Thursday, 15 January 2026

कलजुग केवल -------।"

 "कलजुग केवल -------।"

      लेड़गा पूछथे कलजुग केवल नाम अधारा।ऐकर काय मतलब होथे भईया।मे केहेंव रमायनिक मन बताथे रे लेड़गा पहिली परमात्मा ल पाय बर बड़ तपझप करे ल पड़े।तब कहूं ले देके प्रभु के दरसन होय। गंगा ल लाय बर भगीरथ के तीन पुरखा निकल गे तब ले देके गंगा हर धरती म आईस।फेर कलजुग ऐसन जुग आय जेमा सिरिफ भगवान के नाम ले ले से परमात्मा के दरसन हो सकत हे।या ये मानुष जनम ले मोक्ष मिल सकत हे।वहू म कहिथे एक घड़ी या दो घड़ी। कोनो जरूरी नइ हे माला धरके घंटों जपत रहा जब समे मिले जतना समे मिले परमात्मा के नाम लेना चाहि।लेड़गा कथे हव भईया तेखरे सेती सब अस्पताल, स्कूल,लेब मनके नाम देवी देवता के नाम म रखे रथे।

नही रे लेड़गा कलजुग के दूसर पक्ष (   )घलो हे।धरम अउ अधरम।अधरम के गोड़ हांथ नी राहय।वो हर धरम के गोड़ हांथ के भरोसा म रहिथे।जईसे रावण ल देख ले कतिक ज्ञानी, बलवान रिहिस तभो ले माता सीता के हरन करे बर साधू के भेष बनाय ल पड़गे ।जेन रावण हर कैलाश पर्वत ल हिलाय के दम रखे तेन हर का माता सीता ल अइसने नी ले जा सकतीस?

           वइसने कलजुग म जतना अधरम के काम हे धरम के नाम म होथे।जइसे अस्पताल, स्कूल के नाम ल देख ले, श्री राम,सांई, तुलसी, रामकृष्ण, गंगा, गायत्री, कृष्णा। भले कोनो मरे मनखे के लाश ल बिना पईसा के छुवन नी दिही।चाहे खेत खार बिक जाय।  दरियादिल।ददा लगे न भईया सबले बड़े रुपईया। वइसने स्कूल मन धंधा बनगेहे।जिहां ज्ञान बांटे नही बिकथे। ऐला लक्ष्मी के मंदिर घलो कही सकथन।लेड़गा कथे तोर कहे के मतलब हे भईया विद्या ददाति धनम।

         लेड़गा पूछथे ऐसने पूजनीय,दरसनीय जगा म घलो होवत होही न भईया?मे केहेव हव जी लेड़गा बड़े बड़े मंदिर मन में दरसन करे बर वीआईपी गेट, आनलाईन, आफलाईन,इही तो खेल आय। मंदिर म परसाद बेचना भभूती बेचना।अइसने राजनीति के भव सागर पार करे बर घलो धरम के डोंगा के जरुरत  होथे।

 हां कलजुग के एक ठन गुन खास हे चाहे धरमी राहय चाहे अधरमी अगरबत्ती जलाय बर नी छोंड़े।जईसे अंताक्षरी शुरू करे बर कहिथन शुरू करो अंताक्षरी लेके प्रभु का नाम।

           फकीर प्रसाद साहू 

               फक्कड़ 

                सुरगी

लघुकथा ) जेब खर्चा

 (लघुकथा )

जेब खर्चा 

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एके पारा के रहइया राकेश अउ दिनेश दूनों छटवीं कक्षा मा पढ़त हें।

आज खाना छुट्टी मा दूनों झन गुपचुप-चाट लेके गोठियावत-गोठियावत खावत हें।

"अरे भाई राकेश तोला रोज खजानी खाये बर कोन पइसा देथे"--दिनेश हा पूछिस।

"मोला तो मम्मी अउ पापा दूनों कोई देथें। मोर पापा हा फैकटिरी मा नौकरी करथे अउ मम्मी हा आँगन बाड़ी मा। उँकर सो पइसा के कमी नइ रहाय"--राकेश हा खुश होके कहिस तहाँ ले पूछिस--

" अउ तोला पइसा कोन देथे जी। "

"मोला कोनो नइ देवयँ भाई।"

"वाह!कइसे नइ देवत होहीं। रोज तो बहुत खजानी खाथच। कहाँ ले पइसा पाथच"

"मैंहा रोज बिहनिया दारू के खाली शीशी बेंचथँव भाई।बहुत पइसा मिल जथे। एक दू ठो ददा अउ बबा के घर मा खाली करे अउ दस-बीस ठो तरिया पार मा मिल जथे।"--

दिनेश कहिस।

"देख भाई शीशी बेंचत-बेंचत तोर ददा कस शीशी ढरकाये ला झन सीख जबे।जेब हा खाली होये ला धर लिही" --राकेश कहिस।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

Sunday, 11 January 2026

युवा दिवस' विशेष


 १२ जनवरी 'युवा दिवस' विशेष


°उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"

"उठव, जागव अउ लक्ष्य पाय के पहिली झन रुकव" 


 विवेकानंद के बचपन


       भारत भुँइया के महान गौरव स्वामी विवेकानंद के आज जनम दिन हरय। स्वामी जी के जनम १२ जनवरी सन् १८६३ के कलकत्ता (अब कोलकाता) म होय रिहिस। ऊँखर पिताजी के नाँव बाबु विश्वनाथ दत्त अउ महतारी के नाँव सिरीमती भुवनेश्वरी देवी रिहिस। ऊँखर माता-पितामन ऊँखर नाँव नरेन्द्रनाथ रखे रिहिन। बचपन ले ही नरेन्द्रनाथ धार्मिक सुभाव के रिहिन। धियान लगाके बइठे के संस्कार उनला अपन माताजी ले मिले रिहिस। एक बार नरेंद्र एक ठी खोली म अपन संगवारी मन संग धियान लगाय बइठे रिहिन के अकसमात कहूँ ले वो खोली म करिया नाग आके फन काढ़ के फुसकारे लगिस। ओखर संगी साथी मन डर के मारे उहाँ ले भाग के उँखर माता-पिता ल खभर करिन। उन दउड़त-भागत खोली म पहुँचिन अउ नरेन्द्र ल जोर-जोर से अवाज देके बलाय लगिन। फेर नरेन्द्र ल कहाँ सुनना हे। वोतो धियान म मगन हे ते मगने हे। एती नाग देवता अपन फन ल समेट के धीरे-धीरे कोठी ले बाहिर होगे।


नरेन्द्रनाथ ले स्वामी विवेकानंद


        ये घटना ले माता-पितामन ल आरो हो गे नरेन्द्र कोनो छोटे-मोटे बालक नोहे अउ भगवान जरूर वोला बहुत बड़े काम बर भेजे हे। ये बात बाद म साबित होइस तेला आज सरी दुनिया जानत हे। इही नरेन्द्रनाथ आगू चलके अपन गुरू स्वामी रामकृष्ण परमहंस के चेला बने के बाद स्वामी विवेकानंद के नाँव ले दुनियाभर म प्रसिद्ध होइन। स्वामी विवेकानंद आज ले लगभग डेढ़ सौ साल पहिली होइन फेर ऊँखर विचार ल जान के आज के पीढ़ी ल अचरज हो सकथे के ऊँच-नीच, जात-पाँत,  दलित-सवर्ण के जेन झगरा आज देस के बड़े समस्या के रूप धर ले हवय तेखर विरोध उन वो समय म करिन जब समाज म एखर कट्टरता ले पालन करे जाय अउ एखर विरोध करना कोनो हँसी-ठठ्ठा नइ रिहिस। वो समय म उन नारी जागरन, नारी सिक्छा अउ दबे-कुचरे मनखे बर आवाज उठइन तेन बड़ जीवट के काम रिहिस। नरेन्द्र बचपन ले ही मेधावी, साहसी, दयालु अउ धारमिक सुभाव के रिहिन। उन रामकृष्ण परमहंस ल गुरू बनाइन फेर ठोक-बजा लिन तब बनइन। हमर छत्तीसगढ़ म एक ठी कहावत हे-"गुरू बनाए जान के पानी पीयय छान के"। अउ नरेन्द्रनाथ अपन गुरू रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयान के बाद संन्यास धारन करके स्वामी विवेकानंद कहाइन।


हिंदू धरम के झंडा दुनिया म फहराइन


        अब वो समय आइस जब दुनियाभर म स्वामी विवेकानंद के नाँव के डंका बजना रिहिस। वो समय रिहिस ११ सितंबर १८९३ अमरीका के शिकागो शहर म विश्व धर्म महासभा के आयोजन। जेमा स्वामी जी बड़ मुस्किल ले सामिल हो पाइन। अउ जब ऊँखर बोले के पारी आइस तौ अपन गुरुजी के याद करके बोलना सुरू करिन- "अमेरिकन सिस्टर्स एंड ब्रदर्स"(अमरीका निवासी बहिनी अउ भाई हो)... बस्स् अतके बोले के बाद धरम सभा के जम्मो देखइया सुनइया दंग होके खुसी के मारे ताली बजाय लगिन।  हरदम "लेडीज़ एंड जेन्टलमैन" सुनइया मन कभू सपना म नइ सोंचे रिहिन के कोनो वक्ता अइसे घलो हो सकथे जेन उनला बहिनी अउ भाई बोल के सम्मान देही। बाद म अपन भासन म हिन्दू धरम के अइसे ब्याख्या करिन के अमरीकावासी मन सुनते रहि गे। धरम के अतका सुंदर ब्याख्या ओखर पहिली कोनो नइ कर पाय रिहिन। बिहान दिन अमरीका अउ दुनियाभर भर के अखबार स्वामी जी के तारीफ म भर गे राहय। 


      ३० साल के उमर म स्वामी जी हिंदू धरम के झंडा फहराय बर अमरीका अउ यूरोप सहित दुनियाभर भर म घूमिन अउ अपन जीवन के ये पाँच-छे साल जिहाँ भी गीन उहाँ हिंदू धरम के झंडा गड़ा के ये साबित करिन विश्वगुरु होय के योग्यता यदि कोनो धरम हे तो वो हे हिंदू धरम।


जिनगी बड़े होना चाही, लंबा नहीं 


        स्वदेस वापिस आके उन जघा-जघा रामकृष्ण मिशन के स्थापना करिन। कुछ दिन बाद उनला आभास होगे के आगे के काम बर ये सरीर के कोई जरूरत नइ रहि गे। अब ये सरीर तियागे समय आ गे हे। स्वामी विवेकानंद ०४ जुलाई १९०२ के महासमाधि धारन करके अपन भौतिक सरीर तियाग दिन अउ मात्र साढ़े ३९ बरस म कतको महान कारज करके ये साबित कर दिन के जिनगी बड़े होना चाही लंबा नहीं।

         सन् १९८४ म भारत सरकार दुवारा स्वामी विवेकानंद के जनमदिन ल 'युवा दिवस' के रूप म मनाय के घोसना होय रिहिस। तब से हर साल १२ जनवरी ल युवा दिवस के रूप म मनाय जाथे। ऊँखर देय मूलमंत्र-"उठव, जागव अउ लक्ष्य पाय के पहिली झन रुकव" हमेसा युवा मन बर अटूट प्रेरणास्रोत रइही।


-दिनेश चौहान,

छत्तीसगढ़ी ठीहा, 

नवापारा-राजिम,

मो.नं. ९८२६७७८८०६

Monday, 5 January 2026

छत्तीसगढ़ी रंग नाटक*

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                *छत्तीसगढ़ी रंग नाटक*

                      (हिंदी आलेख)



          यहां मैं दो अति विशिष्ट नाटकों का जिक्र करना चाहूंगा । उनमें प्रथम है डॉक्टर नंदकिशोर तिवारी द्वारा लिखित और डॉक्टर योगेंद्र चौबे द्वारा निर्देशित,और रँगदल ' गुड़ी  'द्वारा प्रदर्शित नाटक - रानी दई (रानी दई डभरा के ) 



              नारी विमर्श के चरमोत्कर्ष को अपने आप में सहेजे इस नाटक की कथावस्तु ,नारी के ह्रदयऔर प्राण दान, और पुरुष के द्वारा उसे भोगवादी एक वस्तु (कमोडिटी) माने जाने के बीच संघर्ष की  कथा है । अत्यंत संक्षिप्त में कथा सूत्र के रूप में कहा जा सकता है- डभरा रियासत का जमीदार या राजा, अपने संबलपुर प्रवास के दौरान वहां किसी रूप लावण्यवती तरुणी के साथ संबंध स्थापित कर लेता है ।और अपना काम समेट कर वापसी के समय उसे 'भोग्या' मानकर वहीं छोड़ देना चाहता है । पर वह साथ चलने के लिये अड़ जाती है । राजा कुटिलता के साथ उसे लाते हुए बीच रास्ते में  तलवार से गर्दन काटकर उसकी हत्या कर देता है। किंतु वापसी में अपराध बोध या (?)से उसकी दस्तक- धमक हर जगह सुनाई देती है ।और उसे वह दिखती भी है। सचमुच में देवी के रूप में उसका डभरा में आगमन हो चुका था । मगर उसने किसी भी प्रकार का प्रतिशोध नहीं लिया ।उसकी बस एक ही सोच थी कि मैं जिसको अपना कह चुकी हूं । वह मेरा है। भले ही उसने मुझे इसके बदले मौत दिया पर  वह मेरा अपना है ।और उसका प्रत्येक अपना भी मेरा अपना है। 


            और वह माता आज आराध्या होकर डभरा में जाग्रत देवी के रूप में विराजमान हैं ।उसका संकल्प वही है...  तुम मेरे अपने हो ।तुम्हारा हर चीज मेरा अपना है। ना केवल आज बल्कि आने वाले सभी समय में  भी । जहां जो व्यक्ति  इस धरा को स्पर्श करेगा ,वह मेरा अपना अपमान है । इस घटना को लेखक द्वारा अत्यंत सरलता के साथ दृश्यों में उसे उकेरा है । उसे तो  गुड़ी के द्वारा मंचित और डॉ योगेंद्र चौबे द्वारा निर्देशित इस नाटक को प्रत्यक्ष  देख कर ही अनुभव किया जा सकता है।




               ' रानी दई डभरा के '  एक सम्पूर्ण नाटक है।इसमें नाटक के सभी तत्व मौजूद हैं



1.कथावस्तु-

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  नाटक में तीन प्रकार की कथाओं का उल्लेख किया जाता है –


१ प्रख्यात


२ उत्पाद्य


३ मिश्र प्रख्यात कथा



       इस विश्लेषण में यह उत्पाद्य होते हुए भी ' मिश्र- प्रख्यात ' कथानक है।जनश्रुति और किवदंती को सहारा लेकर लेखक की कल्पना का  भी योगदान है।



             इन कथा आधारों के बाद इस नाटक में  'मुख्य' तथा 'गौण ' अथवा 'प्रासंगिक '  भी मौजूद है, जो मुख्य कथानक को अभिसिंचित करते हुए चलता है  ।  इसमें  प्रासंगिक के भी आगे 'पताका ' और 'प्रकरी ' भी  हैं । है। इसके अतिरिक्त नाटक की कथा के विकास हेतु कार्य व्यापार की पांच अवस्थाएं -प्रारंभ ,प्रयत्न , प्रत्याशा, नियताप्ति और कलागम  सभी मौजूद है।



             इसके अतिरिक्त इस नाटक में पांच संधियों  को भी चिन्हित किया जा सकता है।



2.पात्र और चरित्र चित्रण

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        ' रानी दई डभरा के ' एक नायिका प्रधान नाटक है । प्रतिनायक या खलनायक की जगह  पारंपरिक जमीदार है जिसके समक्ष स्त्री -वीर भोग्या वसुंधरा  की तर्ज पर वसुंधरा ही बन कर खड़ी है , जिसे जो चाहे अपनी बाजूओं के बल पर भोग ले ।



 नाटक में पताका और प्रकरी के प्रचलन के लिए बहुत सारे पात्र आते- जाते रहते हैं ।पर राजा के बेटे के रूप में एक सह नायक भी उपस्थित होता है  जिसके ह्रदय में नारी के प्रति श्रद्धा का प्रथम अंकुरण होता है । क्योंकि वह उसके वात्सल्य से अभिभूत है ।पात्रों का संयोजन अत्यधिक समीचीन है   जिसे योग्य निर्देशक ने अपनी कल्पना प्रवणता के बल पर थोड़ा मोड़ा फेरबदल  भी कर लिया है ।



3.संवाद

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              इस  नाटक के  संवाद सरल , सुबोध , स्वभाविक तथा पात्रअनुकूल छत्तीसगढ़ी में हैं जिसमें मिट्टी की सुगंध आप आसानी से पकड़ सकते हैं ।नीरसता के निरावरण तथा पात्रों की मनोभावों  को व्यक्त करने के लिए   स्वगत कथन तथा गीतों की योजना भी है।



4.देशकाल और वातावरण-

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          देशकाल वातावरण के चित्रण में नाटककार युग अनुरूप  चित्रण करने मे  विशेष सतर्क  रहा है। पश्चिमी नाटक के देशकाल के संकलनत्रय- समय, स्थान और कार्य की कुशलता  के बीज भी यहाँ उपस्थित है।



         इस नाटक में स्वाभाविकता , औचित्य तथा सजीवता की प्रतिष्ठा के लिए देशकाल वातावरण का उचित ध्यान रखा गया है।  पात्रों की वेशभूषा, तत्कालिक धार्मिक , राजनीतिक , सामाजिक परिस्थितियों  के अनुरूप है।



            पर एक दृश्य में नायिका का दोहरा गेटअप- सधवा और विधवा स्त्री का अद्भुत आकर्षण की उत्पत्ति करता है । वह विधवा की तरह श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं ,जबकि सधवा की तरह मांग में सिंदूर है ।इस प्रकार निर्देशक और लेखक की आत्मा  का एकालाप होते हुए  अद्भुत फंतासी की रचना हो जाती है और नाटक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है ।



5. भाषा -शैली

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नाटक  'रानी दई डभरा के ' की  भाषा शैली सरल , स्पष्ट और सुबोध  है । जिससे नाटक में  विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न होता है। बोलचाल की छत्तीसगढ़ी में रची गयी इस नाटक से प्रेक्षक सहजता से जुड़ जाते हैं।



6. उद्देश्य 

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यह नाटक नारी विमर्श को केंद्र में रख कर प्रस्तुत होता है। पुरुष पहले स्त्री को उपभोग की सामग्री मानकर उसका उपभोग करता है। यहां तक कि उसकी हत्या भी कर देता है ।और कालांतर में, उसी को देवी मानकर  उसकी आराधना भी करता है । पुरुष के इस दोहरे और दोगले चरित्र को यह नाटक बखूबी उजागर करता है । ना केवल छत्तीसगढ़ अभी तो भारत के कई भूभाग पर ऐसे मिलते -जुलते वृतांत वाले कई किस्से मिल जाते हैं । जिसमें पहले पुरुष अनाचार, दुराचार ,अत्याचार सब करता है। बाद में आराध्या बनाकर  उसका उपासक बन जाता है ।आज नारी सशक्तिकरण के इस युग में किसी नारी के प्रति ऐसे अत्याचार की पुनः पड़ताल की जा रही है । और नाटककार  का यही प्रतिपाद्य विषय वस्तु भी है । नारी विमर्श को प्रस्तुत करना नाटककार का मूल उद्देश्य  है ।



7. मंच-ध्वनि-प्रकाश-अभिनेता

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           निर्देशक डॉ योगेंद्र चौबे  रूप , आकार , दृश्यों की सजावट और उसके उचित संतुलन , परिधान , व्यवस्था , प्रकाश व्यवस्था आदि का पूरा ध्यान रखते हुए इसे आधुनिकता से लबरेज रखते हैं।  लेखक की  भी दृष्टि रंगशाला के विधि – विधानों की ओर विशेष रुप से  है। इन सब में  इस नाटक की सफलता निहित है।



            ऐसे ही 'पहटिया '  भी पूर्ण सिद्ध नाटक है।भूमकाल आंदोलन -गुण्डाधुर को जिस सहजता के साथ मंच पर उतारा जाता है वह डॉ0 योगेंद्र चौबे की व्यक्तिगत उपलब्धि है । मिर्जा मसूद के रेडियो रूपक को इसमें उन्होंने अपनी कथा का आधार बनाया है ।और एक नवीन नाटक की रचना की है । 'पहटिया ' के बहाने समग्र छत्तीसगढ़ के  प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन का एक सशक्त बानगी हम मंच पर देख लेते हैं ।यह डॉक्टर योगेंद्र चौबे की एक निर्देशक के रूप में निर्देशित की जाने वाली श्रेष्ठ नाटकों में शुमार है । रंगमंच के सभी तत्वों को सभी नोर्मों  को पूरा करते हुए अत्यंत सारगर्भित एवं प्रभावशाली प्रस्तुति देखने को मिलती है । या छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों की दास्तान है जिसमें गेंद सिंह , वीर नारायण सिंह से आगे चलकर गुंडाधुर तक कथा विस्तार पाता है पर केंद्र में एक पहटिया है जिसके द्वारा  कथा विस्तार होता है । 


        इसी क्रम में डॉक्टर योगेंद्र चौबे के द्वारा पं0 द्वारका प्रसाद तिवारी' विप्र '  के कई नाटकों का भी मंचन किया गया है ।



          इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी सिद्ध नाटकों की श्रेणी में और कई नाम शामिल हैं। जिसमें राकेश तिवारी द्वारा निर्देशित नाटक- राजा फोकलवा, अजय आठले के प्रसिद्ध नाटक  'बकासुर', घनश्याम साहू  का अघनिया प्रमुख है  । प्रख्यात रंगकर्मी मिनहाज असद, मिर्जा मसूद ,सुनील चिपड़े जैसे कई रंग निर्देशकों ने कुछ अनुदित छत्तीसगढ़ी नाटकों का भी मंचन किया है और छत्तीसगढ़ी भाषा की श्री वृद्धि की है । 



              लोक कथा शैली के अद्भुत रचनाकार श्री विजय दान देथा की मूल कहानी पर आधारित डॉक्टर योगेंद्र चौबे का 'बाबा पाखंडी '  दूसरा 'चरणदास चोर' बनने की राह पर चल निकला है । लोक नाट्य शैली नाचा और पंडवानी गायन को अपने आप में आत्मसात करते हुए यह यह नाटक 70 से भी अधिक बार  मंचित किया जा चुका है । नाट्य लेखन, परिकल्पना और निर्देशन प्रसिद्ध रंग निर्देशक और रंगकर्मी डॉक्टर देवेंद्र चौबे  का है ।आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ,दिल्ली के उत्पाद हैं ।



         बाबा- पाखंडी ,एक प्रकार से जन नाटक ही है। इसमें रंग जगत की तकनीक कम, कला और कौशल के साथ ही व्यक्ति का जीवन प्रमुखता से उतरा है । बाबा पाखंडी वह नाटक है जो लोग की चिंता करता है ।जन की चिंता करता है ।और राजनीति के चाटुकार प्रवक्ता मीडिया की मुखालफत  भी करता है। और बाबा पाखंडी जैसे अवांछनीय तत्व को गधे की सवारी प्रदान करने का दुस्साहस भी करता है । और गधा भी कोई ऐसा वैसा नहीं, परम सत्यवादी , जो अपने हृदय परिवर्तन के उपरांत विद्रोही हो जाता है ।और अपने मालिक बाबा के खिलाफ मुंह खोलता है ।तब- गधे ने किया कमाल, जी सच का लिया है नाम... जैसे गीत की मंत्रमुग्धकारी सामूहिक प्रस्तुति होती है । एक प्रकार सदैव सत्ता से पंगा लेने वाले और आखिरी सिरे पर खड़े हुए 'आदमी ' की तलाश में भटकने वाला- एक्टर इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन का जननाट्य धर्मी तेवर इसमें कहीं ज्यादा प्रखरता से दिखाई देते हैं ।धर्म ,अंधविश्वास और धन को राजनीतिकारों ने अपना हथियार बना रखा है । बाबा पाखंडी की रचना करने वाले ने बाबागिरी के धंधे को कारपोरेट जगत से भी ज्यादा लोकलुभावन और संपन्न पाया । अपने तमाम कूटनीतिक दांव पेंच लगा  विश्वास, खेल ,रिश्ता, लोक, भयदोहन ,सत्ता प्राप्त करने की अभीप्सा  के बीच -बाबा पाखंडी का अवतार होता है । और एक ही आवाज में यह बहुत कुछ कह जाता है । रामनाथ साहू के नाटक- जागे जागे सुतिहा गो !   में भी यही बुना गया है । गांव का भ्रष्ट कोटवार कोटवानंद बन जाता है । यह नाटक तत्कालीन पढ़े-लिखे ,संभ्रांत कुलीन जैसे बड़े-बड़े शब्दों से विभूषित किए जाने वाले समाज में भी बाबाओं की गहरी पैठ पर सीधा प्रहार करता है कि संबंधित व्यक्ति तिलमिलाने के सिवा और कुछ नहीं कर पाता है । नाटक का मुख्य पात्र रंग बदलने वाला गिरगिट जिसे छत्तीसगढ़ी में 'टेटका' कहा जाता है । यह राजनीति और बाबागिरी की जो दुरभि संधि है,उसे  पूरी तरह से परत दर परत  उखाड़ता है। जमीन पर पड़े हुए आखरी तृणमूल व्यक्ति से मंदिर के कंगूरे जैसा सत्तासीन होने का जो प्रपंच और छल है उसे यह नाटक प्रदर्शित पूरी शिद्दत के साथ प्रस्तुत करता है ।



          यद्यपि सिनेमा नाटक एवं रंगमंच की इतर वस्तु है ।इसके बावजूद भी डॉ योगेंद्र चौबे के निर्देशन चमत्कार को हम 'गांजे की कली ' में देख चुके हैं । 



        इस प्रकार छत्तीसगढ़ी नाटक भी अपनी पूरी क्षमता के साथ किसी भी रंगमंच पर  अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम  हैं । 




*रामनाथ साहू*



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समालोचना ग्रन्थ*

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             *समालोचना ग्रन्थ*


  *छत्तीसगढ़ी साहित्य: दशा और दिशा*

       *(डॉ. नन्दकिशोर तिवारी )*


                 *म*


 *पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे के नाटक 'पीरा' के अंश*

  


            इसी काल खण्ड में डॉ. सुरेन्द्र दुबे का नाटक 'पीरा' और रामनाथ साहू का नाटक 'जागे-जागे सुतिहा गो' प्रकाशित हुआ ।


          डॉ. सुरेन्द्र दुबे का नाटक 'पीरा' छत्तीसगढ़ लोक थियेटर और आधुनिक

नाटकों की समन्वित शैली का आस्वाद देता है। इस नाटक की मूल चेतना

छत्तीसगढ़ का शोषण है। अकाल, पर्यावरण का विनाश, पलायन, अंधविश्वास

इत्यादि समस्याओं को एक साथ यह नाटक उठाता है। रामनवमीं की खुशी दुःख

में बदल जाती है जब अंजोर कहता है।" दिन बादर काकरो रोके नइ रुकय ।

भगवान का जानही हम ऐंठा के डोरी होगे हन। 'पीरा' के लेखक बाजारवाद

का समाज पर पड़ रहे प्रभाव को उद्घाटित करता है। कैसे हमारी इच्छाएँ बाजार

के इशारे पर बनती हैं। उदाहरण के रूप में मनबोधी का यह कथन कि-

मनबोधी -मोला बीस ठन रुपिया दे तो ददा !

पकला-का करबे बीस ठन रूपिया के

मनबोधी- पज्जी बिसाहूं

पकला- सेठ दुकान ले, ले आन डंडहा कपड़ा

मनबोधी - में ह डंडहा पज्जी नइ पहिरॅव। मे ह रेडिमेड पहिरथँव डोरा के ।


         इसी तरह देश के बंटवारे का दुःख भी इस नाटक में व्यक्त हुआ है।पकला का बंटवारा मांगने पर उसका पिता कहता है “सौ साल पूरगे मोर' मे ह देस ल बंटत देखेंव, तहाँ प्रदेस ल बंटत देखेंव। ऊंखरे चाल ल सीख के तहूँ बाटा बर ठेंगा उठात हस रे।" इस नाटक में आकर छत्तीसगढ़ी नाटक ने एक अव्यक्त

दर्द को व्यक्त किया है। उसकी तासीर और जमीन भी बदली है।

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छत्तीसगढ़ी साहित्य दशा और दिशा / 103


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तोर अगोरा मा !

 .......तोर अगोरा मा !

                      

                                चन्द्रहास साहू

                             मो- 8120578897

तन ले भलुक सांवरी रंग हाबे फेर मन ले उज्जर हावय। कद काठी ले भलुक बुटरी हाबे फेर कदम पोठ उठाथे। आँखी मा जलरंग करत आँसू हाबे फेर सपना समंदर ले गाहिर हाबे। काया दुबर-पातर फेर अंतस ले पोठ हाबे। ...... फेर कतको पोठ हो जावय जिनगी मा भांवर उठथे तब बुध पतरा जाथे। आगी कस अंगरा मा घला राख के परत चढ़ जाथे। बस अइसनेच तो हाबे वोकर जिनगी हा। 

          मोटियारी अहिल्या के गोठ करत हॅंव मेंहा। वोकरो जिनगी मा भांवरी उठे हाबे। कोनो न देखिस, न गुनिस, मनन नइ करिस। नित-नियाव नइ करिस सोज्झे फैसला होगे। 

"तोला जिए के अधिकार नइ हाबे अहिल्या जा पथरा हो जा।'' 

                 अहिल्या के आँखी मा अंधियारी छागे। लहू के संचार बाढ़गे। रुआ ठाड़ होगे। धक ....धक..... धड़कन चले लागिस। अंधियारी आँखी मा बिजली चमकीस अउ बुतागे। ...धड़ाम होगे। जझरंग ले गिरगे पथरा लगे दुवारी मा "पथरा'' हा। जियत-जागत मनखे सिरतोन पथरा बनगे। मुहूँ ले बक्का फूटे न आँखी ले आँसू गिरे। कतका रोही बपरी हा ...? एक-एक आँसू के हिसाब लिही ते समुंदर के खारो पानी कमती हो जाही। एक-एक पीरा के हिसाब लिही ते पोथी  कमती हो जाही। एक-एक दरद ला जोड़ही ते दुनिया कमती पड़ जाही।

           अइसने तो एक बेरा अउ होए रिहिन। मनचलहा इंद्रदेव हा बहिरूपिया बनके आए रिहिन लार टपकावत। बिचारी अहिल्या देवी का जानही.....? गोसइया के भोरहा मा अपन मया ला दे दिस इंद्र देव ला। .... अउ गोसइया ला जानबा होइस तब ....? जम्मो के दोषी देवी अहिल्या होगे। 

"जा पथरा बन जा......।'' 

डांड़ दे दिस। सौहत पथरा बनगे देवी हा। 

तब अउ आज में का बदलिस नारी के जिनगी हा। आज वइसने यहू अहिल्या होगे।

"जा पथरा बन जा......।'' 


                  टूरा मन कहांचो किंजर लेवय काही पहिन लेवय सब आजादी फेर टूरी मन बर पहरेदारी ? 

जम्मो तन ढंके राहय अदब मा राहय। ... अउ थोकिन उघरा होगे तब गिधवा के का कमती ?  जंतु वैज्ञानिक मन भलुक गिधवा ला विलुप्त होवत प्रजाति कहिथे फेर अपन प्रयोगशाला ले  बाहिर निकल के तो देखो साहब ! मरी खवइया मन भलुक कमती होगे फेर जियत खवइया मन बाढ़गे हाबे। तभे तो फ्रीज मा पैंतीस कुटका मा बेटी मन मिलत हाबे, रोड मा घसीटत लेगत हे। छिहीबिही होगे जियत बेटी हा। माॅंस-हाड़ा अउ लहू के रंग मा रंगाये सड़क होगे हे। कोनो माइक्रोस्कोप ले तड़प सुसकन ला देख सकथे का  ? ....नही। अहिल्या भलुक भाव शून्य होगे हे फेर मन मा बादर गरजत हाबे।

अहिल्या एक दिन जींस टॉप पहिर के शहर ले का आइस दाऊ पारा के जवनहा के आँखी लहुटगे। दाऊ के बड़का टूरा हा अहिल्या ला रौंद डारिस।

"तोर गलती हाबे अहिल्या ! ..... सिरिफ तोर।''

परोसी सोज्झे कहि दिस। .... अउ पंचायत मा पंच परमेश्वर मन घला इही बला लगावत हाबे। आज जम्मो कोई गाँव के एकता चौक मा सकेलाये हावय दाऊपारा अउ खाल्हे पारा के माते झगरा ला देखे बर।

                 अहिल्या खाल्हे पारा के बढ़ई के टूरी आवय अउ भानू हा बड़का दाऊ के टूरा आवय। बड़का दाऊ भलुक भैरा हाबे फेर कोनो भैरा कहि दिही वोतकी मा खंडरी उधेड़ दिही। छोटका दाऊ घला सांय - सांय करत हाबे आज। खाल्हे पारा के अगवा बने हाबे बोचकू माहंगू अउ गंगू हा।

"हमर भुईयाॅं मा जम्मो ला जिए के अधिकार हाबे एकर मतलब अब गाँव-गंवई के टूरी मन जींस टॉप पहिरके थोड़े किंजरही ? अइसन मा हमर संस्कृति के नाश नइ हो जाही ..? ये टूरी अहिल्या ला शहर के हवा लगगे हावय। जींस टॉप पहिर के गाँव मा किंजरत हाबे तब देखइया के का गलती ?''

मंझला दाऊ बइटका के मूल गोठ ला चतुराई ले किहिस।

"कोनो हा रोटी ला झुलात रेंगही तब कोनो कुकुर हा झपट्टा तो मारबे करही ? ...... येमा कुकुर के का दोष ....?''

बड़का दाऊ अब मंझला के गोठ मा पॉलिश लगाइस।

"तोर बेटा भानू हा कुकुर हो सकथे दाऊ ! फेर हमर बेटी, बहिनी अहिल्या हा रोटी नइ हो सके कि कोनो कुकुर देखही अउ झपट्टा मार लिही।''

दाऊ रखमखागे। 

"जबान सम्हाल के बात कर गंगू ! हमर जूठा-काठा मा पलथो तुमन तब कुकुर तुमन होए।''

"मेंहा मानथो तुहर घर के बनी भूती ले खाल्हे पारा के गुजारा चलथे। तुंहर जूठा-काठा ला खा घला लेथन फेर ऐकर मतलब  हमर परवार के नोनी बाबू के इज्जत ला तुंहर घर के खेलउना नइ बनावन दाऊ ! ..... अउ हमर बेटी कोती गंदला नजर ले देखबे ते तुंहर आँखी ला कोचक देबो। अब जमाना बदलगे दाऊ.....! तेंहा चार मुटका मारबे ते महूॅं हा दू मुटका मार के मरहूॅं फेर हार नइ माने खाल्हे पारा के मन घला।''

बोचकू किहिस अपन लुहंगी मा गठान पारत।

"नइ होवन देवन अइसन अनित।''

अब खाल्हे पारा के जम्मो कोई चिल्लाए लागिस।

"शहरी स्टाइल मा ओन्हा पहिर-ओढ़के के गली-गली किंजरत रिहिस अहिल्या हा। दाऊ के टूरा के नियत डोलगे ते का होइस...? वोकर तन ला छू दिस ते खीया थोड़े गे ? हमर दाऊ बेड़ा मा तो सबर दिन अइसन होवत आवत हाबे कोनो टूरी संग दिल लग जाथे ते ठठ्ठा कर लेथन।''

दाऊ फेर किहिस अपन मइलाहा सोच ला उजागर करत।

"सबर दिन हमन ला जानवर समझे हस फेर हमू मन मनखे आवन दाऊ ! ...... अउ हमू मन अब तुंहर बेटी बहिनी संग ठठ्ठा करबो तब कइसे,...... बनही का ?''

माहंगू किहिस अब अगियावत।

दाऊ ला मिर्ची के झार लाग गे।

"हमर गाँव मा अइसन नइ होवन देवन।''

दाऊ पारा के युवा मन गरियाए लागिस। एक कोलिहा नरियाइस अउ जम्मो कोती हुंवा-हुंवा। 

अहिल्या हा नवा फैशन के ओन्हा पहिरके किंजरथे उही गलती हावय। गाँव के इज्जत बचाना हाबे तब पाबंदी लगाए ला लागही।

"टूरी मन का पहिरही, का नइ पहिरही के नियांव होवत हाबे पुरुष मन के बइटका मा। ये भारत हा दुनिया के सबसे बड़का लोकतंत्र के भुईयाॅं  आवय अउ जम्मो कोई ला अपन सुभित्ता अनुसार सब पहिरे के आजादी हाबे।.....अउ इही बस्ती मा दाऊ के बेटी मन अपन मन से ओन्हा पहिर सकथे तब हमर खाल्हे पारा के बहिनी मन काबर नइ पहिर सकही ? टूरी मन का पहिरही का नइ पहिरही के नियाव ले जादा बड़का गोठ आवय अहिल्या के तन संग काबर खेलिस दाऊ के टूरा भानू अउ उकर संगवारी मन ? एकर नियाव होना चाहिए पंच परमेश्वर हो।''

खाल्हे पारा के सियान गैंदलाल किहिस। जइसे सिरतोन मा जम्मो कोई आज के नियाव के मूल गोठ ला बिसरगे हाबे। अहिल्या के अनाचार होए हे तेकर नियाव करे बर सकेलाएं हाबे जम्मो कोई अउ होवत हाबे टूरी का ओन्हा पहिरही तेखर। 

"अहिल्या ला बलाके  हियाव-नियाव करो तब बनही जी !  .....अउ दाऊ के टूरा भानू ला घला बलावव।''

खाल्हे पारा के सबले बड़का सियान किहिस।

अहिल्या अपन दाई के तीर मा अब बेसुध बइठे हाबे।

"अहिल्या हा भलुक ये बइटका मा आही फेर दाऊ के टूरा हा अपन इज्जत उतारे बर नइ आवय।''

अब बड़का दाऊ हा रखमखावत किहिस।

"दाऊ के कुकरा होवय कि टूरा अब्बड़ जल्दी नजर लागथे मोर होनहार बेटा ला नजर लगगे। अपन मोह फाॅंस मा फॅंसा डारिस ये टूरी हा। रुपिया पइसा धन दौलत ला देख के लूटे के उदिम करत हाबे। तन ला बेचके मजा उड़ावत हाबे ये बेसिया हा। आज मोर बेटा फॅंसगे मोह जाल में काली तुंहर बेटा मन फॅंस जाही......! अइसन टूरी ला तो गाँव मा घला नइ रहना चाही। बचाओ ये गाँव ला।....बचाओ ये गाँव के जवनहा मन ला।''

दाऊ कोती ले बड़का सियान किहिस।

"हाॅंव ! सिरतोन कहात हाबे बबा हा।''

"भगाओ.... भगाओ.....!'' 

आरो आए लागिस। जम्मो कोई अब एक सुर होगे।

"कहाॅं जाही बपरी हा ? वो तो अपन रद्दा मा रेंगत रिहिस अउ ....।  गाँव ला छोड़ही ते दाऊ के टूरा हा छोड़े। अहिल्या इहिंचे जिहि इहिंचे मरही। ... अउ कोन निकालही मोर लइका ला देखथो मेंहा।''

खाल्हे पारा के  सियान बबा किहिस। 

बबा के भीष्मप्रतिज्ञा ला सुनके बइटका मा अब जम्मो कोई काॅंव-काॅंव हाॅंव-हाॅंव करे लागिस। एकता चौक मा बवाल होगे। नित-नियाव के जगा गारी- बखाना चलत हाबे। मार काॅंट बर उमिहावत हावय। ..... अहिल्या अउ वोकर दाई अब उदास रोवत  अपन घर चल दिस।

                   सिरतोन पहिली पंच परमेश्वर बनके गाँववाला मन नित-नियाव कर लेवय फेर अब जब ले एकता चौक के नाव धराये हाबे तब ले एको नियाव नइ होए हाबे। कभू ऊंच-नीच, कभू जाति-धर्म, पंत अउ अब तो राजनीति के नाव मा मार पीट हो जाथे चौक मा। जिहा सर्वसम्मति ले चुनई होवय उही अब बिन कछेरी अदालत जाय बिना नइ होवत हाबे। 

"अहिल्या तहुं चल कछेरी.....?''

सियान किहिस अउ रद्दा मा रेंगे लागिस। थाना अमरे नइ रिहिस अउ उदुप ले गाँधी चौरा मेर अमरगे दाऊ हा। वोकर संग गाँव के बड़का सियान पलटू राम घला रिहिस - शांति दूत बनके आए रिहिन।

"कहाॅं थाना-कछेरी जाथो दीदी ! जम्मो पुलिस वाला मन तो दाऊ के भक्त आवय। कोन सुनही तुहर गोठ ला ?''

"कोनो तो होही भईयाॅं  ये गरीबीन के सुनइया। दुख ला बताबो ते कोनो तो नियाय करही...।''

अहिल्या के दाई किहिस।

"ये सब तो आम बात आय बहिनी ! बड़े घर के लइका मन जवानी के जोश मा अइसन सब कर डारथे। येहाॅं कोनो बड़का गोठ नोहे आज के बेरा मा।''

दाई के आँखी अगियावत रिहिस। बोले बर अब्बड़ रिहिस फेर गोठ मुॅंहू मा रहिगे।

"ये दुनियाॅं मा टूरी मन तो बोझा ढोये बर आए रहिथे बहिनी ! मुड़ी ऊपर घर भर के बोझा, जिम्मेदारी के बोझा-पानी, लकड़ी, घास के बोझा अउ पेट भीतरी लइका के।'' 

"सबो ला सहे ला सीख वो ! नानकुन गोठ बर दोरदीर -दोरदीर थाना झन जा। पेट मा जौन बोझा हाबे तेकर उतारे बर जौन कीमत माॅंगबे देये बर तियार हावन।''

मूल गोठ ला दाऊ किहिस पल्टू राम के पाछू।

"बढ़िया बइदराज करा लेगबो। ऊॅंचा-ऊॅंचा जड़ी बूटी खवाबो  अहिल्या ला....तहान न रही बाॅंस न बनही बाॅंसुरी।

"अब बइदराज मन के दुकान बॅंद होवत हे दाऊ ! अब बड़का नर्सिंग होम मा अइसन बुता होथे। भलुक जादा पइसा लेथे फेर सादा ओन्हा पहिरइया मन येला सुघ्घर  गारंटी के साथ करथे। अहिल्या ला नर्सिंग होम पठोबो।''

पल्टू राम किहिस।

"...... अउ सुन !,  बुता के नागा होही तेकर सेती सौवा के कड़क एक बॅडल  लेग जाबे। समुंदर ले एक लोटा पानी निकालबे ते थोड़े कमती हो जाही ...? हम दाऊ हरन अउ दाऊ मन तो समंदर होथे,... समंदर। ....अउ ये पइसा ला हमू मन गरीब के मुहूँ मा थूक देन कहिके भुला जाबो ।''

दाऊ मेंछा मा ताव देवत छाती फुलोवत अहिल्या के कोख के बोली लगाए लागिस अब ।

"हाॅंव, दाऊ बने काहत हे। मान जा।''

सियान पल्टू राम फेर किहिस

"तोर बेटी के संग अइसने होतिस तब मान जातेस का पल्टू भईया !''

अहिल्या के दाई किहिस रट्ट ले। पल्टू राम के बक्का नइ फूटिस। मुॅंहू-मुॅंहू ला देखे लागिस। अहिल्या के दाई के रगरगावत आँखी ला देखे नइ सकिस अब दाऊ अउ पल्टू राम हा। दूनो कोई अब बोक-बाय ठाढ़े हाबे।

                      अहिल्या तो बेसुध रिहिस। पथरा कस होगे रिहिन न हुंके न भुंके। ... अउ दाई घला इकर मन के गोठ सुनके रो डारिस। तभो ले कछेरी के डेरउठी ला खुंदिस फेर पुलिस वाला घला हड़का दिस अब। 

"मजा लेये बर ये सब करथो ।.... अउ मन भरथे तहान रिपोर्ट लिखाए बर आ जाथो माई पिल्ला। इहाॅं पुलिस स्टॉफ के कमती हाबे अउ तुंहर मन के मजा के चक्कर मा हम फॅंस जाथन। भागो इहाॅं ले। रोज के कतका रिपोर्ट लिखबो।  ?'' 

थानादार धमका दिस। 

का करही बपरी सियान हा ? अहिल्या ला धरके लहुटगे अब। जी हतास होगे। न गाँव मा इज्जत बाँचिस न कोनो काम बुता दिस अब। गोसइया तो पहिलीच बितगे रिहिन। जम्मो नियाव के सभा हा अब कौरव के सभा होगे धृतराष्ट्र तो अंधरा रिहिस फेर आँखी वाला जम्मो कोई घला अंधरा बनगे। कोन हे अब गाँव मा ? शहर चल दिस अहिल्या ला धरके अज्ञातवास मा दाई हा। अब नवा चिन्हारी के संग जिनगी जिए ला लागिस दाई हा अहिल्या के संग। 

                        दूरपति के एक आरो मा आगेस किसन ! लाज बचाए बर। मोर देश राज ला बचाले दाऊ ! अब्बड़ झन दुस्शासन किंजरत हाबे छेल्ला। छत्तीसगढ़ के दुलरवा भाँचा राम तहुं हा शबरी दाई के आरो मा आगेस। ....मीठ बोईर ला खाके कहाॅं लुकागेस।  ....आ तोरो अगोरा हाबे बचा ले ये छत्तीसगढ़ ला ! अब्बड़ अनित होवत हाबे ये भुईयाॅं मा। रावण अउ मारीच ले जादा मायावी होगे हाबे इहाॅं के मनखे मन हा। फोक्कट पाॅंव भर परवाते रहिबे कि दरस घला देबे ये छत्तीसगढ़ मामी ला। अब तो आ जाना लबरा भाँचा-राम !

.......अउ सिरतोन मोहाटी के कपाट बाजिस अउ उदुप ले मोटियारी हा आके नहानी कुरिया मा खुसरगे सोज्झे सबरदिन बरोबर । जी हाय लागिस लइका ला देख के। अब्बड़ बेरा के अगोरा करत रिहिस बेटी माधुरी के। अहिल्या जम्मो ला गुन डारिस शहर के कुरिया मा बइठे अपन बेटी माधुरी के अगोरा करत। भलुक बड़का-बड़का महल अटारी बनगे आज फेर मनखे के सोच तो नइ बदलिस। महाभारत रामायण काल मा घला नारी अपन इज्जत ला बचाए बर छटपटावत रिहिन अउ आज घला। बेटी माधुरी संग कभु कोनो अनित झन होवय अब्बड़ डर लागे रहिथे अहिल्या ला। वोकर अंतस के पीरा तो आज घला हरियर हाबे कोट कछेरी चलत हाबे। कोन जनी कब नियाव होही ते...? वोकरे सेती अउ जादा डर्राथे अहिल्या हा। 

"जनक दुलारी, देवी तुल्य,वीरांगना, राजमाता रानी अहिल्या बाई के चेहरा मा उदासी कइसे दिखत हाबे आज। ....अउ ममतामयी करुणामयी जगत के पालनहार मोर नानी कही नइ दिखत हाबे।''

माधुरी मुचकावत आइस अउ दाई अहिल्या ला पोटार के इतरावत किहिस। अहिल्या लजागे।

"टार रे ! तोर आनी बानी के गोठ ला। ....तोर नानी हा परोसी काकी घर कोती बरी अमराये बर अभिनेच गिस हाबे। आ जाही झटकुन।''

गिलास भर पानी देवत किहिस दाई अहिल्या हा। 

"बता तोर आज के दिनचर्या कइसे रिहिस।''

"हमर बुता का हे दाई ! मार-काट, चीर-फाड़। जीभ के अकड़ होवय कि हाड़ा के अकड़। सब्बो ला सोझियाये के बुता करथन महतारी ! हमर तो रोज के बुता आवय दरद पीरा मा कहारत मनखे ला देखे के। दर्द भी हम है और दवाई भी हा...हा....।

माधुरी बताइस हाँसत। अदरक वाली चाय आगे रिहिस अब। 

"के महीना अउ बाॅंचिस तोर इंटर्नशिप हा ?''

"बस दू महीना अउ मोर राजमाता !  तहान ....अपन दुनियाॅं, ....... अपन अगास, अपन उड़ान.....। डॉक्टर माधुरी ला सरी दुनिया देखही दाई ! तोर बेटी अब्बड़ नाव कमाही, सब के ईलाज करही, रिसर्च करही वो संसो झन कर। ''

आँखी नचावत हाथ ला मटकावत किहिस मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट माधुरी हा। सिरतोन अहिल्या के सपना पूरा होए बरोबर लागत हाबे। तपस्या के फल मिलइया हाबे अब। अब्बड़ दुख पीरा सहे हाबे अहिल्या हा माधुरी के जीवन ला सिरजाये बर। प्राइवेट स्कूल मा काम वाली बाई के नौकरी करके बेटी ला डॉक्टर बनाए के सपना देखिस अउ लोन लेके जगदलपुर मेडिकल कॉलेज मा भर्ती करिस। अहिल्या के अंतस मा मया के इंद्रावती हिलोर मारे लागिस अउ अरपा पैरी आँखी मा उतरगे। दूनो हाथ उठाके आसीस दिस बेटी ला।

.... अउ बेटी ? वो तो फेर मसखरी करे लागिस।

"डोंट बी सो इमोशनल मेरी जान ! आई हेट टियर पुष्पा ! ये जो तुम्हारे आँसू है न ! वो आँसू नही, मोती है रे...! और इन मोतियों को सम्हाल कर रखो पुष्पा मेरी जान....!''

राजेश खन्ना के नकल करत किहिस माधुरी हा। वो तो जानथे दाई ला कइसे हँसाना हाबे तौन ला। अब दाई घला मुचकाये लागिस।

"दाई !  एक झन सियान भर्ती होए हाबे वो हमर मेडिकल कॉलेज अस्पताल मा। अब्बड़ दुख पीरा मा बुड़े हाबे। शुगर लेवल बढ़गे हाबे। काया काॅंटा होगे हाबे अउ गोड़ में लागे जुन्ना घाॅंव गैंगरिन बनगे हे जम्मो गोड़ सरत हाबे। वोकर गोड़ ला काॅंटे ला लागही।  बुधवार के अपॉइंटमेंट हाबे।''

माधुरी बताए लागिस।

"दाई ! मेंहा वोकर वार्ड मा जाथो तब अब्बड़ रोथे। कभु-कभु तो मोर गोड़ मा गिर जाथे अउ माफी माॅंगथे। पीरा के संग अहिल्या कहिके जोर से चिचियाथे। मोला माफी दे दे अहिल्या कहिके गिड़गिड़ावत रहिथे। ते मोर बेटी आवस कहिके दुलार करथे। आसीस देथे। अहिल्या बरोबर नैन नक्श हाव भाव चाल ढाल कहिके तारीफ करथे वो सियान हा। फेर....  वोकर घर के कोनो मनखे देखे ला घला नइ आवय। जरहागाँव के दाऊ भानुप्रताप नाव बताथे अपन नाम ला।''

अहिल्या के जी धक्क ले लागथे। छाती मा झूलत मंगलसूत्र मा हाथ जाम जाथे अउ मांग के कुहकु कोती धियान देथे। खनकत चूरी के आरो सुने लागथे।

"मोर बाबूजी आवय न दाई वो सियान हा। तेंहा सबरदिन मोला लबारी मारस न ! तोर बाबूजी हा परदेस गेहे खाए कमाए ला कहिके। बताना दाई ?''

अहिल्या अकचकागे बेटी के गोठ सुनके। सिरतोन कतका  अपमान करे हाबे दाऊ के टूरा भानू प्रताप हा। कछेरी मा अभिन घला केस दर्ज हाबे। भलुक पइसा के दम मा फाइल ला बंद करवा देहे फेर ....? भगवान शिव ला हलाहल पीए हाबे कहिथे फेर अहिल्या हा अपमान के कतका बीख पीये हाबे कोनो नइ जाने....? बिन बिहाये महतारी बने हाबे कहिके जौने जाने तौने हा बुरी नियत राखे। कतको बेरा फभित्ता सुने ला मिले। सोनपुतरी कस सम्हरे के उम्मर मा कोनो मेकअप नइ करे। कोन जन कोन कुकुर हा लार टपकावत आ जाही....? संसो करे।  खाली प्लॉट अउ भरे प्लॉट के ताना घला सुने। का करही बपरी हा ...? बिन बिहाव करे टूरी …....?  मंगलसूत्र चूरी अउ मांग मा कुहकू डार के  गिधवा मन ले बाचे के उदिम करे रिहिन अहिल्या हा।

"दाई !''

समुंदर के लहरा बरोबर जम्मो के सुरता आगे छिन भर मा। नोनी माधुरी के आरो ले चेतना लहुटिस अहिल्या के।

"दाई ! अइसन बेरा मा देवी-देवता के आरो लगाथे अपन दाई-ददा के आरो करथे फेर वो हा तोर आरो करत हाबे। भलुक अब्बड़ दुख - पीरा मा बुड़े हाबे फेर रात-दिन तोर अगोरा करत हाबे दाई। भलुक वोकर मुॅंहू नइ देखे के किरिया खाए हावस फेर जीवन भर वोकर नाव के सवांगा तो पहिरे हावस न दाई ! ....पान परसाद खवाए बर चल दे वोतकी मा वोकर जी जुड़ाही।''

"कइसे जावंव बेटी ? आज जब कोनो नइ हे तब सुरता आवत हाबे वोला मोर । लाचार परे हाबे तब सुध लेवत हाबे। तेंहा नान्हे रिहेस तब बस्सावस अउ आज जब तेंहा सबल होगे हस तब अपन बेटी कहिके अधिकार जतावत हाबे। ...... तेंहा मोर बेटी आवस पोगरी । मोर अउ सिरिफ मोर...!

अहिल्या रो डारिस।

"हाॅं...! डॉक्टर आवस तेंहा, सुघ्घर ईलाज कर। कोनो जिनिस के कमती झन करबे। न पईसा के,न दवाई पानी बर। डॉक्टर के धरम ला निभाबे।'' 

गाल मा ढूंलत आँसू ला पोछीस अहिल्या हा।

"......फेर वोकर आगू मा मेंहा कभू नइ जावंव। अपन गलती मान के अपना लेवय कहिके जीवन भर अगोरा करेंव फेर जब सुघ्घर रिहिन तब कभु हीरक के नइ देखिस अउ अब......? भलुक मेंहा जीवन भर वोकर अहीत हो कहिके कभु नइ गुनेंव फेर सबरदिन मोर अउ तोर अहीत हो कहिके उदिम करे हे वोहा। भलुक मनखे मन नियाव झन करे फेर  भगवान के घर नियाव होथे सिरतोन।'' 

अहिल्या रोवत कुरिया मा खुसरगे।

अब तोरे अगोरा हाबे राम ! शबरी अउ अहिल्या ला तारे हावस वइसना मोर छत्तीसगढ़ के भाग जगा दे। कब तक माथा के खियावत ले पाॅंव परावत रहिबे भाँचा ! अब मामी छत्तीसगढ़ के उद्धार कर दे।

अभिन घला आबे भाँचा राम !  दुराचारी रावण अउ  मायावी मारीच ला मारे बर। वोकर ले जादा आज के मनखे मन अगवा गे हाबे। अब रद्दा देखत हॅंव.........तोर अगोरा मा।

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

देवउठनी एकादशी अउ मांगलिक काज*

 *देवउठनी एकादशी अउ मांगलिक काज*

                 मां भारती के कोरा मा सुशोभित छलकत धान के कटोरा 'छत्तीसगढ़' अपन संस्कृति-संस्कार, परब-तिहार, बन-बाग, नदी पहाड़ अउ खनिज संपदा बर जाने जाथे। हमर देश भारत होय या फेर हमर राज छत्तीसगढ़, दूनो के परब तिहार, संस्कृति संस्कार अउ उछाह मंगल के जम्मो कारज खेती किसानी के अनुसार चलथे। कतको झन मन प्रश्न करथें, कि कोनो भी मांगलिक काज देवउठनी एकादशी के बाद ही काबर करना चाही? कतको विद्वान में एखर कई कारण बताथें, फेर मूल कारण खेती किसानी अउ मौसम ही आय। देवउठनी एकादशी जेला छत्तीसगढ़ मा जेठवनी के नाम से जाने जाथे। ये दिन ला छोटे देवारी के रूप मा घलो मनाये जाथे। मनखें मन पूजा अर्चना, दान धरम करत फाटाका फोड़थें अउ खुशी मनाथें। ये दिन कतकोन गांव मा मातर होथे, गोधन ऊपर सोहाई बन्धाथे ता कतकोन कोती मड़ई मेला भराथे। संझा मनखें मन अपन तुलसी चौरा के तीर मा सुघर मंडप बनाके कुसियार अउ तोरन ताव ले सजाके, रिगबिग रिगबिग दीया जलाके भगवान सालिग्राम अउ तुलसी दाई के बिहाव के नेंग करथें। पूजा पाठ के बाद घरों घर प्रसाद दिए जाथे। वइसे तो कतकोन मन हर एकादशी के उपास रथे फेर देवउठनी तिहार के उपास के अलगे महत्ता हे। कथे ये उपास रहे ले सबे उपास के पुण्य प्रताप मिल जथे। महाभारत काल मा महाबली भीम हा घलो एकमात्र इही एकादशी के उपास रिहिस, जेखर ले प्रसन्न होके, भगवान विष्णु हा ओखर नाम ले एक अलग तिथि मा भीमसेन एकादशी व्रत अउ व्रत करइया मन ला विशेष पुण्य प्राप्ति के वरदान दिस। पौराणिक कथा अनुसार भगवान विष्णु देवउठनी एकादशी के चार मास के योगनिद्रा ले जागथे, ते पाय के ये तिहार मनाए जाथे। भगवान विष्णु के जागे के एक अउ कथा मिलथे- मुर नामक एक दानव हा भगवान विष्णु ला सुते देख ओखर ऊपर हमला कर देथे, जेखर ले विष्णु जी के निद्रा भंग हो जथे अउ 11 इंद्री ( 5 कर्म इंद्री+5 ज्ञान इंद्री+मन) के तेज ले एक दिव्य देवी उत्पन्न होथे, जे वो दानव के वध करथे। ये दिन घरों घर होवइया तुलसीविवाह के घलो पौराणिक कथा हे। एक समय रानी बृन्दा के सतीत्व के कारण ओखर पति राजा जलन्धर बहुते शक्तिशाली हो जथे, अउ अपन शक्ति ले देव अउ ऋषि मन ला सताएल लग जथे, ओखर वध बृन्दा के सतीत्व के कारण कोई नइ कर सकत रहय, ते पाय के भगवान विष्णु हा लोकद्धार बर छलपूर्वक रानी बृन्दा के सतीत्व ला भंग करके, जलन्धर के संहार करथे। जब ये बात बृन्दा जानथे ता भगवान विष्णु ला पथरा होय के श्राप दे देथें, अउ खुद सती हो जथें। उही पथरा सालिग्राम के रूप मा आजो पूजे जाथे, अउ रानी बृन्दा जेन जघा अपन आप सती करे रिहिस वो राख ले तुलसी के जन्म होथे। तब ले तुलसी अउ भगवान सालिग्राम के विवाह के चलागन हे। 

                आसाढ़ के देवशयनी एकादशी ले लेके कातिक के देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु जब योगनिद्रा मा रथे, ता पृथ्वी के पालन पोषण भगवान महादेव सपरिवार करथें। ते पाय के आसाढ़, सावन, भादो अउ कुवाँर भर उही मन ला सुमिरथन। चाहे पोरा तिहार मा नन्दी महाराज होय, नांगपांचे मा नांग देवता होय, सावन सोममारी मा शंकर जी होय, तीजा मा पार्वती होय, गणेश चतुर्थी मा गणेश जी होय या फेर नवरात्रि मा मां भगवती। देवउठनी के बाद भरण पोषण के काज फेर भगवान विष्णु अपन हाथ मा  ले लेथें अउ जम्मों प्रकार के उछाह  मंगल के काज होएल लगथे। उछाह मंगल के काम देवउठनी के बाद होय के एक अउ महत्वपूर्ण कारण हमर कृषि परम्परा आय। काबर कि चतुर्मास(चौमास) भर बादर ले पानी बरसथे, घर-खेत, गली-खोर जम्मो कोती चिखला रथे, आदमी मन आये जाये मा असहज महसूस करथें, संगे संग खेती किसानी के बूता घलो चरम मा रथे अउ बरसा घरी जर बुखार के घलो डर रहिथे, एखरे सेती कोनो भी जुड़ाव अउ उत्सव के काज मा सब सपरिवार शामिल नइ हो पाए अउ व्यवस्थापक ला सहज व्यवस्था करे मा घलो कतको  दिक्कत होथे। ते कारण देवउठनी के बाद के समय ला अइसन काम बर  चुने जाथे। ये समय पानी बादर लगभग बन्द हो जथे, गुलाबी ठंड जनाय बर लगथे अउ धान पान के बूता घलो उसरे बर लग जथे। अइसन बेरा मा बर बिहाव, छट्ठी बरही, पूजा पाठ, भगवत रमायन, मड़ई मेला सब उत्साह अउ मंगल ले सबके उपस्थिति मा सुघ्घर ढंग ले निर्बाध सजथे। 

                       ये दिन घर भर भगवान के भक्ति मा लीन रथे। बिहना स्नान ध्यान के साथ पूजा पाठ चालू हो जथे। घर ला सुघ्घर रंगोली अउ तोरण ताव मा सजाये जाथे। आमा पाना अउ गन्ना के मंडप बनाये जाथे। घर के कतको झन उपास रथे अउ दीया जलाके, मेवा मिठाई, फरा चीला अउ नरियर के प्रसादी चढ़ाथें। ये दिन आयुर्वेद में विशेष स्थान रखइया तुलसी के पौधा लगाए अउ जतन करे के संकल्प लिए जाथे। कथे जे घर तुलसी के पौधा हे वो घर मा सुख समृद्धि अउ शांति रहिथे अउ इही सुख समृद्धि, शांति अउ दया मया के पावन परब आय देवउठनी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)