पीतर पाख आस्था अउ भाव के परब हरे
बोवव बीज करम के पोठहा,सरल रखव व्यवहारI
तब सुरता करहीं सब हा,गुण गाहीं संसारI
हर परब आस्था ले जुड़े होथे ग्यारह दिन ले कतेक भाव भक्ति सन गणेश पूजा चलत रिहिस हे I अउ आज उही आस्था संग गणेश विसर्जन करत इही गोहरावत हन अगले साल अउ जल्दी आ I कहे के मतलब ओकर वापसी के कामना करथन, इही तो हम ला नवा शुरुआत के संकल्प के भरोसा देवाथे, गणेश मूर्ति विसर्जन के बाद बड़े फजर ले ओरिया लीप के चउँक चन्दन पुरके फूल पान चढ़ा के, लोटा मा पानी मढ़ा के, अपन पीतर देव मनके स्वागत करथन I पीतर पाख माने आस्था अउ श्रध्दा के परब आय, अउ श्रध्दा उकर बर जेकर परसादी आज हमन ल ये जिनगी मिले हे, हमन अंतस ले अपन पुरखा मन ल आभार करत उन ला सुरता के आरूग फूल चढ़ावत माथ नवाथन I काबर हम सब एकरे मन के छइयाँ मा फरत फूलत हन, तेकर सेती अनंत चतुर्दशी के बाद पूर्णिमा ले अमावस तक ओरिया लीप के पीतर मन के अगुवाई म जौं तिली अउ काशी ले तर्पण करके बरा बोबरा चीला सोंहारी बना के तोरई सन हूम जग दे के, अपन भाव ले तृप्त करथन I अउ मया दुलार मान गौण ले अघाय हमर पीतर मन तको आशीष के बरसा करत अपन परिवार के मया पिरित अउ खुशी ल देख के संझा कुन बिदा हो जथेI अउ अइसे माने गेहे ये पाख भर पीतर मन धरती लोक मा अपन परिवार के मया मा खींचत आथेI अउ भाव के परसाद पाके आशीर्वाद देवत अमावस के दिन अपन परम धाम चल देथे I वइसे तो हमन अपन पुरखा मन ला हर कारज मा चाहे दुःख रहय या सुख सुरता करथन, आशीर्वाद लेथन, फेर ये पीतर पाख अपन पुरखा मन ल समर्पित रहिथे, उन ला देख तो नइ सकन फेर भाव इही रहिथे आज दाई मन आय हे, आज हमर घर के सियान बबा ह आय हे, अउ आके हमर परिवार ल देखत हें I हमन भी ओकर स्वागत सत्कार कर भाव के भोग लगा के अपन संस्कृति अउ परंपरा के निर्वाह करत अवइया पीढ़ी ल ये संस्कार रूपी भाव के बीज ल अंतस मा बोके महकाय के कोशिश करथन I अउ ये बताय के कोशिश रहिथे अपन जनम देवइया महतारी बाप अउ घर के बड़े सियान मन ला उकर राहत ले मया दुलार मान सम्मान देवन I अउ उखर इच्छा खुशी के मान राखन, अउ उकर जाय के बाद तको उन मन के देय संस्कार परंपरा ला याद रखन, जेन पुरखा ले वंश चलत आत हे वोला सुरता करके ओकर अच्छाई ल अवइया लइका मन ल बतावन Iआज आधुनिकीकरण अउ भागमभाग के युग मा सब मनखे अपन नीत नियम रीति रिवाज परंपरा ला भुलात जात हे, फेर हमन अपन जर ला झन भुलावन अउ ये पीतर पाख तो इही सुरता देवाथे कि हमन कोन पेड़ के फूल फर आन, अउ ये तो प्रकृति के नियम अउ विधि के विधान हरे आय हे तेन ला एक दिन जाय बर पड़हीं I वो कहिथे न पाके फल एक दिन टुप ले गिरके माटी म मिल जथे, एक ठन अउ बात हे पीतर पाख मा कउँवा ला भोजन देवई शुभ माने जाथे, हमर पुरखा मन कतेक गुढ़ बात ल सोचे रिहिन Iइही मौसम ह कउँवा मन के बढ़वार के मौसम होथे, ते पाँय के वोला भोजन देंवय अउ कउँवा ह एक अइसन पक्षी आय जेन बर पीपर के फल ल खाथे अउ ओकरे बीट ले ही बर पीपर के पेड़ ह जामथे, अउ ये पेड़ ले हमन ल आक्सीजन मिलथे Iअइसन भाव के भोग लगावन कि नदावत कउँवा मन आवय ओकर बढ़वार होवय अउ प्रकृति के संतुलन बने राहय I अउ पीतर पाख मा हमू मन ये संकल्प करन पुरखा के नांव ले एक एक पेड़ लगावन अउ ओकर आशीष के छइयाँ पावन I
संगीता वर्मा
अवधपुरी भिलाई
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