महीना मे नागर जोंतत हवं।

राजा अउ किसान के गोठबात ह मंत्री मन के समझ म कुछु नई आवत रहय। बात के रहस्य ला मने मन म सोचत सब झन आघू बढगे। भ्रमण के बाद सब मंत्री अउ राजा ह राज महल म पहुँचिन। सब अपन अपन आसन म बइठिन तब राजा पूछिस-‘‘देखव जी मंत्री हो ,इहाँ सब एक ले बढ़ के एक विद्ववान हव। अभी सब झन वो किसान के संग मोर गोठ-बात ला सुने हव। आप मन ला बस वो गोठबात के रहस्य ला बताना हे। एकर बर आप मन ला एक महीना के समे दे जावत हावें। जउन मंत्री ह ये गोठबात के मतलब ला सबले पहिली बता दिही वोला सोन के सौ मोहर इनाम दे जाही अउ राज के प्रधान मंत्री बनाय जाही।‘‘ अतका कहिके राजा ह सभा समाप्त करे के घोशणा करिस ।

इनाम अउ प्रधान मंत्री बने के लालच में सब मंत्री अड़बड दिमाग लगा के राजा अउ किसान के गोठबात के मतलब निकाले के उदीम करिन फेर कोन्हो सफल नइ होइन।  बड़े-बड़े ज्ञानी, ध्यानी अउ विद्ववान मन घला हक खागे। 

  मंत्री मन किसान के हाथ पाँव जोड़ के वो बात के मतलब पूछे। किसान ला रंग-रंग के लालच देवय। किसान कहय जब तक राजा ह ये बात के मतलब बताय के आज्ञा नइ दीही तब तक मै नइ बता सकव। आखिर म सब मंत्री थक हार गे अउ राजा के तीर म जाके हार मान के कहिन-‘‘ये बात के मतलब ला समझना हमर बस के बात नोहे राजा साहब।‘‘ 

    राजा किहिस-‘‘दिखगे तुंहर बुद्धिमानी, नानकुन बात के मतलब नइ समझ पात हव अउ मनमाने घंमड करथव। अब दरबार म उही किसान ह आके अपन बात के मतलब ला सबला समझाही।‘‘

बिहान दिन वो किसान ला राज दरबार मे बलाय गिस। किसान दरबार म आके सबला परनाम करके बइठगे। राजा ह इशारा करिस तब किसान किहिस-‘‘राजा साहब! वो दिन आप मन मोला पूछेव कि अदरा म बरसिस कि नइ बरसिस तब मैंहा कहेवं बरसिस फेर खोचका-डबरा के पुरतिन होगे। ये बात के मतलब आय आप के प्रश्न रिहिस जवानी म लोग - लइका आइस ते नई आइस। खोचका - डबरा के पुरतिन होगे के मतलब आय लइका तो आइस फेर जनम लेते ही मरगे।

 आप पूछेव मघा म बरसिस कि नइ बरसिस, मैहा कहेव बरसिस फेर जिहाँ के चीज तिहाँ चल दिस मतलब मोर अधेड़ावस्था म संतान तो होइस तेमन बेटी आय उंखर पालन-पोषण करेंव अउ उंखर बिहाव करके ससुराल बिदा कर देवं। 

आप के तीसरा प्रश्न रिहिस उतरा-चितरा के काय हाल चाल रहिस तब मे कहेंव उतरा चितरा म बरसिस तभे तो ये कुंवार के महीना म नांगर जोतत हवं मतलब बुढ़ापा म बेटा जनम ले हावे। बेटा अभी नान्हे हावे तभे तो मोला काम करना पड़त हे।‘‘ अतका बताके किसान ह चुपचाप बइठगे।

राजा ह ऊँच ऊँच सिहांसन में बइठे मंत्री मन कोती ला देख के किहिस-‘‘तुमन राज के परजा ला मूरख समझे के भूल करथव। परजा घला बुद्धिमान हावे। अपन बुद्धिमानी म घमंड करना बने बात नोहय। राज के सुख समृद्धि अउ शांति ह सब मिलके बनथे। आज ले सब किरिया खालेव कि घमंड नइ करना हे अउ राज के  परजा के सनमान करना हे।‘‘


वीरेन्द्र सरल

छत्तीसगढ़ी (लोक कथा) एक लोटा पानी

 छत्तीसगढ़ी (लोक कथा)


एक लोटा पानी


*भोला राम सिन्हा*


एक गाँव म रंगी नाव के एक गौंटिया राहय।वोहा बड़ घमंडी राहय।वोकर घर नौकर-चाकर ,धन - दौलत सबो रहय।गाँव म वोकरे राज चलय।रंगी के एक झन बेटी रिहिस।वोहा अड़बड़ सुन्दर अउ गुणवनतीन रिहिस।गाँव के एक किसान ह अपन बेटी के बिहाव करिस त वोहा गाँव के सबो मनखे के संगे-संग गौंटिया ल मंझनिया कुन जेंवन बर नेवता दिस।किसान घर सबो नेवताय सगा मन खाय बर आ जथे,फेर रंगी गौंटिया ल अतका अपन चीज-बस के घमंड रिहिस कि ओहा अपन नौकर कर एक लोटा पानी ल किसान के घर म भेज देथे।

ये बात ल ओकर बेटी जानिस त अपन ददा ल किहिस-"ददा ते ह खाना खाय  बर नइ जावत हस अउ एक लोटा पानी ल नौकर कर भेजवा देस।ये ह बने बात  नोहे ददा,तोला खाय बर जाना चाही।"

अपन बेटी के गोठ ल सुन के वोकर ददा किहिस-" मेहा गाँव भर के गौंटिया अउ गरिबहा मन घर खाय बर जाहूँ,नइ जावंव।"

गौंटिया ह अपन बेटी के बात ल नइ मानिस।गाँव म काकरो घर बिहाव होय त गौंटिया ह अपन नौकर कर एक लोटा पानी ल भेजवा देवय।दिन बितत गिस।गौंटिया के बेटी बिहाव के लइक हो जथे।ओकर बेटी जानथे कि मोर ददा ह घमंडी हावे,वोला सबक सिखाना जरुरी हे।इही बीच म ओकर बेटी  के रिसता तय हो जथे।बिहाव के दू दिन पहिली  गाँव के मनखे मन ल ओकर बेटी चेता देथे ,कि मोर बिहाव माड़ही अउ ददा ह सबो गाँव भर ल खाना खाय के नेवता दिही त एकक लोटा पानी धर के आहू फेर कोनो झन खाहू।दू दिन के बाद बिहाव माढ़ जथे,ऐती गौंटिया ह गाँव वाला मन बर बरा,सोंहारी,मोती चुर के लड्डू अउ बोरे बरा बनाय रिहिस।

गौंटिया ह नौकर ल गाँव के जम्मो मनखे मन ल मंझनिया कुन जेंवन करे बर नेवता देयबर भेजिस ।नौकर ह नेवता नेउत के आ जथे।

अब ऐती गाँव के सबो मनखे मन एकक  लोटा पानी धर के गौंटिया के घर म मढ़ा देथे अउ अपन-अपन घर जाए बर लग जथे।गौंटिया ह देख के दंग रही जथे,वोला तुरते सुरता आ जथे कि महू ह इंकर मन संग अइसने बेवहार करे रेहेंव तेकर सेती यहू मन मोर संग वइसने बेवहार करत हे।

गौंटिया ल अपन गलती के ऐहसास  हो जथे ,वोहा तुरते गाँव के सबो मनखे मन ले हाथ जोड़ के माफी मांगथे।ओकर बेटी कथे " मनखे ल अपन चीज बस के घमंड़ नइ करना चाही,भलुक अमीर-गरीब सब झन ल हिलमिल के रहना चाही।


भोला राम सिन्हा

बेंदरा अउ मँगरा** कहानी

 **बेंदरा अउ मँगरा**

           कहानी

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      "नदी किनारे एक ठन जामुन के पेड़ रहय ओमा एक ठन बेंदरा के बसेरा रहय। नदी के ठीक ओ पार म एक ठन मगर रहय। वइसे तो नदी  के भीतर अउ नदी के आरपार कतको जीव-जंतु मन के बसेरा रहय, कइ झन मन के तो कइ पीढ़ी हो गय रहय। बेंदरा हर दिन भर नदी तीर ओही मेर उछल-कुद करत रहय जब भूख लगय त कोनों रुख रई म चढ़ के फल-फूल टोर के खा लेवय प्यास लगय त नदी के पानी पी लेवय रात होय त जामून के डगाली ल पोटार के सो जाय। जामुन के दिन म तो पेंड़ ऊपर जामून खाय बर मिल जाय कहीं हाथ पैर चलाय के जरुरत नइ रहय। हाथ-गोड़ पसहुर करना हे त थोड़ा-बहुत टहल लेवय नहीं त ओही जामुन के डारा ल धर के चार फइत झूल डारय। ये पार के जीव-जंतु मन नदी के ओ पार नइ जावंय, काहे कि ओ पार म बहुत मगर रहय, जाबो त धर दारही एके मुँह गप ले कर दीही।

      जामुन के दिन अइस, ये दारी जामुन हर बिकट फर म माते रहय। जामुन हर पाकीस त पेंड़ के डारा-पाना नइ दिखत रहय, पूरा पेंड़ हर करिया-करिया दिखत रहय। मीठा-मीठा रसीला जामुन ल देख के ललचावत कतको जीव -जन्तु मन आवत रहंय। रुख-रई के चढ़ोईया चढ़ के पेंड़े ऊपर ले खावत रहय ताजा-ताजा जामुन के मजा लेवत रहंय, जउन नइ चढ़ सकय भुईंया के गिरे ल खा के मन ल संतोष करत रहंय। अब जब तक जामुन म फर हे बेंदरा ल कांही कछु के चिंता नइ रहय, हाथ पैर डोलाना नहीं जतके बेर पईस खा लीस पानी पी के सो गे, आराम के जिंदगी कटत रहय। एक दिन बेंदरा हर अइसने निसफिकर होके एक ठन मोटहा डारा म आराम से उतान लेटे रहय  अउ अकाश कोती ल टुकुर-टुकुर देखत प्रकृति के आनंद लेवत रहय चिरई-चुरमुन मन के आनीबानी के आवाज बडा़ मनलुभावन लागत रहय, अचानक चिरई मन चाँव-चाँव करे के शुरु करे लगिन। बेंदरा हर उठ के देखीस त सब जीव जंतु मन ओमेर ले भागत रहंय, का होगे कइके बेंदरा हड़बड़ागे, बने ध्यान लगा के देखीस; नदी किनारे जामुन पेंड़ के तरी एक ठन बड़का मँगरा हर ओ पार ले आ गय रहय। सब तो भाग गिन पर बेंदरा काय करे पेंड़ के एक ठन थाँही ल धरके दबक गे। बेंदरा ल पता हे मगरमच्छ हर पेंड़ म नइ चढ़ सकय। 

      अब मँगरा हर रोज आय मीठा-मीठा जामुन गिरे रहे ते ला खाय कुछ ल मुँह म धर ले अउ चल दे। अब सब जीव-जंतु मन के उहाँ आना बंद होगे बेंदरा घलव अब जादा बेरा पेंड़ के ऊपर बईठे रहय। बेंदरा सोचथे कहीं जादा उछलकूद करत दनाक ले गिर गें त ये तो मोला गपाक ले कर दीही। ये ती मगर सोंचथे ये तो बढ़िया बात ये कि मोर आय ले इहाँ ले सब जीव-जंतु मन आना छोंड़ दिन अब सब फल मोरेच ये आराम से खाथंव मोर पेट भर जाथे। एक दिन मगर सोंचथे ये बेंदरा के मजा ये पेंड़ म बईठे-बईठे आराम से ताजा-ताजा  फल ल टोर-टोर के खावत रथे, मैं इहाँ चीखला-माटी ले बीन-बीन के खाथंव, कोनो हर तो अइसे सड़ जाय रइथे की मुँह के स्वाद बिगाड़ देथे। काश महुं ल ताजा-ताजा जामुन खाय ल मिलतीस। 

     तभे मगर ल एकठन उपाय सुझथे, जामुन पेंड़ के तरी म आके सुरताय लगथे, ओला देख के बेंदरा हर डरा जाथे कहीं ये मोर फिराक म तो नइ आय हे!कहीं मैं झपकी लिहौं अउ गिर गें त ये तो मोला खा दिही। बेंदरा सोचथे अब चौकन्ना रहना परही। मगर हर बेंदरा ल आवाज लगाथे-मितान -ओ -मितान! बेंदरा हर येती-ओती ल देखथे कहीं ये अपन अउ कोनो संगी ल तो नइ बुलावत हे। मगर हर बेंदरा ल इशारा करथे तुंहला कहत हँव मितान! बेंदरा कथे -मैं बेंदरा तैं मँगरा दूनो मितान कइसे होगेन। न तैं रुख चढ़ सकस न मैं पानी म उतर सकंव त फेर ये मितानी कइसे? मगर हर नाना प्रकार के बात करीस त बेंदरा ओकर बात म आगे। अब मँगरा हर रोज आवय दूनों बईठ के खूब गपशप मारय। भूख लागे त जामुन खा लें' प्यास लगे त पानी पी लें। शाम के घर जाय के बेरा कुछ जामुन मँगरा हर घर घलव ले जाय। अब वहाँ सब जीव-जंतु मन के आना बंद हो गय रहे, बस दूनों मितान बेंदरा अउ मँगरा आराम से बइठे रहंय। सब तरफ दूनों के मितानी के चर्चा चलत रहय। 

     अइसने करत कतको दिन बीतगे जामुन के दिन खतम होगे त बेंदरा हर अनते-अनते ले आने-आने फल लाके मगर ल खवावय अउ घर ले जाय बर घलव दे। अब बेंदरा हर बाकि संगी-साथी मन से किनारा कर ले रहय , ओला तो अपन मितान मँगरा संग म बड़ा मजा आवत रहे। अइसने ढंग ले समय हर बीतत गीस एक दिन मँगरा हर आके बेंदरा ल कथे- मितान आज तुंहर मितानीन हर तुंहला दावत म घर बुलाय हे। का हे कि, मैं बहुत दिन से इहाँ आवत हँव मीठा-मीठा फल खा के घर ले के जाथंव त मोरो फर्ज बनथे एक दिन तुंहु ल ले जा के नेवता बड़ई करंव ये ही बहाना मोर घर द्वार ल घलव देख लिहा। बेंदरा के घलव मन रहे अपन मितान के घर देखे के ओ तो डर म नइ कहे सकत रहे आज मौका अच्छा हे झट ले तियार हो जाथे। फेर, एक समस्या हे मैं तो पानी म तौर नइ सकौं। मगर कहीस चिंता मत करा आके मोर पीठ म बइठ जावा मैं आज तुंहला नदी के सैर करवाहौं। बेंदरा के तो कब के इच्छा रहीस नदी म नौकाबिहार करय, नौकाबिहार नहीं यही सही,वया का कम हे। झट ले बेंदरा हर कूद के मँगरा के पीठ म बइठ गे, मँगरा पानी म छलाँग लगा दीस। बेंदरा ल बड़ा मजा आवत रहय। पानी के लहर मन ल छू छू के मजा लेवत रहे, पानी ल हाथ म  छपाक-छपाक करे म बड़ा मजा आवत रहे। मगर हर सोचथे ये बेंदरा मितान कतका खुश हे येला नइ पता अगले पल येकर साथ का होने वाला हे। ये ल  मोर ऊपर कतका भरोसा हे एक बार म आय बर तियार होगे अउ मैं येला छल कपट से धोखा दे के लानत हँव। सियान मन कहे हें मित्र से धोखा नइ करना चाहिये झूठ नइ बोलना चाहिये। मित्र संकट म होय त अपन प्राण के भी परवाह नइ करना चाहिये लेकिन मैं तो अपन खुशी के लिये ओकर प्राण ल संकट म डारत हँव।

लेकिन, मोर पत्नी के इच्छा . . .! भगवान राम हर अपन पत्नी सीता के इच्छा पूरा करे बर सोन के मिरगा ल मारे रहीन ये तो साधारण बेंदरा ये कोन मार के सोन के बने हे, फेर मैं कोन मार के भगवान अँव हमर मँगरा जात जीव जंतु ल मार के खाय बर बने हन। घोड़ा हर घास ले मितानी केही त का खाही अउ मँगरा मन जीव-जंतु ल नइ खाहीं त काय खाहीं। मोला कुछ अइसे करना चाहिये कि मितान ले झूठ बोले के पाप घलव झन लगय अउ पत्नी के इच्छा भी पूरा हो जाय। मितान ये समझही त समझबे करही नइ समझही त बीच नदिया ले कुद के कहाँ जाही। बेंदरा हर मँगरा ल चूप देख के पूछथे कइसे का होगे मितान का गुनान परगे। मँगरा हर कथे एक ठन बात कहना रहीस मितान। बेंदरा कहीस हँ बोलव का बात हे! मँगरा कथे- बात ये हे कि हमर घर म तुंहर कछु दावत व नइ हे। बेंदरा ल अचंभा लागिस, दावत नइ हे मतलब कइसे?  तभो कइथे कोई बात नइ ये मितान येमा का चिंता दावत नइ ये त मैं अइसे घरद्वार ल देख के आ जाहूं दावत फिर कभी हो जाही दावत के का हे। थोड़े देर बईठ के मोला फिर वापस छोड़ दिहा। मगर कथे नहीं मितान अब तुंहला वापस आय के कोनो जरुरत नइ हे ये ही हर आखिरी ये। बेंदरा कहीस कइसे मतलब मैं समझें नहीं काय बात ये ते ला साफ-साफ कहा। मँगरा कहीस मितान घर म दावत तो हे लेकिन तुंहर बर नइ हे बल्कि, हमन तुंहरे दावत करबो कहत हन आज। तुंहर मितानीन हर तुंहर करेजा ल खाहूँ कहत हे। ओकर कहना हे जउन बेंदरा हर अतके मीठा-मीठा फल रोज खाथे तेकर करेजा हर कतका मिठावत होही। कई दिन ले जिद म अड़े हे नइ मानत हे आज तो खाना-पीना छोड़ दे हावय। मैं बहुत समझांय मितान हर रोज मीठा-मीठा फल टोर-टोर के देथे बिचारा हर ओला मार के खाना ठीक नइ हे फेर ओहर नइ मानत हे। ओहर भूखन-प्यासन बइठे हे चला जल्दी तंह ले हमन तुंहर करेजा के दावत करबो। 

     अतका ल सुनके बेंदरा के खून सुखागे, गुनान धर लीस, मँगरा के पीठ म बइठें तभो मौत दिखत हे, पानी ले कूद जाहूं तभो मौत दिखत हे, उपर वाला ल देखते प्राथना करथे मदद माँगथे। भगवान हाथी ल बचाय रहा मगर ले आज महू ल बचा लेवा कइके हाथ जोड़थे। कुछ उपाय तो सोचना परही नइ तो मैं अइसने मारे जाहूँ। मँगरा हर बेंदरा ल कथे का होगे मितान! जादा का गुनना अब थोड़े देर के तुंहर जिंदगी हे मस्त मौज-मस्ती करा कइहा त नदी के एक चक्कर अउ लगवा देवत हँव परंतु, आज तुंहला हमर दावत तो बनेच ल परही । बेंदरा कहीस वो बात नइ ये मितान! तुंहर काम आना तो मोर परम सौभाग्य के बात ये पर एक ठन मुश्किल हे। मँगरा कहीस का मुश्किल हे? बेंदरा कथे मितानीन हर मोर करेजा ल खाहूँ कहत हे ये बात ल तुंहला मैं जामुन के पेंड़ के ऊपर म रहेंव तभे बताना रहीस अब फेर वापस जाना परही। मगर कथे कइसे! बेंदरा कहीस देखा मितान, हमन बेंदरा जात मन अपन करेजा ल तुंहर मँगरा जात मन असन धर के नइ किंदरन। तुमन ल पानी म चूपचाप रहना रथे त तुमन अपन करेजा ल अपन शरीर म धरे रथा। हमन बेंदरा अन ओ रूख-रई ले ओ रुख-रई, ओ डार ले-ओ डार म कूदत-फाँदत रइथन अइसे म अपन करेजा ल कोनो मेर गिरा दारबो त हमर जिनगी तो खतम हे। त फेर तुमन कहाँ रखथा अपन करेजा ल मगर ल बड़ा आश्चर्य होथे। अरे वहीं पेंड़ के एक ठन खोखरा म सुरक्षित रख देथन अउ दिन भर किंदर-किंदर के उछलकूद करत रथन। चला जल्दी नहीं त उहाँ भूख-प्यास म मितानीन ल कछु हो जाही। मगर हर झट ले पलटिस अउ जल्दी जामुन के पेंड़ तीर पहुँच गे। बेंदरा के छाती धकधकावत रहे, कूद के जामून के पेंड़ के ऊपर चढ़ गे। लंबा-लंबा साँस लीस। मगर आवाज लगाथे मितान जल्दी आवा अपन करेजा ल ले के। बेंदरा कहीस कोन मितान, कइसे मितान? अरे दुष्ट, ये तो मोर मति मारे गे रहीस जो मैं तोर जइसे दुष्ट  ल मितान बना दारें, वो तो मोर किस्मत अच्छा रहीस भगवान के कृपा ले बच गेंव तैं तो मोला दावत करवाहूँ कइके मोरे दावत करे चले रहे। मूर्ख मोला मूर्ख बनाय चले रहे तोला इतना भी पता नइ ये कि कोनों अपन करेजा ल अपन शरीर से नइ निकाल सके। बिना करेजा के कोई घूमना-फिरना तो दूर जिंदा भी नइ रह पाय। सियान मन कहे हें दुष्ट से कभी संगती नइ करना चाहिये तोर खातिर मैं अपन संगी साथी मन ल छोड़ देहें। सजा तो मोला मिलना रहीस, तैं अच्छा सबक सिखाय। मोर किस्मत अच्छा रहीस त बाँच गय हौं नइ तो तैं तो आज मोर दावत कर देहे रहे मोर संगी-साथी मन सोचतीन मैं वो मन ल छोड़ के तोर संग चल दे हँव। अब निकल यहाँ से फिर अपन सकल मत देखाबे। मगर कथे ये तो दाँव उल्टा पर गे, फल-फूल खवावत रहीस तेहु गय। मितान अइसे बात नइ हे, आँसू पोंछे अस करथे, बेंदरा कहीस तोर मगरमच्छ के आँसू मैं अच्छी तरह समझथौं, चल अब जहाँ यहाँ से। मगर वहाँ से कलेचूप भागे म ही भलाई समझथे।"

( दुष्ट से संगति नइ करना चाहिये, दुष्ट व्यक्ति ले सावधान रहना चाहिये, संकट के घड़ी म हड़बड़ाना नइ चाहिये, शांत मन से समस्या के उपाय सोचना चाहिये। ये बात अब बेंदरा के मन अच्छी तरह से आगे। )"

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**अंजली शर्मा **

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ).

7470989029 .

चोर अउ खटिया/लोककथा*

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            *चोर अउ खटिया/लोककथा*

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         अगास मा एक ठन डोकरी डोकरा मन के जोड़ा रहत रहिस। डोकरा हर बढ़ाई रहीस।फेर जइसन चलागत अउ हाना हे -


           बइगा के डौकी ठड़गी के ठड़गी

           बढ़ई के डौकी बर भुईंया गोदरी।


        कहे के मतलब  हे बइगा हर अपन घरवाली ल जतने नई सकत ये अउ वोहर निपूती हे, बाल बच्चा नई ये। अउ बढ़ई के सुवारी  हर कभु खटिया नई  पाय। वोहर भुइयां म सुतथे।


            तब येहू डोकरी भुईंया म सुते। भुईंया म सुते ले वोकर कनिहा पिराय लगिस। अइसन म एक दिन वो डोकरी हर अपन गोसान बढ़ई पर भड़क गए। भड़क का गय,वोहर तो अब बढ़ई डोकरा ऊपर भीड़  गय रहिस।वोकर चुन्दी मुड़ी ल नीछत रहिस। बढ़ाई थर थर थर थर काँपत आन बुता ला छोड़ के डोकरी बर खटिया बनाय बर लग गय।


        तब वोहर लकड़ी मन ला छोले करोय। अइसन करे ले जउन बुरादा अउ छिलपा निकलिस वोहर अगास म बगर गय। अउ आज ले घलव वो छिलपा बुरादा मन बगरे दिखथें(आकाश गंगा -The Milky Way)। बढ़ई के कुटेला (एक तारा मंडल ) हर दिखथें। सब जगमग जगमग चमकत रथें।


             खटिया बन गय। आज डोकरी मजा के खटिया म सूत गए। तभे घर म तीन झन चोर मन पेलिन। वोमन डोकरी के खटिया ला उठा के ले जात रहिन। लेकिन खटिया के खुरा रहे चार और चोर रहीन तीन। एकर सेती खटिया हर डगमग डगमग डोले लगीस। एकर ले डोकरी जाग गय। अउ उतर के चोर मन ल सुध के बुतात ल ठठाइस। अउ एकठन लंबा डोर म वोमन ल खटिया के एकठन खुरा म। बांध दिस। आज ले वो तीनो चोर मन खटिया के वो खुरा ले बंधाय हें।



( येहर हिंदी वांग्मय के सप्तर्षि -क्रतु ,पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ अउ मारीचि आंय । अंग्रेजी वांग्मय के  Ursa Major ये। वशिष्ठ के तीर म -मंझ के चोर तीर म एकठन नानकुन तारिका दिखथे।येहर वशिष्ठ पत्नी -अरुंधती ये। जउन येला देख लेथे, वोकर नेत्र ज्योति बढ़िया माने जाथे।)



*रामनाथ साहू*



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मरहा जी आपला शत् शत् नमन*। (संस्मरण)



 


*मरहा जी आपला शत् शत् नमन*। (संस्मरण)


छत्तीसगढ़ के माटी सपूत श्री विशंभर यादव मरहा के जनम दुर्ग जिला के ग्राम बघेरा मा 6 अप्रैल सन् 1931 मा होय रहिस।

मरहा जी हर जब अपन संघर्ष भरे जिनगी के 70  बरस गुजार डारे रहिस,तब ग्राम सुरगी जिला राजनांदगांव मा आयोजित एक कवि सम्मेलन मा उकर ले पहली बार मुलाकात करे के अवसर मिलिस। तब मॅंय अनुभो करेंव उकर जिनगी हा तो सादगी के प्रतिमान आय।

कवि सम्मेलन मा जाय बर कतको दूरिहा सायकिल मा चल देंवय। 

कोनो मनखे मन कहुं उकर शरीर के उपर टिप्पणी कर देतिन अउ पइसा कौड़ी ला लेके घालमेल कर देतिन ता उनकर मनले कभू प्रतिकार नइ करय। फेर कोई कहुं छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान ला ठेस पहुंचाय के कोशिश करय ता उनला ओतरी बेर भरपूर खुराक पानी देय बर कभु नइ पिछवाय। 


     सन् 2003 कुॅंवार नवरात्रि परब के बात आय ,जब साकेत साहित्य परिषद सुरगी जिला राजनांदगांव के द्वारा ग्राम सुरगी मा कवि सम्मेलन के आयोजन रखे गे रिहिस।

          ये आयोजन के खास बात ये रिहिस कि कार्यक्रम मा छत्तीसगढ़ के दुलारा जनकवि श्री विशंभर यादव मरहा जी घलव  कार्यक्रम के नेवतहार कवि रिहिस अउ महुं ला ओ कवि सम्मेलन मा कवि के रूप मा नेवता मिले रिहिस।


    उही समय डोंगरगांव क्षेत्र मा ग्राम मोहड़ के श्री तिलोक राम साहू "बनिहार" हर छत्तीसगढ़ी आसु कवि के रूप मा बड़ नामी रहिस।जेन हर मरहा सही निरक्षर रहे के सेती , अपन रचना ला दूसर ला लिखवाय।

 बनिहार जी के भी आमंत्रित कवि मा नाम रिहिस, उनकर ले सहमति अउ उनला सुरगी तक पहुचाय के जुम्मेदारी मोला मिले रहिस।

बिना बिलमे उहीच दिन बनिहार जी ला नेवता देके उनकर ले सहमति प्राप्त कर लेंव।

     आयोजन तिथि के दिन कवि सम्मेलन मा शामिल होय खातिर मॅंय अपन गृह ग्राम कलडबरी ले  बनिहार जी ला लाय बर फटफटी मा उॅंकर गाॅंव मोहड़ पहुचगेंव।


  मॅंय मने मन मा धन्य मनात रहेंव कि आज मरहा अउ बनिहार  दूनो जनकवि के सुग्घर मेल-जोल , गोठ बात होही।

    फटफटी मा बनिहार जी ला बैठारेंव अउ डोंगरगांव- अर्जुनी- राजनांदगांव के रस्ता डहर ले सुरगी जाय बर मॅंय मोहड़ ( डोंगरगांव) ले रवाना हो गेंव।

           हम दूनो , बेर बुड़ताहा सुरगी मा पहुॅंच गयेन। नेवतहार कवि मन के अराम अउ भोजन के बेवस्था भाई ओमप्रकाश साहू अंकुर के घर मा रखे गय रहिस।उहे पहुंच के हम दूनो अराम करत रहेन। उही कोनों 10-15 मिनट के बाद ग्राम निकुम निवासी गीतकार कवि श्री प्यारे लाल देशमुख अउ व्यंगकार श्री डी.पी. श्याम कुॅंवर के संग परम आदरणीय कवि श्री विशंभर यादव मरहा जी के आगमन होइस।

   जिनगी भर गरीबी ले लड़ने वाला ,पातर -दुबर बड़े दिलवाले जनकवि ले अब्बड़ दिन के बाद मिलके दिल ला सकून मिलिस।

      सादा धोती-कुर्ता अउ गाॅंधी टोपी पहिरे बड़े कद के आदमी ले मिलके मोर मुड़ हा अपने आप ओकर पाॅंव मा नव गे। खुशी रहे के आशीर्वाद देवत मोला  किहिस " *कुकुर अउ कोलिहा के सींग होतिस ते का होतिस* "

   आदरणीय मरहा जी हर मोला मोर नाव ले जानय कि नइ जानय मॅंय नइ कहि सकॅंव फेर उकर साथ हर मंच मा पढ़े गय ये रचना के माध्यम ले मोला जरूर जानय। हर बेर सही यहू बेरा मा।

मरहा जी के संग मा दो काव्य गोष्ठी अउ तीन कवि सम्मेलन मा सॅंघरे के सौभाग्य मिलिस, जेला उमर भर मॅंय नइ भूला सकॅंव।

     सामान्य गोठबात के बाद मॅंय श्री तिलोक राम साहू बनिहार जी से मरहा जी के परिचय करायेंव।

बनिहार जी हा आशु कवि तो रहिस सामान्य गोठबात ला घलव कविता शैली मा गोठियाय के शुरू करदिस ।

   जरवत ले जादा गोठियाय मा गड़बड़ी घलव हो जथे, जेहा होइचगे।

        सिद्धांत वादी मरहा जी के पूरा जिनगी हा तो कला अउ कविता के साधना मा बीते रहिस। उनला तो अभाव मा जीये के कला अपन विरासत मा मिले रहिस ,जेला उमर भर अपन छाती मा लगाके मंच  मा दहाड़- दहाड़ के जीये रहिस।

     अभाव के भट्ठी मा तपके निखरे मनखे हा दिखावा ला भला कइसे बर्दाश्त कर सकतिस । मरहा जी हा तिलोक राम साहू बनिहार के उपर बनेच बिफर गय अउ कविता के मान सम्मान ला कायम रखे बर जमके खबर लिस। ये सब देख सुन के मॅंय हर असहज हो गय रहेंव।

           मेल-जोल के बाद दूनो झन ( बनिहार अउ मॅंय) घर ले  गली डहर टहले बर निकलेन। तब बनिहार हा मोला कहिस- "बबा हा भड़क गे रहिस बघेल।" अउ अपन गलती ला स्वीकार घलव करिस,तब कहिं जाके मोला बने लागिस।


         भोजन करे के बाद कवि सम्मेलन शुरू होइस, जब मरहा जी के पारी आइस, बिना रुके धड़धड धड़धड़ जब कविता पढ़िस ते सुनइया मन झूम उठिन।

    उमर के ये पड़ाव मा जब उकर स्वास्थ्य घलव ऊंच नीच हो जाय, तब ले उकर जोश मा कोई कमी नइ आइस।

     निरक्षर होय के बाद उनला सैकड़ों कविता मुखाग्र याद रहिस। भइसा- मेचका अउ उड़िया जइसन हास्य कविता ला पढ़के स्रोता मन ला लोटपोट करइया मरहा, वीरांगना झलकारी बाई वाले कविता ला पढ़के स्रोता मन के अंतस मा देशप्रेम के भावना ले भर देवय।

मरहा हा जीवन भर सच्चाई, ईमानदारी अउ प्रेम ला अपन मीत बनाके जीवनयापन करिस, बइमानी के हलवा पूरी ले गुरबत के दू रोटी मा गुजारा करना सदा उचित समझिस अउ जिनगी भर सरकार के आघू मा कभू हाथ नइ पसारिस,सुख सुविधा नइ लिस।

   मरहा हर काव्य मंच मा शिष्ट साहित्यकार मन के दोमुंहा व्यवहार ले  हमेशा नाखुश रहिस।

अउ आखिर मा तारीख 10/09/2011 के ये दुनिया ला चेतावत देह त्याग दिस कि जीना होय ते छत्तीसगढ़िया सही अउ मरना होय ते छत्तीसगढ़िया सही, जइसन कि एक आम छत्तीसगढ़िया हा जीथे, अभाव मा..., गरीबी मा..., कि घाट के माटी अउ चीता के आगी ला घलव शर्मिंदा झन होना पड़े।

     यादव जी के मरहा उपनाम ले ही हमन उकर व्यक्तित्व अउ कृतित्व ला समझ सकथन।

 मरहाच हा भूगोल, इतिहास अउ अर्थशास्त्र हरे , आम छत्तीसगढ़िया के समाजशास्त्र हरे।

आज हमर बीच मरहा नइहे, फेर ओकर सरल ,सहज व्यक्तित्व हा हम सबके अंतस मा बसे हे जे हम सबला छल कपट ,आडंबर ले हटके सिरतोन मनखे बने के कला सिखाथे।

🙏मरहा जी आपला शत् शत् नमन🙏


महेंद्र कुमार बघेल डोंगरगांव

मोर महतारी ..… बड़ सुग्घर

 ये कहानी समर्पित माताओं को

मोर महतारी ..… बड़ सुग्घर 


कारी आउ गोंदील (दाई-बेटा ) दुनों झन शिवरीनारायण मेला देखे गईन । सरकस, सिनेमा, बरतन दुकान, रेहटा,

जलेबी, चना चरपटी, सड़इल, बताशा, साइकिल दुकान, मौत कुंआ, जोक्कर,कठपुतरी बुलत-बुलत थकगे दाई बेटा । बाढ़त गइस मनसे दूरगँछि कस । रेलम-पेल मंदिर म ठेलागे मनसे ऊपर मनसे छूट गईस हाथ दाई बेटा के हाथ लक्ष्मीनारायण महाराज के गोड़ पखारे के चक्कर म ।।

भगवान के दर्शन के लालसा म भुलागे महतारी बेटा ल ।

बाह रे माया तोर मालिक महतारी कल्लागे अपन दुच्छा हाथ देखके ।। छूटगे कारी के तोलगी लइका के हाथ ले 


पहिली पइंत छुटिस अंचरा दाई के अध्धर होंगे लइका

कोरा सुन्ना लागिस कारी ल, मन भुकुर भुकुर होंगे ।

गोंदील हदरगे अकेल्ला होके चारों मुड़ा अंधियार होगे

दाई ओ दाई ओ दाई.........चारों कोती मातगे पीरा...

फेर मेला के हल्ला गुल्ला आउ धक्का पेल बड़े परगे 

गोंदील के रोवइ कल्लाई के ऊपर ,,,, देख डारिस पुजारी

लइका के आँखी के आंसू आउ मन के पीरा ...….


पुजारी हपके बलाइस मेला के कारकुन ल ... करवादिस

हांका बाजगे भोंपू लइका गँवागे मंदिर म पुजारी करा हवय देखा भाई बहिनी मन आवा ले जावा । ऐति बिपतियागे चार मनसे लइका संग ,,,  तोर काय नाम आय

गोंदील, कोन गांव म रथस ...नई जानव, काकर संग आय हस.... दाई संग , काय नाम आय ...कारी, कइसनहा दिखथे .... मोर दाई बड़ सुग्घर हे । मोर महतारी बड़ सुग्घर ..हांका घनघनागे सुना हो बहिनी मन सुना जी...


जुरगे मेला म महतारी ...सोन चांदी म लदाय , किसिम किसिम के लुगरा , हांका परतगे महतारी जुरतगे ...

कस बाबू एमा कोन ह आय तोर महतारी...…..

अपन ले अपन सुग्घर माई लोग ...फेर नई फरक परिस 

गोंदील अधीर होगे दाई मोर आँखी म नई दिखिस ...


थकगे सुरुज घला  बुड़ती म चले बर धर लिस पच्छिम म

मनसे मन घलो धीरे-धीरे छटागे ,,, रोवाई घला थिरागे

फेर छाती के सुसकाई जस के तस बने रहीस .....

दिन बुड़ती होगे, बरदी लहुटे बर धर लिस , गरुआ के खुरी के धुर्रा बगर के माघी मेला म , इहि ओहरती बेरा म

लक्ष्मीनारायण मंदिर के कलश ले लहुटती सुरुज के अंजोर परिस कारी के मुंह म गोंदील के आँखी चमकगे


कलपत अल्लर परे कारी गोंदील ल पाके अब्बक होगे

न रोवत बनिस न बनिस सुसकत ,,,, भरगे आंसू

फुदका म सनाय चुन्दी, उघरा मुंड, फाटे रेशम कोर के लुगरा, हाथ म पटा, बीरबीट कारी ,,,, जइसे नाव तइसे मुंह

गोंदील दऊंडगे महतारी बर हपट्त परत कूद परिस 

पुजारी अकबका गईस वाह रे मोर सुग्घर कारी

बाह लक्ष्मीनारायण महाराज तोर महतारी के सुग्घराई

धन हस मालिक , धन हे तोर रचना महतारी के


बाह रे गोंदील आउ तोर सबले सुग्घर महतारी कारी

हदरगे दाई हदरगे बेटा महानदी के निर्मल पानी म 

पुन्नी के चंदा आज घलो सुरता करथे हर साल

कारी आउ गोंदील के किस्सा 


बस यूं ही बैठे-ठाले

माताराम की याद में Ashok Tiwari भाई साहब