Saturday, 12 September 2026

लघुकथा ) बसंत के अगोरा

 (लघुकथा )


बसंत के अगोरा 

---------

परोस के सियान कका जेन हा रोज संझा अपन चौरा मा बइठे दिख जय वो हा चार -पाँच दिन होगे दिखत नइये।जब ले वोकर छोटे बेटा बसंत हा अपन बाई संग शहर मा रोजी मजूरी करत रहे ला धर लेहे तब ले कका हा जादेच कमजोर दिखे ला धर लेहे।मोला लागिस के हो सकथे तबियत खराब होही। अइसे भी वोकर उमर अस्सी बछर ले आगर होवत हे । 

 मन नइ माढ़ीस त कका -कका कहिके आरो देवत वोकर घर गेयेंव। भीतर परछी कोती ले कका के अवाज अइस --"आव बेटा आव। कोन मोहित अच गा।आव बइठ।"

हव कका कहिके पाँव परेंव अउ कुर्सी मा बइठत पूछेंव --"तबियत उबियत सब बने बने हे न कका। चार पाँच दिन होगे दिखत नइ रहे। गाँव गौँतरी चल दे रहे का?"

"कहाँ गाँव गौँतरी जाहूँ ग। अब तो सक नइ चलय। अउ तबियत के बात हे त अब का बने अउ का गिनहा।भगवान हा अब हम दूनो परानी ला लेग जतिस तेने बने हे।"

"नहीं नहीं अइसे मत काह कका तोर आशीर्वाद हमन ला मिलते राहय। का होगे तेमा अतेक उदास हस "--मैं पूछेंव।


"काला बताववँ बेटा -तैं तो सब जानते हस। दू दी औलाद रहिके तको हमन बेऔलाद बरोबर हाबन। बड़े बेटा बलकरण हा बीसो साल होगे जब ले अपन ससुरार मा जाके घरजवँई बने हे, एती हिरक के नइ निहारय। उहें के पुरता होगे। छोटे बेटा बसंत हा तको चार महीना होगे कानपुर कमाये-खाये ला गेहे। झन जा कहिके कतको बरजेन फेर नइ मानिच। वोला बरगलाये मा बहू के हाथ हे। हमन ला दू मूठा राँध के देये मा वोकरो अदरमा फाटगे।  बेटी बेचारी हा हप्ता पंदरही मा शोर संदेशा लेवत रहिथे। उही बिचारी हा का करही। वोकरो घर दुवार हे, लोग लइका हे, सास ससुर हे। हमन तो अब पाना डारा झरे पेंड़ कस ठुठवा -ठुठवी होगेन बेटा"--एक्के साँस मा हिरदे के पीरा ला कका हा बाहिर निकालत फफक डरिस।

मैं धीरज धरावत कहेंव -- तैं तो मोर बाप बरोबर हस कका । मैं भला का समझा सकहूँ फेर एक बात जरूर कहना चाहहूँ -- मौसम बदलत रहिथे कका। अभी पतझर हे त का होगे बसंत तको आही।"

"अब ये चला चली के बेरा मा बसंत ला अगोर के का करबो?पतझर ला नइ आना रहिसे"--भर्राये गला ले कका कहिस।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

करु लागत हे रे! ....* (लघुकथा)

 .          *करु लागत हे रे!  ....* (लघुकथा)


                      - डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


         वोहा रात साढ़े आठ बजे काम ले थके-मांदे वापिस द्वारी के भीतरी कदम नि रखे पाय रहिस कि अम्मा के आवाज सुनाई परिस- ' बेटा, तोर बाबू पाछू के द्वारी मा बोतल ला धर के बइठे हे। कतको कहँथव फेर नि मानत हे। जा ओला थोरकुन चना-मुर्रा दे आ! '

      पाछू कोती के द्वारी मेर गिस त ददा चिल्लावत रहे-' करु लागत हे रे.... करु लागत हे! थोरकिन चना-मुर्रा तो लान दे ..... '

      तइसने जोरहा लात परिस त सीढिया ले नीचे गिरके पाँच फुट दूरिहा फेंका गे! - ' साला! ..... एही सिखाय बर चार ठिन लइका पैदा करे हस! '

     ओती अम्मा के आवाज आइस- ' का गिर गे बेटा! '

     ' कुछु निही अम्मा! एक ठिन कुकुर ला लात मार के भगाय हँव! '

_________________________________

जंगल म सुरुक्षा --( कहानी )

 ---- जंगल म सुरुक्षा --( कहानी )


​लछमी नारायन यादव गंडई गांव के रहइया ए। ओहू हा अपन ददा कस चरवाहा के काम करय। लछमी नारायन के दो ठन बेटका रहिन—नवरंग अउ बजरंग यादव। नवरंग के उमर 13 बछर अउ बजरंग 11 बछर के रिहिस। नवरंग अउ बजरंग घलो 5वीं तक पढ़े के बाद ढोर-डांगर चराए म लग गैन । दोनूं लइका गांव के चार ठन दाऊ मन के ढोर-डांगर ल नजीक के जंगल म चराए बर ले जावयं। ढोर-डांगर चरावत बेरा ओमन के हाथ म लाठी रहय। कभू-कभू ओमन कुल्हाड़ी घलो लेके जावयं, जेखर ले जंगल ले लकरी काट के आवय।

​नवरंग देह-दउर म तगड़ा रिहिस, पर थोकिन डरपोक रिहिस। ओहीच मेर बजरंग दुबरा-पतरा रिहिस, फेर ओहा भारी हिम्मती रिहिस।

​दोनूं भाई मवेशीमन ल जंगल के सुरूआत म एक ठन मैदान म चरइ बर छोड़ के पेड़ के छांव म बैठ जावयं। फेर दोनूं मिलके बिल्लस खेलयं या गाना-बजाना करयं। 4 बजे के बाद सबो जानवर ला स्केल के ले जावय। इन ढोर-डांगर के एक ठन खासियत रिहिस—जब घलो ओमन समूह म चलयं, तो समूह के आगू अउ पाछू जवान अउ ताक़तवर जानवर रहयं, अउ कमजोर, बूढ़ा अउ लइका जानवर बीच म रहयं।


​ओती उंकर ददा लछमी नारायन के पूरा समय गाय-भैंस के दूध दुहे म, चारा देवे म अउ ग्राहक मन तक दूध पहुंचाए म बीत जावय। बाप-बेटका मिलके अतेक कमा लेवयं कि कभू कंहू हाथ पसारे के नौबत नई आई।

​कुछू दिन ले गांव म हल्ला रिहिस कि कुछू ख़ूंख़ार जंगली जानवर  जंगल ले भटक के गांव कोती आ चुके हवयं अउ पालतू जानवर मन ऊपर हमला करत हवयं। तभे सबो ल सतर्क रहे के जरूरत रिहिस।

​लछमी नारायन हा अपन दोनूं लइका ल ए खतरा के बारे म बताईस अउ सलाह दीस कि ढोर-डांगर ल नजीक म ही चरावव, जादा दूर जंगल म मत जावव। कमर म छुरी-चाकू अउ कांधे म कुल्हाड़ी रखव। दोनूं लइका ददा के गोठ ल अक्षरस: मानिन अउ सुरुक्षा के संग जंगल जाए लागिन।

​अब खाली समय म बजरंग अपन जानवर मन ल बहादुरी के किस्सा सुनावयं कि कैसे एक हाथी हा मगरमच्छ ले अपन गोड़ ल छुड़ाईस, कैसे खरगोश हा शेर ल कुंवा म गिरा दीस अउ कैसे बंदर हा चालाकी ले अपन जान बचाईस। ओहा 6 ठन हट्टे-कट्टे जानवर (1 बैल अउ 5 भैंसा) ल आपस म लड़े के अउ हमला करे के ट्रेनिंग दे लागिन। बैल के नाम 'संग्राम सिंग' अउ भैंसा मन के नाम 'ज्वाला प्रसाद', 'बलबीर', 'काल भैरव', 'बहादुर प्रसाद' अउ 'शक्ति कुमार' रखिन। बजरंग ओमन के सींग ल खरोंच के नोकीला कर दे रिहिस अउ पूंछ म कांटा के लड़ी बांध दे रिहिस।

​दो महीना बीत गे, अइसन कोई घटना नई होईस।


​अब बड़े भाई नवरंग थोकिन बेफ़िक्र रहे लागिस, फेर छोटे भाई बजरंग अब भी सजग रिहिस। अब ओमन के बरदी म 55 ठन मवेशी हो चुके रिहिन। बजरंग कभू-कभू अपन छहों रणबांकुरा मन के परीक्षा लेवत रहय।

​बरसात के दिन आ चुके रिहिस। एक दिन दोपहर म दोनूं भाई खाना खावत रिहिन कि जानवर मन के दउड़े के अवाज आईस। नवरंग हा देखिस त तीन ठन शेरनी ओमन के पाछू परे रिहिन। नवरंग डर के मारे रुख ऊपर चढ़ के बैठ गे। फेर बजरंग हा हिम्मत नई हारिस, ओहा अपन कुल्हाड़ी उठाईस अउ संग्राम सिंग, ज्वाला प्रसाद, बलबीर, काल भैरव, बहादुर अउ शक्ति कुमार ल हुक्म दीस—"आज तुम्हर हिम्मत के परीक्षा ए, आगू आवव!" सबो मवेशी हुंकार भरत आगू आके ठाढ़ हो गैन।

​जब तीनों शेरनी सोझ म पहुंचीन अउ नज़ारा देखिन, त एक बेर ठिठक गिन। एक शेरनी आगू बढ़िस त संग्राम सिंग ओकर सोझ म आ गे। तीनों शेरनी हमला करिन—एक हा संग्राम सिंग के टेंटुवा ल धर लीस, दूसरी पीठ म चढे के कोसिस करिस अउ तीसरी पूंछ कोती आई। संग्राम सिंग हा अपन पूंछ ल जोर ले हिलाईस त कांटा के लड़ी ले तीसरी शेरनी पीरा के मारे पाछू हट गे। तब संग्राम के सहायता बर ज्वाला प्रसाद अउ बहादुर अली हा एक संग अपन सींग ले पीठ वाली शेरनी ऊपर वार करिन, जेखर ले ओहा भुंइया म धड़ाम ले गिर गे।

​गर्दन ल धरे शेरनी ल छुड़ाए बर बजरंग हा कुल्हाड़ी ले ओकर पीठ म जोरदार हमला करिस। शेरनी हा बजरंग कोती झपटी, बजरंग फिसल के गिर गे। तब बजरंग ला बचाय बर बलबीर, शक्ति कुमार अउ काल भैरव सोझ म ढाल बनके ठाढ़ हो गैन। एही मउका म संग्राम सिंग हा पाछू ले आके अपन नोकीला सींग ल शेरनी के पेट म पूरी ताक़त ले घोंस दीस। शेरनी ओहीच बेर ढेर हो गे अउ ओखर  प्राण पखेरू उड़ गे। ए दृश्य ल देख के बाकी दो ठन शेरनी दुम दबाके भाग गैन।

​बजरंग हा संग्राम सिंग के घाव म माटी के लेप लगाईस, जेखर ले लहू बहना बंद हो गे। सबो जानवर अपन पूंछ हिलाके अपन रणबांकुरा मन ल सलामी दे लागिन।

​संझा होगे रिहिस। बरदी वापस गांव कोती फिरीस। आज कतार म सबले आगू संग्राम सिंग रिहिस अउ ओकर पीठ म बजरंग शान ले बैठे रिहिस। नवरंग ल बीच म रखे गे रिहिस अउ बाकी योद्धा पाछू-पाछू चलत रिहिन।

​ए घटना के बाद गंडई के जंगल म कभू शेर के दहाड़ नई सुनाई दीस। ओही दिन ले गंडई म हर बछर विशाल पशु मेला लागथे, जेनहा पूरे छत्तीसगढ़ म प्रसिद्ध हवे।

​(समाप्त)

करु भात* (कहानी)

 *करु भात*

(कहानी)

बुधारु अउ समारु सग भाई रिहिन।फेर का करबे।दस डिसमिल जमीन के झगरा हा दूनों झन ला बांटे भाई परोसी बना दिस।बुधारु अउ समारु दूनों झन मर खपगे।फेर आज ले दूनों परिवार के बीच गोठबात बंद हे।उंकर बेटा मन घलो उही दुश्मनी ला निभावत उमर पहात रिहिन।बुधारु के बेटी रमेसरी अउ समारु के बेटी  निर्मला संगे मा खेलिन कूदिन अउ पढ़िन।समय के मुताबिक दूनों के बर बिहाव घला होगे।दूनों झन अपन अपन ससरार चलदिन।निर्मला ऊमर मा रमेसरी ले महिना भर के छोटे रिहिस।घात मया रिहिस दूनों के बीच।फेर का करबे।जमीन जयदाद के झगरा दूनों झन बर बैरी बनगे।

हर बच्छर तीजा के बेरा मा दूनों झन आवय।फेर भाई मन के डर में एके जघा नी संघरे।

कलेचुप मौका पावय त संगी सहेली मन घर अपन अपन मन के पीरा ला गोहरावय।

रमेसरी अउ निर्मला एसो घला तीजा आय हवै।फेर एसो के तीजा मा निर्मला कुछ ठान के आए रिहिस।ओहा अपन बड़े भाई संतोष ला कहिथे-भैय्या!हमर ऊमर हा खियात हे।कतेक दिन काकर जिनगानी रही।कोनो नी जानय।धन दोगानी आवत जावत रही।फेर बेरा नी लहुटे।तोर से बिनती हे भैय्या!!ए जिनगी ला दुश्मनी मा खुवार झन करौ। में हा एसो रमेसरी दीदी ला करु भात के नेवता देबर जाहूं।मना झन करहू काहत निर्मला ओकर गोड़ मा गिरगे।

निर्मला के गोठ ला सुनके संतोष के हिरदे पसीजगे।ओहा ओला उठाइस अउ हां कहत अपन सहमति दे देथे।

संझौती बेरा निर्मला हा रमेसरी तीर ओला बलाय बर जथे ता ओकर बड़का भैय्या ओला देखके अचरित मा पर जाथे।पांव परथे तभो मुंहू ले भाखा नइ निकलय।त निर्मला वहू ला उही बात कहिथे।जेन बात ला वो अपन सग भाई ला केहे रहिथे।

रमेसरी के आंखी ले निर्मला के गोठ ला सुनके तर तर आंसू बोहाय लगथे।रमेसरी के आंसू ला देखके भैय्या के आंखी घलो डबडबा जाथे।

निर्मला रमेसरी ला कहिथे-दीदी! मैं तोला करु भात खाए बर बलाए बर आए हंव!!

रमेसरी मुड़ ला हलावत निर्मला ला पोटार लेथे अउ अपन भैय्या कोती देखथे त ओहा मुड़ ला हलावत स्वीकृति दे देथे।संझौती बेरा दूनों बहिनी कई बच्छर बाद दूनों घर मा करु भात खाथे।एसो के करु भात उंकर बर थोरको करु नइ रिहिस बलुक अमरित बनगे रहय।

तीजा मनाए के बाद एसो दूनों बहिनी जोड़ा तीजा लुगरा धरके अपन भाई भतीजा ला आशीष देवत हाॅंसत गावत लहुटिन।


रीझे यादव टेंगनाबासा 

छुरा

एक लोटा पानी पोखन लाल जायसवाल

 ५. एक लोटा पानी

                  पोखन लाल जायसवाल

           भादो के महीना रहिस, अगास मं पड़री बादर अइसे बगरे रहय, जइसे कोनो पोनी बेचइया ह हाट मं पोनी के कुढ़वा मन के पसरा लगाय हावय। बीच-बीच ले झाँकत घाम चाम ला जरोवत हावय। कमरछठ मनगे रहिस। आठे घलव बुलक गे राहय। 


आठे के दिन भगवान के असनादे बर घलव दया नइ दिखइस, बइरी बादर ह। करिया-करिया मार घपटिस अउ कोन जनी कति बिलम गे। छिन भर नि लागिस लहुटे मं। 


द्वापर युग मं इही बादर हा कइराहा इंद्रदेव के कहे ले जमके बरसे रहिस, वहू ला कातिक के महीना मं। तभे तो एक अँगरी मं गोवर्धन पर्वत ला उठाँय रहिन हें किशन हा अउ सब के रखवारी करे रहिन। तब गोवर्धन पर्वत ह छाता बनगिस। 


फेर अभी, दिन हा अइसे जनावत हे कि चउमासा बुलक गे हे। कोनो-कोनो मेड़ पार के फूले काँसी मन तुलसी बबा के कहना के आरो देवत हें। 


नरवा खॅंड़ मं फूले काॅंसी मन बरसा के बुढ़वा होय के चारी करत हावँय। सफाचट के उतरे ले मेड़ पार के काँसी घलव नँदाय ल धर ले हे। 


बदरहा घाम हवय। फुरफूँदी मन बिकटे उड़त हवँय। भुइँया च तिर मं। बरसा होही के आस टोरत हें। गुड़ी तरी लीम के छाॅंव मं बइठे लोगन मन गोठियात हावें।

        

गाँव के गुड़ी तिर कमलेश के घर हावय। लिमतरिहा बबा के घर ले जुरे हावे कमलेश के घर। दूनो के छानही-परवा जुड़े रहिन त अनगइहाँ मन ल तब भोरहा होवय कि ए दूनो घर एके ठन घर आवय। 


...अब न खपरा मिलत हे अउ न मेड़ मं बने सहीं रुख। जंगल तो कब के रोवत हावय लकड़ी बर। विकास के घोड़ा जब ले दउड़े लगे हे, तब ले रोजेच जंगल के विनाश होवत जावत हे। पेड़ लगावव के सरकारी अभियान कागज-पत्तर मं चलत हावे। कागज-पत्तर के मुताबिक कोनो मेर आँतर नइ छूटे होही, पूरा भुइँया ला हरियर कर डरे हें नेता मन। 


किसान मन छइहाँ मं धान नइ होवय कहिके मेड़ पार के रुख ला कटई च करत हें। बेंदरा मन घलव खाजी खोजत गाँव डहर आगे हवँय। छानही मं जझरंग-जझरंग कूदे ले खपरा के ठिकाना नइहे। अइसन मं सबे च हा पक्की घर बनावत हें। 


कमलेश घर सियान के नाँव मं दू परानी हावँय। अउ एक ठन नान्हे फूल ले ॲंगना महकत हावय। तीजा के दिन हरे, ओकर अँगना मं तीन झन तीजहारिन आय हवँय। 

       

बिहनिया ले घर-अँगना अउ दुआरी ला बहार-बटोर के बहिनी-माई मन असनान-ध्यान मं लगे हें। भोले बाबा ला सुमिरन करत हें। माटी के बनाय शिवलिंग के अभिषेक करत मोर माँग के सिंदूर सदा दिन चमकत रहय, कहिके पूजा पाठ करत विनती करत हवॅंय। तीजा उपास ला पति के लम्बा उमर बर रखे जाथे। कोनो-कोनो मन मइके तो आय हवॅंय, फेर उपास नइ राखे हें। बेरा-कुबेरा कहूँ ए उपास टूट जथे त अउ रखे नइ जावय, इही मानता ले कुछ झन मन उपास रहई के शुरुआत नइ करे हें। वइसने जेन मन ए उपास ल शुरुच नइ कर पाय रहिन हें, ओमन आसो लौन के बाढ़े ले उपास नइहें। 


लौन नइ बाढ़े रहितिस, त अभी नवरात्र परब चलत रहितिस। चउँक-चउँक मं देवी पूजा होवत रहितिस। माँदर के थाप अउ झाँझ के संग जसगीत सुनत मन झुमरत-नाचत रहितिस। गाँव के महामाई अउ शीतला दाई के मंदिर सजे मिलतिस। आस्था के जोति ले मन मं उजास बगरत रहितिस। ए जोत अंँजोर तो आगू बगराबे करही, ओकर पहिली गणपति ला भजे ला परही अउ ओकर गे ले सरगवासी पुरखा मन ला परघा के उॅंकर मन ले असीस ला परही। 


पितर पाख मं। अपन पुरखा मन ला हम नइ सोरियाबोन त काली हमर लइकामन हमर कति ले हियाव करहीं? अब तो कतको मन कहे धर लेहे - 'जीयत मं पुछारी नहीं अउ मरे मं सोहारी।' त कोनो अउ पटंतर देवत कहिथे- 'जीयत भर एक लोटा पानी बर नइ पूछे, अउ मरे मं गंगा।' 

         

शहरिया मन के चरितर ल सुन के गँवइहा मन के छाती फाट जथे। जेन ददा पुरखा के कमई ले टींग पूछ करथें। अपन गोड़ मं ठाड़ होय रहिथें। उही दाई ददा के हियाव नइ करँय। अथक होय ले उन ला आश्रम मं भरोसा छोड़ आथे। बने हे, ए बीमारी अभी गाँव मं नइ सँचरे हे। भगवान करे अइसन मन ले दुरिहा रहय गाॅंव ह।  


इही गोठ ला सुन के सुरता आगिस पउर साल के। लिमतरिहा बबा के परछी। गणपति पंडाल के जघा आवय। इही मेर के गोठ आय। जब अइसन पटंतर देवइया जवनहा मन के गोठ ला सुन के मनराखन बबा के रिस तरवा मं चढ़गिस। अउ गुसिया के चिचियाइस। ' रे! परलोखिया हो!! तुमन अपन ला देखव। दूसर ला दोष काबर देथव? तइहा के मनखे मन अपन दाई-ददा के तन-मन ले सेवा करँय, खटिया मं परे तभो जतन करँय। कभू दाई-ददा के आगू मुँह नइ उलत रहिन उँकर। अभी के मन ... एक ले दू होइस अउ ले दे के चार महीना नइ बीते पाय, दू ठन चूल्हा बना डारथे घर मं। घर के अँगना खँड़ा जथे। दाई-ददा बइरी जनाथे। अइसन मन बर तो दाई-ददा बोझा होगे हे... बोझा..।'       

 

मनराखन बबा इही मेर नइ थिराइस आगू काहते गिस - अपन करनी ला तोपे बर दस बहाना तूहीं मन ला आथे, रे ननजतिया हो! पुरखा मन के नेंग-जोंग मन ला निभा नइ सकव त झन निभाव, फेर उँकर भावना के मजाक झन तो उड़ावव। कोन काहत हे तुम मानौ। फेर एकरे बहाना जउन पुरखा ला मानत हें, उँकर आस्था ला तो चोट झन करव।'        


कोन जनी? मनराखन बबा के कोन पीरा ह उसल गे रहिस ते ओ दिन? बड़ सुनाय रहिस टूरा मन ला। सब्बो झन के मुँह सिलागिस बबा के गोठ सुन के। पंडाल सजई ला छोड़ के सुटूर-सुटूर टरक दिन सबझन पंडाल तीरन ले।       

'ले बबा! चुप रहा...सबो झन भगा गिन हें अब। कोनो नइ हे। लइका आय नइ जानॅंय। रीत रिवाज अउ उँकर मानता ला। हमीं मन सिखाबो अउ उँकरे मन मुताबिक रम के समझाय ला परही, तब कहूँ कुछु समझ पाहीं। नवा जमाना के लइका आवँय। अभी परम्परा अउ रिवाज मन इँकर बर फोकटइहा आय। मोबाइल चपकत भलुक नइ असकटाहीं, फेर पूजा-पाठ अउ रिवाज ला अपनाय मं टेम लगहीं बुजा मन ला। सीखहीं जरूर.... बस हम उन ला धीरलगहा समझावन। मन मं धीर धरन। बिशेसर कका ह बबा ले कहिस। 


पंडाल के बाजू कमलेश के घर। उहाॅं ले तिजहारिन मन के गोठियाय के आरो आवत हे। 'कुछु होवय एक बात तो मानेच ला परही कि तीजा तिहार के बहाना हम बेटी मन बर मइके के दुआरी खुला रहिथे। कभू-कभू मन मुटाव अउ कोनो किसम के अनबोलना होगे हे, गलतफहमी होगे हे, वहू हर एकरे बहाना दुरिहा जथे। मन मिल जथे।' करू भात खावत-खावत महेश्वरी हा अइसने च तो केहे रहिस काली अउ छोटे फुफू ह हुँकारू दे रहिस - 'बने काहत हस बेटी! हम नारी-परानी मन तो बिहा के, मइके बर पहुना हो जथन। एक लोटा पानी भर मिलत रहय, मन मं अतकेच के आस रहिथे। मया के बँधना ला इही एक लोटा पानी ह जोर के राखथे।'           


बड़की फूफू ह जुन्ना दिन ला सुरता करत कहिस, 'अब तो पहिली के जइसे दिन नइ रहिगे हे। पहिली बहिनी-माई मन तीजा माने अठुरिया अकताहा मइके आ जवत रहिन। अब तो पोरा घलव ससुरार मं मान लेवत हे। तीजा उपास रहे के दिन ले मइके के अँगना मं हबरथे। करू भात के दिन बेरा आछत ले मइके पहुँचे के दिन-बादर (नेत मढ़ाथें) धरथें। लइका मन के पढ़ई-लिखई बहाना जउन होगे हे। पढ़ई ले जिनगी के अँगना मं अंजोर बगरथे। बस्ता ला खूँटी मं टँगई ह बने बात नोहय। प्रतियोगिता बाढ़ गे हावय, अइसन मं चेत तो करेच ला परही। जे पढ़थे, ते बढ़थे।'


फूफू के गोठ लम्बा रेस सहीं नॉनस्टॉप चलते रहिस।

'मोटर गाड़ी घलव अब अपने हाथ के बात होगे हवय। घरोघर फटफटी जउन होगे हवय। बरसा पानी ले नरवा-ढोंरगी के पूरा आय के तो गोठेच नइ रहिगे हे। रपटा-पुलिया मन पक्की हो होगे हें। चउमासा मं घलव पहिली घरी कस अब झड़ी नइ होवय। सुरुज नरायन के दर्शन बिगन बासी खवइया मन ला लाँघन रेहे के जरूरत नइ रहिगे हे।' बड़की फूफू कोनजनी अउ कतेक ला अमरतिस ते। रोटी-पीठा बनाय बर पिसान अउ जरूरी सबो जिनिस के गोठ करत महेश्वरी ह फूफू ला अपन गोठ ल घिरियाय बर कहिस। फूफू ह महेश्वरी के चाल ल समझ गिस, तभे तो कहिस- 'महेश्वरी ला मोर गोठ कभू भाबेच नइ करय।'       


महेश्वरी फूफू ला मनावत कहिस, 'अइसन बात नोहय दीदी, तहीं बता न? काली पूजा पाठ करे मंदिर जाबोन कि नहीं? अभी संसो नइ करबो त फेर तेलई कतका बेर बइठबो? ...मन नइच माढ़े होही त गोठियाइच ले। फेर मन ला झन मार ...मोर माता।'       

'नहीं बेटी ! में तो ठठ्ठा करत रेहेंव। तें सहीं काहत हस। ...अउ सुन न बेटी! काली अतके जुआर तोर मोबाइल मं सिहोर वाले प्रदीप मिश्रा के कथा चलाय बर भुलाबे झन। शिव-पारबती के कथा सुनवाबे हँई?' अतका ला सुन सबो कोई हाँस डरिन।           

दीदी! महराज तो तीजा तिहार मं फुलेरा बाँधे बर कहिथे, बाँधबोन का ओ ...अतका ल सुन के छोटकी फूफू ह खलखला के हाँस डरिस।...         


तीजा के अगोरा तो सबो ला रहिबे करथे। लइका मन ला घलव ममा घर जाय के बड़ अगोरा रहिथे। आजकाल तो गरमी छुट्टी ह होमवर्क के भेंट चढ़ि च जथे। प्राइवेट स्कूल के तो हाल अउ झन पूछव। अइसन मं घर मं धँधाय लइका मन बाहिर जाय के सोचथें। फेर अब तो ओमन ला तिमाही परीक्षा के राहू गिरहा मन हा जम के घेर ले रहिथें। उँकर मनसा मं पानी फेर देथे। महेश्वरी सात बछर के नोनी ला घर मं छोड़ के आय रहिस। फूफू के मोबाइल कहे मं नोनी कोति महतारी के मया उफनाय लगिस। सुरता के डोर लाम गिस। नोनी ले तुरते गोठियाइस तब कहूँ महतारी के उफनात मया शांत होइस।        


कुछु रहय मइके के सुरता ला तीजा के जोरन मं अकताहा जोरत रहिथें। बेटी-माई मन घलव भाई-भौजी के घर एक लोटा पानी के थेबहा बने रहय, सोचथें। इही आस मं अपन मन ला मढ़ा लेथें। एकरे ले मया के बँधना जुरे रहय, इही आसरा करथें। इही आस ल तीजा तिहार ह बछर भर मं पूरा करथे।       

   

कोरोना बइरी हा अँगना ला उजाड़ कर दे रहिस। महेश्वरी के दाई-ददा अउ कोइली कस कुहकत नान्हे भतीजिन ला अपन गाल मं भख ले रहिस हे। भाई कमलेश के अँगना सुन्ना होगे रहिस। बिपत के ओ घरी मं भाई कमलेश हा यमराज के दुआरी ले, ले दे के घर लहुटे रहिस। बीस-बाईस दिन ले बिस्तर मं परे रेहे रहिस। सबो के मन उतर गे रहिस हे। कोनो ला भरोसा नइ रहिस कि भाई ह हाथ आही। कमलेश के दाना-पानी बाँचे रहिस, तभे तो घर आ पाइस।.... बड़ दिन ले घर के हाँसी ला गरहन धर ले रहिस हे। कोरोना के लगे सूतक उतरे नइ हे।          

चार महीना पहिली घर मं नवा सगा के आय ले खुशहाली ह लहुटे हावय। इही तो जिनगी आय। दुख के पाछू सुख अउ सुख के पाछू दुख लगे रहिथे। 


बेरा एके ठउर मं नइ ठहरय। उवत बेरा धीरे-धीरे बुड़ती मं जाथे, त रतिहा के पहाय ले फेर उत्ती डहर ले झाँके लगथे। बिहनिया सुरुज नरायन अपन अँजोर ले घर के मुहाटी खटखटाथे। अउ नवा संदेशा देथे, नवा शुरुआत के। दुख के दिन ला बिसार हँसाय के उदिम करथे। दुख के घड़ी आथे त चल घलव देथे। घड़ी के काँटा कब रुके हे, भितिया मं टँगाय घड़ी के जेन काँटा बारा बजावत ठाड़ तपथे, उहीच काँटा तो छै बज्जी अपन थोथना उतार देथे। बस मनखे ल मन मं आस अउ धीर राखे के चाही। अइसने कमलेश के जिनगी मं छाय उदासी के अँधियार घलव छटगे हावय। अँगना मं फूल ममहात रहिस। ओकर जिनगी अब उछाह ले भरगे हावय।         


चतुर्थी के दिन हरे। कमलेश तीजहारिन फूफू अउ बहिनी मन ला तीजहा लुगरा देवत हावय। लुगरा झोंकत फूफू मन के आँखी छलछलाय लागिस। बड़की फूफू के मुँह अपन भाई-भौजी के सुरता करत रोनहुत होगे। सुरता कइसे नइ आतिस, जइसने लुगरा भाई-भौजी बिसावॅंय तइसने च लुगरा भतीजा घलव बिसाय हे। कोनो भेद नइ करे हे कमलेश ह बहिनी अउ फूफू मं। लुगरा ल झोंकत बड़की फूफू कहिस,  ''कमलेश बेटा! हम ला अइसने तीजा मं सोरिया ले करबे बेटा। भलुक लुगरा झन बिसाबे। मन मं अतके आस हावय कि जीयत भर ए घर मं एक लोटा पानी मिलत राहय। मया के पाग मं जुरे नता कभू छरियाय झन।"           


अतका सुन के कमलेश कहिथे- "दीदी! ददा के रहिते आवत रेहे, त ददा के गे ले नता गोता ल मैं नइ सरेखहूँ त कोन सरेखही? बाप एके झन रहिन अउ महूँ तो अकेला हवँव। पुरखा मन के चलागन ल आगू बढ़ाय बर। भाई रहितिस त ओकर हिजगा करतेंव। बाप अउ भाई के आँखी मूँदे ले तोर मइके डेरउठी तो इही भतीजा के डेरउठी ह आय। तीजा ले जुरे तुँहर आस ल कभू नइ टोरँव दीदी मैं ह। काहीं ल सकँव, ते झन सकँव... एक लोटा पानी ल जरूर सकहूँ।"


भादो के महीना मं पानी बरसत नइ हे त का होइस, फूफू-भतीजा के मया छलकत तो हावय। दूनो के आँखी ले अरपा-पैरी बोहाय लगिस। 


महेश्वरी फरहार बर लोटा के पानी मढ़ावत दू मन आगर फूफू मन ला कहत हावय- मोरो घर एक लोटा पानी तुँहर अगोरा करत हावय दीदी हो। भाई ऊपर जम्मो मया ला झन ढकेलव, थोर बहुत मोरो बर बचा के राखव, नइ ते मैं रिसा जहूँ।....एक पइत फेर, जम्मो झन खिलखिला के हाँसे लगिन।

०००


*पोखन लाल जायसवाल*

पठारीडीह (पलारी)

जिला: बलौदाबाजार भाटापारा छग

मो. 6261822466

Sunday, 2 August 2026

लघुकथा ) सुधार

 (लघुकथा )



सुधार

-------

जाति-बिरादरी के बइठक मा लोगन सकलाय हें। समाजिक भवन के हाल खचाखच भरे हे। आज पंदरा ठो आवेदन लगे हे जेमा तेरा ठो हा तलाक के हावय। सबो मा प्रायः पति के दारू पी के मारपीट करना तेकर सेती पत्नी के मइके मा बइठे के हावय। दू प्रकरण हा गुला-झाँझरी के तको हे।

  ये दरी बने नवजवान मुखिया चुनाये हे जेकर कंधा मा समाजिक सुधार लाये के जिम्मेदारी हे। बाँकी पदाधिकारी मन तको ठीक-ठाक हें। 

पहिली प्रकरण के सुनवाई शुरु करत महामंत्री हा अवाज दीस-- ''तेज राम अउ प्रमिला खड़े हो जावव।"

महामंत्री के आदेश ला सुनके दूनों झन खड़ा होगें।

" ये तलाक बर आवेदन ला तैं लगाये हस नोनी। का होगे तेमा "--महामंत्री कहिस।

"ये हा मोला दारू पी के अबड़ मारथे। मैं उहाँ नइ राहँव। मोला तलाक चाही"--प्रमिला कहिस।

अतका ला सुनके मुखिया हा थोकुन गुसियावत कहिस- "अच्छा तोरे कहे भर मा तलाक हो जही। हमन इहाँ समझा बुझाके परिवार ला जोंड़े बर बइठे हावन तोड़े बर नहीं। समाज मा सुधार लाना हमर प्रण हे।" अतका कहिके तेज राम ला हड़कावत कहिस--"क्यों तुम शराब पीकर मारपीट करते हो? "

" नहीं मुखिया जी कसम से मैं दारू ला हाथ नइ लगाववँ। एला नइ रहना हे तेकर सेती फोकट के आरोप लगावत हे। "--तीज राम कहिस।

"कइसे वो प्रमिला, ये तो नइ पियँव काहत हे। झूठ मत बोलबे, सही-सही बता।"--एक झन सियान कहिस।

" पीथे--पीथे--पीथे। अभी चार दिन पहिली टुन्न पीके मोर मइके मा आके दंगा-दासी करत रहिसे"।

"कोनो गवाही साखी हे?"--मुखिया कहिस।

"हाँ। ये दे परोस के कका वो मेर रहिसे। ले तैं बता दे कका।"--प्रमिला कहिस।

अतका मा एक झन  हा खड़ा होके कहिस--" हव, ओ दिन तीजू हा फूल पीके आये रहिसे अउ गाली-गलौच करत रहिसे। "

"नहीं --ये झूठ बोलत हे। मैं उहाँ गेयेच नइ अँव। येला खवा-पिया के सेट करके गवाही दे बर लाये हें "--तीजू कहिस।

अतका ला सुनके मुखियाहा कड़क अवाज मा कहिस--" अरे चुप रा तैं हा। तोर दारू पीना हा प्रमाणित होगे। दारू पीना बहुत बड़े समाजिक अपराध ये। हमर जात मा प्रतिबंधित हे।तोला दस हजार रुपिया दंडित करे जाथे। प्रमिला ला तलाक नइ मिलय। तैं हा लिखित मा देबे के अब ले दारू नइ पियवँ। ये प्रकरण के इही फाइनल निर्णय हे। आगू आवेदन के सुनवाई शुरु करे जाय। "

     बाँचे आवेदन मन के सुनवाई करत रात के आठ बजगे। बइठक समाप्त होइस तहाँ ले सब घर चल दिन। पदाधिकारी मन बस डाँड़- बोड़ी मा सकलाये पइसा मन के हिसाब-किताब मिलावत बइठे हें।

अचानक एक झन बड़का पदाधिकारी हा कहिस-- " मुखिया जी आज तो नियाव करत-करत मूंड-कान पिरागे। सब झन थकगे हावन। कुछु व्यवस्था हो जय भई। "

"वोहो तैं तो मोर मुँह के बात छीन लेयेच। होजय---"-मुखिया कहिस।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

तोर बर...!

 तोर बर...!

                         चन्द्रहास साहू 

             मो न 8120578897


रेलगाड़ी अब एक उरेर के अउ लम्बा सिटी मारिस अउ हलु -हलु आगू कोती रेंगे लागिस। सइमो-सइमो करत स्टेशन, गमकत प्लेटफार्म  सब छुटत हाबे अब । अउ छुटना ही जुड़ाव के आस आवय। इही  जम्मो आस अउ विश्वास ले  ट्रेन हा अपन मंजिल ले अमरके फेर लहुट आथे। ......रोजिना इही क्रम चलथे- सरलग। इही सरलगपन ले नवा ऊर्जा अउ उछाह मिलथे यात्री मन ला। काखरो गुजर-बसर के जरिया बनथे तब काखरो अगोरा सिराथे। अब अपन स्पीड पकड़ ले रिहिस रेलगाड़ी हा। यात्री मन अपन सीट ला पोगरा डारे हाबे अउ कतको झन मन भटकत घला हाबे। कतको झन मन अपन अपन जिनिस ला तिरियावत हाबे अउ हियाव घला करत हाबे। भलुक जम्मो उम्मर के यात्री मन सफर करत हाबे फेर सब ले जादा उछाह मा हाबे तौन पढ़इयां मन के टोली आवय। जम्मो कोई एकेच उम्मर-जौजर। कोनो कालेज के आवय अउ अपन नौकरी बर परीक्षा देवाए ला जावत हाबे। परीक्षा के आखर सुनके सब गंभीर हो जाथे फेर येकर मन के बरन मा कोनो गंभीरता नइ दिखत हाबे। स्लीपर कोच के लोवर मा तीन झन टूरी अउ ऊप्पर मा दू झन टूरा बइठे हाबे। अइसना दूनो कोती हाबे अउ आर ए सी मा एक झन टूरा बइठे हाबे। भलुक जम्मो कोई मेछरावत हाबे फेर ये टूरा हा गंभीर हाबे। अइसन केंवरी उम्मर मा कोनो गंभीर होथे का  ? नहीं फेर  कभु-कभु परिस्थिति हा उम्मर ले जादा बड़का बना देथे। .... अउ बाप के बीते ले लइका हा तुरतेच बड़का हो जाथे। केंवची उम्मर मा पीरा सहे ला जान डारथे, घर चलाये बर सीख जाथे अउ विद्या के महत्तम ला घला समझथे पढ़ाई जीवन मा सुख पाबे तब जीवन भर दुख झेलबे अउ पढाई जीवन मा दुख उठाबे तब जीवन भर सुख मिलही। मेंहा आर ए सी वाला सीट मा बइठे राकेश के गोठ करत हावंव। रेलगाड़ी मा बइठे पढ़े के उदिम करत हे फेर रेणुका, मोहनी, रमेश अउ पवन कहां ले पढ़े ला दिही....?   ये जम्मो जौजर मन राच्छस बनके राकेश के पढ़ाई लिखाई यज्ञ मा बिघन बाधा उत्पन्न करत हाबे।

"अरे ! देख भाई डोंगरगढ़ के पहाड़ी ला, कतका सुघ्घर लागत हाबे।''

रेणुका किहिस।

राकेश मुड़ी उठा के देखिस। खिड़की के वो पार मैकाल पर्वत माला के अनंत छोर......! अहा...! अब्बड़ सुग्घर, अब्बड़ मनभावन, अगास ला अमरत पहाड़ के फुनगी, दाई के अचरा कस लहर-लहर लहरावत  फुनगी मा धजा-पताका, धजा पताका मा सौंहत देबी दाई के प्रतिकृति अउ दाई के ये बरन ले बरसत मया दुलार अउ आसीस। सिरतोन जौन देखथे तौने मनखे के अंतस हरिया जाथे। नवा ऊर्जा के संचार ले मन गमके लागथे। जम्मो कोई अपन मनोरथ सिद्ध होये कहिके अर्जी कर लेथे जगतारण देबी माॅं डोंगरगढ़ बमलाई ले। 

"मोरो बिनती सुन ले महतारी ! एसो के नवराति मा तोर अंगना मा घींव के जोत बारहूं अउ नौ दिन ले उपास रहूं।''

मोहनी भलुक फुसफुसावत किहिस फेर राकेश तो सुन डारिस वोकर गोठ ला। 

"ये सुग्घर जीवन देये बर देबी-देवता ला धन्यवाद दे मोहनी ! अउ जोत जलाहूं कहिके माता रानी ला घूस झन दे। मेहनत कर, पढ़ अउ घेरी-बेरी पढ़, सरलग पढ़ तब सब याद हो जाही वोकरे सेती करत करत अभ्यास के..... कहिथे।''

राकेश के गोठ सुनके मोहनी अकबका गे। सन्न खा गे। अउ जम्मो जहुरियां मन ठठाके हाॅंस डारिन। 

मोहनी लजागे अउ लजाये के संगे-संग अब रोसियाये लागिस।

"तुमन मोर आस्था ला खिल्ली झन उड़ावव।''

मोहनी के गोरिया बरन अब लाल होगे, आँखी फरिहागे। अउ  फुनफुनाये लागिस। फुनगी नाक जादा लाल होगे अउ वोमा नान्हे मोती के बूंद चमके लागिस। ससन भर देखत हाबे राकेश हा।

"येहां आस्था नोहे मोहनी ! अंधविश्वास आवय। जोत के भरोसा ले बिना पढ़े कोनो परीक्षा मा पास नइ हो सकय।''

राकेश किहिस।

"आस्था के मतलब विद्यार्थी मन बर एकाग्रता आवय मोहनी ! .. आस्था हा प्रश्न ले परे होथे।''

अब पवन घला पंदोली दिस अउ राकेश वोला फरिहा के किहिस।

"अपन कर्म मा आस्था राख कि मोर मिहनत हा फलित होवय। सौ प्रतिशत मिहनत अउ सौ प्रतिशत भरोसा ही आस्था के मूल आवय। मन ला एकाग्र कर अउ पढ़ नोनी !''

राकेश  समझाईस तब थोकिन शांत होइस मोहनी हा।

"भगवान के नाव मा दे ददा, दीदी  भाई बहिनी हो !''

भीखमंगइया आगे रिहिन। 

"हूं..''

सरिता मुँहू मुरकेटे लागिस। वो भिखारी के बरन ला देख के। 

"भलुक मइलाहा घोंघटाहा ओन्हा पहिरे हाबे फेर  दिखे मा सांगर-मोंगर हे। गोड़ भर एक कन अपंगहा तो हाबे, खोरवा हाबे।''

सरिता फेर फुसफुसाये लागिस।

"खोरवा होगे ते का होइस। कोनो सुग्घर बुता कर सकथे। हमर गाँव के लोकवा वाला मनराखन बबा हा चना फुटेना के दुकान  खोल के सुग्घर बुता करत हाबे। ..... मोला अइसन मंगइया मन थोरको बने नइ लागे, अइसन घोरवा लुलवा सदा उपई , छानी मा चढ़के होरा भूंजई।''

अब मोहनी फुनफुनाये लागिस। वोकर मुँहू करू हो गे रिहिस। 

"दे दे बहिनी मंगइया आवंव।''

मंगइया किहिस अउ मोहनी भभके लागिस। 

"बुता के डर मा मंगइया बन गे हावस जांगर चोट्टा हो। मंगइया नो हरो तुमन, तुमन कोढ़िया आवव।''

छिन भर बर मंगइया हा छटाक भर होगे, वोकर मुँहू नानचुन होगे। चेहरा मा उदासी छागे। नानचुन टूरी अउ बोली मा अब्बड़ झार।

"का करबो बहिनी ! गाँव मा कोनो बुता करे बर बलाये नही अउ ... कोनो धंधा-पानी करबे तब अब्बड़ पइसा घला लागथे ....कोन दिही ? हमू मन ला कोनो साध नइ हाबे वो भीख माॅंगे बर फेर जीए बर तो बीख ला पीये ला परही ? का होइस ये हिनमान के बीख हमर भाग मा बदे हाबे ते। पी लेथन भगवान भोलेनाथ बरोबर अइसन बीख ला। एकरे भरोसी हमर लोग-लइका मन ला अमृत पियाथन, वोकर पेट के आगी ला बुता लेथन। .. का करबो जौन ला हाँसना हे हाँसे, थूकना हाबे थूके।''

मंगइया किहिस अउ मोंहनी तो वोकर मुँहू ला देखते रहिगे। उदुप ले राकेश हा अपन बैग ले सेवफल ला निकालिस अउ मंगइया ला दे दिस।

"बने सुग्घर रहो भाई ! दूधे खावव दूधे अचोवव। भगवान कुटुंब परिवार ला सुख अउ उछाह मा राखे।'' 

ससन भर आसीस दे डारिस मंगइया हा अउ अब आगू कोती चल दिस।

"अब अपन मूड ला बने कर ना यार मोहनी !''

वोकर जम्मो संगी संगवारी घलो मना डारिन फेर मोहनी तो अभिन घला शांत नइ होवत हाबे।

"अब सफर के मजा ला किरकिरा झन कर ना मोहनी ! देख, अब बिलासपुर जंक्शन अमर गे हावन। चल ताते तात चाहा पीके आथन। स्टेशन मा अभिन ट्रेन हा दस मिनट तक ठाढ़े रही।''

राकेश किहिस अउ हाथ ला धरके तीरे लागिस फेर मोहनी तो टस ले मस नइ होइस।

"देख मोहनी ! गरीब मनखे ईलाज बर लुलुवाथे, जेवन बर तरसथे अउ अपन अधिकार पाये बर खुरचथे। ... अउ सेठ साहूकार मन भलुक प्याज खाये बर छोड़ दिन फेर मनमाने ब्याज खाये ला धर लिन, मानवता ला बिसराके गरीब मनखे के तेल निकालत हाबे अउ अपन बर सरग निसेनी बनावत हाबे। देश के जम्मो मंदिर मा सोना के भंडार हाबे। अउ उही मोहाटी मा मंगइया के रेला हाबे। अतका असमानता हाबे हमर देश मा तब देश कइसे आगू बाढ़ही ? येखरे सेती मंदिर मस्जिद मा दान दक्षिना करे बर मोर मन नइ खंधे। अउ मेंहा थोकिन कठोर हो गे हँव।''

राकेश फेर समझाये लगिन।

मोहनी अब सिरतोन गुने लगिस अउ राकेश संग उतरगे। अब जम्मो संगी जहुरिया मन प्लटफार्म मा चहा के सुट्टा मारे लागिन।

"अपन साइंस सब्जेक्ट के प्रश्न ला समझ जाथो फेर गणित ला नइ समझ पावंव।''

प्रियंका हा संसो करत किहिस। अब जम्मो कोई गोठ बात करत हाबे।

"मोला तो करेंट अफेयर हा थर्रा देथे। सिरतोन करेंट मारथे वोहा।''

रमेश किहिस।

हो .... हो ... जम्मो कोई हाँस डारिन रमेश के गोठ ला सुनके। 

"प्रियंका तेंहा करेंट अफेयर सीख ले अउ तेंहा वोला गणित समझा दे।''

राकेश किहिस।

हँव बने तो कहत हाबे। एक दूसर के पंदोली दे देव। इही ला तो साइंस में सिंबायोसिस कहिथे।

"मोला तो गणित हा बने लागथे फेर केमिस्ट्री के समीकरण हा मोर समीकरण ला घाल देथे।''

केमिस्ट्री के समीकरण ला मेंहा बता दुहूं।

राकेश किहिस नरेश के गोठ ला सुनके।

"भाई ! मोला छत्तीसगढ़ के बारे मा बता ? अब्बड़ कन्फ्यूज रहिथों।''

छत्तीसगढ़ मा रहिके छत्तीसगढ़ ला नइ जानव, का बतावंव ?

विश्व के श्रेष्ठ आयरन ओर बैलाड़िला मा मिलथे। विश्व के पहेला संगीत विश्विद्यालय इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ मा हाबे। दुनियाँ मा सबले जादा धान के जर्मप्लाज्म इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर मा हाबे। उच्च गुणवत्ता वाला सुग्घर कोइला इहिच मिलथे। अतका सुग्घर अउ पोठ हाबे हमर छत्तीसगढ़ हा।''

राकेश गरब-गुमान करत किहिस। 

"दे दे राम...., देवा दे राम.....!''

उदुप ले एक झन मंगइया फेर आगे। गोड़ लड़बड़ावत हाबे। एक हाथ मा पाऊ धरे हाबे अब्बड़ मुसकिल ले अपन आप ला सम्हालत हाबे। अब्बड़ सामरथ ले रेंगे के उदिम करत हाबे। अब आगू मा स्लिपर कोच मा बइठे सुटेड बुटेड सभ्य कहवइया मनखे मन अपन मुँहू ला करू करे लागिन। 

इही हरे पोठ छत्तीसगढ़ भुइयां के गरीब मनखे। 

"मोला बने करे राम अंधरा बनाये....!''

अब कोनो बाबूलाल के गाना घला सुनाये लागिस।

राकेश गुने लगिस। बाबूलाल हा तो अंधरा हाबे फेर इहाँ के जवनहा मन कब जागही  ? मूल निवासी कब अपन अधिकार बर आगू आही ? थारी-लोटा धरके अवइया परदेसिया करा का जिनिस के कमती हाबे- स्कूल कॉलेज अस्पताल कारखाना अउ शासन मा उच्चा ओहदा तक हाबे। ......अउ हमन मूल निवासी करा का हाबे ? छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के नारा। इही नारा मा भरमाए हाबे। गुनव कतका सुग्घर हाबे छत्तीसगढ़िया मन। राकेश के मन मा मथनी चलत हाबे। छटपटाए लागिस वोहा। मन बियाकुल होगे जम्मो ला गुनिस तब। 

उदुप ले मोहनी के कर्रस आरो ला सुनिस अउ अपन मन के मथनी ले बाहिर निकलिस राकेश हा। 

"........फेर आ गेस मोला माँगे बर। खोरवा लुलवा ले मोला सक्त नफरत हाबे। एक भिखारी ला कुछु देके पठोये नइ रहिबे अउ दूसर मन के रेला आ जाथे।''

तमकत किहिस मोहनी हा।

"कोनो जान सुनके खोरवा नइ होवय मोहनी ! कोनो न कोनो मजबूरी रहिथे। ....अउ का होइस  मंगइया मन माँग लेथे ते ? चोरी डकैती लूट पाट तो नइ करत हाबे।''

"का भरोसा ? कब काला चोरा लिही तेनला कोन जानही ?''

आगियावत मोहनी के गोठ सुनके राकेश समझाये लागिस।

"कतका ला चोरा लिही ?  खाये बर फलफलहरी, रोटी अउ बहुतेच होही तब हजार पाँच सौ ला । सादा कुरता वाला असली चोर तो करोड़ों ला चोरा के बिदेश मा घर बसा लिन। ... अउ कोनो पकड़इया घला नइ हाबे। इहाँ के एक रोटी के चोरी करइया ला दंदरत ले कुचर देथे। पाँच सौ रूपिया के चोरहा जीवन भर जेल मा धंधाये हाबे। येहा कइसन न्याय आवय।... बता ?''

राकेश आगियाये लागिस अब।

"ट्रिन.... ट्रिन.......!''

मोहनी के मोबाइल के घंटी बाजिस। मोहनी अकचका गे। "ये दरी दाई के फोन ?''

"हलो माँ !''

"हलों बेटी ! कहाँ अमरेस बेटी  ?''

"अभिन नागपुर अमरे हँव माँ !''

"बने बने जावत हव न बेटी ?''

"हँव माँ  ! हमन जम्मो कोई बने हावन। भोपाल अमरते साठ फोन करके बताहूं  ।''

"बेटी ......!''

"हाँ माँ !''

"का गोठ आय माँ ! बता।''

मोहनी के दाई के मुँहू ले बक्का नइ फुटत हाबे। 

"ऊ....ऊ....!''

उदुप ले बबा जात के आरो आय लागिस अब।

"पाँव परत हँव पापा !''

"के दिन लागही टूरी तुमन ला लहुटे बर ?''

"काली परीक्षा होही ताहन लहुट जाबो जम्मो कोई। प...प...परनदिन आ जाबो ।''

"हूँ....!''

पापा हुंकारू दिस।

"पापा एक दिन बर.... मोसी गाँव  जाहूँ ...का ? राकेश घला उही गाँव के आवय मोला लेग जाही ....। मोसी के बेटी दिव्या बहिनी ले घला मिल लुहूँ ....। अब्बड़ दिन होगे भेंट-मुलाकात घला नइ होवय हे।''

मोहनी ढोढ़कत किहिस। 

ददा के रिस तरवा मा चढ़ गे। 

"तोला परीक्षा देये बर पठोये हँव, कोनो गाँव किंजरे बर नहीं। .... अउ राकेश ले दुरिया रहिबे। मनराखन के टूरा आवय ना !''

"हँव पापा !''

"वो टूरा ले दुरिहा रहिबे कोनो भी उच्च नीच होही ते तोर गोड़ ला टोर के खोरी बइठार दुहूॅं।''

गरजत किहिस ददा हा।

"अउ सुन ।''

मोहनी सावचेती होगे। कान मा असली परमाणु बम तो अब गिरही। ....अउ बेटी बर कोनो परमाणु बम तो आवय येहा।

"परीक्षा अतका जरूरी नइ हाबे ते तुरते घर लहुट जा। .... अउ जरूरत घला काबर रही ? तेंहा दाऊ के एकलौती बेटी आवस। पन्द्रा हजार के नौकरी बर आँखी ला फोर के झन पढ़। एकर ले जादा वेतन तो हमर घर के नौकर ला दे देथन। आजा लहुटके, बेटा राजा ला स्टेशन पठो दुहूं तोला लाने बर।''

ददा के गोठ घरघस लागिस मोहनी ला। सुकुरदुम होगे।

"विधायक हा अपन एकलौता बेटा बर  तोला देखे बर अवइया हाबे।  बड़का पद, बड़का प्रतिष्ठा, नेता अउ अभिन के विधायक संग मा अतराब के दाऊ- चार सौ पचास एकड़ के जोतनदार  वो भी डबल फसल वाला। वोकर बेटा संग बिहाव हो जाही तोर तब मेंहा गंगा नहा डारहूं। झप ले आ  जा बेटी !''

ददा छाती फुलोवत गोठियावत हाबे अउ बेटी हा तो सन्न खा गेहे। आखर के बीख कान मा परत हाबे अउ बेसुध होवत हाबे मोहनी हा। वोकर सपना टूटत हाबे । अगास ला छूके अवइया  पड़की चिरई बरोबर। ......एक- एक पाॅंख झरे बरोबर लागत हाबे।

"सुनत हस ना !''

कर्रस ले फेर आरो आइस ददा के।

"..... ह.. हव पापा !''

"ले बताबे तब। कब लहुटबे तौन ला ?''

"हूँ....!''

मोहनी हुँकारू दिस अउ मुड़ी गड़ियाके बइठगे। आँखी कईच्चा होगे। तरतर- तरतर आँसू बोहाये लागिस। 

"का होगे मोहनी ? का किहिस पापा जी हा।''

मया के गोठ सुनिस अउ अब गोहार पार के रो डारिस- हिचके लागिस, दंदरे लागिस मोहनी हा। 

"झन रो मोहनी ! दाई- ददा के गोठ मा रिस नइ करे।''

"हव, रिस  तो नइ करे के। फेर, मोर बाप हा तो पितृ सत्ता के अगुवा आवय। नारी के मन अउ देह मा अपन अधिकार समझथे, नारी ला अपन दास मानथे। आज विश्व हा इक्कीसवीं सदी मा रेंगत हाबे तब घला जौन करना हे तौंन ददा के मन से होथे। नारी ला खेलउना बना ले हे ये पुरूष प्रधान सोच के अगुवा मन हा। का पहिरना हाबे, का ओढ़ना हे। कहाँ जाना हे, कहाँ आना हे इहाँ तक का खाना हे तौनो ला .......  पुरुष हा बताथे। गरीब घर के बेटी ला जौन स्वतंत्रता हाबे तौंन हमर दाऊ बेड़ा मा नइ हाबे राकेश ! बिहाव के पहिली सपना के अगास देखाये रहिथे अउ बहुरिया हा अगास मा उड़ियाए ला धरथे तब वोकर पाँख ला कतर देथे। बिन पाँखी के चिरई के का अस्तित्व ?  बेटी तो चिरई आवय अपन फुदकना ले सबके मन ला हर्षा  डारथे ।  ... अउ इही बेटी हा अपन बर कोनो  सुग्घर जोड़ी चुन लिस तब ? ऑनर किलिंग हो जाथे। खाप पंचायत ला कोन नइ जाने। अइसना हाबे हमर झुठल्‍ला दाऊ अउ झुठल्ला दाऊ बेड़ा हा। आज मेंहा परीक्षा देवाए बर जावत हावंव तौंन हा दाई के बल मा जावत रेहेंव। ददा तो शिक्षा ले जादा सुंदरता ला देखथे । जतका सुंदर रहिबे ओतकी सुग्घर रिश्ता आही अइसे कहिथे ददा हा।.... अउ आगे विधायक हा अपन बेटा बर  रिश्ता धर के ।''

मोहनी फुनफुनावत रिहिस। चेहरा तमतमाए लागिस। पुरुष सत्तात्मक सोच बर घिन आये लागिस। उदुप ले राकेश ला ससन भर देखिस मोहनी हा । वोकर मन मा गरेरा चलत हाबे। ट्रेन चलत हाबे अपन रफ्तार ले अउ मोहनी के धड़कन घला। 

"राकेश !''

"हा, बोल ना मोहनी का बात आय।''

बॅाटल के पानी ला देवत किहिस राकेश हा। 

"कइसे लागत हाबे। तबियत तो ठीक हे न मोहनी तोर।''

मोहनी के मन बियाकुल होगे। वोकर मुँहू ले बक्का नइ फुटत हाबे। 

"बोल न, का बतावत हावस ते ?''

मया के पंदोली पाये ले मोहनी ला बल मिलिस अउ अब्बड़ सामरथ करके किहिस।

"राकेश ! मेंहा तोर संग अब्बड़ मया करथो। मोर संग बिहाव करबे का ?''

नेह के बंधना मा तो पहिलिच ले बंधा गे रिहिस राकेश हा फेर अपनेच अंतस में राखे रहिस। ... फेर राकेश तो समझदार आवय। दिल अउ दिमाग के संतुलन बनाके फैसला लेथे। 

"नहीं मोहनी ! तोर पापा हा नइ मानही। ... अउ गोठ गोठ मा धमकी घला देवत रहिथे। ... ये  समाज तो घला कहाँ अपनाही। तेंहा दाऊ के बेटी अउ मेंहा बनिहार के लइका ........।''

राकेश उदास होवत किहिस। 

"समाज ला तो मांदी भात चाहिये राकेश ! काकरो बिगड़े कि बने, वोमन ला कुछु मतलब नइ राहय। चल भाग जाबो त फेर...... ये समाज ये शहर ले दूर बाहिर कोनो बिरान शहर मा !''

"अपन छइयां भुइयां ला छोड़ के कहाँ जाबो मोहनी !  कोनो उड़हरिया भागे टूरी टूरा ला समाज हा सुग्घर नजरिया ले नइ देखे। ....... अउ उड़हरिया भागे ले दाई ददा के नाक नइ कटा जाही ? बेटी के जनम धरते साठ दाई ददा मन हा वोकर बिहाव के जोरा-जारी करे ला धर लेथे अइसन मा मेंहा अपन मन ला मार दुहूं फेर तोर अउ मोर कुटुंब ला आँच नइ आवन देवंव।''

राकेश गंभीर होवत किहिस। मोहनी अब्बड़ समझाईस फेर राकेश तो टस ले मस नइ होइस।

"मेंहा जीवन भर तोर अगोरा करहूँ फेर कोनो आने के नइ होवंव।''

मोहनी किरिया खा डारिस.... भीष्म किरिया। 

"आनी बानी के गोठ झन गोठिया मोहनी अभिन पीरा होवत हाबे फेर बेरा के मरहम ले सब घांव भरा जाही। अपन पढ़ई मा धियान दे। तोर बर मोरले सुग्घर जहुंरिया मिल जाही।''

मोहनी अकचकागे। कतको टूरा मन वोला अपन बनाये बर किरिया खाथे, कतको झन मन अब्बड़ उदिम करथे मोहनी के दिल जीते के। ... अउ राकेश ? 

"तेंहा मोर संग मया नइ करस का राकेश ?''

मोहनी कलपत किहिस।

"हँव, नइ करंव।''

रट्ट ले किहिस राकेश हा। 

"मेंहा केहेंव न पढ़ई मा धियान लगा अइसे अउ तेंहा आनी बानी के गोठ गोठियावत हस।''

राकेश खिसियावत किहिस। मोहनी कलेचुप होगे। भलुक कलेचुप होगे फेर तरी-तरी अब्बड़ दंदरत हाबे, भंवर उमड़े हे, विचार हा मथनी कस मथत हाबे अंतस ला। 

अब  जम्मो कोती कलेचुप होगे। कोनो आरो आवत हाबे ते ट्रेन के पटरी के खटर-पटर के आरो। खिड़की ले बाहिर कोती ला देखिस। बड़का बोर्ड अउ बोर्ड मा सुग्घर आखर मा लिखाए राजा भोज के नगरी भोपाल मा भारतीय रेल जम्मो यात्री मन के स्वागत करत रिहिस। उदुप ले ट्रेन हा लम्बी सीटी बजाइस अउ स्टेशन मा ठाड़े होगे। कोनो उतरत हाबे तब कोनो चढ़त हाबे। चाय नाश्ता जुस अउ पानी बेचइया मन के चिल्लम पो....। 

राकेश मोहनी अउ संगी- संगवारी मन घला उतरे लागिन अब।  अब फ्रेश होही अउ अपन अपन परीक्षा सेंटर मा जाके परीक्षा देवाही।

            ... अउ नारी जात के जिनगी मा अब्बड़ परीक्षा रहिथे। बिन गलती के माता जानकी ला अगिन परीक्षा देवाय ला परिस वहू ला राम राज मा, तब तो येहां कलजुग आवय। कदम कदम मा परीक्षा देवाए ला परथे। भलुक मोहनी के हाथ हाबे फेर करम के डाड़ तो वोकर ददा के हथेली मा छपाये हाबे। जइसन करम तइसन भुगतना। कतको चतुरई करले फेर करम के डाड़ नइ मेटाई रे भाई ! 

               कनवा आँखी मा घला नइ सुहावय तइसन राकेश के आगू मा गरबी ददा हा ठाड़े हाबे मुड़ी नवा के आज। इही तो समय आवय। ... अउ येहा बेरा के ताकत घला आवय, ... अउ परीक्षा घला आवय। आज पांच बच्छर पाछू राकेश ला ये दिन देखे ला परही अइसन कभू नइ गुने रहिस राकेश हा। 

                            राकेश बैंक मैनेजर बनगे हाबे अउ आज मोहनी के घर ला कुर्की करे बर आये हाबे अपन मातहत मन संग। मोहनी के गरबी ददा हा लोन मा ट्रेक्टर लेये रिहिन अउ किश्त नइ पटा सके हाबे। बैंक तो नीति नियम अउ कानून ले चलथे। फेर बेरा हा झुका देथे घमंड करइया ला। 

"वन टाइम सेटलमेंट के योजना घला हाबे बाबू जी ! पचास प्रतिशत राशि ला जमा कर दे हफ्ता  दिन मा ताहन कुर्की  नइ होवय।''

बैंक मैनेजर राकेश मोहनी के ददा ला समझाये लागिस। कहाँ ले लानहूं अतका पईसा। ददा मने मन गुने लागिस अउ नीरस होवत किहिस।

"हँव ! कोनो उदिम करहूँ। कोनो सगा संबंधी ले माँगहूं...!''

संसो करत किहिस ददा हा। 

"बाबू जी ! मोहनी कहाँ हे ? .... अउ का करथे आजकल ?  

"मोहनी...?''

कुछू नइ गोठिया सकिस ददा हा अउ बड़का घर के कोंटा वाली कुरिया कोती ला देखावत किहिस।

"वो दे वोती हाबे अभागिन हा।''

"धक्क ले लागिस जी हा राकेश के। कच्च ले लागिस करेजा हा अउ गोड़ गरू लागे कस लागिस। गरू गोड़ ला उसालत जावत हे। वोकर आने स्टाफ मन उही मेर थिरागे।  कुरिया के कपाट उघरा हाबे। 

''खिड़- खिड़ खिड़- खिड़ ''

 कपाट के सांकल ला हला के बजाए लागिस राकेश हा। 

"कोन ? आवत हावंव।''

मोहनी के गुरतुर गोठ राकेश के कान मा परिस। राकेश अधीर होवत हाबे मोहनी ले मिले बर । ....फेर मोहनी ला तो बिलम होवत हाबे। एक घड़ी घला अब्बड़ बेरा लगत हाबे।.... कइसे बिलम नइ होही। अपंगही बर तो जम्मो बुता धिरन लागथे। .....अउ जब निकलिस बाहिर तब तो सुकुरदुम होगे दूनों कोई। मोहनी थरथराये लागिस। एक गोड़ मा कतका दम ? उदुप ले पाउ गिरगे इही हड़बड़ाहट मा। राकेश झटकुन सम्हाल लिस। ससन भर देखिस राकेश हा मोहनी ला। कुमलाये चेहरा, सुन्ना आँखी अउ हफरत मोहनी। 

आँखी उघरा दूनों के, न हूंकत हे न भूंकत हे। चुप... कलेचुप। सुई... सुई .... पंखा के डेना के किंजरे के आरो आवत हाबे। ...आरो आवत हाबे धड़कन के धड़क... धड़क । .....बेरा थिरागे अब। ....फेर कब तक बेरा थिराए रही। मौन टुटीस । अउ दुनो कोई अपन आप ला सम्हाले के उदिम करिन। राकेश पंदोली दिस। एक दूसर के आँखीं टकराइस। दूनों के आँखी ले अरपा पैरी बोहावत हाबे। 

"ये का होगे.....?''

राकेश के आँखी गोठियाये लागिस। 

भोपाल ले आवत रेहेंव।...... जम्मो यात्रा सुघ्घर रिहिस अउ गाँव के सियार मा अमरेंव तभेच केचबिल लगे ट्रेक्टर मा एक्सीडेंट होगे। मेंहा तो बेसुध हो गेंव अउ जब सुध आइस तब एक गोड़ वाली होगे रेहेंव। 

"मेंहा तो विधायक के बेटा संग बिहाव होगे होही काहत रेहेंव मोहनी ! कभू फोन घला नइ करेस ? 

"नहीं, कोनो खोरी ला कोन गोसाइन बनाथे राकेश ! तहूं तो मोला फोन नइ करेस ?''

"हँव, मेंहा तो करे रेहेंव फेर  रिजेक्ट कॉल में डाल दे रिहिस मोर नंबर ला।

"जब मोबाइल नइ रिहिस तब अब्बड़ सुख दुख के संगी संगवारी रिहिस, अब्बड़ गोठियइया रिहिन फेर मोबाइल आगे तब कोनो गोठियाइया  नइ होइस। का करहूं....? 

रोज अगोरा करत रेहेंव तोर ...! कभू घर आबे अइसे फेर.....!''

आये हँव न आज।  

"अच्छा ते सुना...?  तोर होगे बिहाव ? के झन लोग लईका हाबे ?''

मोहनी नकली मुचकावत किहिस।

"न..... नहीं.... नइ होए हाबे।''

"काबर नइ करेस बिहाव ! अब तो नौकरी घला लगगे हाबे। कोनो घला मिल जाही...! काबर नइ करेस बिहाव ?''

तोर बर.... नइ करेंव बिहाव। फेर तोर आगू आए के सामरथ नइ होइस।

सिरतोन 

तोर किरिया।

तहूँ ला कर लेना रिहिस। काबर नइ करेस बिहाव ?

तोर बर ......!

दूनों के हाथ एक दूसर मा धराए हाबे सात जनम तक साथ निभाए बर अब...। 

                    चन्द्रहास साहू 

                       धमतरी