Friday, 31 March 2023

सुर-बईहा* *(छत्तीसगढ़ी कहानी)*

 -


    





                  *सुर-बईहा*


          *(छत्तीसगढ़ी कहानी)*


              हमन पाँच संगवारी गुरु के चरन मा बईठ के रमायन पोथी सीखे के उजोग करे रहेन । गुरु-सिस चाला हर हमर ये। येई हर हमर भारतीय संस्कृति आय। बिन गुरू गयान कहाँ... ! येकरे सेथी रमायन के मरम ला कुछु अरथ मा समझ के फेर कंठ साधना करके रमायन मंडली बनाय के हिच्छा हमन के मन मा रहिस । मानसाय के घर के पाछु कोती के खाली खोली मा अब अगर धूप कहरे बर लाग गय रहिस | सनातन महाराज ... जाँत-पाँत के

गोठ ला तियाग के येई कोती हमर पारा आके रमायन गान सिखोय के सुरु करे रहिन । मानसाय, बहादुल, झनक, केंगटा अऊ मैं,

अतका झन तो पक्का रहेन, एक दू झन अऊ आन संगवारी मन घलो आ जाँय अऊ चिमटा, खड़ताल हर मात जाय । अवईया जवईया मन

देख के मुचकाय घलो। वोमन के हाँसे मुचकाय मा गहरा अरथ हर छुपे रहे फेर हमन कुछु नई कहन काकरो से ।


             हमन के ये उजोग हर स्कूल कस पढ़ई रहिस । पहिली महराज हर हमन ला दोहा - चौपाई के सधारन अरथ फेर वोमन के असली मरम ला बूझाय के कोसिस करें तेकर पाछु सब झनजुर मिल के सुर ला उठावन। मैं पेटी मा अंगुरी नचाय के कोसिस करँव त केंकटा के बाँटा मा तबला - डुग्गी रहेय अऊ बाकी संगवारी मन आन अलंकार बाजा मन ला संभाले । अईसनहा बच्छर भर करे के बाद

गुरु महराज ला लागिस कि ये चिरईया मन अब थोर मोर उड़े के काबिल हो गय हें । एकरे बर एक दिन वो कहिन... दऊ हो अब येती

बर... तुहर अभ्यास अऊ विस्वास हर ही गुरु आय। पहिली रमायन के दोहा -चौपाई मन के अरथ मा बूड़ जावा फेर माता सरसती-भवानी

तुँहर कण्ठ मा खुद आ बिराजहीं फेर देखिहा तुँहर  कंठ ले उपजे नाद-बरम्ह हर कईसे सुनईया मन ला भाव - समुंदर मा बोर दिही ।


           येला सुनके हमर जीहर धक्क ले करिस । दुख ये बात के लिए,अब गुरु हर सिखोय बर बंद करते हे फेर खुसियाली ये बात के रहिस कि अब हमन अपन साज-सिंगार ला धर के नवधा.. साप्ताहिक

रमायन मा गाये बजाये जाय सकबो । गुरु महराज छेवर मा कहिन...

बेटा हो, गीता रमायन ला तो छूये कि हिच्छा तो करत हावा फेर... पढ़े बर रामायन पोथी अउ कीरा परे भीतर कोती... झन होवे...

बस्स येईच्च हर मोर आखिरी दिक्छा... मंतरा आय । 


           हमन सब के सब उन्कर चरन ला धर दारेन । गुरु तो हमन ला समारत भर रहिन ।


     *               *            *               *


            मैं तरिया मा नहावत पूरब के अगास मा रगबगात भगवान उदित नरायन ला ओंजरी ओंजरी पानी के अरध देवत रहँय कि वोतकीच बेरा कोन जानी कहाँ कोती ला गुरु महराज के बानी रमायन के चौपाई के रुप मा मोर भीतरी कान अऊ हिरदे मा गूँजे बर लागिस... पर हित सरिस धरम नहीं भाई... पर पीड़ा सम नहीं

अघमाई। एक पईत मोर नजर तो वो सुरुज नरायन से मिल गय अऊ मोला लागिस वोहू हर ये गोठ के हुँकारू देवत हें । मैं अपन आखा -बाखा देखें सबेच्च कोती एईच्च गोठ गूँजत हे कहू लागत रहे.... परहित

सरिस धरम नहीं भाई... | मैं पानी से बाहिर निकल आँय हाथ ला जोरे-जोरे...। 


          तीर के पथरा मा भकवा डोकरा अपन अंगोछा ले पीठ ला लगरे के कोसिस करत रहय फेर हाथ हर उहाँ तक नइ अमरात रहे । ये ला देखके मैं वोकर पीठ ला लगरे... लगरे करें । एक पईत तो वोहर मोर मुँहु ला देखिस बट्ट ले फेर हाँसत कहिस, जुग-जुग जी बेटा सील लोढ़ा मा पीसके खा.. । 

तोरे कस बबा.. मैं कहेंव अऊ वोला लगर घस्स के उप्पर आ गँय तरिया के पार मा। सैलिन बई हर बाँगा मा पानी बोहे रहिस अऊ धीरे रेंगत रहिस। मैं वोकर तीर मा जाके टप ले वोकर पनिहा ला मोर खाँद मा मढ़ा लेये... दे बई मोला कहत। बई मोर मुँह ला देखत रहि गय पाछु-पाछु रेंगत ।


            घर आके तेल फुल चुपर के मैं खोर कोती निकल आँय । आज मोर मन मा हिच्छा होवत रहिस के जब हमर सास्तर हर... वसुधैवव कुटुम्बकम कहत हे फेर तब  तो ये सब मनखे अपनेच आँय। एकर सेती

आज मैं गाँव भर के सब्बो घर ला जाँहाँ वोमन दुख -दरद हाल- चाल पूछहाँ। मैं अईसन करें घलव... । जे डेहरी मा कभ्भु नई जाना हो

उहाँ तक भी गँय अऊ राम जोहार करके आयें। सबके सब मोला अचरज मा देंखे... का होगय एला कहिके ।


           बेरा चढ़त ले मैं मोतीलाल के डेहरी ले आँवत रहें कि पाछु ले वोकर गोठ मोर कान मा पर गईस। “ये छोकरा हर सुरबईहा गय हे देख न गाँव भर ला घरो-घर किंजरत हें।'' 


        घर आयें अऊ अपन गुसाईन ला सब बात बताये लागें त वो कहिस... ये सब ठीक हे... | रमासन पोथी सब ठीक हे... फेर..?


            वो चुप हो गय रहिस।



*रामनाथ साहू*



-

1 अप्रैल - दाऊ मंदराजी के 112 वीं जयंती मा विशेष

 


हमर पुरखा 


1 अप्रैल - दाऊ मंदराजी  के 112 वीं जयंती मा विशेष 




नाचा के  पुरोधा – मंदराजी दाऊ 




धान के कटोरा छत्तीसगढ़ के लोक कला अउ संस्कृति के अलग पहचान हवय । हमर प्रदेश के लोकनाट्य नाचा, पंथी नृत्य, पण्डवानी, भरथरी, चन्देनी के संगे संग आदिवासी नृत्य के सोर हमर देश के साथ विश्व मा घलो अलगे छाप छोड़िस हे। पंथी नर्तक स्व. देवदास बंजारे ,पण्डवानी गायक झाड़ू राम देवांगन, तीजन बाई, ऋतु वर्मा, भरथरी गायिका सुरुज बाई खांडे जइसन कला साधक मन हा छत्तीसगढ़ अउ भारत के नाम ला दुनिया भर मा बगराइस हवय. रंगकर्मी हबीब तनवीर के माध्यम ले जिहां छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकार लालू राम (बिसाहू साहू),भुलवा राम, मदन निषाद, गोविन्द राम निर्मलकर, फिदा बाई  मरकाम, माला बाई मरकाम हा अपन अभिनय क्षमता के लोहा मनवाइस. ये नाचा के नामी कलाकार मन हा एक समय नाचा के सियान मंदराजी दाऊ के अगुवाई मा काम करे रिहिन ।मंदराजी दाऊ हा नाचा के पितृ पुरुष हरय. वो हा एक अइसन तपस्वी कलाकार रिहिस जउन हा नाचा के खातिर अपन संपत्ति ला सरबस दांव मा लगा दिस ।


   जीवन परिचय 


    नाचा के पुरोधा  दाऊ मंदराजी के जन्म संस्कारधानी शहर राजनांदगांव ले 5  किलोमीटर दूरिहा रवेली गांव मा एक माल गुजार परिवार मा  1 अप्रैल 1911 मा होय रिहिन. उंकर ददा के नांव दाऊ रामाधीन साव रिहिन.  मंदरा जी के सही नांव दुलार सिंह साव रिहिन । वोकर नाना जी हा वोला मंदराजी कहिके बुलाय तब ले वोकर इही नांव के सोर बगरगे.


1922 मा ओकर प्राथमिक शिक्षा हा पूरा होइस।दुलार सिंह के मन पढ़ई लिखई मा नई लगत रिहिन । ओकर धियान नाचा - पेखा डहर जादा राहय । रवेली अउ आस पास गांव मा जब नाचा होवय तब बालक दुलार सिंह हा रात रात भर जाग के नाचा देखय ।एकर ले 

ओकर मन मा घलो चिकारा, तबला बजाय के धुन सवार होगे. वो समय रवेली गांव मा थोरकिन लोक कला के जानकार कलाकार रिहिस । ऊंकर मन ले मंदराजी हा 

चिकारा, तबला बजाय के संग गाना गाये  ला घलो सीख गे ।


    नाचा दल के गठन करिन 


 अब मंदरा जी हा ये काम मा पूरा रमगे ।वो समय नाचा के कोई बढ़िया से संगठित पार्टी नइ रिहिस । नाचा के प्रस्तुति मा घलो मनोरंजन के नाम मा द्विअर्थी संवाद बोले जाय ।येकर ले बालक दुलार के मन ला गजब ठेस पहुंचे ।वोहा अपन गांव के लोक कलाकार मन ला लेके 1928-29 मा रवेली नाचा पार्टी के गठन करिन ।ये दल हा छत्तीसगढ़ मा नाचा के पहिली संगठित दल बनगे ।वो समय खड़े साज चलय । कलाकार मन अपन साज बाज ला कनिहा मा बांधके अउ नरी मा लटका के नाचा ला प्रस्तुत करय ।

 मंदराजी के नाचा डहर नशा अब्बड़ लगाव ला देखके वोकर पिता जी हा अब्बड़ डांट फटकार करय ।अउ चिन्ता करे लगगे कि दुलार हा अइसने करत रहि ता ओकर जिनगी के गाड़ी कइसे चल पाही । अउ एकर सेती ओकर बिहाव 14 बरस के उमर मा दुर्ग जिले के भोथली गांव (तिरगा) के राम्हिन बाई के साथ कर दिस ।बिहाव होय के बाद घलो नाचा के प्रति ओकर रुचि मा कोनो कमी नइ आइस ।शुरु मा ओकर गोसइन हा घलो एकर विरोध करिन कि सिरिफ नाचा ले जिनगी कइसे चलही पर बाद मा 

वोकर साधना मा बाधा पड़ना ठीक नइ समझिस ।अब वोकर गोसइन हा घलो वोकर काम मा सहयोग करे लगिन अउ उंकर घर अवइया कलाकार मन के खाना बेवस्था मा सहयोग करे लगिन ।


खड़े साज के जगह बैठक साज 


 सन् 1932 के बात हरय ।वो समय नाचा के गम्मत कलाकार 

सुकलू ठाकुर (लोहारा -भर्रीटोला) अउ नोहर दास मानिकपुरी (अछोली, खेरथा) रिहिस ।कन्हारपुरी के माल गुजार हा सुकलू ठाकुर अउ नोहर मानिकपुरी के कार्यक्रम अपन गांव मा रखिस ।ये कार्यक्रम मा मंदरा जी दाऊ जी हा चिकारा बजाइन ।ये कार्यक्रम ले खुश होके दाऊ जी हा सुकलू

अउ नोहर मानिकपुरी ला शामिल करके रवेली नाचा पार्टी के ऐतिहासिक गठन करिस ।अब खड़े साज के जगह सबो वादक कलाकार बइठ के बाजा बजाय लागिस ।


कलकत्ता ले हारमोनियम खरीदिस अउ टाटानगर मा सीखिस 


सन् 1933-34 मा मंदराजी दाऊ अपन मौसा टीकमनाथ साव ( लोक संगीतकार स्व. खुमाम साव के पिताजी )अउ अपन मामा नीलकंठ साहू के संग हारमोनियम खरीदे बर कलकत्ता गिस ।ये समय वोमन 8 दिन टाटानगर मा  घलो रुके रिहिस ।इही 8 दिन मा ये तीनों टाटानगर के एक हारमोनियम वादक ले हारमोनियम बजाय ला सीखिस ।बाद मा अपन मिहनत ले दाऊजी हा हारमोनियम बजाय मा बने पारंगत होगे । अब नाचा मा चिकारा के जगह हारमोनियम बजे ला लगिस ।सन् 1939-40 तक रवेली नाचा दल हमर छत्तीसगढ़ के सबले प्रसिद्ध दल बन गे रिहिस ।


नामी कलाकार मन ले सजगे रवेली नाचा पार्टी


   सन् 1941-42 तक कुरुद (राजिम) मा एक बढ़िया नाचा दल गठित होगे रिहिस ।ये मंडली मा बिसाहू राम (लालू राम) साहू जइसे गजब के परी नर्तक रिहिन। 1943-44 मा लालू राम साहू हा कुरुद पार्टी ला छोड़के रवेली नाचा पार्टी मा शामिल होगे ।इही साल हारमोनियम वादक अउ लोक संगीतकार खुमान साव जी 14 बरस के उमर मा मंदराजी दाऊ के नाचा दल ले जुड़गे ।खुमान जी हा वोकर मौसी के बेटा रिहिन ।इही साल गजब के गम्तिहा कलाकार मदन निषाद (गुंगेरी नवागांव), पुसूराम यादव अउ जगन्नाथ निर्मलकर मन घलो दाऊजी के दल मा आगे ।अब ये प्रकार ले अब रवेली नाचा दल हा लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, खुमान लाल साव, नोहर दास मानिकपुरी, पंचराम देवदास, जगन्नाथ निर्मलकर, गोविन्द निर्मलकर, रुप राम साहू, गुलाब चन्द जैन, श्रीमती फिदा मरकाम, श्रीमती माला मरकाम जइसे नाचा के बड़का कलाकार मन ले सजगे । 1936 के आस -पास रवेली नाचा पार्टी मा मशाल के जगह पेट्रोमेक्स के उपयोग चालू होइस.


 जब अंग्रेज सरकार नाचा के प्रदर्शन ले

घबराइस 


   नाचा के माध्यम ले दाऊ मंदराजी हा समाज मा फइले बुराई छुआछूत, बाल बिहाव के विरुद्ध लड़ाई लड़िन अउ लोगन मन ला जागरुक करे के काम करिन ।नाचा प्रदर्शन के समय कलाकार मन हा जोश मा आके अंग्रेज सरकार के विरोध मा संवाद घलो बोलके देश प्रेम के परिचय देवय ।अइसने आमदी (दुर्ग) मा मंदराजी के नाचा कार्यक्रम ला रोके बर अंग्रेज सरकार के पुलिस पहुंच गे रिहिन। 


वोहर मेहतरीन, पोंगा पंडित गम्मत के माध्यम ले छुअाछूत दूर करे के उदिम, ईरानी गम्मत मा हिन्दू मुसलमान मा एकता स्थापित करे के प्रयास, बुढ़वा बिहाव के माध्यम ले बाल बिहाव अउ बेमेल बिहाव ला रोकना, अउ मरानिन गम्मत के माध्यम ले देवर अउ भौजी के पवित्र रिश्ता के रुप मा सामने लाके समाज मा जन जागृति फैलाय के काम करिस ।


1940 से 1952 तक तक रवेली नाचा दल के भारी धूम रिहिन ।


कलाकार मन के बिखराव 


 सन् 1952 मा फरवरी मा मंड़ई के अवसर मा पिनकापार (बालोद )वाले दाऊ रामचंद्र देशमुख हा रवेली अउ रिंगनी नाचा दल के प्रमुख कलाकार मन ला नाचा कार्यक्रम बर नेवता दिस । पर ये दूनो दल के संचालक नइ रिहिन। अइसने 1953 मा घलो होइस ।ये सब परिस्थिति मा रवेली अउ रिंगनी (भिलाई) हा एके मा शामिल (विलय) होगे ।एकर संचालक लालू राम साहू बनिस ।मंदराजी दाऊ येमा सिरिफ वादक कलाकार के रुप मा शामिल करे गिस । अउ इन्चे ले रवेली अउ रिंगनी दल के किस्मत खराब होय लगिस ।रवेली अउ रिंगनी के सब बने बने कलाकार दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा संचालित छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल मा शामिल होगे ।पर कुछ समय बाद ही छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल के कार्यक्रम सप्रे स्कूल रायपुर मा होत रिहिस।ये कार्यक्रम हा गजब सफल होइस ।ये कार्यक्रम ला देखे बर प्रसिद्ध रंगककर्मी हबीब तनवीर हा आय रिहिन ।वोहर उदिम करके रिंगनी रवेली के कलाकार लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, ठाकुर राम, बापू दास, भुलऊ राम, शिवदयाल मन ला नया थियेटर दिल्ली मा शामिल कर लिस ।ये कलाकार मन हा दुनिया भर मा अपन अभिनय ले नाम घलो कमाइस अउ छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा के सोर बगराइस । पर इंकर मन के जमगरहा नेंव रवेली अउ रिंगनी दल मा बने रिहिन ।


घर  मा बंटवारा


  एती मंदरा जी दाऊ के घर भाई बंटवारा होगे ।वोहर अब्बड़ संपन्न रिहिन ।वोहर अपन संपत्ति ला नाचा अउ नाचा के कलाकार मन के आव -भगत मा सिरा दिस ।वोहा कलाकार मन ला आर्थिक सहयोग घलो करय. तीन सौ ले अधिक एकड़ के जमींदार के अंत मा अइसे दशा होगे कि खुद ला आर्थिक मदद के जरूरत पड़े लागिस. 

दाऊ जी हा अपन कलाकारी के सउक ला पूरा करे खातिर छोटे -छोटे नाचा पार्टी मा जाय के शुरु कर दिस । धन -दउलत कम होय के बाद संगी - साथी मन घलो छूटत गिस । वोकर दूसर गांव बागनदी के जमींदारी हा घलो छिनागे ।स्वाभिमानी मंदरा जी कोनो ले कुछ नइ काहय । अपन साथी कलाकार मन ले धोखा खाके दाऊजी अंदर ले टूटगे!


 बीएसपी द्वारा सम्मानित 


मंदराजी दाऊ ला नाचा मा वोकर अमूल्य योगदान खातिर  जीवन के आखिरी समय मा भिलाई स्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग द्वारा मई 1984 मा सम्मानित करिस । अंदर ले टूट चुके दाऊ जी सम्मान पाके भाव विभोर होगे ।


 सम्मानित होय के बाद सितंबर 1984 मा अपन दूसर गांव बागनदी के नवापारा( नवाटोला) मा पंडवानी कार्यक्रम मा गिस । इहां वोकर तबियत खराब होगे ।वोला रवेली लाय गिस । 24 सितंबर 1984 मा नाचा के पुरोधा हां  अपन नश्वर शरीर ला छोड़के स्वर्गवासी बनगे. 


स्व. मंदरा जी दाऊ हा एक गीत गावय – “


 दौलत तो कमाती है दुनिया पर नाम कमाना मुश्किल है “.दाऊ जी हा अपन दउलत गंवा के नांव कमाइन ।

 मंदराजी के जन्म दिवस 1 अप्रैल के दिन हर साल 1993 से लगातार मंदरा जी महोत्सव आयोजित करे जाथे ।1992 मा ये कार्यक्रम हा कन्हारपुरी मा होय रिहिस ।जन्मभूमि रवेली के संगे संग कन्हारपुरी मा घलो मंदराजी दाऊ के मूर्ति स्थापित करे गेहे ।वोकर सम्मान मा छत्तीसगढ़ शासन द्वारा लोक कला के क्षेत्र मा उल्लेखीन काम करइया लोक कलाकार ला हर साल राज्योत्सव मा मंदराजी सम्मान ले सम्मानित करे जाथे ।  वोकर जीवनी ला लेके सार्वा ब्रदर्स हा छत्तीसगढ़ी के पहिली बायोपिक फिल्म बनाइस . फिल्म अब्बड़ चलिस अउ ये फिल्म के माध्यम ले नाचा में उंकर योगदान अउ आखिरी समय मा उंकर संघर्ष के जानकारी छत्तीसगढ़िया मन ला होइस. 

मंदराजी के ये परंपरा ला दाऊ रामचंद्र देशमुख,दाऊ महासिंह चंद्राकर, लक्ष्मण चंद्राकर, झुमुक दास बघेल- निहाईक दास मानिकपुरी, पद्मश्री डोमार सिंह कुंवर,दीपक चंद्राकर सहित कई ठक  सांस्कृतिक दल अउ नाचा दल हा बढ़ाय के काम करिन. 



 नाचा के भीष्म पितामह ला उंकर 112 वीं जयंती मा शत् शत् नमन हे। 


    🙏🙏🙏💐💐💐

          

                      ओमप्रकाश साहू” अंकुर “

ग्राम + पोष्ट – सुरगी (हाई स्कूल के पास) 

तहसील + जिला – राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) 

मो. न.  7974666840

अप्रैल फूल के तिहार"*


 

*"अप्रैल फूल के तिहार"*


हमर देस मा तिहार मनाये के गजब सऊँक। सब्बो किसिम के तिहार ला हमन जुरमिल के मनाथन। तमाम जातपात, धरम-सम्प्रदाय के तिहार मन ला एकजुट होके मनाये के कारण सांप्रदायिक सदभाव अउ एकता के नाम मा हमर, दुनिया मा अलगेच पहिचान हे। तिहार मनाये बिना हमर बासी-भात तको हजम नइ होवय। तिहार मनाये के सऊँक मा हमन प्रगतिशील होगेन। बिदेस के तिहारो ला नइ छोड़न। भूमंडलीकरण के जमाना मा नवा पीढ़ी हर "वेलेन्टाइन-तिहार" मनाये बर पगलागे। "वेलेन्टाइन-तिहार",  मया करइया जोड़ा के बिदेसी तिहार आय। एमा पुलिस संग "रेस-टीप" खेल के अपन मया ला जग-जाहिर करे के पवित्र भावना कूट कूट के भरे रहिथे। कभू कभू तो कुटकुट ले मार घला खाना परथे तिही पाय के ये तिहार मा बरा, सोंहारी, ठेठरी, खुरमी बनाय-खाय के परम्परा नइ रहय। रद्दा साफ मिलगे तो कोन्हों-कोन्हों  मन अपन जोड़ी-संगवारी ला चीन-देस के आनीबानी के नुन्छुर्रा चिजबस के भोग लगाथें। ये भोग दीखे मा गेंगरवा साहीं दिखथे। पताल के लाल-लाल झोर डार के येखर रंग ला घला लाल कर डारथें। कोन्हों-कोन्हों भोग अंगाकर रोटी साहीं घला दिखथे फेर अंगाकर जैसे वोमा दम नइ रहाय। एला पीज्जा कहिथें फेर खाथें।"वेलेन्टाइन-तिहार" हमर देस मा नवा-नवा आये हे।


जुन्ना बिदेसी तिहार मा "अप्रैल फूल के तिहार" हमर देस मा अप्रैल महिना के पहली तारीख के मनाये जाथे।" अप्रैल फूल के तिहार" के माई-भुइयाँ के बारे म कोन्हों बिद्वान मन इंगलैंड बताथे तो कोन्हों मन फ़्रांस देस बताथे। हमला येखर माई-भुइयाँ से का लेने देना? बिदेसी तिहार हे, त सगा बरोबर मान सम्मान तो मिलबे करही। ये तिहार मा लोगन मन ला बुद्धू बनाये जाथे। पहिली के जमाना मा मोबाइल-टेलीफोन नइ रहिस तब बैरंग लिफाफा मा कोरा कागद भेज के बुद्धू बनाना, झुठ्हा समाचार दे के हलकान करना, जीयत मनखे के मरे के झुठ्हा खबर दे के परेशान करना, नौकरी लगे के झुठ्हा खबर देना, अइसन कई प्रकार के हरकत करके तिहार के मजा लूटे जात रहिस। यहू तिहार मा पकवान बनाय-खाय के रिवाज नइ हे। जुन्ना बिदेसी तिहार होये के कारण अप्रैल फूल के महक साल भर बगरे रहिथे। चपरासी मन बाबू ला, बाबू मन साहेब ला, साहेब मन बड़े साहेब ला, बड़े साहेब मन, अउ बड़े साहेब ला बुद्धू बनावत हें। एखर महक के बिना न भाषण लिखे जा सकथे, न पढ़े जा सकथे। कश्मीर ले कन्याकुमारी तक, अटक ले कटक तक अप्रैल फूल के महमही महसूस करे जा सकथे। बुरा लगे के बाद भी बुरा नई मानना, मामूली बात नोहय। "बुद्धू बनात हे" जान के भी चुप्पेचाप रहिना सहनशीलता के निशानी आय। अप्रैल फूल के तिहार अपन दुःख पाके दूसर ला सुख देना के संदेस देथे कि अपन सुख बर दूसर ला दुःख देना के समर्थन करथे, ये भेद अभीन ले सुलझे नइ हे। खैर, तिहार ला तिहार के नजर मा देखना चाही तब्भे मजा आही।


मजा लूटना, जिनगी मा आनंद लाना तिहार के खास लच्छन होथे। चार दिन के जिनगी मा कतिक टेंसन पालबो। इही सोच के हम हर दिन तिहार मनाये के बहाना खोजत रहिथन। 1 अरब 40 करोड़ मनखे ला कोन खुशी दे सकथे? मनखे ल अपन खुशी के रद्दा ला खुद निकालना पड़थे। मँय घर मा खुसरे खुसरे अपन जुन्ना बियंग ला नवा पैकिंग मा परोस के तिहार मनाए के रद्दा निकाल डारे हँव, आपो मन कुछु बहाना सोचव।


*अरुण कुमार निगम*

Sunday, 19 March 2023

परंपरा आगी माँगे के..

 परंपरा आगी माँगे के.. 

   हमर संस्कृति म आगी माँगे  के घलो परंपरा हे, फेर ए ह अब कोनो नेंग-जोग के बेरा भले दिख जाथे, तहाँ आने बेरा म तो नंदाय बरोबर होगे हे.

    हमन लइका राहन. गाँव म राहन, त रोज संझा अरोस-परोस के चार-पांच झन माईलोगिन मन छेना धर के हमर घर आवय, हमर बूढ़ी दाई संग ससन भर के गोठियावय. साग-भाजी के गोठ होवय, संग म नान-मुन कुछू काम-बुता राहय तेनो ल सिध पार देवंय, तहाँ ले छेना म अंगरा के नान्हे टुकड़ा ल धर के चले जावंय. ए ह रोज के बुता राहय. हमरो डोकरी दाई ह गोरसी म सिपचा सिपचा के आगी राखे राहय.

    जिहां तक धर्म अउ संस्कृति के बात हवय, त एमा तो ए आगी माँगे के बहुतेच महत्व हे. नवरात्रि म होवय, होरी जइसन परब म होवय या फेर ककरो घर बर-बिहाव होवत राहय त अइसन बेरा म कोनो सिद्ध बइगा-गुनिया या फेर मंदिर के कुंड आदि ले आगी लान के आगी सिपचाए या ज्योति प्रज्वलित करे के परंपरा आजो दिखथे. बिहतरा घर के चूल ल बइगा घर ले लाने आगी ले ही सिपचाए जाथे.

    एकर पाछू सिरिफ अतके भावना होथे, के हम अपन शुभ कारज के शुरुआत अइसन मनखे या जगा के माध्यम ले करत हावन, जेकर ले मन म ए भरोसा राहय के वोकर सिद्धी के परिणाम हमरो खातिर शुभ रइही.

   कतकों लोगन एला अंधविश्वास के श्रेणी म राख सकथें. कतकों झन इहू कहि सकथें- जे मन खुदे मंत्र सिद्धी कर डारे हें, वोमन ल कोनो दूसर मनखे या जगा ले आगी लाने के का जरूरत हे? उंकर कहना वाजिब घलो आय. फेर मोला लागथे, कतकों बेरा म अपन तर्क शक्ति ल कोनो कोनहा म मढ़ा के पुरखौती परंपरा ल आगू बढ़ाय के उदिम करत रहना चाही. 

    आज तो आगी बारे के कतकों जिनिस के आविष्कार होगे हावय. तभो ले अपन परोसी घर ले आगी माँग के लाने अउ इही बहाना वोकर संग सुख-दुख के बात कर ले के जेन आनंद अउ मजा हे, वोहा अद्भुत हे. खासकर आज के बिखरत संयुक्त परिवार के बेरा म तो अउ जादा.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

छानही* (छत्तीसगढ़ी कहानी)

 -


     🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷


       *छानही हर घर के* *कहानी कहिथे तेकरे सेथी सबले ऊँच छानही कई लास के, मंझोलन गजालाल के* *अऊ सबले तरी रहिस सुन्दरू के*...




     🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷



                     *छानही*


             (छत्तीसगढ़ी कहानी)





                   तीनों के तीनों छानही हर एके कोती रहिस, गाँव मा जाये के बेरा मा डेरी कोती अऊ उहाँ ले आये के बेरा मा जेवनी कोती। ये तीनों छानही हर तीन सग,पाठी-पिठा भाई कईलास, गजालाल

अऊ सुन्दरू के रहिस। ये तीनों भई के भरे-पूरे घर- परिवार मन, ये तीनों छानही के तरी मन मा फूलत-फरत रहिन । सब कुछ ठीक-

ठाक रहिस फेर एकठन जिनिस के फरक रहिस ये छानही मन मा । वो फरक रहिस छानही के जिनिस मन मा । कईलास के

छानही हर छानही नइ होईस वोहर तो पक्का छत रहिस सिरमिट गिट्टी के ढलई वाला। गजालाल के छानही हर छवाये रहिस खपरा

मनले त छेवर मा सुन्दरू के हर रहिस करईन के।


             छानही मन के ये फरक हर सुरुच ले नई रहिस। बाँटा-रोटी के बेरा तो तीनों के तीनों एक-एक ठन छितका कुरिया भर पाये रहिन।

पाछु कईलास हर कछेरी मा चपरासी बन गय त गजालाल हर नून -मिरचा बेचे के बैपार सुरु कर दिस। सिरिफ सुन्दरू हर रहिस जय

के तस, वोई दू टेपरी के खेती मा जाँगर टोरई भर वाकर बुता रहिस। ये सब के असर हर वोमन के छानही मा दिखे लग गय रहय।

छानही हर घर के कहानी कहिथे तेकरे सेथी सबले ऊँच छानही कईलास के, मंझोलन गजालाल के अऊ सबले तरी रहिस सुन्दरू

के। 


         गजालाल भई ददा के छानही मोर ले उप्पर हे... । वोकर नाँव घलो मोर ले बड़का हे... जादा हे । सुन्दरू गजालाल के खपरा के

छानही ला देखत गुनिस अऊ चल आज भिथिया के वो पार का होवत हे आरो- गारो ले आंव... कहिके मंझिला गजालाल के

अंगनईया मा आ गइस... । 

“आ सुन्दरू... ।" गजालाल अंगना मा

ठाढ़ हो के बड़े भई कईलास के पक्का के छानही ला देखत रहिस।

“सुन्दरू...।" वोहर किहिस ।

“हाँ, भई ददा, " सुन्दरू वोकर उतारा मा ओझी देत किहिस।

"कईलास भईददा के छानही हर मोर छानही ले ऊँच हावै अऊ वोकर नाँव घलो मोर ले जादा हे, आना?'' गजालाल कईलास के

पक्का के छानही ला देखत पूछिस त सुन्दरू भक्क खा गय। अतका बेरा ला वोहर खुद अपन अंगनईया मा ठाढ़ होके येकर छानही ला ऊँच कहत रहिस हे, अब ये गजालाल भई ददा हर बड़का कईलास के छानही ला देखके वोइसनहेच्च गुनत हे जईसन वोहर

पहिली गुनत रहिस। सुन्दरू ये पईत मुचमुचा उठिस।

"तैं काबर हाँसे भई!" गजालाल सुन्दरू ला किहिस ।

"छोड़ भई ददा, ये छानही पुरान ला अऊ बता कईसन हस तऊन ला..।"

"चल आज वो पार बड़खा के घर ला किंजर- बुल आबो । आरो- गारो लेवत आबो ।"

"चल, ठीक कहत हावस, आखिर वोहू घर हर तो हमरेच आय न, तो वोकर हाल जानना जरूरी घलव हे... ।”

"हमन अईसन सोचत हन बड़का के पक्का घर-दुआर ठाठ -बाट ला देखत, फेर का वोहर हमन बर अईसनहेच सोच थे?" गजालाल पूछिस । तोर ला कमजोर मैं... का तैं मोर बर अईसन सोचथस? सुन्दरू मने मन मा किहिस फेर परगट मा हाँस भरिस।


        दूनों के दूनों छोटे अऊ मंझिला भई बड़का भई के दुवारी गईन। भिथिया हर जुरे हावै, फेर एक जगह उठना बईठना हफ्ता महीना भर म नई हो पाये। आज बड़का भई कईलास घलो घर मा सुछिन्धा बईठे

रहिस। वोमन ला आवत देखिस त वोहु उठ ठाढ़ हो गइस। तीनों भई गोठ बात मा रम गईन, फेर येती अगास मा करिया बादर मन

घलो बहसबाजी मा रमे के सुरू कर दिन। अउ वोमन के बहस हाँसी-दिल्लगी हर ये भुईयाँ ले सुनाय लागिस। येती पीली भऊजी

गुर- गोरस लानिस, त ठीक वोतकिच बेरा अगास मा घलो बग्ग ले बिजली के लहुकना हर दिखिस । सुन्दरू एक पईत अगास ला

देखिस, तहाँ ले फिर गहना गुठा चमकात भऊजी के मुख ला...।


            येती गोठ बात छेवर होयेच नई पाईस हे अऊ अगास ले सुरू हो गय बरसे बर रस के धार । सुन्दरू ला बड़े भई कईलास के पक्का

छानही के तरी बईठे अब्बड़ नीक लागत रहे। एक धरी के गय ले बरसात ह रूकिस। अब गजालाल अऊ सुन्दरू कईलास ला जय

गोहार करत निकल आईन अऊ गजालाल के घर पहुँचिन। उहाँ परछी मा माढ़े चीज- वसूत मन भीज गय रहें । पक्का छत केओईरछा ला खपरा के छानही थोरहे झोंके सकिही। बड़का मन के छत के पानी के सेथी ये परछी हर भीज गय हे।" साँति गजा लाल के सुआरी जतन करत किहिस त सुन्दरू के धियान आईस। अब वोहर लहुटत पाँव फिर के अपन घर आईस, त घर मा करईन के छानही ले चूहे पानी हर जगह-जगहा भरे रहे। वोकर सुआरी बासन बाई हर , ठूठी बहिरी मा बाहरत रहे परछी घर ला...।


             अऊ गजा भई ददा के खपरा छानही के धार ला मोर करईन के छानही हर थोरहे झोंके सकिहि ....सुन्दरू किहिस धीरन्त सुर मा ।



*रामनाथ साहू*



-

छाॅंटत-छाॅंटत अटल कुॅंवारी


 

छाॅंटत-छाॅंटत अटल कुॅंवारी


            महेंद्र बघेल


आजकल सालभर बर-बिहाव के सररे-सरर हवा उड़त रहिथे, येहा मनमरजी वाले लप-झप के रेंज म होय चाहे घर-मरजी वाले अरेंज म।जब फटाखा अउ डीजे के परमात्मीय ध्वनि ह कान अउ हिरदे के उपर वायरस कस धाय-धाय हमला करथे तब तरवा के साइन बोर्ड म परघनी अउ रिसेप्शन के सूचना ह अपने आप चिपक जथे।तहाॅं अड़ोस-पड़ोस के गबरू-पाठा मन के चरण-कमल ह जुगाड़ अउ नाटू-नाटू के जुगलबंदी म व्यस्त हो जथे।इही दिलझटकू डीजे के परसादे परोसी घर के सियान-सामरत मनखे मन ल अस्पताल म भर्ती होय के बिहतरा लाभ भी प्राप्त होथे। आखिर आयुष्मान कार्ड ल अइसने बेरा म परोसी धरम निभाय खातिर तो बनाय जाथे।

        बाप-महतारी बर लइका मन तो लइकाच होथे, बीपीएल बरोबर जब तक लइका बीएमएल (बिलो मेच्योरिटी लाइन) के सीमा म रहिथे तब तक सियान के चिंता फिकर ह संडे मनावत रहिथे। उनला  चना-चबेना, मुर्रा-मुरकू, केक-चिप्स , पापड़-पेप्सी, टोस बिस्कुट, आइसक्रीम, चाकलेट अउ मिकी माऊस जइसे कार्टून के भरोसा भुलवार डारथें। फेर लइका के संज्ञान होय के डेंजरस लाइन ल छूते भार ओकर काया के उपजाऊ धरती ले मेछा के भूरवा रेख फूटना शुरू हो जथे अउ हिरदे के तानपुरा ह टुनुन-टुनुन बाजे बर लफलफायच ल धरथे। फेयर एंड लवली, डिंपल पाउडर, सेंट-डिओ के उत्ता-धुर्रा उपयोग संग कुकरा छाप हेयर कटिंग के सजई-धजई अउ दर्पण के आगू म मटमटई के आवृति बढ़ जथे।

     कुछ -कुछ असमानता ल छोड़ लइका प्रजाति के दूनो जेंडर के इही कुदरती कहानी हे।हाइटेक जमाना म सबे लइका मन सरकारी समय सीमा के पहिली संज्ञान हो जथें। सोला-सतरा के पहलीच गुगल गली म किंदरत आज्ञाकारी शिष्य के पदवी घलव पा जथें। तब लगथे ऊपरवाला ह मनखे के हाथ ल मोबाइल धरे बर अउ ॲंगरी ल कोचकेच बर बनाय हे।येमन मोबाइल नेट के मितानी म दुनिया के ताकी-झाॅंकी करत दुर्गम इलाका के सांगोपांग दर्शन लाभ ल घर-बैठे प्राप्त कर लेथे।

        लइका मन के ये हलचल ल परखत अनुभो के घाम म करियाय ये विषय के भूतपूर्व छात्र मन (ददा,कका भैया) एलर्ट हो जथे।कि लइका ह लइकुसहा के परीक्षा म पास होके अब संज्ञान शाला म भर्ती होगे हे।

             एती हमर भैया संतू ह संज्ञान शाला म भर्ती अपन बेटा सुंदर के घर-बसाय बर जम्मो संडे ल रद्द कर दिस। अउ विषय के पहिली कालखंड म बहू खोजव अभियान म लगगे।

            सुंदर ह सहीच म बड़ सुंदर हे, ऊंचपुर, गोरा बदन, हंसमुख चेहरा, पढ़े-लिखे अउ काम-काज म हुशियार। दस साल पहिली च कम्यूटर साइंस म बीई कर डरे हे मने इंजिनियरिंग के उलेंडा पूरा म भकरस ले उलंड के अपन माथा ल फोर डरे हे। बिहाव के जरूरी योग्यता पाय बर  सुबे-शाम सरकारी नौकरी के एकतरफा सपना देखई के काम जारी हे।

      एती-ओती जिहाॅं पता लगे उही कोती फटाफट दौड़े-भागे , हाव-हाव होवत-होवत म बस नौकरी के नाम म रिश्ता लटक जाय।

  बहू खोजत-खोजत संतराम के मति ह अति-तति होगे रहय। संतराम के मतलब ये नइहे कि ओहा कोनो साधु-संत हरे। संत तो सिरिफ नाम आय ,माया मोह के सखरी म अरझे बीबी-बच्चा वाले संयासी टाइप के आदमी।संत ल आशा हे ओकर सुंदर के आस ह पूरा होही। मने ओकर जीवन म आशा हे आशाराम नइहे। येकरे सेती घर म एके झन सुंदर हे ,सुंदर मन के कबड्डी टीम नइहे। संतराम ह मंच म छम-छम नाचत आशाराम ल देखे  रहिस अउ पंचेड़ बूटी के गुणवत्ता ल सुने भर रहिस।कहुॅं उपयोग कर पारतिस ते कृष्ण जन्म स्थली म आशाराम ले सेक हेंड करे के अवसर भी मिल जतिस।

        बीरबल के कुछ अलग इमेज हे, अपन ह सुधवा अउ भौजी ह तेज हे। वो अतिक सुधवा कि कई घाॅंव अपन सुध ल घलव भूला जथे। भौजी ह बजार ले जब मुनगा मॅंगाथे त ये मुरगा धर के आ जथे.., एक दिन कतरा (हलवा) पागे बर सूजी मॅंगाइस त वीरबल्लू ह कपड़ा सीले के सूजी ल धरके आगे।आजकल गली-मुहल्ला, बजार-हाट अउ रद्दा-बाट म बारो-महिना मुरगा मिलना सहज हे फेर मुनगा ह नोहर होगे हे। 

           अइसे भी मुनगा के महत्तम के कोई लेखा नइहे फेर ओकर ले जादा मुनगा चुचरे के चमत्कार ह चकमिक-चकमिक करत हे।भाटा अउ मुनगा चुचरई के आध्यात्मिक दरसन-परसन ले बजरहा झोला म कई किसम के छद्म-फ्री अवार्ड घलव टपक जथे। छत्तीसगढ़ के मान-सम्मान बर मुनगा चुचरई ह कोनो अश्वमेध यज्ञ ले कम हे का..?

           रकम-रकम के आयोजन फाग,रामधुनी, मानस गान, जसगीत प्रतियोगिता ले गांव-गांव म फुतकी उड़त हे।बिहान वाले दीदी बहिनी मन ठऊॅंका परीक्षा के बेरा म सुबे ले साॅंझ तक पोप-पोप पोंगा बजावत भरे मंच ले बिहान-बिहान खेलत हें। 

     अउ येमन मुनगा के महत्तम ल नइ जाने..! अरे कम से कम मुनगा के महत्व ल समझत मुनगा चुचरो प्रतियोगिता तो रखे जा सकथे।एती छत्तीसगढ़िया मन मुनगा चुचरे म मस्त हें ओती ठढ़बुंदिया मन छत्तीसगढ़ ल चुहके म व्यस्त हें।

         हाल-चाल ये हे कि आजो सुंदर ल कोनो शुभ समाचार नइ मिलिस। बाप संत ह मुरझाय कस बर रूख के खाल्हे म मितान बीरबल दूनो बैठे हें।संत ह बहूखोजी अभियान म विलेन मन के चरित्र हनन म लगे हे, बीरबल अपन लइका के मोबाइल प्रेम के प्रसंग ल विस्तार देवत हे। 

      फुर्र- फुर्र उड़त, चिऊॅं- चिउॅं करत चिरई- चिरगुन मन बर (बरगद) के लाली फर ल ठोनक-ठोनक के फोलत हें त कतको फर ह बर के जर म गिरत बुद-बुद बोलत हे। का करबे ये दूनो मन चिरई- चिरगुन के चारा बाटे सही अपन- अपन घर-दुवार के सुख-दुख ल बाॅंटत हें, गृहस्थी के डोरी ल अनुभो के ढेरा म ऑंटत हें।

         संतराम ह बीरबल ल बतावत हे- "देवारी तिहार ले शुरू होके फागुन तिहार तक बहु खोजे के रटाटोर उदीम ह चलत हे।सुंदर ह उत्तर, दक्षिण ,पूरब,पश्चिम चारो दिशा म भटकत हे, फेर को जनी कते कोन्टा म किरपा ह अटकत हे।"

           अतिक म बीरबल के मौन हड़ताल ह टूटिस अउ ओकर सुधवा बाणी ले बक्का फूटिस -" ओ.. हो..! अतराब म पढ़े-लिखे लड़की तो अबड़ हे छोटे, फेर अतिक दिन म बात फत्ते कइसे नइ होइस।ये समस्या जग जाहिर हे, हमर समझ ले बाहिर हे !"

             एती देखते-देखत छे महीना ह बीतगे, सुंदर के यात्रा ह फलित नइ हो पाय हे। नवा रिश्ता बनाय बर लड़की खोजना मामूली बात तो नोहे। ये उदीम म पहिली लड़का अउ लड़की के हाॅं, बाप-महतारी के हाॅं फेर रास-बरग अउ गण-गुण के नंबर लगथे। ये बूता ह हिमालय चढ़े ले कम नोहे।

      कुछ सोचके बीरबल फेर बोलिस - "अरे भई लइका इंजीनियरिंग पढ़े हे त  किरपा ह कहाॅं अटके हे। अभीन लइका ह का बूता करथे...?"

  "का बतावॅंव भैय्या,लइका ह पढ़ लिखके निकलिस तहां प्राभेट बैंक म दस हजारी होगे, गांव म खेती ह मोर अकेल्ला बर भारी होगे। मॅंय सुंदर ल घर बलालेंव, आज उही ह खेती ल सॅंभाले हे। हमर कर दस एकड़ खेती हे, टेक्टर हे, हार्वेस्टर हे अउ का चाही" - संतू राम कहिस।

बड़ बेर ले सोचके बीरबल कहिस- "सुंदर के उमर के का हाल-चाल हे, ये दस साल म बिहाव बर चेत काबर नइ करेव जी। उमर के सेती रिश्ता ह अटकत तो नइहे.?"

   गंज बेर ले दूनो झन ल बैठे देखके उनकर तीर महूॅं पहुचगेंव ।उनेंव न गुनेंव उनकर बहुखोजी अभियान के कांफ्रेंस म बरपेली वफलेंव।

             दूनो झन ल तिखारके पूछेंव - "बर रुख के छइॅंहा म गंज बेर ले का चारा बाॅंटत हो भैया..?"

   संतू ह तुरते बात ल अपन कति लपक के कहिस - "अरे इहाॅं कोन ल चारा बाॅंटबे , रात-दिन के खोजई बूता म टायर घिसा गेहे,सपना ह चिरपोटी बंगाला कस पीसा गेहे। ॲंजोर के चक्कर म सब ॲंधियारी हे, हमर बर फाऊ उकर बर फरहारी हे। बनत-बनत म सुंदर के रिश्ता लटक जथे, सरकारी नौकरी के ब्रेकर म बात अटक जथे।"

       कुछ-कुछ समझ म तो आवत रहिस तभो ले मॅंय बात ल साजेंव,फूटहा तबला कस फेर  बाजेंव- " दूल्हा बने बर के घाॅंव वेकेन्सी भरेव.., का सरकारी नौकरी बर कभू कोशिश करेव..?"

          अतका सुनके संतू ह चिलमाहा सही बड़ लम्बा सुवाॅंसा खींचत कहिस - " मॅंय का गोठियाॅंव ..उही दस-बारा साल पहिली फूटू फूटे कस जगा-जगा इंजिनियरिंग कॉलेज खुलिस, लइका ल इंजिनियर बनाय के सपना ह ऑंखी-ऑंखी म झूलिस। लोभ म काल होगे, आज बारा हाल होगे। प्राभेट कालेज म कतको पैसा धसगे , संदूक के तारा म कुची ह फसगे। जइसे सब मन करथें, हाॅंसत-हाॅंसत हमू करेन।फेर हम का जानन हमर सुंदर ह पेल-ढकेल के पास होही। लइका ह बीई करे हे,नाॅंगर मुठिया ल धरे हे।अब लड़की वाले मन पूछथे, लड़का सरकारी नौकरी म हावे का..?"

          मॅंय कहेंव- "सबो बात के इही सार हे ,बेटी ओकर आय ओला बने दमाद खोजे के अधिकार हे।सबे चाहथें कि बेटी ससुराल म राज करे, नौकर-चाकर ह काम-काज करे। ससुर ह साग लाय,सास ह चाय बनाय..।"

         संतू के पारा फेर हाई होगे.., तमतमावत कहिस-  का किसान होना अपराध हे..? माथा ल पोतके कान म मंत्र फूकइया, सदन म कुर्सी-कुर्सी खेलइया, कंपूटर के लीड म ताता-थैया करइया, पत्रकारिता के ढोल पिटइया, धरम के नाम म बिल्डिंग टेकइया अउ दुनिया के ए कोना ले ओ कोना तक मुॅंहुॅं मरइया सबे के पेट बोजवाव के ठेका किसान के  मत्थे तो हावे का..? दुनिया के जम्मो किसान सुम्मत होके जे दिन हड़ताल म बैठ जही उही दिन ये बैठांगुर मन ल अपन औकात समझ म आ जही।

         भरे पेट म दस ठन किसम-किसम के बोल फूटथे,जे दिन इनकर पेट ल एक दाना नसीब नइ होही उही दिन एसी म बैठके किसानी म भाषण पेलइया ये बजरंगा पेट वाले मन ल हड़ताल के साइड इफेक्ट पता चल जही। धर्म-अध्यात्म, दर्शन, विज्ञान ये सब भरे पेट के पैदावारी आय। का हार्डवेयर, साफ्टवेयर, करेंसी अउ क्रिप्टोकरेंसी ल चाॅंट-चाॅंट के खहू, उही म पेट ल भर लेहू..? सुबे-शाम जेकर सुरता करना चाही ओहा आखरी कोंटा म फेकाय हे अउ लफराहा मन के चरण वंदना होवत हे। चाकलेटी चेहरा म घर ह नइ चमके, सरकारी पिया खोजइया मन हमरे उपजारे अन्न ल खावत होही कि पथरा-ढेला ल।"

   गोठे-गोठ म आगी कस धधकत ओकर तमतमाय बरन ल देखके बीरबल अउ मोर हिम्मत ह उही मेर हथियार डाल दिस, सही म छे महिना ले हलाकान मनखे ल कोचकबे त अइसनेच छटारा मारही।

       संतू के ये हाइपरसोनिक दर्शन विद्या ल सुनके मॅंय तुरते ओकर दर्शनाभिलाषी होगेंव अउ ओकर दुःख-दरद ल हुॅंकारू के झेंझरी म तुरते झोकेंव।

             मॅंय कहेंव - "ले बड़े भैया ये बहू-खोजी अभियान म अब हमू मन तोर संग-साथ देबो, समाजिक पत्रिका ल खोधिया- खोधिया के पता लगाबो।चल देखथन कइसे रिश्ता नइ ठसही..।"

    इही बोली-बचन ह संतू के धधकत लावा ल तुरते ठंडा करे के बनेच काम करिस।

            अधियाय गोठ ल लमावत संतू ह फेर कहिस- " जेकर घर जाबे उही ह अग्नि मिसाइल कस सवाल दागथे , ..का लड़का ह सरकारी नौकरी म हावे..। महिना म कतिक कमाथे, का कभू-कभू पीथे- खाथे..। छे-छे महिना ले बस इहीच तो सुनत हॅंव। सुनत-सुनत कान  गदला गेहे, दिल-दिमाग पगला गेहे।सामाजिक पत्रिका के जरिए कते दिन फोन नइ करे होहूॅं..। जेला फोन घुमाबे उकरे एके टप्पा बोल.., लड़का ह का करथे। मॅंय कहिथव लड़का कंप्यूटर साइंस म बीई हे, आजकल खेती-बाड़ी म बीजी हे..।ओमन कहिथे खेती के छोड़ अउ का करथे.., नानमुन बिजनेस हे, कम से कम पान ठेला तो होना चाही..। त नौकरी के नाम म मॅंय सुंदर ल भट्ठी के ठेकेदार बना दॅंव कि मुहल्ला के दारू कोचिया..? इनकर नजर म आज किसानी के इही कीमत हे।"

     संतू के ये संतवाणी ह मोर तन के नस-नस ल छिल दिस, नौकरी के घमंड ल बरसाती पानी कस ढिल दिस।

       आखिर म वीरबल अउ मोर सटकाई म कइसनो करके सुंदर के बनौती बनगे, लड्डू पापड़ बरा संग हमरो छनगे।

     फेर रूपवती, गुणवती बेटी वाले दाई-ददा मन के डिमांड ह सरकारी नौकरी म अटके हे, बेटी ह भला बूढ़ा जाय उनला ये मंजूर हे। नौकरी वाले लड़की मन ल सरकारी सजन चाही। जेकर बाप ह नौकरी म हे तेकर ठसका कुछ अलग हे वोला आइएएस, आइपीएस, जज अउ डाक्टर दमाॅंद चाही।

       तब लगथे बाढ़त हाइटेक शिष्टाचार ह ये दुनिया ल अटल कुंवारी के तपोभूमि बनाके छोड़ही।

          सही म मनखे के सोच म कतका बदलाव आ गेहे। लड़का नौकरी म रही त लड़की के बाप ल नौकरी संग खेती-खार वाले दमाद चाही, जनो मनो अपन बेटी ल रोपा लगाय बर भेजही। कहुॅं बाप-महतारी के सपना के आगू म बेटी मन बेबस हे त कहुॅं बेटी के इच्छा खातिर घर वाले मजबूर हें।

          कतरो मन बिन बिहाव के जिनगी ल जियत हें फेर ठोसरा ल सुसक-सुसक के पियत हें। तीस-पैतीस साल वाले अटल कुॅंवारी मन के एके आस हे, नौकरी वाले सरकारी सजन के तलाश हे। जनों मनो "तुमने पुकारा और हम चले आए‌ ..."  सही नौकरी ह ओकर ओली म आके गिर जही..।

सबके अपन जिनगी हे फेर समझौता एक्सप्रेस म चढ़के जिनगी ल सॅंवारे म जादा समझदारी हे ,का भरोसा कते दिन जम्मों सरकारी नौकरी ह सरकार के डिक्शनरी च ले गायब हो जाय..?


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

झिरिया ले पानी...

 


संसो//

झिरिया ले पानी...

    हमन लइका रेहेन त हमर गाँव नगरगांव ले बोहाने वाला कोल्हान नरवा म गरमी के दिन म झिरिया कोड़ऩ अउ वोमा कूद-कूद के नहावन। 

वो लइका पन के उमंग रिहिस हे। फेर आज इही झिरिया ह गरमी के दिन म  लोगन के जीए के सहारा बनत हे।

     छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्र ले अइसन सोर मिलत रहिथे,  के नंदिया-नरवा, कुआं-बावली, बोरिंग-सोरिंग मन झुक्खा परत हें। लोगन जीव बचाए बर झिरिया कोड़-कोड़ के बूंद-बूंद पानी सकेलत रहिथें।

 सरकार ल एकर ऊपर गंभीरता ले सोचना चाही। इहाँ अतेक नंदिया-नरवा हे। बरसात म वोकर पानी ल रोके-छेंके के कुछु उदिम तो करना चाही, तेमा गरमी म अइसन ताला-बेली के बेरा मत आवय।

   अभी नरवा, गरुवा, घुरुवा, बारी के जोरदरहा नारा चलत हे, त भरोसा जागथे, के ए विकराल समस्या कोती चेत करे जाही। 

   दुख के बात ए आय के इहाँ जतका भी नीति बनथे, सब बड़े-बड़े कारखाना मनला पोंसे अउ मरत ले पानी पियाए के नीति बनथे। खेत-खार ल सींचे अउ गाँव के तरिया-डबरी मनला लबालब भरे के नीति नइ बनय। जबकि कृषि प्रधान राज्य म कृषि ऊपर आधारित नीति बनना चाही।

   मोर तो ए सुझाव हे, के एक पंचवर्षीय योजना ल पूरा के पूरा कृषि ल समरपित कर देना चाही। इहाँ जतका भी नंदिया-नरवा हे, सबो म हर तीन-चार कि.मी. के दुरिहा म छोटे-छोटे स्टाप डेम बना दिए जाना चाही। एकर ले एक फायदा ए होही, के इहाँ के पूरा राज भर म किसान मन आसानी के साथ दू फसली खेती कर सकहीं। संग म इहाँ के चारोंमुड़ा के भू-जल स्तर बाढ़ही। कुंआ-बोरिंग मन म बारों महीना लबालब पानी रइही। कोनो गाँव के रहइया मनला झिरिया कोड़ के जीव बचाय के जोखा करे बर नइ लागही। भरोसा हे ए नरवा, घुरवा वाले सरकार के चेत ए मुड़ा म जाही।

-सुशील भोले-9826992811,