Friday, 17 March 2023

कोचई पान के इड़हर* (छत्तीसगढ़ी कहानी)

 [3/17, 8:03 AM] रामनाथ साहू: -



*सियान- विमर्श के एकठन कहिनी-*


*बच्छर भर के खरचरी, जऊन हर पंचैटी मा टुटे हावे तऊन ला देवत हैं ... चार चार बोरा धान तब अऊ अब काबर दींही साग- पान ...। वोहर तो पंचैटी मा नई टूटे आय ...।”*


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             *कोचई पान के इड़हर*

                

                (छत्तीसगढ़ी कहानी)

         

 



         संकेरहा खा-पी के दुनो परानी अपन कुरिया मा खुसर गय रहिन। 

“ दिया ला पलो दों ...।" सियानिन कहिस तब फेर डोकरा अपन खटिया ले उठके बईठ गया ... " रा ... रा ना .. ठहर जा ...

अंजोर हर भले ही एको धरी बर काबर नई रहय, बने लागथे। बने लागथे न ...?"


            सियानिन कछु नई कहिस।


 ' अच्छा बता ... कोन-कोन बहुरिया मन साग अमराये रहिन ...।' ' सियनहा फेर पूछिस अपन मुड़सरिया ला लहुटावत

पहुटावत ...।

" छोटे मंझिली ...। "

'' बस्स ...। "

" त अऊ नहीं त का ...। " सियानिन उठके तेल के काँची मा करु तेल ला ढारत किहिस ... " चलव, तरपाँव मा तेल समार दिहाँ कहत हॅव तब तु साग- पुरान निकालत हावा ... वोमन, हमन ला

बच्छर भर के खरचरी, जऊन हर पंचैटी मा टुटे हावे तऊन ला देवत हैं ... चार चार बोरा धान तब अऊ अब काबर दींही साग- पान ...। वोहर तो पंचैटी मा नई टूटे आय ...।”

 “ ठीक कहत हानस ... सियानिन ...।'' सियनहा लम्मा सुवासा

लिस।

 “ लेवा ढरक जावा ...।” सियानिन वोकर खटिया के गोड़तरिया मा तेल काँची धरके आ बईठिस। सियान चुपेचाप ढरक गय।

 “ मैं जानत हँव ...।” सियान हर फेर चुप ला टोरत किहिस।

 " वो ... का ...?"

 " बड़की हर आज इड़हर राँधे रहिस हे। कोंचई के पाना मा उरिद के पीठी ला लपेटत रहिस हे ...।" सियान धीरलगहा किहिस।


            सियानिन चुपे रहिस। धईन रे ... असतिनन बड़की...! जानथस डोकरा ला इड़हर हर बड़ सुहाथे तभो ले एको कुटी नई पठोये ... बड़ के जिनिस आय ...

कोंचई के पाना मा बराय उरिद के पीठी भूँज .... बपार अमचुर के

खटई मा बस्स ...  फेर ऐती तो लार चुहत हे ...। बुढ़ापा हर लईकई

के दुसर रुप आय ... देखव न डोकरा कईसन ओढ़हर करके वो गोठ

ला निकारत हावें ...।

“ सुत जावा ... काली बिहनिया जुगजुगी घर ला कोचई पान लान के मैं बनाहाँ तूँहर बर इड़हर ...। " सियानिन वोकर पाँव मा

तेल ला मलत किहिस। 

"फेर तैं बड़की कस बधारे नई जानस ..."

सियान के गोठ ला सुनके वोहर कंझा गय ... अब इनला इड़हर नहीं

बड़की के हाथ के बघार चाही फेर वोहर कहाँ ले मिले ... असतिन ... जानतेच हावस ... तबले सियान बर अतेक  कोर कपट करत हावस ....नहीं...नहीं हम तो महतारी-बाप अन तोला नई सरापन

भगवान ...फेर अपन अपन करनी ... अपन अपन फल 

“ सूत जावा ... मैं जुगजुगी करा ले बनवा के लानहाँ .. वोकर ले अऊ जादा बढ़िया

बनवा के ...।" सियानिन वोला ओढ़ावत किहिस।


        सियानिन दिया ल पलो दिस अऊ अपने घलो सुते के उजोग करिस फेर वोला कछु जिनिस अघबटिया लागत रहस। कछु जिनिस खड़िया हे अघबटिया हे ... कछु गोठ काहीं कछु भुलावत हावै ... जानत हे वो तो वोहर फेर का कर सकत है ...।

" सुत गेया ...?" सियानिन सियान ला किहिस।

" नहीं ... तै सुत गय ...।" सियान ठनकत आवाज में जवाब दिस।

"सुत गय रथें त तुँहला ओझियाय सकथें ...?

"ठीक हे सुत जा वनेच्चे रात हो गये हे ...।"

"तहुँ सुत जावा भिनसरिया जल्दी उठिहा ...।" सियानिन जईसन मनावत रहिस वोला।

" बड़का छोकरा के नाँव हमन फिरतू धरे हावन न ...।"

“ हाँ फेर ये गोठ ला अभी काबर सुरता करत हँव ...।"

"पहिली पहिलात लईका ला भगवान सकेल लिस तब फेर येहर अवतरिस ता हमन समझेंन भगवान, पहिलीच ला फिरे देये हे ... तेकरे सेथी एकर नाँव फिरतु ...।" सियान जईसन डोकरी के गोठ ला सुनबे नई करिस ये... वो फिर कहिस," येकर पाछु ता दूध अऊ पूत के धार लाम गय ... चार चार छोकरा तीन ठन छोकरी ...।"

"भईगे बस्स ... अब सुत जावा।" सियानिन वोकर गोठ ला अऊ जादा लामन नई दिस । 

"फेर कछु कह .... येहर कल जुग ये एक ठन बेटा के एकठन लात अऊ चार ठन बेटा के चार लात ... रोज महतारी बाप ला ... ए उम्मर मा तोला चुल्हा- चुकिया धरे बर लागथिस । अलगे बिलगे हो गईन अऊ हमन संझियारा माल बन गएन । सहाजी माल किरा जाय ... " सियान जईसन भभक गय रहय ।


        सियानिन ला लागिस डोकरा ओढ़े चद्दर ला फेंक दिसहे । वो चुप रहिस .. ओझी नई दिस फेर एक ठन निश्चय कर ले रहिस । वईसनेहेच अंधियार मा उठिस अऊ रंधनी कुरिया मा ले टमड़त खोझत कटोरी ला धरिस । सियानिन कटोरी ला धरके बड़की बहुरिया के खोली मेर आ गय । उहाँ भी दिया - बाती बुता गय रहय । 

" बड़की ... ये ... बड़की ...। " सियानिन धीरलगहा हाँक पारिस । एक- दू पईत वो हाँक पारे के बाद बड़की उठिस .. " का ये काय ... कहत हावा । " आवाज मा थोरकुन रिस तो रहिबे करिस । 

" एको रंच साग बचाये हस । वो .. वो .. कोंचई पान के इड़हर राँधे हावस काय | " 

'"नई ये पोंछ चाट के खा डारे हावन ... । पहिली नई मांगे रथा ...। " बड़की कहिस अऊ तुरतेच बेड़ी हरक दिस फईरका के । 

“ चल ऐती ... काय माँगत हस ...। " डोकरा सियान आके वोला तीरत वापिस ले गईस अपन खोली कोती । फेर डोकरी के कान मा गूंजत रहे ... पहिली नई मांगे ... रथा ...। अपन के घर अपन के सिरझाय मनखे मन करा माँगना । 


          बिहना पहाईस । सियानिन देखथे ... बड़की हर वोईच्च ईड़हर साग मा पीठ म रेवनईया लेवत, डेहरी मा बईठ के बासी खावत हे । 



*रामनाथ साहू*

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समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल: 

भारतीय समाज म समिलहा परिवार के गोठ अब तइहा के होगे हवय। चार बर्तन म टिकी लड़बे करथे, फेर बुद्धिमानी अउ चतुरई तो इही म हवय कि बर्तन ल सम्हाल के रखन। सबो चतुरई धरे के धरे रही जथे, जब बात दू पीढ़ी के बीच होय लगथे। नवा पीढ़ी नवा विचार अउ सोच के पक्षधर होथे। अइसन म बॅंटवारा टाले नइ जा सकय। घर परिवार म बॅंटवारा ले कभू कभू मया दुलार बने रहिथे। कभू इही बॅंटवारा जिनगी भर बर नता म जहर महुरा घोर देथे। भाई भाई ल देखन नइ भावय। 

         इही बॅंटवारा म कभू अइसन घलव देखें मिलथें, जब बेटा बहू दाई ददा ल राॅंध के देना नइ चाहयॅं। दाई ददा अपन करतब (कर्तव्य) ल पूरा करथें। पर बेटा अधिकार ल सुरता रख अपन करतब ल खूॅंटी म अरो देथे। जिनगी के संझौती बेरा सहारा के बिगन मन के सबो साध धरे रही जथे। बॅंटवारा ले उपजे इही बेरा के पीरा के गोठ करत कहानी "आय कोचई पान के इड़हर" । 

        ए कहानी के संवाद अउ भाषा कथानक के मरम ल पाठक तिल पहुॅंचाय म सक्षम हे। ए कहानी ल पढ़त सियान के इड़हर खाय के साध ले मुंशी प्रेमचंद जी के कहानी "बूढ़ी काकी" सुरता आ गिस। 

          सियानिन दाई सियान के नींद परे के आरो लेवत, बड़की बहू तिर साग बर जाथे। फेर भेद खुल जथे। स्वाभिमानी सियान सियानिन ल मना के वापिस ले जाथे। 

          कहानी म सियान, सियानिन अउ बड़की बहू के चरित्र ल कहानीकार ह बढ़िया चित्रित करें हें। समाज म आज अइसन कतकों सियान सियानिन मिलहीं, जिंकर जिनगी सिरतो म इही किसम ले बीतत हें। 

           कहानीकार ए बताय म सफल हे कि बॅंटवारा के नेम ल नवा पीढ़ी निभाही भले अपन धरम नइ निभाही। 

        मनके के जिनगी के भविष्य के फोटू खींचत बढ़िया कहानी बर श्री रामनाथ साहू जी ल बधाई

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदा बाजार जग.

Friday, 10 March 2023

10 मार्च पुण्यतिथि म सुरता//

 10 मार्च पुण्यतिथि म सुरता//

सुरूज बाई खांडे अउ छत्तीसगढ़ म भरथरी गायन

    छत्तीसगढ़ म अइसन कई ठन लोक गाथा गायन के परंपरा हे, जेन कोनो न कोनो ऐतिहासिक पात्र मन ऊपर आधारित ग्रंथ या धर्मग्रंथ के मानक म गाये जाथे. फेर ए ह शास्त्र ले लोक के कंठ म आवत-आवत अपन एक अलगेच स्वरूप धारण कर लेथे. इहाँ के पंडवानी गायन विधा ल देख लेवौ, मूल रूप ले वो ह महाभारत के प्रमुख पात्र पांडव मन ऊपर आधारित हे. फेर ए विधा के प्रवर्तक नारायण प्रसाद वर्मा ह एला छत्तीसगढ़ी लोक गीत अउ संगीत मन संग समो के सबल सिंह चौहान के लिखे किताब ल एक अलगेच विधा के रूप म विकसित कर दिस. ठउका अइसनेच राजा भृर्तृहरि के ऐतिहासिक कथा ल छत्तीसगढ़ी के लोक विधा म पिरो के भरथरी गायन के परंपरा विकसित करे गे हवय.

     रायपुर के मोती बाग म पहिली हर बछर 'जगार' कार्यक्रम के आयोजन होवय. इहें मैं सबले पहिली सुरूज बाई खांडे के भरथरी गायन के प्रस्तुति देखे रेहेंव. तब ओकर संग मुंहाचाही घलो करे रेहेंव. तब वोमन बताए रिहिन हें, के एकर कथा ल ओमन अपन बबा (नाना) जगा सुने रिहिन हें. सुरूज बाई बताए रिहिन हें- मैं पढ़े लिखे तो नइ हौं, फेर मोर नाना ह जेन बतावय अउ सिखोवय तेन मोला कंठस्थ हो जावत रिहिसे. 

    आगू चलके रेखादेवी जलक्षत्री अउ सफरी मरकाम ल घलो भरथरी गायन करत सुनेंव. रेखादेवी जलक्षत्री अउ मोर गाँव तो आपस म जुड़े हे. हमर मनके एक-दूसर के घर घलो आना-जाना होवत रहिथे. रेखा घलो अइसने बताए रिहिसे, के सिरिफ सुन-सुन के ही ए गायन विधा ल सीखे हावय. एकरे सेती उन सबो के गायन म लगभग एके असन शैली अउ शब्द देखे बर मिलथे-

घोड़ा रोवय घोड़ेसार म, घोड़ेसार म वो,

हाथी रोवय हाथीसार म

मोर रानी ये वो, महलों म रोवय

मोर रानी ये या, महलों म रोवय

एदे धरती म दिए लोटाए वो, ये लोटाए वो, भाई येदे जी...


सुन लेबे नारी ये बाते ल, मोर बाते ल या, का तो जवानी ये दिए हे

भगवाने ह वो, मोर कर्मे म न

भगवाने ह या, मोर कर्मे म न

येदे काये जोनी मोला दिए हे, येदे दिए हे, भाई येदे जी...

    भरथरी के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे म बताए जाथे, के परमार वंश के महान सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भृर्तृहरि ह ए गाथा के मुख्य पात्र आय. एला संस्कृत के महान कवि भर्तृहरि घलो माने जाथे. अइसे बताए जाथे, के भरथरी कथा ह बिहार, उत्तर प्रदेश अउ बंगाल म पहिलिच ले प्रचलित रिहिसे, उही मन डहार ले होवत ए ह छत्तीसगढ़ आए हे. बताए जाथे, पहिली बंगाल के जोगी मन उज्जैन आवत-जावत राहंय. छत्तीसगढ़ एकर मनके बीच म परय, तेकर सेती वोमन इहाँ ले नहाक के ही आवयं-जावयं, इही यात्रा के खातिर ए ह छत्तीसगढ़ म घलो अपन बसेरा बना डारिस. वइसे भरथरी के इहाँ आए अउ एकर कथा प्रसंग के संबंध म अलग-अलग विद्वान मन के अलग-अलग विचार हे. 

    भरथरी एक अइसन चरित्र आय, जेकर संबंध म बहुत अकन किंवदंती घलो हे. भरथरी योगी कइसे बनीस? वो तो उज्जैन के राजा रिहिसे. फेर वो राजकाज ल छोड़ के काबर चल दिस? अलग-अलग कहानी हे. फेर आखिर म गोरखनाथ जी के किरपा ले सब ठीक हो जाथे. तब भरथरी ह गोरखनाथ के चेला बन जाथे. एकरे सेती एकर एक लोक प्रचलित नांव बाबा भरथरी घलो हे.

     छत्तीसगढ़ म भरथरी गायन के क्षेत्र म वइसे तो बहुत झन आवत रेहे हें, फेर जेन लोकप्रियता अउ ऊंचाई सुरूज बाई खांडे ल मिलिस, अभी तक अउ दूसर मनला नइ मिल पाए हे.

    सुरूज बाई खाडे के जनम 12 जून 1949 के बिलासपुर जिला के एक ग्रामीण परिवार म होए रिहिसे. जब वो सात बछर के होइस, तभेच ले अपन बबा (नाना) रामसाय घृतलहरे के मार्गदर्शन म गाए ले धर लिए रिहिसे. वोहर अपन नाना जगा ले भरथरी के संगे-संग ढोला-मारू, चंदैनी जइसन लोक गाथा मनला घलो सीखे रिहिसे. पहली बेर उनला रतनपुर मेला म गाये के मौका मिले रिहिसे, फेर रूस म सन् 1986-87 म होए 'भारत महोत्सव' म उनला विशेष चिन्हारी अउ प्रसिद्धि मिलिस. रूस के छोड़े करीब 18 अउ देश मनमा वोमन अपन कला के डंका बजाए रिहिन हें. जेकर सेती उनला दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ स्व. देवदास बंजारे स्मृति सम्मान मिले रिहिसे. वोमन ल मध्यप्रदेश शासन के देवी अहिल्या बाई सम्मान घलो मिले रिहिसे. 10 मार्च 2018 म वोमन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लिए रिहिन हें.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

भाई चारा"

 "भाई चारा"

         कभू कभू कई ठन शब्द बड़ उटपुटांग लागथे जईसे "भाईचारा "। अब ये भाई म चारा के का काम। एक ठन चारा गायगरु जानवर मन बर काम आथे,एक ठन मछरी फंसाय के।मछरी फंसाना घलो एक कला आय।चारा कईसे गुंथना हे,गरी कहां फेंकना हे,कतिक समें फेंकना हे,अऊ सब ले बड़े बात आए ओकर इशारा ल समझना। मछरी मतलब ललचाहा जीव।जिंहा चारा दिखीस खब्ब ले मुहूं म डारिस।थोरकुन मेहनत नी करना चाहे। चारा मतलब फोकट (फ्री) के लालीपाप कही  सकथन।पहिली चारा फंसाय के कला एक समुदाय विशेष कर राहय। अब ऐकर आधिपत्य के दूसर उत्तराधिकारी घलो हो गेहे । जेन मन फोकट के जमगहा चारा फेंकथे। जेकर गरि म जतका फोकट के चारा रहिथे होकर बेड़ा पार हो जथे। अऊ फंसे मछरी दिन-रात पूछी हलात दिन गिनत रहिथे। अब चारा के फेंकईया ले ये उम्मीद नई करें जा सके कि वोहर मछरी ला अपन घर म कांच में पानी डाल के सजा के रखही हैअऊ समे-समे मां पौष्टिक आहार दीही ।फेर देना ही रहितिस त गरि मा चारा कार फेंकतिस।

                  हर मनखे ल अपन घर ल साफ सुथरा रखना चाहि।साफ सफई म झाड़ू के बड़ योगदान हे। कतको झन तो सुत उठ के झाड़ू ल परनाम घलो करथे। जेला झाड़ू के ताकत देखना हे त देश के दिल म जाय बर पड़ही।।इंहा फोकट के जमगरहा चारा अऊ ललचाहा जीव के कांम्बीनेशन ले झाड़ू वाले मन हर सरग के मजा उड़ावत हे। मदिरालय म एक के संग एक फ्री।ऐ हर इंहा के समृद्धी( विकास) के राज आय।पूरा देश के विकास म एकर सब ले बड़े योगदान हे।ऐला हमर देश के अर्थव्यवस्था के 'पीठ के हाड़ा 'घलो कही सकथन। फेर ऐकर विज्ञापन हर 

टीवी, अखबार म 'ढूंढते रह जाओगे '।        लईका मन के कुपोषण बर बारा बिभ्भो योजना चलाथे।वईसने लईका मन बर एक लिटर दूध के संग एक लिटर दूध फ्री के चारा फेंकतिस त का चीन ह हमन ल खुसरा खुसरा आंखी ल देखातिस।

       ये देश ऋषि मुनि गुनि मन के देश आय।इंहा ज्ञान चंद मन तो खरही कस गंजाय हे।जिंहा "भाईचारा "के गोठ आथे ताहन ले ज्ञान चंद मन के दिमाक म किरा कांटथे।देवारी भाईचारा ले मनाव फेर फटाका मत जलाव प्रदूषण के खतरा बाढ़ जथे।

कोन जनी युक्रेन वाला मन बछर भर होगे कईसे झेलत हो ही ।वईसन दशा म तो दिल वाले मन आज ले निपट जतिन। एक दिन के फटाका म उंखर सांसा ऊपर नीचे होवत रहिथे।फेर सिलेंडर चोरों से सावधान कहिके कोनो जगा नइ पढ़ें हन।ये दिल वाले मन बर बहुत बड़े बात आए।

                  ज्ञानचंद मन के दिमाक के बत्ती साल म दू बेर जलथे, एक तो देवारी दूसर होली ।होली मनाए से भाखड़ा नांगल बांध, हीराकुंड बांध के सुखाय के खतरा बढ़ जथे। जेन मनखे मन 'निवृत्तमान संस्था' म सात आठ बाल्टी पानी उरकाथे ,कार म रोज पानी मारथे, गार्डन में पानी डाल के दिल गार्डन गार्डन करथे तेन मन हर ज्ञान पेलथे। इहां पानी बचाय के ठेका तो वो मन ला मिलथे जिंकर शौचालय में दू बाल्टी पानी नी रहा है।

               ज्ञानचंद मन के संगे संग बुद्धिजीवी मन के मुंहूं म मास्क कोरोना के खतरा असन आय।ये समस्या ल देख के गांव के पंचायत म कम दिमाक वाले वैज्ञानिक मन ल दिल्ली के खस्सु कुकर मन ल धर के शोध करें बर "भाईचारा "के नाता युक्रेन भेजे के घला प्रस्ताव पास करे गेहे।

             फकीर प्रसाद साहू

              "फक्कड़ "सुरगी

नान्हें कहिनी अमली के रुख

 नान्हें कहिनी

                    अमली के रुख

        हमर गांव के तीर म एक ठी अमली के रुख हवै। उही अमली रूख के तीर म मोर घर रहिस। ननपन ले अमली रुख तरी खेलन -खावन।अमली रुख के डंगाल म डोरी बांध के झुलवा झूलन ।कच्चा-पक्का अमली ल नुन मिरचा डार के लाटा चाटन। अहा!अभु भी मुहूं म पानी आ जाथे। गर्मी के छुट्टी म अमली के चिचोल बीजा ल तिरी पासा खेलन।हमर जम्मो संगवारी मन के वो अमली रुख ह मितान रहय।फेर हमन सुनन अमली के रुख म परेतिन रहिथे। कभु - कभु हमन डरन ।गर्रा आंधी आये त दाई  ह खिसियावे-"झन जाओ टुरी मन ।अमली रुख के परेतिन तुमन ल तीर लिही।"

         अइसन सुन के हमन हासन। गर्रा आंधी म पट-पट अमली झरे त पसेरी म झोंकन।

        एक दिन के बात आय।हमर पारा के खेदि या  दाई ल गांव के लोगन मन मारत-पीटत गांव के गुड़ी तीर लानत रहय। महेसर बतात रहे - खेदिया दाई ह टोनही हवै। एखरे पाय के ओला गांव के लोगन मन अमली के गोजा म मारत हे।

       खेदिया दाई ह टोनही हे ? मोला बिस्वास नी होइस। ओखर एको झिं लोग-लइका नी रहिस। तभे तो बपुरी ह गांव भर के लोग-लइका ल अपन घर म लेग -लेग के खेलाए। हमु मन ओखर कोरा म खेलेंन-खायें हन। फेर आज का होगे? 

       अमरौतिन काकी ह खेदिया दाई ल बखानत रहय-"देखे ओखर खेलाय लइका ह काली मर गिस।खेदिया घर जा जा के लइका ह खाईस -खेलिस ।जाने रोगही ह लइका ल का जादू करिस  ।खेलत कूदत लइका अचानक मर गिस।टोनही हे ओहा।"

        मैं कहेंव -लइका बेमार रहिस का काकी? काबर तुमन खेदिया दाई ल बदनाम करत होव।

       काकी कहिस," काली लइका ठीके रहिस ।रथिया उलटी टट्टी भर होइस ताहन लइका मर गिस। एह ओखरे टोना ये। "

        उलटी टट्टी ल तुमन साधारण रोग समझ लेथव। इलाज कराना छोड़ के तुमन झाड़ फूंक म लगे रहिथो।अउ कुछु हो जथे त जादू टोना के भरम म पड़ के  तुमन दूसर ल बदनाम करथ्व।

     आइसना कहिके मेंहा उहाँ ले दउड़त घर आयेंव अउ शहर म रहवइया अपन भाई ल सब गोठ ल बतायेंव। 

          मोर भाई ह गांव के  मन ल पुलिस कानून के डर देखा के खेदिया दाई ल छोड़वाइस। खेदिया दाई ह रोवत -रोवत कहत रहय-"देख बेटी, मेंहा जनम भर ये गांव के लईका मन ल खेलायेंव- कूदाएंव फेर आज मोला गांव  के मन टोनही कहि के मोर अपमान करिन । मैं  कईसे ये अपमान ल  सहो।"अइसने कहि के ओहा रोवेल लागिस। ओखर रोआई ह धरती माता ल डोलावत हे अइसे जान परत  रहिस। मोर हिरदय घलो दहल गे।

        दूसर दिन गांव म हल्ला होगे। खेदिया  दाई ह अमली रुख म फ़सीया के मर गे। मैं सुनेव  दंग रहि गेंव ।गांव के मन एक  निर्दोस के जान ल ले डारिन। हमर खेदिया  दाई अंध बिस्वास के भेंट चढ़ गिस।

      अब तो वो अमली के रुख ह भुतहा हो गे।अब कच्चा-पक्का अमली ल कोनो बीने बर अमली के रुख तरी नी जावे।

                   डॉ. शैल चन्द्रा

Sunday, 5 March 2023

कृषि संस्कृति अउ छत्तीसगढ़ी"*

 *"कृषि संस्कृति अउ छत्तीसगढ़ी"*


               हमर छत्तीसगढ़ शुरू ले कृषि अउ ऋषि संस्कृति ले रचे-बसे हवय। इहाँ के 76 प्रतिशत लोगन मन कृषि अउ उँखर ले जुड़े उद्योग-धंधा मा सरलग काम करथे। धान के पैदावार सबले जादा होथे, ऐखर सेती छत्तीसगढ़ ल "धान के कटोरा" के नाव ले दुनिया भर प्रसिद्ध हे। सँगे-सँग इहाँ गहुँ, चना, कोदो, कुटकी, अरसी, मसूर, तीली, रहेर, पटवा, सरसों, सूरजमुखी, मटर अउ जोन्धरा के घलो खेती होथे। इहाँ के लोगन मन बर बारो महीना काम के कमी नइ रहय। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के अब दुनिया भर मा शोर होगे हवय। इहाँ के कृषि संस्कृति बड़ मनभावन हे। खेती-किसानी के बुता मा लगे पसीना के ओगरत ले कमईया किसान अउ उँखर सँग  छैहाँ सही कमेलिन किसानीन के जीवन-दर्शन मा बड़का ग्रंथ लिखा जाही। हमर पुरखा सियान मन कहे घलो हे- "खेत के बोय अउ कोठार के पाय।" खेती के काम मा घर भर के मनखे मन भीड़ें रहिथे, तभे किसानी के बुता ह पूरा होथे। जादा काम होय ले पारा-परोस के मन घलो एक-दूसर के खेत मा कमाये बर लगथे। अईसन सहयोग के भाव ले हमर कृषि संस्कृति मा उत्साह, प्रेम, भाईचारा अउ समरसता ह लबालब भरे हे।

               कृषि संस्कृति के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के जम्मो तीज-तिहार, पूजा-पाठ, संस्कार, मड़ई-मेला, गीत-संगीत, नृत्य मन शामिल हवे। जेमा अकती, सवनाही, हरेली,भोजली, पोला, नारबोद, कमरछठ, इतवारी, देवारी, जेठोनी, मड़ई-मेला अउ छेरछेरा तिहार जईसन उत्सव मा कृषि संस्कृति समाहित हे। ये तीज-तिहार मा प्रकृति ले सीधा जुड़ाव हवय।

               छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति अब दिनों-दिन खुशहाल होवत जात हे। किसानी के कतको जुन्ना तरीका ह नन्दावत हे, त कतको नवा-नवा वैज्ञानिक तरीका ले कृषि के काम सरल अउ जल्दी घलो हो जात हे। कभू-कभू सरकारी सहयोग मिले ले किसान अउ किसानी काम ह घलो समृद्ध होवत हे। जिहाँ कभू पानी के साधन नइ रिहिस, निचट पथर्री अउ मुरमाहा रिहिस, उहाँ घलो आज पानी हाथ मा होय ले अब्बड़ उपज होवत हे। किसान अनाज के सँग भाजी-पाला बोके अपन घर बर अउ बेचे बर घलो पैदा करत हे।

            छत्तीसगढ़ मा ज्यादातर कृषि  काम ह अकती तिहार के दिन ले शुरुआत होथे। अउ सरलग नौ-दस महीना ले चलथे। येमा खरीब अउ रबी फसल दूनो होथे। अइसे तो कृषि काम ह साल भर घलो चलथे। फेर  किसानी के नवा बछर अकती तिहार ले सियान मन शुरुआत करत आवत हे। धान बोवाई ले मिंजई-कुटई तक अउ जिंकर खेत मा उन्हारी होथे उँखर बर चना-गहूँ के लुवात ले किसानी के बुता रथे। किसानी बुता बने रम के करे ले होथे। ठठ्ठा-दिल्लगी मा खेती नइ होय। एक ठन कहावत हे- "बो दे गहूँ चल दे कहूँ।" अईसन मा नइ बने।

             कृषि मा हमर पुरखा मन के दिये अब्बड़ संस्कृति के दर्शन होथे। इहि संस्कृति ह सब झन ल बाँध के रखे हे। किसानी के बुता ह हाड़ा-तोड़ई बुता आय। दिनभर कमात हाथ-गोठ थक के अल्लर पड़ जाथे। तब बीच-बीच मा आराम करे के सेती कई ठन तिहार मनाथे। इंखर ले फेर नवा बल बँधाके काम म जुट जाथे। तिहार-बार मानत, गीत-संगीत मा झूमत, करमा-ददरिया, कविता, कहानी-किस्सा, जनउला-चुटकुला ला सुनत कृषि के काम ह पूरा होथे। ये शोध आलेख मा छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति ल प्रस्तुत करे के प्रयास करत हों।

          अकती तिहार मा गाँव भर के मन मातादेवाला मा सकलाय रथे। नान्हे-नान्हे लइका मन ल प्रतीक स्वरूप बैला बनाके लकड़ी के नांगर धराय रथे। अउ गोल-भाँवर रेंगें बर कथे। एक झन बैला बने लइका मन ला खेदद जथे, अउ दूसर ह धान बोवत जथे, फेर तीसर आदमी ह उँखर मन मे पानी रुकोवत जाथे। ये गाँव के लइका मन मा कृषि संस्कृति के बीजारोपण करके कृषि काम ल उँखर जिंदगी सँग जोड़े के जतन आय। बाद मा बैगा के पूजा-पाठ करे के पीछू परसा पान के दोना में धान ल देथे। घर के सियान जब धान के दोना ल लाथे, तब घर के मुहाटी मा दाई-माई मन लोटा मा पानी ओइचथे अउ पाँव परके घर के भीतरी म लेजथे। अन्न के कतका मान-सम्मान होथे, ये छत्तीसगढ़ के संस्कृति मा देखे ल मिलथे। फेर उही धान ल खेत म लेज के एक कोन्टा मा बोय जाथे। जेला मुड़ सोरना घलो कहिथें।

           मानसून के आय के पहिली खेत के कांद-दूबी मन ला जम्मो रापा मा छोल डारथे। गरमी के मारे सबो कचरा मन अटिया जाथे। घुरवा के खातू-कचरा खेत भर बगर जाथे। आसाढ़ मा पानी गिरीस तहन किसान मन अपन खेत डहन ठऊंका धियान देथे। कतको झन बोथे त कतको मन परहा रख देथें। नहिते "डार ले चूके बेंदरा अउ बांवत ले चूके किसान" वाले किस्सा होथे। खेत मा किसान के अरर-ततत अउ महतारी मन के करमा-ददरिया के तान सुनाथे। लक्ष्मण मस्तुरिया अउ निर्मला ठाकुर के गीत रेडिया मा बाजे लगथे-


   "चल-चल गा किसान बोय चल धान, आसाढ़ आगे गा...

    जेठ बैसाख तपे भारी घाम, अकरस के नांगर पको डारे चाम,

    अब किड़कत बिजली ले ले तोर नाम, आसाढ़ आगे गा.."


             सबो के खेत मा छत्तीसगढ़ महतारी के हरियर लुगरा असन धान हा दिखे ला लगथे। बांवत के काम पूरा होथे, तब नांगर-जुड़ा के सँग सबो किसानी के औजार मन ला तरिया मा धोके घर के बीच दुवार मा पूजा करथे। बेल पान, चीला रोटी अउ नरियर चढ़ा के उँखर कृतज्ञ मानथे। जेला हरेली तिहार कहे जाथे। इहि दिन ले लइका मन बर गेड़ी बनाये के परंपरा हे।

            बियासी के बेरा चपचपहा पानी रहे ले बियासी अच्छा बनथे। बियासी के नांगर जब चलथे तब चारों कोती अरर-ततत के मीठ बोली ह गीता-रामायण बांचे असन लगथे। महतारी मन गीत गावत धान ल चाले के बुता करथे। कुंज बिहारी चौबे जी के गीत किसान के सजीव चित्रण करत बियासी बर सुरता आथे-


"पहिरे बर दू बीता के पागी जी,

पीये ला चोंगी, धरे ला आगी जी।।

खाये ला बासी, पिये ला पेज पसिया।

करे बर दिन-रात खेत मे तपसिया।

साधु जोगी ले बढ़के दरजा हे हमर,

चल मोर भइया बियासी के नांगर।।"


            इतवारी तिहार गाँव मा पाँच नहिते सात ठन माने जाथे। जेमा खेत मा चीला रोटी चढ़ाये के सुग्घर संस्कृति हवय। चीला रोटी, सेना आगी, पानी, हूम-धूप, अगरबत्ती धरके खेत जाथे अउ पूजा-पाठ करके चीला ला खेत मा चढ़ा देथे। अउ अन्न महाराज के अरजी-विनती करथे कि एसो मोर खेत मा बने उपज होके जम्मो कोठी-डोली हा भर जाय। महतारी मन खेत निंदत गीत, कहानी, किस्सा घलो सुनाथे। अईसन होय ले काम के थकासी दूर हो जाथे, अउ घातेच मजा घलो आथे। छत्तीसगढ़ के कवि डॉ. जीवन यदु "राही" जी के पुस्तक 'माई कोठी के धान' के ददरिया ल देखव-


              " बटकी मा बासी, कटोरिया मा नून।

            मैं गावत हौं ददरिया, तैं खड़े-खड़े सुन।।


             धान बाढ़े के बाद पोटराय के समय आथे तब गॉंव वाले अउ बैगा के सलाह ले गरभही तिहार घलो मनाथे। ये दिन कोनो आदमी खेत-खार नइ जावय। कहे जाथे कि इहि दिन अन्न महारानी ह गर्भ धारण करथे। तब खेत मा हलचल नइ होना चाही। एकांत के जरूरत होथे। हमर कृषि संस्कृति हर मनुष्य जीवन के कतिक तीर हवय। किसानी काम प्रकृति ले बिल्कुल जुड़े हवय।

                इहि समय पोरा के तिहार होथे। ये तिहार मा कृषि काम में सहयोग करईया बईला मन के पूजा होथे। बईला मन के कृतज्ञता के तिहार पोरा आय। इहि समे बहिनी मन ला तीजा घलो लानथे।मइके के बाँचे निंदई ला पूरा करे ल लगथे। फेर भाई मन बहिनी अउ भांची-भांचा मन बर बढ़िया कपड़ा-लत्ता देके खुशी मनाथे।पोरा तिहार बर एक ठन हाना हवय- "मानिन पोरा हेरीन मोरा।" मने पोरा तिहार के बाद पानी के गिरना कम हो जाथे, तब मोरा ओढ़े के जरूरत नइ पड़य।

         पोरा के बिहान दिन नारबोद तिहार होथे। जेमे खेत अउ बाड़ी में भेलवा, कर्रा के डारा ला खोचें जाथे। ये डारा मन के रस मन खेत मा मिल के फसल मन बर दवाई के काम करथे। डारा मा चिरई मन बैठते अउ फसल के कीरा-मकोरा मन ला खाके फसल के नुकसानी ले बचाथे। अईसने खेत के रखवाली मा उपयोगी होथे झाँका जेला कागभगोडा घलो कहिथे। जुन्ना कपड़ा, लकड़ी, डोरी, करसा ले येला बनाये जाथे। ये दुरिहा ले देखे मा आदमी सही दिखथे। येला खेत के बीच मा गड़ा देथे। चिरई-चिरगुन अउ जानवर मन येला देखथे अउ आदमी हवय कहिके फसल ला खाय बर नइ आय। एकरो ले फसल के नुकसानी ह बच जाथे। ये कृषि संस्कृति के बढ़िया चित्र आय।

           ये बढ़िया संस्कृति आय कि हमन जब कोई चीज ला ग्रहण करथन तब सबले पहिली देवता-धामी में चढ़ाये के संस्कार सियान मन देहे। धान के नवा फसल आथे तब सबसे पहिली देवता-धामी में फसल ला चढ़ाये के संस्कृति बने हे। बाद में नवाखाई तिहार मनाके प्रसाद के रूप मा ग्रहण करथे। नवा खाये के तिहार मा सबो परिवार एक जगह सकलाय रथे। ये कृषि संस्कृति में आज घलो चलत हवय।

               धान के लुवाई बेरा खेत जावत नवयुवती मन के रेंगई ल जनकवि कोदूराम 'दलित' अपन लेखनी के माध्यम ले किहिस-


"छन्नर-छन्नर पैरी बाजय, खन्नर-खन्नर चूरी।

हाँसत कुलकत मटकत रेंगय, बेलबेलहीन टूरी।।


                फसल के लुवाई हा एक-दू झन के बुता नोहे। येकर बर सबो परिवार अउ जादा काम रेहे ले आसपास के लोग मन एक-दूसर के खेत मा जाके लुये के काम ला करथे। गॉंव मा सहयोग के भाव, आपसी भाईचारा, प्रेम-व्यवहार बने हवय। इहि संस्कृति के जड़ आय। फसल के लुये के दिन जब गाँव मा सहयोग करे बर तियारथे। तब खेत मा परिवार के मन कइसे बुता करथे, जनकवि कोदूराम दलित जी के काव्य मा सजीव चित्रण होय हे-


   "दीदी लुवय धान खबाखब भांटो बांधय भारा।

     अउंहा-झउंहा बोहि-बोहि के लेजय भौजी ब्यारा।।

    लकर-धकर बपुरी लइकोरी समधिन हर घर जावय।

    चुकुर-चुकुर नान्हे बाबू ल दु-दु पिया के आवय।।"


          देवारी के दिन गाय के गला में सुहई बाँधे के रीत बने हे। परसा जड़, चिन्दी अउ मंजूर पांख ले बने सुहई गाय-गरुवा मन के स्वास्थ्य बर बने होथे। गोधन के पूजा के रिवाज पुरखा मन के समे ले चले आवत संस्कृति आय। घर के मन नया फसल के बने खीर-भात तो खाथे। उहें घर के गाय-गरुवा मन बर घलो नया चाँउर के खिचरी भात सँग रोटी अउ कांदा-कुम्हड़ा के साग बने रथे। उँखर खाय के बेरा प्रसाद के रूप मा निकाले खिचरी, भात अउ रोटी- साग मन ला घर भर के मन खाके आनंद पाथे। किसान जीवन मा पशु-प्रेम के अतका बड़े का उदाहरण हो सकथे। राउत भैया मन के दोहा मा कृषि संस्कृति के बढ़वार होय के सुग्घर कामना भरे रहिथे-


   " जैसे के मालिक! दैहौ-लेहौ, तैसे के देबो आसीस।

  अन्न धन्न तोर कोठा भरे भैया, जीयौ लाख बरिस।।"

            

             खेत के फसल ला भारा-भारा बँधाके कोठार तक पहुँचाये बर अब्बड़ जतन करे ल लगथे। फेर  मिंजे के पहिली कोठार में झाला बनाना अउ उहें सुते के कपड़ा-लत्ता, चाहा-पानी के सामान रखना शुरू होथे। सबो धान के मिंजात ले झाला हर किसान बर घर सही काम आथे। अंगेठा के आगी मा रात भर जागे-जागे सुतना अउ बिहनियां ले गाड़ी, बेलन, दौरी फाँदना कृषि संस्कृति के अंग हरे। येहा समय के सँग नंदावत जावत हे। मशीन के जमाना हर कृषि संस्कृति ला लीलत जात हे।

             कोठार के झरती मा झरती कोठार बढ़ोना खवाई ह गाँव मा आज घलो चलत हवे। जतीक झन कमाये ला लगे रथे, ओतिक ला खाना खवाना कृषि संस्कृति के उदारता के प्रतीक आय। बढ़ोना बाजार के दिन जादा करथे, जेकर ले साग-भाजी लेय बर सहूलियत होय। रोटी, बरा, खीर, भात-साग के सँग प्रेम से बइठ के खवाई के अलगे मजा हवे। बढ़ोना कमइया मन ला खुश करत उँखर मेहनत के मान-सम्मान करे के उदिम आय।

             झरती कोठार मा बेटी माई मन ला धान देय के घलो बढ़िया संस्कृति हवय। धान मिंजे के बाद सबो धन तो बेटा मन के हो जाथे। बेटी-माई किसानी काम मा नंगत के भीड़ें रहिथे। बेटा मन ले जादा काम बेटी मन करथे। बेटी ला पराया धन कहिथे, उँखर तो बाप घर के कहीं नई होय। अइसे सोच के झरती कोठार मा अपन शक्ति अनुसार कोठार धान देय के सुग्घर संस्कृति बने हे। झरती कोठार के दिन बेटी मन एक ठन नरियर कोठार के सीग मा रख देथे, फेर उँखर कोठार धान मिलना तय हो जाथे। कोठार धान ला जम्मो बहिनी मन पैसा भंजा के आपस में बांट के अब्बड़ खुश होथे।

           छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति सबले जादा उदार हवे। दुसर ला खवाय-पियाय अउ दान-धर्म करे बर सदा आघू रहिथे। इहि कारण तो इहाँ दान-पुन के परब छेरछेरा तिहार मनाये के सुग्घर रीत हवय। जेमा छेरछेरा मंगईया सबो झन अन्न के दान देथे। ये छत्तीसगढ़ के भुइयाँ के प्रताप आय कि इहाँ सब झन दूसर ला दान देय बर समर्थ हे। धान-पान के घर के कोठी-डोली में भराय के बाद कतको मँगईया घर-घर मांगें बर आथे। जेमे हरबोलवा, गोरखनाथ वाले चिकारा बावा, जय गंगा वाले, पीर बाबा, साँप वाले, दवाई ताबीज़ वाले, देवार मन, नांदिया बईला वाले अउ कतको आथे। इहि कारण कथे घलो- "छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया।"

           कृषि संस्कृति मा गॉंव के जरूरी काम वाले मन बर जेवर देय के व्यवस्था बने रथे। एमा साल भर बाद फसल के उपज अन्न धान, कोदो, कुटकी ला निर्धारित नाप मा देथे। नापे बर काठा, पईली मानक होथे। राऊत, नाई, लोहार, धोबी, मोची, कोटवार, बैगा अउ घर के नौकर-चाकर एमे शामिल हवय। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के यहू बड़का प्रमाण आय।

             मड़ई-मेला गाँव के सामाजिक समरसता के प्रतीक आय। येला गॉंव के वार्षिक उत्सव घलो कहि सकथन। कृषि संस्कृति के साल भर के कमई के बाद मिले उपज के खुशी मा उत्सव मनाय बर मड़ई-मेला के जन्म होय होही। मड़ई मा किसान मन अपन जरूरत के सबो सामान ला खरीद लेते। एमे दिल खोल के खर्च करे जाथे। अपन परिवार अउ सगा-सोधर मन ला नेवता देके बलाथे, अउ सबो मिल के ये उत्सव ला मनाथे। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के सबो तिहार मन आनंद ले भरे हे।

        

निष्कर्ष:-

         छत्तीसगढ़ राज कृषि संस्कृति के गढ़ आय। इहाँ कृषि काम के शुरुआत ले किसिम-किसिम के तिहार मनाये जाथे। जेमा कृषि संस्कृति के सजीव दर्शन होथे। इहाँ के सबो तिहार मा कहीं न कहीं संस्कृति समाये हे। अउ संस्कृति हा सोझे प्रकृति ले जुड़े हवय। किसान अउ कृषि संस्कृति छत्तीसगढ़ के मुख्य आधार आय। संस्कृति मन पुरखा के देय संस्कार हरे, जेमा ज्ञान, अनुभव के सँग आपसी प्रेम-व्यवहार, सहयोग, भाईचारा अउ समरसता कूट-कूट के भरे हे।  कृषि संस्कृति ग्रामीण जन-जीवन के प्राण शक्ति हरे। येकर बिना जीवन सुना अउ नीरस हो जहि। अब के मशीनरी समे में कृषि संस्कृति के कतको नेंग ह नंदावत हवय। संस्कृति सब झन जोड़े के काम आय। अब सब लोगन सामाजिकता ले दुरिहाय सही करत रथे। दिनो-दिन संस्कृति हा पीछू छूटत हे। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति ला बनाये रखे बर येला अपन व्यवहार में लाना जरूरी प्रयास होही। छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति छत्तीसगढ़ के रहवईया जम्मो मनखे ल पुरखा ले मिले विरासत आय। इहि कृषि संस्कृति हर छत्तीसगढ़ के सबो संस्कृति के जड़ हरे। छत्तीसगढ़ के जम्मो मनखे ल कृषि संस्कृति ह जोड़ के रखे हे।


हेमलाल सहारे

मोहगाँव(छुरिया) राजनांदगाँव

बियंग "यात्रा"

 बियंग "यात्रा"

सपना देखना कोई बुरा बात नो आय ।सपना देखे के आजादी सब ल हे सब सपना देख सकथे। लाइका सियान जवान सब अपन अपन उमर के हिसाब ले सपना देख सकथे। जिनगी के जम्मो सुख सपना म मिलथे।इंहा फकीर मंत्री, प्रधानमंत्री, संन्यासी बाबा,अडानी, अंबानी, बने के सुख भोग सकथे।

       कतको मार काट के बाद तो हम मन ल आजादी मिलीस फेर हमर देश मा बोले गोठियाय के आजादी बड़ खतरनाक हे। देश के दू कुटका होगे तभो ले देश के बुढ़वा बुढ़वा पढ़हईया  मन ल अऊ आजादी चाहि। देश के विकास मां ये बुढ़वा बुढ़वा पढ़हईया मन के का योगदान हे यहू विचार करे के बात आए ।इहां हर चीज म 'एक्सपायरी डेट' रहीथे फेर इंकर पता नहीं ? जाहिर (संच) से बात आए  एमन नौकरी करें के नाम से तो नी पढ़हत हो ही ।वो कहिथे  न" ऊपर वाला दे खाए बर तक कोन जाए कमाए बर" इहां सरकार ह जनम, ले ले के मरन , तक ठेका ले लेहे। पेट म हे त महतारी ल पौष्टिक भोजन फोकट, जचकि फोकट ,लईका बर डलिया फोकट ,आंगनबाड़ी फोकट, स्कूल मां किताब स्कूल डरेस फोकट, बरबिहाव बर पईसा फोकट,आवास फोकट राशन फोकट, पेंशन फोकट ,त अऊ का रोजगार चाहि?

रामराज म दूध मिले, कृष्ण राज म घी

कलयुग म दारु मिले,चांऊर बेच के पी।कका जिंदा हे।

               हमर डोकरी दाई के मुंहू ले सुने हन रथ यात्रा, तीरथ यात्रा, अब तो किसिम, किसिम के यात्रा सुनें बर मिलथे। हमर गली म आठ, दस झन मनखे मन हाथ जोड़े जोड़े रेंगत राहय, ।डोकरी दाई पूछथे  एमन काय वाले आय बेटा ,में बताएव ये अमुक पारटी वाले आए दाई, हाथ जोड़ो यात्रा निकाले हे, दाई कथे हाथ  ल जोड़ दीही त कामे खाबोन बेटा ।मे कहेव इकर भाषण मे तो हमार पेट भर जथे दाई, अऊ काए खाय ल पकड़ी। खाए के ठेका तो पोगरी ,पोगरी इही मन ल मिलेथे।

            डोकरी दाई कथे फेर समाचार मे तको का भारत जोड़ो यात्रा काहत रिहीस बेटा, कश्मीर ले लेके कन्याकुमारी तक ,कते कते कर टूट गेहे बेटा? मोरो दिमाक भन्नागे तहूं वो दाई एमन नेता आय इंकर बस चल ही ते पाकिस्तान ,बांग्लादेश ल घला जोड़ दीही ।दाई कथे ले रहन दे बेटा पीओके ,एल ए सी ल देखत देखत  कनिहा  नवगे।में केहेव दाई ये नवा भारत आए इहां कुछ भी हो सकथे  जईसे बॉलीवुड (फिलिम) मां ब्लाउज अऊ लहंगा (बिकनी)पहिन के करोड़ों कमा लेथे अऊ दिनभर घाम म टघलत कमईया मन मजूरी बर लुलवात रहिथे ।आज घला शोषण करईया मन राज करत हे।सिरिफ नाम बदल गहे।

                 आजकल यहू यात्रा घलो फईसन बन गहे जेला देखेबे तेला यात्रा निकालत हे। कोनो न्याय यात्रा ,कोनो पद यात्रा निकालत हे ।फुसर्री, फुसर्री बात मां यात्रा। एक समय राहय जब मनखे के  शव यात्रा म मनखे मन मठ देवालय तक रेंगत ,रेंगत संग म जाय, अब तो आदमी मन भारी बिजी। दू पहिया, चार पहिया ,म सीधा मठ देवालय तक पहुंचथे जईसे मुरदा से मिले के अपाईमेंट मिले हे। आज घलो जिंदा अऊ मुरदा के एके हाल हे। इहां कतको के "यात्रा "खटली म त कतको के "यात्रा" स्वर्ग रथ म होथे।'राम नाम सत् हे-------------।

                 फकीर प्रसाद साहू

                '  फक्कड़' सुरगी,

                    २५-३ -२०२३

गवन के संदेशा..


गवन के संदेशा.. 

    हमर संस्कृति म कतकों अइसन परंपरा हे, जेन ह देश, काल अउ बेरा-बखत ल देखत अपन रूप म थोर-बहुत बदलाव कर लेथे. गवन, गौना या पठौनी घलो उही म के एक परंपरा आय, जेन बेरा के चलत अपन रूप म बदलाव करत हे. वइसे कतकों जगा अभी घलो अपन मूल रूप म ए ह दिख जाथे, फेर बहुते कम जगा दिखथे. आज के नवा पीढ़ी म तो कतकों झन अइसे घलो हो सकथें, जे मन ए परंपरा ले अनजान घलो होहीं.

    पहिली हमर इहाँ 'बाल विवाह' के गजबे चलन रिहिसे. कतकों नान्हे लइका मन के तो पर्रा भाॅंवर (साल डेढ़ साल के लइका जेन बिहाव के मतलब तो दुरिहा जाय, बने गतर के रेंगे घलो ले नइ सीखे राहय तइसनो मन के पर्रा म बइठार के) भॉंवर पार दिए जावत रिहिसे. 

    अइसने नान्हे उमर म होवत बर-बिहाव के सेती नवा बने बहुरिया नोनी ल ओकर मइकेच म राहन देवत रिहिन हें. अउ जब दुल्हा-दुल्हीन दूनों जब घर-गृहस्थी ल जाने-समझे के उमर म पहुँच जावत रिहिन, त फेर गौना या पठौनी के रूप म नवा दुल्हीन के फेर बिरादरी करे नेंग ल पूरा करे जावत रिहिसे. 

    अब ए गवन या पठौनी के जुन्ना परंपरा कमतीच देखे म आथे, फेर एकर एक बदले हुए रूप ह चारों मुड़ा दिख जाथे. अब नवा बहुरिया ह बिहाव होय के तुरते च बाद भले अपन ससुरार म रहि जाथे, तभो बिहाव होय के बाद के पहला होली परब ल अपन मइकेच म मनाथे. इही परंपरा ह गवन या पठौनी के बदले रूप आय. 

    फागुन पुन्नी ले लेके चैत अंजोरी के एकम तिथि तक के बीच के जेन पंदरही होथे इही ह गवन या पठौनी के असली बेरा होथे. हमर संस्कृति म फागुन महीना ह बछर के आखिरी महीना होथे, अउ चैत अंजोरी एकम ले नवा बछर चालू होथे, जे ह माता के उपासना के घलो बेरा होथे. एकरे सेती नवा बहुरिया ल नवरात्र के इही शुभ बेरा म अपन घर लनई ल घलो शुभ माने जाथे.

    हमर इहाँ के लोकगीत मन म ए गवन या पठौनी परंपरा ले जुड़े गजब सुग्घर सुग्घर गीत सुने ले मिलय-


ये दे लाल लुगरा ओ पिंयर धोती गवन के लाल लुगरा.. 


कहंवा ले आथे तोर लाली-लाली लुगरा, 

कहंवा ले आथे पिंयर धोती गवन के लाल लुगरा... 


*****

    एक गीत बहुतेच लोकप्रिय होए रिहिसे-

जरगे मंझनिया के घाम रे आमा तरी डोला ल उतार दे.. 


पहिली गवन बर देवर मोर आए हो.. 

देवर के संग नहीं जाॅंव रे, आमा तरी डोला ल उतार दे.. 

*****


    एक गीत म नवा दुल्हनिया ह अपन डोकरी दाई ल काहत हे- मोर उमर तो अभी केंवची बानी के हे, तेकर सेती ए बछर भर अउ गवन झन देबे-


 एसो गवन झन देबे ओ बूढ़ी दाई, मैं बांस-भिरहा कस डोलत हौं ओ... 


    ए विषय म एक गीत महूं लिखे के उदिम करत रेहेंव-


महर-महर महके अमराई फागुन के संदेशा ले के

बारी म कुहके कारी कोइली सजन के संदेशा ले के... 


कतका बसंत बीत गे हे जोहीं

देखत तोर रस्ता हो जाथंव बही

अब सगुन संग भेज दे पाती, गवन के संदेशा ले के... 

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811