Friday, 31 March 2023

संस्मरण* *अपन अपन होथे*

 *संस्मरण*


*अपन अपन होथे*


नवा घर कहिथे बनाके देख अउ बिहाव कहिथे करके देख | ये गोठ ला सियान मन कहे हे तेन कतका सही हे अपन अनुभव ले जाने बर मिलिस |नवा घर जब जनवरी दू हजार बाइस(जनवरी 2022मा बनवाएव) ता कब खर्चा हा 20 लाख ले बाढ़त-बाढ़त 30 लाख पहुँचगे पता नई चलिस |एक बेर बनवाना हे इहु कर लेथन उहु लगवा लेतेन करत-करत कब घर के खर्चा बाढ़गे पता नई चलिस कर्जा मूड़ी मा चढ़गे रहिसे | रोज रतिहा जब  सोवव ता कर्जा के आंकड़ा मन लेनदार मन आँखी मा झूलय |का करहू कइसे करहू अइसन लगे | लइका कतको बड़ हो जावय दाई बाबू बर  सदा नान्हे अउ मयारू रहिथे |मैं घर के चार भाई मन मा सबले नान्हे आवव मोर मया कतका होही समझ सकत होहू |जब भी थक जथँव माँ के कोरा मा जाके सुत जथव |अइसे लगथे जइसे अब सब सुग्घर हो जाहि |एकदिन जाके माँ होरा खावत बरवट मा बइठे रहय मैं जाके ओखर कोरा मा मूड़ी रखके ढलँग गेंव |फेर दाई-दाई होथे मोर चिंता भरे मुह ला देखके समझगे बिन बोले सबगोठ ला जनामना जानगे मोर मुहू ला देखके पूछिस-कस बेटा का सोंचत हस ,अड़बड़ चिंता मा दिखत हस बेटा | मैं कहेव माँ एकझन लागादार के पैसा लागत हव |मोला तगादा के आदत नइहे माँ |इस्कूल के जम्मों तनखा किश्ती पटाये मा अउ घर परिवार बाई लइका के तबियत पानी सब मा खर्चा हो जथे एकझन लेनदार के सत्तर हजार कर्जा के ब्याज हा 2% के हिसाब ले 14 महीना के बीस हजार होगेहे का करव तइसे लगथे का मोर जीवन कर्जा मा निकल जही| ये वाले घर जब मा तुँहर संग रहेंव ता कोनो चिंता फिकर नइ रहिसे फेर एक समय आथे जब  हम चाहन नही तेनो बूता काम ला करे ला परथे तुम्हर अशीष ले अउ आदेश ले अलग नवा घर बनवाएव ताकि चार बरतन मा आवाज झन होवय  फेर अब ये कर्जा चैन नींद लूट लेहे संसो होवत रहिथे |मां के कलेजा कतका बड़ होथे काबर मां ला देवता ले बड़े कहे गेहे केवल कविता मा लिखत रहेंव ओ दिन अनुभव करेंव |माँ कहीस बेटा जेन करजा दे हवै तेन मनखे के आदत ला जानत हव दे के बेरा मीठ मीठ पाछू अड़बड़ पेरथे | माँ(दाई)कहिस मैं सकेल-सकेल के सत्तर हजार धरे हव बेटा जेन तूमन बेटा मन तोर बाबू धराय रहिथव तेला| जब कहेव 90 हजार हवै थोर बहुत नइहे ता मोर ले बड़े भाई (तीसर नम्बर)के अनिल भैया कहीस तोर फोन पे नम्बर ला बता भाई रे मैं बांकी 20 हजार  ला डारत हव |कल जा देके लेनदार ला सुख पा |मैं दूनो के गोठ ला सुनके रोय के मन तो होइस फेर आंसू ला रोक लेव आज अड़बड़ हरूहव | सिरतोन कहे हे अपन अपनेच होथे|आज मोर भाई औ माँ जेन मोर बर करीस परिवार उहीला कहिथे जेन दुख मा खड़े होवय सुख मा संग रहे |मोर भाग आवय जेन अइसन परिवार मिलेहे |मैं बजरंगबली ले सब बर अइसने विनती करथव| भगबान मोर भाई मां बाप परिवार ला मोर उमर ला देवय अइसन विनती मन ले निकलथे |


सुनिल शर्मा नील

थान खम्हरिया

जिला बेमेतरा

दिन आगे बोरे-बासी के..

 दिन आगे बोरे-बासी के.. 

    

छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा डाॅ. खूबचंद बघेल जी के एक मयारुक कविता के आज सुरता आवत हे-

  बासी के गुण कहुँ कहाँ तक,

  इसे न टालो हाॅंसी में.

  गजब बिटामन भरे हुये हैं,

  छत्तीसगढ़ के बासी में..

   

 पहिली उंकर ए कविता ल हमन अपन लइकई बुद्धि म परंपरा के संरक्षण-संवर्धन खातिर लिखे गे मयारुक रचना होही समझत रेहेन. वइसे खाए बर पहिली घलो बासी ल ससन भर आवन अउ आजो खाथन, फेर वोकर पौष्टिक महत्व ल समझत नइ राहन. हाँ, डोकरी दाई अतका जरूर काहय- बासी के पसिया ल घलो पीना चाही, एकर ले चूंदी बने जल्दी-जल्दी बाढ़थे अउ घन होथे. फेर अब जब ले वैज्ञानिक मन बासी उप्पर शोध कारज करिन हें अउ बताइन हें, के बासी खाए ले ब्लडप्रेशर ह कंट्रोल म रहिथे, गरमी के दिन म बासी खाए ले लू घलो नइ लगय, एकर ले हाइपर टेंशन घलो कंट्रोल म रहिथे. गरमी के दिन म बुता करइया मन के  देंह-पाॅंव के तापमान ल घलो बने-बने राखथे. संग म पाचुक होए के सेती हमर पाचन तंत्र ल घलो बरोबर बनाए रखथे. जब ले ए वैज्ञानिक शोध ल जानेन तबले अपन पुरखा मन के वैज्ञानिक सोच अउ अपन परंपरा ऊपर गरब होए लागिस.

    

आज अचानक ए सब बात मनके सुरता एकर सेती आवत हे, काबर ते हमर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ह 1 मई 2022 ले श्रमिक दिवस के अवसर म श्रमिक मनके श्रम ल सम्मान दे खातिर ए दिन जम्मो छत्तीसगढ़िया मनला बोरे-बासी खाए खातिर आव्हान करे हे. बोरे-बासी के महत्व ल जन-जन म बगराए अउ एला अपन पारंपरिक गरब के रूप म जनवाए खातिर 'बोरे-बासी' डे के रूप म मनाए के अरजी करे हे.

   

 ए तो बने बात आय, काबर ते हम आधुनिकता अउ शहरी जीवन शैली के नांव म अपन कतकों परंपरा अउ खान-पान मनला भुलावत जावथ हन. अउ वोकर बदला म पौष्टिक विहीन खान-पान अउ परंपरा म बोजावत जावत हन. एकर बर जरूरी हे, हमर तइहा के परंपरा अउ वोकर महत्व ल नवा पीढ़ी ल बताए अउ वोकर संग जुड़े खातिर कोनो न कोनो उदिम होवत रहना चाही.

   

 वइसे हमर संस्कृति म 'बासी' खाए के एक रिवाज तइहा बेरा ले हे. भादो के महीना म 'तीजा' परब म जब बेटी-माई मन अपन-अपन मइके आए रहिथें, तब उपास रहे के पहिली दिन करू भात खाये के नेवता दिए जाथे अउ तीजा के बिहान दिन बासी खाये के नेवता देथें. फेर ए नेंग ह सिरिफ तीजहारिन मन खातिर ही होथे. आज बासी के महत्व ल समझे के बाद मोला अइसे लागथे, के अभी जेन 'बोरे-बासी' डे मनाए के बात सरकार डहार ले होए हे, वोला 'बासी उत्सव' के रूप म मनाए जाना चाही. जइसे आने उत्सव के बेरा जगा-जगा म वो उत्सव ले संबंधित आयोजन करे जाथे, ठउका वइसनेच जगा-जगा बासी पार्टी या बासी खवाये के भंडारा आयोजन करे जाना चाही. 

    

अब तो बासी खवई ह सिरिफ परंपरा या रोज के पेट भरई वाले भोजन ले आगू बढ़के सेहत अउ रुतबा के घलो प्रतीक बनत जावत हे, तभे तो फाइवस्टार होटल मन म घलो एला बड़ा शान के साथ उहाँ के  मेनू म शामिल करे जाथे, अउ लोगन वतकेच शान ले एला मंगा के खाथें घलो.

     

वइसे तो हमर घर म आज घलो बारों महीना बासी के उपयोग होवत रहिथे. तभो मोला अपन लइकई के वो दिन के सुरता जरूर आथे, जब हमन मही डारे बिना बासी ल छुवत घलो नइ राहन. तब डोकरी दाई के सियानी राहय. गाँव घर म तो रोज दही-मही के व्यवस्था घलो हो जावय, फेर जब ले शहर के हवा म सांस लेवत हन, तब ले दही-मही संग बासी खवई ह अतरगे हे. बस सादा-सरबदा ही चलथे.

    आज मोला अपन लिखे कविता के चार डांड़ के जबर सुरता आवत हे-

  दिन आवत हे गरमी के, नंगत झड़क ले बासी

  दही-मही के बोरे होवय, चाहे होवय तियासी

  तन तो जुड़ लागबेच करही, मन घलो रही टन्नक

  काम-बुता म चेत रइही, नइ लागय कभू उदासी

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

छत्तीसगढ़ी कहानी -श्रद्धा

 छत्तीसगढ़ी कहानी -श्रद्धा

बिहिनिया -बिहिनिया जुन्ना पेपर ल लहुटा - पहुटा के चाँटत - बाँचत बिसाल खुरसी म बइठे हे। आजे काल साहर ले आए हे गाँव म। जादा खेती खार तो नइ हे फेर अतेक मरहा तको नइहे। ददा साहर में नौकरी करत रिहिस हे। अपनो ह पढ़ई करत -करत इस्कूल के साहेब होगे हे। आना जाना लगे रहीथे। 

“जय शंकर भोले।”

बिसाल दुवारी कोति ल मुड़ के देखथे। चुकचुक ले गोरिया, ऊँचपुर, छरहरा बदन के मनखे दुवारी म ठाढ़े हे। चक्क सुफेद धोती झकझक ले झोलझोलहा कुरता, देखे म मलमल अस कोवँर। टोटा म छाती के खाल्हे के आवत ले ओरमे रूद्राक्ष के माला। माथा म छोटकुन कुँहकु के टीका। बगल म कपड़ा के बेग ओरमे हे। बिसाल देखते साठ समझगे कोनो बाहरी पंडा हरे। 

कहिस - बइठौ महाराज ! कहाँ ले आए हव ? 

अइसे तो हमन रूद्रपुर ले आए हन बिसाल भाई - महराज अपन खाँध म टँंगाए - ओरमे कपड़ा के बेग ल सोझियावत कइथे। 

“बिसाल भाई” 

अपन नाम सुनके बिसाल एक घाँव चकरित होगे- अरे ! मोर नाम महराज कइसे.............। बिसाल सोचते हे।

महराज आगू कहिथे - ठहिरे खम्हरिया म हवन, तीर - तखार ल साइकिल म घूम लेथन। 

“हूं ऽऽ...ऽऽ.... कब के आए हौ  ?” 

बस चारे पाँच दिन होवत हे - महराज चट्ट ले उत्तर दीस। आगू कहिथे- पूस के महिना म रौनिया के आनन्दे अलग होथे न।

तभो ले तो जी नई जुड़ावय महराज ! पूस, फूसे फूस ताय- काहत बिसाल अकर -जकर देखे लागिस - कोनो हावय ते सेर चाँऊर देवय। मन के बात गड़रिया जानय, बारा घाट के पानी पीये महराज फट बिसाल के हावभाव ल समझगे। 

’बात ये हे बिसाल भाई’ बीच्चे म महराज ल टोंकत कहिथे - हमन हरेक साल इही समे म भगवान रूद्रदेव के मंदिर ले जम्मो दिशा म निकलथन अउ देशभर म घूम घूमके भगवान रूद्रदेव के अभिशेक खातिर आदेश लेथन। बिसाल कभू हूँ ... हाँ काहय त कभू मूड़ी ल हला देवय। महराज के गोठ घोड़ा म सवार होइस ते रूके के नाम नई लेवय। बिसाल ह महराज के मुँह ल देखतेच रहीगे। महराज हँ बेग के चैन ल ‘चर्र’ के खोल दीस। एक ठन कापी, पींयर पींयर किताब अउ पेन निकाल डरिस। गोठ के संगे -संग महराज हँ पोथी -पतरा ल घला लमा डारिस। 

कहिथे - हमर संस्थान म पूजा - पाठ, हवन - अभिशेक पूरा बिधि -बिधान से होथे फेर श्रध्दालु भाई मन के सहुलियत खातिर समान्य अउ बिशेश दूनो प्रकार के अभिशेक करथन। 

सुनके बिसाल मुसकुराए बिगर नइ रहे सकिस। बामहन देवता थोरके चुप रहिस ताहेन फेर चालू। एक्सप्रेस फेल होगे। तैं डार - डार त हम पान पान। महराज रसीद बुक ल खोल डरिस -ए देखव ! बाजू वाले गाँव उसलापुरिहा दाऊ हँ महारूद्राभिशेक के आर्डर दे हावय।

 ’वो सब तो ठीक हे महराज ! फेर हमन अभीन अभिशेक-उभिशेक नई करावत हन।’ 

महराज सोचे लागिस पासा हा उल्टा परगे का ?

 बिसाल रूके -रूके कस आगू कहिस - ’अऊ जिहाँ तक मोर खियाल हे दीन-हीन के सेवा ले जबर दीगर -धरम, दान -पुन अउ कोनो नइहे।’ 

महराज एक गोड़ के माड़ी ऊपर दूसर गोड़ के पाँव ल मढ़ाये बइठे हवय। पँवतरी ल सहिलावत कहिथे - ’बिसाल भाई , वो सब तो आत्मा के शांति खातिर होथे, संसार के दुख - पीरा ले छुटकारा काकर ले मिलथे ? घर मे सुख-समृध्दि धन-मान कहाँ ले आथे ? एहू ल तो सोचॅव। 

बिसाल सोच के धार म बोहाय लगिस। कोनो ल बुरा लगय अइसन कभू केहे हे, न करे हे। दुवार म आय बामहन देवता ल खाली हाथ कइसे लहुटावंवँ ? माटी के महक पानी के सुभाव अउ हवा के रंग ल कोनो अलग नई कर सकय। नस -नस म दया -धरम आदर अउ सम्मान, मीठ बोली अउ संस्कार छत्तीसगढ़ के पहिचान हरे, बैरी ल घला ऊँच पीढ़वा देहे के इहेंच रिवाज हे। जेने अइस तेकरे कटोरा ल भरिस, भले अपन लांँघन भूखे रही जावय। फोकट में धान के कटोरा नई कहाय हे छत्तीसगढ़ हँ। अइसे -तइसे महराज अपन रसीद बुक ल खोल डारिस । ऊप्पर म क्रमांक डार के श्रीमान लगाके बिसाल के नाम लिखे के पीछू पूछथे - 

बाबू जी के का नाम हे ? 

श्री बेद राम। 

जाति म धोबी लिखागे, महराज हँ तो गाँव म घुसरे के पहिली सब्बो ल पता कर डारे रहय। गोत्र के संगे -संग परिवार के जम्मो सदस्य मन के नाम ल सरलग पूछ -पूछ के लिखे लागिस। 

महराज - ’कतेक वाला करना हे भाई साहब’ ?

बिसाल - ‘अब अतेक जोजियावत हव त एक सौ इनक्यावन रूपया वाला करवा लेथवँ महराज, अइसे तो.............।’ 

अतका म महराज के मन नई माड़िस, कहिस - अतेक दुरिहा ले आए हन। सिरिफ तुँहर श्रद्धा अउ ऊपरवाले के कृपा ....अउ तुमन .....! 

बिसाल थोरिक सकुचागे। गाय कतको मरखण्डी रहय दूहे बर राउते जानथे - ले भई तीन सौ इनकावन लिख ले फेर ऽऽ...ऽऽ... ”।

 ’ अँ.....हँ....हाँ मै कहाँ अभी पइसा मागथौं। बिसाल के गोठ ल पूरा नइ होवन दिस। महराज हँ ओला फुग्गा कस फूलो के हरू कर दिस - ’ अभी तो नाम लिख के जाथौं। तुँहर परिवार के नाम से उहाँ रूद्राभिषेक होही। जब हमार आगमन दुबारा होही, हम तुँहर परिवार बर प्रसाद स्वरूप कुछु लाबोन तब आप पइसा देहू - अभी नहीं।’ 

बिदा करे के पहिली आधा डर आधा बल करत बिसाल ह पूछथे - ’चाहा चलही महराज ?

’अंधरा खोजय दू आँखी’।

महराज खुश होगे - ’जिहाँ प्रेम हे उहाँ परमेश्वर हे बिसाल भाई, हिरदे मिलगे तिहाँ का के भेदभाव ? 

चाहा पीके महराज चलते बनिस।

बिसाल शहर के रद्दा धर लीस। नेकी कर दरिया में डार। बिसाल धीरे -धीरे सब बिसर गे। चार महिना बीतगे। दू दिन के छुट्टी परे म फेर ओकर गाँव आना होइस। एक दिन बिसाल ठऊँका खाये बर बइठत रहय। आचमन करके भोग भर लगाये रिहिस हे, के ठुक ले महराज पहुँच गे। बिसाल जेवन छोड़ के उठत रिहिस हे -“ नहीं, नहीं बिसाल भाई ! तुमन शांति से भोजन करव, अइसन करना ह अन्न के अपमान होथे। फिकर झन कर, मैं बइठ के अगोर लेथँव। मोर बूतच का हे, ओसरी-पारी ये दुवारी ले वो दुवारी।” 

बिसाल ह महराज के बात ल नई काट सकिस। महराज हँ बिसाल के खावत ले ओकर सुवारी ममता ले कटोरी मँगाके दू - तीन किसम के माला, नान -नान पुड़िया अउ प्रसाद निकालके रख डरिस। बिसाल पाँव परके के एक तीर खुरसी म बइठ गे। महराज एक -एक करके बिसाल ल देखाथे - ये तुलसी माला, महाप्रसाद, भोज पत्र काहत लइका मन बर छोटे -छोटे माला, सुहागिन मन बर कुँहकु, बंदन, चंदन के पुड़िया कटोरी म रखके बिसाल ल समझाथे - ये स्फटिक ए, विशेष आप के लिये। येहाँ रूद्राभिषेक के संगे -संग पवित्र अउ स्थापित होगे हे। आप ल केवल शनिच्चर के दिन नहा -धोके उदबत्ती जला के धारण करना हे बस।’

महराज जब दुबारा अइगे, पूजा -प्रसाद ल सउँप दिस तब अउ का नेंग रहिगे, -भइगे बिदागरी ! बिसाल बिना कुछु कहे कुरिया म गइस अउ लाके चार सौ रूपिया महराज के हाथ म समरपित करके पाँव ल छू लिस -

 “कल्याणम् अस्तु।” 

शनिच्चर के दिन बड़े फजर बिसाल नहा - धोके उदबत्ती जलाइस अउ महराज के दिए समान के कटोरी ल धुँगिया देखाइस। स्फटिक के माला ल निकालके अपन घेंच म अरो लिस। एक अजीब आत्मिक आनंद बिसाल के हिरदे म खलबलाय लगिस। बिसाल ल सरग के सुख के अनभो होय लगिस।

रतिहा बिसाल सुते के पहिली माला टूटय झन सोंचके निकालिस अउ खटिया के खुरा म ओरमाए लगिस। बिसाल कहूँ सुने रहय कि स्फटिक के माला हँ आपस म रगड़ाथे त ओमाले चिनगारी फूटथे। 

सोचिस - रगड़के देखवँ का ? 

ओकर आत्मा धिक्कारथे ‘‘-च्च .....च्च..! अतेक बड़ शंका’’ उहू हँ धरम के काम म ? महराज के दिए परसादी के परीक्षा, घोर पाप होही अउ कुछू नहीं। 

कलथी मार के बिसाल सुते के बहाना खोजे लगिस। जी अकुलागे । नींद नइ अमराइस। एक सोच के झकोरा बिसाल के मइन्ता ल झकझोरे लागिस। गलत तो नइ करत हौं, चिनगारी कइसना होथे तेला तो देख सकत हौं। उठके बइठ गे । माला ल दूनों हथेरी के बीच म रखिस अउ रगड़े लगिस । अंधियारी रात, आँखी ल बटबटले ले नटेरे बिसाल टकटकी लगाए देखत - एक दू....तीन....रगड़त हे -खर्र, खर्र, खर्र। 

    बिसाल के बिसाल हिरदे ले श्रध्दा ह ‘सर्र ‘के महराज बर गारी बनके निकल गे फेर फटीक के माला ले चिनगारी नइ निकलिस।

धर्मेन्द्र निर्मल

कुरूद भिलाई जिला दुर्ग 

9406096346

अंधवा

 *अंधवा*


अंधवा केहे ले मनखे के ध्यान सहज रूप मा मनखे के दुनों आँखी नइ होए के तरफ जाथे। फेर मँय कहिथौं कि मनखे अंधवा सिरिफ आँखी के नइ होए ले ही नइ कहावै। अंधवा के तीन किसम होथय। पहिली आँखी के अंधवा, दूसर मया मा अंधवा अउ तीसर विरोध मा अंधवा।

मनखे जे आँखी के अंधवा होथय वोहर देख नइ सके,फेर सुन के सबके बात ल समझथे। बोली अउ बोली मा तुलना करथे कि कोन बने कहत हे अउ कोन गिनहा। आँखी के अंधवा, मनखे के भाखा ल ओरख के समझ जाथे कि कोन अपन आये अउ कोन बिरान। भाखा ओरखे के क्षमता ओकर कर आँखी वाले ले जादा होथय। आँखी के अंधवा अनुमान लगा के या फेर लउठी के सहारा मा सही रद्दा के पहिचान कर लेथे।

दूसर मया मा अंधवा के बात करन तब मनखे जब मया मा अंधवा हो जाथे तब वोला अपन मयारू मनखे के गलती नइ दिखय या फेर गलती ल ढाँके के कोशिश करथे। परिणाम ये होथे कि गलती करइया के गलती मा सुधार नइ होवै, बल्कि गलती ऊपर गलती करे के सम्भवना अउ बढ़ जाथे। जइसे कोनों कोनों माँ-बाप मन अपन लइका के मया मा अंधवा हो जाथे। परोसी जब लइका के सुधार खातिर गलती बताथे तब ओकरे संग झगरा करे बर उमिहाथे। अइसन करे ले लइका के भविष्य बिगड़थे। लइका कोई ल कुछु बोले या कोनों काम ल करे के पहिली नइ सोचय। काबर कि माँ-बाप मन सदा सपोट करथे। मया मा अंधवा मनखे के लइका कभू अपन कुल के नाँव रोशन नइ कर सकय। अपजस ओकर तीर मा लोटत रहिथे। धृतराष्ट्र आँखी के अंधवा होए के संगे-संग अपन लइका दुर्योधन के मया मा घलो अंधवा होगे रिहिस। तेकरे सेती जब्बर महाभारत होइस। अपन लइका दुर्योधन ल बरजे ल छोड़ वोकर साथ दिस। परिणाम ये होइस कि कौरव कुल के नाश होगे। मया करना बुरा बात नइ हे फेर मया मा अंधवा होना बने नोहे। संसार मा कोनों के मया मा मनखे ल अंधवा नइ होना चाही। 

तीसर किसम के अंधवा होथय, विरोध मा अंधवा। मनखे जब मनखे या दूसर के जाति -धरम के विरोध मा अंधवा हो जाथे, तब आगू वाले मनखे या जाति-धरम के सुघरई वोला नइ दिखय। ये किसम के अंधवा बहुत खतरनाक होथय। कब का कर दिही कुछु नइ केहे जा सकय। अइसन अंधवा के अंतस मा सदा आगी धधकत रहिथे। विरोध के अंधवा ल समझा पाना बिलई के नरी मा घण्टी बाँधना होथे। राजा हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु के विरोध मा अंधवा होगे रिहिस। भगवान विष्णु के पूजा करइया साधु-संत मन ल अड़बड़ सतावै। अइसन किसम के अंधवा चाहथे कि वो जेकर विरोधी हावे ओकर सब विरोधी होवय। विरोध नइ करइया ल अपन विरोधी समझ के ओकर ऊपर जुलुम करे ल लग जाथे। विरोध के अंधवा ल अपन विरोधी के बड़ाई थोरकु नइ भावै। अइसन अंधवा ल समझाना मतलब खुद ल ओकर विरोधी बनाना होथे। महापुरुष मन कहिथे कि- 'विरोध अइसन आगी आवय, जेन सुलगथे विरोधी बर फेर जलाथे खुद ला।' येकर ले बचके रहना चाही। येकर ले ये बात साफ होथय कि आँखी के अंधवा बने फेर मया अउ विरोध के अंधवा बने नोहे। आँखी के अंधवा ल बताए मा सही रद्दा चल लेथे। फेर मया अउ विरोध के अंधवा ल सही बात घलो बुरा लगथे। 


           राम कुमार चन्द्रवंशी

           बेलरगोंदी (छुरिया)

            जिला-राजनांदगाँव




एक लोटा जल ------।"

 "एक लोटा जल ------।"

             फिरतू  गली म फिरत रिहिस में पूछेंव कस जी फिरतू कोनो काम बुता  नई हे  गली गली म फिरत हस ।कथे मे तो सुबे ले नहा धो के काम कर डारेव। मे पूछेंव का काम जी एक लोटा जल चढ़ा डरेंव ।सब कहिथे "एक लोटा जल सब समस्या के हल "त अऊ का कमाना धमाना। अवईया चुनाव म घोषणापत्र म फिरतू (बेरोजगार)मन ल एक लोटा जल दे के वादा कर दीही त कतका मजा आही ।मोर असन कतको फिरतू गली गली मे दिखही (नजर आही)।  एक लोटा जल सब समस्या के हल, एक लोटा जल सब समस्या के हल , में कहेंव तै गुणत होबे  फिरतू ऐहा दूनों सदन म सुम्मत ले पास हो जही ,गलत ।ऊंहां ऊंकर मन के जेवर बाड़हे के प्रस्ताव ह सुम्मत ले पास हो सकथे। जईसे कौंवा कुकुर मन मरी खाए बर जुरिया जथे ।अऊ कहूं दे के शुरू कर दीही त वो मन खुदे फिरतू बन जही।

                फिरतू कथे बेरोजगारी भत्ता के पईसा जनधन खाता म चक्र विधी ब्याज करले (सहित) दिनों दिन बढ़त हो ही ना भईया ?हां फिरतू भाई भत्ता के पईसा ले जनधन खाता के पन्ना घेरी बेरी भर जथे। अवईया समे म ऐला स्विस बैंक म जोड़ें के प्रस्ताव जरूर पास कर सकथे, ताकि तूहर भत्ता के पईसा कतिक अकन हे कोनो जान मत सके।

              फिरतू कथे सब समस्या के हल हो जही त भईया ये दवई बूटई, अस्पताल वाले मन के का हो ही ।मे कहेंव झोला धरके डोंगरगढ़ के पहाड़ी मां ध्यान लगा ही ।इंकर उच्च बिचार ले तो हमर धनहा डोली घलो बिक जथे। ऊंकर किरपा बरसथे त मरे मुरदा ल घलो छु नी पान ।दरसन नोहर हो जथे ।कई बेर इंकर 'शुभ हस्त 'ले जान तो बच जथे, फेर जान नि राहय। मरे ले जियई भारी लागथे 'खस्सु खजरी दाद मूड़ ले जादा ब्याज।'

                    फिरतू कथे तहु मन अधरतिया जाग-जाग के का का लिखथो फेर कोनो हा तूमन ल समाज सेवक नी काहय अऊ नशा पानी बेचईया  मन के नाम कहूं-कहूं पोस्टर म समाज सेवक फलाना प्रसाद लिखाय रहिथे ।मे केहेंव फिरतू भाई उंकरे किरपा ले घर बईठे जुआ खेले बर मिलथे, दारु पानी गांजा उंजा ल घर तिर म लान के देथे। तेखरे सेती ऐमन ल समाज सेवक कहिथे। इही समाज सेवा से परसन् होके लक्ष्मीदाई अपन घड़ा ल उड़ेल देथे।

            अब जादा झन पूछ फिरतू भाई एक लोटा जल ले सब समस्या मिटा जाही त संसार के बढ़वार रुक जाही ।ए संसार म सब कमाएच बर तो बईठे हे। सब  माया के जंजाल हे।बिना माया के तो भगवान के पूजा घलो नी होय। थोकिन माया के कमी ले गाड़ा उल्ला होय ल धरथे। ज्ञान के नदिया म तउंरना हे त धन बांध के गेट ल खोलेल पड़ही।

किलो म मिलथे इंहा भांजी,मुनगा,जाम,

जगा जगा बेचावत हे ज्ञान,

लगे हे चक्का जाम।

माया के सब खेल हे संगी

        आनलाईन दरसन पाना हे,

वी आई पी मनखे मन बर

              वी आई पी गेट के धंधा चलाना हे।  

नाचत हे पंडाल म

                बनके श्याम दिवानी

गली के गरवा चारा बर तरसे

       पंडाल म मिलथे चारा दानी।

                    फिरतू भाई जेनदिन दीया बारत रेहेन,थारी पीटत रेहेन तेन दिन ये जल जीवन मिशन वाले मन का हड़ताल म  रिहिस। इंकर तीसर आंखी ल खोले बर पठान के हीरोइन ह तो नी नाचीस  हो ही ।हो सकथे कामदेव अऊ रति ह एप्लीकेशन दे दे रिहिस होही अचानक बूता आए के सेती छुट्टी दे किरपा करहू। आप मन के बात रखईया (आज्ञाकारी।)

                       फकीर         

                    प्रसाद साहू         

                  ‌    "फक्कड़ "

                  ग्राम -सुरगी

दू गज जमीन (कहानी)

               *दू गज जमीन* (कहानी)


                   -डाॅ विनोद कुमार वर्मा


        *एक दिन छोटे भाई अपन गोसाईन ले बोलिस- विन्ध्याचल पहाड़ के पार कौड़ी के मोल मा जमीन मिलत हे। चल इहाँ के जमीन ला बेंच के ऊहें चली। जमीन खरीद के तोला रानी कस रखहूँ !* 

      *एहा ओ समय के बात हे जब मानव सभ्यता जंगल-पहार ले निकलके मैदानी भाग मा फलत-फूलत रिहिस।* 


             ..............................


         काबुल के तीर एक ठिन गाँव म दू भाई चार बीघा जमीन म खेती-किसानी करत सुखपूर्वक जीवनबसर करत रिहिन। दुनों के बिहा दू सगा बहिनी संग एके मड़वा म होय रहिस। आपस म अगाध मया-प्रेम रहिस। बड़े भाई के दू ठिन नोनी अउ छोटे भाई के एक ठिन बाबू रहिस। अकाल-दुकाल के दिन परिस त बड़े भाई बोलिस- मैं घर के जमापूंजी ला लेके शहर कोती जावत हौं। खेती-किसानी ला तैं देख। मैं शहर म जाके कुछु व्यवसाय कर लेहूँ। इहाँ गाँव म अतकी कम खेती म दूनों भाई ला जीना मुश्किल होही। फेर लइकन मन घलो बाढ़त हें। ओमन के तालीम अउ बर-बिहा बर पैसा जोरे ला परही। छोटे भाई बात ला मान गे। 

       अइसने दू बछर गुजर गे। दुनों भाई कमात-खात फलत-फूलत रिहिन। ठंड के समे म व्यापार मंदा रहिस त बड़े भाई अपन परिवार सहित गाँव आ गे। दू बछर म भेंट होइस त दुनों परिवार के खुशी के ठिकाना नि रिहिस। एक दिन रात के बेरा खा-पी के दुनों बहिनी हाँसी-ठिठोली करत खटिया म बइठे बतियात रिहिन।

       छोटे बहिनी बोलिस- दीदी, पाछू बछर ले पड़ोस के राज म लड़ाई चलत हे त उहाँ अनाज के कमी पर गे हे। हमर धान ला दुगुना-तिगुना रेट म कोंचिया मन खरीद के ले जात हें। घर म खूब पइसा आवत हे। दू बीघा अउ जमीन खरीद डरेन। तुमन के का हाल-चाल हे? बने-बने तो ह ?

       ' हाँ रे ठीके-ठीक हन। हमर व्यापार मंदा हे, फेर परिवार बर पूर जात हे। बहिनी, शहर म अस्पताल हे, मदरसा हे, बढ़िया सड़क हे, कोनो चीज के कमी नि हे। तोर गाँव-गँवई ले तो बने हन! '

      ' दीदी! इहाँ घलाव कोनो जिनिस के कमी नि हे। खेत-खार म घूमत रहिथन। चिरई-चिरगुन आसपास म किंदरत रहिथें। शुद्ध हवा-पानी हे। मैं तो कहिथों, तुमन वापिस गाँव आ जावा। मिल-बाँट के बूता-काम करिबोन त दू-चार बीघा अउ जमीन खरीद लेबो। परोसी राज के लड़ई ह अभी बन्द होही कहुस नि लागत हे! '

      ' नहीं रे! हमन उहें ठीक हन! ' - बड़े बहिनी लंबा साँस लेके बोलिस। '

     ओमन के गोठ-बात ला छोटे भाई सुनत रहिस। मने-मन मा गुनिस कि मोर गोसाईन ठीक कहत हे। बड़े बहिनी तो निरा बुध्दु हे! कुछु अउ जमीन खरीदे के बेंवत मढ़ाना चाही। ओही मेर शैतान लुका के बइठे रहिस अउ सबो गोठ-बात ला ओहू सुनत रहिस। फेर छोटे भाई के मन के बात ला घलो जान डरिस अउ मने-मन मुस्कुराए लगिस!

      बड़े भाई अपन परिवार सहित शहर लौट गिस। दुनों भाई के बूता-काम ठीके-ठीक चलत रहिस हे कि एक दिन छोटे भाई अपन गोसाईन ला बोलिस- सिन्धु नदी के पार अड़बड़ सस्ता आधा रेट म जमीन मिलत हे! एक झन सौदागर बतइस हे। इहाँ के जमीन ला बेच के उहाँ खरीदे म दुगुना जमीन मिल जाही! '

     ' उहाँ जाय के बाद बड़े बहिनी मन करा भेंट नि हो पाही? '

     ' कोन जिंदगी भर ओमन करा रहना हे! मैं आजे जमीन के सौदा करत हौं! '

        सिन्धु नदी के पार सचमुच सस्ता रेट म छोटे भाई ला जमीन मिल गे अउ अब ओहा दस बीघा जमीन के मालिक हो गे। साल भर म कमई करके दू बीघा जमीन अउ खरीद डारिस। दिन हाँसी-खुशी मा गुजरत रहिस। फेर छोटे बहिनी के मन मा अपन बड़े बहिनी के परिवार ले नि मिल पाय के मलाल रहिस अउ रह-रह के ओमन के सुरता करय। 

       दिन भागत देरी नि लगे। तीन बछर अइसने गुजर गे। एक दिन छोटे भाई अपन गोसाईन ले कहिस- विन्ध्याचल पहाड़ के पार कौड़ी के मोल म जमीन मिलत हे! चल इहाँ के जमीन ला बेच के उहें चली। जमीन खरीद के तोला रानी कस रखहूँ!

        एहा ओ समय के बात हे जब मानव सभ्यता जंगल-पहार  ले निकलके मैदानी भाग मा फलत-फूलत रिहिस। कुछ महामानव जेमन ला दैवीय शक्ति प्राप्त रिहिस- ओमन मानव सभ्यता ला आघू बढ़ाय के जतन करत रिहिन। सिन्धु घाटी के सभ्यता के बाद हिमालय के तराई क्षेत्र अउ भारत के मध्य भूभाग ओकर बर आदर्श स्थान रिहिस। ओती जंगल-पहार म बाहुबल के जोर रिहिस। लूटपाट अउ हत्या आम बात रिहिस।

         गोसाईन बोलिस- आन राज मा झन जावा, बड़ दुरिहा हे। रद्दा म जंगल-पहार परही। कोनो मार डारही त का करिहा?

      ' अरे! मैं अकेला थोरे जावत हौं। तीन कोरी ले आगर आदमी रहिबो। जंगली रद्दा ले नि जावत अन! ' 

         ' मोला डर लगत हे! तूँ बइहा-भुतहा हो गे हा का? मैं उहाँ नि जाँवव। मोला बड़े बहिनी के घर छोड़ देवा, बड़ दिन होगे दीदी मन करा भेंट नि होय हे! ' 

       ' तोला उहाँ कहाँ छोड़े जाहूँ रे ? समयच्च नि हे। दू हप्ता बाद सबो झन जुरियाबो! दिने-दिन चलबो अउ रात म अराम करबो। .... तोर बर इहें नौकर-चाकर के बेंवत मढ़ा देवत हौं, रानी कस रहिबे। तीन-चार महीना के तो बात हे! फेर ऊँटवा बिसा के लानहूँ अउ ओही म बइठार के तोला राजरानी कस लेके जाहूँ! '              ............................


        जंगल-पहार, नरवा-नदिया, आँधी-पानी आदि कतकोन बाधा सामने आइस फेर ओमन के यात्रा नि रूकिस। छोटे भाई अउ ओकर वफादार नौकर सबो यात्री मन के संग म विन्ध्याचल के पार दू महीना म पहुँचिन। रद्दा म एक रात लूटपाट करे बर डकैत मन हमला घलो करिन फेर आधा झन रतजगा करत पारी-पारी चौंकीदारी करत रिहिन ते पाय के डकैत मन भाग खड़े होइन, हालाकि दू झिन ला चोंट घलो आइस। 

          ओमन सरायखाना म रूकिन अउ  अपन नाम-पता,  इहाँ आय के कारण आदि रजिस्टर म दर्ज कराइन त ओ राज के मंत्री ला ये खबर मालूम पर गे कि सिन्ध राज ले कोनो सौदागर बीस किलो सोना के असर्फी लेके जमीन के सौदा करे बर आय हे। मंत्री ओला तुरते बुला भेजिस। जाँच करना घलो जरूरी रहिस कि कहीं सौदागर के भेष म कोई भेदिया एयार तो नि हे?

      ' ये बीस किलो सोना के असर्फी हे मंत्री जी! अतका में कतेक जमीन दे सकत हव? ' - छोटे भाई पूरा आत्मविश्वास ले बोलिस अउ बीस किलो असर्फी  मंत्री ला सौंप दीस। मंत्री ओकर आत्मविश्वास अउ ईमानदारी ले प्रभावित हो गे। 

       फिर भी मंत्री ओला मने-मन तौलिस अउ संतुष्ठि के भाव ले बोलिस-' हमर राज म जमीन के सौदा नि करन भाई! हमन ला राजकाज चलाय बर कर्मनिष्ठ, ईमानदार अउ संतोषी आदमी के जरूरत हे।..... कालि सबेरे उत्ती बेरा जंगल के पास वाला खेत मेर आ जइबे। परीक्षा म पास होइबे त बिना धन देहे जमीन मिल जाही अउ तोला ये राज के सरदार घलो बना देबो! फेर सरदार बने बर एक ठिन अउ परीक्षा पास करे ला परही। 

      मंत्री के गोठ ला सुन के छोटे भाई के चेहरा दमके लगिस मानो सपना सच होय के बेरा ह अब ओकर मुट्ठी म बंद हो।

     रात म छोटे भाई ला नींद नि आवत रिहिस। फेर नींद परिस त सपना म काला-कलूठा आदमी आके ओला चेताय लगिस- वापिस चल दे अपन राज। जमीन खरीद के सरदार बने के सपना ला छोड़ दे ,नई तो जान जाही तोर! 

    ' अरे जा जा! तैं शैतान कस लगत हस। मैं तोर ले डरने वाला आदमी नि हों। बार-बार मोर सपना म काबर आथस? ' - छोटे भाई सपना म गुसिया के बोलिस। 

    ' ठीक हे मैं जावत हौं। मैं शैतान तो बिल्कुल भी नि हों- शैतान हर तोला लेहे आतिस, चेताय बर नि आतिस! मैं तो जिन्न हों अउ तोर घरवाली के पुण्य करम ला देख के तोला बचाय बर चेतावत हौं। बाकी तैं जान अउ तोर करम जाने। कालि शैतान ह तोला लेहे बर आही त मोर बात ला सुरता कर लेबे! '

     दूसर दिन बड़े सबेरे छोटे भाई अपन वफादार नौकर के संग जंगल पास के खेत म पहुँच गे। मंत्री खेत म पहिलिच्च ले ठाढ़े रिहिस।

        मंत्री बोलिस - सबेरे ले शाम तक दिन भर म जतेक दूरिहा पैदल चल के जइबे, पाँच सौ गज के चौड़ाई म ओतका लम्बा-चौड़ा जमीन वापिस आय के बाद तोला मिल जाही। जमीन ला चिनहा करत जइबे, बुड़ती बेरा के पहिली एही मेर वापिस आना जरूरी हे। ये परीक्षा म फेल हो जइबे त तोर सोना के असर्फी राजसात हो जाही अउ तोला अपन राज वापिस लौटे ला परही! 

      अब छोटे भाई परीक्षा पास करे बर कमर कस लिस। वोहा राँपा-कुदारी धर के कोनो-कोनो जगा म चिनहा करत जल्दी-जल्दी आघू कोती भागे लगिस। मंझनिया 12 बजती के बेरा अपन प्यास ला बुझाईस अउ वापस लौटे के उदिम करिस। लगभग छै घंटा के भागमभाग के कारण थकावट ले शरीर निढाल रिहिस,फेर अभी घलो छै घंटा वापिसी के सफर पूरा करना बाकी रिहिस। छोटे भाई के दिल धक्-धक् करत रिहिस फेर खुश घलो रहिस काबर कि जंगल-पहार के जमीन ला छोड़ के खेती-किसानी के लइक कम से कम तीन सौ बीघा जमीन के मालिक तो बनबेच्च करतिस।

       वापसी के बुड़ती बेरा जंगली रद्दा म अंधेरा होय के कारण चलना मुश्किल होगे रिहिस अउ रद्दा घलो भटक गे त एक घंटा के समय रद्दा खोजे म लगगे! अब  मन म डर समा गे, संसो ब्यापे लगिस कि समय रहते नि पहुँच पाहूँ त सब मेहनत बेकार हो जाही! धन जाही-त-जाही, जमीन घलो नि मिलही! अब ओहा दौड़े लगिस, अउ कोई चारा घलो नि रिहिस। समय भागत रिहिस अउ बुड़ती बेरा एकदम सामने दिखत रिहिस..... कुछ पल ही बाँचे रिहिस कि ओला मंजिल सामने दिखे लगिस। अब ओहा अउ जोर ले दौड़ लगाइस। अन्तिम बेरा म शरीर निढाल होगे अउ ठीहा म पहुँचे के ठीक पहिली धड़ाम ले गिर गे!....... जाय के बेरा नजदीक आ गे त कालि के सपना अउ अपन गोसाईन के सुरता ह हिरदे म उमड़े-घुमड़े लगिस, फेर अर्धबेहोशी के हालत म अब कुछु कर पाना संभव नि रिहिस। ठीक ओही बेरा सुरूज नारायण बुड़त रिहिस अउ अंधियारी ह चारों मुड़ा सुरसा कस बाढ़त रहिस।......

        ओला बचाय के सारा जतन बेकार होगे। बैद्य ह हाथ के नाड़ी ला छू के साफ कहि दीस- जय गंगे! अब अउ कोई ठउर नई बाँहचे हे एकर बर!

        मंत्री अफसोस जाहिर करत नौकर ले बोलिस- ' जमीन म गड्ढा कोड़! एकर प्राणपखेरू उड़ गे हे! 

       ओही बेरा शैतान जोर ले अट्टहास लगाइस! मंत्री, वैद्य  अउ नौकर एती-ओती देखे लगिन कि कोन अतेक जोर-ले हाँसत हे? फेर कोनो दिखाई नि परिस।

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        छोटे भाई के वफादार नौकर जमीन ला कोड़ के मालिक ला दफना दिस, एकर बर केवल दू गज जमीन के ही जरूरत परिस। वफादार नौकर के आँखी म आँसू रहिस। ओकर मन म एके बात घुमरत रिहिस कि मालिक ला अतेक जमीन के का जरूरत रिहिस, मरे म तो केवल दू गज जमीन के ही जरूरत परथे! ...... अउ अब मालकिन कइसे जी पाही?

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               - विनोद कुमार वर्मा

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समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल:


 जे मनखे धन-दौलत के फेर म फॅंसे भागत-फिरत रहिथे, वो ह जिनगी भर भागते रहि जथे। थकय नहीं त आराम घलव नइ पावय। बटोरे के चक्कर म जिनगी भर न खाय के सुख पावय, न बने ढंग ले नत्ता-गोता मेर बरोबर मान पावय। जुच्छा हाथ आय हन अउ जुच्छा हाथ जाना हे, सब जानथन फेर कोन जन अइसे का मोहनी हे धन दोगानी म ते सबे के बुध नाश होवत देखे जा सकत हे। आज के समे म कोनो आरुग नि बाॅंचे हे। कतको साधु-संत मन घलव धन के मोह फाॅंस म धॅंधागे हें। अइसन म आम मनखे जउन अवगुण के खान होथे, कतेक दिन ले बाॅंच पाही भला। रपटो रपटो के धुन सवार हो जथे। मनखे मन ल काबू म कर लय, त सबो सुख इहें भोग पाही। मन चंचल होथे, ए ह ओकर स्वभाव आय, फेर मनखे तिर बुद्धि घलव तो हे, जेकर ले मन ऊपर लगाम कसे जा सकत हे। मन के घोड़ा हॉंके बर बुद्धि तो लगायेच ल परही। 

      जेन ह बुद्धि ल तिरिया के रख दिही अउ कोनो जामवंत जइसे सुजानिक ह हनुमान समझ सुरता कराथे, तउन ल नि मानही त ओकर मन के घोड़ा ल कोनो च ह नइ थामे। इही रकम ले 'दू गज जमीन' कहानी म छोटे भाई जमीन सकेले के पाछू पगला हो जथे। इहाॅं ले उहॉं जाहू त मोर जमीन दू ले चार आठ हो जही, सोचत रहिथे। मन म संतोष नाव के बाते च नइ हे। धरम बरोबर सीख देवत गोसाइन के बात घलव ओला बिरथा लागथे। अउ जमीन के बढ़वार बर दिनोंदिन ए जघा ले वो जघा भागत रहिथे।

       दूसर कोती बड़े भाई अउ भउजी बड़ संतोषी हें। हाथ-गोड़ याने अपन जाॅंगर  के भरोसा बाढ़त परिवार ल हॅंसी-खुशी चलात रहिथें।   

        छोटे बहिनी मया के बॅंधना ल जोरे रखना चाहथे। जिनगी ल नत्ता गोता के बीच जीना चाहथे। जेन म जिनगी के असली सुख हे।

     ‌ मन के तिष्णा मति हर लेथे। मन ए तिष्णा ए प्यास कभू शांत नइ होवय। मनखे के साॅंसा के रहत ले साॅंसा के छाॅंव बने संगे रहिथे। मन के इही तिष्णा म तरी मुड़ सनाय छोटे भाई जादा ले जादा जमीन पाय के लालच म गिर हपट के जान गवाॅं डारथे।     

          आखिर म वो ह सिरिफ दू गज जमीन के पूरती होइस। 

           ए कहानी अपन म अध्यात्मिक भाव ल सहेजे मनखे ल ए संदेश देथे कि अपन डीहडोंगर म अपन के बीच रहिते जिनगी जियन। सुख धन दौलत के पीछू भागे म नि हे। सुख तो जउन हे तिही म संतोष करे म हे। ए मनुख भर आय जउन जरूरत ले जादा सकेले के चक्कर म अपन असली सुख ल भोग नि सकय।

        शासक या मंत्री ल परमसत्ता के प्रतीक माने जा सकथे। अउ छोटे भाई ल भगवान के भक्ति ले दुरिहा भटकत फिरत जीव के प्रतीक।

         आत्मा के परमात्मा ले परछो करइया जिन्न कोनो संत महात्मा ले कमती नइ लागय। देखव न छोटे भाई के सपना म उॅंकर संवाद ल - " मैं तो शैतान बिल्कुल भी नि हौं। शैतान हर तोला लेहे आतिस। चेताय बर नि आतिस।"

        कहानी म प्रवाह हे, भाषा शैली एक मॅंजे कहानीकार के आरो देथे। मानव सभ्यता के विकास यात्रा के लेखा जोखा करत कहानी म वो युगीन शब्द मन के सुग्घर प्रयोग हे। संवाद अउ लेखन शैली पाठक ल कहानी ले बाहिर भटकन नइ दय। ऑंखी के आघू सिनेमा कस चित्र झूलत नजर आथे। 

        कहानी के शीर्षक 'दू गज जमीन' लोगन ल सोचे बर मजबूर करथे, आखिर हम का लेके आय हन अउ का लेके जाबो? रपटो रपटो करे म भलाई नइ हे, ए सीख देथे।

         एक रचनाकार तिर तखार के कोनो घटना ले प्रभावित होके अपन कल्पना ले विस्तार देवत रचना ल गढ़थे। आज गाॅंव-देहात के लोगन मन खेती-खार ल बेच के शहर कोती भागत हें। शहरी चकाचौंध म चौंधियाय  मनखे के दुर्गति अउ विनाश ल रोके के उद्देश्य ले लिखे गे सुग्घर कहानी बर कहानीकार आद. डॉ विनोद कुमार वर्मा जी ल बहुत बहुत बधाई🙏🙏🌹🌹💐💐


पोखन लाल जायसवाल पलारी (पठारीडीह) जिला बलौदाबाजार भाटापारा छग

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आदरणीय वर्मा सर जी

जोहार पांय लागी

   

   *"दू गज जमीन" पढ़ेंव | ये कहानी के कथानक,भाषा शैली,शब्द विन्यास, ऐतिहासिक घटना जम्मो दृष्टि से "लोक कथा" के दर्जा पा गए हे |*

    *जब कोनो काल्पनिक कहानी के कथानक म  रहन-सहन,खान-पान, वेशभूषा, जीवन दर्शन,आचार-विचारअउ दिनचर्या ह आम जनमानस के जिनगी ल दर्शाथे, तब अपने-आप "लोक कथा" के दर्जा पा जाथे | तब लोककथा के स्वरूप,मिठास अउ संदेश ह नस-नस म लहू जैसे भीन जाथे !*

     *अईसन कहानी से कई ठन सीख घलो मिलथे | "दू गज जमीन" से शिक्षा मिलथे- मन भर दौड़य,करम भर पाय  | कम खाय हदर मरय, जादा खाय-फूल मरय ! हदर मरय ! तऊने हितकर होथे | अईसने लोक कथा ल गांव के चौरा आंट या चौपाल म सियान मन सुनावत रहिन अउ सीख देवैं -लंका म सोन  बिरथा होथे!  "धांय-धूपे तेरह अउ घर बैठे बारह आना ह जादा उचित होथे !  जम्मो सिखौना ये "दू गज जमीन कहानी से मिलथे |*

     *हिरदय ले धन्यवाद


गया प्रसाद रतनपुरिहा

सुर-बईहा* *(छत्तीसगढ़ी कहानी)*

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                  *सुर-बईहा*


          *(छत्तीसगढ़ी कहानी)*


              हमन पाँच संगवारी गुरु के चरन मा बईठ के रमायन पोथी सीखे के उजोग करे रहेन । गुरु-सिस चाला हर हमर ये। येई हर हमर भारतीय संस्कृति आय। बिन गुरू गयान कहाँ... ! येकरे सेथी रमायन के मरम ला कुछु अरथ मा समझ के फेर कंठ साधना करके रमायन मंडली बनाय के हिच्छा हमन के मन मा रहिस । मानसाय के घर के पाछु कोती के खाली खोली मा अब अगर धूप कहरे बर लाग गय रहिस | सनातन महाराज ... जाँत-पाँत के

गोठ ला तियाग के येई कोती हमर पारा आके रमायन गान सिखोय के सुरु करे रहिन । मानसाय, बहादुल, झनक, केंगटा अऊ मैं,

अतका झन तो पक्का रहेन, एक दू झन अऊ आन संगवारी मन घलो आ जाँय अऊ चिमटा, खड़ताल हर मात जाय । अवईया जवईया मन

देख के मुचकाय घलो। वोमन के हाँसे मुचकाय मा गहरा अरथ हर छुपे रहे फेर हमन कुछु नई कहन काकरो से ।


             हमन के ये उजोग हर स्कूल कस पढ़ई रहिस । पहिली महराज हर हमन ला दोहा - चौपाई के सधारन अरथ फेर वोमन के असली मरम ला बूझाय के कोसिस करें तेकर पाछु सब झनजुर मिल के सुर ला उठावन। मैं पेटी मा अंगुरी नचाय के कोसिस करँव त केंकटा के बाँटा मा तबला - डुग्गी रहेय अऊ बाकी संगवारी मन आन अलंकार बाजा मन ला संभाले । अईसनहा बच्छर भर करे के बाद

गुरु महराज ला लागिस कि ये चिरईया मन अब थोर मोर उड़े के काबिल हो गय हें । एकरे बर एक दिन वो कहिन... दऊ हो अब येती

बर... तुहर अभ्यास अऊ विस्वास हर ही गुरु आय। पहिली रमायन के दोहा -चौपाई मन के अरथ मा बूड़ जावा फेर माता सरसती-भवानी

तुँहर कण्ठ मा खुद आ बिराजहीं फेर देखिहा तुँहर  कंठ ले उपजे नाद-बरम्ह हर कईसे सुनईया मन ला भाव - समुंदर मा बोर दिही ।


           येला सुनके हमर जीहर धक्क ले करिस । दुख ये बात के लिए,अब गुरु हर सिखोय बर बंद करते हे फेर खुसियाली ये बात के रहिस कि अब हमन अपन साज-सिंगार ला धर के नवधा.. साप्ताहिक

रमायन मा गाये बजाये जाय सकबो । गुरु महराज छेवर मा कहिन...

बेटा हो, गीता रमायन ला तो छूये कि हिच्छा तो करत हावा फेर... पढ़े बर रामायन पोथी अउ कीरा परे भीतर कोती... झन होवे...

बस्स येईच्च हर मोर आखिरी दिक्छा... मंतरा आय । 


           हमन सब के सब उन्कर चरन ला धर दारेन । गुरु तो हमन ला समारत भर रहिन ।


     *               *            *               *


            मैं तरिया मा नहावत पूरब के अगास मा रगबगात भगवान उदित नरायन ला ओंजरी ओंजरी पानी के अरध देवत रहँय कि वोतकीच बेरा कोन जानी कहाँ कोती ला गुरु महराज के बानी रमायन के चौपाई के रुप मा मोर भीतरी कान अऊ हिरदे मा गूँजे बर लागिस... पर हित सरिस धरम नहीं भाई... पर पीड़ा सम नहीं

अघमाई। एक पईत मोर नजर तो वो सुरुज नरायन से मिल गय अऊ मोला लागिस वोहू हर ये गोठ के हुँकारू देवत हें । मैं अपन आखा -बाखा देखें सबेच्च कोती एईच्च गोठ गूँजत हे कहू लागत रहे.... परहित

सरिस धरम नहीं भाई... | मैं पानी से बाहिर निकल आँय हाथ ला जोरे-जोरे...। 


          तीर के पथरा मा भकवा डोकरा अपन अंगोछा ले पीठ ला लगरे के कोसिस करत रहय फेर हाथ हर उहाँ तक नइ अमरात रहे । ये ला देखके मैं वोकर पीठ ला लगरे... लगरे करें । एक पईत तो वोहर मोर मुँहु ला देखिस बट्ट ले फेर हाँसत कहिस, जुग-जुग जी बेटा सील लोढ़ा मा पीसके खा.. । 

तोरे कस बबा.. मैं कहेंव अऊ वोला लगर घस्स के उप्पर आ गँय तरिया के पार मा। सैलिन बई हर बाँगा मा पानी बोहे रहिस अऊ धीरे रेंगत रहिस। मैं वोकर तीर मा जाके टप ले वोकर पनिहा ला मोर खाँद मा मढ़ा लेये... दे बई मोला कहत। बई मोर मुँह ला देखत रहि गय पाछु-पाछु रेंगत ।


            घर आके तेल फुल चुपर के मैं खोर कोती निकल आँय । आज मोर मन मा हिच्छा होवत रहिस के जब हमर सास्तर हर... वसुधैवव कुटुम्बकम कहत हे फेर तब  तो ये सब मनखे अपनेच आँय। एकर सेती

आज मैं गाँव भर के सब्बो घर ला जाँहाँ वोमन दुख -दरद हाल- चाल पूछहाँ। मैं अईसन करें घलव... । जे डेहरी मा कभ्भु नई जाना हो

उहाँ तक भी गँय अऊ राम जोहार करके आयें। सबके सब मोला अचरज मा देंखे... का होगय एला कहिके ।


           बेरा चढ़त ले मैं मोतीलाल के डेहरी ले आँवत रहें कि पाछु ले वोकर गोठ मोर कान मा पर गईस। “ये छोकरा हर सुरबईहा गय हे देख न गाँव भर ला घरो-घर किंजरत हें।'' 


        घर आयें अऊ अपन गुसाईन ला सब बात बताये लागें त वो कहिस... ये सब ठीक हे... | रमासन पोथी सब ठीक हे... फेर..?


            वो चुप हो गय रहिस।



*रामनाथ साहू*



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