Sunday, 19 February 2023

मुँहु चिक्कन खबड़ा के

 मुँहु चिक्कन खबड़ा के 

                    भगवान कृष्ण के दुनिया ले विदा लेहे के सूचना चारों मुड़ा म जंगल म लगे आगी कस बगरगे ।  एला सुन ... गोकुल के जुन्ना संगवारी मन लकर धकर द्वारका कोति मसक दिन । भगवान हा ओमन ला देखिस त ओकर आँखी म आँसू आ गिस । भगवान हा केहे लगिस – तूमन ला मेहा कोन्हो सुख नइ देय पायेंव । अब तो जाय के बेर आगे हे ... अवइया युग म मिलबो त तुँहरों मन बर कुछ अच्छा करहूँ । ग्वाल सखा मन केहे लगिस – तोर दिये आशीष अभू तक चलत हे भगवान फेर तोर जाय के पाछू ... को जनि ओकर प्रभाव रइहि या सिरा जहि तेमा शंका हे .. तेकर सेती हमू मन अभू चल देबो । फेर आगू जनम म हमन मिलबो तेकर गारंटी देय बर लागही भगवान ।  तुँहर कृपा ले हमन ला अइसने खाय बर मिलत रहय तहू ला सुनिश्चित  करे बर लागही भगवान । 

                    भगवान किथे – तुम फिकर झन करव । तूमन ला खाय पिये बर लाला थापा  करे बर नइ लागय । तुमला खाय बर भरपूर मिलही । ग्वाला मन किथे – एक बात अऊ हे भगवान ... पूरा युग निकलगे हमन ला सत्ता के बागडोर नइ मिलिस । हमन तरस गेन । का अवइया युग म घला अइसने रहिबो अऊ खाये बर तुँहर मुँहु ताकबो ... । भगवान थोकिन सोंच म परगे अऊ केहे लगिस – तूमन मोर बहुत संग साथ दे हव .. तुँहर भारी उपकार हे मोर उपर ... तेकर सेती ब्रम्हाजी ला कहि देथँव ... ओहा अवइया युग म बाजी पलट दिही । तुँहर उपर मय आश्रित रइहूँ ... तुँहर ले बाँच जहि तभे मोला मिलहि । 

                    ग्वाला मन किथे – हमन राजा होके खाबो तहन हमन ला .... सब खावथे खावथे कहिके बदनाम करहि । तिंहीं केहे बर धर लेबे । भगवान किथे – तुँहरे संगवारी तुँही मनला बदनाम करही । तुम ओमन ला साध लेना । मे राम राम नइ कहँव ... मोर वचन हे  ।  तूमन अभू घला खाथव तेकर कोन्हो प्रमाण रहिथे का । अरे भई ... उहू समय ... सरबस खाके मोर मुँहु म चुपर देहु ... सब अभू कस  ... मुही ला खाये हे समझही ... । चाहे कतको खावव ... तुँहर मुँहु एक कनिक नइ छड़बड़ाय ... चिक्कन रहि । भगवान सब ला भरोसा देवा के चल दिस ।

                    कलयुग आ चुके रहय । सबके अगले इनिंग के तैयारी होवत रहय । ब्रम्हाजी हा भगवान कृष्ण के दिये वचन ला पूरा करे बर उपाय खोजत पस्त हो चुके रहय । ब्रम्हाजी के माथ म पछीना के धार बोहावत रहय । ओकर स्टेनो चित्रगुप्त किथे – का होगे भगवान ... भारी फिकर म बुड़े हस । सियनहा एकदमेच थकथकागे रहय । ओकर गमछा हा पछीना पोंछत निचोड़े लइक होगे रहय । चित्रगुप्त समझगे । ओला हार्ट अटेक फटेक झन आ जाय सोंच तुरते कारण खोज ... निवारण के उपाय रच डरिस । जम्मो झन ला भारत म जनम ले के व्यवस्था कर दिस ।  

                    कुछ दिन पाछू ... भगवान हा अपन दिये वचन के पालन सही साट होवत हे के निही ... तेकर सचाई जाने बर निकलिस । इहाँ अइस तब सत्यता जानिस । चित्रगुप्त हा जनता ला भगवान बना दे रिहिस । जेला खाय बर नइ मिलय फेर  ओकरे मुहुँ म जे पाये तेहा कुछु कहीं ला चुपर देथे । ग्वाल सखा मन देश म कर्णधार बन चुके रिहिस ... जेमन खावय तो बहुत फेर दिखय निही । भगवान पूछिस – मोला समझ नइ आवत हे  चित्रगुप्त । चित्रगुप्त बतइस – इहाँ लोकतंत्र के स्थापना कर दे हँव भगवान ... जेला समझ सकना तोर बस के बात नइहे ... तेकरे सेती तोला जनता के रूप दे देंव । जे मन समझ गिन तेमन ला कर्णधार बना देंव । तुँहरे दिये वचन के पालन होवत हे भगवान । भगवान ला बड़े बड़े पेट धरे कुछ बिगन खाये मनखे दिखगे ... जेमन खाये बर मरत रहय ... । भगवान पूछिस – येकर मन के पेट तो बड़े दिखत हे फेर येमन कभू खाय नइहे तइसे ... पोट पोट करत हे । चित्रगुप्त बतइस – इँकर धोंध भर चुके हे फेर खाय के इच्छा शक्ति कमतियावत नइहे तेकर सेती पोट पोट करत दिखत हे ... वाजिम म येमन खाये बर पोट पोट नइ करत हे भगवान ... बल्कि जनता के मुहुँ म खाये के सामान चुपरे के अवसर पाय बर पोट पोट करत हे । भगवान किहिस – फेर कलेचुप खवइया मन तो बिगन हुँके भुँके आराम से बइठे दिखत हे ... येमा का राज हे । चित्रगुप्त बतइस – वास्तव म इही मन सरकार आय ... अऊ पोट पोट करइया मन विपक्ष ... । भगवान पूछिस – मोर एक आखरी सवाल अऊ हे चित्रगुप्त .. येमन खाथे कहिथस ... त खाये के निशान तो एको कनिक नइ दिखत हे । चित्रगुप्त किहिस – तैं भुलागे हस भगवान । सब तोरे वचन के पालन करे के उदिम आय भगवान । जे जतका खाही ... ओतके ओकर मुँहु चिक्कन रइहि । 

                    भगवान भुखाये हाबे कहिके चारों मुड़ा म हल्ला माते रहय । ओला खवाये के होड़ लगे के ढिंढोरा पिटागे । खाये के सरी सामान जनता भगवान के आघू म आके माढ़गे । फेर ओला कोन्हो खाये बर नइ दिन ...  । ओकर हाथ म झुनझुना धरा दिन । जनता भगवान हा झुनझुना हलावत बइठे रहिगे । खाये के सरी सामान ... अपने अपन सिरागे ।  जनता  के मुँहु म खाये के सामान म छबड़ दिन ।  बिगन खाये जनता के मुँहु छबड़ाये  देख ... भगवान तिर पछताये के अलावा कुछ नइ बाँचिस । 

                    सरग पहुँचके ....  भगवान हा चित्रगुप्त ला तलब करिस । मोला तैं मारे के बनेच उदिम जमा डरे हस चित्रगुप्त । दू चार दिन धरती म अऊ रहि जतेंव ते भूख के मारे मर जतेंव । चित्रगुप्त किथे – तेकर सेती तो जनता बना के तोला राखे हँव ताकि तोला जादा दिन रेहे बर झन परय । ओकर जुम्मेवार घला तिंही तास । काँही जानस न सुनस ... जइसे पाय तइसे वचन देके लहुँट जथस । पालन करे बर  कतका उपाय करे बर लागथे तेला हमीं मन जानबो । भगवान किथे – ओ तो ठीक हे चित्रगुप्त ...  फेर मोला तोर संरचना म एक बात समझ नइ अइस । कोन्हो खावत दिखय निही तभो ले ... खाय के सामान हा अपने अपन कइसे सिरा जात रिहिस । चित्रगुप्त बतइस –  तोला के बेर उही उही बात ला बताहूँ ... अभू उहाँ लोकतंत्र हे भगवान । उहाँ  राज चलइया मन खुर्सी म बइठथे । उही खुर्सी म अइसे यंत्र फिट करदे हाँबो भगवान ... जेमा बइठे के पाछू कतको खा ...  दिखबे नइ करय । सामान सिरा जथे फेर खुर्सी म बइठइया हा खइस तेला प्रमाणित करना सम्भव नइ रहय । खुर्सी ले उतरे के पाछू ... कतका खइस ... तेहा दिखथे जरूर फेर प्रमाणित नइ होय सकय ...  । भगवान हा प्रश्नवाचक मुँहु बनाके देखिस । चित्रगुप्त समझगे के भगवान काये पूछना चाहत हे । ओहा बताये लगिस – मुँहु चिक्कन खबड़ा के ... तोरे वचन के पालन करे बर नियम बनगे  भगवान ... । भगवान हा उही दिन ले कोन्हो भी मनखे ला वचन नइ देय के कसम खा डरिस ।           

हरिशंकर गजानंद देवांगन .. छुरा .

सुरता - श्री रघुवीर अग्रवाल "पथिक"


 

*सुरता - श्री रघुवीर अग्रवाल "पथिक"* 


पथिक जी के जनम जन्म 4 अगस्त 1937 के ग्राम मोहबट्टा मा होइस। इनकर पिताजी के नाम नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, माता जी के नाम अरुंधति देवी अग्रवाल अउ धर्मपत्नी के नाम निरूपण अग्रवाल हे।

 पथिक जी हिंदी और अर्थशास्त्र मा एम. ए. करे रहिन। उन मन  "साहित्य रत्न" के परीक्षा घलो पास करे रहिन। 

बी.एड. करे के बाद दुर्ग अउ विद्यालय मा अध्यापन के कार्य करिन। अगस्त 1995 मा बीएसपी कन्या उच्चतर माध्यमिक शाला सेक्टर 2 भिलाई ले वरिष्ठ उप प्राचार्य के रूप में सेवानिवृत्त होए रहिन। पथिक जी 15 फरवरी 2020 के हम सब ला छोड़ के ब्रह्मलीन होगिन।


पथिक जी सन 1956 ले लेखन प्रारंभ करे रहिन। अनेक कविसम्मेलन के मंच मा आप काव्य पाठ करे रहेव। दूरदर्शन अउ आकाशवाणी ले अनेक कविता प्रसारित होए रहिन। राष्ट्रीय प्रादेशिक अउ क्षेत्रीय पत्र-पत्रिका मन मा आपके रचना प्रकाशित होवत रहिन। कई काव्य संग्रह में रचनाएं संग्रहित।


पथिक जी के पहिली हिन्दी काव्य संग्रह "जले रक्त से दीप" 1970 मा प्रकाशित होए रहिस।  छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "उजियारा बगरावत चल" 2004 अउ 2009 मा प्रकाशित होइस। "काव्य यात्रा के 50 वर्ष" नाम के समीक्षात्मक पुस्तक 2011 मा प्रकाशित होइस। तेकर बाद "आही नवा अंजोर" नाम के  छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह 2015 मा प्रकाशित होइस। 


उत्कृष्ट लेखन बर पथिक जी ला अनेक संस्था मन सम्मानित करे रहिन। जइसे - 

प्रयास प्रकाशन एवं जिला छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति बिलासपुर द्वारा साहित्य सम्मान 2004 

अधिक सम्मान छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायपुर 2008 

नारायण लाल परमार सम्मान धमतरी द्वारा प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति रायपुर 2010 छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग द्वारा जगदलपुर में साहित्य सम्मान 2010 दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति दुर्ग द्वारा आदर्श शिक्षक सम्मान 1999 एवं हिंदी दिवस पर शब्द साधक सम्मान 2001 सामुदायिक विकास विभाग भिलाई स्टील प्लांट भिलाई द्वारा साहित्य सम्मान 2002 स्टेट बैंक आफ इंडिया मुख्य शाखा दुर्ग द्वारा राजहरा सम्मान 2002 गायत्री प्रज्ञा पीठ आश्रम पुलगांव दुर्ग द्वारा प्रज्ञा प्रतिभा सम्मान 2010 गांधी विचार यात्रा के अंतर्गत ग्राम पारा में साहित्यिक सम्मान 2002 निवास शिक्षक नगर चिन्हारी सम्मान छत्तीसगढ़ साहित्य समिति दुर्ग द्वारा 2012 हीरालाल का उपाध्याय सम्मान रायपुर में सितंबर 2012


रघुवीर अग्रवाल "पथिक" जी के हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर समान अधिकार रहिस। उँकर हिन्दी काव्य-संग्रह के कुछ पंक्ति मा उँकर शैली अउ श्रेष्ठता के सुग्घर परिचय मिल जाथे -   


जलें रक्त से दीप उठे ,बलिदानों की आरती।

उठो जवानो आज देश की धरती तुम्हें पुकारती ।।

(कविता - जलें रक्त से दीप के अंश)

 

हर सुबह यही लिखता सूरज का उजियारा 

संदेश सुनाता यही रात को हर तारा।

भारत का है कश्मीर सिर्फ भारत का है

लो घूम घूमकर पवन लगाता है नारा।

(कविता - अंगार उगलने लगी सुबह की लाली भी, के अंश) 


नौजवानों फिर हमें दी है चुनौती दुश्मनों ने 

फिर दिखा देंगे उन्हें क्या शौर्य है तूफान का 

मर मिटेंगे पर न देंगे हम कभी कश्मीर उनको 

जान ले संसार ही संकल्प हिंदुस्तान का 

(कविता - संकल्प हिंदुस्तान का, के अंश) 


*मुक्तक*


पसीने से लिखो साथी नए युग की कहानी 

दफन कर दो क्षमता की सभी बातें पुरानी 

हमारा देश मांगे रक्त या श्रम हम उसे देंगे 

बढ़ो आगे कहीं कल तक न ढल जाए जवानी ।।


*मुक्तक*


क्या पार हमारे भारत से टकराएगा 

क्या अंधकार सूरज से आँख मिलाएगा 

पाकिस्तानी शासन की अर्थी पर बैठे 

भुट्टो साहब क्या ढोलक रोज बजाएगा।।


रघुवीर अग्रवाल "पथिक" जी चार डाँड़ के मुक्तक असन कविता खूब करंय। उनकर पड़ोस मा कोदूराम "दलित" जी के निवास रहिस। दलित जी उँकर चार डाँड़ के कविता ला "चारगोड़िया" नाम दे रहिन। पथिक जी ला छत्तीसगढ़ी-चारगोड़िया के प्रवर्तक माने जाथे। छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "उजियारा बगरावत चल" ले एक चरगोड़िया - 


*छत्तीसगढ़ी चारगोड़िया*


एक जन्म के नाता ला तुम टोरौ झन

सुनता के सुग्घर बँधना ला छोरो झन

बसे बसाई अपन देसला फोरो झन

बिख महुरा अलगाववाद के घोरव झन।


*छत्तीसगढ़ी दोहा* - 


राजनीति ल देख लौ, आजादी के बाद

संसद म टूटत हवै, संसद के मरयाद।।


ये मंदिर कानून के, बनिस अखाड़ा आज

मल्ल युद्ध नेता करें, देखे सकल समाज।।


हंगामा के होत हे, संसद म बरसात

धक्का मुक्की तो उहाँ, हे मामूली बात


*छत्तीसगढ़ी गजल*


गाँव सो कर मया दुलार संगी

गाँव चल देख खेतखार संगी।

देख आमा बगइचा के शोभा

धान के खेत कोठार संगी।। 

तैं गरीबी अउ अशिक्षा ला

देखबे गांव म हमार संगी।


*छत्तीसगढ़ी कविता*


कुर्सी फेंक, माइक टोर

अउ ककरो मूड़ी ल फोर

राजनीति म रोटी सेंक

पद अउ पइसा दुनों बटोर।

अतको म नइ काम बनय तौ

कालिख पोत दाँत निपोर

इही असीम ले हमर देश मा

जल्दी आही नवा अँजोर।


 आज तीसर पुण्यतिथि मा दुर्ग छत्तीसगढ़ लोकाक्षर परिवार के श्रद्धांजलि


*आलेख - अरुण कुमार निगम*

कागज/ नान्हे कहिनी*

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              *कागज/ नान्हे कहिनी*

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             बड़े भई हर कुछु कल कारखाना खोलिस। वो बुताक़रा- बनिहार मन ल भरती करिस। फेर सबके आघु दिखने वाला नोटिस बोर्ड म एकठन कोरा फारम ल घलव लगवा दिस। सबो बनिहार मन ,वोला आत- जात पढ़ें। वोहर नौकरी ले बाहिर निकाले के रिजाइन लेटर रहिस। अब तो सबो बनिहार मन चौकस- चोखट होके बुता ल करत रहिन।


         थोरकुन दिन के गय ले छोटे भई ल घलव ,वोइच धंधा म उतरे बर लाग गय। वो घलव बनिहार भरती करिस।सबो बुता करिस।फेर वोकर नोटिस बोर्ड म कुछु आन लिखाय कागज हर चपके रहिस।  बड़े भई ल ,शुरू म छोटे भई के धंधा हर चौपट दिखिस...


         फेर बच्छर के छेवर म सालाना टर्नआउट जोड़े के बेरा म छोटे भाई हर ,बड़े भाई ल कतको आगु रहिस।


        आज छोटे भई के प्रतिष्ठान म वार्षिक उत्सव अउ पुरुस्कार वितरण समारोह होवत रहिस।


*रामनाथ साहू*


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टूटहा हाथ

 टूटहा हाथ 

                    को जनी का होइस ना का .... कन्हो ढपेलिन के अपने अपन घट गिस .... एक दिन घर के बाहिर म किंजरत भोलाराम हा चिखला म गिरगे । गिरिस घला अतेक धीरे के , येकर जगा अऊ कन्हो होतिस त , नानुक खरोंच तको नइ आतिस । फेर भले मानुस के हाड़ा म कतेक दम ........ भाजी कोदई खवइया के हाथ म कतेक ताकत , बपरा के हाथ टूटगे । हाथ के टूटना कोई बहुत बड़े दुर्घटना नोहे । फेर हाथ टूटे के बाद , ओकर ले कतको बड़े बड़े दुर्घटना होवत देखे रिहिस भोलाराम हा , इही ला सुरता करके , फिकर म जहू तहू बेहोश हो जाय वोहा । अस्पताल म सियानिन नर्स के अलावा कोई शुभचिंतक नइ दिखय । एक दिन सेवा जतन करत , सियानिन हा , फिकर के कारन पूछिस । भोलाराम बतइस - बहुत समे पहिली के बात आय काकी .... एक झिन संगवारी के हाथ का टूटिस , बपरा के सरी गै । टूटहा हाथ म , रहि सहि संपति ला सम्हाले नइ सकिस , रिश्तेदार मन अपन अपन ले नंगा डरिन । दूसर संगवारी के संग तो येकरो ले बिचित्तर घटना होइस । ओकर सुवारी बड़ सुंदर रिहिस । कतको दूसर संगवारी मन के नजर गड़गे । बपरा के करम फूटगे । तीसर के तो बारा हाल होगे । हाथ का टूटिस , खुरसी छूटगे । टूटहा हाथ धरे अस्पताल म निही जेल म समे काटत रहय ।   

                     सियानिन नर्स किथे – जइसना संगवारी मनके नाव गिनाये हस , तइसना तोर तिर काये हे ? तोर तिर न पइसा हे , न तोर बई सुंदर हे , न पद हे , न प्रतिस्ठा ........ फेर तैं काबर फिकर करथस । भोलाराम किथे – अरे काकी दई , येमन मोरो तिर होतिस त , तोर अस्पताल म मोला देखे बर अवइया के , रेम नइ लगे रहितिस या .... ? नर्स किथे – अस्पताल म तोला देखे बर रेम लगे हे के निही , तै काला जानबे । तोर बर अवइया मनखे के सेती , अस्पताल के कर्मचारी मन थर्रा गेहे । भोलाराम किथे – मोला देखे बर मनमाने मनखे आथे कहिथस , फेर मोर तिर तो एको झिन नइ अमरे हे अभू तक । नर्स किथे – तोर तक काला अमरही बाबू ........ , जे आथे ते , अस्पताल के दरवाजा म पहुंचके फोटू खिंचवा के निकल जथे । एक दू झिन भितर निंगे के प्रयास करिन फेर सरकारी अस्पताल के महक म बेहोश हो गिन , ओमन ला तुरते प्राइबेट अस्पताल म भरती करे लगिस । तोर बड़ बदनामी होइस । भोलाराम किथे – अस्पताल बस्साही , तेमा मोर का बदनामी .......... ? नर्स किथे – जे आथे ते इही सोंचथे के , तोरे सेती अस्पताल बस्सावत हे । भोलाराम किथे – मोर सेती कइसे बस्साही या काकी अस्पताल हा ? नर्स किथे – कोरी खइरखा कस भरती रहू त अस्पताल तो बस्साबे करही । भोलाराम किथे – खसखस ले चांटी फांफा कस बियाये के बेर तूमन ला कहींच नइ लागिस काकी , अऊ सरी होय के पाछू हमन ला दोस देथव या ............ । ओमन काबर मोर तिर नइ आये तेला में जानत हंव । नर्स पूछिस – काबर ? भोलाराम बतइस – ओमन मोला चिन डरही कहिके नइ आवय । नर्स पूछिस – तैं चिन डरबे तेकर का डर ........ ? भोलाराम किथे – में कहूं उगल दुहुं के , इही मन हाथ ला टोरे हे .... । नर्स किथे – अई ......... , में नइ जानत रेहेंव बाबू । फेर ये मन दिखथे बहुत भला आदमी , तोर बड़ फिकर घला करथे , काकरो हाथ म कइसे नीयत गड़ही ........ ? भोलाराम किथे – फिकर के बूता उपजाये बर , छद्म सहानुभूति जताये बर , हाथ टोरे के उदिम रचथे बिया मन ........ । 

                     नर्स पूछिस – ओमा येमन ला का फायदा हे तेमा ? भोलाराम किथे – फायदा हे काकी , तभे करथे । येमन जानथे के , हमर हाथ सही सलामत रइहि , त येमन ला अपन व्यभिचार के तुरते दंड भुगतना पर जही । हमर हाथ सलामत रइहि त , हमर देश के तरक्की म बाधक मनखे के जीना हराम हो जही । तेकरे सेती हमर हाथ ला टोर के बइठार देथे । नर्स किथे – तोर हाथ मजबूत नइ होही तभे तो , जेन आथे तिही तुंहर हाथ के बूता बना देथे । भोलाराम किथे – हमर मेहनतकस हाथ हा , पहिली बहुतेच मजबूत रिहिस काकी , फेर मुफत के माल हा हमर सरी देहें ला खोखला कर दिस । ये बैरी मन नइ चाहे के हमन मेहनत करके , मजबूत बनन । येमन हमर छीनी उंगरी ला जबरदस्ती बड़का मई उंगरी के बरोबर लाने बर , आरक्षण के फरिया ला लपेटके छीनी उंगरी संग , पूरा हाथ के ताकत ला खतम कर देथे । बिगन बूता काम के , मुफत म चऊंर देके , देहें के लहू म , आलस के वाइरस घुसेड़ देथे । इही वाइरस हा देहें के लहू ला चुचर देथे । उपर ले ससता म मिलत सोमरस हा , हमर दिमाग ला अइसे भरमा देथे के , हमन समझे लग जथन के , इही मन हमर तारन हार आय । 

                   नर्स किथे – ओ तो ठीक हे बाबू , अतेक जानत हस तभो , येमन ला काबर अपन तारनहार समझथव ? भोलाराम किथे – हाथ टूटे के पहिली समझेच नइ आवय के , कोन हमर तारनहार आय काकी , फेर एक बात महू ला समझ नइ अइस आज तक , हाथ टोर के बइठार दिस , कोलवा करके मरीज बना दिस , अस्पताल म भरती कर दिस फेर , हमन ला घेरी बेरी देखे बर काबर आथे ? नर्स किथे – येकर जवाब मोर तिर हे बाबू , तूमन मर झिन जावव ताकि , इंकर दुकान निर्बाध चलत रहय कहिके , घेरी बेरी देखे बर आथे । मोला ओकरेच बर तो राखे हे बेर्रा मन । एक कोती , में तूमन ला मरन नइ दंव , त दूसर कोती , येमन तूमन ला ठीक से जिये बर , तुंहर हाथ ला ठीक घला नइ करन देवय । येमन सहींच म जानथे के , एक बेर हाथ ठीक होगे तो , तूमन इंकर बारा बजा दुहू ..... । 

                    भोलाराम हमर देश के जनता आय , जेकर देखरेख करइया नर्स , हमर देश के लोकतंत्र आय , जेहा जनता ला मरन तो नइ देवय , फेर ठीक से जिये बर कहींच नइ कर सकय ।   

 हरिशंकर गजानंद देवांगन . छुरा

बदलाव

 बदलाव

                    जबले पुलवामा म सैनिक मन उपर अटेक होय रहय तबले सरी देश म तूफान मचे रहय । पान ठेला तक म इही चरचा जोर पकड़े रहय के अब पाकिस्तान उपर हमला कर देना चाही । गली गली म अऊ घर घर म रक्षा अऊ विदेशी मामला के विशेषज्ञ जनम धर डरे रहय । कन्हो कहय के येकर ले बड़का मौका अऊ नी मिलय । तुरत हमला कर पाकिस्तान के नामोनिशान मिटा देना चाही । देश के जनता के बाढ़हत दबाव ला राजनीतिक दल मन घला समझगे । राजनीतिक दल मन स्थिति के फायदा अपन पक्ष म उचाये के सोंचिन । येमन सब मिल के फैसला करिन के पाकिस्तान के उप्पर हमला कर दे जाय । जब तक इँकर फैसला हा अमली जामा पहिरतिस तब तक ... देश के भला चहइया एक झिन मनखे हा कछेरी पहुँचके नालिस कर दिस के ... देश के सैनिक मनला अपन स्वार्थ बर नेता मन युद्ध म झोंकना चाहत हे । येहा गलत हे ... येला रोकना चाही । युद्ध म स्टे लगगे । अदालत हा सरकार ला तलब करिस । सरकार ला अपन पक्ष रखे के मौका दिस । 

                     सरकार अपन पक्ष रखत कछेरी म बयान दिस के ... सैनिक के भरती ओकरेच बर करे जाथे ... जब जब देश के दुश्मन मन जब आँखी देखावय तब ओकर आँखी ला फोरय । येमा का नावा बात हे । नालिस करइया के बकील हा अदालत के माध्यम ले सरकार ला पूछिस - तूमन सैनिक भरती करथो त देश के सुरक्षा बर करथो के सैनिक के मरे बर । सरकार कहिथे - देश के सुरक्षा बर करथन । याचक वकील पूछथे – त सैनिक मन ला मरे बर काबर झोंकत हव । ये सैनिक मन मर जही त देश के सुरक्षा कइसे होही ? सरकार किथे – नावा सैनिक भरती करबो । याचक वकील कहिथे – कतका झिन जवान ला सैनिक बना बना के मारहू । ओहा जज ला बतइस के राजनीतिक पार्टी म अबड़ अकन कार्यकर्ता होथे ... इही मनला सैनिक के ड्रेस पहिरा के बंदूक धरा के लड़े बर भेज देना चाही । यहू मनला जिनगी म एक बेर देश सेवा के मौका दे देना चाही । जज कहिथे – राजनीतिक पारटी के कार्यकर्ता मन का करही ? याचक बकील किथे – यहू मन लड़ही जज साहेब अऊ दुश्मन ला मारही । अइसन तर्क सुनके पूरा राजनीतिक पार्टी सकलाके एके होगे । देश म कन्हो संकट परे म भलुक एके नी होय फेर अपन उपर संकट आय म अऊ अपन फायदा देखे म ... येमन अभू तक कभू अलग अलग बिचारधारा नी रखिन ।  

                     संयुक्त राजनीतिक पार्टी के बकील नामित होगे । ओहा अदालत म जिरह करे लगिस अऊ केहे लगिस के – अरे भई मोर्चा म जाके लड़ई करना राजनीतिक मनखे के काम थोरहे आय । फेर बंदूक धरे बर अऊ हथियार चलाये बर अनुभौ के जरूरत परथे । बिगन अनुभौ के कइसे करही ? याचक बकील किथे – खुरसी म बइठके अतेक बड़ देश ला बिगन अनुभौ के चला सकत हे जज साहेब ........ त बंदूक नी चला सकही गा तेमा ........ । बिगन बात के मुँहु चलाके अपन दुश्मन ला ढेर करइया मनला हथियार चलाये बर कन्हो प्रशिक्षण के का जरूरत ? संयुक्त बकील किथे – जेकर काम तिही ला फबथे जज साहेब । येहा सैनिक मन के काम आय । तिहीं बता जज साहेब ........ का सैनिक मन देश चला सकत हे ...... ? याचक वकील किथे – जज साहेब एक बेर रद्दा छोंड़ के देखय ... सैनिक हा देश चलाके बता दिही के देश ला कइसे चलाना चाही । संयुक्त वकील किथे – अइसे कइसे हो सकत हे ...... हमर देश म लोकतंत्र हे तेकर का होही ....... । अइसन म लोकतंत्र मर जही । याचक बकील किथे – लोकतंत्र कती मेर जियत हे जज साहेब ? तेमा येमन ला लोकतंत्र के फिकर होवत हे । लोकतंत्र के लाश ला जनता ला देखा के ओला जियत हे कहिके जनता ला भरमावत हे येमन । संयुक्त बकील किथे – जज साहेब ....... समस्या के समाधान राजनीतिक हो जतिस त राजनेता मन जातिन अऊ सुलझातिन .....। ये समस्या राजनीतिक नोहे । याचक बकील किथे – जज साहेब ........ कश्मीर के समस्या ला सैनिक मन बियाये हे तेमा का ....... ? येला राजनेता मन पैदा करे हे त ....... उही मन ला हल करना हे । बातचीत म हल नी कर सकही त युद्ध के मैदान म जाये अऊ झोंक दै अपन कार्यकर्ता मनला । उही मन ला येमन अपन अनुशासित सैनिक कहिथे ना । अपन कार्यकर्त्ता मनला इही मन अपन पार्टी के सिपाही बताथे ना ....... । एक बेर यहू सिपाही मन के उपयोग हो जाय । जइसे येमन अपन घर म एक दूसर ले लड़थे ततके ताकत म बाहिर म लड़ के देखा देवय । लोकतंत्र के लहू पीके मोटइया मनखे मनके देंहे ले ... देश के खातिर जे दिन लहू बोहाही त पोट पोट करत लोकतंत्र के हिरदे के धड़कन वापिस शुरू हो जही । 

                    अदालत म जिरह चलतेच हे । फैसला आयेच निये । राजनीतिक पार्टी म काम करइया मन अदालत के अवइया फैसला के अंदेशा म .... डर के मारे धड़ाधड़ अपन अपन पार्टी छोंड के देश के बिकास बर ... काम धंधा म लगगे । निचले स्तर म देश म बइमानी करइया घटगे । ओकर असर उपर तक दिखे लगिस । फैसला आयेच निये तभो ले लोकतंत्र ला स्वस्थ हावा मिले लगिस । लोकतंत्र के मुँहु म पानी आय कस दिखे लगिस । थोकिन हरियाये कस दिखे लगिस लोकतंत्र ....... । पदनी पाद पदइया पाकिस्तान समर्थक राजनीति हा पाकिस्तान म शरण मांगे लगिन । अभू सेना के कन्हो जवान ला शहीद होवत नी सुनेन । कश्मीर संग पूरा देश म शांति के वातावरण बगरगे । 

                                               मोर नींद उमचिस .. पछीना म नहा डरे रेहेंव ...  देंहें के बुखार उतर चुके रिहिस ... काश मोर सपना सच हो जतिस ...  लबर लबर मरइया मन ला .. जीरो डिग्री तापमान म घर परिवार ले धूर हमर सुरक्षा बर बर कुछ करे के मौका मिल जतिस .. देश के भला अपने अपन हो जतिस । 

                                                            हरिशंकर गजानंद देवांगन

धर्मेंद्र निर्मल: कहानी -लोटा भर पानी

 धर्मेंद्र निर्मल: कहानी -लोटा भर पानी

अकती हँ अँ़़़़गरी म पाँचे दिन बाँचे हे। मनोज के बिहाव हँ अभी ले तय नइ होय हे। देवसिंग हँ फागुन के नंगारा थिराय के बिहान भर ले पानी पी पी के बहू खोजत हे। फेर बात हँ अभीन ले नइ बने हे। कईयो गाँव घूम डरिस। कतकोन छोकरी देख डरिस। फेर उही बात, भरम भारी पेटारा खाली। 


बहू बर जतका के चढ़ावा लेगतिस तेकर चवन्नी हिस्सा तो मोटरे गाड़ी म फूँकागे होही। देवसिंग अपन गाँव के मोटहा किसान हरे। पैंतीस चालिस एकड़ के जोतनदार हे। तीर तखार म अइसे कोनो गाँव नइ होही जिहाँ ओकर मेंछा नइ गड़े होही। कोस कोस ले पूछ परख होथे। गाँव म कोनो बात होवय ओकर सुमत-सुलाह बिना चिटको पाँव नइ उसाले सकय। नर -नियाव म ओकरे बानी हँ निरने के रूप लेथे अउ नियम बनके गाँव म बगर जथे। 


कोनो दिन अइसे नइ होही जे दिन चहा के डेगची हँ चूल्हा ले उतर के चोंगी पीयत ले थिराय पावत होही। जेन गाँव म लड़की हे सुनतिस देवसिंग तुरत- फुरत गाड़ी धरके पहुँच जाय। संझा लहुट के गोठिया डरय-

‘लडकी तो सनान हे, फेर वा भई ! आजकाल के लडकी मन ल माने बर परही। ....मैं अपन कान म सुने हवँ जी ! हमरे आगू म अपन दाई तीर कहि देवय-‘मैं अउ पढ लेतेवँ दाई, मोर बिहाव ल अभीन झन करव।’

गाँव के मन चहा ल सुड़कत हूँकारू भरय -‘हव्व गा !’ 


कोनो दिन कहूँ ले लहुटके गोठियातिस-‘लडकी के बाप हँ हमर संग गोठियाते रिहिस हे। ओकर दाईच हँ दुवार के आड़ ले कहिदिस-‘हमन अपन बेटी ल नौकरी वाले संग बिहाबो।’ 

देवसिंग करय त का करय। ककरो बेटी परिया म तो नइ बइठे हे, जेन ल जावय अउ ‘टुप ले’ झोला-झंकर कस उठाके ले लानय। बेटा बने पढ़ेच- लिखे हे, घर म दूकान चलावत हावय, त काय काम के। लडकी वाले मन ल सरकारी दमांद चाही, जऊन सरकार के संगे-संग उन्कर बेटी के तको नौकरी बजावय।


कभू कभू कऊव्वा के कहे लगय- ‘आजकाल लइका ल सरकारी आफिस के बाहरी धरा लेवय फेर डिगरी के बोजहा ल झन बोहावय।’ लड़की वाले खेती बारी,  घर -दुवार, पढ़ई- लिखई ल नइ पूछके, लड़का का करथे तेला पूछथे। ये सब बात ल देख -सुनके देवसिंग के मति छरिया जथे। 


गाँव वाले मन पहिली -पहिली तो देवसिंग के गोठ- बात ल सुनय त चकरित खा जय। अब वइसन बात नइ रहिगे। चहा- पानी, चोंगी -माखुर के पीयत ले ओकर बात म हूँकारू भर भरथे। एक कान ले सुनके दूसर कानले बदरा कस उड़ा देथे। 


पीठ पीछू उही मन गोठियाथे-‘ये काला बताही गा, सगा छाँटत हे।’ 

कोनो कहय -‘अतेक बड़ संसार म टूरी के दूकाल परे हे ? चलय न हमर संग, हम अभीन देखा देथन, कइसन टूरी चाही ?’ 

माईलोगन मन मुँहजोरे गोठियावय-‘अई ! इही बहू खोजइया ये या, दाईज देखत हे दाईज। दुनियाभर के गोठ ल फलर-फलर ओसावत भर हवय, हम नइ जानबो एकर चाल ल।’


साँप के चाबे मुँह जुच्छा के जुच्छा ! जे ठन मुँह तेठन गोठ, भागे मछरी जाँघ अस रोंठ। भाँड़ी के मुँह म परइ ल तोपबे, आदमी के मुँह ल कामा ढाँकबे। 

देवसिंग एक ठो गाँव गए रहय। सुने हावय कि घर -दुवार, खेत -खार बने हे। छोकरी सुजानिक लगिस। तभो बात उही मेर अटकगे। लड़की वाले मन ये बछर बिहाव नइ करन कहिदिन।

 

देवसिंग ल चट मँगनी पट बिहाव करना हे। सियान दाई के पाँव हँ कबर म लटके हे अउ साध हँ मड़वा तरी अटके हे। संझा-बिहिनिया रेकत रहिथे-‘देवसिंग ! दू बीजा चाऊँर टीक लेतेवँ बेटा। कोन जनी कब बुलऊवा आ जही ते, बहू हाथ के पानी पीए के साध हँ साधे झन रहि जाय।’


 लड़की अतेक सुघ्घर रिहिस हे के देवसिंग के मन हँ चार महिना रूके रजुवागे रिहिस हे। फेर खाए के बेरा होगे राहय तभो ले सगा घर चहा -पानी बर तको नइ पूछिस, खवई -पीयई तो दूरिहा के बात ये। 


देवसिंग ल इही बात खटकगे अउ बनेच खटकगे। हाले के देवसिंग जादा पढ़े लिखे नइहे फेर चार झन रोज उठत -बइठत हे, धरमी- सुजानिक, छोटे- बड़े सबो संग बरोबर मेल जोल होवत हे। संगत के जोर, जादा नहीं ते थोर-थोर। 


ओकर लइका मनोज घला कम नइ हे। जइसन -जइसन दाई- ददा तइसन तइसन लइका, जइसन जइसन घर -दुवार तइसन- तइसन फइरका। पढ़े लिखे के रूवाब ल अपन तीर म थोरको नइ ओधन दिस। तभे तो आज तक अपन ददा संग लड़की देखे बर नइ गिस। 

जब पहिली पइत बिहाव के गोठ चलिस, त आनन्द बबा हँ बलाके कहिस-‘ ले न संगवारी ! लाड़ू-उड़ू कब खवावत हस जी।’ 

‘ओमा का बात हे बबा ! पाग-वाग ल धर डर ताहेन लाड़ूच-लाड़ू ।’


जब लड़की देखे बर जाए के पारी आइस त कहिदिस -‘माँ- बाप हँ मोर बर सिरिफ बाई नइ खोजय, अपन बर बहू पहिली देखही। मैं अनुभवहीन लइका बाहिर के सुघरई भर ल देखहूँ। जाँचहू -परखहू त सियाने मन। तुमन ल जेन जँच जाय, मैं ओकरे संग भाँवर किंजर लेहूँ।’

बबा हाँसे लगिस- ‘ स्साले बूजा हँ अच्छा फाँदा म फाँद दिस भई।’ 


पसंद -नापसंद के बात आइस त मनोज सोज्झे कहिस-‘माँ-बाबू बइरी तो नोहय, जेन निचट अंधरी -खोरी ल मोर संग धरा देही।’ देवसिंग अपन लइका के हुसियारी ल भाँपगे अउ मनेमन गदगद घलो होइस। 

आनंद बबा कहिथे- ‘ भागमानी हवस देवसिंग ! आजकाल अइसन लइका मुड़ म राख डारके खोजे नइ मिलय।’

पूत के पाँव पलने म दीख जथे। अइसन पूत ल पाके देवसिंग धन हे येला सबो गोठियाथे। 


देवसिंग अब हारगे। भइगे एसो के साल बिहाव नइ करना हे। इही सोच के वोहँ अपन घर लहुटे लगिस।

ओतके बेरा घरजोरूक सगा राहय ते हँ मुड़ ल खजुवावत गुनमुनाथे-

‘एक झिन अउ सगा हे। लड़की जादा पढ़े लिखे नइहे। गरीबहा हे फेर...... लड़की बने आए -जाए के लइक हे।’ 


देवसिंग के मन थोरको नइ रिहिस हे। मन तो बतइयो के नइ रिहिस हे। बता के पादा भर चुकाना रिहिस हे। आधा बतइया के बात राखे बर अउ आधा इही सोचके कि दिन भर बर निकले हावन, घर जाके करबोच्च का ? चल काहत देवसिंग गाडी ले उतर के ओकर पीछू -पीछू रेंगे लगिस। घरजोरूक संसो म परगे। 


‘कहाँ- कहाँ बता परेवँ। कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली। बिजती भर होही।’

अंगसी-संगसी होवत सगा घर पहुँचिन। देवसिंग देखथे, गिनके दूए ठिन कुरिया, छोटकन परछी अउ खदर के छानी। 


घरजोरूक रेंगान म मुड़ ल गड़ियाए ‘ठुक ले’ खड़ा होगे -‘ हवस गा रामाधीन ?’ 

लड़की घर म अकेल्ला राहय। संग आए लोगन मन उकूल - बुकूल होगे।

‘ए कहाँ लान के धँसा दिस गा।’

देवसिंग बिना हूँके-भूँके कलेचुप सब ल आकब देखत रहय। 

 

नोनी हँ लोटा म पानी धरके निकलिस। लोटा ल आगू म रखके जम्मो झन के ‘टुपटुप’ पाँव परिस। नोनी ल पाँव परत देख चिक्कन-चाँदर भीथिया म लटकत ओकर बनाए झूमर अउ भीथि-सज्जा मन मुचमुचाए लगिन। बइठारे बर घर म कुर्सी-मुर्सी तो नइ राहय। एक ठन टेड़गा-कुबरा मुँहा खटिया भीथिया म पीठ टेकाए टुकुर-टुकुर देखत राहय। उही ल बिछाके ओमा चद्दर बिछावत कहिस-

‘बइठौ।’ 


पाँव हँ अतका दूर उसल के आइगे हे त मुँह ल तो उसालेच बर परही। आनन्द बबा पूछिस- ‘तोर का नाँव हे नोनी ?’ 

‘लक्ष्मी।’ 

एक झन सगा मने मन मुस्कुराइस- ‘अहा ह ! खदर के छानी म लक्ष्मी के बसेरा। तोरो लीला अपरम्पार हे लीलाधर।

‘कतका पढे़ हस ?’ देवसिंग तिखारिस।

‘दसवी पढ़के छोड़ दे हववँ।’ अउ कोनो सवाल के अगोरा म चिटिक रूकके नोनी लहुटे लगिस -‘दाई -बाबू मन येदे मेरन खन्ती गए हवय। मैं आरो देथवँ ।’

सगा मन संघरे कहिन- ‘नहीं नहीं राहन दे।’ देवसिंग चुप रिहिस। 

‘दूरिहा नइ हे, बइठव न बुलुवा देथवँ।’


ठाढ़े मँझनिया। थोरको बाहिर निकले म रगरग-रगरग करत गुसियाए घाम हँ कनपटी ल ‘चाँय ले’ देवय। सबो झिन भूख के मारे कलबलागे राहय। एकर पहिली घर म देवसिंग गुस्से -गुस्सा म पानी घलो नइ पीए रिहिस हे। लक्ष्मी के दे पानी ल एके साँस म गटागट पीके देवसिंग जुड़ागे। छाती जुड़ोवत पीछू कोति हाथ ल टेकिया के खटिया म बइठ गे। सगा मन फुसुर -फासर करे लगिन - 

‘नोनी तो बने सुग्घर हे।’

‘हहो, आए-जाए के लइक हे !’

‘सबो बने हे फेर का काम के ? तुरते निचोए तुरते पहिरे ....।’ 


अतका म लीमऊ के सरबत बनाके लान डरिस लक्ष्मी हँ। सबो झन के जी तर होगे। कुंद -कुंद के गोठियाए लगिन। सरबत पीयाए नइ पाए रिहिस। खन्तिहार मन घलो पहुँचगे। दाऊ के शोर तो चारो मुड़ा उड़त रहय। नोनी के ददा रामाधीन देखते साथ पहिचान डरिस। सकुचागे बपुरा हँ। छोटे मुँह बड़े बात, बिचारा कते मुँह म पूछय ? जोहार-भेंट करके ‘कुकरूस ले’ एक कोन्टा म बइठ गे। 

देवसिंग सोचत राहय-‘पूछवँ त कोन ढंग ले पूछवँ ?’


आखिर म घरजोरूक पूछिस - ‘बिहाव करबे नहीं सगा ?’

रामाधीन  हाथ ल जोर के काँपत खड़ा होगे - ‘बाढ़े बेटी ल घर म बइठारे के सऊँक कोन ल होथे दाऊ ! ...फेर मोर तो सबो डाहर ले उघरा हे, तुँहर आगू म हवँ।’


अतके काहत वो घर म चुप्पी हँ हाथ- गोड़ ल लमाके पसर गे। घर डाहर ले खाए के बुलऊवा हो गे। फेर का मजाल के ठहिरे शांति हँ टस ले मस हो जाय। कोनों तो खुर-खार करतिस। सबो के मुँह बँधाए के बँधाए रहिगे। 


नोनी के दाई हँ कपाट के आड़ म छपटे, साँस ल थाम्हे सुनत राहय। धड़कन ह लुहुर-तुकुर करत अइसे धकधक-धकधक करत हे जानो मानो छाती ल फोर के बाहिर आ जही। ओकर बस चलतिस त वोहँ उहू ल थाम लेतिस। 


ओकर पीछू म लछमी मुड़ी ल गड़ियाए खड़े हे - हाँ या न, दू ठन डोर म बँधाए असमंजस के झूलना झूलत। दूनों के कान जुवाब के अगोरा म बिलई कस कान टेंड़ाए हे। घरजोरूक अउ देविंसंग के घरोधिहा सगा मन तो बनेच भूखा गे राहय। सबो झन एलम -ठेलम करत देविंसग के मुँह ल ताके लगिन। 


आखिर म देवसिंग कहिथे-

‘ए उघरे अउ मुँदाय ल तैं झन सोच। लक्ष्मी हँ मोर मन आगे हे येला मैं जानथौं।’ 

भरमाभूत धरे कस, सुनके सबो के सबो अकबका गे। कोनो ल अपन कान म भरोसा नइ होवत राहय। 

देवसिंग आगू कहिस-‘तोला मोर समधी बनना हे के नहीं, तेन ल तैं बता ? बेटी तोर ये, फेर बहू तो मोर होही न। मोर बहू ल मैं अपन बरोबर कइसे बनाके ले जाहूँ येहँ मोर चिन्ता हरे।’


लक्ष्मी के दाई अपन मुँह ल सीलके नइ राखे सकिस। पीछू मुड़ के लक्ष्मी ल ‘हबरस ले’ कहि भरिस- ‘हाय ! बने घर पा लेस बेटी ! भागमानी हवस। तोला जनम देके आज मोर कोख धन्न होगे।’ लक्ष्मी अपन महतारी के मुँह ल एक पइत देखके जस के तस होगे- मुक्का अउ मुड़ी ल गड़ियाए। 


रामाधीन के मुँह ले बक्का नइ फूटत हे। देवसिंग रामाधीन के मन ल टटोल डरिस। आसरा के डोर लमाए मुस्कावत पूछिस- 

‘कइसे ! का विचार हे सगा ?’

रामाधीन सोच म परगे-‘नान्हे मुँह ले बड़े बात कइसे करवँ।’ 

ओतका ल सुन-परख के महतारी के जी हँ अंगार होके भरभरागे- 

‘इही हावय नटवा। न हूँकत हे, न भूँकत हे। घर बर कइसे टाँय-टाँय करथे।’ 


ओकर मन तुकतुकाए लगिस। जी तो होवत रहय के जोर से चिचियाके कहि देववँ-

‘बने हे सगा ! आज ले हमर करेजा के कुटका ल तुँहला सुपरित कर देन। हमला खुशी हे।’ 

रामाधीन धीर लगाती मुँह ल उलाइस - ‘ठीक हे दाऊ, फेर.........।’.देवसिंग हाथ के इशारा करत रामाधीन के मुँह ल बाँध दिस अउ हूत कराइस-  ‘लक्ष्मी ! 

कबके गिरे -परे, अपटे - थम्हे बेरा ल थाम्हे-थेगे के आसरा मिल गे। हवा के पाँखी जामगे, सरसराय लगिस। उछाह के लहरा हरेक मन म हलोर मारत दँऊड़े लगिस।


महतारी हँ खुशी -खुशी..... फेर एक बिरहा के भय म झुरझुरावत कहि डरिस -‘जा बेटी ।’

खुशी हँ दू कदम आगू रेंगत आँखी के पार ले कूदके छलक गे। लक्ष्मी अपन ले बिरान होए बर जावत हे।

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 पोखनलाल जायसवाल:

 'जनम-विवाह मरण गति सोई, जहाँ जस लिखा तहाँ तस होई।' 

      मानस म तुलसीदास जी के लिखे ए चौपाई लोकजीवन के जिनगी म  जादा करके सिरतोन जनाथे। जब मनखे जनम धरथे त कब जनम लिही? जनम होय के पक्का बेरा अउ ठउर कोनो नि बता पावय। ए अलगे बात आय कि अभी के समय म जचकी अस्पताल म होना तय च होगे हे। फेर विज्ञान घड़ी के मुताबिक जनम के समय अभियो नइ बता पावय। यहू हे कि लोगन आज शुभ घड़ी देख के ऑपरेशन ले जनम के बेरा जरूर तय कर लेवत हें।

         बिहाव बर दूनो पक्ष के रजामंदी जरूरी होथे, इही रजामंदी ह बिहाव कब, कहाँ अउ काकर ले होही? के बीच बाधा परथे। कभू बेटा वाला के मन आ जथे, त बेटी वाला मन ल मन नि आय। कभू बेटा च वाला मन मन नइ करयँ। धन-दोगानी, रंग-रूप, पढ़ई-लिखई ए सब रजामंदी ऊपर फरक डारथे।। लोकाचार के दृष्टि ले काहन त देवसिंग के बेटा संग लक्ष्मी के बिहाव तय होवई ह तुलसीदास जी के लिखे चौपाई ल एक पइत फेर सही साबित करथे। अइसन संयोग हम ल अपन तिर तखार म देखे ल घलव मिलथे।

       अपन घर-दुआर अउ रहन-सहन के मुताबिक घर म सबो कोई बहू-बेटी लेन-देन करई पसंद करथें। दाई-ददा चाहथें कि मोर बेटी मोर ले सजोर अउ बने घर जावय, नइ ते बरोबर घर म जावय। फेर हरदम...अइसन नइ हो पावय। 

        कई बखत देखे म आथे कि कई झन बछर दू बछर ले जोरा करके पहुना के अगोरा करत रहि जथे, बखत संग ठगा जथे। अइसन म जे मनखे ते गोठ होय धर लेथे। ए गोठ मन के न मुड़ी के ठिकाना रहे ल पूछी के। जेकर ऊपर बीतथे तउने जानथे। 

      इही सब गोठ-बात के चित्रण करत कहानी आय- 'लोटा भर पानी' । कहानी के संवाद अउ वर्णन मन ले जुरे दृश्य आँखी के आगू सिनेमा सहीं दगदग ले नजर आथे। समाज म बिहाव के पहिली होवइया सबो किसम के गोठ बात ल कहानी म सुग्घर ढंग ले रखे गे हे। 

        बदलत समय के संग पढ़े-लिखे नोनी बर नौकरिहा दमाद के सपना सँजोए दाई-ददा मन ऊपर कहानी म व्यंग्य घलव हे।

         'लोटा भर पानी' हमर संस्कृति अउ परम्परा के चिन्हारी आय। कोनो भी पहुना के आय ले लोटा म पानी दे के स्वागत करे के चलन हे। ए चलन के पाछू के वैज्ञानिकता घलो समझे के लाइक हे।  

         ए कहानी के शीर्षक 'लोटा भर पानी' यहू दृष्टि म सार्थक हे कि लक्ष्मी के दाई-ददा भलुक देवसिंह के बरोबरी नइ कर पाहीं, फेर ऊँकर स्वागत म हरदम 'लोटा भर पानी' दे म समरथ हे।

       कहानी के भाषा शैली प्रभावित करथे। भाषा के प्रवाह पाठक ल बाँधे म समर्थ हे। कहावत मुहावरा के सटीक प्रयोग होय हे। संवाद पात्र अउ जघा के मुताबिक हे। कथानक ल आगू बढ़ाय म मददगार घलो हे। सुग्घर कहानी बर धर्मेंद्र निर्मल जी ल बधाई💐🌹


पोखन लाल जायसवाल

पलारी पठारीडीह

जिला बलौदाबाजार छग

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छत्तीसगढ़ी कहानी

छत्तीसगढ़ी कहानी

 : भलुवा ल चकमा

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       चैत के महिना चारो कोती मैनपुर के जंगल हर घाम म तको हरियाय , साल, सरई, महुआ, तेंदु के बड़का-बड़का रूख म तोपाय जंगल हर महुआ के सुबास म महमहावत हवय। मुधरहा चरबजी उठ के रधिका हर महुआ बिने बर अपन संगवारी मन संग घर कुरिया ले जंगल डहार निकलगे। महुआ के सुबास ले सफ्फा बन हर महमहावत हे, महुआ फूल हर सुरूज निकले ले टप-टप रुख तरी गिरे ल लगथे। बड़का -बड़का बास के टुकना ल धरे रधिका अपन संगवारी मनटोरा, फगुनी, सुहासिनी अउ रमसिला संग जंगल के रद्दा म रेंगे लगिन।  जंगल पहुंचत थोरकुन अंजोर होवत रहिस, सफ्फा जंगल के रुख-राई सुत के उठ के मुंहकान धोय बरो बर उज्जर दिखत रिहिस।

          जंगल के जेन रद्दा म महुंआ के रुख हर लगे महमहावत रिहिस, तेही डहार सब्बो संगवारी मन रेंगेन लगिस।  फेर का देखथे के जम्मो रुख अउ रुख तरी के पाके महुंआ फूल ल  कोनो ऊखर आय ले पहिली बिन डरे हवय। आगु सब्बो बन हर त महुंआ ले पटाय हवय,  फेर जंगल भीतरी नींगे के कोनो हिम्मत नइ करय। रधिका हर संगवारी मन ले किहिस- "मोला अइसने लागथे के, इहां हमर ले पहिले कोनो आके महुंआ बिन डरे हवय।  चलव संगी आज हमन जंगल के भीतरी निंग के महुंआ बिनबो, नइ त हमन ल दुच्छा टुकना, धर के अपन घर कुरिया जाय ल परहि. राधिका के गोठ ल सुन के मनटोरा हर कहिस- "बहिनी इंही महुंआ फूल हर हमर रोजी -रोटी अउ जिनगी के आधार आय। आज हमन दुच्छा टुकना धर के जाबो त, आज के मजूरी के हमन ल घाटा हो जाही, तीस रूपिया किलो के हिसाब ले हमर एक टुकना म पचास किलो त महुंआ हर धराथे। इहीं घाटा ल हमन कइसे भरबों,चलव आज जंगल के भीतरी म निंगबों।" अइसना कहिके चारों संगवारी जंगल भीतरी म निंगगे।

                जंगल भीतरी नींगत,रमसीला हर चिन्हा बनावत गिस । सब्बो झिन जंगल भीतरी डहार रेंगत गिन। थोरकुन एको मील रेंगिन त का देखथे। चारो मुड़ा महुंआ के रूख रहाय, रूख तरी महुंआ के फूल हर गिरे रहाय, सब्बो संगवारी महुंआ ल देख के खुस होगिन अउ महुंआ  बिने लगिन. देखते-देखत उँखर टुकना हर महुंआ फूल ले भरगे रहाय। बाचे महुंआ फूल ल पहिरे सारी के अंचरा म तको बांध डरिन। चारो संगवारी एक दूसर के टुकना ल मुंड़ी म बोहाय लगिन। घर बस्ती कोती जाय बर, जंगल ले बाहिर निकले लगिन।

               जंगल रद्दा म सबले आगू रमसीला रहाय,ओखर पाछू मनटोरा अउ सुहासनी रहाय, सबले पछुवाय रधिका हर आज चपक -चपके महुंआ फूल ल अपन झऊहा म भरे रहाय,संगे-संग अंचरा म तको अब्बड़ अकन महुंआ ल धरे रहाय। पचास किलो ले जादा महुंआ ल मुंडी़ म बोहे,अंचरा म धरे लकर -लकर रद्दा म पछुवाय रेंगे लगिस।

                 उही बेरा जंगल के भीतरी ले भलुवा के हुंकारु हर सुनाई  परिस। सब्बो झिन के  हाथ -गोड़ फुले लगिस, जुड़ाय लगिस। सबके जीव हर कांपे लगिस के अब का करिन। सबले आगू रमसीला हर पाछू मुंड़ के देखिस त देखते रहिगे। एक झिन भलुवा हर पाछू ले आवत रिहिस; रमसिला हर जोर ले चिचियाइस अउ कहिस-"भलुवा हमर पाछु हावय, भागव-भागव जल्दी दउड़व, भागव संगवारी हो भागव... ।"

                  रमसिला के चिचियई अउ ओखर गोठ ल सुन के सब्बो झिन कांपगे। रमसिला त सड़क के तीर कना आगे रिहिस, फेर जमके दउडे़ लगिस,  ओखर पाछु सब्बो झिन अपन टुकना ल उंही मेर मड़ाके, दउडे़  लगिन । सबले पाछु रधिका हर दउड़त रिहिस, त भलुवा हर ओखर संघरा होगे रहाय. रधिका  भलुवा के मुँहु ल देखके, महुंआ ले भरे टुकना ल ओखर ऊपर पटक दिस अउ कछु नई सूझिस त तेन्दू रूख म चघे लगिस । रधिका ल रूख म चघत देख के, भलवा तको रूख म चघे लगिस। रधिका हर अपन डहार आवत भलुवा  ल देखके डरागे ।  डर के मारे ,रूख के डारा हर ओखर हाथ ले छूटगे  अउ  रूख तरी धडाक ले गिरगे। रधिका रूख ले अइसना गिरिस के,पेट के बल मुंड़ी कान सब्बो भुइयाँ म गढ़ियागे। अइसे लगिस के रूख ले गिरके ओखर प्रान पखेरू उड़ियागे; न हिले न डुले सिरतोन रधिका के जीव छूटगे।

            ऐतीबर रधिका के संगवारी मन सड़क मेर जुरियागे रिहिन अउ रधिका के अगोरा करत रिहिन। भगवान ले सुमिरन करे लगिन, हे भगवान रधिका ल भलुवा ले बचा ले,  रधिका के नान-नान लइका -पिचका हवय; ओहर मर जाही त लइका मन के का होही??

                 जंगल के सड़क के रद्दा तीर म अगोरा करत ,मनटोरा हर सड़क म चलत गाड़ी -मोटर वालामन ल रोक के, रधिका ल बचाय बर गुहार लगाईस फेर कोनो अपन गाड़ी ल नइ रोकिन। इही इलाका हर लाल बबामन के अड्डा हरे, इही पायके कोनो अपन गाड़ी मोटर ल नइ रोकय। अब भइगे बस के अगोरा हवय। बस हर त इही रद्दा म आबे करही, कंडक्टर अउ डायवर हर थोरकुन मदद करबे करही, अइसना बिचार गुनत फगुनी हर जंगल डहार रूवासी मुंह करके देखे लगिस।

              रमसिला हर आंसू पोछत कहे लगिस-"हहो संगवारी हमन  जंगल के रहवइया, आदिवासी कहाथन। इही जंगल के रूख-राई ऐखर ले उपजे  फूल- फर,पाना -डारा -बीजा ,लकड़ी हमर रोजी-रोटी आय, फेर इही थोरकुन साल बीजा, महुंआ फूल, तेन्दुपाना के संग्रहन ले हमन ल थोरकुन रूपिया-पइसा मिलथे.इही रोजी-रोटी बर हमन  अपन जिनगी ल दांव म लगाय परथन। इही जंगल म पग-पग म जिनगी के खतरा हवय। हमर परान लेहे बर कोन जाने तेन्दुआ, भलुवा घात लगाये बइठे हवय।भइगे आज हमन अपन एक झिन संगवारी ल खो देबो।" अइसना कहिके रमसिला अउ सब्बो संगवारी मन रोय लगिस।जंगल म मनखे मन के अगोरा करे लगिन।

              इही पइत कतको घव हुँवा-हुँवा  के हुंकारू लगा डारिन, हुं. ...ऊई-उई.. हुंआ.. हुंआ... जंगल राज के जम्मो हुंकारू ल लगा डरिन।सब्बो झिन के हुंकारू  ले जंगल हर गूंजे लगिस,फेर कोनो जंगल भीतरी नींगे के हिम्मत नइ करिन। सुरुज हर लुकात रिहिस।

जम्मो संगवारी मन बीन पानी मछरी कस तरफत रिहिन। कइसे करन घर कुरिया जांवन के इही मेर थोरकुन अउ अगोरा कर लेन।

             ठउका उही बेरा जंगल भीतरी ले रधिका ल आवत देख के ,सब्बो संगवारी मन

के आँखी म चमक आगिस। माथा फूटे, लहु -लुहान रधिका ल पोटार लिन। सड़क के रद्दा के ओरी म बइठार के ,पानी ल पियायिन । लहुं ल पोछत ,रमसिला हर रधिका ले कहिस-"रधिका तेहर बांचगे, हमन तोला जंगल भितरी अंग छोड़ के भाग के आगे रेहन।"   रधिका हर किहिस- "बने होइस तुमन भागगेव, आज हमन सबो झिन भलुवा के सिकार बन जातेन; मोला खुसी हवय के मेंहर आज भलुवा ल चकमा दे हवव। मिही हर सबले पाछू रेहेव, भलुवा मोर संघरा होगे रहाय, ओला देख के मेंहर  डरागे रेहेव, फेर हिम्मत कर के मेंहर ,भलुवा के मुंड़ी ऊपर महुंआ ले भरे झंउहा ल पटक देव त ले भलुवा हर महुंआ ल खाय बर छोड़ मोर डहार आय लगिस। भलुवा ल अपन कोती आवत देख के मेंहर रूख म चघे लगेव। भलुवा तको रूख म चघे लगिस, त भइगे मेंहर अपन परान ल बचाये बर, रूख ले कूद गेव अउ पेट के बल अपन सांस ल रोक के,अपन तन ल मरे कस बना डारेव। मोर आगू- पीछू भलवा हर किंदर -किंदर के मोला सूंघीस अउ मोला हलाईस -डुलाईस  अउ मोला मरे जान के जंगल डहार नींगगे,फेर तुंहर मन के जंगल हुंकारू ल सुनके भगागे। मेंहर अब्बड़ बेरा ले अइसने परे रेहेव फेर भगवान ल सुमिर के उठेव अउ अपन परान ल बचावत दउड़त-दउड़त आवथव।

             जम्मो संगवारी मन रधिका ल पोटार के ओखर बुद्धि अउ चतुराई ल देखके अब्बड़ खुस होगिन। भगवान ल सुमिरन करिन अउ धन्यवाद करिन। सारदा बस तको उही बेरा आगिस. बस म बइठार के रधिका ल जिला अस्पताल लेगिन, उहां ओखर इलाज कराइन। चारो मुंड़ा पट्टी बंधागे रिहिस। डाक्टर हर दवई तको खाय बर दिस अउ रधिका के बहादुरी के सराहना करे लगिस। उही बेरा पत्रकार मन ओखर फोटु खिंचिन अउ ओखर साहस के बड़ाई करिन  के भलुवा ल चकमा देके रधिका हर मउत ल तको चकमा दे दिस।

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                        लेखिका

             डॉ.  जयभारती चंद्राकर

                     सहायक प्राध्यापक

                         रायपुर (छ.  ग.)

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उड़िया जाही हंस अकेला

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      माटी के तन माटी म मिल जाही,कतको संभाल राखो इही हंस उड़िया जाही।का राजा - रंक के,का अमीर-गरीब के, का डॉक्टर- कलेक्टर के जम्मो गुन इही जग म बगराही, फेर माटी के तन माटी म मिल जाही, हंस अकेला उड़िया जाही।

       अब्बड़ उदिम करिन डॉक्टर के परान बाच जाय । जम्मों गरियाबंद के रहिवासी के तीर-तखार के जम्मों गंवई गाँव के लोगन मन अपन डॉक्टर के जीव बांच जाय।ऐखर सेती अपन-अपन देवता धामी ल सुमिरन करिन। प्रार्थना  सभा करिन,के डॉक्टर हर बांच जाय।फेर विधि के विधान ताय,जम्मों ओखी हर फेल होगे अउ डॉक्टर के परान पखेरू उड़ियागे।पंछी परेवा उड़ियागे। 

       जम्मों लोगन मन के आँखी म धारे-धार आँसू बोहाय लगिस। हमर डॉक्टर सुवरग वासी होगे,अब हमर इलाज ल कोन करही।

        आज बिहिनिया ले जम्मों गरियाबंद के दुकान बंद होगे,लोगन मन सोक म समागे।डॉक्टर के गुन के बखान हर जम्मों मनखे के हिरदय म समागे।का अमीर- गरीब, नेता,अधिकारी कर्मचारी,सियान ,लइका-पिचका,माईलोगन मन ओखर दुवारी म जुरियाय लगिन।

मुसलिम समाज के रीति-रेवाज ले डॉक्टर के तन ल ताबूत म घर के दुवारी म राखिन।जम्मों जुरिया लोगन मन के आँखी म आँसू बोहाय लगिस।जात-पांत के भेद ले उप्पर ,मनखे बर देवदूत रिहिस डॉक्टर मेमन हर दस-बीस रुपिया फीस ले के गरियाबंद के आदिवासी कमार,भुंजिया लोगन मन के इलाज करत रिहिस।अधरथिया  म तको मरीज ल देखे बर दूरिहा-दूरिहा गाँव रेंग देत रिहिस।

     जुरिया भीड़ म हिन्दू,मुसलमान,सिख , 

ईसाई अउ आदिवासी परिवार,कमार ,भुंजिया मन अब्बड़े संख्या म डॉक्टर के परिवार के संगे -संग जुरियाय रिहिन।

         भीखम के लुगाई हर त गोहार पार के रो डरिस अउ कहे लगिस- " हमर डॉक्टर ते हर जी जतेस ,अभे हमर का होही, हमरे अउ लइका-पिचका के इलाज ल कोन करहि।" दयाबती हर कहे लगिस-" डॉक्टर के देहे दवई  म हमन दु-तीन दिन म बने हो जात रेहेन। "

     सुकारो  कहे लगिस- "मनखे-मनखे मां अंतर ,कोनो हीरा त कोनो कंकर' हमर डॉक्टर हर हीरा अस रिहिस।वोखर बोली हर देवता अस रिहिस।मोर कना डॉक्टर ह गोठियावय अउ कहाय -'का ओ दाई बने लागिस ,ले अभी कुन पइसा नई धरे हस त रहन दे ,तोर कना जभे पइसा होही, त दे देबे।अभे कुन इही दवई ल खा अउ जल्दी बने हो जा।' आज इही गोठ हर अब्बड़े सुरता आवत हे।" अइसना कहिके गोहार पार के रो डरिस।ओखर गोठ अउ रोवई ल सुन के जम्मों जुरियाय मनखे मन के छाती हर फाटे अस लागिस।जम्मों लोगन के आँखी म आँसू धारे-धार बोहाय लगिस।

        गरियाबंद के लोगनमन अउ तीर तखार के लोगनमन अपन देवता डॉक्टर के अंतिम दरसन करत,ओखर जनाजा म रद्दा म फूल ल बिछा दीन।जेन डॉक्टर हर जम्मों लोगन मन  के परान ल बचात रिहिस,तेन डॉक्टर के परान ल लोगन मन नइ बचा पाइन।

अपन मयारू,देवदूत ल बिदा करत, हिदय म पथना राख डरिन ।जम्मो लोगनमन ल मया करइया,जम्मो के मयारूक डॉक्टर मेमन हर देवदूत रिहिस,अपन देव लोक म रेंग दिस। माटी के तन माटी म मिलगे अउ जीव हर उड़ियागे।


                            लेखिका

        डॉ.जयभारती चंद्राकर 

              छत्तीसगढ़ 

मोबाइल न. 9424234098

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 समीक्षा--पोखनलाल जायसवाल:

 जात-धरम ले ऊप्पर होथे, मनखे के करम। मनखे के सद्-करम अउ सद् बेवहार ह जग म ओकर नवा पहिचान बनथे। जन-जन के हिरदे म जघा बनाथे। माटी के चोला माटी म मिलना च हे। ए संसार म का हे? जे नश्वर नइ हे। तभे तो कहे जाथे- मनखे! तैं जतन कर लाख, होना च हे एक दिन राख। जिनगी के इही सार ल पहिचाने के जरूरत हे। जेला जान के अनजान बने रहिथे मनखे।

       जब माटी म मिलना च हे, राख होना च हे त का के गरब अउ अभिमान? साँसा के डोर के राहत ले जिनगी के ठाठ (गाड़ी)ल हाँक ले। नर सेवा नरायण सेवा मान के, कखरो हिरदे ल झन दुखा। 

        कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये।

       ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये।।

       कबीर के ये सीख ल असल जिनगी म अपना के जिनगी जियइया कतको हें। अइसन जिनगी जिए बर धन-दोगानी, मान-सम्मान अउ पद के लालच छोड़ के नवा रद्दा बनाना परथे। ये रद्दा जतके सरल होथे, ओतके कठिन घलव होथे। इहू ह एक तपस्या आय। जे ल घर परिवार म रहिके करे जा सकथे। जौन सब के दरी नइ हो सकय। सब के वश के बात नोहय। समाज ल इही मन नवा उजास देथे। मनखे-मनखे म फरक नइ करयँ। 

         सुग्घर कथानक ल लेके कहानी गढ़े के बढ़िया प्रयास हे। बढ़िया संवाद हे। मोर विचार म अभी ए कहानी नइ बन पाय हे। अभी एक वृत्तांत हे, ए अलग बात ए कि कहानी घलव वृत्तांत होथे, जेमा कल्पना के संग एक मोड़ (घटना) रहिथे। जेन ह कहानी अउ वृत्तांत म बारीक विभाजन रेखा खींचथे। अभी लोकप्रिय मनखे के परलोक गमन के शोक म बूड़े वृत्तांत लगत हे।


        जात-धरम ले ऊपर उठे अउ समता के संदेश बगरावत सुग्घर सृजन बर बधाई