Showing posts with label बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू. Show all posts
Showing posts with label बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू. Show all posts

Friday, 3 July 2020

बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू

*बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू

मंगतिन गांव म अपन जिनगी काटत राहय। मंगतिन के बिहाव नानपन म होय रिहिस हे अउ १५ बच्छर म ससुरार आगे रिहिस हे, वोला गुड़ाखू घसे के बड़ नशा रिहिस हे, दिन भर रतिहा जसना म जावत ले ओखर मुहु म गुड़ाखू दबे राहय। धीरे -धीरे दिन बितत गिस अउ मंगतिन तीन लईका के महतारी बनगे।धनसिंग (बड़े बेटा) कुंती (मंझली) अउ जीवन सबले छोटे रिहिस हवय, जीवन के अवतरे के दू बच्छर बाद मंगतिन के गोसैंया ल एक दिन खेत म सांप चाब दिस बिचारा बीत गे ।धनसिंग अउ कुंती बड़े होगे अउ गांव के सरकारी इस्कूल म पढ़े जाय लगिस... लेकिन ओखर छोटे बेटा जीवन के हाव-भाव,रेंगना-फिरना दूनो लईका मन ले अलग राहय कभू कखरो संग हां,हूं ,घलो नइ गोठियावय।कले चुप रेहे राहय,मल मूत्र अउ पखाना घलो ओन्हा म कर डारय,बाढ़त उमर अईसने कटत लईका बड़े होगे।
          धीरे-धीरे मंगतिन ल संसो होगे अउ बड़ परशानी घलो होवय लईका ल घर म छोड़ के बनी-भुति म निकल जावय , जीवन के बेवहार ल देख के मंगतिन हदास होगे राहय अउ खेत खार अउ  मड़ई मेला अउ सगा सोदर कोनो गांव जावय त दूनो लईका मन ल संग म धरके जावय अउ जीवन ल कुरिया मे धांध के संकरी ल लगाके रखय।
         कोनो दिन कंहू घर ले जीवन निकल जतिस त गांव बस्ती पारा परोस के मन बिचारा ल पथरा ढेला म मारय अउ कोनो पानी ल घलो ओखर ऊपर फेंक देवय...नान-नान लईका संग बड़े मन घलो बिचारा ल *बईहा* आगे कहिके भगावय ,मंगतिन हदास होगे राहय अउ घर के मुहाटी म बैठे राहय उहि बेरा मा गांव के एक झन पढ़े लिखे सियान ह शाहर के *मनोरोग चिकित्सक* डॉक्टर
के तीर म देखाए म सुझाईस अउ मंगतिन ल डॉ. के पता ठिकाना ल चिट्ठी म लिखके दे दिस दुसरईया दिन मंगतिन जीवन ल धर के  डाॅ. ले भेंट करिन अउ डॉ.साहब ह पुछिस ।
का जीवन ह ?अवतरे के तुरते बेरा रोईस हे...... मंगतिन कहिथे नहीं साहब।
का तेंहा नशा करथस?
हव....... साहब गुड़ाखू घसथंव।
फेर मंगतिन कहिथे डॉ साहब मोर लईका ल गांव वाले मन, पारा परोस के मन *बईहा-बईहा* कहिथे!हव साहब मोर लईका बईहा हे!
तब डॉ साहब (मनोरोग विशेषज्ञ)कहिथे जीवन बईहा नइहे.......ऐला मानसिक दिव्यांग कहिथे।अउ ईखर बुद्धि सामान्य लईका ले कम होथे।
जौन कोनो महतारी अम्मल म रहिथे तब के बेरा म नशा,अउ जेला घेरी भेरी झटका आथे अउ अन्ते-अन्ते नंगत अकन कारन हे अउ अवतरे के तुरते बेरा म  लईका नइ रोवय त अईसन म लईका के बुद्धि के नस बराबर काम नइ करय जेखर कारन लईका ह मानसिक दिव्यांग होथे।
*लईका बईहा नइहे* ऐला रोज के काम धाम ले संग म रहिके सिखोवव! लईका धीरे-धीरे अपन जिनगी ल चलाए बर तो सीख जहि। कखरो बर बोझा नइ रहि।

------------******-----------------
मिनेश कुमार साहू
भुरभुसी गंडई/माना कैंप रायपुर