Sunday, 17 July 2022

छत्तीसगढ़ी हाना

  छत्तीसगढ़ी हाना 

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*१. धान भाई भली*

      *कुटी खाई चली*

*अर्थ- धान ले चाऊर निकाल के भोजन पकाना सरल-सुगम काम आय*


*२.  सेतुवा- मनमेतुवा*

    *कब घोली,कब घाली ?*

*कब गिलास ढाली*

*कब कंठ उतारी ?*

*अर्थ:- सेतुवा पावडर ल घोल के पीना बड़ा पीचकाट बूता आय*


*३. काड़ी नहीं मूसर*

      *तैं नहीं दूसर*

*अर्थ- एकर से नहीं, तव ओकर से काम पूरा करना |*


*३. ना पहिरे के धोती*

     *ना ओढ़े के दुसाला*

    *तव निचोवौं काला*? 


*अर्थ- बहुंत तंग हाल, करारी साधन से गुजर-बसर करना*


*४. ना पकड़े के पूछी*

    *ना ही धरे के कान*

*अर्थ:- ना गांव म घर, ना ही खार म खेत वाली बात, अर्थात सम्पत्ति विहीन, आधार हीन मनखे होना*


*५. ना उधो के लेना*

       *ना माधो के देना*

*, अर्थ:- किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं होना*


*६. गांव के जोगी जोगड़ा*

    *बाहर के सिद्ध*

*अर्थ- नजदीक या आसानि से उपलब्ध व्यक्ति या वस्तु को महत्व हीन समझना*


*७. तेली घर तेल रहिथे*

    *तव पहार ला नइ पोतैं*

*अर्थ- पर्याप्त मात्रा म कोनो चीज रहिथे,तभो ले दुरूपयोग नहीं करना चाही*


*८. गोल्लर (संढ़वा) ल हरहा कोनो नइ कहैं*

*अर्थ-समर्थवान मनखे ल कसूरवार कोनो नइ कहैं*


*९. गुड़-गोबर एक कर देना*


*अर्थ- मूल्यवान वस्तु ल मूल्यहीन बना देना*


*१०. एके पूस म जाड़ नइ जाय*

*अर्थ-बुरा वक्त सबके साथ खच्चित आथे*


*११. दूध के जरे ह मही ल फूंक-फूंक के पीथे*

*अर्थ-एक बार कोनो व्यक्ति या वस्तु  से धोखा खाए के बाद मनखे सचेत हो जाथे*


*११. छाती म कोदो दरना*

*अर्थ - कोनो मनखे ल बार-बार खरा-खोटा सुनाना*


*१२. हरही गाय कछारे जाय*

*अर्थ- एक बार चोरी या कुकर्म के आदत होय ले बार-बार कुकर्म करना*


*१३. हरहा संग कपिला के विनाश*

*अर्थ-दोषी के संगत करे ले दंडित होना*


*१४. अपन कनवा बेटा ल घलो कनवा नइ कहैं*

*अर्थ -अपन सोरा आना दोषी औलाद ल दोषहीन कहना*


*१५ लईका जांघ म मैला कर देथे, तव जांघेच ल नइ काटैं*

*अर्थ-अपन औलाद के गलती ल मांफ कर देना*


*१६. ठलहा बैठ के खाए म राजा के खजाना अउ तलाव के पानी घलो नइ पूरै*

*अर्थ-जिनगी ल सुखमय  बनाए बर रोज मेहनत करना जरूरी हवय*


*१७. ठलहा बनिया हलावै कनिहा*

*अर्थ-मेहनती मनखे ठलहा बैठ के नइ रहे सकै*


*१८. गत न गरहन बंदन के खईता*

*अर्थ - कोनो काम संहराय लाईक नहीं करना*


*१९. जांगर चलै न जंगरौटा*

     *खाए बर गेहूं के रोटा*

*अर्थ-बिना मेहनत करे माल उड़ाना*


*२०. कुकूर के पूछी टेड़गेच रहना*

*अर्थ - गलत आदत कभी भी नहीं सुधारना*


*२१. लबरा के खाय, तभे पतियाय*

*अर्थ- लबरा मनखे कभी भी वादा पूरा नइ करै*


*२२. अपन हीनता काला बताय ?*

    *चार बियाय, एक बताय*

*अर्थ-अपन बेइज्जती बात ल छुपा के रखना*


*२३. जईसन तोर बाजा बाजही*

      *वईसन मोर नाच होही*

*अर्थ-जईसन के तईसन व्यवहार करना*


*२४ मघा  के बरसे,माता के परसे*

*महतारी जैसे मया-दुलार करना*


*२५. सबके  हवय राम कहानी*

   *कोनो के बीत्ता भर, कोनो के हाथ भर*

*अर्थ - ए दुनिया म सब मनखे दुखी हवंय, कोनो के दुख कमती हवय, कोनो के दुःख ज्यादा हवय*


(दिनांक-१४.०७.२०२२)


आपके अपनेच संगवारी

*, गया प्रसाद साहू*

    "रतनपुरिहा"

*मुकाम व पोस्ट करगीरोड कोटा जिला बिलासपुर 


//हाना के सीख //*

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*१. दुश्मन ल दांव चाही,*

       *माछी चाही घाव*,

*कइसे होय गुजर-बसर*?

    *का जुगती अपनाव ?*


*२. दुश्मन ल दांव झन दे*

   *माछी झन दे घाव |*

*संयम ले गुजर-बसर*,

    *"गया" जुगती अपनाव*||


*३. बेटवा ले बहुरिया गरू*

  *दुबर गरू मोटरा*

*ऊंटवा पहार चढ़ै,*

    *बोले लागे तोतरा ||*

*४. भूखहा ल दाल-भात*

    *प्यासा ल पानी ||*

*बीमरहा ल परहेज,*

    *सरल होय जिनगानी*||


*५. पानी गए ले पार बांधे,*

    *बुजदिल का पाए ?*। *चलनी म गाय दुहे*

       *करम ल ठठाए !!*

*६.मोबाईल बिगाड़े टुरी-टुरा*

   *चाल बिगाड़े मोटर |* *चाय बिगाड़े बिहनिया बूता*

    *जात बिगाड़े होटल !!*


*७. गांजा बर चना-चबेना*,

    *भांग बर चाही घी* |

*दारू बर चखना चाही,*

   *सोच-समझ के पी*||


*८. ग्यानी बर ग्यान बुध*

   *सठ बुध लाठी* |

*सियानी बुध कम बात*,

   *लईका बुध बांटी*||


*९. रोवत लईका झन धरै*

   *झन धरै नंगरिहा के नांगर*|

*कुकर्मी मनखे के संग झन धरै*

*झन धरै पाही टांगर !!*


*१०. बिड़ी सिगरेट तम्बाकू ले,*

   *पेट भरै न पुरखा तरै !*

*गर म केंसर-पेट म अल्सर*

   *अकाल मिरतू मरै !!*


(दिनांक-१६.०७.२०२२)



संकलन करैया


*गया प्रसाद साहू*

  "रतनपुरिहा"

*मुकाम व पोस्ट करगीरोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)


🙏☝️✍️❓✍️👏

जब सावन के सुरसुरी फूटथे...

 जब सावन के सुरसुरी फूटथे...

     सावन के सुरता आते मन म उमंग के सुरसुरी फूट परथे। प्रकृति के जवानी चारों खुंट जब लहलहाथे तब मनखे के रूआं-रूआं कुलके अउ हुलसे लागथे। इही हुलसना अउ कुलकना ह हमर संस्कृति के साज बन जाथे, सिंगार बन जाथे। हमर भुइयां के मूल संस्कृति म सावन महीना के बड़ महात्तम हे। ये महीना ल शिव उपासना के महीना घलो कहे जाथे। सृष्टिक्रम प्रारंभ होए के बाद देवता मन के अरजी करे ले परमात्मा ह इही महीना के पुन्नी तिथि म अपन पूजा के प्रतीक के रूप म तेज रूप म सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड म संचरे विराट रूप के प्रतीक स्वरूप शिव लिंग के प्रादुर्भाव करे रहिसे। इही महीना के अंजोरी पाख के पंचमी तिथि म वोकर सबले प्रमुख गण, जे हमेशा वोकर गला म आसन पाथे, वो नांग देवता के घलो जमन होए हे, जेकर सेती हमन नाग पंचमी के रूप म उंकर सुरता अउ पूजा करथन।


   परमात्मा के एक रूप प्रकृति ल घलो माने जाथे, अउ प्रकृति के अद्भुत रूप, सिंगार घलो ह ए सावन म देखने-देखन भाथे। ए महीना म झड़ी-बादर, तरिया-नंदिया के घलोक अइसन रूप होथे के मनखे मन एती-वोती जवई ल छोड़ के एके तीर बइठ के पूजा उपासना के मुद्रा म आ जथें। माने हर दृष्टि ले सावन परमात्मा के उपासना खातिर उपयुक्त लागथे। बोल बम के जयकारा पूरा महीना भर सुने ल मिलथे। जेती देखौ साधक रूप के सिंगार करे कांवरिया मन अपन-अपन क्षेत्र के पवित्र नंदिया-नरवा के जल लेके अपन-अपन क्षेत्र के सिद्ध शिव स्थल म जाके वोला समर्पित करथें। अध्यात्म म परमात्मा ल पाए के तीन रस्ता बताए गे हे- ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग अउ साधना मार्ग। सावन म ये तीनों रस्ता या मार्ग एके संग देखे ले मिलथे।


    शिव के प्रमुख गण नागदेव के प्रादुर्भाव इही सावन के अंजोरी पंचमी म खुद भोलेनाथ अपन दाहिना हाथ ले करे रिहिसे। मोर साधना काल म एक ठन बिरबिट करिया शेषनांग हमेशा मोर जगा आवय अउ मोला लपेट डारय। शुरू-शुरू म अड़बड़ डर लागय। मैं वोला फुहर-फुहर के गारी देवौं, पटकिक-पटका होवौं, लड़ौं-झगरौं। धीरे-धीरे मोर अंदर के डर ह कम होए लागिस, त वोकर संग मजा लेए लागेंव। वो समय मोला बताए गिस के संपूर्ण सर्प प्रजाति के उत्पत्ति भोलेनाथ के दाहिना हाथ ले होए हे। वोकरे सेती वोहर एकर जम्मो काम म जेवनी या कहिन दांया हाथ के भूमिका निभाथे। जिहां कहूं शिव उपासना होथे, वोकर मदद खातिर सबले पहिली इही जाथे। शेषनाग के सिरिफ पांच फन होथे, इहू बात ह जाने के लाइक हे। ये पांचों फन ह भोलेनाथ के दाहिना हाथ के पांचों अंगरी के प्रतीक आय। शेषनाग के संबंध म जेन सैकड़ों-हजारों फन के कथा मिलछे वो मनगढ़ंत अउ अतिशयोक्ति आय।


    सावन पुन्नी के दिन जेन रक्षा बंधन के तिहार मनाए जाथे वोहर सिरिफ भाई-बहिनी के रक्षा के तिहार नोहय, भलुक जम्मो जीव-जगत के रक्षा परब आय। काबर ते परमात्मा इही दिन अपन पूजा के प्रतीक देके जम्मो झन के सुरक्षा अउ सुख-शांति के आशीष अउ वचन दिए रिहिन हें। इहां ये जानना जररूरी हे, के उपासना के फल हर उपासक ल मिलथे। एकर प्रक्रिया अंजोरी-अंधियारी पाख के आधार म मिलथे। अंधियारी पाख म हमर रद्दा म जेन अवरोधक तत्व होथे, वोला हटाए के बुता होथे, अउ अंजोरी पाख म फेर वो फल जेकर उपासना खातिर साधना करे जाथे वो ह मिलथे। ए सब ह एके दिन या महीना म नइ मिल जाय, जइसे-जइसे कारज होथे, वोकर मुताबिक वतका दिन तक धैर्य रखे के जरूरत होथे।


-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर 

मो/व्हा.98269 92811

छत्तीसगढ़ी हाना, अर्थ अउ वाक्य म प्रयोग

 


छत्तीसगढ़ी हाना, अर्थ अउ वाक्य म प्रयोग 



मुहावरा अउ कहावत मन कोनो भी भाखा के आत्मा होथंय. 

मुहावरा ह पूरा वाक्य नइ होय. येहा वाक्य के अंश या भाग होथे.येहा विकारी शब्द आय जेहा काल, वचन अउ पुरुष के अनुसार 

बदलत रहिथे. अउ हाना (कहावतें) के बात करन त अपन आप म पूरा वाक्य होथे -जइसे -दूबर ल दू असाड़.  काल, वचन अउ पुरुष के अनुसार येमा बदलाव नइ होय.  कहावत ल विश्व के नीति साहित्य के अंग माने गे हवय. कहावत के अर्थ कहना या कथन होथे. अंग्रेजी म येकर बर "वेलशेड" अउ संस्कृत म "सुभाषित" शब्द लागू होथे. छत्तीसगढ़ी म लोकोक्ति (कहावतें) ल हाना कहे जाथे.  छत्तीसगढ़ी भाखा ह हाना प्रधान भाखा आय. हाना ह हमर भाखा के परान तो आय येकर सुभाव अउ सिंगार घला आय. पांव पुट येकर प्रयोग होत रहिथे. छत्तीसगढ़ के गाँव मन म बात -बात म, हर वाक्य म हाना सुने बर मिल जाही. छत्तीसगढ़िया मन के कोनो वाक्य ह बिना हाना के पूरा होयेच नइ. 

   हाना के आधार कोनो न कोनो घटना होथे. हाना ह लोक अर्थात जनता के देन हरे. हाना ह परीस्थिति के अनुसार प्रयोग करे जाथे. हाना के उद्देश्य कोनो बात ल तर्क द्वारा सही ठहराना या विरोध करना होथे. येमा नीति परक बात के संगे- संग "ताना" घलो रहिथे जेला सुन के आदमी ह गुने ल लागथे. येकर ले जिनगी म सुधार होथे अउ जिनगी रुपी गाड़ी ह सही रद्दा म चले ल लागथे. 

     जमाना ह अब बदलत जावत हे. जइसे- जइसे लोग लइका मन पढ़त -लिखत जावत हे त कतको बात ल भूलत घलो जावत हे. तइहा के बात ल बइहा लेगे हाना ह सही होत जात हे. हाना म घलो यहू बात लागू होथे. अब देखे ल मिलत हे कि छत्तीसगढ़ी भाखा के 

स्वरूप ह घलो बदलत जावत हे. हाना के प्रयोग ह कम होवत जावत हे. हमन ल देखे ल मिलथे कि एक शिक्षित आदमी के तुलना म एक ग्रामीण जउन ह भले पढ़े लिखे नइ हे वोहा ठेठ छत्तीसगढ़ी म बात करके सबला प्रभावित कर लेथे. ये जगह पढ़े लिखे मनखे मुंह ताकत रहि जाथे. नवा पीढ़ी मन अपन महतारी भाखा ले 

दूर होवत जावत हे. अंग्रेजी, हिंदी अउ आने भाखा सीखना बने बात हरे. जिनगी म आगू बढ़े बर यहू जरुरी हे. पर हमन ल अपन महतारी भाखा ल नइ भूलना चाही. येला बोले म गर्व महसूस होना चाही. काबर कि जउन अपन महतारी भाखा ल भूल जाथे तेमन धीरे ले अपन संस्कृति अउ सभ्यता ल घलो भुल जाथे. 

    अब के नवा पीढ़ी मन अपन गुरतुर महतारी भाखा ल भुलावत जावत हे. अइसन स्थिति म ये मन हाना मन ल का सरेखही, का जानहीं! अइसे जनावत हे कि अवइया पढ़े- लिखे पीढ़ी ह हाना ल भुला जाही. अइसमे भूलत -बिसरत हाना मन ल सकेले -संजोय के उदिम हमर छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर ग्रुप द्वारा करे जाथे. येकर खातिर ग्रुप एडमिन गुरुदेव अरुण कुमार निगम जी के संगे-

संग ये विषय म अपन कलम चलइया बुधियार साहित्यकार मन ल गाड़ा -गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना देवत हंव. 


  हाना के प्रकार -


   हाना कई प्रकार के होथे. 


1.खेती- किसानी  अउ प्रकृति के हाना 


2.शिक्षा अउ नीति के हाना 


3.जाति ले जुड़े हाना 


4.धंघा -पानी ले जुड़े हाना 


5.नाता -रिश्ता के हाना 


6.हंसी -मजाक के हाना 


7.शरीर के अंग मन ले जुड़े हाना 


8.जगह संबंधी हाना 


9. पशु -पक्षी संबंधी हाना 



  हाना के लक्षण-


 छत्तीसगढ़ी हाना के जउन लक्षण 

देखे ल मिलथे वोमा ये प्रकार हे. 

 

1. छोटकू /लघुता 


2. सरलता 


3.लय या गीत 


4.तुक 


5.निरीक्षण अउ अनुभूति के अभिव्यंजना


6.प्रभावशाली अउ लोक रंजकता


हाना ह लोक जीवन ल समझे म सहयोग करथे. उहां के मन का सोचथे, का जिनीस ल बने कहिथे अउ काला पसंद नहीं करय.ये सब हा उहां के हाना म देख ल मिलथे.


  1 . खेती -किसानी ले जुड़े हाना 


हमर छत्तीसगढ ल धान के कटोरा कहे जाथे. खेती -किसानी इहां के रहवासी मन के जिनगानी हरे.येकर सेति इहां खेती -किसानी उपर नंगत अकन गाना अउ हाना बने हवय.त आवव हाना ल पढ़व.


1.आषाढ़ करै गांव -गौतरी,

कातिक खेलय जुआं.

पास -परोसी पूछै लागिन ,

धान कतका लुआ.


अर्थ -   जउन किसान आषाढ़ माह म गांव -गांव घूमथे अउ कातिक माह म जुआं खेलथे वोकर धान नइ हो पाय. त परोसी ह अइसन मनखे उपर व्यंग्य करके पूछथे कि " धान कतका लुआ". येमा बताय गे हवय कि किसान ल आषाढ़ अउ कातिक माह म गजब मिहनत करना चाही. 


2.अपन हाथ मा नागर धरे, 

वो हर जग मा खेती करे .


अर्थ- खेती -किसानी म खुद ल नंगत मिहनत करे ल लागथे. खेती म दूसर भरोसा रहिबे त अब्बड़ नुकसान उठाय ल पड़थे. काबर कि सही समय म बांवत नइ होय ले खेत ह परिया पड़ जाथे. 


3.तीन पईत खेती, 

दू पईत गाय. 


अर्थ -  किसान ल अपन खेत -खार डहर तीन घांव जाके सेवा करना चाही. अइसन नइ करे ले कतको प्रकार ले नुकसान उठाय ल पड़थे. वइसने गाय के दू बार सेवा -जतन करना चाही. खेती अउ गाय किसान के सहारा होथे त बने जतन करना जरुरी हे. 


4.कलजुग के लइका करै कछैरी, 

   बुढ़वा जोतै नांगर. 


अर्थ - ये हाना म व्यंग्य अउ पीरा दूनो छुपे हे. बदलत जमाना म लइका मन पढ़ -लिख के खेती-किसानी डहर एको कनक धियान नइ देय. भले वोमन दूसर के चाकरी कर लिही फेर खेती करे म हीन भावना रखथे. अइसन स्थिति म जवान लइका के ददा ह नांगर जोते बर मजबूर रहिथे. 


5.धान -पान अउ खीरा, 

ये तीनों पानी के कीरा. 


अर्थ - धान, पान अउ खीरा ह तभे होथे जब बने पानी गिरथे .पानी के कमी ले ये तीनों ह सही ढंग ले नइ हो पाय. 


6.एक घांव जब बरसे स्वाति, 

कुरमिन पहिरे सोने के पाती. 


अर्थ - ये हाना के मतलब हे कि जब स्वाति नक्षत्र म एक घांव बने पानी गिर देथे त फसल ह बने होथे. अउ जब फसल ह बने होथे त जिनगी के जिये के जरुरी जिनीस के संगे -संग माई लोगन मन के गहना -गुटा के सउंक ह घलो पूरा हो पाथे. 


7.भांठा के खेती, 

अउ चेथी के मार. 




अर्थ - कन्हार जमीन म बने फसल होथे. येकर उल्टा भांठा जमीन म खेती- किसानी करे म नंगत मिहनत करे ल पड़थे तभो ले बने फसल हाथ म नइ आ पाय. जइसे चेथी ल मार पड़ जाथे 

त अब्बड़ पीरा होथे वइसने पीरा के अनुभव भांठा जमीन म खेती करे ले होथे. 


8.बरसा पानी बहे न पावै, 

तब खेती के मजा देखावे. 

अर्थ - ये हाना म बरसात के पानी ल रोके बर संदेश दे गे हवय. जब पानी ल सहेज के रखबो त मानलो एकाध पानी नइ गिर पाही त वो बेरा म बरसात के पानी ह फसल ल पकाय के काम करही. ये हाना ले पता चलथे कि हमर छत्तीसगढ़ के किसान कत्तिक गुनिक हे. आज वाटर हारभेस्टिंग के बात चारो डहर कहे जाथे जबकि ये हाना ह तो न जाने कत्तिक पहिली ले बने हे .


9.जइसन बोही, 

तइसन लूही .


अर्थ - ये हाना म गीता के संदेश हवय. जइसन कर्म करबे तइसे फल पाबे. वइसने बात खेती -किसानी म लागू होथे. जब बने मिहनत करबे त फसल बने होही अउ कोढ़ियई करके काम करबे त 

फसल कहां ले बने होही.


  हाना के लक्षण -


१. लय या गीत वाला हाना 



१.खाय बर जरी, बताय बर बड़ी .


अर्थ - अपन हैसियत ले जादा बताना. कोनो चीज ल बढ़ा -चढ़ा के गोठियाना. 


२..जाड़ कहिथे लइका मन ल छुअंव नइ, जवान हे मोर भाई. 

डोकरा मन ल छोड़व नइ, कतको ओढ़ रजाई. 


अर्थ - लइका मन ल कम, जवान मन ल साधारण अउ सियान मन ल जादा जाड़ लागथे. जादा जाड़ ले सियान मन गुजर घलो जाथे. 


३.बिन बल के बजनी बाजे, बिन गला के गीत. 

बिना ठसा के हाँसी हँसे, तीनों गपड़वा मीत. 


अर्थ - अपन बल, बुद्धि, योग्यता ले ऊपराहा जाके काम करइया मन बर ये हाना बोले जाथे. मूरख- मूरख मन जब संगवारी बन जाथे त अइसने होथे. 


४.अरे हरना, समझ के चरना. 

एक दिन होही, तोरो मरना. 


अर्थ - ये जिनगी ह पानी के बुलबुला जइसे होथे जेहा देखते देखत फुट जाथे. जउन मनखे ये दुनिया म आहे हे वोला एक दिन इहां ले जररु जाय ल पड़ही .


५.फुटहा करम केफुटहा दोना.

पेज गंवा गे चारो कोना .


अर्थ - परेशानी म अउ ऊपराहा परेशानी आ जाथे तेकर बर ये हाना कहे गे हवय. 


६.जियत न देहौं कौरा, 

मरे उठाहौं चौरा. 


अर्थ - जियत रिहिस त दाई -ददा ल बने ढंग ले खाय बर नइ पूछिस अउ उंकर मरे के बाद मठ बना के दिखावा करत हे. 


७.तन बर नइ हे लत्ता, जाय बर कलकत्ता. 


अर्थ - अपन हैसियत ले जादा खरचा करना. 


८.ज्ञानी मारे ज्ञान ले, अंग -अंग भिन  

जाय. 

मूरख मारे लउठी ले, मूड़ -कान फूट जाय.  


अर्थ - बुधियार मनखे ह बैरी मन ल अपन बुद्धि ले मारथे. अउ धीरे ले वहू ल अपन वश म कर डालथे. येकर उल्टा मूरख आदमी ह अपन बैरी ल लउठी म मार के वोकर मूड़ -कान फोड़ डालथे.


२.तुक संबंधी हाना-


१ .काम न बूता,पहिरे बर सूता


अर्थ - काम बर ढेरियाना अउ सिंगार करे बर अघुवाना.


२.मान न बड़ई ,कहां जाबे मड़ई 


अर्थ - जिहां मान- सम्मान  नइ मिले उहां बिल्कुल नइ जाना चाही.


३.मन म आन, मुंह म आन


अर्थ -  मीठ -मीठ गोठियाना पर अंदर ले कपट भाव रखना .


४.सांच ल का आंच

अर्थ - बने मनखे ल गलत ठहराय ले वो गलत नइ हो जाय. सही आदमी ल कोनो फर्क नइ पड़य.


३.निरीक्षण अउ अनुभव संबंधी हाना-


   हाना ल बने समझ के बनाय जाथे.कोनो घटना या कोनो चीज के बने जांच -पड़ताल करके हाना सिरजाय जाथे  .


१.संझा के पानी बिहनिया के झगरा.


अर्थ - जेकर संग बैर हे वोकर ले लड़े बर  मउका खोजना.


२.दूधो जाय दुहनी जाय.


अर्थ - सरबस नुकसान पहुंचना   .


३.आंजत- आंजत कानी


अर्थ - बने दिखे के साद म नुकसान होना


४.प्रभावशीलता अउ लोक रंजकता-


 कई ठन हाना ह गजब प्रभाव डाले के संगे -संग अब्बड़ मनोरंजक होथे. 


१.अंधवा पीसे कुकुर खाय.


अर्थ - बेकार के मिहनत करना


२.दीया तरी अंधियार


अर्थ - साधन- संपन्न होय के बावजूद कमी झलकना.


५.सरलता वाला हाना-


१ .अड़हा बैइद परान घात


अर्थ - अधूरा ज्ञान वाला मनखे ले अक्सर नुकसान पहुंचथे.


२.घीव गंवागे खिचरी म


अर्थ -नुकसान के भरपाई  नइ हो पाना.


हाना के वर्गीकरण-

१. खेती अउ प्रकृति संबंधी हाना- येकर उदाहरण उपर म रख चुके हंव 



२. स्थान परक हाना


  कोनो भी शहर अउ गांव के अपन निजी पहचान होथे. उंकर गुण- दोष ल देख के हाना बन जाथे .


१.रात भर गाड़ी जोते कुकदा के कुकदा


२.बेलगांव कस  बईला धपोर दिस .


३.छुईखदान के बस्ती,जय गोपाल के सस्ती


४.संगीत के गढ़ माने खैरागढ़


 ५.मानव -मंदिर   के चाय अउ गठुला के पोहा . 


राजनांदगाँव के छुईखदान नगर म  

वैष्णव मन जादा निवास करथे. वो मन अपन सामान्य बेवहार म "राम -राम "के जगह "जै गोपाल "कहिके एक दूसरा ल आदर भाव  देथे. तेकर सेति उहां बर कहे गे हवय - "छुईखदान के बस्ती, जै गोपाल के सस्ती. 


    अइसने राजनांदगाँव के मानव मंदिर (होटल) चाय -नास्ता बर प्रसिद्ध हे त गठुला गाँव के टीकम होटल  के पोहा के गजब सोर हे. राजनांदगाँव शहर के मन घलो सिरिफ पोहा खाय बर गठुला जाथे. तेकर सेति सहज हाना बन गे हवय - "मानव मंदिर के चाय अउ गठुला के पोहा. "


६.बागनदिया रे झन जाबे मंझनिया 


अर्थ-  छत्तीसगढ़ के बूड़ती दिशा म महाराष्ट्र सीमा ले लगे बागनदी घोर जंगल डहर के गाँव हरे जिहां नदी बहिथे वोकरो नाँव बागनदी हे. पहिली ये नदी म जंगली जानवर मन मंझनिया पियास मरे त पानी पीये ल आय. तेकर सेति हाना बने हे -"बागनदिया झन जाबे मंझनिया ". इही शीर्षक ले छत्तीसगढ़ी गाना घलो जन -जन म प्रसिद्ध हे. 


७.छै आगर छै कोरी रिहिस तरिया, तेकर सेति सुरगी के सोर हे बढ़िया. 


अर्थ - कहिथे कि तइहा जमाना म सुरगी गाँव म छै आगर छै कोरी  माने 126 तरिया रिहिस. समय के संग सैकड़ो तरिया पटागे. अभनो इहां दर्जन भर ले जादा तरिया हवय. "दसमत कैना "लोक गाथा के प्रसंग घलो सुरगी ले जुड़े हवय. 


 ८.सुरंग के गाँव माने सुरगी 


अर्थ- कहिथे कि गांव म पहिली सुरंग रिहिस हे तेकर सेति सुरगी नाम पड़िस. सुरंग के संबंध ओड़ार बांध टप्पा ले जुड़े हुए बताय जाथे. जन श्रुति हे. 


३.जाति संबंधी हाना -


१.  नाऊ के कचर- कचर त गहिरा के जतर -खतर .

२.आय देवारी राऊत माते .

३.. मर -मर पोथी पढ़े तिवारी, घोंडू मसके सोहारी .

४. उजरिया बस्ती के कोसरिया ठेठवार. 

५. संहराय बहुरिया डोम के घर जाय. 

६. तेली घर तेल रहिथे त पहार नइ पोते. 

७.मातिस गोंड़ दिस कलोर, उतरिस नशा दांत निपोर. 

८. गांव बिगाड़े बम्हना, खेत बिगाड़े सोमना. 

९. जइसे दाऊ के नाचा तइसे नाऊ के नाचा. 

१०. चिट जात तेली घोरन जात कलार, कुर्मी जात मदन मोहिनी घोरमुंहा जात कलार. 

११   बाम्हन मरे गोड़ के घाव, कुकुर मड़े मुड़ के घाव. 

१२.. हाथी बर गेड़ा कोष्टिन बर खेड़हा. 


४.. पशु -पक्षी संबंधी हाना -


१ . दुधारु गाय के लात मीठ 


अर्थ- जेकर ले फायदा होथे भले वोहा करु गोठियाय या खिसियाय सुने ल पड़थे. 


२. नवा बइला के नवा सींग, चल रे बइला टींगे -टींग 


अर्थ - शुरु म कोनो काम म अब्बड़ जोश रहिथे. नवा -नेवरिया मन नंगत के काम करथे चाहे कोनो भी क्षेत्र म हो. 


३.परोसी बुती सांप नइ मरे .

अर्थ - घर म कोनो प्रकार ले विपदा आय हे तेला खुदे निपटाय ल पड़थे नइ ते अब्बड़ नुकसान उठाय ल पड़थे. 


४. कुकुर भूंके हजार, हाथी चले बाजार 

अर्थ - यदि तैंहा अपन जगह सही हस त कतको बैरी मन तोर पाछु पड़ जाय कोनो प्रकार ले नइ बिगाड़ सकय. 

५  बोकरा के जीव जाय खवइया ल अलोना. 

अर्थ - दूसर ल पीरा पहुंचा के मजा उड़ाना. 


५.  प्रकीर्ण हाना -


    ये प्रकार के हाना म ज्ञान, शिक्षा , कर्तव्य, उपदेश, उपहास, व्यंग्य, दृष्टांत, समाज अउ जातीय जीवन के कतको क्षेत्र उपर मार्मिक बात अउ चुभने वाला हाना मिलथे. 


1.  सब पाप जाय फेर मनसा पाप नइ जाय. 


अर्थ- मन म शंका हे त वोहा बड़का बीमारी हरे जउन ह नइ दूर होय. 


2.  भाजी म भगवान राजी 


अर्थ - कोनो ल कम सुविधा म मान- सम्मान देना. जइसे भगवान कृष्ण ह राजा दुर्योधन के छप्पन भोग ल नइ खाके अपन भक्त विदुर के घर भाजी संग भोजन करिस. 



       हाना के कतको भंडार पड़े हे. अवइया बेरा म अउ गोठ- बात

करबो. 


संदर्भ - 1. सियान मन ले सुने

 हाना के आधार पर .

     2. साकेत स्मारिका 2014 ,विशेषांक - "छत्तीसगढ़ी जन जीवन म हाना के प्रभाव "

  3.आदरणीय डॉ. पीसी लाल यादव जी अउ आदरणीय कुबेर सिंह साहू जी के लेख के आधार पर .

4. छत्तीसगढ़ी का सम्पूर्ण व्याकरण -२०१९ (संपादक - आदरणीय डॉ. विनय कुमार पाठक जी अउ आदरणीय डॉ. विनोद कुमार वर्मा जी के लेख के आधार पर. 

5. सर्व शिक्षा अभियान के तहत वर्ष 2011 म प्रकाशित किताब के आधार पर.        

               ओमप्रकाश साहू" अंकुर"


               सुरगी, राजनांदगांव


          मो. ७९७४६६६८४०


व्यंग्य--गुरू गूगल दोउ खड़े

 व्यंग्य--गुरू गूगल दोउ खड़े 


गुरूर्ब्रम्हा गुरूर्विष्णु गुरूर्देवो महेश्वरः।

गुरूः साक्षात् परब्रम्ह तस्मै श्रीगुरूवे नमः।

गुरूपूर्णिमा गुरू - नमन, वंदन, पूजन के दिन हरे। असाड़ के पुन्नी ल गुरूपूर्णिमा कहिथे। ये दिन प्रकृति म गुरूतत्व ह हजार गुना क्रियाशील रहिथे, जेकर ले ओकर फल तको हजार गुना फलित होथे। इही दिन कृष्ण द्वैपायन महर्षि वेदव्यास जी ह 18 पुरान अउ उपपुराण मन के रचना करे रिहीन। पंचम वेद ‘महाभारत’ के रचना विश्व के प्रथम आशुलिपिक शिव-शिवानंदन श्रीगणेश के करकमल ले पूर्ण करे के पीछू ‘ब्रम्हसूत्र’ लेखन के श्रीगणेश करीन, तेकर सेति येला व्यासपूर्णिमा के रूप म तको मनाए जाथे। कतको व्हाटसेपिया ज्योतिषाचार्य मन व्यासजी ल तको असाड़ पूनम के दिन अवतरित कर डारे हावय। इही व्हाट्सेपिया-फेसबुकिया सखा-सहेली मन के परसादे ये दिन ल व्यासपूर्णिमा नाम देके ओकरो जनमदिन के बधई गा-गवा लेथन। व्यास जी ल आदिगुरू अउ आद्यशंकराचार्य जी ल महर्षि वेदव्यास के अवतार माने जाथे।

भारतीय संस्कृति म गुरू के जगा अबड़ ऊँच हे। गुरू के महिमा बड़ पोठ, महान अउ गरू होथे। भगवान तको इहां अवतरथे त गुरूच के शरन म जाथे। इही कारण मया, राजनीति अउ प्रबंधन के पुरोधा लीलाधारी कृष्ण ह सांदीपनी के आश्रम म तन-मन-धन ले सेवा करिस, त मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम तको गुरू वशिष्ठ के चरन-कमल के अनुरागी बनिस। कहे जाथे कि गुरू- शिष्य परम्परा ले घिसा -पिटा के ‘सिख’ शबद बने हे। गुरू-शिष्य परम्परा ह सिख समुदाय के मऊर-मुकुट हरे।

‘गु’ माने अंधकार या अज्ञान अउ ‘रू’ माने तेज, प्रकाश या ज्ञान। अर्थात गुरू ही ब्रम्ह हरे, जउन अज्ञानता के अंधियार ल मेटार के जिनगी म ज्ञान के अंजोर बगराथे।

गुरू ज्ञान के खदान, उड़ान के ऊँचान अउ भक्ति के मचान होथे। गुरू भक्ति के उचान-मचान ले ही ईश्वर के संज्ञान अउ मिलन होथे। आजकल के विद्यार्थी भले बड़े -बड़े डिग्री ले अपन परिचय-पहिचान कराथे, अर्थ के सीढ़ी चढ़ विद्या के अर्थी निकालथे, सोचिंग के पाठशाला ले निकल कोचिंग के गौशाला म झींगालाला कर लेथे, फेर पहिली कोनो भी शिष्य के पहिचान ओकर गुरू ले होवत रिहिसे। सही कहिबे त गुरू बिना मानुष जिनगी अधूरा, अबिरथा अउ गारद हे। 

एक योग्य शिष्य ल ‘कुत्त सुत्त बक्क ध्यानम्’ (श्वान निद्रा बको ध्यानम्) माने कुकुर बरोबर सुतई-उठई अउ कोकड़ा बरोबर एकथई मन ले लक्ष्य ल साधना-बेधना चाही तभे जिनगी के लक्ष्य- स्वयंवर म मछरी के आँखी छेदन -भेदन संभव हो सकथे । आज के शिष्य अतेक गुनी, ग्यानी अउ डेढ़ हुसियार हे कि अपन लक्ष्य म शेर बरोबर झपट्टा मारके काकरो भी मुँह के कौंर ल लपके-झटके म महारथ हासिल कर लेहे। कोनो- कोनो शिष्य अपन योग्यता, अनभो अउ अनुमान ले अतेक सीख डारथे कि गुरू ल तीन कोस पीछू ढकेलके अपन पाँच कोस आगू निकल जथे। गुरू गुरूता के गुर धरे, माछी झूमत गुड़ के ढेला रहि जथे अउ चेला शक्कर -मिश्री के रद्दा होवत सिंघासन बिराज नरियर के भेला झेले-पगुराए लगथे। 

गुरू के गुरूता अउ महानता के पहिचान ओकर शिष्य ले होथे तेकर सेति योग्य गुरू योग्य शिष्य के तलाश म लगे रहिथे। इही कारन गुरूजी गनित के असली गुर ल कक्षा म नइ बताके ट्यूशन म बताथे। जे दिन गुरूजी नाक ल ऊँच करके राजप्रासाद ले राजप्रसाद के रूप म श्रेष्ठ गुरूजी के प्रमाणपत्र झोंक-पा लेथे ओ दिन ले ओकर सिद्ध-शुद्ध चरू लोटा म काई रचे लगथे। ओमा के पवित्र गंगाजल ह तको ताम के लोटा म धरे अम्मट कस कसा जथे। ओकर मान-सम्मान ह जोंखी छाँड़के गुरूजी ले गरूजी होय लगथे। जे दिन वो ह गुरूता अउ श्रेष्ठता के टोंटा ल मुरसेट के अपन आप ल राजसात कर लेथे वो दिन ले अतेक हरू हो जथे कि राजपुरूष अर्जुन बरोबर श्रेष्ठ धनुर्धर ल तको गरीबहा, अधनंगा अउ बनवासी एकलव्य के अंगठा के आगू मुड़ी नवाए बर पर जथे। ये ह गुरूजी के महानता अउ गुरूता के गरूता हरे कि एकलव्य के अंगठा काटके चरणदास जइसन चोर-ढोर ल अर्जुन सही श्रेष्ठ घोषित करे म कोनो संकट आवय न संकोच। राजयोग अउ हठयोग के राम-भरत मिलाप इतिहास के स्वर्णिम पल होथे जब करन जइसन योग्य अउ गुनी मनखे ल तको मंत्रालय म अंगराज के पद पाए बर दुर्योधन जइसन कायर, कपटी अउ चालबाज राजपुरूष के सिफारिश अउ ठगयोग के आसरा लेहे बर परथे।

गुरू गोविन्द दोउ खड़े काके लागू पाय।

बलिहारी गुरू आपनो, गोविन्द दियो बताय।।

जिहां गुरू अउ गोविन्द दूनों मया ओरमाए खड़े रहिथे ओमेर गुरू के पहिली पाँव परना-पखारना भल मानना चाही काबर कि गुरूच ह ईश्वर ले परिचय कराए हे कहिथे। कोनो- कोनो अइसनोहो ब्याख्या करथे कि गुरू अउ गोविन्द दूनो खड़े रहिथे अउ कहूँ चेला के मुड़ म शंका के ढेला माढ़के विचार के डंका ठठाए लगथे कि काकर पायलगी पहिली करवं, त गोविन्द खुदे कहि देथे - इही चंडाल के पहिली पर बेटा ! काबर कि मोला तो तोर चिन्ता हावय-च, मैं ह तो कइसनो करके तोला उबारी लेहूँ। येला ‘एनी नॉट फिकर-संसो’। येला अपन गुरूता अउ गरूता के चिन्ता हे। एकर पायलगी पहिली नइ करबे त ये ह तोला कोनो मेर उदुपुहा बोज देही, नाश देही।

गुरू गूगल दोउ खड़े ..........।

चेला जब चितिया-चिथिया जथे तब ओकर चेथी म दही चटाकन चटकावत गूगल कहिथे - रिचार्ज के गुग्गुल जला, मोला पहिली मना। तेकर पीछू प्रश्न के नाँगर जोतबे रे बइला !! खखुवाए-भकुवाए चेला दऊँड़े - दऊँड़े रिचार्ज कराथे, तेकर पीछू गूगल बताथे- हे वत्स ! तोर गुरूजी के मोबाइल सेवा ल अस्थायी रूप ले बंद कर देहे गे हे। अइसे तैं जिहाँ खड़े हवस, सर्च इंजन म उही मेर तोर गुरूजी के मोबाइल नंबर बतावत हे। छू- टमरके खोज-देख ले।


जय जोहार !!

धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

Saturday, 9 July 2022

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक छत्तीसगढ़ी अनुवाद - दुर्गा प्रसाद पारकर


 

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

छत्तीसगढ़ी अनुवाद - दुर्गा प्रसाद पारकर


लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के जनम 23 जुलाई 1956 म महाराष्ट्र के तटीय नगर रतनागिरि म होए रिहिस। ओकर लालन-पालन धार्मिक परिवार म होय रिहिस। ओकर ददा (पिता) के नाम गंगाधर राव अउ दाई (माता) के नाम पार्वती बाई रिहिस। ओकर पिता जी स्कूल मास्टर रिहिस, बाद म स्कूल मन के निरीक्षक बन गे। पिता कट्टर अनुषासन प्रिय अउ गम्भीर सुभाव के मनखे रिहिस। तिलक उपर पिता के अनुषासन प्रियता के प्रभाव परिस।

    लोकमान्य तिलक के ननपन ले ही पढ़ई बर लगन रिहिस। गणित, इतिहास अउ संस्कृत म ओकर जादा रूचि रिहिस। एक घांव अपन पिता जी ल एक ठन संस्कृत नाटक कादम्बरील पढ़त देख के अपनो ह पढ़े के इच्छा जाहिर करिस। सुन के पिता जी ह आष्चर्य चकित तो रिहिसे काबर कि ओ किताब ह बड़े लड़का मन के रिहिसे तभो ले ओला मना तो नइ करिस फेर एक ठन

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गणित के कठिन सवाल हल करे के बाद ओला किताब दे बर शर्त रखिस। गणित के प्रष्न ह बाल गंगाधर के उमर के लइका मन बर बिक्कट कठिन रिहिस तभो ले तिलक ह ओकर चुनौती ल स्वीकार करके ओला हल कर दिस। 

तिलक जब दस बच्छर के रिहिस तभे ओकर महतारी (माता) के इंतकाल हो गे। सोला साल के उमर म तिलक के बिहाव घर तीर के (पड़ोसी) तापीसत्यभामा बाई नाम के नोनी संग होइस। बिहाव म दहेज के रूप म तिलक ह पढ़े बर किताब लेना स्वीकार करिस।

तिलक ल वाद-विवाद बहुत पसन्द रिहिस। एमा ओला बोले के क्षमता ल बढ़ाय बर सफलता मिलिस। जउन ओकर बाद के जीवन म बहुत काम अइस।

तिलक ह छात्र के रूप म कालेज म पाँच बच्छर बितइस। गणित म प्रथम श्रेणी म पास होके सन् 1877 म स्नातक के डिग्री लिस। दू बच्छर बाद कानून के डिग्री प्राप्त करिस। ओकर बाद अपन संगवारी (मित्र) आगरकर के संग वकालत सुरू कर दिस।

मनखे मन म उचित षिक्षा के कमी ले तिलक बिक्कट (बहुत) दुखी रिहिस। ओहा षिक्षा ल स्वतंत्रता अउ विकास के मूल षर्त मानिस। सन् 1880 म न्यू इंग्लिष स्कूल के स्थापना करिस।

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सन् 1885 म डेकन एजुकेषन सोसायटी के स्थापना षिक्षा के क्षेत्र म ओकर मुख्य कदम रिहिस।

जन समुदाय ल षिक्षित अउ ज्ञानवर्धक बनाए बर तिलक ह मराठी म केसरीअउ अंग्रेेजी म मराठासमाचार पत्र निकालिस। अपन अखबार के माध्यम ले लोगन मन ल तिलक ह ब्रिटिष सरकार के नीति मन के अउ अपन राष्ट्रीयता के बारे म बतइस। ओकर जोरदार लेख मन ह समाचार पत्र ल बिक्कट लोकप्रिय बना दिस अउ स्वतंत्रता के जरूरत बर जन समुदाय के आँखी ल उघार (खोल) दिस। ओकर राष्ट्र के लक्ष्य अउ आदर्ष मन के बारे म लेखन अउ बिचार ह सबके धियान ल अपन डाहर तिरिस। बाल गंगाधर तिलक सबके इज्जत के पात्र लोक मान्यबन गे।

    समाज म लइका बिहाव (बाल विवाह) जइसे कुरीति मन ले छूटकारा देवाना अउ नवा समाज गढ़े बर माईलोगन मन म षिक्षा अउ विधवा बिहाव ह अनिवार्य हे कहिके ओकर समर्थन करिस। स्वदेषी के भावना ल बढ़ाये बर अउ समाज म सुधार लाए खातिर तिलक ह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलावा पुणे सार्वजनिक सभा अउ दूसर संस्था मन म सक्रिय भूमिका निभइस। तिलक जन समुदाय म चेतना जगाए खातिर किरिया

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खाए रिहिसे। ओकर इच्छा अइसे रिहिसे कि कोनो ओला एती ले ओती नइ कर सकय।

सन् 1907 म कांग्रेस के सूरत अधिवेषन म तिलक ह दहाड़िस स्वराज मोर जन्म सिद्ध अधिकार आय ओला मँय लेके ही रहूं।” (“स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा”) ओकर दृढ़ इच्छा शक्ति अउ कर्तव्य के ए मूल मंत्र ह देष के, जन-जन के मूल मंत्र बन गे। भारतीय राजनीति म उठत गरेर (तूफान) ले ब्रिटिष सरकार ह तमतमा (बौखला) गे अउ बर्बर दमन कारी तरीका ले ओला दबाए बर कोनो कसर नइ छोड़िस। ओकर उपर राज द्रोह के इल्जाम लगा के मुकदमा चलइन। तिलक करोड़ो उत्पीड़ित भारतीय मन के प्रवक्ता अउ लोगन मन के स्वतंत्र होए के इच्छा के प्रतीक के रूप म कटघरा म खड़ा होइस। ओकर बाद राजद्रोह एक्ट अउ दमनकारी तरीका के घोर निंदा बिना डरे करिस। 21 घंटा ले भी जादा समय तक के भाषण ओकर अद्भूत कानूनी क्षमता के प्रदर्षन रिहिसे अउ ओकर बचाव के स्पष्टीकरण ह स्वतंत्रता बर विधान बन गे।

22 जुलाई 1908 म ओला छै बच्छर बर काला पानी के सजा सुनाए गिस। ब्रिटिष सरकार के ए निर्णय के विरोध म हड़ताल अउ हिंसात्मक घटना घलो घटिस। सड़क मन घलो सुन्ना परगे रिहिस।

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जीवन म जइसे ठहराव आ गे। छै बच्छर के सजा के बदला म छै दिन तक ले बम्बई म जीवन बिल्कुल थम गे।

    7 जून 1912 म ओकर गोसइन (पत्नी) के इंतकाल (मृत्यु) होगे जेकर खबर ओला तार के माध्यम ले मांडले म राहत-राहत मिलिस। तिलक ल चालिस बच्छर के उमर म जीवन साथी के मृत्यु ले भारी धक्का लगिस। तिलक के जिनगी म भगवत गीता के बहुत प्रभाव रिहिस। ओहा गीता रहस्यके रूप म अपन विचार मन ल सकेल के किताब के रूप दिस जउन ह ओकर गहन दर्षन ल प्रगट करथे।

    तिलक बर स्वराजमात्र एक शब्द भर नइ रिहिस बल्कि बलिदान अउ संघर्ष के माध्यम ले स्वतंत्रता बर रद्दा बनइस। अपन सबले बड़े निष्ठा के सेती ओहा भारतीय स्वतंत्रता के नेव (नींव) रखिस। एक अगस्त 1920 के दिन ओहा आखरी सांस लिस।

    स्वतंत्रता के संघर्ष के दौरान ओकर विचार अउ शब्द ह प्रेरणा देवत राहय तहान स्वराज एक सच्चाई बन गे। देष के कोन्टा-कोन्टा म लोकमान्य के बुलंद आवाज मनखे मन के हिरदे म गूंजत रही, “स्वराज मोर जन्म सिद्ध अधिकार आय अउ ओला मँय ले के ही रहूं।

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संझा के पानी बिहनिया के झगरा* *- दुर्गा प्रसाद पारकर*


*संझा के पानी बिहनिया के झगरा*

*- दुर्गा प्रसाद पारकर*


                        

तुलसी चंवरा बिना घर ह घर कस नइ लागे। काबर कि देवी-देवता के संगे संग तुलसी के पूजा बिना चोला ह भरे कस नइ लागे। सबो घर कस मोरो घर म  हे तुलसी के बिरवा। फेर ओहू माटी के  चँवरा ल बरसात के पानी ह ओला खलखल ले ओदार देथे । साल के साल देवारी माटी संग चंवरा ल घलो चिकनाए ल परथे। बच्छर पुट के पिचकाट ले बांचे खातिर सीमेंट के गारा उपर ईंटा रचवायेंव तुलसी चंवरा खातिर एक जुवरिया संझौती मिस्त्री के रेंदा ह तुलसी चंवरा ल पलस्तर का करत रिहिस बादर ह देखमरी मरगे। तभे तो पानी ह छनके बर धर लिस। गुरूमाला ह चिकनाए ल धरय त मसाला भेसक देत रिहिस। गिल्ला हो गेय रिहिस तइसे लागय। उपराहा म पानी के जीव ल बगियावत रिहिस। मने मन बिनती करंव कम से कम घंटा भर तो उबास दे महराज। झूरा जतिस ताहन दोंगरत राह। मनमाड़े सोसन भर फेर बादर जानय कहां आदर करे बर ओहा तो ओड़ा ल दे दे रिहिस मिहनत के पइसा ल पानी करे बर | पानी के सीटिर-सीटिर करई ल देख के मोर बक्का ह फूटू कस छतरागे-ए पानी ह एको कनी दम नइ धरही तइसे लागथे मिस्त्री। सुन के मिस्त्री कथे-संझा के पानी बिहनिया के झगरा ग नइ छोड़ही जल्दी तइसे महूं ल लागथे। गीर दे महराज गीर दे तोरे ले भरोसा हे।

सियान मन कथे-जे साल दू ठन जेठ परथे ओ साल दूकाल के सकल ल देखे बर परथे।कहूं कोनो फसल नइ होही त हमर कोठी तो उन्ना हो जही। जब भरे कोठी म बैरी मन के आंखी सइहारत हे त फेर उन्ना कोठी के का होही। अब कोठी भरे बर बने पानी के जरूरत हे। बने रझरीझ रझरीझ पानी दमोर दे महराज चाहे मोर सीमेंट के तुलसी चंवरा ओदर जय। डोली म बने पानी बकबकाही तभे तो बांवत, रोपा अउ बियासी ल कर पाबो। रोपा खातिर खेत ल मता पाबो। भले हमला पनकप्पड़, खुमरी अऊ मोरा फेर बिसाय बर पर जय फेर नांगर बइला के बोरत ले पानी दमोर। एसो तो कम से कम हमर मन के गोठ ल सुन ले अऊ धन धान ले भारत महतारी ल पूरा संसार भर के गउटनीन बना दे।

वर्षा रितु के सुवागत तो झीमीर झीमीर झड़ी ले होय हे। जेती देखबे तेती तता ओहो ह सुनावत हे। बनी वाले बनी म त ठेका वाले मन ठेका म कमावत हे। पानी कांजी के कमइया मन करा घड़ी कहां ले अउ मान ले काकरो करा घड़ी हे त बांधही कामे। अइसन समे म कतको मन बीच म नइ खा के चरबज्जी एकट्ठा छुट्टी पाथे। अब इन ल टेम के पता चलय कइसे के अभी चार बज गे हे। पटरी तीर वाले मन तो कोनो गाड़ी के अवई ल समे ले मिला ले रथे जइसे पसिन्जर ह चार बजे आही ताहन तो छुकछुक छुकछुक सुनते भार पाथ ल पहुंचाए बर घलो छोड़ देथे।

कतको गांव म लइका मन के पूरा छुट्टी के ठीन - ठीन , ठीन - ठीन घंटी ल चरबज्जी मान लेथे। कतको करा मिल मन के सीटी ले अंदाज मिल जाथे। ए बात ह सब बादर आये ले हरे। कोनो बियान कर दिस ताहन फेर कोनो इसारा के जरूरत नइ परय  अपने अपन आकब हो जथे। जइसे अपन छाव ह अपन पांव मिलत हे मने बारा बजे हे। लइकोरी मन के दुसरइया पियाए के बेरा होगे या बनी वाले बनिहार मन के बासी खाए के बेरा होगे।

आज जतके कीरा आवत हे ओतके दवई आथे उन ल काटे बर। सबले सजा के बात ए आय के कीरा मन कस महंगाई ह दिनो दिन बाढ़त जात हे। कीरा ह तो समे पूरे ले या दवई परे ले मर जथे फेर महंगाई ह एक घाव बाढ़गे तेहा उतरे के नाव नइ लेवय। भगवान भरोसा किसानी म त कतको तकलीफ। समे के मुताबिक पानी नइ गिरना। कतको घांव धान भता जथे। बांवत के बखत त कतको घांव बियासी ह लटलटा जथे अइसन म बन (घास फूस ) मनमाने बाढ़ जथे। अब काला बनिहार ल देबे त काला किसान पाबे।

अरे भई बनिहार तो एक घांव चैन के नींद सुत जथे फेर किसान ल कहां ले नींद आही काबर ओला सबो के चिंता रथे। चिंता ले उबरे बर हर सरकार ल चाही कि जघा जघा बांध, स्टाप डेम बांध के   किसान मन के चिंता ल दूर कर देवय | जउन दिन किसान मन के चिंता दूर हो जही ओ दिन कृषि प्रधान भारत देश विश्व के धनी देश हो जही। एकर खातिर भारत के हर सपूत ल जागरूक रेहे बर बरही 


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अपन रूचे भोजन अउ पर रुचे सिंगार* *- दुर्गा प्रसाद पारकर*


*अपन रूचे भोजन अउ पर रुचे सिंगार*

*- दुर्गा प्रसाद पारकर*

                        

कोनो भी जात के चिन्हारी उंकर रोजगार कराथे। जइसे तेली मन के तेल पेरई, कोष्टा मन के कपड़ा बुनई, धोबी मन के कपड़ा धोवई त केवट मन के कोतरी मरई अउ डोंगा चलई। देवार मन के सुरा पोसई, कतको मन के कुकरा पोसई। राऊत मन के गरुआ चरई, । कुम्हार मन के माटी के बरतन बनई, लोहार मन के लोहा पजई, सोनार मन के जेवर बनई, तमेर मन के बरतन बनई एमा के कतको मन के रोजगार ल सरकार नंगा ले हे या फेर बड़े-बड़े मोटहा रुपिया वाले मन। हां, जऊन काम ल रुपिया वाले मन नई कर सकय उहीच्च ल छोड़े हे। तहान बाचेच का हे?

तेली मन तेल निकाले बर बिसर डरे हे। अब तो घानी पूजा करे बर घलो देखे बर नइ मिलय। कहां गै तिली कहां गै सरसो अउ कहां गै मुंगफल्ली। जेकर तेल के तेल अउ उपराहा म खरी पावन। अब तो बस टेलीविजन ले विज्ञापन देखेन सौ प्रतिशत शुद्धता के अउ चलेन दुकान पइसा धर के। कोष्टा मन के मांगा ले दे के कोनो करा देखे बर मिलथे वोहू ह अब प्रदर्शनी भर के पुरतीन बांच गे हे। धोबी मन के हाल तो अउ बेहाल हे। पहिली तो हर गांव म एक ठन धोबी घठौंदा राहे। केवट मन के सिरीफ फांदा रहिगे हे काबर अब बड़े-बड़े तरिया नरवा ह तो ठेकादार मन के होगे हे। इन मन बनी भूती म मछरी ल मार के अपन मन ल मढ़वत हे।

देवार मन नाच गा के अउ सुरा पोस के अपन जिनगी ल चलावय त आजकाल उंकरो डेरा म सुरा ह दिखे बर नइ धरय कहूं इन ल सुरा ले बर सरकार ह रिन दे उहु देथे त कुटकी डिगरी बर तो घलो इंकर कर कुछ नई राहे, कुकरी कुकरा ल तो अब बारोह जात के मन पोंसे ल धर ले हे। कुकरी फारम बन गे हे। उद्योग कस चलत हे। त हमन काबर जिवका खातिर इन ल काबर नई अपना सकन? अभी भी हम जागे नइ हन।

हमर आंखी कब उघरही ते काबर दुरुग जिला के एक ठन गांव म बड़े जात के बेरोजगार लइका ह सुरा पोसई ल बेवसाय के रूप म अनपइस त ओकर समाज वाले मन ओला महासभा म जात बाहिर कर दे रिहिस। ए कहिके कि  सुरा पोसई ह हमर जात के बेवसाय नोेह कहिके । चलो मान लेथन कि उंकर समाज के धंधा नो हे त भई अउ कोनो रद्दा हे लइका मन के खातिर। जब बड़े समाज वाले मन बूट हाउस खोल सकथे त का डिगर मन जूता नइ बेंच सकय।  आज आर्थिक मंदी के दउर म हमला जीवन यापन बर रोजगार करे मा एतराज नइ हो चाही फेर ओ हा रुचे उपर बात हे। कतको केवट मन मछरी मारथे फेर मछरी नइ खावय  मोर संगवारी घर सब झिन मछरी खाथे फेर ओह नइ खावय । ए ह तो सब रुचे के बात आय । तभे तो सियान मन कहिथे अपन रुचे भोजन अउ पर रुचे सिंगार | अब पहिनावा ल ले ले। कतको मन जमे ते झन जमे कइसनो पहिर ओढ़ डरथे। ओइसे तो हम छत्तीगढ़िया मन ला पन्छा बड़ी अउ पगड़ी पहिरना चाही।

भंदई पहिरना चाही फेर सहर म दुसरा मन ल नइ रुचे | देखव तो रे भई अभी तक ले नइ सुधरे हे बिया मन। मने कि जघा के मुताबिक, पोसाक जघा के मुताबिक भासा बोलई ह हमला आगु बढ़ा सकथे।

सहर म माइलोगन मन ल रुपिया, सुता टोड़ा पहिरे बहुते कम पाबे इहां तो सोनहा चैन सोनहा नइ मिलही बेलटेक के नही ते सोना पांलिस वाले गाहना ल पहिर के झमझम ले निकलथे। तभे तो गाहना के संग रूप म घलो निखार आ जथे लाडू गोंदा अस | कतनो मन ल तो मेचिंग कलर पिहरे ले नइ आवय जइसे कारी माइलोगन ह करिया बलाउज अउ लुगरा पहिरही त चिरई जाम नइ दिखही | ओला तो संतरा कलर, किरीम कलर, सादा कपड़ा ह जादा फभही। कतको मन ल मौसम के मेचिंग गजब भाथे। जइसे चउमास म बादर कलर। बसंत ऋतु म टेसू कलर ह फबथे |अइसे करव जउन अपनो ल रुच जय अउ दूसरो ल रुच जय। तिही पाय के सियान मन कथे अपन रूचे भोजन अउ पर रूचे सिंगार |

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