-
*होरी के मउका म महराजिन त्रिपुर सुंदरी अउ ठकुराइन सोनकली के जिद -बाद अउ नोंक झोंक के आनन्द लो।कथा म आते कन्हैया के गोठ आही।फेर वो लाला नन्द लाला बर का होरी कि का आठे कन्हैया।वो तो गुणातीत ये।सबो गुण अवगुण तो हम मनई मन भर ये...*
*विश्व रूप दरसन*
---------------------
(लंबा छत्तीसगढ़ी कहिनी)
1 .
पुन्नी के चन्दा अगास म फरियात हे ।रगबग चटक चंदैनी बगरत बगरत महराज सदानन्द के परसार ल घलव छू डारे रहिस ।महराज अउ महराजिन.... दुइक -दुवा अभी ।दु ठन नोनी बिहा के अपन ससुराल म हें, अउ दउ हर शहर म नौकरी पा गय हे ।
महराज, नियम- धरम बर पक्का।उंकर बस चले त दिवसावसान होय के पहिली ही वो रात के जेवन कर लेथिन; फेर रसोई विभाग हर तो उँकर जिम्मा म तो रहे नहीं ।अउ जेकर जिम्मा म रथे, वो ये महराजिन त्रिपुर सुंदरी ।
अउ महराजिन ल महराज के बुता- काम म हर बुता कम भेवा जादा लागथे ।तेकरे बर कभु भी महराज ल सूर्यास्त- पारायण के शुभ अवसर नइ मिल पाय ।वोतका बेरा तो उँकर चूल्हा हर सुलगथे । फेर आज कौन कोती के राजा के चला चली होय हे, तब महराजिन हर बर्तन -भांडा ल संकेल के ये पूरब म उवत सुधाकर के सुधा पान करत हे ।
"खा डारे ओ,महराजिन ।"सोनकली ठकुराइन निकलिस अपन मुहटा ल ।
"हाँ..।"
"ठीक हे, फेर मैं साग नइ पूछत अंव न।मोला तोर अलवा- जलवा साग ल पूछे बर घलव नइ ये।"
"का कहे रे न**इन !मोर साग अलवा- जलवा अउ तोर हर चोखट ।"महराजिन एकदम भड़क गय रहिस ।
"ह ओ ब***नीन, देखे गोठ -पतियाये गोठ तो आय ,तोर साग- पान हर।रान्ध बे मुनगा काड़ी तउन म माड़ी भर के झोर ।अइसन तो रथे तोर साग भात हर ।वो तो नेम धरम के पक्की -पक्का महराज,कहे कुछु नही तोला अउ आंखी कान मूंद के गट.. गट.. लील देथे बोपरा हर ।हमर ठाकुर करा तो तंय एकदिन भी नइ चलथे ओ ।"
"पानी पी ले सोन कली,तब फिर बखानबे अउ उखा*बे ।"महराजिन तीर म धरे लोटा ल वोकर कोती अमरत कहिस ।
अब सोनकली सिरतो म चुप पर गय रहिस । महराजिन तो मुचमुचात रहिस ।अतका तो येकर रोज के बुता ये ।फेर कभु- कभु येकर गोठ ले ,जी हर बम बिया घलव जाथे ।
"महराजिन...!" भीतर कोती ल महराज के गोठ हर उदगरत रहिस । महराजिन सुनिस ,फेर वोकर जवाब नइ दिस
"ये महराजिन...!'अवाज हर थोरकुन उंचहा आइस ।
"रा... हा ... न थोरकुन।" महराजिन ललकारत कहिस महराज ल ,"करत रहा न बने पारायण ,काके करत हव तेला।रमायन के ये सुखसागर के तेला ।"
"तंय बझ झन काकरो करा बस ।"
"माने मंय जनम रेन्धही अंव।"
"मैं तो अइसन नइ कहत हंव ।"
"तव फेर काय कहत हावा तुँ ।"
"ले बबा ,बझ- लड़ काकरो करा ...।"
येला सुनके सोनकली खुश ...खुश..हाँसत रहे।देखे महराजिन, तंय मोला झगड़हीन बनाथस,तोला खुदे तोर गोसांन हर झगड़हीन करार देवत हे ।
"अरे तंय ,काकर करा लड़बे महराजिन, मोर छोड़ आने करा ।"सोनकली पांच परगट कहिस ।
"तंय मोर करा का खा के लड़बे रे नवा**न"
"देख..देख..तोर भाखा ल।जीभ ल बने सम्भार के राख । वह दे महराज सुनत हे नही त जना देय रथें तोला अभी ।"सोनकली के ठनकत आवाज सुनइ परिस ।
"महराजिन...!"महराज के भयग्रस्त अवाज फेर सुनई परिस।फेर येती महराजिन बर, का ये न का..।
"जा ओदे ,बेर हो जावत हे।"सोनकली कहिस अउ भेदहा हाँसी हँसे लागिस । ये पइत महराजिन थोरकुन हथियार डाल दिस।वोहर थोरकुन सकुचा घलव गय रहे ।
"नइच जाँव अभी,हाँक पारन दे,महराज ल "सुंदरी महराजिन कहिस ।
"तोर मन दइ,...!कह पारत रहेन ओ ।"सोनकली कहिस अउ चुप हो गय ।
"काय कहत ..र ..रहे,वोतका बेरा।बड़े ठाकुर मन के बड़े तलवार रथे , रणभूमि म जाये बर...।अउ तुमन छोटे ठाकुर अव, तेकर बर तुमन के तलवार हर छोटे रथे।वाह रे..,छोटे तलवार..! छुरा देवता...!"
"हाँ..!येहर तो सच आय ।एमे कोनो शंका नइ ये ।"सोनकली हाँसत -हाँसत कहिस ।
महराजिन अब अपन आँट ल उतर के खोर -गली म आ गय रहिस ।एक प्रकार ले ठकुराइन के तीर म ।माने तंय महराज के लिहाज करके वोला जवाब देवत हस ,तब आनन्द नइ आवत ये ।अब बोल तोर बोलवाही ल ,चिटिक महुँ सुनों..का बोलथस तंय हर ।
अतका बेर म चन्दा हर पुरा फरिया के झक्क- सादा बरफ के गोला बन गय रहय ।महराजिन वोला निच्चट कर के देखत रहय ।वोला अइसन देखत देखिस,तव ठकुराइन फेर भेदहा हाँसी हाँसिस।
"अब तोला का हो गय ।"महराजिन कहिस ।
"मोला का होही, चन्दा ल तो तइच हर देख मरत हस ।"
"वो तो कतेक सुंदर दिखत हे..।"
"होही..।" ठकुराइन सरपट उत्तर दिस ।
"का चंदा हर तोला सुंदर नइ लागत ये ।"
"अरे हमर साही मन ल तो लगबे करिही, जउन मन महीना दिन म एक पइत देखे पाथन ये चन्दा ल,फेर.....?"
"फेर....का फेर..?का अधूरा बंचा देय अउ।"महराजिन थोरकुन अचकचावत कहिस ।
"वो अइसन ये ओ महराजिन, हमन महीना म एक दिन देखे पाथन पुन्नी के चन्दा ल अउ तंय तो रोजीना -चौबीसो घड़ी देखत हावस अइसनहेच चांद ल,तेकर बर,का के पुन्नी के चन्दा के सुघरई...!"
"मंय चौबीसों घड़ी देखत हंव...चन्दा ल,तोर काय मतलब...?"सुंदरी महराजिन सिरतोन म जंगा गय रहिस ।
"अरे चौबीसों घड़ी नइ देखत अस अपन महराज के मुड़ वाला चन्दा ल ।एकदम चिलकत....एकदम.. चिक्कन....!"
"रा ...रे बंजर का कहे तंय,तोला मंय बतात हंव ।"सुंदरी महराजिन तो एकदम वोकर कोती कूद परिस ।
"महराजिन ,नइ सुनस का...!,महराज के थोरकुन रिस मिंझरा गोठ फेर हवा म तउरिस ।
"जा ओ महराजिन जा।वोती जी हर छुटिच जाही ,तब फेर तैय जा के का करबे ।"
"तंय चुप भी कर ,अब छि**र कहीं के ।"
"देख.. देख.. तंय अपन जिभिया ल सम्भाल , नही त,"ठकुराइन सिरतोन जंगाय के शुरू कर देय रहिस ।
तंय रे... कहत महराजिन सिरतोन ठकुराइन के चुन्दी ल जाके धर लिस ।
"इया.. इया.. कइसन करत हव ,महराजिन येकर चुन्दी ल। कालेच चुन्दी झन झरही कह के झरन तेल लाने हंव।अउ तुँ एके पइत म एक गोंछा ल नीछ देवत ह।"ठाकुर जगजीवन ठीकेच ये बतर म आ गय रहीस ।
महराजिन ठकुराइन ल छोड़ के अपन भीतर कोती जाय लागिस।वोतकी बेरा म सदानन्द महराज पीतल बाल्टी म भरे पानी ल महराजिन उपर उलद दिन..जा बनेच गर्मी हो गय हे, तेकर सेथी अउ नहा के आ..कहत । महराज के शौच -अशौच विचार हर बड़ प्रबल रहिस ।ठकुराइन के चुन्दी ल धरे माने स्पर्श दोष तो लगी गय।अब बिन स्न्नान घर म प्रवेश वर्जित ...!
2
कभु कभु महराजिन ल रात रात भर नींद नइ परय ।वोकर कारण, महराज हर बिन मेहनत चोखट भोजन ल बताथे ।
आज घलव वइसनहेच होवत हे।जब तक सोनकली ठकुराइन ल नीचा नइ देखा लिही तब तक सुंदरी महराजिन ल चैन नइ पड़य ।
तोला तोरेच घर म घुस के पटकनी देंहा , तब तोला समझ आही , मैं कोन अंव तेहर ...महराजिन गुनथे,अउ मने ..मन ..म का.. न ...का.. खिचडी पकात रहिथे ।
"ठकुराइन, नाश्ता -कलेवा हो गय का..?"।महराजिन ठनकत अवाज म पूछिस।येकर गहिल अर्थ रहिस,अगर ,फुरसत हो गय होबे त आ अब वाक-युद्ध शुरू करी ।
"रा ..ना..!ठाकुर हर गंवई गइन हें।आके कलेवा करहां कहिके गय हें ।
"कतेक गंवई करथे ठाकुर हर,कभु देखबे त गंवईच गय हे ।"महराजिन थोरकुन तमकत कहिस ।
"तोर घर के महराज नइ जाय का ,अपन जजमानी म।"
"वो जाथें तब ठाकुर ल घलव ले जाथें संग म ।अउ जतका अपन पाथें ,चढ़ोत्तरी म वोकर ठीक आधा ओहु ल देवाथें । "
"ये बुता ल महराज हर तो, बढ़िया च करथें ।वो बोपरा तोरे कस कचकचहा नोहें ।सदा प्रसन्न रहइया जीव । हां ..बार-बाछ हर थोरकुन जादाच हो जाथे कभु -कभु ।"
"येई च हर तो ब्राह्मण के निशानी आय ,ठकुराइन । पूजा- पाठ, धरम -करम..येइच म तो दुनिया हर टेकाय हे, ठकुराइन । नही त दुनिया हर रसातल म नइ चल देथिस ।"
"ओहो रे मोर धरम -करम ।वो बोपरा अपन मन के शान्ति बर पूजा -आचा करथें ।"
"महराजिन.....!" महाराज के हाँका फेर गुंजिस ।
"वह दे ,महराजिन ,महराज तोला फेर हाँक पारत हें ।"ठकुराइन कहिस ।
"पारन दे,उंकर तो बस एइच बुता ये ।"
"तब ले ओ..!" ठकुराइन कहिस अउ महराजिन के मुख ल देखिस ।
"तोर ठाकुर का का बुता करथे, ठकुराइन ।"महराजिन जइसन प्रण कर डारे रहिस के ये ठकुराइन ल धर के दबोचना च हे ।
"ठाकुर हर 'क्षौर -करम' के सब बुता करथे,फेर तोर घर म आधा च लागथे ।"ठकुराइन भेदहा मुचमुचात कहिस ।
" वो कइसन आधा लागथे हमर घर ओ।"महाराजिन थोरकुन भकचकात कहिस ।
येला सुनके ठकुराइन कुछु कहिस नहीं ।वो तो अब ठाकुर के रास्ता देखे के शुरू कर देय रहिस ।
"महराजिन....!!" येती महराज के हाँका फेर पर गय । फेर महराजिन अपन अभियान ल पिछु नइ हटिस ।अउ अभियान रहिस, कछु कर के ठकुराइन ल गोठ बात म चित्त कर दिया जाय ।
"तंय कइसे कहे ठकुराइन, हमर घर के बुता कइसन म आधा लागथे ।
"वो वइसन ये ।महराज के तो बस दाढ़ी- मेंछा भर बनाय बर लागथे ओ,बाकी हर तो बस सत्य नारायण ये ...!"ठकुराइन कह दिस फेर अपन हाँसी ल रोके नइ सकिस ।
वोकर हांसे के गूढ़ार्थ ल महराजिन समझ गइस । अरे ये का...!येला मैँ गोठ घेरहां कहत हंव ,अउ इहाँ मैं खुद घेरा जावत हंव।
"सोनकली,तंय महराज के ऊपर ऊपर ल देख के हाँसत हस ।देखे हस उंकर मेंछा ल ।तारा जोगनी संग अगास हर गिरे लागही तब वो अपन ठाड़ मेंछा म वोमन ल झोंक लिहिं ।"
"बने कहे...।"
"मोर महराज के ठाड़ -ठाड़ मेंछा,अगास कोती जावत अउ तोर ठाकुर के तरी ओरमत मेंछा ,जाने माने धरती माता हर वोमन ल खीँच लेवत हें ।"
"वो तो उंकर हाथ के बनाय बनोरी ये महराजिन ।मोर ठाकुर हर तो मेंछा मास्टर ये ,वोकर जेती मन लागही तेती गजुम लीही
ओमन ल ..।" ठकुराइन कहिस,"तंय जाबे कि नहीं ,तेला तंय जान।फेर मैं अब जावत हों ,काबर के वह दे मोर ठाकुर आवत हे ।
महराजिन अबक्क ठाढे रहिस।वो खुद तय नइ कर पात रहिस के बाजी ये पइत काकर हाथ म हे ।
थोरकुन बेर बाद म ठकुराइन घर ल बाहिर निकलिस।तब का देखथे, महराजिन जाड़ म कुड़कूड़ात तरिया ल फेर नहा के आवत हे।अब रसोई बनही ।अउ शुचिता म सदानन्द महराज कोई समझौता नइ करेंय ।
वोला अइसन जाड़ म कुड़कूड़ात देखिस,तब ठकुराइन फेर मुचमुचा उठिस ।
"तंय कइसन भी हाँस बे मोला, तब ले भी तोर तीर म नइ जाओ ।महराज, देखहीं तब फेर वापिस तरिया भेज दिहीं।"महराजिन तो फेर ठाढ़ हो गय रहिस।
"महराजिन, तंय मोला तो ओझिया -बतरा घलो डारे,अब ।जा....जा...भीतर कोती जा नहीं तव ठिकाना च नइ ये ।"अइसन कहत ये पइत खुद ठकुराइन अपन घर भीतर कोती आ गय ।
3
महराज सदानन्द अपन ब्राम्हणत्व बर बहुत ही सचेत, वोतकी महराजिन त्रिपुर सुंदरी हर बिन्दास...!महराज के लाख हरके- बरजे ल भी महराजिन अवइया -जवइया मन ल दु चोंच नइ मारही,तब बनबे नइ करय ।
आज भी ये जगह म महराज के एकछत्र राज चलथे । बिना कछु भय के ही जनता -जनार्दन हर उंकर आगु म नत मस्तक रथे ।येकर मर्म ल महराज हर अच्छा तरीका ले जानथें ।वोहर आय उंकर कर्म काण्ड अउ सुचिता । थोरकुन समाज ल दूरी बना के रइबे,तब तोर प्रभा- मंडल सदाकाल अइसनहेच बने रही । येहर उंकर बर अधिकतम कुटिलता ये।येकर ल आगु वोहर अपन स्वार्थ बर अउ आन कछु नइ ज जानीन । सदा प्रसन्न राम हर उंकर आराध्य आँय ।अउ वोई मूर्ति ल अपनों म उतारे के प्रयास हर ही उँकर जीवन उद्देश्य घलव ये ।
फेर महराजिन के मन आय ,तब न...!जब तक वोहर दु -चार लइका मन के मूड के जुंहा नइ देख लीही, अउ खुद के मूड़ के एक दु पाकत चुन्दी मन ल,पड़ोसिन नावा बहु- बोहासीन मन करा ले सुलरवा
नइ लीही, तब तक वोकर दिनचर्या पूरा नइ होय।अउ महराज देख डारिन,तब येकर सजा....वोइच तीर के तरिया ल स्न्नान करके ,कइनचा ओनहा पहिन के घर म घुसर ..। कै पइत तो महाराजिन ल पांच... पांच पइत तक ल नहाय बर पर गय हे,दिन भर म ।
अउ ये सजा हर महराजिन ल अइसन सिझो देय हावे कि अतेक नहाय ले भी उनला कुछु फरक नइ पड़े । न.. जर ..न ..जुड़..न छींक ...न..खाँसी ,कुछु भी नहीं । महराजिन बर येकर लिये महराज करा लें कुछु भी छूट नइ ये ।
महराज के पूर्वज मन ही ठाकुर के पूर्वज मन ल ये तीर म बसाय रहीन हें , काबर के बनेच अकन कर्म काण्ड म ठाकुर के उपस्थिति हर जरूरी होथे। मर मिट म पिंडा धारे के बेर म परसा पान के खोनिया बना के लान थे ,चुरी - चाकी ल पानी नहाय के बेर घाट म अपन छुरा ले....। बिहाव पढ़े के बेर म ,वोहर तो महराज के हाथ -पाव बने रइथे । येकर सेथी ठाकुर हर महराज के पूरक आय ,कहके ये महराज घर तीर म वोकरो उपस्थिती हे ।
फेर सदानन्द महराज अपन पुरखा के चलागत ल कस के अपन म राखे हे ।अउ ठाकुर करा क्षौर कर्म कराये के बाद,स्न्नान ध्यान बर बराबर सचेत रइथे । अउ ठाकुर हर दिन के पहिली बुता करही, तब वोहर महराज के बुता रइथे ।
महराज महराजिन ल कै न कै पइत चेताथे । बिना काम ..अकारण काकरो आन के देहरी झन खुंद । फेर महराजिन अइसन भलमनसी वाले जीव आय ,के कोई झगड़ा- झंझट होवत देखही, तव घर -भीतर ल खुसर जाही । समझाय बुझाय बर ।कोन्हों रिसाय फुलाये हें ,तब महराजिन हावे वोला मनाय बर । ये बेरा म वोकर आत्मीयता हर देखतेच बन थे ।फेर महराजिन हर निज नारी पुरुष मन के लड़ई भिड़ई, म अतेक दखल दे देवत हे ,ये समय म ।
परनु राउत ,ये गांव के बड़ डिंगर जीव ।एक दिन दुनो राउत- रौताइन कुछु जिनिस ,बर तीरा -घिंचा होवत रहीन।फेर बात महराजिन के कान म खुसर गय ।वोइच दे,तुरत- ताही महराजिन पहुंच गय उँहा ।समझाइश देवत हे दुनो झन ल ।समझाइश कम डांट -डपट वोकर ल कतको जादा। तरी मुड़ करके दुनों के दुनों हाँसत हें, अउ येती महराजिन त्रिपुर सुंदरी ,वोमन ल पानी पी ..पी ..के समझात
रहिस । बनेच बेर म वोमन मानिन ।महराजिन ल एक पइत अउ पानी मंगा के पिये बर लाग गय।
"तुंहला इंहा पानी पीयत देखहीं ,तब महराज हमन बर जंगाही,महराजिन ..!"
"ठीक हे, अब बने रइहा।मैं अब जावत हंव " महराजिन कहिस अउ उँहा ल निकल आइस ।
एकर बाद तो महराजिन बुता च कर देय रहिस।आत -जात,भेट- मुलाकात हरदम वोमन के खोज -खबर लेये के।बने राखथे ये पइत के फिर वोइच दिन कस डिंगरई करत हे । कनहुँ मारा पीटा तो नइ करय ।
बने रान्ध पसा के देवत हे के बारा भिभो करथे,मुँहू फूलोय रइथे के बने हाँसथे गोठियाथे । देखबे दउ, अउ कहाँ जाही वोहर तोला छोड़के ।
परनु तो ठहरिस डिंगर मनखे...।महराजिन के अइसन पूछ परख ल अस्कटाके वोहर अपन रौताइन ल कहिस-अतेक ध्यान तो तोर हमर दुनों के महतारी- बाप मन नइ राखत ये।
रउत,वोकर कान म कुछु फुसुर.. फिया ..करिस ।
"ये... ये...!येहर नइ बनय ।"
"तब फेर जिनगी भर,येकर उपदेश सुन ।"
"हे ..हे..!नहीं.. नहीं..! तब ले भी..।"
"चुप्प..!"रउत दलकारत कहिस,"जइसन मंय बोले हंव, ठीक तोला वइसन करना हे ।"
"असतिया...!"रौताइन घलव हाँस डारे रहिस ।
राऊत घर किल्ली गोहार परत हे ।ठक ...ठीक ..परवा ..टाटी टूटे- फूटे के अवाज आवत हे।
"कइसे रे..फेर का हो गय, तुमन ल मोर अतेक समझाय के बाद घलव ।"महराजिन दहाड़त खुसर गइस ,मोर्चा बीच म । राऊत बड़का तेल पिया सटका ल धर के रोताईन ल कुदावत हे।रौताइन येती ...ओती..भागत हे, अपन जान बचाय बर।
..ये महराजिन दइ, बचावा.. बचावा.. कहत रौताइन वोला पोटार लिस ।राऊत आ गय, बड़ गुस्सा म हे वोहर । अरे ..अरे..पापी ..असतीया मारीच दारबे,अबला ल का ।घोर नरक म जाबे ।
महराजिन छोड़ा तुँ येला.. छोड़ा ।रौताइन किंजरत हे। वोकर ले नजर मिल गइस राउत के तब वोहर वोला आंखी मार के मुचका दिस ।इशारा म झनीच छोडबे महराजिन ल...!राउत डिंगर...मउका देख के महराजिन के पोठ माँसल कुल्हा म बने एक सटका थोरकुन जनाय के लाइक जमा दिस ।
"हरे मुरहा,मार डारे रे..."कहत महराजिन राउत घर ल भाग परइस ।
पीछू दुनो राउत -रौताइन महराज घर जाके महराजिन करा ले मुँहू ल छबकत माँफी घलव मांगे गय रहीन ।
फेर तब तक ल महराजिन अपन आन घर जाय के सजा...तरिया ल स्न्नान कर के आवत रहिस ।
"चोट्टी -चोट्टा हो ,ठग- ठियाली के लड़ई होके मोला एक सटका मार देया ।" महराजिन घलव हाँसत रहिस, रौताइन ल देख के ।
वो दिन ले थोरकुन कम हो गय रहिस, महराजिन के आन -आन के घर जवइ हर ।
फेर ठकुराइन करा तो महराजिन के पेंच हर अरझेच रइथे । वो दिन के तना - तनी हर तो जितीच गय रहिस ।दुनों के दुनों विचित्तर शर्त लगा दारें रहिन ..! हाँ.. फेर ठकुराइन आश्वस्त रहिस कि जीत तो मोरेच होही।काबर के वोकर य
ठाकुर ,वोकर गोठ ल सुनथे, बरोबर सुनथे । हाँ... हिम्मत भर करे बर हे ।अउ ठाकुर हर वोकर खातिर करही घलव । अउ महराज करा महराजिन के एको नइ चलय ।अउ महराजिन शर्त लगा बइठीस अतेक बड़े ।
4
बाजा रुंजी घिडक़त रहिस । परोस के परसादी के बेटी के बरात आये हे । बरात ठीक बेरा म आ गय हे । ठीक बेरा म पइरघई हो जाथे ,तब सब कुछ ठीक - ठाक निबट जाथे।
समधी भेंट हो गय । सदानन्द महराज द्वारपूजा बर मुंहटा म बइठीन । तीर म अतेक लइका -पिचका मन चुटा मरत रहिन, के ठाकुर ल अपन विचार ल बलदे बर लागिस ।
द्वार पूजा, मउर सेंकई के बाद दुल्हा मंडवा तरी म आ गय ।उँहा तो महराज वोकर ले पहिली आ के विराज गय रहिन ।आन आन धुरिहा गांव ल बिहा पढ़े जाय बर लागथे,तब आज मउका मिले हे घरेच तीर म बिहा पढ़े के,येकर ल अउ का सुख लेबे । महराज तो आज अपन खास पीताम्बरी धोती ल पहिने हें । उंकर चेहरा म अभी ले विजेता के भाव तउरत हे।
फेर महराजेच काबर, ठाकुर जी के भी के संग भी तो एइच गोठ हे।पर वोहर अभी बड़ तनाव म दिखत हे ।अतका तनाव तो बधु के ददा परसादी के चेहरा म नइ ये ।
वोहर एक पइत ये मुड़ी जाथे मंडवा के,त कभु वो मुड़ी जावत हे।
वोतकी बेरा वोकर ठकुराइन सोनकली आ गय ,बर -बिहा देखे बर । वोला आवत देखिस,तब ठाकुर के चेहरा हर कठोर हो गय ।
थोरकुन बेर बाद म वर पक्ष ले लाने समान मन के पूजा- आंचा करके सुवासीन मन ल लड़की ल पिंधाय ओढ़ाय बर अंदर भेज दिन ।
अब एक परकार ले महराज के जगह हर सुन्ना हो गय, कन्या के आवत ल ।येती ठाकुर , महराज के तीर म गइस,अउ अवइया संकट ल बेखबर बइठे महराज ल अपन दुनों बलिष्ठ भुजा म धर के उठा दिस ,दशानन रावण कस ।अउ उतारे के बेर थोरकुन महराज ल पटके कस घलव कर दिस ।
महराज तो अबक्क...!!फेर सबो कोती हाहाकार मच गय । ठाकुर हर महराज ल अलगा दिस ।ठाकुर.. हर....महराज ल मार डारिस ।महराज ल धर के पटक दिस ।महराज ल कचार दिस ।
"महराजिन ,महराजिन कइसे दइ, तंय आज इंहा घर म खुसरे हवस।अउ वोती ना* हर तोर महराज ल पटक -पटक के मार डारिस हे ।"
"ये नवा*न , भइगे जीत डारिस ।" महराजिन के मुख ल बड़े आराम से निकलिस ।
येला सुनके जउन महिला बेचारी, इहाँ तक शोर बजाय आये रहिस,वोकर मुंह सुख्खा के सुख्खा हो गय ।वो कुछु भी समझ नइ पाइस ।चुपे चाप वोहर फिर आइस उहाँ ल ।
येती गुड़ी पंचायत के नौबत आ गय रहे।परसादी हर ठाकुर बर बड़ रोसियाये रहय ।वोला तो महराजेच हर शांत करिस.. येला बेटी विदा करे के बाद देखबो .. कहत।परसादी तो अपन बिहाव मंझ म रंग म भंग होय के कारण बड़ दुखी रहिस ।
ठाकुर ,अब महराज आगु म दण्डाशरण परे हे। भुइंया म घुण्डल घुण्डल के माफी मांगत हे.... त्रिया हठ.. महराज त्रिया ..हठ !
"का...!"
"हाँ..! भरे सभा म तुंहला अलगा के दिखाना ।ठकुराइन के महराजिन करा शर्त लगे रहिस।ठकुराइन के कहे ल ठाकुर मानथे। मानथे तव ये मुश्किल काम ल कर के बता ।"
"महराजिन तंय अब महू ल पांचाली असन दांव म लगाय के शुरू कर देय ।"महराज थोरकुन रिस मिंझरा गारी महराजिन ल दिन।
"चल सोनकली के भक्त..,येती माड़ी कोहनी ल छोल देय।अब बर बिहा म चेत कर ।"महराज ठाकुर साहब ल झिड़कत कहिन ।
" मैं थोरकुन स्न्नान कर के आवत हंव।वोतका ल नोनी ठीक तइयार होये सके रहही,परसादी गौटिया ..।महराज कहिन अउ स्न्नान करे बर अपन घर डहर चल दिन ।
येती मुँहटा म महराजिन उंकर स्न्नान बर धोआ कपड़ा धर के खड़े रहिन ।
"महराजिन बड़ नाम कमाये ,न...!"महराज थोरकुन रिस म कहिन ।
"फेर ठकुराइन हर जितीच तो गय।अउ तुँ मोला कभु भी जितवावा तो नही ..!"महराजिन महराज ल कपड़ा धरावत कहिन ।
5
आज भी पूर्णमासी ये ।फेर अगास म बादर छाय हे, तेकर सेथी रग ..बग ल चंदैनी हर नइ दिखत ये ।तब ले भी चन्दा रात के अंजोर हर दिखतेच हे।सावन- महीना म ही, ये बच्छर बरसात हर एकदम गझा गय हे ।
खँचवा-डबरा सब भर गय हे ।तरिया लबालब भर के उल्टा लहुटत हे । पानीच ..पानी..पनिहर हो गय हे ,सब कोती हर ।
फेर झिंगरा मन के ये सिटी के तो का कइबे।
रांधे -पसाय के बाद एक घरी तो फुर्सत मिलबे करथे ।आज ठकुराइन अघवा गय हे, तेकर सेथी आगु आके परसार म बइठ गय हे, पसीना जुड़वाय बर ।
ठकुराइन के बाद म तुरतेच महराजिन घलव निकल गय । फेर रोज कस चंचल, अमर के ओझियाने वाली ठकुराइन आज ,आन कछु म खोये हे कहु
लागत हे ।
"कइसे सोनकली, आज बने नइ दिखत अस ।" महराजिन उनमुंनहा बइठे ठकुराइन ल देख के कहिस ।
महराजिन सिरतो म कउआ गय रहिस ।का हो गय येला, सदा -सर्वदा चढउ लेने वाली ठकुराइन आज ,निच्चट अशक्त दिखत हे ।
"तोर देहें तो ठीक हे, ठकुराइन।"महराजिन वोला कोंचत-कुरेदत पूछिस ।
"हाँ.. महराजिन ।मोर तबीयत हर तो बने हे ।"
"तोर मतलब..?"
"मोर हर तो बने हे।फेर ठाकुर ल, वोकर जुन्ना बीमारी हर फेर उबक गय रहिस हे, आज ।"
"ठाकुर के जुन्ना बीमारी..!तोर -हमर एके करा रहत,तो जुग-जनमन कटत है अब ।फिर मंय ठाकुर के कुछु बड़का बीमारी नइ जानत अंव ।"
"........"
"एके ठन बीमारी मंय जानत हंव,ठाकुर के ।वोहर आय, वोकर मेंछा हर ओरम गय हे ।"महराजिन, ठकुराइन ल हँसवाय बर कहिस ।
ठकुराइन हाँसिस तो फिर आन दिन कस गमकत हाँसी नइ रहिस आज के हर । वोकर हाँसी हर मुरझाय फूल कस रहिस ।
"......"
"मैं ठाकुर के एक ठन अउ बीमारी ल घलव जानत हंव ।"
ठकुराइन, महराजिन कोती ल भेदहा देखिस...का कहत हे, येहर...?
"अरे,वो दूसर बीमारी तंय खुद अस ।वो बपुरा बर ...।
महराजिन के कोशिश, बेकार जावत रहिस ।
"अरे कुछु कहबे तब तो जानबो...!!"महराजिन थोरकुन जोरलगहा कहिस ।
"का बताबे,महराजिन..।ठाकुर ल पहिली मिर्गी -बाफुर के दौरा पड़य।वोहर बीस- पच्चिस बच्छर के गय ल फेर काल रात के उमड़ आय रहिस ।"
"ये बबा रे..!वोला तो आज तक देखइ तो धुरिहा हे ।कान म सुनें तक नइ रहेन ,ओ ठकुराइन ।" महराजिन तुरतेच कह उठिस ।
"हाँ...महराजिन ,सच गोठ आय ।"
"ये बीमारी के तो आगी -पानी हर बड़ दुश्मन आय।" ठकुराइन के उदासी हर ,महराजिन ल विधुन कर देय रहिस ।
"फेर ठाकुर हर ,कोई ल बताय बर नइ कहे
ये । "
"येती बताबे नहीं, तव जानहि कौन.।"
"वो तो ठीक हे, महराजिन, तभो ले मंय तोर पांव परत हंव। कनहुँ ल भी झन बताबे ,ये गोठ ल।"
"चल ठीक..।" महराजिन कहिस ।
6
आज भादों के अँधियारी के आठे ये । आज आठे कन्हैया ये ।आज के ये दिन हर महराज बर बड़ खास रइथे । साल भर ल महराज हर ये दिन ल अगोरथे ।
आजे के दिन, महराज हर मुकुंद- मुरारी....लड्डू -गोपाल के श्री विग्रह ल अपन सीना म लगा के एक प्रकार ले पैदल नगर भृमण करथे । नगर का.....ये मंझोलन कद काठी के गांव ये ,महराज के भुइंया हर । संग म दु -चार, कभु -कभु तो कोरी- ख़इरखा, किरतनहा-भजनहा हो गीन तब अति उत्तम।नहीं त डेरी हाथ म भगवान चरण वाला ...ठीनठीनी घण्ठी ल बजावत,जेवनी हाथ म भगवान के छोटकुन सिंहासन वोई सीना म डांटे।
आज के दिन, महराज एक प्रकार ले गांव के हर गली -खोल ,मुहल्ला म बिना कोई भेदभाव... बिना कोई आग्रह.. दुराग्रह के समभाव ले किंजरथें ।
प्रणाम करइया प्रणाम करथें..।आरती करइया ...आरती अउ पूजा करइया पूजा -आंचा । सब अपन अपन ढंग ले लड्डू- गोपाल के झांकी ल निहारथें ।
महराज आज अपन गांव म भगवान के श्री- विग्रह ल घुमा लेथें,वोकर बाद म तीर के गांव म लोकनाथ गौटिया घर ले जाथें।उँहा तो भगवान संग महराज के विशेष विशेष अगोरा होवत रइथे। खुद गौटिन अउ आन- आन नारी परानी मन भगवान के ये झांकी..मञ्जुल मुरतिया ल जी भर निहार के अपन ल धन्य मानथे । पूजा -आंचा कर के संझाती बेरा ल उंकर वापसी होथे ।
फेर एक ठन बात ,आज काकरो करा वोहर दान -दक्षिणा,भेंट -उपहार स्वीकार नइ करंय । महराज के हालत पोठ हे।ये बात के गुमान सब ल हे। येकरे सेती, कोइ जोर जबरदस्ती भी नइ करें चधौतरी बर ।
"महराजिन ,अमली पानी ल अमर न,मंय लड्डू -गोपाल के आसन ल माँजो।"
"देवा न मोला, मैं मांज हाँ तब ,नइ बनही का ।"
"बनही,फेर मोला माँजन दे ।"
"ठीक हे, फेर पहिली सुख्खा राख म पहिली रगडा ।अइसन म जादा सफ्फा होही ।"
" हाँ...।ठीक कहत हस तैं..।"
"ले अब ,आसन धोआ गय।भगवान के बारी ये अब..!" महराज ,महराजिन ल अपन गोठ के साखी देवत कहिन ।
" भगवान ल कतेक नहवाईहा महराज...!उनला जर जुड़ धर लिही ,त..?"महराजिन महराज करा ठठ्ठा मसखरी करत कहिन ।
"जर -जुड़ के आदि अउ अंत ल ,जर -जुड़ धरे सकहि , महराजिन..!" महराज भाव- विभोर हो गय रहीन ।
महराजिन उंकर अकारण- सकारण, भाव -विह्वलता ल देख के मुचमुचा के चुप रह गइन ।
"महराजिन, लड्डू -गोपाल सादा पानी म नहा डारिन। अब पंचामृत ल लान ।अब वोमे नहाहीं।तब फेर नावा वस्तर धारन करिहीं।यज्ञोपवीत.. श्रृंगार....! अभी तो कतेक बुता बांचे हे...!!"महराज थोरकुन उतावला होवत कहिन।
"सब हो जाही, महराज ।"
"तभो ले..।"
"तुं हर बच्छर, अइसनहेच बेरा तो निकलथा।"महराजिन घलव थोरकुन जल्दबाजी करत कहिन ।
पूजा-आंचा.. आरती भोग अस्तुति के बाद महराज, लड्डू गोपाल ल मनायिन ।चलव...प्रभु..तुँहर ..कतेक न कतेक भक्त मन दरशन बर डहर देखत हें...!
बहुत ही आदर के साथ,भगवान लड्डू -गोपाल के मंगल- मूर्ति ल पीतल के वोइच चमकत आसानी म बइठार के फूल दल ले सजा के, महराज बाहिर निकालीन । महराज के सीना म चटके हे ,भगवान के वई आसानी हर ।जेवनी हाथ म आसनी हे अउ डेरी म घण्ठी हे । घण्ठी के आवाज बड़ धुर ल जावत हे, तब अगर गुँगुर धूप हर
भी बढ़ धुर ल गमकत हे।
आठे -कन्हैया उपास करइया लइका,सियान सब भगवान के झांकी दरशन करत हें। आन- आन कत्था झांकी हर तो रात के होही मन्दिर म ।अभी तो घरो घर पाखा म छपाय ,गोड़रंगी रंग म बने आठे कन्हैया ल, भोग लगा के लइका पिचका मन ल अपन 'एक -गाल 'अउ 'पूरा गाल ' वाला उपवास ल समोखे बर हे। महराज के झांकी हर बुलक जाही तब..।
महराज के संग बनेच कीर्तनहा ...।महराज नगर भृमण कर डारिन ।वो दु ठन नरिहर वोमन ल प्रसाद बना के खाय बर देवत अब अपन गांव ले विदा लेवत हें ।
जयजयकार जयघोष होइस अउ कीर्तनहा मन फिर गइन ।
अब महराज...वो परोस के गांव ,लोकनाथ गौटिया के घर जाय के संकल्प के संग म ये पैडग़री म पाँव धरत हें अकेला ...।वो अकेला च जायें उँहा..।संग म कभु कनहुँ ल नइ ले जांय ।
अपन हृदय म बसुदेव जी के सुख ल धारण करत महराज चिखला.. खँचवा-डबरा म पाँव मढावत आगु बढ़त हें ।गांव के रास्ता.. चिखला के कमी कइसे होही ।धरसा परत हे.... । धरसा म तो ये चिखला अउ बिच्चछल के भरमार ये।रो ..हो..पो..हो..चिखला ।आगु तो चिखला के समुन्दर दिखत हे।
त्रिलोकी नाथ ल हृदय म लगाय के सुख ।वोहू म वात्सल्य भाव...!आज अउ अब साक्षात मथुरा ले ब्रज जाना होवत हे नन्द बबा के घर ,बसुदेव जी के । भाव समुन्दर अतेक गहरा के, दुनों आंखी ले गंगा जमना बोहावत हे ।
हे प्रभु...!कोंन....? महराज के मुख ल निकलिस।अउ उंकर हाथ अउ हृदय म लगे भगवान लड्डू गोपाल के आसनी हर वोई चिखला म फेंका गय ।
महराज चिखला म बुड़े अउ बुड़ ...बुड़ करत वो मनखे आकृति करा, जाके पहिली वोकर मुड़ ल, झोर असन पातर होय चिखला ले उपर करिन ।
पूरा चिखला म सनाय.. बेहोश ..मनखे।मुंह म ले गजरा निकलत हे । चीन्हउ नइ ..मिलत ये ..कोन ।अउ इंहा येकरा..अइसन ...कइसन होय हे । महराज के पांव हर घलव माड़ी के जात ल चिखला म बुड़त जात हे।
महराज अपन गमछा म वो मनखे के मुँहू ल बने पोछिन....ये बबा रे...!
ये तो ठाकुर ये।हाँ.. तीर म वोकर ये साज समान हर फेंकाय हे ।
ठाकुर....!महराज कस के वोला हाँक पारिन।फेर चिट न पोट...!मुहँ ल गजरा अउ निकलत हे।कोई ..अहिरू -बिच्छू तो नइ छू दिस।अब कइसे करंव..लड्डू गोपाल ।
महराज के शरीर हर भी अभी पोठ हे।वो ठाकुर ल अपन खांध म उठाईंन अउ वापस गांव कोती फिरे लॉगिन ।
देखइया अबक्क रह गइन।वोमन सहायता बर कुदिन, फेर महराज ठाकुर ल सीधा अपन घर म ले आइन। अंगना म भगवान के स्न्नान सामग्री हर माढ़ेच रहिस ।
महराजिन येला देख के अबक्क हो गइन ।फेर थोरकुन दिन पहिली ,ठकुराइन के कहे गोठ हर सुरता घलव आवत रहिस ।
महराज....!ठाकुर ..!! कहत किल्ली गोहार पारत ठकुराइन आके ठाकुर ल पोटार लिस।अतका बेरा म महराज वोला बढ़िया नहवा के पोंछ डारे रहिन।
"देखे महराजिन, जउन चीज ल डरात रहंय।वोइच जिनिस हर होइस , हे।"ठकुराइन के आँखी मन ले रकत धार आँसू हर बोहावत रहिस।
अब ठाकुर के आंखी खुलिस।वोहर अपन ल महराज के घर भीतर म पाके अबक्क होवत रहिस ।
महराज सब गोठ ल सार संक्षेप म बतावत कहिन-लड्डू गोपाल,मोला वो कोती नइ ले जाय रथिन,तब तो अंधेर हो गय रहिस, ठकुराइन ।
महराज अब ले भी वइसनहेच चिखला..रद म सनाय हें।वो उठे कस नइ करत यें ।
"ठाकुर, आधि व्याधि मन चोर असन यें।ये मन ल लुकाना माने चोर मन ल घर खुसारना ये ।" महराज कहत हें,"सब्बो जिनिस के उपचार हे, वैद मन करा ।"
ठकुराइन, भुइंया म दण्डाशरण परे हे महराज के आगु म ।बस.. बस.. अब ठकुराइन । अब हम सब भगवान के पांव परी...।वोइच तो प्रेरणा देने वाला आँय ।
"तब ले महराज, तुं अपन नेम धरम के पक्का। काकरो आन के छइंहा ल नइ छुवा ।तेहर आज मोर असन ल खांध म बोह के अतेक धुरिहा ल लाने हव।"ठाकुर हर घलव रोवत रहिस ।
"ले भइ गे बस्स ,बराबर हो गय।परसादी के मंडवा म तंय मोला अलगाय रहे न, वोकर बदला ये, चल।"महराज हाँसत कहिन, तब ये पइत एके संग तीन झन लजा गइन- महराजिन, ठाकुर अउ ठकुराइन ।
"ले ठकुराइन ,अब महराजिन घलव जीत डारिस न ।"वो फिर कहिन ।
ठकुराइन एक पइत फेर महाराज के पांव परत ठाकुर ल अपन घर लानिस,वोकर बहां ल धर के ।
"महराज,स्न्नान ...?"
"रा ..ना ..महराजिन,थोरकुन बाद म करत हंव ।"महराज कहिन ।
"जावा, कर लेवा पहिली ।"
"हाँ...ठीक।फेर तुरतेच तंय ,एक ठन बुता कर।वो लोकनाथ गौटिया घर पहिली खबर भेजे के व्यवस्था कर।वोला सब्बो गोठ ल पूरा बता दिही, जवईया हर ।"
"लागही च..?"
"पूरा सोलह आना ....!ये विश्वास के बात आय। जा..जा..।उँहा मनखे भेज ..।महराज कहिन अउ स्न्नान करे के तइयारी करिन ।
"नहा लेया, तुं...?" महराजिन वापिस आवत रहिस।
"कोन ल भेजे ...?"
"गोवर्धन ल...।"
"पूरा बताये..?"
"हाँ....।"महराजिन कहिस अउ नहा खोर के फिर तइयार महराज के नजदीक म चल दिस।
महराज वोकर चेहरा ल बने ध्यान लगा के देखिन।थोरकुन अफसोस के भाव..
!
"सब कुछ खइता च हो गय, आज ।"महराजिन थोरकुन धीरन्त सुर म कहिन ।
" का कहे ,महराजिन । खइता च हो गय...!अरे पगली,आजे तो असली बुता होइस हे, पूजा के। आज मैं लड्डू गोपाल के, आदि अउ अंत देव् के विश्व रूप के दर्शन करे हंव।अउ देख अभी ल मै करतेच हंव ,वोला।"
"......"
"अर्जुन हर वोतकी आनन्द नइ पइस होही , वोकर ल ज्यादा आनन्द मैं पावत हंव ।"महराज एक पइत फिर भाव विभोर हो गय रहिन ।
"फेर..लड्डू गोपाल कहां हें..?"महराजिन पुछिन।
"लड्डू- गोपाल,ये पंचतत्व के मालिक....!अपन पांचो तत्व-जल, पावक ,गगन ,समीर अउ क्षितिज माने धरती म खुसर गइन हैं कनहुँ करा ।" महराज थोरकुन हाँसत कहिन ।
"तुहर मतलब...?"
"हाथ ल फेंका गइन,चिखला म गड़े होंही कनहुँ करा ।"
"हे.... राम..!!!"महराजिन के मुँहू ल किल्ली -गोहार निकल गय ।अतका बेरा ल सपना दशा म वोहर येला नइ सोचें रहिन ।
"चुप..कुछु नइ होय ।"
"येकरे बर उनला बाहिर ,ले गय रहा ।" महराजिन रिस अउ दुख म थर ...थर कांपत रहिन ।
"उनला जाके खोज बो पाछु।मिल गइन तब मिल गइन।अउ नइ मिलिन तब पीछू आने बिसा के , खरीद के ले आनबो ।" महराज , महराजिन ल समोखत कहिन ।
"बिसाये ल भगवान मिलथे ।"
"तंय एक बात के उत्तर दे ।"
"भगवान शालिग्राम अउ लड्डू गोपाल ल कंहा ल लाने रहेन..?"
" वो शिवरीनारायण के मेला ल..।"
"अउ आसन ..?"
"डभरा मेला..ल ।"
"मुफ्त..?"
"मुफ्त काबर.. अउ कोन दिही ।आसन बर तो कतेक न कतेक ..मोल भाव करना पड़ गय रहीस ।सुरता हे तुंहला...?"अब महराजिन के आंखी म चमक आ गय रहिस ।"
"ठीक कहे तंय।अउ मैं घलव यइच कहत हंव न..।"
"भगवान के मूर्ति अउ आसन ,खरीदे ले कतको मिल जाहीं..?"
"हाँ..! वो तो हे ..।"
"फेर खरीदे ले ठाकुर हर नइ मिलय, महराजिन..!" महराज हाँसत कहिन।भगवान के विश्व रूप दरशन के अलौकिक आनन्द अब ले भी उँकर मुख मंडल म खेलत रहिस ।
*रामनाथ साहू*
-