Friday, 17 March 2023

जस गायन के मयारुक प्रतिभा अनुसुइया साहू..


 

जस गायन के मयारुक प्रतिभा अनुसुइया साहू.. 


गुरुसर गुरुसर गुर नीर गुरु साहेर शंकर 

गुरु लक्ष्मी गुरु तंत्र मंत्र गुरु लखे निरंजन 

गुरु बिना हुम ला हो काला रचे हो नागिन


गुरु के आवत जनि सुन पातेंव

चौकी चंदन पिढ़ुली मढ़ातेंव

लहुर छोड़ के अंगना बहारतेंव

रूंड काट मुंड बइठक देतेंव

जिभिया कलप के हो....


     अनुसुइया साहू के आवाज म जब झांझ मंजीरा अउ मांदर के ताल संग ए गुरु स्थापनी मंत्र म रचे जस गीत रावांभाठा के दरबार म गूंजय तब कतकों भक्त मन के ऊपर देवता के सवारी आ जावय, कतकों मन भक्ति के धारा म बोहा जावंय, अपन चेत बिसरा के सिरिफ गायन दल ल देखत अउ सुनत राहंय. अइसन अउ कतकों जस गीत मनला अनुसुइया लगातार बिना रुके, बिना सुरताए सरलग गावत राहय. 

    मोला अपन साधना काल के शुरूआती दौर म अनुसुइया साहू के जस गायन के गजब आनंद मिलत रहे हे. आगू जब वोकर गाये जस गीत मन आकाशवाणी अउ दूरदर्शन के संगे-संग आडियो कैसेट मन म आइस त फेर घर बइठे घलो उंकर गायकी के सेवाद ले बर मिल जावत रिहिसे.

      अनुसुइया साहू के जनम 4 फरवरी सन् 1967 के गाँव खर्रा (बेरला) जिला बेमेतरा के शिक्षक सहसराम जी साहू अउ महतारी कंचन देवी के घर होए रिहिसे. एकर बिहाव मोर साहित्य जगत के सबले मयारु संगी रहे डाॅ. सीताराम साहू जी संग सन् 1984 के बैसाख पुन्नी के दिन होए रिहिसे. एकरे सेती अनुसुइया संग मोर चिन्हारी एकर ससुरार गाँव रावांभाठा, बंजारीधाम, रायपुर म बहू बन के आए के संग ले ही हे. फेर एकर गायन के संगे-संग अउ जम्मो कला प्रतिभा संग चिन्हारी तब होइस, जब मैं आध्यात्मिक साधना के विधिवत दीक्षा लेंव अउ इंकर गाँव म सरलग आए-जाए लगेंव, रतिहा बीताए लगेंव. इंकर मन के रामायण अउ जस गायन मंडली संग संघरे लगेंव.

    अनुसुइया साहू जतका सुंदर जस गायन करथे, वतकेच सुग्घर रामायण मंडली म गायन, वादन अउ व्याख्या घलो करथे. अतकेच नहीं, उन अगहन बिरस्पत जइसन दिन-बादर म अपन सहेली मन घर जा-जा के अगहन बिरस्पत के कथा घलो सुनाथे. आकाशवाणी अउ दूरदर्शन म एकरे सेती उंकर जस गीत के संगे-संग सोहर, बसदेवा गीत जइसन आध्यात्मिक रचना मन के घलो रिकार्डिंग अउ प्रसारण होवत रेहे हे.

    मोला एक-दू जस गीत के सुरता आवत हे-


महंग लेले आरती हो माय... 


कोन कोन देव मिल आवय माता

तोला शब्द सुनावय

कोन कोन मिल आवय माता देवन मंगल गाये... महंग लेले....


    मैं शिव जी के एक नान्हे उपासक असन हावंव तेकर सेती उंकर ले संबंधित जस गीत मन के सुरता जादा हावय-


अंगना म धुनी ल रमाये

रमाये हो बाबा... 


गिरी पर्वत ले उतरे महादेव

अंग भभूत लमाये

हाथ के डमरू डम डम बाजे

नगरी म अलख जगाये.. हो बाबा... 


    अनुसुइया के गाये जम्मो गीत, भजन अउ जस मन के रचनाकार उंकर जिनगी के संगवारी रहे साहित्यकार डाॅ. सीताराम साहू ही आय. सीताराम ह एमन ल लगातार प्रोत्साहित करत राहय. कतकों बेर तो महूं ह वोकर संग संघर जावत रेहेंव. सन् 2009 म एकर मन के एक समिति 'माँ बंजारी महिला मानस मंडली रावांभाठा बीरगांव' के नॉव ले पंजीयन करवाइस, जेमा अध्यक्ष अनुसुइया साहू, सचिव गीता राठौर, कोषाध्यक्ष मालती साहू के संगे-संग सदस्य के रूप म सेवती चंद्राकार, घसनीन साहू, अमरीका सेन, बेदमती साहू अउ तारा चंद्राकार आदि हें.

    हमर इहाँ आडियो कैसेट के एक दौर रिहिसे, जब घरों घर लोगन कैसेट सुनत रिहिन हें. वो बेरा म अनुसुइया साहू के घलो कैसेट देश के नामी कंपनी मन के द्वारा रिलीज करे जावत रिहिसे. वोकर कैसेट मन म - 1. माता जस, 2. भवानी जस, 3. माता सिंगार, 4. जस जुड़वास अउ 5. भोले बाबा जस आदि प्रमुख हे. अपन संगवारी डाॅ. सीताराम साहू संग वोमन वो बखत बहुतायत म बनत विडियो फिल्म - 1. माल हे त ताल हे, 2. टूरी मारे डंडा, 3. गंवइहा बाबू, अउ 4. बांगा लेड़ू आदि मन म चरित्र अभिनेत्री के भूमिका घलो निभाए रिहिसे. ए जम्मो विडियो फिलिम मन के कथा, पटकथा संवाद अउ गीत मन डाॅ. सीताराम साहू के ही लिखे रिहिसे.

    आकाशवाणी, दूरदर्शन, आडियो अउ विडियो कैसेट मन के संगे-संग सैकड़ों मंच मन म अपन गायन, वादन अउ व्याख्या के प्रतिभा ल सरलग देखावत रेहे के सेती अनुसुइया साहू ल सैकड़ों मंच द्वारा सम्मानित करे गे हवय. अनुसुइया अउ वोकर समिति के जम्मो सदस्य सखी मन के सक्रियता आज घलो ए पूरा क्षेत्र म लोकप्रिय हे. अपन कला प्रतिभा के संगे-संग अनुसुइया ह साहू समाज रावांभाठा धरसींवा परिक्षेत्र के महिला अध्यक्ष के पद ल घलो सुशोभित करे हवय. मैं व्यक्तिगत रूप ले उंकर हर क्षेत्र म सफलता के शुभकामना देवत उंकर आकाशवाणी म गाये माता जी के ए जस के सुरता करत शुभकामना देवत हौं-

आठों अंग सोलहों संवांगा

तोला मैं सिंगार दिहंव माँ... 


हाथ बर ककनी कंगन बनुरिया

पांव बर पइरी पायल पयजनिया

टोड़वां गढ़वा दिहंव माँ..

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

नान्हे लइका के बस्ता ले शब्द अध्ययन

 नान्हे लइका के बस्ता ले

शब्द अध्ययन

   फूल


हिंदी कॉपी म फूल के मायने चित्र देके बोध  कराये जाथेl 

फूल के बहुत अकन चित्र दिखाथेl 

फूल के आकार प्रकार मालूम होथेl 

फूल के अनेको रंग ले ओकऱ भेद

के जानकारी मिलथे l

फूल जो अपन आस पास पाये जाथे l

फूल जउन जंगल या परिवेश से बाहर हे l

देवी देवता म चढ़े या चढ़ाये जाने वाला फूल l

देसी  विदेशी फूल l

पेड़ म नार म पौधा म खिलने वाला फूल l

महीना म साल म दिखने वाला फूल l

कभू कभार मिलने वाला फूल l

अलग अलग जमीन क्षेत्र राज्य म पाये जाना फूल l

पहाड़ी  मैदानी घाटी  रेतीला पानी म खिलने वाला फूल l

जड़ी बूटी म काम आने वाला फूल l

सुंघाये अउ पहिराये के फूल l

तोहफा अउ धन पाये के फूल l

कोन -कोन फूल के का- का गुन?

असली फूल नकली फूल l

धातु माटी अन्य वस्तु म बने फूल l

फूल के ऐतिहासिक सांस्कृतिक अउ पौराणिक महत्व l

फूल सदा खिलने वाला फूल कभी कभार खिलने वाला वाला फूल l


भाषा अध्ययन म फूल अंग्रेजी म flawar उच्चारण म ful वर्तनी म फुल, full अर्थ म पूरा fully फुल्ली

नाक के फुल फुल्ली l

अनेकार्थकता म फूल

अंगना म फूल खिलगे   याने बच्चा पैदा होये हे l

देह म फूल आवत हे l

मतलब गर्भ ठहरत हे l

शरीर म फूल नई बनत हे l अर्थात

औरत के शरीर म  अंडा नई बनत हे l

फूल गिरगे एकर अर्थ बच्चा पेट म मरगे l फूल नई खिलिस याने  बच्चा पैदा नई होइस l 


अइसे एखर बारे म अध्ययन करबो विश्लेषण करबो  जानकारी लेबो त बहुत बढ़िया लेखन हो सकत हे l

    गद्य विधा म अइसने सामग्री आही  ओकर ऊपर चिंतन मनन अउ लेखन  होही त भंडार नवा पीढ़ी ल दिशा दिही पोठ बनाही l


      मुरारी लाल साव

       कुम्हारी

     ज. ति 1 अप्रेल

मंगनी म मांगे मया नइ मिलै रे मंगनी म"……*

 *"मंगनी म मांगे मया नइ मिलै रे मंगनी म"……*


दउँड़त-भागत बिसौहा पान ठेला म तमंचा मिलगे। ये चलाए वाला तमंचा नोहय, मोर सँगवारी के बढ़उवल नाम आय। असली नाम त बने असन हे, फेर नाम म का रखे हे ? मोर मितान तमंचा ह राजश्री के पाऊच फाँकत रहिस। मोला देख के कहिस - कहाँ उत्ताधुर्रा जावत रहे ? आ...पान खा ले। मँय कहेंव - तुहिच्च ल खोजत रहेंव। पदमश्री बर अप्लाई कर दे, ऑनलाइन फारम भरे के चालू होगे हे, इही बात ला बताए बर तोला घेरी बेरी खोजत रहेंव। तमंचा ठठा के हाँसिस अउ कहिस - पान सिगरेट नइ चले त कोनो बात नइये, पद्मश्री-वदमश्री के बात झन कर, सोझबाय राजश्री खा ले। मँय कहेंव - तमंचा भाई, तँय छत्तीसगढ़ के अतका बड़े साहित्यकार आस, कतको किताब छप गेहे, बड़े बड़े सम्मान पाए हस। तोला पद्मश्री बर फारम भरना चाही। तमंचा कहिस - मांग - तांग के मिलिस तेन कइसन सम्मान ? देख भाई ! महूँ जानत हँव, अभी सीजन चलत हे। जइसे पानी-बादर के आरो पाके मेचका अउ भिन्दोल मन बाहिर आ जाथें वइसने फेसबुक अउ वाट्सएप मा टरर-टरर चलत हे। बेंगुआ मन घलो राग अलापत हें। साल भर के सुते कुंभकरण मन मार कोट-टाई मार के अपन सम्मान वाले फोटू, बड़े-बड़े कवि मन संग मंच साझा करे के फोटू, कहूँ नाटक-नौटंकी मा काम करे हे, तेकर फोटू, जुन्ना-जुन्ना यूट्यूब के लिंक अउ कतको ठन अपन बेंदरा-कुदई के कारनामा ल घेरीबेरी चेंपत हें। फेसबुक म मन नइ माड़िस त वाट्सएप ग्रूप, मैसेंजर अउ निजी इनबॉक्स तको ला नइ छोड़त हें। कोनो अध्यक्ष वाले त कोनो माई पहुना वाले नेवता पाती ला घलो चिपकावत हें, भले कई साल के जुन्ना काबर नइ रहय अउ तँय पतियाबे नइ कि कोनो कोनो त दूसर माई पहुना के नाम ला कटवा के अपन नाम जोड़वावत हें। संगी तँय अड़हा गतर के ! पदमश्री पदमश्री देखत हस, इहाँ आयोग के जुगाड़ बर अपन अपन गोटी फिट करे के चक्कर मा अपन अपन उपलब्धि ला नरी म लटका के जुगाड़ खोजत हें। कोनो कोनो मन लुकाछिपी म दूसर दावेदार मन के थाह ला तमड़त हें। एखर ओखर संग फोटू खिंचवा के पेपर म तको छपवावत हें। पंच, पार्षद ले लेके राष्ट्रपति तक के संग वाले फोटू मिल जाही। अरे बइहा, फेसबुक के हाट-बजार मा घलो किंजरे कर। तँय मोर लँगोटिया मितान आस। तोर मया के कदर करथंव,  फेर भइया तँय सम्मान अउ पद-कुर्सी के चक्कर ला नइ जानस। आने काम करइया ला आने बात बर सम्मान मिल जाथे। हमर बातचीत ला बिसौहा सुनत रहिस अउ कहिस - साहेब ! राजश्री लेना हे त जतिक चाही ले लेवव। मँय दुहूँ, कहाँ पदमश्री के चक्कर म अरझत हव। अरे ! इहाँ मंगनी म मया नइ मिले। तमंचा ह राजश्री के पाँच पाऊच अउ लिस फेर हमन अपन अपन घर डहर रेंग देन। 


*अरुण कुमार निगम*

गरमी मा चिरई-चिरगुन बर पानी...

 गरमी मा चिरई-चिरगुन बर पानी...


अब गरमी ह दिनों दिन नंगत के बाढ़त हे। अइसन बेरा म नदी, नरवा, तरिया अउ कई ठन पानी के नान्हें-नान्हें सरोत मन घलो ठकठक ले सूखा हो जथे। कतको जीव-जंतु, गाय-गरवा, चिरई-चिरगुन संग सबे जीव मन ल पानी बर अब्बड़ कसट करे ल पड़थे। 


पानी सबो जीव के आधार आये। येकर बिन जिनगी के कल्पना करना बिरथा हे। गरमी के बाढ़त बेरा म हमन अपन घर के तीर बाहिर म धमेला म, छत के ऊपर, कोनो पेड़ म ठेका बांध के, मटका म पानी रख के चिरई-चिरगुन अउ दूसर नांन्हे जीव मन बर पानी भर के रख के दया भाव के कर्तव्य निभा सकत हन। जेमे कोनो खरचा घलो नई हे। ये सब समान मन घर म रहे रथे।


गरमी के दिन म जादा चिरई मन पियास ले अचेत सड़क, रदा म पड़े दिखे ले मन म अब्बड़ दुख होथे। ये मन ह नांन्हे अउ बड़ नाजुक जीव हरे। थोरको पीरा ल नई सहे पाये,अउ रुख के सुख्खा पाना बरोबर पुट ले गिर जाथे। येकर जीव बचाये बर हमन पानी अउ हो सके ते दाना के बेवस्था घलो कर सकत हन। जेकर ले येमन ल कुछु राहत जरूर मिलही।


येमन अइसन बेवस्था ल देख के जरूर खुश हो जाही। उंकर मन कतका गदगद होही उही मन जानही। अईसे तो चिरई-चिरगुन मन हमरे आसपास रहवइया परोसी जीव तो आय। बिपत परे म पोठ परोसी मन काम नई आही त कोन आही। हमन ल बिहिनिया बेरा अपन सुहावन कलरव ले गीत सुनाथे, हमन ल सोये म जगाथे। बिहने ले नवा उमंग, आशा,अउ दिन भर के बुता करे बर नवा बल इंकरे ले तो मिलथे। अतकी म मन परसन्न हो जाथे।


आमा खात कोयली, निभौरी खात पडकी मैना, कोवा ल खात मिठ्ठू, धान के झूल म झूलत गोड़ेला, उच्ची, परेवा, रमली के बोली मन ल मोहित कर डारथे। अइसन गुरतुर बोली ले वातावरण ल गमकैया जीव मन ल कतको झन निसमझी मन ह गुलेल गोटी धरके पेड़-पेड़ म घुमत रथे। ये काम कोई भी तरह ले सही नई हे। ये निर्बाद गीत गवैया, मासूम,नाजुक,निरदोस जीव मन ककरो का बिगाड़ करे होही। सजग मनखे मन ल रोके बर आगू आय ल पड़ही नहिते इंकर भाखा-बोली बर तरसे ल पड़ही।


गरमी म कतरो जंगल के नांन्हे जीव मन पानी के तलास म गांव तरिया, नदिया,नाला तक पहुँच जथे। इंकर मन मे कभू गांव के कुकुर,कभू मनखे मन हमला कर देते। यहू बने बात नोहे। पियासे जीव ल पानी, भूखे ल जेवन देना हमर मानव संस्कृति आये। जेकर जब्बर पालन हम सब ल करे के धरम होना चाही। तभे तो सब जीव एक समान के भाव मजबूत होही।



           हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगाँव

व्यंग्य नानकून मन बर

 व्यंग्य

नानकून मन बर 


लद्दी म सपटे सांप

  स्कूल  ले भाग गे मेचका  मारे ल  जावैय्या छेदी राम के फोटो बड़े बड़े फ्लैक्स म चिपके देख़ के मोला बहुत  ख़ुशी होइस l ख़ुशी एकर सेती कि मैं ओला पढ़ाके  निकाले हव l

  पढ़ाई म होशियार भले  नई रहिस  मेचका मारे के प्रतिभा अउ कला ओकऱ पास रहिस l

  कक्षा ले अतेक भगय  दूसर लइका मन ओला गुरू मानय l


              शिकायत मिले त बाल प्रतिभा के सर्टिफिकेट ल देखावन l हमर स्कूल के होनहार हे आघू अपन नाम कमाही l

              हम भले लद्दी म बुड़े रहेन किन्तु इन्हे ले निकले मेचका मार छेदी राम के नाम सुनके हम गौरवान्वित होवत हन l

              अपन क्षमता ले योग्यता ले पार्टी के बड़े पद ला पाइस l

             पकड़ाए मेचका मन जियत मरत बहुत असीस दे रहिस होही l 

             ओकर पुन्य प्रताप ए ओकऱ नाम के पाछू हमू ल छीटा मिलगे l

             छेदी राम ल कोन पढ़ाये हे l  लतिया के हबर हबर आघू आके हाथ  उठाके जोर से चिल्लाके कहव  - मैं पढ़ाये हँव l

             अउ कोनो मत आघूवाय झन l गणित वाले गुरूजी के गणित काम नई आइस l मुँह ओरमांए हे l

             हम हिंदी वाले अर्थ ला अनर्थ अउ अनर्थ ला अर्थ देये के पुर जोर कोसिस करवं l

             मेचका नई मारत रहिस हे मोर शिष्य छेदी राम ह l अरे लद्दी म सांप सपटे रहय l उहू जहरीला l बगियाये सांप निकल के आतिस त कतकों लइका  के इंतकाल हो जतिस l सबके परान बचाये हे l

             इही दलील म ओकऱ दरिया दिल नेकी के सर्टिफिकेटम ऊंचहा मैनखे  बने हे l     

              जलकुकड़ा मन मोला लद्दी के सांप कहिथे l


           मुरारी लाल साव

             कुम्हारी

कोचई पान के इड़हर* (छत्तीसगढ़ी कहानी)

 [3/17, 8:03 AM] रामनाथ साहू: -



*सियान- विमर्श के एकठन कहिनी-*


*बच्छर भर के खरचरी, जऊन हर पंचैटी मा टुटे हावे तऊन ला देवत हैं ... चार चार बोरा धान तब अऊ अब काबर दींही साग- पान ...। वोहर तो पंचैटी मा नई टूटे आय ...।”*


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             *कोचई पान के इड़हर*

                

                (छत्तीसगढ़ी कहानी)

         

 



         संकेरहा खा-पी के दुनो परानी अपन कुरिया मा खुसर गय रहिन। 

“ दिया ला पलो दों ...।" सियानिन कहिस तब फेर डोकरा अपन खटिया ले उठके बईठ गया ... " रा ... रा ना .. ठहर जा ...

अंजोर हर भले ही एको धरी बर काबर नई रहय, बने लागथे। बने लागथे न ...?"


            सियानिन कछु नई कहिस।


 ' अच्छा बता ... कोन-कोन बहुरिया मन साग अमराये रहिन ...।' ' सियनहा फेर पूछिस अपन मुड़सरिया ला लहुटावत

पहुटावत ...।

" छोटे मंझिली ...। "

'' बस्स ...। "

" त अऊ नहीं त का ...। " सियानिन उठके तेल के काँची मा करु तेल ला ढारत किहिस ... " चलव, तरपाँव मा तेल समार दिहाँ कहत हॅव तब तु साग- पुरान निकालत हावा ... वोमन, हमन ला

बच्छर भर के खरचरी, जऊन हर पंचैटी मा टुटे हावे तऊन ला देवत हैं ... चार चार बोरा धान तब अऊ अब काबर दींही साग- पान ...। वोहर तो पंचैटी मा नई टूटे आय ...।”

 “ ठीक कहत हानस ... सियानिन ...।'' सियनहा लम्मा सुवासा

लिस।

 “ लेवा ढरक जावा ...।” सियानिन वोकर खटिया के गोड़तरिया मा तेल काँची धरके आ बईठिस। सियान चुपेचाप ढरक गय।

 “ मैं जानत हँव ...।” सियान हर फेर चुप ला टोरत किहिस।

 " वो ... का ...?"

 " बड़की हर आज इड़हर राँधे रहिस हे। कोंचई के पाना मा उरिद के पीठी ला लपेटत रहिस हे ...।" सियान धीरलगहा किहिस।


            सियानिन चुपे रहिस। धईन रे ... असतिनन बड़की...! जानथस डोकरा ला इड़हर हर बड़ सुहाथे तभो ले एको कुटी नई पठोये ... बड़ के जिनिस आय ...

कोंचई के पाना मा बराय उरिद के पीठी भूँज .... बपार अमचुर के

खटई मा बस्स ...  फेर ऐती तो लार चुहत हे ...। बुढ़ापा हर लईकई

के दुसर रुप आय ... देखव न डोकरा कईसन ओढ़हर करके वो गोठ

ला निकारत हावें ...।

“ सुत जावा ... काली बिहनिया जुगजुगी घर ला कोचई पान लान के मैं बनाहाँ तूँहर बर इड़हर ...। " सियानिन वोकर पाँव मा

तेल ला मलत किहिस। 

"फेर तैं बड़की कस बधारे नई जानस ..."

सियान के गोठ ला सुनके वोहर कंझा गय ... अब इनला इड़हर नहीं

बड़की के हाथ के बघार चाही फेर वोहर कहाँ ले मिले ... असतिन ... जानतेच हावस ... तबले सियान बर अतेक  कोर कपट करत हावस ....नहीं...नहीं हम तो महतारी-बाप अन तोला नई सरापन

भगवान ...फेर अपन अपन करनी ... अपन अपन फल 

“ सूत जावा ... मैं जुगजुगी करा ले बनवा के लानहाँ .. वोकर ले अऊ जादा बढ़िया

बनवा के ...।" सियानिन वोला ओढ़ावत किहिस।


        सियानिन दिया ल पलो दिस अऊ अपने घलो सुते के उजोग करिस फेर वोला कछु जिनिस अघबटिया लागत रहस। कछु जिनिस खड़िया हे अघबटिया हे ... कछु गोठ काहीं कछु भुलावत हावै ... जानत हे वो तो वोहर फेर का कर सकत है ...।

" सुत गेया ...?" सियानिन सियान ला किहिस।

" नहीं ... तै सुत गय ...।" सियान ठनकत आवाज में जवाब दिस।

"सुत गय रथें त तुँहला ओझियाय सकथें ...?

"ठीक हे सुत जा वनेच्चे रात हो गये हे ...।"

"तहुँ सुत जावा भिनसरिया जल्दी उठिहा ...।" सियानिन जईसन मनावत रहिस वोला।

" बड़का छोकरा के नाँव हमन फिरतू धरे हावन न ...।"

“ हाँ फेर ये गोठ ला अभी काबर सुरता करत हँव ...।"

"पहिली पहिलात लईका ला भगवान सकेल लिस तब फेर येहर अवतरिस ता हमन समझेंन भगवान, पहिलीच ला फिरे देये हे ... तेकरे सेथी एकर नाँव फिरतु ...।" सियान जईसन डोकरी के गोठ ला सुनबे नई करिस ये... वो फिर कहिस," येकर पाछु ता दूध अऊ पूत के धार लाम गय ... चार चार छोकरा तीन ठन छोकरी ...।"

"भईगे बस्स ... अब सुत जावा।" सियानिन वोकर गोठ ला अऊ जादा लामन नई दिस । 

"फेर कछु कह .... येहर कल जुग ये एक ठन बेटा के एकठन लात अऊ चार ठन बेटा के चार लात ... रोज महतारी बाप ला ... ए उम्मर मा तोला चुल्हा- चुकिया धरे बर लागथिस । अलगे बिलगे हो गईन अऊ हमन संझियारा माल बन गएन । सहाजी माल किरा जाय ... " सियान जईसन भभक गय रहय ।


        सियानिन ला लागिस डोकरा ओढ़े चद्दर ला फेंक दिसहे । वो चुप रहिस .. ओझी नई दिस फेर एक ठन निश्चय कर ले रहिस । वईसनेहेच अंधियार मा उठिस अऊ रंधनी कुरिया मा ले टमड़त खोझत कटोरी ला धरिस । सियानिन कटोरी ला धरके बड़की बहुरिया के खोली मेर आ गय । उहाँ भी दिया - बाती बुता गय रहय । 

" बड़की ... ये ... बड़की ...। " सियानिन धीरलगहा हाँक पारिस । एक- दू पईत वो हाँक पारे के बाद बड़की उठिस .. " का ये काय ... कहत हावा । " आवाज मा थोरकुन रिस तो रहिबे करिस । 

" एको रंच साग बचाये हस । वो .. वो .. कोंचई पान के इड़हर राँधे हावस काय | " 

'"नई ये पोंछ चाट के खा डारे हावन ... । पहिली नई मांगे रथा ...। " बड़की कहिस अऊ तुरतेच बेड़ी हरक दिस फईरका के । 

“ चल ऐती ... काय माँगत हस ...। " डोकरा सियान आके वोला तीरत वापिस ले गईस अपन खोली कोती । फेर डोकरी के कान मा गूंजत रहे ... पहिली नई मांगे ... रथा ...। अपन के घर अपन के सिरझाय मनखे मन करा माँगना । 


          बिहना पहाईस । सियानिन देखथे ... बड़की हर वोईच्च ईड़हर साग मा पीठ म रेवनईया लेवत, डेहरी मा बईठ के बासी खावत हे । 



*रामनाथ साहू*

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समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल: 

भारतीय समाज म समिलहा परिवार के गोठ अब तइहा के होगे हवय। चार बर्तन म टिकी लड़बे करथे, फेर बुद्धिमानी अउ चतुरई तो इही म हवय कि बर्तन ल सम्हाल के रखन। सबो चतुरई धरे के धरे रही जथे, जब बात दू पीढ़ी के बीच होय लगथे। नवा पीढ़ी नवा विचार अउ सोच के पक्षधर होथे। अइसन म बॅंटवारा टाले नइ जा सकय। घर परिवार म बॅंटवारा ले कभू कभू मया दुलार बने रहिथे। कभू इही बॅंटवारा जिनगी भर बर नता म जहर महुरा घोर देथे। भाई भाई ल देखन नइ भावय। 

         इही बॅंटवारा म कभू अइसन घलव देखें मिलथें, जब बेटा बहू दाई ददा ल राॅंध के देना नइ चाहयॅं। दाई ददा अपन करतब (कर्तव्य) ल पूरा करथें। पर बेटा अधिकार ल सुरता रख अपन करतब ल खूॅंटी म अरो देथे। जिनगी के संझौती बेरा सहारा के बिगन मन के सबो साध धरे रही जथे। बॅंटवारा ले उपजे इही बेरा के पीरा के गोठ करत कहानी "आय कोचई पान के इड़हर" । 

        ए कहानी के संवाद अउ भाषा कथानक के मरम ल पाठक तिल पहुॅंचाय म सक्षम हे। ए कहानी ल पढ़त सियान के इड़हर खाय के साध ले मुंशी प्रेमचंद जी के कहानी "बूढ़ी काकी" सुरता आ गिस। 

          सियानिन दाई सियान के नींद परे के आरो लेवत, बड़की बहू तिर साग बर जाथे। फेर भेद खुल जथे। स्वाभिमानी सियान सियानिन ल मना के वापिस ले जाथे। 

          कहानी म सियान, सियानिन अउ बड़की बहू के चरित्र ल कहानीकार ह बढ़िया चित्रित करें हें। समाज म आज अइसन कतकों सियान सियानिन मिलहीं, जिंकर जिनगी सिरतो म इही किसम ले बीतत हें। 

           कहानीकार ए बताय म सफल हे कि बॅंटवारा के नेम ल नवा पीढ़ी निभाही भले अपन धरम नइ निभाही। 

        मनके के जिनगी के भविष्य के फोटू खींचत बढ़िया कहानी बर श्री रामनाथ साहू जी ल बधाई

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदा बाजार जग.

Friday, 10 March 2023

10 मार्च पुण्यतिथि म सुरता//

 10 मार्च पुण्यतिथि म सुरता//

सुरूज बाई खांडे अउ छत्तीसगढ़ म भरथरी गायन

    छत्तीसगढ़ म अइसन कई ठन लोक गाथा गायन के परंपरा हे, जेन कोनो न कोनो ऐतिहासिक पात्र मन ऊपर आधारित ग्रंथ या धर्मग्रंथ के मानक म गाये जाथे. फेर ए ह शास्त्र ले लोक के कंठ म आवत-आवत अपन एक अलगेच स्वरूप धारण कर लेथे. इहाँ के पंडवानी गायन विधा ल देख लेवौ, मूल रूप ले वो ह महाभारत के प्रमुख पात्र पांडव मन ऊपर आधारित हे. फेर ए विधा के प्रवर्तक नारायण प्रसाद वर्मा ह एला छत्तीसगढ़ी लोक गीत अउ संगीत मन संग समो के सबल सिंह चौहान के लिखे किताब ल एक अलगेच विधा के रूप म विकसित कर दिस. ठउका अइसनेच राजा भृर्तृहरि के ऐतिहासिक कथा ल छत्तीसगढ़ी के लोक विधा म पिरो के भरथरी गायन के परंपरा विकसित करे गे हवय.

     रायपुर के मोती बाग म पहिली हर बछर 'जगार' कार्यक्रम के आयोजन होवय. इहें मैं सबले पहिली सुरूज बाई खांडे के भरथरी गायन के प्रस्तुति देखे रेहेंव. तब ओकर संग मुंहाचाही घलो करे रेहेंव. तब वोमन बताए रिहिन हें, के एकर कथा ल ओमन अपन बबा (नाना) जगा सुने रिहिन हें. सुरूज बाई बताए रिहिन हें- मैं पढ़े लिखे तो नइ हौं, फेर मोर नाना ह जेन बतावय अउ सिखोवय तेन मोला कंठस्थ हो जावत रिहिसे. 

    आगू चलके रेखादेवी जलक्षत्री अउ सफरी मरकाम ल घलो भरथरी गायन करत सुनेंव. रेखादेवी जलक्षत्री अउ मोर गाँव तो आपस म जुड़े हे. हमर मनके एक-दूसर के घर घलो आना-जाना होवत रहिथे. रेखा घलो अइसने बताए रिहिसे, के सिरिफ सुन-सुन के ही ए गायन विधा ल सीखे हावय. एकरे सेती उन सबो के गायन म लगभग एके असन शैली अउ शब्द देखे बर मिलथे-

घोड़ा रोवय घोड़ेसार म, घोड़ेसार म वो,

हाथी रोवय हाथीसार म

मोर रानी ये वो, महलों म रोवय

मोर रानी ये या, महलों म रोवय

एदे धरती म दिए लोटाए वो, ये लोटाए वो, भाई येदे जी...


सुन लेबे नारी ये बाते ल, मोर बाते ल या, का तो जवानी ये दिए हे

भगवाने ह वो, मोर कर्मे म न

भगवाने ह या, मोर कर्मे म न

येदे काये जोनी मोला दिए हे, येदे दिए हे, भाई येदे जी...

    भरथरी के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे म बताए जाथे, के परमार वंश के महान सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भृर्तृहरि ह ए गाथा के मुख्य पात्र आय. एला संस्कृत के महान कवि भर्तृहरि घलो माने जाथे. अइसे बताए जाथे, के भरथरी कथा ह बिहार, उत्तर प्रदेश अउ बंगाल म पहिलिच ले प्रचलित रिहिसे, उही मन डहार ले होवत ए ह छत्तीसगढ़ आए हे. बताए जाथे, पहिली बंगाल के जोगी मन उज्जैन आवत-जावत राहंय. छत्तीसगढ़ एकर मनके बीच म परय, तेकर सेती वोमन इहाँ ले नहाक के ही आवयं-जावयं, इही यात्रा के खातिर ए ह छत्तीसगढ़ म घलो अपन बसेरा बना डारिस. वइसे भरथरी के इहाँ आए अउ एकर कथा प्रसंग के संबंध म अलग-अलग विद्वान मन के अलग-अलग विचार हे. 

    भरथरी एक अइसन चरित्र आय, जेकर संबंध म बहुत अकन किंवदंती घलो हे. भरथरी योगी कइसे बनीस? वो तो उज्जैन के राजा रिहिसे. फेर वो राजकाज ल छोड़ के काबर चल दिस? अलग-अलग कहानी हे. फेर आखिर म गोरखनाथ जी के किरपा ले सब ठीक हो जाथे. तब भरथरी ह गोरखनाथ के चेला बन जाथे. एकरे सेती एकर एक लोक प्रचलित नांव बाबा भरथरी घलो हे.

     छत्तीसगढ़ म भरथरी गायन के क्षेत्र म वइसे तो बहुत झन आवत रेहे हें, फेर जेन लोकप्रियता अउ ऊंचाई सुरूज बाई खांडे ल मिलिस, अभी तक अउ दूसर मनला नइ मिल पाए हे.

    सुरूज बाई खाडे के जनम 12 जून 1949 के बिलासपुर जिला के एक ग्रामीण परिवार म होए रिहिसे. जब वो सात बछर के होइस, तभेच ले अपन बबा (नाना) रामसाय घृतलहरे के मार्गदर्शन म गाए ले धर लिए रिहिसे. वोहर अपन नाना जगा ले भरथरी के संगे-संग ढोला-मारू, चंदैनी जइसन लोक गाथा मनला घलो सीखे रिहिसे. पहली बेर उनला रतनपुर मेला म गाये के मौका मिले रिहिसे, फेर रूस म सन् 1986-87 म होए 'भारत महोत्सव' म उनला विशेष चिन्हारी अउ प्रसिद्धि मिलिस. रूस के छोड़े करीब 18 अउ देश मनमा वोमन अपन कला के डंका बजाए रिहिन हें. जेकर सेती उनला दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ स्व. देवदास बंजारे स्मृति सम्मान मिले रिहिसे. वोमन ल मध्यप्रदेश शासन के देवी अहिल्या बाई सम्मान घलो मिले रिहिसे. 10 मार्च 2018 म वोमन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लिए रिहिन हें.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811