Friday, 17 March 2023

बियंग "अनुकंपा "

 बियंग "अनुकंपा "

अनुकंपा के महिमा अपरंपार हे जेखर  ऊपर हो जाए ऊंकर भाग बदल जथे चाहे अनुकंपा भगवान के होए या सरकार के। एक वह बेद्ंरा के भाग देख भगवान के अनुकंपा ले आज दुनिया मां ओखर नाम के शोर उड़त हे जगा जगा ओला हमन पूजत हन।

            अउ अभी के बेंदरा मन ला देख 'छानी मां होरा भूंजत हे' बारी बखरी के धुरा धरा दे है ।अब तो वहुमन वीआईपी टाइप से हो गेहे।खेतखार ह सुहाय नही, हफ्ता लागे ना पंदराही गांव म धावा बोल देथे जाने-माने बफे रखे हे गांव वाले मन ।यहू मन ल सरकारी संरक्षण मिलत हे, सरकार के लाचारी भी हे वोट बैंक के सवाल हे। वइसे भी वन जीव ल मारना कानूनी अपराध हे।वइसे ये ला भी सरकार के अनुकंपा ही कहीं सकथन। सरकार भी अनुकंपा कखरो मुहूं देख के थोड़ी ना देथे, जेन मन भाग में कमाय रहिथे उहिच ल  मिलेथे। हो सकथे ये किरपा उमन ल समोसा म इमली चटनी खाए से मिलीस कि हरा चटनी? भगवान मालिक।

                    जेन बेदरा मन सरकारी किरपा पाय रहिथे  ऊंकर मुंह ललहूं  रहिथे। सरकारी बेदरा मन के एकेच ही फंडा कस के खा अऊ मरत ले पी पाले हस सुरा खोजत हस घी।(बुरी आदत)तरिया पार अऊ सड़क पाई हर ईकर फेवरेट ठऊर आय मानो आत्मिक शांति मिले के एक मात्र ठऊर ।

 सेटिंग घलो न देश व समाज बर बड़ खतरा आए,अऊ अहू  सच आए बगर सेटिंग के कोनो काम नई होय। इकरों सेटिंग बढ़ भयंकर टाइप ले रहीथे। खेत खार  म कुदत हे। तबले धकाधक छुट्टी मेंटनेंस होवत रहिथे। महीना पुरिस ताहन" तुम भी खुश हम भी खुश "अनुकंपा प्राप्त बेदरा मन एक कन जादा अतलंगहा होथे। लंका के हाल का काहवं।इंकर संग म रहवाईया बेदरा मन हलाकान घला हो जथे। इंकर लपेटा म पड़े ले दू चार लमडेना यहू मन ल पड़ जथे,फेर  सच काहंव जादा किरपा जीव के जंजाल घलो होथे जईसे भस्मासुर।

                फकीर प्रसाद साहू

             "फक्कड़ "  सुरगी

व्यंग्य - हमर गाँव वार्ड बनगे

 व्यंग्य - हमर गाँव वार्ड बनगे

एटमबम तो भड़ाभड़ फूटबे करिस। संगे-संग लरी-लरी चुटचुटिया फटाका मन तको पड़पड़ावत फुटिस। सुनके बिसन्तीन बक खा गे। मुँह ल पोर्टेबल टीबी के साइज म फार दिस। बाजू म बइठे उदे ल कोहनी म हुदरत पूछथे - ‘कस हो ! नोनी पीला के अवतरे म तीन ठन फटाका फोरे के रिवाज हे। बाबू अवतरे म पाँच ठन फोरथे। फेर यहा काय पड़पड़ऊवन फोरे जात हे ? काकर घर अतेक कोरी-खइरखा लइका अवतर गे ?

 ‘हम दू हमर दू’ हँ जाँगर थके, जियान परे म ‘हम दू हमर एक’ होइस। एक के जगा अब कतको झिन ‘हमर एको नहीं’ के रट्टा मारे लग गे हे। अउ ये कोन हरे, ओकर घर भरका-भिंभोरा फूटत हे। बरदी-पाहट रेंगाए के मन हे कि क्रिकेट टीम बनाए के, ते उही जानय।’ 

उदे हाँसत कहिथे - ‘येहँ नेता अवतरे के फटाका ये।’

 ‘नेता अवतरे के ?’- बिसन्तीन चेंधिस। 

उदे हँ फरिहाके बताथे - ‘हमर इहाँ नेता आवत हे, तेकर स्वागत म ये फटाका फूटत हे, जाने।’ 

‘गाँव देहात म नेता मन के का काम ? इन्कर बूता न कुकुर के। भइगे लूट-लूट एति किंदर लूट-लूट ओति।’ 

‘हमर गाँव वार्ड बन गे पगली !’ 

‘अई ! त वार्ड तो सरी दिन रिहिसे। तहूँ एक पंचइत म वार्ड पंच रहे हस। ठऊँका काम बूता के बेरा म अढ़ोरे-बिल्होरे बर सब आ जवै। उही पइत ले तैं कोढ़िया होगे हवस। घर के काम-बूता म थोरको ध्यान नइ देवस। गोंह-गों ले खावत हस अउ गोल्लर कस किंजरत भर रहिथस। अउ का के नवा वार्ड ?’ 

‘वो वार्ड हँ पंचइती राज के रिहिसे। अब ये गाँव हँ पंचइत नइ रहि गे।’

‘पंचइती नइ रहिगे तभो ले अतेक पंचइती कहाँ ले होवत हे ? इहाँ के मनखेमन ल कम हे कहिथस ?’

 ‘येहँ सहर के निगम म संघरगे। एकरे उद्घाटन बर नेता मन आवत हे।’ 

‘अई ! त निगमे म सामिल होय ले हमर गाँव के का मान-मरजाद बाढ़ गे ? दुनिया भर के पंचइत तो सबो जगा हे। कुछु फायदा हे ते बता ?’ 

‘तौ नहीं त का ? अब जेन सुविधा सहर वाले मन ल मिलत रिहिसे, तेन सुविधा हमू मन ल मिलही। जगा-जगा नल लगही। गाँव के निकलती म सुग्घर, स्वच्छ अउ चमकदार महमहावत सौचालय घलो बनही। दूरिहा जाए बर नइ लगय। रात बिकाल पेट-मुड़ सब बर सुविधा हो जही। गली-गली म टूबलाइट बगबगाही...... भइगे उदे अतके भर कहि पाए रिहिसे कि चुमुक ले लाइन गोल हो गे। 

बिसन्तीन हाथ ल झर्रावत कहिस - ‘ये दे ! बर तो गे बंगबंग ले तोर गली-गली के टूबलाइट हँ।’ 

उदे चऊज-ठट्ठा करत कहिस - ‘तोर चंदा कस चुकचुक ले चेहरा के आगू म टूबलाइट कोन खेत के मुरई हे बिसन्तीन ?’ 

बिसन्तीन बगियाके आगी हो गे- ‘ये कीरहा-रोगहामन ल ठउँका दीया-चिमनी के बेरा हँ दिखथे लाइन गोल करे बर। वोमन अपन घर खात-पीयत नइ होही का ?’ अइसे कहिते-काहत पटपटौवन दूनो हाथ के अंगरी ल फोरे लगिस। 

उदे सोचिस - ‘लड़े ले टरे बने हे ददा ! नहिते ये चंडी हँ मोरे बंडी उतारके रख दिही।’  

महिना भर के बूलके ले चुटचुटिया के लरी फेर फूटत सुनके बिसन्तीन फेर उदे के माथा ल चाँटे लगिस - ‘ये हँ काए ?’

 उदे जना-मना चोरी करत पकड़ाए चोर कस मुड़ी ल गड़ियाए कहिस - ‘गाँव के निकलती म सुलभ बने हे, ओकर उद्घाटन हवय।’ 

‘जस-जस मँहगई बाढ़त हे तस-तस नेता मन के भाव अतेक गिरत हे जी ?’ 

‘तैं बने फोरियाके गोठियाए-बताए कर बिसन्तीन। तोर तिरपट-तिरछट गोठ हँ मोर भेजा ले पाँच हाथ ऊपरे-ऊपर उड़ा जथे। थोरको समझ नइ आवय।’ - अब उदे कंझटागे, तरूवा ल धरत बुड़बुड़ाइस।

मरद औरत ल भले झन संभाल सकय, एक मरद ल कइसे साजना-संभालना हे, औरत मन बर लइका खेलई के बरोबर होथे। 

बिसन्तीन सट्टे सपाट जुवाब दिस- ‘मैं कहेवँ बाबू के ददा ! नेतामन के अउ कोनो काम बूता नइ रहिगे का ? अब उन टट्टी खोली के तको उद्घाटन करे बर दऊड़े परत हे ?’

 बिहान भर मुँधियार कन उदे हँफरत आके गोठियाथे - ‘यहा काए ददा ! भारी मच्छर हो गे साले हँ ! मोर जम्मो पछीत भर दोरदोरा उपज गे वो।’

 जिहाँ चिटको पोंडा पाथे बिसन्तीन टाँग घुसेरे बर थोरको पाछु नइ राहय, कहिस- ‘नाक ल थोरिक अउ ऊँच करके नाच न, सुलभ बनैया हे कहिके। चंदोर बनाए हे। सुलभ बनाए हे। उहाँ पानी के बेवस्था न काँही। उप्पर ले दू रूपिया देबे त पेट ल खाली कर नइतो परे रहा बसियावत-बस्सावत।’

उदे समझाथे - ‘बिकास हँ हलु-हलु होथे रे जकली ! कोनो मिल नोहय जेमा एक डाहर धान ल ओइर अउ दूसर डाहर चाँऊर उछरे लगही।’

‘ह हो...... बने बात ल गोठियावत हस। गाँव के जम्मो खेत-खार अउ परियामन म कालोनी बन-तन गे। गाँव वालेमन निस्तारी अउ चरागन बर ललावत-चुचुवावत हवय। गाँव के गाय-गरूमन सड़क म किंदरत हे त बेंवारस पसु हरे कहिके काँजी हौस म ओइलावत हे। इही विकास ये ?’ 

‘मरत ल ठोसरा ठसाम, पोठलगहा बर काजू-बदाम !’

 बिहान भर दू झिन मनखे आइन अउ घर के अँगना ल भकाभक कोड़े लगिन। बिसन्तीन पूछथे - ‘यहा काए करथौ तुमन गा ?’ 

‘हमन नल लगावत हन बाई।’ 

जिहाँ लाभ के पानी पझरथे उहाँ बानी म लगाम देके ही भल के बँधानी ल भरे जाथे। नल के नाँव सुनके बिसन्तीन के मुँह बँधा-सिला गे। सोचिस - ‘चल रोगहा ल, दस कोस पानी बर रेंगे ल तो नइ परही अब।’ 

संझा काहत बिहिनिया हो गे। बिसन्तीन कनिहा ल धरे अगोरत खड़े हे। बाजू म जम्मो बरतन पानी के धार ल झोंके बर चातक चिरई कस मुँह ल फारे देखत हे। घंटो पहा गे, फेर नल म पानी नइ आइस। 

काबर आही ? वो तो किरिया खाए हे। पानी तो मिल अउ मालिक मन के ये। मरहा -खुरहा बर थोरे हरे। 

लइकामन मुँह म पानी भरके फोहारा-फोहारा खेलथे तइसे नल ल मुंधियार कन फर्र -फर्र करत देखके बिसन्तीन पूछथे - ‘कस हो बाबू के ददा ! अइसने विकास होथे का ?’ उदे के घलो मुँह सिला गे। का बोलय बपुरा हँ ? 

एक दिन अइसने बिसन्तीन हँ गली-दुवार ल बहार-बटोरके बने सुग्घर लीप डारे रहय। का देखथे ? डेरावाली मुँहरन दू-तीन झिन माइलोगनमन मुड़ भर लउठी म बाहरी बाँधे। कनिहा म खरतरिहा कमइया कस पटका बाँधे। बाहिर चौरा म माखुर गठत गपियात बइठे हे। पाउच खावत पच-पच लिपान म थूँकत हे। जम्मो कचरा अउ नाली के लद्दी-चिखला ल निकालके ओकर लीपे-बाहरे दुवार म सकेल दे हवय। बिसन्तीन के मति छरिया गे। 

बमकके कहिस - ‘तुमन का करथौ या ? जम्मो कचरा ल इही मेरन सकेल दे हवव। पाउच खा-खाके किचकिच ले थूँकत हौ अउ सफई करत हन कहिके सफई मारत हौ। माछी भनभनावत हे। फेंकौ येला। 

बाइमन कहिथे - ‘हमला तैं झन कह बाई ! जे कहना हे मुन्सीपाल्टी म जाके सिकायत कर। हमर बेरा होगे हे। हमन जावत हन’ - कहत उठिन अउ अँटियावत रेंग दिन। 

फेर एक दिन मुन्सीपाल्टी के मनखे आइन। घर के नाप-जोख कर लिन। लिख -पढ़के टेक्स के रसीद थमा दिन। घर के एक कोती दीवाल ल नवा-नवा देखके कहे लगिन - ‘ये घर ल कब बनवाए हौ ? जब बनवाए हौ त मुन्सीपाल्टी के परमिसन कइसे अउ काबर नइ ले हौ ? ओदारौ ये दीवाल ल।’ 

अतका ल सुन के बिसन्तीन जंगियागे। कहिस - ‘वाह गा चतूरा ! हमरे जगा, हमरे घर अउ तोर ले परमिसन लेबो। चल हट ये मेर ले।’

 मुन्सीपाल्टी वालेमन बिसन्तीन के काली रूप ल देखके उठिन अउ कुला झर्रावत रेंगते बनिन। 

अइसने एक दिन नाली अउ सफई टेक्स वाले मन आइन। दू दिन नइ बुलके पाइस। नल के बिल आ गे। बिसन्तीन के जी टेक्से- टेक्स म कऊवा गे। आखिर म एक दिन देखे बर मिलिस कि गाँव के जम्मो खेत-खार म मनमाड़े दर्रा-भरका फट गे हे। वो दर्रा मन ले मकान उपजे लगे हे। 

जगा-जगा गलीमन म दलालमन मड़ियावत-बइठत रिगबिग-सिगबिग दऊड़े लगे हे। 

गाँव के नाट चउँक म दारू भट्ठी खुल गे हे। अब लोगनमन एती भीनसरहा, ओती मुंधियार ले उंहेच् के भजन-कीर्तन म लगे रहिथे। 

गाँव के मंदिर-देवालामन के दीवाला निकल गे हे। चौपाल के गाल हँ चेपटी के आए ले चेपट के खोखस गे हे। कमइया जवानमन तको कोढ़िया होगे हवय। विकास अतेक तेज गति ले आइस कि लइकामन के सपाट चेहरा म जवानी ले पहिली बुढ़ापा पाँव मड़ाए लगे हे। 

लोगनमन जब भट्ठी के विरोध करिन, त पुलुसवालेमन विरोध करइयामन ल गजब सोंटयाइन। भट्ठी वालेमन अपन घर के छट्ठी कस पौवा बाँट-बाँटके आधा गाँव ल अपने कोती उन्डा लिन। पौवा-पौवा म लिखे हे पीनेवालन के नाँव। विरोध के कनिहा अइसने टूट गै।

 गाँव हँ अभीन उखरू होय बर नइ सीखे हे। गँवइहामन के दुनिया भर के टेक्स अउ बिजली के बिल म कनिहा-कुबर टूटे लग गे हे। मया-पिरीत के बोल राम-रमौवा हँ सुवारथ के बेंड़ी म बँधाय-छँदाय बोकबाय देखत भर हे। 

मनखे के थोथना म चाइना कंपनी के ‘चुकचुक-ले’ मुस्कुराहट हँ ‘चमचम-ले’ चिपक गे हे। असल मुस्कान नदारद होगे हवय। मया-पिरीत म भेंट होवइया फोकट के चना-चबेना, भाजी-पाला, धुर्रा अउ पानी असन जिनिस हँ बेचाय लग गे हे। 

गाँव के पइसा म सहर चकाचक हीरवइन कस संभर-ओढ़के मटमटाए लगे हे। कालोनीमन बिजली म चकाचक हे। गाँव अंधियार म सीतका कुरिया म बाघ गुर्राए कस हाल अब ले साँय-साँय करत हे। सड़कमन म आठो काल बारा महीना फागुन कस गुलाल धुर्रा उड़ावत हे। बड़े-बड़े कंपनी मन चोरी के बिजली म धकाधाक चलत हे। तिहाँ नोटिस तको नइ भेजावत हे। अउ गाँव म बिल नइ पटावत हौ कहिके कनेक्सन ल कचाकच काटे जात हे। 

गाँव वालेमन भइगे बोमियावत भर हे - ‘हमर गाँव वार्ड बनगे ! हमर गाँव वार्ड बनगे !!’


धर्मेन्द्र निर्मल 

9406096346

विकास के डोंगा##. ब्यंग

 ## विकास के डोंगा##.      ब्यंग 


     पाना पतेरा ला कनिहा मा लपेट के मरजाद ढ़ँकइया मनखे आज अतका उन्नति कर डारे हे कि जतका ढाँकत हे ओतके उघरत हे। ये तो बने हे कि छेरी नइ चगलत हे नइते आजो हम उही आदि मानव ले कम नइ हावन। पैडगरी अउ धरसा के जगा हाईवे अउ फोरलेन बनगे। ओकरो ले आगू मेटरो ट्रेन दँउड़त हे। ठूठी बाहरी के खरीदी आनलाईन होवत हे। तब लाईन मा लगके राशन खरीदना ये सदी के अपमान ही आय। आज हम विकसित ले विकासशील देश के नागरिक हवन। चहुंमुखी विकास के डोंगा बीच धारा मा लहरा के चलत हे। पीपर तरी बइठ के गांव ला आगू बढ़ाय बर सुधारे बर गोठ करे तेन मन डिजिटल बैठक करके मन के गोठ करत हें। एकर ले फायदा यहू हे कि सुन सकथस सुना नइ सकस। पसरा पसरा किंजर के छाँट के बंगाला बिसाने वाला मन आनलाईन मँगाये बर मोबाईल मा एप लोड करत हें। आनलाईन पढ़ई अउ अनुदान अंक ले पास के तालमेल बहुत बढ़िया चलत हे। हर सवाल के जवाब अब गुरुजी मन के जगा गूगल हर देवत हे। तब तो फैल होय के सवाले नइ उठे। विकास के डोंगा हर उथली धार मा घलो सरपट भागत हे। फेर कते डिलवा मा जा के झपाही कहे नइ जा सके। आज आदमी के हाथ मा सब कुछ हे। बजारवाद के जमाना मा बजार ला ही जरूरत समझ गेहन। आत्मनिर्भर होय के शंखनाद हो गेहे। स्वाभिमान अउ अभिमान ले मनखे हम के जगा मँय मँय काहत काहत मयखाना तक चल दिन। एक झन मितान के चिमनी उपर अतका श्रद्धा हे कि ओकर अस्तित्व ला बचाय बर जन जागरण के गीत बनाके गानत हे ये तो उही गोठ होगे कि छत्तीसगढ़ी ला बचाये बर सब झन ला उचकाव अउ घर मा हिन्दी बोलके लइका मन ला अँगरेजी इसकुल मा पढ़ाव। तभोले हम नइ पूछन कि डोंगा मा छेदा खुद विद्वान मन काबर करत  हे। शहर हर गांव ला अतका लदक डारे हे कि भाषा के असर बोलचाल मा देखते बनथे। हम तेरे से कमती हैं क्या? अतके कथे तभे समझ मा आ जाथे कि ये हर खाँटी हे। 

        छै महिना मा सड़क उखड़ जथे। एके बरसत मा नव पुलिया बोहा जथे। ये सब चिंता करे के विषय नोहे। कबर कि येला हम अपन उपलब्धि मान सकत हन। हम सड़क मा रेंगत हावन ये बड़े बात हे। नँदावत जिनिस ला संग्रहालय मा सजा के राखत हन। जीव जिनावर ला विदेश ले मँगावत हवन।  तब पीतर पाख बर भठत कउँवा के माँग सरकार ले तो करि सकथन। भठत नँदावत प्रजाति ला संरक्षण मिल जाही। एकर बहाना मनखे के चेतना हर तो जागही। उवत सुरुज ला पैलगी करके सुखी जीवन जीने वाला आदमी आज भक्ति भावना मा अतका बुड़ गेहे कि डाक पोष्ट ले गंगा जल मँगाके नहाथे तब सीता हरन के चौपाई ला गाथे। जे  मन सबो सुख सुविधा मा हे उही मन चिचियावत हे के डोंडा धारे धार बोहाथे कहिके। हमर देश तकनीक अउ विज्ञान मा अतका आगू बढ़गे हे कि मशीन अउ मिसाइल खुदे बनात हे। ये अलग बात हे कि बीड़ी सिपचाय बर लाइटर चीन ले मँगाथन। 

       डोंगा मा सवार दस होवय कि सौ जब तक ओकर खेवनहार कोनो राजनीतिक दल के नेता नइ रही पार नइ हो सके। समाज सेवा बर कोनो महात्मा गांधी मदर टेरेसा नइ आवय। आहीं तो बिगड़े छबि ला राजनीति के मइलाहा चद्दर मा ढांके प्रतिभा सम्पन्न मनखे हर ही आही। राज्य केन्द्र ले केन्द्र हर विश्व बैंक ले करजा ले ले के विकास के डोंगा ला खेवत हे। जेकर ले देश आत्मनिर्भरता के मोहाटी तक आ गेहे। मोफत के चाँउर अउ मनरेंगा के मजूरी सब मा लाल बत्ती वाले के नजर हे। हमर देश सबके साथ सबके विकास के हाना उपर काम करत हे। एक झन सफेद दाढ़ी चूँदी वाला भीष्म प्रतिज्ञा लेके बइठे हे कि खावँव न खावन देवँव। ओकरे नतीजा आय कि आय दिन ई डी सीडी अउ सी बी आई वाले मन पिछलग्गू दूध के धोवल मन घर छोड़ के परोसी मन घर के छापामारी ले फुरसत नइये। ओती एक झन हर दाढी तो बढ़ावत हे फेर प्रण लेय बर हाना जुमला खोजे नइ पावत हे। 

           विकास सरकार अउ नक्सली दुनो चाहत हे फेर अंतर के सँग डर ये हे कि नक्सलवाद के सिराये ले दुनो अपाहिज हो जाही। राजनीति के दुकान चलाय बर नक्सलवाद के खँचवा ला खँचवा ही रहना जरूरी हे। अउ फेर चुनाव बर मुद्दा खोजे नइ जाय, अपन होके बनाय जाथे। खुद ला पैदा करना पड़थे। विकास के डोंगा ला पार लगाय बर हर छोटे बड़े खादी टोपी वाले मन वचनबद्ध हे। फेर वचन तभे निभथे जब तकनीक तरीका ले कमीशन के आवा जाही होथे। अभी हाल अइसन हे कि नेंव कोनों दुसर धरथे अउ नाँव कोनो दुसर के होथे। तरक्की के हिमालय मा बैसाखी धरके चलइया मन झंडा गड़ियावत हे। नाक रेहे ले साख रथे। इँहा नकटा के नाक कटे ले सवा हाथ अउ बाढ़त हे। मंदिर जाव चाहे मदिरालय आखिर जाना तो मसानेघाट हे। जरूरी नइये कि मरे के ओखी दारू पी के होवय चाहे धरम सम्प्रदाय के दंगा फसाद मा चपका के मरव। चुनाव मतपत्र नहीं मशीन के गोपनीय तंत्र हर जीतत हे। जनता जुमला हाना मा जीयत हे। ओकरे सेती  मनखे धरती ला छोड़ के चंन्द्र मंगल ग्रह मा मरे बर अढ़ई ढीसमिल जगा पोगराय बर दलाल अउ एजेंट खोजे मा लगे हे। गिर के उठना बड़ साहस अउ हिम्मत के बात होथे। फेर जेन स्तर ले रूपिया गिरत हे ओकर ले अतका तो तय हे कि आने वाला समय मा सौ रुपिया के धनिया पान खाये बर निंहीं सुँघे बर ही मिल सकथे। 

             - - - - - ##--------          

                   राजकुमार चौधरी "रौना" 

                  टेड़ेसरा राजनांदगांव 🙏🏻

सन्तुलित बजट

 सन्तुलित  बजट 


   दारू के  बढ़त  प्रभाव  कुप्रभाव ला  देखत  हुए  मद्य विभाग के मंत्री हर अपन विभाग के सबो सचिव के एक पइत बैठक  बुलाइस कहिस -" केंद्र सरकार ये बछर दारूबंदी बछर घोषित करय,एकर बर राज्य मन ल अनुदान घलो दे जही।दारू ले होव इया नकसान, अउ जोखिम ला जन -जन तक हम ल पहुँचाना हे, एकर बर बडका कार्यक्रम के रूपरेखा घलो बनाय जाए, पूरा बछर के लेखा- जोखा आय-व्यय के बजट तुरते बनावय,मद्यनिषेध के  ये कार्यक्रम बर केंद्र  सरकार ले  ईनाम हमी ल मिलना चाही। दस दिन मा बजट बना के मोर  सामने  स्वीकृति बर रखे  जाय। 

    दस दिन पाछू मद्य विभाग के बजट, मंत्रीजी के नस आघु  रखे  गइस ।

    बजट मंत्रीजी के आघु रखत हुए प्रमुख सचिव हर  कहिस -" सर, बिशेषज्ञ मन कार्यक्रम के खर्चा, पोस्टर्, भाषण, कार्यशाला, विज्ञापन अउ ईनाम शुद्धा सात सौ करोड़ के बजट बताय हवे, जउन हमर आय ले सौ करोड़ अधिक आय। अब आपे  बतावव खर्चा मा  कहाँ ले कतका खर्चा कम करन, के  बजट  सन्तुलित हो जावय । "

    मंत्रीजी हर एक नजर बजट मा डारत हुए  कहिस -" खर्चा मा कोनो कटौती झन करें जाए । सबो  कार्यक्रम बने अउ प्रभावी हवे । हम ल पूरा जोस अउ होस के साथ दारूबंदी  बछर मनाना हवे । हमर राज्य दूसर ले आघु  रहना  चाही। "

    फेर सरजी,  वो सौ करोड़ कहाँ ले आही ? केंद्र एकर ले ज्यादा नी दे सकय। अपन वित्त मंत्रालय भी  कहत हवे कि, आप अपन आय हिसाब ले खर्चा  करव। हम कुछु नी दे सकन । एकर सेती सरजी, कुछु आयटम तो कम करे ल पडहीच। आपे  बतावव, कोन-् खर्चा कम करन।"  मुख्य सचिव ह  सब स्थिति ल  बनेगा फोरिया के कहिस।

   मंत्री महोदय  सरी बात ल सुनके एक घाव सबो कोती बजट  ऊपर  नजर डारिस अउ  कहिस -" नी -नी, दारूबंदी बछर धूम-धाम ले मनाना हवे । देखत नी अस, युवक मन मा ऐकर प्रवृत्ति बाढ़त जात हवे । हम ल सबो ल सोच के उपाय ल काम मा  लाना  हवे ।"

    "फेर सर, वो ...  बजट...."

    " तेहर वोकर फिकर झन कर।सरी कार्यक्रम  तुरन्ते लागू  करव। हमर विभाग  के नाम  होना चाही बस । खर्चा के फिकर नी हवे, बजट सन्तुलित हो जाहीबरोबर होही ।" मंत्री महोदय हर सचिव के बात  काटत हुए अउ आय के लेखा जोखा देखत हुए फट ले कहिस ।

             दूसर दिन, मद्य विभाग मंत्रालय ले दू सौ करोड़ के नवा दारूघर और नवा दारू करखाना बर  लाइसेन्स जारी कर  दे गिस। होइस न सुग्घर संतुलित बजट । 

                डॉमीताअग्रवाल मधुर

रायपुर छत्तीसगढ़


   दारू के  बढ़त  प्रभाव  कुप्रभाव ला  देखत  हुए  मद्य विभाग के मंत्री हर अपन विभाग के सबो सचिव के एक पइत बैठक  बुलाइस कहिस -" केंद्र सरकार ये बकरा दारूबंदी बछर घोषित  करय,एकर बर राज्य मनल अनुदान घलो दे जही। दारू ले होव इया नकसान, अउ जोखिम ला जन जन तक हम ल पहुँचाना हे, एकर बर बडका कार्यक्रमों के रूपरेखा बनाय जाए, पूरा बछर के आय-व्यय के बजट तुरते बनावय,मद्यनिषेध के  ये कार्यक्रम बर केंद्र  सरकार ले  ईनाम मिलना चाहि। दस दिन मा बजट बना के मोरे  सामने  स्वीकृति बर   रखे  जाना चाहि । 

    दस दिन पाछू मद्य विभाग के बजट, मंत्रीजी के सामने  रखे  गइस ।

    बजट मंत्रीजी के आघु रखत हुए प्रमुख सचिव हर  कहिस -" सर, विशेषज्ञ मन कार्यक्रम के खर्चा, पोस्टर्, भाषण, कार्यशाला, विज्ञापन अउ ईनाम शुद्धा सात सौ करोड़ बताय हवे, जउन हमर आय ले सौ करोड़ अधिक आय। अब आपे  बतावव खर्चा मा ले कहाँ कतका खर्चा कम करन, के  बजट  सन्तुलित हो जावय । "

    मंत्री महोदय हर एक नजर बजट मा डारत हुए  कहिस -" खर्चा मा कोनो कटौती झन करे जाए । सबो  कार्यक्रम बने अउ प्रभावी हवे । हम ल पूरा जोस अउ होस के साथ दारूबंदी  बछर मनाना हवे । हमर राज्य दूसर ले आघु  रहना  चाहि। "

    लेकिन सर,  वो सौ करोड़ कहाँ ले आही ? केंद्र एकर ले ज्यादा नी दे सकय। अपन वित्त मंत्रालय भी  कहत हवे कि आप अपने आय अनुसार खर्चा  करव। हम कुछु नी दे सकन । एकर सेती सर, कुछ आयटम तो कम करे ल पडहीच। आपे  बतावव, कोन-् खर्चा कम करन।"  मुख्य सचिव ह स्थिति ल स्पष्ट  करत  हुए  कहिस।

   मंत्री महोदय  सरी बात ल सुनके एक घाव सबो कोती बजट  ऊपर  नजर डारिस अउ  कहिस -" नी -नी, दारूबंदी बछर धूम-धाम ले मनाना हवे । देखत नी अस, युवक मन मामा ऐकर प्रवृत्ति बाढ़त जात हवे । हम ल सबो ल सोच के उपाय ल काम मा  लाना  हवे ।"

    "फेर सर, वो ...  बजट...."

    " तेहर वोकर फिकर झन कर।सरी कार्यक्रम  तुरन्ते लागू  करव। हमर विभाग  के नाम  होना चाहि । खर्चा के फिकर नी हवे, बजट सन्तुलित हो जाही ।" मंत्री महोदय हर सचिव के बात  काटत हुए अउ आय के लेखा जोखा देखत हुए  कहिस ।

    दूसर दिन, मद्य विभाग मंत्रालय ले दू सौ करोड़ के नवा दारूघर और नवा दारू करखाना बर  लाइसेन्स जारी कर  दे गिस। 

                   डॉ मीता अग्रवाल मधुर

रायपुर छत्तीसगढ़

समसामयिक बियंग लाकडाउन के समे *बाबा*

 समसामयिक बियंग लाकडाउन के समे

       *बाबा*

रामलाल के दुलहिन रमलिया अउ लईका मन हलाकान होगे।रामलाल ल कोन जनी का हो गेहे घर म मुड़ी ल गड़िया देहे।पहिली तो घर म एक मिनिट पाँव नि माढ़े।धरबाँध के हस्पताल लेगे रेहेन ऊहों  ले भगा दिस।कोन जनी एकर मूड़ी  म क बइठ गेहे।लगथे भगवान बरोबर मानथन तहू डाक्टर ह एकर बिमारी ल देख के डर्रा गेहे।का करबे बिपत म खुदे के अक्कल जर जथे।त पारा-परोस के मन काम आथे।पड़ोसी मन ल रमलिया के दुख देखे नि गीस।गाँव के नामी-गिरामी महराज ल बुलाईस।महराज पंचाग देख के आडा़-तीरछा खण्ड म गुना-भाग करके कहिथे येला तो बहीरी।हे भगवान हमन अकबकागेन पच्चीस तारिक ले तो हमन घरेच म हन फेर कोन बहीरी ले भीतरी खुसरगे।अवईया महिना  के तेरा तारिक के मन

थोकिन हल्का लागत रिहिस रातभर के पूजा-पाठ अंधन -बधंन।उम्मीद म त दुनियाँ कायम हे।चऊदा के बड़े फजर ले रामलाल थोकिन हाथ -पाँव मारथे फेर जस -जस दिन चढ़िस घड़ी म दस सवा दस बजिस फेर जस के तस ।रमलिया के बुध पतरागे।मोला कथे अब तही कछु ऊपाय बता बाबू तही थोकिन पढ़े -लिखे

हस।

            टीवी म देखे रेहेव एक ले बड़के एक बाबा,बाबा तमाशाराम,हिरो बाबा, स्वेचछा धारी बाबा,जामपाल बाबा,बाबा साफ -सफाया ।ऐके फोन म नम्बर् लगगे बाबा साफ-सफाया कर।बाबा,अहो भाग हमर धंधा अभी मंदा हे।रामलाल ल देख के पुछथे कब ले अइसन होवत हे।पच्चीस तारिक ले बाबा।पच्चीस के नेता जी के सम्बोधन सुने रिहिस ,हव बाबा।चऊदा तारिक के हव बाबा ।तीन मई के अउ सुनाना किरपा आना सुरु हो जही।जय हो बाबा साफ-सफाया की जय।

                     फकीर प्रसाद साहू

                         सुरगी 14-4-2020

व्यंग्य - चमाकोबदर

 व्यंग्य - चमाकोबदर 

एक रात पीपर के डारा म चमगेदरी सीर्सासन करत लटके रहय। एक झिन मंदहामुँहा घुघुवा लड़भड़ावत आइस अऊ ओकरे ऊपर ‘जझरंग-ले’ झपा गे। कामा अपट गेवँ कहिके सोचत-गुनत मुड़-धुनत घुघुवा उठिस। अकचकाए आँही -बाँही ल देखिस। का देखथे, चमगेदरी सीर्सासन म ओरमे हे। घुघुवा चकरित खा गे। आँखी ल छटकार दिस, मुँह ल फार दिस- 

‘अरे बाप रे ! रामदेव बबा ले बड़े आसन।’ 

घुघुवा के झपाए ले चमगेदरी झकनका गे। ओकर धियान भंग हो गे। वोहँ मनेमन अब्बड़ खुस हो गिस। सोचिस- ‘आखिर कोनो अनदेखना इरखाहा मन मोर असन विस्वामित्र के तपस्या भंग करे बर मेनका ल भेजी दिस।’ 

आँखी ल जगजग ले उघारके देखिस त का देखथे ? घुघुवा आँखी ल नटेरे वोला बोटोर-बोटोर देखत रहय। चमगेदरी के बहुरूपिया आसाराम हँ उदासाबाई म तब्दील हो गे। 

खिसियाइस - ‘अरे ! संस्कारहीन रहिस के संस्कारी औलाद। खुदे आके झपावत हस अऊ उल्टा मोहि ल आँखी देखाथस रे।’ 

घुघुवा तुरंत चमगेदरी के गोड़ म डंडासरन घोलन्ड गे - ‘वइसन बात नइ हे प्रभु !’

चमगेदरी कहिस - ‘अच्छा बेटा ! नाँव के सिक्षित साक्षर मनखे ले प्रसिक्षित होके आए हस। जिहाँ फँसे उहाँ घोलण्ड के नाक घिंसे। हँय .......!’

घुघुवा दूनो हाथ ल जोड़के एक गोड़ म खड़ा हो गे। कहिस - ‘साहेब मैं योग बबा ल घला अइसन करतब करत नइ देखे हौं। वोहँ तो भुइयाँ म सीर्सासन करथे। तुमन तो अधर म कर डारथौ। तुँहर किरपा बरसतिस ते महूँ सीख लेतेवँ कहिथवँ।’ 

पतरी देखै चाँटै कुकुर 

गठरी देखै काहै हुजूर

का फरक मनखे कुकुर

धुर्र धुर्र धुर्र धुर्र धुर्र.......   

चमगेदरी मुड़ ल हलावत कहिथे - ‘हूँ......। ओ चमाकोबदर मनखे तोला कोलिहा (सियार) के हुसियारी घलो सिखो डारे हे। घुघुवा के कान डम्फर के पीछौत कस टेंड़ा गे। बक खाके मुँह ल फार दिस। अकर-जकर ल बकर-बकर देखत पूछिस : ‘चमाकोबदर ! ये चमाकोबदर का होथे भई ?’ 

ओतका म चमगेदरी भड़क गे। कड़किस - ‘स्साले ! तोर कनपटी म अइसे ‘झम्म-ले’ तानपुरा बजाहूँ के ‘बंग-ले’ आँखी बर जही। आगू कहिस - ‘देखा देस न अपन औकात ल। आ गेस नहीं मनखे के कुत्तईपना म। पहिली प्रभु कहेस। फेर गुरू म उतरेस। अब भाई म गिर गेस।’

‘अगास ले गिरे खजूर म अटके।’

‘अंगरी धरत-धरत घेंच ल धरबे का रे ! मैं सहिस्नु हौं येकर मतलब तैं कुछ भी बोले-बके जाबे।’ 

घुघुवा सुकुरदुम हो गे। मारे डरके काँपे लगिस लदलद-लदलद। हाथ जोरके रोनहू मुँह बनावत कहिस - ‘छिमा करो प्रभु ! मोर ले भारी-भरकम भूल हो गे।’ 

‘अरे उल्लू के पट्ठा ! टेटका बरोबर भक्कम रंग घला बदलथस। ये मंगरा के आँसू ल बंद कर अऊ सोझ-बाय बता, तोला योग सीखना हे के नहीं ?’ 

घुघुवा कहिस - ‘सीखना हे प्रभु ! सीखना हे।’ 

‘हाँ, त सुन ! बिना फीस के फुस-फास काँही नइ होवय। गुरूजी किताब नइ उघारय। आफिस के बाबू फाईल नइ हलावय-डोलावय। डाक्टरमन नाड़ी छूवय, न वकील मुँह उलावय-खोलय। त तैं कइसे समझ लेस कि अपन ग्यान के पिटारा ल मैं सुक्खा, फोकट अउ बिगारी म खोल देहूँ ?’ 

घुघुवा बोलिस - ‘आपे मन कुछु रद्दा बतावव। मैं अबड़े अबूझ हौं, किरपा करके आपे समझावव गुरूदेव !’ 

‘समझाहूँ। सब के मतलब बताहूँ। दम धर। पहिली तैं ये बता, जेने म खाना उही ल भोंगरा करना सीखे हस।’ 

घुघुवा मुड़ ल डोलाइस - ‘नहीं।’

‘त काए सीखे हस रे भोकवा ?’ फेर कहिथे -‘अच्छा ! समझ गेवँ। त वो बइमान मनखे तोला फरजी डिगरी भर ल धरा दिस। तैं अइसे कर, तुरते जा। बिसनू-लक्ष्मी अभी छीरसागर म मीटिंग-सीटिंग म व्यस्त होही। धीरे से एकात बंडल गाँधी छप्पा उठाके ले लान। जब फीस पटही तभे तोर पढ़ई सुरू होही। नइते ‘शिक्षा के अधिकार’ के तहत तोर भरती तो कर लेहूँ, फेर पढ़ई के बेवस्था उही गरीबी रेखा किसम ले होही।’

चोरी के नाम सुनके घुघुवा के घिग्घी बँधा गे। डर के मारे काँपत कहिस : ‘अऊ कहूँ जान परही त ? घू घू घू ......।’

‘अरे ! अभीन ले हवा-पानी बंद हो गे।’ चमगेदरी आँखीं ल चमकावत कहिस - ‘बेटा ! गीदड़ धमकी दे भर ल जानथस। दम-वम कुछु नइ हे। घू घू घू घू कहिके लोगन ल डरवाए भर ल आथे। कतका पढ़े हस रे ?’

घुघुवा छाती ल तनियावत कहिथे - ‘बी. काम. पास हौं।’ 

‘बी.काम. रहस कि एम.काम. रहस कुल मिलाके पढ़े-लिखे बेकाम बइला हस। लछमी मेहरबान तिहाँ घुघुवा प्रधान। ले चल जा, बाते करत-कढ़ारत खड़े झन रहा।’

घुघुवा रहिस तेन दऊड़के गिस। पाँच बंडल गाँधी छप्पा धरके हँफरत आ गे। 

चमगेदरी कहिस - ‘साब्बास बेटा ! अब ये बता। बिहनिया दाँत-मुँह म झाड़ू -पोछा करथस कि नहीं ?’ 

घुघुवा गुटका म रचे-पींवराए अपन बत्तीसी ल खबखब ले उघार दिस - ‘हौ’ अउ मोबाइल ल देखावत कहिथे - येदे ब्रस करत सेल्फी घलो ले हौं।’

‘अब भूलके मत करबे।’ 

घुघुवा चेंधिस - ‘काबर ?’ 

चमगेदरी कहिस - ‘ले पहिली वो चमाकोबदर मनखे के गुन ल सुन-सीख।’ 

घुघुवा के समझ म मनखे तो आ गे। फेर चमाकोबदर ल सुनके जिग्यासाबस कान ल फेर टेंड़ दिस - ‘चमाकोबदर !’ 

अन्तर्यामी चमगेदरी घुघुवा के अंतस ल पढ़ डारिस - ‘स्साले ! बी. काम. पास हस फेर गदहा ले इंच भर कम नइ हस। उहीच्-उही बात ल घेरी-घँव पूछथस। काए पढ़े-लिखे हस रे !’ 

‘भेंड़िया धसान कस नौकरी के चक्कर म जिहाँ पाथस उँहे फारम भर भरत-भटकत हस।’ घुघुवा ल बइठे के इसारा करत आगू कहिस - ‘तोर मन के मन्सूबा काबर रहय ? तोला सबले पहिली मनखे के औकात ले साक्षात्कार करा देथौं, तेकर पीछू आगू-पाछू ल पढ़ाहौं।’

घुघुवा पालथी मारके बइठत कहिस - ‘मनखे जे होथे न वोहँ सबसे उच्च कोटि के नीच प्रानी होथे। वोकर हाल ’‘दिखत के साम सुंदर पादे म ढमक्का’’ ले कम नइ होवय।’ 

‘मीठ-मीठ खाथे भर। मीठ बोली बोल नइ सकय। खाए बर तो पिस्ता, बदाम, काजू, किसमिस खाथे फेर जब गोठियाथे गुहइन-गुहइन । उप्पर ले खुस्बूदार सौचालय अऊ चमकदार सफई के गोठ करथे।’ 

‘एक से एक पेस्ट करथे तभो मुँह बस्सावत रहिथे। क्रीम, पावडर, सेंट चुपरथे -पोतथे। थोथना भर चमकथे। मन मलीन हे। मन ले गंदगी जाबे नइ करय - 

मीन सदा जल म रहय, कतको धो बस्साय। 

कतको धन-दोगानी ल दारू म बोहवा देथे। पियासे ल दू बूँद पानी नइ पीयाए सकय। कतको पइसा ल गुटका-माखुर खाके थूँक देथे। भूखे ल भोजन कराए बर जियान परथे।’ 

पखरा के मंदिर म लाखो दान करथे फेर गरीब के हाल-चाल पूछे बर छाती धसके लगथे।

कुकुर के हागे लीपे के न थोपे के तेन ल इन दूध बिस्कुट खवाथे। संग म सुताथे। चाँटथे-चँटवाथे, चुमथे-पुचकारथे। दूध-घी के देवइया गाय बर पसिया नइ निकलय।

उल-जलुल कुछ भी बोलत-बकत रहिथे। अनाप-सनाप बयानबाजी करत रहिथे। छींही-छींही बात बर लड़ई। तहीं बता अइसन चटक-मटक चेहरे भर के का मतलब ? मुँहे भर के धोए ले का मतलब ? ओकर ले ब्रसे मत कर तेने बने हे। 

मोर बात मान, तहूँ मोरे कस हो जा। जेने मुँह म खाथस उही मुँह ले हग। मन कइसनो बिरबिट करिया रहय, तन उज्जर-ओग्गर होना, झक्क दिखना अउ फक्क रहना चाही। ये स्साले मनखे जात हँ गदहा, कुकुर, कोलिहा, टेटका, मंगरा, बेंदरा, सुरा सबके मिलवट बेंवारस औलाद हरे। इन्कर बर दुनिया के जम्मो गारी कम हे। सब बेकार हे। ऊँट के मुँह बर जीरा बरोबर हे। 

सस्ता रोवय घेरी-बेरी, महँगा झाड़य हमेरी।

मैं सोचेवँ, सोनार के ठुक-ठुक लोहार के ‘भकरस-ले’ कस एके ठन जोरदरहा गारी होना चाही।

ओकरे सेती मैं हँ दुनिया भर के सब्बो गारी ल सकेलेवँ। पहिली सबो ल अलग -अलग चिखेवँ-चाँटेवँ। चिचोरेवँ-चाबेवँ। सुवाद ल परखेवँ। अपन तन-मन म उन्कर असर देखेवँ। तेकर पाछू सब्बो ल मिलाके पीसेवँ-फेंटेवँ । सेव-सेवके राखेवँ। मति ल भयंकर मताएवँ।

फेर चिखेवँ-चाँटेवँ। चिचोरेवँ-चाबेवँ। अपन प्राइभेट कंपनी म छै महिना ले सोध करेवँ। तब जाके सातवा महिना म नवा गारी के निर्मान करेवँ। जेन हँ सिरिफ अऊ सिरिफ मनखेमन बर एकदम सर्वसुलभ, बहुपयोगी, सबले सस्ता, सुग्घर अउ टिकाउ हवय - 

ओ गारी हे - ‘चमाकोबदर !’ 


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

व्यंग "तड़कफांस"

 व्यंग "तड़कफांस"

बरदीहा मन  पहाट ल बढ़ हियाव ले राखथे। पाहट म रंग बिरंगी नाना परकार के गाय गरु रहिथे।  अलग-अलग गली मोहल्ला के तभो ले चीन डारथे उंकर नजर कोनो नेता ले कम थोड़ी आए दूरियां ले जान डारथे ये  दे फलाना घर के हरही गाय आए। उंकर कामे काए जी? वहुमन ल बरदी चराए के एक्सपीरियंस रहिथे।  हर्रे थुर्रे काहत दिन भर पहा देथे, अउ जईसे संझा होथे गरुवा मन अईसे भागथे  जईसे कोनो नेता के रैली होथे,अउ आदमी मन पुड़ी सब्जी बर टूट पड़थे। बरदिहा मन के बढ़ ताकत एके ही इसारा काफी रहिथे। बारवाही के समे कतको  मरखडीं , हड़बड़ही राहय  सहिला -साहिला के दुहूं डारथे । फेर गरवा मन ऊपर आज बिपत आन पड़े हैं तरिया के पानी सूखागे,   खेतखार म चारा नई हे, गरवा मन बोंबीयावत हे। न तो बरदीहा छेंकत हे न गोसइया,। सब दूरिया ले  आंखी सेंकत हे।मोला लागते ये बीमारी तड़कफांस ले  जादा खतरा हे।

           फकीर प्रसाद   

            "फक्कड़"🙏

           २५-५-२०२०लाकडाउन