Sunday, 17 July 2022

छत्तीसगढ़ी हाना*

 *छत्तीसगढ़ी हाना*


1 . **दूबर बर दू असाढ़*


 अर्थ  - पहिली ले परेशानी हावय तेमा अउ परेशानी आ जाथे


2.*खाई मीठ ता माई मीठ*


अर्थ- जेखर ले जादा फायदा होथे तेन हा जादा मयारुक लागथे


3.**तइहा के बात बइहा लेगे*


अर्थ-अब्बड़ जुन्ना बात


4.*पर भरोसा तीन परोसा*


अर्थ- दूसर के धन ला उड़ाय मा नई अखरय ।


5.*एक कोलिहा हुआँ ता जम्मो कोलिहा हुआँ हुआँ*


अर्थ-बिन गुने बिचारे दूसर के हाँ मा हाँ मिलाय


6.*एक आमा के सौ लबेदा*


अर्थ-कोनो एक ठन जिनिस के जादा माँग होवय


7.*उजड़े मड़वा मा डिड़वा नाच*


अर्थ-कोनो काम के होय ले चुस्ती फुरती देखाय


8.*करमइता के नाँगर ला भूत जोतय*


अर्थ -अबड़ेच भागमानी होवय


9.*चलनी मा गाय दुहय,करम ला देवय दोस*


अर्थ-खुदे गलती करय अउ भाग ला दोष देवय


10.*जबके आमा तबके लबेदा*



अर्थ-जउनेच बुता के बेरा आय तउने बुता ला करय


11*कउआँ कान लेगे ता ओखर पाछू नई भागय*


अर्थ-कोनो कुछु अफवाह फइलाइस तेने ला मान लेवय


12.*नवा बइला के नवा सींग  चल रे बइला टींगे टींग*


अर्थ-नवा नवा जिनिस बर जादा लगाव रहिथे




संकलनकर्ता


चित्रा श्रीवास

बिलासपुर

पलारी के छैमासी शिव मंदिर*


*पलारी के छैमासी शिव मंदिर*


- *दुर्गा प्रसाद पारकर* 

                        

छत्तीसगढ़ देवता धामी के गढ़ आय। गांव होवय चाहे शहर जंगल होवय चाहे पहाड़। खेत होवय चाहे खार, नही ते नदिया करार। अपार मंदिर देवालय हे। अइसे कोनो गांव नइ होही जिंहा भोले भंडारी के मंदिर नइ होही अऊ जिंहा मंदिर नइ होही ते शिवलिंग जरुर होही। काबर कि ओखर मनइया तो घरो घर हे चाहे ओहा सावन होवय चाहे भादो चाहे शिवरात्रि। कतको गांव म तो शिव मंदिर करा कसाकस मेला भराथे। जिंहे नांद बइला म बेल चघा के अउ नरियर के भेला चघा के अपन मनोकामना बर असीस मांगथे अउ ठिन्न ले घन्टी बजाथे | धमतरी गुण्डरदेही रद्दा म पलारी गांव परथे। उहें भारी जुन्नेट शिव मंदिर हे। उहें के मंदिर म हीरादास साहू ह घंटी बजा के बताथे कि सियान मन बताथे ग-जब इहां के मंदिर ह बने रिहिस ओ समे छै महीना के रात रिहिस। बड़े-बड़े पखना म छपे फोटू - ह अपन समे के इतिहास के बक्का फोरत हे।

शिवजी के मंदिर ह तरिया के पार म बने हे। तभे तो दरसन करइया मन तरिया म गोड़ हाथ धो के अवघट दानी भोले भंडारी जी के दरसन परसन बर चघथे। मंदिर के नेव ह बड़े बड़े पखना ले धराये हे। छै फीट लम्हरी अउ दू फीट मोट्ठा पखना ले ए मंदिर ह बने हे। मंदिर के बनावट ले ओकर इतिहास के अंदाज लगाए जा सकत हे। लोगन मन के मानना हे कि ए मंदिर ह बौद्ध काल के होही। एकर गवाही ओकर बनवट हे। कोड़ई के बखत जऊन मुर्ती मिले हे, ओमा बुद्द काल नही ते ओकर तीर तार के होही अइसे संभावना दिखथे।

मंदिर के भीतरी म शिवलिंग हे। जेहा भारी फुरमानुक हे। तभे तो मंदिर भीतर कुंड (जलहरी) म दरसन करइया मन पानी डालथे। कुंड म जतका पानी डालथे ओहा मंदिर के भीतरे भीतर तरिया म जा के समा जथे। पानी ह सुरंगे सुरंग निकलथे।

मंदिर के आगु डाहर मुहाटी म गंगा-जमुना देवी के मूर्ती मन भावन हे। ओकरे लक्ठा म हनुमान जी के छापा छपाए हे। जउन ह देखे के लइक हे। कतको पखना म खुदाई करे गे हे। अइलगे- अइलगे पखना म सात झन भाई मन के छापा ह चकचक ले चिन्हावत हे।

मंदिर के गुम्बद के चारो दिशा म सूर्यदेव के छापा हे बीच म कुछ के चिन्हा नइ हे। मंदिर बहुंते जुन्ना आय। सियान मन बताथे कि हम जब ले देखत हन तब ले अइसने देखत हन। उदपहा देखबे ते अइसे लागथे कि मंदिर अबक तबक गिरतेच हे। जउने देखथे उही कथे कि मंदिर के अइसन गीरे हालत देख-रेख के अभाव म होवत हे फेर देखे कोन। अब गांव वाले मन ल चेत आगे हे तभे तो दस बारा साल होगे गांव वाले मन मंदिर के देख भाल करत हे।

तिही पाए के अब इहां सांप बिच्छी दिखै नही ते पहिली तो बड़ेब बड़े सांप अऊ करिया भूरवा बिच्छी मन उहां माढ़ा बना ले रिहिस। मंदिर के पूजेरी राजेश्वर नाथ झा के देख रेख म मंदिर म धार्मिक कार्यक्रम होवत रथे बखत बखत म। अब तो मंदिर के बगल म पुजेरी ह नानकुन मकान बना ले हे। झा ह इहें परिवार सहित रथे। समे - समे म श्रद्धालु मन तनी ले रमायण किर्तन अउ भजन के कार्यक्रम होवत रथे।

मंदिर के कोनो लिखित इतिहास तो नइहे। फेर पुरातत्व विभाग ह घलो शिव मंदिर के दर्शन कर के असीस पा लेतीन अइसे इहें के सियान मन के आसा हे। काबर के पलारी के अद्भुत शिव मंदिर ह भारतीय संस्कृति अउ धर्म के चिन्हा आय। लोगन मन तो यहू कथे कि छत्तीसगढ़ म अइसन चमत्कारिक मंदिर दुसर करा अऊ देखे बर नइ मिलै। अइसन मंदिर देखे ले अइसे लागथे कि आज ले कोनो जादा भगवान उपर आस्था पहिली जमाना के मन ल रिहिस हे तइसे लागथे। तभे तो अद्भुत-अद्भुत मंदिर देखे बर मिलथे। ओइसन आज कोनो जघा बनत नइ देखे जा सके।

 

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छत्तीसगढ़ म कांदा के महत्व*



*छत्तीसगढ़ म कांदा के महत्व*


- *दुर्गा प्रसाद पारकर* 

                        

      जऊन समे मनखे मन धान कोदो कुटकी ल नइ चिन्हत रिहिन होही ओ समे काला खा के जियत रिहिन होही। कुछू काही ल तो खावत पीयत रिहिन होही। ओ बखत जर बुखार बन कोनो क्रोसिन रिहिस होही न विक्स। तभो ले जिनगी ल काटिन होही कांदा - कुसा खा के। आजो घलो छत्तीसगढ़ म आनी बानी खनिज ले कतको जादा कांदा कुसा ह जघा जघा मिलथे। लगभग इहां सबो किसम के कांदा मिलथे

 जइसे-डांग कांदा के नार ह ढेखरा म बने फून्नाए रथे। डांग कांदा के सागो रांध ले अऊ पलपला म उसन के हकन के खा ले। बने सुहाथे। जंगलिहा मन तो सेवारी ल घलो खवाथे जल्दी सम्हलही कही के। केऊ कांदा ह बस्तर कोती जादा मिलथे। केऊ कांदा खाए ले पेट ह खलखल ले साफ हो जथे। सादा दिखते केऊ कांदा ह। बखत परे म सागो रांध ले जी। ढुलेना कांदा तरिया म करिया रंग के मिलथे। ओकर नान-नान कांदा ह छेरी लेड़ी कस दिखते। डोटो कांदा के नार ह बंगला पान के नार कस होथे। डोटो कांदा ल मरार मन जादा लगाथे। तरिया के पैठू म बुचरूवा कांदा ल देख ले। ए कांदा म बूच रहिथे तिही पाए के एला बुचरूवा कांदा केहे जाथे।

बुचरूवा कांदा ल कुकरी कांदा के नाव से घलो जाने जाथे। बुचरूवा ह भुरवा दिखथे। केसरूवा कांदा ह खान खान भाथे। सियान मन कहिथे बुचरूवा अऊ केसरूवा कांदा दूनो भाई बंद हरे। सेम्हर कांदा ललहूं रहिथे जउन अघात मीठ रहिथे। शकर कांदा ल केंवट कांदा के नाव ले जादा जाने जाते। जऊन ह लाल अऊ सादा रंग के होथे। केवट कांदा ह केवट मन कस सबो डाहर मिलथे। केवट कांदा ह मांदा म भारी भोगाथे। घुपकाला के मौसम म नदिया के रेती म केवट कांदा लगाथे फेर पाला के कांदा कस मोठ नइ राहे तभे तो पचर्रा रथे। बाजार हाट ह तो बिना केवट कांदा के शोभा नइ देवय। कांदा भाजी गजब मिठाथे | लालच म जादा खाबे त झार घलो देथे पेट ल।

नांगर कांदा जीमीकांदा कस होथे। लम्हरी घलो होथे। चना कस नांगर कांदा ह जमीन ल उर्वरक देथे। जतेक जादा करिया माटी ओतके जादा मीठ नांगर कांदा। कोचई कांदा तीन किसम के होथे। लाल रंग के कोचई ह बड़े-बड़े तो होथे फेर जीभ ह खजुवाथे। जीमी कांदा ल मही म रांधबे त तो बने नही ते मुंह के बूता बना देथे। अटके बीर्रे म कोचई खुला तारथे। जात कोचई फरहरी के काम आथे। जात कोचई ह भुंजवा म गंज सुहाथे। अइसने किसम के छूइहा कोचई ल साग बनाथे। कोचई के पाना ल बेसन म लपेट के उसने के बाद काट के कटकट से अम्मट मही म रांधबे ते रांधते-रांधत मुंहू ह पंछा जथे। राम कांदा ह बड़े-बड़े होथे। ए कांदा ल कच्चा खाए जाथे। एला उसने के जरूरत नई परय। भंइस ढेठी कांदा ह भइस के ढेठी कस होथे। अइसने किसम के ढेस कांदा अउ रतालु कांदा होथे जऊन ह तरिया म मिलथे। रतालू कांदा ह घलो होथे । अइसने किसम के अऊ कतनो कांदा छत्तीसगढ़ म मिलथे।

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तुतारी

 तुतारी 

                                          चन्द्रहास साहू

                                मो   8120578897


      हा.. हा.. तो.. तो.. के  आरो के संग खेत जोतत हावय सियनहा हा । बइला मन घला आज अब्बड़ मेछराइस । फेर सियनहा के हाथ के तुतारी हा कच्च ले बाखा म परे तब तरमरा के रेंगें। सियान के जी घला कउवागे आज। अगास ला देखे । सादा करिया गुंगवा कस बादर हा रेंगत रहाय फेर भुइयां म नइ गिरीस । चिरीरिरी फट्..... अब्बड़ आरो संग गरजिस- घुमरिस बादर हा फेर बूंद भर नइ बरसिस । कभू अगास कोती ला, कभू नांगर कोती ला देखे अउ नांगर के पड़की ला धर के कुंड मा कुंड मिलाये परदेसी हा । फेर भुइयां मा बरोबर पानी दरपाये नइ हावय तब कइसे नांगर हा गड़ही ...? बइला हा घला तुतारी के डर मा रेंगे , सामरथ करे । ....बइला लाहकगे अब । 

"गिर जा गंगा मइया ! गिर जा !  पानी गिर जा ।''

अब्बड़ बिनती करिस परदेसी हा। फेर.. येहा परदेसी आवय कोनो भगीरथ थोड़े आय ? आ गंगा मइयां कहि अउ ..आइच जाही, रदरदा के गिर जाही।

 .. पानी नइ गिरिस अउ काया के पसीना हा गिरे लागिस तरतर - तरतर । परदेसी के नांगर फेर चभकगे । हला - डोला के अटेसीस अउ फेर चमकाइस बइला ला।

" हर्रे ..हर्र.. तता ... तता...त त....।''

बाखा म फेर तुतारी मारिस। बइला बमियागे। ताकत नस - नस मा दउड़े लागिस । जइसे  दस हाथी के बल समागे । दुनो बइला संघरा ताकत लगाइस जुड़ा मा... फेर नागर तो टस ले मस नइ होइस अतका सामरथ घलो। ... अबके सामरथ मा जुड़ा हा सुलरागे । नोई टूटगे ।...अउ बइला मन  बारा हाथ आगू कोती दउड़े लागिस । परदेसी मुड़ी ला धर के बइठगे।

" का करव भगवान ! पानी के बेवसथा कहाँ ले करव..? एक - एक पइसा ला जोर के बोर खोदवाये हँव । पानी घला हावय । फेर बिन बिजली अबिरथा हावय। अब्बड़ दउड़े-भागेव घला । कतको झन साहब मन आइस - गिस। जम्मो कोई ला तो पइसा देये हँव । फेर बोर मा बिजली कनेक्शन नइ खिचाइस। 

            परदेसी तरमराये लागिस।

" का करव मेंहा.. ?'' 

हफरगे । कुंदरा ले टूटहा साइकिल ला निकालिस अउ डंडिल मा बांस के कमचील बांध के दुनो चक्का मा हवा भरिस । परदेसी के आरो ला पाके कलवा कुकुर हा घला आगे अउ राख - माटी मा घोण्डइया मारे लागिस । 

“ नानजात ! ”

 बखानत नानकून ढ़ेला मा फेंक के मारिस परदेसी हा कुकुर ला । कु.कु... करत भागगे ओहा । लकड़ी के बोझा ला बोहो के आइस परदेसी के गोसाइन दमयंतीन हा ।

 “कहाँ जावत हस, मार तरमिर. तरमिर.....? "

बोझा ला पटकत किहिस । अउ पछिना ला गुड़री मा पोछे लागिस । फेर पछिना पोछाये के आगू देख डारिस परदेसी हा दमयंती के चेहरा ला ससन भर । दमकत सिकल, चमकत टिकुलिया अउ पछिना मा बोहाये मांग के कुहकू । ललहु गाल, गाल के तेलई अउ तेलई के तीर कान के पीछू सादा - सादा नुन फूटे हे ..। सब ला देख डारिस परदेसी हा ।

 "जात हँव । उही डाहर, तहू जाबे ते चल । ” परदेसी किहिस । गड़गड़ - गड़गड़  एक लोटा पानी ला पियिस दमयंतीन हा अउ नानकून पोटरी मा कुछू ला धरत साइकिल के केरियल मा बइठगे ।

       अब्बड़ सइमो - सइमो करत रिहिस आफिस हा। आफिस के एक कोती बिगड़ाहा टासफारमर, तार , केबल अउ दुसर कोती पावर हाऊस बड़का - बड़का बिजली खम्बा । संगमरमर लगे आफिस के डेरउठी ला जइसे खुंदिस कान मा आरो आइस ।

“फरस ला मइलाहा झन कर डोकरा !”

चपरासी आए तमकत रिहिस । परदेसी हा पनही ला हेरके खनखोरी म चपक लिस अउ दुसर हाथ मा तुतारी ला धरे रिहिस । 

"बड़का साहेब ले भेंट करना हे बाबू ।"

परदेसी के गोठ ला सुनके चपरासी हा भभकत रिहिस। अंगरी देखा के बड़का साहब के कुरिया ला देखा दिस ।  

“ राम राम साहेब !”

 परदेसी जोहार करिस । गोटारन कस आँखी नटेरत चश्मा ले देखिस अउ फेर फाइल मा गड़गे । 

"मइलाहा घोंघटाहा ओन्हा पहिरके आ जाथो। कोन जन के दिन के नहाये नइ हावय ते.. ?मेनरलेस डर्टी पीपल ? पसीना के बस्सई छीः छीः...।"

 साहब फुसफुसाइस अउ मुँहू ला करू - करू करे लागिस । 

"स ..स.. साहेब मोर फारम  ?“

गोटारन कस आँखीवाला हा फेर देखिस दुनो  परानी ला अउ फेर फाइल मा आँखी गडि़या दिस । दुनो परानी भुइयां मा फसकराके बइठगे । आगू के गद्दा वाला खुरसी मे बइठे के सामरथ नइ करिस । 

“भागवत !” 

साहब के आरो ला सुनके चपरासी आगे।

 “बरा भजिया अउ चाहा लानबे  गरमा - गरम जा ।’’

 ” हव  ।"

चपरासी हुकारू दिस अउ ठाड़े रिहिस।

 ” दे दे पइसा ताहन तोर फारम ला देखहू ।"

साहब किहिस । परदेसी अउ गोसाइन एक दूसर ला देखे लागिस । सलूखा के खिसा ले चिपटी कस मुड़े पचास रूपिया ला दिस ।

“अतकी मा का होही डोकरा...?"

 चपरासी मुचकावत किहिस

 “पच्चीस पचास अउ दे दे ! ” आँखी ला रमजत साहब किहिस अउ दमयंतीन हा पोलखा के खिसा ले पंदरा परत ले चिपटाये बीस रूपया ला हेर के दिस । 

“बिन पइसा के आ जाथो ।” 

चपरासी हा फुसफुसावत किहिस अउ रेंग दिस । अब साहब के नजर हा दमयंतीन के उपर ठाढ़े होगे । झुंझी चुंदी मुड़ी ,बजरहा खिनवा, रवाही फुली, चिरहा लुगरा अउ चिरहा पोलखा के ओ पार...। 

         टेबल मे परदेसी के फाइल माड़े रिहिस । बड़का-बड़का कागज नकसा खसरा बी वन । परदेसी झटकुन चिन्ह डारिस अपन अंगठा के चिन्हा अउ संरपच के ठप्पा ला। चश्मा ला उठा - उठाके अपन आँखी ला एक - एक पन्ना मा गडि़याइस । कभू करिया पेन मा कभू लाल  पेन मा कागजात मा चिन्हा लगाये लागिस। अपन गुड़गुड़ी वाला खुरसी ला आगू तिरत साहब हा कहिथे ।

  ’’परदेसी तोर इस्टीमेट बने नइ हे। टांसफारमर  ले तोर खेत हा सात पोल के दुरिहा हावय । अउ ऐमा पांच पोल देखावत हे । ’’

  “कोन जन साहेब नाप जोख तो तुमन ला आथे । हमन तो अड़हा आवन ।” 

परदेसी किहिस । कभू नकसा खसरा बिगड़गे हावय किहिस तब कभू फारम मा सरपंच के दसकत नइ हे किहिस अउ आने साहब मन। "कब बिजली लगही भगवान ..?''

परदेसी संसो करे लागिस । 

"तोर ले आगू वाला साहब ला चार हजार देये रेहेंव। ओखर आगू वाला ला तो पंद्रा सौ देये रेहेंव साहेब ! बछवा ला बेचके।" 

परदेसी अब हाथ जोर डारे रिहिस।

 ’’ये जस के बुता तोरे हाथ मा होही अइसे लागथे साहेब ! मोर बनौती बना दे । हाथ जोरत हँव साहेब । मोर बनौती बना दे ।’’ 

दमयंतीन घला हाथ जोर के किहिस । 

"बन तो जाही परदेसी फेर तोला खरचा करे ला परही , पचीस तीस हजार ।’’ 

साहेब हा जुड़ सांस लेवत किहिस अउ बरा भजिया ला झड़के लागिस । 

"कहाँ ले लानहू साहेब ?''

परदेसी किहिस । साहेब के आँखी दमयंतीन के बांहा के पहुची मा जामगे । 

"तोर घरवाली हा बांहा मा पहिरे हावय ते का गहना आए परदेसी...? "

दमयंतीन बांहा  ला अछरा मा तोपे लागिस

 “पहुंची आय साहेब ! ”  ।

सुघ्घर दिखत रिहिस चांदी के चमकत जोखी भराये सांप कस सलमिल - सलमिल करत हे । सुघ्घर  फुल छप्पा अउ सोनार के कलाकारी घात सुघ्घर हे । 

"साहब मोर दाई हा चिन्हा देये हे। अब्बड़ मया करे साहेब। एक दिन मलेरिया के बुखार होइस अउ एके दिन मा ताला - बेली होगे । पान - परसाद घलो नइ खवा सकेन । दमयंतीन ऐके सांस मा गोठियाइस । ओखर आँखी जोगनी कस बरिस अउ बुता घला गे । आँखी के कोर के आँसू ला पोछिस दमयंतीन हा । 

   " एक ठन उदीम हावय परदेसी तोला पइसा नइ लागे ।''

साहब हा परदेसी डाहर नवगे । परदेसी के घांम मा भूंजाये सिकल मा आँखी गड़ियावत किहिस।

 “का साहेब !’’ 

परदेसी अउ तीर मा जाके पुछिस। 

"सरकार हा एक ठन योजना बनाये हावय जेखर लाभ देवाहू अउ योजना कोती ले पइसा जमा हो जाही । तोला एको पइसा नइ लागे फेर ... । "

साहब  काहत - काहत अतरगे । चाहा ला ढोक्कोम - ढोक्कोम पीये लागिस ।

 "परदेसी ! मेंहा मोर घर मा छत्तीसगढ़ महतारी के मुरती बनवात हँव।  ओहा तोर गोसाइन के पहुंची ला पहिरही तब सुघ्घर लागही । सौहत छत्तीसगढ़ महतारी लागही । अब जमाना घलो बदलगे । कोनो नारी परानी अइसन गहना जेवर नइ पहिरे ....।"

 साहेब महाभारत के सकुनी ममा कस अपन चतुराई मा मुचकाये लागिस । अउ ये दुनो परानी एक दुसर के सिकल ला देखे लागिस । 

  ’’इनाम तो मांगत हव परदेसी ! कतको किसान हा अंकाल मा मरत  हावय । मेहां तोला बचाये के उदीम बतावत हावव । तोर बोर मा बिजली अमरही तभे तो भक्कम पानी निकलही।  ....अउ अंकाल-दुकाल के मुँहू ला नइ देखस । 

“ देख ले परदेसी ! तोर गोसाइन के बांहा के पहुची हा मोर घर मा पहुचही..। तभे तोर खेत मा बिजली पहुचही, परदेसी इमान से ।” 

साहेब हा किरिया  खाइस अउ पान घला । 

’’इमान से मेंहा घुस नइ लेवत हव । ओ ....तो.. छत्तीसगढ़ महतारी के मुरती के सवांगा बर मांगत हव। "

साहब अउ आगू किहिस । 

 परदेसी के आँखी मा उज्जर भविस दिखे लागिस । दमयंतीन घला अंकाल के परछो ले  निकले के रद्दा देखे लागिस। अउ पहुची ला हेर के दे दिस । छाती म पथरा लदक के सुल्हर डारिस पहुंची ला । आँखी ले झर - झर ऑंसू आवत रिहिस। अपन पहेलात नोनी ला गवाइस तब के दुख अउ अब के दुख दुनो बरोबर रिहिस । कतको बड़का दुख आ जावय परदेसी ठाढ़े रहिथे पहार कस । कोनो आँधी धुंका झन आये अइसे । सिरतोन आज के धुंकी तो अधमरहा कर दिस दुनो कोई ला। साहब मुचकाये लागिस जइसे कुबेर के खजाना ला पोगरा डारिस अइसे । कोन जन  ओखर बोर के पानी कब बोहाही ते फेर दमयंतीन के आँखी ले अरपा पैरी के धार  बोहाय लागिस । हाथ गोड़ टूटे कस लागिस । झिमझिमासी लागिस । अउ परदेसी के खांध ला धरके थामिस । 

“ए ...एक महीना पाछू आके आरो कर लिहू ।” साहब किहिस अऊ खिड़की कोती ले पच्च ले पान के पीक ला थूकिस । 

चपरासी हा कोल्ड्रिक के गिलास धरके ठाढ़े रिहिस । साहब झोकिस। पीये लागिस ढ़ोक्कोम - ढ़ोक्कोम । 

"हअये'' साहब ढ़कारिस अउ सांस छोड़ीस ।

" लेवव तहू मन पी लेव कोल्ड्रिक । '' 

 "न ...नही साहेब ! हमन ला नइ पचे आनी - बानी के जिनिस हा ।''

परदेसी के अंतस मा अंगरा बरत रिहिस फेर जुड़ाके किहिस । चपरासी के गोठ सुनके।

                        अब साइकिल के मुठा मा सामरथ फबे लागिस। नस - नस मा लहू दउड़े लागिस। साइकिल उत्ता- धुर्रा दउड़त हे घर कोती लहुटे के रद्दा मा। दमयंतीन केरियल मा बइठे रिहिस अउ  पोटरी के फुटे चना ला खवावत गिस परदेसी ला । फुटे चना के संग डुरू चना ला घला मसक डारिस परदेसी हा । अउ कभु - कभु तो गोटी - माटी ला घला खटरंग ले चाबिस। लीम के जुड़ छांव मा अतरके पानी पियिस । अउ फेर रेंगे लागिस अपन रद्दा। पेट के भभकत आगी ला कतका बुताइस चना हा.....? उही जाने  ...।  फेर कोनो डाहर आथे - जाथे तब अइसना चना ला धर लेथे दमयंतीन हा ।

             बटकी भर बासी अउ चुटकी भर नून के खवइया परदेसी हा कोनो जिनिस के लालच नइ करिस फेर अगास ला देखथे तब संसो हो जाथे । सावन भादो मा आगी सुलगत सुरूज देवता अऊ अइलावत खेत के धान । पानी के मारे पियासे भुंइया अउ मरत मछरी कोतरी...।

"बटकी भर बासी के बेवसथा कइसे होही भगवान.....? तहू ठगत हावस का लबरा बादर ...?  बिजली वाले साहब कस लबरा । दू महीना होगे आज ले बिजली के दउहा नइ हावय। पइसा पहुंची जम्मो गवागे । परदेसी बियाकुल होगे । 

साइकिल ला निकालिस ।  तुतारी ला धर के रेंग दिस आने गॉंव के रद्दा ... अकेला ।


"कइसे साहेब मोर खेत मा बिजली कब लगही ...? ...अउ लगही कि नही वहू ला बता ...?''

 परदेसी बड़का साहब के कुरिया मा खुसरत किहिस।  ओखर आँखी मा लहू उतरे कस लाल रिहिस । चुन्दी छतराये , माथा मा लाल टीका अउ हाथ मा तुतारी । चिरहा सलूखा अउ नानकुन पटका । कोठ मा टंगाये तिरसूल धरे भगवान  भोलेनाथ के रौद्र रूप देखे साहब हा तब तुतारी धरे परदेसी के बरन ला।

“ल ..ल..लग जाही न परदेसी !  संसो झन कर । ” 

साहब डर्रावत किहिस । 

"इही गोठ ला तो सुनत जोजन होगे साहेब ! फेर कब लगही ते ..? महू जानथव सुचना के अधिकार ,लोक सेवा गारंटी अधिनियम ला । जान डारेव तुहरे आफिस मा लगे सी0सी0 टी0वी0 केमरा के आगू मा मोर गोसाइन के पहुंची ला नगाये हस तौन ला । सी0डी0 घला बनवा डारे हव इमानदार बाबू जेखर टरासफर करवाये हस तेखर ले मिलके ।’’

परदेसी किहिस मेछा ला अइठत। 

    साहब थरथराये लागिस अउ टेबल के तरी मा कही ला खोजे के उदीम करिस ।

’’साहेब कतका लबारी मारथस तौन ला अब घला जान डारेव । साहेब खेत जोतथन अउ बइला मेछराये लागथे तब बाखा मा तुतारी परथे तब सोझिया जाथे ।"

 परदेसी फेर किहिस ।

   परदेसी के हाथ के तुतारी ला देखे लागिस  साहब हा । डेढ़ दु हाथ के पातर लउठी अऊ आगू कोती खिला लगे सुचकी ....। कच्च ले गड़े कस लागिस साहब ला अउ लाइनमेन ला बला के कागज मा दसकत करत बिजली खंभा तार अउ आने जिनिस ले भरे ट्रक ला पठोय बर किहिस परदेसी संग । टेबल मा माड़हे अपन गोसाइन के पहुंची ला धर लिस परदेसी हा  अउ गरेरा कस बाहिर कोती आ गे । 

  साहब हा पसीना पोछे लागिस ।

" अड़हा परदेसी हा अब सब ला जानथे ....एवेरी थिंग....।'' फुसफुसाइस  अपने  - अपन साहब हा। तुतारी लागे सही कच्च ले गडि़स साहब के..।        

                     


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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

छत्तीसगढ़ी हाना

  छत्तीसगढ़ी हाना 

======०००====


*१. धान भाई भली*

      *कुटी खाई चली*

*अर्थ- धान ले चाऊर निकाल के भोजन पकाना सरल-सुगम काम आय*


*२.  सेतुवा- मनमेतुवा*

    *कब घोली,कब घाली ?*

*कब गिलास ढाली*

*कब कंठ उतारी ?*

*अर्थ:- सेतुवा पावडर ल घोल के पीना बड़ा पीचकाट बूता आय*


*३. काड़ी नहीं मूसर*

      *तैं नहीं दूसर*

*अर्थ- एकर से नहीं, तव ओकर से काम पूरा करना |*


*३. ना पहिरे के धोती*

     *ना ओढ़े के दुसाला*

    *तव निचोवौं काला*? 


*अर्थ- बहुंत तंग हाल, करारी साधन से गुजर-बसर करना*


*४. ना पकड़े के पूछी*

    *ना ही धरे के कान*

*अर्थ:- ना गांव म घर, ना ही खार म खेत वाली बात, अर्थात सम्पत्ति विहीन, आधार हीन मनखे होना*


*५. ना उधो के लेना*

       *ना माधो के देना*

*, अर्थ:- किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं होना*


*६. गांव के जोगी जोगड़ा*

    *बाहर के सिद्ध*

*अर्थ- नजदीक या आसानि से उपलब्ध व्यक्ति या वस्तु को महत्व हीन समझना*


*७. तेली घर तेल रहिथे*

    *तव पहार ला नइ पोतैं*

*अर्थ- पर्याप्त मात्रा म कोनो चीज रहिथे,तभो ले दुरूपयोग नहीं करना चाही*


*८. गोल्लर (संढ़वा) ल हरहा कोनो नइ कहैं*

*अर्थ-समर्थवान मनखे ल कसूरवार कोनो नइ कहैं*


*९. गुड़-गोबर एक कर देना*


*अर्थ- मूल्यवान वस्तु ल मूल्यहीन बना देना*


*१०. एके पूस म जाड़ नइ जाय*

*अर्थ-बुरा वक्त सबके साथ खच्चित आथे*


*११. दूध के जरे ह मही ल फूंक-फूंक के पीथे*

*अर्थ-एक बार कोनो व्यक्ति या वस्तु  से धोखा खाए के बाद मनखे सचेत हो जाथे*


*११. छाती म कोदो दरना*

*अर्थ - कोनो मनखे ल बार-बार खरा-खोटा सुनाना*


*१२. हरही गाय कछारे जाय*

*अर्थ- एक बार चोरी या कुकर्म के आदत होय ले बार-बार कुकर्म करना*


*१३. हरहा संग कपिला के विनाश*

*अर्थ-दोषी के संगत करे ले दंडित होना*


*१४. अपन कनवा बेटा ल घलो कनवा नइ कहैं*

*अर्थ -अपन सोरा आना दोषी औलाद ल दोषहीन कहना*


*१५ लईका जांघ म मैला कर देथे, तव जांघेच ल नइ काटैं*

*अर्थ-अपन औलाद के गलती ल मांफ कर देना*


*१६. ठलहा बैठ के खाए म राजा के खजाना अउ तलाव के पानी घलो नइ पूरै*

*अर्थ-जिनगी ल सुखमय  बनाए बर रोज मेहनत करना जरूरी हवय*


*१७. ठलहा बनिया हलावै कनिहा*

*अर्थ-मेहनती मनखे ठलहा बैठ के नइ रहे सकै*


*१८. गत न गरहन बंदन के खईता*

*अर्थ - कोनो काम संहराय लाईक नहीं करना*


*१९. जांगर चलै न जंगरौटा*

     *खाए बर गेहूं के रोटा*

*अर्थ-बिना मेहनत करे माल उड़ाना*


*२०. कुकूर के पूछी टेड़गेच रहना*

*अर्थ - गलत आदत कभी भी नहीं सुधारना*


*२१. लबरा के खाय, तभे पतियाय*

*अर्थ- लबरा मनखे कभी भी वादा पूरा नइ करै*


*२२. अपन हीनता काला बताय ?*

    *चार बियाय, एक बताय*

*अर्थ-अपन बेइज्जती बात ल छुपा के रखना*


*२३. जईसन तोर बाजा बाजही*

      *वईसन मोर नाच होही*

*अर्थ-जईसन के तईसन व्यवहार करना*


*२४ मघा  के बरसे,माता के परसे*

*महतारी जैसे मया-दुलार करना*


*२५. सबके  हवय राम कहानी*

   *कोनो के बीत्ता भर, कोनो के हाथ भर*

*अर्थ - ए दुनिया म सब मनखे दुखी हवंय, कोनो के दुख कमती हवय, कोनो के दुःख ज्यादा हवय*


(दिनांक-१४.०७.२०२२)


आपके अपनेच संगवारी

*, गया प्रसाद साहू*

    "रतनपुरिहा"

*मुकाम व पोस्ट करगीरोड कोटा जिला बिलासपुर 


//हाना के सीख //*

=====०००=====


*१. दुश्मन ल दांव चाही,*

       *माछी चाही घाव*,

*कइसे होय गुजर-बसर*?

    *का जुगती अपनाव ?*


*२. दुश्मन ल दांव झन दे*

   *माछी झन दे घाव |*

*संयम ले गुजर-बसर*,

    *"गया" जुगती अपनाव*||


*३. बेटवा ले बहुरिया गरू*

  *दुबर गरू मोटरा*

*ऊंटवा पहार चढ़ै,*

    *बोले लागे तोतरा ||*

*४. भूखहा ल दाल-भात*

    *प्यासा ल पानी ||*

*बीमरहा ल परहेज,*

    *सरल होय जिनगानी*||


*५. पानी गए ले पार बांधे,*

    *बुजदिल का पाए ?*। *चलनी म गाय दुहे*

       *करम ल ठठाए !!*

*६.मोबाईल बिगाड़े टुरी-टुरा*

   *चाल बिगाड़े मोटर |* *चाय बिगाड़े बिहनिया बूता*

    *जात बिगाड़े होटल !!*


*७. गांजा बर चना-चबेना*,

    *भांग बर चाही घी* |

*दारू बर चखना चाही,*

   *सोच-समझ के पी*||


*८. ग्यानी बर ग्यान बुध*

   *सठ बुध लाठी* |

*सियानी बुध कम बात*,

   *लईका बुध बांटी*||


*९. रोवत लईका झन धरै*

   *झन धरै नंगरिहा के नांगर*|

*कुकर्मी मनखे के संग झन धरै*

*झन धरै पाही टांगर !!*


*१०. बिड़ी सिगरेट तम्बाकू ले,*

   *पेट भरै न पुरखा तरै !*

*गर म केंसर-पेट म अल्सर*

   *अकाल मिरतू मरै !!*


(दिनांक-१६.०७.२०२२)



संकलन करैया


*गया प्रसाद साहू*

  "रतनपुरिहा"

*मुकाम व पोस्ट करगीरोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)


🙏☝️✍️❓✍️👏

जब सावन के सुरसुरी फूटथे...

 जब सावन के सुरसुरी फूटथे...

     सावन के सुरता आते मन म उमंग के सुरसुरी फूट परथे। प्रकृति के जवानी चारों खुंट जब लहलहाथे तब मनखे के रूआं-रूआं कुलके अउ हुलसे लागथे। इही हुलसना अउ कुलकना ह हमर संस्कृति के साज बन जाथे, सिंगार बन जाथे। हमर भुइयां के मूल संस्कृति म सावन महीना के बड़ महात्तम हे। ये महीना ल शिव उपासना के महीना घलो कहे जाथे। सृष्टिक्रम प्रारंभ होए के बाद देवता मन के अरजी करे ले परमात्मा ह इही महीना के पुन्नी तिथि म अपन पूजा के प्रतीक के रूप म तेज रूप म सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड म संचरे विराट रूप के प्रतीक स्वरूप शिव लिंग के प्रादुर्भाव करे रहिसे। इही महीना के अंजोरी पाख के पंचमी तिथि म वोकर सबले प्रमुख गण, जे हमेशा वोकर गला म आसन पाथे, वो नांग देवता के घलो जमन होए हे, जेकर सेती हमन नाग पंचमी के रूप म उंकर सुरता अउ पूजा करथन।


   परमात्मा के एक रूप प्रकृति ल घलो माने जाथे, अउ प्रकृति के अद्भुत रूप, सिंगार घलो ह ए सावन म देखने-देखन भाथे। ए महीना म झड़ी-बादर, तरिया-नंदिया के घलोक अइसन रूप होथे के मनखे मन एती-वोती जवई ल छोड़ के एके तीर बइठ के पूजा उपासना के मुद्रा म आ जथें। माने हर दृष्टि ले सावन परमात्मा के उपासना खातिर उपयुक्त लागथे। बोल बम के जयकारा पूरा महीना भर सुने ल मिलथे। जेती देखौ साधक रूप के सिंगार करे कांवरिया मन अपन-अपन क्षेत्र के पवित्र नंदिया-नरवा के जल लेके अपन-अपन क्षेत्र के सिद्ध शिव स्थल म जाके वोला समर्पित करथें। अध्यात्म म परमात्मा ल पाए के तीन रस्ता बताए गे हे- ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग अउ साधना मार्ग। सावन म ये तीनों रस्ता या मार्ग एके संग देखे ले मिलथे।


    शिव के प्रमुख गण नागदेव के प्रादुर्भाव इही सावन के अंजोरी पंचमी म खुद भोलेनाथ अपन दाहिना हाथ ले करे रिहिसे। मोर साधना काल म एक ठन बिरबिट करिया शेषनांग हमेशा मोर जगा आवय अउ मोला लपेट डारय। शुरू-शुरू म अड़बड़ डर लागय। मैं वोला फुहर-फुहर के गारी देवौं, पटकिक-पटका होवौं, लड़ौं-झगरौं। धीरे-धीरे मोर अंदर के डर ह कम होए लागिस, त वोकर संग मजा लेए लागेंव। वो समय मोला बताए गिस के संपूर्ण सर्प प्रजाति के उत्पत्ति भोलेनाथ के दाहिना हाथ ले होए हे। वोकरे सेती वोहर एकर जम्मो काम म जेवनी या कहिन दांया हाथ के भूमिका निभाथे। जिहां कहूं शिव उपासना होथे, वोकर मदद खातिर सबले पहिली इही जाथे। शेषनाग के सिरिफ पांच फन होथे, इहू बात ह जाने के लाइक हे। ये पांचों फन ह भोलेनाथ के दाहिना हाथ के पांचों अंगरी के प्रतीक आय। शेषनाग के संबंध म जेन सैकड़ों-हजारों फन के कथा मिलछे वो मनगढ़ंत अउ अतिशयोक्ति आय।


    सावन पुन्नी के दिन जेन रक्षा बंधन के तिहार मनाए जाथे वोहर सिरिफ भाई-बहिनी के रक्षा के तिहार नोहय, भलुक जम्मो जीव-जगत के रक्षा परब आय। काबर ते परमात्मा इही दिन अपन पूजा के प्रतीक देके जम्मो झन के सुरक्षा अउ सुख-शांति के आशीष अउ वचन दिए रिहिन हें। इहां ये जानना जररूरी हे, के उपासना के फल हर उपासक ल मिलथे। एकर प्रक्रिया अंजोरी-अंधियारी पाख के आधार म मिलथे। अंधियारी पाख म हमर रद्दा म जेन अवरोधक तत्व होथे, वोला हटाए के बुता होथे, अउ अंजोरी पाख म फेर वो फल जेकर उपासना खातिर साधना करे जाथे वो ह मिलथे। ए सब ह एके दिन या महीना म नइ मिल जाय, जइसे-जइसे कारज होथे, वोकर मुताबिक वतका दिन तक धैर्य रखे के जरूरत होथे।


-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर 

मो/व्हा.98269 92811

छत्तीसगढ़ी हाना, अर्थ अउ वाक्य म प्रयोग

 


छत्तीसगढ़ी हाना, अर्थ अउ वाक्य म प्रयोग 



मुहावरा अउ कहावत मन कोनो भी भाखा के आत्मा होथंय. 

मुहावरा ह पूरा वाक्य नइ होय. येहा वाक्य के अंश या भाग होथे.येहा विकारी शब्द आय जेहा काल, वचन अउ पुरुष के अनुसार 

बदलत रहिथे. अउ हाना (कहावतें) के बात करन त अपन आप म पूरा वाक्य होथे -जइसे -दूबर ल दू असाड़.  काल, वचन अउ पुरुष के अनुसार येमा बदलाव नइ होय.  कहावत ल विश्व के नीति साहित्य के अंग माने गे हवय. कहावत के अर्थ कहना या कथन होथे. अंग्रेजी म येकर बर "वेलशेड" अउ संस्कृत म "सुभाषित" शब्द लागू होथे. छत्तीसगढ़ी म लोकोक्ति (कहावतें) ल हाना कहे जाथे.  छत्तीसगढ़ी भाखा ह हाना प्रधान भाखा आय. हाना ह हमर भाखा के परान तो आय येकर सुभाव अउ सिंगार घला आय. पांव पुट येकर प्रयोग होत रहिथे. छत्तीसगढ़ के गाँव मन म बात -बात म, हर वाक्य म हाना सुने बर मिल जाही. छत्तीसगढ़िया मन के कोनो वाक्य ह बिना हाना के पूरा होयेच नइ. 

   हाना के आधार कोनो न कोनो घटना होथे. हाना ह लोक अर्थात जनता के देन हरे. हाना ह परीस्थिति के अनुसार प्रयोग करे जाथे. हाना के उद्देश्य कोनो बात ल तर्क द्वारा सही ठहराना या विरोध करना होथे. येमा नीति परक बात के संगे- संग "ताना" घलो रहिथे जेला सुन के आदमी ह गुने ल लागथे. येकर ले जिनगी म सुधार होथे अउ जिनगी रुपी गाड़ी ह सही रद्दा म चले ल लागथे. 

     जमाना ह अब बदलत जावत हे. जइसे- जइसे लोग लइका मन पढ़त -लिखत जावत हे त कतको बात ल भूलत घलो जावत हे. तइहा के बात ल बइहा लेगे हाना ह सही होत जात हे. हाना म घलो यहू बात लागू होथे. अब देखे ल मिलत हे कि छत्तीसगढ़ी भाखा के 

स्वरूप ह घलो बदलत जावत हे. हाना के प्रयोग ह कम होवत जावत हे. हमन ल देखे ल मिलथे कि एक शिक्षित आदमी के तुलना म एक ग्रामीण जउन ह भले पढ़े लिखे नइ हे वोहा ठेठ छत्तीसगढ़ी म बात करके सबला प्रभावित कर लेथे. ये जगह पढ़े लिखे मनखे मुंह ताकत रहि जाथे. नवा पीढ़ी मन अपन महतारी भाखा ले 

दूर होवत जावत हे. अंग्रेजी, हिंदी अउ आने भाखा सीखना बने बात हरे. जिनगी म आगू बढ़े बर यहू जरुरी हे. पर हमन ल अपन महतारी भाखा ल नइ भूलना चाही. येला बोले म गर्व महसूस होना चाही. काबर कि जउन अपन महतारी भाखा ल भूल जाथे तेमन धीरे ले अपन संस्कृति अउ सभ्यता ल घलो भुल जाथे. 

    अब के नवा पीढ़ी मन अपन गुरतुर महतारी भाखा ल भुलावत जावत हे. अइसन स्थिति म ये मन हाना मन ल का सरेखही, का जानहीं! अइसे जनावत हे कि अवइया पढ़े- लिखे पीढ़ी ह हाना ल भुला जाही. अइसमे भूलत -बिसरत हाना मन ल सकेले -संजोय के उदिम हमर छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर ग्रुप द्वारा करे जाथे. येकर खातिर ग्रुप एडमिन गुरुदेव अरुण कुमार निगम जी के संगे-

संग ये विषय म अपन कलम चलइया बुधियार साहित्यकार मन ल गाड़ा -गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना देवत हंव. 


  हाना के प्रकार -


   हाना कई प्रकार के होथे. 


1.खेती- किसानी  अउ प्रकृति के हाना 


2.शिक्षा अउ नीति के हाना 


3.जाति ले जुड़े हाना 


4.धंघा -पानी ले जुड़े हाना 


5.नाता -रिश्ता के हाना 


6.हंसी -मजाक के हाना 


7.शरीर के अंग मन ले जुड़े हाना 


8.जगह संबंधी हाना 


9. पशु -पक्षी संबंधी हाना 



  हाना के लक्षण-


 छत्तीसगढ़ी हाना के जउन लक्षण 

देखे ल मिलथे वोमा ये प्रकार हे. 

 

1. छोटकू /लघुता 


2. सरलता 


3.लय या गीत 


4.तुक 


5.निरीक्षण अउ अनुभूति के अभिव्यंजना


6.प्रभावशाली अउ लोक रंजकता


हाना ह लोक जीवन ल समझे म सहयोग करथे. उहां के मन का सोचथे, का जिनीस ल बने कहिथे अउ काला पसंद नहीं करय.ये सब हा उहां के हाना म देख ल मिलथे.


  1 . खेती -किसानी ले जुड़े हाना 


हमर छत्तीसगढ ल धान के कटोरा कहे जाथे. खेती -किसानी इहां के रहवासी मन के जिनगानी हरे.येकर सेति इहां खेती -किसानी उपर नंगत अकन गाना अउ हाना बने हवय.त आवव हाना ल पढ़व.


1.आषाढ़ करै गांव -गौतरी,

कातिक खेलय जुआं.

पास -परोसी पूछै लागिन ,

धान कतका लुआ.


अर्थ -   जउन किसान आषाढ़ माह म गांव -गांव घूमथे अउ कातिक माह म जुआं खेलथे वोकर धान नइ हो पाय. त परोसी ह अइसन मनखे उपर व्यंग्य करके पूछथे कि " धान कतका लुआ". येमा बताय गे हवय कि किसान ल आषाढ़ अउ कातिक माह म गजब मिहनत करना चाही. 


2.अपन हाथ मा नागर धरे, 

वो हर जग मा खेती करे .


अर्थ- खेती -किसानी म खुद ल नंगत मिहनत करे ल लागथे. खेती म दूसर भरोसा रहिबे त अब्बड़ नुकसान उठाय ल पड़थे. काबर कि सही समय म बांवत नइ होय ले खेत ह परिया पड़ जाथे. 


3.तीन पईत खेती, 

दू पईत गाय. 


अर्थ -  किसान ल अपन खेत -खार डहर तीन घांव जाके सेवा करना चाही. अइसन नइ करे ले कतको प्रकार ले नुकसान उठाय ल पड़थे. वइसने गाय के दू बार सेवा -जतन करना चाही. खेती अउ गाय किसान के सहारा होथे त बने जतन करना जरुरी हे. 


4.कलजुग के लइका करै कछैरी, 

   बुढ़वा जोतै नांगर. 


अर्थ - ये हाना म व्यंग्य अउ पीरा दूनो छुपे हे. बदलत जमाना म लइका मन पढ़ -लिख के खेती-किसानी डहर एको कनक धियान नइ देय. भले वोमन दूसर के चाकरी कर लिही फेर खेती करे म हीन भावना रखथे. अइसन स्थिति म जवान लइका के ददा ह नांगर जोते बर मजबूर रहिथे. 


5.धान -पान अउ खीरा, 

ये तीनों पानी के कीरा. 


अर्थ - धान, पान अउ खीरा ह तभे होथे जब बने पानी गिरथे .पानी के कमी ले ये तीनों ह सही ढंग ले नइ हो पाय. 


6.एक घांव जब बरसे स्वाति, 

कुरमिन पहिरे सोने के पाती. 


अर्थ - ये हाना के मतलब हे कि जब स्वाति नक्षत्र म एक घांव बने पानी गिर देथे त फसल ह बने होथे. अउ जब फसल ह बने होथे त जिनगी के जिये के जरुरी जिनीस के संगे -संग माई लोगन मन के गहना -गुटा के सउंक ह घलो पूरा हो पाथे. 


7.भांठा के खेती, 

अउ चेथी के मार. 




अर्थ - कन्हार जमीन म बने फसल होथे. येकर उल्टा भांठा जमीन म खेती- किसानी करे म नंगत मिहनत करे ल पड़थे तभो ले बने फसल हाथ म नइ आ पाय. जइसे चेथी ल मार पड़ जाथे 

त अब्बड़ पीरा होथे वइसने पीरा के अनुभव भांठा जमीन म खेती करे ले होथे. 


8.बरसा पानी बहे न पावै, 

तब खेती के मजा देखावे. 

अर्थ - ये हाना म बरसात के पानी ल रोके बर संदेश दे गे हवय. जब पानी ल सहेज के रखबो त मानलो एकाध पानी नइ गिर पाही त वो बेरा म बरसात के पानी ह फसल ल पकाय के काम करही. ये हाना ले पता चलथे कि हमर छत्तीसगढ़ के किसान कत्तिक गुनिक हे. आज वाटर हारभेस्टिंग के बात चारो डहर कहे जाथे जबकि ये हाना ह तो न जाने कत्तिक पहिली ले बने हे .


9.जइसन बोही, 

तइसन लूही .


अर्थ - ये हाना म गीता के संदेश हवय. जइसन कर्म करबे तइसे फल पाबे. वइसने बात खेती -किसानी म लागू होथे. जब बने मिहनत करबे त फसल बने होही अउ कोढ़ियई करके काम करबे त 

फसल कहां ले बने होही.


  हाना के लक्षण -


१. लय या गीत वाला हाना 



१.खाय बर जरी, बताय बर बड़ी .


अर्थ - अपन हैसियत ले जादा बताना. कोनो चीज ल बढ़ा -चढ़ा के गोठियाना. 


२..जाड़ कहिथे लइका मन ल छुअंव नइ, जवान हे मोर भाई. 

डोकरा मन ल छोड़व नइ, कतको ओढ़ रजाई. 


अर्थ - लइका मन ल कम, जवान मन ल साधारण अउ सियान मन ल जादा जाड़ लागथे. जादा जाड़ ले सियान मन गुजर घलो जाथे. 


३.बिन बल के बजनी बाजे, बिन गला के गीत. 

बिना ठसा के हाँसी हँसे, तीनों गपड़वा मीत. 


अर्थ - अपन बल, बुद्धि, योग्यता ले ऊपराहा जाके काम करइया मन बर ये हाना बोले जाथे. मूरख- मूरख मन जब संगवारी बन जाथे त अइसने होथे. 


४.अरे हरना, समझ के चरना. 

एक दिन होही, तोरो मरना. 


अर्थ - ये जिनगी ह पानी के बुलबुला जइसे होथे जेहा देखते देखत फुट जाथे. जउन मनखे ये दुनिया म आहे हे वोला एक दिन इहां ले जररु जाय ल पड़ही .


५.फुटहा करम केफुटहा दोना.

पेज गंवा गे चारो कोना .


अर्थ - परेशानी म अउ ऊपराहा परेशानी आ जाथे तेकर बर ये हाना कहे गे हवय. 


६.जियत न देहौं कौरा, 

मरे उठाहौं चौरा. 


अर्थ - जियत रिहिस त दाई -ददा ल बने ढंग ले खाय बर नइ पूछिस अउ उंकर मरे के बाद मठ बना के दिखावा करत हे. 


७.तन बर नइ हे लत्ता, जाय बर कलकत्ता. 


अर्थ - अपन हैसियत ले जादा खरचा करना. 


८.ज्ञानी मारे ज्ञान ले, अंग -अंग भिन  

जाय. 

मूरख मारे लउठी ले, मूड़ -कान फूट जाय.  


अर्थ - बुधियार मनखे ह बैरी मन ल अपन बुद्धि ले मारथे. अउ धीरे ले वहू ल अपन वश म कर डालथे. येकर उल्टा मूरख आदमी ह अपन बैरी ल लउठी म मार के वोकर मूड़ -कान फोड़ डालथे.


२.तुक संबंधी हाना-


१ .काम न बूता,पहिरे बर सूता


अर्थ - काम बर ढेरियाना अउ सिंगार करे बर अघुवाना.


२.मान न बड़ई ,कहां जाबे मड़ई 


अर्थ - जिहां मान- सम्मान  नइ मिले उहां बिल्कुल नइ जाना चाही.


३.मन म आन, मुंह म आन


अर्थ -  मीठ -मीठ गोठियाना पर अंदर ले कपट भाव रखना .


४.सांच ल का आंच

अर्थ - बने मनखे ल गलत ठहराय ले वो गलत नइ हो जाय. सही आदमी ल कोनो फर्क नइ पड़य.


३.निरीक्षण अउ अनुभव संबंधी हाना-


   हाना ल बने समझ के बनाय जाथे.कोनो घटना या कोनो चीज के बने जांच -पड़ताल करके हाना सिरजाय जाथे  .


१.संझा के पानी बिहनिया के झगरा.


अर्थ - जेकर संग बैर हे वोकर ले लड़े बर  मउका खोजना.


२.दूधो जाय दुहनी जाय.


अर्थ - सरबस नुकसान पहुंचना   .


३.आंजत- आंजत कानी


अर्थ - बने दिखे के साद म नुकसान होना


४.प्रभावशीलता अउ लोक रंजकता-


 कई ठन हाना ह गजब प्रभाव डाले के संगे -संग अब्बड़ मनोरंजक होथे. 


१.अंधवा पीसे कुकुर खाय.


अर्थ - बेकार के मिहनत करना


२.दीया तरी अंधियार


अर्थ - साधन- संपन्न होय के बावजूद कमी झलकना.


५.सरलता वाला हाना-


१ .अड़हा बैइद परान घात


अर्थ - अधूरा ज्ञान वाला मनखे ले अक्सर नुकसान पहुंचथे.


२.घीव गंवागे खिचरी म


अर्थ -नुकसान के भरपाई  नइ हो पाना.


हाना के वर्गीकरण-

१. खेती अउ प्रकृति संबंधी हाना- येकर उदाहरण उपर म रख चुके हंव 



२. स्थान परक हाना


  कोनो भी शहर अउ गांव के अपन निजी पहचान होथे. उंकर गुण- दोष ल देख के हाना बन जाथे .


१.रात भर गाड़ी जोते कुकदा के कुकदा


२.बेलगांव कस  बईला धपोर दिस .


३.छुईखदान के बस्ती,जय गोपाल के सस्ती


४.संगीत के गढ़ माने खैरागढ़


 ५.मानव -मंदिर   के चाय अउ गठुला के पोहा . 


राजनांदगाँव के छुईखदान नगर म  

वैष्णव मन जादा निवास करथे. वो मन अपन सामान्य बेवहार म "राम -राम "के जगह "जै गोपाल "कहिके एक दूसरा ल आदर भाव  देथे. तेकर सेति उहां बर कहे गे हवय - "छुईखदान के बस्ती, जै गोपाल के सस्ती. 


    अइसने राजनांदगाँव के मानव मंदिर (होटल) चाय -नास्ता बर प्रसिद्ध हे त गठुला गाँव के टीकम होटल  के पोहा के गजब सोर हे. राजनांदगाँव शहर के मन घलो सिरिफ पोहा खाय बर गठुला जाथे. तेकर सेति सहज हाना बन गे हवय - "मानव मंदिर के चाय अउ गठुला के पोहा. "


६.बागनदिया रे झन जाबे मंझनिया 


अर्थ-  छत्तीसगढ़ के बूड़ती दिशा म महाराष्ट्र सीमा ले लगे बागनदी घोर जंगल डहर के गाँव हरे जिहां नदी बहिथे वोकरो नाँव बागनदी हे. पहिली ये नदी म जंगली जानवर मन मंझनिया पियास मरे त पानी पीये ल आय. तेकर सेति हाना बने हे -"बागनदिया झन जाबे मंझनिया ". इही शीर्षक ले छत्तीसगढ़ी गाना घलो जन -जन म प्रसिद्ध हे. 


७.छै आगर छै कोरी रिहिस तरिया, तेकर सेति सुरगी के सोर हे बढ़िया. 


अर्थ - कहिथे कि तइहा जमाना म सुरगी गाँव म छै आगर छै कोरी  माने 126 तरिया रिहिस. समय के संग सैकड़ो तरिया पटागे. अभनो इहां दर्जन भर ले जादा तरिया हवय. "दसमत कैना "लोक गाथा के प्रसंग घलो सुरगी ले जुड़े हवय. 


 ८.सुरंग के गाँव माने सुरगी 


अर्थ- कहिथे कि गांव म पहिली सुरंग रिहिस हे तेकर सेति सुरगी नाम पड़िस. सुरंग के संबंध ओड़ार बांध टप्पा ले जुड़े हुए बताय जाथे. जन श्रुति हे. 


३.जाति संबंधी हाना -


१.  नाऊ के कचर- कचर त गहिरा के जतर -खतर .

२.आय देवारी राऊत माते .

३.. मर -मर पोथी पढ़े तिवारी, घोंडू मसके सोहारी .

४. उजरिया बस्ती के कोसरिया ठेठवार. 

५. संहराय बहुरिया डोम के घर जाय. 

६. तेली घर तेल रहिथे त पहार नइ पोते. 

७.मातिस गोंड़ दिस कलोर, उतरिस नशा दांत निपोर. 

८. गांव बिगाड़े बम्हना, खेत बिगाड़े सोमना. 

९. जइसे दाऊ के नाचा तइसे नाऊ के नाचा. 

१०. चिट जात तेली घोरन जात कलार, कुर्मी जात मदन मोहिनी घोरमुंहा जात कलार. 

११   बाम्हन मरे गोड़ के घाव, कुकुर मड़े मुड़ के घाव. 

१२.. हाथी बर गेड़ा कोष्टिन बर खेड़हा. 


४.. पशु -पक्षी संबंधी हाना -


१ . दुधारु गाय के लात मीठ 


अर्थ- जेकर ले फायदा होथे भले वोहा करु गोठियाय या खिसियाय सुने ल पड़थे. 


२. नवा बइला के नवा सींग, चल रे बइला टींगे -टींग 


अर्थ - शुरु म कोनो काम म अब्बड़ जोश रहिथे. नवा -नेवरिया मन नंगत के काम करथे चाहे कोनो भी क्षेत्र म हो. 


३.परोसी बुती सांप नइ मरे .

अर्थ - घर म कोनो प्रकार ले विपदा आय हे तेला खुदे निपटाय ल पड़थे नइ ते अब्बड़ नुकसान उठाय ल पड़थे. 


४. कुकुर भूंके हजार, हाथी चले बाजार 

अर्थ - यदि तैंहा अपन जगह सही हस त कतको बैरी मन तोर पाछु पड़ जाय कोनो प्रकार ले नइ बिगाड़ सकय. 

५  बोकरा के जीव जाय खवइया ल अलोना. 

अर्थ - दूसर ल पीरा पहुंचा के मजा उड़ाना. 


५.  प्रकीर्ण हाना -


    ये प्रकार के हाना म ज्ञान, शिक्षा , कर्तव्य, उपदेश, उपहास, व्यंग्य, दृष्टांत, समाज अउ जातीय जीवन के कतको क्षेत्र उपर मार्मिक बात अउ चुभने वाला हाना मिलथे. 


1.  सब पाप जाय फेर मनसा पाप नइ जाय. 


अर्थ- मन म शंका हे त वोहा बड़का बीमारी हरे जउन ह नइ दूर होय. 


2.  भाजी म भगवान राजी 


अर्थ - कोनो ल कम सुविधा म मान- सम्मान देना. जइसे भगवान कृष्ण ह राजा दुर्योधन के छप्पन भोग ल नइ खाके अपन भक्त विदुर के घर भाजी संग भोजन करिस. 



       हाना के कतको भंडार पड़े हे. अवइया बेरा म अउ गोठ- बात

करबो. 


संदर्भ - 1. सियान मन ले सुने

 हाना के आधार पर .

     2. साकेत स्मारिका 2014 ,विशेषांक - "छत्तीसगढ़ी जन जीवन म हाना के प्रभाव "

  3.आदरणीय डॉ. पीसी लाल यादव जी अउ आदरणीय कुबेर सिंह साहू जी के लेख के आधार पर .

4. छत्तीसगढ़ी का सम्पूर्ण व्याकरण -२०१९ (संपादक - आदरणीय डॉ. विनय कुमार पाठक जी अउ आदरणीय डॉ. विनोद कुमार वर्मा जी के लेख के आधार पर. 

5. सर्व शिक्षा अभियान के तहत वर्ष 2011 म प्रकाशित किताब के आधार पर.        

               ओमप्रकाश साहू" अंकुर"


               सुरगी, राजनांदगांव


          मो. ७९७४६६६८४०