Friday, 17 March 2023

घोटुल माने मुरिया जन जाति के जुन्ना विश्वविद्यालय

 घोटुल माने मुरिया जन जाति के जुन्ना विश्वविद्यालय


हमर छत्तीसगढ के बस्तर क्षेत्र अपन जन जातीय संस्कृति के कारन भारत के संगे- संग दुनियां भर म एक अलगे पहिचान रखथे. इहां के रहन- सहन, आचार- विचार, संस्कृति -सभ्यता , परंपरा -संस्कार जहां लोगन मन बर आश्चर्य के विषय हे त इहां के कतको नियम - धियम ह अबूझ पहेली घलो हे      जउन ल समझना वत्तिक सरल नइ हे जइसे हमन उपरे उपर समझे के कोशिश करथन.  अइसने एक पहेली हरे घोटुल. जेला हमन सिरिफ प्रेम प्रसंग के जगह समझ जाथन? 


    सबले पहिली जाने के कोशिश करथन कि घोटुल का हरे. जन जाति मन म "युवा घर" के परंपरा रहे हे. परजा जन जाति म धागा बक्सर,उरांव के धुम कुरिया,बिरहोर के गितिओना,भारिया के घसरवासा, भुइंया जन जाति के रंग भंग, अबूझमाड़िया जन जाति के कोसीघोटुल अउ अइसने मुरिया, मारिया व गोंड़ जन जाति मन के" युवा घर "ल घोटुल कहे जाथे. युवा गृह घास- फूस ले बने एक झोपड़ी या मकान होथे जउन गांव के बींचो- बीच या जंगल के पास बनाय जाथे.


घोटुल के मायने 


आवव घोटुल के मायने ल जानथन.  येकर सही नांव गोटुल हरे. गोटुल के अर्थ होथे गोंगा स्थल या "विद्या ठउर" . येहा गांव के बीच म बनाय जाथे.अब नामे से स्पष्ट झलकत हे कि घोटुल मात्र रास -रंग के ठउर नोहे बल्कि येकर अउ कतको नीक उद्देश्य हे जेकर माध्यम ले मुड़िया या मुरिया जन जाति के युवक (चेलिक) अउ युवती ( मुटियारिन) मन येमा शामिल होके जिनगी जीये के मरम ल समझथे. येहा परिवारिक, सामाजिक दायित्व ल समझे के मउका देथे जउन जिनगी म अब्बड़ काम देथे. घोटुल के जन्मदाता लिंगोपेन माने जाथे जेहा जन जाति मन के मुख्य देवता हरे.घोटुल ल" कुमार घर" (गृह) घलो कहे जाथे. इहां सामाजिक, राजनीतिक अउ धार्मिक जिनगी जीये के शिक्षा मिलथे. युवा गृह के माध्यम ले जन जाति समाज के युवक -युवती मन सामाजिक रीति रिवाज अउ परंपरा ले जुड़े ज्ञान ल सीखथे. अतकिच नइ घोटुल के माध्यम ले वोमन अपन समाज के बढ़वार म घलो योगदान देथे. घोटुल के मुख्य नृत्य मांदरी हरे जेला पुरुष वर्ग मन संचालन करथे. 


घोटुल के नियम


बस्तर के घोटुल म ७ बरस ले १६ बरस उमर  तक के युवक- युवती मन दाखिल

ले सकथे. इहां अविवाहित युवक -युवती मन संझा बेरा इकट्ठा होथे अउ रात म घर वापस आथे. येमन ल चेलिक ( प्रेमी) अउ मुटियारिन ( प्रेमिका) कहे जाथे. 

मानलो कोनो मुटियारिन ह घोटुल म कोनो चेलिक ले प्रेम करे ल लग जाथे त वोकर चेलिक (प्रेमी) के नांव पूछ करके वोकर संग बिहाव कराय जाथे. शादी के बाद दंपत्ति ल घोटुल म रहना वर्जित रहिथे पर घोटुल का मुखिया वो दंपत्ति ले ये बचन लेथे कि वोमन अपन संतान ल घोटुल म जरूर भेजही. घोटुल म दंड के नियम हे जेकर पालन सबो सदस्य मन ल करना रहिथे. येमा सदस्य मन अपन ले बड़का सदस्य मन ल प्रनाम करथे जेला राम जुहार प्रथा कहे जाथे.ये संस्था म सरदार के पद सबले बड़े होथे.येकर चुनाव आम सहमति ले करे जाथे.

घोटुल म चेलिक मन के मुखिया (सरदार पुरुष)ल सिरेदार अउ मुटियारिन मन के मुखिया (सरदार महिला) ल बेलोसा कहे जाथे. अक्सर घोटुल के संचालन विधुर या परित्यक्त व्यक्ति ह करथे. 


घोटुल के उद्देश्य


कोनो भी संस्था बनाय के पीछे वोकर उद्देश्य जरूर होथे त घोटुल  कइसे अछूता रहि. 


१ .येहा भोजन इकट्ठा करे खातिर एक महत्वपूर्ण आर्थिक संगठन हरे.


२. येहा युवक युवती मन ल सामाजिक अउ जिनगी संबधी कारज ल सही ढंग से करे के उदिम सिखाथे. 


३.  येहा जादू अउ धर्म ले संबंधित संस्कार,लोक परंपरा ल सीखे के  ठउर हरे.  जइसे वोमन ल भरोसा रहिथे कि शिकार म सफलता जरूर मिलही अउ

युवक -युवती मन के उत्पादन शक्ति म बढ़वार होही. 



व्यवहारिक उद्देश्य -


घोटुल के व्यवहारिक उद्देश्य म शामिल हे.

१.  युवक युवती मन म सेवा भाव जगाना .


२ . सामाजिक शिक्षा देना .


३ . जीवन साथी के चयन करना.

  


  घोटुल के प्रमुख परब 


घोटुल म समय- समय म उत्सव,

तिहार मनाय जाथे जेमा नुनानारे दाना पंडुम,वेल पिज्जा,पारंद,नया खानी,हरेली,दीयारी,काडामारगा, कारा पंडुम,कोरता पंडुम,कोरे पंडुम,ईराऊ पंडुम,मर्का पंडुम, प्रमुख हरे.


घोटुल के पहुना


 घोटुल के परब,उत्सव म गांव के गायता ( मुखिया), दूसर क्षेत्र के अपरगना माझी (मुखिया), दूसरा घोटुल के चेलिक -मुटियारिन पेड़गा- पेड़गी, नव जवान पेकी, गांव के धार्मिक कार्य ल ल संपन्न करने वाला पेरमा,गांव के उपमुखिया पदा, दूल्हामेइदों, जादू टोना जानने वाला सिरहा, मरन संस्कार करने वाला हेनगुंडा मन ल निमंत्रण दे जाथे.


तो ये प्रकार ले घोटुल मुरिया जन जाति मन के प्रमुख सामाजिक संस्था हरे. मेल जोल के सबले बढ़िया माध्यम हरे जेकर माध्यम ले मुरिया जन जाति संगठित रहिथे अउ अपन, संस्कृति, सभ्यता अउ संस्कार ले जुड़े रहिथे. आधुनिक,पाश्चात्य संस्कृति अउ नक्सलवाद जइसन समस्या ह बस्तर के "युवा घर"(गृह) मन बर एक बड़का संकट हरे.


             ओमप्रकाश साहू "अंकुर"

 

                

             सुरगी, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़)


मो.  ७९७४६६६८४०

छत्तीसगढ़ी साहित्य मा व्यंग्य यात्रा

 


छत्तीसगढ़ी साहित्य मा व्यंग्य यात्रा 


व्यंग्य रचना अउ व्यंग्य गोठ म वो शक्ति रहिथे कि मनखे ल सुधरे बर प्रेरित करथे. कतको बेरा व्यंग्य गोठ ह झगरा के जड़ घलो बन जाथे. महाभारत काल म दुर्योधन ल द्रोपदी के बात कि “-अंधवा के बेटा ह अंधवा जइसे हस ” ह तिलमिला के रख दीस. जेकर सेती ये व्यंग्य बात के बदला ले के ठान लीस. वोकर दुष्परिणाम महाभारत युद्ध के रुप म सामने आइस.

दूसर कोति देखथन कि रत्नावली के व्यंग्य बात ल सुनके कि -” हांड मास के तन ले अत्तिक प्रेम करथस! अतकी प्रेम भगवान ले कर लेहू त त़ुमन जिनगी रुपी भव सागर ले पार हो जाही “ह तुलसी जैसे संत दीस.


वइसे तो कविता म घलो जमगरहा व्यंग्य रहिथे. कबीर, तुलसी ,रहीम, वृंद सहित बड़का कवि मन के रचना म सीख के साथ व्यंग्य छुपे हवय . कहानी, एकांकी, नाटक म व्यंग्य के गुन मौजूद रहीथे.


पर इहां व्यंग्य के अर्थ हमन ल साहित्य के नवा विधा व्यंग्य लेखन के बात करना हे.ये विधा ह आधुनिक साहित्य के सबले लोक

प्रिय विधा बन गेहे. ये विधा के सम्राट हरिशंकर परसाई जी माने जाथे. जब मेहा स्कूल म पढ़त रेहेंव त उंकर व्यंग्य रचना “टार्च बेचने वाला ” पढ़े रेहेंव. बाद म विभिन्न अखबार अउ पत्र- पत्रिका म उंकर रचना पढ़ेव. आकाशवाणी ले घलो उंकर व्यंग्य वार्ता सुनेंव. परसाई जी ह अपन व्यंग्य रचना के माध्यम ले राजनीति म गिरते स्तर, नेता मन के झूठा वादा, भ्रष्टाचार, जमाखोरी, पाखंड, दिखावा उपर जमगरहा कलम चलाइस. ये विधा म लिख के परसाई जी ह जन जन म लोक प्रिय होइस. दुर्घटना ले गुजरे के बावजूद परसाई जी शासन /प्रशासन के समक्ष कभू नइ झुकिस अउ जनता जनार्दन ल जीवन भर जागरुक करे के कारज करते रीहीस.


हिन्दी व्यंग्य विधा म लतीफ घोंघी जी, त्रिभुवन पांडे जी, काशीपुरी कुंदन, प्रभाकर चौबे जी, रवि श्रीवास्तव जी, शरद कोठारी जी (नगर दर्पण, सबेरा संकेत राजनांदगांव) रामेश्वर वैष्णव जी, गजेन्द्र तिवारी जी विनोद साव जी, शत्रुघ्न सिंह राजपूत जी, कुबेर सिंह साहू जी, वीरेन्द्र साहू सरल जी, गिरीश ठक्करजी (सुई की चुभन) के नांव आदर के साथ ले जाथे.


मेहा ह लतीफ घोंघी जी के व्यंग्य रचना ल जादा पढ़े अउ सुुने हवँ. विभिन्न अखबार के रविवारीय अंक के संगे संँग साहित्यिक पत्रिका म पढ़े हवँ. आकाशवाणी रायपुर ले प्रसारित उंकर व्यंग्य रचना ल अब्बड़ चाव ले सुनवँ . उंकर व्यंग्य रचना म व्यंग्य के सँग हास्य के पुट झलकय जेहा मन ल गुदगुदाय अउ व्यवस्था पर जमगपहा प्रहार करय.


अइसने शरद जोशी जी के रचना ल पत्र पत्रिका म पढ़े के सँगे सँग रेडियो अउ टीवी म सुने रेहेंव.


छत्तीसगढ़ी साहित्य म व्यंग्य लेखन के यात्रा…..


आवव अब छत्तीसगढ़ी साहित्य मा व्यंग्य लेखन के यात्रा के गोठ करथन. छत्तीसगढ़ी म गद्य रचना के शुरुआत 1950 के बाद जादा देखे ल मिलीस. “छत्तीसगढ़ी मासिक” (संपादक -मुक्तिदूत),” लोकाक्षर” (संपादक -नंदकिशोर तिवारी जी) के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी गद्य ल बने वातावरण मिलीस. सुशील भोले जी के संपादन म 1987 से 1989 तक “मयारु माटी “पत्रिका म रामेश्वर वैष्णव , टिकेन्द्र टिकरिहा , चेतन आर्य , राजेश्वर खरे जी के सँगे सँग दूसरा व्यंग्यकार मन के लेख प्रकाशित होय हे.



छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य लेखन के एक बड़का नाँव रामेश्वर वैष्णव जी के हे. वैष्णव जी ह 1966 ले व्यंग्य लिखे के शुरु करीस. उंकर व्यंग्य लेख कई ठक अखबार अउ पत्रिका म प्रकाशित होइस जेमा बांगो टाईम्स(बागबाहरा) म 1966से 1968 तक (स्तंभ-आंखी मूंद के देख ले),छत्तीसगढ़ झलक म 1978 से 1981 तक, नवभारत म 1983 से 1990 तक अउ फेर बाद म 2010 से 2013 तक (स्तंभ -उत्ता -धुर्रा), 1995 से1997 तक दैनिक भास्कर म (स्तंभ -उबुक -चुबुक), 2009 से 2011 तक छत्तीसगढ़ी सेवक म 1980 से 1986 तक (स्तंभ – गुरतुर -चुरपुर)फेर 2010 से 2013 तक (स्तंभ – सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया) साप्ताहिक रुप म प्रकाशित होइस. वैष्णव जी ह लगभग पांच सौ व्यंग्य लिखे हे. हिन्दी म  तो उंकर पांच व्यंग्य संग्रह निकले हे.उंकर छत्तीसगढ़ी व्यंग्य के कुछ शीर्षक म ” का साग खायेस, सब्जी मन के गोठ बात, करिया कुकुर के उज्जर बात, “अच्छा आदमी के हालत खराब ” शामिल हे.



1959 मा  जय प्रकाश मानस के छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह “कलादास के कलाकारी “पहचान प्रकाशन (प्रकाशक – राजेन्द्र सोनी) रायपुर ले प्रकाशित होइस.हमर छत्तीसगढ़ के बड़का साहित्यकार जेमा हरि ठाकुर जी, चितरंजन कर जी, डॉ. बल्देव, डॉ. बिहारी लाल साहू, राजेन्द्र सोनी, राम लाल रात्री मन ह अपन लेख म ये व्यंग्य संग्रह ल छत्तीसगढ़ी के पहिली व्यंग्य संग्रह (व्यक्तिगत) माने हे. मानस जी ह 1990-91 म अमृत संदेश(संपादक – गोविन्द लाल वोरा) म “पंचनामा’ स्तंभ म व्यंग्य लेख लिखे.


छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य लेखन ल बढ़ावा दे म लोकाक्षर (संपादक – नंद किशोर तिवारी) देशबंधु के मड़ई(संपादक- आदरणीया सुधा वर्मा जी) वैभव प्रकाशन (संपादक – सुधीर शर्मा जी) हरिभूमि के चौपाल(संपादक-दीन दयाल साहू जी) पत्रिका के पहट(संपादक- गुलाल वर्मा जी), छत्तीसगढ़ सेवक(संपादक- जागेश्वर प्रसाद जी) मयारु माटी (संपादक -सुशील भोले) गुरतुर गोठ (संजीव तिवारी जी) “हांका”, दैनिक सबेरा संकेत(संपादक- शरद कोठारी जी, सुशील कोठारी जी) छत्तीसगढ़ झलक(संपादक-चन्द्रकांत ठाकुर) नवभारत, अमृत संदेश के अपन डेरा, दैनिक भास्कर, समवेत शिखर, आरुग चौंरा( संपादक -ईश्वर साहू आरुग छत्तीसगढ़ आस पास(प्रदीप भट्टाचार्य जी)

नांदगांव टाईम्स(संपादक -अशोक पांडे जी) दैनिक दावा( संपादक -बुद्धदेव जी) बांगो टाईम्स, कृषक युग(विद्या भूषण ठाकुर जी) कला परंपरा(संपादक- गोविन्द साव जी) विचार विन्यास(संपादक -डॉ. दादू लाल जोशी जी) विचार विथि

(संपादक – सुरेश सर्वेद जी)

साकेत स्मारिका ( संपादक -कुबेर सिंह साहू जी) राजिम टाईम्स (संपादक – तुका राम कंसारी जी ) छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर ग्रुप (ग्रुप एडमिन द्वय – अरुण कुमार निगम जी अउ सुधीर शर्मा जी), लोक सदन झापी (‌संपादक-। डा. एस. एस. धुर्वे जी)


अंजोर(संपादक-जयंत साहू जी) अउ विभिन्न पत्र पत्रिका ह गद्य के विभिन्न विधा के संग व्यंग्य लेखन ल बढ़ावा दीस / देवत हे.


छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य लेखन पहिली छुट- पूट चलते रीहीस.लिखइया कम रीहीस फेर छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य लेखन के बढ़वार देखे ल मिलीस. नवा राज बने ले छत्तीसगढ़िया साहित्यकार मन के स्वाभिमान म जिहां बढ़ोत्तरी होइस त दूसर कोती छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा बनाय के मांग ह जोर पकड़े लागीस. हमर छत्तीसगढ़ के साहित्यकार मन कविता के सँगे सँग गद्य म घलो अपन कलम ल चलात गिस. साहित्य के नवा विधा व्यंग्य म घलो लिखइया साहित्यकार मन म बढ़ोत्तरी होइस.



छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखन क्षेत्र म रामेश्वर वैष्णव जी, सुशील यदु , शत्रुघ्न सिंह राजपूत (कबीर चँवरा(स्तंभ) दैनिक सबेरा संकेत में 1993 से लगातार 15 साल साप्ताहिक प्रकाशित होइस, रायपुर के कई ठक अखबार म घलो छपिस ) ,लक्ष्मण मस्तुरिया ( गाय न गरु सुख होय हरु, ये व्यंग्य ह एम. ए. हिन्दी साहित्य म शामिल रीहीस ), सुशील भोले (मयारु माटी म ” बजरंग तोला युग पुरुष बनाबो “, छत्तीसगढ़ी सेवक म किस्सा कलयुगी हनुमान के प्रकाशित होइस. व्यंग्य संग्रह -भोले के गोले 2015 म प्रकाशित) , द्वारिका दास वैष्णव ( थोक भाव मा चिल्हर ज्ञान 2020-21 मा प्रकाशित),छंद विद् अरुण कुमार निगम  (रेखा रे रेखा, मंगनी मा मांगे मया नइ मिले) परमानंद वर्मा , दुर्गा प्रसाद पारकर  ( पारकर जी के व्यंग्य लेखन संग्रह -” बईगा घर लईका नइ हे” जल्दी प्रकाशनाधीन हे. जेमा उंकर 14 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेख हे) वीरेन्द्र साहू सरलज , के. के. चौबे , पुरुषोत्तम अनासक्त, धर्मेन्द्र निर्मल  (हांका अउ लोकाक्षर  म सरलग प्रकाशित होवत रहिथे) दीन दयाल साहू जी (बीवी अउ टीवी, कुर्सी नइ पूरत हे, होरी तिहार के मजा, चौपाल म दो दर्जन ले जादा व्यंग्य प्रकाशित होइस) , टिकेन्द्र नाथ टिकरिहा , हेमनाथ वर्मा , चेतन आर्य , तीरथ राम गढ़ेवाल, राजेश्वर खरे, गजेन्द्र तिवारी, चोवा राम वर्मा बादल , डी. के. सार्वा, रामेश्वर गुप्ता, रमेश चौहान, बिट्ठल साहू , राजेन्द्र सोनी , के. के. चौबे , हरि शंकर गजानंद देवांगन ,  जितेन्द्र वर्मा खैरझिटिया,गया प्रसाद रतनपुरिहा, राज कुमार चौधरी जी ( व्यंग्य संग्रह- का के का बधाई 2019 म प्रकाशित ), गिरीश ठक्कर  (लबरा के गोठ,छत्तीसगढ़ झलक, राजनांदगांव म 10 साल तक साप्ताहिक रुप म प्रकाशित, कृषक युग अउ चौपाल म भी व्यंग्य प्रकाशित होइस) , मथुरा प्रसाद वर्मा, अश्वनी कोसरे, हीरा लाल गुरुजी, विजेन्द्र वर्मा ,चन्द्रहास साहू , लखन लाल साहू लहर (गौंटिया राज अउ पंचायती राज, नांदगांव टाईम्स म प्रकाशित, का इही आय मोर सपना के छत्तीसगढ़, 23 दिसंबर 2003 म सबेरा संकेत म प्रकाशित , छत्तीसगढ़ राज ह कुर्सी म चपकागे ,21 दिसंबर 2000 म दैनिक भास्कर के कालम अपनी बात म प्रकाशित) , डॉ. अशोक साहू आकाश (छत्तीसगढ़ी केशरी म “अंते तंते “शीर्षक ले प्रकाशित),महेन्द्र कुमार बघेल मधु  (चाहा- पानी 2007 म साकेत स्मारिका म प्रकाशित, आप मन के व्यंग्य रचना‌ लोकाक्षर

ग्रुप म प्रकाशित होवत रहिथे), फकीर प्रसाद साहू” फक्कड़ ” (तड़क फांस, सरकार, बाबा, अनुकंपा, यात्रा, भाईचारा,कुकरूस कूं ) 

 )  के नांव सामिल हे.


2019 म गुरतुर गोठ के संपादक संजीव तिवारी जी ह छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखन उपर आलोचानात्मक किताब निकालिस. येमा “छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखन : दशा अउ दिशा “के बहाने दो दर्जन छत्तीसगढ़ी व्यंग्यकार के रचना के बारे म समीक्षा करे गेहे. येमा तिवारी जी ह छत्तीसगढ़ी व्यंग्यकार के लेखन के बारे म सुग्घर चर्चा करे हे.


व्यंग्य रचना म साहित्यकार ह कोनो प्रतीक लेके बात रखथे. पशु- पक्षी के सभा, जानवर मन के बइठका जइसे विषय ल लेके व्यवस्था उपर अब्बड़ प्रहार करथे.


छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर ग्रुप के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ह पोठ होवत हे. येमा जुड़े दर्जन भर के करीब बुधियार साहित्यकार मन ये विधा म अपन कलम चलावत हे.


आज छत्तीसगढ़ी साहित्य म व्यंग्य विधा ह अब्बड़ लोक प्रिय विधा बन गेहे.


              ओमप्रकाश साहू अंकुर

               सुरगी, राजनांदगांव

              संपर्क - 7974666840

छंद के छ परिवार के अर्जुन मनीराम साहू 'मितान' रचित कालजयी खंड काव्य- 'हीरा सोनाखान के'


 

छंद के छ परिवार के अर्जुन मनीराम साहू 'मितान' रचित कालजयी खंड काव्य- 'हीरा सोनाखान के' 

        छत्तीसगढ़ी साहित्य आज अपन शैशव काल ल पार कर डारे हवय। काव्य साहित्य के दृष्टि ले छत्तीसगढ़ी साहित्य पहिलीच ले सजोर हे। हमर पुरखा मन गीत कविता सिरजा के एकर दमदार अउ पोठ नेंव रख के चल दे हें। हिंदी काव्य साहित्य म आज 'नई कविता' भाव प्रधान सशक्त सृजन होवत हे। फेर सनातनी छंद के माँग अउ महत्तम न कमतीयाय हे अउ न कमतियावय। छत्तीसगढ़ी साहित्य म घलव अभी के बेरा म खूब छंद लिखे जावत हे। ए छंद लेखन गुरु शिष्य परंपरा ले सरलग आगू बढ़े हे अउ बढ़त हे। 9 मई 2016 के दिन 'छंद के छ' नाम ले ऑनलाइन कक्षा के शुरुआत करे गिस। गुरु-शिष्य परंपरा निभावत ए परिवार के आदि गुरु छंदविद् श्री अरुण कुमार निगम आयँ। जउन मन छंद के छ के संस्थापक आयँ। जेन ल आज सबो साधक भाई-बहिनी मन 'गुरुदेव' कहि मान देथें। आज 'छंद के छ' के 22 कक्षा खुलगे हे। इहाँ भर्ती होय के एके शर्त हावय - 'सरलग अभ्यास के संग सीखना अउ सिखाना।'। इहाँ कोनो किसम पइसा-कौड़ी नइ लगय। इही छंद के छ परिवार के अर्जुन आयँ मनीराम साहू 'मितान'। मास्टरी के नौकरी करत अनगढ़ गीत लिखइया मितान जी छंद साधना करत जब छंद म मास्टरी हासिल कर लिन, तब गुरुदेव निगम जी भरोसी ले उन ल खंड काव्य लेखन बर कहिन। गुरु के आज्ञा अउ प्रेरणा जान उन सतत् साधना, श्रम, एकाग्रता ले खंड काव्य सिरजन के लक्ष्य भेद कर लिन। अरुण कुमार निगम अपन जम्मो शिष्य के प्रतिभा अउ क्षमता ल पहिचानथें। उँकर ले अपेक्षित काज कराथें अउ खुद प्रेरणा बन आगू लाय के उदिम करथें। इही कारण आय कि आज 'छंद के छ' छत्तीसगढ़ी पद्य बर एक आंदोलन के रूप पा गेहे। कतको बुधियार साहित्यकार मन एला गुरुकुल कहिथें, त कुछ मन विश्वविद्यालय घलव कहिथें।

        छत्तीसगढ़ अपन खनिज संपदा, वन संपदा, लोकसंस्कृति, लोकगीत अउ लोक व्यवहार ले अपन अलग छाप बनाय हे। तभे तो धान के कटोरा छत्तीसगढ़ के रहवइयाँ मन बर एक ठन कहावत जग जाहिर हे- छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया। छत्तीसगढ़ आज अपन विकास के संग देश के विकास म सरलग अपन भागीदारी निभावत हे। योगदान देवत हे। 

         छत्तीसगढ़ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लड़ई बखत देश के आने हिस्सा मन के संग कदम ले कदम मिला चले हे। इहों के शूरवीर मन माँ भारती के खातिर अपन जिनगी ल होम दिन। इहाँ के लाल मन कोनटा-कोनटा ले आजादी खातिर अँग्रेज मन ले लड़े बर भिंड़े रहिन। १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम ले ही छत्तीसगढ़ के लाल मन गुलामी के जंजीर ले भारत माँ ल मुक्त कराय बर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आवाज उठइन। देश हित म अपन स्वारथ ल खूँटी म दिन। अपन सुख-चैन ल भूर्री बार दिन। ए बेरा के छत्तीसगढ़िया महानायक शहीद वीर नरायण सिंह ले फिरंगी मन थर-थर काँपे लगिन। उँकर युद्ध कौशल, बुद्धि अउ नीति के आगू अँग्रेज टिक नइ पावत रहिन। अइसन बीर योद्धा के शौर्यगाथा के वर्णन सिरीफ छत्तीसगढ़ भर बर नइ भलुक देश के सबो जन बर गौरव के बात आय। उहें उँकर जीवनगाथा ले जम्मो कोई ल देशहित म सोचे-विचारे के प्रेरणा मिलही। शहीद बीर नरायन सिंह के बीरता के गुनगान करत मनीराम साहू 'मितान' जी मन खंडकाव्य 'हीरा सोनाखान के' लिख भारत महतारी के अपन करजा ल उन उतार लिन, कहे जाय त बिरथा बात नि होही। आजो बाहिर-भीतर दूनो ठउर म देश ल एक सच्चा सपूत के जरूरत हवय। जे देश हित म बिचार करयँ। 'हीरा सोनाखान के' पढ़े पाछू ए बिचार पाठक के अंतस् म उदगरही, ए पक्का हे। एकर श्रेय मितान जी ल उँकर लेखन शैली के नाँव ले मिलना च चाही।

          कोनो भी साहित्य अपन विषय अउ अध्ययन ले सज-धज के अउ निखर के आगू आथे, लोक के तिर पहुँचथे, त ओकर आरो दुरिहा-दुरिहा ल अमरथे। मितान जी ए खंडकाव्य ल सिरजाय म बड़ पछीना बोहाय हें। उँकर मिहनत ला एला पढ़ के समझे जा सकत हे। खंडकाव्य या फेर उपन्यास के लिखई कोनो ठठ्ठा-दिल्लगी के बात नोहय। घटना अउ कालक्रम ल क्रमवार सिल्होय के पाछू लिखे बर बड़ लगन के जरूरत पड़थे। चिंतन के संग लोकरंजक गढ़े बर सावचेत रहना बड़ चुनौती होथे। मितान जी छंद साधना के अभ्यास म अतेक मँजा गेहें कि उन ल रकम-रकम के छंद म सिरजन करे म दिक्कत नइ होइस होही। अइसे भी खंडकाव्य सिरजइया बर पहिली शर्त तो छंद-सुजानिक होना च आय। कठिन बुता आय त छंद के मुताबिक घटना के वर्णन ल तुक बिठा के सरलग बढ़ात लिखई हरे। जेकर शब्द कोठी भरे-पूरे रही, उही ह अइसन कमाल कर पाथें। भाषा अउ शब्द भंडार अलंकार अउ छंद चयन के बीच बाधा नि परे हे। बीर के बखान बर आल्हा छंद सबले उपयुक्त होथे, अतिशयोक्ति अलंकार के संग बीर के बखान जन-जन के हिरदे म लड़े के हौसला अउ हिम्मत दूनो पैदा करथे। ए संग्रह म इँकर समन्वय अचरज म डाल देथे। इही रचनाकार के सफलता आय। अइसन साहित्य छत्तीसगढ़ी साहित्य ल नवा ऊँचई दे म सक्षम हे। अवइया बखत म छत्तीसगढ़ी साहित्य सेवा बर मनीराम साहू 'मितान' जी के नाँव बड़ सम्मान के संग लिए जाही। 

         अब चिटिक गोठ किताब म लिखाय जिनिस (छंद मन) के कर लेवन।

         कोनो भी बड़का ग्रंथ/खंड काव्य/महाकाव्य के सिरजन के शुरुवात मंगलाचरण के संग करे जाय के परम्परा मिलथे। हर सर्ग के शुरुवात म मंगलाचरण रहिथे। आजकाल तो काव्य के जम्मो किताब म अइसन शुभ संकेत दिखथे। चर्चित ए किताब म अपन देवधामी अउ ईष्ट देव के बंदना भर नइ हे, बल्कि गुरु, दाई-ददा के संग जनमभुइयाँ के बंदना हे। बंदना इहें थिराय नइ हे वोहर अपन डीह-डोंगर के जम्मो देवी-देवता ल सुमिरन करत छत्तीसगढ़ के जम्मो पबरित भुइयाँ ल माथा टेके हे।  संत महात्मा के पावन सुमिरन हे। 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' के मंगलभावना के दर्शन होथे। भारतीय परम्परा म नदी ल माता के दर्जा दे गेहे। छत्तीसगढ़ भुइयाँ ल अपन निर्मल अउ अमृत धार ले सबरदिन खुशहाल रखइयाँ नदी मन के सुमरनी एक कोति अध्यात्म ले जोड़थे, त दूसर कोति उपकार माने के संग खंडकाव्य के कथानक ले जोरे के बढ़िया उदिम हे। 

          भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बीर योद्धा शहीद बीर नरायन सिंह के ऊपर लिखे संग्रह म भारत माँ के वैभव के गान हे।

         ए संग्रह म भारत भुइयाँ के नामकरण, संस्कार, विश्व कल्याण, दया-भाव के सुग्घर चित्रण करे गे हे। हमर इही दया-धर्म के फायदा उठइयाँ जम्मो आक्रमणकारी मन के इतिहास ह छंद म छँदाय नजरे नजर म दिखे लगथे। भारत कइसे गुलाम होइस एकर जानबा मिलथे। 

      'जहाँ सुमति तहाँ सम्पत्ति नाना, जहाँ कुमति तहाँ बिपति निदाना।'

        ए बात के सुरता करावत उल्लाला छंद देखव जेमा गुलामी के फाँदा म हम कइसे फँसेन एकर चिंतन हे अउ आगू बर नवा संदेश घलव हे-

      सुमता जब दुबराय तब, होथे बइरी पोठ जी।

      संगी जम्मो जान लव, सार करत हँव गोठ जी।। (पृष्ठ 23)


          गुलामी ले मुक्ति अउ अँग्रेज के अत्याचार बिरुद्ध विद्रोह के सुर ल देखव - 

          मंगलपांडे नाव रहिस जी, भारत माँ के बाँकेलाल।

          करिस खुला विद्रोह छावनी, बनके गोरा मन के काल।।

          अँग्रेज शासन के बिरुद्ध उठे विद्रोह के ए आगी जब छत्तीसगढ़ पहुँचिस तेकर बानगी देखव-

        बनके अगुवा लड़िस लड़ाई, सन्तावन मा बाँके बीर।

        नाव रहिस गा बीर नरायन, रख दय बइरी ठाढ़े चीर।। पृ. 28

        छत्तीसगढ़ के शहीद बीर नरायन के जन हितवा, न्यायप्रियता, साहसी, पराक्रमी, परमार्थ सेवाभावी, दृढ़ संकल्पी जइसे जम्मो गुन अउ शारीरिक सौष्ठव अउ सुंदरता ल बड़ सुघरई ले चित्रण करे म मितान जी कहूँ मेर कमती नइ दिखयँ। 

      अँइठे-अँइठे करिया मेंछा, लम्बा-लम्बा ओकर बाल।

       मूँड़ सजावय बड़का फेटा, खोंचय कलगी दिखय कमाल।।

दूसर हे-

        लाल तिलक वो माथ लगावय, झुलै सोनहा बाली कान।

        दुनो हाथ मा चाँदी चूरा, चमक बढ़ावय ओकर शान।। पृ. 29

         रमायन म पढ़े सुने ल मिलथे कि लंका जाये बर श्री राम जी समंदर ले रद्दा माँगथे, विनती करथे, फेर समंदर ह चिटिक अनसुना कर देथें, तब भगवान राम क्रोधित हो जथे... अइसन त्रेतायुग के सुरता ए डाँड़ पढ़त आ गइस-

       नइ देवय जब चाबी प्रहरी, दय कनपट ला ओकर झोर।  पृ.33

        जन हितैषी अउ संवेदना ले भरे गुन के चित्र देखव-

          केलवली कर कहय बीर हा, मानव माखन हमरे बात।

          तालाबेली जनता मन हें, मरत हवय बिन बासी भात।।

            जनमभूमि बर मर मिटना शान के बात होथे, जे जनमभूमि ल ताक म रख सुवारथ ले जीथें, उन ल धिक्कारत कहिथे-

            ओकर जीना बिरथा जेला, महतारी बर नइये प्यार।

            काम जेन भुइँ के नइ आवय, वो जिनगी ला हे धिक्कार।।

           इही किसम ले युद्ध के फोटू खींचे म मितान जी बड़ सक्षम हें।  

           हो जयँ फाँकी-फाँकी धड़ मन, कतको छर्री-दर्री होय।

           हाड़ा-गोड़ा खुदे पिघल जय, करयँ बुता सब धीरज खोय।। पृ. 48

          मैं पहिली च लिखे हँव कि बाहिर भीतर दूनो ठउर म देश ल सच्चा सपूत के जरूरत हे। इही जरूरत ल भाँपत मितान जी ए गाथा लिखे के पाछू के संदेश देवत देशभक्ति के भाव युवा मन के मन म जगही के आस सँजोथें।

         जब-जब आही संकट भुइयाँ, बइरी मन करही अतलंग।

         सिंह गाथा हा चेलिट मन के, तन मा भरही जोश उमंग।।

        काव्य सौंदर्य के सबो माप म खरा उतरत ए संग्रह स्वतंत्रता संग्राम के अउ बीर मन के गाथा ल सरेखे बर प्रेरणा बनही। 'हीरा सोनाखान के' ए संग्रह नवा पीढ़ी ल अपन आजादी के इतिहास ल जाने के मौका दिही, उहें देश हित बर हरदम एक रेहे के संदेश बगराय म सुफल रही, ए मोला पूरा अजम हे। दू-एक जगह के वर्तनी म चूक जरूर दिखिस। खंडकाव्य के दृष्टि ले एला थोरिक मिहनत अउ गुनान करके जरुरी सर्ग म बाॅंटे के उदिम होना रहिस हे। जेला मितान जी कर सकत हें। नवा संस्करण ह सर्गबद्ध  संग्रह के रही एक उमीद हे।

         आखिर म मनीराम साहू मितान जी ल ए संग्रह बर बधाई पठोवत, घर-परिवार अउ समाज बर उँकर लिखे संदेश ले भरे दू डाँड़ ल लिखना चाहत हँव, काबर कि दमदार घर परिवार अउ समाज ले ही देश घलव दमदार बनही।

         सुमता के संदेश, बाँटबो घर-घर जाबो।

         मुटका असन बँधाय, एकता अलख जगाबो।।


किताब : हीरा सोनाखान के (खंडकाव्य)

रचनाकार : मनीराम साहू 'मितान'

प्रकाशक : वैभव प्रकाशन रायपुर (छत्तीसगढ़)

 प्रकाशन वर्ष : 2018

मूल्य : 100/-

पृष्ठ सं.  : 64


पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला -बलौदाबाजार भाटापारा छग.

पिन 493228

मो. 6261822466

कुकरूस कूं "

 "कुकरूस कूं "

              पहली के समे म एक ठन कुकरा बासे "कुकरुस कूं" ताहने गांव भर उठ जाय।अब तो पड़ोसी के कुकरा बासही तभो ले नींद नई खुलय।कुकरा मन के संख्या दिनों दिन घटत जात हे।वहू मन ल अपन अस्तित्व बंचाय के खतरा मंडरात हे।काली का हो जही कोई (गारंटी)ठिकाना नही।असल बात अब कोनो कखरो सुनना नी चाहे। कोनो ल जगाना ही अपराध (गुनाह)हे।इंहा मंदिर मस्जिद मे लगे पोंगा ल झेल नी पाय ते मन कुकरा के बांग ल का झेल पाही। अऊ आजकल तो कखरो मुंहू ल बंद करना बड़ सुभीता हे ,मुंह म ईडी, सीडी ल गोंज दे मुंहू बंद। अब तो मनखे मन के न सुते के ठिकाना न,उठे के ठिकाना?पहिली गंवई गांव म सात अऊ जादा ले जादा आठ बजे खा पी डरे,अब कहां पाबे एक आवत हे एक खावत हे अऊ जादा होगे त मोबाइल म बारा बजावत हे।तो एमे कुकरा के का दोष?

                हमू मन ल कुम्भकरण असन सोय के आदत पड़ गेहे। रावण ल घमंड अपन धन,बल,महल, के थोड़िना रिहिस, घमंड तो ओला 


अपन परिवार के रिहिस। जेन परिवार मन ऐके म हे तेखर कोती कोई आंखी ततेर के तो देखे? एक ठन लौठी ल तो कोनो टोर देथे,फेर चार पांच ठन जुरियाय म एंड़ी चोंटी करे ल पड़थे।इंहा तो बर बिहाव होईस ताहने 'हम दो हमारे दो 'बांकी को भां----में जाने दो।असल म सुखी परिवार के परिभाषा गलत गढ़े हे।अऊ सही काहंव त कुकरा मन के घटे के इही कारन आय।

                  नारी के महिमा अपरम्पार हे। नारी शक्ति ल परनाम। फेर कभू कभू यहू मन अति कर देथे।सुरपनखा ह अपन जिद अऊ कामुकता ल अपन बस म राखतिस त का ओकर नाक कटातिस? अब के लईका मन घलो नाक कटाय म कमी नी करे।नाक कटाय के पीरा दाई-ददा अऊ परिवार के मन जानही।जतका पीरा महतारी ल बियाय म होथे,ओकरो ले जादा पीरा नाक कटाय म होते।हमला तो सरम लागथे हमन अइसन देश म रहिथन जिंहा 'बचपन का प्यार भूल नहीं जाना रे' गवईया ल फूल माला डाल के कार म घूमाथन,उहां नाक नी कटही त का कटही।

कहिथे गुरु बनाओ जान के, पानी पीयो छान के।अऊ मे कहिथों परेम करो छान के नही थे पैंतीस कुटका होही तुंहर जान के।

                    दुरपती हर कोनो ये गोठ नी करतिस 'अंधरा के बेटा अंधरा 'त का कौरव पांडव मे लड़ई होतिस? भाई भाई ल कईसे लड़ाना हे ऐकर अनुभव अपन सुवारी मन ले मिल सकथे।कई झन मन तो ऐकर  जनमजात एक्सपीरियंस रहिथे।मईके म पूरा ग्रेजुएट हो जाय रहिथे। डिगरी पाय के बाद कईसे फालो करना हे ऐकर तलाश रहिथे। कतको झन ल एकर ए बी सी डी  मालूम नई राहय।बिचारी मन अड़ोसी पड़ोसी मन ले सिखथे।अऊ सही बात आय पड़ोसी मन कब काम आही।भले चुंदी ल हपाटिक हपाटा होही त छोंड़ाय बर नी आही। कतको झन मन कहिथे जम्मो सफल मरद के पाछू ओकर सुवारी के हांथ रहिथे। फेर कोन सुवारी चाही ओकर मरद असफल राहय। कतको झन मन तो भट्ठी म घोनडईया मारत रहिथे त ओला का समझना चाही। सही काहंव त सफल होय के बाद सुवारी के नाम मरद के संग जोड़ देथे।जईसे मास्टर संग मास्टरिन, डाक्टर संग डाक्टरिन ।भले दवई गोली ल नी जाने फेर कहिथन डाक्टरिन।

               फकीर प्रसाद साहू

                "फक्कड़"सुरगी

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व्यंग्य - चुनाव अवइया हे

 व्यंग्य -          चुनाव अवइया हे


पीछू चुनाव के कलेन्डर हँ बूढ़ा-जुन्निया गे। हफ-हफ करत हे। अब नवा चुनाव अवइया हे। टी.बी. के मरीज कस हँफरत-खाँसत-खखारत ले-देके पाँच साल ल काटिस बिचारा हँ। कलेण्डर के पन्नामन फड़फड़ा-फड़फड़ाके थक-जुड़ा गे। थूँक ल लीले के ताकत नइ रहि गे। जऊन थूँक रिहिसे तेमा तो नेता, मंतरी, करमचारी, सकलकर्मीमन बरा चुरो-चुरोके अपन-अपन घर ल भर डारे हे।

 

पीछू चुनाव म चले घातेच् भासन-घोसना-रासन ले जनता के आस-उम्मीद-सपना के चिरइया जनम-जाग गे रिहिसे। उहू हँ कथनी-करनी के उलटफाँस बचन-बान ले घायल होगे रिहिसे। वो सपन चिरइया स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र अगास ले स्वतंत्र धरती म गिरके जिनगी ले स्वतंत्र हो गे हे। बयानबीर महापुरूस मन जनता के दीन-हीन दसा ल देखके घलो आँखी म टोपा बाँधके रहि गे। महाभारत जुग के राजधरम ल उन पतिब्रता गँधारी कस निभा दिन। गाँधी बाबा के बुरा मत देखव के वचन ल सार्थक कर दिन। बता-देखा दिन कि राजधरम सबले बड़े थाथी होथे। 


थाथी कइसनो थोथा राहय साज-सँवार-संभालके रखे के जिनिस होथे।


जनता बपुरी के टोटा चिल्ला-चिल्लाके अइँठ-बइठ गे। फेर नेतामन के पोचवा कान म थोरको जूँवा नई रेंगिस। गाँधी बबा के बुरा मत सुनव के कनघऊवा ल कान म गोंजे-बोजे माटी कस लोंदा-कोंदा बइठे दिन ल पहा दिन।


 जुन्ना कलेण्डर उदास हे। बिदाई के बेला आ गे। नवा कलेण्डर छपके नेवरनीन कस मुड़-कान कोरे-गाँथे, पाटी-पारे मटमट ले तियार दुवार म मुचमुचावत खड़े हे। धरती म अवतरे बर छटपटावत हे। महतारी के पेटे भीतर ले हाँसत -खेलत-हुदरत-कोचकत-कुलबुलावत हे। 


 भारत महतारी के दू झिन संतान हे- एक चुनाव, दूसर योजना।


चुनाव हँ बाबू पिला हरे। बाबूमन ल भ्रूण हत्या के डर नइ रहय। काबर कि हमर समाज बाबू पिला के पक्षधर हे। बेटामन पुरखा परिवार ल तारथे। जोजवा, भोकवा, लुलुवा, खोरवा बेटा तको पुरखा ल तारे के पोठलगहा दम रखथे। ये हमर परम-धरम के किरिया-कसम खाए बेसरम करम हरे। जऊन हँ मानुस जात के पीछु ल नई छोड़य। मानुस जात अउ ओकर सोच के बीच फेविकोल के चोक लगे हावै, जे हँ बइगा गुनिया तो दूर भगवान के छोड़ाए नई छूटय। 


योजना हँ नोनी पिला हरे। नोनीमन सेवा, समर्पण अउ सहनसीलता के साक्षात देवी होथे। येमन भारतीय सोच अउ समाज के बिकास खातिर जनम लेके पहिली गरभे म हूम देवा जथे। नोनीमन जिनगी भर के कमई ल हथिया-पोगराके पर घर रेंग देथे। नोनीमन के ये बलिदान हँ मुटभेड़ म मुरकेटे आतंकवादी बरोबर होथे। जेकर दुख-पीरा परिवार-समाज का, घरवाले मन ल तको नई होवय।

समाज तो समाज, सरकारो ल नइ होवय। कसाब अउ अफजल बर भले करोड़ो खरचा हो जाय, नइ अखरय। एकर ले कमई के रस्ता खुल्ला रहिथे। 


 स्वारथ जागे अउ काम परे ले कतको मनखे, संगठन अउ समाज सेऊक बनके खड़ा हो जथे, वोहँ बेरा-बखत के बात हरे।


सिंघासन हँ माटी के लोंदा-कोंदामन ल झेलत लोकवाग्रस्त हो गे हे। अँधरा, कोंदा, लंगड़ा अउ दलाल नाम के चार गोड़ के सहारा चौपाया सिंघासन ल पाँच साल बर चौपाई बनाके बिछाए जाथे। ये चौपाई हँ कोंदा, लेड़गा अउ जोजवा मनके अलथ-कलथ के उन्डई-घोन्डई म दरर गे हवय।


खोरवा-लंगड़ा सिंघासन के फेर सजे-सँवरे के दिन आ गे। उँघावत-सुतत, अँइठे-बइठे नेता-मंतरी मन के चेते-जागे के बेरा होगे। बसियावत परे चमचामन के छकछक-चकाचक धोवाए-पोंछाए के दिन आ गे। उन्कर पूछ- परख अब बाढ़े लगे हे। 


बड़का नेता मन भीड़-भाड़के भिंदोल कस टेर्र-टेर्र करत अपन टिकट के जुगाड़ म लग गे। टुटपुँजिया नेतामन अपन घुनावत पार्टी के गुन बघारत मेचका कस पिच-पिच एती-उती कूदे लगे हे। अवगुन हँ भले सुस बैंक के लॉकप म अण्डा देवत-सेवत सपटे-लुकाए रहय। 


देस ल बोहे-बोहे बड़का नेतामन के खाँध हँ जब थके लगथे, त उन अपन टूरी -टूरा ल टिकिस दे देथे। अइसन म कार्यकर्ता का करही ? उन सोज्झे कहिथे 

‘वाह गा चोखू ! जिनगी भर तोर रैली म हम समोसा-मिच्चर खा-खाके चिचियाएन -भूँकेन। पसीना के रेला बोहवाएन । तोर पीछू-पीछू झोला धरे घूमेन, त का इही दिन देखे बर घूमे हन ? मिहनत करन हम अउ आमलेट झड़कव तुम ? अइसन नइ बनय गा दाऊ ! तोर लइका ल तहीं पा तहीं खेला, तहीं पीछवाड़ा धो। हमार सिरिफ मेहनत रहिही। मेहनत बर हम कमी नइ करन। काँख -काँखके करबो।’ 

‘फेर ......... ’

‘फेर तोर लइका अब हमर झोला धरही, तभे बात बनही। 


बेटा कतको बड़ बाढ़ जावय, बाप हँ बापे रहिही, तेकर मतलब का बाप हँ कभू बुढ़ाबे नइ करही ? बाप के पनही बेटा के पाँव म आ जही त का बेटे हँ बाप बन जही ?

बनय ते झन बनय, फेर पागा ल तो पहिर सकत हे। जिहाँ कुकरा नइ बासय, उहाँ का बिहनिए नइ होही ?’ 


दल के बइठे-बइठारे, छोड़े-भागे, रिसाए-गुसियाए अउ हुदेने-लतियाए चमचामन ल माँजे-मनाए अउ भाँजे-भँजाए के दिन अवइयच् हे। 

भासन, रासन, आस्वासन अउ चेपटी के बीच राम-सुग्रीव कस मीत-मितानी के मुुहुरत निकलइया हवय। 

चंगू -मंगू मन के कुछु किम्मत राहय चाहे झन राहय। उन्कर बोट के किम्मत, हिम्मत अउ किस्मत चमकने वाला हे। उन्कर नाम हँ गरीबी रेखा सूची म जुड़े लगे हे। दुरूप्पा चाँउर वाले कारड हँ पहुना बनके उन्कर घर म धमके लगे हे। जेकर खुशी हँ घरो-घर फुगड़ी खेलत धमाचौकड़ी मचाए लगे हे।


नवा-नवा ठेकादारी खुलत हे। जेकर ले रोठहा दलालमन मोठहा नोट कमई करके बोट बटोरही। जात ले बिजात होए मनखेमन अपन-अपन जात के झण्डा उचा-उचाके, जी-परान देके समाज-सेवा के बहाना अपन नाक अउ नाम ल उचाए-बचाए के उदीम म भीड़़ गे हे।

 

सड़क मन इस्नो-पावडर लगा-लगाके अपन गाल ल चिकनावत -चमकावत हे। उज्जर कपड़ा पहिरे करिया मनवाले गोरिया नेतन के चुकचुक ले सुफेद कपड़ा म धुर्रा नइ उड़ना-परना चाही। मन कतको करिया राहय तन के गोरिया अउ ओग्गर रहना जरूरी हे। तभे देस के चमकत बिकास हँ आँखी म चकचक ले दिखथे-चमकथे। 


बड़ेमन ल पाँच साल म एके घँव तो आना-जाना हे। बाकी सरी दिन गरीब के सड़क होथे। गरीब-गुरबामन ल सउर-सबर तो रहय नहीं। उन गँवार मुरूख अउ सबले बड़े गदहा होथे। बइला-भइँसा अउ छेरी-पठरू मिलाके जेन बरदी होथै ओइसने जनता होथे। अकर-जकर देखत, जतर-कतर गदर-फदर रेंगही त कइसनो पक्की सड़क होवय खदर-बदर तो होबेच् करही।


अइसने वोहँ घेरी-बेरी हमर गली म आवय-जावय। अघुवा के जैराम करय। एक दिन तो मैं बक खागेवँ। वोहँ आइस अउ गोड़ तरी ढलगत कहिथे- 

‘भैया मोर मुँह म थूँक देते गा !’

      पूछेवँ - ‘काबर ?’ 

त वो सुनसुनहा, महामना बनत साधु वचन उच्चारथे - ‘सुने हौं, तोर थूँक हँ दवई के काम करथे। मोर गाल म दाद हो गे हवय। अब्बड़ बिछियावत हवय। थूँक देते त माड़ जतिस।’

मैं कनुवा गेवँ। नइ थूँकेवँ। 


उपरहा अउ सुनव। कोन जनी वोहँ कब के मोर पाछू परे देखत-पासत रिहिसे ? एक दिन भूँसा धरत-डोहारत धूल-गरदा के मारे मोर टोटा खरखराए लगिस।

 मैं जोरदरहा खखारके थूँक परेवँ। पता नही वोहँ कोन कोती ले चील कस झपट्टा मारत अइस अउ ‘चप्प-ले’ कूदके चपर-चपर चाँटे लगिस। पाछू जुवर सुनेवँ - वोहँ टिकिस के जुगाड़ म भीड़े हे। 


फेर बिहान भर सुनेवँ, टिकिस घलो मिलइया हे। वोकरेच् जीते के आसरा तको सोला आना हे। मैं बकबकाए खड़े अपन थूँक ल न लील सकत रहेवँ, न थूँक सकत रहेवँ। मोला का पता के मोर थूँक म वोहँ बरा चुरोइया हवय।

एती चुनाव के उमरत-घुमरत बादर ल देख के जम्मो सकलकरमी-करमचारीमन के मन हँ मँजूर पाँखी कस छितराए लगे हे। उन परिवार सम्मेत बोरिया-बिस्तर बाँधके हड़ताल म बइठत हे। जगा-जगा नाचा -गम्मत कस पंड़ाल लगे-लगे हे।

 

असल बरसइया बादर के रंग-ढंग ल मँजूर बज्जुर पहिचानथे । तइसे भासन -घोसन के असल अमल के बेरा ल सकलकरमीमन चिन्हथे-जानथे-पहिचानथे। दुबारा सत्ता के सुग्घर सुख-सुवाद लेना हे त कइसनो माँग होवय मानेच ल परही। अभीन के बेरा हँ अइसने बेरा हरे। 


अब जनता काँही कहय, नेतन ल मुँह नइ खोलना हे। कोनो कतको गारी देवय जुवाब नइ देना हे। 

इन कहे-बोले, झगरा-झंझट ले बाँचे खातिर उनमन अपन प्राइभेट अखाड़ा घर बनवा डरे हे। जिहाँ खुरसी टेबुल ल फेंक-फेंकके पटक-पटकके ससन भर लड़थे अउ जी ल जुड़वा लेथे।


गाँधी बबा हँ सायद इही दिन बर बुरा मत कहव के नारा ल देश के भीथिया म लिख-चिपकाके गे हवय।

 

तरिया म चुनई नारा के जाल हँ पर गे हे। जाल हँ कंदर गे हे। जुनिया गे हे। तभो ले भासन-रासन-आस्वासन अउ चेपटी के गठबंधनी फाँस हँ अतेक मजबूत हे के बयकूप जनता हँ फँसिच् जथे। 


मरत प्रजातंत्र ल बचाए खातिर मरहा-खुरहा जीयत-जागत महामुरदा मन मुददा बोहे-बोहे फेर जागके खड़ा हो गे हे। 

देखव बगुला मन पार ले उतरके प्रजातंत्र के तरिया म कइसे धँसत हे।


उत्ती ले लाली बगरे ल धर ले हे। नवा बिहान होवइया हे। चुनाव अवइया हे। 


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

चक्कर म चक्कर

 चक्कर म चक्कर

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 ये संसार म अइसे कोनो मनखे आरूग नइ होही जेन ह कुछु न कुछु के चक्कर म नइ  परे होही। सबके अपन अपन चक्कर हे। ये चक्कर मन ल देखबे -सुनबे त चक्कर आये ल धर लेथे ।

          भक्त मन अपन-अपन भगवान ल खोजे अउ पाये के चक्कर म परे हें। एकर बर कतको झन उपग्रह सहीं अपन-अपन ग्रह---पंडित, मुल्ला, मौलवी, पादरी, गुरू, संत ,साधू ----बहुरूपिया मन के चक्कर लगावत हें।अउ ये कतको किरहा ग्रह मन कामिनी कंचन के चक्कर म परे हें। ये  चक्कर म कई झन जेल पहुँच के कानून के चक्कर लगावत हें। बस चक्कर उपर चक्कर हे।ये संसार म जानवर,चिरई-चिरगुन , नान नान छै-सात साल के लइका ,जवान अउ निच्चट डोकरा-डोकरी तको मन प्यार के चक्कर म परे हें।

         रकतबीज असन बाढ़त प्रजाति जेन नेता कहे जाथें। उँकरो चक्कर मरई कमती  नइये। रात दिन कुर्सी के चक्कर हे। कभू टिकट पाये बर चक्कर हे, त कभू एक दल ल किरनी असन चूहक के दूसर दल म जाये के चक्कर हे। कुर्सी मिलगे त कमीशन के चक्कर हे, भाई भतीजावाद जातिवाद, वोट बैंक  के चक्कर हे। बाँचे खोंचे म  चिखला फेंके के मुकाबला म भाग लेके एक दूसर ल होले पढ़के निपटाये के चक्कर हे।

   एक ठन अउ बिकराल चक्कर चलत हावय। चोर मन चोर मन ल पकड़े के चक्कर म , चोरे मन ले साँठ-गाँठ करे के चक्कर म परे हावयँ। कुछ चोर मन मत पकड़ावन सोच के पाला बदले के चक्कर म हें।

   ए.सी. रूम में बइठे बड़े-बड़े दिमाग मन  आलतू फालतू योजना बनाके  पांँचो अँगरी ल घी म चिभोरे ऊपर ले खाल्हे तक खुरचन पानी रूपी प्रसाद के व्यवस्था करके खजाना ल दियाँर किरा कस सफाचट करे के चक्कर म परे हें। ये दिमाग मन के नाना विभाग जिहाँ जोंक मन रहिथें ।वो मन तैं पलोवत जा ,मैं सोंखत हँव कहिके गीत गावत मुफ्तखोरी के चक्कर म परे हें।

             अनुभवी मन बताथें के थाना, कचहरी अउ अस्पताल के चक्कर सबले भारी चक्कर होथे। उहाँ सेवा के आड़ म मेवा झड़के के चक्कर म बड़े-बड़े बन बिलबा अउ बिलई मन सीका टूटे के चक्कर म ताकत रहिथें।

     एक झन बतावत रहिसे--वो ह डंडाधर टोपीवाले के चक्कर म परे हे।  वो डंडा धरे बड़े-बड़े मेंछा वाले ह आवेदक अउ अनावेदक दूनों ल टोपी पहिना के गाय असन दूहे के चक्कर म हे। एक झन ह तो इहाँ तक काहत रहिसे वोकर खाकी के कुरता ल पाकिट मार अउ चोर मन खरीद के दे हें।  

      एक झन कचहरी के चक्कर के मारे संदउवा काड़ी कस दुब्बर पातर होये ह बतावत रहिसे - करिया कोट वाले मन के चक्कर म परके केस लड़त लड़त वोकर ददा के ददा के ददा सिरागें फेर  फैसला होबेच नइ करिस। बस तारीख के ऊपर तारीख के चक्कर हे।

     एक झन कका ह अपन भतीजा ल समझावत रहिसे के सरकारी अस्पताल के चक्कर म कभू झन परबे काबर के उहाँ बड़े बीमारी ल कोन काहय दाँत पीरा,खजरी खसू जइसे छोटे-छोटे बीमारी के इलाज के चक्कर म गये मनखे के मुर्दा लहुटे के पूरा संभावना रहिथे।उहाँ इलाज करइया भले नइ मिलही फेर माला कस ओरमाये सादा-सादा पहिने यमराज अउ वोकर दूत मन चक्कर लगावत रहिथें। वो कहिस- बने बताये कका फेर  वो दिन मंगलू ह चार मंजिल के बड़े जान प्राइवेट अस्पताल म माथा पीरा के इलाज करवाये बर गे रहिसे। उहाँ तीन दिन म तीन लाख के बील ल देख के वोला चक्कर आगे । चक्कर खाके पट ले गिरिस तहाँ ले राम नाम सत्य होगे।वोकर घर वाले मन लाश ल पाये बर चक्कर लगावत हें।बिना नोट के उहाँ गोठ करे बर कोनो तइयार नइये। मुर्दा के मुँह तको ल नइ देखन देवत यें।

    सबो जगा एके हाल हे।जेती देखबे तेती, जेन ल देखबे तेन ल बस चक्कर ऊप्पर चक्कर हे।कुछ झन चक्कर म डारे के चक्कर म हें त कुछ मन चक्कर म चिथियायें हें।

   गुरु घंटाल मन हड़ताल बाढ़ते राहय के चक्कर म हें जेकर ले गप्पशाला जिहाँ पाठशाला के बोर्ड टँगाये हे, जायेच ल मत परय। घरेच म बइठे-बइठे बरवाही मिलते राहय। पता हे के वोट के चक्कर म घनचक्कर मन आज नहीं ते काली सोजबाय तनखा ल तो देबे करहीं।

 चुनाव के आरो पाके सबो कर्मचारी मन  मौका के फायदा उठाये के चक्कर म हावैं।सरकारी खजाना के  छाती म होरा भूँजे के चक्कर म सब राजधानी कोती दउँड़त हें।

       कोनो  सब ले जादा चक्कर म परे हे त वो ह भुँइयाँ के भगवान हर आय। एकर चक्कर सिराबे नइ करय। बिजहा,खातू माटी के चक्कर, सोसाइटी म धान बेंचे के चक्कर, बैंक के चक्कर, नक्शा खसरा बनवइया के चक्कर,करजा लिखइया के चक्कर, नहर पानी के चक्कर चक्कर --- चक्कर ---चक्कर--- चक्कर --चक्कर। रात दिन चक्कर।

  सिरतो म ये चक्कर के बीमारी सिरा जतिच त सबके जिनगी कतका बढ़िया हो जतिस।


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

बियंग "अनुकंपा "

 बियंग "अनुकंपा "

अनुकंपा के महिमा अपरंपार हे जेखर  ऊपर हो जाए ऊंकर भाग बदल जथे चाहे अनुकंपा भगवान के होए या सरकार के। एक वह बेद्ंरा के भाग देख भगवान के अनुकंपा ले आज दुनिया मां ओखर नाम के शोर उड़त हे जगा जगा ओला हमन पूजत हन।

            अउ अभी के बेंदरा मन ला देख 'छानी मां होरा भूंजत हे' बारी बखरी के धुरा धरा दे है ।अब तो वहुमन वीआईपी टाइप से हो गेहे।खेतखार ह सुहाय नही, हफ्ता लागे ना पंदराही गांव म धावा बोल देथे जाने-माने बफे रखे हे गांव वाले मन ।यहू मन ल सरकारी संरक्षण मिलत हे, सरकार के लाचारी भी हे वोट बैंक के सवाल हे। वइसे भी वन जीव ल मारना कानूनी अपराध हे।वइसे ये ला भी सरकार के अनुकंपा ही कहीं सकथन। सरकार भी अनुकंपा कखरो मुहूं देख के थोड़ी ना देथे, जेन मन भाग में कमाय रहिथे उहिच ल  मिलेथे। हो सकथे ये किरपा उमन ल समोसा म इमली चटनी खाए से मिलीस कि हरा चटनी? भगवान मालिक।

                    जेन बेदरा मन सरकारी किरपा पाय रहिथे  ऊंकर मुंह ललहूं  रहिथे। सरकारी बेदरा मन के एकेच ही फंडा कस के खा अऊ मरत ले पी पाले हस सुरा खोजत हस घी।(बुरी आदत)तरिया पार अऊ सड़क पाई हर ईकर फेवरेट ठऊर आय मानो आत्मिक शांति मिले के एक मात्र ठऊर ।

 सेटिंग घलो न देश व समाज बर बड़ खतरा आए,अऊ अहू  सच आए बगर सेटिंग के कोनो काम नई होय। इकरों सेटिंग बढ़ भयंकर टाइप ले रहीथे। खेत खार  म कुदत हे। तबले धकाधक छुट्टी मेंटनेंस होवत रहिथे। महीना पुरिस ताहन" तुम भी खुश हम भी खुश "अनुकंपा प्राप्त बेदरा मन एक कन जादा अतलंगहा होथे। लंका के हाल का काहवं।इंकर संग म रहवाईया बेदरा मन हलाकान घला हो जथे। इंकर लपेटा म पड़े ले दू चार लमडेना यहू मन ल पड़ जथे,फेर  सच काहंव जादा किरपा जीव के जंजाल घलो होथे जईसे भस्मासुर।

                फकीर प्रसाद साहू

             "फक्कड़ "  सुरगी