Saturday, 21 October 2023

कहानी -तारनहार

 कहानी -तारनहार



प्रेमीन गली म पीछुवाएच हे, धनेस दऊड़त आके अँगना म हँफरत खड़ा होगे। लइका के मिले लइका, सियान के मिले सियान..। ओतके बेरा परछी उतरत नरेस हँ धनेस ल देख खुसी के मारे फूले नई समइस।

चिल्लावत घर कोति भागिस -‘दाई ! बुवा मन आगे। बुवा मन आगे।’

भगवन्तीन कुरिया ले निकलके देखथे डेढ़सास प्रेमीन अउ भाँचा धनेस अँगना म ठाढ़े़ हे। 


भगवन्तीन लोटा भर पानी देके प्रेमीन संग जोहार भेंट करे लगिस। वोमन जोहारथे रिहिस हे धनेस टुप-टुप भगवन्तीन के पाँव परे लगिस। भगवन्तीन धकर -लकर पीछू घुचत कहिथे - ‘अई हाय ! परलोखिया भाँचा हँ मोला पाप बोहा दिस दाई’- अउ धनेस के पाँव छूवत चऊज करत हाँसे लगिस - ‘अलवइन भाँचा हँ फेर आगे दई।’ 


भगवन्तीन के गोठ ल सुनके जम्मो झन मुचमुचाए बिगर नई रहे सकीन। पाँव छूते साथ भगवन्तीन तीर म खडे़ अपन देरानी ल सुर धरके बताए लगिस -‘इही भाँचा हँ.... पऊर साल आए राहय’ - मुँह ल अचरज म फारत दूनो हथेरी ल जोरके इसारा करत बताइस- ‘यहा बडे़ पुक म मोर मंघार ल मार दिस बाई ! मैं मुड़ ल धरके बइठ गेवँ, तँवारा मारे कस होगे।’


भगवन्तीन के गोठ ल सुनके देरानी देवकी अउ प्रेमीन एक दूसर के मुँह ल देखके मिलखियावत हाँसे लगिन। प्रेमीन मुस्की ढारत पूछथे - ‘काय पुक बहुरिया ?’ 

‘काय किरकेट कहिथे तइसना खेलत रहिस हे, महूँ अँड़ही ल नाम ले बर तको नई आवय’ - अउ हाथ ल हलावत भगवन्तीन धनेस ल बोकबाय देखे लगिस। 

धनेस लजावत मुच-मुच करत एक कोन्टा म खड़ा होगे। गाय -गरूवा मन खाए जेवन ल पचोए बर पगुराथे तइसे भगवन्तीन एक ठन गोठ लएमेर -ओमेर कई घँव पचार के पचोथे। तेकरे सेति देरानी जेठानी अउ गाँव भर सब भगवन्तीन ल पचारन कहिथे। 


भगवन्तीन के मन झरना के झरत पानी के एकदम फरी हे। घिना -तिरस्कार बर थोरको ठऊर नई हे। कुछु बात रहय बिगर लाग -लपेट के कहे-बोले के आदत हे भगवन्तीन के। भूले बिसरे काँसी गोत कस नवा -जुन्नी सबो गोठ-बात भगवन्तीन के मुँहजबानी खाता म रहिथे। 


लइका मन अबोध होथे। पुरईन पान हँ पानी म जनम के तको पानीच ल अपन ऊपर नई लोटन देवय तइसे लइका मन कोनो बात ल मन म घर नइ करन देवय। बडे -बडे मन पाँव-परलगी, गोठ -बात, हाल -चाल पूछई म भुलागे त नरेस अउ धनेस दुनियादारी रीत -रिवाज सब ल भुलाके अपन खेल -खेलौना, बाँटी- भौंरा, गिल्ली -डंडा म रमगे। 


नफा -नुकसान, सुख -दुख, मान -सम्मान, ऊँच -नीच बडे मन देखथे। लइका मन ल का चाही पेट भर जेवन, ससन भर खेल। खेल -खेलौना, ऊछल -कूद, संग -संगवारी अतके इन्कर संसार ये। लइका मन सिध महात्मा मन कस जग के सुख -दुख ले निस्फिकर होथे, तेखरे सेति लइका मन ल भगवान माने गे हे। 


मझनिया भगेला खेत ले घर लहुटिस । अपन बहिनी-भाँचा ल देखके गदगद होगे। धनेस ल देखके ओकर आनन्द उफनागे। भूख, पियास अउ जाँगर के सरी थकान ल कोन्टा के खूँटी म अरो -टाँगके चिहुकत चिचियाए लगिस-‘भगवन्तीन ! हमार तारनहार आगे। लान थारी -लोटा, पीढा -पानी ल, देवता के चरन पखारबोन।’

 

धनेस तको इही बेरा के अगोरा म रिहिस हे। मने मन ममा के बाट जोहत रिहिस हे। हर पइत अइसने होथे । ममा --भाँचा दूनो एला नई बिसरय। ममा, भाँचा ल तारनहार समझथे, त भाँचा हँ ममा ल ‘चुकिया’। ‘चुकिया’ जेमा सिक्का डारे के जरूरत नई परय भलकुन जब जब तीर म गए रूपिया झरे लगथे। काबर के ममा - मामी भाँचा के चरन पखार - पांछके चरनामरित लेथे। तेकर पीछू भाँचा ल दान -पुन करथे। 


भगेला मनखे के पूजा ल भगवान पूजा मानथे। भाँचे भर के बात नइ हे, कोन्हो लइका होवय भगेला बर भगवाने सरूप होथे। भगवान, जेला जात -पात ऊँच- नीच के चिन्हारी नई रहय। ओइसनेहेच लइका मन होथे- सऊँहत भोला भंडारी। धुर्रा -माटी, छोटे -बडे़, जात -कुजात नई जानय। माने ये असार जगत के सार ल सरल -सहज भगेला भगत सोला आना समझ गे हावय।

 

बालापन निर्मल मन के घर, न जोरे के चिन्ता, न छोरे के डर। पइसा मिलिस धनेस अउ नरेस दऊँड़ प्रतियोगिता होगे। हरही गाय कछारे जाय। दूनो दूकान ले बिस्कुट ले लानिन अउ हाँसत-खेलत-गोठियावत खाए लगिन।


होवत बिहिनिया नरेस बोम्म फारके रोए लगिस। धनेस हँ खेलते खेलत नरेस के बाँटा रोटी ल झटक के खा लिस। 

भगेला नरेस ल भुलवारे -पुचकारे लगिस - ‘ले अउ बना लेबोन बेटा ! खावन दे, भाई हरे।’- अउ अपन करेजा नरेस ल अपन छाती म सपटा - थपटके ओकर जीव ल जुड़ो दिस।


बेरा हँ घंटा भर रेंगे रिहिस होही। भगवन्तीन अचरज म मुँहफारके बोमियाइस - ‘अई हाय ! देखत हस, भाँचा ल ! खँवडी़ के चूरत दूध ल ढारके पी डरिस।’ 

‘लइका के जात कइसे करबे ? पीयन दे’ - भगेला खिसियाइस। 

भगवन्तीन हाथ ल हलावत साँस ल बीता भर लमाइस- ‘जम्मो ल पी डरे हे, कसेली हँ ठाढ़ सुक्खा पर गे हे।’

‘वा ... दूध ल पी दिस त का गाय हँ दूधे नइ देही’ - भगेला हँ भगवन्तीन के मुँह ल तोप -ढाँक दिस। 


भगवन्तीन सरी बात बर टिंगटिंगही, त भगेला शांति बर ओकर ले डंकाभर आगु। तैं डारा डारा, त मैं पाना पाना। भगेला ल तीनो पीढी़ म कोन्हो गुसियावत न देखे हे, न सुने हे। जनम के गरूवा, भगेला के तरूवा।


चार -छै दिन रहीके धनेस मन महतारी बेटा गाँव लहुट गय। भगेला भगवन्तीन ससन भर भाव भजन ले बिदा करिन बहिनी-भाँचा के। 

रतिहा भगवन्तीन पूछ बइठिस-‘कस जी ! भाँचा मन एकर पहिली कई पइत आइस -गइस, आज पहिली पइत तुँहर आँखी ले आँसू ढरकत देखे हवँ। का बात हे ? अइसन तो तुमन बेटी के बिदई म तको नइ रोए हव।’

 

भगेला छाती के आखरी कोर के जावत ले साँस ल तीरके कहिथे - ‘तैं नई जानस जकली, भाँचा हँ मोर बर सहींच म तारनहार हरे।’ 

भगवन्तीन चेंधे बिना न कभू रहे सकिस न अभी रहिस - ‘कइसे ?’


बेरा तको रतिहा के करिया कथरी ओढ़े एक कोन्टा म सपट के बइठ गे। भगेला के गोठ ल सुने बर सन्नाटा तको कुरिया भर पसर गे। भगवन्तीन के संगे-संग कुरिया भर के कान टेंड़ागे। 

चिटिक रूकके भगेला कहिथे- ‘एक दिन के बात ये। अकेल्ला कुरिया म बइठे राहवँ। भाँचा कति ले आइस अउ पूछथे- ‘कइसे गुमसुम -गुमसुम बइठे रहिथस ममा ? अबड़े चिन्ता -फिकर करथस तइसे लगथे।’


भगेला कहिस -‘का करबे भाँचा ! एक तो आधा उमर म बेटा पाएवँ। हिम्मत करके पढाए -लिखाए के उदीम करथवँ त नरेस के पढ़ई -लिखई म चिटिकन चेत नइहे। अब तैं नवमी चढ़ जबे अउ ओला देख।’

 

धनेस कहिथे -‘नरेस काली सँझा बतावत रिहिस हे कि तोर फिसिर -फिसिर ल देखके चिन्ता म वोहँ नइ पढ़ सकत हे अउ ओकर फिकर म तैं चुरत -अऊँटत हस। नरियर हँ निछाए नइहे खुरहेरी के फिकर करत हव दूनो।’

भगेला हँ धनेस के गोठ ल धियान लगागे सुने लगिस- ‘चिन्ता हँ चिता कुति तीरथे। तैं अपन इलाज पानी ल बने ढंगलगहा करवा, भविस्य के चिन्ता ल छोड।’

‘पूत सपूत त का धन जोरय पूत कपूत का धन जोरय।’ एला सुनके भगेला गुनान म परगे। भगेला ल गुनत देखके धनेस बात ल फरियावत कहिथे - ‘अपन तन ल घुरो -चुरो के धन बचई लेबे ओला लइका बिगाड़ दिस त का काम के तोर धन जोरई हँ। अउ कहूँ कुछू नई बनाए हस, लइका हँ अपन समझदारी से भविस्य म कुछु बना डरिस त तोर ए चिन्ता फिकर काएच काम के।’


धनेस चिटिक रूकके कहिस- ‘भूत ल खूँट म बाँधके रख, भविस्य ल उड़ावन दे पाँखी लगाके हरहिंसा अउ तैं वर्तमान सजा-सँवार। जब के आमा तब के लबेदा ल देखे जाही।’


भगेला ल मानो घर बइठे संसार के ग्यान मिलगे। जिनगी के आखरी पाहरो म भगवान, भगेला के आगू म साक्षात खड़ा होके गीता सुना दिस। धनेस बीच दुवारी म खड़े गोठियावत रहय। भगेला अपन भाँचा के दूनो पाँव ल ‘टप्प ले’ धर लिस - ‘आज तैं मोला जीयत तार दिए ददा, तँही मोर तारनहार अस।’

अउ भगेला के दूनो आँखी ले तरतर -तरतर गंगा -जमुना के धार फूटके गाल म ढरक गे।    

                                                                          

धर्मेन्द्र निर्मल

कुरूद भिलाईनगर जि. दुर्ग

9406096346

छत्तीसगढ़ी कहानी - सजा

 छत्तीसगढ़ी कहानी -    सजा


हँड़िया के मुँह म परई ल देबे आदमी के मुँह म काला तोपबे। जे मुँह ते गोठ। मनखे जेन बात ल चिचियाके नई गोठिया सकय ओला फुसुर- फासर गोठिया लेथे। फेर गोठियाके रहिथे-

‘टूरी ल अच्छा जानत रेहेन यार।’

‘अरे ! जवानी म काकर जोर चलथे भाई ! बड़े -बड़े साधु- महात्मा खसल जथे त ये टूरी कोन खेत के ढेला ये।’

‘बनेच बने म तो कीरा परथे जी।’

मरद तो मरद ठहीरिस। बात ल कम से कम नाप - तऊल के गोठियाथे। नारी-परानी ल का कहिबे। नारी के जात छेरी के जात। वोमन टठिया भर भात ल अइँठ-गोंठके पचो लेही फेर ‘फुस्स ले’ पादत सुन परही तेन ल नई पचो सकय। अउ चारी चुगली बर तो उन बरदान माँगे आए हे। खेत होवय ते खार होवय, नदिया होवय ते कूआँ पार होवय, जिहाँ दू परानी मिलगे समझ ले मुँह बाँधे नइ रहे सकय। 

तरिया के पचरी म बइठे साबुन लगाके लगर -लगर के नहावत गोठियाथे - चरबी चढ़े रिहिस हे राँड़ ल, गन्ना चुहक-चुहक के ललियाए परदेसिया टूरा मन भा गे अउ का ?’

‘ओकरो दाई -ददा ल चाही रिहिस हे। ओकर ले नान्हे-नान्हे मन के कोरा म दूदी- तीन-तीन झन गेदा खेलत हे अउ वोहँ बीस-पचीस साल के बूढ़िया, छी !

‘हहो ! चर्रागे रिहिस हे।’

‘जब मैं ससुराल आए तब के देखत हवँ ओहँ आए- जाए के लइक होगे रिहिस हे, आज मैं तीन-तीन लइका के महतारी होगेवँ,  बंद तको होगे।’

‘अई ! अई !! तैं आपरेशन घलो करवा डरे हस ?’

‘त रे।’

जवानी के डारा ल अभी-अभी अमरत नवा-नवा जहुँरिया कूआँ पार म मिलथे त मुसकिया भर देथे काबर के उहाँ काकी-बड़ी, भौजाई के संगे-संग ठगेके नता घलो रहिथे। का पूछत हस ताहेन। डोकरी दाई मन नतनीन टूरी मन ल ‘हबरस ले’ कोचकथे - ‘खुसियार चुसरे बर आहू वो। हमरो बारी म यहा मोठ -मोठ खुसियार ठढ़ियाए हे।’ अउ मार अपन एक ले दूसर हाथ ल कोहनी के आवत ले अँटियाथे।

साऊ नोनी मन लाज के मारे मुड़ी नइ उठा सकय।

गाँव तो गाँव आस-परोस के कोस-कोस भर दूरिहा गाँव म घलो इहीच गोठ चलथे। नवा - नवा टूरा मन तरिया पार म संझा -बिहिनिया मंजन घीसत गोठियाथे -

‘कोन निशा यार ?’

एक तो बीच म भाँजी मारके जम्मो रसा ल नीरस कर दिस अउ ऊपर ले बात ल खोधियाथे -‘अरे पागल ! निशा ल नई जानस। बता एला यार।’- दूसर कोति ओधा देथे।

‘अबे दू साल पहिली हमरे गाँव म पढ़े बर आवत रिहिस हे। नदिया के पूरा म बोहावत लइका ल बचाए रिहिस हे तेकर सेति वोला ‘बीरता पुरूस्कार’ मिले रिहिस हे।’ 

‘अच्छा ! उही यार .. वो तो मास्टरीन होगे रिहिस का रे।’ 

‘हहो रे। लाल रंग के स्कूटी म आवय - जावय। कोनो दिन खम्हरिया ले आवत -जावत करमू मोड़ म पहुँचाए घलो होबे, उही डाहर कोन गाँव म पढ़ावय। परदेसिया मन के फारम हाउस घलो उही कोति हावय।’

‘अच्छा ! ठीक ..... ठी ...क, आवत -जावत सिगनल मिलगे अउ चिड़िया ‘फुर्र ले’ उड़गे.... है नहीं ।’ 

‘फेर भाई ये परदेसिया मन घला बड़ा हरामी हे न, वो टाइम रे गोल्लर ल टँगिया म काट दे रिहिस हे।’

जँहुरिया मन मुड़ी ल जोड़े गैंदू भैया के गोठ सुनत हे -‘स्साले मन ! दू नम्बर के धंधा करथे बइहा।’

‘झन कहा। करत होही। तभे तो बाहिर ले आके अतेक -अतेक खेत बिसा डरथे, अउ हमन ल देख, जिनगी भर कमाके एक एकड़ तको नइ ले सकन।’

‘मैं अपन आँखी म देखे हौं बइहा। वोमन मिर्चा पेड़ तरी गाँजा लगाथे।’

‘उन्कर ओतेक बड़ जंगल कस बारी म कोन काय करे बर जाही।’ गौकरण हूँकारू देवत अपन भरोसा के पलौंदी दिस। 

‘वोमन गाँव के चीन्हे-जाने मनखे के छोड़ दूसर ल घुसरन तको नइ देवय।’ अब गैंदू भैया कहानी सुनाए लगथे - ‘का होइस... एक पइत मैं अपन दीदी घर गे राहवँ। भाँटो अपन संग महूँ ल बारी लेगे। उहेंचे कमाथे। वोमन रोकत रिहिसे। भाँटो भरोसा देवाइस कि येहँ मोर साला हरे भई ! चिन्ता करे के कोनो बात नइ हे।’

‘उहेंचे देखे रहेवँ भाई, मिर्चा पेड़ तरी या... मोठ-मोठ गाँंजा के पेड़ ल पथरा म चपक-चपक के राखे राहय।’ गैंदू भैया अपन मुरूवा ल दूसर हाथ के हथेरी म रमजत -अँइठत बताइस।

‘एक पइत अपन खेत के तार काँटा म करेंट लगा दे रिहिस हे त चार- पाँच ठन गाय मन चटक के मरगे।’ 

‘यार ! तैं तो अतके सुने हस। वोदे गाँव कोति के परदेसिया मन के ल नइ सुने हस। एक झन आदमी हँ साइड माँगे बर हारन भर बजाइस हे कहिथे बइहा !’

‘त फेर’ ?

‘वो साइड मँगइया के गाड़ी ल रोक के बेदम मारीस कहिथे।’

‘हौ, महूँ अइसेने सुने रेहेवँ। थाना वाले मन रिपोट तक नई लिखिस कहिथे बइहा।’ 

‘तेकर ले तो येमन ल एती बसन नई देना चाही भाई !

‘अरे कतको दलाल हे यार, अपन बर लेवत हाववँ कहिके मोल -भाव कर लेथे। पाछू पता चलथे, अपन बर नही उन्करे बर बिसाए हे।’

‘हमरे आस्तीन म साँप होगे हे, भाग ल दोस देके का करबे।’

‘सही बात ये -भाग ल दोस देके का करबे। भोगौ रे नर करम बेवहारा, हरि को दोस झन देहू गँवारा।’

‘कोनो लाख काँही काहय भाई, फेर मोर मन नई काहत हे कि वो अपन होके गिस होही।’-छिटके-छरियाए चिन्ता ल सकेल के गठरी बाँधत कहिस-‘हो न हो सुघरई के सजा भोगत हे बपुरी हँ !’

‘ निशा ’! उही निशा जेन कक्षा म हर बछर अव्वल आवय। जेकर ऊपर सिरिफ माँ- बाप भर ल नहीं, भलकुन जम्मो गाँव ल गरब रिहिस हे। लोगन ओकर आदत ल देखके काँही बात बर निशा के कसम खाए बर तिहार राहय। लइका मन ओला डर्राय नहीं, भलकुन ओकर सम्मान करय। गाँव के चटरही मुँहा नेवरनीन माइलोगन मन घलो ओकर आगू म गोठियाए के पहिली सोच लेवय तेकर पीछू मुँह उलावय। जेकर रहे ले घरे भर नहीं पारा -परोस भर म उछाह चहकत-चुलबुलावत किंदरत राहय। 

निशा सोज्झे काहय -‘चटकन के का उधार ?’ अउ कोनो भी बात ल बिना डर-भय के तपाक ले बोल देवय। अति अउ अन्याव के विरोध बर एक पाँव खड़े राहय। 

हाँ, हाँ उही निशा ! आज चुपचाप मुड़ी ल गड़ियाए फारम हाउस म परदेसिया मन बर भात राँधत हावय। वो सब जानथे, एक ओकर बोले ले का कुछु नइ हो सकत हे। रही-रही के ओकर मन म पीरा बरसऊ बादर कस उमड़त हे। छिन म आँखी म झूले लगथे -कइसे परदेसिया टूरा मन साइकिल ल घेरके रोकिन। कइसे चिंगिर-चाँगर उठाके फारम हाउस म लेगीन। कुकुर-कऊव्वाँ कस बदन ले जम्मो कपड़ा ल चीथ डरीन अउ ओसरी-पारी........... छी छी।

निशा के मुँह म पलपलाके पिचर्री पानी भरगे। एक दिन म निशा हँ जहर के दसो घूट ल पीयत- जीयत हे - ‘भगवान कोनो ल एकट्ठा सुघरई झन देवय।’

जाँच बर गिनके अँगरी म दू झिन सिपाही आये हे। लइका सियान निशा के बात ल सुने-जाने बर कटाकट जुरियाए हवय। साँस ल थाम्हे सुने बर लुहुर-तुकुर, आसरा-असमंजस के बीच उबुक- चुबुक झूलत हे सबो के मन। 

आगू म संजय परदेसिया के बियान ले के बाद थानादार साहब निशा ल बलवाथे। परदेसिया मन निशा ल कुरिया के दुवारीच म गजब अकन फोटू असन देखावथे। ओकर कान म सबो के सबो काय -काय काहथे। फोटू ल देखके, परदेसिया मन के बात ल सुनके निशा अल्लर परगे। संजय ओला पानी लाके पीलाइस। निशा चिटिक रूकके धीरे- धीरे पाँव उसालिस। थानादार कोति रेंगत आवथे।

भीड़ के बीच कोनो मुड़ी ल टाँगके त कोनो अगल-बगल ले अकर-जकर करत हावय। निशा ल देखे बर जम्मो के आँखी तरस गे रिहिसे। निच्चट करियागे हवय बिचारी हँ। चेहरा मुरझागे हवय, चिटको चमक नई रहिगे हे।

‘अब का होही ?’ सब के साँस थमगे हवय। आँखी उघरे के उघरे रहीगे हे। ’ निशा आखिर का बोलथे ?’ सबो के मन म एके सवाल आवत -जावत धुर्रा पार दे हवय।

थानादार साहब पूछथे - ‘का संजय तोर ले जबरदस्ती करे हे ?’

निशा चुप। 

साहब उहीच सवाल फेर दुहराथे। तीसरइया -चौथइया पइत म निशा मुँह उलाइस -‘मोर दाई-ददा सही- सलामत राहय साहब !’

मनखे उही रहिथे, फेर वर्दी पहिरे ले जबान बदल जथे - ‘जतका पूछे जात हे ओतके के जुवाब दे।’ साहब के गोठ ले वो मेरन के जम्मो आब-हवा म बास गँजमजागे। 

‘मैं अपन मरजी से आहे हौं।’ अतके कहिके निशा दऊँड़त-दऊँड़त जाके फारम हाऊस म घुसर जथे अउ गोहार पारके रो डरथे।

परदेसिया मन के माथा म बिफिक्री हँ पहिलीच ले उमड़त-घुमड़त रिहिस हे। उहाँ ले उतरके थोथना अउ होंठ म इतराए -तुलमुलाए लगिस।

पुलुस वाला मन के मेंछा अउ नाक सरीदिन ठाढ़ रहिथे। आज दू इंच ऊँच उचके परत रिहिस हे।

लोगन काँव-काँव करे लगीन। उन्कर काँव-काँव के भीड़ म निशा के रोवई हँ दब-कुचराके मरगे, कोनो ल चिटको आरो नइ मिलिस। ओकर आत्मा कुलुप अंधियार होगे।

सब चीरबोर -चीरबोर गोठियावत गाँव कोति लहुटगे। निशा के ददा रामाधीन ल काटबे त खून नही। रामाधीन ककरो संग नजर नइ मिला सकत हे।

पाहर-पाहर चलत चार दिन बीतगे। चारी-चुगली के नींद परगे। समे के धार म सबो बोहागे। फारम हाऊस म परदेसिया परिवार बिहाव के उछाह-मंगल मनावत हे। फारम हाऊस जगर -मगर होगे हे। खार म बने फारम हाऊस कोति ले आवत अंजोर गँवई ल चिचिया-चिचियाके बलावत हे। लुहलुहावत हे फारम हाउस, तभो गाँव ओति झाँके बर तको डर्रावत हे। वोहँ अपन बेरा म खाईस-पीइस अउ रतिहा के घपटे अंधियार ल ‘घुमुक ले’ ओढ़के सुतगे। 

रामाधीन के आँखी ले नींद हँ दुरिहागे हे। टकटकी संग इशारा म गोठियावत मुक्का छानी ल देखत हे रामाधीन। एक बजगे राहय। अचानक ओकर कान म सँकरी खटखटाए के आरो सुनाथे। झकनका जथे। सोचथे- ‘मोर भरम होही।’ सँकरी फेर बाजथे- ‘खन खन खन !’ 

एकक पीछू घर भर जाग गे। कोनो अनहोनी के डर म सबो के पोटा काँपे लगिस। पास-परोस के दू-चार झिन सियान मन तको जागगे। रामाधीन मुहाटी के सँकरी ल खोलके देखथे। ओकर आँखी म भरोसा के अकाल परगेहे। झुँझुर-झाँझर कलमुँहा अंजोर म आँखी ल लिबलिबावत देखिस- -‘ निशा !’ निशा मुड़ी ल गड़ियाए आगू म खड़े हे। रामाधीन घुड़क के कहीस - ‘नाक ल तो उही दिन काट डरे रहे मोर, आज अउ काला काटे बर आये हस ?’

‘मैं सजा काटे बर आये हौं ददा !’ निशा के पाँव ल लड़भड़ावत देखके रामाधीन ओला संभाले बर आगू बढ़ते रहिथे। ओकर बाँहा म लोमत-गिरत - ‘जम्मो परदेसिया मन ल ....खाना म... जहर........।’ अउ अतके कहीके निशा अचेत होके ‘भड़ाँग ले’ गिर जथे। 


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

कहानी--किरिया (महेंद्र बघेल)

 किरिया

                   (महेंद्र बघेल)


देवारी के लक्ठाती म तीन अकड़ के नाॅंगरजोत्ता किसान अघनू हर हरहुना धान ला मिंज-कूट के बेंचे बर सुसायटी मा कई दिन ले खटे रहय। तब खार खाके  तउल बाबा मन ला चहा पानी के चढ़ोतरी चढ़ाइस तेकर पाछू ले देके धान हा तउलाइस। अउ एती सुसायटी बाबू हर मरदनिया के मेछा कटई कस करजा के पइसा ला चुक ले तुरते उड़ा दिस। जीव करलागे फेर उधारी ल तो पटायेच ल परही..। 

             साॅंझ के पाॅंच बजगे रहय ,घर जाय बर अघनू हर सायकल मा चढ़िस अउ पायडिल ला ओंटत ओंटत मनेमन मा गुंताड़ा करे लगिस- "हाथ मा एक टिकली नइहे।अब तिहार बार ला मनाॅंय ते मनाॅंय कइसे जाय, ऊपर ले दवई बूटी वाले मन के तगादा।" कई ठन बात मगज म आवत गीस जावत गीस। इही सोचत सोचत घर अमरत ले मुॅंधियार होगे रहय। रातकुन अघनू हर खा-पी के सुतगे, फेर नींद परे तब ,कतरो अलथी-कलथी मारिस।मगज मा घेरी बेरी उही बात आय उही बात जाय, चिंता फिकर मा ऑंखी कब लटकिस गम नी मिलिस।

     "चिंता फिकर म आदमी जब समाधान खोजे म असहाय हो जथे तब विवेक ह घलव ओधियाये बर धरथे, उही समे कहूॅं टपले हिम्मत के पूछी धरागे तब तो बात बन जथे, नइते अनहोनी हा मेर्री मारके तो बइठेच रहिथे धीरज ला डसे बर।"

      अघनू के नींद ह उचटिस , वतीक बेर शुकवा हर नइ उवे रहय, दसना मा फेर ढलंग गय अउ सुते-सुते पहुॅंचगे सोच के दुनिया मा।         बीते बाॅंवत-बियासी, रोपई-निंदई के सुरता करत मने मन मा गुने लगिस -  "खार मा तीन अकड़ खेत हावय तो जरूर  फेर कोठी मा एको दाना बीजा नइहे।प्राभेट कंपनी के बीज-भात के जरवत ले जादा माहॅंगी होय के सेती यहू साल सुसायटी ले सरोना अउ एक हजार दस के बीजहा धान  बिसाना पड़िस। का करबे कते साहेब के छाॅंव परे रिहिस ते सरोना हा एको बीजा जागबे नइ करिस, एक हजार दस हर आधा जागबे करिस त साॅंवा, बदॅंउर, करगा अउ राहड़ा के मारे खेत बिल्लागे। खेत निंदवावत- निंदवावत कनिहा ढिल्ला परगे। सरकारी बीजा के चक्कर मा चार सौ बीसी के शिकार तो होइ गेंव।"

        अघनू ह बीजा ह बने नइ जामे हे कहिके खेत ल मौका म देखे बर कृषि विकास विस्तार अधिकारी ल कई बेर शिकायत करिस, कलोली करिस। साहेब मन आज आहूॅं,काली आहूॅं कहि कहिके समय पहा दीन फेर आबे नइ करिन।अबीजहा धान के  सेती बड़ उपाय करिस अघनू हर, खेत म फेर बोंवाई करवाय बर गांव मा घरोघर जा-जाके धान खोजिस। एक दाना बीजहा धान नइ मिलिस, कलप के रहिगें अघनू हर। ले देके पता  चलिस कि परोसी गाॅंव धनगाॅंव मा दाऊ धन्ना सिंग के खेत म थरहा हवय। जेन नापडंगनी के हिसाब मा बेचावत हे, सुनके भरपूर ठंडा साॅंस लिस।

           अघनू हर बड़े बिहनिया ले साइकिल म निकलगे धनगाॅंव अउ पहुॅंचगे दाऊ के दुवारी मा। परछी मा सीजर धूॅंकत आधा सुते अउ आधा बइठे बरोबर दिखत रहय धन्ना सिंग ह।हुरहा देखके अकचकागे अगनू ह ,येहा न तो खटिया हरे न कुरसी, सइत दूनो के बीच वाले कोई जिनिस होही टू इन वन कस। पुरखा सियान मन तो कभू बइठारे नइ रिहिन अरामी कुरसी मा। त काला जानही अघनू ह अरामी कुरसी के मजा ला ।

      जै जोहार करत अघनू हा किहिस - "राम राम दाऊ जी, सुने हॅंव कि आप मन के खेत मा धान के थरहा बाचे हे। जेन ल बेचइया हव । ओकरे खबर मिलिस, तब पता लगाय बर आय हॅंव।"

     अगनू के गोठबात ला सुनके दाऊ ला अतका  समझ तो आगे रिहिस कि  अघनू हा मजबूरी मा फॅंसे हवय तभे इहाॅं आय हे।

        अरामी कुरसी मा जेदर्रा सांप कस कसमसात दाऊ हा कहिस - "हव, सही बात तो आय ,थरहा ला तो बेचनाच हवय। कतिक लगही तेला जल्दी  बता डार, तुहरे सही कई झन थरहा पुछइया मन सॅंझा बिहने हर रोज अब्बड़ आवत हें।"

            आफत मा फॅंसे मनखे के संग कइसे सुवारथ ला साधना हे कोई इकरे ले पूछे। काबर इही काम हर तो इकर पुरखौती धंधा पानी हरे।

     ऑंय-बाॅंय,बजार ले दू गुना उप्पर बढ़ा चढ़ा के भाव ल बताइस, सुनके अघनू कट्ट खागे।आखिर करे ते करे का, पाछू हटे मा खेत परिया लहुट जही, किसान के काम तो बस माटी के सेवा बजाना हे, जुआ खेले बरोबर।बस इही सोचत-सोचत दाऊ कर ले दू अकड़ खेत के पुरतीन थरहा बिसा डरिस। आधा थोरहा पैसा ल तुरत जमा कर दिस अउ आधा पैसा ल धान लुवे के बाद म जमा करे बर खॅंधो डरिस।

       बिहान दिन थरहा उखाने बर बनिहार लगाइस। गाड़ा-बइला मा डोहारे बर बनिहार, रोपा लगाय बर बनिहार लगाइस। तब चार पाॅंच दिन मा लटपट सबो खेत के रोपई बुता हर उरकिस। रोपा लगई के बुता हर एके झन के बस के बात तो नोहे। 

   सरकारी अबिजहा धान के सेती किसान ल कतिक चितखान अउ जेब ढिल्ला करना पड़थे,तेकर गम ला अगनू जइसे किसानेच मन ह जान सकथें।

       जे जगा म किसान मन ल बेरा-बेरा म सहयोग-सुझाव के दरकार रहिथे। उहां के घलव अकथ कहानी हे।देख कतका गोरा नारा हे अधिकारी सुराज प्रसाद हर ,फकफक ले ओग्गर, चक सादा कार मा चढ़के आथे, कारे मा चढ़के जाथे। गोटारन कस लाल-लाल ऑंखी अउ बाटा हर भरनाहा भरनाहा कस अइसे दिखत रहिथे मानो लहरलोट होके आय हे का । चौबीस घंटा संग म रखे बाटल ल देख के लगथे कि बाटल म पानी कस दिखत पदारथ ह मिनरल वाटर आय के कुवाटर आय।

         इही जिला कृषि विभाग के सबले बड़े अधिकारी,जेकर डमडम ले गुदुम कस तनाय पेट अउ लाल बंगाला कस ललमुॅंहा चेहरा ल देखके भुरभुस जनाय ल धरथे। कहुं येकर बउग म सरकारी योजना के नेवती रसा ह खमस मींझरा तो नइ होगे हे। 

        साहेब सुराज प्रसाद अउ धनगाॅंव के दाऊ धन्ना सिंग दूनो के बनेच मितानी हे, फेवीक्वीक के मजबत जोड़ कस।काबर दूनो झन ह कृषि यूनिवर्सिटी मा सॅंघरा पढ़े-लिखे हवॅंय।ये दूनो मितान मन दाऊ लाला घर के लल्ला ऑंय, तेकर सेती बड़ संस्कारी होय मा संदेह करना उचित नइहे।जानकार मन बताथें कि दूनो के पूर्वज मन के नेरवा ह इहाॅं नइ गड़े हे।आजादी के तुरते बाद म इनकर पुरखा मन इहाॅं पुलिस के नौकरी करे बर आइन। अउ इहाॅं के चातर भुइयाॅं म फसल अपन लहलहाइन। तभे तो उॅंकर विस्तार मन आज घलव फलत-फूलत हें अउ पेज-पसिया धरके चरपा के चरपा लुवतहें।

    घर परिवार के मनखे मन के  बड़े-बड़े पद मा रहे के लाभ तो बाकी रिश्तेदार मन ला परसाद मा आखिर मिलथेच न। आजादी के फसल ला टुटपूॅंजिया मन हर थोरे लुही, उॅंकर बर तो हर जगा इंटरव्यू के काटा गड़े हे। अउ बड़पूॅंजिया मन बर का इंटरव्यू ? जब उहाॅं उकर कका भैया मन पैनल मा मेर्री मार के बइठे हें। तब का आनलाइन अउ का पारदर्शिता।

           जनता ल चश्मा लगाना नइ पड़े ओकर ऑंखी म तो सबो चीज ह झल-झल ले दिखी जथे। वो अलग बात हे उंकर मुहुं ले कभू बक्का नइ फूटे ते।बस इही भाईचारा ले कालेज के पढ़ई ले अधिकारी बनई तक के सफर ला तय कर लेना उनकर बर कोई अनहोनी घटना नोहे। उही पहुॅंच अउ पहचान वाले कुल परम्परा के मान-सम्मान ल राखत सुराज प्रसाद हर आज जिला के कृषि अधिकारी पद मा शोभायमान हे।

     नैतिकता ,नियम कानून  जइसन शब्द ला छेरी कस चरे के अइसन प्राणी मन ला अघोषित पारंपरिक छूट रहिथे।कानून जनइया उकील फुकील मन ह तो घलव इनकर खुदे ममा फुफू के लागमानी आय।त का मजाल हे कि कानून हर इखर कुछू उखाड़ सके।

           अउ एती कहत लागे सौ एकड़ के जोतनदार, अपन ददा के एकलौता सपूत , धनगाॅंव वाले दाऊ धन्ना सिंग, का ककरो ले कम हे। कृषि विभाग म जनपद क्षेत्र (ब्लाक) के बड़े साहेब के  नौकरी पाइस। फेर सबो काम-काज ह उल्टा च पुल्टा।किसानी बुता बर मिले खातू-बीजा अउ दवई ल किसान ल नइ बाॅंट (वितरण) के बेपारी मन कर बेचई-भॅंजई ह ओकर बर चुटकी के काम आय। मजाल हे आफिस के कोनो बाबू-साहेब मन के.. ओला कुछू बोल सके।

          कन्हो मन बोल दॅंय त धमकी-चमकी लगाके मनमाने डरवाय के उदिम करे। मनमाफिक चढ़ोतरी के आगू पत्रकार मन घलव अपन कान म तेल डार के कुंभकरण कस सुत जाॅंय। एती-ओती चारो-कोती कोई हिम्मत नइ करें ओला कुछू कहे के। तेकर सेती सरकारी चीज बस ल सुलटाय बर ओकर हिम्मत ह बाढ़ते गिस। पैसा अउ पहुॅंच के बल म साल-पुट बइमानी अउ चार सौ बीसी ले बाचे के सुगम रस्ता के भरपूर उपयोग करे। धीर लगहा सरकारी ममा-फुफू मन के आशीर्वाद ले शहर म कई ठन पलाट अउ गाॅंव म खेती-खार के रकबा ल घलव बढ़ाते गिस। 

         उही दुवे-तीन साल होत रहिस होही तभे लंबा हाथ मारे के चक्कर म सब गड़बड़ झाला होगे। किसान मन ल बाॅंटे बर मिले स्प्रींकलर पाईप अउ स्प्रेयर ल आफिस म पहुंचे के पहिली बहिरे-बहिर बेपारी मन कर बेच दिस। ये पईंत सब दाॅंव उल्टा परगे। सरकारी समान के चोरी अउ लाखों के गबन मा अइसे धॅंधइस कि नौकरी ले चुक्ता हाथ धोना पड़गे। बाॅंचें के कतको उदीम करिस, ममा-फुफू मन नइ बचा सकिन। हाॅं बइमानी के अनुभो साटिपिकट जरूर मिलिस। फेर उकर बर जुर्माना संग खानगी ला भरके इज्जतदार के पावती ला झटक लेना कोनो मुश्किल काम ए का।नौकरी गीस ते गीस सौ-सौ एकड़ जोतनदार दाऊ के मान सम्मान मा भला का उद जलिस।

    धनगाॅंव के दाऊ धन्नासिंग  के लमचोचवा नाक हा नाक हरे ,कोन्हो भारतीय शेयर बाजार के सूचकांक थोड़े आय जेमा भदरस ले गिर जही।

        यहू साल अघनू ह सुसायटी ले करजा निकालिस तभो ले निंदई, रोपई बर पैसा नी पुर पइस। आखिर म साहूकार ले उॅंचहा ब्याज म पैसा निकालना पड़िस। सही टेम म सुसायटी ले खातू नइ मिलिस , डेव्ढ़ा रेट म बाहिर ले खातू बिसाना परिस। जस-जस समय पहावत गिस, रोपाही खेत म साॅंवा, नरजा, बन-कचरा मन घलव उम्हियावत गिस। येला देख के अघनू के माथा म सॅंशो के लकीर तनागे अउ ओहा चुरमुरा के रहिगे। सरकारी बीज-भात ह अबीजहा तो होइचगे, किसानी थरहा म घलव गंज बन-कचरा के बासा होगे।

          साॅंवा-बदउर जइसे बन-कचरा ले खेत ह परिया झन लहुट जाय। इही सोच-सोच के अघनू ह कनिहा के टेड़गावत ले अपन धरम निभाइस फेर हार नी मानिस।

          भादो के निकलती अउ कुॅंवार के लगती म दूध भराय के टेम म सिरबिस ले आखरी पानी टोर दिस। अघनू ह घेरी-बेरी के निंदई, चलवई, रोपई अउ माहंगी खातू ले अइसने दंदरगे रहिस। उप्पर ले सुक्खा..!धन तो पड़ोसी भाई के नलकूप के सहारा मिलगे, नइते सुक्खा म धारे-धार बोहा जतिस। एती खेत म पानी के पलोती होइस ओती सुबे-शाम झम-झम बादर निकलना शुरू होगे। दिनमान गरमी अउ रातकुन बादर। गरमी के मारे धान-पान ल का कहिबे जीव-जंतु मन के जीना मुसकुल होगे रहिस। कुॅंवार के अनसम्हार बदराहा गरमी ले खेत म माहू झपागे।

     रकम-रकम के उदिम करिस तब कहुं जाके घेरी-बेरी के दवा छिंचई ले हप्ता-पंदरा दिन म कीरा-काॅंटा ले छुटकारा मिलिस।  

            फसल के घेरी-बेरी सेवा-जतन करई ले पइसा ह भला कतिक दिन ले पुर पाही.., हाथ सिरबिस जुच्छा होगे। जुच्छा हाथ ल देख-देख के प्रमाणित बीज के मठराहा घाव ह अउ उपकगे। तेकरे सेती जाॅंच के हाल-चाल जाने बर अघनू ह बलाक आफिस डहर फेर धमक दिस। आफिस के कपाट कर बैठे चपरासी ह तॅंय अभी नइ जा सकस कहिके उही कर रोक दिस। अतिक म अघनू कहिस-" तॅंय मोला काबर रोकथस, मोला शिकायती जाॅंच के बारे म पूछना हे, मोला जावन दे"। तब चपरासी बोलिस-" भीतरी कोति पारटी-सारटी चलत हे, जिला के बड़े साहेब सुराज प्रसाद ह आय हे। अभी अंदर जाना मना हे। आधा घंटा के पाछू आ जबे।"

  चपरासी के बरजई ल सुनके अघनू ह नजीक के लीम छांव म जाके बइठगे।

         उही घंटा-डेड़ घंटा ले बइठे-बइठे असकटा गे रहिस अघनू हर, अउ उनिस न गुनिस सोज्झे खुसरगे आफिस म। तब तक बड़े बाबू ह अपन कुर्सी म बइठगे रहिस।ओकर ले  शिकायती आवेदन के बारे म पूछिस।अतिक म बड़े बाबू ह बतइस कि तोर संग बहुत झन किसान मन के शिकायती कागज ल जिला आफिस म भेजवा डरे हन उही मन जाॅंच करही। उही मन धान ल भेजवाथें, उही मन अबीजहा के कारण ल बता सकथें।

          अघनू ह स्टाफ रूम म बइठे साहेब सुराज प्रसाद के तीर घलव अपन समस्या ल रखिस। साहेब ह का जुवाब ल दीही भला। आजो बस रटे-रुटाय एके ठन जुवाब ल ओरिया दिस- "धीरज रखे रहव, जाॅंच खच्चित होही, सबला न्याय मिलही।" तहाॅं बात खतम..! कुल मिलाके यहू बखत अघनू ह आफिस के असवासन ल सुरता म गॅंठियाके लहुटगे।

           घर लहुटती म अघनू ह दाऊ धन्ना सिंग के थरहा के देनदारी ल चुक्ता करे बर सायकिल के हेंडिल ल धनगांव डहर मोड़ दिस।त दाऊ घर के बाहिर म एक ठन चक सादा कार ह खड़े रहिस।कार ल देखके अइसे लगत रहिस मानो कोई सगा-पहुना आय होही।ऊंखर घर के बहिरी कोन्टा म भलवा बरोबर दिखत सखरी म बॅंधाय झुलपाहा कुकुर ह हुरहा हाॅंव-हाॅंव करिस।अघनू ह लटपट बाचिस नइते कुकुर ह हबक दे रहितिस। हाॅंव-हाॅंव ल सुनके भीतरी डहर ले थोरिक चमकावत टाॅंठ बानी म एक झन चिल्लाइस-ए टाईगर,क्या कर रहा है...? अवाज ल सुनके उनकर टाईगर ह तुरते कलेचुप होगे अउ पूछी ल हलावन लगिस।

             कोन आय हे कहिके आरो लेवत मुनीम ह अइस अउ अघनू ल भीतरी डहर बलाइस। त उहाॅं सुराज प्रसाद अउ धन्ना सिंह दूनो झन गपशप मारत , धुॅंगिया उड़ावत बइठे रहॅंय। "अभी च तो साहेब ह आफिस म बइठे रहिस ,लघियाॅंत धनगाॅंव अमरगे।" -अघनू ह मने मन म इही बात ल सोचत उधारी के पैसा ल जमा करिस अउ अपन गाॅंव लहुटे लगिस।

साॅंझ कुन पाॅंच बजे रहिस होही धनगाॅंव के बजार चौक म अमरे च रहिस त चाय पीये के चुलुक होइस तहान एक ठन होटल के आगू म ठाढ़ होगे। उही होटल म पुराना चिन-पहिचान के एक झन सॅंगवारी शोभा राम ह मिलगे। दूनो म आपसी जोहार-भेंट होइस, तहा घर-परिवार, खेत-खार अउ सुख-दुख के बात गोठियाय लगिन। शोभा ह अघनू ल पूछिस - ए साल खेती-बाड़ी के का हाल-चाल हे मितान। कूत-कबार ह बाढ़िस हे.. कि काम-कमई ह पानी-बादर के भेंट चढ़गे..? अघनू ह कहिस- "काला बताबे मितान दुब्बर ल दू अषाढ़ कस हमर हाल हे। सोसायटी ले बीज बिसाएन.., अबीजहा होगे। दाऊ धन्नासिंग ले थरहा बिसाएन.., खेत ह साॅंवा, करगा , राहड़ा जइसे बन म बिल्लागे, फेर माहू झपागे। बाचे-खोंचे मोर हिस्सा म जतका आइस उही मोर कमई। दाऊ कर उही थरहा के बाचे पैसा ल जमा करे बर आय रहेंव।"

            अतिक म शोभा ह कहिस- " अरे मितान तहूॅं ह कहाॅं प्रमाणित-व्रमाणित बीजा के चक्कर म फॅंसगे रहेस, सोसायटी ले जतका प्रमाणित बीज बिसाये रहे होबे न वो सब्बो बीज-भात ह दाऊ च के खेत के बीजा आय जी...।उकर खेत म कहाॅं निंदई अउ कोड़ई..! पूरा सौ एकड़ के खेत के उपज अउ ओकर ससुरारी फारम के जम्मों उपज ह प्रमाणित बीज लिखाय बोरी म सीधा भराथे अउ पहुंच जथे सोसायटी म वितरण खातिर। दाऊ धन्ना ह सोसायटी म भला नइहे मितान फेर सुराज प्रसाद नाम के ओकर पहुंच ह तो उहां माढ़े हावे रे भई..‌। ईंखर प्रमाणित बीजा ह इहाॅं के खेत-खार ल सिरिफ परिया बनाथे। येमन साॅंवा ,बदउर, नरजा ,चुहका अउ गाजर घास ले घलव खतरनाक बेलाटी बन-कचरा हरे मितान...।"

        शोभा के गोठ ल सुनके अघनू के बुध चकरागे।तुरते ताही सायकिल ल धरिस अउ शुरू-खुरू घर जाय बर निकलगे। घर जावत-जावत रद्दा म अघनू ह सोच के भॅंवरी म अइसे अरझिस कि ओकर अंतस म बोंवई ले लेके मिंजई तक के जम्मों बात ह धारावाहिक कस ओरी-पारी आवन-जावन लगिस। अबीजहा धान के जाॅंच करवाय बर उप्पर डहर शिकायत के कागज पेश करई अउ कागज ला आघू डहर दउड़ाय बर कागज म वजन रखई के सबो उदीम ह कइसे फाऊ होइस। जाॅंच ल तो भुलई जा.., वो कागज ह आगू कोति काबर नइ सरकिस.. , वो गहिर राज ह आज पता चलिस।

   उपर ले दाऊ घर के कुकुर के हाॅंव-हाॅंव करई के घटना ह घलव ओकर अंतस ल हलाके रख दिस।आज ऑंखी उघरिस तब गुस्सा के मारे तन-बदन म धधकत आगी ल खुदे गटागट पीगे।अउ सोच के काॅंटा ल उत्तर डहर घुमावत अपन आप ल बखानत एक ठन किरिया खईस  - " बिना बिलमे अब ये बन-कचरा ल उखाने बर बनेच भिड़ना पड़ही, नइते हमरे सिधवई के ओधा म , स् ..साले जम्मों बेलाटी (विलायती) कुकुर मन इहाॅं आके टाईगर बनते रइहीं ..!"


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

7987502903

छत्तीसगढ़ी कहिनी कोईली बसंती

 छत्तीसगढ़ी कहिनी


                       कोईली बसंती

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        मउरे आमा रूख म आमा पान तोपाय, पिंवरी-पिंवरी आमा मउरे, अमरइया म छागे हवय। बसंत रितु के आवत, कोईली के कूक ले चारो डहार खुसहाली आगे। सुघ्घर पिंवरी फूल सरसो के, सेमर,  परसा फूल लाली -अंगारी बंगबग ले चारो अंग खेत म बगरे हवय। आमा के माउर हर अमटहा महमहावत हवय।

        अमरइया के तीर खेत म संझा कुन धियान मगन बसंती हर, फागुन गीत ल गावत रिहिस। कोईली कस अब्बड़ मीठ गीत हर खेत खार म गूंजे लगिस। बसंती के गोठ अउ ओखर कंठ के आवाज हर अब्बड़ गुतुर, मीठ हवय। ओहर जइसने गोठियाथे,लागथे कोईली हर कूकत हवय, ओहर हांसथे त पारिजात  के रूख ले फूल हर झरथे तइसने लागथे। ओखर गाय गीत हर त सब्बो डहार खेत -खार, घर-कुरिया ,अंगना म गूंजत रहाय। का ददरिया, का जसगीत, का सुवा गीत?जम्मो गीत गाय म हुसियार बसंती। अमरइया मेर बइठे बेरा संझा ले अंधिरियागे। अमरित हर बसंती के  तीर आके कहिस-"अवो बसंती संझा कुन ले अब रथिया होवत हवय, ते अभिचे ले घर कुरिया नइ गे हवस। दाई हर तोला खोजत हवय।" अमरित के गोठ ल सुन के बसंती हर हड़बड़ागे। उठके सोझे घर कुरिया डहार रेंह दीस।

         बसंती लकर-लकर घर कुरिया के अंगना म हाथ गोड़ धोके रंधिनी कुरिया भीतर नींग गे। बसंती हर किहिस-"दाई मैंहर कछु बूता काम करव का?" दाई हर अब्बड़े रिसाय किहिस -" कस ओ नोनी तोला कोनो लोक लाज सरम हावय के नइ, अतना अंधियार होवत हवय अउ तैंहर अमरइया मेर नाचत, कूदत, गावत हवस." गोठ ल सुन के बसंती हर चुपे चाप मुच- मुच ले हांस दिस। दाई ल पोचार के किहिस-" दाई ओ दाई मैंहर त घर कुरिया आवत रेहेव फेर रददा म अमरइया मेर नानकुन सुवा के नानकुन पीला हर अपन खोंदरा ले भुइंया म गिर परिस।ओला मेंहर लोरी गावत पुचकारत रेहव दाई, जम्मो संगवारी मन संग आमा रूख के खोल म राख के आये हवव। दाई मोर जीव हर सुवा बर कलपत हवय दाई। सुवा हर अपन पांख ल फड़फड़ावत रिहिस। ओखर खोल म कोनो नइ रिहिस। दाई मोला अब्बड़े सुरता आवत हवय।" बसंती के दाई हर किहिस-"नोनी तैंहर कोनो फिकर झन कर भगवान  हर सब्बो जीव के रक्छा करथे। ओखरो करबे करहि। जा तोर बाबू अउ भाई ल जेवन बर बला ले।"

          बसंती अपन दाई-ददा अउ बड़का भाई ल जेवन करा के आखिरी म अपन बर थारी म भात दार साग हेरके खाईस अउ रंधनी घर ल झारू-बुहारू, झार-पोछ, लीपब बहार के बरतन भाड़ा ल मांज धोके रंधनी म राख दिस। अपन कुरिया म दसना बिछा के थोरकुन पढ़ई -लिखई करिस अउ सुतगे। बसंती पढ़ई लिखई म अब्बड़ हुसियार रिहिस।

           बसंती  के दाई दसमत हर रथिया इही चिन्ता-फिकर म नइ सुतय के मोर नोनी के का होही। काबर नोनी के उमर बाढ़त जात रिहिस। बिहाव बर सगा मन आवय फेर नोनी के तन के करिया रंग ल देख के कोनो जवाब नइ देवय। सब्बो ल उजर रंग के बहुरिया चाही। मन म गुने के लगिस के काली माता दाई हर तको त करिया रिहिस, ओखर गुन के कोनो पार नइ रिहिस। फेर इही संसार के लोगन मन त चमड़ी के रंग ल देखइया हवय। नोनी के गुन हर ओखर करिया रंग म लुकाय हवय। जइसन कोइला म हीरा तोपाय रहिथे। हीरा ल जौहरी हर परख लेथे। तइसने कोनो बसंती के गुन ल परखही। नोनी के उमर बाढ़त जावत हवय, त ओखर गुनों तक बाढ़त हवय।

        बसंती के ददा हर दसमत ले किहिस-"दसमत तैंहर हमर नोनी बर कोनो चिन्ता-फिकर झन कर, ओहर पढ़ई म सबले आगू हवय। मैंहर येला कॉलेज पढ़ाहुं,  मोर नोनी जतका पढ़ही ततका ओला पढा़हुं, ओखर जेन सपना हवय, तेला मैंहर पूरा करेके कोसिस ल करहुं। हमन नइ पढ़े लिखे हवन त का होगे,  हमर बर त पढ़ई-लिखई त करिया आखर भइंस बरोबर हवय।  फेर हमर नोनी हर बड़ हुसियार हवय। तेंहर ओखर बिहाव के फिकर ल छोड़ दे। ओखर भाग म जेन होही तेन ओखर बने बर होही।"  दसमत हर हीरा लाल के गोठ ल सुनिस त ओखर मन हर हरू होय लगिस।  कब सुत भुलाइस गम नई पाइस।

         कच्छा बारा म बसंती अपन इस्कूल म सबले ज्यादा नम्बर लानिस। जम्मो इस्कूल के सिक्छक अउ गांव के लोगन ओखर गुन ल सहराइन। काबर लोक गीत गाय तको म बसंती हर अपन जिला अउ राज म पहिली नम्बर म रिहिस। सरस्वती वंदना अउ सुवागत गीत ओखरे गाय बिना अधूरा  रहाय। बसंती के बने पढ़ई ले ओखर दाई-ददा अब्बड़ खुस रिहिन।

        कक्छा बारहवी  पास करके बसंती हर बी. ए. करीस अउ हिन्दी म एम. ए. पास कर डरिस। फेर बी. एड. तको पास होगे। बसंती के दु ठन सपना रिहिस। सिक्छिका बने के अउ दूसर गाइका बने के। इही सपना बर ओखर दाई-ददा  दुनो मन ओखर संग दिन। काबर समाज  हर अभीकुन नोनी मन के पढ़ई बर अतना जागरूक नइ होय हवय। जादा पढा़बे त बिहाव कोन करही। अइसना समाज के सोच हरे। फेर समाज म बदलाव आना चाही,  नोनी-बाबू एके समान के नारा ल सिरतोन करना चाही। इही गोठ ल दसमत अउ हीरालाल हर गाँठ बांध लिन अउ अपन नोनी के सपना ल पूरा करेके ठान लीन।

          आज बसंती अब्ड़े खुस हवय। ओखर पोस्टिंग अपन गाँव  के हाई इस्कूल म होइस। जिही इस्कूल म बसंती पढ़िस, तिही इस्कूल म आज सिक्छिका बनगे हवय। ओखर खुसी के कोनो ठिकाना नइ रिहिस। आकासवानी रेडियो  म ओखर गीत के कार्यकरम  आय लगिस। देवी गीत, जस गीत,  ददरिया, बिहाव गीत ,फाग के गीत के कैसेट  तको निकल गिस।  नवरातरी बेर जम्मो जगराता म बसंती  ल गीत गाय के नेवता तको मिले लगिस। अब बसंती ल कोईली बसंती के नांव ले जाने लगिन।

          आज बसंती के दुनो सपना हर पूरा होगे। आज ओहर अब्बड़े खुस हवय।ओखर गुन के सुवास हर चारो अंग बगरगे।  बसंती ले बिहाव करेबर सगा मन के बाढ़ आगे,सगा ऊपर सगा आवत रिहिन।

        सुखदेव हर बसंती के गीत अउ ओखर गुन म मोहाय, अपन दाई-ददा संग बसंती ले बिहाव के गोठ करे बर, ओखर घर आइन। बसंती के दाई-ददा मन खुस होगे। फेर बसंती हर बिहाव बर तियार नइ होइस अउ कहिस-"दाई मैंहर बिहाव नइ करव।" ओखर गोठ ल सुन के दसमत हर किहिस-"नोनी जिनगी म सबो जरूरी हवय, फेर सुखदेव अउ ओखर दाई-ददा तोर गुन म मोहाय हवय। नोनी तंय हां कहि दे।" बसंती हर किहिस-"दाई आपमन ल जेन बने लागे ओही ल करव, काबर मोला अपन ले जादा आपमन म बिस्वास हवय। मोर भलई जेमा होही ओही आपमन करहुं।"  जसमत अउ हीरालाल बड़ खुस होगे अउ सुख देव ल अपन दमाद बनाय बर तियार होगे। सगई अउ बिहाव ल एके संघरा करेके गोठ -बात ल करके सुखदेव के दाई-ददा मन बसंती ल नेग बर पइसा धरा के  सगा मन संग रेंग दिन।

         अब्बड़े धूम-धाम ले बसंती अउ सुखदेव के बिहाव होगे। सगई- बिहाव के बेर बसंती हर सुखदेव ल देख के देखते रहिगे। सुखदेव हर फकफक ले गोरा नारा, गोरस सही उज्जर, ऊंच पूर रिहिस। बसंती हर ओला देखते रहिगे।  अपन भाग ल सहराय लगिस, अपन दुल्हा ल देख के देखते रहिगे। सुखदेव हर बसंती ले किहिस-"बसंती तन के रंग हर त चार दिन के हवय, मन के उज्जर रंग त सदा रहहि। मोला तोर जइसन गुनी जीवन संगवारी चाहे रिहिस,आज मोला तंय मिल हवस। तैंहर मोर जिनगी म कोईली बसंती हवस। मोर दाई-ददा के सेवा जतन करइया, सबोबर मया करइया, तोर कोईली अस सुघ्घर गीत गवइया ल पा के मैंहर सबों कछु पागे हवव।

         पहिली फागुन बसंती के फाग के गीत ले गूंजे लगिस। लाली गुलाली रंग ले बसंती हर सब्बो झन ल अपन रंग म रंग डरिस।  कोईली बसंती के गीत हर जम्मो मनखे के हिदय म, रूख-राई, खेत-खार, गाँव -गवंई,सहर म गूंजे लगिस।


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                  लेखिका

      डॉ. जयभारती चन्द्राकर

           सहायक प्राध्यापक, रायपुर छत्तीसगढ़

मोबाइल न. 9424234098




मोर छत्तीसगढ़ी कहिनी प्रेषित हवय ...🙏🌸🌺😊

छत्तीसगढ़ी लोक कथा वीरेन्द्र सरल

 छत्तीसगढ़ी लोक कथा

वीरेन्द्र सरल

जे पाय आंच ते खाय पांच

एक गांव म डोकरी अउ डोकरा रहय। डोकरी- डोकरा मन निचट गरीब रिहिन। बनी -भूति, रोजी- मंजूरी करके 

उंखर गुजर-बसर होवत रहय। गरीबी के सेती उंखर जिनगी एक लांघन , एक फरहर बीतत रहय।

        एक दिन डोकरी-डोकरा मन सुंता होइन कि हमर मन के जिनगी तो सदा दिन चुनी-भूंसी के रोटी अउ भाजी- कोदई के साग खावत बीततेच हवय। फेर कोन्हों दिन बने गुड़हा चीला रोटी खाय के साध लागथे। दु-चार दिन उपरहा मिहनत - मंजूरी करबो तब गुड़ अउ गेंहू पिसान बिसाय के लइक पैसा  कमा लबों का?

       डोकरी किहिस- " बात तो तैहा सिरतोन कहत हस डोकरा! चल आज ले थोड़किन जादा मजदूरी करबो।"

         बिहान दिन ले दुनो झन मालिक घर जादा समय तक काम करना शुरू करिन। महीना दिन म मंजूरी के पैसा ह  पहिली ले जादा सकलाइस।

        अब डोकरा किहिस- " ले डोकरी! अब तोर साध पूरा करे के पुरतिन जादा पैसा सकलागे हावे। आज मैहा दुकान ले गुड़ अउ गेंहूँ पिसान बिसाके लानत हंव। तहन बने रांधबे अउ दुनों झन आघात ले चीला ल झड़कबो।"      अतका कहिके डोकरा ह दुकान डहर चलदिस अउ डोकरी ह चूल्हा म आगी बारे के शुरू करिस। संझा के बेरा रहय,  एकेच कनि होइस अउ डोकरा ह दुकान ले समान बिसा के घला ले लानिस।

         डोकरी बने एक मन के आगर चीला रोटी रांधे के शुरू करिस। दुनों झन बने चूल्हा तीर म बइठ के चीला बने के अगोरा करे लगिन। बिसाय समान म लटपट नव ठन चीला बनिस। खाय बर बइठिन तब  चीला के बंटवारा ह बरोबर नइ होवत रहय। अब दुनो झन म झगड़ा मातगे। डोकरा कहय कि मैहा दुकान ले समान लाने हंव। मैंहा पांच चीला खाहुँ  अउ डोकरी कहय कि मैहा आगी के आंच सहे हंव तब मैहा पांच चीला खाहुँ। चार चीला खा के अपन मन बढ़ाय बर कोन्हों तैयार नइ होइन। अइसने- अइसने झगड़ा होवत अधरतिहा होगे फेर दुनों के झगड़ा माढ़बे नइ करिस।

        आखिर म थक हार के डोकरी किहिस- "अइसन म नइ बने डोकरा! चल दुनो झन जीत - हार खेलबो। बाजी लगाबो। हमन दुनो झन चुप्पे मिटका के सुते रहिथन। जउन ह पहली गोठियाही ओहा हार जाही। ओला चार चीला खाना पड़ही अउ जउन पाछु गोठियाय ओहा जीत जाही ओला एक चीला इनाम के उपरहा मिलही अउ ओहा पांच चीला खाही। अब तो ठीक रही न?"

 डोकरा तैयार होंगे।

 अब पांच चीला खाय के लालच म डोकरी - डोकरा मन गोठियाबे नई करय। धीरे - धीरे रतिहा पोहागे। फेर दुनो झन अपन- अपन जिद म अड़े अपन जठना म चुप्पे मिटका के सुते रहय। बेरा उके चढ़गे। बारह बजगे। मंझनिया होगे।

      जब पारा - पड़ोस के मन डोकरी - डोकरा के घर के कपाट ल मंझनिया तक बंद देखिन तब सोचे लगिन, डोकरी -डोकरा मन मरगे तइसे लागथे तभे अतेक बेर ले उठे नइ हे अउ उंखर घर के कपाट खुले नइ हे। अतेक बेर ले तो दुनो झन बने उठ के नहा- धो के अपन काम - बुता म लग जावत रिहिन।

 डोकरी - डोकरा मरगे कहिके गांव भर हल्ला होगे। गाँव के सियान मन सब मिल-जुल के डोकरी -डोकरा के घर के कपाट ल तोड़ के भीतरी म खुसर के देखिन। तब डोकरा - डोकरी मन अपन -अपन जठना म मुर्दा असन पड़े रिहिन।

 गांव वाला मन सोचिन ये दुनिया म इखर,  हमर छोड़ कोन्हों अउ दूसर नइ हे। अब इखर क्रियाकरम हमी मन ल करे बेर पड़ही। ओमन डोकरी-डोकरा बर कफ़न-काठी तैयार करे लगिन। डोकरी-डोकरा मन चुप मिटका के सब ल सुते-सुते देखत रहय फेर पांच ठन चीला खाय के लालच म कहीं गोठियाबे नइ करय।

    गांव वाले मन सब तैयारी करके डोकरी-डोकरा मन ल माटी दे बर श्मशान घाट लेगगे। लकड़ी सकेल के चिता तैयार कर डारिन। अउ डोकरी-डोकरा मन ल ओमें सुता के आगी लगाय के तैयारी करे लगिन।

डोकरी - डोकरा मन सब ल देखके डर्रावत रहय फेर रोटी के लालच म पड़े अपन-अपन जिद म अड़े रहय। जब गांव वाला मन चिता म आगी लगाय बर धरिन तब डोकरा डर के मारे उठ के बैठगे अउ चिचिया के किहिस-"ले डोकरी! मैहा हारगेंव। तैहा जितगेस अब पांच ल तैहा खा ले अउ चार ल मैहा खाहुँ।"

डोकरी- डोकरा ल माटी दे बर गे रिहिस तउन कठियारा मन घला नवेच झन रहय। ओमन डोकरा ल चिता ले उठके बइठत देखिन अउ चार ल खा लेथव कहत सुनिस तब डोकरा- डोकरा ल भूत बन गे हे समझ के डर्रा गिन। ओमन डर के मारे श्मशान घाट ले गिरत-हपटत घर डहर भागगे । डोकरी-डोकरा मन घला चिता ले उठके घर लहुटे लगिन। कठियारा मन जब देखे कि डोकरी-डोकरा मन घला पाछु - पाछु आवत हे तब डर के मारे थर थर कांपत अपन-अपन घर म खुसर के कपाट-बेड़ी ल लगा दिन।

      डोकरी - डोकरा मन गांव चौक म आके गांव वाले मन ला अपन घर के रतिहा के किस्सा ल बतादिन। किस्सा ल सुनके गांव वाले मन के पेट ह हाँसी के मारे फुलगे। ओमन कठ्ठल -कठ्ठल के हांसे लगिन। तब ले हाना बने हे कि जे खाय आंच तै खाय पांच। मोर कहानी पुरगे, दारभात चुरगे।

 वीरेन्द्र सरल

एक कहानी हाना के ... जे खाही आँच ते खाही पाँच

 एक कहानी हाना के ...


          जे खाही आँच ते खाही पाँच 


               तइहा तइहा के बात आय । एक ठिन गाँव म एक झिन कोचिया रिहिस । ओकर पाँच झिन बेटी रिहिस । कोचिया हा कभू धान के कोचियई करय । मौका म गाय बइला के ....... । त थिरथार समे म जगा भुँइया के घला कोचियई अऊ दलाली म लगे रहय । ओकर काम अतेक चोखा अऊ बिस्वसनीय रहय के न केवल गाँव के आम मनखे , बल्कि गौटिंया .. पंच सरपंच .. अऊ तो अऊ तिर तखार के गाँव गँवतरी के छोटे ले बड़का मनखे मन घला ओकर तिर सलाह लेहे बर आवय अऊ कहीं बड़का चीज बेंचे या बिसाये बर कोचिया ला अऊ कुछु बर निही ते कम से कम गवाही धरे के नाम से लेगय । तिर के शहर तको म कोचिया के संबंध बड़े बड़े बैपारी मन संग बनेच रिहिस हे । शहर म कहीं चीज बस बिसाये बर गये , गाँव के कन्हो मनखे के खंगे बढ़े म घला कोचिया के नाव काम आ जाय । कोचिया हा अतेक इमानदार रिहिस अऊ बचन के पक्का रिहिस के जेला बचन दे रहय तेला खत्ता म पूरा करय । फेर बपरा ला काम झरे के पाछू कतको झन चहा तक बर नइ पूछय , तभो ले ओकर मेहनत के सेती .. आर्थिक स्थिति हा डाँवांडोल नइ रहय ।    

               एक बेर के बात आय । कोचिया ला गाँव के एक झिन बड़का किसान हा बइला बिसाये बर दूरिहा के एक ठिन गाँव संग म चले बर केहे किहिस । कोचिया के कामेच काये ...... जेमा दू पइसा मिल जाये । चार पाँच दिन के लइक कपड़ा लत्ता अऊ दसना ओढ़ना धरके किसान संग छकड़ा गाड़ी म मसक दिस । पाँच दिन बाद घर म अगोरा होय लगिस । सांझ ले नइ अइस । रात तक आये के उम्मीद रिहिस । 

               कोचिया ला चीला बहुतेच पसंद रिहिस । दू चार दिन म कहाँचों ले किंदर के आय तब ओकर बर आतेच साठ चीला खत्ता म बनय । लइका मन घला कोचिया कस , चीला बर प्राण ला दे देवय । लइका मन ला ये उमीद रहय के ददा आही तहन , दई ओकर बर चीला बनाही । ददा के अगोरा करत करत अधरतिया होगे । लइका मन के नींद परगे । कोचिया हा , घर म मुँधरहा अमरिस । कोचनिन रात भर कोचिया के अगोरा म जागत रहय । आतेच साठ लालचहा पिया दिस कोचिया ला । कोचनिन हा कोचिया ला किथे – दतवन मुखारी कर लव । बाहिर बट्टा ले निपटके नहा लव । तब तक तुँहर बर चीला बना देथँव । अभू लइकामन सुते हे  .. पेटभरहा खाये बर मिलही । जागत रहिथे ते ओकरे मन ले नइ बाँचय । कोचिया हा बिहिनिया ले चीला खाये बर मना करिस । त कोचनिन किथे - तूमन ला चीला अबड़ पसंद हे कहिके कालीचे नावा धान बिसाये हँव । तुँहर नित्य करम के करत ले चीला तैयार हो जही । खाहू पिहू तहन दिन भर सुत जहू । बने कहत हस कहत कोचिया हा नित्य करम म लगगे । कोचनिन हा चीला बनाये के उदिम म भिड़गे ।  

               बोरा ले धान हेर के जइसे चलनी तिर गिस त कोचनिन देखथे के .. सबले छोटे बेटी हा चलनी तिर सुते रहय । कोचनिन जइसे धान चाले बर सुरू करिस छोटे बेटी के नींद खुलगे । छोटे बेटी पूछथे – ददा आगे का दई ? ओकर बर चीला बनाबे का या ? महूँ ला एक ठिन देबे अईं ...... । कोचनिन हा किथे – अभीच्चे अइस हे बेटी । चीला बनही तहन उचाहूँ या ..... । अभी भिनसरहा हे सुत जा  ......... । छोटे बेटी ला सुता दिस । 

                 धान चलागे । कूटे बर ढेंकी तिर गिस । ढेंकी तिर चौंथा नंबर के बेटी हा सुते रहय । धान ला जइसे कूटना सुरू करिस यहू उठगे । यहू पूछिस – ददा आगे का दई ...... ? चीला बनाबे का या ...... ? महूँ ला एक ठिन देबे अईं ...... । कोचनिन हा यहू ला अभी भिंनसरहा हे कहत चीला दे के आश्वासन देवत सुता दिस । 

                धान कुटागे । फुने अऊ निकियाये बर सूपा तिर गिस । त सूपा तिर सुते तीसर नंबर के बेटी हा उचगे । यहू पूछिस – चीला बनाबे या ...... ददा आगे हे का दई ...... ? महूँ ला देबे ..... । कोचनिन किथे - देहूँ रे रोगही ........ अभी बिहिनिया नइ होहे ...... कलेचुप सुत ....... उहू ला सुता दिस । 

                चऊँर फुनागे । गोंटी निकियागे । पिसान पिसे के बेरा म जाँता तिर सुते दूसर नंबर के बेटी हा उचगे ।  ओहा किथे – चीला बनाबे त महू ला देबे अईं या दई ...... । ददा आ गे ना ..... ? कोचनिन किथे – तूमन ला नींद नइ आय दुखाही हो ....... रात ले जागत रेहेव ....... अऊ बिहिनिया होय निये उच गेव ......... सुत रोगही ...... बनही तहन उचा दुहुँ ...... । यहू ला सुता दिस । 

               पिसान घोरत .. कोचनिन हा चुलहा बारे बर अइस त चुलहा तिर सुते बड़े बेटी उचगे । ओहा पूछिस – ददा कतेक बेर अइस या ....... । उचाते निही रोगही ...... कहीं करन लागतेन ...... । बड़े बेटी हा तुरते आगी ला सिपचा डरिस । तब तक ददा हा नहा धोके पूजा पाठ निपटाके पटका पहिर रंधनी खोली म अमरगे । दई हा सिल लोढ़हा म चिरपोटी पताल के चटनी घँसर डरिस । बड़े बेटी हा गरम गरम चीला बनाके ददा ला पोरसे लगिस । ददा हा चीला खाके अघागे । पाँच ठिन चीला बाँचगे । आधा रात ले जागे के सेती , अऊ लइका मन अतेक नींद म रहय के , हुद कराये म नइ उचिन । बाँचे खोंचे पाँचों चीला हा बड़े बेटी के हिस्सा म अइस । 

                 बेरा चइघिस तहन सुते सबो बेटी मन उचगे अऊ दई ला चीला नइ बचायेस कहिके शिकायत करे लगिस । कोचिया जागत रहय । ओहा अपन बेटी मनला किथे – तूमन घोड़ा बेंचके सूतत रेहेव बेटी । तुँहर दई के कन्हो गलती निये । तूमन ला अबड़ उचइस । कन्हो नइ उचेव । तुँहर नाव ले बने चीला ला बड़े बहिनी हा पा गिस । हमर हिस्सा के चीला ला हमर बर बँचाके नइ राखतेव कहिके छोटे बहिनी मन फटफटाये लगिन । तेकर ले छोटे टूरी हा तो अऊ अबड़ तपय अऊ चुन चुन के लुबुर लुबुर गोठियायव .......... वोहा अपन बड़े बहिनी कोती अंगरी देखावत अपन दई ला कहत रहय – भँइसी हा पाँच ठिन चीला ला अकेल्ला बोज डरिस या ......... वोला एको कनिक शरम नइ लागिस होही ......। लइका मन के फटफटई ला देखके ददा किथे – वोमे काके शरम बेटी ........ तूमन न काम करेव न धाम । जे मेहनत करिस ....... जे आगी म तपिस ते पइस .......... जे खइस आँच ते खइस पाँच ........ । मेहनत करइया हाथ ला मिलत खाये बर अन्न के दाना हा कोचिया के इही बात ला अभू भी सार्थक करत हे अऊ आगू भी करत रइहि ...... ।


                                 हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

छत्तीसगढ़ी कहानी गोटानी वाले बबा

 छत्तीसगढ़ी कहानी


         गोटानी वाले बबा 

शहर के जगमगावत बिजली ऊच ऊच महल घर गाड़ी घोड़ा आटो रिक्शा के कान फोड़वा आवाज़ से चार कोस दुरिहा म बसे पिपरहा गांव जीहां हरियर हरियर रुख राई बर पीपर के छाव चिरई चिरगुन गुरतुर आवाज तरिया पार के छलकत पानी के धार मुश्किल से पांच कोरी के आबादी ऊहा खपरा के छानी अवु माटी के भीथिया के घर चिमनी के अंजोर माटी के चूल्हा परछी म जाता ढेकी बाहना के छितका कुरिया टीमीर टिमीर करत दिया के अंजोर म गोरसी तापत पुस के जाड़ म

एक झन बबा बईथे राहय गाल म झुर्री माथा म सिकुड़न आंखी म धुंधला पन उमर करीब साढ़े तीन कोरी बछर ले उपर होगे रहिस उमर के हिसाब ले सहारा बर तीन फुट के गोटानी गांव भर के लोगन प्यार से गोटानी वाले बबा काहय गोटानी वाले बबा गांव के लोगन के दुख सुख हमेशा साथी रहीस

बबा गांव भर के आदमी के हालचाल पुछय गांव म कोनो ल जर बुखार आवय गाय गरुवा बीमार परय  त बबा 

देशी जड़ी बुटी म ठीक कर दय  बबा के सेवा भाव ल देख के गांव आऊ  आस पास के गांव के लोगन बुला लेगय फेर ओ पीपरहा गांव म कोनो पढ़े लिखे नही रहीस जेकर पीरा बबा 

ला होवय एक दिन बबा पीपर छाव म उदास बैठे राहय खेत कोती ल मंगलू ह बैला ल धरके आवत राहय मंगलू के नजर बबा उपर पड़ जा थे तीर मा जाके मंगलू पूछथे  कैसे बबा आज मुरझुराये कस उदास बैठे हच बबा कहीथे का बतावव मंगलू तुहर मनके जिंदगी हकर हकर खेती किसानी के कमई म बितत हावय हमर गांव के लइका मन के जिंदगी कैसे सुधरही 

मंगलू अकबकागे में बबा एकर रस्ता तहि बता बबा गोटानी ल धरके बबा गुड़ी म जाके बैठ जाथे गांव के सब लोगन ल लइका मन के पढ़ई के बारे म  बताथे फेर गांव म स्कूल नहीं हे बबा कैसे करबो बबा कही थे चिंता मत करव परोसी गांव म स्कूल हे कल सब झन अपन अपन लईका ल मोर संग मा

भेजिहव सब गोटानी वाले बबा के बात सब मान ले थे बबा दुसर दिन गांव के सब लइका ला परोसी गांव के स्कूल मा दाखिला करा दे थे आज बबा के प्रेरणा से पढ़े लइका मन कतको साहब सूबा बनके अपन सुख के जिंदगी जियत हे धन्य हे ओ गोटानी वाले बबा ईही मा हमर विकास हे पढ़ई के रस्ता ही हमर ज़िंदगी म अंजोर ला सकथे आज न ओ गोटानी वाले बबा न पीपर के छांव

सुरता सियान मन के अमर हे l

दार भात चूर  गय मोर किस्सा पुर गय l


मोहन लाल निर्दोष

८३१९५८९३२५