Saturday, 26 July 2025

लघु कथा- " उत्तराधिकारी " -मुरारी लाल साव

 लघु कथा-


 " उत्तराधिकारी "

     -मुरारी लाल साव

घऱ के आघू म भीड़ जमा होवत गिस l एक झन कहिथे -" अपन करम के फल ला भोगत रहिस l बाई रहिस तेनो भगागे बीमरहा के कतेक दिन ले सेवा करत रहिबो l ओकर बेटा बहू कमाये खाये ले निकले रहिस मुख ला नइ देखाइस l

न डउकी संग दीस न बेटा संग दीस l"

दूसर आदमी बात ला काटत कहिस - " बने होगे अकेला रहिके,अकेल्ला मरगे l

डउकी ओकर हलाकान करत रहिस l बेटा तौन नालायक निकलगे l मरिस त चैन से l"

तीसर मइनखे कहिथे - "

भागमानी रहिस ओकर कोनो न आघू रोवय्या न पाछू रोवय्या l रहितिस त रोना गाना होतिस l जे आदमी ते ठन गोठ l

बुढ़वा सियान कहिस - " ऊपर वाले जनम देथे अउ मरन ला देथे l करम तो मइनखे करथे l

करम के दंड ला भोगे ला पड़थे l चलो बोहो अब काला देखना l न रिश्ता हे न नाता हे एखर l अपन रिश्ता ला ऊपर कोती बना लीस l'

आखिर म नाउ आथे कहिथे-

" अइसे झन कहव मैं ओकर दाढ़ी मेछा बनावत रहेंव l मुड़ी ला मैं मुड़वाहूँ,मोर धरम बनथे l

मैं आघू म कन्धा दुहूँ कहत लास  ल बोह लेथे l" ओला देख पहटिया आथे कहत " मैं रोज देवत रहेंव l" मोरो हक हे l

तीसर म खोरावत आइस l*अरे भाई चोंगी माखूर के संगवारी रहिस l मोला बुलाते रहय आये कर मनसुख कहय l "

फेर आखिर म किराना दुकान वाले आथे " सब समान घर म पहुँचा के देवत रहेंव l मोर बने गराहिक निकल गे l कुछु फिकर नइ रहिस ओला l 

"राम नाम सत्त हे सबके इही गत्त हे l' कहत सब झीन

लाई ग़ुलाल छिंचत मरघट लानिस l

चारो मिलके ओकर दाह संस्कार करिस l

     -कुम्हारी, जिला दुर्ग छ. ग.

हरेली परब पर विशेष लेख... ओमप्रकाश साहू अंकुर

 हरेली परब पर विशेष लेख... ओमप्रकाश साहू अंकुर



खेती किसानी ले जुड़े़ तिहार हरे हरेली



हमर छत्तीसगढ़ हा कृषि प्रधान राज्य हरे. हमर प्रदेश के किसान मन धान के खेती जादा करथे.एकर सेति  छत्तीसगढ़ ला धान के कटोरा कहे जथे. इहाँ के कतको तिहार बार हा खेती किसानी ले जुड़े हवय. अक्ती तिहार हा धान बोवाई के संकेत हरय ता हरेली परब हा धान के सुग्घर हरियरपन दिखे के प्रतीक हरय.

  हरेली तिहार हा सावन अमावस मा मनाय जथे. आषाढ़ मा किसान हा धान बोवाई के काम चालू कर देथे. जउन किसान मन के पास खुद के पास बोर, नदी, डेम ले पानी मिले के आसा नहिं रहय वोमन बोयता पद्धति ले धान बोथे. आज कल खेती किसानी मा बइला फंदाय नांगर के प्रयोग एकदम कम होगे हे. आज कल हर काम हा जल्दी मा होवत हवय. नांगर के जगह ला अब ट्रेक्टर हा ले डरे हवय. अब बहुत कम किसान मन हा बइला रखे हवय. खेत मा बइला अउ नांगर ला देखे बर आँखी तरस जथे. अइसे लगथे धीरे ले नांगर हा नंदा जही. पहिली बइला ला फांद के दंतारी अऊ पाटा चलाय जाय. अब ये सब ला ट्रेक्टर हा कर देथे.

   जउन किसान मन के पास हाथ मा पानी रहिथे. बोर, नदी, बांध ले पानी खींच के पलो डलथे. अइसन किसान मन हा परहा पद्धति ले धान बोथे. एकर बर पहिली ले खेत के कोनो भी जगह धान के थरहा लगा देय रहिथे. जब थरहा हा लगाय के लइक हो जथे ता खेत ला बढ़िया जोत - मंताके ,पाटा मा बरोबर करके परहा लगाया जथे. अभी ए काम ला बनिहार मन हा करत हवय. का पता कल जाके यहू काम ला घलो सिरिफ मशीन हा करे ला लग जही.

  आज कल आधुनिक तरीका ले खेती होवत हवय. पहिली गोबर खातू के उपयोग जादा करय. अब बहुत साल होगे हे रासायनिक खाद यूरिया, डीएपी, पोटास के गजब उपयोग करे जथे. बन ला मारे बर निंदानाशक दवा के छिड़काव करे जथे. बनिहार मन के काम हा कम होवत जावत हवय तभो ले बनिहार नहिं मिलय. खेती किसानी  करे मा बनिहार के समस्या हा गहरात जावत हवय. एक दू रुपया किलो चऊंर के सुविधा अउ खेती किसानी काम के प्रति लोगन मन के उदासीनता हा एकर प्रमुख कारण हरय.


  आवव अब हरेली तिहार के बात

करथन. ये तिहार हा अइसे समय मा मनाय जथे जब खेत मा धान के फसल हा लहलहाय ला लग जथे. बोयता पद्धति के धान के बियासी हो जथे. कुछ बचे घलो रहिथे. वइसने परहा पद्धति के धान हा घलो सुग्घर ढंग ले पोठ दिखे ला लगथे.

  ये तिहार ले किसान मन के संगे संग बइला -भईंसा के थके हरे जांगर ला सुसताय ला मिल जथे. खेती किसानी मा कट -कट काम करे ला पड़थे. खेती अपन सेती  कहे गेहे. ये तिहार मनाय से किसान, बनिहार मन ला कम से कम एक दिन आराम मिल जाथे.

ए समय खेती किसानी मा प्रयोग होने वाला अवजार नांगर -बख्खर, पाटा, दंंतारी, रापा, कुदारी, गैंती, टंगिया, बसुला, भंवारी, हंसिया, साबर, तुतारी अउ अब नवा जमाना मा ट्रेक्टर,अ टिपर, हार्वेस्टर के पूजा करे जथे. घर के दुवार मा सुग्घर ढंग ले मुरमी डाल के ये अवजार मन ला रखे जथे. अब दुवार मा घलो पथरा लग गेहे ता कतको मन मुरमी नहिं डोहारय. सुग्घर ढंग ले किसान परिवार हूम -धूप ,

फूल, दीया, अगरबत्ती के उपयोग कर पूजा करथे. पिसान के लेप बनाके जम्मो अवजार मा लगाथे.

चीला चढ़ाय जथे. पशु धन बइला, गाय, भईंसा के पूजा करे जथे.

ए दिन राउत मन गाय, बइला, भईंसा ला जड़ी बूटी से बने दवई खिलाथे. साथ मा किसान मन घलो आटा से बनाय लोंदी जउन में  नून घलो डलाय रहिथे. येला पशु धन ला खिलाथे. बरसात मा पशु धन के बीमार पड़े के संभावना जादा रहिथे. जड़ी बूटी अउ लोंदी हा हमर पशु धन के रोग प्रतिरोधक क्षमता ला बढ़ाथे अउ स्वस्थ रखथे. किसान मन राउत ला चांवल, दाल, नमक, मिर्च अउ जउन बन पड़े भेंट करथे.

हरेली तिहार के दिन लोगन मन मा गजब उछाह रहिथे. घरो घर चीला, बरा, सोहारी, भजिया, अरसा, कटवा रोटी चुरथे. अपन घर परिवार अउ अड़ोस पड़ोस ला खाय बर बुलाथे. एकर ले मेल मिलाप अउ आपस मा भाई चारा के भावना हा बढ़थे. लईका मन के संगे संग बड़का मन घलो गेंड़ी मा चढ़ के मजा लेथे . पहिली गाँव के गली मा गजब चिखला रहय. एकर से बचे बर गेड़ी हा काम आय. आज कल अब गली के क्रांकीटीकरण होगे हवय. अउ कतको जगह होना बाकी हवय. कतको जगह गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता होथे. अउ तरह तरह के ग्रामीण खेल कबड्डी, रस्सा खींच, मटका फोड़, फुगड़ी, बिल्लस, कुर्सी दौड़ के आयोजन होथे. ग्रामीण मन गाँव के मैदान मा सकलाके एक दूसर ले मिलथे जुलथे अउ सुख दुख के गोठ गोठियाथे. नवा नेवरनिन मन ला तीजा लाय के शुरुआत घलो हो जथे. अइसन सुग्घर ढंग ले हमर छत्तीसगढ़ मा हरेली तिहार मनाय जथे. 


        जय जोहार...


        ओमप्रकाश साहू "अंकुर "


      सुरगी, राजनांदगाँव

हरियर धरती के सुघरई ह आय हरेली*

 *हरियर धरती के सुघरई ह आय हरेली*


छत्तीसगढ़ के उर्वरा धरती मा सावन महीना के अमौसी के दिन मनाय जाने वाला ये लोक परब हरेली छत्तीसगढ़िया किसान, बनिहार, मजदूर मन के दूसरइया बड़का तिहार आय। छत्तीसगढ़ के किसानी तिहार अक्ती के बाद हरेली तिहार ह खेती-बाड़ी म रमे किसान मन के जिनगी म नवा उमंग-उल्लास ल अपन कोरा मा समोख के लाथे। ये तिहार ह चिखला-माटी के काम-कारज मा चिभके कमइया मन बर थोकिन सुस्ताय के उदीम घलव आय। तइहा जमाना ले बैला-भैंसा के उपयोग नाॅंगर जोतई , माल ढुलई अउ आवागमन बर होते आवत हे। किसान मन डहर ले मवेशी मन के मल-मूत्र अउ बन-कचरा (कृषि अपशिष्ट) ले जैविक खातू बनाय के परम्परा निच्चट जुन्ना बात आय।

    किसानी काम-बूता बर खातू- बीजा, मजदूर-बनिहार (मानव श्रम),नाॅंगर-दतारी, रापा- कुदारी (कृषि उपकरण) गाय -बैला (पशुधन) अउ पानी-बरसात जइसन चीज-बस (संसाधन) के होना बहुत जरूरी चीज होथे। येकरे भरोसा म किसान मन अपन खेत म थीरभाव ले फसल उपजारे के काम ल कर पाथें। किसान मन अन्न के उपजइया आँय तेकर सेती येमन ये सबो चीज-बस (श्रम संसाधन) बर भारी चिंता फिकर घलव करत रहिथें।

जोताई-बोवाई अउ बिआसी जइसन किसानी बूता के उरके के पाछू जब भाठा-टिकरा, खेत-खार, मेड़-पार, परिया-कछार मन हरियर-हरियर दिखन लगथे, तरिया-डबरी, नरवा-ढोड़गा, नंदिया-बॅंधिया डबडबाके छलछलाय ला धरथे तब किसान भाई मन इही श्रम संसाधन मन के आभार व्यक्त करे बर हरेली तिहार ल मनाथे।

हम सब जानथन कि खेती किसानी के काम में अवइया श्रम सहायक समान चाहे वोहा सजीव होय या निर्जीव, सबके देखभाल बर किसान ह चौबीस-घंटा सजग रहिथे। किसानी संस्कृति के इही प्रमुख तिहार म अगर कोनो धरम नाम के चीज हे त वोहा आय किसानी धरम जिहाॅं माल-मवेशी अउ कृषि औजार मन ह ही ओकर देवता-धामी आय।

     गाॅंंव-गॅंवई म  चलागन (लोक मान्यता) हे कि बीते रातकुन ह बहिरी हवा के सक्रिय होय के बेरा आय। बाहरी-हवा के पोषक मन कहुँ डहर सुन्ना जगा म जाके सिरजन के उलट जादू-टोना ( कारू-नारू) सीखे के शुरूवात इही दिन ले करथे।

          गाँव म ठउका इही दिन जादू-टोना जइसे बाहरी हवा ल जड़मूल ले खतम करे बर तंत्र-मंत्र विद्या के गुरूवारी पाठशाला के शुरुआत होथे। गुरूवारी पाठशाला ह सावन अमौसी रतिहा ले भादो महिना के रिषि पंचमी तक सरलग पैंतीस दिन तक चलथे।

          इही दिन माल-मवेशी मन ल नवा चारा ले होवइया रोग-राई ले बचाय बर औषधीय गुण ले भरे दशमूल कांदा, डोडो-कांदा अउ बन गोंदली जइसन जड़ी-बूटी ल खवाय जाथे। तिहार के दिन बड़े-बिहनिया राऊत-बरदिहा के घर ले ये जड़ी-बूटी ल लान के सबो मवेशी मन ल खवाय जाथे। साथे-साथ गहूँ पिसान के लोंदी बनाके ओमा नमक डार के घलव खवाय जाथे। येकर ले गाय-गरू ल जरूरी खनिज लवण मिलथे अउ मौसमी बीमारी ले लड़े बर प्रतिरोधक क्षमता घलव बाढ़थे।

     जड़ी-बूटी के एवज म किसान मन राऊत-बरदिहा ल धान-पान (शेर-चाऊर ) नइते पैसा देके ओकर कीमत अदा करथें।

     तिहार के दिन येती सुरुज के उत्ती होइस कि ओती किसान मन अपन घर के नाँगर ,जुड़ा, रापा-कुदारी, भवाँरी ,रोखनी बिन्धना-बसूला, पटासी हॅंसिया,पैसूल, सब्बल, छीनी घन अउ टंगिया जइसन किसानी औजार मनके साफ सफाई मा भीड़ जाथें। अपन घर के अँगना मा मुरूम के आसन बिछा के उही मा सब औजार मन ल रखे जाथे।

      ओ दिन घरोघर तेल-तेलई ले नाना प्रकार के पकवान बनाके किसान मन अपन परिवार अउ सगा-सजन समेत खुशी मनावत मिल बैठ के भोजन करथें। बरा,सोंहारी, चौसेला ,भजिया अउ चीला जइसन मनपसंद रोटी रँधई ले घर के वातावरण हा गमकन लगथे। हमर छत्तीसगढ़ ह धान के उपजइया प्रदेश आय तेकर सेती इहाँ के नेंग-जोग अउ पाक-पकवान मन म चाउँर पिसान के बहुते उपयोग घलव होथे। मुरूम के आसन म माढ़े कृषि औजार म दीया-बाती, हूम-धूप अउ उदबत्ती जलाके, चाऊर पिसान के घोल ल छिड़के जाथे नइते ओकर हाथा लगाय जाथे। अउ गुड़ ले बने गुरहा-चीला के भोग लगाय जाथे। किसान के धान-चाऊर ह कतक पावन-पवित्र हे तेला ये नेंग ह प्रमाणित घलव करथे। ये साल कस अवइया साल म घलव खेती किसानी के काम-बूता म इनकर अइसनेच साथ मिले कहिके घर के जम्मो सदस्य मन किसानी औजार के पूजा-पष्ट करत ओकर योगदान बर आभार व्यक्त करथें। किसान मन डहर ले सजीव (मवेशी) अउ निर्जीव (किसानी औजार) मन बर  मान-सम्मान के अइसन आदर भाव शायद आप मन ला दूसर डहर देखे बर नइ मिल पाही।

         पहिली गाँव-गॅंवई मन ह पेड़-पौधा, जंगल-झाड़ी, नदी-पहाड़ के हरियाली ले घिरे रहय। एकर कारण खूब बरसा होवय अउ अँगना-दुवार , गली-खोर, रवन-रस्ता मन चिखला के मारे गदपथ हो जाय रहय। किसानी औजार मन ल इही चिखला-पानी ले बचाय खातिर मुरूम के आसन बिछाय जाय। आज पक्का घर-दुवार होय के बाद घलव मुरूम बिछाय के परम्परा ह चलत हे, जे बहुत खुशी के बात आय। सही कहिबे ते येहा किसानी के काम म अवइया साजो-समान ल सुरक्षित रखे के किसान के अनुभव ले उपजे वैज्ञानिक सोच आय।

      इहाँ खेती-किसानी के काम-बूता ल बिना छेका-रोका के निपटाय बर गांव गॅंवई म पौनी-पसारी के बड़ सुग्घर वेवस्था घलव होथे। जेमा राऊत,लोहार,नऊ, बरेठ, बैगा, कोटवार अउ रखवार मन ह किसान के प्रमुख सहयोगी होथें। इनकर बिना किसानी के काम ह अधूरा हे।हरेली के दिन राऊत अउ लोहार मन के काम ह बड़ खास होथे। राऊत ह घरोघर जाके कपाट (दरवाजा) म लीम के डारा खोंचथे त  लोहार ह उही कपाट के चौखट मा खीला ठोक के अपन हिस्सा के बूता ल सीध करथे। कीटनाशी अउ जीवाणुनाशी मन ले बचे बर अउ शीतलता पाय खातिर नीम डारा के उपयोग अउ येती गरज-चमक जइसन बरसाती अलहन ले बाचे बर लोहा के खीला के उपयोग हमर पौनी मन के वैज्ञानिक सोच के कहानी घलव बताथे।

     बड़े (किसान) ल मान अउ छोटे (पौनी) ल दुलार देय के ये तिहार ह मानवता अउ समरसता ले एकता के मजबूत डोरी म बँधे रहे के संदेश देथे।

सियान मन बताथे कि कमती म गुजारा करे के आदत के सेती पहिली तीज तिहार के छोड़ घर मा कभू तेल-तेलई नइ चूरत रहिस। ओ बीते बेरा मा बीज ले तेल निकालना कोई सरल काम नइ रहय। तेकर सेती किसान के रोज के जिनगी म तेल-तेलई के कोई विशेष जगा नइ रहय, बिना तेल वाले डबका साग ह उनकर भोजन के हिस्सा रहय। येकरे सेती तीज-तिहार म तेलहा रोटी खाॅंय अउ ओला पचाय बर येमन भाठा-टिकरा कोति खेले-कूदे बर घलव जाॅंय।

कतको जगा म रोटी-पीठा खाय के बाद पान बीड़ा कस मुँहुँ ल लाल करे बर लइका मन कोदो पान,दतरेंगी जड़ अउ सेम्हर कांटा ल खावँय अउ खुशी मनावँय। सुदूर वनांचल डहर ये परंपरा ह अभी घलव देखे बर मिल जथे।

      ये परब म पौनी मन अपन ठाकुर ( किसान) मन के घर  मा जोहार-भेंट करे बर जाथें। बलदा म किसान मन खुशी मनावत उनला धान देके बिदा करथे। ओ पइॅंत बोंवाई म कोठी के बीजहा धान के छबनाच ह फूटे रहय तेकर सेती किसान ह उही बीजहा धान ल पौनी मन ल देंवय, तेकर सेती किसान मन डहर ले पौनी मन ल सम्मान के साथ देय जाने वाले ये प्रथा ल बीजकुटनी के नाम ले घलव जाने जाथे।

भरे बरसात म गाँव के चारों मुड़ा म चिखला माटी के कारण एक जगा ले दूसर जगा जाय म बड़ तकलीफ होवय। तेकर सेती हमर पुरखा-सियान मन ये समस्या ल दूर करे बर गेड़ी जइसे यंत्र के खोज करिन। हरेली के दिन ले पोरा तिहार तक ये गेंड़ी ह आवागमन के काम आय अउ नारबोद के दिन बैगा के अगुवाई म येला विसर्जित कर दिए जाय। आजकल इही गेंड़ी ल बड़ सम्मान के साथ खेल के रूप म स्वीकार कर ले गेहे।

हरेली के दिन गाँव के बुजुर्ग -सियान मन चौपाल म एक जगा सकला के आल्हा-उदल अउ पंडवानी जइसन किस्सा-कंथली मन ल सुनत-सुनावत ये तिहार के आनंद मनाथें।

       गाँव-गाँव म स्कूल, बिजली, सड़क,अस्पताल होय ले टोना-टोटका (बाहरी हवा) उपर अँखमुंदा विश्वास करइया मन के संख्या म कमी आय हे।जे मनखे समाज बर बड़ सुग्घर बात आय। फेर येकर साथ ट्रेक्टर, रीपर, थ्रेसर , हार्वेस्टर जइसन मशीन मन के आय ले नाँगर अउ बैला-भैसा के उपयोग अब न के बराबर होवत जात हे। ये मशीनीकरण के सेती किसान डहर ले लोहार मन ल काम नइ मिल पावत हे।जे पौनी-पसारी जइसन छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति बर हाईटेक हमला घलव आय जो कि बने बात नोहे।आज आधुनिकीकरण के सेती बिखरत तीज-तिहार के महत्तम ल समोखे के जरवत  हवय।

     जिनगी म मनखे मनके हाय-हफर करत काम-कमई के बीच म अपन थके जाँगर ल सुख अउ खुशी देय बर लोक समाज ह सम्मिलात जेन अवकाश के उदीम करथे उही ह लोक परब हो जाथे। उही कड़ी म हरेली ह घलव एक ठन लोक परब आय। मने नेक सोच (सकारात्मक उर्जा) कोति ले गलत सोच (नकारात्मक ऊर्जा) के हर तिरपट चाल ल हर (खतम) लेना ही हरेली आय। कुलमिलाके हम इही कहि सकथन खेत-खार, मेड़-पार, भाठा-परिया, जंगल-पहाड़, बारी-बखरी के संग चारो मुड़ा धरती के हरियर-हरियर दिखई अउ ओकर सुघरई ह हरेली आय।


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

Friday, 25 July 2025

करम के फर*(नानकुन किसा)

 *करम के फर*(नानकुन किसा)



सावन के महीना रहिस संगवारी अउ सावन के महीना मं भोलेनाथ ल पानी चढ़ाय के पुण्य भी अड़बड़ मिलथे,अइसे हमर सियान मन ह कहिथे.इही बिचार से सुखिया ह बड़े बहिनिया सुत-उठ के नहा-धो के पूजा- पाठ करय अउ मंदिर जा के शिवलिंग मं जल चढ़ावय.रोज के पहिली बुता इही राहय.फेर बाद मं घर-कुरिया के बुता ल करय.सुखिया ह मने-मन मं सोचय कि मय बहुतेच भक्तिन हरंव.मोर पूजा-पाठ ले भगवान ह बिक्कट खुस हो जवत होही.सुखिया के बसेरा मं कोनो भी मनखे आतिच त ओहर एक लोटा न पानी देवत रहिस,न चहा बनावत रहिस.सुखिया ह कंजूसनिन रहिस.ओकर घर मं आके मनखे मन  भूख-पियास मरत बिदा होवय.मनखे मन के आत्मा ह एक कप चहा बर तको तरस जवत रहिस.सुखिया ल कोनो फरक नइ पड़त रहिस कि ओकर घर ले कोनो मनखे ह दुखी हो के बिदा होवत रहिस.

    सतिया ह सुखिया के परोसी रहिस.सतिया ह न मंदिर जावत रहिस,न पूजा करत रहिस.अइसे नइ रहिस कि सतिया के मन मं भगवान नइ रहिस.असल मं सतिया ह मनखे मन मं भगवान के दरसन करत रहिस.मनखे के पीरा ल मिटाय के परयास करय अउ ओकर अंगना ले कोनो भी मनखे ह भूख-पियास मरत बिदा नइ होवत रहिस.सतिया के कुटिया ले कोनो भी मनखे ह दुखी होके बिदा नइ होवत रहिस.सतिया से मिलके सबो मनखे खुस हो जवत रहिस काबर कि सतिया के गोठ से ही मनखे के आधा दरद ह कमती हो जवत रहिस.

     सावन के महिना मं एक दिन संझा बेरा पानी ह बिक्कट गिरत रहिस,जइसे पानी गिरत रहिस,वइसे हवा करत रहिस,बिजली तको गरजत रहिस.एक झन मनखे ह अपन गोसइन दुनों सुखिया के गांव ले गुजरत रहिस.पानी गिरत मं फिंज जाबोन सोचके सुखिया के दुवारी मं गाड़ी ल खड़ा करीस फेर सुखिया करन कहिस,दाई हमन ल थोकिन तुहंर घर मं जगा दूहू का?सुखिया ह मन मं गुनिस कि कहूं पानी ह नइ थिरकही त येमन तुहंर घर रतिहा ल पहाबोन कइही,तेकर ले जगा नइ देवंव.सुखिया ह कहिस,मोर घर ह चोरोबोरो हे गा त जगा कहां ले दूहू.फेर दुनों परानी सतिया के घर मं जाके पूछिस कि थोकिन तुंहर घर जगा दूहू का?सतिया ह हव रूक जवव कहिस.सतिया ह रद्दा रेंगइया मन ल चहा-पानी दिस.सतिया ह कहिस कि पानी नइ छोड़ही त हमर कुटिया मं रतिहा ल पहा लेहू.पानी ह छोड़बे नइ करिस रतिहा होगे.सतिया ह भात-साग रांधिस अउ अपन गोसइया संग मं दुनों परानी ल भात-साग परोसिस.तहान अपन खइस.खा के खटिया ल बिछाइस.सबो झन सुख-दुख गोठियावत सुतगे.बिहनिया होइस त पानी ह नइ गिरत रहिस.दुनों परानी ल सतिया ह चहा-पानी दिस फेर दुनों परानी ह सतिया ल कहिथे कि दाई तय ह हमन ल भगवान सरीक मदद करे हस.भगवान ह तोला तोर करम के सुघ्घर फर देवव इही अशीष हे.अइसने कहिके दुनों परानी अपन गांव बर निकलगे.सुखिया ह मने मन खुस होइस कि बने करेंव मय ह येमन ल जगा नइ दे हंव त काबर कि पानी ह छोड़बे नइ करिस,मोला येमन ल रखे बर पड़ जतिच अउ मोला इंकर मन बर साग-भात रांधे बर पड़तिच.

    एक दिन सुखिया अउ सतिया के टिकट ह धरती ले कटगे.दुनों परानी ह यमराज के दरबार मं हाजिर होइस.यमराज ह कहिस कि सुखिया ल नरक मिलही अउ सतिया ल सरग मिलही.अतका गोठ ल सुनके सुखिया के जीव ह चिहर के कहिस कि अइसे कइसे हिसाब करत हव यमराज महराज,मय कतका पूजा-पाठ करे हंव,कतका पानी रिकोय हंव भोलेनाथ मं.ये सतिया ह कभू मंदिर नइ गे हे.कभू पूजा नइ करे हे.त ये ल कइसे सरग अउ मोला नरक देवत हव.यमराज ह कहिस कि दाई तय हर पूजा करत रहेस ओकर पुण्य तो मिलही जरूर फेर जेन तय पाप करे हस ओमा काटे के बाद तोर पाप जादा होवत हे काबर कि कोनो मनखे ल भूख-पियास मं मारे हच, ओहर पाप मं गिनाथे.काबर कि कोनो जीव ल तरसाना बहुतेच बड़े पाप हरे.सतिया ह भले पूजा नइ करिस फेर कोनो भी जीव ल भूखन-पियासन नइ रखिस.सबो जीव ल तृप्त करिस.नेक करम ह पूजा हरय अउ ओकर फर भी जादा मिलथे.सुखिया ल समझ मं आगे रहिस कि सबो जीव मं शिव हे अउ शिव ल खुस करना हे त जीव के  सेवा करे से भगवान ह खुस होथे.फेर चिरई ह तो खेत ल चुग गे रहिस.पछताय से कोनो मतलब नइ रहिस.


सदानंदनी वर्मा

ग्राम-रिंगनी(सिमगा)

जिला-बलौदाबाजार(छ.ग.)

Friday, 18 July 2025

पनही तोला प्रणाम* 🙏🏻 बियंग (टेचरही)

 *पनही तोला प्रणाम* 🙏🏻

                             बियंग (टेचरही) 


          पनही उपर निबंध लिखे के प्रतियोगिता मा सबले कम नंबर मोला मिलिस। कारण ये होगे कि मँय ओकर जनम विकासक्रम अउ मजबूती उपर विस्तार दे पारेँव। असल मा ओकर चलन चलागन कहां कहां कइसे होथे वोला लिखना रिहिस। पनही पाँव सँग दुनिया दुनिया घूम  के आथे तेकर कोनो भाव नइ देवय। इही पनही जब संसद मा चलथे, ब्यवस्था के अधकपारी मा चलथे तब परिया के रेंगइया पैडगरी के रसता धरथे। तब पनही के मान अउ भाव दू गुना हो जाथे। माने सस्ता दाम वाले कथा वाचक जादा उँचहा ज्ञान पोरसथे वो भूमिका मा पनही रथे। तब तो पनही के प्रणाम पैलगी  आदमी ले जादा करना चाही। कतको झन ये चरणदास ला अइसे फेंक के राखथे जइसे सरकारी दफ्तर के बाबू फाइल मन ला फेंकथे। अइसन आचरण ले अचरज नइ होवय काबर कि ये दफ्तर के मरियादा आय। फेर चरित्तर मा बिचित्तरपना अगास छूथे तब चरण के पनही चेथी तक ले जाना ही चाही। काबर कि पनही ही एक अइसन सेवादार हे जे कपार चढ़के बोलथे । अइसन शुभ समाचार के विज्ञप्ति अखबार मा आथे तब मनखे के सँग पनही के घलो पैलगी करे के मन होथे।

            सौ डेड़ सौ के कंटोप ला सिराना मे चपक के सुतना अउ डेड़ हजारी पनही ला हारे निर्दली उम्मीदवार असन मोहाटी के बाजू मा रखना कहां के न्याय हे। आज हमर संस्कार के नवाचार आय कि जरुरत के समान सँग रँधनी खोली तक पनही जावत हे। एक मँय हवँ कि असामाजिक जीव जिनावर ला भगाए बर ठेंगा के जगा पनही राखे रथँव। नवा जमाना के नवा पहिनावा ले भदई चघऊ के इन्तकाल होगे। भदई ला श्रद्धांजलि देय बर पुरातत्व विभाग के संग्रहालय मा सकेलाय रेहेँन। भीड़ अतका बाढ़िस कि बरसो बरस के इतिहास पोटारे टुटहा भदई के चोरी घलो होगे। सोन चाँदी चोराय मा वो सुख अउ आनंद नइ मिले जतका पनही चोराय मा मिलथे। अइसन काम बर मंदिर के मोहाटी अउ बरतिया के जेवनास ला उत्तम माने गेय हे।

            हमर जमाना मा बाप ला पनही लेय बर एकर सेती नइ पदोएन कि मोर जनम पत्री बनवात ले वोकर कतको पनही के तला खियागे। अफसर अधिकारी मन ला मोर बाप के पनही घिसाय से का लेना देना। जेकर लेन देन होथे वोकर लेना देना करे रहितिस तो पनही के पइसा बाँच जातिस। हम जानत हावन एक जोड़ी पनही हिमालय अउ चाँद के यात्रा करके आ जाथे फेर दफ्तर मा अरजी फँसाय बर कतको तला रोज फेंकावत रथे। वोइसे कहे जाथे पनही से मनखे के असली पहचान होथे। तभे तो परसाई जी प्रेम चंद के फटहा जूता उपर निबंध लिख डारिस। पनही मान बढाए अउ घटाए दूनो के काम करथे। फूल माला सँग रुपिया गुँथके पहिरा अउ पनही के हार पहिरा कते मा जादा सोर उड़थे वो घेँच ला पूछ जे हर पहिरे के सौभाग्य पाए रथे। फूलमाला के दुकान तो अबड़ मिलथे। फेर पनही के माला वाले दुकान के जेकर जादा जरूरत हे दिखबे नइ करे। पनही के माला के लाईक नरी तो बिक्कट हो गेहे। दुकान के कमी ला पूरा करहूँ कहिके धन कमाए अऊ बेरोजगारी ले मुक्ति पाये बर हनुमान चालीसा पढ़के दुकान शुरू करे रेहेँव। कार्पोरेट कम्पनी वाले मन तंत्र ले साँठगाँठ करके गुणवत्ता मा दोष बताके दुकान बंद करवा दिस। सौदागर मनके डर ये हे कि वो आदर्श हाट के उद्घाटन अपन कर कमलों ले करे हे, उही नरी बर पनही के माला एडवांस मा आडर शुरू होगे रिहिस। खास यहू हे कि इही खास मन के पनही पशु तन के चमड़ी ले नहीं मानुस तन के चमड़ी ले बनथे। तभे तो पाँच साल के आगू अउ टिकाऊ बर नवा पीढ़ी के नवा चमड़ी वाले तला ठेंसावत रथें।

          हम सरकार ला फोकट दोष देवत रथन। वोकर नजर पाहटिया से लेके पान टोरइया के पाँव तक हे। आखिर इही पाँव मा बिना फोरा परे वोट डारे बर तो बलाए जाही। गाय के नरी मा खड़पड़ी अउ मनखे के पाँव बर पनही मिलना लालबत्ती वाले गाड़ी मिले से कम नइ होवय। फेर दुर्भाग्य हे कि इन गदहा मन के गोड़ मा जुच्छा हाथ घुमाए ले समझथे कि अब हम फँदागेन जब मालिक ढिलही तब अजादी मिलही। निजी संस्थान ले निकलके शासकीय मान्यता वाले नारा "" चमचों और दलालों को मारो जूता सालों को "" सुनत मन ला हल्का लागे कि अब पनही के चलागन जोर सोर ले होही। अवसरवादी के असरदार प्रभाव हे कि हक अनीति जरूरत के लड़ई मा अउ हलाकानी ले मुक्ति बर मुँहुँ उलाबे तब मुँहूँ बंद करे बर वो कोती ले "मारो जूता सालों को" के आधा नारा ये कोती लहुट के आथे। 

        जइसे एक मंत्री दू चार ठन विभाग ला सम्हालथे ओइसने पनही अउ कुसियार दुहरा जवाबदारी निभाथे। मुख मा परथे तब मीठ सवाद देथे। पिछोत मा परथे तब सबरस के सवाद देथे। ओइसने पनही पाँव मा हे तब तक तन ला सुख देथे। अउ पीठ मा परथे तब मनसुख बना देथे। पहिली मनसुख भोगी बहुत कम मिलय। फेर अब नकटा लुचकट समाज-सुधारक भ्रष्ट व्यभिचारी अधिकारी पाखंड विधर्मी दोगाली राष्ट्र भक्ति वाले के भीड़ हे। इही सब नर से नारायण बनने वाला मन बर जादा काम मा लाये के जरूरत हे। समस्या ये हे कि बिलई भेकवा के नरी मा घंटी बाँधे कोन। आम लोगन तो खुदे भूल जाथें कि उँकर हाथ मा सबले बड़का ब्रम्हास्त्र पनही हे। बात अऊ लात के मार ले काम नइ चले तब पनही ही पूरा न्याय देवाथे। ये बात के चेत आम जनता ला कब होही। सबो किसम के अतिया ला सहन करना ला अपन मजबूरी बनइया के कायरता ही आय। अइसन मूरख मन बर घलो केहे गेय हे। "का मुरख सँग करँव बात, हेरवँ पनही मारवँ लात।"

           जेकर चोला झूठे राष्ट्रीयता मा बूड़े हे अउ चोलिया दगहा खादी मा लपेटाए हे, जेकर लाज धरम ईमान गंदा नाला मा विसर्जित होवत हे। जे मन बेवस्था के चिरहा चेंदरी मा तंत्र के धुर्रा झर्रावत हें। सेवा के नाम मा मेवा खावत हें। लोकतंत्र के अनुष्ठान मा नरबलि पूजवन चघावत हे अइसन मन के पैलगी करत तो माथा खियागे। ये सब देख के मुरहाराम के पनही काबर कुछु नइ बोलय। झूठ धोखा फरेब के मनभावन भाषण के आँवा मा भरोसा के चिबरी चाँउर खूब चूरत हे। अइसन मा पगराइत मन के चेथी डहर मुरहाराम के पनही बोलही तब ओकर पाँव सँग कहूँ पनही तहूँ ला प्रणाम।🙏🏻


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनांदगांव।

9755233236

पंडाल के कथा "

 लघु कथा - 

           "  पंडाल के कथा "

      -मुरारी लाल साव


          बहुत भीड़ l पाँव रखे के जघा नइ हे l अतका भीड़ मुड़ीच मुड़ी दिखत हे l पंडाल खचा खच भरा गे देखते देखत l जेन ला जेन मेऱ जघा मिलिस पौगरावत गिस l मंच ले घेरी भेरी  अपील होवत हे " बइठत जाव बइठत जाव "l 

बिसहत अपन बाई ला कहिस "भीड़ बहुत हे संभल के रहिबे सामान ला घलो संभाल के राखबे l"

      " तैं का करबे? देखबे नहीं तहूँ ह l" - बिसनतिन कहिस l

" तोला सबे झीन देखथे बने फक फक ले गोरी हस l गर भर माला पहिने हच l "

" त मोला देखाये बर लाने हच इहाँ l"

" देखाये बर नहीं कथा सुनाये बर लानेहँव  l" देख देख ओती देख महाराज आवत हे l"

बिसनतिन आघू- पाछू,डेरी -जेवनी कोती  डहर देखथे l

ओती देख मंच कोती उहें ले बुलक के आइस l 

" महराज बुलक के? " 

परदा उठा के आइस l

"अतका भीड़ म ओहा आही त कतको अइसने रौंदा जही l तेखर सेती  जानेस l " 

बिसनतिन कहिस-"  बीचो बीच  आतिस त महराज के गोड़ छुके तर जातेंव महूँ ह l " "घोलंड घोलंड के गोड़ धर धर के पाँव परइया के भीड़ l लात मारत निकलत हे तभो नइ बनय l "

"मइनखे झपाए लेथे गोड़ छुवे बर l"बिसहत समझाइस l ओती महराज  अपन आसन ले कथा कहे ला शुरू करिस -

" ये संसार ए l इहाँ सब झन ला कुछु न करे ला पड़थे l जइसन करथे  ओला मत देख अपन ला देख  का फल मिलथे l 

अच्छा करम के फल अच्छा  होही l बुरा करम के फल बुरा होही l संसार बने हे  देखे सुने बर बने हे l मानुस जनम मिले हे बार बार नइ मिलय l कथा सुने ले अंदर अउ बाहिर म उजियारा आथे l आत्म ज्ञान मिलथे बने आनंद मिलथे आत्मा ला l"

बिसनतिन हचकारत - "लदके परत हस गो घुच के राह थोकून  l " दूसर आदमी -" का लदकत 

हँव देख कतका धुरिया म हँव l" " छू मत गो घेरी भेरी l"

" कोन तोला छुवत हे l"

"कथा होवत हे तेती ला देख 

"मोला काबर देखत हस?"

"तोला कोन देखत हे?"

"लबरा, तोर नियत ला देख l "

बिसहत सुन केअपन बाई ला समझाथे -

"ओकर से मत लाग l सुने बर नइ आये हे l"

      ..महराज के प्रवचन चलते रहिस

" संसार म अपन अपन ढंग ले रहे ला पड़थे l भक्ति करो अउ करम करो पुन कमाओ l" 

कथा ला सुन के सब निकलत रहिस l

एती बिसनतिन पंडाल के भीतरी  के कथा ला बाहिर म सुनावत रहिस -" मोर गला ले सोन के चैन ला पुदक के लेगे  l "


     )(     )(

दादी के छड़ी* (छत्तीसगढ़ी लघुकथा)

 .         *दादी के छड़ी* (छत्तीसगढ़ी लघुकथा)

                       

                                 - डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


            पाँच बरस के अंशिता फर्श मं दरी मं बइठके पढ़ई करत  रहिस। घर मं कुर्सी-टेबल घलो सजे हे जिहाँ वोहा पढ़ई कर सकत हे फेर कुर्सी मं बइठके पढ़ना ओला बने नि लागे। काली जुवार गणित के पेपर हे। फेर ये समे ओकर ध्यान दादी कोती रहिस। अपन अनुशासनप्रियता के कारण दादी पूरा गाँव मं हेडमास्टरनी के नाम ले विख्यात रहिस। दादी ले आँखी मिलिस त अंशिता हाँसे लगिस। दादी हेडमास्टरनी तेवर मं पूछिस- ' काबर हाँसत हस? '

        ' दादी, छड़ी! '

       दादी एती-ओती ताकिस त ओला छड़ी नइ दिखिस।

        ' तँय लुकाय हस! '- दादी गुस्सा मं बोलिस। 

       ' नइ, दादी ..... तँय बुद्धु हस!' - अंशिता अउ खेलखेला के हाँसे लगिस। 

      ' बहू, छड़ी के बिना मँय कइसे रेंगहूँ! अपन बेटी ला समझा। देख, मोला देखके कइसे हाँसत हावय? '- दादी गुस्सा मं बोलिस। ओकर चेहरा तमतमाय रहिस। 

       ' आपके घलो त पोती हे! ..... बेटा, छड़ी ले आ। बने लइका मन छड़ी ला नि लुकावँय! '

       ' मम्मा, छड़ी ला मँय नि लुकाय हँव। मँय तो एक घंटा ले एही मेर बइठके पढ़त हँव!  ' - अंशिता मासूमियत ले जवाब दीस। 

         दरअसल दू महीना पाछू दादी के दुनों घुटना के सर्जरी होय हे- नी रिप्लेसमेंट सर्जरी। आपरेशन के लगभग तीन महीना पाछू ले ओकर दुनों घुटना मं तकलीफ बहुत बढ़ गे रहीस अउ रेंगे बर छड़ी के सहारा लेना पड़त रहिस। दू दिन पाछू जाँच बर डाक्टर करा गे रहिन त डाक्टर कहिस- ' अब तक इन्हें बिना छड़ी के चल लेना चाहिए था। अगर एक महीने में कोई खास इम्प्रूव़मेंट नहीं हुआ तो इन्हें न्यूरोलाजिस्ट को दिखाना पड़ेगा! ' 

         ओ दिन डाक्टर साहब फोन मं फिजियोथेरिपिस्ट ला डाँटे घलो रहिस। तब फिजियोथेरिपिस्ट जवाब दे रहिस- ' सर! वे सभी एक्सरसाइज स्वयं से कर ले रही हैं। उन्हें अब मेरी जरूरत नहीं है। वे बिना छड़ी के चल सकती हैं, मगर नहीं चल रही हैं। अब मैं क्या करूँ? '

         ' अच्छा बेटा, मोला छड़ी लान के दे दे, मँय तोला इनाम मं पैसा दुहूँ। ' - दादी हर पुचकारत अंशिता ले कहिस। 

       ' कतका? '

       ' सौ रूपिया। '

   ' नहीं दादी, पाँच सौ लेहूँ! मोला परीक्षा खतम होय के बाद एक खेलौना खरीदना हे। '

       एकर बाद अंशिता खाना पकईया बाई ला चिल्लाके कहिस- ' कमला दीदी, पुराना घर मं दादी के छड़ी हे, ओला ले आ! '

       थोरकुन देर मं पुराना घर ले दादी के छड़ी लेके कमला बाई आ गइस। पुराना घर, नया घर ले लगभग 150 फीट दूरिहा मं हे। बीच मं अँगना हे। 

       ' अंशिता बेटा, दादी के छड़ी उहाँ पहुँचिस कइसे? '- मम्मी पुचकारत पूछिस। 

      ' मम्मा, दादी छड़ी लेके तोर सहेली मन के संग पुराना घर गे रहिस कि निही? '

      ' हाँ, उहाँ तोर दादी के संग मँय घलो गे रहेंव। मोर हाथ पकड़के तोर दादी एक हाथ मं छड़ी के सहारा लेके रेंगत गइस। '

      ' दादी बिना छड़ी के रेंगत इहाँ आइस। मँय दादी ला बिना छड़ी के रेंगत देखके खुशी के मारे हाँसत रहेंव। .... फेर नइ रेंगे सकबे त मँय तो हँव न दादी तोर छड़ी बने बर! '

      ' हाँ, सासु माँ, आप पुराना घर ले बिना छड़ी के रेंगत इहाँ आय हॅव अउ हमन ला तो पता घलो नि चलिस! '

     ' अब मँय बिना छड़ी के रेंग सकत हँव! हे भगवान!! ' - दादी आश्चर्चकित होके जोर ले कहिस अउ अंशिता के लकठा मं जाके ओला बाँही मं पोटारके रोय लगिस।

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