Friday, 25 April 2025

तइहा अउ आज के खवई पियई (खान-पान)*

 *तइहा अउ आज के खवई पियई (खान-पान)*





तइहा के बेरा मा खाए पिए ले लेके... हर जिनिस हा जादातर पारम्परिक अउ देशी ही जादा रहय।

जइसे हमर छत्तीसगढ़ मा पहिली के बेरा मा... बिहनिया के नास्ता माने.... चटनी बासी ,अंगाकर रोटी ,चीला रोटी,पान रोटी,पातर रोटी,फरा अउ मुठिया रोटी रहय...जेहर बड़ स्वादिष्ट भी रहिथे .... अंगाकर रोटी अउ पताल चटनी अउ बासी अउ पताल चटनी के स्वाद के तो का पूछना?....बड़ मिठाथे...भई....अउ कभू-कभू  बिहने फजर कोनो पेज अउ महेरी बन जाय ते ... तो का पुछना?... बड़ मजा आ जावय....अउ तेलहा रोटी पीठा...पहिली कोनो पारम्परिक बड़े तिहार जइसे... हरेली,तीजा-

पोरा,देवारी ,फागुन तिहार अउ बर-बिहाव के बेरा मा ही चुरय....अउ खाय बर मिलय.....अउ इही सब तिहार बार मा हमर छत्तीसगढ़ी व्यंजन खुरमी,ठेठरी,गुझिया,अरसा,करी लाड़ू,गुलगुला भजिया‌ अउ आने-आने कइ किसम के छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनावय जेनला लोगन अउ लइका पिचका मन तिहार माने के हफ्ता पंदरही दिन बाद तक घलो स्वाद ले लेके जमावत रहयं.....काबर ओ पहिंत...अभी असन...जादा खई-खजाना घलो नइ मिलय...?अउ कोनों गांव-गंवतरी नइते..बेटी माई... घर जावय तभो इही सब छत्तीसगढ़ी व्यंजन ला धर के जोरन जोर के जावयं.....तइहा के बेरा मा राँधे-गढ़े बर तेल के उपयोग घलो बहुत कम मात्रा मा ही करयं कहिथें.... साग भाजी ला तो माटी के कलौंजी मा बिना तेल के डबका... भुंज-बघार अउ रांध-गढ़ डरयं...कहिथें... अउ बड़ मिठावय घलो कहिथें भई...जेन  स्वास्थ्यगत दृष्टिकोण ले बड़ लाभकारी घलो रहय कहिथें....अउ आज तो अधिकतर लोगन मन आयतामाल के आदि होवत जावत हन.... नाश्ता ते नाश्ता....खाना घलो बंद पाकिट मा मिले ला धर लेहे अउ वहु... आनलाईन घर पहुंच...अउ  अभी के बेरा मा तो सबे गांव के चउंक-चौराहा मा होटल घलो खुल गे हावय.....जिहां रोज दिन भर ...तेलहा रोटी पीठा...बरा, भजिया ,आलूगुंडा अउ समोसा आने हा चुरते रहिथे ....जेन तेलहा -फूलहा रोटी ला मनखे मन पहिली विशेष तिहार-बार मा खावयं तेन ला...आज लोगन मन रोज बिहने ले जमा डरत हें.... अउ कोनो‌ दू चार दिन बर बाहिर डाहर घुमे-फिरे ला जाय रहिबे ता तो बाते....छोंड़ दव... निमगा तेलहा फूलहा अउ मसलहच खवई चलथे... ता कहां ले आज के मनखे स्वस्थ्य रही....? तबियत तो बिगड़बेच करही ना।

अउ एक बात आज के लइका मन के रूचि विदेशी व्यंजन पिज्जा,बर्गर,मैगी,चाऊमिन, पास्ता, मोमोज ,चिप्स, चाकलेट अउ आने आने किसम- किसम के अनगढ़न बिदेशी खान-पान डाहर जादा बाढ़त जावत हे....अउ बड़ चाव के सांथ खाथे घलो..... भई....जेन  ला बइद - गुनिया,सुजानिक अउ स्वास्थ्य के जानकार मनखे मन स्वास्थ्यगत दृष्टिकोण ले बड़ नुकसान दायक घलो बताथें....आज इही सब अनगढ़न खान-पान के कारण कतको लइका मन बचपना मा ही कई ठन बीमारी के घेरा मा आ जावत हे....मतलब बने चिभिक लगाके सोंचबे मंथन करबे ता तइहा अउ आज के खान-पान मा जमीन आसमान के अंतर आगे हावय तइसे घलो लागथे...जेन अवइया पीढ़ी मन बर बड़ हानिकारक अउ नुकसानदायक घलो हावय लगथे....तइहा के बेरा के एक ठन अउ सुग्घर बात...सियान‌ मन के बताय गोठ सुरता आथे....पहिली के मनखे मन कुछ तेल जइसे अरसी ,सरसों अउ कुछ आने तिलहन के तेल ला तो अपने उपजाय अउ पेराय तेल ला ही उपयोग करयं....अइसने चांउर-दार ले लेके...साग-भाजी, बेसन,गहूं पिसान,कनकी,चांउर पिसान,आमा ,लिम्बु, अथान चटनी,आमा खुला ला घलो घरे के उपजाय पेवर जिनिस मन ला ही खाय बर उपयोग करयं....अउ एक ठन बने बात.…ओ पहिंत चना भाजी,लाखड़ी भाजी,गोभी भाजी अउ कई ठन प्रकार के भाजी ला सुखो के रखयं...जेनला सुक्सा भाजी कहे जाथे....जेकर सुवाद के का कहना?अइसने सेमी,भांटा , कांदा अउ आने साग भाजी ला सुखो के रखय जेनला खुला अउ खोइला कहिथे...एकरो सुवाद के कोई सानी नइहे...बड़ मिठाथे....अइसने  अदौरी ,रखिया,पोंगा ,बिजौरी सहित कई  किसम के बरी घलो बनावयं...एकरो अलगे स्वाद रहिथे….अउ अइसने पताल,कायत अउ अमारी फूल ला सुखो के ओकर बुकनी बनाके घलो रखयं...जेकर स्वाद अंगरी मा चांट के खाए मा जादा आथे...ए सब के उपज जादातर जड़कला के मौसम मा होथे ते पाय के इही बेरा इन ला घाम मा सुखो के जतन के रखथें अउ बरसात के दिन मा जब साग-भाजी के‌ कमी रहिथे तेन समे मा उपयोग करथें ....अउ अइसने दलहन चना, मसूर अउ राहेर आदि ला घलो सुरक्षित रखयं.....अउ मसूर के टाहरी अउ राहेर के घुघरी घलो बड़ गजब मिठाथे...वो पहिंत साग भाजी तो अधिकतर घर के बारी -बखरीच मा निकल जावय....वइसने घरो घर पहिली गाय -भंइसी घलो पाले पोंसे...ता दूध,दही अउ घींव घलो बिल्कुल पेवर अउ देशी घरो घर मिल जावय...अब कहां अइसन पाहू?

पहिली के ढेंकी अउ धनकुट्टी मा कुटाय चाउंर के भात-बासी अउ पेज-पसिया भी बड़ स्वादिष्ट रहय...बड़ मिठावय अउ आज तो सब राईस मिल मा एक्के घांव मा कतरो अकन ला कुटवा लेत हें भले ओला दवई डार के रखहीं... ता चाउंर के कतरो विटामिन हा अइसने... अउ जादा साफ -सफई के चक्कर मा घंसा के निकल जाथे कहिथें...काबर आज काल के लोगन मन ला सब आयता माल चाही... कोनो एक्कन निमारना-फूनना नइ चाहे...निकाल अउ सोज्झे ओइर वाले हिसाब-किताब के चलन होगे हावय....अउ एक ठन जमगरहा बात ये हे के अभी के बेरा मा कोनो भी साग-भाजी ,दलहन, तिलहन अउ धान के फसल हा बिना कीटनाशक दवा अउ रसायनिक खातू कचरा के नइ होवत हे?...सबे किसान मन उपज बढ़ा के ...आर्थिक रूप ले सजोर होय खातिर कीटनाशक दवई अउ रसायनिक खातू कचरा के बम्फाड़ उपयोग करत हें.... स्वास्थ्य बर कतका नुकसान दायक हे?तेला सबे जानत हें फेर ये बात ला सब जानसुन के तिरिया देत हावयं.... जेन संभवतः वर्तमान अउ अवइया पीढ़ी के विनास के सबले बड़का कारण भी हो सकत हे.. 

*मादक पेय....* पिए के जिनिस मा पहिली बिहने के बेरा के चाय भर ला जानन ...वहु कभू-कभू अउ कोनो सगा सोदर आ जावय‌ ता ..... अउ गरमी दिन मा लिम्बु पानी, पदीना पानी,बेल के शरबत अउ मही दही....अउ अब तो चाय के कोनों गिनती नइ हे... कतको मन तो दिन भर मा कइ कप ढोंक डरत हें.....अउ आज काल के लइका मन तो झार... ठंढा... कोल्डड्रिंक मा मोहाय हे.....ठंढा तो अब ठंढच रहिगे.... अब तो अधिकतर लोगन मन... एक ठन अइसन मादक पेय के फांदा मा फंसत जावत हे...जेनहा लगत हे के कुछे दिन मा धीरे-धीरे हमर युवा पीढ़ी ला खा जाही....वो हरय दारू मंद ....हां आज अधिकतर युवा पीढ़ी दारू के कई ठन किसम के नशापान मा मोहावत जावत हावय....संझा बिहने चाय के जघा ला अब दारू हा ले डारे हावय....पहिली के बेरा मा दूसर देश के मनखे मन हा एकर उपयोग दिन भर महिनत करे के बाद संझा के बेरा थकान मिटाय बर करयं कहय... कहिके सुनन.... फेर अब तो हमरो देश मा....संझा के बेरा चढ़ात हें ता... बिहनिया बेरा...उतारा के चलन शुरू हो गे हावय...कतको के घर परिवार इही चक्कर मा बर्बाद होवत जावत हे....धन संपत्ति तो सिराबेच करत हें...जवानी मा कतरो लोगन मन के जान घलो चले जावत हें....कइ ठन अलहन दुर्घटना घलो घट जावत हे..इही चक्कर मा कहव...चाहे एकर दुष्परिणाम कहव.…आज कतको बेटी बहिनी मन बहुते कम उमर मा खाली हांथ ता.... कतकोन लइका मन ननपन मा अनाथ हो जावत हें.... कतकोन परिवार हा इही दारू मन के चक्कर मा बिखर जावत हे... छिहीं-बिहीं हो जावत हे....आज हमर देश के युवा पीढ़ी... आज इही मादक पेय के फांदा मा फंसत जावत हे...*युवा पीढ़ी माने देश के रीढ़ के हड्डी...देश के पावर बैंक......हो सकत हे ये गोरख धंधा ले जुड़े लोगन मन ला जमगरहा आर्थिक लाभ होत होही.....फेर नुकसान..... सीधा-सीधा हमर पावर बैंक के होत हे ...पावर बैंक माने हमर युवा पीढ़ी ....आज अइसन गोरख धंधा ले कोनों कतको कमा डरय फेर..... जतका युवा पीढ़ी कमाही....युवा पीढ़ी के कमई ले.... हमर देश जतना सजोर होही... वतना कोनों के कमई ले नइ हो सकय ?....युवा पीढ़ी के कमई ले ही देश आर्थिक रूप ले सजोर होही....* बड़ चिंतन के विषय हे के आज इही सब अनगढ़न खवई - पियई के चक्कर मा *हमर पावर बैंक अर्थात युवा पीढ़ी* धीरे-धीरे कई‌ किसम के अनगढ़न खान-पान के फांदा मा फंसत जावत हे....जेन ला जतना जल्दी हो सकय रोकना... हम सब के बड़का कर्तब्य अउ जिम्मेदारी हे...अउ एकर खातिर हम सब‌ला जुरमिल के कुछ ना कुछ जमगरहा कदम तो उठायेच ला परही...तभे हमन अपन देश के भविष्य ला जतन के रख सकत हन....।

अमृत दास साहू 

ग्राम -कलकसा, डोंगरगढ़ 

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

कहानी -करम के फल*

 *कहानी -करम के फल*


*कर्मण्ये वा धिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।*

*मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोअस्त्व कर्मणि।।*


           भगवान श्रीकृष्ण हा गीता मा कहे हे। कि,!!! हे मनुष्य प्रानी ला अपन करम करना चाही अउ फल के इच्छा ला परमात्मा ऊपर छोड़ देना चाही, मतलब करम करना भर मनखे के वश के बात आय अउ फल देना नइ देना भगवान के इच्छा ऊपर निर्भर हे। तब तो हम इहू केहे सकत हन कि, हमर करम अच्छा होही ता खच्चित ही ओखर फल घलो अच्छा होही, मीठा होही। न्यूटन के गति के नियम घलो ये सिद्ध करथे, क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया बल, मतलब जइसन हमर काम, ओतकेच मिलही दाम। हम कर्म करे के पहिली अच्छा फल के आस करबो, ता करम के रस्ता में कतकोन प्रकार के बिधन आ सकत हे, तभे भगवान हा फल के आसक्ति ले बाँचे बर बरजे हे,ताकि हमर मन दुच्छा करम भर में लगे राहय, चाहे ओखर परिणाम काँही आवय।


            करम करैया घलो तीन प्रकार के होथे, एक तो सोंचथे भर...... करय काँही नही। दूसर सोंचथे अउ कुछ करथे...... फेर थोरिक विपत्ति आथे ताहन वो काम ला अधूरा छोड़ देथे, विपत्ति देख घबरा जथे, दुबारा वो काम ला छूए के प्रयास घलो नइ करय अउ तीसर मनखे कर्मठ होथे........ जउन जइसन सोंचथे वो वइसनेहे कर बताथे, ओखर रस्ता में कतको काँटा आथे, कतको बाधा आथे, असफलता हाथ लगथे, फेर वोहा असफलता ला कोन्हो गलती मान के दूसरैया सुधारे के उदीम करथे, अवैया मुश्किल ला टार के अपन सोंचे लक्ष्य ला पूरा कर लेथें-----आवव मैं इही सन्दर्भ में तुँहला एक ठन कहानी सुनावत हँव!!!!


                एक राजा के राज में डंचगहा अउ डंचगहीन रहिथे। एक दिन सँझा बेरा उही नगर मा अपन नाच देखाय खातिर अपन नान्हे लइका अउ बाजा रुंजी मन ला धरे मंडप ला गड़ियावत रिहिस, देखैया अउ अवैया जवैया मनखे मन काहय, कि भैया तैं इहाँ काय करत हस, सब नाचा ला देख लिंही अउ अपन अपन घर कोती मसक दिही, तँय चुचवावत रहि जबे, काबर कि इहाँ के राजा के आज्ञा हे, ना दान देवय ना दान देवन दय, जेन ओखर आज्ञा के उलंघन करही तेला राजा दंड दिये जाही। डंचगहा कखरो बात मा ध्यान नइ दिस अउ कहिथे अब परिणाम काँही मिलय, मोला तो बस मोर काम ला करना हे।


          मंडप तइयार होगे, नाचा गाना चालू होगे, नाचा देखे बर भीड़ घलो बने जुरियागे, डंचगहा बाजा बजावत राहय अउ डंचगहीन सँजे सँवरे गोड़ मा घुंघरू बाँधे, ताल मा ताल मिलावत गावत राहय अउ ठुमकत राहय। पूस के महीना, कड़कड़ावत जाड़, बाँही ला चपके लोग बाग नाचा के मजा लेवत रिहिन हे। नाच बड़ा मनभावन लागत रिहिस हे, तेखर सेती कटकट ले भीड़ घलो सकलाय रहय।


            एती रात जतके गहीर होय, डंचगहीन के मन अधीर होय।

नाचत-नाचत मुँधरहा होगे रात थोरकिन बाँचे रिहिस, गीत अउ नाच के मधुरता में कोनो ठउर ले नइ टरत रिहिन - फेर काय करबे राजदंड के भय मा कोन्हो धेला के चढ़ावा नइ दिस।रात भर के नचई मा डंचगहीन थक के कोंघर गे राहय तब उदास होके अपन डंचगहा ला आरो देवत ए गीत मा कहिथे----------

*नाचत गावत रात पहागे, थकगे जोंड़ी जाँगर।*

*कहे डंचगहीन सुनव मयारू, धीर बजा अब माँदर*


अतका बात सुनके धीरज बँधावत डंचगहा कहिथे------


*जादा बीतगे थोरकिन बाँचिस, अब थोड़ा हर जाय*

*डंचगहा कहिथे मोर पिरोहिल, भंग ताल में झन आय*


डंचगहा कहिथे कि ए मोर सँगवारी----सरी रात गुजरगे, रात पहाती आगे, अब बिहान होय बर थोरिक बेरा बाँचे हे, तब जउन बाँचे हे तेला काबर गँवाबो, नाचा जइसन चलत हे तइसने चलन दे, हमर ताल में भंग नइ परना चाही।


           दूनो के वार्तालाप ला सुनके एक महात्मा के हृदय परिवर्तन होगे अउ वोहा अपन देह मा लपेटे कम्बल ला भेंट कर देथे, महात्मा ला दान देवत देख के तीर मा बइठे राजा के बेटा हा हीरा जवाहरात ले जड़ें अपन कोट ला डंचगहा ला दे देथे, उही भीड़ मा बइठे राजा के बेटी घलो काबर पीछू रहितिस भला, अपन सोना के कंगन,मोटरा मा बाँधे कीमती साड़ीं अउ सिंगार के सामान ला भेंट कर देथे। महात्मा, राजा के बेटा अउ बेटी ला भेंट करत देखके,बाँचे दर्शक मन घलो यथा शक्ति भेंट चढ़ाथे, काबर कि ए जग के रीत हे, जउन काम बड़े लोगन मन करथे तब उन ला देख के छोटे मन घलो उही रस्ता ला अपनाथे। डंचगहा अउ डंचगहीन कभू जिनगी मा अतका धन नइ कमाय रिहिस अउ ना सपना में सोंचे रिहिस कि हम ला कभू अतेक जादा धन मिल पाही। आज उन ला ओखर करम के मीठ फल मिले रिहिस।


         एती राजा हा दान के बात ला सुनके क्रोधित हो जथे अउ महात्मा, अपन बेटा अउ बेटी ला दरबार में हाजिर होय के आज्ञा देथे, काबर कि राजाज्ञा के उलंघन होय रिहिस हे-- राजा सबले पहिली महात्मा ला पूँछथे,काबर कि दान करे के शुरुआत महात्मा करे रिहिस -- कस महराज तँय जानत हस हमर राज में कोनो ला दान दक्षिणा देना वर्जित हे, सख्त प्रतिबंध हे, तिल तिल करके हम प्रजा ला सुखी राखे बर धन सकेले हन तेला तुमन नाच गाना में दान कर देव, ए हर तो धन अउ राजाज्ञा दूनो के अपमान हरै। अब आप ला का सजा दे जाय।

तब महात्मा कहिथे - गलती माफ करव सरकार, गलती तो होय हे, फेर मै ओखर ले बड़ें गलती करे बर जात रेहे हँव अब मोला फाँसी में चढ़ा दिहव तभो कोनो दुख नइहे। राजा किहिस बने फरिहा के बता, महात्मा कहिथे - का करव राजाजी, मोर जिनगी के तीन पन अइसने साधू बने फक्कड़ पन मा बीतगे, अब चौथापन के चिंता हर तन ला घुना सही खात रिहिस हे, सोंचत रेहेंव कहूँ बिहाँव रचा लेतेंव, सियान होगे हँव कोनो कानी खोरी आ जतिस ता मोर सेवा सटका बजातिस अउ ए बुढ़ापा बइरी आसानी ले कट जतिस फेर वो डंचगहा के कहे एक ठन बात मोर विचार ला बदल दिस।

*जादा बीतगे थोरकिन बाँचिस, अब थोड़ा हर जाय।*

*डंचगहा कहिथे मोर पिरोहिल, भंग ताल में झन आय।।*


तब मैं सोंचेव सरी उमर तो पहवा डरेंव, आज मरहूँ ते काली, जिनगी के कोनो ठिकाना नइहे, तब काबर अपन चोला में दाग लगाहूँ, चौथा पन ला घलो भगवान के भक्ति मा अकेल्ला पहवाहूँ - मोर जिनगी के ताल मा भंग नइ आना चाही, इही बात मोर मन ला बदल दिस, डंचगहा हा मोर गुरु बनगे, मैं तो रमता जोगी बहता पानी, फक्कड़ साधू सन्यासी, मोर करा कमंडल अउ कम्बल के छोड़ काँही नइ रिहिस तेखर सेती मैं अपन कंबल ला दान कर देंव।


        महात्मा के बात ला सुनके राजा हा अपन बेटा ला पूँछथे - कइसे बेटा तैं मोर बेटा होके मोर आदेश के उलंघण काबर करे होबे,तब ओखर बेटा कहिथे - पिताजी मैं ए राज्य के युवराज आँव, पढें लिखे हँव, जवान हँव, एती वोती जतर कतर खाली गिंजरत रहिथँव। आप बुजुर्ग होय के बाद भी अभी तक राजपाट में कुंडली मारे बइठे हव, मैं सोंचे रेहेंव पिताजी ला जहर महूरा देके मार डरहूँ अउ मैं राजा बन जाहूँ - फेर डंचगहा के उही बात - 

*जादा बीतगे थोरकिन बाँचिस, अब थोड़ा हर जाय।*

*डंचगहा कहिथे मोर पिरोहिल, भंग ताल में झन आय।।*

उनखर रहस्य अउ ज्ञान भरे बात मोला अइसन करे ले रोक लिस, मैं सोंचेंव पिताजी अब सियान होगे, आज नही ते काली मोला राजा बनना च हे कहिके मैं अपन कुटिल विचार ला त्याग देंव।


         अब ओसरी राजा के बेटी के रिहिस हे - बेटी कहिथे कि पिताजी मैं जवान होगे हँव, कहिथे जेखर बेटी जवान हो जथे - ओखर दिन के चैन अउ रात के नींद हराम हो जथे ओखर दाई ददा ला भूख-प्यास नइ जनावय, पर आप तो अपन राजपाट के धुन मा बिधून हाबव, तेखरे सेती मैं अउ मंत्री के बेटा उड़हरिया भगैया रेहेन - लेकिन मोला ए डंचगहा अउ डंचगहीन के प्रेरणा भरे गीत मोर मन मस्तिष्क ला झकझोर दिस मोर बढ़ें हुए कदम ला खींच लेंव, मैं सोंचेंव पिताजी के तीन पन बीतगे, चौथा पन में काबर ओखर इज्जत में दाग लगाहूँ, काबर दुख पहुँचा हूँ कहिके अपन विचार ला बदल देंव, डंचगहा मोर गुरु बनगे, तेखर सेती मैं अपन हाथ के कंगन अउ साड़ीं ला भेंट कर देंव।


         राजा ला तीनों के बात जँचगे, सत्ता के मद में अपन कर्तव्य मा होय भूल के घोर पश्चाताप करत साधू ले क्षमा प्रार्थना करत कहिथे महराज मैं राजमद मा अंधरा होगे रेहेंव आप सब झन मोर आँखी ला जग जग ले उघार देंव, आज सन्यास लेके अवस्था में घलो मैं राज करत अपन कर्तव्य ला भूलागे रेहेंव - आप जइसन महात्मा ला भविष्य के चिंता खावत रिहिस हे तब ये मोर शासन बेवस्था के दोष हरै जउन एक साधू सन्यासी मन के हियाव नइ कर सकेंव। आज ले आप हमर राज अतिथि बनके रइहव,राज काज में सलाह दिहव अउ आपके उचित सम्मान होही।


          राजा हा तुरते पंडित बलवाके राज्यभिषेक के मुहरत निकलवाथे अउ अपन बेटा ला राजपाट सौंप देथे अउ अपन बेटी के बिहाव मंत्री के बेटा संग सम्पन्न करवाथे।तेखर पाछू वो डंचगहा अउ डंचगहीन ला बलाके उचित सम्मान करिस।जेखर प्रेरणा भरे गीत हा आज सबके आँखी ला खोल दिस।


भगवान केहे घलो हे - 

*योगस्थ कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।*

*सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।*


हे!!!अर्जुन जय पराजय, लाभ हानि के आसक्ति ला छोड़के मनखे ला करम करना चाही अउ अपन करम ला भगवान ला अर्पित कर देना चाही।


दार भात चुरगे, मोर किस्सा पुरगे🙏🙏🙏

छत्तीसगढ़ी रंग नाटक* (हिंदी आलेख)

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                *छत्तीसगढ़ी रंग नाटक*

                      (हिंदी आलेख)



          यहां मैं दो अति विशिष्ट नाटकों का जिक्र करना चाहूंगा । उनमें प्रथम है डॉक्टर नंदकिशोर तिवारी द्वारा लिखित और डॉक्टर योगेंद्र चौबे द्वारा निर्देशित,और रँगदल ' गुड़ी  'द्वारा प्रदर्शित नाटक - रानी दई (रानी दई डभरा के ) 



              नारी विमर्श के चरमोत्कर्ष को अपने आप में सहेजे इस नाटक की कथावस्तु ,नारी के ह्रदयऔर प्राण दान, और पुरुष के द्वारा उसे भोगवादी एक वस्तु (कमोडिटी) माने जाने के बीच संघर्ष की  कथा है । अत्यंत संक्षिप्त में कथा सूत्र के रूप में कहा जा सकता है- डभरा रियासत का जमीदार या राजा, अपने संबलपुर प्रवास के दौरान वहां किसी रूप लावण्यवती तरुणी के साथ संबंध स्थापित कर लेता है ।और अपना काम समेट कर वापसी के समय उसे 'भोग्या' मानकर वहीं छोड़ देना चाहता है । पर वह साथ चलने के लिये अड़ जाती है । राजा कुटिलता के साथ उसे लाते हुए बीच रास्ते में  तलवार से गर्दन काटकर उसकी हत्या कर देता है। किंतु वापसी में अपराध बोध या (?)से उसकी दस्तक- धमक हर जगह सुनाई देती है ।और उसे वह दिखती भी है। सचमुच में देवी के रूप में उसका डभरा में आगमन हो चुका था । मगर उसने किसी भी प्रकार का प्रतिशोध नहीं लिया ।उसकी बस एक ही सोच थी कि मैं जिसको अपना कह चुकी हूं । वह मेरा है। भले ही उसने मुझे इसके बदले मौत दिया पर  वह मेरा अपना है ।और उसका प्रत्येक अपना भी मेरा अपना है। 


            और वह माता आज आराध्या होकर डभरा में जाग्रत देवी के रूप में विराजमान हैं ।उसका संकल्प वही है...  तुम मेरे अपने हो ।तुम्हारा हर चीज मेरा अपना है। ना केवल आज बल्कि आने वाले सभी समय में  भी । जहां जो व्यक्ति  इस धरा को स्पर्श करेगा ,वह मेरा अपना अपमान है । इस घटना को लेखक द्वारा अत्यंत सरलता के साथ दृश्यों में उसे उकेरा है । उसे तो  गुड़ी के द्वारा मंचित और डॉ योगेंद्र चौबे द्वारा निर्देशित इस नाटक को प्रत्यक्ष  देख कर ही अनुभव किया जा सकता है।




               ' रानी दई डभरा के '  एक सम्पूर्ण नाटक है।इसमें नाटक के सभी तत्व मौजूद हैं



1.कथावस्तु-

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  नाटक में तीन प्रकार की कथाओं का उल्लेख किया जाता है –


१ प्रख्यात


२ उत्पाद्य


३ मिश्र प्रख्यात कथा



       इस विश्लेषण में यह उत्पाद्य होते हुए भी ' मिश्र- प्रख्यात ' कथानक है।जनश्रुति और किवदंती को सहारा लेकर लेखक की कल्पना का  भी योगदान है।



             इन कथा आधारों के बाद इस नाटक में  'मुख्य' तथा 'गौण ' अथवा 'प्रासंगिक '  भी मौजूद है, जो मुख्य कथानक को अभिसिंचित करते हुए चलता है  ।  इसमें  प्रासंगिक के भी आगे 'पताका ' और 'प्रकरी ' भी  हैं । है। इसके अतिरिक्त नाटक की कथा के विकास हेतु कार्य व्यापार की पांच अवस्थाएं -प्रारंभ ,प्रयत्न , प्रत्याशा, नियताप्ति और कलागम  सभी मौजूद है।



             इसके अतिरिक्त इस नाटक में पांच संधियों  को भी चिन्हित किया जा सकता है।



2.पात्र और चरित्र चित्रण

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        ' रानी दई डभरा के ' एक नायिका प्रधान नाटक है । प्रतिनायक या खलनायक की जगह  पारंपरिक जमीदार है जिसके समक्ष स्त्री -वीर भोग्या वसुंधरा  की तर्ज पर वसुंधरा ही बन कर खड़ी है , जिसे जो चाहे अपनी बाजूओं के बल पर भोग ले ।



 नाटक में पताका और प्रकरी के प्रचलन के लिए बहुत सारे पात्र आते- जाते रहते हैं ।पर राजा के बेटे के रूप में एक सह नायक भी उपस्थित होता है  जिसके ह्रदय में नारी के प्रति श्रद्धा का प्रथम अंकुरण होता है । क्योंकि वह उसके वात्सल्य से अभिभूत है ।पात्रों का संयोजन अत्यधिक समीचीन है   जिसे योग्य निर्देशक ने अपनी कल्पना प्रवणता के बल पर थोड़ा मोड़ा फेरबदल  भी कर लिया है ।



3.संवाद

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              इस  नाटक के  संवाद सरल , सुबोध , स्वभाविक तथा पात्रअनुकूल छत्तीसगढ़ी में हैं जिसमें मिट्टी की सुगंध आप आसानी से पकड़ सकते हैं ।नीरसता के निरावरण तथा पात्रों की मनोभावों  को व्यक्त करने के लिए   स्वगत कथन तथा गीतों की योजना भी है।



4.देशकाल और वातावरण-

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          देशकाल वातावरण के चित्रण में नाटककार युग अनुरूप  चित्रण करने मे  विशेष सतर्क  रहा है। पश्चिमी नाटक के देशकाल के संकलनत्रय- समय, स्थान और कार्य की कुशलता  के बीज भी यहाँ उपस्थित है।



         इस नाटक में स्वाभाविकता , औचित्य तथा सजीवता की प्रतिष्ठा के लिए देशकाल वातावरण का उचित ध्यान रखा गया है।  पात्रों की वेशभूषा, तत्कालिक धार्मिक , राजनीतिक , सामाजिक परिस्थितियों  के अनुरूप है।



            पर एक दृश्य में नायिका का दोहरा गेटअप- सधवा और विधवा स्त्री का अद्भुत आकर्षण की उत्पत्ति करता है । वह विधवा की तरह श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं ,जबकि सधवा की तरह मांग में सिंदूर है ।इस प्रकार निर्देशक और लेखक की आत्मा  का एकालाप होते हुए  अद्भुत फंतासी की रचना हो जाती है और नाटक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है ।



5. भाषा -शैली

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नाटक  'रानी दई डभरा के ' की  भाषा शैली सरल , स्पष्ट और सुबोध  है । जिससे नाटक में  विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न होता है। बोलचाल की छत्तीसगढ़ी में रची गयी इस नाटक से प्रेक्षक सहजता से जुड़ जाते हैं।



6. उद्देश्य 

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यह नाटक नारी विमर्श को केंद्र में रख कर प्रस्तुत होता है। पुरुष पहले स्त्री को उपभोग की सामग्री मानकर उसका उपभोग करता है। यहां तक कि उसकी हत्या भी कर देता है ।और कालांतर में, उसी को देवी मानकर  उसकी आराधना भी करता है । पुरुष के इस दोहरे और दोगले चरित्र को यह नाटक बखूबी उजागर करता है । ना केवल छत्तीसगढ़ अभी तो भारत के कई भूभाग पर ऐसे मिलते -जुलते वृतांत वाले कई किस्से मिल जाते हैं । जिसमें पहले पुरुष अनाचार, दुराचार ,अत्याचार सब करता है। बाद में आराध्या बनाकर  उसका उपासक बन जाता है ।आज नारी सशक्तिकरण के इस युग में किसी नारी के प्रति ऐसे अत्याचार की पुनः पड़ताल की जा रही है । और नाटककार  का यही प्रतिपाद्य विषय वस्तु भी है । नारी विमर्श को प्रस्तुत करना नाटककार का मूल उद्देश्य  है ।



7. मंच-ध्वनि-प्रकाश-अभिनेता

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           निर्देशक डॉ योगेंद्र चौबे  रूप , आकार , दृश्यों की सजावट और उसके उचित संतुलन , परिधान , व्यवस्था , प्रकाश व्यवस्था आदि का पूरा ध्यान रखते हुए इसे आधुनिकता से लबरेज रखते हैं।  लेखक की  भी दृष्टि रंगशाला के विधि – विधानों की ओर विशेष रुप से  है। इन सब में  इस नाटक की सफलता निहित है।



            ऐसे ही 'पहटिया '  भी पूर्ण सिद्ध नाटक है।भूमकाल आंदोलन -गुण्डाधुर को जिस सहजता के साथ मंच पर उतारा जाता है वह डॉ0 योगेंद्र चौबे की व्यक्तिगत उपलब्धि है । मिर्जा मसूद के रेडियो रूपक को इसमें उन्होंने अपनी कथा का आधार बनाया है ।और एक नवीन नाटक की रचना की है । 'पहटिया ' के बहाने समग्र छत्तीसगढ़ के  प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन का एक सशक्त बानगी हम मंच पर देख लेते हैं ।यह डॉक्टर योगेंद्र चौबे की एक निर्देशक के रूप में निर्देशित की जाने वाली श्रेष्ठ नाटकों में शुमार है । रंगमंच के सभी तत्वों को सभी नोर्मों  को पूरा करते हुए अत्यंत सारगर्भित एवं प्रभावशाली प्रस्तुति देखने को मिलती है । या छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों की दास्तान है जिसमें गेंद सिंह , वीर नारायण सिंह से आगे चलकर गुंडाधुर तक कथा विस्तार पाता है पर केंद्र में एक पहटिया है जिसके द्वारा  कथा विस्तार होता है । 


        इसी क्रम में डॉक्टर योगेंद्र चौबे के द्वारा पं0 द्वारका प्रसाद तिवारी' विप्र '  के कई नाटकों का भी मंचन किया गया है ।



          इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी सिद्ध नाटकों की श्रेणी में और कई नाम शामिल हैं। जिसमें राकेश तिवारी द्वारा निर्देशित नाटक- राजा फोकलवा, अजय आठले के प्रसिद्ध नाटक  'बकासुर', घनश्याम साहू  का अघनिया प्रमुख है  । प्रख्यात रंगकर्मी मिनहाज असद, मिर्जा मसूद ,सुनील चिपड़े जैसे कई रंग निर्देशकों ने कुछ अनुदित छत्तीसगढ़ी नाटकों का भी मंचन किया है और छत्तीसगढ़ी भाषा की श्री वृद्धि की है । 



              लोक कथा शैली के अद्भुत रचनाकार श्री विजय दान देथा की मूल कहानी पर आधारित डॉक्टर योगेंद्र चौबे का 'बाबा पाखंडी '  दूसरा 'चरणदास चोर' बनने की राह पर चल निकला है । लोक नाट्य शैली नाचा और पंडवानी गायन को अपने आप में आत्मसात करते हुए यह यह नाटक 70 से भी अधिक बार  मंचित किया जा चुका है । नाट्य लेखन, परिकल्पना और निर्देशन प्रसिद्ध रंग निर्देशक और रंगकर्मी डॉक्टर देवेंद्र चौबे  का है ।आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ,दिल्ली के उत्पाद हैं ।



         बाबा- पाखंडी ,एक प्रकार से जन नाटक ही है। इसमें रंग जगत की तकनीक कम, कला और कौशल के साथ ही व्यक्ति का जीवन प्रमुखता से उतरा है । बाबा पाखंडी वह नाटक है जो लोग की चिंता करता है ।जन की चिंता करता है ।और राजनीति के चाटुकार प्रवक्ता मीडिया की मुखालफत  भी करता है। और बाबा पाखंडी जैसे अवांछनीय तत्व को गधे की सवारी प्रदान करने का दुस्साहस भी करता है । और गधा भी कोई ऐसा वैसा नहीं, परम सत्यवादी , जो अपने हृदय परिवर्तन के उपरांत विद्रोही हो जाता है ।और अपने मालिक बाबा के खिलाफ मुंह खोलता है ।तब- गधे ने किया कमाल, जी सच का लिया है नाम... जैसे गीत की मंत्रमुग्धकारी सामूहिक प्रस्तुति होती है । एक प्रकार सदैव सत्ता से पंगा लेने वाले और आखिरी सिरे पर खड़े हुए 'आदमी ' की तलाश में भटकने वाला- एक्टर इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन का जननाट्य धर्मी तेवर इसमें कहीं ज्यादा प्रखरता से दिखाई देते हैं ।धर्म ,अंधविश्वास और धन को राजनीतिकारों ने अपना हथियार बना रखा है । बाबा पाखंडी की रचना करने वाले ने बाबागिरी के धंधे को कारपोरेट जगत से भी ज्यादा लोकलुभावन और संपन्न पाया । अपने तमाम कूटनीतिक दांव पेंच लगा  विश्वास, खेल ,रिश्ता, लोक, भयदोहन ,सत्ता प्राप्त करने की अभीप्सा  के बीच -बाबा पाखंडी का अवतार होता है । और एक ही आवाज में यह बहुत कुछ कह जाता है । रामनाथ साहू के नाटक- जागे जागे सुतिहा गो !   में भी यही बुना गया है । गांव का भ्रष्ट कोटवार कोटवानंद बन जाता है । यह नाटक तत्कालीन पढ़े-लिखे ,संभ्रांत कुलीन जैसे बड़े-बड़े शब्दों से विभूषित किए जाने वाले समाज में भी बाबाओं की गहरी पैठ पर सीधा प्रहार करता है कि संबंधित व्यक्ति तिलमिलाने के सिवा और कुछ नहीं कर पाता है । नाटक का मुख्य पात्र रंग बदलने वाला गिरगिट जिसे छत्तीसगढ़ी में 'टेटका' कहा जाता है । यह राजनीति और बाबागिरी की जो दुरभि संधि है,उसे  पूरी तरह से परत दर परत  उखाड़ता है। जमीन पर पड़े हुए आखरी तृणमूल व्यक्ति से मंदिर के कंगूरे जैसा सत्तासीन होने का जो प्रपंच और छल है उसे यह नाटक प्रदर्शित पूरी शिद्दत के साथ प्रस्तुत करता है ।



          यद्यपि सिनेमा नाटक एवं रंगमंच की इतर वस्तु है ।इसके बावजूद भी डॉ योगेंद्र चौबे के निर्देशन चमत्कार को हम 'गांजे की कली ' में देख चुके हैं । 



        इस प्रकार छत्तीसगढ़ी नाटक भी अपनी पूरी क्षमता के साथ किसी भी रंगमंच पर  अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम  हैं । 




*रामनाथ साहू*



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मोर फूंके* --

 *मोर फूंके* -------।

       हमर जानत म पहिली के जमाना म घर के मोहाटी म लिखाय राहय 'सु-स्वागतम' बर बिहाव म आनी बानी के पेंटिंग संग लिखाय राहय "फलाना परिवार आपका हार्दिक अभिनन्दन करता है"।अऊ कखरो घर जान त मन गदगद हो जाय।अऊ घरवाला मन घलो गदगद हो जाय।कहिथे सगा भगवान बरोबर होथे कोनो ल बता के नई आय।ये बात (गोठ)अलग आय के अब सगा बता के जथे ।ये हर विज्ञान के चमत्कार आय।अऊ रात-दिन के हाय-हलो म कतिक मया बाड़ही घर के मुरगी दार बरोबर। पहिली एक ठन निबंध आय "विज्ञान वरदान है या अभिशाप "तब ओमा एक लाईन लिखन माने (यदि) कोनो मनखे चाकू ले साग भाजी कांटे ल छोड़ के अपन गोड़ हांथ ल काटही त ओमे (विज्ञान )चाकू के काय दोष (गलती)।

               अब तो जम्मो नंदावत हे कोनो -कोनो घर म अइसन पेंटिंग देखे बर मिलही। अब तो वेलकम लिखाय रहिथे।जेला गोड़ म खुंदक के जाथन। जिहां वेल ह कम रहिथे। अब तो नवा जमाना आगे घर के मोहाटी म लिखाय रहिथे "कुत्तों से सावधान"पढ़बे तेमा पोटा कांप जथे।खुदे ल चोर चिल्हाट होय के शंका होय ल धरथे।कतरो मनखे मन कुकुर सऊंक ले पालथे,कतनो मन घर के रखवारी बर अऊ कतनो मन जेकर लोग लईका नी राहय तहू मन।वैसे कुकुर मन ईमानदार होथे,फेर सब कुकुर, मनखे मन ईमानदार नी होय। कोनो ईमानदार होय के सर्टिफिकेट मिलतिस त कुकुर मन मनखे कस वहू ल बिसा लेतिस।इहां रोटी दे म कुकुर घलो बिदक जथे त मनखे कोन खेत के ढेला आय।

          वईसे सब कुकुर ऊपर बिस्वास करेके  मतलब 'जीव ल दहरा म डारना आय।कतनो कुकुर मन गोसईंया(मालिक)ल निपटा देथे।कतरो मनखे म घलो ये गुन मिलथे।इही ल कहिथे जिही पतरी म खाना उही म छेदा करना(भोंगरा करना)।कतरो झन बईगा मन कथे मोर फूंके मोर गुरु के फूंके तईसे इंखरो कांटे खबर नी खाय।

              **फकीर प्रसाद*    

                 *साहू फक्कड़*

                      ‌ *सुरगी*

हाँसी (लघुकथा)* ----------------------------

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                   *हाँसी (लघुकथा)*

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       सुरुज के हाँसे ले, वोकर ये हाँसी हर किरण के रूप म धरती म बगर जाय। अउ ये हाँसी ल अपन अन्तस् म ...अपन गरभ म समोख के ये धरती हर ,अन्न -फल - मूल -कंद-जीव -जनाउर अउ मनखे बना लिस।


           सुरुज के हाँसी ले बगरत ,एकठन किरण हर ,सुरुज ले पुछिस -उदित नारायण !मंय धरती जावत हंव। तँय उहाँ वाला मन ल कुछु शोर -सन्देश देत हस  का...?


           तब सुरुज कहिस - मोर ये हाँसे ले, मोरे कस हाँसी, धरती के नरवा -झोरखी -ताल -तलैया मन हाँसत हें। ये बादर हाँसत हे। खेत म धान के बिरवा हाँसत हे।अउ वन म  सबो रुख -राई हाँसत हें। सबो जीव जिनिस मन हाँसत हें। नई हाँसत त बस... एक मनखे भर हर! जा वोहू मन ल मोरे कस हाँसे बर कह देबे।


        तब वो हाँसत कुलकत किरण हर आके सबला छुये लागिस।  छुवत छुवत  वो किरण हर ,जब नानकुन लइका के गाल ल छू दिस। येकर ले लइका हर खलखला के हाँस उठिस। लइका के हाँसे ले फिर तो अकाश -पताल एके हो गय रहिस।


*रामनाथ साहू*


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छत्तीसगढ़ी कहानी) *केंवची -कांदा*

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               (छत्तीसगढ़ी कहानी)      


                 *केंवची -कांदा*                    

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                       (1) 


"सरपंच बने के बाद छह महीना  तक ल  ये नावा सरपंच समेलाल हर बने रहिस । वोकर बाद वोकर म कार्बन आय के शुरू हो गय भई...! "

"कइसे का हो गय जी ?" 

"का का ल बताबे ?" 

"अरे तभो ले भी ?" 

"तँय नई हावस का वोकर परजा... जइसन वो कहत रइथे आजकल अउ अउ कुछु सुने हस...तँय?" 

"अरे बने फरिया के परच्छर बता धंधा कस झन जनवा !" 

"केंवची कांदा... दु -चार मनखे मन के छोड़ बाकी सब मन  वोकर आगू म केंवची कांदा आंय ।... अउ केंवची कांदा के कईसन मुँहू जी ?"          


         रात के अंधियार म मुँहरन तो नई दिखत ये कि येमन कोन- कोन गोठियात हांवे अइसन फेर अवाज ल लखे ल लागत हे उदल  अउ बृज लाल आंय ये दुनो झन...कोसमलाल अइसन गुनिस । फेर वोकर जी म डर पेल दिस। ये तो राजद्रोह आय ! राजा के खिलाफ कुछु कहना हर राजद्रोह नई होइस त काय ये ।सरपंच माने अभी के राजा । वोकर खिलाफ कुछु बोलइ माने सफा सफा राजद्रोह !अउ राजद्रोह के सजा कुछु भी हो सकत हे...



                      (2)             



         परेमा सियानीन  एक हाथ म अपन लउठी अउ दूसर हाथ म पीतल बाल्टी म असनाने के तेल -साबुन ल धर के नहाय के नांव म निकल गय हे। वोकर बर नहाय जवई माने पूरा जुआर भर के बुता आय । दु तीन बईठान म वो तरिया के वो मुड़ी म पहुँचही जिंहा नहाय बर बहुत पहिली के बने पचरी हे अउ ठीक अइसन करत वोहर वापिस फिरही ।आज तो घर तीर ल आत वोला चक्कर असन आ गय रहिस ।येला देखके वोकर लइका बंशी लाल कउआ गय रहिस ।                 


              आठ -चार दिन के गय ल वोला पता चलिस कि गांव सरपंच हर तरिया म नहाय बर पचरी बनवाने वाला हे अउ वोहर जुन्ना पचरी ले सटा के ये नावा पचरी ल बनवात हे ।                



            ये पारा के मनखे येला सुनके तुरनतेच जुरिया गिन । बैठक  हो गय ।चला जाके कहा जाय सरपंच ल । वोहर ये पचरी ल तरिया के ये मुड़ा म बनवाय । अरे वो कोती नावा -जुन्ना जइसन भी हे पचरी नहाय धोय बर तो होइबे करिस न । ये कहाँ के न्याय ये कि मेखा उपर मेखा ठेंस । मनखे मन जुरिया के गईंन घलव । सरपंच हर हूँ हाँ कूँ काँ कुछु नई करिस अउ जउन करिस वोहर वोकर मन मरजी से होइस । जउन जगहा म तुरत ताही पचरी के जरूरत नई रहिस ,तउन जगहा म पचरी बन गय ।मनखे मन कहिंन -यह तो पूरा के पूरा भेदभाव ये। येहर तो भरे हे तेला भरदे अउ जुच्छा ल ढरका दे असन गोठ हो गय ।               


               तरिया के ये पार के मनखे मन अब ले भी वो पार नहाय बर जात रहिन । फेर वोमन के मन म ये बात हर तो घर कर गिस कि जउन भी होवत हे तेहर सबके मन के नई होइस । अकेला जउन चाहत हे वो भर होवत हे।              


            अउ पांच साल ल वोहर जइसन चाहिस वइसन होइस । वो हर सब जुन्ना मन ल नावा बना दिस अउ सब नावा ल जुन्ना । अउ का कहे जाय ? सब विरोधी मन ल टोर दिस कि सरिया के अपन कोती मिला लिस , सबो भेवा करके । जउन मन साम म मानिन तउन मन ल साम म , जउन मन इकन्नी - दुअन्नी खोजिन, तउन मन ल दाम म , दण्ड हर  तो सधारण बात रहिस,नहीं त भेद हर तो रईबे करिस ।सब निबट गईंन , फेर एक बाँच गय रहिस...वो  रहिस वंशी  !     सरपंच समेलाल ल वोकर परामर्शदाता मण्डल मन वंशी के बात बताईंन ।वोकर अब ले  भी नई मिंझरे के गोठ गोठियाइन, तब सरपंच समेलाल कहिस - वो वंशी केंवची कांदा ! अउ केंवची कांदा के का...?                            



                        (3)        



              संजोग अइसन ...ये पईत फेर सरपंची बर समेलाल ल फारम भरत बन गय ।लाटरी सिस्टम ले अनारक्षित हो गय रहिस ये पद हर । समेलाल घलव एइच ल चाहत रहिस ।          


       बाजा -रुंजी घिड़कात वोकर फारम भरिस । का जुलूस...देखे के लइक ! चुनाव होवत रहिस ।  देखे के लइक खरचा ,खाय के लइक खरचा, पिये के लइक खरचा सबो होवत रहिस ।              चुनाव परिणाम आइस । समेलाल एक वोट ल हार गय रहिस ।            


           केंवची कांदा के घलव बड़ ताकत हे इहाँ... !अब समेलाल समझ पाय रहिस।



(केंवची कांदा - तुच्छ वस्तु)


*रामनाथ साहू*


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सूरदास के सूर

 कहिनी             // *सूरदास के सूर* //

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                   अमलीटिकरा गांव के चिन्हारी गजब के रहिस।गाँव के टिकरा,धरसा,कछार सबो जघा कतको किसीम के रुखराई रहिस फेर अमली के रुख जादा रहिस ते पाय के गाँव के नांव अमलीटिकरा धराय रहिस।गाँव के तरिया,मुड़ा,बंधवा,पयठू,डबरी सबो ल गिनती लगाय म छै आगर छै कोरी तरिया रहिस।सबो तरिया के अलगेच-अलग नांव ले चिन्हारी रहिस।पनपिया तरिया ल नवां तरिया कहंय।कोरी अकन तरिया के बिहाव घलो होय रहिस।तरिया मन गाँव के चारो कोती खेत-खार के बीच-बीच म बगरे रहिस।

               बस्ती के लकठेच म एकठन तरिया पनपिया रहिस,जेन म पुराइन पान,कमल फूल,कोकड़ा उड़ियावत अउ पनबुड़ी चिराई तरिया म तउंरत रहय त ओकर सुघराई गजब के नीक लागय।तरिया के पार बने ऊंच रहय अउ चारो कोती पीपर के रुख लगे रहिस।तरिया के पार म एकठन महादेव के छोटकून मंदिर घलो रहिस। तरिया के सुघराई के सोर कोस भर के गाँव ले बगरे रहय।तरिया के फिटिंग पानी सबो के मन ल अपन तीर झींक लेवय।छाती भर के पानी म एकोठन सिक्का गवां जातिस त ओहू रगरग ले दिख जावे।अमलीटिकरा म तरिया होय के सेथी गाँव म दुकाल नि होवय।बरसा ह एको पानी ल ठगे कस करथे त तरिया के पानी ल गरोसा ले लेके टीप खार तक खेत म अपासी करंय जेकर ले फसल सोला आना हो जावय।

            उही अमलीटिकरा गाँव के छेदहा पारा म एकझन गरीब अंधवा रहय।अंधवा के घर माटी के दू खोली के रहिस।घर म ढरका फइरका लगे रहय।फइरका म संकरी लगे रहिस,बाहिर कोती जावय त उही सकरी ल लगा देवय।एकठन परछी अउ छोटकून रंधनी कुरिया रहय।अउ खपरा के छानहीं ओकर ओरवाती दूनों कोती गिरय।घर ओतका जादा बड़े नि रहिस फेर चुकचुक ले सुग्घर रहय।छोटकून अंगना अउ नानचूक चंवरा जेमा तुलसी के बिरवा के खाल्हे म एकठन करिया लोढ़ी जेन ल ओहर शालीग्राम कहे ओहू रहय।सूरदास असनान करके तुलसी चंवरा म अवस के एक लोटा पानी रोजेच रिकोवय।

                 अंधवा ल लोगन मन सूरदास कहंय।हमर देश म अंधवा मन के नांव के जरुरत रहे न काम के।सूरदास बने बुनाय नांव धरा जाथे अउ भीख मंगाई काम।उंकर गुन अउ सुभाव जग-जाहिर रहिथे गवइ-बजइ म जादा चिभिक अउ भक्ति म मन जादा रमे रहिथे,उंकर मन के सुभाविक लक्षन दिख जाथे।उंकर बाहिर के आंखी नि दिखे फेर भितरी कोती के ज्ञान के आंखी जरुर दिखथे।

           हमर देश म कतको झन जनमजात अंधवा होइन हावंय जेन ल सूरदास के नांव ले जाने जाथें।एकझन सूरदास श्रीकृष्ण जी के भगत रहिस,ओहर अपन ज्ञान के आंखी ले श्रीकृष्ण जी के दरशन पाय रहिस अउ अपन रचना के जरिया ले सबोझन ल उंकर लीला के दरशन करवाइस।कोनों  संगीत के क्षेत्र म अलख जगावत हे त कोनों धरम के कारज करत अपन मान बढ़ावत हावंय,कतको झन मंदिर देवाललय,गली-खोर,रेलगाड़ी के डब्बा म सुग्घर गीत गाके भीख मांगत देखे बर मिल जाथे।

              अमलीटिकरा के सूरदास के अलगेच चिन्हारी रहिस।जनमती ओकर आंखी नि रहिस।ओकर नांव घलो धराय रहिस।लोगन मन ओला बरसाती नांव ले चिन्हार करे रहिन।ओहर एको बार काकरो गोठ ल चिन्हारी कर डारय त ओला कभू नि भूलावे।ओहर जबर सुवाभिमानी किसीम के मनखे रहय।लइकुसहा उमर म बरसाती के दाई गुजर गे रहिस।ओकर ददा ह गाय के गोरस पिया के पोसे रहिस।रमायन मंडली म सुग्घर गावय अउ बजावय संगे-संग टीका घलो करे।ओकर तीर म रहे तेन ह चौपाई अउ दोहा के शुरु आखर ल बतावे तहं अपनेच चौपाई,दोहा ल मुअखरा बोल डारय।

             बरसाती के लइकुसहा पन जबर मुसकुल म गुजरे हावे।बरसाती के देखरेख करे बर ओकर ददा दूसरावन बिहाव करिस।समे अपन रंग देखावत जावत रहिस।थोरिक दिन म बरसाती के दूसरावन दाई के एकठन बाबू होइस।दू बछर के पाछू बरसाती के ददा बीमारी ले मउत होगे।बरसाती अंधवा रहिस ते पाय के ओकर दूसरावन दाई ओला नि पतियावय।मोसीदाई के सबो दुख देवइ ल झेले बर परे रहिस,दाई के मया दुलार नि पाईस।ओकर जिनगी म कठिनई अउ चुनौती भरे रहिस,ओकर ले हार नि मानिस।ओहर निराश होइस फेर हताश नि होइस।

               बरसाती जबर सुवाभिमानी रहे ते पाय के आघू बढ़े बर कुछू न कुछू उदीम सोचत रहिस।एकदिन गाँव के स्कूल म मास्टर जी करा सलाव लेहे बर गिस।स्कूल के मुहांटी म जइसे बरसाती खुसरिस मास्टर जी के नजर दुरिहा ले बरसाती ऊपर गिस।एकझन लइका ल लेहे बर भेजिस।लइका दउड़त बरसाती के तीर जाके ठाड़ होगिस। ' गोड़ के अवाज ल ओरखिस '... कोन ?..बरसाती पूछिस!' मैं फेंकू आंव '...मास्टर जी तोला लाने बर भेजिस हे।फेंकू बरसाती के हाथ ल धर के मास्टर जी के तीर लेगिस। '

                 जोहार हे मास्टर जी '....पैलगी करत कहिस!' आ बइठ बरसाती ' .....कुरसी ल देवत कहिस!कुरसी ल टमरत अउ घुंचावत बरसाती बइठिस।' बता कइसे आय हावस बरसाती ' ?......मास्टर जी पूछिस!' एकठन सलाव लेहे आय रहेंव '...संकोचत बरसाती कहिस। ' काय बात तेन ल बता न ' ?....मास्टर जी फेरेच कहिस।' मोर पढ़े के बड़ साध हावे फेर मैं काय करंव मास्टर जी ' ?.....दुखी मन ले कहिस। ' एकठन भैअंकों (भैरा अंधवा कोंदा) ज्ञानदीप स्कूल हावे जिहां तुहिमन कस लइका मन उंहा रहिके पढ़ाई करथें '....सलाव बतावत मास्टर जी कहिस। ' उहां तोर जाय के बेवस्था कर देवत हंव '.....मास्टर जी कहिस।

                   जिनगी म सपना के बड़का महत्तम होथे,सपना एकठन लक्ष्य देथे अउ आघू बढ़े बर पंदोलथे। दूसरावन दिन बरसाती भैअंकों ज्ञानदीप स्कूल चल दिस।उहां भैरा,अंधवा अउ कोंदा लइका मन पढ़त रहिन।सबोझन के बीच म रहिके अपन आप ल बड़ भागमानी समझत रहिस।काबर कि ओकरे कस लइका मन उहां रहत रहिन।उहां के मास्टर जी मन सबोझन ल अलगेच-अलग उदीम करके पढ़ावंय।हाँस के,गा के अउ नाच के पढ़ावंय।उहां लइका मन के सउंख अउ रुचि ल अधार बनाके सिखावत रहिन।उहां के पढ़े लइका मन अपन जिनगी म नांव कमावत जगजाहिर होवत रहिन।

                  बरसाती घलो उहां रहिके पढ़े लागिस।ओकर धियान संगीत कोती जादा रहिस ते पाय के ओला संगीत के पढ़ाई करवाइन।ओहर बने मन लगाके संगीत सीखे लागिस।अउ देखते-देखत बड़ जल्दी संगीत के क्षेत्र म महारथ हासिल कर डारिस।ओहर लोक संगीत,शास्त्रीय संगीत,सुगम संगीत जल्दी सीख गिस।वइसे बरसाती शुरुच ले बढ़िया गावत-बजावत रहिस।फेर सीखे के पाछू अउ सुग्घर गायक बनगिस।

                 ओहर धीरे-धीरे अकाशवाणी,दूरदर्शन म हबर के अपन जघा पोगरिया डारिस।ओहर देखते-देखत म बरसाती अब बड़का कलाकार के रुप म अपन नांव के संगे-संग गाँव के नांव ल जगजग ले अंजोर बगरावत रहिस।बड़का संगीतकार मन के डांड़ म गिनती होय बर धर लिस। " *सूरदास के सूर* " दूरिहा ले सुनाय लगिस।अंधवा ल अउ का चाही बस एकठन लाठी। ' सुग्घर डाहर अउ दिशा मिल जाथे त मनखे ल आघू बढ़े म समे नि लागे,नइ तो उवत सूरुज घलो बुड़त दिखे लगथे '।

✍️ *डोरेलाल कैवर्त " हरसिंगार "*

         *तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)*

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