Saturday, 1 October 2022

आज 55 वीं पुण्यतिथि म विशेष.... छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय- कोदूराम दलित


 

आज  55 वीं पुण्यतिथि म विशेष....


छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय-  कोदूराम दलित   

                                                            जब हमर देश हा अंग्रेज मन के गुलाम रिहिस ।वो समय हमर साहित्यकार मन हा लोगन मन मा जन जागृति फैलाय के गजब उदिम करिन । हमर छत्तीसगढ़ मा हिन्दी साहित्यकार के संगे संग छत्तीसगढ़ी भाखा के साहित्यकार मन घलो अंग्रेज सरकार के अत्याचार ला अपन कलम मा पिरो के समाज ला रद्दा देखाय के काम करिन ।छत्तीसगढ़ी के अइसने साहित्यकार मन मा स्व. लोचन प्रसाद पांडेय, पं. सुन्दर लाल शर्मा, पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, स्व. कुंजबिबारी चौबे ,प्यारे लाल गुप्त, अउ स्व. कोदूराम दलित के नाम अब्बड़ सम्मान के साथ लेय जाथे ।येमा विप्र जी अउ दलित जी हा मंचीय कवि के रुप मा घलो गजब नाव कमाइन । छत्तीसगढ़ी मा सैकड़ो कुंडलिया लिखे के कारण दलित जी ल  छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय कहे जाथे 


जन कवि कोदू राम दलित के जनम बालोद जिले अर्जुन्दा ले लगे गांव टिकरी मा 5 मार्च 1910 मा एक साधारण किसान परिवार मा होय रिहिन ।पढ़ाई पूरा करे के बाद दलित जी हा प्राथमिक शाला दुर्ग मा गुरुजी बनिस। बचपन ले वोकर रुचि साहित्य डहर रिहिस हवय ।वोहा अपन परिचय ला सुघर ढंग ले अइसन देहे –


लइका पढ़ई के सुघर, करत हवंव मैं काम ।

कोदूराम दलित हवय मोर गंवइहा नाम ।।

मोर गंवइहा नाम, भुलाहू झन गा भइया ।

जनहित खातिर गढ़े हवंव मैं ये कुंडलियां ।।

शउक महूँ ला घलो हवय, कविता गढ़ई के ।

करथव काम दुरुग मा मैं लइका पढ़ई के ।।



दलित जी सिरतोन मा हास्य व्यंग्य के जमगरहा कवि रिहिन हे । शोषण करइया मन के बखिया उधेड़ के रख देय ।दिखावा अउ अत्याचार करइया मन ला वोहा नीचे लिखाय कविता के माध्यम ले कइस अब्बड़ ललकारथे वोला देखव –


ढोंगी मन माला जपयँ, लमभा तिलक लगायँ।

हरिजन ला छूवय नहीं, चिंगरी मछरी खाय ।।

खटला खोजो मोर बर, ददा बबा सब जाव ।

खेखरी साहीं नहीं, बघनिन साहीं लाव ।।

बघनिन साहीं लाव, बिहाव मैं तब्भे करिहों ।

नई ते जोगी बनके तन मा राख चुपरिहौं ।।

जे गुण्डा के मुँह मा चप्पल मारै फट ला ।

खोजो ददा बबा तुम जा के अइसन खटला ।।


ये कविता के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ के नारी मन के स्वभिमान ला सुग्घर ढंग ले बताइन । संगे संग छत्तीसगढ़िया मन ला साव चेत करिस कि एकदम सिधवा बने ले घलो काम नइ चलय ।अत्याचार करइया मन बर डोमी सांप कस फुफकारे ला घलो पड़थे ।


दलित जी के कविता मा गांव डहर के रहन सहन अउ खान पान के गजब सुग्घर बखान देखे ला मिलथे –


भाजी टोरे बर खेतखार औ बियारा जाये ,

नान नान टूरा टूरी मन धर धर के ।

केनी, मुसकेनी, गंडरु, चरोटा, पथरिया,

मंछरिया भाजी लाय ओली ओली भर के । ।

मछरी मारे ला जायं ढीमर केंवटीन मन,

तरिया औ नदिया मा फांदा धर धर के ।

खोखसी, पढ़ीना, टेंगना, कोतरी, बाम्बी, धरे ,

ढूंटी मा भरत जायं साफ कर कर के । 


दलित जी हा 28 सितंबर 1967 मा अपन नश्वर शरीर ला छोड़ के स्वर्गवासी होगे । 


दलित जी के सुपुत्र आदरणीय गुरुदेव अरुण कुमार निगम जी हा अपन पिता जी के मार्ग ला सुग्घर ढंग ले अपना के साहित्य सेवा करत हवय । संगे संग” छंद के छंद “जइसे साहित्यिक आंदोलन के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ के नवा पीढ़ी के साहित्यकार मन ला छंद सिखा के सुग्घर ढंग ले छंदबद्ध रचना लिखे बर प्रेरित करत हवय। येहा एक साहित्यकार पुत्र द्वारा अपन पिता जी ला सही श्रद्धांजलि हरय।



[ ●ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’,सुरगी,राजनांदगांव, 


मो.79746 66840. ]


■■■ ■■■


छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय कोदूराम 'दलित' के 55 वीं पुण्यतिथि मा सादर नमन...हेमलाल सहारे


 

*छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय कोदूराम 'दलित' के 55 वीं पुण्यतिथि मा सादर नमन...हेमलाल सहारे


*दलित जी के 'छन्नर-छन्नर पैरी बाजय' में ग्राम्य जनजीवन के चित्रण* 


       छत्तीसगढ़ी साहित्य के गिरधर कविराय के रूप में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ के साहित्यकार, लेखक, जनकवि कोदूराम दलित के साहित्य जगत म बिसेस महत्व हवय। उँखर छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी के पद्य-गद्य में बरोबर पकड़ रिहिस। दलित जी हिन्दी के छन्द में छत्तीसगढ़ी कविता लिखय। उँखर कविता मन हा गाँधीवादी विचारधारा ले प्रेरित रहय। हास्य-व्यंग्य घलो बनेच रहय। कवि सम्मेलन मन म अपन इहि विशिष्ट शैली ले लोगन मन ल  जागरूक करत अब्बड़ मनोरंजक करय। दलित जी के कविता में देशप्रेम भाव, जनजागरण,प्रकति चित्रण, नीतिपरख, समाज सुधार, समाजोपयोगी, मानवतावादी, अउ प्रगतिशील नजरिया के घलो दर्शन होय। येखर सेती दलित जी ल जनकवि के नाव घलो मिले रिहिस।

  

       दलित जी अपन कलम ले लगभग 800 कविता रच के साहित्य संसार के कोठी ल भरे के उदिम करीस। आज 55 वीं पुण्यतिथि म उँखर कविता संग्रह के किताब "छन्नर-छन्नर पैरी बाजय" के सुरता करत मोर आदरांजलि देवत हों। ये किताब ल संपादक नंदकिशोर तिवारी जी अउ गुरुदेव अरुण कुमार निगम जी के स्वत्वाधिकार म सन 2007 म प्रकाशित होय हे। ये किताब म समाज सुधार,देशप्रेम भावना के संगे-संग किसान-मजदूर के पीरा ल कहत अपन अधिकार बर जगात, मद्यपान निषेध, राष्ट्रीय तिहार, भारतमाता ल आजादी करे बर गोहार अउ खादी ग्रामोद्योग के कविता मन प्रमुख हवय। ये किताब के कविता मन हमर ग्राम्य जनजीवन के चित्रण ले भरे हे।  दलित जी के विचार ल ये किताब के 32 ठन कविता ल पढ़के जाने जा सकत हे।  कवि के लगभग सबो भाव ये कविता संग्रह में आगे हवय। येला पढ़के साहित्य प्रेमी मन बिना सहराये नई रह सकय। 


     दलित जी शिक्षण काम के जुड़े के सेती सबो झन बर शिक्षा के चिंता करना स्वभाविक बात आय। अनिवार्य शिक्षा के महत्व ल बतात उँखर पहली कविता 'अनिवार्य सिक्छा' में जम्मो लइका मन के शाला भेजे बर किहिस-


"पढ़े लिखे बर जाव-गुन सीखे बर जाव,

पढ़ लिख के भईया! बने नाम ल कमाव।"


लइका मन के चिंता के पीछू सियान मन के प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम बर बने चेतावत घलो कहत हे-


"रतिहा आठ बजे आ जाहू, साढ़े नौ के छुट्टी पाहू।

आए बर झन करौ कोताही, बिगर बलाए आना चाही।"


     हमर समाज बर अभी सबके बड़े बुराई हवे त ओ हरे मंद-मउँहा के पियई। दलित जी ह येला रोके अउ जनमानस ल येकर के बचे के प्रयास बर लिखिस। येहा घर, परिवार, समाज अउ देश ल नुकसान करथे। पियईया मन ल फटकारत किहिस-


"पियइ में तोर लगे आगी, जर जाय तोर ये जिनगानी।

पीथस निपोर तैं ढकर-ढकर, ये सरहा मौहा के पानी।"


   सहकारिता अपनाय बर कवि के लेखनी कम नई चले हे। सबो झन ल सहकारिता लाय बर सहयोग करे के जरूरत हवय। सबो मिलके हमर देश के बेकारी, भुखमरी अउ गरीबी ल दूर करे के  संकेत देवत हे-


"हम्मन भिड़बो तो भारत में,लाबो स्वर्ग उतार।

सहकारिता हमर देस के, कर देही उद्धार।"


       दलित जी के देशप्रेम 'भारत ला बैकुण्ठ बनाबो' कविता में साफ-साफ दिखत हे। गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होय के भाव देखव-


"अवतारी गाँधी जी आइन,

जप-तप करिन सुराज देवाइन।

हमर देस ल हमर बनाइन,

सुग्घर रसदा घलो देखाइन।"


      दलित जी के लिखे के शुरुआत 1926 ले 1967 तक सरलग होईस हे। शुरुवाती के समय स्वतंत्रता संग्राम मचे रहय। त ओकर प्रभाव कविता में आनाच हे। उन स्वतंत्रता सेनानी मन ल अपन कविता म जगह देवत उँखर प्रशंसा करीस। 'भगवान तिलक' कविता में बाल गंगाधर तिलक जी के सुघ्घर बखान करे हे-


"है पावन जेकर तिलक नाव,

हम कस न परीं ओकरेच पाँव।"


       ग्रामीण जनजीवन के सउँहत चित्रण उँखर कविता 'हम सुग्घर गाँव बनाबो' में दिखथे। संग मा ग्रामीण परिवेश के साफ-सफाई,वृक्षारोपण, समानता के भाव, पंचायती-राज, खेती-खार के गोठबात सहज, सरल शैली में केहे हे-


"घर कुरिया अउ गली खोर मन ला,

साफ रखत हम जाबो।

हवा-अँजोर निंगे खातिर,

घर-घर खिरकी लगवाबो।"


"बस्ती के बहिरी-भितरी रुख,

राई खूब लगाबो।

नवा ढंग मा खेती करबो,

गजब अन्न उपजाबो।"


   स्वतंत्रता आंदोलन के समय  उपजे वर्गभेद, ऊंच-नीच, छुआछूत जईसन घातक कुरीति मन ला दलित जी अपन कलम ले निशाना साधत हरिजन मन बर मंगलकारी-जन हितकारी सुराज ला सामाजिक समता के अचूक उपाय बताईस-


"गांधी बबा सब्बो झन खातिर,

लाये हवय सुराज।

ओकर प्रिय हरिजन मन ला,

अपनाना परही आज।"


     अपन कविता '15 अगस्त के सुराजी परब' में अमीर-गरीब के बीच वर्ग-संघर्ष ल मार्मिक ढंग के चित्रित करीस कि कईसे स्वतंत्रता के सुराज सिर्फ बड़े मन बर आईस हे, छोटे वर्ग तो आज घलो आर्थिक कमजोरी, बेकारी, गरीबी ले जुझते हवय-


"कइसे सुराजी परब ला मनाई,

नइ हे गा घर मा एकोठन पाई।

पंदरा अगस्ते के होही देवारी,

चमकीही दाऊ के महाल-अटारी।

हमर घर में रहि घुप-अँधियारी,

जरजा गरीबी, तँय मर जा बुजारी।

पोनी अउर तेल,का में बिसाई,

नइ हे गा घर में एकोठन पाई।"


      छत्तीसगढ़ी गीत के राजा ददरिया के राग में 'बापू जी' कविता में गाँधीजी जी के सत्य, अहिंसा, हरिजन उद्धार अउ आजादी बर करे कठिन संघर्ष के बानगी देखे के लईक हवे-


"हमला पढ़ाये अहिनसा के पाठ,

छेरी-बघवा-ला पानी पिलाये एके घाट।"


        कविता 'भारत माता से' सवैया छंद में अंग्रेज मन के गुलामी में जकड़े हमर भारतमाता ला ये कहके भरोसा देवात हवे, कि हमन सब झन मिलके तोला ये फिरंगी मन के मुक्त करा लेबो दाई, अउ वो मन का कइसनो करके इन्हां ले खेदार के ही सांस लेबो-


"अब रो मत भारत माता कभू,

हम बंधन-मुक्त कराबोन तोला।

अंगरेज के संग,करे बर जंग,

करे हन राजी इहाँ के सबो ला।"


         देश के आजादी के लड़ई लड़े बर दलित जी ह गांव के मजदूर और किसानों मन ला जगाके अंग्रेज मन ले दू-दू हाथ करे बर तैयार करे हे-


"आजादी खातिर लड़ना हे,

जागो मजूर जागो किसान।

गोरा-ला खूब कुचरना हे,

जागो मजूर जागो किसान।"


        इंकर संग जवान मन ल घलो आजादी के लड़ई बर चेत करे ल किहिस। आलसीपन ल छोड़व अउ देश बर आघू आवव-


"हे नव भारत के तरुण वीर,

ये भीम,भगीरथ, महावीर।

झन भुला अपन पुरूसारथ बल,

खँडहर मा रच अब रंग महल।"


       आजादी बर किसान, मजदूर, जवान मन ला जगाये के बाद सत्याग्रह करे के तैयारी उँखर 'सत्याग्रह' कविता में दिखत हवे।  गाँधी जी के बात मानके उँखर रद्दा धरबो-


"अब हम सत्याग्रह करबो,

कसो कसौटी-मा अउ देखो।

हम्मन खरा उतरबो,

अब हम सत्याग्रह करबो...."


        लकर-धकर देश के आजादी होय के बाद घलो बैरी- दुश्मन मन पीछू नई छोड़िन। देश के दुश्मन जेमन कश्मीर में घुसपैठ के कोशिश करिन ओमन ला मार भगाये के बात कवि ह 'बंडवा हुंडरा' में केहे हे। अउ घनाक्षरी छंद के माध्यम के चीनी आक्रमण करईया मन ल घलो धमकाईन हे-


"दौड़ो-पकड़ो, मारो खेदारो सँगी हो,

बंडवा हुंडरा-मन हमर देस मां आइन हे।"


"अरे बेसरम चीन! समझे रेहेन तोला,

परोसी के नता-मां अपन बंद-भाई रे।"


         पाकिस्तानी आक्रमण बर वीर सिपाही मन ला जोश दिलाये के काम उँखर 'आव्हान' कविता में हवय। अपन मातृभूमि के रक्षा बर बैरी मन ले लड़े बर बंदूक, बम, तोप, तलवार जइसन हथियार उठाये के अब समय आ गेहे। स्वतंत्रता संग्राम के समय सिपाही के आम जनता ला मारना एकोकनी अच्छा नई लगे, येकर सेती ओहा 'झन मार सिपाही' में बड़ा करूणा भरे शब्द में कथे-


"झन मार सिपाही, हमला झन मार सिपाही।

एक्के महतारी के हम-तैं, पूत आन रे भाई।"


     दलित जी मूलतः गांधीवादी विचार ले प्रेरित कवि रिहिस। उँखर कविताओं में सत्य, अहिंसा के साथ खादी ग्रामोद्योग के बात तको हे, 'फगुवा अउ फगनी के गोठ' में देवारी तिहार म सबो झन बर स्वदेशी खादी भंडार ले खादी के कपड़ा-लत्ता लेय बर केहे हे। 'तकली' कविता में जम्मो झन ला तकली चलावत आलस्य छोड़के कर्मठ बने के सुझाव दिस। 'सूत कातिहौं वो दाई' में लइका अपन महतारी ले चरखा और तकली लेय बर कहत हवय।

 'खादी के टोपी' कविता में आजादी के बाद सबो झन ला खादी के टोपी पहने ल कहत खादी के महिमा अउ खादी ग्रामोद्योग ला बढ़ावा देय के सफल उदिन करे हे-


"पहिनो खादी टोपी भइया!

अब तो तुम्हरे राज हे।

खादी के उज्जर टोपी ये,

गाँधी जी के ताज हे।"


       किसान-मजदूर के भुखमरी बर तो दलित जी हा भगवान ला घलो नई छोड़िस। 'न्यायी भगवान' कविता में गरीब मनके लाचारी, बड़े वर्ग द्वारा शोषण के सेती दलित जी हा भगवान के स्वरूप बर प्रश्नचिह्न घलो लगा दिन। इहि दलित जी के प्रगतिवादी कवि होय के प्रमाण आय-


"धन-धन रे न्यायी भगवान,

कहाँ हवय तोर आँखी-कान।

नइये ककरो सुरता-चेत,

देव आस के भूत-परेत।"


      गुरु के महिमा, भक्ति, त्याग अउ समर्पण के भाव मनखे के जीवन संवर जथे। अपन लोक-परलोक ल सुधारे बर रत्नावली के फटकार हा तुलसीदास जी ला सत के रद्दा धरा दिस। कविता 'तुलसी भगवान तभे पाइस' में गुरु के महिमा ल बतात केहे हवय-



."पहिली सद्गुरु जी चरण धरिस।

ओकर सेवा दिन-रात करिस।

विदया सीखिस, दस-पांच बरिस।

गुरु ग्यान भरिस, अग्यान हरिस।

मन मंदिर में अँजोर लाइस।

तुलसी,भगवान तभे पाइस।"


      दलित जी छत्तीसगढ़ी के संगे-संग हिन्दी के घलो बेजोड़ कवि रिहिन। दूनो भाषा में कवि के समान अधिकार रहय। हिन्दी के देवनागरी लिपि बर उँखर लिखे कविता हिन्दी प्रेम ला स्पष्ट करत हे-


" येकर मान करय सब जनता,

हिन्दी अउर अहिन्दी,

ये जान्हवी बनिस अउ बनगें,

सब भासा कालिन्दी,

बोलंय ये भासा-ला मदरासी,

बंगाली सिंधी,

बनिस रास्ट्रभासा हमार,

हम सबके प्यारी हिन्दी।"


         छत्तीसगढ़ के कण-कण ले परिचित होय के सेती उँखर कविता में छत्तीसगढ़ के हर रंग, रूप, संस्कृति, खान-पान, लोक व्यवहार के दर्शन जरूर होथे। छत्तीसगढ़ के कई ठन भाजी में खेड़ा भाजी प्रसिद्ध हवे। येला जरी भाजी घलो कहिथे। ये हमर शरीर बर कतका उपयोगी हवे, दलित जी बतात हे-


"जो चुचुर-चुचुर के खावे।

तन-बदन मस्त हो जावे।

वो हार कभू न माने।

कखरो से भिड़े अभेड़ा।

ये छत्तीसगढ़ के खेंडा।"


         छत्तीसगढ़ के किसानी जनजीवन ला सबसे ज्यादा छूये के जतन दलित जी हा अपन रचना में करे हे, किसान पुत्र दलित जी स्वयं बालपन ले ही सबो किसानी काम-काज ला नजदीकी से देखत आय हे, तेकर सेती ओकर रचना मन में किसानी जनजीवन के बारीकी ले चित्रण होय हे। 'हम किसान' कविता के पंक्ति में किसानी काम के कतिक सुंदर चित्रण करे हे-


"चल नांगर सरर-सरर,

खेत चीर चरर-चरर,

छिड़के हन बीज-भात,

छरर-छरर, झरर-झरर।"


        किसानी के चार महीना के कठिन परिश्रम के पीछू फसल कटई के समय सबसे ज्यादा आनंददायक होथे। किसान के मेहनत अब बगबग के दिखे ल लगथे। गांव के सभी सँगी-साथी के संग मिलके, ये पुण्य काम के शुरुआत ले आखिरी करथे। धान लुवाई कराये बर अपन-अपन खेत में जादा मनखे जाये के मोह बने रइथे। जेकर ले धान कटई के बुता जल्दी पूरा हो जाये। इहि में लोगन मन के बीच आपसी मनुहार देखते बनथे-


"चल संगवारी,चल संगवारिन,

धान लुए ला जाई।

मातिस धान लुवाई अड़बड़,

मातिस धान लुवाई।"


       फसल कटई के समय मोटियारी अउ नवा बहुरिया के  तैयारी अउ उँखर संगी-सहेली के साथ हँसी-मजाक के दृश्य सजीव हो उठथे। दलित जी के लेखनी के जादू के ये गीत अमर होगे हे-


"पाटी पारे मांग सँवारे,

हँसिया खोंच कमर मा।

जाँय खेत मोटियारी जम्मों,

तारा दे के घर मा।"


"छन्नर-छन्नर पैरी बाजय,

खन्नर-खन्नर चूरी।

हाँसत, कुलकत,मटकत रेंगय,

बेलबेलहीन टूरी।"


       "छन्नर-छन्नर पैरी बाजय" कविता संग्रह में आखिरी कविता के रुप में 'चउमास' का वर्णन मिलथे। चउमास अर्थात बरसात के चार महीना के चित्रण करे गेहे। चारों दिशा में फईले हरियाली हरे-भरे फसल,पेड़-पौधा ला देखके मन प्रफुल्लित हो जथे। ग्रामीण संस्कृति में जइसे-जइसे घटना-घटित होत जाथे, वइसे-वइसे उँखर रूप के चित्रण बड़ सुघ्घर ढंग ले करे हवय-


"घाम दिन गइस, अइस बरखा के दिन।

सनन-सनन चले पवन लहरिया।

छाये रथे अगास-मां चारों खूँट धुँआ साहीं।

बरखा के बादर निच्चट भिम्म करिया।

चमकय बिजली गरजे घन घेरी-बेरी।

बरसे मुसरधार पानी छर-छरिया।

भरगें खाई खोंधरा, कुवाँ, डोली-डांगर 'औ'

टिप-टिप ले भरगें-नदी नरवा तरिया।"



        अईसन ढंग के जनकवि कोदूराम 'दलित' जी के कविता संग्रह "छन्नर-छन्नर पैरी बाजय" में शामिल जम्मो कविता मन में तत्कालीन स्थिति, स्वतंत्रता संग्राम, गांधीवादी विचारधारा, सहकारिता, प्रकृति चित्रण, ग्रामीण जनजीवन, समाज-सुधार, खादी ग्रामोद्योग, सत्य-अहिंसा, किसान-मजदूर के मेहनत उँखर पीरा अउ संघर्ष पुरजोर तरीका के केहे गे हवे। ये संग्रह में वर्तमान समय के स्थिति के घलो चित्रण होय हे। ये कविता संग्रह में कवि के समय के सामाजिक ,राजनीतिक स्थिति, स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणीय वीरों, आंदोलन कारी महिला मन के चित्रण का होना जरूरी लगत रिहिस। तिहंक ले ये कविता संग्रह सराहनीय हवे। आज घलो दलित जी के कविता संग्रह "छन्नर-छन्नर पैरी बाजय" सहृदय सबो वर्ग के पाठक मन बर पठनीय हे। येमें शामिल कविता मन वर्तमान स्थिति में घलो प्रासंगिक हवे।



             हेमलाल सहारे

मोहगाँव(छुरिया)राजनांदगांव

ग्रामीण अर्थशास्त्र मा छत्तीसगढ़ के नारी के भूमिका

 ग्रामीण अर्थशास्त्र मा छत्तीसगढ़  के नारी के भूमिका


छत्तीसगढ महतारी के ये पावन माटी मा हमर ग्रामीण अर्थ्यवस्था ल मज़बूत करे बर नारी मन के महत्पूर्ण योगदान हावय येला समझे खातिर अपन घर के व्यवस्था ल देकथन त  अर्थ व्यवस्था ल सुधारे खातिर नारी मन पुरुष से जादा चितिंत रहिथे गांव के महिला मन के दिनचर्या भिंसरहा साढे चार बजे से शुरू हो जाथे तेंहा रात के दस बजे तक महिला मन के काम बूता ह सिरावय नही सुबह उठ के घर के साफ सफई चाय नाश्ता स्कूल जवाइया लइका मन नाश्ता उकर कपड़ा लत्ता के साफ सफाई मझनिया के भोजन से लेकर रात के बियारी तक के जिम्मेदारी महिला मन के कंधा म हवय एकर बाद खेती किसानी के काम मेहनत मजदूरी के काम म हाथ ब टाथे हमर घर परिवार ग्रामीण अर्थ व्यवस्था म महत्वपूर्ण योगदान हावय जबसे हमर संविधान म डाक्टर बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ह नारी मन ल बराबरी के अधिकार दिए  गए है  हिन्दू कोड बिल के द्वारा नारी ल अनेक संवैधानिक अधिकार दिए गए है हर क्षेत्र म बढ़ चढ़ के महिला मन के हिस्सेदार दिख थे चाहे नौकरी के क्षेत्र म होय रोजगार के क्षेत्र म होय  या राजनीती म होय नारी के ताकत ल सलाम करे ल पड़ही

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के द्वारा महिला उत्थान एवं महिला शस्कती करण के लिए अनेक योजना चलाए जाथे

येमा प्रमुख योजना ग्रामीण योजना चलत हे महिला स्वयं सहायता समूह  ये  बिहान योजना के अन्तर्गत गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करयया परिवार के प्रत्येक एक महिला ल समूह म सदस्य बनाकर जोड़ना ह  समूह के महिला मन ल छोटे छोटे लघु एवं कुटीर उद्योग म जोड़के उकर आर्थीक स्थिती ल मजबूत करना हे ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान से महिला मन कम समय के प्रशिक्षण  देकर रोजगार से जोड़ना हे ताकि उमन आत्मनिर्भर बन सके ऐसे हमर सरकार के मनसा से ग्रामीण महिला मन कौशल विकास योजना दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय Kaushal योजना ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान के माध्यम से निःशुल्क सिलाई कढ़ाई आचार पापड़ मशरूम बनाना ब्यूटी पार्लर जैविक खाद वाशिंग पाउडर फिनायल बनाना ऑटो रिक्शा चलाने का प्रशिक्षण बकरी पालन मछली पालन अगरबत्ती निर्माण कंप्यूटर ट्रेनिंग दिए जा थे

येकर लाभ हमर प्रदेश के महिला मन ले सकथे बैंक के माध्यम से अनेक प्रकार के ऋण सुविधा भी दिए जा थे यकर लाभ लेना चाहिए 

हमर प्रदेश के महिला मन के आर्थिक उत्थान बर समूह के माध्यम से दो लाख से अधिक नारियो को जोड़ने वाली पद्मश्री फूलबासन यादव के नाम आथे जेन्हा महिला मन के आर्थिक उत्थान के लिए संगठन बनाके आत्मनिर्भर बना इच ऐसे नारी शक्ति को प्रणाम। आज वित्तीय समावेशन के अन्तर्गत वित्तीय साक्षरता के जानकारी भी दिए जा थे महिला मन म बचत करे के आदत हो थे आज महिला मन कमजोर नहीं हे आओ हम सब मिलके नारी के सम्मान करी न ओकर उत्साह बढ़ ईन तभे हमर ग्रामीण अर्थ व्यवस्था मजबूत होही

मोहन डहरिया

8319589325

ग्रामीण अर्थशास्त्र म छत्तीसगढ़ के नारी के भूमिका- चित्रा श्रीवास

 ग्रामीण अर्थशास्त्र म छत्तीसगढ़ के नारी के भूमिका- चित्रा श्रीवास



       या देवी सर्वभूतेषु मातृ  रूपेण संस्थिता*।

        *  नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः*।

         अर्थात् महतारी के रूप  मा जो देवी हे तेखर मैं हा बारंबार पयलगी करत हवँ ।दुर्गा शप्तशती के ऊपर देहे श्लोक मा महतारी ला देवी माने गय हे। उही महतारी हा नारी आय जेहा परिवार के धुरी आय ।नारी के बिना परिवार के कल्पना नइ करे जा सके। हमर छत्तीसगढ़ राज के नारी घलौ अपन हर भूमिका ला निभावत हे अउ साथ ही साथ  पढ़ लिख के नौकरी करके  कोनो रोजगार या स्वरोजगार करके इहाँ के अर्थव्यवस्था ला मजबूत करत हे ।ये तो  शहरी या अर्धशहरी नारी के योगदान आय जेला आज के समय मा सब महसूस करत हे फेर हम इहाँ बात ग्रामीण नारी के करत हन की ओखर इहाँ के अर्थव्यवस्था में का योगदान हवे।

                 छत्तीसगढ़ के जादा आबादी गाँव मा बसथे।पहिली जमाना  मा जब गाँव के मनखे के आय के साधन सिर्फ खेती हा रहीस हे तब नारी खेती के काम मा अपन सहयोग देवय।भिनसार ले उठ के घर के जम्मो बुता करके खेत जावय अउ उहाँ पुरुष के कंधा से कंधा मिला के काम करय।गर्मी के दिन मा खेत के कांटा बिनाई,अषाढ़ मा धान बोआई,कई जगह तो खेत जोताई,रोपा लगाई,निंदाई, धान लुआई मिसाई,अउ डोहराई के काम ला करय ।कतको झिन माइलोगन मन सब्जी भाजी लगावय अउ ओला बेचे के बुता घलौ करँय।अभी के समय मा जब खेती के रकबा घटत जावत हे प्रचार प्रसार, जागरूकता, शिक्षा, संचार क्रांति जेमा मोबाइल क्रांति घलौ शामिल हवय के मदद ले गांव के नवा पीढ़ी अपन आय के नवा उदिम तलाशत हे ,गाँव के नारी घलौ नवा रद्दा मा चल पड़े हे।अउ अपन आय के नवा स्रोत  बनावत जावत है जेमा सरकारी योजना मन ओखर सहयोगी बने हावय।

              *स्वसहायता समूह*हा एक अइसन कड़ी आय जेखर ले जुड़ के गाँव के  महिला हा सक्षम ही नइ होवत हे बल्कि आत्मनिर्भर घलौ बनत हे।स्वसहायता समूह मा  10 सें 20महिला मन मिल कर के समूह बनाथे अउ अपन बचत मा से कुछ पइसा ला जमा करत जाथें ।समूह के खाता बैंक मा खुलवाये जाथे जेखर से बैंकिंग के समझ महिला मन मा बनथे।समूह के पइसा ला जरूरत पड़े मा समूह के सदस्य ला न्यूनतम ब्याज दर मा उधारी घलौ देहे जाथे येखर से साहूकार के शोषण से मुक्ति मिलथे।बने ढंग ले समूह हा चलथे ता बैंक हा स्वरोजगार बर लोन देथे जेखर ले समूह के महिला मन मुर्गी पालन ,मछली पालन, दुग्ध उत्पादन जइसे  स्वरोजगार करके अपन आय ला बढ़ावत हे।

             आज गाँव गाँव मा प्राइमरी स्कूल अउ मिडिल स्कूल हवे जेमा लइकन मन ला मंझनिया गरम भोजन देहे बार मध्यान्ह भोजन योजना शासन द्वारा चलाये जावत हे ।ये योजना संचालन के जिम्मेदारी इही समूह मन ला देहे गय हे।आंगनबाड़ी मा घलौ *रेडी टू ईट*,अउ गरम भोजन के दायित्व समूह के माध्यम ले महिला मन निभावत है अउ चार पइसा कमावत हे।गाँव मा राशन दुकान समूह के माध्यम ले चलत हे।

          कोरोना काल मा जब पूरा दुनिया मा हाहाकार मच गइस  ,बड़े बड़े देश के अर्थव्यवस्था चरमरा गइस।भारत से लेके छत्तीसगढ़ मा ये त्रासदी के असर होइस फेर हमर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पैर नई उखड़िस। येखर योगदान इहाँ के नारी ला दिये जाही ता ये अतिशयोक्ति नइ होही।नारी धैर्य से जुटे रहिस वो समूह के माध्यम ले सेनेटाइजर बनाइस अउ बेच के चार पइसा कमाइस ता मास्क बना बेच के अपन आय के साधन बनाइस संगे संग सैकड़ों मास्क फोकट मा बाँट के पुण्य घलौ कमाइस।छत्तीसगढ़ मा 68071स्वसहायता समूह हावय जेमा 8.03लाख महिला मन जुड़े हावयँ।

            गोधन न्याय योजना के तहत समूह के महिला मन गोबर खरीदी करके ओखर कंपोस्ट खाद बना के बेचत हे जेखर से जैविक खेती ला बढ़ावा मिलही।

         कौशल केंद्र से सिलाई सीख के महिला अपन घर के कपड़ा सील केअपन सिलाई के पइसा बचावत हे ता दूसर के कपड़ा सील के चार पइसा कमावत भी हे।येखर अलावा समूह के माध्यम ले मिल जुल के नारी शासन के मुफ्त गणवेश योजना के गणवेश बनाथेअगरबत्ती,अथान,पापड़,बड़ी,बिजौरी

बना के ओला बेच के आय करथे।

             महिला बाल विकास विभाग के अनुसार स्वसहायता समूह के सालाना टर्न ओवर 60 करोड़ रुपया हे।येखर से ये निष्कर्ष निकलथे कि गाँव के महिला मन के आय मा लगातार बढ़ोतरी होवत जावत हे ।मोर पास आँकड़ा नइ होय के कारण निश्चित तो नइ कहे सकवँ पर ये संभावना हे कि ग्रामीण पुरूष के अपेक्षा ग्रामीण महिला के वार्षिक आमदनी जादा हो सकत हे।

                 ये तरह से देखे जाय  तो अपन स्थापना के बहुत  कम समय मात्र 22साल मा छत्तीसगढ़ हा विकास के रफ्तार मा आघू बढ़त हे अउ अपन संग मा अस्तित्व मा आये दुनो राज्य उत्तराखंड अउ झारखंड ले जादा उन्नत अउ सशक्त नजर आवत हे।राज्य के मजबूत अर्थव्यवस्था मा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मजबूती के विशेष योगदान हावय।ता ग्रामीण अर्थव्यवस्था   मा ग्रामीण महिला के विशेष और सराहनीय योगदान हवे।

                              

                           चित्रा श्रीवास

                         बिलासपुर छत्तीसगढ़

30 सितम्बर जयंती म सुरता// हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के अमर रचनाकार पद्मश्री मुकुटधर जी पाण्डेय


 

30 सितम्बर जयंती म सुरता//

हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के अमर रचनाकार पद्मश्री मुकुटधर जी पाण्डेय

    भीड़ ले अलग हट के कुछ मौलिक अउ आरुग अंतस के गोठ लिखने वाला साहित्यकार ल एती-तेती के गाड़ा-गाड़ा रचना लिख के खरही गाँजे के जरूरत नइ परय. वो वतकेच म ही अमर अउ कालजयी रचनाकार हो जाथे.

    जांजगीर-चांपा जिला (अब सक्ती) के गाँव बालपुर म 30 सितम्बर 1895 म महतारी देवहुती देवी अउ सियान पं. चिंतामणि जी के घर जनमे पद्मश्री पं. मुकुटधर पाण्डेय जी अइसने साहित्यकार रिहिन हें, जेन मन दू-चार रचना म ही साहित्य जगत म अमर हो गय हें. एकर खातिर 'सरस्वती' के संपादक रहे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के वो पाती उंकर बर रस्ता देखाए के बुता करे रिहिसे, जेमा लिखाय रिहिसे- 'आप साल भर म तीन रचना ही भेजे करौ. उंकर सीख रिहिसे के, कम लिखौ फेर पोठ लिखौ. अच्छा लिखे म रचनाकार दू-चार रचना म ही अमर हो जाथे. जबकि जादा लिखे म घलो लोगन उनला चालीस-पचास बछर म बिसर डारथें.' आचार्य द्विवेदी जी के ए पाती ह मुकुटधर पाण्डेय जी खातिर गुरु मंत्र साबित होए रिहिसे.

    मोला पं. मुकुटधर पाण्डेय जी के दर्शन अउ घंटा भर बइठ के उंकर संग मुंहाचाही करे के सौभाग्य तब मिले रिहिसे, जब हमन सन् 1988 के दिसंबर महीना म 'छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य प्रचार समिति' के प्रदेश स्तरीय जलसा रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म करवाए रेहेन. 

    असल म ए जलसा म छत्तीसगढ़ी के सियान साहित्यकार मन के सम्मान घलो होना रिहिसे, जेमा मुकुटधर पाण्डेय जी के नॉंव घलो शामिल रिहिसे, फेर उन स्वास्थ्य गत कारण के सेती रायपुर नइ आ पाए रिहिन हें. तब हमन डाॅ. व्यास नारायण दुबे जी, जागेश्वर प्रसाद जी अउ मैं, हम तीनों रायगढ़ जाके उंकर घर म ही समिति के डहार ले सम्मान करे रेहेन. ए कारज म डाॅ. बलदेव साव के संगे-संग रायगढ़ के अउ साहित्यकार मन के अच्छा सहयोग मिले रिहिसे. ए बेरा म श्रद्धेय पाण्डेय जी ह रायपुर ले गए हम तीनों झनला महाकवि कालिदास के अमरकृति 'मेघदूतम्' के छत्तीसगढ़ी अनुवाद के प्रति ल अपन हस्ताक्षर कर के दिए रिहिन हें. उही छत्तीसगढ़ी कृति के माध्यम ले ही मैं 'मेघदूत' ल पढ़ पाए रेहेंव, अउ वोकर ले प्रभावित होके छत्तीसगढ़ी म एक गीत लिखे रेहेंव-

अरे कालिदास के सोरिहा बादर, कहाँ जाथस संदेशा लेके

हमरो गाँव म धान बोवागे, नंगत बरस तैं इहाँ बिलम के

थोरिक बिलम जाबे त का यक्ष के सुवारी रिसा जाही

ते तोर सोरिहा के चोला म कोनो किसम के दागी लगही

तोला पठोवत बेर चेताय हे, जोते भुइयाॅं म बरसबे कहिके

अरे कालिदास के सोरिहा बादर...


    छत्तीसगढ़ी मेघदूत के  भाषा ल पढ़ के अइसे नइ जनावय, के ए ह अनुवाद आय. वोला पढ़े म अइसे जनाथे, के एहि ह मूल प्रति आय. देखव छत्तीसगढ़ी मेघदूत के दू डांड़-

बता मित्र के काम करे बर तैं हर मन म ठाने? 

उत्तर देबे तभे तोर स्वीकृति का जाही जाने? 

बिन गरजे याचक चातक ला देथस तैं जल, जलधर, 

काम कर दिहिन जन के पूरा, यही सुजन के उत्तर..

 

    मुकुटधर पाण्डेय जी ल छायावाद के प्रवर्तक के रूप म जेन कविता 'कुररी के प्रति' ह स्थापित करिस, वो ह जुलाई 1920 के 'सरस्वती' के अंक म छपे रिहिसे-

बता मुझे, हे विहग विदेशी, अपने जी की बात.

पिछड़ा था तू कहाँ, आ रहा जो कर इतनी रात? 

निद्रा में जा पड़े कभी के, ग्राम्य मनुज स्वच्छंद.

अन्य विहग भी निज खेतों में सोते हैं सानंद.

इस नीरव घटिका में उड़ता है तू चित्रित गात.

पिछड़ा था तू कहाँ, हुई क्यों तुझको इतनी रात? 

    मुकुटधर पाण्डेय जी बतावंय के वोमन 'कुररी' ऊपर तीन कविता लिखे रहिन हें. शायद उंकर दूसर रचना 1917 म छपे रिहिसे-

सच पूछो तो तुममे मुझमे भेद नहीं कुछ भारी

मैं हूँ थल चारी तो तू है विस्तृत व्योम विहारी

    तीसर रचना शायद 1939 म लिखे गे रिहिसे-


सुना, स्वर्ण मय भूमि वहाँ की मणिमय है आकाश

वहाँ न तम का नाम, कहीं है रहता सदा प्रकाश


     मुकुटधर पाण्डेय जी रामायण के उत्तरा कांड ल घलो छत्तीसगढ़ी ल लिखे रिहिन हें. वोकर एक झलक देखौ-

अब तो करम के रहिस एक दिन बाकी

कब देखन पाबो राम लला के झांकी


हे भाल पांच में परिन सवेच नर नारी

देहे दुबराइस राम विरह मा भारी


दोहा - सगुन होय सुन्दर सकल सबके मन आनंद।

पुर सोभा जइसे कहे, आवत रघुकुल चंद॥


महतारी मन ला लग, अब पूरिस मन काम

कोनो अव कहतेव हवे, आवत्त वन ले राम


जेवनी आंखी औ भूजा, फरके बारंबार

भरत सगुन ला जनके मन मा करे विचार


अब तो करार के रहिस एक दिन बाकी

दुख भइस सोच हिरदे मंचल राम टांकी


कइसे का कारण भइस राम नई आईन

का जान पाखंडी मोला प्रभु बिसराईन


धन धन तैं लक्ष्मिन तैं हर अस बड़भागी

श्रीरामचंद्र के चरन कवल अनुरागी


चिन्हिन अड़बड़ कपटी पाखंडी चोला

ते कारन अपन संग नई लेईन मोला


करनी ला मोर कभू मन मा प्रभू धरही

तो कलप कलप के दास कभू नई तरही


जन के अवगुन ला कभू चित नई लावै

बड़ दयावंत प्रभु दीन दयाल कहावै


जी मा अब मोर भरोसा एकोच आवै

झट मिलहि राम सगुन सुभ मोला जनावै

 

बीते करार घर मा परान रह जाही

पापी ना मोर कस देखे मा कहूं आही


दोहा

राम विरह के सिन्धु मा, भरत मगन मत होत।

विप्र रूप धर पवन सुत, पहुंचिन जइसे पोत॥


    हर मनखे ल अपन माटी, अपन भाषा अउ संस्कृति खातिर गजब मया होथे. वो एकर बखान ल कोनो न कोनो रूप म जरूर करथे. तब छत्तीसगढ़ राज एक स्वतंत्र राज के चिन्हारी पा जाही या नइ पाही, तेकर कोनो भरोसा नइ रिहिसे. तभो ले इहाँ के गुनी साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ के एक स्वतंत्र अस्तित्व के कल्पना करत ओकर जोहार-पैलगी अउ वंदन जरूर करीन. मुकुटधर पाण्डेय जी के 'प्रशस्ति' शीर्षक ले लिखे ए रचना ल देखौ-

सरगुजा के रामगिरि ह मस्तक-मुकुट संवारे.

महानदी ह निरमल जल मा जेकर चरन पखारे.. 

राजिम अउ शिवरीनारायन क्षेत्र जहाँ छवि पावै.

ओ छत्तीसगढ़ के महिमा ला भला कवन कवि गावै? 

हैहयवंशी राजा मन के रतनपुर रजधानी.

गाइस कवि गोपाल 'राम परताप' सुअमरित बानी.. 

जहाँ वीर गोपालराय का करो करय नइ संका.

जेकर नांव के जग जाहिर दिल्ली म बाजिस डंका.. 

मंदिर, देउर डहर-डहर आजो ले खड़े निसानी.

कारीगरी गजब के जेमा, मुरती आनी-बानी.. 

ये पथरा के लिखा, ताम के पट्टा अउ शिवाला.

दान-धरम अउ बल-विकरम के देवत हवै हवाला..


    आचार्य द्विवेदी जी के बताए गुरुमंत्र ल धरे उन वाजिब म कम ही लिखिन, फेर गजब पोठ अउ अंतस ल छूने वाला साहित्य रचिन. उंकर प्रमुख लेखन म- पूजा फूल, लच्छमा अनूदित उपन्यास, हृदय दान कहानी, परिश्रम निबंध संग्रह, शैलबाला अनूदित उपन्यास, मामा अनूदित उपन्यास, छायावाद एवं अन्य निबंध, स्मृति पुंज, मेघदूत के छत्तीसगढ़ी अनुवाद, विश्वबोध काव्य संकलन आदि प्रमुख हे. एकर संगे-संग उंकर व्यक्तित्व-कृतित्व ले संबंधित अउ कतकों किताब प्रकाशन के अगोरा म हे. 


    मुकुटधर पाण्डेय जी के तीन किताब - पूजा फूल (काव्य संग्रह) अउ उड़िया ले अनुदित उपन्यास 'शैलबाला', अउ 'लच्छमा' के लेखक पं. मुकुटधर शर्मा (पाण्डेय) के संगे-संग उंकर बड़े भाई मुरलीधर शर्मा (पाण्डेय) घलो हे. रायगढ़ के साहित्यकार बसंत राघव (सुपुत्र डाॅ. बलदेव साव) ए बात ल प्रमाण सहित कहिन हें.


    मोर सौभाग्य आय मोर पहला कविता संकलन 'छितका कुरिया' खातिर वोमन छत्तीसगढ़ी म अपन शुभकामना संदेश दिए रिहिन हें, अउ कहे रिहिन हें- मैं अपन जिनगी म पहिली बेर ककरो खातिर छत्तीसगढ़ी म संदेश लिखे हौं. उंकर ए संदेश के पांडुलिपि ल तब मैं ब्लाक बनवा के अपन संग्रह म छपवाए रेहेंव. आज घलो उंकर वो पाती ह मोर बर धरोहर बने हुए हे.


    6 नवंबर 1989 के 94 बछर के उमर म वोमन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लेइन. उंकर सुरता ल पैलगी- जोहार🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


ग्रामीण अर्थशास्त्र मा छत्तीसगढ़ के नारी के भूमिका-हेमलाल सहारे

 ग्रामीण अर्थशास्त्र मा छत्तीसगढ़ के नारी के भूमिका-हेमलाल सहारे


    हमर छत्तीसगढ़ मा सबले जादा खेती-किसानी के बुता होथे। अउ खेती-किसानी के करईया मन घलो जादा हे। छत्तीसगढ़ के सबो अर्थव्यवस्था हा खेती-किसानी मा ही टिके हवय। मने ग्रामीण अर्थशास्त्र मा खेती-किसानी के महत्व सबले बढ़के हवय। ग्रामीण अर्थशास्त्र ला सजोर बनाके रखे हवय, इंहा के नारी मन हा। इंकर बिना पुरूष मन कोई अर्थ वाले बुता ला कर नई सकय। हमर छत्तीसगढ़ ला 'धान के कटोरा' कथे तेहा इंकरे मेहनत, लगन, चेत के परिणाम आय। भले पुरूष मन कतको कूद-कूद के कहय।


      सामान्य रूप मा अर्थशास्त्र के बारे मा केहे जाथे कि वस्तु अउ सेवा के उत्पादन, वितरण, विनिमय अउ उपभोग के अध्ययन हरे। मने धन के बारे मा अध्ययन।   येमें हमर छत्तीसगढ़ के महतारी, बहिनी मन पूरा खरे उतरे हवय। हमर ग्रामीण क्षेत्र मा धन के उत्पादन, वितरण, विनिमय अउ उपभोग करके अपन अउ अपन परिवार के आर्थिक स्थिति ला मजबूत करे में बड़का योगदान हवय। ग्रामीण अर्थशास्त्र के धुरी छत्तीसगढ़ के नारी मन हवय येमा कोई अतिश्योक्ति नई होही।


      छत्तीसगढ़ के नारी मन बिहने ले उठके जम्मो बुता ला करथे, पुरुष मन के उठे के पहली रांध-गढ़के सुभीता हो जाय रथे। पढ़ईया लोग-लइका ला बिहनिया के नहवा-खोरा, खवा-पिया के तैयार करके अपन खेती-किसानी नहिते अउ दूसर काम बर खुद तैयार होके समय मा निकल जथे। अतिक बुता हा केहे मा एककनी लगथे फेर करईया मन ही जानही, कि ओमन कतिक जल्दी-जल्दी सबो काम-बुता ला समय मा कर डारथे। फेर शुरू होथे अर्थशास्त्र के सबो कोना मा जाके, घर के आर्थिक पक्ष ला मजबूत करे के उँखर सबले बड़े योगदान हा।


    किसानी के दिन-बादर ले शुरू करथन ल देखे ल मिलथे कि खेत के डीपरा मन ल खन के बरोबर करना, गड्डा मन ल माटी में भरना, कांटा-खूंटी ल बाहर के जलाना, कांद-दूबी ला निकालना अउ खातू बगराना। फेर धान बोय बर खेत अब तैयार होथे। अतिक बुता हा सिर्फ नारी मन के बस के हवे, कोई पुरुष मन अईसन काम ला नई करे ला धरे। करत होही उँखर संख्या नहीं के बतौर हे। अतिक बुता मा कतिक पैसा बांच जथे, ये नारी मन ही जानही। अभी टेक्टर के आये के नारी मन के नांगर धरई कम होईस हे, नहिते यहु बुता ला पुरूष के बरोबर करत रिहिसे। फेर निंदई के बेरा तो पुरुष मन मोला नींदे ल नई आवय कहिके, मुही पार ल देख के अपन पाप ल काटते। धान के संगे-संग कतको फसल के कतई में नारी मन नई जाही ते कामे नई होवय। सबो बोहा जाही। धान निंदई अउ फसल के कटई में सबके जादा नारी मन के योगदान रइथे। 


    चार महिना के खेती-किसानी के बाद दूसर काम मा घलो पैसा कमाये अउ बचाये के उदिम मा लगे रइथे। कई झन नारी मन कपड़ा सिलाई अउ कढ़ाई के बुता सीखे रइथे, ओमन हर देवारी, मेला-मड़ई, बर-बिहाव के आत ले कपड़ा सिलाई-कढ़ाई के काम मा रम जाथे अउ बनेच पैसा कमा लेथे। कई झन दीदी मन अचार, मुरब्बा, कैंडी बनाये के बुता करथे अउ बेचथे। घर के साग-भाजी के पैसा बचाये बर रखिया, तुमा, मुरई के बरी, सेमी, भांटा, आलू के खुला अउ पापड़, मुरकु घलो बनाये के काम करथे। ग्रामीण क्षेत्र मा कतको भाजी मन के खुला करके रखे रहिथे, येहा अर्थव्यवस्था के समय-समय मे संतुलन के काम आथे। घर के सियान एक हप्ता बाजार नई जाही तभो ले घर मा साग चुरही। काबर कि नारी महतारी मन पहली ले व्यवस्था करके रखे हवय। 


        अब तो गाँव-गाँव मा नल लगत हवे। नल के पानी के कइसे उपयोग करना हे, वोला घर के महिला मन बढ़िया जानथे। नल के पानी भरे के बाद बखरी मा बनाये अपन नान्हे सब्जी-बाड़ी में पानी देवत रथे। अउ अपन रसोई बर धनिया, मेथी, मुरई, लाल भाजी, पालक भाजी, चेंच भाजी,पटवा भाजी, बंगाला, मिर्ची लगाए रथे। इहि बाड़ी के सब्जी हर कई बाजार के पैसा ला बचा डारथे।


      अर्थशास्त्र के विनिमय के अंतर्गत गाँव मा आज घलो चना के बदला रहेर, लाखड़ी के बदला गेहूँ, उरीद के बदला मूंग, तीली के बदला कुल्थी, पतला हरुना धान के बदला पतला माई धान, कुम्हड़ा के बदला कांदा, कोचई के बदला जिमी कांदा, मीठा आमा के बदला चटनी वाले आमा अउ काम बुता बर घलो धान लुवईया के बदला भारा बँधईया जइसे काम नारी मन के सेती होवत रथे। येकर ले एक दूसर के सहयोग तो होथेच जरूरी चीज मन घलो आ जथे। जेकर ले अर्थशास्त्र बने रथे।


      गरमी के दिन मा जंगल के वनोपज मन के आये के बेरा हो जथे। वनोपज के संग्रह मा घलो नारी मन ही प्रमुख रूप के भीड़े रहिथे। हर्रा, बेहरा, आँवला, करण, नीम, कुसुम, परसा फूल-बीजा, धंवई फूल, तेंदू पत्ता-फर, चार-चिरौंजी, पेम फर, महुआ, गुल्ली, आमा, परसा लाख, अमली बीजा, चिरई जाम सकेले बर लगे रथे अउ बाजार मा बेच के घर के जरूरी चीज मन ला लेथे। गाँव के अर्थशास्त्र अईसने काम म अब्बड़ मजबूत रथे। येमन सब बिना पैसा के सिर्फ चिभिक लगा कि कमाये ले मिलथे। अउ अईसन काम मा नारी मन पीछू नई हे।


        वनोपज के संगे-संग सरकारी काम-काज मा घलो अघवाय रहिथे। रोजगार गारंटी योजना के काम, सड़क काम, नवा बिल्डिंग काम, पुल-पुलिया के काम, वन-विभाग के काम, मंडी के काम मा घलो नारी मन के प्रमुख भूमिका रथे। इंकर काम ले मिले पैसा ले अपन घर के जरूरत के समान लेके परिवार के आर्थिक सहयोग करत रथे।


      आज तो जतिक स्कूल हावे, ओतिक में अधिकतर महिला समूह वाले दीदी मन मध्यान्ह भोजन के संचालन करत हवे, अउ लाभ कमावत हे। स्कूल के अधिकतर रसोइया मन नारी मन हवे। गाँव मा कई ठन समूह वाले काम चलत हवे। अगरबत्ती बनाना, कपड़ा बुनना, रेडी-टू-ईट फूड, पतरी-दोना बनाना, गोठान में गोबर लेना, सब्जी फॉर्म, वर्मी कम्पोस्ट खातू बनाना जइसे काम करत अपन घर के खर्चा चलावत हवे। ये काम मा नारी मन के ही प्रमुख योगदान हवे।


     अब तो कहनचो के बाजार रहय, महतारी-दाई मन पुरुष मन के बरोबरी करत पसरा लगाए साग-भाजी बेचत रथे। सब्जी के फॉर्म ले बाजार तक उँखर पहुँच होगे हे। छोटे गाँव अउ कस्बा ले-लेके बड़े शहर के हरेक दुकान मा हमर बहिनी मन सामान लेत-देत देखे जावत हे। मने अब आधा बाजार में नारी मन के जगह बन गेहे। अईसने सरकारी कार्यालय मा घलो चपरासी, रोजगार सहायक, सचिव, पटवारी, पुलिस, बैंक, स्कूल, रेलवे, पोस्ट ऑफिस ले-लेके कलेक्टर तक नारी मन काम करत छत्तीसगढ़ के अर्थशास्त्र मा अपन भूमिका निभावत हे।


       कुल मिलाके कहन ता हमर छत्तीसगढ़ राज ल आर्थिक रूप मा आघू बढ़ाये बर, अपन घर-परिवार के स्थिति ला मजबूत करे बर छत्तीसगढ़ के नारी मन के सबले जादा योगदान हवे। इंकरे मेहनत, लगन अउ अपन-आप ल आर्थिक रूप मा सबल बनाये के उदिम हरे कि हमर छत्तीसगढ़ राज अब विकास के रद्दा मा आघू डाहर रेंगत हे।


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।


हमर छत्तीसगढ़ के नारी मन के जय हो...🙏



        हेमलाल सहारे

1 अक्टूबर : सियान मनला जोहार पैलगी कर आशीष पाए के दिन..

 1 अक्टूबर : सियान मनला जोहार पैलगी कर आशीष पाए के दिन.. 

    वइसे तो सियान मन के जोहार पैलगी रोजेच करना चाही, फेर उंकर मन खातिर हमर मन म लुकाय श्रद्धा अउ सम्मान के भाव ल व्यक्त करे खातिर, उंकर मन खातिर हमर चिंता फिकर अउ कर्तव्य ल उजागर करे खातिर घलो एक दिन निश्चित करे गे हवय, अउ वो तिथि आय 1 अक्टूबर के दिन, जेला अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिन या अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस कहिथन. हमर मयारुक भाखा म कहिन त 'सियान जोहार दिवस'.

    अंतर्राष्ट्रीय सियान दिवस मनाए के शुरुआत सन् 1990 म होए हे. दुनिया के सियान मन संग होवइया दुर्व्यवहार अउ अन्याय ल रोके खातिर लोगन ल एकर खातिर जागरूक करे खातिर 14 दिसंबर 1990 के ए फैसला करे गिस. तब ए फैसला लिए गिस, हर बछर 1 अक्टूबर ल अंतर्राष्ट्रीय सियान दिवस के रूप म मनाए जाही. 1 अक्टूबर 1991 के पहिली बेर सियान दिवस मनाए गिस, जेन अब सरलग हर बछर मनाए जावत हे.   

    एकर पहिली घलो सियान मन खातिर चिंता जतावत उंकर मन खातिर अइसन उदिम करे गे रिहिसे. सन् 1982 म विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 'वृद्धावस्था ल सुखी बनावव' नारा देके 'सबो खातिर स्वास्थ्य' अभियान चलाए गे रिहिसे. एकर बाद संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1991 म अंतर्राष्ट्रीय सियान दिवस के शुरुआत करे के पाछू 1999 ल 'अंतर्राष्ट्रीय सियान बछर' के रूप म मनाए गे रिहिसे.

    ए दिन ल चुकता सियान मन खातिर समर्पित करे गे हवय. उंकर मन खातिर वृद्धाश्रम जइसन जगा मन म घलो कतकों किसम के आयोजन करके उंकर सम्मान अउ खुशी के बने चेत करे जाथे. खास करके उंकर मन खातिर सुविधा अउ उंकर समस्या ऊपर विचार करे जाथे. उंकर मनके स्वास्थ्य खातिर गजबेच चेत करे जाथे.

    सियान मन हमर मन बर साक्षात देवता स्वरूप होथें. उंकर अनुभव के खजाना हमर मन बर सिरिफ एक किताब नहीं, भलुक पूरा के पूरा पुस्तकालय होथे. उंकर मनके आशीर्वाद ले हमर मन के पालन पोषण अउ बढ़ोत्तरी होय रहिथे. तब तो उंकर मन खातिर सम्मान अउ मया होना स्वाभाविक होथे. फेर एकरो ले जादा महत्वपूर्ण होथे, वो अवस्था म उंकर मन संग रहना, जब उन अक्षम अउ असहाय होथें. आज लकर-धकर के बेरा म अइसन सरलग रह पाना संभव नइए, तभो अइसन एक दिन ल तो उनला पूरा के पूरा समर्पित करना च चाही. काबर ते उनला ए उमर म तुंहर मया दुलार के छोड़ अउ तो कुछु च नइ चाही.

    त आवव, हम अपन सियान मन के सम्मान करन, उनला मया देवन अउ उंकर ले आशीष के खजाना पावन.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811