Monday, 26 September 2022

सुरता" सुशील यदु* आज पुण्यतिथि मा शत शत नमन

 



*"सुरता" सुशील यदु* 

आज पुण्यतिथि मा शत शत नमन


                सहज,सरल,मृदुभाषी अउ मिलनसार व्यक्तित्व के धनी स्व. सुशील यदु के जन्म – 10 जनवरी 1965 के ब्राह्मणपारा रायपुर म होय रहिस। आपके पिता के नाम स्वर्गीय खोरबाहरा राम यदु रहिस ।  एम.ए.हिंदी साहित्य तक शिक्षा प्राप्त यदु जी मन प्राइमरी स्कूल म हेड मास्टर रहिन।  छत्तीसगढ़ राज्य बने के पहिली ही छत्तीसगढ़ी भाषा ला स्थापित करे खातिर जेमन संघर्ष करिन वोमा सुशील यदु जी के नाम अग्रिम पंक्ति में गिने जाथे। छत्तीसगढ़ी भाखा अउ साहित्य के उत्थान खातिर हर बछर छत्तीसगढ़ म बड़े-बड़े साहित्यिक आयोजन करना जेमा प्रदेश भर के 300-400  साहित्यकार मन ल सकेल के ओकर भोजन पानी के व्यवस्था करना अइसन काम केवल सुशील यदु ही कर सकत रहिन।  छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के लोकप्रिय हास्य व्यंग्य कवि के रूप म उमन जाने जात रहिन। छत्तीसगढ़ी के उत्थान बर अपन पूरा जीवन खपा दिन अउ अंतिम सांस तक छत्तीसगढ़ी भाखा ल स्थापित करे के उदिम करत रहिन। 

                 सन 1981 में जब प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के स्थापना होइस तब वो बखत कोनो सोंचे नइ रहिन होही कि आघू चल के ये संस्था छत्तीसगढ़ी भाखा ल स्थापित करे बर मील के पथरा बनही । सुशील यदु के अगुवई म ये संस्था छत्तीसगढ़ राज के 18 जिला म छत्तीसगढ़ी के विकास खातिर संकल्पित होके काम करिस अउ आज पर्यन्त उँकर 'बाना बिंधना" उठाए काम करत हवय । छत्तीसगढ़ी साहित्य परिषद रायपुर ले सैकड़ो साहित्यकार, कलाकार, संस्कृतिकर्मी अउ रंगकर्मी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ेच रहय। सन 1994 म पहिली प्रांतीय सम्मेलन के आयोजन होइस जेन आज पर्यंत जारी हे। सन 2007 म छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के रजत जयंती वर्ष मनाय गिस। यदुजी के उठाय हर कदम सराहनीय रहय । हर बछर ये संस्था के माध्यम से लगभग 8-10 सम्मान अलग-अलग क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करने वाला मन के करँय जेन आज पर्यन्त चलत हवय। अपन संस्था के माध्यम ले उमन छत्तीसगढ़ के अनेक हस्ती ल सम्मानित करिन जेमा- साहित्यकार, लोक कलाकार, पत्रकार, फिल्मी कलाकार, रंगकर्मी आदि शामिल हे। छत्तीसगढ़ के लगभग हर बड़े साहित्यकार और लोक कलाकार के सम्मान सुशील यदु जी मन संस्था के माध्यम ले करिन।

                  महिला साहित्यकार मन ला प्रतिनिधित्व देना यदु जी के खासियत रहिस ।उँकर प्रांतीय साहित्य समिति के वार्षिक आयोजन के लोकप्रियता के अंदाजा आप इही बात ले लगा सकथव कि साहित्यकार मन ला साल भर ये आयोजन के इंतजार रहय। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण खातिर  स्वर्गीय हरि ठाकुर संग जुड़के आंदोलन ल गति दे के काम यदुजी करिन। छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद छत्तीसगढ़ी भाषा ल राजभाषा बनाय बर अउ पाठ्यक्रम म शामिल करे खातिर कई बार प्रांतीय सम्मेलन के माध्यम ले आवाज ल सरकार तक पहुंचाइन। राजभाषा बने के बाद घलो उमन चुप बइठ के नइ रहिन अउ छत्तीसगढ़ी ला राजकाज के भाखा बनाय बर, छत्तीसगढ़ी ला आठवीं अनुसूची में शामिल करे बर आजीवन लड़त रहिन। 

                  छत्तीसगढ़ी म यदु जी कालजई गीत घलो लिखे हवय जेमा कुछ के ऑडियो-वीडियो भी बने हे अउ फिल्म मा भी आ चुके हे। उँकर लिखे गीत अउ हास्य व्यंग्य के कविता के छाप आज भी जनमानस में देखे जा सकत हे । रायपुर के दूधाधारी मठ उँकर कई बड़े आयोजन के साक्षी हवय। कवि सम्मेलन के मंच म- "घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचय, अल्ला-अल्ला हरे-हरे, होतेंव कहूँ कुकुर, नाम बड़े दर्शन छोटे, कौरव पांडव के परीक्षा जइसन हास्य व्यंग्य कविता ले उन खूब वाह-वाही लूटिन । 

                    सन 1993 ले 2002 तक दैनिक नवभारत म छत्तीसगढ़ी स्तंभ "लोकरंग" के लोकप्रिय लेखक रहिन । लोकरंग के माध्यम ले उमन छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार अउ लोक कलाकार मन ला आघू लाय के प्रशंसनीय कार्य करिन। 

                   सुशील यदु जी अपन संपादन म वरिष्ठ और अभावग्रस्त साहित्यकार मन के किताब के प्रकाशन करे के सराहनीय काम करिन । हेमनाथ यदु, बद्री विशाल परमानंद, रंगू प्रसाद नामदेव, लखन लाल गुप्त, उधो झकमार, हरि ठाकुर, केशव दुबे, रामप्रसाद कोसरिया जइसन ख्यातिनाम साहित्यकार मन के रचना ल पुस्तक के रूप म प्रकाशित करवाइन। अपन संपादन म छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के द्वारा  कुल 15 पुस्तकों के प्रकाशन श्री यदु जी करिन जेमा- 1. हेमनाथ यदु के व्यक्तित्व अउ कृतित्व  2. बन फुलवा   3.पिंवरी लिखे तोर भाग  4. छत्तीसगढ़ के सुराजी वीर काव्य गाथा ,5. बगरे मोती  6. हपट परे तो हर-हर गंगे  7. सतनाम के बिरवा 8. छत्तीसगढ़ी बाल नाटक 9. लोकरंग भाग -1 ,  10. लोकरंग भाग -2  11. घोलघोला बिना मंगलू नहीं नाचय, 12. ररूहा सपनाय दार-भात  13. अमृत कलश  14. माटी के मया  15. हरियर आमा घन मँउरे, 16. सुरता राखे रा सँगवारी हवय।

                 छत्तीसगढ़ी के दिवंगत साहित्यकार मन के सुरता म उमन "सुरता" कड़ी के शुरुआत करिन जेमा - सुरता हेमनाथ यदु, सुरता भगवती सेन , सुरता डॉ नरेंद्र देव वर्मा , सुरता हरि ठाकुर, सुरता कोदूराम दलित , सुरता केदार यादव,सुरता बद्री विशाल परमानंद ,गणपत साव, मोतीलाल त्रिपाठी मन ल सोरियाय के अनुकरणीय काम करिन। प्रांतीय साहित्य समिति के बैनर म बड़े-बड़े छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलनों के आयोजन घलो करिन। उँकर स्वयं के पांच कृति प्रकाशित होय हवय । वर्ष 2014 म प्रकाशित उँकर कृति हरियर आमा घन मउँरे  (सन 1982 ले 2012 तक उँकर द्वारा लिखे गीत अउ व्यंग्य कविता कुल 51 रचना के संग्रह) प्रकाशित होइस जेन खूब लोकप्रिय होइस।

                कार्यक्रम आयोजन अउ संयोजन करे के गजब के क्षमता यदु जी म देखे बर मिलिस। उँकर संग मोर लगभग 18 बछर के साथ रहिस उन खुले दिल के व्यक्ति रहिन । बातचीत के दौरान  कभू कभू उमन कहि दय कह -*अब आघू के काम तुम युवा मन ला ही करना हवय अपन अपन कमान ल संभाल लव*  तब हमन कहन कि  आपके रहत ले का चिंता है भैया ? फेर हमन उनका इशारा नइ समझ पायेन । मैं कभू नइ सोंचे रहेंव कि अतका जल्दी हम सब ल छोड़ के उँमन चल देही। उँकर अगुवाई म छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के अंतिम सम्मेलन 14 और 15 जनवरी 2017 के तिल्दा म होय रहिस। कई साहित्यकार मन आज भी इही बात ल बार-बार कहिथे कि उनला नइ मालूम रहिस कि ये सम्मेलन हा उँकर जीवन के आखिरी प्रांतीय सम्मेलन होही ओकर बाद यदु जी से कभू मुलाकात नइ हो पाही।  

                   यदुजी के पूरा जीवन संघर्षमय रहिस । अंतिम समय म कुछ दिन आईसीयू म रहिन, उँहा ले छुट्टी होके घर आ गे रहिन फेर नियति के लिखे ल कोन टार सकथे। 23-09-2017 के रात 9:30 बजे मोला खबर मिलिस कि यदु जी नइ रहिन । कुछ देर तो मोर हाथ-पांव सुन्न होगे। अइसन व्यक्तित्व के सुरता आज भी रहि रहि के आथे अउ आँखी ले आँसू  बरसे लगथे। 

                  सुशील यदु के नाम लोक साहित्य, लोक कला अउ लोक संस्कृति के पर्याय बनगे रहिस । उँकर जाय ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के एक अध्याय समाप्त होगे । भाषा के उत्थान बर जूझने वाला, लड़ने वाला अउ दिन रात एक करइया व्यक्तित्व नइ रहिन। छत्तीसगढ़ी ल स्थापित करे के दौर म उँकर चले जाना छत्तीसगढ़ी साहित्य  बर अपूर्णीय क्षति हे जेकर भरपाई नहीं हो सकय।

                 

               *अजय अमृतांशु *

                     भाटापारा

गुंथौ हो मालिन माई बर फूल-गजरा...


 

गुंथौ हो मालिन माई बर फूल-गजरा...

    चम्मास के गहिर बरसा के थोर सुरताए के पाछू जब हरियर धनहा म नवा-नेवरनीन कस ठाढ़े धान के गरभ ले नान-नान सोनहा फूली कस अन्नपुरना के लरी किसान के उमंग संग झूमे लागथे, तब जगत जननी के परब नवरात के रूप म घर-घर, पारा-पारा, बस्ती-बस्ती जगमग जोत संग जगमगाए लागथे।


    नवरात माने शक्ति के उपासना पर्व। शक्ति जे भक्ति ले मिलथे। छत्तीसगढ़ आदि काल ले भक्ति के माध्यम ले शक्ति के उपासना करत चले आवत हे। काबर के ये भुइयां के संस्कृति ह बूढ़ादेव के रूप म शिव अउ शिव-परिवार के संस्कृति आय जेमा माता (शक्ति) के महत्वपूर्ण स्थान हे। वइसे तो नवरात मनाए के संबंध म अबड़ अकन कथा आने-आने ग्रंथ के माध्यम ले प्रचलित हे। फेर इहां के जेन लोक मान्यता हे, वोकर मुताबिक एला भगवान भोलेनाथ के पत्नी सती अउ पारबती के जन्मोत्सव के रूप म मनाए जाथे।


     दुनिया म जतका भी देवी-देवता हें उंकर जयंती के पर्व ल साल भर म एके पइत मनाए जाथे, फेर नवरात्र एकमात्र अइसन पर्व आय जेला बछर भर म दू पइत मनाए जाथे। काबर ते माता (शक्ति) के अवतरण दू अलग-अलग पइत दू अलग-अलग नांव अउ रूप ले होए हे। पहिली पइत उन सती के रूप में दक्षराज के घर आए रिहीन हें। फेर अपन पिता दक्षराज के द्वारा आयोजित महायज्ञ म भोलेनाथ ल नइ बलवा के वोकर अपमान करे गीस त सती ह उही यज्ञ के कुंड म कूद के आत्मदाह कर लिए रिहीसे।


    ए घटना के बाद भोलेनाथ वैराग्य के अवस्था म आके एकांतवास के जीवन जीए बर लगगे रिहीसे। फेर बाद म राक्षस तारकासुर के उत्पात ले मुक्ति खातिर देवता मन वोकर संहार खातिर शिवपुत्र के जरूरत महसूस करीन। तब शिवजी ल माता पारवती, जेन हिमालय राज के घर जनम ले डारे रिहीन हे तेकर संग बिहाव करे के अरजी करीन। पारवती ह माता सती जेन शिवजी के पहिली पत्नी रिहीसे वोकरे पुनरजनम (दुसरइया जनम) आय। एकरे सेती हमर इहाँ माता (शक्ति) के साल म दू पइत जन्मोत्सव के पर्व ल नवरात के रूप म मनाए जाथे। संस्कृति के जानकार मनके कहना हे के सती के जनम ह चइत महीना के अंजोरी पाख के नवमी तिथि म होए रिहिसे अउ पारवती के जनम ह कुंवार महीना के अंजोरी पाख के नवमी तिथि म।


    हमर छत्तीसगढ़ म नवरात म जंवारा बोए के रिवाज हे। लोगन अपन-अपन मनोकामना खातिर बदे बदना के सेती जंवांरा बोथें, जेमा पूरा परिवार ल बर-बिहाव सरीख नेवता देथें। जंवारा बोवइ ह चइत महीना के नवरात म जादा होथे। कुंवार म शक्ति के उपासना के रूप म आजकल दुर्गा प्रतिमा स्थापित करे के चलन ह अभी बने बाढ़त हवय। इहू बखत माता दुर्गा के फुलवारी के रूप म जोत-जंवारा बोये जाथे। अइसने इहाँ जतका भी सिद्ध शक्ति पीठ हें उहू मनमा जोत-जंवारा जगाए जाथे।


    नवरात के एकम ले लेके नवमी तक पूरा वातावरण म शक्ति उपासना के धूम रहिथे। हर देवी मंदिर, दुर्गा प्रतिमा स्थल अउ जंवारा बोए घर म जस गीत गूंजत रहिथे। जब सेउक मन गाथें-


माई बर फूल गजरा,

गुंथौं हो मालिन माई बर फूल गजरा।

चंपा फूल के गजरा, चमेली फूल के हार।

मोंगरा फूल के माथ मटुकिया, सोला ओ सिंगार।


त पूरा वातावरण म शक्ति के संचार हो जाथे। कतकों झन ल देवी घलोक चढ़ जाथे। फेर सोंटा, बोड़बोरा अउ बाना-सांग के दौर चलथे। जेकर जइसन शक्ति वोकर वइसन भक्ति। सरलग नौ दिन ले सेवा करे बाद दसमीं तिथि म माता जी के प्रतिमा के संगे-संग जंवारा के घलोक विसरजन कर दिए जाथे।


    हमर छत्तीसगढ़ म ए दिन मितानी बदे के घलोक परंपरा हे। कतकों संगी-जउंरिहा मन जेकर मन के  मया बाढ़ जथे, वो मन ए दिन जंवारा (मितान) घलोक बद लेथें।


-सुशील भोले 

संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)

मो/व्हा. 9826992811

Saturday, 17 September 2022

पुरखा पुरोधा साहित्यकार डॉ . निरुपमा शर्मा








पुरखा पुरोधा साहित्यकार 

       डॉ . निरुपमा शर्मा 

              छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति ल अपन साहित्य मं सबले ऊंच आसन देवइया , प्रथम मंचीय कवयित्री डॉ निरुपमा शर्मा  के पहिचान बनिस ऊंकर कविता अउ गीत मन ,त सबले पहिली प्रकाशित कविता संग्रह " पतरेंगी " पाठक के हाथ लगिस । कोनो महिला के कलम से पुरुष सुंदरता के वर्णन ओहू तइहा दिन मं भारी अचंभो के बात आय फेर उन करिन । कालिदास , सेनापति , पदमाकर के परम्परा ल छत्तीसगढ़ी मं आघू बढ़ाइस " ऋतु वर्णन " कविता संग्रह हर  ..। दूनों काव्यसंग्रह के अधिकांश रचना लय , तुक , गेयता के गुण से भरे हुए हे । " हमर चिन्हारी " छत्तीसगढ़ के संस्कृति के शंखनाद आय । 

    गीत विधा हर जल्दी अउ जादा मनसे के मन मं जघा बना लेथे एकरो फायदा निरुपमा शर्मा ल मिलिस त सोना मं सोहागा बनिस कविसम्मेलन के मंचीय प्रस्तुति मन । आकाशवाणी घलाय उंकर लोकप्रियता ल बढ़ावा दिहिस । 

   छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति , लोक गीत , लोकनृत्य के संगे संग छत्तीसगढ़ के नामकरण , इतिहास , पुरातात्विक महत्व असन विषय वस्तु मन उंकर कलम ल गद्य विधा डहर ले चलिन त सन् 2009 मं " इंद्र धनुषी छत्तीसगढ़ " किताब लिखिन । ये किताब मं लोक के वैश्विक प्रतिमान मन के मूल्यांकन घलाय मिलथे । हमर खान पान , रहन सहन , तीज तिहार के वर्णन संग छत्तीसगढ़िया मनसे के उज्जर मन के परिचय घलाय तो मिलथे । 

  " चिंतन के बिंदु " अउ" दत्तात्रेय के चौबीस गुरु " के बाद " मूल्यजनक पुराख्यान " लइका सियान सबो झन बर सहज जीवन दर्शन के सारतत्व समझाने वाला किताब आय । शोध ग्रन्थ के " ददरिया की सांस्कृतिक पृष्टभूमि "  पाठक मन बर अनमोल रचना आय काबर के जेन ददरिया ल तइहा दिन मं खेत खार छोड़ के गली , मोहल्ला मं गाए के मनाही रहिस अतके नहीं ददरिया ल प्रेम प्रसंग के सवाल जवाब शैली के रचना माने जावत रहिस ओमा समसामयिक प्रसंग के अवधारित अंश मन भी जघा मिलिस " झंडा तिरंगा लगे हे दिल्ली , रजधानी ये हमर सहर दिल्ली । " 

 ददरिया मं लोकमानस के सहज अभिव्यक्ति , प्रकृति के पंचरंगा सिंगार , लयात्मकता , मुक्तक काव्य शैली मिलथे....डॉ. निरुपमा शर्मा के अनमोल देन ये किताब मं मिलथे । 

     सन् 2018 मं दुर्ग मं " डॉ . निरुपमा शर्मा समग्र " समारोह के एक दिवसीय आयोजन होए रहिस , संयोजक  सरला शर्मा रहिस । एकर दूसर विशेषता बिहनिया दस बजे ले सांझ के 5 बजे तक चलिस ए कार्यक्रम सिर्फ गद्य / वक्तव्य प्रधान रहिस । 

अभी उनला गए साल भर नइ पुरे हे ...अभी तो मन हर समंगल तियारे नइ होए हे के अब ऊंकर संग ए जनम मं फेर कभू भेंट नइ हो सकय तभो माने बर तो परबेच करही । इही देखव न पितर पाख मं आज मैं डॉ . निरुपमा शर्मा ल आखर के अरघ देवत हंव ...। 

    सरला शर्मा


साहित्यिक तर्पण ******* " जे बतावै सार जिनगी के उही , आज जिनगी ले अघा के रेंगदिस "

 




साहित्यिक तर्पण 

******* 

      " जे बतावै सार जिनगी के उही ,

       आज जिनगी ले अघा के रेंगदिस " 

              ओहर सुरता मं हमर रहिही सदा , 

              जेहर ग़ज़ल अउ गीत गा के रेंगदिस । " 

   जनम छतीसगढ़ मं ते पाय के छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी उंकर सांस मं महकत रहय , ओइसे तो उन गुजराती भाषी रहिन फेर हिंदी के आदर , सनमान मं रत्ती भर कमी नइ रहिस अतके नहीं उर्दू अदब के जब्बर जानकार रहिन । चित्रकला अउ संगीत उंकर कलम के संगे संग चलयं । हां ..आज हमन पितर पाख मं आखर के अरघ देवत हन मुकुंद कौशल ल । 

      सबले पहिली उन लिखिन " लालटेन जलती रहे " ठीके लिखे रहिन तभे तो ए धरा धाम छोड़त तक लालटेन जलत रहिस उंकर जाए के बाद आखिरी किताब वैभव प्रकाशन रायपुर ले छप के आइस " ज़मी कपड़े बदलना चाहती है । " किताब मोर हाथ मं आइस त गुनेवं कपड़ा नहीं देंह बदले के बात कहे रहिन मुकुंद कौशल उही .....गीता के बात ..

  " वासांसि जीर्णानि यथा विहाय , 

   नवानि गृह्णाति नरोपराणि , 

  तथा  शरीराणि विहाय नन्या 

 नवानि गृह्णाति नवानि देही । " 

        बहुत दिन ले उंकर शरीर दुख देवत रहिस तभो चलत फिरत , लिखत पढ़त रहिन बल्कि पहिली ले बने हो गए रहिन ....भारी खिलंदड़ा सुभाव रहिस , कतको बीमार रहयं भेंट कर जवइया मन संग हांस के बोलतिन अतके नहीं साहित्य चर्चा करत दुख तकलीफ ल खुदे भुला जावंय , अवइया घलाय ल भुलवार देवयं ..। 

    छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ल परवान चढ़ाए के काम जनम भर करिन ...ग़ज़ल मं छोटे बहर होवय चाहे बड़े देश राज , समाज , संस्कृति , राजनीति , सामयिक घटना प्रसंग मन के चर्चा जरूर करयं ...जबकि ग़ज़ल हर मूल रूप से प्रेम परक रचना आय । 

बानगी देखव न  " मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा " , " बिन पनही के पांव " ....

" रहिजा पहिली जम्मो चूल्हा मं आगी सुलगावन दे , 

  मनखे मनखे के चेहरा मां हांसी ला  बगरावन दे । " 

      सबके भूख पियास , हांसी खुशी के सरेखा करइया कवि मुकुंद कौशल ...। फरेबी मन के चिन्हारी करवाथे त साहित्यकार के जिम्मेदारी के सुरता भी तो करवावत चलथें , अइसने मनसे अपन कलम ल हथियार बना के समाज के विसंगति मन से लड़े बर आघू आथे त गोहार पार के लोगन ल जगावत चलथे ...

  " संगी संगवारी हो हमला ,जुरमिल आघू बढ़ना हे , 

   कहिथे ते बात सियनहा के , पतियाना घलव जरूरी है । " 

         जीवन दर्शन छोटे बहर मं जगर मगर करत दिखथे .....ग़ज़लकार के कलम के रवानी देखे लाइक हे ..

   " कर पारे गलती तेकर बर 

   थोरिक तो पछता ले बाबू । " 

          आगू आगू जीवन हे 

           पाछू पाछू काल हवै । " 

" जे दिन आही , तोर बुलउवा , 

  माढ़े रहिही , जंतर मंतर .। " 

          उन तो छांव मं जुड़ावत जिये के सपना न देखिन न हमला  देखाइन ...जांगर टोर कमाये के उदिम सीखोइन ..तभे तो धान के कटोरा भरही किताब लिखे हें " घाम हमर संगवारी ।" गीत घलाय तो सुनावत हे जी ....

 " धर ले रे कुदारी गा किसान , 

  डिपरा ल खन के खचंवा पाट देबो ना ।। " 

        मुकुंद कौशल के रचना संसार मं किसिम किसिम के फूल महंमहावत हे उन लिखे हें " हमारी भाषा हमारी अस्मिता है , पहचान है , स्वाभिमान है । भारत जैसे बहु भाषी देश में हम किसी अंचल विशेष की भाषा , साहित्य , संस्कृति की चर्चा करके समग्र भारत का मूल्यांकन नहीं कर सकते । भाषाई औदार्य जनचेतना के विकास का प्रथम सोपान है । " 

         अपन अंतिम  ग़ज़ल संग्रह के विस्तृत भूमिका मं  अपन जन्म से लेकर जेन साहित्यिक , सांस्कृतिक संस्था मन से जुड़े रहिन , जेन मन से जौन भी सीखिन सबो के उल्लेख करे हें ...। भूमिका पढ़ के समझेंव के हिंदी ,उर्दू , छत्तीसगढ़ी , गुजराती के समकालीन लिखइया मन के नांव सहित कृतज्ञता जताए हें ...आज गुनत हंव उनला अपन जाए के दिन लकठिया गए के आभास हो गए रहिस का ? आप मन ए किताब के भूमिका ल पढ़िहव तभे पतियाहव । उर्दू सबो झन नइ पढ़ पांवय तेकरे बर उन ए किताब ल उन देवनागरी लिपि  मं लिखे हें । उंकरे शब्द मं उनला सुरता करत हंव ....

   " हिरदे के चौंरा मां सुरता के दीया ला बारत हे , 

     मन के गहिरा , बांह पसारे , कब ले दोहा पारत हे । " 

         मुकुंद कौशल ..बड़े भाई कहत रहेंव ..त मुंह भर असीस पावत रहेंव । जानत , चिन्हत तो पचास साल पहिली ले रहेंव काबर के उन जांजगीर के कवि सम्मेलन मं जावत रहिन कभू विमल पाठक जी त कभू आंनदी सहाय शुक्ल त कभू मुस्तफ़ा हुसैन संग ..स्टेट बैंक परिसर के गणेश चतुर्थी कवि सम्मेलन के सुरता कभू भुलाए नइ सकवं । भिलाई के घर मं भैया संग भेंट करे आइन त कहे रहिन " कलम उठाओ सरला ! कुछ लिखना शुरु करो , शील जी की उत्तराधिकारी हो तुम । " तब तो नइ लिखे पाएवं फेर सन् 2003 / 04 मं मोर पहिली किताब " वनमाला " के विमोचन मं आइन त बहुत असीसिन उनला सदा दिन मोर से शिकायत रहिस के मैं कविता लिखे बर छोड़ काबर देहेंव उंकर शिकायत ल दुरिहाये बर ही उंकर एक ठन ग़ज़ल संग्रह के भूमिका लिखे के दुस्साहस करे हंव ...जानत हंव उंकर असन वरिष्ठ ग़ज़लगो के बारे मं लिखना सुरुज ल दीया देखाना आय । 

 कमी बेशी हर आदमी मं होथे दूसर बात सबो लिखइया ,साहित्य के सबो विधा मं नइ लिखे सकय । 

  का लिखवं , कतका लिखवं फेर आज तो पानी पितर के दिन ए ...त उन तो ...

    "  जे मया करही उही पाही मया ,

       बात अतका भर बता के रेंगदिस । " 

सरला शर्मा 

   दुर्ग

साहित्यिक तर्पण ****** पंडित दानेश्वर शर्मा

 






साहित्यिक तर्पण 

 ****** 

      पंडित दानेश्वर शर्मा 

   "आएगी रात मुंह में सियाही मले हुए , 

   रख देगा दिन भी हाथ में कागज़ फटा हुआ " 

          फेर वो फ़टे हुए कागज़ मं सन् 1955 ले कविता लिखावत गिस ...लिखत चलिन संगे संग कवि सम्मेलन में मं सस्वर काव्य पाठ घलाय तो करत रहिन त ओ समय मं छत्तीसगढ़ के पहिली कवि रहिन दानेश्वर शर्मा जिंकर ग्रामोफोन रिकार्ड्स अउ कैसेट्स सबले बढ़िया कम्पनी जइसे हिज मास्टर्स वॉयस ( कोलकाता ) , म्यूजिक इंडिया पॉलीडोर ( मुंबई ) , सरगम रिकॉर्ड्स ( बनारस ) अउ वीनस रिकार्ड्स मुंबई  मन बनाये रहिन ...। 

लगभग चालीस साल पहिली मंजुला दास गुप्ता गाए रहिन ....

" मइके ल देखे होगे साल गा , भइया तुमने निच्चट बिसार देव , 

 बहिनी के नइये खियाल गा , कनकी कस कइसे निमार देव । " 

      बेटी कतको धन दोगानी , खेत खार वाला घर बिहाव होके जावय फेर बछर पूरे ले तीजा आथे त मइके के सुरता मं सुसक डारथे । नारी हृदय के दशा के जतका भाव भरे वर्णन करे हें दानेश्वर शर्मा ओतके करुण स्वर मं गाए हें मंजुला दास गुप्ता ...जबकि उन बंगला भाषी महिला रहिन । 

     सन् 1966 मं लिखे "बेटी के बिदा " आजो पढ़इया , सुनइया के आंखी मं आंसू भर देथे । उन सफ़ल मंचीय कवि रहिन , उंकर हांसी मिलइया , जुलइया के मन के दुख पीरा ल दुरिहाये मं भी सफ़ल रहिस । छत्तीसगढ़ी कविता के दूसर उन्मेष काल के  लोकप्रिय कवि उनला ही कहे जा सकत हे । ए बात मं दू मत नइये कि उंकर जादा छत्तीसगढ़ी रचना नइ मिलय ...तभो जतका लिखे , प्रस्तुत करे हें ओतके मं हम उनला सेरा कवि कहि सकत हन । उन मूलतः गीतकार आंय जेन गीत मन मं जीवन के उल्लास अउ विषाद दूनों के व्यंजना एकबरोबर मिलथे ।देखव न ....

    " भादों मं जइसे घटा बाढ़े रहिथे , 

    अगहन मं जइसे खेती बाढ़े  रहिथे 

    पुन्नी मं चंदा जइसे बाढ़े  रहिथे 

    ओइसे बाढ़े तोला रोजे देखेंव । " 

       बेटी के बढ़त रुप अउ उम्मर महतारी के मन मं सुख दुख दूनों भाव जगाथे , बाढ़त नोनी के रुप महतारी के मन मं सुख संग गरब गुमान बढ़ोथे त बेटी अब ससुरार चल देही ए बात गुन के दुख घलाय तो उही मन मं हिलोरा मारे लगथे । महतारी के ओंठ मुसकिया देथे त आंखी धुंधराये लगथे आंसू के चलते इही हर ए उल्लास अउ विषाद के संघरना साहित्य के अनुसार विरोधाभासी भाव के संचरण अउ लेखन । 

      कवि मनसे के मनोभाव के अद्भुत चितेरा होथे तभे तो जीवन दर्शन ओकर आत्मा के , रचना के मूल विषय हो जाथे । छत्तीसगढ़ के परब तिहार , मेला मंड़ई  इहां के रहइया , बसइया मन के उत्सवधर्मिता के रंग बिरंगी रुप तो आय । कवि एहू मं जीवनदर्शन के झलक देखथे , असार संसार के चार दिनिया राग रंग , हांसी खुशी अपन जघा ठीक हे फेर आखरी सच तो दुनिया के मेला के उजरत बेरा के बिछड़े के दुख हर आय । ए जिनगी पानी मं माढ़े  माटी के ढेला तो आय जेला एक दिन घुरना च हे , शरीर के पिंजरा मं धंधाये आत्मा कब उड़िया जाही कोनो जाने नइ पावयं । कवि दानेश्वर शर्मा कहिथें जनम अकारथ झन करव जाए के पहिली दान धरम , तिरिथ बरत कर लेव जिनगी नइये कोनो ठिकाना ....

  " कै दिन के जिनगी अउ कै दिन के मेला ,

  कै दिन खेंढ़ा भाजी कै दिन के करेला ।

कै दिन खटाही  पानी बूड़े ढेला , 

पंछी उड़ाही पिंजरा होही अकेल्ला । 

तिरिथ बरत देवता धामी मनाबो 

चल मोर जंवारा मंड़ई देखे जाबो । " 

       दानेश्वर शर्मा लोककला , लोकसंस्कृति के संरक्षण बर जनम भर सराहे लाइक उदिम करत चलिन तभे तो किताब लिखे हें " छत्तीसगढ़ के लोकगीत ( विवेचनात्मक ) सन् 1962 मं । एकरे संग सुरता आवत हे दैनिक भास्कर अउ नवभारत अखबार मं तीन साल सरलग " लोकदर्शन " स्तंभ लिखिन जेला गद्यकार मन ललित निबन्ध कहिथें । लोक जीवन अउ संस्कृति के सुग्घर दर्शन " तपत कुरु भाई तपत कुरु" सन् 2006  कविता संग्रह मं मिलथे । छत्तीसगढ़ के लोक गीत , लोक संस्कृति प्रेम उंकर संगे संग चलत रहिस तभे तो भिलाई इस्पात संयंत्र के अधिकारी बनके " लोक कला महोत्सव " आयोजन के सूत्रधार , संस्थापक बनिन अउ विश्व प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई ल भिलाई इस्पात संयंत्र से जोड़े सकिन । 

   छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष बनिन त भिलाई के स्वरूपानन्द महाविद्यालय हुडको के अंगना मं दू दिनी राजभाषा महोत्सव के कर्णधार बनिन । सन् 2006 मं छत्तीसगढ़ के सबले बड़े साहित्य सम्मान " सुंदर लाल शर्मा सम्मान " पाइन । 

     सहज , सरल मनसे संस्कृत , हिंदी , छत्तीसगढ़ी , अंग्रेजी के विद्वान अध्येता अउ श्रीमद्भागवत के बढ़िया प्रवचनकार रहिन ...।  डॉ. पालेश्वर शर्मा संग केयूर भूषण अउ दानेश्वर शर्मा ल शील जी के परछी के बाजबट मं बइठे साहित्य चर्चा करत देखे जुग पहा गे । अब तो तीनों झन ऊपर जा के भाषा के विकास बर गद्य जादा जरूरी हे के पद्य तेकर बर अपन अपन विचार ल जोरहा गला करके शील जी ल सुनावत होहीं त उनमन के सेसू भैया के पातर पातर ओंठ मं दुइज के चंदा कस हांसी झलक जावत होही । छत्तीसगढ़ के इन चारों पुरोधा साहित्यकार मन ल प्रणाम करके आखर के अरघ देवत हौं । 

   एक बात अउ गुनत हंव " हर मौसम में छंद लिखूंगा " कहइया पंडित जी ...हां हमन तो तइहा दिन ले उनला पंडित जी कहत आवत हन जिंला सबो झन पंडित दानेश्वर शर्मा कहिथें उन अभियो कुछु काहीं लिखत होहीं का ? कहे के मन होवत हे मोर लेख मं  कोनो किसिम के कमी बेशी रहि गए होही त बताहव पंडित जी ..। 

   शतशः नमन 

       सरला शर्मा 

        दुर्ग

पुरुषोत्तम अनासक्त जनम ...20 फरवरी 1935 प्रयाण ...08 फरवरी 1996

 पुरुषोत्तम अनासक्त 

   जनम ...20 फरवरी 1935 

    प्रयाण  ...08 फरवरी 1996 

            ओ समय के मध्यप्रदेश अउ आज के छत्तीसगढ़ मं नवा कविता ल जन जन के बीच स्थापित करे बर जीव परान होम देवइया साहित्यकार रहिन पुरुषोत्तम अनासक्त ...। अनासक्त जी के कविता मं मनसे के जीवन के रोजमर्रा के दुख सांसत के संगे संग अद्भुत रूप से जीवन दर्शन समाये दिखथे । कभू कभू तो लगथे के मनसे के मन के विवेचना हर कविता के आसन मं जोमिया के बइठे हे , अइसन कविता मन ल पढ़ के साधारण पाठक काव्य शिल्प , अलंकार , लय , तुक ल तो भुलाई जाथे ओइसे भी उंकर कविता  छंदविहीन हे । तभो माने ल तो परही के गांव गंवई के छोटकन बात घलाय ल बड़ महत्व मील हे ।

कविता तो लिखे च हें समय सुजोग मिलिस त गद्य भी लिखे हें तभो उन मूलतः कवि आयं । " सतह से ऊपर आदमी " कहानी संकलन आंचलिकता के कारण ही जादा प्रसिद्ध हे ...अईसे लगथे जाना पूरा छत्तीसगढ़ इन कहानी मन के बीच बगरे हे । 

   रहिस बात कविता के त नवा कविता ए त का होगे प्रकृति चित्रण तो चिटको नइ पिछुवाए हे ....

      " सूजी गोभत हे मंझनिया के घाम 

         डबरा मं तौंरत हे सुरुज 

         मेंढ़  मड़ियाए हे , 

      धरसा परे हे उतान 

   गोभत हे मंझनिया के घाम ...। " 

         बिम्ब विधान के बलिहारी त शब्द चयन अद्भुत ..." गोभत " हे ...वाह ..छेदत काबर नइये जी ? काबर के छेदे मं लहू निकलथे गोभे मं नहीं ...। 

     प्रकृति के एकदम अलग रूप ल एमेरन ...देखे , सहराये लाइक हे .....कवि अनासक्त ए त का होगे उंकर मन तो रंग गए हे ....

  " हवा मं कोन जनी 

  का बात हे ?

महमहावत हे दिन 

अउ गमकत रात हे ।

चंदैनी के मांग मं फागुन बसे 

तब चेहरा मं पाथौं मैं 

  परसा फूल । " 

            गांव के दशा दिशा ल सुधारे बर , ओकर वैभव के सुरता करत उजरे के पीरा ल कवि भुलाए नइ सकय त शहरी चाल चलन के दुष्प्रभाव ल देख के डेरावत भी रहिथे , अवइया दिन मं गांव के आरुग मया पिरीत बिला झन जाय ये डर कवि के मन मं सेंधिया गए हे तो डर कलम ले कागज मं उतर आइस .....

" गांव ल शहर के 

नज़र लगे हे , 

शहर गज़ब टोनहा हे 

शहर मोर गांव ला पांगे हे । 

 संगी मोर गांव मं शहर आ गे हे । 

 .........

 गांव के तन मां 

जहर चढ़े हे 

जब ले सांप के 

मोर गांव मं डेरा परे हे । "  

     अपन गांव गंवई के भुईंया बर तड़प , हमरे बीच पलत , बढ़त , जोंक कस लहू पियत परदेशी मन कवि ल चैन लेहे देबे नइ करय त निभुर नींद तो सपना हो गए हे । छत्तीसगढ़ी मं लोकचेतना जगावत अइसन कविता ओ समय मं लिखइया कमे झन रहिन । ये जरुर कहे जा सकत हे कि अनासक्त जी के कविता हिंदी पट्टी ले जादा प्रभावित हे तभी मने बर तो परबे करही की उंकर गद्य होय या पद्य छत्तीसगढ़ के माटी के सोंध सोंध महक , धान के बाली के गमक , मृदंग के थाप के धमक , बिरहा ददरिया के सुर पाठक के मन मोह लेथे । 

   आज पुरुषोत्तम अनासक्त ल अंजुरी भर आखर चढ़ा देवत हौं ।


सरला शर्मा

Saturday, 10 September 2022

10 सितंबर पुण्यतिथि म सुरता// मंच के मयारु कवि रहिन बिसंभर यादव 'मरहा'


 

10 सितंबर पुण्यतिथि म सुरता//

मंच के मयारु कवि रहिन बिसंभर यादव 'मरहा'

    छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत म कुछ अइसनों साहित्यकार होए हें, जिंकर चिन्हारी आरुग मंचीय रचनाकार के रूप म जादा होए हे. बिसंभर यादव 'मरहा' जी इही कड़ी के कवि रिहिन हें, जेकर बिना इहाँ के कवि सम्मेलन, रामायण अउ आने सांस्कृतिक मंच मन सुन्ना असन लागय.

    6 अप्रैल 1931 के दुरुग तीर के गाँव बघेरा म कुशल यादव अउ महतारी चैती बाई के कोरा म अवतरे बिसंभर जी संग मोर चिन्हारी सन् 1987 के दिसंबर महीना म तब होए रिहिसे, जब छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के विमोचन खातिर नेवता दे बर मैं चंदैनी गोंदा के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी घर बघेरा गे रेहेंव. जतका बेरा मैं दाऊ जी के घर पहुंचेंव वतका बेरा मरहा जी घलो उहें बइठे रिहिन हें. तब दाऊ जी ह उंकर संग मोर परिचय करवाए रिहिन हें अउ मरहा जी ल घलो 'मयारु माटी' के विमोचन के नेवता दिए खातिर कहे रिहिन हें. तब मरहा जी मोला विमोचन के नेवता झोंकत अपन एक कविता 'अस्पताल के एक्सरा' ल 'मयारु माटी' म छापे खातिर दिए रिहिन हें. 

     फेर उंकर संग जादा गोठ-बात तब होवय, जब दाऊ जी मोला कभू-कभार बघेरा म ही रात रहे खातिर कहि देवत रिहिन हें. तब मोर बेरा के पहवई ह मरहा जी संग ही जादा होवय. अइसने बेरा म मरहा जी ल जादा जाने अउ समझे के अवसर मिलय. उंकर संग दाऊ जी ऊपर बने विडियो 'यात्रा जारी है' ल घलो संगे म देखे रेहेन.

    मरहा जी मंच के जतका मयारु अउ लोकप्रिय कवि रिहिन हें, वतकेच मयारु मनखे घलो रिहिन हें. उंकर संग कतकों मंच म संग म कविता पाठ करे के अवसर मिले रिहिसे. मरहा जी एक अइसन रचनाकार रिहिन हें, जेला अपन जम्मो रचना कंठस्थ राहय. मैं वोला कभू कागज-पातर धर के रचनापाठ करत नइ देखेंव. हाँ, डायरी के नांव म एक नान्हे असन पाकेट डायरी जरूर धरे राहयं, जेमा जिहां-जिहां कार्यक्रम म संघरंय उंकर दिन, बेरा अउ आयोजक के नांव लिख के वोमा दस्तखत करवा लेवत रिहिन हें. एक-दू पइत तो महूं उंकर डायरी म लिख के दस्तखत करे रेहेंव.

    अपन 'मरहा' उपनाम धरे के बारे म उन बतावंय- एक पइत एक बड़का कार्यक्रम के माईपहुना दाऊ रामचंद्र देशमुख जी रहिन, अध्यक्षता संत कवि पवन दीवान जी करत रिहिन हें अउ संचालन श्यामलाल चतुर्वेदी जी. इही म बिसंभर जी के देंह-पांव ल देख के दाऊ रामचंद्र देशमुख जी पवन दीवान जी ल मजा लेवत असन कहिन के एकर 'मरहा' उपनाम कइसे रइही? दीवान जी के कट्ठल के हंसई तो दुनिया भर म जाने जाय, उन ए 'मरहा' शब्द ल सुनिन त अपन चिरपरिचित शैली म ठहाका लगावत हुंकारू भर दिन. तब ले बिसंभर यादव जी अपन उपनाम 'मरहा' लिखे लागिन. ए बात ल मोला मरहा जी अउ दाऊ जी दूनों झन बताए रिहिन हें.

     मरहा जी ल काव्य शिरोमणि के सम्मान ले घलो सम्मानित करे गे रिहिसे, जब बिलासपुर म 'मरहा नाईट' के आयोजन डाॅ. गिरधर शर्मा जी के माध्यम ले होए रिहिसे.  बिलासपुर के प्रसिद्ध राघवेंद्र भवन म आयोजित 'मरहा नाईट' म खचाखच भीड़ राहय, जेकर दिल ल मरहा जी अपन लाजवाब प्रस्तुति के माध्यम ले जीत ले रिहिन हें. मरहा जी के सम्मान म तब उच्च न्यायालय बिलासपुर के न्यायाधीश रमेश गर्ग जी ह कहे रिहिन हें- 'पहिली मैं संत कबीर जी के बारे म अड़बड़ सुने रेहेंव पढ़े घलो रेहेंव, फेर आज ओला मैं ह मरहा जी के रूप म साक्षात सुने हौं. इही कार्यक्रम म मरहा जी ल 'काव्य शिरोमणि' के उपाधि ले सम्मानित करे गे रिहिसे. 

    मरहा जी के दू काव्य संग्रह 'हमर अमर तिरंगा' अउ 'माटी के लाल' डाॅ. गिरधर शर्मा अध्यक्ष- छत्तीसगढ़ साहित्यकार परिषद बिलासपुर के संपादन म छपे रिहिसे. 

    बिसंभर यादव जी अपन कविता लिखे के शुरू करे के बारे म बतावंय- जब उन 14-15 बछर के रहिन, तब गाँव वाले अउ दाऊ के बीच के मनमुटाव ह बघेरा गाँव के शांति अउ सद्भाव ल बिगाड़े ले धर ले रिहिसे. तब एक दिन बाड़ा म गाँव के दस मनखे अपन-अपन विचार ल कागज म लिख के लिफाफा म भरेन अउ दे देन. दसों लिफाफा ल जब खोधिया के दाऊ जी निकालिन त वोमा मोरे लिफाफा ह उंकर हाथ म आगे. लिफाफा ल हेर के जब वोमन कागज ल पढ़िन त वोमा लिखाय राहय-

   प्रजा पालन राजा करे,

   पुत्र पालन करे माँ-बाप.

   का दूसर के कहिनी म,

   लड़त हवव सब आप.

     वो कविता ल पढ़तेच दाऊ जी के आंखी ले आंसू बोहाए लगिस. तहाँ ले कोतवाल करा हांका परवा के गुड़ी म गाँव वाले मनके बइठका सकेलिस. तहाँ ले गुटबाजी अउ मनमुटाव के जम्मो किस्सा के बिदागरी होगे. ए घटना ले बिसंभर जी सोचिस- जब चार डांड़ के कविता म गाँव के अतेक बड़े समस्या के समाधान होगे, त फेर तो अउ कविता लिखहूं, तेमा देश के बड़े-बड़े समस्या के निपटारा हो सकय.

    मरहा जी कविता पाठ करे के संगे-संग मंच के सिद्धहस्त अभिनेता घलो रिहिन. ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रस्तुति 'चंदैनी गोंदा' म जीपरहा कवि के अभिनय उंकर अविस्मरणीय भूमिका हे. अइसने लोक नाट्य 'कारी' म घलो पटइल के अभिनय म  जनमानस ल अपन प्रशंसक बना लेवत रिहिन हें. अपन जीपरहा कवि वाले अभिनय ल तो उन कतकों रामायण अउ आने सांस्कृतिक मंच मन म घलो देखा देवत रिहिन हें.

    जनता के दुख-पीरा अउ नीति-नियाव के अलख जगावत ए जनकवि ह 10 सितंबर 2011 के रतिहा 9 बजे ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लेइस. आज उंकर सुरता म उंकरेच ए चार डांड़ के सुरता आवत हे-

   मान मर्यादा नियाव ल छोड़ के,

   सब कपटिच मन सुख पावत हें.

   सत धरम म चल के सिधवा मन,

   जिनगी भर दुख पावत हें.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811