Thursday, 23 December 2021

किसान दिवस विशेष आलेख- चोवाराम वर्मा बादल


 किसान दिवस विशेष  आलेख- चोवाराम वर्मा बादल


किसान*


किसान कहे तहाँ ले रात दिन चरचरावत घाम ,ताते तात झाँझ-झोला, लउकत-गरजत बरसत  बादर-पानी  अउ कँपकँपावत जाड़ म तको जाँगर टोर के कमइया, खेत के धुर्रा-माटी,चिखला म सनाये सब बर अन्न उपजइया फेर खुद भूख गरीबी अउ अभाव म घेराय हलधरिया के चेहरा आँखी-आँखी म झूले ल धर लेथे।

      आजादी के पहिली अउ अभो ले ये भुँइया के भगवान के दशा 19-20 ओइसनेच हे।भले आनी-बानी के आँकड़ा मन चिल्ला-चिल्ला के काहत रहिथें के किसान के दशा म बहुत सुधार होये हे,उँखर आमदनी बाढ़ गे हे फेर हकीकत ल टमड़ के देखबे त कुछु आन नजर आथे।

 हाँ ---आमदनी बाढ़गे हे,फसल हा पहिली ले जादा कीमत म बेंचावत हे  फेर खातू -माटी, बिजहा अउ दवई के रेट हा तो घलो अगास ल छूवत हे। फसल के कीमत थोकुन बाढ़थे त ओकर तुलना म सुरसा कस मुँह फइलाये मँहगाई ह कई गुना बाढ़ जथे। कुल मिला के जोड़-घटाना करबे त किसान ल कुछु हाथ नइ आवय उपर ले कर्जा-बोड़ी करके खेती किसानी करे लागत (खर्चा) ह नइ वसुलावय।किसान ह जनम ले मरत तक कर्जा म बूड़े रहिथे।कतेक झन तो इही दुख म फाँसी लगा लेथे।

    कोनो भी सरकार कहिथे के हम तो किसान ल ये स्थिति ले उबारे बर वोकर कर्जा माफ कर देथन--- बहुत कस छूट अउ अनुदान देथन--- सहीं बात ये फेर एकर लाभ वास्तव म किसान ल मिलथे धन नहीं तेन सोंचे के बात ये।

कर्जा माफ होइस तहाँ ले फेर मँहगाई ह चुहक के ओइसने के ओइसने कर देथे। अनुदान अउ छूट के लाभ बड़े मन उठा लेथें।असली किसान पिछवा जथे।अरे भइया हो करजा माफ करे के ,फोकट म देये के जरूरत नइये भलुक फसल ल उचित कीमत म खरीदे के जरूरत हे, किसान ल भरपूर बिजली,सिंचाई बर पानी, सहीं बिजहा अउ सहीं समे म पर्याप्त खातू देये के जरूरत हे। उत्पादन बने होही,फसल के बने कीमत मिलही त मिहनती ,संतोषी किसान ह अपन स्थिति ल खुदे सम्हाल लिही। बिजली बिल नहीं के बरोबर होगे हे फेर फसल म पानी पलोये के दिन म कटौती उपर कटौती-- फसल भुँजाके मर जथे, येहू का काम के ।सिंचाई बर नहर कहाँ हे? हाबय तेनो मन ऊँट के मुँह म जीरा बरोबर हें।

  एक बात अउ के कर्जा माफी अउ जतका भी सुविधा के घोषणा होथे वोकर असली फायदा बड़े-बड़े दाऊ जोतनदार ,जमींदार ,गौंटियाजे मन खेत के मेंड़ म तको नइ जायँ ते मन उठाथें। कतेक झन नकली किसान बने सेठ-बैपारी मन उठाथें।इँकरे  दस ठन बीस ठन खाता रहिथें  तेमा लाखों-लाखों रुपिया के कर्जा छूट होथे। खेती किसानी के नाम म  जानबूझ के मँनमाड़े करजा ले रहिथें--पटावयँ तक नहीं-- काबर के जानत हें, आज नहीं ते काली चुनावी मौसम म कर्जा माफी होबे करही। इँकर सरी काम ल मजदूर अउ निच्चट छोटे किसान मन करथें फेर येमन ल कुछु नइ मिलय।असली किसान इही मन ये ते मन चुक्कुल म चल देथें।येमन ईमानदारी ले बैंक ले लेये कर्जा ल घलो पटा देथें। अउ कहूँ छूट मिलथे घलो त कतका--  पाँच हजार  के दस हजार----।

   सच कहे जाय त किसान के दशा अबड़ेच दयनीय हे वो ह मोटइय ते दूरिहा के बात ये दिनों-दिन दुबरावत जावत हे। वो ह बने पेट भर खाके कभू नींद भर सो नइ सकत ये। हरदम चिंता फिकर म परे रहिथे-कभू बिन बरसा के त कभू बाढ़ त कभू कीरा मकोरा,बीमारी के मारे। अब तो वो ह किसान ले मजदूर होवत जावत हे।मजबूरी म होवय चाहे बड़े-बड़े तनावत फेक्ट्री मन के सेती, खेत-खार खिरावत जावत हे।

       किसान मन ल ये दुर्दशा ले बँचाये के उदिम होना चाही वोकर बर सबले पहिली फसल के सहीं कीमत मिलय अइसन इंतजाम करे बर लागही। वोकर खेती-किसानी के काम के जिनिस मन ल मँहगाई के खर छँइहा ले बँचाये ल परही।  सिंचाई सुविधा देये बर परही, सहीं समे म खातू-माटी ,बिजहा के सुभीता देये बर लागही।अधिया-रेगहा लेके जेन खेत म वो मिहनत करथे वोमा मिलइया सरकारी जम्मों लाभ उही ल मिलना चाही।

    किसान के दशा ल देखके हमर आत्मा पुकार उठथे---


जग ला सब सुख देने वाला, तैं किसान सब ले मजबूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।।


रिबी रिबी बर तरसत रहिथें,तोर सुवारी लइका लोग।

खून पछीना तोर कमाई, बइठाँगुर मन करथें भोग।

तोर काम के दाम तको ला, बइरी मन नइ दँय भरपूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।


जाँगर पेर कमावत रहिथस, घाम भूख अउ सहिके प्यास।

भोग आन मन छप्पन झड़थें,रहिथे हँड़िया तोर उपास।

देख तमाशा हाँसत रहिथें, सेठ धनी मन मद मा चूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।


जादा सिधवा झन रा संगी, तभे बाँचही तोरे लाज।

मूँड़ उठाके रेंग बने तैं, पटकू बंडी पागा साज।

'बादल' के अरजी हे अतके,झन चिखबे खट्टा अंगूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।



चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़


Friday, 17 December 2021

12-14 दिसम्बर के सुरता// छत्तीसगढ़ म साहित्य के पहला कुंभ

 12-14 दिसम्बर के सुरता//

छत्तीसगढ़ म साहित्य के पहला कुंभ

   दिसंबर महीना लगते कोंवर  जुड़ जनाए ले धर लेथे. तब होत बिहनिया रउनिया तापत पेपर पढ़े के अलगेच सुख होथे. पेपर पढ़त एक समाचार म नजर थोकन बनेच गड़गे. लिखाय राहय- रायपुर म अखिल भारतीय स्तर के साहित्य महोत्सव के आयोजन के तैयारी चलत हे. आम तौर म ए जानत राहन, अइसन किसम के साहित्य, संस्कृति या कला ले जुड़े जम्मो बड़का आयोजन ल इहाँ के संस्कृति विभाग डहर ले करे जाथे. फेर ए समाचार म लिखाय राहय के छत्तीसगढ़ शासन के जनसंपर्क विभाग ह ए आयोजन ल करवाने वाला हे, जेमा देश भर नामी साहित्यकार, पत्रकार अउ कलाकार मन ल नेवता दिए जाही.

   तब मैं सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ के साप्ताहिक पत्रिका 'इतवारी अखबार' के संपादन कारज देखत रेहेंव. उहाँ प्रेस म बइठे अपन रोज के बुता म भुड़े रेहेंव, तइसने जनसंपर्क विभाग के अधिकारी अउ हमर साहित्यिक संगवारी त्रिजुगी कौशिक जी आइन अउ "रायपुर साहित्य महोत्सव" आयोजित करे के बारे म बताइन. हां महूं आजेच के पेपर म पढ़े हंव कहिके बताएंव. त वोमन कहिन- वोकरेच सेती तो तोर जगा आए हंव. उन बताइन के एकर पहला दिन के उद्घाटन सत्र छत्तीसगढ़ ऊपर आधारित रइही, एमा आपला संचालन के बुता ल पूरा करना हे.

   उन विस्तार ले जानकारी देवत बताइन- अवइया 12, 13 अउ 14 दिसंबर 2014 के छत्तीसगढ़ के इतिहास म पहिली बेर अखिल भारतीय स्तर के साहित्य कुंभ के आयोजन जनसंपर्क विभाग करत हे. एमा तीनों दिन एकक घंटा के अलग-अलग सत्र रइही. एमा एक मंडप म छत्तीसगढ़ ले संबंधित विषय हे, जेकर मोला दू वरिष्ठ साहित्यकार तो मिलगे हे, तीसरा मैं आपला लेना चाहत हंव. 

   मैं हव बन जही कहेंव, त उन बताइन- ए सत्र म डा. रमेन्द्रनाथ मिश्र जी छत्तीसगढ़ के इतिहास अउ पुरातत्व ऊपर व्याख्यान दिहीं. नंदकिशोर तिवारी जी छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति ऊपर अउ आपला कार्यक्रम के संचालन करते-करत छत्तीसगढ़ के साहित्यिक इतिहास ल घलो बतावत चलना है. मैं हव कहेंव त उन फेर कहिन- तुंहर ए सत्र के दूनों आदरणीय मन संग फोन म गोठ-बात कर के कार्यक्रम के बारे म अउ गोठिया लेहू.

   मैं गुनेंव 'इतवारी अखबार' के ए अंक ल "रायपुर साहित्य महोत्सव" ल समर्पित करना चाही. काबर ते छत्तीसगढ़ के इतिहास म पहिली बेर अतका बड़का साहित्यिक आयोजन होवत हे, वोला स्मरणीय अउ संग्रहणीय बनाए जाना चाही. अखबार के प्रधान संपादक सुनिल कुमार जी संग ए गोठियाएंव, त उहू हव बढ़िया हे कहिन. तहाँ ले मैं चारों मुड़ा के साहित्यकार मन संग संपर्क कर-कर के एकर खातिर प्रकाशन सामग्री मंगाए लागेंव. खूब सामग्री आइस, अउ एमा सबले बढ़िया सहयोग हमर रायपुर के ही बड़का साहित्यकार जयप्रकाश मानस जी ले मिलिस.

   12 दिसंबर के मैं जल्दी नहा-धो के तैयार होगेंव. हमर सत्र के दूनों अउ प्रतिभागी डा. रमेन्द्रनाथ मिश्र अउ नंदकिशोर तिवारी जी संग फोन म मुंहाचाही घलो होगे. वोमन बेरा म पंडाल म ही संघरबो कहिन. वोकर मन संग गोठियावत खानी ही जनसंपर्क विभाग के अधिकारी डहरिया जी के मोर जगा फोन आगे. उन कहिन- मैं आपला ले खातिर आवत हंव, कोन जगा भेंट होही. मैं अपन घर के पता बताएंव, तहाँ उन झट पहुंची गें. तहाँ ले हमन लाल रामकुमार सिंह ल ले खातिर गेन, फेर उहाँ ले सीधा कार्यक्रम स्थल 'पुरखौती मुक्तांगन'.

   पुरखौती मुक्तांगन तो पहिली घलो गे रेहेन, फेर लोगन के अतका भीड़ अउ रौनक कभू नइ देखे रेहेन. चारों मुड़ा जिहां तक नजर जावय लोगन के मुड़िच मुड़ी दिखय. हमन मुख्य दरवाजा म पहुंचेन त संग म रेहे अधिकारी डहरिया जी के माध्यम ले जम्मो प्रतिभागी मन बर अलग से बनाए गे पहचान पत्र ल हमर मन के टोटा म अरको दिन, संग म छत्तीसगढ़ शासन के अलग-अलग विभाग मन ले संबंधित पत्रिका मन ले भरे दू भारी-भरकम झोला घलो धरा दिन. मोर बर बड़ा अलकरहा होगे राहय, काबर ते पहिलीच ले इतवारी अखबार के विशेषांक निकाले राहन तेकर सइघो चुंगड़ी भर बोझा फेर एदे शासकीय किताब मन के झोला. 

   मैं एको संगी देखेंव त आगूच म देश भर ले आए किताब मन के प्रकाशक मन के ओरी-ओर स्टाल लगे राहय. मोला डा. सुधीर शर्मा अउ वोकर वैभव प्रकाशन के सुरता आइस. फोन करेंव त पता चलिस, एदे भइगे दूसरा नंबर के स्टाल उंकरे आय. मैं जम्मो किताब अउ पत्रिका मन के झोला ल उंकर स्टाल म रख के अपन मंडप, जेमा हमन ल अपन प्रस्तुति देना रिहिसे, वोती चल देंव.

   अपन ठीहा 'मुकुटधार पाण्डेय मंडप' म पहुंचेंव त उहाँ डा. रमेन्द्रनाथ जी संग भेंट होगे, फेर नंदकिशोर तिवारी जी नइ दिखत रिहिन, तभे उंकर फोन आइस- सुशील भाई मैं रायपुर के तीरेच म पहुंचगे हंव बस आधा घंटा म पंडाल म पहुँच जाहूं. एती जनसंपर्क विभाग के अधिकारी मन हमन ल चेता दे राहंय- 11 बजे मतलब ठीक 11 बजे मंच म चढ़ जाना हे. काबर ते आज उद्घाटन सत्र आय मुख्यमंत्री के संगे-संग अउ आने मंत्री, विधायक अउ बड़का अधिकारी मन इहाँ पहुंचही.

  उहाँ अलग-अलग सत्र के संचालन खातिर इहाँ के तीन पुरखा साहित्यकार मन के सुरता म तीन  बड़का-बड़का पंडाल बने रिहिसे. पहला के नाम रिहिसे- गजानन माधव मुक्तिबोध मंडप, दूसरा के- मुकुटधर पाण्डेय मंडप अउ तीसरा के- पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मंडप. एकर छोड़ इहाँ के कलाकार मन के विविध कला के प्रदर्शन खातिर अलग-अलग अउ ठउर बनाए गे रिहिसे.

   हमन मुकुट धर पाण्डेय मंडप म बइठे रेहेन. 11 बजे बर बस पांच मिनट बांचगे रिहिसे फेर नंदकिशोर तिवारी जी अभी तक आए नइ रिहिन हें. मोला चिंता असन लागिस त रमेन्द्रनाथ जी ल कहेंव- कइसे करबो, बेरा तो मंच म जाए के होगे हे अउ नंदकिशोर जी दिखत नइए. रमेन्द्रनाथ जी कहिन- हमन दूनों झन खींच लेबो, एक घंटा ह का मायने रखथे? तैं शुरूआत करत मोला आमंत्रित कर देबे. मैं आधा घंटा तो खींचच देहूं, तहाँ ले तहूं अपन वक्तव्य देवत दू-तीन ठोक कविता घलो हकन देबे, हो जाही एक घंटा.

   मंच म आयोजक मन डहर ले एक सदस्य आइस. हमन ल आमंत्रित करिस. हम दूनों झन गेन. फूल-माला होइस, तहाँ ले मैं संचालन खातिर माइक म आएंव. अपन वक्तव्य देवत रमेन्द्रनाथ जी ल आमंत्रित करेंव. रमेन्द्रनाथ जी अपन वक्तव्य देवत रिहिन हें, तेकरे बीच म नंदकिशोर जी घलो पहुँचगे. मोला हाय म हाय असन लिगिस. फेर हमर मन के सत्र ह बढ़िया ढंग ले संपन्न होइस.

  हमर सत्र पूरा होए के बाद फेर पूरा आयोजन स्थल ल घूम घूम के देखेन. हमर मन जगा जम्मो कार्यक्रम के सूची रहय, कोन मंडप म कतका बेरा का कार्यक्रम हे. अपन रुचि के मुताबिक वतका जुवर वो मंच म पहुँच जावन. सांझ के घर आए के बेरा फेर डहरिया जी के संग होगेन. रद्दा म वोमन मोला कहिन- काली थोरिक एक जुवरिया मोला सिरपुर जाए खातिर संग दे देतेव.

  वोमन बताइन के स्टार प्लस टीवी म वो बखत बालीवुड कलाकार आमिर खान के संचालन म जेन कार्यक्रम आथे- 'सत्यमेव जयते' वोकर पूरा टीम इहाँ आए हे, काली संझा उंकर मन के हमरे मंडप म कार्यक्रम हे. वोमन चाहथें, के एक जुवर सिरपुर भ्रमण कर लेवन. आप संग म चलतेव त मोला सोहलियत हो जातीस. मैं तैयार होगेंव.

  बिहान भर डहरिया जी कार धर के मोर घर आगे. उहाँ ले सत्यमेव जयते के जम्मो सदस्य रूके राहंय, वो होटल गेन उहाँ ले सिरपुर. रद्दा म वो मुंबई के पहुना मन पूछिन- हमन अभी तीन नवा बने म ए छत्तीसगढ़ ल ही जादा विकसित रूप म देखत हन. इहाँ के सड़क मनला देखथन त लागथे, के मुंबई म किंजरत हन. आखिर अतेक जल्दी ए राज्य के विकास कइसे होगे? 

  मैं कहेंव- छत्तीसगढ़ प्राकृतिक रूप ले बहुत संपन्न राज्य आय. इहाँ राजस्व के आवक भरपूर हे, फेर पहिली वो राजस्व के मात्र 12 ले 15 प्रतिशत भाग ही छत्तीसगढ़ के विकास म लगत रिहिसे, बाकी के 85 प्रतिशत ल शेष मध्यप्रदेश म लगा देवत रिहिन हें, तेकर सेती इहाँ विकास नइ हो पावत रिहिसे. चारों मुड़ा के सड़क के संगे-संग अउ जम्मो जिनिस ह अदियावन असन दिखय. अब अलग राज्य बने के बाद पूरा के पूरा राजस्व के आवक ह छत्तीसगढ़ म ही लगथे, तेकर सेती विकास दिखथे. अउ कई विषय म उंकर संग गोठ-बात होइस. वोमन सिरपुर मंदिर म मोर जगा अलग से साक्षात्कार लेके विडियो रिकार्डिंग घलो करिन अपन कार्यक्रम म प्रसारित करबो कहिके. तीन के बजत ले वापस पुरखौती मुक्तांगन पहुँच गेन. 

   तीसरा अउ ए आयोजन के आखिरी दिन इतवार परे राहय तेकर सेती अथाह भीड़ राहय. पूरा छत्तीसगढ़ के कोना- कोना ले लोगन जुरियाए राहंय. देश भर ले आए जम्मो पहुना मन के संगे-संग हमर इहाँ के संगी मन संग घलो मेल भेंट होइस. ए आयोजन के झरे बाद घलो महीना भर असन एकरेच संबंध म संगी मन संग गोठ-बात होवय. अवइया बछर फेर जुरियाबो काहन, फेर ए संजोग दुबारा नइ बन पाइस. जनसंपर्क विभाग हाथ खड़ा कर दिस, के हमर नियमित वाला काम म भारी व्यावधान आ जाथे. हां संस्कृति विभाग करवाना चाहय, त आर्थिक फंड ल हम जनसंपर्क विभाग के डहर ले दे देबो, फेर आयोजन म कार्यकर्ता मन के भूमिका हमन नइ निभा सकन. संस्कृति विभाग के ए डहर चेत करे के अभी तक अगोरा हे. का इहू ह असली कुंभ कस बारा बछर म एके बेर आए करही??

(संस्मरण संग्रह 'सुरता के संसार' ले साभार)

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

विचार// छत्तीसगढ़ी लेखन म विषय संग शब्द के चयन..

 विचार//

छत्तीसगढ़ी लेखन म विषय संग शब्द के चयन..

     वइसे तो छत्तीसगढ़ी ल शिक्षा संग राजकाज अउ रोजगार के भाखा बनाए के माँग गजब दिन के चलत हे, फेर जब ले छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन इहाँ होए हे, तब ले ए माँग ह बनेच जोर धरे हे. फेर मोर मन म कभू इहू बात उठथे, के का छत्तीसगढ़ी म आज हमर जगा अतका साहित्य या लेखक हे, जेन ए जम्मो क्षेत्र के माँग अउ आवश्यकता ल वोकर गरिमा के अनुरूप पूरा कर सकथे?

    अभी देखे ए जाथे के सिरिफ कविता, कहानी, कुछ लेख अउ व्यंग्य आदि मनला ही छत्तीसगढ़ी के पूरा के पूरा साहित्य मान लिए जाथे. त का अतकेच भर म समाज अउ शासन के हर वर्ग अउ क्षेत्र के आवश्यकता ल पूरा करे जा सकथे?

   मोला सुरता हे, रायपुर म एक प्रतिष्ठित दैनिक अखबार के संपादक संग हमर मनके चर्चा होए रिहिसे, तब उन कहे रिहिन हें, के उन रोज एक पेज छत्तीसगढ़ी म छापे बर तैयार हें, फेर शर्त ए हे के एकर बर वो सबो विषय के भरपूर मटेरियल आना चाही, जेकर ले एक दैनिक अखबार के जम्मो वर्ग के पाठक मनला पढ़ाए अउ संतुष्ट करे जा सकय. 

    एक अखबार ह एक सामान्य रिक्शा चलाने वाला ल लेके बड़े-बड़े अधिकारी, कर्मचारी, डॉक्टर, वकील, व्यापारी, अर्थशास्त्री, इंजीनियर, वैज्ञानिक, युवा, महिला अउ लइका मन के संगे-संग राजनेता मनला घलो अपन डहार आकर्षित करे खातिर उंकर पसंद के अनुरूप सामग्री छापथे. हमन ल अइसन जम्मो विषय म रोज भरपूर अउ एक प्रतिष्ठित अखबार के गरिमा के अनुरूप सामग्री, जेमा संबंधित विषय मन म लेख अउ समाचार उपलब्ध कराए बर कहिस. हमन बहुत झन साहित्यकार मन संग चर्चा करेन अउ ए सब तमाम विषय म लिखे बर कहेन, फेर वोकर बर अपेक्षा के अनुरूप न सामग्री मिलिस न लोगन.

    एक अउ बार हमन  छत्तीसगढ़ी म राजनीतिक मासिक पत्रिका निकाले के उदिम करेन. मात्र एक-दू अंक ही निकाल पाएन, तहाँ ले भइगे. एकरो असली कारण उही रिहिसे. पत्रिका के मांग अउ गरिमा के अनुरूप भरपूर सामग्री के नइ मिल पाना. कतकों साहित्यकार मनला जोजियावन फेर नतीजा शून्य. 

    अब आप बतावव, सिरिफ सरकार ऊपर लाठी धर के भीड़े भर म ए सब आवश्यकता ह पूरा हो सकथे का? का हमन ल इहू डहार चेत करे के अउ म अपन लेखन के रद्दा ल वो सब दिशा अउ विषय डहार लेगे के जरूरत नइए? सिरिफ कविता-कहानी भर म अरझे रहिबो, त फेर समाज के हर वर्ग के लोगन के साहित्यिक आवश्यकता ल कइसे पूरा कर सकबो?

    अइसन तमाम विषय मन म भरपूर लेखन के संगे-संग हमन ल भाखा के एकरूपता डहार घलो चेत करे बर लागही. एक नान्हे शब्द हे- 'अउ' एला लोगन कतका किसम ले लिखथे देखव- कोनो 'अउ' कोनो 'अऊ' त कोनो 'आउ', 'आऊ', 'अव', 'अउर', 'औ', 'आव'. अइसने कतकों शब्द हे जे मन ल जम्मो लेखक मन ल एक किसम ले लिखे के जरूरत हे. हमन ल शासन ऊपर छत्तीसगढ़ी ल शिक्षा, राजकाज अउ रोजगार के भाखा बनाए के दबाव तो बनाएच बर लागही, संगे-संग तमाम विषय अउ क्षेत्र के लोगन मन के साहित्यिक आवश्यकता ल घलो पूरा करे बर लागही तभे छत्तीसगढ़ी ह चारों मुड़ा सर्वमान्य भाखा के रूप म स्थापित हो पाही, सम्मान पा सकही.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

आशा,निराशा अउ शांति

 आशा,निराशा अउ शांति


आशा,निराशा अउ शांति के बड़ महता हे।आशा के भरोसा, निराशा के दुखवा अउ शांति के गोसइयाँ संतोष ल केहे जाय त मँय सोचथों कि कोनों उपराहा बात नइ होही। काबर कि ककरो अंतरात्मा मा जब ये मन आथे त आशा,भरोसा के संग,निराशा,दुखवा के संग अउ शांति सदा संतोष के संग ही आथे।

         मनखे ल जब कुछ पाय के आशा होथे, तब 

भरोसा करके कोई काम ल सिरजाय के कोशिश करथे। जिहाँ आशा होथे, उहाँ भरोसा होथे, अउ जिहाँ भरोसा होथे, उहाँ आशा। बिना आशा अउ भरोसा के मनखे कोई काम के शुरुवात नइ करे। आशा परानी के जिनगी मा खुशी लाथे। कारज करे बर उत्सुकता जगाथे,अउ आघू बढ़े बर रद्दा घलो देखाथे। फेर अनुचित आशा, निराशा के कारण बनथे। 

       निराशा वो घुना आवय जेन परानी के जिनगी ल बरबाद कर देथे,जइसे लकड़ी ल लकड़ी के घुना। निराशा के जिनगी मा आय ले परानी आशा के ठीक उल्टा काम करथे। जब कभू ककरो जिनगी मा निराशा आथे,परानी ल भटकाथे। निराशा के कारण परानी ल अपन जिनगी मा अँधियार लगे ल लगथे। जेन परानी के जिनगी मा निराशा आथे, मनखे ल कोई कामकाज करे के इच्छा नइ होवय। मनखे ल बड़ दुख होथे। कोई मनखे तो अपन जिनगी ल घलो खो देथे। अपन काम ले जादा आशा रखना निराशा ल नेवता देना होथे। हम ला जादा आशा नइ करना चाही, न जादा निराश होना चाही।

            परानी के जिनगी मा शांति तब आथे,जब निराशा,चल देथे। जेन परानी के मन मा संतोष होथे, वो परानी अपन जिनगी मा शांति अनुभव करथे। बिना संतोष के शांति के अनुभव नइ होवय।

संतोष नइ करे ले ही जिनगी मा निराशा आथे।जेन ककरो हित मा नइ होवय।

     आशा,निराशा अउ शांति थोरिक दिन बर ही परानी के जिनगी मा आथे,अउ बहुत कुछ सीखा के जाथे। हम ला सबो स्थिति ल झेले बर सदा तियार रहना चाही।

       

     राम कुमार चन्द्रवंशी

     बेलरगोंदी (छुरिया)

     जिला-राजनांदगाँव

      9179798316

कहानी: अकलमुँडी

 कहानी: अकलमुँडी

           मनखे घर मनखे आथे-जाथे, तभे मनखे के अटके बूता आगू सरकथे। काम बूता के संग चलत मुँहाचाही ले मन घलव हरियाथे। दूएच मिनट कखरो संग बइठ के गोठियाय ले दुख के जब्बर पहाड़ ह हरू लागथे। जिनगी ह एके जगा ठाढ़े सहीं नइ जनावय। दुख ल धरे बइठे म नइ बनय। आगू तो बढ़े ल पड़थे। इही जिनगी के सार आय। अइसे तो सुख-दुख जिनगी के अँगना म घाम-छइहाँ के खेल खेलत रहिथें। कोनो नइ जानय कब काखर भाग म कतिक बेर दुख आ जही। कोनो नइ सोचय कि दुख ले मोर भेंट होवय। फेर जिनगी म सुखेच सुख तो नइ मिलय। सुख के पाछू दुख हे त दुख के पाछू सुख घलव हे। दुख ले कभू न कभू भेंट तो होबे करही। इहू ह जिनगी के रीत आय। फेर वाह रे दू गोड़िया मनखे के गुमान। मरे के पाछू तन दू कउड़ी के राहय न दू कउड़ी ल धर के जाय बर मिलय। जुच्छा हाथ आय हे अउ जुच्छा हाथ जाय बर हे तेमा मोर पइसा, मोर धन...जइसन दसो ठन गरब गुमान ल पोटार के रख लेथे। दू पइसा आगर, का बटोर लेथे घमंड के पाँख लगाय दुनिया ले बाहिर उड़े लागथे। अपनेच भाई बंध ल नइ चीन्हे सहीं करथे। पारा परोसिन के का कहिबे? अइसने बानी चइतू अउ सेवती के हाल हे। भाई बंध मन ले चार पइसा आगर का कमाय धर लिन, अब उन मन के न आरो लँय, न शोर करँय। कोन्हों मेर भुर्र के जाय बर गाड़ी होगे हे। जब मन करे तब रेंग देथे। घाम के संसो न बरसा के। गाड़ी म बइठिन अउ चले चलिन माईपिल्ला। राजा महराजा मन के माहल सहीं चमकत घर होगे हे। रिकिम रिकिम के टाइल्स अउ काँच मन ले मार चमकत घर दुआर। दुआरी म पट्टा बँधाय बेलाती कुकुर। जेन बिस्कुट खाय बर तरसय, तेन ह कुकुर ल संझा बिहनिया दूध बिस्कुट खवाथे। जेकर दू काठा के टेपरी रहिस, तेन सात आठ एकड़ के धनहा वाला होगे। 

       चइतू के बेवहार अब बिल्कुलेच बदलगे। पाँव-पैलगी करई ल भुलागे। राम-राम के बेरा मुँह फरकातेच रहिथे। जेला देखही, तेला सुनाय धर लिही। नँगरा मन ...डउकी बुध म चलइया .. मन...उँकर मेर काय हे... घरे बस हे....तेमा...जउन आय तउन... गारी गुफतान अब ओकर रोजेच के बूता होगे राहय। चइतू के बेवहार अइसन कइसे बदलगे? कोनो ल हजम नइ होवत हे। कोनो कोनो फुसफुसाय लग गे हे ..धन बइहा होगे हे, धन बइहा..धन बइहा। ओकर संग कोनो ....।... कब बउरा जही, कोनो ठिकाना नइ हे, ओकर ले बाँच के रइहू। ओकर संग भिड़ना अपने इज्ज़त गँवाना ए। 

        कोनो कहय, चारों कोती ले कमई होय धर लेहे त बउरा गे हे। धंधा जोर पकड़ ले हे। तव कोनो फुसफुसाथे दूकान ले उबर नइ पात हे, खाय के फुरसत नइ मिलत हे, तेकर सेती खखवाहा होगे हे।

          दिनभर म दू मिनट ठेलहा नइ रहय। ग्राहिक ऊप्पर ग्राहिक ठाढ़े रहिथे। बेटा घलव कमावत हे। बेवहर म घलव लाखों बँटाय हे। बाप पुरखा म नइ देखे रहिस तउन ल देख डरिस। पइसा पलपलाय ल धर ले हे, त पगला घलव गे हे।का कहिबे, जे मनखे ते गोठ।

          सेवती घलव कभू पारा परोसिन संग बइठई काला कहिथे नइ जानिस। काँके पानी, कथापूजा म घलव काखरो घर जाय बर पाँव नइ उठाइस। दुख के बेरा म घलव दुखिया के संग दू मिनट बइठ लँव कहिके कभू नइ जानिस। अकेल्ला रहि जतिस फेर अकलमुँडी कस दूसर घर के मुँहाटी म पाँव नइ मढ़ाइस। उही जानय का ओकर मन म हे तउन ल। 

       ओकर महतारी ह ओला कतको समझा डरिस, पारा परोसिन मेर उठबे बइठबे तभे तो तोर संग कोनो गोठियाही बतियाही। दुख-पीरा ल बाँटबे। सबो दिन एके नइ रहय। तहींच नइ जाबे, त तोर घर कोनेच आही। बेवहार ह पूरथे अउ मनखे बेवहार ले पूछथे। धन दौलत तो हाथ के मइल आय। कब कति रेंग दिही कुछु नइ केहे जाय। आज हे त काली रइही जरूरी नइ हे। एकर घमंड बने नोहय। घमंड के घर खाली होथे, कहे गे हे।

       सेवती के महतारी अतके कहिके नइ रुकिस। आगू अउ कहिस- "दमाद बाबू ल काबर नइ बरजस। जब पाथे तब कोनोन कोनो ल बफलत रहिथे। चीजेच भर ल सकेले म नइ होवय, बेवहार घलव कमाय ल लागथे।" अतका ल सुन के सेवती अपन दाई ल उराठिल गोठ कहिस-- "दाई तोला रेहे बर हे त मुँह सील के कलेचुप रहि। नइ त तँय अपन घर के रस्ता नाप।" बेटी के गोठ ल सुन के चुप रहिगे। दू दिन के गे ले सेवती के महतारी बपुरी अपन घर चल दिस। 

         चइतू अउ सेवती दूनो के विचार रेलवाही के पटरी सहीं एके कोती सरलग जावय। चइतू घर बाहिर के जम्मो बूता चटपट कर डरय। कभू कोनो बूता ल डउकी करही, ते बहू करही कहिके नइ छोड़िस। खुदे झट्टे कर लेतिस। ओला सबो बूता बहुतेच उसरथे। घर म ठेलहा बइठई ओला कभू नइ भाइस। ठेलहा रहितिस त घुमे चल देतिस। ओढ़े पहिने के बड़ सउँकीन। चक सादा कुरता बड़ फबथे ओला। अस्तरी चले कुरता ऊप्पर सेंट मारे बर कभू नइ भुलाइस। ब्रांडेड पनही सेंडिल टोपी संग चस्मा पहिरई घलव ओकर बड़का सउँक आय। सेवती घलव ओकर देखा-सीखी टेस मारे म कभू पीछू नइ रहिस। मार लरी-लरी वाला करधन। गोड़़ बर लच्छा । रानी हार। कान म झुमका। फुँदरा ले पोहाय पोलखा के का कहना। ....अवइया पँदरही शनिच्चर के चार दिन बर दूनो झन घूमे जाय के प्लान बना डरे हे।

         

         नारी परानी घर के गहना आय। घर के सुघरई नारी के हाथ म रहिथे। नारी जइसन अपन रूप ल सँवारथे अउ सजाथे, वइसन घर बार अउ परिवार ल सँवारथे। घर सिरीफ घर सजाय के जिनिस ले नइ सजय। बेवहार ले सजथे। नता रिश्ता के मनखे मन के आय ले सजथे। तोर दिन तो दमाद तिर भाई-बंध अउ जेठानी मन के लाई लिगरी लगावत बीतय। ओकर तिर लीक के लाख करच। न खुद बने अउ न दमाद ल भाई-भउजी मन ले बनन देच। चीज आइस त भाई बंध मन छुटगे। भाई भउजी के आरो बिना तरी तरी छटपटात राहय बपुरा ह।

       अब मोर तिर रोय-गाय म का होही? मोर संग गोहरा के काय पाबे? मँय का करहूँ? मँय तो चार दिन के सगा अँव। भाई बंध अउ देरानी-जेठानी मन ले नता ल तहीं दुरियाय हस। त तहीं ह दुख ल झेल। पारा-परोसिन मन घर तहीं नइ गे हस, त उही मन कइसे के तोर दुख बाँटे आही। फरिका के कपाट ल तहीं ओधाय हस, त कइसे कोनो खोल के आही। परोसी बदले नइ जाय सकय, फेर तँय परोसी के बरोबर मान गउन नइ जानेस। परोसी मन ल लाठी च लाठी मारहूँ काहय, त तोला मजा आवत रहिस। कभू नइ बरजेस। भगवान सबो बर हे। जेकर लाठी चले के आरो नइ आय फेर गहिर घाव हो जथे। पहलियो बरजे रेहेंव, फेर तहीं...।

        नवा चरितर के बेमारी ह कोन जनी कति मेर चइतू ल अभरा लिस। सेवती ह डॉक्टर तिर पइसा कउड़ी कुढ़ो डरिस फेर एको काम नइ आइस। चइतू के साँस फूले लागिस। ...तन के कुँदरा ले हंसा उड़ागे। माटी के काया माटी म मिलगे। चइतू सरग के पहुना बनगे। 

         चइतू के जाय ऊप्पर ले सेवती आय दिन आँसू बोहाते राहय। ओकर रोवई सबो सुनय फेर कोनो ओकर डेरौठी म जाय के हिम्मत नइ कर पात रहिन। सबो एके गोठ करँय, कइसे जावन अकलमुँडी के घर? कोन जनी का कइही? माइलोगन मन संग कभू नइ सँघरिस त कोन जनी अभियो...? का कहि दिही.. का ठिकाना अकलमुँडी गतर के? सबो इही सोचत ओकर डेरौठी पार नइ गिन।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह (पलारी)

जि. बलौदाबाजार 

9977252202

विषैला

 विषैला

                                  देश ला आजादी मिले के कुछ बछर पाछू के बात आय । एक गाँव म , एक किसान , उदुपले  , बिन कोन्हो बीमारी के  , दुनिया ले चल दिस । काबर मरिस ? कोन्हो ल खोज खबर करे के जरूरत अऊ फुरसत दूनों , नइ रिहिस । दू चार झिन कारन खोजे के प्रयास करिन , तेमन ल सिर्फ झिड़की मिलिस । ओकर चिट्ठी चिरा गिस - तेकर सेती मर गिस होही , कहिके चुप करा दिन । समे बीतत अइसन घटना के बाढ़ आगिस । सरकार करा , कुछ मन ये खबर ला फेर अमरईन । देशी   सरकार लबारी थोरे मारही ..... ? वोमन , लोगन ल बतईन – किसान मजदूर मनखे के उदुप ले मरई हा , साँप चाबे के सेती होवत हे । लोगन ल चेतइन - खेत खलिहान , बारी बखरी जंगल झाड़ी म चेत लगा के जावव , जरूरी हे तभे जावव । कतको बछर नहाकगे , फेर गरीब किसान मनखे ल कहाँ ओतेक चेत । अऊ फेर चेत के चक्कर म , जेकर बूती जिनगी चलत हे , तेला थोरे छोर दिही । मनखे ल हरखे बरजे के , जम्मो उपाय फेल होगे , त सरकार कानून बनाए बर मजबूर होगिस – अउ खेत खार जंगली भुंईया ला , फेक्ट्री मालिक मन ल बाँटे लागिस , किसान मजदूर बिरोध करीन , तब ओमन ल बताय गिस कि तुँहर प्रान बचाये बर , साँप के भुंईया ल देवत हाबन , येमे तुँहर कोन्हो नकसान नईये । एकर बावजूद , प्रान हराये के संखिया नइ कमतिअईस ।

             सरकार के सलाहकार मन , साँप ल मरवाये के सलाह दिन । देखते – देखत साँप के संख्या घटे लागिस । साँप समाज ल चिंता होइस । जंगली जनावर मन के बईठका सकेल के अपन पीरा ल गोहनईस । जम्मो जानवर प्रजाति मिल के तै करीन ..... अब कोन्हो मनखे ल काटना - चाबना या कोकमना घला निये , निही ते साँप कस हमरो दुर्दशा होही । साँप मन किथे ‌- हमन कोन्हो मनखे ला नइ चाबन - काटन , हमर ऊप्पर फोकटे फोकट इल्जाम लगावत हे । सरकार करा बात रखे के , बात तै होईस । सरकार हा पहिली तो जाँच कराये बर आनाकानी करिस । फेर पाछू ...... जानवर मन के दबाव म सबर दिन ले झुकईया सरकार हा मांग स्वीकार कर लिस ।  

              छै महिना बर , जाँच आयोग के काम शुरू होगे । खुल्ला सुनवाई होये लगिस । साँप मनला अपन बात रखे के पहिली मौका मिलिस । साँप मन अपन दरद पीरा ल बतावत किहीन – हमन वाजिम म बिषैला आवन जज साहेब , फेर कुछ बछर ले मनखे ल काटंना कोकमना त दूर , देखना तको बंद कर दे हाबन । किसान गरीब मनखे मन के उदुप ले मरे के पाछू , हमर निही , मनखेच मन के हाथ हे । अपन बात के समर्थन म आगू किहीन – देश के आजाद होए के पहिली , जब हमन कोन्होच ल काटन , तब हमर जहर के प्रभाव ले , काकरो बाँच पाना सम्भव नइ रहय । फेर वो समे , हमन कोन्हो ला जानबूझ के नइ काटन । हमर रद्दा म उदुप ले सपड़ईया मनखेच हमर शिकार होय । कुछ दिन पाछू , हमन देखेन के , मनखेच ह , मनखेच के लहू ल पियत हे । उही समे एक दिन हमूमन सोंचेन के .... मनखे के लहू म जरूर मिठास आगे होही , इही सोंच के साधारण दिखत एक्का दुक्का मनखे ल , हमूमन जानबूझ के , चाबे बर धरेन । पछीना म बस्सावत , मइलहा अंगोछा धरे , आधा पेट खाके सेफला कस हाड़ा हाड़ा दिखइया , नानुक पटका पहिरे घूमत हे , तेकर लहू म अतेक मिठास हे , तब   सुघ्घर धोती कुरता पइजामा पहिरे , चिक्कन चिक्कन गाल , अउ महर महर महमहईया मनखे के लहू म अऊ कतेक मिठास होही । इही सोंच के उही दारी दू चार झिन अईसने मन ल घला चाब पारेन ..... हमन का जानन , यहू मन हमरे कस होही कहिके , येमन नइ मरिन जज साहेब । ओला तुहूँ मन जानत हव , उही दारी ले , मनखे ल , कभू कभू साँप कहिके बुलाये लागिन । एक बेर उदुपले , कुछ लालबत्ती वाला मन सपड़ागे ......  दू चार झिन एके संघरा चाब पारेन । एक ठिन साँप .... तुरते मरगे । दूसर .... कुछ बछर ले बड़ तड़फिस ..... आखिरी म दरद पीरा ल सेहे नइ सकिस ..... फाँसी लगाके मरगे । कुछ अभू तक तड़प तड़प के हाबे .... न ठाड़ हो सकत हे ..... न बईठ सकत हे .... इँकर गिनती न जियईया में हे .... न मरईया में । इही दारी ले हमन अब कोन्हो सधारन मनखे तक ल चाबे बर डर्राथन । हमन जान डरेन के , मनखे बड़ प्रगति कर डारे हे … साफ सुथरा दिखईया के लहू म अतेक बिख हे , त मइलहा म को जनि अऊ कतेक बिख हमागे होही । अब बतावव .... बिषैला हमन आवन कि मनखे ?

             साँप के बात सुनके मनखे भड़कगे । नारेबाजी ... निंदा प्रस्ताव सुरू होगे । अऊ ये चक्कर म साँप के शिकार मनखे मन के रिश्तेदार मन के बयान नइ हो सकिस । कतको छै महीना नहाकगे .... आयोग के कार्यकाल लामते गिस । आखिर म .... जज ह साँप के बयान के अधार म फैसला सुनाये बर रिपोट बनाये धर लिस । रिपोट फाइनल होए के पहिली .... जज हा कोन जनी काकर शिकार होके दुनिया ले चल दिस । नाव फेर साँप के धर दीन । फाइल बंद होगे । सरकार हा साँप उप्पर , अऊ जादा नराज होगे  । धड़ाधड़ मरवाये लागिस ..... साँप मन ल । 

             साँपमन बहुतेच जादा डर्रागे । एक दिन लटपट .... आस्तीन म खुसर के अदालत तिर पहुँच गिस । उहाँ जज ल बतईस – जब ले हमर देश आजाद होये हे तब ले सरकार हमन ल परेशान करत हे , हमर जान के पाछू परे हे । वो समझथे के , उदुपले मनखे मरे म हमरे हाथ हे । अदालत ले प्रार्थना करिन .... जाँच कराये के । अदालत सज्ञान लिस । तब सरकारी वकील बतईस – उदुप ले मरईया , मनखे के मौत के जुम्मेवार , इही साँप मन हरे जज साहेब । मरईया के लहू के रिपोट ल , घला मढ़हा दिस । जज किहिस – तूमन लबारी मारथव रे साँप हो ..... सरी रिपोट तुँहर खिलाफ हे । साँप मन किथे - हमन साँप आवन साहेब  , मनखे नोहन । जनम लबारी नइ मारन । रिहीस बात चाबे के , त हमन अभू कोन्हो ल चाब घला देबो , तभ्भो ले वोहा नइ मरे । हमर बिख ले जादा ताकतवार बिख ला मुहुँ म लुकाये मनखे हा .... ओकरे उपयोग करके हमन ला बदनाम करत हाबे । हमर बिख ला हमन अइसे लुकाके राखे हन के ओला कन्हो नंगाये नइ सकय । जम्मो जाँच ल तुँहर देखरेख म फेर करावव । 

             अदालत के आदेश ले जाँच सुरू होगे .... मरघट्टी ले जुन्ना जुन्ना हाड़ा गोड़ा के खोजा खोज माचगे । कुछ नावा नावा लास घला मिलगे । रिपोर्ट अइस । जम्मो के मरे के तरीका एके रिहिस - तड‌प तड़प के । जम्मो मनखे बिख के असर ले मरे रिहिन । फेर साँप चाबे के निशान कोन्हो करा नइ रिहीस । कुछ के , हाड़ा गोड़ा लहू म अजीब किसीम के गंध रिहीस , कोन्हो म चारा के गंध , कोन्हो म गोला बारूद तोप के गंध , कोन्हो म पेट्रोल के गंध , त कोन्हो म कोइला के गंध , एकर अलावा अऊ कतको प्रकार के बिचित्र बिचित्र गंध आवत रिहीस । जाँच आगू बढ़िस , कुकुर संसद भवन तक पहुँच गिस भूँकत भूँकत । उहाँ एको बिल नइ मिलीस साँप के । फेर कुकुर हा कभू सत्ता पक्ष के खुरसी , त कभू बिपक्ष के खुरसी ला सूँघ सूँघ के भोंके लागिस ।  

            एक दिन जज जान डरिस के – बिख साँप कस बिषैला हे , फेर ऐला बगराने वाला साँप नोहे , बल्कि सभ्य मनखे आए , जे कभू सत्ता पक्ष के खुरसी म , त कभू विपक्ष के खुरसी म , समे समे म बइठथे । अउ मरईया जीव , देश के गरीब , मजदूर , साधारन जनता अउ किसान आए । अपन आप ला बिख ले बँचाये बर फैसला सुना दिस - गलती साँप के आए .... जेन रूख रई के लकड़ी ले संसद के खुरसी बनथे , उहीच म एमन मनखे ल बदनाम करे बर अपन बिख ल लुका देथें , अऊ , एकर सेती जे भी मनखे संसद म बइठथे , तेहा बिषैला हो जथे । सभ्य मनखे माँचगे ..... । फैसला के बिरोध म साँप अपील करिस – हमर बिख करिया धन नोहे जज साहेब , जेला हमन लुका के बिदेसी बैंक कस राखबो , एला हमन अपनेच तिर लुकाके राखथन । दूसर बात , हमन चाबथन तभ्भेच हमर बिख ले मनखे मरथे , जाँच रिपोट म चाबे के कोंन्हो निसान निये । तीसर बात , मरईया मन तड़प तड़प के मरे हे , हमर काटे ले , मरे बर , जादा तड़पे नइ लागे साहेब । अदालत जानत रहय , फेर खुद ला घला बाँचना हे ...... इही बिख ले .... । वहू मन मजबूर हे । मामला जनता के अदालत म घेरी बेरी पहुँच जथे ..... जनता तय नइ कर पावत हे ....... बिषैला कोन ?    

   हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

कहानी- ==माॅई कॅवरा==

 [ कहानी


         ==माॅई कॅवरा==

          बड़े बिहनिया एक दुसर ले खुसुर फुसुर गोठियावत बात गाॅव भर बगरगे कि जानकी चल बसिस।जानकी खतम होगे ।अउ थोरिक बेरा मा ओकर दुवारी मा मनखे मन सकलाय लगगे। सगा संबंधी हित पहिचान सब्बो जगा फोन खबर पहुचे लगगे ।

गाॅव के परम्परा के मुताबिक घरो घर ले पाॅच पाॅच ठन छेना घलो सकेलागे । घर के सियान माने जानकी के गोसॅइया दुखी मन ले दुवारी के एक टोकान मा गाॅव के चार छै झन सियान मन सॅग बइठे रहय । थोरिक बेरा मा जानकी के   देंह ला अंतिम बिदाई देय के तियारी सुरु होगे। जानकी हर हेंवाती दसा मा परान तजे रहय। येकर सेती जानकी के शव यात्रा के पहिली वोला सोला सिंगार मा सजाये लागिन।अइसे भी नारी परानी मन सुहागिन मरना ला अपन अहोभाग मानथे ।नारी परानी मन ला दू बखत सुहागिन के सोला सिंगार मा सजाथें।एक तो बिहाव होथे तब अउ दूसर पति के जियते जीयत मर जाथे तब । भले वो हर नेंगहा काबर नइ रहय। 

              गाॅव आने गाॅव के सबो सगा पथिया मन मिलके खटोली तियार करके मुक्ति धाम कोती मरे तन के गत बनाय बर चले गे। जानकी के बेटा बसंत अपन महतारी के बड़ मयारू बेटा रहय।  महतारी तो महतारी होथे ।चाहे वो एक लइका के रहय चाहे चार लइका के । दुवा भाव कोनो बर नइ राखय। ना नोनी बाबू मा भेद करय ।काबर कि एके दुख पीरा ला सहिके सबो ला जनम देथे । बिचारा बसंत मुक्ति धाम तक मा रोवत बिलखत रहय । उही गाॅव के एक झन अधेड़ मनखे जेन हर बसंत के जौजर अउ नानपन के सॅगवारी भूरू । भूरू घलो काठी करम मा पहुंच जाय रथे । चिता मा जानकी के देंह ला जरत लेसात देख के आॅसू नइ रोक पाइस। अंतस मन ले रोवत रोवत वोला अपन नान्हे पन के वो सबो बात घरी घरी सुरता मा समाये लागिस । 

             जब बसंत अउ भूरू नान्हे नान्हे रहय। पहिली साल आॅगन बाड़ी मा इसकुल मा भरती होय रथे । दूनो के जोड़ी सॅग कभू नइ छूटय। कतको बखत खेले के धुन मा इसकुल घलो नइ जावय ।एक दिन के बात आय। कातिक अग्घन के महिना मा रांय रांय धान लुवई चलत रथे । मॅझनिया जानकी लकर धकर खेत ले बियारी करे बर आइस ।हाथ पाव ला धो के जेवन निकालथे । ओकर मयारू बेटा अपन सॅगवारी भूरू सॅग खेले मा मगन रथे । बिचारा भूरू के महतारी भूरू के जनम के साल भर बाद अलपकाल गुजर जाय रथे । ओकर ददा मेरन बने खेती बारी रिहिस खाय पिये के कमती नइ रिहिस। कमती रिहिस ते सिरिफ भूरू के महतारी के। धुर्रा माटी मा सनाय भूरू अउ बसंत मगन रथे। अउ ये डहर घर ले जानकी आरो देथे----------बसंत-------- ए बसंत आ बेटा भात भाले ,,,,,,,,,। जनकी कई बखत आरो देथे। महतारी के मन नइ माड़िस तब , तब जानकी हर तीर मा जाके ओकर हाथ ला धरके तिरत लाके कथे-----------चल बेटा एक कनी खाले । ताहन खेलत रबे भूरू सॅग। ढिठईपना करत बसंत हर कथे-------------मोला भूख नइये    पाछू ले खाहू मोला खेलन दे ना वो । भूरू भगा जाही दाई। मयॅ एके झन काकर सॅग खेरहूं कहिस अउ भगागे। खेत मा भारा बॅधइया गोंसइया बर घलो जेवन लेके जाय बर हे देरी होय ले खिसियाही कहिके जल्दी जल्दी खाय बर जेवन निकाल लिस अउ खाय बर बइठगे। महतारी के मया अतका तो घलो कमजोर नइ रहय कि लइका ला छोड़ के पेट भर जेवन खा लिही। जानकी खाय बर तो लगगे फेर सुधअपन पेट ले जादा बसंत डहर लगे रहय। अगल चगल खावय अउ बीच बीच मा चिचियावे---------आ बसंत खाले,,,,,,जल्दी खेत जाहू । तोर भात ला बिलई खा दिही रे भूखे रेहे रबे बेटा आ खाले । सथरा उरकती आ गे तभो बसंत नइ आइस। महतारी के मन नइ मानिस तब जानकी सथरा छोंड़ के जाथे अउ तिरत लान के थारी केआगू मा बइठार के कथे--------------ले एक कॅवरा तो खाले रे  बेटा ताहने भूख नइ लागे।अउ ओकर मुंह मा लकर धकर दू तीन कॅवरा डार देथे। तब जानकी के मन हा माड़थे। अउ लइका हर घलो दू ओआर कॅवरा मा डकार लेय ला धर लिस। अइसन कोनो अभागा नइ होही जेन महतारी के सथरा सॅग नइ हितात होही । महतारी हर अमरित तो तन ले ओगार के पियाथे। अउ अपन सथरा मा बइठार के खवाके जनमो जनम के दरिदरी ला भगाथे । महतारी अपन पेट ला उन्ना करके लइका बर माई कॅवरा बनाथे।अउ आखिर मा दू कॅवरा खवाथे तभे हिरदे जुड़ाथे। सियान मन कथे-----

माता के पोरसे अउ मॅगहा के बरसे । बहुते सुखदाई होथे ।जेन ये दूनो मा नइ हिताय तै कभू सुख नइ पाय। भले मगहा मत बरसे फेर माता के मया सदा बरसथे। 

   बसंत ला खवात खवात जानकी के नजर भूरू उपर पर जथे। भूरू कपाट के चौंखट ला धरके दुरिहा ले सपटे असन देखत रथे। ओकर मन मा का बिचार चलत रिहिस होही वो लइका जाने । जानकी हर देखके भूरू ला कथे---------------तहूं खाय रते का भूरू ।भूरू हां कहय ना निहीं। बिन महतारी के लइका कहिके जानकी के ममता भूरू बर घलो पिकियागे। तिर मा बलाके बइठारिस। अउ उही जुट्ठा सथरा के भात सान के दू कॅवरा भूरू के मुंह मा डारके खवा दिस।

अउ मूड़ी मा हाथ रखके कथे--------------झगरा झन होहू दुनो सॅग मा खेलहू बेटा हो। साॅझ किन आहूं तब तुंहर मन बर मुगेसा लाहू ना। जानकी हर गाॅव के नता ले भूरू के बड़े दाई लागय । फेर परोसी के लइका ला जुट्ठा भात खवाए हे कहिके कोनो जान पारही त अलहन मत होय कहिके भूरू ला कथे-----------भूरू जुट्ठा भात ला खवाइस कहिके कोनो ला झन बताबे बेटा आॅय,,,,,,।अउ बने दुनो भाई रहू मोर आवत ले। 

बसंत के माई कॅवरा के हिस्सा भूरू घलो पागे। फेर जौन मया दुलार ला सान के मुंह मा कॅवरा परे रहय वो भूरू के तिसना बनगे। ओकर सकल ला देख के अइसे लागत रहय। महतारी के मया ननपन ले दुरिहाय रहय। बाप हर सबो सुख देय। फेर जानकी के हाथ के खाय के तिसना हर भूरू ला तिर के लानय।मॅझनिया आॅगन बाड़ी ले आवय अउ बसंत सॅग भूरू घलो जानकी के सॅग बइठ जावे। डर के  मारे जानकी अलग अलग थरकुलिया मा परोसय। फेर जब तक चार सीथा जानकी के हाथ के माई कॅवरा नइ खाय मन नइ हिताय। महतारी दुलार के खवाय चाहे डाॅट डपटके मया तो सनाय ही रथे। लइका बर अमरित एक तो महतारी के दूध अउ दूसर सथरा के आखिर मा बाॅचे माई कॅवरा । भूरू जुट्ठा भात ला खवाइस कहिके आज ले कोनो ला नइ बताइस । फेर जौन आनंद सुख परेम भाव ला कॅवरा सॅग मा खाय रहय  जानकी के जरत चिता ला देख देख के सुरता कर।कर के तरी तरी सुबकत रहय।  आॅखी ले आॅसू टुप टुप चुहे लागथे । बसंत अउ भूरू के नजर एक दूसर उपर परथे । दुनो एक दूसर के तिर मा आके बसंत ला पोटार के भूरू कथे--------------तॅय तो अपन दूध के करजा अउ माॅई कॅवरा के लागा ला आगी देके छुट डारे बसंत । मोर तो उधार के उधार रहिगे भाई,,,,,,,,,।अउ दूनो झन मुक्तिधाम मा गोहार पार के रो डारथे । भूरू अउ बसंत के आज घर गिरहस्ती बसगे हे । मुड़ मा घर परिवार के जुवाबदारी घलो हे। तभो ले भूरू जानकी के हाथ के खाय माई कॅवरा ला भूले नइ पाये हे ।


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनादगाॅव🙏

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल: 

सागर वो होथे, जिहाँ ले कतको पानी निकाल कमती होय के नाँव नइ लय। उही किसम ले नारी-परानी मया के सागर होथे, जिंकर मया कभू कमतियाय नइ भलुक बाढ़थे। नारी कहूँ महतारी बनगे त ओकर मया ल तो अउ नापेच नइ जा सकय। जतका लइका सबो बर ओतके मया। कोन्हों बर कम अउ जादा नइ होय, सब बर बरोबर मया रहिथे। हमर भरम आय जउन महतारी के मया ल कमती आँकथन। महतारी के मया लइका नइ चीन्हे। ए मया सिरीफ लइका देखथे अउ लइका बर पलपला जथे। कहूँ बिन महतारी के लइका होगे त मया अउ छलके लगथे।

         गँवई गाँव होय त शहर होय लइका के संगी साथी बर महतारी मन के मन म मया जाग जथे। अपन लइका के मुँह म डारत कउँरा बँट जथे। कभू कभू मया अतेक उमड़ जथे कि महतारी चेत ले बिचेत हो जथे अउ बिरान के लइका ल घलव अपने बियाय लइका बरोबर खवाय पियाय के जतन करथे। मया के भूखाय लइका घलव चेत नइ धरय कि महतारी मोर नोहय। ओला तो सिरीफ मया चाही। अइसन मया दुलार सिरीफ मया ल चीह्नथे। 

       इही मया ले भरे कउँरा के उधारी ल सुरता करत सुग्घर मार्मिक कहानी आय माई कउँरा। माई कउँरा माने महतारी के हाथ ले ओकर जुठा भात के कउँरा। 

       गँवई गाँव म कभू कभू यहू देखब अउ सुनब म आथे कि नान्हें लइका के करलई ल देख के परोसिन अपन गोरस ले दूध पियाय हे।

       कहानी म दुख के बखत म क्रिया करम बर छेना लकड़ी के बेवस्था करे के चित्रण गँवई गाँव के सुग्घर परंपरा ल उजागर करे के बढ़िया उदिम आय। इही बहाना लोगन ल दुख कमती जनाथे। दुख सहे के ताकत मिलथे। सबर दिन बर कखरो बिछड़े के दुख ल बाँटे तो नइ जा सकय। दुख के घरी म सहारा जरूर बने जा सकथे। 

      जानकी दाई के हाथ ले खाय भात के कउँरा ल सुरता करके भुरू के तरी तरी सुबकई अउ आँसू  के टपकई ओकर दुखी होय के प्रमाण आय।

      कहानी के भाषा सहज सरल हे अउ नदिया के धार सहीं बोहावत हे। जेमा पाठक बहत जाथे। 

    मुँहाचाही गजब हे, कहानी अउ पात्र मन के मुताबिक़ गढ़ाय हे।

      खेत खार अउ बूता म जात खानी दाई ददा मन के सिखौना ले भरे गोठ जीवंत लागथे---"झगरा झन होहू, दूनो संग म खेलहू बेटा हो...."


पारा परोस के लइका संग होय कुछु बात के मन म डर आय के फोटू(चित्रण) घलव बढ़िया बने हे---"भुरू! जुठा भात ल खवाइस कहिके कोनोल झन बताबे बेटा आँय।"

      जानकी दाई के बिछोह म भुरू के मन के पीरा ल बड़ मार्मिक ढंग ले लिखे ले कहानी अपन उद्देश्य ल पूरा कर लेथे--"तँय तो अपन दूध के करजा ल आगी दे के छुट डारे बसंत! मोर तो उधार के उधार रहिगे भाई।" सिरतोन भुरू बर जानकी के खवाय माई कउँरा भुरू बर उधारेच रहिस, फेर भुरू भागमानी आय जउन ल मया मिलिस।

      कहानी के शीर्षक कहानी ल सार्थक करत हवै, इही कउँरा के उधार आय जउन बिन महतारी के लइका भुरू के आँखी ले टप टप चूहत हवै। फेर कहे जाथे दाई के करजा कभू छूटे नइ जा सकय।

      बहुत सुग्घर कहानी लिखे खातिर राजकुमार चौधरी जी ल बधाई अउ शुभकामना🌹💐🙏🙏


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह (पलारी)