Thursday, 27 March 2025

मया के तिहार : होरी* //

 *आलेख        // मया के तिहार : होरी* //

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                 भारतीय पंचांग के काल गणना के मुताबिक बछर के आखरी महीना फागुन अऊ आखरी तिहार होरी हावे।ए तिहार ल हर बछर फागुन पून्नी के दिन होलिका दहन अऊ चइत के पहिली दिन पूरा गाँव अऊ शहर म रंग गुलाल अउ ढोल नगारा म गावत बजावत बड़का उछाव ले तिहार ल मनाये जाथे।होरी तिहार मया के संगे-संग रंग के तिहार घलो कहे जाथे।

                होरी के तिहार ल वेद -पुरान के कथा ले घलो जोर के देखे गे हावे।पौराणिक कथा के मुताबिक प्रहलाद ह भगवान के भगत होय के सेथी ओकर ददा हिरण्यकश्यप ओला बैरी समझथे।ओला मारे के कतको अकन उदीम करथे कभू पहार ले ढकेलवा देथे,कभू हाथी करा रउंदवाथे फेर प्रहलाद कइसनहों करके बांचिच जाथे।आखिर म प्रहलाद ल मारे बर अपन बहिनी होलिका ल जोंगथे होलिका अपन के कोरा म प्रहलाद ल बइठार के लकरी के कुढ़ा म बइठ जाबे अऊ आगी म लेस देबे कहिथे।होलिका ल ब्रम्हाजी ले बरदान मिले रहिथे कि तैं आगी म नि लेसावस।हिरण्यकश्यप के कहे के मुताबिक होलिका प्रहलाद ल अपन कोरा म बइठार के लकरी के कुढ़ा म बइठ जाथे।फेर आगी म होलिका भंग-भंग ले जर-भुंजा जाथे अऊ प्रहलाद बांच जाथे।ओही दिन ले बुराई के नाश अऊ अच्छाई के जीत के चिन्हारी होरी के तिहार मनावत आवत हावें।

                वइसे तो होरी के शुरुआत बसंत पंचमी के दिन हो जाथे।ओ दिन अंडी के झाड़ी ल काट के गाँव बाहिर म एक जघा गड़िया के पूजा करे जाथे।तंह फेर ओ दिन ले लेके फागुन पून्नी के आत ले ओकर बढ़ोवन बढ़ावत रहिथें।कोनों मेर के सुक्खा रुख-राई ल काट के लइका मन होरी डांड़ ल बढ़ावत रहिथे।छेना लकरी पैरा,राहेर कांड़ी,अरसी ढेंटा अऊ काकरो घर के टूटहा रांचर,फइरका कुर्सी टेबल घलो ल होरी म बढ़ोवन बढ़ावत रहिथें।

                  फागुन महीना के लगती बेरा ले गाँव-बस्ती म नंगारा अऊ मांदर के धून म फाग गीत जघा-जघा सबो जुरमिल के गोल जुरिया के गावत बजावत अऊ नाचत खुशी मनावत रहिथें।एहर सरलग फागुन पून्नी के आवत ले चलत रहिथे।फेर पून्नी के रतिहा बेरा म गाँव के बइगा,पंच सरपंच अऊ लोग-लइका सियान सबो जूरमिल के होली के पूजा करके चकमक पखरा नइ तो अगरीसा के आगी ले होलिका ल जरो देथें।होरी के राख ल अपन माथा म टीका घलो लगाथें।होरी राख जबर गुनकारी होथे।एकर राख ल देहें म चुपरे ले रोग निरोधक के काम करथे।कतको अकन घाव-गोंदर,खजरी,फोरा,फुंसी सबो ठीकेच हो जाथे।

                  इही दिन मनखे ह अपन जम्मो किसीम के बुराई कस आदत अउ घमण्ड ल होरी के आगी म भूरभेटे के बेरा घलो रहिथे।होली के चारो कोती किंजरत सबो सुघराई के कामना घलो करथें।हितवा अउ मितवा मन के संगे-संग पारा-परोस के मनखे मन अपन ले बड़े मन ल रंग-गुलाल लगाके आशीष अउ मया पाथें।कतको झन होरी तिहार के बहाना करके नशा घलो करथें अउ अपन चेत सुरता भुला जाथें।

                   होरी के तिहार ल लइकामन म जादा उछाव देखे बर मिलथे।पिचकारी अउ रंग म सनाय सराबोर हो जाथे।घरो-घर किसीम-किसीम के रोटी-पीठा खाई-खजेना बनाथें अउ एक-दूसर संग बांट-बिराज के खाथें।कहे गे हावे कि होरी के दिन सबोझन बैरवासी के भाव ल भुलाके एक-दूसर के मया म *नार असन लपटा* जाथें।जेकर ले सबो के मन म *मया के पीकी* उलहोथे।ए होरी तिहार म ईरखा-दुवेस म आस्था अउ विश्वास के जीत के चिन्हारी के रुप म घलो मनाथें।

               रुख-राई के कोंवर-कोंवर उलुहा-उलुहा पाना,परसा अऊ सेमर के लाली-लाली फूल जेहर आगी कस अंगरा दिखथे।आमा के मउर म अमरइया ममहावत,मउहा फूल सबो ल मतावत हे,खेत म सेरसों के पीवंर-पीवंर फूल अऊ गहूं के अटियावत बाली मुसकावत फागुआ के संदेशा देवत अगोरा म ठाढ़े हावे।आमा रुख ले पाना के ओधा म लुका के कोयली फगुआ के राग सुनावत सबो के मन मोहत रहिथे।

              फगुआ तिहार ल हमर देश के सबो राज म अलगेच-अलग नांव ले मनाए जाथे।ब्रज म होली ल देखे के लाईक रहिथे त बरसानों के लठमार होली ल देखे बर दुरिहा-दुरिहा ले मनखे मन आथें।मथुरा अऊ वृन्दावन म चउदा दिन ले होली मनाए जाथे।बिहार म फगुआ, छत्तीसगढ़ म होरी बड़का उछाव ले मनाथे।पंजाब म होला मोहल्ला,महाराष्ट्र म रंग पंचमी,हरियाणा म धुलंडी अलग-अलग नावं ले तिहार ल बड़का उछाव ले मनावत आवत हावें।

                   तइहा समे म होरी चंदन अऊ गुलाल ले खेले जावत रहिस।परसा के फूल अउ पाना पतई के सुग्घर रंग बनाके होरी खेले जावत रहिस।फेर समे के संगे-संग बदलाव आवत जावत हे।अब तो प्राकृतिक रंग ल छोड़ के बनावटी रंग जेहर देंहें अउ आंखी ल नुकसान कर देथे उही ल सबोझन बउरे ल धर ले हांवें।अब तो कतको अकन रिंगचिंगी रंग उतरे हावे जेन ह देंहें ल जबर नुकसान करथे। 

            आवौ सबोझन अपन के भीतर म माढ़े कुसंस्कार ल होरी के आगी म स्वाहा करके अपन जिनगी ल नवा रंग म रंग के शुरुआत करबो।भाईचारा के परसाद बांटत अपन जिनगी ल तिहार असन मनाबो।एक-दूसर संग जूरमिल के सुमता के डाहर ल चतवारत आघू कोती बढ़त जाय ल परही।

                  फगुआ तिहार के अलग-अलग रंग होथे जेकर महत्तम घलो अलगेच अलग हावे।जइसे लाली रंग-गुस्सा,हरियर-ईरखा,पींवरा-खुशी,गुलाबी-मया,मसरइल-बड़े,सादा-शान्ति,संतरा रंग-त्याग अउ भांटा रंग-ज्ञान के चिन्हारी हावे।इही ल जिनगी के सार जान लेवौ अऊ होरी तिहार म जून्ना ईरखा दुवेस ल भुलावत मया-दुलार बांटत बड़का उछाव ले मनाय बर परही तभे होरी के परब हम सबोझन ल एकठन भाईचारा के संदेशा देवत बछर के छेवर करत नवा बछर चइत ल सउपत नवा अँजोर बगरावत जाही।

✍️ *डोरेलाल कैवर्त  " हरसिंगार "*

         *तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)*

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डोकरी दाई के कुरिया* (नान्हे छत्तीसगढ़ी कहानी) - डाॅ विनोद कुमार वर्मा

 *डोकरी दाई के कुरिया* (नान्हे छत्तीसगढ़ी कहानी)


                            - डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


            तइहा के बात हवय। एक राजा रहिस। एक डोकरी दाई रहिस। डोकरी दाई के कुरिया जंगल के बीच मं रहिस। पशु-पक्षी अउ जंगली जानवर- हिरन, कोलिहा, भालू, चितवा, बघवा सबो ओला चिन दारे रहिन काबर कि नानपन ले ओमन डोकरी दाई ला जंगल म देखत रहिन। एकरे सेती ओहूमन डोकरी दाई ले मया करें अउ डोकरी दाई घलो ओमन के संग  एक सदस्य के रूप मं रहे। डोकरी दाई रोज बिहनिया जंगल ले फर-फूल इकट्ठा करे अउ तीन मील दूर हाट-बजार मं बेचके दार-चाँउर खरीद के ले आने।  फर-फूल बेचके घर आवत ले बेर बुड़ती हो जावय। फेर जेवन बनावय अउ खा-पी के सुग्घर  सो जावय। अइसने ओकर दिन बढ़िया बीतत रहिस। अपन नानकुन घास-फूस के कुरिया अउ दुवारी ला डोकरी दाई एकदम सफ्फा रखे।

       एक दिन के बात हे कि राजा शिकार करे बर अपन सैनिक मन के संग जंगल आये रहिस अउ हिरन के पाछू घोड़ा दउड़ावत अपन संगी-साथी ले बिछड़ गे। आखिर मं डहर खोजत-खोजत पहिला पहर आ गे अउ प्यासन होवत मूर्छा खा के घोड़ा ले गिर गे। घोड़ा के हिनहिनाय के आवाज सुन के डोकरी दाई घर ले बाहिर निकलिस त देखथे कि कोनो भुइयाँ मं गिरे-परे हे! डोकरी दाई का जाने कि ओहर एही राज के राजा हे!  डोकरी दाई दउड़त पानी लाइस अउ चेहरा उपर छिंचिस। मुड़ ला धीरे-धीरे ठोंकिस। मूर्छा टूटिस त ओला पानी पिलाइस अउ पूरा होश मं आये के बाद खाना बनाके ताते-तात खवाइस घलो। थोरकुन बेरा मं मंत्री, संतरी अउ सैनिक मन खोजत आइन अउ राजा ला संहुआत बने-बने देखके बहुत खुश हो गीन। उहाँ ले जाय के पहिली राजा कहिस- डोकरी दाई, तँय मोर संग मं चल। उँहा तोला महल कस घर दे देहूँ अउ तोर रहे-बसे के सुग्घर ठउर दे देहूँ!

          प्यासन मरत रइही तेला का चाही? पानी न! डोकरी दाई बरसों ले रोज रात के बेरा भगवान ले माँगे कि कि महूँ ये राज के रानी कस रहिथे भगवान! मोरो घर मं नौकर-चाकर, चौकीदार, माली, रसोइया रहितिस! ......अब डोकरी दाई बड़ खुशी-खुशी राजा के संग चल दीस। भगवान के वरदान आज ओला मिल गे रहिस। राजा ओला महल कस बड़े घर, नौकर-चाकर, माली, रसोइया सबो कुछ दे दीस। रात के सुते के बेरा डोकरी दाई भगवान ला मने-मन धन्यवाद दीस। 

      दू हप्ता पाछू हालचाल जाने बर राजा स्वयं आइस अउ डोकरी दाई ले पूछिस- ' का हालचाल हे दाई? ..... बने बने? '

              डोकरी दाई बड़ दुखी मन ले बोलिस- ' राजा साहेब, मोला जंगल पहुँचा देवा। इहाँ बने नि लागत हवे। मँय उहेंच रहूँ! '

        राजन अचंभो रह गीस अउ पूछिस- ' दाई, इहाँ कुछु तकलीफ हे का? '

       डोकरी दाई बोलिस- बेटा इहाँ सबो कुछ तो हे, कुछु बात के कमी नि हे! फेर दुख ये बात के हे कि तुँहर गद्दा मं रात के मोला नींद नि आवय त चद्दर बिछा के मँय जमीन मं सुतथँव। फेर मोला जंगल के रंग-रंग के चिरई-चिरगुन मन के सुरता आवत रहिथे जेन मन ला मँय रोज दाना-दुनगा खाय बर देंवव। ओमन तो भूखन मरत होंही अउ मोला खोजत होहीं! मोला जंगल के जनावर अउ रूख-राई मन के घलो सुरता आवत रहिथे जेन मन ला मँय बड़ मया करथँव। कतकोन फूल-पाना अउ रूख-राई ला महींच् लगाय हावँव अउ जेठ-बइसाख के घाम मं पानी दे-दे के बढ़ोय हँव। .....अउ का का ला बताओं बेटा? ..... तोर पाँव परत हँव, मोला जंगल के अपन कुरिया मं जावन दे। मोला तोर नौकर-चाकर, माली, रसोइया कुछु नि चाही! '

       एकर बाद डोकरी दाई ला राजा जंगल मं भेज दीस। फेर डोकरी दाई महल कस घर ला छोड़ के अपन घास-फूस के कुरिया मं सुखपूर्वक जीवन-बसर करे लगिस। ओकर  घास-फूस के कुरिया ह राजा के देहे महल ले बने रहिस।

                          *समाप्त*

लंबा छत्तीसगढ़ी कहिनी)

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*होरी के मउका म महराजिन त्रिपुर सुंदरी अउ ठकुराइन सोनकली के जिद -बाद अउ नोंक झोंक के आनन्द लो।कथा म आते कन्हैया के गोठ आही।फेर वो लाला नन्द लाला बर का होरी कि का आठे कन्हैया।वो तो गुणातीत ये।सबो गुण अवगुण तो हम मनई मन भर ये...*


         


               *विश्व रूप दरसन*

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             (लंबा छत्तीसगढ़ी कहिनी)



                       1 .




           पुन्नी के चन्दा अगास म फरियात हे ।रगबग चटक  चंदैनी  बगरत बगरत महराज सदानन्द  के परसार  ल घलव छू डारे रहिस ।महराज अउ महराजिन.... दुइक -दुवा अभी ।दु ठन नोनी बिहा के अपन ससुराल म हें, अउ दउ हर शहर म नौकरी पा गय हे ।


              महराज, नियम- धरम बर पक्का।उंकर बस चले त दिवसावसान होय के पहिली ही वो रात के जेवन कर लेथिन; फेर रसोई विभाग हर तो उँकर जिम्मा म तो रहे नहीं ।अउ जेकर  जिम्मा म रथे, वो ये महराजिन त्रिपुर सुंदरी ।


          अउ महराजिन ल महराज के बुता- काम म  हर बुता कम भेवा जादा लागथे ।तेकरे बर कभु भी महराज ल सूर्यास्त- पारायण के शुभ अवसर नइ मिल पाय ।वोतका बेरा तो  उँकर चूल्हा हर सुलगथे । फेर आज कौन कोती के राजा के चला चली होय हे, तब महराजिन हर बर्तन -भांडा ल संकेल के ये पूरब म उवत सुधाकर के सुधा पान करत हे ।


"खा डारे ओ,महराजिन ।"सोनकली ठकुराइन निकलिस अपन मुहटा ल ।


"हाँ..।"


"ठीक हे, फेर मैं साग नइ पूछत अंव न।मोला तोर अलवा- जलवा साग ल पूछे बर घलव नइ ये।"


"का कहे रे न**इन !मोर साग अलवा- जलवा अउ तोर हर चोखट ।"महराजिन एकदम भड़क गय रहिस ।


"ह ओ ब***नीन, देखे गोठ -पतियाये गोठ तो आय ,तोर साग- पान हर।रान्ध बे मुनगा काड़ी तउन म माड़ी भर के झोर ।अइसन तो रथे तोर साग भात हर ।वो तो नेम धरम के पक्की -पक्का महराज,कहे कुछु नही तोला अउ आंखी कान मूंद के गट.. गट.. लील देथे बोपरा हर ।हमर ठाकुर करा तो तंय एकदिन भी नइ चलथे ओ ।"


"पानी पी ले सोन कली,तब फिर बखानबे अउ उखा*बे ।"महराजिन तीर म धरे लोटा ल वोकर कोती  अमरत कहिस ।



   अब सोनकली सिरतो म चुप पर गय रहिस । महराजिन तो मुचमुचात रहिस ।अतका तो येकर रोज के बुता ये ।फेर कभु- कभु येकर गोठ ले ,जी हर बम बिया घलव जाथे ।


"महराजिन...!" भीतर कोती ल महराज के गोठ हर उदगरत रहिस । महराजिन सुनिस ,फेर वोकर जवाब नइ दिस 


"ये महराजिन...!'अवाज हर थोरकुन उंचहा आइस ।


"रा... हा ... न थोरकुन।" महराजिन ललकारत  कहिस महराज ल ,"करत रहा न बने पारायण  ,काके करत हव तेला।रमायन  के  ये सुखसागर  के तेला ।"


"तंय बझ झन काकरो करा बस ।"


"माने मंय जनम रेन्धही अंव।"


"मैं तो अइसन नइ कहत हंव ।"


"तव फेर काय कहत  हावा तुँ ।"


"ले बबा ,बझ- लड़  काकरो करा ...।"


           येला सुनके सोनकली खुश ...खुश..हाँसत रहे।देखे महराजिन, तंय मोला झगड़हीन बनाथस,तोला खुदे तोर गोसांन हर झगड़हीन करार देवत हे ।


 "अरे तंय ,काकर करा लड़बे महराजिन, मोर छोड़ आने करा ।"सोनकली पांच परगट कहिस ।


"तंय मोर करा का खा के लड़बे रे नवा**न"


"देख..देख..तोर  भाखा ल।जीभ ल  बने सम्भार के राख । वह दे महराज सुनत हे नही त जना देय रथें तोला अभी ।"सोनकली के ठनकत आवाज सुनइ परिस ।


"महराजिन...!"महराज के भयग्रस्त अवाज फेर सुनई परिस।फेर येती महराजिन बर, का ये न का..।


"जा ओदे ,बेर हो जावत हे।"सोनकली कहिस अउ भेदहा हाँसी हँसे लागिस । ये पइत महराजिन थोरकुन हथियार डाल दिस।वोहर थोरकुन सकुचा घलव गय रहे ।


 "नइच जाँव अभी,हाँक पारन दे,महराज ल "सुंदरी महराजिन कहिस ।


"तोर मन दइ,...!कह पारत रहेन ओ ।"सोनकली कहिस  अउ चुप हो गय ।


"काय कहत ..र ..रहे,वोतका बेरा।बड़े ठाकुर मन के बड़े तलवार  रथे , रणभूमि म जाये बर...।अउ तुमन  छोटे ठाकुर अव, तेकर बर तुमन के तलवार हर छोटे रथे।वाह रे..,छोटे तलवार..! छुरा देवता...!"


"हाँ..!येहर तो सच आय ।एमे कोनो शंका नइ ये ।"सोनकली  हाँसत -हाँसत कहिस ।



         महराजिन अब अपन आँट ल उतर के खोर -गली म आ गय रहिस ।एक प्रकार ले ठकुराइन के तीर म ।माने तंय महराज के लिहाज करके वोला जवाब देवत हस ,तब आनन्द नइ आवत ये ।अब बोल तोर बोलवाही ल ,चिटिक महुँ सुनों..का बोलथस तंय हर । 


   अतका बेर म चन्दा हर पुरा फरिया के झक्क- सादा बरफ के गोला बन गय रहय ।महराजिन वोला निच्चट कर के देखत रहय ।वोला अइसन देखत देखिस,तव ठकुराइन फेर भेदहा हाँसी हाँसिस।


"अब तोला का हो गय ।"महराजिन कहिस । 


"मोला का होही, चन्दा ल तो तइच हर देख मरत हस ।"


"वो तो कतेक सुंदर दिखत हे..।"


"होही..।" ठकुराइन सरपट उत्तर दिस ।


"का चंदा हर तोला सुंदर नइ  लागत ये ।"


"अरे हमर साही  मन ल तो लगबे करिही, जउन मन महीना दिन म एक पइत देखे पाथन ये चन्दा ल,फेर.....?"


"फेर....का फेर..?का अधूरा बंचा देय  अउ।"महराजिन थोरकुन अचकचावत कहिस ।


"वो अइसन ये ओ महराजिन, हमन महीना म एक दिन देखे पाथन पुन्नी के चन्दा ल अउ तंय तो रोजीना -चौबीसो घड़ी देखत हावस अइसनहेच चांद ल,तेकर बर,का के पुन्नी के चन्दा के सुघरई...!"


"मंय चौबीसों घड़ी देखत हंव...चन्दा ल,तोर काय मतलब...?"सुंदरी महराजिन सिरतोन म जंगा गय रहिस ।


"अरे चौबीसों घड़ी नइ देखत अस अपन महराज के मुड़ वाला चन्दा ल ।एकदम चिलकत....एकदम.. चिक्कन....!"


"रा ...रे  बंजर का कहे तंय,तोला मंय बतात हंव ।"सुंदरी महराजिन तो एकदम वोकर कोती कूद परिस ।


"महराजिन ,नइ सुनस का...!,महराज के थोरकुन रिस मिंझरा गोठ फेर हवा म  तउरिस ।


"जा ओ महराजिन  जा।वोती जी हर छुटिच जाही ,तब फेर तैय जा के का करबे ।"


"तंय चुप भी कर ,अब छि**र  कहीं के ।"


"देख.. देख.. तंय अपन जिभिया ल सम्भाल , नही त,"ठकुराइन सिरतोन जंगाय के शुरू कर देय रहिस ।


    तंय रे... कहत महराजिन सिरतोन ठकुराइन के चुन्दी ल जाके धर लिस ।


"इया.. इया.. कइसन करत हव ,महराजिन  येकर चुन्दी ल।  कालेच चुन्दी झन झरही कह के झरन तेल लाने हंव।अउ तुँ एके पइत म एक गोंछा ल   नीछ देवत ह।"ठाकुर जगजीवन ठीकेच ये बतर म आ गय रहीस ।


           महराजिन ठकुराइन ल छोड़ के अपन भीतर कोती  जाय लागिस।वोतकी बेरा म सदानन्द महराज पीतल बाल्टी म भरे पानी ल महराजिन उपर उलद दिन..जा बनेच गर्मी हो गय हे, तेकर सेथी अउ नहा के आ..कहत । महराज के शौच -अशौच विचार हर बड़ प्रबल रहिस ।ठकुराइन के चुन्दी ल धरे माने स्पर्श दोष तो लगी गय।अब बिन स्न्नान घर म प्रवेश वर्जित ...!




                      2



कभु कभु महराजिन ल रात रात भर नींद नइ परय ।वोकर कारण, महराज हर बिन मेहनत चोखट भोजन ल बताथे ।


         आज  घलव वइसनहेच  होवत  हे।जब तक सोनकली ठकुराइन ल नीचा नइ देखा लिही तब तक सुंदरी महराजिन ल चैन नइ पड़य । 


          तोला तोरेच घर म घुस के पटकनी देंहा , तब तोला समझ आही , मैं कोन अंव तेहर ...महराजिन  गुनथे,अउ  मने ..मन ..म  का..  न ...का.. खिचडी पकात रहिथे ।


"ठकुराइन, नाश्ता -कलेवा हो गय  का..?"।महराजिन ठनकत अवाज म पूछिस।येकर गहिल अर्थ रहिस,अगर ,फुरसत हो गय होबे त आ अब  वाक-युद्ध शुरू करी ।


"रा ..ना..!ठाकुर हर गंवई  गइन हें।आके कलेवा करहां कहिके गय हें ।


"कतेक  गंवई करथे ठाकुर हर,कभु देखबे त गंवईच गय हे ।"महराजिन थोरकुन तमकत कहिस ।


"तोर घर के महराज नइ जाय का ,अपन जजमानी म।"


"वो जाथें तब ठाकुर  ल घलव  ले जाथें संग म  ।अउ जतका अपन पाथें ,चढ़ोत्तरी म वोकर ठीक आधा ओहु ल देवाथें । "


"ये बुता ल महराज हर तो, बढ़िया च करथें ।वो बोपरा तोरे कस कचकचहा नोहें ।सदा प्रसन्न रहइया जीव ।  हां ..बार-बाछ हर थोरकुन जादाच हो जाथे कभु -कभु  ।"


"येई च हर तो ब्राह्मण के निशानी आय ,ठकुराइन । पूजा-  पाठ, धरम -करम..येइच म तो दुनिया हर टेकाय हे, ठकुराइन । नही त दुनिया हर रसातल म नइ चल देथिस ।"


"ओहो रे मोर धरम -करम ।वो बोपरा अपन मन के शान्ति बर पूजा -आचा करथें ।"



"महराजिन.....!" महाराज के  हाँका फेर गुंजिस ।


"वह दे ,महराजिन ,महराज तोला फेर  हाँक पारत  हें ।"ठकुराइन कहिस ।


"पारन दे,उंकर तो बस एइच बुता ये ।"


"तब ले ओ..!" ठकुराइन कहिस अउ महराजिन के मुख ल देखिस ।


"तोर ठाकुर का का बुता करथे, ठकुराइन ।"महराजिन जइसन प्रण कर डारे रहिस के ये ठकुराइन ल धर के दबोचना च हे ।


"ठाकुर हर 'क्षौर -करम' के सब बुता करथे,फेर तोर घर म आधा च लागथे ।"ठकुराइन भेदहा मुचमुचात कहिस ।


" वो कइसन आधा लागथे हमर घर ओ।"महाराजिन थोरकुन भकचकात कहिस ।     


        येला सुनके ठकुराइन कुछु कहिस नहीं ।वो तो अब ठाकुर के रास्ता देखे के शुरू कर देय रहिस ।


"महराजिन....!!" येती महराज के हाँका फेर पर गय । फेर महराजिन अपन अभियान ल  पिछु नइ हटिस ।अउ अभियान रहिस, कछु कर के ठकुराइन ल गोठ बात म चित्त कर  दिया जाय ।


"तंय कइसे कहे  ठकुराइन, हमर घर के बुता कइसन म आधा लागथे ।


"वो वइसन ये ।महराज के तो बस दाढ़ी- मेंछा भर  बनाय बर लागथे ओ,बाकी हर तो बस सत्य नारायण ये ...!"ठकुराइन कह दिस फेर अपन हाँसी ल रोके नइ सकिस ।


  वोकर हांसे के गूढ़ार्थ ल महराजिन समझ गइस । अरे ये का...!येला मैँ गोठ घेरहां कहत हंव ,अउ  इहाँ मैं खुद घेरा जावत हंव।


"सोनकली,तंय महराज के ऊपर ऊपर ल देख के हाँसत हस ।देखे हस उंकर मेंछा ल ।तारा जोगनी संग अगास हर गिरे लागही तब वो अपन ठाड़ मेंछा म वोमन ल झोंक लिहिं ।"


"बने कहे...।"


"मोर महराज के ठाड़  -ठाड़ मेंछा,अगास कोती जावत अउ तोर ठाकुर के  तरी ओरमत मेंछा ,जाने माने धरती माता हर वोमन ल खीँच लेवत हें ।"


"वो तो उंकर हाथ के बनाय बनोरी ये महराजिन ।मोर ठाकुर हर तो मेंछा मास्टर ये ,वोकर जेती मन लागही तेती गजुम लीही


ओमन ल ..।"  ठकुराइन कहिस,"तंय  जाबे कि नहीं ,तेला तंय जान।फेर मैं अब जावत  हों ,काबर के वह दे मोर ठाकुर आवत हे ।


         महराजिन अबक्क ठाढे रहिस।वो खुद तय नइ कर पात रहिस के बाजी  ये पइत काकर हाथ म हे ।


   



   थोरकुन बेर बाद म  ठकुराइन घर ल बाहिर निकलिस।तब का देखथे, महराजिन जाड़ म कुड़कूड़ात तरिया ल फेर नहा के आवत हे।अब रसोई बनही ।अउ शुचिता  म सदानन्द महराज कोई समझौता नइ  करेंय ।


    वोला अइसन जाड़ म कुड़कूड़ात देखिस,तब ठकुराइन फेर मुचमुचा उठिस ।


"तंय कइसन भी हाँस बे मोला, तब ले भी तोर तीर म नइ जाओ ।महराज, देखहीं तब फेर वापिस तरिया भेज दिहीं।"महराजिन तो फेर ठाढ़ हो गय रहिस।


"महराजिन, तंय मोला तो ओझिया -बतरा घलो डारे,अब ।जा....जा...भीतर कोती जा नहीं तव ठिकाना च नइ ये ।"अइसन कहत ये पइत खुद ठकुराइन अपन घर भीतर कोती आ गय ।






                      3




         महराज सदानन्द अपन ब्राम्हणत्व बर बहुत ही सचेत, वोतकी महराजिन त्रिपुर सुंदरी हर बिन्दास...!महराज के लाख हरके- बरजे  ल भी महराजिन अवइया -जवइया मन ल दु चोंच नइ मारही,तब बनबे नइ करय ।



          आज भी ये जगह म महराज के एकछत्र राज चलथे  । बिना कछु भय के ही जनता -जनार्दन हर उंकर आगु म नत मस्तक रथे ।येकर मर्म ल महराज हर अच्छा तरीका ले जानथें  ।वोहर आय उंकर कर्म काण्ड  अउ सुचिता । थोरकुन समाज ल दूरी बना  के रइबे,तब तोर प्रभा- मंडल सदाकाल अइसनहेच बने रही । येहर उंकर बर अधिकतम कुटिलता ये।येकर ल आगु वोहर अपन स्वार्थ बर अउ आन कछु नइ ज जानीन । सदा प्रसन्न राम हर उंकर आराध्य आँय ।अउ वोई मूर्ति ल अपनों म उतारे के प्रयास हर ही उँकर जीवन उद्देश्य घलव ये ।


             


            फेर महराजिन के मन आय ,तब न...!जब तक वोहर दु -चार लइका मन के मूड के जुंहा नइ देख लीही, अउ खुद के मूड़ के एक दु पाकत चुन्दी मन ल,पड़ोसिन नावा बहु- बोहासीन मन करा ले सुलरवा


 नइ लीही, तब तक वोकर दिनचर्या पूरा नइ होय।अउ महराज देख डारिन,तब येकर सजा....वोइच  तीर के तरिया ल स्न्नान करके  ,कइनचा ओनहा पहिन के घर म घुसर  ..। कै पइत तो महाराजिन ल पांच... पांच पइत तक ल नहाय बर पर गय हे,दिन भर म ।


          


        अउ ये सजा हर महराजिन ल अइसन सिझो देय  हावे कि अतेक नहाय ले  भी उनला कुछु फरक नइ पड़े । न.. जर  ..न ..जुड़..न छींक ...न..खाँसी ,कुछु भी नहीं । महराजिन बर येकर लिये महराज करा लें कुछु भी छूट नइ ये ।


   


        महराज के पूर्वज मन  ही ठाकुर के पूर्वज मन ल ये तीर म बसाय रहीन हें , काबर के बनेच अकन कर्म काण्ड म ठाकुर के  उपस्थिति हर जरूरी होथे। मर मिट म  पिंडा धारे के बेर म परसा पान के खोनिया बना के लान थे ,चुरी - चाकी  ल पानी नहाय के बेर घाट म अपन छुरा ले....। बिहाव पढ़े के बेर म ,वोहर तो महराज के हाथ -पाव बने रइथे । येकर सेथी ठाकुर हर महराज के पूरक आय ,कहके  ये महराज घर तीर म वोकरो उपस्थिती हे ।


         


        फेर सदानन्द महराज अपन पुरखा के चलागत ल कस के अपन म राखे हे ।अउ ठाकुर करा  क्षौर कर्म कराये के बाद,स्न्नान ध्यान बर बराबर सचेत रइथे । अउ ठाकुर हर दिन के पहिली बुता करही, तब वोहर महराज के बुता रइथे ।


             महराज महराजिन ल कै न कै पइत चेताथे  । बिना काम ..अकारण काकरो आन के देहरी झन खुंद । फेर महराजिन अइसन भलमनसी वाले  जीव आय  ,के कोई झगड़ा- झंझट होवत देखही, तव घर -भीतर ल खुसर जाही । समझाय बुझाय  बर ।कोन्हों रिसाय फुलाये हें ,तब महराजिन हावे वोला मनाय बर । ये बेरा म वोकर आत्मीयता हर देखतेच बन थे ।फेर महराजिन हर निज नारी पुरुष मन के लड़ई भिड़ई, म अतेक दखल दे देवत हे ,ये समय म  ।


             परनु राउत ,ये गांव के बड़ डिंगर  जीव ।एक दिन दुनो राउत- रौताइन कुछु जिनिस ,बर तीरा -घिंचा  होवत रहीन।फेर बात महराजिन के कान म खुसर गय ।वोइच दे,तुरत- ताही महराजिन पहुंच गय उँहा ।समझाइश देवत हे दुनो झन ल ।समझाइश कम डांट -डपट वोकर ल कतको जादा। तरी मुड़ करके दुनों के दुनों हाँसत हें, अउ येती महराजिन त्रिपुर सुंदरी ,वोमन ल पानी पी ..पी ..के समझात  


रहिस । बनेच बेर म वोमन मानिन ।महराजिन ल एक पइत अउ पानी मंगा के पिये बर लाग गय।


"तुंहला इंहा पानी पीयत देखहीं ,तब महराज हमन बर जंगाही,महराजिन ..!" 


"ठीक हे, अब बने रइहा।मैं अब जावत हंव " महराजिन कहिस अउ उँहा ल निकल आइस ।



        एकर बाद तो महराजिन बुता च कर देय रहिस।आत -जात,भेट- मुलाकात हरदम वोमन  के  खोज -खबर लेये के।बने राखथे ये पइत के फिर वोइच दिन कस डिंगरई  करत हे । कनहुँ मारा पीटा तो नइ करय । 


           बने रान्ध पसा के देवत हे के बारा भिभो करथे,मुँहू फूलोय रइथे के बने हाँसथे गोठियाथे । देखबे दउ, अउ कहाँ जाही वोहर तोला छोड़के ।



     


      परनु तो ठहरिस डिंगर मनखे...।महराजिन के अइसन  पूछ परख ल अस्कटाके  वोहर अपन रौताइन ल कहिस-अतेक ध्यान तो तोर हमर दुनों के महतारी- बाप मन नइ राखत ये।


                 रउत,वोकर कान म कुछु फुसुर.. फिया ..करिस ।


"ये... ये...!येहर नइ बनय ।"


"तब फेर जिनगी भर,येकर उपदेश सुन ।"


"हे ..हे..!नहीं.. नहीं..! तब ले भी..।"


"चुप्प..!"रउत दलकारत कहिस,"जइसन मंय बोले हंव, ठीक तोला वइसन करना हे ।"


 "असतिया...!"रौताइन  घलव हाँस डारे रहिस ।



       


            राऊत घर किल्ली गोहार परत हे ।ठक ...ठीक ..परवा ..टाटी टूटे- फूटे के  अवाज आवत हे।


"कइसे रे..फेर का हो गय, तुमन ल मोर अतेक समझाय के बाद घलव ।"महराजिन दहाड़त खुसर गइस ,मोर्चा बीच म । राऊत बड़का तेल पिया सटका ल धर के रोताईन ल कुदावत हे।रौताइन येती ...ओती..भागत हे, अपन जान बचाय बर।


..ये महराजिन  दइ, बचावा.. बचावा.. कहत रौताइन वोला पोटार लिस ।राऊत आ गय, बड़ गुस्सा म हे  वोहर । अरे ..अरे..पापी ..असतीया मारीच दारबे,अबला ल का ।घोर नरक म जाबे ।


महराजिन छोड़ा तुँ येला.. छोड़ा ।रौताइन किंजरत हे।  वोकर  ले नजर मिल   गइस राउत के तब वोहर वोला आंखी मार के मुचका दिस ।इशारा म झनीच छोडबे महराजिन ल...!राउत डिंगर...मउका देख के महराजिन के  पोठ माँसल कुल्हा म बने एक सटका थोरकुन जनाय के लाइक  जमा दिस ।


"हरे मुरहा,मार डारे रे..."कहत महराजिन राउत घर ल भाग परइस ।


        पीछू दुनो राउत -रौताइन महराज घर जाके महराजिन करा ले मुँहू ल छबकत माँफी घलव मांगे गय रहीन ।


        


      फेर तब तक ल महराजिन अपन आन घर जाय के सजा...तरिया ल स्न्नान कर के आवत रहिस ।


"चोट्टी -चोट्टा हो ,ठग- ठियाली के लड़ई होके मोला एक सटका मार देया ।" महराजिन घलव हाँसत रहिस, रौताइन ल देख के ।



       वो दिन ले थोरकुन कम हो गय रहिस, महराजिन के आन -आन के घर जवइ हर ।




           


         फेर ठकुराइन करा तो महराजिन के पेंच हर अरझेच  रइथे । वो दिन  के तना - तनी  हर तो जितीच गय रहिस ।दुनों के दुनों विचित्तर शर्त लगा दारें रहिन ..! हाँ.. फेर ठकुराइन आश्वस्त रहिस कि जीत तो मोरेच होही।काबर के वोकर य


ठाकुर ,वोकर गोठ ल सुनथे, बरोबर सुनथे ।  हाँ...   हिम्मत भर करे बर हे ।अउ ठाकुर हर वोकर खातिर करही घलव  । अउ महराज करा महराजिन के एको नइ चलय ।अउ महराजिन शर्त लगा बइठीस अतेक बड़े ।





 



                   


                       



                        4










                बाजा रुंजी घिडक़त रहिस । परोस के परसादी के बेटी के बरात आये हे । बरात  ठीक  बेरा म आ गय हे । ठीक बेरा म  पइरघई हो जाथे ,तब सब कुछ ठीक - ठाक निबट जाथे।


समधी भेंट हो गय । सदानन्द महराज द्वारपूजा बर मुंहटा म बइठीन । तीर म अतेक लइका -पिचका मन चुटा मरत रहिन, के ठाकुर ल अपन विचार ल बलदे बर लागिस ।


           द्वार पूजा, मउर  सेंकई  के बाद दुल्हा मंडवा तरी म आ गय ।उँहा तो महराज वोकर ले पहिली आ के विराज गय रहिन ।आन आन धुरिहा गांव ल बिहा पढ़े जाय बर लागथे,तब आज मउका मिले हे घरेच तीर म बिहा पढ़े के,येकर ल अउ का सुख लेबे । महराज तो आज अपन खास पीताम्बरी धोती ल पहिने हें । उंकर चेहरा  म अभी ले विजेता के भाव तउरत हे।


    


      फेर महराजेच काबर, ठाकुर  जी के  भी  के संग भी तो एइच गोठ हे।पर वोहर अभी बड़ तनाव म दिखत हे ।अतका तनाव तो बधु के ददा परसादी के चेहरा म नइ ये ।


    वोहर एक पइत ये मुड़ी जाथे मंडवा के,त कभु वो मुड़ी जावत हे।


    वोतकी बेरा वोकर ठकुराइन सोनकली आ गय ,बर -बिहा देखे बर । वोला आवत देखिस,तब ठाकुर के चेहरा हर कठोर हो गय ।


          थोरकुन बेर बाद म वर पक्ष ले लाने समान मन के पूजा- आंचा करके सुवासीन मन ल  लड़की ल पिंधाय ओढ़ाय बर अंदर भेज दिन ।


               अब एक परकार ले महराज के जगह हर सुन्ना हो गय, कन्या के आवत ल ।येती ठाकुर , महराज के तीर म गइस,अउ अवइया संकट ल बेखबर  बइठे महराज ल अपन दुनों बलिष्ठ भुजा म धर के उठा दिस ,दशानन रावण कस ।अउ उतारे के बेर थोरकुन  महराज ल पटके कस घलव कर दिस ।


        महराज तो अबक्क...!!फेर सबो कोती हाहाकार मच गय । ठाकुर हर महराज ल अलगा दिस ।ठाकुर.. हर....महराज ल मार डारिस ।महराज ल धर के पटक दिस ।महराज ल कचार दिस ।


 "महराजिन ,महराजिन कइसे दइ, तंय आज इंहा घर म खुसरे हवस।अउ वोती  ना* हर तोर महराज ल पटक -पटक के मार डारिस हे ।"


"ये नवा*न , भइगे जीत डारिस  ।" महराजिन के मुख ल बड़े आराम से निकलिस ।


           येला सुनके जउन महिला बेचारी, इहाँ तक शोर बजाय आये रहिस,वोकर मुंह सुख्खा के सुख्खा हो गय ।वो कुछु भी समझ नइ पाइस ।चुपे चाप वोहर फिर आइस उहाँ ल ।


                


             येती गुड़ी पंचायत के नौबत आ गय रहे।परसादी हर ठाकुर बर बड़ रोसियाये रहय ।वोला तो महराजेच हर शांत करिस.. येला बेटी विदा करे के बाद देखबो .. कहत।परसादी तो अपन बिहाव मंझ म रंग म भंग होय के कारण बड़ दुखी  रहिस ।


          ठाकुर ,अब  महराज आगु म दण्डाशरण परे हे। भुइंया म घुण्डल घुण्डल के माफी  मांगत हे.... त्रिया हठ.. महराज त्रिया ..हठ !


"का...!"


"हाँ..! भरे सभा म तुंहला अलगा के दिखाना ।ठकुराइन के महराजिन करा शर्त लगे रहिस।ठकुराइन के कहे ल  ठाकुर मानथे।  मानथे तव ये मुश्किल काम ल कर के बता ।"


"महराजिन तंय अब महू ल पांचाली असन दांव म लगाय के शुरू कर देय ।"महराज थोरकुन रिस मिंझरा गारी महराजिन ल दिन।


  "चल सोनकली के भक्त..,येती माड़ी कोहनी ल छोल देय।अब बर बिहा म चेत कर ।"महराज ठाकुर साहब ल झिड़कत कहिन  ।


" मैं थोरकुन स्न्नान कर के आवत हंव।वोतका ल नोनी ठीक तइयार होये सके रहही,परसादी गौटिया    ..।महराज कहिन अउ स्न्नान करे बर  अपन घर डहर चल दिन ।


    येती  मुँहटा म महराजिन उंकर  स्न्नान बर धोआ कपड़ा धर के खड़े रहिन ।


"महराजिन बड़ नाम कमाये ,न...!"महराज थोरकुन रिस म कहिन ।


"फेर ठकुराइन हर जितीच तो गय।अउ तुँ मोला कभु भी जितवावा  तो नही ..!"महराजिन  महराज ल कपड़ा धरावत कहिन ।







                         5   







      आज भी पूर्णमासी ये ।फेर अगास म बादर छाय हे, तेकर सेथी रग ..बग   ल चंदैनी हर नइ दिखत ये ।तब ले भी चन्दा रात के अंजोर हर दिखतेच हे।सावन- महीना म ही, ये बच्छर बरसात हर एकदम गझा गय हे ।


              खँचवा-डबरा सब भर गय हे ।तरिया लबालब भर के उल्टा लहुटत हे । पानीच ..पानी..पनिहर हो गय हे ,सब कोती हर ।


फेर झिंगरा मन के ये सिटी के तो का कइबे।



      रांधे -पसाय के बाद एक घरी तो फुर्सत मिलबे  करथे ।आज ठकुराइन अघवा गय हे, तेकर सेथी आगु आके परसार म बइठ गय हे, पसीना  जुड़वाय बर ।



             ठकुराइन के बाद म तुरतेच महराजिन  घलव निकल गय । फेर रोज कस चंचल, अमर के ओझियाने वाली ठकुराइन आज ,आन कछु म खोये हे कहु


लागत हे ।



"कइसे सोनकली, आज बने नइ दिखत अस ।" महराजिन उनमुंनहा बइठे ठकुराइन ल देख के कहिस ।


         महराजिन सिरतो म कउआ गय रहिस ।का हो गय येला, सदा -सर्वदा  चढउ लेने वाली ठकुराइन आज ,निच्चट अशक्त दिखत हे ।


"तोर देहें तो ठीक हे, ठकुराइन।"महराजिन वोला  कोंचत-कुरेदत पूछिस  ।


"हाँ.. महराजिन  ।मोर तबीयत हर तो बने हे ।"


"तोर मतलब..?"


"मोर हर तो बने हे।फेर ठाकुर ल, वोकर जुन्ना बीमारी हर फेर उबक गय  रहिस  हे, आज ।"


"ठाकुर के जुन्ना बीमारी..!तोर -हमर  एके करा रहत,तो जुग-जनमन कटत है अब ।फिर मंय ठाकुर के कुछु बड़का बीमारी नइ जानत अंव ।"


"........"


"एके ठन बीमारी मंय जानत हंव,ठाकुर के ।वोहर आय, वोकर मेंछा हर ओरम गय हे ।"महराजिन, ठकुराइन ल हँसवाय बर  कहिस ।


        ठकुराइन हाँसिस तो फिर आन दिन कस गमकत हाँसी नइ रहिस आज के हर । वोकर हाँसी हर मुरझाय फूल कस रहिस ।


"......"


"मैं ठाकुर के एक ठन अउ बीमारी ल घलव जानत हंव ।"


         ठकुराइन, महराजिन कोती ल भेदहा देखिस...का कहत हे, येहर...?


"अरे,वो दूसर बीमारी तंय खुद अस ।वो बपुरा बर ...।


     महराजिन के कोशिश, बेकार जावत रहिस ।


"अरे कुछु कहबे तब तो  जानबो...!!"महराजिन थोरकुन जोरलगहा कहिस ।


"का बताबे,महराजिन..।ठाकुर ल पहिली मिर्गी -बाफुर के दौरा पड़य।वोहर बीस- पच्चिस बच्छर के गय ल फेर काल रात के उमड़ आय रहिस ।"


"ये बबा रे..!वोला तो आज तक देखइ तो धुरिहा हे ।कान म सुनें तक नइ रहेन ,ओ ठकुराइन ।" महराजिन तुरतेच कह उठिस ।


"हाँ...महराजिन ,सच गोठ आय ।"


"ये बीमारी के तो आगी -पानी हर बड़ दुश्मन आय।" ठकुराइन के उदासी हर ,महराजिन ल विधुन कर देय रहिस ।


"फेर ठाकुर हर ,कोई ल बताय बर नइ कहे


ये । "


"येती बताबे नहीं, तव जानहि कौन.।"


"वो तो ठीक हे, महराजिन, तभो ले मंय तोर पांव परत हंव। कनहुँ  ल भी झन बताबे ,ये गोठ ल।"


"चल ठीक..।" महराजिन कहिस ।










                      6







           


                आज  भादों के  अँधियारी के आठे ये । आज आठे कन्हैया  ये ।आज के ये  दिन हर महराज बर बड़ खास रइथे । साल भर ल महराज हर ये दिन ल अगोरथे ।


           आजे के दिन, महराज हर मुकुंद- मुरारी....लड्डू -गोपाल के श्री विग्रह ल अपन सीना म लगा के एक  प्रकार ले  पैदल नगर भृमण करथे । नगर का.....ये मंझोलन कद काठी के गांव  ये ,महराज के भुइंया हर । संग म दु -चार,  कभु -कभु तो कोरी- ख़इरखा, किरतनहा-भजनहा हो गीन तब अति उत्तम।नहीं त डेरी हाथ म   भगवान चरण वाला ...ठीनठीनी घण्ठी ल बजावत,जेवनी हाथ म भगवान के छोटकुन सिंहासन  वोई सीना म  डांटे।


         


            आज के दिन, महराज एक प्रकार ले गांव के हर गली -खोल ,मुहल्ला म बिना कोई भेदभाव... बिना कोई आग्रह.. दुराग्रह के समभाव ले किंजरथें ।



              प्रणाम करइया प्रणाम करथें..।आरती करइया ...आरती अउ पूजा करइया पूजा -आंचा । सब अपन अपन ढंग ले लड्डू- गोपाल के झांकी ल निहारथें । 


 


              महराज आज अपन गांव म भगवान के श्री- विग्रह ल घुमा लेथें,वोकर बाद म तीर के गांव म लोकनाथ गौटिया घर ले  जाथें।उँहा तो भगवान संग महराज के विशेष विशेष अगोरा होवत रइथे।  खुद गौटिन अउ आन- आन नारी परानी मन भगवान  के ये झांकी..मञ्जुल मुरतिया ल जी भर निहार के अपन ल धन्य मानथे । पूजा -आंचा कर के  संझाती बेरा ल उंकर वापसी होथे ।



       फेर एक ठन बात ,आज  काकरो करा वोहर दान -दक्षिणा,भेंट -उपहार स्वीकार नइ करंय । महराज के  हालत पोठ हे।ये बात के गुमान  सब ल हे। येकरे सेती, कोइ जोर जबरदस्ती भी नइ करें चधौतरी बर ।




"महराजिन ,अमली पानी ल अमर न,मंय लड्डू  -गोपाल के आसन ल माँजो।"


"देवा न मोला, मैं मांज हाँ तब ,नइ बनही का ।"


"बनही,फेर मोला माँजन दे ।"


"ठीक हे, फेर पहिली सुख्खा राख म पहिली रगडा ।अइसन म जादा  सफ्फा होही ।"


" हाँ...।ठीक कहत हस  तैं..।"




"ले अब ,आसन धोआ गय।भगवान के बारी ये अब..!" महराज ,महराजिन ल अपन गोठ के साखी देवत कहिन ।


" भगवान ल कतेक नहवाईहा महराज...!उनला जर जुड़ धर लिही ,त..?"महराजिन महराज करा ठठ्ठा मसखरी करत कहिन ।


"जर -जुड़ के आदि अउ अंत ल ,जर -जुड़ धरे सकहि , महराजिन..!" महराज भाव- विभोर हो गय रहीन ।


            महराजिन उंकर अकारण- सकारण, भाव -विह्वलता ल देख के मुचमुचा के चुप रह गइन ।





"महराजिन,  लड्डू -गोपाल सादा पानी म नहा डारिन। अब पंचामृत ल लान ।अब वोमे नहाहीं।तब फेर  नावा वस्तर धारन करिहीं।यज्ञोपवीत.. श्रृंगार....! अभी तो कतेक बुता बांचे हे...!!"महराज थोरकुन उतावला होवत कहिन।


"सब हो जाही, महराज ।"


"तभो ले..।"


"तुं हर बच्छर, अइसनहेच बेरा तो निकलथा।"महराजिन घलव थोरकुन जल्दबाजी करत कहिन ।





       पूजा-आंचा.. आरती भोग अस्तुति के बाद महराज, लड्डू गोपाल ल  मनायिन ।चलव...प्रभु..तुँहर ..कतेक न कतेक भक्त मन दरशन  बर डहर देखत हें...!



        बहुत ही आदर के साथ,भगवान लड्डू -गोपाल के मंगल- मूर्ति ल पीतल के वोइच चमकत आसानी म बइठार के  फूल दल ले सजा के, महराज बाहिर  निकालीन । महराज के सीना म चटके  हे ,भगवान के वई आसानी हर ।जेवनी हाथ म आसनी हे अउ डेरी म घण्ठी हे । घण्ठी के आवाज बड़ धुर ल जावत हे, तब अगर गुँगुर धूप हर


भी बढ़ धुर ल गमकत हे।


    आठे -कन्हैया उपास करइया लइका,सियान सब भगवान के झांकी दरशन करत हें। आन- आन कत्था झांकी हर तो रात के होही मन्दिर म ।अभी तो घरो घर पाखा म छपाय ,गोड़रंगी रंग म बने आठे कन्हैया ल, भोग लगा के  लइका पिचका मन  ल अपन 'एक -गाल 'अउ 'पूरा गाल ' वाला उपवास ल समोखे बर हे। महराज के झांकी हर बुलक जाही तब..।



          महराज के संग बनेच कीर्तनहा ...।महराज  नगर भृमण कर डारिन ।वो दु ठन नरिहर वोमन ल प्रसाद बना के खाय बर देवत अब  अपन गांव  ले विदा लेवत हें ।


      जयजयकार जयघोष होइस अउ कीर्तनहा मन फिर गइन ।


    




       अब महराज...वो परोस के गांव ,लोकनाथ गौटिया के घर जाय के संकल्प के संग म ये पैडग़री म पाँव धरत हें अकेला ...।वो अकेला च  जायें उँहा..।संग म कभु कनहुँ ल नइ ले जांय ।


    


         अपन हृदय म बसुदेव जी  के सुख  ल धारण करत महराज चिखला.. खँचवा-डबरा म पाँव मढावत आगु बढ़त हें ।गांव के  रास्ता.. चिखला के कमी कइसे होही ।धरसा परत हे.... । धरसा म तो ये चिखला अउ बिच्चछल  के भरमार ये।रो ..हो..पो..हो..चिखला ।आगु तो चिखला के समुन्दर दिखत हे।


   त्रिलोकी नाथ ल हृदय म लगाय के सुख ।वोहू म वात्सल्य भाव...!आज अउ अब साक्षात मथुरा ले  ब्रज जाना होवत हे नन्द बबा के घर ,बसुदेव जी के । भाव समुन्दर अतेक गहरा के, दुनों आंखी ले गंगा जमना बोहावत हे ।




 हे प्रभु...!कोंन....? महराज के मुख ल निकलिस।अउ उंकर हाथ अउ हृदय म लगे भगवान लड्डू गोपाल के आसनी हर वोई चिखला म फेंका गय ।


           महराज चिखला म  बुड़े अउ बुड़ ...बुड़ करत वो मनखे आकृति करा, जाके  पहिली  वोकर मुड़ ल,  झोर असन पातर होय  चिखला ले उपर करिन ।



    पूरा चिखला म सनाय.. बेहोश ..मनखे।मुंह म ले गजरा निकलत हे । चीन्हउ नइ ..मिलत ये ..कोन ।अउ  इंहा येकरा..अइसन ...कइसन  होय हे । महराज के पांव हर घलव  माड़ी के जात ल चिखला म बुड़त जात हे।


         महराज अपन गमछा म  वो मनखे के मुँहू ल बने पोछिन....ये बबा रे...!


ये तो ठाकुर ये।हाँ.. तीर म वोकर ये साज समान हर फेंकाय हे ।


ठाकुर....!महराज कस के वोला हाँक पारिन।फेर चिट न पोट...!मुहँ ल गजरा अउ निकलत हे।कोई ..अहिरू -बिच्छू तो नइ छू दिस।अब कइसे करंव..लड्डू गोपाल ।


महराज के शरीर हर भी अभी पोठ हे।वो ठाकुर ल अपन खांध म उठाईंन अउ वापस गांव कोती  फिरे  लॉगिन ।




      देखइया अबक्क रह गइन।वोमन सहायता बर कुदिन, फेर महराज ठाकुर ल सीधा अपन घर म ले आइन। अंगना म भगवान के स्न्नान सामग्री हर  माढ़ेच रहिस ।


        महराजिन येला देख के अबक्क हो गइन ।फेर थोरकुन दिन पहिली ,ठकुराइन के कहे गोठ हर सुरता घलव आवत रहिस ।



महराज....!ठाकुर ..!! कहत किल्ली गोहार पारत ठकुराइन आके ठाकुर ल पोटार लिस।अतका बेरा म महराज वोला बढ़िया नहवा के पोंछ डारे रहिन।


 


"देखे महराजिन, जउन चीज ल डरात रहंय।वोइच जिनिस हर होइस , हे।"ठकुराइन के आँखी मन ले रकत धार आँसू हर बोहावत रहिस।


     अब ठाकुर के आंखी खुलिस।वोहर अपन ल महराज के घर भीतर म पाके अबक्क होवत रहिस ।


 महराज सब गोठ ल सार संक्षेप म बतावत कहिन-लड्डू गोपाल,मोला वो कोती नइ ले जाय रथिन,तब तो अंधेर हो गय रहिस, ठकुराइन ।


          


   महराज अब ले भी वइसनहेच चिखला..रद म सनाय  हें।वो उठे कस नइ करत यें ।


"ठाकुर, आधि व्याधि मन चोर असन यें।ये मन  ल लुकाना माने चोर मन ल घर खुसारना  ये ।" महराज कहत हें,"सब्बो जिनिस के उपचार हे, वैद मन करा ।"


         


      ठकुराइन, भुइंया म दण्डाशरण  परे हे महराज के आगु म ।बस.. बस.. अब ठकुराइन  । अब हम सब भगवान के पांव परी...।वोइच तो प्रेरणा देने वाला आँय ।


"तब ले महराज,  तुं अपन नेम धरम के पक्का। काकरो आन के छइंहा  ल नइ छुवा ।तेहर आज मोर असन ल खांध म बोह के अतेक धुरिहा ल लाने हव।"ठाकुर हर  घलव रोवत रहिस ।


"ले भइ गे बस्स ,बराबर हो गय।परसादी के मंडवा म तंय मोला अलगाय रहे न, वोकर बदला ये, चल।"महराज हाँसत कहिन, तब ये पइत एके संग तीन झन लजा गइन- महराजिन, ठाकुर अउ ठकुराइन ।


"ले ठकुराइन ,अब महराजिन घलव जीत डारिस न ।"वो फिर कहिन ।


  ठकुराइन एक पइत फेर महाराज के पांव परत ठाकुर ल अपन घर लानिस,वोकर बहां ल धर के ।



"महराज,स्न्नान ...?"


"रा ..ना ..महराजिन,थोरकुन बाद म करत हंव ।"महराज कहिन ।


"जावा, कर लेवा पहिली ।"


"हाँ...ठीक।फेर तुरतेच तंय ,एक ठन बुता कर।वो  लोकनाथ गौटिया घर पहिली खबर भेजे के व्यवस्था कर।वोला सब्बो गोठ ल  पूरा बता दिही, जवईया हर ।"


"लागही च..?"


"पूरा सोलह आना ....!ये विश्वास के बात आय। जा..जा..।उँहा मनखे भेज ..।महराज कहिन अउ स्न्नान करे के तइयारी करिन ।




"नहा लेया, तुं...?" महराजिन वापिस आवत रहिस।


"कोन ल भेजे ...?"


"गोवर्धन ल...।"


"पूरा बताये..?"


"हाँ....।"महराजिन कहिस अउ नहा खोर के फिर तइयार महराज के नजदीक म चल दिस।


             महराज वोकर चेहरा ल बने ध्यान लगा के देखिन।थोरकुन अफसोस के भाव..


!


 "सब कुछ खइता च हो गय, आज ।"महराजिन थोरकुन धीरन्त सुर म कहिन ।


" का कहे ,महराजिन ।  खइता च  हो गय...!अरे पगली,आजे तो असली बुता होइस हे, पूजा के। आज मैं लड्डू गोपाल के, आदि अउ अंत देव् के विश्व रूप के दर्शन करे हंव।अउ देख अभी ल मै करतेच हंव ,वोला।"


"......"


"अर्जुन हर वोतकी आनन्द नइ पइस होही , वोकर ल ज्यादा आनन्द मैं पावत हंव ।"महराज एक पइत फिर भाव विभोर हो गय रहिन ।


"फेर..लड्डू गोपाल कहां हें..?"महराजिन पुछिन।


"लड्डू- गोपाल,ये पंचतत्व के मालिक....!अपन पांचो तत्व-जल, पावक ,गगन ,समीर अउ क्षितिज माने  धरती म खुसर गइन हैं कनहुँ करा ।" महराज थोरकुन हाँसत कहिन ।


"तुहर मतलब...?"


"हाथ ल फेंका गइन,चिखला म गड़े होंही कनहुँ करा ।"


"हे.... राम..!!!"महराजिन  के मुँहू ल किल्ली -गोहार निकल गय ।अतका बेरा  ल सपना दशा म  वोहर येला नइ सोचें रहिन ।


"चुप..कुछु नइ होय ।"


"येकरे बर उनला बाहिर ,ले गय रहा ।" महराजिन रिस अउ दुख म थर ...थर कांपत रहिन ।


"उनला जाके खोज बो पाछु।मिल गइन तब मिल गइन।अउ नइ मिलिन तब पीछू आने बिसा  के , खरीद के ले आनबो ।" महराज , महराजिन ल समोखत कहिन ।


"बिसाये ल भगवान मिलथे ।"


"तंय एक बात के उत्तर दे ।"


"भगवान  शालिग्राम अउ  लड्डू गोपाल ल कंहा ल लाने रहेन..?"


"   वो शिवरीनारायण के मेला ल..।"


"अउ आसन ..?"


"डभरा मेला..ल ।"


"मुफ्त..?"


"मुफ्त काबर.. अउ  कोन दिही ।आसन बर तो कतेक न कतेक ..मोल भाव करना पड़ गय रहीस ।सुरता हे तुंहला...?"अब महराजिन के आंखी म चमक आ गय रहिस ।"


"ठीक कहे तंय।अउ मैं  घलव यइच कहत हंव न..।" 


"भगवान के मूर्ति अउ आसन ,खरीदे ले कतको मिल जाहीं..?"


"हाँ..! वो तो हे ..।"


"फेर खरीदे ले ठाकुर हर नइ मिलय, महराजिन..!"  महराज हाँसत कहिन।भगवान के विश्व रूप दरशन के अलौकिक आनन्द अब ले भी उँकर  मुख मंडल म खेलत रहिस ।





*रामनाथ साहू*



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होरी तिहार मा का कराथन थोरकिन सोचव जी*

 तुलेश्वर कुमार सेन जी के आलेख




*होरी तिहार मा का कराथन थोरकिन सोचव जी*


हमर देश के संस्कृति भाखा ,बोली, पहनावा, तीज तिहार,सगा सोदर माने के बेवहारिक बातचीत,हंसी ठिठोली करत हन फेर मर्यादित ढंग ले,  छोटे लइका अउ बड़े सियान से कइसे बातचीत करना हे , दाई ददा के आगु मा का ,कब अउ कइसे रहना हे, सबला हमन भूलावत जावत हन, भारतीय संस्कृति देश दुनियाँ मा हजारों साल ले नाम कामावत रीहिस, कतको झन अपन _अपन ढंग ले येला मिटाए के कोशिश करिन ओमन ख़ुदेच ले मिटगे फेर नइ मिटा सकिन काबर सुने अउ देखे हवन मराइया ले बड़े बचाइया होथे ।पश्चिमी सभ्यता के रोग अब हमु मन ला लगे के शुरू होगे हे तेखर सेती आज हमन पढ़े लिखे अउ शिक्षित होय के घमंड करत हर बात ला तर्क वितर्क अउ वैज्ञानिक होय के बात कहि थन हमर पुरखा मन के आगू उखर एड़ी के धोवन बराबर घलो नइ हवन, फेर वा रे मनखे थोथा चना बाजे घना, दिखे मा श्याम सुंदर पादे मा ढमका, जाने कुछ नहीं फेर अपन आप ला बड़का ज्ञानी बतावत हे, जबकि हमर इही भारतीय संस्कृति तीज तिहार मन ला अपना के ओकर वैज्ञानिक सोच अउ शोध करके विदेशी मनखे मन आज चाँद सूरज मा पहुंचगे। हमर लइका मन ला हमर सियान मन के सब बात हा  ढपोसला अउ मूर्खता पूर्ण लागे लगत हे,अनपढ़  गंवार कहत हे। उखर दूरदर्शी बात ला हम कभू नइ देख अउ सोच सकेन जबकि हमर ले ज्यादा वैज्ञानिक ओमन रिहिन उखर बात मा शोध करे के जरूरत हे।

         बात होली तिहार के करत हन ता पहली के सियान मन पौराणिक हिरणाकश्यप,होलिका अउ भक्त प्रहलाद के कथा अउ राधा कृष्ण संग गोप गोपाल के कथा ला मान के होली मनवात रिहिन अउ प्राकृतिक रंग ले होली खेले परसा के फूल, हल्दी, चंदन, प्राकृतिक रंग गुलाल आदि ला लगा के ओखर बाद रिश्ता अनुसार पांव पायलगी करे। नगाड़ा बजावत हंसी ठिठोली संग फाग गीत गाए अउ झूम झूम के नाचे,घर घर गुझिया, सोहारी, ठेठरी,खुरमी,अरसा, बरा अउ नमकीन आदि बनाए परिवार सहित संग मा बइठ के खाए मिलके तिहार मनाए एक दुसर ले सुख दुख बांटे अउ खुश रहे। कोनो काम बुता मा बाहर जाए तहुमन लहुट के अपन छइंया भुईयां वापस आ जाए। जियत मरत के होली तिहार कहाए।

           बात करथन परिवार के आज के होली तिहार के ता आज के तिहार मनाए के तौर तरीका रंग ढंग ककहरो समझ नइ आवत हे आदमी मन परिवार सहित तिहार मनाए बर जोरियाथे जरूर फेर शरीर भर घर आथे मन हा दुसर जगह मा रहिथे ।आज सब झन पइसा के पीछे पागल होगे हावे पिता पुत्र,सास बहु,ननद भाभी ,बच्चे सब झन अलग _अलग रहिथे सबके सोच अलग_ अलग हो थे। अचानक सकला थे थोड़कन मा ऊपर नीचे हो जा थे तहान पारिवारिक माहौल नइ रहे काबर सबके अपन अपन स्वतंत्र विचार हो थे कोई ककरो सुने बर तैयार नइ राहें। कोनो कोनो जगह मा बने झगड़ा लड़ाई घलों हो जा थे।

       बात करथन समाज के समाज मा आज सीखे के लायक कुछु नइ दिखे सबके सब अपन आप मा मस्त हावे हम हवन मस्ती मा आग लगे चाहे बस्ती मा ये कहावत चरितार्थ दिखथे।आज के तारीख मा कोनो ला कुछु नइ बोल सकस। घर, परिवार,पास पड़ोस ओखर बाद गांव समाज बन थे कोनो ला ककरो चिंता नइ हे सब अपन सोच विचार मा स्वतंत्र हे अगर उखर सुधार बर ते कुछु बोल दे बे ता तोरे बर जुरिया जाहि।सच सुने बर कोनो तैयार नइ हावे ।सबला अपन मनोरंजन अउ टाइम पास के फिकर हे, काली ला कोन देखे हे, काली जिन्दा रहिबो ता काली देखे जाहि।आज के युवा मन बीड़ी, सिगरेट, शराब, गांजा, तम्बाकू गुटखा,चरस,भांग जइसन नशा के पाछु पागल हे ।पता नहीं काकर कृपा हो जा थे गांव गांव मा आसानी ले कइसे पहुंच जा थे संविधान अउ शासन प्रशासन वाले मन ला इकहर खबर कइसे नइ लागे जबकि छोटे छोटे बात हा तुरते पहुंच जा थे ।पढ़ाई लिखाई से कोनो मतलब नइ हे ,अपन उज्ज्वल भविष्य के कोनो चिन्ता नइ हे ,स्कूल कालेज टाइम पास के अड्डा बनत जावत हे।सोशल मीडिया टीवी, सिनेमा, फेस बुक, मोबाइल, इंस्ट्राग्राम, रील लाइफ ला देखत रहिथे अउ बनावत रहिथे आनी बानी के फैशन के पीछे पागल होगे हे उखर चुन्दी मुड़ी कटई अउ कोरई मा ओमन ला देख आज ते नइ पहिचान सकस कोन टूरी हरे कोन टूरा हरे। बर बिहाव, छट्टी बरही,छोटे मोटे कार्यक्रम मा कान फोड़वा डीजे मा आज फूहड़ फूहड़ गाना मा महिला, पुरुष, लोग लइका ज़ुरमिल मटक मटक दारू गांजा पीके नाचत रहिथे।खाए बर खपरा नइ बजाय बर दफड़ा वाले बात आम होगे हे। एक ठन बात मोला आज अउ ज्यादा दुखी करत रहिथे कि मनखे के भीतर आज संवेदना नाव के कोनो भाव बात नइ रहिंगे हे। जेन ला देखबे तेने हा कोनो भी नानमुन गांव गली खोर मा घलो अंडा रोल अउ कुकरी कांटे के दुकान लगावत रहिथे जानवर मन ले जादा मनखे मन मांस खवइया होगे।हमर नान नान लइका मन ओला देखत हे ता उखर बाल मन का असर पड़त होही ये मा चिंतन जरूर होना चाही।गांव गांव में आसानी ले नशापानी के सामन गांव मा कइसे पहुंच जावत हे।गांव मा आसानी ले मिलही ता लइका मन सीखबे करही।अपन स्वार्थ बर सियान मन खुदेच बेचाइया मन ला प्रोत्साहित कर थे ये रुकना चाही।

       होली तिहार मा प्राकृतिक रंग गुलाल अउ होली तिहार के प्रमुख संदेश ला सबो मनखे भुलावत जावत हे।रंग गुलाल ला छोड़ के चिखला,गोबर,पेंट, आइल ला लगावत रहिथे ।रंग रंग खोपड़ी,रंग रंग के आवाज के भोपू बाजावत रहिथे। गांजा, दारू, भांग के जादा कोनो नशा करिन तहान गाड़ी मोटर मा जपावत रहिथे। कभू कभू बने मनखे मन इकहर चपेट आ जा थे ।बुराई मा सच्चाई के जीत अब कोनो जगह देखे बर नइ मिले।सब जगह मा मुंह मंगा घोटाला होवत हे।होली तिहार मा नशा करिन तहान लड़ाई झगड़ा होवत रहिथे।कोनो भी तिहार के पाछु के संदेश ला नइ जानबो तब तक वो तिहार ला वो भाव के संग नइ मना सकन न हमन ला वो आनंद के प्राप्ति हो सके।आज दिखावा अउ फिजुल खर्ची घर घर ला बर्बाद करत हे।होली तिहार ला तो जम्मो अमीर _गरीब,ऊंच _नीच,छोटे_ बड़े,दोस्त _दुश्मन के भेदभाव ला भुलाके सबके साथ मनाए जाथे।बदलाव जरूरी हे फेर अतका झन बदलव की खुदेच ले दूरिहा जाव।होली के दिन न जाने अपन स्वार्थ बर कतका कन कुकरी, बोकरा, मछरी,सुरा ,अंडा भीतरी खुसरे पिला ला मारे जाहि भगवान उखर आत्मा ला शांति देवय अउ ख़वइयाँ मन सद्बुद्धि ।कोनो भी नशा आपके जीवन मा आगे हो ही उहू ला छोड़व जी ।होली हे बुरा झन मानव जी।ये होली आपके घर परिवार मा सुख शांति लावे। जतेक भी बुराई हे सबो होलिका संग जल के राख हो जाए।


                         तुलेश्वर कुमार सेन 

                        सलोनी राजनांदगांव

गुनान *******

 गुनान 

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       आज के गुनान साहित्य से संबंधित नोहय त मैं लिखे काबर हंव ? लखटकिया सवाल आय , चिटिक थिरा के गुनव न ? पढ़ाई लिखाई सुभीत्ता होही तभे तो साहित्य रचना होही न ? चिटिक  बिलम के पढ़ लेवव भाई बहिनी मन ..

    कलम , कागज , किताब डहर लहुटे च बर परही ...काबर के आजकल के शिक्षा पद्धति हर तो डिजिटल होवत जात हे । नर्सरी , प्रायमरी कक्षा से ले के कॉलेज के पढ़ाई तक कम्प्यूटर आधारित डिजिटल फार्म मं होए लगे हे । मोबाइल , आई पेड , एलेक्सा वाइस सिस्टम , गूगल गुरुजी के सहायता से पढ़ाई लिखाई होवत हे इही ल एजुकेशन टेक्नालॉजी कहि के नान नान लइका मन ऊपर थोपत जावत हें , शिक्षा शास्त्री , राजनेता सबो झन । गुरुजी मन ल विशेष ट्रेनिंग देहे जात हे , किताब कॉपी , पेन पेंसिल घुरूवा मं जाय कोनो ल संसो नईये । 

   लइकन घलाय मन अपन भविष्य बनाये बर डिजिटल शिक्षा ल जरूरी समझत हें उनहूँ मन का करयं , पढ़ लिख के नौकरी बर निकलथें त दरखास्त देहे बर on line , लिखित परीक्षा , इंटरव्यू सब on line होथे त मरो मरो कम्प्यूटर के शरण मं जाए च बर परथे । मरन हो गए हे रोबोट टेक्नालॉजी के सेतिर बेरोजगारी बढ़त जात हे । सबले बड़े बात लइकन के सीखे के प्रक्रिया learning process ल नुकसान पहुंचत हे त लइकन के सोचे समझे के गुन कमजोर परत जात हे । बिना गुरुजी के , बिना कक्षा मं पढ़ाई कर लइकन परीक्षा देवत भर नईये पास घलाय होवत हें । लइकन के लइकाई। नंदावत जात हे । लइकन के कल्पनाशीलता , प्रकृति प्रेम , संवेदनशीलता खतम होवत हे उनमन अकेल्ला परत जात हें । 

     अइसन हालत मं मेटा टेक्नालॉजी , आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सुरसा के मुंह कस बढ़त जात हे । यूनेस्को हर तो कम्प्यूटर माध्यम शिक्षा ल मॉडरेट करे बर कहत हे त दुनिया के कई झन शिक्षा शास्त्री मन एकर गुणवत्ता ल नकारे लग गए हें । स्वीडन के केरोलिसका इंस्टिट्यूट अपन शोध मं कहे हे के डिजिटल / कम्प्यूटर शिक्षा प्रणाली हर लइकन के स्वाभाविक विकास बर जब्बर बाधा बन गए हे समय रहते चेत जाना जरुरी हे । 

स्वीडन सरकार तो अपन स्कूल में  कलम , किताब , कागज , ब्लैकबोर्ड चालू करके पोट्ठ काम कर दिस । 

  ठीक हे भाई रोजी रोजगार बर कम्प्यूटर शिक्षा आज के दिन मं जरूरी हे त पाठ्यक्रम मं एक विषय के रुप मं पढ़ाये जावय ए बात मं कोनो किसिम के उजिर आपत्ति नईये । गूगल अउ अलेक्जा लइकन ल सहज मानवीय गुन दया , प्रेम , भाई चारा , सुख दुख मं काम आना तो नइ सीखोए सकय न ?  साहित्य रचना तो नइ सिखोए सकय न ? एकरे बर लिखना जरुरी लागिस , समय रहते हमू मन ल चेतना जरुरी हे । बिनती हे के कलमकार मन  ए विषय मं गुनयं , लिखयं ...हमू मन ल कलम , किताब , कागज डहर लहुटना जरुरी हो गए हे । लइकन बर गुरुजी जरूरी हे , संगी जंवरिहा जरुरी हें , जरुरी हे स्कूल के ब्लैकबोर्ड अउ चाक , किताब कॉपी बोझा नोहय एला समझना जरुरी हे । 

     एहर मोर निजी विचार आय फेर गुनान तो सबो झन के आय ....।  

एक जरूरी निवेदन के अगर ए गुनान हर लोकाक्षर के लाइक नइ होही त एडमिन एला डिलीट कर सकत हें । 

     सरला शर्मा 

       दुर्ग

छत्तीसगढ़ी कहानी* *नित्या के चिट्ठी*



               *छत्तीसगढ़ी कहानी*



                  *नित्या के चिट्ठी*





           बरखू  हर नित्या ल ,अपन घर ले निकल के जात देखत रहिस बड़ बेर ल।नित्या हर तो वोकर करा भेंट होय बर आय रहिस। वो कहत रहिस कि वोहर अब मन लागही ते कोती चल दिही। ये पाय के वो, वोकर ले एक पइत मिल भेंट कर लंव कहके आय रहिस। अउ आतिस घलव काबर नहीं,वो  दुनों तो एके कक्षा म पढ़त हांवे शहर म। दशहरा- दीवाली के छुट्टी म वो दुनों अपन गांव- घर आय रहिन। वोमन तो बने  छुट्टी मनाबो कहके आय रहिन अउ ये दशा हो गय नित्या के संग...


           नित्या के बाप पहारसिंग गांव सरपंच ल , पुलिस के भेदिया होय के शंका म, जंगल राज करईया मन ,अपन मनमर्जी जन अदालत लगाके,वोला दोषीदार मानत, रुख म बांध दिन अउ गन के सात गोली एके जगहा म उतार देय रहिन।


         नित्या के बाप पहारसिंग सरपंच ल, जब वोमन खड़ा करिन,तभे येमन के मनसुभा ल जान के महतारी घलव अपन गोंसान के तीर म आ गय। तब वोमन ल अलगिया के अलग- अलग रुख म बांध दिन।तब तक महतारी हर किल्लाये के शुरु कर देय रहिस कि झन मारव...झन मारव अउ मारिहा तब महुँ ल घलव मार डालव। तब वोमन कहे रहिन कि गोली कमती हे ये पाय के मारे तो एके झन ल जाही अउ दूसर हर वोला बरोबर देखिही। तब फिर सात पइत धमाका होय रहिस वोकर महतारी के आगु म ही । ये नित्या हर तो ,वोतका बेरा वोकरा नई रहिस। अब येकर महतारी घलव पन्दरा च दिन म ही, ये सब होय के सेती येकर बाप के ठउर पहुँच गय।  अउ ये नित्या हर अकेल्ला हो गय। कका  काकी मन हें।येहर जेवन -पानी उहें करथे अभी। 


       नित्या कहथे कइसे वोकर महतारी हर देखिस होही एके जगहा म एक के बाद सात गोली ल घुसरत वोकर गोंसान के शरीर म। वो तो अतकिच म अभी अपन मन ल बोधत हे कि  वो दिरिस ल वोहर देख नई पाइस।एईच हर बड़ बड़े बात आय। फेर वोला महतारी -बाप के छेवर होय ल जादा दुख,ये बात के हे कि गोली मारने वाला हाथ हर ,कनहुँ आन हाथ नोंहे। वो हाथ हर तो वोइच मन कस,सगा समाज वाला आदिवासी हाथ आय। वो मनखे मन के चिन्हारी हो गय हे। वोमन तो एईच तीर- तखार के मनखे आंय,जउन मन अभी वो जंगल राज वाला मन के मनखे बन गंय हें।



             एक आदिवासी दूसर आदिवासी के कईसन अतेक बड़े दुश्मन हो गय। वोमन ल अइसन दुश्मन कोन अउ कब बनाइस?बस भाई बरखू एईच हर मोर दुख के सबले बड़े कारण आय...नित्या हर तो वो दिन कहत कहत फफक उठे रहिस।


           अब ये घटना होय के बाद,ये जगहा हर फेर शांत हावे। फेर कतेक दिन ल शांत रहही,तेकर ठिकाना तो घलव नइये ?


*              *                 *               *


             बरखू अपन दसना म केरोंटी बलदत हे फिर आँखी म नींद कहाँ है?देखते देखत का ले का हो गय। अब कइसे जीवन हर कटही नित्या के?वोकर पढ़ई हर तो भईच गय,हो गय  अब पूरा वोहर?नित्या के ही काबर मोर अपन पढ़ई के का होही? नींद हर तो परबेच नई करत ये।आँखी म टकटकी बंधा गय हे...


        ग्रामपंचायत चुनाव के समय आ गय रहिस।ये छोटे बड़े गांव के  सरपंची बर कनहुँ चिभिक नई लेवत रहिन।तब नित्या के सियान पहार सिंग ,वोकर बाप मानुलाल करा आय  रहिस,ये कहत कि मानुलाल भई तँय बन जा सरपंच । कतेक न कतेक गोठ चलिस वोमन के तीर म।एक दु पइत तो गरमा गरमी आ गय रहिस।वो दिन खुद वोला, अपन बाप मानुलाल अउ बाप के भई बरोबर मीत मितान पहारसिंग कका के बीच होवत गोठ बात म, ये अचंभा लागत रहय कि वोकर गांव म सरपंची बर जोजियाय बर लागत हे;जबकि सुनई परथे आन देश राज म अइसन सरपंच बने बर मनखे मन  साम दाम दण्ड भेद का नई का कर दारत रहिथें। खैर गोठ हर छेवर होइस अउ जउन हर प्रस्ताव लेके आय रहिस,उल्टा वोकरेच गला म ये सरपंची हर आ लटकिस। पहार सिंग कका नित्या के ददा हर सरपंच बन गिस। वोहर एक पन्ना के फार्म म दस्तखत भर करे रहिस बस...!


         अउ अउ सरपंची हर तो सरकारी आय।तब सरकार दुआर जाना आना हर कइसे छुटतिस।


             ले दे के डंगचेघा लइका के डोर म रेंगई असन संतुलन बनात जिनगी कटत रहिस हे।पढ़ई के नांव म नित्या अउ खुद वोला तीर के शहर म टांग देय गय रहिस।असल गोठ तो आने रहिस। कनहुँ ये लइका मन ऊपर नजर झन पर जाय वो जंगलराज वाला मन के समझत। फेर लइका मन तो सार चेत सुरक्षित बाँच गेन अउ वोती नित्या के पूरा घर हर उजड़ गय।


              सरकार कोती ले, ये उत्ती कोती के  जउन झोरखी हांवे,तेकर ऊपर म पुल बनाय के हुकुम आइस। बुड़ती कोती के झोरखी ऊपर म तो पहिली के बन गेय रहिस। रुपया पइसा घलव आइस। ये पुल हर तो अच्छा जिनिस रहिस।येकर वोमन ल जरूरत घलव रहिस। गांव के सबो झन भिड़ के ये कच्चा- पक्का पुल ल बना लिन।अउ येकर उद्घाटन बर आन कनहुँ ल नई अगोरिन।खुद सरपंच पहारसिंग करा ले गांव वाला मन उद्घाटन करा के वोला उपयोग म लाने के शुरू कर दिन। अउ सरपंच हर कइसे उद्घाटन करे रहिस...भावना म भर के एकठन नरिहर, जल देवती के नांव म फोर देय रहिन। हो गय उद्घाटन, अउ का...? फेर वोती ल हुकुम आय के शुरू हो गय।टोरो रे ये पुल ल...!! अब अपनेच हाथ म बनाय सिरझाय जिनिस ल कइसे टोरे जाय। एक दु दिन के गय ले दु पइत जंगल हर दलक उठिस अउ दुनों कोती के पुल स्वाहा !


          किस्सा अतकिच म खतम नई हो गिस।पुल हर उड़े के बाद,तीर के थाना ल पुलिस मन आइन अउ का हे ?वोमन गांव के दस पन्दरा मनखे मन ल धर के थाना म ले गिन अउ बइठार दिन।


         अब तो वो मनखे मन इहाँ नित्या के सियान पहारसिंग  सरपंच के घर आके बइठ गिन।जा...तँय सरपंच अस।अब हमर मनखे मन ल , थाना ले छोड़ा  के लान।


              पहारसिंग सरपंच अपन मुखिया होय के धरम ल निभाईस। वो थाना गिस। अपन संग म  चले बर एक दु आदमी मन ल कहिस ,फेर वोमन साफ मना दिन थाना जाय बर।अब तो वो अकेल्ला गिस थाना अउ थाना म वोकर असन बनगिहाँ आदिवासी सरपंच के तो स्वागत -आरती तो होना नई रहिस। हाँ,फेर पोठ सुद्धा भर के गारी खाय बर जरूर मिलिस। नांव तो रहिस पहारसिंग फेर तरी मुड़ करके पुलिसिया गारी के नरवा ल मुड़ ऊपर ल जान दिस। पुलिस वाला मन वो नौ - दस मनखे मन ल का करथिन। वोहू मन येमन के खोझ खोझारी लेवईया मन के जइसन डहर देखत रहिन।दु पद अउ सुना के सबो झन ल पहारसिंग सरपंच संग वापिस भेज दिन।


           बस वोइच दिन ले,पहारसिंग के नांव अउ छप्पा हर ,वोमन के सूची म आ गय। अउ छेवर हर अइसन होय रहिस।पुलिस के आदमी ठहरा के वोला, इनाम के रूप म ये सातों गोली हर मिले रहिस...


          बरखू के आँखी हर लटपट मुँदाय रहिस।


*             *              *                  *

     


             नित्या हर चल देय रहिस। बहुत बहुत दिन हो गय, वोकर शोर पता नई मिलय। फेर आज बड़ दिन के गय ल डख़ार हर आज ये दे अभी वोकर चिट्ठी ल बरखू ल दे के गिस हे। 


     बरखू थरथरात हाथ ले वोकर वो चिट्ठी ल खोलिस।चिट्ठी म नित्या लिखे रहिस -बरखू भई !मंय अभी मरे तो नई अंव।फेर मंय कुछु भी समझ नई पात अंव कि मर के मंय,अपन महतारी- बाप के तीर चल दंव, कि वोमन ल मारने वाला ल खोझ के मारे के उदिम करंव।दुनिया मोला कायर कहही।फेर मंय कायर नई होंव। अगर मंय बदला के भावना ले भर के,वोमन ल मारे बर सेना साज लिंहा अउ पांच  दस सौ पचास झन ल मार डारहां। तब ये बता , मंय कोन ल मारहां?मंय मोरेच असन दूसर आदिवासी ल ही मारहां।क़ाबर कि जउन भी  तरी लाइन म गोला- बारूद वाला हांवे, वोमन तो हमरेच मनखे आंय।वोमन के पांव हर थोरकुन लोभ म थोरकुन खेलवारी बर अउ बनेच अकन डर म बंधाय हे। वोमन परगट अपराध ल करत हें तब सरकार वोमन ल अपराधी कहत हे। वोमन ल मारे के छूट देय हे अउ मारत भी हे, फेर वोमन के ऊपर म शहर के आलीशान कोठी मन म बइठे ,वोमन के मास्टर माइंड  जउन भी हें;वोमन तो सादा कपड़ा पहिन के किंजरत हें। खून के  होली खेलईया ये मनखे मन के कपड़ा म खून के एको दाग नइये...


       बरखू भई ! वोकर ले ऊपर बोले- विचारे- गोठियाय के आजादी के नांव म जउन भी दु - चार विचारक नामधारी मनखे मन ,जउन विष बेल ल ,विष के विरिछ ल जगा देंय हें।आज सरकार -समाज कुछु भी कह ले, मोर दई- ददा अउ मरईया हजारों -हजार दई- ददा के  असली हत्यारा तो वोइच नांव के विचारक मन आंय।


       बरखू ! बरखू मोर भई !!मोर सबो रिस हर वोई नांव के विचारक मन ऊपर हे। जउन मन ये जंगल संगठन खड़ा करें हें अउ वोमन ल तरिच- तरी चलात हें ,वोमन के ऊपर हे।अउ जउन मनखे मन परगट म गोली चलात हें,वोमन तो खुद नई जानत यें कि वोमन काकर ऊपर गोली चलात हें। वोमन तो खुद नई जानत यें कि वोमन जिंदा हें कि मर गय हें।


       जीयत रहां, तब तोर से जरूर भेंट करहाँ,चाहे मोर चिट्ठी पाबे।


तोर संगवारी नित्या !


               बरखू चिट्ठी ल धर के घर बाहिर निकलिस।तभे वोकर कान म गोली- बारूद के धमाका हर फिर गूंजे लागिस।



*रामनाथ साहू*

रज्जू* (छत्तीसगढ़ी कहानी)

 *रज्जू*  (छत्तीसगढ़ी कहानी) 


       मैनखे अपन उमर के अलग-अलग पड़ाव में उतार-चढ़ाव भरे जिनगी जीथे। सुख-दुख, दिन-रात, बारिश, जाड़, घाम, भूख-पियास सहत जीवन के रद्दा में सबे जीव ला रेंगे ला परथे। दुनिया के सबे परानी जीवन में सुख पाथे त कभू दुख के खाई में तको गिर परथे, फेर जेन सम्हल के रेंगे के कोशिश करथे ओकर सब्बेच सपना जरूर पूरा होथे।


       बात वो बेरा के हरे जब मेंहा आठवी कक्षा में पढ़त रेहेंव, मोर संग में रज्जू तको पढ़त रीहिसे। रज्जू हा अब्बड़ सुन्दर गोरी अउ छरहरी देहें के नोनी रिहिसे। कक्षा में सबले हुशियार, अपन सबे भाई बहिनी में सबले बड़े रज्जू के बेरा में स्कूल जाय के रोज के दिनचर्या रीहिसे। साफ उज्जर कपड़ा, महमहाती तेल चिकचिकात सुन्दर दू ठन बेनी, काजर पावडर लगाय छुकछुकले सुन्दर रज्जू, पारा भर में सबके बात मनैया सबके दुलौरिन राहय। प्रार्थना मा मैंहा टूरा लाइन में आगू में खड़े होववँ त रज्जू टूरी लाईन में सबले आगू मा राहय। प्रार्थना करवाय बर गुरूजी मन रज्जू के बोले चाले के तरीका ला अब्बड़ पसंद करे। ओकर प्रार्थना करवई अउ जयकारा बोलवई हा सबके मन ला भा जाय।


          15 अगस्त अउ 26 जनवरी के राष्ट्रीय तिहार मन में रज्जू आगू में तिरंगा झंडा धरे महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू अउ भारत माता के जयकारा करत आगू बढ़े तब गाँव भर के मैनखे मन गली तीर के चाँवरा अउ मँहाटी मन मा खड़े होके हमर रैली ला सम्मान देवत हमर भारत माता के गुनगान ला सुनय।


         हर साल राखी तिहार बर गुरूजी मन सबे लइका मनला टाटपट्टी में बैठारके राखी बंधवाय, तब रज्जू हा मोला राखी बांधे, भाई बहिनी के मया दुलार छलक अउ झलक जाय। एक दूसरा ला चवन्नी चाकलेट खवाके मुसकात मया बॉंटन, त कभू कभू झगरा तको हो जावन, फेर अबोला कभू नीं रेहेन। एको दिन में कहूँ स्कूल नइ जाँव त रज्जू हमर घर आ जाय, अउ पूछे आज स्कूल काबर नइ आयेस भाई ? अउ स्कूल में पढ़ाय सबे विषय के पाठ ला मुँह अखरा बताके समझा डरे।


        रज्जू के बाबू ननपन में गुजर गे रीहिसे, ओकर महतारी निर्मला हा बनी-भूती करके परिवार चलात रीहिसे।


स्कूल के कोनो कार्यक्रम होय रज्जू के भाषण गीत कविता बिगर अधूरा लागे, समूह नृत्य, एकल नृत्य, नाटक सबमें रज्जू अगुवा राहय। सब गुरूजी अउ लइका मनके चहेती रज्जू पढ़ई साँस्कृतिक कार्यक्रम के संगे संग खेल कूद में तक अगुवा रीहिसे, सबे खेल ला बढ़िया खेले फेर दौड़ में रज्जू अपन स्कूल के केन्द्रस्तरीय खेल प्रतियोगिता में पहिला आय रीहिसे, केन्द्र स्तर के बाद सम्भाग स्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिता में पहिला आयके बाद गुरूजी मन अपन खर्चा में प्रांत स्तरीय प्रतियोगिता बर भेजिन, जिहाँ रज्जू फेर पहिला स्थान बनाके लहुटिस, तब विधायक द्वारा रज्जू के सम्मान में समारोह के आयोजन करेगे रीहिस, ये सम्मान समारोह में विधायक हा रज्जू ला पढ़ाय बर गोद लेयके घोषणा करिस अउ जिहाँ तक पढ़ही तिहाँ तक पढ़ाय के संकल्प लेवत ओकर खेल प्रतिभा निखारे बर प्रशिक्षण के बेवस्था तक कर दिस। अब रज्जू दिन रात एक करके पढाई अउ खेल प्रतिभा निखारे के प्रयास में लगगे। घर काम में अपन माँ के हाथ बँटाई ओकर दिनचर्या में शामिल रीहिस।


एक दिन मोर संगवारी राधे अक्करहा दऊँड़त हमर घर अइस, खैरपा ला भड़ाक ले पेलके परछी में ले दे के रुकिस तभोले पठेरा के आँट में ओकर मुड़ी लागिचगे। भड़भिड़-भड़भिड़ भड़ाकले बजई में हमर घर कोहराम मचगे, सब कोई जतर कतर ले दऊँड़त अईन।


सबे मन पूछिन - "का होगे? काये बाजिसे तेहा ?


       सबे मन इही सोंचत रीहिन "मरखंडा बछवा फेर खूँटा ला टोर दीस"! ओतका बेर मेंहा बासी खावत रेहेंव, राधे के मार हफरत दऊँड़त अवई ला देखके महूँ हड़बड़ागेंव। हॉत के काँवरा हाथे में।


     राधे हफर-हफरके अपने बतईस "रज्जू घर बड़ मैनखे सकेलाय हवे, मोला तो ओकर दाई मरगे तइसे लागथे।"


तुरते हॉंत ला अँचोके जैसने राधे दऊँड़त आय रीहिसे वइसने महूँ हा सपरट दऊँड़त रज्जू घर गेंव, मोर पाछू राधे अउ हमर घर के सब कोई दौंड़त अइन, अइसने पूरा गाँव सकेलागे, एकेचकनी में हमर स्कूल के सबे लइका मन आगे।


आठवी के वार्षिक परीक्षा के पहिली ओकर दाई निर्मला हुरहा बीमार परगे रीहिसे। अस्पताल में पाँच छै दिन भरती रहे निर्मला कतको जतन के बाद भी नइ चेतिस। रज्जू के जिनगी में दुख के पहाड़ गिरगे। आठवीं परीक्षा शुरू होयके दू दिन पहिली महतारी के मौत हा रज्जू ला पथरा बनादिस। अपन पास के एक झन बहिनी पारो अउ भाई राजू के बोझा अब रज्जू ऊपर आगे। ओमन ला पोटारे रज्जू अपन दाई ला मरघट्टी लेगे के तैयारी ला बोट-बोट देखत रीहिसे। विधाता के पटके ये दुख के पहाड़ ला सगा-सोदर, पारा परोस अउ गाँव भरके मन महसूस करत रीहिन। जे देखिस सुनिस तेकर मुहूँ सुखागे। सबे मन एक दूसर ले काहय अब का होही ये लइका मनके।


        स्कूल में प्रार्थना के संग श्रद्धांजलि सभा के बाद छुट्टी करे गिस, तहाँले हेडमास्टरिन, गुरूजी अउ लइका मन संघरा रज्जू के घर आइन। मुड़ी धरे मुड़सरिया में बइठे, एक टक अपन दाई के पिंवरा परे मुहूँ ला देखत रज्जू हुरहा हेडमास्टरिन, गुरूजी अउ संग में पढ़ैया लइका मनला देखिस त पहाड़ कचारे बरोबर बोम फारके रो डरिस, काकरो मन धीरज नइ धरिस, सब रो डरिन।


      बड़े मेडम हा ढाढस बंधावत कीहिस "तैं फिकर झनकर बेटी हमन तोर संग हन, अपन आपला अकेल्ला झन मान, हमन सब डाहन ले तोर सहयोग करबो।"


अउ अपन पर्स ले अब्बड़ अकन रुपिया निकाल रज्जू के हाँथ में धरादिस। डारा ले गिरे बेंदरी के पीला जइसे अपन महतारी ले लिपट जथे, वइसने रज्जू हा बड़े मेडम ला पोटारलिस, ये बेरा पूरा घर चिरो-बोरो रोवई में गूंजगे।


रज्जू के माँ के तिजनहावन कार्यक्रम के दिन हमर मनके पहिली पेपर हिन्दी रीहिसे। बड़े मेडम ये पेपर ला बाद में देवायके बेवस्था पहिलिच ले कर दे रीहिसे। दुसरैया पेपर एक दिन के आड़ में रीहिसे। गुरूजी मन रज्जू ला मना भुरियाके पेपर देवाय बर राजी कर डरिन। रज्जू हा जीवन के संघर्ष- यात्रा बर तैयारी करके परीक्षा देवाय लागिस ।


        परीक्षा उरकगे अउ सगा सोदर मन देय रीहिस तेन धान चाँवुर पैसा सब उरकगे। अब रज्जू ला अपन आगू के जिनगी अउ अपन भाई बहिनी मन के भविष्य के फिकर सताय लगिस, कहाँ ले पैसा आही, काली का खाबो, ये फिकर ओला रात भर सुतन नइ दिस। ठंडा साँस भरत, बाखा बदलत, आगू जिनगी के योजना बनात, दयालू चोला के मनखे खोजत, गौंटनिन दाई मेर जाके मन थिराइस अउ नींद परगे।


        पहाती उठके गाय गरू के गोबर कचरा डार, पेरा भूँसा दे के पानी कांजी भर डरिस अउ बेरा उत्ती गौंटिया घर जाके गौंटनिन दाई ला अरजी करिस-"दाई मेंहा तुहर पानी कांजी भर दुहूं, गोबर कचरा कर दुहूं, मोला काम देदे दाई, मोला काम देदे, मोर अरजी ला सुन ले।"


    गौंटनिन दाई ओकर सोगसोगान मुहूँ ला देखके रोवाँसी होके कीहिस "तें नानचुन लइका में तोला काय काम करवाहूँ बेटी, ले कियारी मन में पानी डार देबे अउ कोटना में आधा कोटना पानी भरके ऊपर टंकी में पानी चढ़ा देबे" कहिके पंप ला चालू करदिस। आधा घंटा में काम निपटाके रज्जू गौंटनिन दाई मेर खड़े होगे तब गौंटनिन दाई हा ओला खनखनात पानरोटी अथान अउ सौ रुपिया देके कीहिस "बड़ सुंदर कमाय बेटी तें अब रोज आ जायकर अउ आज जतका कमाय हस अतकी बुता रोज करदेबे, मेंहा तोला अतकी रुपिया रोज के देहूँ।"


      सुनके रज्जू खुश होगे, अउ गौंटनिन दाई के पाँव परके किहिस- "तैं मोरबर भगवान अस दाई, तोर एहसान ला मेंहा कभू नइ भुलाँव।" गाँटनिन दाई के घर ले अपन घर जावत रज्जू के गोड़ खुशी के मारे भुईयाँ में नइ माड़त रीहिस। अब ओकर रोज बिहनिया के इही दिनचर्या रिहिसे।


       रज्जू ला आधा घंटा कमई के अत्तिक पैसा पावत देखके अउ कमैया मन कसकसागे राहय। एक दिन ऊँकर घर के झाडू पोंछा करैया किहिस "हमरो बनी ला बढ़ादे गौंटनिन दाई रज्जू ला रोज आधा घंटा कमई के सौ रुपिया देथस, हम अइसन अन्याय ला नइ सहि सकन।"


तब गाँटनिन दाई कीहिस "तुहर जवानी ला धिक्कार हे रे, तुमन नानचुन लइका के हिजगा करथो, मेंहा वो लइका के कमई के नहीं, ओकर अपन परिवार ला चलायके हिम्मत अउ अपन जिनगी में कुछू करे के हौसला के कीम्मत देवथँव। देख लेना ये नानचुन लईका अपन जिनगी में सिर्फ बनिहार बनके नइ राहय, जरूर कुछू करही अउ कुछू बनके रही, ये मोर आत्मा काहथे। मैंहा वो लइका बर सब कुछ कुर्बान कर सकथँव, तुमन कोन होथो बोलने वाला।"


      गौंटनिन दाई थोकिन चुप रहिके शाँत होके कीहिस" देख बेटी भानू वो लइका टूट गेहे वो, ओकर दाई ददा दुनो नइहे, ओला सहारा के जरूरत है। रुपिया पैसा हा जिनगी बर सब कुछ नोहे या, दूसरा के जिनगी ला सहारा देबर कुछू करेके प्रयास ला तुमन टोरव झन। महूँ अतिक निरदइ नइ हँव, तहूँ मनला जी खोलके देथँव, फेर तुमन ये नानचुन लइका के हिजगा झन करो, चलो अपन काम में लग जाव।"


        गौंटनिन दाई के बात ला सुनके सबे कमैया मन मानगे अउ अपन-अपन काम-बुता मा लगगे। रज्जू हा ऊँकर मन के बीच के गोठ-बात ला सुनत रीहिसे, वो जानगे कि गौंटनिन दाई हा ओला ओकर मेहनत ले जादा पैसा देवथे। अब रज्जू हा गौंटनिन दाई के घर, कोठा, बाड़ी बखरी के छोटे छोटे काम बुता करे लागिस। घर में आये सगा-सोदर मन करा चाय पानी लेगई के बुता रज्जू के पोगरी होगे। थोरिक दिन में घर के सबे सदस्य अउ कमैया मन के मन ला जीत डरिस, हमेशा गुमशुम रहैया रज्जू अपन माँ ले बिछड़े के पीरा ला भुलाके जीवन के उतार चढ़ाव मा सम्हलके रेंगे लागिस।


       परीक्षा के रिजल्ट आगे यहू साल रज्जू अपन स्कूल में अव्वल आइस। बिपत के बेरा में धीरज बनाके परिवार सम्हाले अउ मन लगाके पढ़ई करे के सेती स्कूल के सबे मास्टर मास्टरिन मन ओकर बड़ बड़ाई करिन।


       हाईस्कूल हा गाँव ले छै किलोमीटर दुरिहा रीहिसे, संगवारी मन संग जाके रज्जू हाई स्कूल में भरती होगे। अब रज्जू रोज बिहनिया ले संझा तक घर, स्कूल अउ गौंटनिन दाई के घर के बुता में बेंझवाय लागिस, ओला एकोकनी पढ़े के बेरा नइ मिलत रिहिसे, हप्ता, पंदरही में रज्जू करियागे। गौंटनिन दाई रज्जू के मन के पीरा ला जान डरीस। एक दिन किहिस "जब ले मोर नोनी शिखा के बिहाव होय हे बेटी, ये साइकिल हा माड़ेच हवे, जा बेटी ये साइकिल ला लेजा, तोर बेरा में स्कूल जायके काम आही। मन लगाके पढ़ अउ जिनगी के सुग्घर रद्दा गढ़।"


       नवा टायर, तारा, घंटी, फुंदरा लगे चुक-चुकले, नवाँ दुलहिन बरोबर सजे साइकिल ला देखके रज्जू खुश होगे, फेर थोरिक उदास होके कीहिस -"एकर कोनो जरूरत नई रिहिस गौंटनिन दाई, मेंतो दौंड़त चल देथों, फेर बता के पैसा दुहूँ।"


       तब गौंटनिन दाई कीहिस  "मैं कोनो बैपार करथँव वो, जेमे तोला पैसा में दूहूँ "  अउ रज्जू ला छाती में ओधाके कीहिस- "माड़े माड़े सबे खराब होगे रीहिस बेटी, तोरेच बर एला बनवाय हँव, लेजा एमा स्कूल जाबे त मोरो मन माड़ही।"


तब रज्जू हा ओला पोटारके किहिस  "मेंहा तोर कब काम आहूँ दाई, तोर ये सबे करजा ला कब छुटहूँ वो।"


    रज्जू बर ये साइकिल हा कोनो सूरज चंदा ले कम नइ रिहिस, जेकर सपना देखई तक पहाड़ रिहिसे, तहू हा गौंटनिन दाई के किरपा ले पूरा होगे।


        अब सबे काम बेरा में हो जाय। नौंवी कक्षा में अभिभावक के रूप में गौंटनिन दाई के नाम लिखवाय रीहिसे। एक दिन ओकर स्कूल के प्राचार्य हा गौंटनिन घर मेर रुकके पूछिस "रज्जू घर में हवे का।" गौंटनिन दाई ओतिक बेरा घर में नइ रीहिस, ओकर बेटा आरो ला सुनके बाहिर आवत कीहिस


"ओकर घर थोरिक दुरिहा में हवे, मैंहा बुलवा देथों, आप मन बैठो।" अउ लइका मनला भेजके रज्जू ला तुरते बुलवाइस। चाय पानी के पियत ले रज्जू अंगरी फोरत आगे अउ कीहिस


"का बात आय भैया मोला कइसे बलवाय हव।"


अउ अपन स्कूल के प्राचार्य ला चिन्ह के प्रणाम सर कहिके पाँव परिस, ओतकी बेरा गौंटनिन दाई तक पहुंचगे, अउ कीहिस


तोर स्कूल के गुरूजी मन आय हे बेटी चल चाय पानी पिया।


गुरूजी कीहिस "हमन पी डरे हन, एक ठन खुशखबरी देय बर आय हन, हमर विधायक महोदय के अनुशंसा ले, तुहर गाँव के ये होनहार बेटी रज्जू के चयन शहर के बड़का स्कूल में सरकारी खर्चा में पढ़े बर होगे हवे, जेमा छात्रवृत्ति तक मिलही।


अतका सुनके रज्जू चहकगे अउ ताली पीटत कूदत अपन खुशी व्यक्त कर डरिस, फेर अपन बहिनी भाई के सुरता आते भार बुझाय दिया बरोबर रुआँसू होके कीहिस।


"नहीं सर में कहुँचों पढ़े ला नइ जाँव, मोर नान्हे भाई अउ बहिनी मनके का होही।"


तब गौंटनिन दाई के बेटा विधायक करा तुरते फोन लगाइस अउ कीहिस- "विधायक महोदय रज्जू के नान्हे नान्हे भाई बहिनी मनके घलो कोनो बेवस्था करदेतेव ताकि तीनो झन एके जघा रहिके पढ़ सके।"


विधायक महोदय हा रज्जू के जिनगी के उतार-चढ़ाव ला जानत रीहिसे, वो तुरते कीहिस-"मोला सब मालूम हे दाऊजी, मेंहा ऊँकरो मनके व्यवस्था कर डरे हँव। तुँहर गाँव के ये होनहार लइका मनला तुमन सम्मानपूर्वक शहर भेज देव, बाकी सबे बेवस्था ला में देख लुहूँ।"


       बिहान दिन गाँव के सरपंच पटैल, ग्राम प्रमुख, गौंटनिन दाई अउ ओकर बेटा संग गाँव भरके मैनखे जुरियाय, रज्जू ओकर भाई अउ बहिनी ला, बड़का शहरके बड़ेजन स्कूल में अमराके आगे।


आज बारा बछर होगे.....


बड़े बिहनिया कोतवाल हा हाँका पारिस  " सुनव सुनव सुनव, आज हमर गाँव में सब काम धाम बंद हे, बारा बजे पंचायत चौंक मेर सकेलात जाहू हो.......!"


     सब कोई पूछे- "का होगे कोतवाल ? का बात बर गाँव बंद हे ?" कोतवाल कीहिस "में नइ जानों ददा, ऊप्पर ले शासन के आदेश आय हे। "


गाँव के मन पटैल कर गिस, सरपंच करा गिस, कोनो ला कुछ नइ मालूम, अतका भर पता चलिस कि हमर गाँव में बड़े जन साहब अवैया है। सब गाँव भरके मन अगोरा करत राहय, सबे मन सोंचत राहय कोन साहेब होही ?


    बेरा उत्ती बड़े बड़े मशीन गाँव के कच्ची सड़क ला डामरीकरण करे बर आगे। 10 के बजत ले गाँव के कच्ची सड़क डामर के होगे। पूरा गाँव डामरे डामर महमहावथे। पंचायत के आघू के बिगड़हा बोरिंग बनगे। गौरा चाँवरा कराके बोरिंग में पंप फिट करके बीच गली के आवत ले चार पाँच जघा नल लगगे। वृक्षारोपण करे बर पौधा पटकागे, अब्बड़ अकन गड्डा खनागे। पंचायत के आघू मा मंच तैयार होगे, पंडाल तनागे, अब्बड़ अकन कुर्सी सजगे, माइक बाजे लागिस, देशभक्ति के गीत गूंजगे "मेरे देश के धरती सोना उगले, उगले हीरा मोती, मेरे देश के धरती.....।"


ग्यारा बजे अब्बड़ अकन कार आके पंचायत के आगू में रुकिस, पूरा गाँव सकेलागे, हमर गाँव में बड़ेज्जन साहब आगे। सरपंच, पटैल, पंच अउ गाँव वाले मन जाके फूल माला में कार ले उतरते भार साहब मनके अगुवानी करिन। चमचमाती कार उतरैया मन तक शुट बुट में, पूरा गाँव भरके सकेलाय मनखे मन खुसुर-फुसुर करथे, फेर फूल माला देवैया मनला वो साहब मन कहिदिन-

"अरे हमन नोहन भैया, बड़े साहब बाद में आही, हमन बेवस्था देखे बर आय हन।"


     अब पूरा गाँव के सबे बेवस्था के निगरानी करे गिस बिजली, पानी, सड़क, साफ सफाई सब चकाचक.....!


पूरा गाँव के मन ये साहब अउ सबे विभाग के कर्मचारी मनके चाय पानी के बेवस्था में लगगे। सवा ग्यारा बजे एक ठन अउ कार अइस, गाँव भरके मन अउ पहिली आय रीहिस ते साहब मन उत्ता-धुर्रा वो कार डाहर दौंड़िन, गिरत हपटत वो साहब के तीर में जावत ले कार में बैठे साहब हा कार के रुके के पहिलिच ले कार के दरवाजा खोलके उतरत गिर परिस, अउ पहिली ले आय साहब मनला खिसियाके कीकीहि- "पागल हो तुमन इहाँ चाहा पीये ला आय हव, मोला नौकरी ले निकलवा दुहू का, गाँव के बाहिर में स्वागत गेट कोन बनवाही।"


अब सब कोई ला सुरता अइस, टेंट वाले ला कहिके जल्दी-जल्दी सुन्दर गेट बनवाय गिस, अउ पेंटर ला कहिके, सफेद कपड़ा के बेनर में स्वागत हे कहिके लिखवाय गिस। गाँव के स्कूल के हेडमास्टर ला कहिके तुरते लइका मनके सांस्कृतिक कार्यक्रम तैयार करवायगिस।


अब तो पूरा गाँव आश्चर्य में परगे हमर गाँव में अइसन कोन साहब अवैया हे, जेकर बर हमर गाँव के अत्तिक साज सिंगार होवथे।


       ठीक बारा बजे मेन रोड ले गाँव के धरसा में नवाँ बने सड़क डाहन आठ नौ ठन गाड़ी के काफिला मुड़िस, वाँऊँ-वाँऊँ, वाँऊँ-वाँऊँ गाड़ी के शायरन दुरिहा ले गूंजगे। गाड़ी में बैठे मोर मन अपन बचपना के फोटो खींचत रीहिस। जीवन के संघर्ष यात्रा में तपके निखरे रज्जू हमर जिला के कलेक्टर बनगेहे।


डॉ. अशोक आकाश

बालोद

मो.-9755889199