Friday, 17 July 2020

आनलाइन पढ़ई अउ छत्तीसगढ़-हीरा गुरुजी समय

आनलाइन पढ़ई अउ छत्तीसगढ़-हीरा गुरुजी समय
(निबंध)

         शिक्षा अउ पढ़ई आदि काल ले चले आवत हे। सतजुग,त्रेता, द्वापर अउ अब कलजुग मा शिक्षा अउ पढ़ई  के महत्तम ला जाने समझे गे हावय। सतजुग मा देवगुरु बृहस्पति, नारद,सुरुज देवता अउ अबड़ अकन देवता मन ला गुरु के मान मिले रहिस।त्रेता मा भगवान राम घलाव गुरु घर पढ़ेबर गे रहिन।बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी एला रामचरित मानस मा लिखे हावय " गुरुगृहँ गए पढ़न रघुराई, अलप काल सब विद्या आई" ।अइसने द्वापर मा घलाव भगवान किसन ,सुदामा  गुरु संदीपनी के आश्रम मा पढ़ेबर गय रहिन। बेरा बेरा के शिक्षा अउ पढ़ई मा फरक आवत गइस।पहिली जुग मा गुरु के घर चेला पढ़ेबर जावय अउ ज्ञान, विद्या पावय। आश्रय, गुरुकुल मन एखर डेरा रहय। पाछू राजा महराजा मन गुरु ला महल मा राख के अपन लइकामन  ला पढ़ावय।अजादी के पाछू सरकार हा शहर ,गाँव , पारा ,टोला मा बड़हर अउ गरीब सबो के लइका ज्ञान अउ विद्या पावय एखर बेवस्था करिन। आज घलाव शिक्षा अउ पढ़ई चलत हे जेमा विज्ञान के विकास हा जुड़गे हावय।पढ़ई मा मशीनरी ला संग मा धरे गे हावय।

          आनलाइन शिक्षा अउ पढ़ई माने जेमा विज्ञान के विकास के मशीन ला बउरे जावत हे। विज्ञान के आय ले शिक्षा अउ पढ़ई हा घातेच बाढ़िस हावय। कम्प्यूटर, प्रोजेक्टर के संगे संग अब मोबाइल,इन्टरनेट मा आनलाइन शिक्षा अउ पढ़ई होवत हावय।आनलाइन पढ़ई माने गुरुजी अपन घर मा रहिके पढ़ाही अउ पढ़इया लइका हा अपन घर मा बइठे रही अउ दूनो मन एक दूसर ला मोबाइल मा देख के अउ गोठ ला सुनके समझहीं।एखर बर कतको ठन एप बने हावय जेमा एक संग सौ, दू सौ ले आगर पढ़इया जुड़ के एके संग पढ़ई कर सकत हें।ए बूता हा पहिली मोबाइल संदेश, यूट्यूब, इन्टरनेट,दूरदर्शन, टीवी चैनल मा रिकार्डिंग ले होवत रहिस।आनलाइन हा वइसने होही जइसे खेल कूद, लालकिला के भाषण, कार्यक्रम मन ला संउहत देखाथे। आनलाइन पढ़ई बर गुरुजी करा अउ लइकामन करा मोबाइल अउ ओमा नेटवर्क होना चाही।वाट्साप विडियो मा जुड़थे ओइसने फेर वाट्साप मा अटक अटक के सुनाथे अउ एमा सरलगहा सुनाथे।

       देश भर मा आनलाइन शिक्षा अउ पढ़ई शुरु पहिली ले बड़े बड़े संस्था अउ स्कूल मा चलत रहिस हे फेर छत्तीसगढ़ मा सरकारी फरमान ले कोरोना महामारी बखत ले शुरु होइस। सरकार हा इस्कूल कालेज इंस्टीट्यूट ला बंद राखे के फइसला लेइन तब पढ़इया मन पढ़ई ले दुरिहाय झिन अउ ठलहा रहिके कोनों अलहन झिन करय कहिके ये उदिम करे गीस। सरकार हा जिला के, जिला हा ब्लाक के अधिकारी मन ला बोझा बोहाइस कि सरकारी अउ पराइवेट शिक्षा संंस्था मा प्राथमिक से कालेज तक के पढ़ाई आनलाइन करवावय।एखर बर एक योजना " पढ़ई तुँहर दुवार"लाय गीस।जेखर ले आनलाइन शिक्षा अउ पढ़ई चलत हे।

        आनलाइन पढ़ई मा एक होस्ट होथय जौन हा पढ़ईया गुरुजी के बेवस्था ला चलाथे।एखर पहिली एक हप्ता के दिन तिथी ला निकाल देथय जेमा कोन कोन गुरुजी हा कब कब अउ कतका बेरा अपन कोन विषय के कते पाठ ला पढ़ाही। सरेखे बर जौन दिन के पढ़ाई होथे ओकर एक दिन पहिली अउ उही दिन बिहनिया अउ संदेश पठो देथे। ओमा मोबाइल नंबर अउ बइठक नंबर नइते लिंक भेजे जाथे। एला पढ़इहा हा देख के अपन मोबाइल मा लिख के आनलाइन पढ़ई मा जुड़ जाथे।

        आनलाइन शिक्षा अउ पढ़ई के अबड़ फायदा हावय।एमा पढ़इया हा अपन घर मा बइठे बइठे पढ़ सकत है।बरसात मा ,गर्मी मा घलाव पढ़ई मा फरक नइ पड़य।कोनों अस्पताल मा भर्ती हे तभो पढ़े जा सकत हे।एक ले आगर गुरुजी के आनलाइन लिंक मा जुड़ के फायदा लेय जा सकत हे।गाँव गँवतरी आवत जावत कार बस अउ ट्रेन मा घलाव कक्षा मा रहे जा सकत हे जेखर ले पढ़ई के नकसान नइ होवय।बड़का बड़का संस्था मन फीस लेके विषय के गुनिक ज्ञानिक मन के सुबिधा देथें।जेखर ले पढ़इया ला अउ परीच्छा देवइया ला फायदा मिल सकत हे।

      आनलाइन शिक्षा अउ पढ़ई के फायदा के संगे संग नकसान घलाव हावय।सबले बड़का नकसान पइसा के हावय।एक घर मा तीन लइका हे तब तीन ठन एम्ब्राइड मोबाइल चाही।तीनों मा बैलेंस अउ रिचार्ज के खर्चा। संस्था मन फीस लेथय ओखर खर्चा। ए खरचा ला बड़हर अउ नउकरिहा मन तो पूरती कर डारही फेर छोटे अउ गरिबहा मन अपन लइका ला पढ़ा नइ सकय। दूसर नकसान ए हावय कि लइका हा मोबाइल मा सहीच मा पढ़त हे कि नहीं एखर हियाव नइ हो सकय। तीसर ए कि घातेच दिन ले मोबाइल मा लगे रहे ले आँखी मा कमजोरी अउ आँसू आय के समस्या हो सकत हे। कुरिया मा लइका ला पढ़ात गुरुजी हा देख सकत हे कि कोन धियान लगा के पढ़त हावय कि नइ फेर आनलाइन मा एखर हियाव नइ हो सकय। नेटवर्क समस्या ले कतको लइका जुड़ नइ पावय।अइसने किसम के अउ कतको नकसान हे।

            शिक्षा अउ पढ़ई पाय के बड़हर,गरीब सबला हक हावय।संविधान हा एला हमर मौलिक अधिकार बनाय हे। कहे जाथय ज्ञान कहूँ ले मिलय झोकना चाही। आनलाइन शिक्षा अउ पढ़ई एखर बढ़िया साधन हो सकत हे।सरकार हा घलाव एमा धियान देवत हावय।जिनगी मा पढ़ई के महत्तम तभे हावय जब हमन ईमानदारी ले पढ़ना सीखन।सरकार एखर बर नवा नवा उदीम करय कि बढ़हर के संगे संग गरीब ला आनलाइन पढ़ई के फायदा मिलय।


हीरालाल साहू "समय"

छुरा, जिला- गरियाबंद 

-----कहानी----- दीपक निषाद

-----कहानी----- दीपक निषाद

 " *बने* *कहे* *बबा* !"

गाँव भर मा ए खबर बिजली कस बगर गे कि फत्ते के गोसइन दुलारी हा जहर पी लिस। चौंक- चौंरा, गुड़ी -चौपाल सबो जघा  इही बात के चर्चा।
       बखरी जाय बर निकले रहय रमेलाल, पान ठेला करा जुरियाय भीड़ ला देख के बिलम गे। चार झन के गोठ बात मा जहर पिए के घटना के जानबा होइस।
      बिहनिया ले फत्ते अउ दुलारी धान नींदे बर खेत गे रीहिन। वींहिचे कुछु  बात मा बात बनेच बाढ़गे, अउ दुलारी ह तातारोसी मा कुँदरा मा रखाय कीटनाशक दवई ला पी डरीस। वो तो धन भाग, कि परोस के खेत मा बनिहार मन घलो नींदई-कोड़ई करत रीहिन, धरा रपटा दउड़िन, ओला सम्हालिन अउ माँछी घलो खवइन, उल्टी होही कहिके, फेर दुलारी ओकिया के रहिगे, उल्टी नइ होइस,गजरा फेंकेल धर लिस अउ बेहूस होगे। तब तुरते ताही एक सौ आठ ला फोन करके बलइन, ताहन एम्बुलेंस मा भर के मैकाहारा लेगिन।
          जम्मो बात ल जानिस, त रमेलाल से घलो नइ रहे गिस। पूछ परिस--"त भउजी बने हे नहीं जी। "
        एक झन खिसियागे--"अभीच के घटना ए रमेलाल!बने जात के इलाज-पानी नइ शुरू होय होही, त बने गिनहा ला का बताबो। तहीं हा धान बोथच, त का दू पहर मा कंसा निकल जथे। अरे धीर राख। सबो पता चल जही। "
     रमेलाल ला अउ कुछु पूछे के हिम्मत नइ होइस।
      दुलारी के गोतियारी बड़ा ससुर हा  कहिथे--"बिचारी गरीबिन दुलारी ह डेड़हौली हरय, तीने बछर मा दू-दी झन लइका दे दीस भगवान हा कोरा मा। वीही नान-नान कुकुर मन के जादा फिकर हे। "
       "शुभ-शुभ गोठिया कका। अस्पताल पहँच गे त बने होके आही। "एक झन कहिथे।
       "इही उमींद मा तो हमू मन हावन, बाबू!" सियनहा के बोली मा  बिश्वास  ले जादा घबराहट  रीहिसे।
        इही गोठबात मा भुलाय रमेलाल के वो जघा ले टरे के मने नइ होवय, फेर खेती-बारी घलो देखना हे, सोचके मजबूरी मा अपन पाँव पायडिल मा रखिस अउ सायकिल चलावत बखरी पहुँचगे।
       बखरी के राचर ला खोलिस अउ धान ऊपर नजर दउड़इस, फेर धान ला का देखय, आँखी मा तो दुलारी भउजी के चेहरा झूलत हे। कतका सुघ्घर चेहरा-मोहरा अउ बोली-बतरा।
           "का साग खाय पेटला?"
    "हमर बहिनी ला काबर रिसवा देच?"
   "हमरो दरवाजा ला खूंदे बर आ जाय कर कभू-कभू। "
हाँसती बदन भउजी, गाँव -बसेरी मा देवर के नता रमेलाल करा हाँसी-ठिठोली करे बर नइ छोड़िस। ओकर सुरता करत रमेलाल के जी घलो दुखा गेहे। ओकर अंतस इही बिनोवत हवय-"बउपरी ला झटकुन बने कर देतेच भगवान!"
             अनमना असन रमेलाल आज नींदे-कोड़े बर खेत मा उतरत नइये। मेड़ पार मा बइठे गुनत हावय। घाम चरचरइस ताहन कुँदरा मा रखाय खटिया मा आके बइठगे।
          सोचत- बिचारत  खटिया मा थोकिन ढँलग गे। ढँलगे-ढँलगे ओकर नजर अचानक कुँदरा के कोनटा के पाट ऊपर परीस। देखथे कि काली जुअर धान मा छींचे कचरानाशक दवई मन के बाँचे झिल्ली अउ शीशी रखाहे। दवई के शीशी मन ला देख के दुलारी भउजी के दवई पिये के घटना ला सोरिया डरीस। दुलारी भउजी इसने अपन बारी के कुँदरा मा रखाय दवई ला पिए होही।
          अचानक ओकर सोच-बिचार के तार दुलारी भउजी ले परेमिन करा जुड़गे। परेमिन-ओकर गोसइन। दू बछर होगे बिहाव होए, फेर अभी तक दूनो परानी के बने तारी नइ पटय। आए दिन खब-खिब होते रहिथे। नौ महिना के नोनी ला पिया के, राँध गढ़ के, सास ला नोनी ला धरा देवय, तब खेत आवय परेमिन। एती ओकर टेम-कुटेम ला देख के रमेलाल के तरवा गरम हो जाय अउ बफलय--"गाँव भर मा तहीं भर लइकोरी नोहच, बेरा हा सोज होगे, तब आवत हच। "                       परेमिन घलो जवाब देये बर कभू कमी नइ करीस। लात अउ बात के का उधारी।
"एक दिन राँध-गढ़, धो-माँज अउ घर बूता कर के देखबे, तब  मेंछा अँइठेल भुला जबे। "
ताहन चलत हे घंटा भर दूनो के तनातनी। अउ जादा होवय त परेमिन मुँहु अइँठत घर घलो लहुट जावय। ओती रमेलाल बड़बड़ावत हाथ झर्रा के रहि जाय।
       एक दिन तो बात जादा बाढ़गे, त मइके जाय बर झोला-मोटरा बाँध के निकल गे रीहिस परेमिन, लेद बरेद मा चार सियान समझइस, त मानिस।
       "ससुर ला बीते बछर भर होगे, सास ह घरे के पुरतिन, तेकर सेती कोनो ला घेपय नहीं। हमरे करा चलय एहा, दूसर जघा एक दिन नइ टिकतिस। मोर बेटा तो मेंढ़वा ए, कठपुतरी कस नाचथे। "।सास के जाँगर भले नइ चलय, फेर मुँह हा सरलग चलय। अपन बेटा के ऐब ला कोन महतारी बताही, अउ बहू के चारी-चुगली करके सास घलो परंपरा ला निभावत अपन बेवा जिनगी मा थोकिन आनंद अनुभव करय।
           रमेलाल घलो परेमिन ला कभू नइ भइस, फेर ओकर संग लड़-झगड़ के, चाहे सजा का चाहे मजा का, जिए के आदी होगे हे,अउ अपन गिरस्थी बर  परेमिन के कतका महत्तम हे, ओला स्वीकार करय।
      आज कुँदरा मा ढँलगे-ढँलगे इही सब बात ल गुनत हे। जइसे लील्ला-झाँकी मा परदा गिरथे अउ उठथे, अउ आने -आने दृश्य आथे जाथे, वीसने दुलारी के जहर पिए के बात अउ परेमिन के कई ठन घटना साँझर-मिंझर होके आँखी मा झूले लगिन। एक पइत तो रमेलाल के सोच अइसे होगे कि दूनो के झगरा मा रोसिया के परेमिन कुँदरा मा माड़े दवई ला पी डरीस। घर भर रोआ-राही मचगे,अउ रमेलाल के आँखी के आघू अँधियार छागे।
       झकना के उठ बइठथे रमेलाल। एकदम से घबरा जथे ओहा। कई ठो देखे-सुने घटना सुरता आथे कि फलाना-फलानिन कीटनाशक दवई पी डरीन। कई झन बाँच गे अउ कई झन के जान घलो गय। अब तो ओकर हिरदे मा डर समागे कि कोनो बात मा रिसाके कहूँ परेमिन सहींच मा दवई पी डरही, त मोर का होही, मोर नानचुन नोनी के का होही। मोर तो मरे बिहान हो जाही।
     इही बात ला गुनत वो हा ठान लिस कि नहीं!ए बाँचे-खुचे दवई-दारू ला कुँदरा मा नइ रखना हे। नरवा मा बोहवा  दुँहू।अउ जब भी दवई लानहूँ, बउरे के बाद तुरंत नरवा मा बरो दुँहू ।ताकि मोर घर जहर पिए के बाते झन आवय। जब बाँसे नइ रही, त बँसरी कहाँ ले बाजही।
    झटपट रमेलाल उठिस अउ सबो बाँचे-खुचे कीटनाशक दवई के पाकिट अउ शीशी मन ला सकेल के कुँदरा ले निकलिस अउ बखरी तीर के नरवा कोती जाय बर जइसे बखरी के राचर ला उठइस, कि ओकर बबा अभरगे।
       रमेलाल के बबा अस्सी अकन बछर के सियान ,लउठी धरे-धरे संझा-बिहनिया बखरी ला झाँके बर आवय अउ घंटा दू घंटा पहा के एलेम ठेलेम करत घर लहुटय।
        "अरे रमेलाल!कालीच तो ए दवई मन ला छींचे हच, ए बाँचे- खुचे ला सकेल के कहाँ लेगत हच?"
      बबा के सवाल के का जवाब देवय रमेलाल ।कइसे बतावय असल बात।
        "कोनो किसान माँगे हे का दवई मन ला?"
        रमेलाल फेर चुप। फेर बबा कहाँ चुप राहय। तिखार-तिखार के पूछेल लगगे। तब रमेलाल लटपट मा जवाब दीस--"ए दवई-दारू ला फेंके बर जावत हँव। कुँदरा मा दवई-दारू रखना बने नोहय बबा। कब जाने, कोन मनखे के मति बिगड़ जाय अउ दुलारी भउजी कस पी-पुआ लेवय। त भारी अलहन हो जही। "
         "कोन पी डरही जी?" डोकरा थोकिन सोचिस, तब कहिथे--"अच्छा, परेमिन बहू बर कहत हच का?"
      रमेलाल मूंड़ी हलाके स्वीकार करथे। तब बबा मुच ले करिस अउ कहिथे--"अरे बेटा!जिए के सौ बहाना अउ मरे के सौ तरीका। कोनो घर के मेयार मा, पंखा मा, रस्सी, पंछा, लुगरा ओरमा के लटक जथे, कोनो माटी तेल डार के जर जथे, कोनो जहर-महुरा पी लेथे। का का जिनिस ला तैं घर-दुआर, बारी-बखरी ले हटाबे अउ फेंकबे, कि कोनो मरे के उदिम झन करय। "
      बाबू रे!मरे के का का जिनिस हे, वोला झन हटा, मरे के बिचार ल हटा, अपन खुद के मन ले, अउ अपन जाँवर जोड़ी के मन ले। "
      रमेलाल मूंड़ी गड़ियाय हवय,अउ बबा के बात पूरे नइये।
"तोला परेमिन बर अतेक डर परे हे, फेर मैं कहिथँव, परेमिन काबर मरही। तैं ओला मारबे तब मरही। ताली एक हाथ ले नइ बाजय।
       बहू ला तैं झगरहिन, मूलहिन कहिथच, मोर बिचार मा तैं बड़े मूलहा हरच,जनम ले नहीं, करम ले।ठीक हे, झगरा परेमिन शुरू करथे, फेर ओला आगी मा घी डारे कस भभकाथच तहीं हा। कभू मनमुटाव अउ रार के भभकत आगी मा पानी डारे हच? सिरिफ दूसर के गलती ला झन देख, अपनो अंतस मा झाँक के देख अउ बिचार कि तोर कतका जवाबदारी हे। "
      रमेलाल कलेचुप मूँड़ी गड़ियाय सुनत हे। तब बबा ओकर खाँध मा हाथ रख के कहिथे---"देख रमेलाल!मया, पिरीत अउ सुम्मत के डोरी ले अपन गिरस्थी ला अइसे बाँध ले कि कोनो मनमुटाव अउ रीस ओला छोरे झन सकय। अभी तैं दुनियादारी मा नेवरिया हच बाबू, तोला बहुत कुछ झेले बर, सहे बर अउ सीखे बर परही।
       अउ ए दवा-दारू माहँगा-माहँगा के हरय, ए मन बाद मा अउ काम आही, एमन ला कार फेंकथच?
       तोला फेंकनाच्च  हे ,त अपन अवगुन अपन बुराई ला अपन अंतस ले फेंक। "
        अतका सुन के रमेलाल के आँखी मा जइसे चमक आ जथे। वो हा अपन मूंड़ उठाथे अउ एक भरपूर नजर बबा ऊपर डारथे। अउ सोचथे-कतका सोलाआना बात काहत हे बबा हा। ओला अइसे लागथे जइसे मूंड़ ऊपर ले भारी बोजहा उतर गे अउ जी हल्का होगे। ओकर घबराहट छू-मंतर होगे। तब बबा करा मुस्कावत कहिथे--"बने कहे बबा!"
        अतका कहिके रमेलाल सबो दवई के शीशी-पाकिट मन ला कुँदरा के पाट मा वापिस रख देथे।
 
          -दीपक निषाद-बनसाँकरा (सिमगा)

दाई के पीरा* मिनेश कुमार

दाई के पीरा* मिनेश कुमार

हँसा बड़ सिधवा अउ शिक्षित मनखे रहय।जौन पढ़ई-लिखई करिन अउ इँजीनियरिंग के डिग्री लिस, कुछ महिना के बाद म बर-बिहाव अउ सरकारी दफ्तर म नौकरी लगिस,हँसा के गोंसईन लक्ष्मी जेहर घलो बड़ पढ़े-लिखे अउ गउ राहय बिचारी ह।
          नौकरी लगे के तुरते बाद शहर आईन!हँसा ह बुता म रोज दफ्तर जाय लगिस,२ बच्छर बाद म हँसा के घर म बेटी (सुरभि)अवतरिस घर परिवार म बड़ उछाह आ गिस। देखते-देखत सुरभि ५-६ बच्छर के हो गिस अउ स्कूल पढ़े बर जाय लगिस, दिन भर स्कूल के पढ़ई-लिखई अउ बिहना-सँझा खेलत-कूदत दाई के बुता म हाथ बटावत बाढ़त गिस अउ सुरभि म दाई ददा के सँस्कार दिखत रिहिस।
         कुछ बच्छर बाद घर म एक ठन अउ उछाह के बेरा उईस,हँसा अउ लक्ष्मी के बेटा बेटा (विजय)अवतरिस । बेटा के जतन-पानी बड़ सुघ्घर ढंग ले करत रिहिन।
    नौकरी लगे के १५ बच्छर बाद एक दिन हँसा ल हृदयाघात (हार्ट अटैक) के पीरा उठिस अउ अस्पताल लेगत-लेगत हँसा के परान छूट गे!अब तो भईगे लक्ष्मी बर पहाड़ टूट गिस, बेटी बेटा के पढ़ई-लिखई के सँसो संग मा घर के कमईया के बिते के दुःख।
कुछ महिना बाद हँसा के दफ्तर ले पाती पहुँचिस कि हँसा के बिते के बाद (अनुकंपा)हँसा के जगहा म लक्ष्मी ल उहि दफ्तर म वोखर योग्यता ल देखत वोला पद मिलिस।
         एक डाहर लक्ष्मी के सँसो कमती होबे नइ करय, बेटा ल पढ़ा लिखा के डाक्टर बनाए के सपना रिहिस! बेटी ल संग मा राख के पढ़ाई-लिखाई कराईस अउ बेटा ल एकठन बहुते बड़े कान्वेंट स्कूल म भर्ती करादिस जिहाँ छात्रावास के घलो सोसलियत रिहिस,विजय उँहे रहय अउ पढ़य लिखय कभु १५ दिन ते कभु महिना म लक्ष्मी भेंटे बर जावय।
     ऐ डाहर सुरभि ह कालेज तक के पढ़ई पूरा कर डरिस हे..... लक्ष्मी अपन बेटी सुरभि के बिहाव घलो करदिस बिचारी ससुरार चल दिस।ऐ डाहर विजय के उमर घलो बाढ़त गिस अउ डाक्टरी के पढ़ई करे बर बिदेश चल दिस अउ कुछ बच्छर बाद डाक्टरी के डिग्री धर के घर आईस।अब ऐ डाहर लक्ष्मी के उमर घलो घटत रिहिस हवय संगे- संग बेटा के बिहाव के सँसो अउ चौंथा पन के सुख ल पाय के आस देखत बेटा ल बिहाव बर जोजियाईस! बेटा ह तो बिदेशी रंग अउ संस्कार म रँगे राहय । बेटा बिदेश जाके बिहाव करलिस ! बेटा के बिहाव अउ बहू ल देख के लक्ष्मी के खुशी ल का कहिबे,विजय अपन बिहई ल घर लाईस!दाई तो बड़ खुश होवत रिहिस लेकिन बहू ल सास के घर के रहन सहन नइ जमिस बहू ह विजय ले कहिन हमन अपन देश जाबो मँय ईहाँ नइ रहि सकँव।तोर महतारी ल वृद्धाश्रम म दे!विजय अपन गोसईन के बात ल मान के दाई ल वृद्धाश्रम म छोड़ दिस अपन मन बिदेश चल दिस।....... दाई के पीरा... पहाड़ होगे...अँतस के आस टूटगे!रोवत-रोवत दिन ल गुजारय अउ गुनय बेटा ल तो अतका पढ़ाए- लिखायेंव फेर का कमी रहिगे भगवान कहिके लक्ष्मी ह अपन बेटा ले आस टोर दिस......!अउ बेटी डाहर आखरी आस ल जोर के पाती पठोईस!जेमा बेटी ल कहिस...........

घर मा पहुना बना के,
                          बला लेबे बेटी..
एक कोन्हा मा राख के,
                      चला लेबे बेटी.....
चढ़:- घिरलत हँव,
               बेटा-बहु के दुःख मा...
   मोर अँतस के पीरा ल गला देबे बेटी
         घर मा पहुना बना के.......

बड़ गरब करेंव मँय बेटा ला पाके,
पालेंव पोसेंव मँय बड़ दुख ला खाके।
करदेंव बिहाव मँय बड़ सुख पाँहू,
हाथ के काँवरा लेगे बहु नँगाके।।

चढ़:- जिनगी के गाड़ी,
               अड़चन मा अटके हे....
बने रददा मा लाके,ढुला लेबे बेटी
       घर मा पहुना बना के....०१

उतरगे चुरी उतरगे हवय अँईठी,
अब तो भरोसा हवय तोरे डेरौठी।
लईकासही सरेख के राख लेबे  तैंहा,
दाई के लाज रखदे ऐ दुलौरिन बेटी

चढ़:-दाई के आस हवय,
                      तोरे उपर मा.....
जिनगी के काँटा ल ऊला देते बेटी
        घर मा पहुना बना के.....०२


धन हे बिधाता महतारी जनम ल,
सिरतोन निभाथे वोहा दाई के धरम ल।
सुनले समझ ले दाई के पीरा,
झन तँय बिचारबे लाज सरम ल।

चढ़:-जावत बेरा मोर,
                     अरजी हे छोटकुन
बेटा बनके मोर लाश ला,जला देबे
            बेटी....................
    घर मा पहुना बना के........

अईसे कहिके बेटी ल गोहरावत रहय।अउ पीरा म चुरत राहय।


मिनेश कुमार साहू
भुरभुसी गंडई

मयाँ अमोल होगे (नारी प्रधान कहानी)

मयाँ अमोल होगे      (नारी प्रधान कहानी)
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       भाग----1                         --- राधेश्याम पटेल

भादो के महिना...पानी हा झोर झोर गीरत रहय
खेत निंदईया मन निंदाई करत रहँय..बजरहिन हा
सुखमत ला कथे ---
                        " ले$$ न ओ सुखमत ...बने असन  एको ठन गीत सुना डार... बारा हा बजत हे..पेट हा साँय साँय करत हे...थोरक मनों हाँ बहल जाही.."
       " टार ओ$$$ शुरु तो करवा देथा ...फेर झोंके नई लागा त मोला अद्धर अद्धर लागथे भई..."--सुखमत हा निहरेच निहरे मुठा के बन ल जुरियावत कहिस..!
--सुखमत के गोठ ल सुन के सबो निंदईया मन ....ले तैं गा तो हमन झोंकबो कहिके ओला गाय बर शुरु करवाईन..!
-- सुखमत ददरिया गाय बर शुरू करिस...
बने सबो मिलके झोंकिन...गीत के सिराते अब सुखमत ह कथे-- 
"मोर बद्दी तो चुकागे...अब कोनो छोट मोट किस्सा कहा तव हमर बेरा घलोक कट जाही भई..."
 फिरतिन कथे ---" अब हमर बबा के पारी हे ... किस्सा कहे बर "
गोठ मा सबो हाँ मँ हाँ मिलाईन.. !
       बबा तो बबेच रहय ...ना जाने कतका किसा अऊ गीत गोबिंद ओखर मँगज मा गँजाय रहय तेखर गिन्ती नई रहय...ओखर सुनाय किस्सा मानँव  बिते बितात जिनगी सऊँहे आघू मा आ के माढ़ गय हो तईसे लागय ...गीत होय चाहे कहानी  किस्सा ...एक बेर शुरु हो जाय तव संगवारी मन ला बेरा के गमे नई लगे दय... आज फेर बबा के पारी आय हे..!
   "मैं कहे बर तो कईहँव नोनी हो फेर ...तुहाँर मन नई आही तव झन कईहा के ...का किस्सा ल सुनाईस बबा ह..." 
      ---बबा ह कन्हियाँ ला सीधा करके काँदी ल हाँथ म धरेच धरे कहिस..!
सुखमत हा तुरते कथे---  " कोनो नई कहन बबा.. तोर कोती ले मैं गवाही हँव..."
--सुखमत के गोठ ला सुनके सबो हाँस दिन..!
बबा के नाँव मंगल रहय  उमर अऊ आदत बेव्हार के सेति सबो के मयारुक बबा के हाना ...किस्सा ...गीत सबो ला बने लागय.. ..  बबा हा बने हुँकारु देहा भई कहिके  किस्सा कहे ला शुरु करिस---
      " एक ठन गाँव रहय नोनी हो...!  जेखर नाँव रहय ..,पनगाँव ... उहें एक झन माई लोगिन रहय तेखर नाँव रहय अनसुहात ...फेर वोला सबो नवाँपरहिन नवापरहिन कहँय काबर के वोहा नवाँपारा ले आय रहय...!"
---फिरतिन हा बिचे माँ बबा ल टोंकत कथे --- " सहीं किस्सा कहत हस बबा...के अईसने बना के कहत हस...?"
---बबा हा कथे -- " तू मन ला पेंड़ गिनना हे के आमा खाना हे..?"
--सबो झन हाँस परिन ...
--" ओईसे तैं सहीं कहत हस बेटी ...! ऐहा कोनो तईहा के किस्सा नोहँय... सियानन ले सुने सहीं घटना आय..."
--बबा फेर कहे ल चालू करिस--
--"तव नोनी होवा ...! नवाँपरहिन के किस्मत माँ भगवान हा दुखे दुख लिखे रहय...बिचारी हा सुख कभू नई पाईस ...न मईके ...न ससुरे..नवाँपरहिन
दू महिना के रहय तभे महतारी मरगे...घर मा बाप के छोंड़ अऊ कोनो नई रहँय..!
पारा परोस के मन जरुर सोगावँय बिचारी ल...फेर कोनो धोधवी कहँय त कोनो रेंटही त कोनो पेटली...! अब रँग रुप नई रहय त का करय वोला जईसन भगवान गढ़े रहय तईसन रहय।"
--बबा के कहे के ढंग हा सब ला मोक ले रहय
बुता मा जाँगर तो चलत रहय फेर सबके मती बबा के किस्सा मा अरझ गय रहय..! बबा फेर साँस लेके  किस्सा ल आघू बढ़ावत कथे --
--" तव नोनी होवा...! अभी महतारी ला मरे बछर भर नई होय रहय तभे बाप हा मौसी दाई ले आईस
साल भर मा ओखरो नोनी लईका होगे ...अब मउसी महतारी ल तो अपने बेटी ले फुरसत नई रहय त सऊत के लईका के जतन कती ले करय..ओखर नोनी ल भगवान बने सुग्घर गोरी नारी बनाय रहय ...फेर का पुछत हावा नोनी होवा बाप के मया घलव बिहई के बेटी बर कम होय लागिस...मौसी दाई सँग बाप घलो मोसिया बाप बनगे रहय...।
मउसी महतारी वोला अनसुहात कहिके हूँत करावय
देखा देखी मा पारा मोहल्ला अऊ बाप घलो बर बिचारी हा अनसुहाते होके रहिगे...!बिचारी के कोनो पुजारी नई रहय ...खाय हे त खाय हे ...नई खाय हे तव परे हे सोज्झे भूखे पेट अनजतन..पारा के कोनो कभू कहिदँय लईका के जतन नई करच ओ कहिके ...तव मउसी महतारी के रीस अँड़ेरी के बँड़ेरी चढ़ जाय ....आगी हो जय.. कहईया मन अपन कस मुँह करके रेंग देवँय...!
धीरे धीरे बेरा पाँखी लगा के उड़ाय लागिस...दिन हा महिना अऊ महिना बछर होगे...अब अनसुहात नोनी हा देखते देखत बर बिहाव के लाईक होगे ...
अनसुहात नोनी बर मयाँ तो बाप घलो ला नई रहय फेर...अतका सुरता जरुर रहय के ओखर बड़े बेटी
अब बिहाव करे लाईक होगे हे...!
भगवान के किरपा होईस अऊ नोनी के बिहाव होगे...फेर कथें न...भगवान जऊन करम मा लिख दे हे तेन तिल घटय ना राई बढ़य..!
अनसुहात मईके ले बिदा होके ससुरार आईस तव ओहू हुरसेटहा घरऊल मा परगे...ओखर गोसईया
बनसुर्रा  तो दुच्छा बनसुर्रेच रहय...कभू अनसुहात मेरन मिठ भाखा नई गोठियाईस ...सास ससुर जउन रहँय तेन तो रहिबे करँय ऊपर ले बनसुर्रा मार पीट अलग करय....!
अनसुहात ला आय अभी साल भर घलो नई होय रहय के बनसुर्रा हा आने सुवारी ले आईस... अनसुहात के जी धक ले रहिगे..फेर का करय बिचारी छाती मा पथरा लदक के सहिगय..!
बिना गल्ती के गल्ती बहुत कुछ सुने सहे ल तो परते रहिस...अब सऊत के नाव लेके ओखर कल्लाई अऊ बाढ़े लागिस फेर कभू ऊँच भाखा मा कोनो ला जुवाप नई करिस अऊ करतिच काखर बल मा.... ओकर मयाँ दऊँड़ईया कोनो तो नई रहिन ...न मईके न ससुरे...दूनो जघा बरोबरे रहय ओखर बर कुछू बदले रहय तव ...नाँव.. अनसुहात ले अब सबे झन वोला ओखर मईके गाँव के नाँव ले नवाँपरहिन कहँय
नवाँ परहिन के दुख ल देख के घर के कमिंयाँ जरुर सोगावय... फेर गरुवा भईंसा के चरईया नउँकर भला कोन आधार मा कहय...तेखरे सेती चुपे रहि जाय.. हाँ कभू कभू नवाँपरहिन के बुता काम मा ओखर मदत जरुर कर देवय...!
अईसने दुख बिपत ला झेलत अनसुहात नवाँपरहिन
के दिन हा बीते लागिस...ऐही बेरा मा ओकर एक झन नोनी घलो अँवरगे तव सोचिस के अब मोर दुख के करिया बादर छँट जाही...फेर अईसन नई होईस
बेटी जनमाय हस कहिके ससुरार के मन आऊ दुख देहे लागिन..!
बुता काम के सपेटा --खवाई पियाई मा ठिकाना नहीं
ऊपर ले मुँड़ भर के चिंता ...कतेक ला सहय बिचारी बिमार परगे... तीन दिन ले ...खटिया ले नई उठे सकिच तभो ओकर गोसईया अऊ सास ससूर के आँखी नई उखरिस...उल्टा सास हा गारी देव...
मरबो नई करय फलालिन हाँ..नखरा देखात हे..
सुतना सुते हे....बुता काम लाओखर बाप हा आके करही.?
अनसुहात के आँखी ले आँसू हा करा बरोबर टपकय
सास के गारी सुनके फेर का करय...गोसईया घलो तो निच्चट निर्मोहिया रहय ...!
कमियाँ बिचारा ओकर दुख ला नई देखे सकिस तव
दवाई ला के देहिस...अनसुहात के आँखी ले आँसू आगे... कमियाँ कोत ला देखत रहिगे..कमियाँ हा दवाई ल देके रेंगते रेंगिस...!
नवाँपरहिन मन मा गुने लागिस--- अपन ले अकतिहा मयाँ तो दूसर ह करत हे...वाह रे भगवान...!मोला अपन तीर बला ले ... अब नई सहात हे..! मन हाँ काहाँ काहाँ धउँड़े लागिस... महतारी के सुरता आगे जेला जानबो नई करय ....हिचक हिचक रोय लागिस...!
अभी जर बुखार हा उतरेच नई पाय रहय...दूसर दिन ओखर सास ल खभर लगिस के कमियाँ बैजू हा ओकर बर दवाई लाईसे... तव ऐ बात ला अपन बेटा बनसुर्रा ल घलव बता डारिस ... कमियाँ ल कुछू कहिन तो नहीं फेर  बिहान भय ले ओला काम ले निकाल दिन...!
कमियाँ समझ गे चुपचाप चल दिस...नवाँपरहिन ला ऐ बात के खभर लगिस तव वोला अब्बड़ दुख होईस...जान डरिस बैजू के नउकरी ओकरे सेती छूटिस हे...सोगातिस नही तव अईसन होतिस नही
.... का करय बिचारी मन ला मसोस के रही गे...!
रात भर नवाँपरहिन सोय नी सकिस..मन हा बैजू कमियेच कोती जावय...सोचत सोचत नवाँ परहिन
रात भर आँसू बोहवावत रहिगे...!
अनसुहात के करम माँ तो दुख नानपन ले लिखाय रहय अऊ सबो ला सहत आवत रहय फेर ओ दिन के घटना ले ओकर मन --- खाय पीये ...काम बूता घर दुआर लईका कुछू मा नई लागे लगिस ... मन हाँ बैजूच कोति अरझे रहय...!
जब थोर थोर तबियत मा सुधार आईस तहाँ ले घर
के काम जोंगाय लागिस...आज बिहनियाँ ले नवाँपरहिन हाँ हँसिया धरके काँदी लूऐ बर निकल गे
रहय...बनेचकन लू के बोजहा बाँध डारे रहय फेर कमजोरहा देंह ले बोजहा उठत नी रहय...ठउँका ओतके बेरा बैजू घलाव ओही कोत पहुँचगे ... सायित वोहू हा काँदी लूऐच बर गये रहय...
" बने लागिस हे गऊँटनिन...?"
नवांपरहिन ला देख के बैजू हा पुछ बईठिस...!
--" थोर थोर लागिस हे बैजू ...! तबे तो काँदी लूऐ बर आये हँव.."   -- नवाँपरहिन हा बैजू ठहर ला देख के कहिस...!
--"बोहादँव गऊँटनीन...बोजहा ला तो खुबेच बड़का बाँध डारे हावा.."   --- बैजू हा बोजहा ला देखत कहिस..!
---नवाँ परहिन कथे ---" बोजहा ल तो बोह लेहँव बैजू
फेर तोर उठाय बोजहा ला कईसे उतारिहँव..मोर बर दवाई नई लाते ता तोर बूता नई छुटतिस ...तैं अपन बिगाड़ काबर करे..?"
--कहत कहत नवाँपरहिन के आँखी ले आँसू आगे
"का होईस गऊँटनिन ...काम तो अऊ कोनो मेरन मिल जाहय ...फेर रोज रोज तुहँर दुख ल देखे ल तो नई मिलही...!" गोठियावत बैजू के नरी भर्राय लगिस..!
"मोर अतका बड़ उमर मा मोर बर अतका कोनो नई सोगाईन बैजू...फेर तैं मोर बर अतका काबर सोगाथस...? मै तोर कुछू लागमानी तो नोहँव ..फेर अतका पिरित काबर..?---नवाँपरहिन एके साँस मा ओरिया डारिस..!
" मया काखर बर कईसे छलक परथे तेला बताय नई जाय सकय गउँटनिन..!तुहाँर बर मोर ऐ पीरित हा
तुहाँर अनसम्हार दुख के परिनाम आय..!
--बैजू हा गोठियाते गोठियात बोजहा ला बोहाये बर निंहरिस..! काँदी ला बोह के नवाँपरहिन घर कोती तो आगे फेर ओखर चेत बैजू के कहे बात मा घेरी बेरी अरझत रहय..!
धीरे धीरे दिन हा बीते लागिस...कभू कभू नवाँपरहिन के भेंट बैजू मेरन हो जावय अऊ दूनो एक दूसर के हाल चाल पूछ के रेंग देवँय... दूनो ल ऐ बात के डर लगे रहय के कोनो गोठियात देख लेहीं तव फेर घर मा अंदोहल हो जही...!
धीरे धीरे अईसन दिन आगे के दूनो ला भेंट होय के इंतजार रहे लागिस... !
एक दिन भेंट होईस तव नवाँपरहिन ला बैजू हा कहिथे--- 
"एकठन ठन बात कहे के मन हो थे गउँटनिन ....
गुस्सा झन...!"
"बताना बैजू ...काबर गुस्साहूँ..."  ---नवाँपरहिन कहिस...!
हमर ऐ तरा मिलई गोठियई हा हमर जी के काल हो सकत हे ....तुहँर मन होय तव तव जिनगी भर बर तुहँर संग देहे बर मैं तियार हँव..."  --- बैजू मन के बात कहि तो डारिस एक साँस मा लकिन जीव हा धकनकाय लागिस ... अऊ नवाँपरहिन अब्बक होके बैजू के मूँह ल देखे लागिस...!
बैजू डराय असन फेर कथे---  "गलती कहि परे होहूँ
त ..."  --- बैजू के गोठ ला बीचे मा काट के नवाँपरहिन हा कथे...
"तैं मोला अतका मयाँ करथच बैजू...?"
----"हाँ गउँटनिन... मै तुहँला बहुत जादा मयाँ करे लागे हँव ..फेर बिना तुहाँर मनके ...."
--- फेर ओखर गोठ बीचे मा काटके नवाँपरहिन कथे
" अब मोर मन मोर काहाँ हे बैजू...? मोर मन तो  तोर अंतस मा समा गे हे ..."
--- नवाँपरहिन के आँखी ले आँसू उमड़ परिस गंगा जमुना असन..!
--बैजू हा अपन बात कहे के बाद अऊ कुछू कहे के हिम्मत नई कर पात रहय... नवाँपरहिन आँसू ल पोंछत कहिथे---
" मोर करम मा रोना ही लिखाय हे बैजू ...नई लगय के तोर टारे ले टर जही"
---"अईसे बात नई ये गउँटनिन ... अगर तूँ हिम्मत करा तव तुहाँर दुख दुरिहा सकत हे..."
---" जिनगी के फैसला अतका जल्दी नई होय बैजू
फेर मै सादी सुधा अँव दुनियाँ का कईही ...?
---"लकिन मैं सोच डारे हँव... तूँ कहिहव त मै तुहँला अपन बना के संग लेग जाहँव ...नही ता मैं गाँव ल छोड़के बाहिर निकल जाहँव.."
---"मोला सोचे बर कुछ बेरा चाही बैजू ..!"
---"मैं तुहँका जिद्द नई करँव गउँटनिन..."
--- बैजू के गोठ सिराय नई रहय आघू डहर ले कोनो आवत देख के नवाँपरहिन रेंग दिस घर कोती ... बैजू चलो थोरक मा रेंग परिस....!
          --- वो दिन दूनो के भेंट नई हो पाय रहिस चार दिन गुजर गे ...फेर एक दिन कोनो के मुँह ले नवाँपरहिन हा सुनिस के बैजू हा कमाय खाय बर सहर कोती चल देहे हे...सुन के नवाँपरहिन के मन हा फेर अद्धर अद्धर लगे लागिस...बैजू के रहते वोला भेंट के अपन कुछ दुख पीरा ला भुला जावय.. अब वोला अपन जिनगी बोजहा कस गरु लागे लागिस...!
----वो डहर बैजू शहर म तो आगे रहय फेर ओखरो मन उजरे उजरे कस लागय आँखिर सहर मा मुस्कुल से एक महिना रहिस तहाँ फेर गाँव आगे
 आँखिर जेन होवईया रहय तउने होगे...!
अनसुहात नवाँपरहिन अपन लईका ल घर मा छोंड़के बैजू संग गाँव ले निकल गे..!
---गाँव मा खूब हो हल्ला होईस...जै मनखे तै गोठ
पर सार बात रहय के नवाँपरहिन बैजू ल लेके भाग गे...!
सहर मा पहूँच के बैजू अऊ नवाँपरहीन मंदिर मा बिहाव करलिन अऊ किराया के घर लेके परेम से कमाँय खाय लगिन...बैजू हा दिन भर रिक्सा चलावय अऊ नवाँपरहिन हा कालोनी मा घर के काम बूता करय..दूनो बड़ खुश रहँय...नवापरहिन ला तो मानो सरग मिल गे रहय...जिनगी मा पहिली बार भगवान ओला सुख देहे रहय..फेर कभू कभू अपन बेटी के सुरता मा रोवय जरुर फेर अपन गलती बर काला दोस देवय ....धीरे धीरे दू महीना कईसे नहँक गे पते नई चलिस...फेर कथें ना के जेखर करम मा भगवान दुखे दुख लिख दे होय वोला खुसी हा जादा दिन नई फूरय...!
एक दिन बैजू हा रिक्सा चलावत कार मा ठोंका गय
नवाँपरहिन ला जब पता चलिस तव बैजू मेरन अस्पताल कोती दउँड़त भागिस...!
                                                            -----   क्रमश:

राधेश्याम पटेल

(कहानी)-महेंद्र बघेल

कहानी)-महेंद्र बघेल

        *रुऑं ठाढ़ होगे*

           बड़े बिहनिया सुरसुर सुरसुर हवा चलत हे , सवाना हा बर्तन भाॅंड़ा ला माॅंज माॅंज के धोवत हे।
    "बियारी मा बउरे लोटा थारी हा आज चाॅंदी कस चमकय लगिस , राते भर मा बरतन भाॅंड़ा सब पटपटा जथे, बड़ हियाव करे बर लागथे " - सवाना हा कहिस।
सुन के सुखलाल कहिस - "तन के होय ,मन के होय चाहे कोनो जिनिस के होय समय समय मा वोला साफ करना च पड़थे सवाना।"
      सबो दिन बरोबर आजो बातें बात मा सहज भाव ले जीवन के उतार चढ़ाव के गोठ गोठियावत दिन के शुरुआत होवत रहिस।
           का भइस सुखलाल अउ सवाना हा आठवीं तक पढ़े लिखे रिहिन ते, जिनगी ला जाने समझे बर कोन से मार भारी पढ़ई लिखई के जरवत पड़थे ,ये बात तो अगम हे अउ कुछ जादा कहना उचित नइहे फेर जिनगी ला सवाॅंरे बर शिक्षा के महत्व तो होबे करथे।अउ ये जुग जोड़ी मन येकर महत्व ला बड़ नजीक ले समझे।
तभे तो सवाना हा सुखलाल ला सुरता करावत कहिस -" अनु हर तो पाॅंचवीं मा पहुॅंच गय हे , अभी असन मा  कापी पेन घलव ले देतेव। घरे मा रहिके थोर बहुत चेत लगाके लिखतिन पढ़तिन ।"
      सुन के सुखलाल हा मने मन मा गुनान करे लगिस - तॅंय सही कहत हस सवाना, अब तब स्कूल हा खुलइया हे,
अनु के पढ़ई लिखई बर अब मोला कोनों संशो नइहे,ओला चार साल पूरा होगे पढ़त पढ़त आज तक मोला कोनो शिकायत के मौका नइ दिस।
   अउ ये चतुर, येला तो अब हर हाल मा पहिली कक्षा मा भरती करना पड़ही, दू साल ले अपन जिद अउ महतारी के कलोली के सेती आंगनबाड़ी मा जाबे नइ करिस, पर अब अइसन होवन नइ दॅंव।"
     
        हाॅंड़ी के सीथा कस दुलरवा बेटा चतुर बर सुखलाल और सवाना के मया दुलार अतिक के वोहा अपन हाथ मा काॅंवरा उठाके खाय बर घटकारी करय, महतारी सवाना हा खवातिस तभे चतुर हा मन भर खातिस।
अनु हा पढ़ई लिखई मा अब्बड़ हुशियार एक घाॅंव के  समझाय पाठ ला सिरबिस नइ भुलाय अपन दिमाग में गम्पलास बरोबर चटका डरे।
पहली कक्षा ले लेके चौथी कक्षा तक हमेशा पहिली नंबर मा पास होवत रहिस ,तभे तो अपन गुरुजी मन के बड़ दुलउरीन रहीस।
मन मा कुलबुलात अपन जिज्ञासा ला बेझिझक गुरु जी मन ले पूछय, अउ गृहकारज ला हमेशा सपूरन करके हर रोज दिखातिस।

    एती काम बुता मा चिभके सवाना के चित मा बड़ उथल पुथल होवत हे ,नाना प्रकार के विचार रहि रहि के आवत-जावत हे अउ मने मन मा विनती करत हे - " बेटी अनु कस चेत बुध देके, बेटा चतुर ला घलव बने हुसियार अउ गुणवान बना देतेस भगवान ।"
     महतारी के सॅंशो फिकर ला महतारी च हर जाने फेर अनु के सुभाव हा तो कुछ हट के हवय, पढ़ई लिखई के संगे संग अपन बाप महतारी के कामकाज मा सहयोग करे बर हरदम आगू।  होनहार बेटी के अइसनहा गुणी सुभाव ला देखके कते दाई ददा के मन हा गदगद नइ होत होही।
        बेटी अनु हा जनम धरे रहिस उही पईंत सुखलाल सवाना दूनो सोच डरे रहिन हे के जब अनु हा पाॅंच साल के हो जही तभे दूसरइया लइका के बारे मा सोचे जही। बने तो सोचे रहिन फेर का कहिबे बेटा के मोह हा घलव अब्बड़ होथे। सवाना हा असनांद करके हर दिन तुलसी चौरा मा पानी रितोवत इही विनती करें , "हे भगवान अब के दरी मोर कोरा मा डीही रखवार बेटा ला पठो देतेस।"
     संजोग अइसन के पाॅंच साल पूरे पूरे मा सवाना के विनती हा पूरा हो गय,उॅंकर ॲंगना मा राजा बेटा के किलकारी गूॅंजे लगिस।

सवाना के घर मा जब बेटा लइका जनम धरिस उही पईंत कोनों पाॅंचक साल के होय रहिस होही अनु ला।
 
      अपन नानकुन भाई ला देख देखके अनु हा बड़ खुश रहय, अपन सब खिलौना ला खटिया मा मढ़ा के कहय "ले खेल न मोर भाई रे" लइकुसहा बुध मा का जाने बपरी हर के अभी तो भाई हा नानेचकुन हे ,अबोध हे।

एती लइका के छ्ट्ठी ला बड़ उछाह मंगल ले मनावत रमायण मंडली वाले रमइनिक मन सुग्घर मंगल सोहर गीत गावत लइका के नाव चतुर धर दिन।
अइसने हॅंसी खुशी ले दिन हा पहावत पाॅंच साल कइसे निकलिस गम नइ मिल पइस।
     एती अड़बड़ मया दुलार मा चतुर हा पलिस बाढ़िस अउ सुखियार होगे। खेलई-कूदई ,खई-खजानी के छोड़ चतुर ला आन चीज ले कोनों मतलबे नइ रिहिस।
   ये डहर अनु हा पढ़ई लिखई संगे संग खेलकूद में भाग लेवत संकुल अउ विकास खंड मा चैम्पियन के पदक अउ पुरस्कार पाइस।
  रंगोली भाषण सामान्य ज्ञान जइसे कार्यक्रम मा भाग लेवत हमेशा पहला स्थान मा आइस।
अइसन होनहार गुणिक बेटी बर कोन ला गुमान नइ होही।

             खेल प्रतियोगिता के आखिरी दिन सरपंच हा कार्यक्रम के पगरईत रहिस, वो तो खुदे अनु ला चैम्पियन के पदक पहिरा के प्रमाण-पत्र सौंपे रहिस।
 दूसरइया दिन सरपंच हर उही वार्ड के पंच ला धरके पहुॅंचगे सुखलाल घर अउ कहे लगिस - " तोर अनु हा पढ़ई के संगे संग खेलकूद मा घलव बड़ हुशियार हे जी, हम तो अपन अढ़हा बुध मा इही सोचत रहेन के पढ़न्ता मन खेलकूद मा कमजोर होथें, अब हमर सोच हा बदलगे । बहुत गरब के बात आय के ये नोनी हर प्राइवेट स्कूल बरोबर अपन अउ हमर गाॅंव के नाम ला रोशन करत हे।"
   सुखलाल अउ सवाना के बढ़िया संस्कार हा अनु बेटी पर वरदान होगे ,तभे तो ओकर नाम के गुहार गांव- गांव मा गली-खोर मा गूॅंजत हे।
सही मा लइका के आगू बढ़े मा घर के शुद्ध वातावरण, बढ़िया संस्कार , सोला-आना संगी साथी और समर्पित गुरु के जरवत पड़थे।
         
पहली कक्षा मा भरती होय ले चतुर के खेलई-कूदई बिसरगे, स्कूल मा खई-खजानी के सुरता कर कर के रोनहू हो जाय, बोटबिटा जाय। मॅंझनिया छुट्टी मा घर जाय अउ महतारी ला खई खजानी बिसाय बर रूंग-रूंग के पइसा माॅंगय।
   दाई ददा मन चेत नइ कर पईन के लाड़ दुलार मा पले बढ़े लइका हा अइसन मा बिगड़ जही। घर मा पइसा नइ रहितिस ता कहूॅं कोति ले माॅंग झाॅंग के ओकर जिद ला पूरा करें। चतुर हा अइसने ढंग ले अपन महतारी ला ठग जग के पैसा माॅंगय अउ अपन मितान मन संग फुटानी मारे।

अषाढ़ के महिना रहय उही दिन के कहूॅं तीन बजत रिहिस होही, भंडार डहर ले बिरबिट करिया बादर उठिस अउ मूसलाधार पानी गिरन लगिस , गरज चमक के संग चकोर चकोर के जब बरसिस ते चार घलव बजगे फेर पानी छोड़े के कोई आसरा नइ दिखय। स्कूल मा लइका मन असकटागे अउ  सब अपन अपन घर भगागें ।
  सब्बो मन तो गिदगिद ले फिलगे रहिन अउ एती भागत भागत फिसल के अनु हा बोहावत पानी मा चभरंग ले गिरगे।
अनु के तबियत खराब होय सेती तीन चार दिन स्कूल नइ गिस।
    अउ चतुर के आदत अइसे बिगड़िस के स्कूल जाय बर सिरबिस ले छोड़ दिस ।एती कतको दिन ले न अनु हर न दाई ददा मन गम पईन।
       सुखलाल अउ सवाना तो इही सोचय के चतुर हर रोज स्कूल जावत होही, पढ़ई लिखई मा ध्यान लगावत होही ।ओमन का जाने चतुर के काम तो पीपर तरी मा घाम छइयाॅं खेलना, घरघुंदिया बनाना अउ घर जाके पइसा माॅंग फुटानी मारना हवय।
         तबियत ठीक होय के बाद जब अनु स्कूल जाना शुरू करिस तब चतुर के चतुराई कम घटकारी हा समझ मा आवत गिस ।
     अनु हा भाई चतुर ला कतको समझाईस ,हर रोज स्कूल जाबे ते धीरे धीरे सबला सीख जबे। फेर चतुर नइ मानिस ।
    जब सुखलाल ला चतुर के घटकारी के बारे मा पता चलिस  ,सवाना ला कानों-कान खबर नइ होवन दिस, काबर कि सवाना हर बड़ सॅंशो फिकर करतिस।
     आगू दिन सुखलाल हा चतुर ला मना भूरियार के स्कूल मा पहुॅंचाईस।
   गुरूजी पूछिस "  स्कूल काबर नइ आवत रहेस जी चतुर " अउ सबो लइका मन ला खड़ी लकीर,आड़ी लकीर, आधा गोल,पूरा गोल लिख लिख के देखाय बर बोलिस।

गुरुजी के बात चतुर ला कइसे लगिस ,उही जाने ,फेर खेलई कुदई ,खई खजानी भॅंवरा बाॅंटी गिल्ली डंडा के सुरता कर करके ओकर ऑंखी ले तरतर तरतर ऑंसू चुचवाय लगिस।
   बिहान दिन ले अइसन ढेरियाइस के स्कूल जाय बर चुकता छोड़ दिस।
बपरी अनु हा समझावत समझावत थकगे-" जा भाई पढ़-लिख ,धीरे-धीरे पढ़बे लिखबे तभे तो आगू बढ़बे।"
  न तो बहिनी के बात मानिस न गुरूजी के सुझाव ल गुनीस।
     अउ एती वार्षिक परीक्षा के समय घलव आगे तभो चतुर के इच्छा नइ बदलिस।
अप्रैल में परीक्षा परिणाम घलव घोषित होगे,फेर चतुर हा खेलई कूदई,घुमई फिरई, के मोह ला नइ छोड़ पाईस।
 समझावात समझावात दाई ददा मन खार खागे।
        एती अनु हा पाॅंचवीं बोर्ड के परीक्षा में जिला भर में पहला स्थान पाके अपन महतारी बाप के छाती ला चाकर अउ माथ ला उॅंच कर दिस। ओकर मेहनत अतिक सुग्घर कि अनु के चयन नवोदय स्कूल बर होगय।
      परीक्षा परिणाम ला सुनके अनु ,सुखलाल अउ सवाना के पाॅंव हा खुशी के मारे भुॅंइया मा नइ माढ़त रहिस।

घर मा अतिक खुशियाली आय  के बाद घलो चतुर ला कोई फरक नइ पड़िस। अउ एती अनु ला आशीर्वाद दे बर सबसे पहली गुरुजी मन आईन,गांव के पंच सरपंच सगा सोदर ,संगी साथी ,जान पहिचान वाले सब मन ओरी पारी ले आ-आके बधाई अउ आशीर्वाद देवत गिन।
  दू दिन बाद सबो दैनिक अखबार मन मा बधाई संदेश देवत कलेक्टर अउ जिला शिक्षा अधिकारी के संग अनु के फोटो छपिस। पेपर मा छपे अनु बेटी के फोटू अउ नाव ल पढ़के सरपंच हा  आज अउ पेपर के संग मिठई  धरके पहुचगे सुखलाल घर। अउ जोर जोर ले उॅंचहा अवाज मा पढ़ पढ़के सुनावन लगिस- "सुखलाल अउ सवाना के  बेटी कु.अनुमति हर नवोदय चयन परीक्षा के संगे संग जिला प्राथमिक प्रमाण पत्र के परीक्षा मा प्रथम स्थान प्राप्त करके गाॅंव के साथ पूरा जिला के नाम रोशन करे हे।
कु. अनुमति के उज्जवल भविष्य के कामना करत उकर माता पिता ला बहुत बहुत बधाई अउ शुभकामना।"
    दूरिहा मा बइठे चतुर हा बधाई संदेश के एकेक शब्द ला बड़ ध्यान लगाके सुनत रहिस। अनु बर लोगन मन के ये बधाई अउ आशीर्वाद के क्रम ला देखके सुनके ,शिक्षा के महत्व ला जानके ओकर अंतर्मन मा हलचल होवत रहिस।
अनु दीदी कस आगू बढ़े बर अउ अपन आप ल गढ़े बर चतुर के पूरा तन बदन मा बिजली कस उमंग भरगे, मुॅंदाय ऑंखी उघरन लगिस।
 अच जल्दी ले जल्दी स्कूल मा जाके भरती हो जातेव इही सोचत सोचत ओकर रुऑं ठाढ़ होगे।

महेंद्र कुमार बघेल डोंगरगांव

*नशा करत हे भारी नाश* मोहन निषाद

*नशा करत हे भारी नाश* मोहन निषाद

आज कल हम सबे झन जानत हावन , हमार समाज मा किसम किसम के लोगन मन हे । अउ आज हमर मन के बीच मा किसम किसम के , मादक नशापान के जिनिस मन हर घलव होंगे हावय । आज हम कोनो समाज के गोठ करिन चाहे , कोनो परिवार के गोठ करिन । आज कखरो घर परिवार हर , अइसन नशापान के जिनिस मन ले छूटे नइ हे । हम सबे जॉनथन की नशा के जिनिस जउन हे , तउन हर बने जिनिस नोहय कहिके । तभो ले हमन ओ जिनिस मन ला , बउरे ला नइ छोड़न । आज हमर मन के बीच मा : - गुटखा , सिगरेट , बीड़ी , माखुर , गुड़ाखू , दारू , गाँजा , अइसन कइ प्रकार के नशा के जिनिस मन हर हे । जउन मन ले आज कल के लोगन मन हर बाचे नइ हे , आज एको ठन अइसन घर अउ परिवार नइ हे ।  जउन घर मा कोन्हों प्रकार के नशापान के जिनिस मन ला ,  परिवार के कोन्हों सदस्य हर नइ बउरत होही । आज सबे घर परिवार मा एक ना एक झन सदस्य , अइसे होथे जउन हर येमा के कोन्हों ना कोन्हों नशा ला करत रहिथे । जेखर चलते घर मा अइसन माहुँल ला पाके , आज काल के नान्हे - नान्हे लइका मन हर घलो अइसन जिनिस मन ला धीरे - धीरे बऊरे ला सिखत जाथे । आज काल के जउन युवा पीढ़ी के लइका हावय , तउन मन हर बहुते हुशियार होंगे हावय । ओमन कोनो भी जिनिस ला जल्दी फट ले पकड़ लेथे , चाहे ओ बने जिनिस रहे , चाहे गलत जिनिस रहे । ओमन हर ओला जल्दी कुन सिख जथे । आज हमर समाज परिवार मा , ये नशा के जिनिस मन के असर (प्रभाव) हर अतेक बाढ़ गे हावय की , आज कल के लइका मन हर । अपन ददा दाई तो ददा दाई , अउ कोनो भी दूसर सियानन मन ला घलव नइ घेपय । पहिली हमरे सियान मन हर नशा के जिनिस मन ला , अपन ले बड़का मन ले लुका ले पीयत खात रहिन हे । फेर आज कल के माहुँल हर अइसन होंगे हावय , की आज लइका मन अपन ददा दाई के आघू मा घलव दारु पानी पीयत रहिथे । तव कभू - कभू अइसन घलव देखे मा आथे , की आज कल बाप बेटा दुनो झन घलव मिलके संघरा पीयत रहिथे । आज ये नशा अउ अइसन नशीला जिनिस मन के , चलागन अतेक बाढ़ गे हावय की ।  लोगन मन हर अपन घर परिवार लोग लइका सबो के , संसो करना छोड़ के अपन पीयइ - खवई मा मस्त रहिथे । तेखर ऊपर तो आज कल के नवजावन युवा पीढ़ी के ,  लइका मन के बारे मा अउ झन पुछव ।  उनकर मन बर तो आज कल के नशा मन ला करना मानो एक ठन फैसन के जिनिस होंगे हावय । रंग - रंग के गुटका , सिगरेट , दारू पानी मन ला पीना , ओमन हर आज अपन बर बड़ सुग्घर समझथे । मानो लोगन मन हर ओमन ला देख के सहरावत होही , चाय के संग सिगरेट फुँकना उनकर मन के , आज कल के बड़का फैसन आय अउ होंगे हावय । आप कहू कर के होटल मेर खड़ा होके देख लेहव , अइसन दू - चार झन मन आपला बज्जुर मिल जही । ये तो बड़े लइका मन के गोठ रहिस , ओइसने हे आज कल के नान - नान लइका मन हर घलो देखे मा आथे । जउन मन हर किसम - किसम के नशा मन ला करत रहिथे , गुटखा , बीड़ी , सिगरेट , पीना तो इनकर मन बर नानकुन बात ये । आज काल के नान नान लइका मन हर घलव दारू पानी ला पिये बर जल्दी सिख जावत हे । अउ कतकोन लइका मन हर तो सिलोचन जइसन जिनिस मन के घलव नशा करत रहिथे । जउन हर मनखे मन के तन ला भारी नुकसान पहुचाथे , अइसे नशा तो कोन्हों भी किसम के होवय नुकसान तो करबे करथे । आज अइसन नशा मन के चलते ही हमर समाज मा , कतकोन घर परिवार मन हर टुट जवत हे । ता उही कतकोन परिवार मन अइसन हावय जउन मन खाय पिये बर पानी पसिया बर घलव तरसत रहिथे । फेर नशा करइया मनखे मन ला का हावय , उन ला तो बस अपन नशा के जिनिस मन के बस खुराक होना चाही । भले घर परिवार लोग - लइका मन के कुछू हो जय , उनला उनकर कोनो संसो नइ राहय । आज हमर समाज मा नशा पानी के जिनिस मन के असर (प्रभाव)  हर दिनों - दिन अतेक बाढ़त जावत हावय , की आज कल काखरो घर परिवार मा कोनो भी किसम के छोटे - मोटे कार्यक्रम हर होथे ,  लोगन मन ला तो बस दारू पानी ही पिये - खाय बर सबले पहिली होना चाही ।  हम सबो जॉनथन की नशा पानी के जिनिस मन हर , कतका भारी नुकसान करथे । तभो ले हमन हर उनला बउरे बर नइ छोड़न , आज ये नशा पानी के चलते ही हमर समाज मा कतकोन घर परिवार मन हर टुट जावत हे ।  तभो ले आज काल के लोगन मन नइ समझय , अउ ओमन ला अइसन कोनो बात ले घलव फरक नइ पड़य । उन मन कोनो बात ला समझबे नइ करय , अउ मैं कहिथव ता अइसन चलत दउर मा ना कभू ओमन हर समझय ....... : -  *मैं तो बस अतके कहिथव ....................* 
                 *छोड़व दारू के नशा , नाश करै परिवार ।*
                *कतको झन जी रोय हे , बात हवय ये सार ।*
                *बात हवय ये , सार दारू ला , झन जी पीबे ।*
               *बात कहत हँव , मान संग मा , जिनगी जीबे ।*
            *रद्दा अइसन , धरके अब झन , घर ला तोड़व ।*
            *लावव घर मा , सुख शान्ति अब , दारू छोड़व ।।*
आज नशापान के जिनिस मन हर हमर समाज अउ घर परिवार ला भारी नुकसान पहुँचावत हावय । ये हर मनखे मन के अपन - अपन सोच समझ अउ विवेक के बात आय , की अइसन भारी नुकसानी ले भरे , नशा पानी मन हर हमर जिनगी के कतका नुकसान करथे । अउ हमन ला अइसन जिनिस मन ला बउरे ले खुद ला बचाना चाही , तभे हम अपन समाज ला साफ - सुथरा अउ स्वच्छ बना सकत हन । अउ लोगन मन ला घलव अइसन जिनिस मन ले बाच के रहे बर समझा सकत हन । आवव हम सब मिलके परन करिन , की अइसन जिनिस मन ले खुद बाचीन अउ दूसर मन ला घलव बचाके , एक ठन सुग्घर अउ स्वच्छ समाज के निर्माण करे मा अपन सहयोग प्रदान करिन ।

                  मोहन कुमार निषाद
               गाँव - लमती , भाटापारा ,
             छंद साधक सत्र कक्षा 4

*मोर गाँव पूछत हे*-हेम साहू

*मोर गाँव पूछत हे*-हेम साहू


           आज 20 बछर होंगे हमर छत्तीसगढ़ ला बने, तभो ले मोर गाँव रोवत हावय। आज आधुनिक युग मा मोर गाँव सबले पिछवागे। गाँव के जम्मो हरियाली गँवागे, जम्मो परिया अब लुकागे हावय। गाँव गली मा चिखला के संग पानी बोहावत हावय। कौन जनि का होंगे कोनो आरो नई लेवत हावय। मँय काला दोष लगाव सरकार ला या ओकर सरकारी तंत्र ला जेन कभू गाँव ला झाँके बर नई आवय या मंत्री ला जेला वोट से मतलब हावय या गाँव के सरपंच अउ पंच ला, फेर मन मा गुंथव त ये गाँव के मनखे ले बड़का दोषी अपने आप ला पाथव। मोला बढ़िया पढ़इस लिखइस अउ गाँव हा एक नवा सपना देखिस अब जरूर सुराज  गाँव मा आही, जम्मो मोर दुःख पीड़ा ला हरही। मोर गाँव पूछत हे अउ कहिथे कस बेटा ये गाँव मा नवा सुराज कब आही। कब इहाँ के लइका, सियान अउ युवा मन ला नशा ले मुक्ति हो पाही। कब मनखे मन मा भाई चारा आही अउ कब इहाँ के मनखे मन परमार्थी बन पाही। कब इहाँ नवा हरिवाली आही अउ कब गाँव हा सरग जस बन पाही। फेर मोर मेर एक्को सवाल के जवाब नई हावय, सोचत अउ गुनत बस हव। ककरो मेर सवाल के जवाब होही त मोर गाँव तक संदेसा पहुँचा देहू।

-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा