Thursday, 10 November 2022

मोर गाँव 'डोंगाकोहरौद'

 मोर गाँव 'डोंगाकोहरौद'

    जांजगीर-चाँपा जिला के बिकासखंड पामगढ़ ले 5 किमी दूरिहा रक्सहूँ दिसा म डोंगाकोहराउद नाँव के एक गाँव बसे हे। बस्ती के चारो मुड़ा म सरलग तलाब हे। धोबनी, अखरहा, डुमरिहा, जोखिया, डोंगिया, बंधवा, केरहा अउ पर्री। ए तलाब मन इहाँ के जीवनदाता आँय। घर-गिरहस्थी के काम बर, नहाय बर अउ खेत मन ल पलोए बर, जब भी पानी के जरूरत होथे, महतारी के गोरस सही ईंकर पानी ह तुरते मिल जाथे। इन सब्बो तलाब म जउन डोंगिया तलाब हे, ओकर खाल्हे बीच खार म एक ठन सिरीस के पेड़ हावै। कब के हावै, तेला कोनो नइ बता सकैं।

     ए गाँव म तइहा जमाना म डोंगा ले जुड़े एक ठन घटना घटे रहीस। ओकरे कारन ईंकर नाँव कोहराउद ले डोंगाकोहराउद परगिस। घटना अइसे हे कि राउत पारा के एक झन माईलोग, जेन ह देह म रहिस याने गरभैतिन रहिस, तीजा मनाए अपन भाई के संग अपन मइके जावत रहिस। ओकर मइके हर महानदी के ओ पार परै। भादो के महीना, महानदी म पाठी-पाठ पूरा आय रहै। ओ पार जाय बर जउन जघा म ओमन डोंगा चढ़िन, उही मेर शिवनाथ नदी ह महानदी म मिले हावै। एमन के डोंगा ह संगम म हबरिस त दूनो नदिया के धार बीच फँसगे। न आघू बढ़ै, न पाछू घूँचै। डोंगहार ल शंखा होइस कि डोंगा के देबी ह नराज होगे हे। ओहर कहिस- ए डोंगा म कोनो गरभैतिन बइठे होहौ, त कुछु बदना बदौ, नहीं त डोंगा ह लहुट (बूड़) जाही। सब झन के कहे म ओ रउताइन ह बदना बदिस, त डोंगा ह पार होइस।

       समे ह बछर दू बछर बीतगे। रउताइन ह बदना के बात ल भुलागे रहै। एक दिन ओ डोंगा ह नदिया के घाट ले निकल के भाँठा म घिसलत-घिसलत ए गाँव के तरिया म आके बूड़े रहै। ओ रउताइन ह गघरी म पानी भरे बर जब ए तरिया म आइस, त ओ डोंगा ह ओकर ऊपर म जाके खपलागे। रउताइन ह मरगे। ए बात के खभर मिलिस त ओकर गोसइया ह डोंगा ल कुटी-कुटी काट के नरवा म फेंक दिस। डोंगा के एक ठन खीला ह सिरीस के रहिस, जेहर गाँव के बहरा खेत जामगिस। बाद म ओहर सिरीस के पेड़ बनगिस।

      एइ घटना के सुरता कराए ब गवाही सही  ओ पेड़ ह उही जमाना ले खड़े हावै। पेड़ ह बुड़गाए के पहिली जरी ले नवा पिचका फेंक देथे अउ ओकर दलगत ले फेर नवा पेड़ तियार हो जाथे। सिरीस के एइ पेड़ तरी देबी दाई के बास हवै। काबर नइ रहही। पखना होवै कि रूख-राई। मनखे के आस्था अउ बिसवास ह जिहाँ टिकगे उहाँ कन-कन म बास करइया सक्ति मन उही मेर ठुलाकेअइसे असर देखाथे ं कि लोग-बाग मन ओला या तो ईश्वर के किरपा समझथें या फेर भगति के चमत्कार।सिरीस-पाठ घलो ह लोगन मन के मनोकामना ल पूरा करे के अधार आय।ऊँकर सरधा-भगति के ठउर आय।

      सिरीस-पाठ के चारो मुड़ा म खेत-खार हे। असाढ़ महीना म पहिली बारीस होत्ते-साथ किसान मन नांगर-बइला लेके धान बोंए बर अपन-अपन खेत म आ जाथें। ए बखत चारो मुड़ा म अर्र-तता के बोली के संगे-संग सुघ्घर गीत हवा म गूँजे लगथे। सावन महीना म जब धान मन बियासे के लइक हो जाथे, तब चौतरफा हरियरहूँ सुघराई ल देखके अइसे लागथे कि जाना-माना धरती दाई ह सिरीस-पाठ के ठउर ल सजाए खातिर हरियर-हरियर मखमली दरी दसाए हे। कुआँर के महीना म छटके धान के बाली अउ पकराए पान मन जब हवा के झँकोरा संग लहराथे, त लगथे कि धरती-दाई ह अपन बेटी अन्न-कुवारी ल सुघ्घर पोतिया पहिरा के अऊ ओकर मुँड़ म सोन के कलगी खोंच के माता के दरसन बर भेजे हवै, तेकरे सेती ओहर ढोंकर-ढोंकर के पाँ परत हे।

     नवरात बखत इहाँ लोगन मन के चहल-पहल बाढ़ जाथे।कुआँर अउ चइत दूनो महीना म एक हफ्ता पहिली ले जवा बोंवा जाथे। अंजोरी पाख के परिवाँ लगते भगत मन मांदर घिड़का-घिड़का के जस-गीत गाए लगथें। अपन मनोकामना ल पूरा कराए बर कोनो घी के, त कोनो तेल के जोत जरवाथें अउ कोनो माता के सिंगार चूरी-फुंदरी चढ़ाथें। धन्न हे ए देबी-देवता मन ल। भगत मन जउन ढंग ले ऊँकर पूजा-आँचा करथें, मौन-भाव ले उनला अपना के सुख-शांति देवत रइथें। तभे तो इहाँ आए म जेकर दुख-अलहन टर जाथे अउ मनोकामना ह पूरा हो जाथे, ओकर मुँह ले जबरन निकल जाथे- जै सिरीस पाठ, जै देबी दाई।

                     संतोष कश्यप

                     जांजगीर

मोर गांव छुरा ला जानव

 मोर गांव छुरा ला जानव


               स्वतंत्रता पाये के पहिली छ्त्तीसगढ़ म छत्तीस ठन राज रिहिस जेला गढ़ के नाव ले जाने जावय । उड़ीसा के सीमा म लगे छत्तीसगढ़ के दक्षिण भाग म बहुत बड़का जगा म विंद्रानवागढ़ नाव के राज रिहिस । ये राज के स्थापना के श्रेय बियाबान जंगल के आदिवासी धुरवा नाव के नवयुवक ला जाथे । धुरवा के वंशज होये के प्रमाण छुरा राजघराना के नंदावत धरोहर म आजो देखे जा सकत हे । 

               धुरवा हा बहुत साहसी बलकरहा जवान रिहिस । धुरवा हा घात सुंदर गुनवंतिन अऊ अपने कस साहसी धरमतराई ( धमतरी ) के राजकन्या कचनार नाव के नोनी ला अपन सुवारी बनाये बर पैरी नदी के ओ पार नहाकके कतको झन दुश्मन सैनिक ला मार गिरइस अऊ उहाँ के राजमहल म खुसरके कचनार ला धरके अपन घोड़ा म बइठार खड़दिक खड़दिक करत निकल गिस । कचनार मिलगे .. आनन फानन म मंदिर म जयमाला बिहाव घला होगे .. फेर धुरवा ला उहाँ ले भागे बर परगे । लहुँटत समे म कचनार के ददा के पठोये सैनिक अऊ प्रतिद्वंदी राजघराना के लइका मन संग मुठभेंड़ होगिस । उहू मन कचनार के रूप अऊ गुण के सेती ओला पाये बर मरत रिहिन । जइसे तइसे धुरवा हा बारुका के पहाड़ी तक पहुँच पइस .. तब ओला अपन सैनिक मनले पता चलिस के आगू पिछु दुनों कोति के रसता म दुश्मन के सेना तैनात हो चुके हे । ओमन पहाड़ी के टिलिंग म पहुँच गिन अऊ कचनार संग एक ठिन माड़ा ला अपन मुकाम बना लिन । बछर निकलगे । कचनार के गोदी म नानुक बाबू आगे । अब धुरवा ला अपन जुन्ना घर नवागढ़ के सुरता आये लगिस । सबो कोति खबर कर दिस । धुरवा के सैनिक मन धीरे धीरे चारों मुड़ा ले निकलके सकलावत गिन । उचित समे अऊ बेवस्था देख धुरवा हा आगू कोति के दुश्मन सैनिक मन उपर हमला कर दिस अऊ पिछु डहर के सेना के कमान कचनार ला दे दिस । चार महीना के नानुक दुधपिया बाबू ला अपन गुप्तचर मन के संग नवागढ़ भेज दिस । कचनार हा मई लोगिन के जात ... कतेक सकय तभो ले लड़त भर ले लड़िस .. ओला जिंदा पकड़ के लेगे के आदेश रहय ... ओहा जब लड़त लड़त अकेल्ला रहि गिस तभो ले भागिस निही । जब तक आखरी दुश्मन नइ मरिस तब तक ओहा लड़िस । लड़त लड़त ओहा बहुतेच घायल हो चुके रिहिस । ओला पानी पियइया तको कोनो नइ बाँचे रहय । धुरवा के सुरता करत अपन प्राण त्याग दिस । 

               एती धुरवा हा पैरी नदी के खँड़ म लड़त रहय । लड़त लड़त कभू पैरी नदी नहाकके चल देवय त कभू पिछू घुचत सिरकट्टी तिर पहुँच जाय । दुश्मन मन हा एती के जंगल झाड़ी ले अंजान रिहिन .. कुछ दिन म हार मान के भाग गिन । धुरवा हा जीत गिस फेर आगू नइ बढ़िस अऊ लहुँट दिस । वापिस अमरिस त पता लगिस के कचनार हा दुनिया म नइ रहिगे हे । ओहा ओकर सुरता म .. उही तिर मुड़ पटक के अपन प्राण दे दिस । आजो उही मेर .. राजिम ले गरियाबंद के बीच कचनार  धुरवा के नाव के मंदिर उही पहाड़ी म बने हाबे .. जिंहा आजो कदम ठिठक जथे अऊ माथ नव जथे । 

               नवागढ़ म कचनार धुरवा के नानुक बाबू हा धीरे धीरे बड़े होय लगिस । देखते देखत पाँच बछर के होगे । महतारी बाप के साहस ओकरो म कूट कूट के भरे रहय । बघवा भालू ला नइ डर्रावय । ओला इहाँ के राजा घोषित करके गद्दी म बइठार दिन अऊ राज के काम काज बर एक झन बहुतेच विश्वसनीय मनखे ला नियुक्त कर दिन । एक दिन बाल राजा हा अपन बर हथियार के मांग करिस । नानुन पाँच बछर के लइका हा बड़े जिनीस तलवार तो उचा नइ सकय तेकर सेती ओकर बर नानुक छुरा नुमा हथियार बना के धरा दिन । लइका राजा हा .. मरत ले ओ छुरा ला अपन ले अलग नइ होवन दिन । दिन भर अपन तिर म राखे रहय अऊ सुते दसना म तको सिरहाना तिर म मढ़हा दे रहय । पाछू इही राजा के वंशज मन .. छुरा नुमा हथियार धरई ला परम्परा बना लिन । 

                तीसर चऊथई पीढ़ी म .. राज के खुबेच विस्तार होइस । ओकर सीमा हा मैनपुर ले सरायपाली तक पहुँच गिस । कुछ दशक पाछू राजा मन भाई भाई झगरे लगिन । राज तीन भाग म बँटागे । गढ़फुलझर के राजधानी सरायपाली , सुअरमल के राजधानी कोमाखान अऊ विंद्रानवागढ़ के राजधानी के नाव नवागढ़ रिहिस । विंद्रानवागढ़ के राजा हा कुछ बछर पाछू अपन राजधानी ला सूखा नदिया के तिर म बना डरिस अऊ बड़े जिनीस राजमहल के निर्माण कर डरिस । 

               मराठा मनके आक्रमण के सेती इँकर अर्थव्यवस्था हा छिन्न भिन्न हो चुके रिहिस । अब यहू मन अंग्रेज मनले समझौता कर डरिन अऊ अंग्रेजी सरकार ला समय समय म लगान पटाये बर धर लिन । हरेक बछर लगान तै करे बर अऊ पिछला बकाया ला पटाये बर .. राजा मन के बइसका हा रायपुर म सकलावय । एक बेर अइसने बइठक म .. विंद्रानवागढ़ के राजा संग अंग्रेजी कमांडर के तू तू मै मै होगे । अंग्रेजी कमांडर हा ओला मारे बर बंदूक उचा लिस । विंद्रानवागढ़ के राजा हा कूदके ओकर बंदूक ला नंगा लिस । कमांडर भागे लगिस तब राजा हा अपन तिर लुकाके धरे हथियार ला फेंक के मारिस । कमांडर भागगे अऊ बाँचगे फेर ओ हथियार हा एक ठिन खम्भा ला अल्लग चिरत निकल गिस । 

               संगवारी राजा मन तिर म जाके देखिन तब ओ छोटे से हथियार के बारे म पता लगिस । ओ हथियार हा अऊ कुछ निही बल्कि छुरा रिहिस । ओकर ले छुरा धरे के कारण घला पता चलिस .. तबले विंन्द्रानवागढ़ के राजा ला छुरा वाला राजा केहे बर धर लिन । इही नाव हा राज के नावा राजधानी बर राजा ला सबले उपयुक्त लगिस अऊ राजधानी गाँव के नाव छुरा पड़गे । 

 

हरिशंकर गजानंद देवांगन  .. छुरा

मोर गांव ल जानंव-अंकुर









 


मोर गांव ल जानंव-अंकुर


  सुरंग होय ले नांव पड़िस सुरगी 


 हमर गाँव सुरगी ह राजनांदगॉव ले अर्जुन्दा मार्ग म राजनांदगॉव ले 13 किलोमीटर दूर हे. खरखरा नदी के किनारे म बसे हे हमर गाँव सुरगी ह. येहा राजनांदगांव जिला के बड़का गाँव मन म शामिल हवय . येहा विधायक आदर्श गाँव हरे. हमर छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुखिया डॉ. रमण सिंह जी ह ये गाँव ल विधायक आदर्श गाँव के रुप म गोद ले रीहिस. सुरगी म हायर सेकेण्डरी तक स्कूल, पांच आंगनबाड़ी केंद्र, दस बिस्तर वाला अस्पताल, आयुर्वेदिक अस्पताल,पशु अस्पताल, मिनी स्टेडियम राष्ट्रीय कृषि विज्ञान केन्द्र ,कृषि अनुसंधान केन्द्र, कृषि महाविद्यालय, दू ठक पेट्रोल पम्म अउ पुलिस चौकी हे. 


इहां अंग्रेज जमाना म प्राथमिक स्कूल खुल गे रीहिस हे. सन 1961 म हाईस्कूल शुरु होगे रीहिस हे. इहां चार ठक प्राइवेट स्कूल हे.


छै आगर छै कोरी तरिया बर प्रसिद्ध


 जन श्रुति के अनुसार हमर गाँव म" छै आगर छै कोरी" तरिया रिहिस हे . तइहा  जमाना म ओड़िया मजदूर मन  छैमासी रात म ये तरिया मन ल खने रिहिन. समय के संग कतको तरिया पटागे. आजो हमर  गांव म दर्जनभर ले जादा तरिया हे गांव के चारों मुड़ा तरिया नजर आथे. इहां के तरिया म दर्री तरिया ह सबले बड़का तरिया हरे.आने तरिया म 

चंडी तरिया, मतवा तरिया,मंधना तरिया, डोंगी तरिया,  बुड़गा तरिया सड़क बुंदिया तरिया, चुनचुनिया तरिया,तुलसी तरिया, पुरइना तरिया , हुर्रा तरिया,खमर्री तरिया ,कोठर्री तरिया, मोहन डबरा सामिल हे. इहां सबो गांव के जइसन चारो मुड़ा देवी -देवता के मंदिर हे. जेमा शीतला माता,सांहड़ा देव, बूढ़ा देव,राम मंदिर, कृष्ण मंदिर, शिव मंदिर, जैतखाम सामिल हे. गांव म जुड़वास,सोमवारी ,बीज बोनी तिहार,मातर मड़ई सुग्घर से मनाय जाथे.


साहित्यकार अउ कलाकार के गांव


दसमत कैना प्रसंग के संबंध ये गाँव ले जुड़े हवय.सुरगी साहित्य अउ कला बर अब्बड़ प्रसिद्ध हे.  ये संस्था ह तेवीस बछर ले संचालित हे. ये संस्था म हमर गांव के संगे संग सुरगी के आस पास गांव के संगे संग दूर दराज के साहित्यकार मन घलो जुड़े हावय.साकेत साहित्य परिषद् सुरगी के वार्षिक समारोह म प्रदेश के दर्जन भर बड़का साहित्यकार मन इहां पहुंच के अपन विचार ल साझा कर चुके हे. 


"सुरंग" रहे ले  हमर गाँव के नाँव "सुरगी "पड़े हे. ओड़ार बांध (टप्पा) ले सुरंग के स्रोत कहे जथे. अइसन जन श्रुति हे.  पूर्व सरपंच स्व. पदुमलाल लाल साहू के घर के सामने सुरंग के निसान आजो विद्यमान हे जेला सुरक्षा के दृष्टि ले चौड़ी के रुप म बांधे गे हावय.


  संत कवि पवन दीवान जी के बिचार


एक बार साकेत साहित्य परिषद् सुरगी के वार्षिक सम्मान समारोह म पहुंचे माई पहुना श्रद्धेय संत कवि पवन दीवान जी ह "सुरगी " के व्याख्या अइसन करे रीहिस हे - "सुर" माने "देवता "अउ "गी "माने "गाँव". मतलब" देवताओं का गाँव सुरगी " . 


 इहां दू ठक मानस मंडली,

दू ठक रामधुनी मंडली,दू ठक पंथी मंडली, चार ठक जसगीत मंडली अउ एक ठक लोक सांस्कृतिक मंडली हे. इहां मानस टीकाकार, प्रवचनकार , उद्घोषक, कवि, लोक गायक,वादक कलाकार एवं नृत्य कलाकार मन के पर्याप्त संख्या हे. 


इहां कबीर कुटी आश्रम संचालित हे. हमर गांव म हर बछर  प्रवचन के आयोजन होथे.  गोवर्धन पूजा के दिन गांव भर के मन सकलाके गोवर्धन चौक म सकलाथे अउ जाति पाति के बंधन ल तोड़ के सुग्घर ढंग ले गोबर के टीका लगा के एक दूसरा ल बधाई देकर सुखी जीवन के कामना करथे.मातर मड़ई के बढ़िया आयोजन होथे. हमर गांव म तीन घांव मड़ई होथे. शनिच्चर, मंगल अउ खरखरा नदी के किनारे म शिवरात्रि मड़ई .


इहां के रहवासी मन म साहू, सतनामी,ढीमर, निषाद,यादव, सिन्हा,सेन,जैन, गोंड़,महार सहित आने जाति के लोग हे. जैन, मुसलमान,सिक्ख धर्म

के लोग घलो हे. सबो जाति अउ धर्म म

सुग्घर भाईचारा के भावना विद्यमान हे.हमर‌ गांव म समय- समय म सस्वर मानस गान टीका स्पर्धा, रामधुनी प्रतियोगिता, पंथी नृत्य प्रतियोगिता,जसगीत प्रतियोगिता होवत रहिथे.


अँचल के पहिली मँड़ई 


कोनो भी गाँव -शहर के मँड़ई -मेला एक तय दिन म होथे. हमर गाँव सुरगी (राजनांदगॉव) के मँड़ई देवारी तिहार मनाय के बाद जे पहिली शनिवार पड़थे वोमा मनाय जथे. ये दृष्टि ले हमर गाँव के मँड़ई ह अँचल के पहिली मँड़ई होथे. मोंहदी(बालोद जिला) मड़ई ह  देवारी तिहार मनाय के बाद पहिली इतवार के होथे. 

देवारी तिहार मनाय के बाद हमन ल मँड़ई के अगोरा रहिथे. अपन सगा औ-सोदर मन ल नेवता देथन. सगा मन ल घलो हमर गाँव के मड़ई के गजब अगोरा रहिथे. काबर कि देवारी तिहार मनाय के बाद शनिवार के मनाय जाथे. ये समय सब के मन अपन सगा संबंधी से मिले -जुले बर होथे. सुग्घर ढंग ले देवारी -मिलन हो जथे. मँड़ई के बहाना एक दूसरा ले मिल के सुख -दु:ख के बात ल आपस म बाँटथे. 

हमर गाँव के शनिच्चर मड़ई ह पुराना बस स्टेण्ड के उत्तर दिशा म बाजार चौक म होथे. इही जगह हमर गाँव के मुख्य सांस्कृतिक मंच हे.जेमा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम समय समय म आयोजित होवत रहिथे.  राउत मन ह मोंहदी मड़ई माने के बाद गरुवा मन ल फिर से चराय बर जाथे. 


मँड़ई - 


मँड़ई -मेला म मँडई के गजब महत्व हे. येखर बिना मँड़ई ह पूरा नइ होवय. मँड़ई ह बड़का बाँस ले बनाय जथे. येला तोरन -पताका, मयूर पंख, घुंघरु, कौड़ी जइसन जीनिस ले सजाय जथे. राउत अउ गोंड समाज के मन ह ईष्ट देवता के पूजा करके मँड़ई ल लाथे. अपन समाज के मुखिया घर सकलाथे. फेर सबो झन सुग्घर नाचत अउ दोहा पारत गाँव के सरपंच, पटेल अउ दू -चार झन मुखिया के अँगना म जाके परघाथे.  मुखिया मन ह राउत समाज ल स्वेच्छा से रुपया -पैसा दान देथे. फेर मँड़ई म आके नँगत नाचथे -गाथे. दुकान दार मन ल जोहारथे अउ खुसी -खुसी वहू मन राउत समाज ल पैसा देथे. राउत मन सुग्घर दोहा पारके दान दाता मन ल आशीष देथे.


राउत मन के पहनावा -


राउत मन के पहनावा ह गजब सुग्घर लगथे. धोती -कुर्ता पहने ,मूंड़ म पागा बाँधे ,कलगी लगाय, कमर ल पटका मा बांधे, अपन शरीर म रस्सी के माध्यम ले मयूर पंख, कौड़ी, घुंघरू ल पिरो के पहने रहिथे. पांव म घलो घुंघरु पहनथे. लौठी ल घलो बढ़िया किसिम -किसिम ढंग ले सजाय रहिथे. राउत मन ह लाठी के माध्यम ले अपन शौर्य के प्रदर्शन घलो करथे. बिधुन होके बाजा बजावत, दोहा पारत, नाचत जब लउठी ल घूमाथे अउ मँडई ल लहराथे त देखइया मन के मन ह घलो झूमे ल लगथे. 


  नाना प्रकार के दुकान -


  हमर गाँव के मँड़ई म मिठाई दुकान वाले अउ कुछ दूसरा व्यापारी मन ह शुक्रवार के संझा -रात तक पहुंच के अपन बर ठीहा पोगरा लेथे. मिठाई  दुकान के संगे सँग कपड़ा -लत्ता,  बर्तन दुकान,सोना चाँदी  के दुकान मनियारी दुकान,जूता- चप्पल दुकान ,लईका मन के खिलौना दुकान,  नाश्ता-चाय दुकान, फल दुकान, झूला, रहचुली, फुग्गा वाले, चॉट -गुपचुप दुकान, गन्ना वाला, सूपा, चरिहा, टुकनी, झाड़ू, के सँगे सँग साग -सब्जी के पसरा लगे रहिथे. बाजार ठेकेदार ह दुकानदार मन ले पैसा वसूलथे. हमर गाँव के सँगे आस- पास के गाँव के मनखे मन अउ दूर -दराज ले रिश्तेदार मन ह आके मँड़ई के शोभा बढ़ाथे. जरूरत मुताबिक मनखे मन किसिम -किसिम के चीज खरीदथे. नान्हें लइका मन झूला अउ जवान मन रहचुली के मजा लेथे. माई लोगन मन के मनियारी अउ सोना चांदी के दुकान डहर गजब भीड़ रहिथे. वोमन ह माला,खिनवा,बिछिया ,सांटी, करधन के सँगे सँगे टिकली -फुंदरी खरीदथे.

मँड़ई म दुकान वाले मन किसिम -किसिम ढंग ले चिल्लाके अपन सामान ल बेचथे. कुछ दुकान वाले मन पोंगा रेडियो के माध्यम ले घलो रिझाथे. एक्का -दुक्का  दुकान वाले मन विशेष रुप से उद्घोषक घलो रखथे. रँग -रँग के बात बताके, लोक गीत अउ फिल्मी गीत सुना के अपन दुकान के सामान ल बेचे के कोशिश करथे. मँडई म सब मन ल उछाह रहिथे. पर जवान अउ लईका मन के बाते अलग रहिथे. ऊंकर मन के खुशी ह देखते बनथे. 

 मँडई म आस -पास के सँगे सँग दूर रहवईया सँगी -साथी अउ जान -पहिचान वाले मन सँग भेंट होथे त गजब खुशी होथे.रात होथे त  मँड़ई म जवान लईका मन के भीड़ ह बढ़ जथे. ये समय सियान मन ह घूम -घाम के घर आ गे रहिथे. 


  मनोरंजक कार्यक्रम -


  रात म मनखे मन के मनोरंजन करे बर मुख्य सांस्कृतिक मंच म कोनो साल नाचा त कोनो साल लोक सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन करे जथे. नाचा अउ लोक सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम ले जनता जनार्दन के जिहां मनोरंजन होथे. त दूसर कोति अपन समृद्ध लोक संस्कृति ले परीचित घलो होथे. ये प्रकार ले 

मँड़ई के बहुतेच महत्व हे. येहा खुशी के प्रतीक हरे. 


              ओमप्रकाश साहू" अंकुर"

     सुरगी, राजनांदगॉव (छत्तीसगढ़) 

  मो.  7974666840

मोर गांव सुरगी'

 'मोर गांव सुरगी'

सुरगी राजनांदगांव अर्जुंदा सोमनी ले तेरा किलोमीटर बीच में हावे। सुरगी गांव के नाम सियान मन  के मुताबिक गांव के बीचों बीच सुरंग हैव जेन हर  ओढ़ार बांध टप्पा म निकले हे तेकर सेती गांव के नाम सुरगी पड़ीस। सुरंग म अभी तक चबूतरा बने हैं सुरगी तरिया के गांव हे। सियान मन के मुताबिक छः मासी रात में ओढ़नी ओड़िया मन छः अगर छः कोरी त्रिया कोड़े रिहीस जेमा आज घलो करीब 15-16 तरिया हावे। ये ह सुरगी के सान आए ।गांव के तीरे-तीर खरखरा नदिया घलो हैवे जे हर  सुरगी के समृद्धि के पपरतिक है।

हमर सुरगी आदर्श ग्राम सुरगी कहलाथे। इहां सबों परकार के सुविधा हावे सरकारी एलोपैथिक, आयुर्वेदिक ,अउ जानवर मन बर सरकारी पशु चिकित्सालय घलो उपलब्ध हवे ।गांव में करीब पांच ठन आंगनबाड़ी केंद्र हे। इहां कृषि विज्ञान केंद्र घलो हवे। गांव में थाना ,विद्युत सर्विस स्टेशन के सुविधा हवे।

साहित्य कला के क्षेत्र में घलो सुरगी के बड़ शोर हवे सन 21 मार्च 1999 में संचालित साकेत साहित्य परिषद आज तक अनवरत चलत आत हे। एकर संस्थापक सदस्य श्री कुबेर सिंह साहू, ओम प्रकाश साहू ,लखन लाल साहू ,धर्मेंद्र पारख, दिलीप कुमार, फकीर प्रसाद साहू हरे ।जस गीत के क्षेत्र में श्री मनजीत मटियारा ला जस सम्राट के उपाधि घलो मिले हवे। लगभग पांच हजार के आबादी वाले गांव में सिरिफ  एकेच  जगा देवी दुर्गा माड़थे  जेन हर हमर गांव के सुमता के पहिचान आए।

               फकीर प्रसाद साहू

                   'फक्कड़'

                  ग्राम-  सुरगी

                 🙏🙏🙏🙏

मोर गाँव बिरोदा*

 

 *मोर गाँव बिरोदा*


मोर गाँव बिरोदा अट्टल कन्हार गाँव आय। शिवनाथ नदिया के सुग्घर तीर मा बसे एक छोटे से गाँव हरय। धमधा ले 6 किलोमीटर दूरिहा उत्ती मूड़ा मा, अहिवारा ले 15 किलोमीटर रकसेल अउ बेरला ले 15 किलोमीटर दूर भंडार मा बसे हे बिरोदा गाँव।


हमर गाँव मा ब्रिटिश जमाना से स्कूल हे। वो समय मा आसपास के गाँव मा केवल बिरोदा मा ही स्कूल रिहिस हे। सियान मन बताते कि कोर्ट भी हमर गाँव मा रिहिस हे बाद मे बेमेतरा शिफ्ट होगे। हमर गाँव के मालगुजार  अग्रवाल मन  रिहिस हे । हमर जानती मा हमर गाँव के मन दाऊ घर बनी मा जावय। येमन भिलाई के रहने वाला हे। आज भी एकर परिवार भिलाई मा हे। 

जब बीएसपी चालू होइस तब हमर गाँव के जतका पढ़ें लिखे आदमी रिहिस सब झन हमर बबा के जमाना मा बीएसपी मा लग गे। हमर गाँव मा लगभग 50-60 झन बीएसपी से रिटायर्ड हे।

हमर गाँव मा साहू समाज के बस्ती हे।

लगभग 300 घर साहू, 50 घर केवट, 30-35 घर सतनामी, 4-5 घर नाई, 10-15 घर यादव, 01 घर ठेठवार, 01 घर पंडित, 01 घर राजपूत, 02 घर मेहर अउ 01 घर पटेल हे।

पारा बस्ती के बात करन ता मुख्य रूप से मंदिर पारा, भाठा पारा, सिकारी पारा, गौटिया पारा, सतनामी पारा, दइहान पारा हे।

हमर गाँव मा एक बड़े तरिया, एक डबरी की एक नवा तरिया हे।


हमर गाँव मा देवी देवता- भाठा पारा में श्री राम जानकी मन्दिर निषाद समाज के द्वारा बनाए हे। बीच बस्ती मा शिव मंदिर, शीतला माता, सतनामी पारा मा जईत खाम, माहामाया मंदिर, तरिया पार मा शिव मंदिर, डबरी पार मा हनुमान मंदिर, पीपर तरी महावीर, दइहान मा साहड़ा देव, ठाकुर देव, नदिया कछार मा भंईसासुर, आदि अउ छोटे-छोटे मंदिर मुर्ती विराजमान हे।

नदिया के ओपार तितुरघाट मा बहुत ही पुराना छमासी रात के प्राचीन विष्णु मंदिर हे। जेमा कार्तिक पून्नी अउ मांघी पुन्नी में मेला भराथे।


तीज तिहार- हमर छत्तीसगढ़ के सबो तिहार ला जुरमिल के मानथें। 

हरेली, पीतर, जन्माष्टमी, कमरछठ, तीजा-पोरा, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दशहरा, देवारी, गुरु घासीदास जयंती, माँ कर्मा जयंती, गुहा जयंती, सवनाही पाठ, नवधा रामायण, मड़ई मेला आदि। हमर गाँव मा हर साल गुहा जयंती 16 जनवरी के, मड़ई 26 जनवरी के, दशहरा एक दिन बाद मनाए जाथे।


हमर गाँव छत्तीसगढ़ के कला संस्कृति बसे हे। इहाँ कलाकार मन के कमी नइ हे। इहाँ के फाग मंडली पूरा छत्तीसगढ़ में बिरोदा के नाम ला रोशन करे हे। दूरदर्शन मा घलो प्रसारित होय हे।

कला के क्षेत्र मा श्री केशव साहू-बिंदिया साहू लोक गायिका जेमन मया के सिंगार लोक कला मंच संस्था चलावत हे। श्री सीतारामसाहू- सत्यभामा साहू लोक कलाकार हे। मोर पिता जी श्री सेवा राम निषाद जस गायक के रूप में आप-पास के क्षेत्र मा  प्रसिद्ध हे। हाल ही में मोर पिता ने जी के संकलन जसगीत ला धरोहर नाम के पुस्तक के रूप मोला संपादन करें के सौभाग्य मिलिस। मोर पिता जी के जसगीत ला यूट्यूब में भी सुन सकत हव। मोर दादा जी भी एक अच्छा मांदर वादक डंडा नृत्य, जस गायक रिहिस हे,  स्व. लेड़गा राम साहू

-जस गायक, स्व. मुकुत राम साहू जस गायक, स्व. दशरथ लाल श्रीवास फाग गायक, जस गायक रामायण टीकाकार रिहिस हे।


शिक्षा अउ खेल के क्षेत्र में हमर गाँव के युवा मन आघू हे। हमर गांव के कबड्डी हा रायपुर, दुर्ग, बेमेतरा, क्षेत्र मा प्रसिद्ध हे। इहाँ के खिलाड़ी मन राष्ट्रीय स्तर तक ले गाँव के नाम रोशन करे हे। जेमा श्री चन्द्रकुमार साहू, नंदकिशोर निषाद, हेमंत साहू, विनय साहू हे। 


शिक्षा के क्षेत्र में भी में भी बी़ई़, एम.बी.ए. डिप्लोमा करके आज बड़े बड़े कंपनी में, अउ सरकारी नौकरी में कार्यरत हे।

चंद्रकुमार साहू, तोरण साहू, भूपेश साहू, अनिल साहू, मोहन साहू, नारद साहू, नंदकिशोर निषाद, आदि हे।


राजकुमार निषाद "राज"

बिरोदा धमधा जिला दुर्ग

7898837338

मोर गांव-टेंगनाबासा*

 *मोर गांव-टेंगनाबासा*


छत्तीसगढ़ के प्रयागराज राजिम ले 45 किमी दूरिहा मा हवै छुरा।जे हा कभू बिन्द्रानवागढ़ जमींदारी के मुख्यालय रिहिस।आज ओला विकास खंड मुख्यालय के दर्जा मिलगे हवै।उंहे ले 2 किमी में बसे हवै मोर गांव टेंगनाबासा।जेमा लगभग 150 छानही के घर कुरिया हवै।

गांव आर्थिक रूप ले संपन्न हवै। ज्यादातर मनखे किसानी अउ मिस्त्री बुता ले जुड़े हवै।हमर गांव ला भगवान विश्वकर्मा के गोद के उपमा घलो देये जा सकथे काबर कि हमर गांव में घरो घर मकान निर्माण से जुड़े राजमिस्त्री,बढ़ई,पेंटर अउ मार्बल मिस्त्री हवै।

जातिगत आधार ले गांव ला देखबो त हमर गांव कलार अउ गोंड जाति बाहुल्य गांव हरे।केंवट,बाम्हन,मुसलमान,राजपूत,राउत अउ ठेठवार जाति के मनखे एके दू घर के हे।सबले विचित्र बात ये हरे कि हमर एतराब में हमरे गांव एक ऐसे गांव हरे जिंहा साहू जाति के परिवार नी बसे हे।एकर बारे मा सियान मन बताथे कि हमर गांव में साहू जाति के परिवार नइ नांदे।तेकर सेती आज तक कोनो नइ बसिन।जबकि हमर परोसी गांव हा साहू बाहुल्य बस्ती आय।

गांव के नामकरण के पाछू गांव के आराध्य देवी टेंगनही माता के नाम हावै।जेकर बारे मा कथा कंथली मा बताथे कि माता टेंगनही हा(जेन गांव ले 8 किमी दूरिहा मा डोंगर ऊपर बिराजित हे) स्नान खातिर हमर गांव के सरार मा आवै अउ कुछ समय वास घलो करे।तेकर सेती टेंगनही वास हा धीरलगहा टेंगनाबासा होगे।कुछ मन के कहिना के जेन सरार मा माता स्नान करे ओमा पहिली अबड टेंगना मछरी राहय।माने सरार में टेंगना के बासा रहै तेकर सेती टेंगनाबासा होगे।खैर,कथा कंथली दंतकथा होथे जेला प्रमाणिक नइ माने जा सकै।फेर ठोस आधार जरुर रथे अइसन कथा के पाछू।जेन सरार के चर्चा करे हवंव वो सरार आज घलो हवै।जेकर खंड़ मा शीतला दाई अउ टेंगनही दाई के देवाला बने हवै।

हमर गांव मा एके जघा गौरा चौंरा अउ एक जघा दुर्गा बइठारथे।जे हा गांव के सुमता के चिन्हारी आय।देवारी के समे मातर महोत्सव बड़ धूमधाम से मनाय जाथे जेमा छत्तीसगढ़ के नामही लोकमंच मन के प्रस्तुति होथे।हर बछर मानसगान प्रतियोगिता घलो होथे। गांव मा भगवान राधाकृष्ण अउ गोंड़ समाज द्वारा स्थापित शिव मंदिर है। कृष्ण जन्माष्टमी के तिहार घलो उछाह के संग मनाय जाथे।गांव में मानस मंडली अउ राऊत नाचा दल घलो हवै।


रीझे यादव

टेंगनाबासा(छुरा)

जंगल म बसे हे मोहगाँव---हेमलाल सहारे

 जंगल म बसे हे मोहगाँव---हेमलाल सहारे



मोर गाँव महाराष्ट्र सीमा के तीर म, राजनांदगाँव जिला के छुरिया तहसील के सुदुर वनांचल म राजनांदगांव-महाराष्ट्र चौड़ा सड़क म बसे हावे मोहगॉंव। गाँव ह तीन डहन के प्रकरीति रूपी जंगल के बीच म हे, जिहां बिहने ल रात के होत ले शुद्ध हवा चलत रथे,प्रदूषण के निशान तको नई हे। मोर गाँव जंगल के बीच म बसे हे। पूरा गाँव के सियार मैदानी हे, जंगल के भीतरी ले नान्हे-नान्हे नाला जुड़े हावे। बरसात म नंगत  पानी भागत रथे। पहिली गाँव मा मालगुजार मन रहत रिहिस त एकहत्थी गाँव ला चलावय। अब उँखर मन के जमाना नंदाईस हे अउ येदे गाँव के मन स्वतंत्र कमावत-खावत हे। गाँव के नाव के बारे सियान मन ला अब्बड़ पूछेंव। फेर कोनो मन बने नइ बता पाइन। अउ सियान मन ला पूछे के प्रयास करहूँ। अपन गॉंव सबका प्यारा रथे। महूँ ला अपन गाँव बड़ नीक लगथे। अपन गाँव के बात ला कुछु बतावत हों।


पक्की सड़क पहिचान--

गाँव ह सोजे राजनांदगांव जिला मुख्यालय ले दक्षिण दिशा मा 57 किलोमीटर दुरिहा पक्की सड़क ले जुड़े हे। बिहने छः बजे ले रात के दस बजे तक बस के सुविधा हे। विकासखंड छुरिया घलो 7 किलोमीटर दुरिहा म हे। इहाँ ले सीधा रायपुर-नागपुर जाए बर बस मिल जथे। उही गाँव के बड़े जान हमर बर पहिचान आये।


तरिया पार म शिव मंदिर---

गाँव के मुड़ा मन मा तीन ठन तरिया हावे,जेमा जुन्ना तरिया,माता तरिया,अउ नवा तरिया हावे,जुन्ना तरिया में सन 1975 ले बने शिव भगवान के मंदिर, जेमे कार्तिक अउ गणेश जी विराजे हे, संतोषी माता अउ दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर हमर गांव के आस्था अउ विश्वास के चिन्हारी हरे। पहली दूसर गाँव के मन हमर गाँव में सावन सोमवारी बर शिव मंदिर में पूजा करे बर आये। अब महाशिवरात्रि म गाँव भर के मन मिल जुलके महाशिवरात्रि तिहार ल मनाथे। जुन्ना तरिया के पार मा एसो महिला समूह वाले दाई-माई मन शिवलिंग के स्थापना करवा डारे हे। ऊंचो पूजा-पाठ शुरू होगे हे।

मोर गॉंव मा एके जगह गणेशजी, एके जगह गणपति जी, एके जगह सरस्वती माता अउ एके जगह दुर्गा माता स्थापित होथे। अउ गाँव भर के मन पूजा-आरती करथे। इहि मोर गाँव के सुमता के बड़े जान बात हरे।


तिनलोकिया देवता--

गांव के बूड़ती म तिनलोकिया देवता विराजित हे, जेकर मानता आस पास के गांव भर म हावे, जेला कुछु दुख तकलीफ होय म जाके सुमरे ले दुख पीरा सिरा जाथे,अइसन आस्था आजो घलो हावे, उहां बड़े-बड़े घोड़ा, हाथी अउ कई ठन बड़े-बड़े देवता-धामी मन हावे। अभी गाँव के मन मिलके बड़े-बड़े देवी-दुर्गा के मूरती ल स्थापित करे हे। जेकर ले मंदिर के शोभा अउ बाढ़ गेहे। मंदिर के तीर ले जवैया कोचिया मन भाटा, मुरई, आलू, मनयारी वाले मन टिकली, पिन,फीता ल चगा के जाथे। ओती के किसान मन किसानी करे के पहली पूजा-पाठ, नरिहर जरूर चघाथे।


रामलीला मंडली---

गाँव में तीर तखार ले सबले पहिली रामलीला अउ रामायण पाठ के मंडली मोहगाँव मा बने रिहिस। उँखर कहीं-कहीं सामान मन आज घलो हावे। समय के संग मंडली के मन ढेरयादिन अउ अभी नवा-नवा टुरामन सीखबो कहिके भीड़े रथे। गाँव में सावन भर घर-घर रामायण पाठ शौकीन मन कराथे। फेर अखण्ड रामायण पाठ दु दिन के होथे,जेमे जम्मो गाँव वाले मन के सहयोग ले होथे। दशहरा में नान नान लइका मन के रामलीला अउ रावण दहन बड़ मजा आथे।


नाचा के कलाकार--

गांव म नाचा के बड़का कलाकार मन घलो रिहिन। जेमे कई झन अभी नई हे। नाचा कलाकार रामदेव विश्कर्मा, रजलाल विश्कर्मा, थनवार चंद्रवंशी, कामता प्रसाद सेन परमुख हे। इहा पंचराम देवदास जइसन मोहरी वादक सन संगत करईया मोहरी वादक अउ नाचा के जोक्कड़ बंशीलाल विश्कर्मा घलो रिहिस। जेहा अभी-अभी बीत गे। 


बिहाव बाजा वाले पारटी घलो हावे। जेमन दफड़ा, दमऊ, गुदुम, बेंजो जईसन बाजा के साज हवे। कानफोड़ईया धमाल अउ डीजे वाले मन नइ हे। इहाँ जवान संगवारी मन के राउत नाच पार्टी घलो हावे। दूनो पार्टी वाले सीजन में अब्बड़ जाथे।


आल्हा गायक---

गाँव में पहली आल्हा-उद्दल के गवईया सियान रिहिन। जेकर तीर तखार म बड़ शोर रहय। ओ सियान अभी नई हे। फेर कथे न पैत्रिक गुन ह ककरो म आथे, उँखर नाती-पंथी मन रामधुनी, रामायण म गाथे। फेर सियान के आल्हा ल पूरा नई सिख पाईन। उनकर घर ल आज घलो आल्हा घर के नाम ले जम्मो गाँव के मन जानथे।


प्रमुख तिहार देवारी--

गाँव के सबले बड़े तिहार के रूप म देवारी तिहार ल बड़ा धूमधाम ले मनाथे, अउ दूसर गांव के दू दिन पीछू होथे, जेकर ले आसपास के देखईया मनखे मन अउ गाँव के बेटी-माई मन घलो सकला जाथे। मोर गाँव मा मड़ई नई होय एकरे सेती साल म एक दिन रथिहा में नाचा घलो होथे। रात भर गाँव वाले मन देखते अउ आनंद पाथे।


वनोपज के भंडार---

जंगल के तीर बसे के इहि फायदा होथे कि उन्हा वनोपज के भरमार रथे। महुवा, गुल्ली, चार, तेंदू, हर्रा, बेहरा, कुसुम,परसा फूल,धंवई फूल, करण बीजा, लीम बीजा, बोहर भाजी, बोइर,अमली अभी घलो मिलथे,जेला सुखों के बाजार में बेचे  के काम आथे। सबले जादा महुवा अउ ओकर गुल्ली, तेंदुपान घलो अब्बड़ मिलते। गॉंव के मन अच्छा पैसा कमाथे।


नान्हे फेर सुग्घर गाँव--

गाँव के जनसंख्या जादा नई हे। 125 छानी के हारी-हारा होही। प्राथमिक शिक्षा तक स्कूल हे। गाँव के मन बढ़िया सुभाव के हे। संग मा मिल जुलके कमाते अउ रथे। आदिवासी मन के संख्या थोरिक जादा हे। आपसी सहयोग, परेम-भाव,भाईचारा, समरसता के बेवहार बने हावे। मने सबो मिलाके मोर गाँव बड़ सुंदर अउ सुग्घर हे।


                

                         हेमलाल सहारे

             मोहगांव( छुरिया)राजनांदगाँव