Sunday, 19 February 2023

लइका मन के सगा-पुतानी बन उँकर मन जीतही: सगा-पुतानी के गीत*


 

*लइका मन के सगा-पुतानी बन उँकर मन जीतही: सगा-पुतानी के गीत*


        ननपन ले ही मनखे गीत सुने के आदी रहिथे। गोदी म रखे लइका रोय ल धरिस तहाँ ले मनखे के गुनगुनई शुरु, भले गीत याद राहय ते झन राहय। कभू-कभू तो इही गीत ले थपकी दे सुताय के उदिम घलव करे जाथे। सुर कइसन हे माने नइ रखय। मूल रहिथे नान्हे लइका ल भुलवारना। कोनो-कोनो किस्सा-कहिनी कहिथे। 

          ननपन ले ही मनखे बनाय के उदिम आय गीत। गीत ले ही मनखे म मनखेपन के विकास होथे। मनखे के अंतस् म गीत के उद्गार होथे। मनखे अकेल्ला रहिथे त कुछु न कुछु गुनगुनाथे, इही ए बात के प्रमाण आय कि मनखे के अंतस् गीत प्रेमी होथे। गीत लइकापन म गोरस के संग लोरी बन के रग-रग म समा जथे, लइकापन ले अंतस् म गीत के नेंव रखा जथे। भाषाविद् अउ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर कहिथें - "जब तक माँ है तब तक ममता है, ममता है तब तक लोरी है, लोरी है तब तक गीत है, गीत है तब तक संवेदना है, संवेदना है तब तक मनुष्यता है।" संवेदना ले भरे गीत जिनगी के जम्मो उतार-चढ़ाव ल घलो समेटे रहिथे।

          बाल साहित्य के बुता ए लइका मन के मनोरंजन संग ओमन ल सीख देना, ए सीख संग मानवीय मूल्य ल सजोर करना प्रमुख होथे। लइका मन म जिज्ञासा, वैज्ञानिकता, जागरूकता लाय अउ साँस्कृतिक अउ राष्ट्रीय चरित्र निर्माण म बाल साहित्य के बड़ भूमिका हे। एकर ले शब्द भंडार म बढ़ोतरी घलव होथे। बालगीत ले लइका मन मोहाथें, एक सुर म खींचत चले आथें, एक जघा सकलाथें। छत्तीसगढ़ी बाल साहित्य लम्बा समय ले वाचिक रेहे हे। अब एला लिखित रूप म सहेजे अउ सिरजाय दूनो के बढ़िया उदिम होवत हे। अभी के बेरा म छत्तीसगढ़ी बाल साहित्य डाहन कतको रचनाकार मन सरलग लिखत हें। जउन म उभरत नाम हे मिनेश कुमार साहू।

      साहित्य सिरजन कभू सरल नइ रेहे हे, कहूँ बाल साहित्य के बात होगे तब तो ए अउ कठिन हो जथे। बाल रचना दिखब म बड़ सरल दिखथे। जे जतका सरल दिखथे, वो ओतका सरल रहय नहीं। बाल साहित्य सिरजन परकाया सिरजन माने जाथे, काबर कि ए सिरजन बाल मन म प्रवेश करे पाछू संभव हो पाथे। ए अलग बात आय कि जादातर लेखक ए उमर के अनभो रखथें, फेर पीढ़ी के फरक तो रहिबे करही। बालगीत /बालसाहित्य अइसे साहित्य आय जेला पढ़के लइका ल मजा आथे, जे उँकर मानसिक विकास के रद्दा खोलथे। छोटे छोटे रचना म मनोरंजन के संग बाल सुभाव, मनोविज्ञान, लोक संस्कृति ले जुड़ाव, स्वच्छता के महत्तम, प्रकृति प्रेम, पर्यावरण संरक्षण, देशभक्ति अउ आचार-व्यवहार  जइसे रकम-रकम के विषय के सिखौना बाल साहित्य म जरूरी ए। बालमन के थाह लगा उँकर नस पकड़े म मिनेश साहू जी पारंगत हें। बालसाहित्य बर जरूरी जिनिस उँकर लिखे बालगीत म दिखथे। मिनेश जी के एक खास बात ए हे कि उन मूल रूप ले गीतकार आयँ। आज इँकर लिखे सिंगार गीत सोशल मीडिया म बड़ चलत हे। 

         अभी के चरचा मिनेश जी के लिखे बालगीत ऊपर हे। जेन म विषय के विविधता हे। मनोरंजन संग वैज्ञानिकता हे। बाल सुभाव के झलक हे। सीख हे। पर्यावरण बर संसो करत संदेश हे। देशहित बर चिंतन हे। जीव जनावर बर लगाव हे।

        पुरखा रचनाकार मन के रद्दा म चलत मिनेश जी जउन गीत लिखे हें, ओमा गेयता के कोनो कमी नइ हे। छंदबद्ध भले नइ हे जउन ओकर सँघरा बालगीत लिखइया कन्हैया साहू 'अमित' के गीत मन म मिलथे। अमित जी जइसे मिनेश जी लइका मन के मनोरंजन के पूरा खियाल करत लिखथें-

          बेंदरा ममा के हवय शादी, कुरता धोती पहिरे खादी।

         भालू कका बजावै ढोल, धिन्नक धिन्नक जेखर बोल।

         एमा जिहाँ मनोरंजन हे, उहें संस्कार अउ परम्परा के आरो हे। 'खादी' गांधीजी के सुरता करावत देशभक्ति के भाव मन म भरे म सक्षम हे।

         माँ खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊँ।

        लइकापन म पढ़े ए कविता सहज सुरता आ जथे।

        जिनगी म स्वच्छता के का महत्तम हे?  सबो ल पता हे। गंदगी ले बीमारी सँचरथे। तन म दुख आथे, पइसा के बरबादी अलगे। अइसन म स्वच्छता जिनगी म सुख के आधार आय।  इही बात लिखें हे-

        राखौ बढ़िया साफ-सफाई।

        जिनगी भर सुख पाबो भाई।।

        भारतीयता के दर्शन मीनेश जी के रचना म होथे। जब उन सर्वे भवंतु सुखिनः ... के सूत्र वाक्य ल अपन शिशु गीत गणपति वंदना म जघा देवत लिखथें-

        सुखी सबो राहय, विनती हावय मोर।

        लइका मन म अइसन विचार अउ सोच पैदा करे के सुग्घर उदिम मिनेश जइसे विचारवान रचनाकार ही कर सकथे।

         घर म टँगाय टिक टिक करत घड़ी हम ल जउन संदेश देथे ओला आप लिखथव-

         घड़ी के गोठ धियान ले सुनव।

         सरलग बुता बर जी गुनव।

         बेरा हाथ म रखाय रेती सहीं होथे, जउन मुठा बाँधत खिसल जथे। जेकर बीते ले पछतावा भर हाथ लगथे। अइसन म बड़ कीमती बेरा ल बिरथा झन जावन दन, लइका मन ल ए संदेश दे म मिनेश जी अव्वल नंबर म पास हे। तभे तो संसो करत लिखथें-

        बेरा कोनो गवाँ न जावय।

       बीते बेरा फेर नइ आवय।।

बेरा (समय) के कीमत समझावत आगू लिखथें-

        बेरा हवय बड़ अमोल।

        समझव एखर  जानव मोल।।

        केरा कब खाना अउ नइ खाना चाही एकर विज्ञान सम्मत् डाँड़ देखव- 

        बवासीर अनपचक अलसर, रोग राई ल लेथे हर।

        जेन ल हवय कफ सुगर, झन खावय वो केरा फर।।

         दूसर रचना म कुनकुन पानी के फायदा के बानगी हे-

       बड़े बिहना झटकुन उठ।

       कुनकुन पानी पी घुट-घुट।

       पेट ल साफ करही भाई।

       कटही कतको रोग-राई।।

           आज जब लइका के हाथ म मोबाइल अउ रिमोट आ गे हे। लइका मन टीवी कम्प्यूटर म चिपके रहिथें। वहू ल मिनेश जी 'टीवी कार्टून' म गजब ढंग ले लिखें हें।

        कृष्णा अउ शिवा, बाल हनुमान।

        डबलू डबलू ले, लख्खा परेशान।।

          मोबाइल आज सब के जिनगी म घुसर गेहे। एकर नफा-नुकसान दूनो म सुग्घर समन्वय बिठा उन सावचेत करत सुग्घर संदेश दे हें।

         आज घलव गँवई-गाँव म साधन विहीन (जिंकर तिर खेलौना नइ रहय) लइका मन धुर्रा-माटी खेलथें, अक्ती तिहार के पहिलीच उन मन पुतरा-पुतरी के बिहाव रचथें। सगा-पहुना बनके आय-जाय के खेल खेलथें। लइकामन के इही खेल ऊपर लिखे गीत के भाव ल किताब के नाम रखे गे हे। जउन बताथें कि मिनेश जी लइकामन ले कतेक जुरे हें। 

       बालसाहित्य ल लइका के चंचल मन ल एकाग्र करे के उपक्रम के रूप म देखना सही रही। एमा साहित्य के गहिर शिल्प अउ भाव खोजई बिरथा रही। बालगीत म काव्य के जम्मो काव्य सौंदर्यं ल सँघारे ले गीत लइका के समझ नइ आही, अइसे मोर मानना हे। 

            छत्तीसगढ़ी बाल साहित्य म मिनेश जी के ए संग्रह अपन नवा छाप छोड़ही। आकर्षक कव्हर पेज के संग भीतर बने चित्र मन मनभावन हें। एमा सँघरे गीत मन लइका मन के सगा-पुतानी बन के उँकर मन जीते म जरूर सफल होही।

संग्रह के नाम - सगा-पुतानी

रचनाकार- मिनेश कुमार साहू

प्रकाशक- आशु प्रकाशन रायपुर

प्रकाशन वर्ष- 2021

पृष्ठ सं.- 75

मूल्य -150/-


पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला -बलौदाबाजार छग

6261822466

Tuesday, 14 February 2023

हमर भाँखा हमर अभिमान-

 हमर भाँखा हमर अभिमान-


             चिरई चिरगुन, कुकुर बिलई, गाय गरुवा सबे के मुख ले बोल निकलथे, जेला हमन नरियई या चिल्लई कही देथन, फेर मनखे के मुख ले निकले बोल ला भाँखा या बोली कहिथन, काबर कि मनखे मन के बोली भाँखा एक खांखा मा चलथे, कहे के मतलब एक बेर बने या बोले बात बोली सरलग वो शब्द या फेर वो बूता काम बर बउरे जाथे। चिरई चिरगुन मन का बोलथे तेखर बर तो इहिच कहिबों- "खग ही जाने खग की भाषा"। फेर गाय गरुवा चिरई चिरगुन घलो हमर थोर बहुत भाँखा ला समझथे तभे तो कुकुर बिलई गाय गरुवा ला आआ, हई आ, ले ले---- कहे मा आ जथे अउ हूत,हात, भाग --- कहे मा भगा जथे।

 हमर महतारी बोली भाँखा छत्तीसगढ़ी आय। एखर जनम कब होइस कइसे होइस तेखर बारे मा कुछु कही पाना सम्भव नइहे। बोली भाँखा ला स्थापित करे मा कतका उदिम लगे होही सोच के थरथरासी लगथे, काबर कि कोनो अंचल या क्ष्रेत्र के भाँखा बोली वो क्षेत्र के सबें रहवासी ला मान्य होथे, अउ तर्कसंगत घलो अउ ओला आन क्षेत्र जे मन घलो नइ डिगा सके। जइसे टेड़ा ल टेड़ के पानी निकाले बर पड़थे, ता वो टेड़ा होगे अउ ओखर पटिया पाटी, जे अपन काल मा मान्य रिहिस अउ आजो  मान्य या चलन मा हे। आज येला बदले नइ जा सके। गांव या अंचल के नामकरण घलो भौगोलिक, राजनीतिक, धार्मिक या अन्य कोनो परिदृश्य मा होवय, जइसे भांठा भुइयां के सेती भांठागाँव, खैर के लकड़ी के कारण खैरझिटी, डीही डोंगरी या देव धामी के कारण देवडोंगढ़, अमलीडीही, डोंगरगढ़ आदि आदि। आज भले स्थल या स्थान विशेष के नाम ल शाब्दिक अभाव या आधुनिकता  के कारण बदलत सुनथन, फेर ओखर मूल कतको बदलना उही रथे। पर वस्तु विशेष या क्रिया विशेष के नाम ला नइ बदल सकन। पंखा पंखा ही कहाही, ढेंकी ढेंकी ही कहाही, लमती, चकरी, टेड़गी तको उहीच कहाही। फेर नइ जाने तेमन ओ वस्तु के रंग रूप अनुसार कुछु आन तान बतावत गोठीयावत काम घलो चला लेथे।  कई ठन शब्द  या बोली अपभ्रंस, देशज रूप मा  घलो चलथे, पर लिखित या भाँखा के रूप मा जस के तस नइ लिखे जाय। कोनो अंचल विशेष मा सरलग बउरे जाने वाला बोली ही भाँखा के रूप लेथे। कोनो चीज जब नवा रूप मा अस्तित्व मा आथे ता ओखर नामकरण ओखर अविष्कारक मन करथे, अइसने काम बूता के नामकरण घलो होय होही। जानकार जे मन वो वस्तु या बूता काम ला आन भाँखा मा का कथे तेला जानत रिहिस होही ता उसनेच शब्द लिस होही, काबर की कई शब्द कई भाँखा मा एके रथे। अउ अनजान या येला का कथे अइसन चीज बस बर नवा शब्द गढ़ीन होही, फेर एखर बारे मा कुछु ठोसलगहा प्रमाण नइ हे। वो समय मनखे के सम्पर्क घलो सिमित राहय अउ आना जाना घलो सहज नइ रहय, ते पाय के हर अंचल के भाँखा बोली लगभग अलगे मिलथे।

             भाँखा घलो पानी कस ऊंच ले नीच कोती भागथे , कहे के मतलब सरलता कोती मुड़ जथे। दुनिया मा असंख्य भाँखा हे, सबके अपन अलग अलग अस्तिवव घलो हे। कतको भाँखा के अलगेच लिपि हे ता कतको भाँखा कई लिपि मा ही बउरावत रथे। बोली के जब तक समझइया नइ रही वो भाँखा नइ बन सके। छत्तीसगढ़ी बोली छत्तीसगढ़ भर मा बोले अउ समझे जाथे। जब भाँखा बनिस ता वो समय जेन भी चीज या जेन भी काम धाम वो अंचल विशेष मा चलत रिहिस वो सबके नामकरण होइस होही। जइसे हमर छत्तीसगढ़ मा ढेरा आँटना, मछरी धरना, मुही बाँधना, निंदई करना, धान मिंजना जइसन असंख्य काम--- । अब वो समय कम्प्यूटर, ट्रेक्टर, हार्वेस्टर नइ रिहिस ता कम्प्यूटर, ट्रेक्टर या हार्वेस्टर। चलाये बर अलग से शब्द नइ बनिस, बल्कि मशीन के नाम के अनुसार जब आइस तब अपना लेय गिस। आजो अइसने होवत हे कोनो भी नवा चीज न सिरिफ छत्तीसगढ़ी भाँखा मा बल्कि जम्मे भाँखा बोली मा जस के तस आवत हे,  येला बदले या अपभ्रंस करे के जरूरत घलो नइहे। भाँखा के बारे मा सोचबे ता एकठन अचरज घलो होथे जइसे कतको जुन्ना अउ जरूरी शब्द के नाम कतको भाँखा मा एके दिखथे, उदाहरण बर नाक, कान, दाँत ----  आदि कस कतको अकन शब्द हिंदी या अन्य बोली भाँखा मा वइसनेच मिलथे। जब भौह बर छत्तीसगढ़ी बोली मा चंडी/बटेना/टेपरा बनाइस ता कान ला कान ही काबर किहिस होही, या कान कहिस ता आन भाषी मन तको जस के तस कइसे अपनाइस होही। या हिंदी के शब्द कान ला  छत्तीसगढ़ी मा घलो कान लिस ता भौह ला चंडी काबर किहिस? खैर ये सब ला उही मन जाने।   कतको शब्द के एक ले जादा नाम तको दिखथे। एखर ले साबित होथे, भाँखा के निर्माण कोनो एक व्यक्ति या अंचल विशेष ले नइ होय हे, बल्कि जम्मे कोती के खोज खबर अउ महिनत,मान मनउवल मिले हे। इही क्रम मा सुरता आवत हे, आज कतको संगी मन धन्यवाद या धनबाद या धनेवाद कहिके छत्तीसगढ़ी शब्द बनाथे ,फेर ये उचित नइहे। काबर कि जुन्ना काल मा ये बात बात मा धन्यवाद कहे के परम्परा हमर छत्तीसगढ़ मा नइ रिहिस, बल्कि सेवा के बदला सेवा, अउ बड़े के छोटे के प्रति किये कोनो काम धाम कर्तव्य मा गिनती आवय। ददा अपन लइका बर खजानी लावय ता लइका ददा ला धन्यवाद नइ काहय, दाई रोटी खवावय तभो लइका गबर गबर खाये, धन्यवाद कहिके अभिवादन नइ करे। काबर कि वो दाई ददा के कर्तव्य अउ आदतन निःस्वार्थ बूता रहय,  जेखर करजा लइका बड़े होके चुकावै, धन्यवाद कहिके नइ बोचके। फेर आज तो लइका का दाई, ददा , भाई, बहिनी, यार दोस्त सबें एक दूसर ला धन्यवाद कहत फिरत हे। खैर छोड़व यदि कहना हे ता कहव, फेर छत्तीसगढ़ी भाँखा कहिके बिगाड़ के झन बोलव। मोर कहे के मतलब हे  हमर भाँखा प्राचीन हे जे चीज वो समय रिहिस ओखर बर प्रचलित शब्द हे, अउ नइ रिहिस तेखर बर नइहे। यदि नइहे ता वोला उही रूप मा शामिल करन अउ हवे या महिनत करके जुन्ना सगा सियान ले पूछन। आज कतको अकन प्रचलित ठेठ शब्द मन नइ बउराय के कारण उड़ावत जावत हे, जे हमर पुरखा मनके महिनत के उचित मान सम्मान नोहे।  दाई ला ओखर लइका ही दाई कही, कोनो आन नही अउ दाई के सेवा घलो लइका ल करेल लगही ,काबर की महतारी के करजा ले उऋण होना सम्भव नइहे, वइसने भाँखा घलो हमर महतारी आय अउ हम सब जम्मो छत्तीसगढिया मन ओखर लइका। अब कतका सेवा जतन, मान सम्मान करथन हमरे उपर हे। 

            आवन इही क्रम मा हमर शरीर के अंग मन के नाम ला जानन कि कोन अंग ला छत्तीसगढ़ी मा का कथे---


हिंदी ले छत्तीसगढ़ी नाम


बाल/केश-चुन्दी

सिर- मूड़

मस्तक-माथा/कपार

भौंह- चंडी/टेपरा/बटेना

पुतली-पुतरी

आँख- आँखी

पलक- बिरौनी

मुँह- मुँहु

कान के बाहरी भाग- कनपट्टी

सिर के पीछे के भाग- चेथी

गला- घेंच/ टोंटा

गाल- कपोल

होट- ओंठ

ठुड्डी- दाढ़ी

कंधा-खाँध

कोहनी- हुद्दा

कलाई-मुरुवा

बाँह-बाँही

उंगली- अँगरी

अँनूठा-अंगठा/ठेंगा

नाखून- नख

जंघा-जांग

हड्डी-हाड़ा

तर्जनी उंगली- डुड़ी अँगरी

मध्यमा- माई अँगरी

अनामिका- पैंती अँगरी

कनिष्ठ- छीनी अँगरी

पंजा- थपोल

पैर- गोड़

टखना-घुटवा

नाभि- बोड़ड़ी

तलवा-पंवरी/तरपंवरी

धमनी/शिरा- नस/रग

कमर-कनिहा

चेहरा-थोथना

ताली-थपड़ी/थपौड़ी

हाथ को कुछ चीज को उठाने के लिये आधा सर्कल में जोड़ना-पसर

मुट्ठी- मुठा

घुटना- माड़ी

आँत-पोटा

काँख-खखोरी

कलेजा-करेजा

मूँछ-मेछा


क्रमशः

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

अउ एको अंग अउ नाम के सुरता आही ता जरूर कमेंट करके बताहू

Sunday, 12 February 2023

महाशिवरात्रि पर्व विशेष समरथ कहुँ नहि दोष गोंसाईं


 महाशिवरात्रि पर्व विशेष 

                                 समरथ कहुँ नहि दोष गोंसाईं 

                     महाराज हिमालय अउ माता मैंना दुनों झन अपन बेटी गिरिजा के बिहाव बर बड़ फिकर करँय । एक दिन नारद जी उँकर दरबार म पहुँचिन । ओमन गिरिजा के हाथ ल देखके बिचारिन अउ बतइन के , जम्मो धरती म , एकर लइक वर मिल पाना असम्भव नइये , फेर थोरकुन मुश्किल जरूर हे – अगुन , अमान , मातु पितु हीना । उदासीन सब संशय छीना ॥ अउ - जोगी जटिल , काम , मन , नगन अमंगल दोष । अस स्वामी एहि कंह मिलहि , परी हस्त असि देख । अर्थात एकर भाग में गुणहीन , मानहीन , बिगन दई-ददा के , उदासीन , लापरवाह , जोगी , जटाधारी , निष्काम हिरदे , नंगरा अउ अमंगल पहनइया पति हे । पर एकर पाछू घला – समरथ कहुँ नहि दोष गोंसाईं । ये मनखे समर्थ होही , जेकर इच्छा ले चंदा – सुरूज , आगी अउ गंगा समर्थ बन जही । 

                    अब सवाल ये आय के , समर्थ कोन ? जेकर करा ताकत हे  ... या वो आय जेकर करा ...  धन दौलत माल खजाना हे । कुछ तो समर्थ उनला घला कहिथें , जेकर म कुछु दोष नइ रहय । फेर वाजिम म समर्थ वो आए , जेकर तिर दे बर कुछु दिखय निही , पर अतका देथे ... जेकर सीमा नइये । भगवान शिव ही केवल समर्थ आए , काबर उही हा अपन जीव के कुटका कुटका करके हमर देंहे म जीव के रोपण करिस , अउ हमन ला जीवन दिस । जम्मो जग म निवास करइया शिव भगवान ही अइसे देवता हरे ... जेकर अराधना उपासना .... मसानगंज तक म होथे । कुछ मानसकार मन , चंदा- सुरूज , आगी अउ गंगा ल घला समर्थ मानथे , पर असल गोठ ये आय , एमन शिव के अंग के सिवाय अउ कुछु नोहे । शिव एकर नियंत्रक अउ स्वामी घला आए । इही मन शिव म समाए हे , तेकर सेती शिव ल शंकर घला कहिथें ।

                     शिव ल समर्थ केहे के अउ कतको कारण हे । जग के जम्मो विधा अउ विद्या के ईशान अर्थात स्वामी घला शिवजी आय । उही हा पंचमहाभूत के नियंता घला आय  , जेकर अनुशासन ला दुनिया भर के चेतना ला स्वीकारे बर परथे  , प्रमाण स्वरूप ‌-   

       ईशान सर्वविधानामीश्वर: सर्वभूतानाम (वेद) 

       ईश्वर: सर्व ईशान: शंकर चंद्रशेखर: ( उपनिषद ).  

       ईश्वर:सर्वभूतानां हृदयेडर्जुन तिष्ठति ( गीता)  

                  शिव पुरान के अनुसार - ईशता सर्वभूतानां ईश्वर: स्वयँ सिद्ध अउ सर्वमान्य सच हे , अउ तुलसी के शिव – भवानी शंकर वंन्दे , श्रद्धा विश्वास रूपिणौ । याभ्यां बिना न पश्यंति , सिद्धा: स्वांत स्थामेश्व: ।

                  सागर मंथन ले निकले चौदह रत्न मे एक रत्न जहर रिहिस , जेकर ताप ले लोगन के हाल बिहाल होए लागिस । चारो मुड़ा हाहाकर मातगे । कोन एला अंगिया सकत हे , तेकर खोजाखोज मातगे । ब्रम्हाजी अउ विष्णु  भगवान हा जानय के ... शिव के अलावा काकरो म येला अंगियाये के शक्ति सामर्थ्य नइये । जम्मो झिन भगवान शिव ल सुरता करिन । शिवजी प्रकट होके गटागट लील दिस बिषम गरल ला । वेद पुरान बड़ जस गइस । तुलसी कहिथें -  

 जरत सकल सुर वृंद , विषम गरल जिन्ह पान किया ।

 तेहि न भजसि मतिमंद , को कृपालु संकर सरिस ।

अउ रहीम कहिथें – मान रहित विष पान करि , सम्भु भये जगदीश ।  

                  शिव के डमरू ले स्वर अउ व्यंजन के जन्म घला होइस । डमरू के प्रथम घात ले – अ , इ , उ , ल ,लृ , च , अउ दूसर घात ले सामवेद के सात स्वर- सा , रे , ग , म , प , ध , नि , निकलिस । 

                  राक्षस मन के गुरू शुक्राचार्य , देवता मन के गुरू वृहस्पति अउ मनखे मन के गुरू वेदव्यास आय , लेकिन ये तीनो के महागुरू शिवजी आय । 

                  राक्षस मन के बैद्य सुखेन , देवता मन के बैद्य अश्वनीकुमार अउ मनखे मन के वैद्य धनवंतरी घला इन ला महावैद्य कहिथें , अउ बिपत परे म शिव के सहारा लेथे । तभे इन ला परल्या वैद्यनाथ घला कहिथें । 

                शिव के उपासना श्रृष्टि के शुरूआत ले चलत आवत हे । गाँव गँवई म गोबर लिपइया दाई बहिनी मन के मुँहू ले लिपत लिपत शिव शिव के अवाज अभू घला सुन सकथन । कपड़ा काँचत भाई- दीदी मन के मुहू ले शिव शिव के रटंत अभू घला सुने जा सकत हे । नांगर जोतत किसान अउ बरतन मांजत दाई के ओंठ फुसुर फुसुर शिव शिव जपत गाँव – खेत – खलिहान - बखरी ब्यारा म अभू घला मिल जाथें । वाजिम म हमर जीव , शिव के सबले तिर होथे , तेकर सेती स्वाभाविक रूप ले शिव के सुरता जाने अनजाने म अपने अपन होवत रहिथें । हमर सबो के इही मानना हे कि शिव के ही अंश आय हमर जीव हा , अउ येकरे सेती जीव के नाश नई होवय , तभे ईश्वर अंश जीव अविनाशी कहिथें । अउ येकरे सेती लोगन कहिथें – जीव न पैदा होवय , न मरय , एहा प्रकट होथे , आखिर म शिव म मिल जथे । 

            शिवजी के ऊप्पर उदुप ले हपट के गिरके मरइया तक ला शिव जी हा मुक्ति प्रदान करथे । खुद शिवजी कहिथें - काशी मरत जंतु अवलोकी , करउ नाम बल जीव बिसोकी । 

            संत मन के अनुसार ... काशी हमर देंह आय  - मन मथुरा , दिल द्वारिका , काया काशी जान । दसवां द्वार देहुरा , तामें ज्योति पिछान ।

            पाप , ताप अउ आवेश ले छुटकारा पाए बर , शिव के नाम के जपन करथे लोगन –

जपहु जाई सत संकर नामा , होइहि हृदय तुरत विश्रामा !

            शिव के महिमा के बखान मानस मे – शिव सेवा पर फल सुत सोई , अविरल भगति राम पद होई । अउ –शिव पद कमल जिन्हहि रति नाही , रामहि ते सपनेहु न सुहाही ।

            वेद के अनुसार - असिति गिरि सम्स्यात कज्जलं सिंधु पात्रे । तरूवरं शाखां , लेखनी पत्र मुर्वीम । लिखित यदि गृहित्वा , शारदा सर्वकालं । तदपि तव गुणाणाम ईशं , पारं न याति ।

           शि अर्थात पाप नाशक , व माने मुक्तिदाता । जे हमर पाप के नाश करके हमन ला मुक्ति प्रदान करथे उही शिव आय –

 शि कहते अद्य नाशक , व कहते ही मुक्ति । गजानंद शिव शिव कहु , प्रेम ज्ञानयुक्त भक्ति । 

           श्रृष्टि ला श्रष्टा से , इडा‌ ला पिंगला से , मैं ला तू से , अहम ला परम से , त्व ला स्वयँ से , पर ला अपर से , अलख ला लख से , चर ला अचर से , जड़ ला चेतन से मिला के जीव ल शिवत्व के बोध करइया स्वयं सिद्ध समर्थ शिव ही आय , जेमा कहींच दोष नइये । तभे शिव जी खातिर रामचरितमानस मा केहे गिस – समरथ कहुँ नहि दोष गोंसाईं । 

                                          

     लेखक  - हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन 

              छुरा


काल अष्टमी के कालरात





 काल अष्टमी के कालरात


जून महिना हमर जनम जनम के आस्था बर शोक के महिना होगे । काल अष्टमी  के हवन म  हमर आस्था के हुँम देवागे।सावन लगे के पहिली भोले भंडारी शिव शंभू ल मनौती मनाय सेती उपास रहे बर सावन सम्मार के गिनती कर- कर के जम्मो परानी के मन म भक्ति गदगदात रहय, बोल बम म जाय बर कँवरिया मन के तइयारी के योजना बनत रहय, वइसने अचानक सन् अट्ठाईस जून दु हजार सोला के दिन होत बिहनिया ले सोर मिलिस के जलेश्वर महादेव (डोंगरिया) के शिव लिंग भंग होगे ! फोर डारिन पापी मन ! ए खबर ल सुनके मूड़ म पहाड़ टूटगे! तीर तखार के गाँव-बस्ती म दु:ख छा गे । अइसे लगिस के घर-घर म मरी परे अऊ लाहस निकले हे। शोक के लहरा पूरा जिला भर के सँगे-सँग जम्मों श्रद्धालु मन ल बुडो़ डारिस दुःख के समुंद म । दुःख भरे दुघटना के बरनन मुह ले कहिना मुसकुल हे, जेला हिरदेच ह समझ सकत हे ।


भगवान ह कोनो न कोनो रुप म बिपदा के चेत कराथे, हमुँ मन ल करइस । फेर हम का जानिन के अइसन घटना घटही ? प्रकृति दाई ह तो दिनेमान ले चेत करात रहिस। बादर गरु- गरु लगय, मउसम ह साँय-साँय करय। जइसे रात होइस छिन भर म अइसे अगास म  बादर बगरिस के साक्छात् कालरात लगे लगिस। साफ-साफ घोर संकट के सोर होय लगिस । बडे़-बडे़ पानी बूंद गिरय,गर्रा ह झकोरा मारत गुर्राय। बिजली चमकय  त लगय के धरती ह गाज रुप म ज्वालामुखी उलगत हे, तिड़कय त लगय के कालरात ह किलकारी मारत जीभ लमा-लमा के परलय करत हे। सियान मन कहयँ के जिनगी म प्रकृति के अइसन बिकराल रुप कभू देखे नइ  रेहेन। 


     घटना के कारन धुरी डोले लागिस, गुने ल परगे के प्रकृति के अलग अलग परलयी रुप शिव लिंग के पीरा अनुसार बदलत रहय। जब पापी मन शिव लिंग म छिनी हथौडी़ मारत रिहिस होही त भगवान शिव चिल्ला-चिल्ला के, बिलख बिलख के, तड़फत अपन पिंड रूप तन ल तियागत रहिस होही। फेर हम कोनो पापी ल एकर भनक तक नइ लग पइस। एकर  पीरा आज ले हमर हिरदे ल करोवत हे।


उही दिन उही बादर म जब घटना के सुरता ताजा होथे त तन ह सुन्न पर जथे । अपने अपन आँखी ले सरन बोहाय लगथे । होही काबर नही! जेन भुँईफोर भगवान शिव के आसन म अपन भाव ल चढा़वन , जेखर जस ले जन-जन के मन म आस्था अऊ भक्ति फरत-फूलत रहय, जेखर दरसन करके हमन तन मन ल पबरित करन, अइसन अदभूत शिव लिंग जेला तेरहवाँ ज्योतिर्लिंग के पद मिले हे ओ आज घोर पापी मन के नेग चढ़गे। काल अष्टमी के हवन म समागे।


आज घटना के चार बछर पूरा होगे। आजे के दिन सत्ताईस जून दू हजार सोला,संवत २०७३, दिन सम्मार, असाड़ कृष्न पक्ष सात, कालअष्टमी के बीच रात भगवान शिव लिंगस्वरुप ह फोक नँदिया के बीच धार म टूट के समा गे। जेखर कारन हे भस्मासुर के अंधभक्ति अऊ लालच। लिंग के फोरे ले न मनि मिलिस न भगवान परगट होइस ! होइस त हतिया हमर आस्था के  ..।


मनखे मन जतके पढ़त लिखत हे ओतके अगियान म अँधरा होत जात हे।  आज मनखे ज्ञान-विज्ञान पढ़ लिख के वो जम्मों दैवी शक्ति के ज्ञाता निर्माता हो गे जेला बेद पुरान, धारमिक पोथी म पढ़त सुनत कल्पना  करय, सब ल सिरतोन म पा गे। तभो ले मनखे अंधबिसवास अऊ लालच म मरगे। एक-दूसर के आस्था, संस्कार, अउ भावना उपर हमला होथे। मनखे -मनखे ल जोरे के काम हमर  देवी-देवता बर आस्था अऊ गुरु के अमरित बानी मन करथें। जिंहा पबरित गियान मिलथे, जेखर ले मनखे के चरित्र बनथे।  फेर आज ओही देवता ठाना घलो सुरक्षित नइ रहिगे। कोनो मुर्ति चोराथे कोनो टोर-फोर करथे, त कोनो देवता परगट करे बर अनित काम करथे। अइसन अंधबिसवास ले समाज ह टूटथे, बनय पनपय नही ।


हर- हर महादेव! शिव शंभू !

जय जालेश्वर महादेव!


देवचरण 'धुरी'

कबीरधाम छ.ग.।

पव्वा के बदला खव्वा "

 "पव्वा के बदला खव्वा "

आजादी के पच्हत्तर बरस बीत गे फेर आज ले गरीबी रेखा जिंदा हे। गरीबी घला घेक्खर किसीम के जीव आए ।नानहे नानहे मनखे मन ल जमगरहा पकड़थे। हम सोचे रेहेन हमन इक्कीसवीं  सदी मा आ गे हन त अब के तांत्रिक मन एक फूंक म गरीबी ला भगा दिही फेर  ये हमर सोच गलत आय हमर तांत्रिक मन गरीबी ला भगावत भगावत हाफ डरिस। ऊंकर फूंकई फूंकई म हमर आंखी कान घला पिरागे ।उमन मंतर पांच बछर के पांच बछर पड़थे। उंखर भभूति ला खावत खावत पांच बाछर कईसे बीत जथे पता घलों नई चले । अब के तारीख म पढ़ लिख के रोजगार मिल जाएगी एकर कोई गारंटी नई हे ।फेर मोर सोच आय की सरकार ल बईगई गुनियई ला पढ़ाई के पाठ्यक्रम में शामिल जरूर करना चाही। बईगा गुनिया मन भले कम पढ़े लिखे रहिथे बिचारा मन फेर ऊंखर इसतर ह गरीबी रेखा के ऊपर जरूर मिलथे। एकर कोचिंग क्लास घलो खुलना चाहिए कम से कम बेरोजगार मन ल रोजगार घलो मिलही ।कतिक सुघ्घर लागही फलाना कोचिंग सेंटर,इहां एक ले बड़के एक बईगा गुनिया मन ले सिखाए जाथे । पांच मंतर म एक (फ्री) फोकट।आम जनता के संगे संग सरकार ल घलो राहत मिलही। इही बहाना कहीं सरकार घलो बन जाही। वैइसे कोचिंग क्लास के धंधा कोई बुरा भी नई हे" दान के दान इनाम के इनाम"।

                 हमन इक्कीसवीं  सदी के मनखे आन नवा नवा शब्द गड़े मां एक्सपर्ट हन जइसे अंधभक्त सोशल मीडिया मां भक्त और अंधभक्त के लड़ाई बढ़ जब्बर होथे। फेर हमर समझ म भक्त अऊ  अंधभक्त एके आए भक्त घलो आंख मूंद के भक्ति करथे,अऊ  अंधभक्त घलो आंखी मूंद के भक्ति करथे फेर दर्शन होथे कि नई होए ये तो वही मन जान ही ।हम तो फकीर मनखे हमला का।

            अब तो कुंवारा मन ल बर बिहाव करना मतलब "दुब्बर बर दू असाड़" ।आधा तो लड़की मन के बायोडाटा ल देख के पोटा कांपथे। ऊंखर पढ़ाई लिखई मतलब फूल पेंट अऊ चड्डा कस फरक दिखथे ।कई झन के बायोडाटा म लिखे रहिथे किसानी अमुक एकड़ डबल फसल जाने-माने होवईया दमाद के नाम एकात  फसल कर दीही। वो तो भला करे भगवान के ये नई लिखे रहाय, खातू कचरा ,दवाई बूटी, छितईया ही मिले।  अइसन बायोडाटा ल देखके जाहिर से बात आए कोनो पकौड़ा तलइया थोड़ी ना मिलही ।

        इहां तो बटवारा मां देश के चानी चानी होगे त का पुरखा के जमीन ह भाई बंटवारा म का बचही।चार ले दू, दू  ले एक ,एक ले आधा,आधा ले पव्वा। तेखरे सेती कबाड़ी वाले मन घला चिल्लात रहिथे "पव्वा के बदला खव्वा ले"।

                  फकीर प्रसाद साहू 

                  " फक्कड़" सुरगी

छत्तीसगढ़ी कहानी-करगा

 छत्तीसगढ़ी कहानी-करगा 

                                                                    

                                          चन्द्रहास साहू

                                  मो - 8120578897

आज बिहनिया ले बादर गरजत हे, बिजली कड़कत हाबे। कोनो हा उछाह मगन होथे तब कोनो गरीब ला संसो धर लेथे। करिया-करिया बादर आमा-अमली कोती ले आइस अउ गौटिया घर के छानी ऊपर टँगा गे अब। ...अउ बरसे लागिस सोनिया बरोबर।

"तेहां जइसन चाहबे वइसने करहुँ फेर तलाक झन दे। तोर बिना मोर जग अँधियार हो जाही।''

गोसाइया अब्बड़ समझावत हे। फेर गोसाइन तो गाँव-गोहार पार डारिस।

"इस बैल के साथ एक पल भी नही रह सकती मैं। आई कैन नॉट लिव विथ दिस बुल। आई वांट डाइवोर्स अदरवाइस आई विल गो कोर्ट एंड पुलिस स्टेशन।''

भूरी डोमी कस फुफकारत हाबे आज वोहा। लहू के संचार बाढ़गे। धड़कन बाढ़गे। आँखी लाल होगे। गुस्सा मा हफरत हे अउ गोड़ कांपत हाबे सोनिया के। 

"लिसन, ससुरजी ! तुम लोगो का नाम लिख के मर जाऊँगी। रियली, आई विल डाई।''

ससुर जी भलुक अंगरेजी के आखर ला नइ समझिस फेर भाव ला तो जान डारिस। महाबिपत अवइया हाबे। मुड़ी ला गढ़िया के ठाड़े हाबे। .....अउ गोसाइया दिनेश ? का कर डारही बपरा हा। 

"जौन साध हे तोर जम्मो ला पूरा करहुँ। गाँव छोड़ के शहर मा रहे के साध हाबे ते वहुँ ला पूरा करहुँ। ददा-दाई संग तारी नइ पटत हाबे ते चल दुनिया के कोनो शहर मा। जी लेबो लड़-झगड़ के फेर तलाक झन माँग। ये अतराब मा अब्बड़ नाव हाबे मोर ददा के वोकर नाव ला मइलाहा झन कर ...।''

रो डारिस दिनेश हा फेर बहुरिया सोनिया ? भकरस ले भीतिया के कपाट बाजिस अउ तारा-बेड़ी लग गे।। अंगरेजी मा अब्बड़ बड़बड़ावत हाबे। रोये चिचियाये बरतन-भाड़ा पटके के आरो आवत हाबे अब। 

                   बिहनिया के पानी अउ पहाती के झगरा जम्मो एक होगे। भीतिया के झगरा परछी मा आगे अब। परछी ले दुवारी, ....अउ दुवारी ले खोर मा अमरगे। अउ खोर मा अमरगे तब का बाचीस ? इज्जत तो गवां डारे हाबे अब, गौटिया के लिंगोटी उतारत हे-गाँव वाला मन।      

                 एक मइनखे के दस मुँहू होगे। हड़िया के मुँहू ला तोप डारबे फेर मइनखे के मुँहू ला कइसे तोपबे। गॉंव भर सोर होगे। खैरागड़िया गौटिया के बहुरिया-बेटा दुनो झन मा अब्बड़ झगरा माते हाबे। आज उघरा होवत हाबे उकरो ओन्हा हा। खाल्हे पारा के  गरीब के गोठ तो अचरी-पचरी, कुआँ-बावली, खेत-खार नरवा-नदिया मा लसुन मिरचा लगा के, भूंज बघार के गोठियाथे गाँव वाला मन। 

"कतको चद्दर ओढ़ ले गौटिया खजरी तो खजवाबे करही..?"'

"सिरतोन खजरी धरे हाबे गौटिया के बहुरिया ला। देवता बरोबर गोसाइया के मान नइ राखिस।''

"नांदिया बइला बरोबर समहरे रहिथे। न गोड़ के पनही हीटे न मुँहू के मुहुरंगी मेटाये।''

"रूपसुन्दरी हाबे ओ ! हिरवइन बरोबर। फेर चाल मा कीरा परगे हाबे वोकर।  दिखे बर श्यामसुंदर अउ पादे बर ढ़मक्का।''

"शहर के टूरी अउ उधार मा चूरी कभु नइ मांगना चाही। दुनो के रंग झटकुन उतर जाथे। गौटिया के बहुरिया के रंग घला उतरत हाबे।''

आनी-बानी के गोठ गोठियाये लागिस गाँव वाला मन। आधा बस्ती सकेलागे हाबे आज गौटिया घर के गम्मत देखे बर।

                गाँव भर के सुख-दुख मा पंदोली देवइया खैरागड़िया गौटिया काखरो तीन-पाँच मा नइ राहय। एकलौती बहुरिया ला अउ जादा दुलार देथे फेर बहुलक्ष्मी के रक्सा कस बरन ला देख के मूड़ धर लेहे गौटिया हा। अब्बड़ आगी उलगत हाबे बहुरिया सोनिया हा। दहेज प्रताड़ना टोनही प्रताड़ना घरेलू हिंसा आनी-बानी के धारा के डर देखाथे बहुरिया हा। का करही ?  कोन समझाही वोला ? गौटिया-गौटनिन के जी पोट-पोट करत हे। कभु कोट-कछेरी गेये नइ हाबे। काकरो लन्दर-फंदर मा नइ राहय तभो ले ये अलहन ले कइसे बाँचव भोलेनाथ ! गौटिया मुड़ धर लेथे। 

"बहुरिया ला कुरिया ले बाहिर कोती निकालो भई ! कोनो अनित कर डारही ते फांसी हो जाही हमर ?'' 

अब्बड़ झन उदिम कर डारिन सोनिया ला कुरिया ले निकाले बर। कपाट के गुजर ला उसाल डारिस गोसाइया दिनेश हा फेर सोनिया नइ निकलिस। संसो अउ बाढ़गे कोनो अहित कर डारही तब। 

"सिधवा ला जम्मो कोई डरवाथे गौटिया। अइसन पदनी-पाद पदोइया बहुरिया ला झन डर्रा। मोरो चुन्दी हा घाम मा नइ पाके हाबे भलुक अनभव के विद्या ला झोंक के पाके हावय। चेहरा मा झुर्री आय हे तौन सीख अउ परीक्षा के चिन्हारी आवय। जिनगी के पहार ला पैलगी करत कनिहा नवे हाबे अइसन टूरी बर पुरव अउ बाँचव।''

उदुप ले बईगिन डोकरी आइस अउ किहिस। वहुँ तो सुन डारे रिहिन नवा बहुरिया के चरित्तर ला। भलुक कोनो मंतर नइ जाने फेर ये घर के बिपत टरइया आवय-बईगिन डोकरी हा। गौटिया के चेहरा मा संसो के डांड़ कमतियाइस  बईगिन डोकरी ला देख के। 

"ये पहार कस बिपत ला टार दे बईगिन काकी ! मोर सिधवा लइका दिनेश के घर टुटे ले बचा दे। तलाक लुहु कहिथे बहुरिया हा। हमन ला पुलिस कछेरी......।''

"हांव सुन डारेंव गौटिया ! संसो झन कर।''

गौटिया के बात ला अधरे ले कांट दिस बईगिन डोकरी हा।

"हेर बेटी ! कपाट ला।''

कोनो आरो नइ आवय अउ आथे तब जइसे जम्मो कोई के करेजा काँप जाथे। 

"डोन्ट डिस्टर्ब मी। मुझे ज्यादा परेशान मत करो। मर जाऊँगी मै। रियली,  आई विल डाई।''

सोनिया के आरो आय। बरतन पटकत हाबे कूदत हाबे बही बरोबर,चिचियावत हाबे, बाय-बैरासु धर लेहे तइसे। जम्मो कोई बरजिस अब। 

.......अउ अब्बड़ आरो कर डारिस जम्मो कोई  खिसियावत-दुलार करत फेर कपाट नइ उघरिस।

"का करंव ?'' 

बईगिन डोकरी हक्क खा गे। कुछु गुनिस अउ पेरा परसार कोती चल दिस। ..... अउ आइस तब नानकुन झिल्ली मा कुछु धरे हाबे। 

"अब्बड़ मरे के साध हाबे न। तब, ले मर।''

झिल्ली मा कॉकरोच अउ छिपकली रिहिस, कपाट के पोंडा कोती ले ढ़ीलत किहिस। 

"अब सोज्झ मा निकलही अउ टेड़गा मा निकलही। गाँव के कमेलिन मन गउँहा-डोमी संग बुता कर लेथे फेर शहरनिन मन तो कॉकरोच अउ छिपकली ला देख के ठाड़ कुदथे। अब देख तमासा अंगरेजी मीडियम वाली टूरी के।''

डोकरी फुसफुसाइस। अब सिरतोन रोये के,चिचियाये के आरो आवत हाबे।

"प्लीज सेव मी ! बचाओ ! कॉकरोच और छिपकली कांट देंगे मुझे, मर जाऊँगी ...। प्लीज सेव मी, प्लीज सेव ।'' 

कपाट हीट गे अब। अउ बईगिन दाई ला पोटार लिस। डर मा लद-लद काँपत हाबे सोनिया हा। चेहरा लाल होगे हे-लाल बंगाला कस। 

"नानचुन कीरा-मकोरा ला डर्राथस बेटी ! कुछु नइ करे। काबर रिसाये हस ओ बता। का जिनिस के कमती होगे  हे तोला ? मेंहा तोर बर लड़हूं ये गौटिया-गौटनिन अउ तोर गोसाइया दिनेश ले। जम्मो कोई बर पुर जाहू मेंहा।''

बईगिन डोकरी दुलारत किहिस अउ पोटार लिस। ऑंसू ला पोछत पीठ मा थपकी देवत चुप कराइस सोनिया ला।..... अउ सिरतोन सोनिया ला अइसे लागथे हितु-पिरितु कोनो हाबे ते-इही दाई बईगिन डोकरी हा। सुख दुख के संगवारी। जम्मो कोई के चरित्तर ला देख डारिस। नाव बड़े दरसन छोटे गौटिया-गौटनिन अउ बइला बरोबर भोकवा गोसाइया दिनेश के।

"नाक उच्चा करके बड़का खानदान ले बहुरिया लाने हस तब वोकरो धियान राख। बहु चलाये के ताकत नइ रिहिस तब अइसन बड़का घर ले नत्ता काबर जोरेस गौटिया ! कोनो मरही-पोटरी ला ले आनतेस। ताहन रातदिन गोबर बिनवावत रहिते। बिजनेसमैन के बेटी संग नत्ता जोरे हस। वोकरो तो मान राख।.....अब तो ये बहुरिया इहाँ एक पल नइ राहय। तोला कोट-कछेरी रेंगाही तब चेतबे।''

गौटिया-गौटनिन ला ठोसरा मारत किहिस बईगिन डोकरी हा।

बड़का अटैची ला तनतीन-तनतीन कुरिया ले निकालिस बईगिन डोकरी हा। सोनिया जम्मो जोरा-जारी आगू ले कर डारे रिहिन।

"चल जाबो तोर मइके अउ थाना-कछेरी। दहेज प्रताड़ना के केस करबो। तब चेथी के अक्कल आगू कोती आही। .....मालपुआ खाके अब्बड़ मोटा गे हाबे, थोड़को सोंटाही।''

गौटिया-गौटनिन तो सुकुरदुम होगे बईगिन के गोठ सुनके। 

"ये का अइन्ते-तइन्ते गोठियावत हस काकी ?''

गौटिया गरजिस फेर बईगिन आवय जम्मो के बीख ला उतारत-उतारत अब्बड़ बीखहर होगे हाबे। 

"मोला छोड़ के झन जा सोनिया ! बईगिन दाई  मोर घर ला टुटे ले बचा दाई !'' 

गौटिया के एकलौता बेटा दिनेश रोवत हाबे।

"चुप रोनहा नही तो....! तोरे सेती मोर फुलकस बेटी के ये दुरगति होये हाबे।''

बईगिन बिन पेंदी के लोटा निकलगे। गौटिया के बहुरिया ला मनाये-बुझाये बर बलाये हाबे अउ भभकावत हे सोनिया ला। ससन भर देखिस जम्मो कोई ला। सोनिया संग बईगिन डोकरी  घर ले बाहिर निकलगे अउ ऑटो मा बइठ के रायपुर रोड कोती जावत हाबे अब।

                   सोनिया रायपुर के बिजनेसमैन के बेटी आवय। इंजीनियरिंग के पढ़ाई करे हाबे अउ दिनेश ? गाँव के खेती करइया। भलुक बी ए करे हाबे फेर नौकरी नइ मिलिस। खेत-खार कमा लेथे-मेड़ मा बइठ के।

सोनिया अब्बड़ मना करिस बिहाव नइ करो कहिके फेर चीज के लालच कोन ला नइ राहय। "गौटिया के एकलौता बेटा के गोसाइन बनबे बेटी ! राज करबे। धन्धा-पानी चल गे ते मालामाल अउ नइ चलिस तब बंठाधार। पचासों एकड़ अचल संपत्ति के मालकिन हो जाबे। कभु लाँघन नइ मरस। गौटिया-गौटनिन कतक दिन जीही पाँच बच्छर कि दस बच्छर। गौटिया घला अंगरेजी मीडियम वाली शिक्षित सुशील बहुरिया खोजत हाबे। अब्बड़ दुलार करही जम्मो कोई।''

अइसना तो कहे रिहिन सोनिया के ललचाहा ददा हा। ....अउ सोनिया अब्बड़ मना करिस फेर ददा के गोठ ला कहाँ टार सकही ? बिहाव होगे धूमधाम ले। निभत हाबे अब । फेर संगी-संगवारी आइस छे महिना पाछु अउ कहे लागिस ओरी-पारी।

"सोनिया ! तुम्हारा पति तो  बैल है और उनके साथ खूंटे से बंधे हुये तुम गाय बन गई हो।''

"गजब की जोड़ी है दोनों की।''

"न बात करने का सऊर है दिनेश को, न रहन सहन का।''

"तुम तो कॉलेज की क्वीन थी। हाई सोसायटी हाई स्टेटस। ....और अब गोबर में सड़ रही हो।'' 

तलाक ले लो सोनिया ! अभी भी वक्त है। अभी बच्चा भी नही है। कही बाद में न पछताना पड़े।''

"दिलीप और अक्षय तो आज भी तेरा इंतजार कर रहें है। तुम्हारे पास दो दो ऑप्शन है।''

"क्या हुआ दोनों अभी बेरोजगार है तो, वेल एडुकेटेड है।''  

संगी-सहेली मन आय रिहिन तब अइसने तो कहि के खिल्ली उड़ाये रिहिन सोनिया के। ...अउ कोनो खिल्ली उड़ाथे तब, आगी लग जाथे तन-बदन मा। आज तो वोकरे संगी-संगवारी मन गाय कहि दे रिहिन। सोनिया तो बेरा खोजत हाबे  तलाक लेये बर। ....अउ आज दिनेश खेत कमाये बर गेये हाबे-रोपा लगाये के दिन ये।

"मंझनिया के जेवन अमराये बर चल देये कर बेटी ! अब मोरो जांगर नइ चले। नौकर मन घला आये-जाए मा अब्बड़ बिलमा डारथे। लइका दिनेश हा बेरा मा खाही तब सुघ्घर होही ओ !''

सास किहिस फेर सोनिया तो चर्रस-चर्रस झंझेट दिस।

"मैं नही जाऊँगी। किसी का खाने-पीने का ठेका नही ली हूँ। जिसको भूख लगे तो समय पर आकर खाये।''

सोनिया सोज्झे सुना दिस अगियावत। गौटिया के मुँहू सिलागे बहुरिया के गोठ ला सुनके। अपंगहा गोड़ मा रेंगत गिस खाना अमराये बर गौटिया हा अउ सबरदिन बर खोरवा होगे। बस, एकरे सेती चार गोठ सुना दिस दिनेश हा अउ इही झगरा आवय। तलाक तक गोठ अमरगे। बेरा बखत मा दुलारत समझाइस गौटिया-गौटनिन बईगिन डोकरी हा फेर सोनिया के छाती मा वोकर संगी-संगवारी के गोठ लटक गे हाबे। -"बइला संग बिहाव करके अपन जिनगी ला बरबाद कर देस सोनिया ! अभिन घला कतको झन तोर अगोरा करत हाबे। तलाक लेके रायपुर लहुट जा। गोबर संग गोबर कीरा झन बन।'' 

जम्मो ला सुरता करत करू मुचकावत हाबे सोनिया हा। अपन जीत दिखत हे अब। गाँव के खाल्हे पारा छुटही अउ रायपुर रोड अमर जाही ताहन एक्सप्रेस बस मा बइठ के उड़ा जाहूँ। चेहरा के गुलाबी बाढ़गे सोनिया के। 

"रहा ले, ऑटो वाले बाबू ! हमर घर कोती चल।

बईगिन डोकरी किहिस अउ वोकर मोहाटी मा ठाड़े होगे ऑटो हा।

"रायपुर जाहू दाई !''

"हांव बेटी ! चार पहार रात ला कांट ले ताहन चल देबे।''

सोनिया बईगिन डोकरी घर चल दिस अब।

                         सुरुज नरायेन आज झटकुन अपन घर चल दिस फेर कमेलिन मन बिलम के  घर लहुटत हाबे। अँधियार होगे। चिखला-माटी मा सनाये बड़की बहुरिया सुशीला मुचकावत आइस अउ बईगिन डोकरी ला बताये लागिस।

"दाई ! आज रोपा लगाई बुता हा लघियात झर जातिस ओ। फेर भइसासुर वाला खेत मा नाग-नागिन के जोड़ी  अब्बड़ पदोइस।''

"बने पूजा पाठ नइ करे रेहेव का ओ ! भिम्भोरा मा ?''

"गोलू के पापा हा करे रिहिन दाई ! फेर का करबे ? थरहोटी अउ नानकुन टेपरी मा रोपा लगावत अब्बड़ बिलम गे जम्मो कोई। गोलू के पापा हा छुट्टी लेके बुता मा पंदोली दिस तब होइस झटकुन। नही ते रबक जातेंन। काली इतवारी मनाही।''

बईगिन डोकरी के बहुरिया सुशीला किहिस अउ गोड़धोनी कोती चल दिस। 


"गोलू के पापा मिनेश कुमार तो चार दिनिया आवय बेटी ! सबरदिन के किसानी बुता ला बहुरिया सुशीला करथे ओ। रोपा घरी अउ मिंजाई के घरी मा आके वोला पंदोली दे देथे मिनेश हा।''

सोनिया ला बतावत हाबे बईगिन डोकरी हा।

          "भलुक कमती पढ़े हाबे फेर अब्बड़ गढ़े हावय ओ मोर बेटी कस बहुरिया सुशीला हा ! गोठ-बात हिसाब-किताब आदत-बेवहार जम्मो मा अब्बड़ सुघ्घर हाबे सुशीला हा। महिला समूह के अध्यक्ष हाबे अभिन। अवइया बेरा मा सरपंच बनाबो कहिके गाँव वाला मन रुंगरुंगाये हाबे। कलेक्टर के मीटिंग मा जाके हिन्दी अंगरेजी मा गोठिया लेथे अउ गाँव के बइठक मा हमर मयारू भाखा छत्तीसगढ़ी मा। अब सुशीला हा चौथी पढ़े हाबे, कोनो नइ पतियाये। जम्मो ला सीखोये हाबे मोर बेटा मिनेश हा।''

सोनिया हुंकारु देवत हे। ससन भर देखथे अब बहुरिया सुशीला ला। सुघ्घर दिखत हाबे। भलुक दिनभर बुता करे हाबे तभो ले नइ कुमलाये हाबे सुशीला के चेहरा हा। सुशीला जेवन के तियारी करत हाबे रंधनी कुरिया मा। अब मिनेश घला घर अमरगे चिखला-माटी मा सनाके। 

"बेटी जात हा धान के थरहा आवय ओ। माइके ले तियार होके ससराल मा गड़िया देथे। बने मया पाके फरथे फुलथे अउ अपन वंश ला बढ़ाथे धान के पौधा बरोबर। बाली के पूजा होथे अउ करगा बोदरा ला फेंक देथे। ममहावत धान के बाली बन सोनिया ।  करगा बोदरा बनबे तब कोनो नइ भावय। आज फोन करके देख ले दिलीप अउ अक्षय ला घला। तोर अगोरा नइ करे भलुक तोला जूठा कहि दिही। जतका मया तोला दिनेश करथे वोतका दुनिया के कोनो मइनखे नइ करे। तोर उछाह बर टेक्टर ला बेच दिस अउ फोरव्हीलर बिसाइस। दाई के गहना-जेवर ला बेच के तोला सोना मा बूड़ो दिस-तोर उछाह बर। टुटहा पनही ला पहिर लेथे फेर तोर बर दर्जन भर ले आगर सेंडिल बिसाये बर नइ बरजिस। रिकम-रिकम के लुगरा लिस- तोर उछाह बर। दवई  के पइसा ले तोर बर सेंट बिसाइस। लाँघन रिहिस तभो तोर बर इज्ज़ा-पिज्जा बिसाइस। देवता भलुक नो हरे फेर सुघ्घर इंसान आवय बेटी। ..अउ ये दुनिया मा  सब मिलथे फेर इंसान नइ मिले। दिनेश हा तोर उछाह बर सब करही ओ ! फेर ओकरो उछाह बर  एककन संसो कर। गोठ-बात,रहन-सहन तौर-तरीका अचार-विचार जम्मो ला सीख जाही मोर सुशीला बरोबर। बेटी ! तलाक झन ले ओ।''

सोनिया रोवत हाबे सिरतोन कभु करू जबान नइ देये हाबे दिनेश अउ वोकर दाई ददा मन, गुनत हाबे। 

"चलो दाई ! जेवन करबो। गोलू के पापा ला आरो कर।''

"गोलू के पापा आ गा ! मिनेश आ बेटा।''

बईगिन डोकरी आरो करिस। ... अउ आइस तब तो सोनिया सुकुरदुम होगे। इंजीनियरिंग कॉलेज के इलेक्ट्रॉनिक्स एन्ड टेलीकॉम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के एचओडी आवय डॉ मिनेश कुमार। सोनिया तो वोकरे मार्गदर्शन में अपन रिसर्च वर्क ला पूरा करे हाबे।

"गोसाइन-गोसाइया हा गाड़ा के चक्का घला आवय सोनिया। अउ दिनेश हा सुघ्घर लइका आवय। मेंहा जानथो। मोर गोसाइन चौथी पढ़े हाबे। फेर मोला गरब हाबे मोर घर परिवार खेत-खार जम्मो ला सम्हाल डारिस। अउ कुछु कमती हाबे दिनेश मा तब तेहां सीखो। सीख जाही जइसे मोर मयारुक सुशीला सीख गे।''

मिनेश किहिस गरब करत अउ जम्मो कोई फुटू साग संग जेवन करे लागिस अब । सोनिया के अंतस मा जागे करगा मरगे अब। अउ ममहावत दुबराज धान के बाली कस दिनेश के मया ममहाये लागिस। आँखी के आगू मा दिनेश के सुघराई दिखत हाबे अब।........... अब बिहनिया के अगोरा करत हाबे। 

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

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समीक्षा


 पोखनलाल जायसवाल: 

आज अउ तइहा के गोठ करन त पाथन कि आज के पीढ़ी घर बसई ल घरघुँदिया सहीं समझे धर ले हें। थोरको नवा बात होइस नहीं कि उजारे के सोच लेथे। अलगे अलगे जिनगी जिए के सोचथें। सबले बड़े आजादी चाहथे। अइसन आजादी जिहाँ कोनो रोक टोक झन रहय। मन भर उड़ान भर सकय। फेर उड़ान भरे च ले नइ होय। उड़ान भरे के पहिली मंजिल के तो ठिकाना होना च चाही। सिरिफ कल्पना के पाँख लगाय ले बूता नइ बनय। थके पाछू पाँव मढ़ाय बर धरती तो होना च चाही। आज के नवा पीढ़ी थोरको बने का पढ़ लेथे, सियान मन ल घेपबे नइ करय। पिटिर पिटिर अँग्रेजी के चाबुक चला धर लेथे। संगी जहुँरिया के बहकावा म होश खो डारथे। 

       जोश म होश खो के नवा पीढ़ी अपन पाँव कइसे कुल्हाड़ी(टँगिया) मारथे। का का मनगढंत परपंच (प्रपंच) नइ रच डारथे। एकर परछो करगा कहानी म मिलथे। फेर अनभो के कोनो विकल्प नइ होवय यहू ए कहानी म देखे ल मिलिस जब बइगिन दाई ह अपन सूझबूझ ले गौटिया घर आय घर टूटे के बिपत ल टार देथे। सिरतोन आय कि गाँव के बइगा-बइगिन गाँव के सियान होथे अउ अपन सियानी ले गाँव म आय/अवइया अल्हन चाहे कोनो किसम के रहय ओकर ले बँचाय के हर उदिम करथे। पूरा गाँव उँकर बर एक परिवार होथे। बइगिन दाई सोनिया के मन ल पढ़ डारथे। गौटिया गौटनिन के घर आय ए अल्हन के उपाय सोच लेथे- तभे तो ओ कहिथे-" .... अइसन टूरी बर पूरवँ अउ बाँचवँ।"

       सोनिया के हिरदे जीत अउ विश्वास पाके ओ रस्ता म ले आनथे, जिहाँ जिनगी के गाड़ा के चक्का के मरम समाझावत सोनिया ल असल जिनगी का अउ कइसन होथे? दिखावत समझा डारथे। बइगिन दाई के ए गोठ सोनिया के हजाय बुध ल जिनगी के पटरी म ले आथे "बेटी जात ह धान के थरहा आवय ओ! मइके ले तियार होके ससराल म गड़िया देथे, बने मया पाके फरथे फूलथे अउ अपन वंश ल बढ़ाथे धान के पौधा बरोबर। बाली के पूजा होथे अउ करगा बोदरा ल फेंक देथे।  ममहावत धान के बाली बन सोनिया! करगा बोदरा बनबे त कोनो नइ भावय। ....तोला जूठा कहि दिही।"

        कहानी के भाषा शैली अउ संवाद पात्र मन के मुताबिक बढ़िया गढ़े गे हे। अँग्रेजी शब्द के प्रयोग सुग्घर ढंग ले होय हे। मुहावरा/कहावत मन के सटीक प्रयोग कहानी के सुघरई ल बढ़ावत हे। 

        "..ए अतराब म अब्बड़ नाँव हाबे मोर ददा के, ओकर नाँव ल मइलाहा झन कर..." ए वाक्य म मोला मइलाहा शब्द जादा सही नइ लागत हे।

        शहरी जीवन शैली अउ गँवइहा जिनगी के बीच बने भिथिया ल ढहाय के बढ़िया उदिम करे गेहे कहानी म।

        जोश के भुइँया म जागे पढ़े लिखे होय के अभिमान के करगा ह अनभो के सफाचट नाशक के आगू मर जथे अउ हिरदे के खेत म मया के फुलवारी ममहाय लगथे। कहानी के शीर्षक ल  सार्थक करत हे।

        सोनिया अउ बइगिन के चरित्र ल जउन ढंग ले गढ़े गे हे, ए कहानीकार के परिपक्वता के उदाहरण ए। नवा-जुन्ना पीढ़ी के बीच जउन पीढ़ी गेप हे, ओकर मनोविज्ञान ल समझे म ए कहानी मिशाल बनही। नवा जुन्ना दूनो पीढ़ी म सुग्घर समन्वय स्थापित करत ए कहानी छत्तीसगढ़ी साहित्य ल अइसन आयाम दिही, दिशा दिही। 

      कहानीकार भाई चंद्रहास साहू जी ल बधाई💐💐

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

Saturday, 4 February 2023

अंतस् के आरो आय - तैं तो पूरा कस पानी उतर जाबे रे* पोखन लाल जायसवाल


 

*अंतस् के आरो आय - तैं तो पूरा कस पानी उतर जाबे रे* 

पोखन लाल जायसवाल


       मनखे कतको ऊँचई ल छू लेवय, ओला ओकर ले अउ आगू जाय के नवा साध हो जथे। ओ ऊँचई कमती च जनाथे। कतको पैसा अउ धन दोगानी कमा लेवय, दू आना कमे च लागथे। मान-सम्मान जइसे मिलथे, छाती तो तान लेथे। फेर मिले सम्मान के पाछू एक गरब ह घमंड म बदल जथे। धन-दोगानी, मान सम्मान, नता-गोता बर मया-मोह, लालच के नार फाँस ह अपन बँधना म अइसे जकड़थे कि छोरे के उदिम म अउ अरझत फँसत जाथे। नता-गोता, जमीन-जायदाद अउ रुपिया-पैसा सब इहें च के पूरती आय। ए सब ल इहें च रहि जाना हे। ...तब ले मन म चढ़े ए सब के मइल मनखे के चेत हर लेथे। कभू-कभू तो गियानी-धियानी के मति घलव छरिया जथे। जतका रहिथे ओकर ले आगर के चाह म मनखे धीर नइ धरय अउ भटकत रहिथे। मन बड़ चंचल होथे। पाँख लगाय बड़ अपन बनाय दुनिया म उड़त रहिथे। कहूँ मेर हाथी त कहूँ मेर घोड़ा पाहूँ के साध म मनखे सरी उमर भटकथे। कभू भटकन के भूल-भुलैया म थक हार के बइठथे त अंतस् म खियाल आथे ए सबो जिनिस तो इहें रहि जाना हे। हाथ पसारे जाना हे। ...फेर खियाल के चिरई जब फुर्र के उड़ जथे त मनखे फेर माया-मोह के फाँदा म अरहज जथे। इही भटकाव म जब मनखे शांति खोजथे त ओकर आत्मा परमात्मा के शरणागत हो जथे। शरणागति होय ले सुख सनात अउ शांति के अनभो करथे। इही अनभो परम आनंद आय, दिव्य ज्ञान आय। जउन संसार के निस्सारता ले परिचय कराथे। परम आनंद अउ दिव्य ज्ञान पाय के रस्ता हर तो आय भक्ति। भक्ति जउन भव बँधना म जकड़ाय जीव ल मुक्ति दिलाथे। धन-दोगानी, मया-मोह, राग-अनुराग, मान-सम्मान सब माया आय। ए माया हरदम भक्ति के मार्ग म बाधा परथे। मन के शांति के रस्ता ले भटकाथे। दुनिया ल देख लव जेकर तिर अपार धन हे, ओकर मन म शांति नइ हे। शांति तो एकेच रस्ता अउ एके दिशा म मिलथे का? सबो ल साधे के उदिम म मन फिरत रहिथे, थिर बाँह नइ पावय, अइसन म शांति मिल पाना संभव च नइ हे। एकरे बर चेतावत रहीम जी कहें हें ..एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।.... सब ल साधे के कोशिश म सफलता नइ मिले ले तनाव आथे, मन के शांति भंग होथे। जउन मनोगत आय। 

         लौकिक संसार म ए सब के बिना जी पाना घलव मुश्किल आय। यहू सुरता राखन कि दू डोंगा म पाँव रखे ले नदी पार नइ करे जा सकय। भव सागर ले पार होय अउ जनम-मरण के बंधन ले मुक्ति बर तो भक्ति साधे च ल परही। काबर कि ज्ञानी-धियानी मन एकर एक मात्र उपाय भक्ति बताय हें। मन के शांति अउ भवसागर ले मुक्ति बर रस्ता चतवारत भक्ति के निर्मल धार बोहावत रचना मन के संग्रह आय कवयित्री शोभामोहन जी के लिखे *तैं तो पूरा कस पानी उतर जाबे रे* । ए संग्रह के रचना मन म लयात्मकता हे। संगीतात्मकता हे। आँचलिकता हे। गहिर चिंतन हे। दर्शन हे। गजब के दृष्टांत घलव हे। 

         जीवन-मरण ले जुरे लोकजीवन के प्रचलित रीत-रिवाज अउ नेंग-जोंग ल सँघारे ले रचना मन के सौंदर्यं बाढ़े हे, उहें एमा समाय प्रतीक ले रचना के लौकिक आनंद ह अलौकिक आनंद के सुख देथे। अध्यात्म संग जोरथे। प्रतीक अउ बिम्ब विधान के प्रयोग ह ए संग्रह ल छत्तीसगढ़ी साहित्य म ऊँचा दरजा जरूर दिलाही। पाठक ल ए किताब म सबो किसम के काव्य तत्व मिलही। 

       ए संग्रह म शामिल रचना मन के भाव पाठक के अंतस् म उतर जथे। लौकिक-अलौकिक आनंद के समंदर म घेरी-बेरी डुबकी लगाय के मौका देथें। निमगा अध्यात्म ले भरे-पूरे रचना हे। आज के बेरा म जब मनखे पग-पग म संघर्ष करत हें, जिनगी ल बने ढंग ले जिएँ बर नवा-नवा जतन करत हें। अइसन म मन ल सजोर बनाय म अध्यात्मिक शक्ति के जरूरत पड़थे।  कोनो-कोनो कहि सकथें कि विज्ञान के युग म आत्मा अउ परमात्मा के का रटन? मोला लगथे कि मन के अशांति अउ तनाव के कोनो दवा विज्ञान तिर नइ हे, फेर लोगन भक्ति-भाव के सागर स्नान करथें, दू मिनट धियान लगाथें त उँकर मन ल शांति मिलथेच अउ मन के तनाव घलो मिट जथे। दिनभर के थकान परमात्मा के शरणागति होय ले मिटा जथे। 

       भारत के जउन अध्यात्मिक चिंतन के विश्व अनुगामी हें, उही गहिर अध्यात्मिक चिंतन ल सँजोये शोभामोहन जी के ए संग्रह छत्तीसगढ़ी भाषा ल सिरतो विश्व पटल म पहचान दिलाही। जेकर चरचा श्री अरुण कुमार निगम जी ए किताब के उतरनी (भूमिका) म लिखें हें।

         कला पक्ष के दृष्टि ले कुछ रचना गीत के कलेवर म हे त कुछ ह ग़ज़ल के तिर हें। सब म गेयता हे। हाँ, कुछ मन शिल्प के हिसाब म न तो गीत बन पाय हे अउ न ग़ज़ल। ग़ज़ल के अपन नियम होथे, नापनी म लिखे जाथे। गीत बर तीन पद नइ त एकर ले आगर पद होना चाही। ए कमी पाठक अउ रचना के आनंद के बीच आ जथे। जेकर ले पाठक के मन कई घँव भर नइ पाय। भटक जथे। जब कभू एकर नवा संस्करण आही त शोभामोहन जी ए कमी ल पूरा कर लिहीं, अइसे मोला अजम हे, विश्वास हे। काबर कि उँकर कलम म अतका दम हे। उँकर शब्द-भंडार के कोठी भरे-पूरे हे। संगेसंग टंकण त्रुटि कोति घलव थोरिक चेत करे के जरूरत हे। कुछ रचना मन अतेक छोटे हें कि अभी ओला कविता कहना ही सही रही। मारक अउ कसावट के कमी नइ हे। उन ल पढ़के बिहारी जी के दोहा सुरता आ जथे-

      सतसइया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर।     

      देखन में छोटे लगे, घाव करे गंभीर।। 


       छंद के छ परिवार संग छंद साधना के तप ले शोभामोहन जी के लेखनी अउ निखर गे हे। उँकर साधना छत्तीसगढ़ी साहित्य म नवा रंग लाही। छत्तीसगढ़ी साहित्य ल नवा दिही।

         तैं तो पूरा कस पानी उतर जाबे रे ...संग्रह के जादातर रचना म आत्मा के जीव ले मनुहार अउ आत्मा के परमात्मा ले गोहार के सुग्घर समन्वय हे। संसार ल गतिमान अउ चलायमान रखइया शक्ति आय परमात्मा।ए किताब म उही परमात्मा ले मिले अउ जन्म-मरण ले मुक्ति बर संसार के माया-मोह म फँसें जीव ल चेतवना के सुर हे अउ संसार के मोह-जाल म उलझे, तोर-मोर के झगरा अउ छल-प्रपंच म भटकत जीव ल जिनगी के सत् मार्ग म लाय के उदिम हे।

         भक्तिकालीन युग के अधिकतर कवि मन परमात्मा ल स्वामी मानत अपन रचना करें हें। शोभामोहन नारी आय, अइसन म उन परमात्मा ल पिया स्वीकारत लिखथें-

         मोर पिया हे गजब मयारू, रखय हथेरी छाँव।

         मोर पिया जग भर ले मंडल, सबले बड़का साव।

         पिया रंगरसिया के रँग रँग के, मैं तो सखी लहराँव।

         डेरा उसलत संझा बेरा, रोवा राही परबे करथे।

       लोकजीवन ले जुरे बिम्ब के संग आत्मा के परमात्मा ले मिलन बर आप लिखथौ-

          गवन करे के चलत तियारी, गठरी अपन उठाव

         रे सुवना जाबे पिया के गाँव।

     एक ठन अउ उदाहरण देखव--

         लेगे बर आही लेनहार, जाये बर रहिबे तियार।

         हरियर भिरहा के बाँस मँगाही, रचही काठ के डोली।

        लौकिक जीवन के दृष्टि ले अतिशयोक्ति अलंकार ले सजे डाँड़ देखव-

         मोर पिया घर चमचम चमकत, सहस सुरुज के गाँव।

         मोर पिया के गगन हवेली, बिन पँवठा चढ़ जाँव।

       ए डाँड़ तो सर्वशक्तिमान परमात्मा बर लिखे गे हे, जेकर कृपा ले सबो सहज अउ सरल हो जथे। हजारों सूरज के ताव ल आम आदमी भला कहाँ ले सहि पाही? ए सरी संसार के मालिक परमात्मा बर लागू होथे। शोभामोहन जी के कल्पना बेजोड़ हे।

      विज्ञान मानथे कि संसार म ऊर्जा अविनाशी हे। बानी (वचन/ध्वनि) ऊर्जा के एक रूप आय। पंचतत्व ले बने देह नाश हो जही, अपन अपन हिस्सा म मिल जथे, फेर बानी अमर रहि जथे। जिनगी ल बोधावत उन ए सच ल गहिर चिंतन के लिखथें-

     हाड़ा जरह मास टघलही, जर बर होबे राख।

     बाँचे रही तोर बानी जग मा, तैं हा लुका ले लाख।

     पाँचों जिनीस मा सरबस मिंझर जाबे रे।

     तैं तो पूरा कस पानी उतर जाबे रे.....

       किताब के नाँव 'तैं तो पूरा कस पानी उतर जाबे रे' एकर ऊपर विचार करे ले इही समझ म आथे कि ए ह अंतस् के आरो आय। जे ह ए किताब के केंद्रीय भाव ल सरेखथे। जेन लोक हित म हे। लोक हित म लिखे साहित्य सदा काल लोक म प्रचलित रहिथे। इही कामना करत हँव कि लोक जीवन म ए किताब अपन ठउर बनावय। 

       अपन अंतस् के बहाना कवयित्री शोभामोहन के लोक हित बर लिखे दू लाइन आप ल सादर समर्पित हे, जउन म जीव ल भक्ति के मार्ग म चले बर शुभ लगिन अउ बूढ़त काल के अगोरा नइ करे के संदेश दे हे। आजे ले भक्ति म लगे के बात कहे हे।

        पूरा मा पार नइ बँधावै, शुभ सुम्मत झन नेत।

        शोभामोहन रेंग अभी ले, चूँदी झन कर सेत।

        रे हंसा बेरा कहत हे चेत।

        

  *संग्रह के नाम*- तैं तो पूरा कस पानी उतर जाबे रे

   *रचनाकार - शोभामोहन श्रीवास्तव*

    *प्रकाशक- सर्वप्रिय प्रकाशन दिल्ली*

   *प्रकाशन वर्ष 2021*

*सहयोग राशि 200/-रूपये*

*पृष्ठ संख्या 160*


आलेख - *पोखन लाल जायसवाल*

पलारी (पठारीडीह) जिला बलौदाबाजार छग.

6261822466