Friday, 24 February 2023

महतारी भाँखा

 महतारी भाँखा

मोला अपन महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी उपर गरब हे।दाई के भाखा ही मातृभाषा आय। मोर महतारी के भाखा छत्तीसगढ़ी रहिस, तब मोरो भाखा आरुग छत्तीसगढ़ी आय।हिन्दी मोर पढ़े लिखे अउ कामकाज के भाखा बनिस। फेर छत्तीसगढ़ी मोर गली गाँव, घर द्वार, मेला मड़ई, नाता गोता, हाट बजार के भाखा आय। छत्तीसगढ़ी मोर डोंगरी पहाड़,खेती खार, तरिया डबरी घाट- घटौंदा के भाखा ये। छत्तीसगढ़ी इहाँ के दाऊ, मंडल, किसान, मजदूर अउ बनिहार - बनिहारिन के भाखा ये।पनघट, गोठान, बरदिहा अउ पनिहारिन के भाखा ये।

छत्तीसगढ़ी मोर अंतस मा समाय हे, जउन हा ददरिया, करमा, पंथी, पांडवानी, नाचा, चंदैनी, सुआ, बांसगीत, बिहाव अउ गौरी गौरा गीत के रूप मा प्रकट होथे। छत्तीसगढ़ी हे तब डुबकी हे, कड़ही हे।बोहार भाजी अउ तिवरा भाजी के साग हे। फरा हे, चीला हे। भात हे बासी हे, पेज हे पसीया हे, कोदो हे कुटकी हे।तसमई अउ सोंहारी हे।अपन भाखा के अपन मिठास। मैं इंकर बिना नइ रहे सकौं। सहर मोर जीविकोपार्जन के जगा आय। फेर गांव मा लाख बुराई पावँव, हरौं खाटी गवइंहा।छत्तीसगढ़ी मोर संवाद के भाखा ये। छत्तीसगढ़ मा कोन हे जेन छत्तीसगढ़ी नइ जानय।नइ जाने के नखरा करने वाला बहुत हे। उड़िया, बिहारी, अवधी, यूपी, राजस्थानी झारखंडी, मैथिल, हरियाणवी, बोलने वाला मन जगा छत्तीसगढ़ी में संवाद आसान हे। हिंदी के समस्त लोकबोली मा खून के रिश्ता हे। अपन अपन बोली भाखा मा गोठियाही एक दूसर संग तो सबो समझही। हमर भाखा हमर गुमान।


छत्तीसगढ़ी हे तभे तक छत्तीसगढ़ी संस्कृति घलो हे। जइसे जइसे भाखा मरत जाही हमर संस्कृति अउ संस्कार घलो नंदावत जाही।हमर पहचान ही छत्तीसगढ़ से हे। छत्तीसगढ़ी ले हे। हम कहाथन छत्तीसगढ़िया। हमर स्वाभिमान आय छत्तीसगढ़ी ।हमर अस्तित्व आय छत्तीसगढ़ी। हमन अपन लोग लइका ला विदेश मा टांग के गरब करत हन। फेर यहू जान लौ, एक पीढ़ी बाद ही वो ये पहिचान ला भूल जाही। अपन घर परिवार अउ संस्कार ला भूल जाही। फेर यहू बात हे कि जब भी दुनिया मा बाहरी वाद के खिलाफत होथे अपन देश अपन मूल मातृभूमि के कोख मा ही जगह पाथे। 

आवौ छत्तीसगढ़ी ला अपन संवाद के भाषा बनावन। छत्तीसगढ़ी एक संपूर्ण अउ समृद्ध भाषा आय। संप्रेषण क्षमता मा कोई कमी नइ हे। कमी हे तो हमर मानस मा। हमर ताकत ये छत्तीसगढ़ी। छत्तीसगढ़ी हे तभे तक हम असली छत्तीसगढ़ी हन। मातृभाषा के उपेक्षा करके हम विकास के सपना देखबो तो अधूरापन ही रइही। समय बदलत जावत हे।विद्वान मन के राय रहे हे कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा मा ही होना चाही, तभे बच्चा मन के सर्वांगीण विकास होथे। एकर कारण नवा शिक्षा नीति मा मातृभाषा मा प्रारंभिक शिक्षा के बात ला जोड़े गेहे। 

आप सब ला मातृभाषा दिवस के गाड़ा गाड़ा बधाई अउ शुभकामना ।आवव हम आज संकल्प लेवन कि हम अपन लोग लइका ला कतको उच्च शिक्षा देवन, अंग्रेजी हिन्दी संस्कृति अउ दुनिया के कोनों भी भाखा के ज्ञान देवन, अपन भाखा ले उन ला वंचित नइ रखन। अपन संस्कार अपन पहचान ला नइ भुलावन दन। 


हम गोठियाबो तभे पूरा छत्तीसगढ़ गोठियाही। 


जय छत्तीसगढ़। 

जय छत्तीसगढ़ी।। 


बलराम चंद्राकर भिलाई

महतारी भाँखा के जतन जरूरी हे

 महतारी भाँखा के जतन जरूरी हे


                     कखरो भी मुख ले निकले कोनो शब्द तब तक भाँखा नइ कहिलाये जब तक कि वो कोनो ला समझ मा नइ आ जाय, नही ते मनखे के आलावा चिरई- चिरगुन, कुकुर- बिलई, कीट- पतंगा ----- मनके बोली घलो भाँखा कहिलातिस। कोनो भी भाँखा कइसे बनिस? कोन बनाइस? कतिक महिनत लगिस? कतिक दिन मा बनिस? येखर बारे मा तनिक सोचबों ता, कोनो भी भाँखा ला छोटे- बड़े कहिथन तेखर भ्रम दुरिहा जही, हाँ कोनो भी भाँखा के बोलइया कम जादा हो सकथे, फेर भाँखा के निर्माण के प्रक्रिया अउ काम एके हे। लइका जने के बाद महतारी जइसे लइका के पालन-पोषण करत, वोला जिंदा रखथे, वइसने भाँखा ला जिंदा रखथे बोलइया मन। लइका बड़े होके अपन अकड़ गुमान या स्वारथ मा महतारी बिन रहि सकथे, फेर भाँखा बोलइया बिन नइ जी सके। महतारी अउ महतारी भाँखा ले दुरिहाई बने बात नोहे। जइसे कोनो लइका अपने महतारी ला महतारी कहिथे, कोनो आन ला नइ कहय, वइसने महतारी भाँखा ला घलो ओखर जनइया मन ला बोले, बउरे बर लगही। आन मनके मुँह ताकना गलत हे।  जइसे मातृ अउ मातृभूमि ला सरग ले बढ़ के हे केहे गेहे, वइसने बड़का हे मातृभाषा। जनम देवइया अउ पालन करइया ददा दाई के मुख के बोली लइका बर महतारी भाँखा बोली आय, जेमा दया, मया, ममता घुरे रहिथे।


                     कोनो भी भाँखा बोली कागज पाथर मा कतको लिखा जाये, यदि बोलइया समझया नइ रही ता, प्राचीन काल के कतको भाँखा- बोली अउ लिपि कस कोनो संग्राहालय मा माड़े रहि जाही या फेर बिरथा हो जही। मनखे अपन मन के भाव ला भाँखा मा उतारथे, जेला समझ के आन मनखे ओखर संग जुड़थे। भाँखा मनखे ला जीव जानवर ले अलगाथे,भाँखा बिन मनखे, मनखे मनले नइ मिल सके। भाँखा भाव, भजन, भ्रमण सबे बर जरूरी हे। मनखे भले सुख मा दाई, ददा ला नइ सोरियाही, फेर आफत मा ए ददा, ए दाई कहिबेच करथे। कहे के मतलब महतारी अन्तस् मा रचे बसे रहिथे, वइसनेच आय महतारी भाँखा। भले देखावा मा मनखे महतारी अउ महतारी भाँखा ला बिसार देथे, फेर आचार, विचार, संस्कार के दाता उही आय। महतारी भाँखा के संग मनखे के दया-मया, संस्कृति अउ संस्कार जुड़े होथे। महतारी भाँखा ले दुरिहाना मतलब अपन संस्कृति अउ संस्कार ला तजना हे। आज अपन भाँखा बोली के बढ़वार बर खुदे ला महिनत करे के जरूरत हे। कोनो भी चीज ला बनावत बड़ बेर लगथे, फेर उझारत छिन भर। अइसन मा चलत कोनो भाँखा बन्द हो जाय, दुर्भाग्य के बात हे। जइसे पानी ढलान कोती बहिथे, वइसने भाँखा घलो सरल कोती भागथे। अपन जुन्ना बोली बचन अउ माटी जे सुवाद मा नवा जमाना के शब्दकोश ला शामिल करत, कठिन ले सरल के रथ मा सवार होके, उदार भाव ले सबला स्वीकारत आज कोनो भी भाँखा बोली के अस्तित्व ला बचाये के उदिम करना चाही,तभे नवा जमाना संग जुन्ना बोली भाँखा टिक पाही। छत्तीसगढ़ी सवांगा पहिर के फ़ोटो खींचाय ले कुछु नइ होह, अन्तस् के निर्मल भाव अउ समर्पण जरूरी हे, नही ते देखावा रूपी सुरसा के मुँह मा कतको चीज समा जथे।


                    ये दुनिया विशाल हे। आज नवा जमाना मा मनखे सबे देश राज संग जुड़ के चलत हे। गाँव, शहर ले, शहर, महानगर अउ देश-विदेश ले जुड़े हे। सियान मन हाना मारत कहिथे कि, कोश कोश मा पानी बदले अउ  चार कोश मा बानी।  माने दुनिया मा बड़ अकन भाँखा  हे, जेखर पार पाना मुश्किल हे। आज मनखे सबे संग कदम ले कदम मिलाके चलत हे, अइसन मा एक सम्पर्क भाँखा जरूरत बन जाथे। मनखे ला महतारी भाँखा के संगे संग अपन देश अउ विश्व भर मा प्रचलित मुख्य भाँखा ला बोलना अउ समझना चाही। पहली संचार अउ सोसल मीडिया के अतिक व्यापकता नइ रिहिस, ना सबे मनखे के विश्वभर मा जाना आना, ते पाय के  वो समय मनखे मन एक या दुये भाँखा जाने, पर आज अपन अस्तित्व बर महतारी भाँखा के संगे संग सम्पर्क भाँखा ला जानना जरूरी हे। भारत मा आज हिंदी सबे कोती बोले समझे जावत हे। संगे संग व्यापारिक भाषा के रूप मा अंग्रेजी जम्मो देश मा पाँव पसारत हे। मनखे मन ला अपन महतारी भाँखा के संग हिंदी, अउ अंग्रेजी के ज्ञान घलो होना चाही। आज के लइका मानसिक रूप ले ये सब बर तियार हे, कोनो लइका मन  ऊपर  एक ले अधिक भाषा ला बोले सीखे बर कहना,थोपना नही, बल्कि आज के जरूरत के रूप मा, बहुभाषी बनना कहे जाथे। एक भाषा ला धरके चलना आज सम्भव नइ हे, काबर कि मनखे जुड़ चुके हे, सरी दुनिया संग। आज भाषा जमाना के  नवा रूप के संग, सोसल मीडिया मा घलो जघा बनावत जावत हे। सब ला अपन महतारी भाँखा ला नवा दशा दिशा देना चाही, ओखर प्रसिद्धि अउ बढ़वार बर सोचना चाही। अनुवादिक एप, गूगल, टाइपिंग जैसे आज के जरूरी एप मा महतारी भाँखा दिखे, एखर बर आज के बुधियार लइका मन ला बूता करना चाही, ताकि भाषा सोसल मीडिया मा  घलो जिंदा रहे अउ सबला सहज समझ आये, तभे भाँखा के उमर बाढ़ही।


अपन भाँखा के मान करव ,

दूसर भाँखा के सम्मान करव।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


महतारी भाँखा दिवस के आप सबो ला सादर बधाई,

21 फरवरी - महतारी भाषा दिवस मा मोर विचार

 21 फरवरी - महतारी भाषा दिवस मा मोर विचार 


  कतको इतिहासकार मन के मत हे कि हमर छत्तीसगढ भगवान श्री रामचंद्र के माता कौशल्या के मईके हरे. छत्तीसगढ़ के पुराना नांव कोसल रिहिस  अउ इहां के भाषा ल कोसली कहे जाय.कौशल्या के नांव भानुमति रिहिस जउन ह दक्षिण कौशल के महाप्रतापी राजा  भानुमनत के बेटी रिहिन. अयोध्या के राजा दशरथ के महारानी भानुमति कौशल प्रदेश के होय के कारन आगू चलके कौशल्या कहलाइस. आदिकाल म छत्तीसगढ़ महाकौशल  नांव ले प्रसिद्ध रहे हे. श्रीराम के जनम भले अयोध्या म होय हे पर कर्मभूमि छत्तीसगढ़ रहे हे. श्रीराम के ननिहाल दक्षिण कौशल म चंदखुरी (आरंग) हरे. बाल्मिकी द्वारा रचित रामायण के अनुसार सूर्यवंशी श्री राम अपन वनवास काल म लगभग बारह बछर तक इही छत्तीसगढ़ (सिहावा) राज्य म वो समय के सप्तऋषि क्षेत्र म बिताय रिहिन.


हैदरअली अउ रत्नदेव के बाद पृथ्वी देव,जाजल्व देव चेदीवंशीय राजा मन कोसल प्रदेश म ३६ किले (गढ़) बनवाइस.येकर अलावा गोंड राजा मन घलो गढ़ बनवाइस.चेदीवंशी राजा मन के कारन ये राज के नांव चेदीसगढ़ रखे गिस जो आगू चलके छत्तीसगढ़ कहलाइस. तेकर सेति इहां के कोसली भाषा ह घलो छत्तीसगढ़ी कहलाय लागिस.  छत्तीसगढ़ी अब्बड़ पुराना भाषा आय .राज्याश्रय नइ मिल पाय के कारन छत्तीसगढ़ी के लीखित रुप विकसित नइ हो पाईस.पर इहां के जन जीवन म ये भाषा ह मौखिक रूप ले बराबर फूल -फरत अउ बाढ़त रिहिस.अउ आजो सही ढंग ले राज्याश्रय नइ मिल पाय के कारन संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल नइ हो पात हे. 


आज छत्तीसगढ़ राज्य बने बाईस बछर होगे. अलगे छत्तीसगढ़ के मांग अंग्रेज शासन के समय ले करे जात रिहिस. हमर छत्तीसगढ ह मध्यप्रदेश संग चौंवालीस बछर तक रिहिस. अलगे छत्तीसगढ़ राज बर हमर पुरखा मन अब्बड़ लड़ाई लड़िन हे. राजनीति दल के संगे संग हमर छत्तीसगढ के साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार अउ मजदूर, किसान मन के गजब सुग्घर योगदान हे. ये बहुत बढ़िया बात हे कि छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन म कोनो किसम के खून- खराबा, सरकारी संपत्ति ल नुकसान  नइ पहुंचाय गिस. ये हमर छत्तीसगढ के बड़का उपलब्धि हरे.आप सब ल मालूम हे कि 

आने राज बने म नंगत खून खराबा होय हे. 

  छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना म इहां के साहित्यकार अउ कलाकार मन के गजब सुग्घर योगदान हे.


कोनो भी देश अउ राज्य के पहिचान उहां के भाषा के माध्यम ले होथे.अपन स्वाभिमान, अतीत के गौरव, संस्कृति के रक्षा अउ विकास बर अपन मातृभाषा सबले बड़का माध्यम होथे. वइसने छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ के आत्मा हरे. हमर छत्तीसगढ़ी ह आठवीं अनुसूची म शामिल होय बर लड़त हे.


आवव अब छत्तीसगढ़ी साहित्यकार के व्यक्तित्व अउ कृतित्व के चर्चा करथन -


धनी धर्मदास - संत धर्मदास संत कबीर के शिष्य रिहिन. उंकर जनम  सन १३९५ म कसौदा गांव , बाधोगढ़,के वैश्य परिवार म होय रिहिन हे.  उन्कर कर्म क्षेत्र छत्तीसगढ़ रिहिन. बांधो गढ़ पहिली छत्तीसगढ़ म रहिस हे.१४५२ म वो सत्यलोक प्रयान करिन. हेमनाथ यदु जी ह धर्मदास ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि मानथे.  वोहर कवर्धा (कबीरधाम) म कबीर पंथ‌ के स्थापना करिन. वोहर संत कबीर ले प्रेरित होके निर्गुन भक्ति के कतको पद के रचना छत्तीसगढ़ी भाषा म करिन. वोकर पद म हमला छत्तीसगढ़ी भाषा के पुराना रूप के दर्शन होथे.  छत्तीसगढ़ी चौका गीत म धर्मदास के नांव के उल्लेख हे.ये ह लोकगीत अउ लोक भजन के रूप म गजब प्रसिद्ध हे. संत धर्मदास ह लोक गीत के सहज,सरल शैली म निगूढ़तम दार्शनिक भावना ल अभिव्यक्त करिन. धर्मदास के उद्देश्य साहित्य सृजन करना नइ रिहिस. वोहर

तो निर्गुन भक्ति के प्रचार के रूप म छत्तीसगढ़ी ले प्रभावित होके पद लिख के संतोस कर लेइस.


जमुनिया की डार मोरी टोर देव हो।

एक जमुनिया के चउदा डारा,सार शबद ले के मोड़ देव हो.


मोर हीरा गवां के कचरा में, कोई पूरब,कोई पछिमम बतावै, कोई बतावै है पानी पथरा में।


छत्तीसगढ़ के संस्कृति, साहित्य अउ धर्म परंरपरा के बढ़वार म संत धर्मदास के अब्बड़ योगदान हे.


दलपत राव - खैरागढ़ के राजा लक्ष्मी निधि राय के चारण कवि दलपतराव ह सबले पहिली छत्तीसगढ़ शब्द के प्रयोग १४९४ ई.म करे रिहिन.


सुंदर राव - देवी प्रसाद शर्मा,बच्चू जाजगीरी है खैरागढ़ के कवि सुंदर राव ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि बताय हे. १६४६ म रचित उंकर कविता म छत्तीसगढ़ी के पुट कम दिखथे अउ अवधी के नजदीक जादा दिखथे. 


गोपाल मिश्र और माखन मिश्र-  


 गोपाल मिश्र रतनपुर के हैहयवंशी राजा राज सिंह के राजकवि अउ दीवान रिहिन.राम नरेश त्रिपाठी ह उंकर जनम १६३३अउ 

प्यारेलाल गुप्त ह १६३४ माने हे. उंकर रचना' खूब तमाशा' अब्बड़  प्रसिद्ध होइस.उंकर आखिरी अपूर्ण ग्रंथ 'राम प्रताप' ल वोकर सुयोग्य बेटा कवि माखन मिश्र ह 

पूरा करिन.   हरि ठाकुर के कहना हे कि गोपाल मिश्र एक महान कवि रिहिन पर वो मन अपन साहित्य के रचना छत्तीसगढ़ी म नइ करिन. येला छत्तीसगढ़ी के दुर्भाग्य ही कहे जा सकथे.


बाबू रेवा राम - बाबू रेवा राम बहुमुखी प्रतिभा के धनी रिहिन. वोकर जनम रतनपुर म सन् १८१३ म होय रिहिस. वोहर हिंदी, संस्कृत, ब्रजभाषा,अउ छत्तीसगढ़ी के बढ़िया जानकार रिहिन हे. संगे संग उर्दू अउ फारसी म घलो अधिकार रखे. हरि ठाकुर जी के अनुसार रेवाराम बाबू छत्तीसगढ़ी म कुछ भजन लिखा के थिरागे. समीक्षक अउ भाषाविद् डा. विनायक कुमार पाठक के कहना हे कि बाबू रेवा राम के रचना 'सिंहासन बत्तीसी'  म छत्तीसगढ़ी के पुट देखे ल मिलथे.


प्रहलाद दुबे - सत्रहवीं शताब्दी म सारंगढ़ निवासी प्रहलाद दुबे के रचना 'जय चंद्रिका ' म छत्तीसगढ़ी के प्रकृत रूप देखे ल मिलथे.


संत घासी दास - संत घासीदास के जनम छत्तीसगढ़  के गिरौदपुरी म  होय रिहिस हे. सतनाम पंथ के संस्थापक संत घासी दास के उपदेश छत्तीसगढ़ी म लिखे गे हवय. उंकर रचना म संसारिक संबंध के असारता अउ ईश्वरीय  कृपा के प्राप्ति के इच्छा ह झलकथे. 'चल हंसा अमर लोक जइबो ' अउ ' खेलथे दिन चार मइहर मा '  जइसन पद येकर उदाहरण हे.


नरसिंह दास वैष्णव - समीक्षक डा.विनय कुमार पाठक ह जांजगीर जिले के गांव तुलसी निवासी नरसिंह दास वैष्णव ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि मानथे. उंकर रचना शिवायन (१९०४)म आय रिहिस.


पंडित सुंदरलाल शर्मा - डा. नरेन्द्र देव वर्मा ह छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि चमसूर ( राजिम)निवासी, छत्तीसगढ़ के गांधी  पंडित सुंदरलाल शर्मा ल मानथे.छत्तीसगढ़ी म 

बड़का सृजन करइया वो पहिली रचनाकार रिहिन. १९०६ म प्रकाशित' छत्तीसगढ़ी दान लीला ' अब्बड़ प्रसिद्ध होइस.येहा छत्तीसगढ़ी के पहिली प्रबंध काव्य माने जाथे. ये कृति ह हमर छत्तीसगढ के साहित्यकार मन ल छत्तीसगढ़ी म लिखे बर प्रेरित करिन. उंकर देहावसान २८ दिसंबर १९४०म होइस.


पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय - नंद किशोर तिवारी जी ह पं.लोचन प्रसाद पाण्डेय ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि बताय हे. अइसने दया शंकर शुक्ल ह घलो' कविता कुसुम ' १९०८-०९ म‌ प्रकाशित उंकर छत्तीसगढ़ी कविता ल छत्तीसगढ़ी के पहिली रचना माने हे. 


हरि ठाकुर -  सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर प्यारेलाल लाल सिंह जी के पुत्र, छत्तीसगढ़ी गीतकार हरि ठाकुर जी छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन ले 1956 ले जुड़ गे रिहिन. उंकर रचना म छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान झलकथे. छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर खण्ड काव्य अउ छत्तीसगढ़ी गीत अउ कविता लिख के छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ल जगाइस. राजनांदगांव के विद्रोही कवि कुंज बिहारी चौबे जी के छत्तीसगढ़ी कविता मन के संपादक करिन.


डा.नरेंद्र देव वर्मा - छत्तीसगढ़ राज्य गीत -अरपा पैरी के धार महानदी हे अपार... के रचयिता डा. नरेन्द्र देव वर्मा हरे. ये गीत ह छत्तीसगढ़वासी मन के स्वाभिमान ल जगाय के काम करिन. सोनहा बिहान के लेखक.


लक्ष्मण मस्तुरिया - दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा स्थापित' चंदैनी गोंदा' बर गीत लिख के स्थापित होय लक्ष्मण मस्तुरिया जी के छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना म अब्बड़ योगदान हे. उंकर लिखे गीत - 'मोर संग चलव रे' अउ  'मंय छत्तीसगढ़िया अंव रे'  ह अलग छत्तीसगढ़ राज्य के नेंव तइयार करिस.


संत कवि पवन दीवान - संत कवि पवन दीवान जी ह प्रवचन अउ कवि सम्मेलन के माध्यम ले अलगे छत्तीसगढ़ राज्य बर जनता मन ल जागरुक करिन. छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन म गजब योगदान दिस. दीवान जी के गीत 'तोर धरती तोर माटी ' ले छत्तीसगढ़वासी मन म जागृति आइस.


गिरिवर दास वैष्णव - छत्तीसगढ़ सुराज गीत


डॉ निरुपमा शर्मा- डॉ निरुपमा शर्मा छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवित्री माने जाथे . उंकर पतरेंगी रचना के अब्बड़ सोर होइस.


अइसने  छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन म  बंशीधर पांडे ,सीताराम मिश्र ,लखन लाल गुप्त, प्यारे लाल गुप्त, नारायण लाल परमार, भगवती लाल सेन,चतुर्भुज देवांगन ,हनुमंत नायडू  कुंजबिहारी चौबे,द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र जी, कोदू राम दलित, मेहत्तर राम साहू जी, डॉ.खूबचंद बघेल, केयूर भूषण, श्याम लाल चतुर्वेदी, दानेश्वर शर्मा, रामेश्वर वैष्णव, नंदकिशोर तिवारी, डॉक्टर परदेशी राम वर्मा,डा.विमल कुमार पाठक,‌ बसंत दीवान,शिव शंकर शुक्ल, डा.बल्देव साव,डा. बिहारी लाल साहू, डॉक्टर बलदाऊ राम साहू, रामेश्वर शर्मा, लाला जगदलपुरी,विश्वंभर यादव मरहा, डा. गोरे लाल चंदेल,डा. जीवन यदु, रामेश्वर वैष्णव,डा.पीसी लाल यादव , पं. नूतन प्रसाद शर्मा, कुबेर सिंह साहू, डा. दादू लाल जोशी,मुकुंद कौशल  उधो राम झखमार , रामेश्वर वैष्णव,सुरेन्द्र दुबे, मीर अली मीर, संजीव बक्शी, संजीव तिवारी, शत्रुघन सिंह राजपूत ,हेमनाथ यदु, सुरजीत नवदीप ,गणेश सोनी प्रतीक, दुर्गा प्रसाद पाकर ,सुशील भोले, गुलाल वर्मा ,डॉक्टर धुर्वे नंदन , डा.दीनदयाल साहू ,प्यारेलाल देशमुख ,संतराम निषाद,सीता राम साहू श्याम , डॉक्टर रामनाथ साहू, टिकेंद्र टिकरिहा गजानंद देवांगन, चंद्रहास साहू, ध्रुव राम वर्मा, अरुण कुमार निगम,  डॉ निरुपमा शर्मा,डॉ सुधा वर्मा ,डॉक्टर सत्यभामा आडिल, सरला शर्मा, बसंती वर्मा,शोभा मोहन श्रीवास्तव,आशा देशमुख सहित कतको रचनाकार मन अपन रचना के माध्यम ले छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना अपन योगदान दिस. कतको साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन म भाग लिस. 


छत्तीसगढ़ी शब्दकोश, व्याकरण म हीरालाल काव्योपाध्याय  डॉ क्रांति कुमार ,शंकर शेष, डा.पालेश्वर शर्मा डॉक्टर नरेंद्र  देव वर्मा ,भालचंद राव तैलंग ,नरेंद्र कुमार सौदर्शन ,रमेशचंद्र महरोत्रा, मन्नूलाल यदु ,साधना जैन,डॉक्टर विनय कुमार पाठक, डॉक्टर चंद्र कुमार चंद्राकर, पुनीत गुरु वंश ,डॉक्टर विनोद वर्मा ,डॉ गीतेश अमरोहित  जइसन विद्वान मन पोठ काम करे हे. 


पाछु पांच बछर ले छंदविद  अरुण कुमार निगम द्वारा स्थापित छंद के छ छत्तीसगढ़  के माध्यम ले छत्तीसगढ़ के कवि मन छत्तीसगढ़ी म छंदबद्ध रचना करके छत्तीसगढ़ी साहित्य के कोठी ल़

 समृद्ध करत हे. 

छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर ग्रुप के माध्यम ले पद्य के  गद्य म   सुघ्घर काम चलत हे  जउन छत्तीसगढ़ी साहित्य ल बढ़वार करत हे.



          ओमप्रकाश साहू" अंकुर"


        सुरगी, राजनांदगांव

किताब के गोठ// लइकई ल आॅंखी-आॅंखी म झुलावत 'फुरफुन्दी'


 

किताब के गोठ//

लइकई ल आॅंखी-आॅंखी म झुलावत 'फुरफुन्दी'


    मयारुक रचनाकार कन्हैया साहू 'अमित' के हाले म आए बाल कविता संग्रह 'फुरफुन्दी' ल हाथ म धरते अपन लइकई ह आॅंखी-आॅंखी म झुले लागिस. जब हमन फुरफुन्दी के पाछू भागत-भागत बारी-बखरी के संगे-संग स्कूल तक चल देवत रेहेन, अउ लहुटत घलो उहिच उदिम म बूड़े राहन. कभू-कभू तो फुरफुन्दी के पूछी म सुतरी बॉंध के संगी मन संग रेस घलो लड़ा देवन, के काकर फुरफुन्दी जादा उड़ियाथे.


    फुरफुन्दी किताब के भीतर म अमाते अपन लइकई के संगे-संग अपन नाती-नतुरा मन संग खेलत, उनला लुढ़ारत अउ कुछ बने बुता करे के गोठ सिखोवत जम्मो दृश्य ह चित्रमय कविता संग दिखे लागिस.


    आज के छत्तीसगढ़ी लेखन म चारों खुंट गहराई अउ चिंतन-मनन देखे म आवत हे. अब गरब होथे इहाँ के रचना संसार ल देख के अउ मन म भरोसा जागथे, के अब एला कोनो भी लोकभाषा संग सरेखा कर के देखे जा सकथे. खासकर अभी लेखन म सक्रिय नवा पीढ़ी जेन किसम ले हर विषय अउ हर विधा म कलम चलावत हे, वो ह अंतस ल आनंदित करने वाला हे.


    कन्हैया साहू जी प्राथमिक शाला म शिक्षक होए के संगे-संग एक सिद्धहस्त छंदबद्ध कविता के रचनाकार घलो आय, एकरे सेती उंकर ए संकलन म उंकर ए दूनों रूप के चिन्हारी मिलथे. नान्हे लइका मनला कक्षा म पढ़ावत-सिखावत उन उंकर मन-अंतस म झॉंके अउ टमड़े के उदिम करथें, उही मनला अपन कविता के विषय घलो बना लेथें. ठउका अइसने छंदबद्ध कविता लेखन म पारंगत होय के सेती उंकर जम्मो रचना मन म लय-ताल सउंहे दिखे लगथे. जब ए मनला पढ़बे त मन मस्तिष्क म सुर-ताल अपने-अपन गूंजे लागथे. देखव उंकर घरघुॅंदिया  खेले बर बलावत कविता ल-


आवव अघनू, अगम, अघनिया.

खेलन फुतका मा घरघुॅंदिया.. 

घर अॅंगना अउ कोलाबारी.

सुग्घर सबके पटही तारी.. 


    लइकई म फिलफिली चलाय के अपने च आनंद  होथे. देखव ए डॉंड़ ल-


चलय फिलफिली फरफर-फरफर. 

अपने सुर मा सरसर-सरसर.. 

रिंगी-चिंगी रंग मा रंगे.

चक्कर खाय हवा के संगे.. 

सनन-सनन ये बड़ इतरावय.

लइका मनला पोठ लुहावय.. 


    ए किताब के शीर्षक रचना फुरफुन्दी ल देखव-


लइकन ला भाथे फुरफुन्दी.

सादा, लाली, छिटही बुन्दी.. 

पकड़े बर लइका ललचाथे.

आगू-पाछू उरभट जाथे.. 

फूल-फूल मा झूमे रहिथें.

कान-कान म का इन कहिथें..

 

    रचना मन म ओ जम्मो विषय ल संघारे के कोशिश होय हे, जेन लइका मन बर आवश्यक होथे, एकर संगे-संग जनउला अउ हाना मनला घलो संघारे गे हवय. मच्छर जेला हमन छत्तीसगढ़ी म भुसड़ी कहिथन. एकर ले संबंधित ए जनउला देखव-


बिन बलाय मैं आथॅंव जाथॅंव.

फोकट म सुजी घलो लगाथॅंव.. 

साफ सफाई जे नइ राहय.

वोला तुरते रोग धराथॅंव.. 


    पान-सुपारी खवावत एक जनउला देखव-


पॉंच परेवा पॉंचों संग.

महल भितरी एक्के रंग.. 

एक जगा जम्मो सकलाय.

नइ कोनो पहिचाने पाय.. 


    जी. एच. पब्लिकेशन, प्रयागराज ले छपे ए बाल कविता संग्रह म कुल 47 कविता मनला संग्रहित करे गे हवय. कुल 64 पेज म सकलाय ए संग्रह के कीमत 150 रु. राखे गे हवय. 


    ए संकलन खातिर मैं रचनाकार कन्हैया साहू 'अमित' जी ल गाड़ा-गाड़ा बधाई संग शुभकामना देवत हौं, उन आगू घलो अइसन पोठ उदिम करत राहॅंय, छत्तीसगढ़ी के ढाबा ल भरत राहॅंय.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

लोक अउ साहित्यिक चेतना"

 "" "लोक अउ साहित्यिक चेतना" ""

       लोक अउ साहित्यिक चेतना एकर उपर बड़का विद्वान मन के गोठ जाने सुने बर मिलत रथे। अउ ये बिषय उपर कतको चर्चा होही कमती ही हो सकथे। आज कुछ विचार मन मा हिलोर मारिस त कुछ लिखागे। पहिली बात लोक - लोक माने आम जन मानस होथे। लोक समूह वाचक शब्द आय जेमा लिंग भेद नइ रहय। स्त्री पुरुष बुढ़वा जवान सब के समूह हर ही लोक आय। आगू के बात मा साहित्य चेतना आथे। अब यहू विचार करे जा सकथे कि आम जन मानस मा साहित्य के चेतना या चेतना मा साहित्य कइसे पनपिस होही। एकर सुत्रधार कोन हरे, कब के हरे। अउ कतको सवाल मन मा उथत रथे। चेतना माने चेतन या जागृत  अवस्था। जे हर लोक के संतुलित मानसिकता संतुलित व्यवहार ला दर्शाथे। चेतन या जागरूक अवस्था हर ही मनखे के पहिचान हो सकथे। नइते आदमी अउ पशु पक्षी मा भेद नइ रही जाही।

             मानवीय विकास के प्रक्रिया मा चेतना चैतन्यता विवेक अउ विचारशीलता हर नवा सृजन नवा निर्माण बर प्रेरित करिस होही। लोक के हर विकास क्रम मा एक ठन प्रयोग हर अंतिम रूप धारण करिस होही। लोक के बीच मा  आर्थिक विकास के चेतना संस्कृति अउ संस्कार के चेतना समाजिक स्वरूप के चेतना के सँग मनोरंजन के विकास बर चेतना जागिस। कभू कभू अइसे लगथे कि इन सब के कोनो न कोनो वाचिक या लिखित साहित्य हर ही चेतना जगाइस होही। हर छोटे बड़े क्रमिक विकास के प्रवृत्ति हर ही संस्कार हर बनत चले आगे। इही क्रम मा लोक के सँग एक बड़का प्रभावशाली तथ्य जुड़े मिलथे जेला साहित्य चेतना कहे जा सकथे। इही साहित्यिक चेतना हर मानवीय विकास के मूल हो सकथे। एकरे सेती साहित्य ला समाज के दर्पण अभी से नहीं बल्कि जबले साहित्य हर विचार अउ भावना ला लोक मा एक दूसर ले बाँटे के माध्यम बनिस तब ले कहत हे ये सोच हो सकथे। साहित्य समाज ला रसता देखाथे लोक के भीतर लोक कल्याणकारी भावना जगाथे। लोक मा व्याप्त विसंगति ला दूर करे के सीख देथे। उही कारण हे कि साहित्य सदा अमर रथे। अउ समय काल परिस्थित के हिसाब ले साहित्य के अलग अलग विधा नवा सँवागा के सँग लोक के बीच आवत रथे।

      मानवीय विकास के प्रक्रिया मा मनखे चेतना जागे ले डारा पाना मा तन ढकने वाला मनखे कपड़ा लत्ता के आश्रय तक आगे। अपन विचार ला लोक तक पहुंचाय बर लोगन वो तरकीब ला घलो अपनाइन जेकर माध्यम ले  कमती मा जादा सरल सहज के सँग गहिरा चिंतन शीलबात ला कहे जा सके। शायद इही प्रयास के  नाम हर ही साहित्य परगे। ये हमर कल्पना हो सकथे। साहित्य के दू विधा हे एक गद्य अउ दुसर पद्य। दुनो विधा मा अपन वात ला प्रभावशाली शब्द शिल्प के माध्यम ले लोक तक रखे जाथे। शुरुआती वाचिक परम्परा से लेके लिखित अउ आधुनिक मिडिया के जमाना तक साहित्य लोक के बीच समाहित हे। या यहू कहे जा सकथे कि  लोक हर साहित्य सँग जीथे। साहित्य मा सम्पूर्ण लोक कल्याण सम्पूर्ण मानवीय विकास के चिन्तनशील विषय वस्तु रथे। इही कारण हे कि लोक मा साहित्य के प्रति चेतना कतको जुग ले जुड़े हे। अउ आगू घलो जुड़े रही।

           आज हम जौन पढ़त लिखत या सुनत हावन सब साहित्य चेतना के परिणाम आय। मानव समाज मा साहित्य के प्रति चेतना या लगाव नइ रही तौ ये सच हे कि सामाजिकता अउ मानवीय व्यवहार मा सुन्यता आ जही। विज्ञान के जोर ले विकास तो संभव हे फेर साहित्य के सुन्यता ले व्यवहार मा पशुता के भाव उभर सकथे। दुनिया मा सम्हल के तमड़ के रेंगे बर साहित्य रूपी गोटानी जरूरी हे।

         साहित्य के प्रति लगाव सबो मनखे ला रथे। कोनो सुनेके कोनो पढ़ेके त कोनो लिखे के रूचि रखथे। विचार अउ भावना के समुन्दर मा गोता लगाके शब्द ला पिरोके लिखथे तब वो साहित्य के रूप ले लेथे। लिखित साहित्य कतको जुग ले जिन्दा रहिके समाज ला रसता देखावत रथे। अब इँहा मन मा बात उभरथे कि आज के दुषित व्यवस्था गंदगी भरे वातावरण मा साहित्य कतका सामर्थ्यवान हे। दूसर आज जौन साहित्य रचे जावत हे लोक सँग जुड़े मा कतका बलकारी हे। साहित्यिक चेतना साहित्य के प्रति चेतना के स्तर का हे? लोक के प्रति चेतना या लगाव तभे होथे जब कोनो भाषा के साहित्य मा भाषा भाव कथ्य शिल्प अउ साहित्यिक सौन्दर्यता के दर्शन होथे। वो हर सहज रूप ले लोक   सँग जुड़ जथे। उही ला लोक चेतना कहे जा सकथे। इही कारण हे कि चार लाईन के दोहासोरठा चौपाई के भाव प्रधान कथ्य हर लोक मा जगा बनाके जबान मा रमे रथे।  तब अपन कथ्य ला  शब्द शिल्प मा ढालके लोक तक परोसे जाथे तब जेन लगाव या जुड़ाव के भाव लोक मा अवतरित होथे उही हर साहित्यिक चेतना हो सकथे। माने जौन लिखित या वाचिक साहित्य बर चित्त मा चिन्तन होय ले चेतना या चैतन्यता जागथे वो साहित्य हर लोक के होके मानविय विकास मा जुड़ जाथे तब कहि सकथन कि लोक के सँग साहित्य चेतना जुड़े हे। अउ हर साहित्य सृजन आ लोक के ही हर क्रिया कलाप आचार विचार व्यवहार अउ लोक जीवन के हर हिस्सा के किस्सा जुड़े रथे। तब लोक मा साहित्य चेतना कहन कि साहित्य चेतना मा लोक संदर्भ। एके बात हो सकथे।


               राजकुमार चौधरी "रौना"

            टेड़ेसरा राजनांदगांव 🙏🏻

Sunday, 19 February 2023

शिव ही जीव समाना..


 


     शिव ही जीव समाना.. 

    शिव सनातन ये, आदि ये अंत ये, हम सबके जीवन के गीत ये संगीत ये। संत कबीर दास जी उंकर संबंध म कहे हें- 'ज्यूं बिम्बहिं प्रतिबिम्ब समाना, उदिक कुम्भ बिगराना, कहैं कबीर जानि भ्रम भागा शिव ही जीव समाना।" माने शिव सब कुछ ये, साकार ये, निराकार ये। समुंदर म छछले पानी कस निराकार घलो उही ये, त कोनो मरकी करसी म समा के वोकर रूप के आकार धरे साकार घलो उही ये। उही आत्मा ये, उही परमात्मा ये। जीव घलो उही ये अउ शिव रूपी परमात्मा घलो उही ये।


    महादेव के ये पावन परब म आज उंकर जम्मो रूप के, सरूप के सुरता करे के मन होवत हे। काबर उनला सर्वस्व कहे जाथे, माने जाथे एला सिरिफ साधना के माध्यम ले जे आत्मज्ञान मिलथे वोकरे द्वारा जाने जा सकथे। हर आदमी ल वो साधना करना चाही। काबर ते आज हमर मन जगा जतका भी लिखित अउ प्रकाशित रूप म साहित्य उपलब्ध हे, सब आपस म विरोधाभास पैदा करथें। तेकर सेती जेन कोनो ल भी सत्य तक पहुंचना हे, शिव तक पहुंचना हे, सुन्दर तक पहुंचना हे, वोला किताबी जंजाल ले बाहिर निकल के स्वतंत्र रूप ले साधना के माध्यम ले ज्ञान प्राप्त करना चाही।


    शिव ल मुख्य रूप ले तीन रूप म हमर आगू रखे जाथे- शिव लिंग या पिंड रूप, जटाधारी रूप अउ ज्योर्ति बिन्दु रूप। शिव ये तीनों रूप म लोगन ल अपन चिन्हारी दिए हें, उपासना के प्रतीक दिए हें अउ जीये के रस्ता बताये हें।  ज्योति स्वरूप ह वोकर मूल रूप ये, लिंग स्वरूप ह वोकर पूजा प्रतीक ये अउ जटा स्वरूप ह वोकर जीवन दर्शन ये।


   हमन ल जुन्ना ग्रंथ म एक कथा मिलथे के सृष्टिकाल म ब्रम्हा अउ विष्णु म कोन बड़े आय ये बात के सेती झगरा होवत रहिथे। दूनों अपन आप ल बड़े कहंय, तब दूनों के बीच म अग्नि स्तंभ के रूप म परमात्मा के प्रादूर्भाव होइस, अउ उनला ये कहिके शांत कराए गिस के असली तो मैं आंव, तुमन आपस म काबर लड़त हौ। तुंहला जेन बुता खातिर भेजे गे हवय वोला पूरा करव। तब जाके ब्रम्हा अउ विष्णु के झगरा थिराइस। ये अग्नि या ज्योति परगट होए के तिथि ह अगहन महीना के पुन्नी के तिथि आय। एकरे सेती अगहन महीना ल विशेष महीना माने जाथे। अग्नि स्वरूप परमात्मा ल अग्नि स्वरूप, ज्योति स्वरूप या ज्योर्तिबिन्दु के रूप म उल्लेख करे गे हवय।


    लागथे एकर असल कारन वो रूप के साक्षात करने वाला मनला वो दृश्य ल व्यक्त करे खातिर सहज ढंग ले जेन प्रतीक मिलिस तेकर उल्लेख करीन फेर आय सब एके मूल चीज। साधना काल म जब परमात्मा प्रसन्न होके साधक जगा ऊपर ले आथे तब जगाजग चमकत आके वोकर माथ म प्रवेश कर जाथे या फेर दिया जलाके रखे गे होथे वोकर बरत बाती म आसन पाथे। सृष्टि निरमान के बाद जब देवता मन परमात्मा ले अपन पूजा अउ उपासना के प्रतीक दिये के गोहार लगाइन तब उनला शिव लिंग के पूजा प्रताक दिये गिस। शिवलिंग के बारे म ए जानना जरूरी हवय के वोहर तेज रूप म संपूर्ण ब्रम्हाण्ड म व्याप्त सर्वव्यापी परमात्मा के प्रतीक स्वरूप आय।


    साधना काल म जब साधक ध्यान साधना म मगन रहिथे, तब तेज रूप म सर्वव्यापी परमात्मा अपन सबो रूप के दर्शन कराथे। सरी धरती अगास म संचरे वो परम शक्ति ह साधक ल दिखथे। वोकर ऊपरी आवरण ह हल्का भगवा गढऩ के दिखाई देथे। एकरे सेती परमात्मा के सर्वव्यापी रूप के प्रतीक स्वरूप शिवलिंग के पूजा करे जाथे अउ अवरण के रूप म भगवा रंग के वस्त्र के चलन होइस। परमात्मा शिव लिंग के रूप म पहिली बार सावन महीना के पुन्नी तिथि म परगट होए रिहिस हे तेकरे सेती सावन महीना ल ओकर पूजा के विशेष महीना के रूप म मनाये जाथे।


    सृष्टि संचालन होए लगिस त कतकों किसम के गुन अवगुन अउ सही गलत के चिनहा अनचिनहा के भेद म मति भ्रम के अवस्था बनत गिस। बने मनखे, गिनहा मनखे के भेद अउ न्याय व्यवस्था के स्थापना के जरूरत महसूस करे गिस तब परमात्मा जटाधारी रूप म परगट होईन अउ लोगन ल जीवन दर्शन देइन संगे-संग न्याय व्यवस्था के स्थापना खातिर संहारकर्ता के भूमिका घलोक निभाइन। आज तक बेरा-बेरा म जब अत्याचारी मन के चारों खुंट फैलाव हो जाथे तब न्याय रूपी धर्म के स्थापना खातिर अपन अंश के सिरजन करत रहिथें।


    सृष्टि के विकास क्रम म जतका भी अवतारी पुरुष संहारकर्ता के रूप म आवत रेहे हें सब वोकरे अंश यें। मोला तो इहाँ तक बताए गिस के राम अउ कृष्ण घलो मन वोकरे अंशावतार आंय। ज्ञान प्राप्ति काल म उन मोरे जगा पूछ बइठिन के संहारकर्ता काला कहिथें रे? त फेर राम अउ कृष्ण ह अपन जीवन म एकर छोड़ अउ का करे हे? 


    मैं बार-बार किताबी जंजाल ले निकले के बात करथंव। साधना के माध्यम ले ज्ञान प्राप्त करे के बात करथंव। तेकर असल कारन इही आय। असल म हमर इहां जतका भी किस्सा-कहानी के रूप म जतर-कतर किताब मन धर्म-ग्रंथ के रूप म चलत हें, वो सबला संशोधन करके प्रमाणित अउ हर किसम ले तर्क संगत ढंग ले नवा धर्म ग्रंथ या मार्गदर्शक ग्रंथ लिखे जाना चाही। कबीर दास जी एक जगा कहे हें- "तेरा-मेरा मनवा कैसे एक होई रे, तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखन देखी रे।" अइसने काल्पनिक किस्सा-कहानी मनके सेती आय तइसे लागथे।


    परमात्मा अपन जीवन-दर्शन दिए खातिर जेन जटाधारी रूप म आए रिहिन हें वो फागुन महीना के अंधियारी पाख के तेरस तिथि आय, जेला हमन महाशिवरात्रि के रूप म जानथन। हर देवता के साल म सिरिफ एके बार परब मनाये जाथे, फेर भोलेनाथ के तीन बार तीन अलग-अलग रूप म लोगन ल अपन चिन्हारी कराए हें तेकर सेती। उंकर साल म तीन पइत परब आथे- सावन पुन्नी, अगहन पुन्नी अउ फागुन अंधियारी पाख के तेरस तिथि। वइसे तो अपन आराध्य के हर दिन, हर पल सुमरनी करना चाही, फेर अइसन जेन वोकर मन के परगट होए के तिथि हे वोमा उंकर मन के पूजा उपासना के जादा महत्व अउ फलदायी होथे। भक्ति के, पूजा के, उपासना के कोई भी रूप हो सकथे, विविध विधि या शैली हो सकथे वोला पाये खातिर वो सबो ह सही अउ उचित होथे, पूर्ण होथे। एकरे सेती बिना कुछु अन्ते-तन्ते सोचे-गुने बिना परमात्मा पाये के मारग म आगू बढ़ना चाही।     

-सुशील भोले 

संजय नगर, रायपुर 

मो/व्हा. 98269-92811

मुँहु चिक्कन खबड़ा के

 मुँहु चिक्कन खबड़ा के 

                    भगवान कृष्ण के दुनिया ले विदा लेहे के सूचना चारों मुड़ा म जंगल म लगे आगी कस बगरगे ।  एला सुन ... गोकुल के जुन्ना संगवारी मन लकर धकर द्वारका कोति मसक दिन । भगवान हा ओमन ला देखिस त ओकर आँखी म आँसू आ गिस । भगवान हा केहे लगिस – तूमन ला मेहा कोन्हो सुख नइ देय पायेंव । अब तो जाय के बेर आगे हे ... अवइया युग म मिलबो त तुँहरों मन बर कुछ अच्छा करहूँ । ग्वाल सखा मन केहे लगिस – तोर दिये आशीष अभू तक चलत हे भगवान फेर तोर जाय के पाछू ... को जनि ओकर प्रभाव रइहि या सिरा जहि तेमा शंका हे .. तेकर सेती हमू मन अभू चल देबो । फेर आगू जनम म हमन मिलबो तेकर गारंटी देय बर लागही भगवान ।  तुँहर कृपा ले हमन ला अइसने खाय बर मिलत रहय तहू ला सुनिश्चित  करे बर लागही भगवान । 

                    भगवान किथे – तुम फिकर झन करव । तूमन ला खाय पिये बर लाला थापा  करे बर नइ लागय । तुमला खाय बर भरपूर मिलही । ग्वाला मन किथे – एक बात अऊ हे भगवान ... पूरा युग निकलगे हमन ला सत्ता के बागडोर नइ मिलिस । हमन तरस गेन । का अवइया युग म घला अइसने रहिबो अऊ खाये बर तुँहर मुँहु ताकबो ... । भगवान थोकिन सोंच म परगे अऊ केहे लगिस – तूमन मोर बहुत संग साथ दे हव .. तुँहर भारी उपकार हे मोर उपर ... तेकर सेती ब्रम्हाजी ला कहि देथँव ... ओहा अवइया युग म बाजी पलट दिही । तुँहर उपर मय आश्रित रइहूँ ... तुँहर ले बाँच जहि तभे मोला मिलहि । 

                    ग्वाला मन किथे – हमन राजा होके खाबो तहन हमन ला .... सब खावथे खावथे कहिके बदनाम करहि । तिंहीं केहे बर धर लेबे । भगवान किथे – तुँहरे संगवारी तुँही मनला बदनाम करही । तुम ओमन ला साध लेना । मे राम राम नइ कहँव ... मोर वचन हे  ।  तूमन अभू घला खाथव तेकर कोन्हो प्रमाण रहिथे का । अरे भई ... उहू समय ... सरबस खाके मोर मुँहु म चुपर देहु ... सब अभू कस  ... मुही ला खाये हे समझही ... । चाहे कतको खावव ... तुँहर मुँहु एक कनिक नइ छड़बड़ाय ... चिक्कन रहि । भगवान सब ला भरोसा देवा के चल दिस ।

                    कलयुग आ चुके रहय । सबके अगले इनिंग के तैयारी होवत रहय । ब्रम्हाजी हा भगवान कृष्ण के दिये वचन ला पूरा करे बर उपाय खोजत पस्त हो चुके रहय । ब्रम्हाजी के माथ म पछीना के धार बोहावत रहय । ओकर स्टेनो चित्रगुप्त किथे – का होगे भगवान ... भारी फिकर म बुड़े हस । सियनहा एकदमेच थकथकागे रहय । ओकर गमछा हा पछीना पोंछत निचोड़े लइक होगे रहय । चित्रगुप्त समझगे । ओला हार्ट अटेक फटेक झन आ जाय सोंच तुरते कारण खोज ... निवारण के उपाय रच डरिस । जम्मो झन ला भारत म जनम ले के व्यवस्था कर दिस ।  

                    कुछ दिन पाछू ... भगवान हा अपन दिये वचन के पालन सही साट होवत हे के निही ... तेकर सचाई जाने बर निकलिस । इहाँ अइस तब सत्यता जानिस । चित्रगुप्त हा जनता ला भगवान बना दे रिहिस । जेला खाय बर नइ मिलय फेर  ओकरे मुहुँ म जे पाये तेहा कुछु कहीं ला चुपर देथे । ग्वाल सखा मन देश म कर्णधार बन चुके रिहिस ... जेमन खावय तो बहुत फेर दिखय निही । भगवान पूछिस – मोला समझ नइ आवत हे  चित्रगुप्त । चित्रगुप्त बतइस – इहाँ लोकतंत्र के स्थापना कर दे हँव भगवान ... जेला समझ सकना तोर बस के बात नइहे ... तेकरे सेती तोला जनता के रूप दे देंव । जे मन समझ गिन तेमन ला कर्णधार बना देंव । तुँहरे दिये वचन के पालन होवत हे भगवान । भगवान ला बड़े बड़े पेट धरे कुछ बिगन खाये मनखे दिखगे ... जेमन खाये बर मरत रहय ... । भगवान पूछिस – येकर मन के पेट तो बड़े दिखत हे फेर येमन कभू खाय नइहे तइसे ... पोट पोट करत हे । चित्रगुप्त बतइस – इँकर धोंध भर चुके हे फेर खाय के इच्छा शक्ति कमतियावत नइहे तेकर सेती पोट पोट करत दिखत हे ... वाजिम म येमन खाये बर पोट पोट नइ करत हे भगवान ... बल्कि जनता के मुहुँ म खाये के सामान चुपरे के अवसर पाय बर पोट पोट करत हे । भगवान किहिस – फेर कलेचुप खवइया मन तो बिगन हुँके भुँके आराम से बइठे दिखत हे ... येमा का राज हे । चित्रगुप्त बतइस – वास्तव म इही मन सरकार आय ... अऊ पोट पोट करइया मन विपक्ष ... । भगवान पूछिस – मोर एक आखरी सवाल अऊ हे चित्रगुप्त .. येमन खाथे कहिथस ... त खाये के निशान तो एको कनिक नइ दिखत हे । चित्रगुप्त किहिस – तैं भुलागे हस भगवान । सब तोरे वचन के पालन करे के उदिम आय भगवान । जे जतका खाही ... ओतके ओकर मुँहु चिक्कन रइहि । 

                    भगवान भुखाये हाबे कहिके चारों मुड़ा म हल्ला माते रहय । ओला खवाये के होड़ लगे के ढिंढोरा पिटागे । खाये के सरी सामान जनता भगवान के आघू म आके माढ़गे । फेर ओला कोन्हो खाये बर नइ दिन ...  । ओकर हाथ म झुनझुना धरा दिन । जनता भगवान हा झुनझुना हलावत बइठे रहिगे । खाये के सरी सामान ... अपने अपन सिरागे ।  जनता  के मुँहु म खाये के सामान म छबड़ दिन ।  बिगन खाये जनता के मुँहु छबड़ाये  देख ... भगवान तिर पछताये के अलावा कुछ नइ बाँचिस । 

                    सरग पहुँचके ....  भगवान हा चित्रगुप्त ला तलब करिस । मोला तैं मारे के बनेच उदिम जमा डरे हस चित्रगुप्त । दू चार दिन धरती म अऊ रहि जतेंव ते भूख के मारे मर जतेंव । चित्रगुप्त किथे – तेकर सेती तो जनता बना के तोला राखे हँव ताकि तोला जादा दिन रेहे बर झन परय । ओकर जुम्मेवार घला तिंही तास । काँही जानस न सुनस ... जइसे पाय तइसे वचन देके लहुँट जथस । पालन करे बर  कतका उपाय करे बर लागथे तेला हमीं मन जानबो । भगवान किथे – ओ तो ठीक हे चित्रगुप्त ...  फेर मोला तोर संरचना म एक बात समझ नइ अइस । कोन्हो खावत दिखय निही तभो ले ... खाय के सामान हा अपने अपन कइसे सिरा जात रिहिस । चित्रगुप्त बतइस –  तोला के बेर उही उही बात ला बताहूँ ... अभू उहाँ लोकतंत्र हे भगवान । उहाँ  राज चलइया मन खुर्सी म बइठथे । उही खुर्सी म अइसे यंत्र फिट करदे हाँबो भगवान ... जेमा बइठे के पाछू कतको खा ...  दिखबे नइ करय । सामान सिरा जथे फेर खुर्सी म बइठइया हा खइस तेला प्रमाणित करना सम्भव नइ रहय । खुर्सी ले उतरे के पाछू ... कतका खइस ... तेहा दिखथे जरूर फेर प्रमाणित नइ होय सकय ...  । भगवान हा प्रश्नवाचक मुँहु बनाके देखिस । चित्रगुप्त समझगे के भगवान काये पूछना चाहत हे । ओहा बताये लगिस – मुँहु चिक्कन खबड़ा के ... तोरे वचन के पालन करे बर नियम बनगे  भगवान ... । भगवान हा उही दिन ले कोन्हो भी मनखे ला वचन नइ देय के कसम खा डरिस ।           

हरिशंकर गजानंद देवांगन .. छुरा .